Sunday, February 8, 2026

युवाओं को लुभा रही पुस्तक


जनवरी में देश के विभिन्न हिस्सों में कई तरह से साहित्यिक आयोजन हुए। दिल्ली में विश्व पुस्तक मेला का आयोजन, छत्तीसगढ़ की राजधानी में रायपुर साहित्य उत्सव, चेन्नई में पुस्तक मेला और उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में साहित्य उत्सव। साहित्यिक आयोजन इस कारण कि वहां लेखकों से संवाद के अलावा पुस्तकों की बिक्री भी हुई। दिल्ली में आयोजित विश्व पुस्तक मेला में पुस्तकों की बिक्री के अलावा फेस्टिवल आफ फेस्टिवल्स का भी आयोजन हुआ। उपलब्ध जानकारी के अनुसार देश के विभिaन्न हिस्सों में आयोजित होनेवाले साहित्योत्सवों ने एक ही मंच पर अलग अलग संवाद सत्र किए। विश्व पुस्तक मेला में पुरी लिटरेचर फेस्टिवल, नालंदा लिट फेस्ट, कोलकाता लिटरेचर फेस्टिवल, भारत लिटरेचर फेस्टिवल आदि ने अपने आयोजन किए। रायपुर साहित्य उत्सव और मुरादाबाद में पुस्तक मेला भी लगा था। लग अलग प्रकाशकों के स्टाल थे। चेन्नई पुस्तक मेला में भी लेखकों से संवाद का कार्यक्रम था। इन सब आयोजनों का स्वरूप अलग था लेकिन एक बात इनमें समान रूप से लक्षित की गई कि पुस्तकों को लेकर समाज में, विशेषकर युवाओं में जबरदस्त आकर्षण देखने को मिला। साहित्य के सत्रों में भी युवाओं की भागीदारी रही। इन आयोजनों ने उस धारणा का निषेध किया कि आज के युवा रील्स देखने में व्यस्त हैं और पुस्तकों और पठन-पाठन में उनकी रुचि घट रही है। ऐसा सिर्फ गमारे देश में नहीं हो रहा है, अमेरिका और यूरोप में भी पुस्तकों की बिक्री बढ़ी है। 

विश्व पुस्तक मेला, दिल्ली के आयोजकों के मुताबिक इस बार मेले में पिछले वर्ष की तुलना में 20 प्रतिशत अधिक पुस्तक प्रेमी पहुंचे। पहले ही दिन से वहां प्रकाशकों के चेहरे खिले हुए थे। प्रकाशकों के चेहरे तभी खिलते हैं जब बिक्री अच्छी होती है। तीन चार प्रकाशकों से बात करने पर ये अनुमान हुआ कि पुस्तकों की बिक्री पिछले वर्ष की तुलना में करीब 30 प्रतिशत अधिक रही है। इस बार विश्व पुस्तक मेला में प्रवेश में कोई टिकट नहीं रखा गया था। कई नवाचार भी किए गए थे। सैन्य इतिहास की थीम पर सजे मेले में सैनिकों की वीरता और शौर्य की कहानियों की पुस्तकें बिक रही थीं, उनपर चर्चा सत्र आयोजित किए गए थे। रेखांकित करनेवाली बात ये रही कि भारत मंडपम में आयोजित पुस्तक मेले में स्वच्छता और अनुशासन का बहुत ध्यान रखा गया था। चेन्नई पुस्तक मेला में बिक्री का आंकड़ा भी उत्साहवर्धक रहा। मुरादाबाद में चार दिनों के आयोजन में सम्मिलित होकर लौटे एक प्रकाशक ने बताया कि स्थानीय होने के बावजूद उनके स्टाल से डेढ़ लाख रुपये से अधिक की बिक्री हुई। रायपुर साहित्य उत्सव के पुस्तक मेले में भी जमकर पुस्तकों की बिक्री हुई। एक प्रकाशक ने तो बताया कि वो जितनी पुस्तकें लेकर आए थे सभी लगभग समाप्त हो गईं। वहां भी युवा खरीदारों की संख्या बहुत अधिक थी। रायपुर् साहित्य उत्सव में तमाशा नहीं था बल्कि साहित्य केंद्र में था। फिल्मों से भी वही लोग आमंत्रित थे जो गंभीर बातें कर सकते थे। इन दिनों आमतौर पर साहित्य उत्सव के नाम पर बीते जमाने के फिल्मी सितारों को आमंत्रित कर लिया जाता है ताकि उनके नाम पर भीड़ जुट सके। रायपुर साहित्य उत्सव और विश्व पुस्तक मेला ने ये साबित किया कि पाठकों को साहित्य और उसकी विधाओं पर गंभीर चर्चा चाहिए। 

जो लोग हिंदी की पुस्तकों को लेकर चिंता प्रकट कर रहे थे उनको भी युवा पुस्तक प्रेमियों ने अपने पुस्तक प्रेम से चौंकाया है। युवाओं के पुस्तकों के पास पहुंचने का मुख्य कारण जो समझ में आता है वो ये कि हिंदी लेखन में विविधता आई है। हिंदी में एक ही तरह की कहानी, कविताओं और उपन्यासों ने पाठकों को दूर किया था। जब से हिंदी लेखन में विविधता आई है और जमकर कथेतर लेखन होने लगा है तो पाठक भी इस ओर आकर्षित होने लगे। अन्य भाषाओं से हिंदी में अनुदित पुस्तकें भी खूब बिक रही हैं। सिनेमा,स्थानीय कहानियां, तकनीक, विज्ञान आदि पर जिस तरह से पुस्तकें आ रही हैं उसने युवा पाठकों के बीच एक उत्सुकता जगाई है। फिक्शन में भी फार्मूलाबद्ध लेखन के चौखटे को तोड़कर कई लेखकों ने देसी कहानियों और देसी माहौल को रचा। इंटरनेट मीडिया पर पुस्तकों की जानकारियां और चर्चा होने के कारण पुस्तकों का व्यापक प्रचार प्रसार होने लगा। पाठकों के बीच पुस्तकों को लेकर उत्सुकता बनी। ई कामर्स प्लेटफार्म पर तो पुस्तकें पहले से बिक रही थीं अब क्विक कामर्स प्लेटफार्म पर भी पुस्तकें उपलब्ध होने लगी हैं। आप पुस्तक के बारे में सोचें, आर्डर करें और 10 से 15 मिनट में पुस्तक आपके हाथ में पहुंच जाती है। इसने भी समाज में एक वातावरण का निर्माण किया। ये भी प्रचार किया गया कि भारत में युवाओं की एकाग्रता अवधि (कंस्ट्रेशन स्पैन) चंद सेकेंड की रह गई है। जब ये भ्रामक प्रचार फैला तो युवाओँ ने अपनी एकाग्रता अवधि को जांचने के लिए पुस्तकों की ओर लौटना आरंभ किया। परिणाम ये हुआ वो पुस्तकों के नजदीक पहुंचे और उनको पढ़ने में आनंद आने लगा। प्रकाशन व्यवसाय से जुड़े लोगों का कहना है कि कोरोना काल के दौरान पुस्तकों के प्रति रुझान देखने को मिला था। कोरोना काल के समाप्त होने के बाद ये रुझान आकर्षण में बदला। एक और कारण जो समझ में आता है वो ये कि पुस्तकों का प्रोडक्शन भी उन्नत कोटि का हो गया है। अच्छी छपाई और अच्छी प्रिंटिंग और बाइंडिंग के कारण पाठकों को पुस्तकों ने अपनी ओर खींचा। पहले की तुलना में पुस्तकों के मूल्य भी तर्कसंगत हुए। पेपरबैक संस्करण की क्वालिटी भी अच्छी होने लगी है। कुल मिलाकर देखा जाए तो इन आयोजनों में किशोरों और युवाओं की भागीदारी पुस्तकों के प्रति आश्वस्ति देती प्रतीत होती है।


Saturday, February 7, 2026

जातिसूचक फिल्म शीर्षक पर बवाल


इस सप्ताह मनोज वाजयेपी अभिनीत फिल्म घूसखोर पंडत के नाम पर उठा विवाद उठा। ये फिल्म ओवर द टाप प्लेटफार्म (ओटीटी) नेटफ्लिक्स पर रिलीज होनेवाली थी। उसका ट्रेलर सामने आते ही इसके नाम को लेकर विवाद आरंभ हो गया। कई शहरों में इसके विरुद्ध प्रदर्शन हुए। लखनऊ में केस दर्ज होने और भारत सरकार के दखल के बाद फिल्म के निर्माताओँ ने ना सिर्फ ट्रेलर बल्कि इंटरनेट मीडिया पर मौजूद सभी प्रकार की प्रचार सामग्री हटा ली। फिल्म के निर्देशक ने एक लिखित बयान जारी किया जिसमें अपनी सफाई दी। कहा कि फिल्म का टाइटल एक कालपनिक चरित्र को ध्यान में रखकर तय किया गया था। फिल्म के शीर्षक किसी समुदाय विशेष को लक्षित करने के इरादे नहीं रखा गया था। अपने लंबे बयान में नीरज ने अपने पूर्व के कामों को भी याद किया। ये भी स्वीकार किया कि इस फिल्म के शीर्षक से कुछ लोगों की भावनाएं आहत हुई हैं। वो लोगों की भावनाओं का सम्मान करते हुए फिल्म से जुड़ी सभी प्रचारात्मक सामग्री हटा रहे हैं। जल्द ही फिल्म को दर्शकों के सामने पेश करने का भरोसा भी दिया। अपने बयान में नीरज ने कंटेंट के इंटेट की बात भी की। प्रश्न ये उठता है कि बार-बार हिंदुओं को ही क्यों लक्षित किया जाता है। नीरज पांडे को ऐसी कहानी कैसे मिली कि उसमें पंडत को ही घूसखोर दिखाया गया। क्या नीरज पांडे कभी ऐसी कहानी पर काम कर पाएंगें या ऐसी फिल्म बनाने का साहस कर पाएंगे जिसका शीर्षक घूसखोर मौलाना या भ्रष्ट पादरी होगा। उत्तर नकारात्मक ही होगा।

नीरज पांडे की इस फिल्म ने एक बार फिर से हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की मंशा पर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। एक बार फिर से ओटीटी प्लेटफार्म के नियमन को लेकर चर्चा होने लगी है। क्या ओटीटी के लिए भी किसी प्रकार के प्रमाणन या नियमन की आवश्यकता है। ये पहली बार नहीं हो रहा है कि ओटीटी प्लेटपार्म पर चलनेवाली सामग्री को लेकर जनता का गुस्सा फूटा हो। इसके पहले भी याद करिए जब राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा समारोह आयोजित होनेवाला था तो उसके कुछ दिनों पूर्व नेटफ्लिक्स पर एक तमिल फिल्म अन्नपूर्णी रिलीज की गई। नेटफ्लिक्स पर प्रसारित इस फिल्म में दिखाया गया था एक ब्राह्मण लड़की देश का श्रेष्ठ शेफ बनना चाहती है। उसको कहा गया कि इसके लिए उसको नानवेज खाना बनाना होगा। इस फिल्म के संवाद में प्रभु श्रीराम को मांसाहारी बताया गया। हिंदू लड़की को नमाज पढ़ते हुए दिखाया गया। तर्क ये दिया गया कि उसने बिरयानी बनाना एक मुस्लिम महिला से सीखा था इसलिए आभार प्रकट करने के लिए उसने नमाज पढ़ी। नेटफ्लिक्स पर आने के बाद इसके संवाद और दृष्य पर मुकदमा हुआ। केस के बाद इसके निर्माता कंपनी ने क्षमा मांगी। इस फिल्म को नेटफ्लिक्स से हटाया गया। ये सब कलात्मक अभिव्यक्ति के नाम पर हुआ लेकिन 22 जनवरी को श्रीरामजन्मभमि मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के पहले इस तरह के कंटेंट का आना इंटेंट पर प्रश्न तो खड़े करता ही है। सिर्फ नेटफ्लिक्स ही क्यों प्राइम वीडियो पर जब वेबसीरीज तांडव रिलीज हो रही थी तब उसको लेकर भी काफी हंगामा हुआ था। लखनऊ में केस दर्ज हुआ था। प्राइम वीडियो से जुड़ी अपर्णा पुरोहित से लखनऊ पुलिस ने पूछताछ भी की थी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुरोहित को अग्रिम जमानत देने से मना कर दिया था। पिछले कई सालों से ओटीटी प्लेटफॉर्म पर दिखाई जानेवाले वेब सीरीज की सामग्री और फिल्मों को लेकर विवाद होते रहे हैं। हिंदू धर्म प्रतीकों के गलत चित्रण के आरोप लगते रहे हैं। दरअसल स्वनियमन या त्रिस्तरीय नियमन के नाम पर जो व्यवस्था बनाई गई है उसमें बहुत सारे झोल हैं। उन्हीं झोल का फायदा ये प्लेटफार्म्स उठाते रहे हैं। यूजीसी गाइडलाइंस को लेकर समाज का एक वर्ग उद्वेलित था। ऐसे वातावरण में घूसखोर पंडत की घोषणा ने उनके जख्मों पर नमक छिड़कने का काम किया।

एक दूसरा समाचार जो दिल्ली पुलिस के हवाले से सामने आया। समाचार था दिल्ली से गायब होनेवाली लड़कियों और महिलाओं को लेकर। अचानक इंटरनेट मीडिया पर इस खबर ने जोर पकड़ा कि दिल्ली से भारी संख्या में लड़कियां और महिलाएं गायब हो रही हैं। रिपोर्ट को इस तरह से प्रस्तुत किया गया कि अमुक अवधि में अमुक संख्या में लड़कियां और महिलाएं गायब हो रही हैं। सामने आए आंकड़े डरानेवाले थे। रिपोर्ट आधारित समाचार में गुमशुदा लोगों की बरामदगी का उल्लेख नहीं था। बाद में इन आंकड़ों पर विमर्श बढ़ा। देश की राजधानी में जब ये विमर्श बढ़ा तो दिल्ली पुलिस हरकत में आई। पुलिस ने अपने एक्स हैंडल पर पोस्ट करके बताया कि चंद संकेतों या प्रारंभिक जानकारी को जांचने के बाद ये सामने आया कि दिल्ली से गुमशुदा लड़कियों की संख्या पेड प्रमोशन का हिस्सा है। दिल्ली पुलिस ने स्पष्ट किया कि डर का माहौल बनाकर लाभ कमाने वालों को बख्शा नहीं जाएगा और इस तरह का वातावरण बनानेवालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। ये स्पष्ट तो नहीं है कि कौन इस तरह का वातावरण बनाकर लाभ कमाना चाहता है। संयोग है कि इसी समय फिल्म मर्दानी-3 रिलीज हुई थी। इस फिल्म की कहानी भी गुमशुदा लड़कियों और उनकी बरामदगी की है जिसमें रानी मुखर्जी लीड रोल में है। कैसे लड़कियां गायब होती हैं और किन-किन गैंगों का इसमें हाथ रहता है। यह बिल्कुल नहीं कहा जा रहा है कि मर्दानी फिल्म को लाभ पहुंचाने के लिए ही दिल्ली में लड़कियों के गायब होने की रिपोर्ट पर चर्चा हुई। अगर दिल्ली पुलिस कह रही है कि उस रिपोर्ट को प्रचारित करना पेड प्रमोशन का हिस्सा है तो उसको इसकी जांच तो करनी ही चाहिए। पेड प्रमोशन में हिस्सा लेकर लाभ कमाने की कोशिश करनेवालों को दिल्ली पुलिस को सामने लाना चाहिए।

एक तर्क ये भी दिया जा रहा है कि प्रचार के लिए घूसखोर पंडत नाम रख दिया गया। इस तरह के तर्क के बाद दर्शक ये सोचने को विवश हो जाता है कि क्या फिल्मकारों को अब अपनी कला पर भरोसा नहीं रहा। क्या उनको अपनी स्टोरीटेलिंग पर विश्वास नहीं रहा और वो प्रचार के विभिन्न हथकंडों को अपनाने लगा। फिल्म धुरंधर ने 1000 करोड़ रुपए से अधिक का बिजनेस किया लेकिन फिल्म को सफल बनाने के लिए निर्देशक आदित्य धर ने किसी प्रकार के सनसनी फैलाने वाले हथकंडे का उपयोग नहीं किया। आदित्य धर कहानी कहने के अपने हुनर और फिल्म की कहानी पर भरोसा था। दर्शकों ने उस भरोसे को सही साबित किया। धुरंधर को लेकर भी कुछ लोगों ने नकारात्मक प्रचार करने की कोशिश की लेकिन उसको दर्शकों ने नकार दिया। हिंदी फिल्मों में जब से भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) से जुड़े लोग कहानी और गाने लिखने लगे तब से ही सनातन धर्म प्रतीकों का उपहास बढ़ा। इस स्तंभ में पिछले दिनों जावेद अख्तर से पूछे गए प्रश्न की चर्चा की थी। वो प्रश्न अब भी अनुत्तरित है कि क्या लेखक का मजहब उसकी कृति को प्रभावित करती है। अब उस प्रश्न का दायरा और बढ़ा देता हूं कि क्या लेखक की विचारधारा कहानी में जबरदस्ती अपने विचार ठूंसती है।