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Sunday, February 8, 2026

युवाओं को लुभा रही पुस्तक


जनवरी में देश के विभिन्न हिस्सों में कई तरह से साहित्यिक आयोजन हुए। दिल्ली में विश्व पुस्तक मेला का आयोजन, छत्तीसगढ़ की राजधानी में रायपुर साहित्य उत्सव, चेन्नई में पुस्तक मेला और उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में साहित्य उत्सव। साहित्यिक आयोजन इस कारण कि वहां लेखकों से संवाद के अलावा पुस्तकों की बिक्री भी हुई। दिल्ली में आयोजित विश्व पुस्तक मेला में पुस्तकों की बिक्री के अलावा फेस्टिवल आफ फेस्टिवल्स का भी आयोजन हुआ। उपलब्ध जानकारी के अनुसार देश के विभिaन्न हिस्सों में आयोजित होनेवाले साहित्योत्सवों ने एक ही मंच पर अलग अलग संवाद सत्र किए। विश्व पुस्तक मेला में पुरी लिटरेचर फेस्टिवल, नालंदा लिट फेस्ट, कोलकाता लिटरेचर फेस्टिवल, भारत लिटरेचर फेस्टिवल आदि ने अपने आयोजन किए। रायपुर साहित्य उत्सव और मुरादाबाद में पुस्तक मेला भी लगा था। लग अलग प्रकाशकों के स्टाल थे। चेन्नई पुस्तक मेला में भी लेखकों से संवाद का कार्यक्रम था। इन सब आयोजनों का स्वरूप अलग था लेकिन एक बात इनमें समान रूप से लक्षित की गई कि पुस्तकों को लेकर समाज में, विशेषकर युवाओं में जबरदस्त आकर्षण देखने को मिला। साहित्य के सत्रों में भी युवाओं की भागीदारी रही। इन आयोजनों ने उस धारणा का निषेध किया कि आज के युवा रील्स देखने में व्यस्त हैं और पुस्तकों और पठन-पाठन में उनकी रुचि घट रही है। ऐसा सिर्फ गमारे देश में नहीं हो रहा है, अमेरिका और यूरोप में भी पुस्तकों की बिक्री बढ़ी है। 

विश्व पुस्तक मेला, दिल्ली के आयोजकों के मुताबिक इस बार मेले में पिछले वर्ष की तुलना में 20 प्रतिशत अधिक पुस्तक प्रेमी पहुंचे। पहले ही दिन से वहां प्रकाशकों के चेहरे खिले हुए थे। प्रकाशकों के चेहरे तभी खिलते हैं जब बिक्री अच्छी होती है। तीन चार प्रकाशकों से बात करने पर ये अनुमान हुआ कि पुस्तकों की बिक्री पिछले वर्ष की तुलना में करीब 30 प्रतिशत अधिक रही है। इस बार विश्व पुस्तक मेला में प्रवेश में कोई टिकट नहीं रखा गया था। कई नवाचार भी किए गए थे। सैन्य इतिहास की थीम पर सजे मेले में सैनिकों की वीरता और शौर्य की कहानियों की पुस्तकें बिक रही थीं, उनपर चर्चा सत्र आयोजित किए गए थे। रेखांकित करनेवाली बात ये रही कि भारत मंडपम में आयोजित पुस्तक मेले में स्वच्छता और अनुशासन का बहुत ध्यान रखा गया था। चेन्नई पुस्तक मेला में बिक्री का आंकड़ा भी उत्साहवर्धक रहा। मुरादाबाद में चार दिनों के आयोजन में सम्मिलित होकर लौटे एक प्रकाशक ने बताया कि स्थानीय होने के बावजूद उनके स्टाल से डेढ़ लाख रुपये से अधिक की बिक्री हुई। रायपुर साहित्य उत्सव के पुस्तक मेले में भी जमकर पुस्तकों की बिक्री हुई। एक प्रकाशक ने तो बताया कि वो जितनी पुस्तकें लेकर आए थे सभी लगभग समाप्त हो गईं। वहां भी युवा खरीदारों की संख्या बहुत अधिक थी। रायपुर् साहित्य उत्सव में तमाशा नहीं था बल्कि साहित्य केंद्र में था। फिल्मों से भी वही लोग आमंत्रित थे जो गंभीर बातें कर सकते थे। इन दिनों आमतौर पर साहित्य उत्सव के नाम पर बीते जमाने के फिल्मी सितारों को आमंत्रित कर लिया जाता है ताकि उनके नाम पर भीड़ जुट सके। रायपुर साहित्य उत्सव और विश्व पुस्तक मेला ने ये साबित किया कि पाठकों को साहित्य और उसकी विधाओं पर गंभीर चर्चा चाहिए। 

जो लोग हिंदी की पुस्तकों को लेकर चिंता प्रकट कर रहे थे उनको भी युवा पुस्तक प्रेमियों ने अपने पुस्तक प्रेम से चौंकाया है। युवाओं के पुस्तकों के पास पहुंचने का मुख्य कारण जो समझ में आता है वो ये कि हिंदी लेखन में विविधता आई है। हिंदी में एक ही तरह की कहानी, कविताओं और उपन्यासों ने पाठकों को दूर किया था। जब से हिंदी लेखन में विविधता आई है और जमकर कथेतर लेखन होने लगा है तो पाठक भी इस ओर आकर्षित होने लगे। अन्य भाषाओं से हिंदी में अनुदित पुस्तकें भी खूब बिक रही हैं। सिनेमा,स्थानीय कहानियां, तकनीक, विज्ञान आदि पर जिस तरह से पुस्तकें आ रही हैं उसने युवा पाठकों के बीच एक उत्सुकता जगाई है। फिक्शन में भी फार्मूलाबद्ध लेखन के चौखटे को तोड़कर कई लेखकों ने देसी कहानियों और देसी माहौल को रचा। इंटरनेट मीडिया पर पुस्तकों की जानकारियां और चर्चा होने के कारण पुस्तकों का व्यापक प्रचार प्रसार होने लगा। पाठकों के बीच पुस्तकों को लेकर उत्सुकता बनी। ई कामर्स प्लेटफार्म पर तो पुस्तकें पहले से बिक रही थीं अब क्विक कामर्स प्लेटफार्म पर भी पुस्तकें उपलब्ध होने लगी हैं। आप पुस्तक के बारे में सोचें, आर्डर करें और 10 से 15 मिनट में पुस्तक आपके हाथ में पहुंच जाती है। इसने भी समाज में एक वातावरण का निर्माण किया। ये भी प्रचार किया गया कि भारत में युवाओं की एकाग्रता अवधि (कंस्ट्रेशन स्पैन) चंद सेकेंड की रह गई है। जब ये भ्रामक प्रचार फैला तो युवाओँ ने अपनी एकाग्रता अवधि को जांचने के लिए पुस्तकों की ओर लौटना आरंभ किया। परिणाम ये हुआ वो पुस्तकों के नजदीक पहुंचे और उनको पढ़ने में आनंद आने लगा। प्रकाशन व्यवसाय से जुड़े लोगों का कहना है कि कोरोना काल के दौरान पुस्तकों के प्रति रुझान देखने को मिला था। कोरोना काल के समाप्त होने के बाद ये रुझान आकर्षण में बदला। एक और कारण जो समझ में आता है वो ये कि पुस्तकों का प्रोडक्शन भी उन्नत कोटि का हो गया है। अच्छी छपाई और अच्छी प्रिंटिंग और बाइंडिंग के कारण पाठकों को पुस्तकों ने अपनी ओर खींचा। पहले की तुलना में पुस्तकों के मूल्य भी तर्कसंगत हुए। पेपरबैक संस्करण की क्वालिटी भी अच्छी होने लगी है। कुल मिलाकर देखा जाए तो इन आयोजनों में किशोरों और युवाओं की भागीदारी पुस्तकों के प्रति आश्वस्ति देती प्रतीत होती है।


Saturday, February 7, 2026

जातिसूचक फिल्म शीर्षक पर बवाल


इस सप्ताह मनोज वाजयेपी अभिनीत फिल्म घूसखोर पंडत के नाम पर उठा विवाद उठा। ये फिल्म ओवर द टाप प्लेटफार्म (ओटीटी) नेटफ्लिक्स पर रिलीज होनेवाली थी। उसका ट्रेलर सामने आते ही इसके नाम को लेकर विवाद आरंभ हो गया। कई शहरों में इसके विरुद्ध प्रदर्शन हुए। लखनऊ में केस दर्ज होने और भारत सरकार के दखल के बाद फिल्म के निर्माताओँ ने ना सिर्फ ट्रेलर बल्कि इंटरनेट मीडिया पर मौजूद सभी प्रकार की प्रचार सामग्री हटा ली। फिल्म के निर्देशक ने एक लिखित बयान जारी किया जिसमें अपनी सफाई दी। कहा कि फिल्म का टाइटल एक कालपनिक चरित्र को ध्यान में रखकर तय किया गया था। फिल्म के शीर्षक किसी समुदाय विशेष को लक्षित करने के इरादे नहीं रखा गया था। अपने लंबे बयान में नीरज ने अपने पूर्व के कामों को भी याद किया। ये भी स्वीकार किया कि इस फिल्म के शीर्षक से कुछ लोगों की भावनाएं आहत हुई हैं। वो लोगों की भावनाओं का सम्मान करते हुए फिल्म से जुड़ी सभी प्रचारात्मक सामग्री हटा रहे हैं। जल्द ही फिल्म को दर्शकों के सामने पेश करने का भरोसा भी दिया। अपने बयान में नीरज ने कंटेंट के इंटेट की बात भी की। प्रश्न ये उठता है कि बार-बार हिंदुओं को ही क्यों लक्षित किया जाता है। नीरज पांडे को ऐसी कहानी कैसे मिली कि उसमें पंडत को ही घूसखोर दिखाया गया। क्या नीरज पांडे कभी ऐसी कहानी पर काम कर पाएंगें या ऐसी फिल्म बनाने का साहस कर पाएंगे जिसका शीर्षक घूसखोर मौलाना या भ्रष्ट पादरी होगा। उत्तर नकारात्मक ही होगा।

नीरज पांडे की इस फिल्म ने एक बार फिर से हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की मंशा पर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। एक बार फिर से ओटीटी प्लेटफार्म के नियमन को लेकर चर्चा होने लगी है। क्या ओटीटी के लिए भी किसी प्रकार के प्रमाणन या नियमन की आवश्यकता है। ये पहली बार नहीं हो रहा है कि ओटीटी प्लेटपार्म पर चलनेवाली सामग्री को लेकर जनता का गुस्सा फूटा हो। इसके पहले भी याद करिए जब राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा समारोह आयोजित होनेवाला था तो उसके कुछ दिनों पूर्व नेटफ्लिक्स पर एक तमिल फिल्म अन्नपूर्णी रिलीज की गई। नेटफ्लिक्स पर प्रसारित इस फिल्म में दिखाया गया था एक ब्राह्मण लड़की देश का श्रेष्ठ शेफ बनना चाहती है। उसको कहा गया कि इसके लिए उसको नानवेज खाना बनाना होगा। इस फिल्म के संवाद में प्रभु श्रीराम को मांसाहारी बताया गया। हिंदू लड़की को नमाज पढ़ते हुए दिखाया गया। तर्क ये दिया गया कि उसने बिरयानी बनाना एक मुस्लिम महिला से सीखा था इसलिए आभार प्रकट करने के लिए उसने नमाज पढ़ी। नेटफ्लिक्स पर आने के बाद इसके संवाद और दृष्य पर मुकदमा हुआ। केस के बाद इसके निर्माता कंपनी ने क्षमा मांगी। इस फिल्म को नेटफ्लिक्स से हटाया गया। ये सब कलात्मक अभिव्यक्ति के नाम पर हुआ लेकिन 22 जनवरी को श्रीरामजन्मभमि मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के पहले इस तरह के कंटेंट का आना इंटेंट पर प्रश्न तो खड़े करता ही है। सिर्फ नेटफ्लिक्स ही क्यों प्राइम वीडियो पर जब वेबसीरीज तांडव रिलीज हो रही थी तब उसको लेकर भी काफी हंगामा हुआ था। लखनऊ में केस दर्ज हुआ था। प्राइम वीडियो से जुड़ी अपर्णा पुरोहित से लखनऊ पुलिस ने पूछताछ भी की थी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुरोहित को अग्रिम जमानत देने से मना कर दिया था। पिछले कई सालों से ओटीटी प्लेटफॉर्म पर दिखाई जानेवाले वेब सीरीज की सामग्री और फिल्मों को लेकर विवाद होते रहे हैं। हिंदू धर्म प्रतीकों के गलत चित्रण के आरोप लगते रहे हैं। दरअसल स्वनियमन या त्रिस्तरीय नियमन के नाम पर जो व्यवस्था बनाई गई है उसमें बहुत सारे झोल हैं। उन्हीं झोल का फायदा ये प्लेटफार्म्स उठाते रहे हैं। यूजीसी गाइडलाइंस को लेकर समाज का एक वर्ग उद्वेलित था। ऐसे वातावरण में घूसखोर पंडत की घोषणा ने उनके जख्मों पर नमक छिड़कने का काम किया।

एक दूसरा समाचार जो दिल्ली पुलिस के हवाले से सामने आया। समाचार था दिल्ली से गायब होनेवाली लड़कियों और महिलाओं को लेकर। अचानक इंटरनेट मीडिया पर इस खबर ने जोर पकड़ा कि दिल्ली से भारी संख्या में लड़कियां और महिलाएं गायब हो रही हैं। रिपोर्ट को इस तरह से प्रस्तुत किया गया कि अमुक अवधि में अमुक संख्या में लड़कियां और महिलाएं गायब हो रही हैं। सामने आए आंकड़े डरानेवाले थे। रिपोर्ट आधारित समाचार में गुमशुदा लोगों की बरामदगी का उल्लेख नहीं था। बाद में इन आंकड़ों पर विमर्श बढ़ा। देश की राजधानी में जब ये विमर्श बढ़ा तो दिल्ली पुलिस हरकत में आई। पुलिस ने अपने एक्स हैंडल पर पोस्ट करके बताया कि चंद संकेतों या प्रारंभिक जानकारी को जांचने के बाद ये सामने आया कि दिल्ली से गुमशुदा लड़कियों की संख्या पेड प्रमोशन का हिस्सा है। दिल्ली पुलिस ने स्पष्ट किया कि डर का माहौल बनाकर लाभ कमाने वालों को बख्शा नहीं जाएगा और इस तरह का वातावरण बनानेवालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। ये स्पष्ट तो नहीं है कि कौन इस तरह का वातावरण बनाकर लाभ कमाना चाहता है। संयोग है कि इसी समय फिल्म मर्दानी-3 रिलीज हुई थी। इस फिल्म की कहानी भी गुमशुदा लड़कियों और उनकी बरामदगी की है जिसमें रानी मुखर्जी लीड रोल में है। कैसे लड़कियां गायब होती हैं और किन-किन गैंगों का इसमें हाथ रहता है। यह बिल्कुल नहीं कहा जा रहा है कि मर्दानी फिल्म को लाभ पहुंचाने के लिए ही दिल्ली में लड़कियों के गायब होने की रिपोर्ट पर चर्चा हुई। अगर दिल्ली पुलिस कह रही है कि उस रिपोर्ट को प्रचारित करना पेड प्रमोशन का हिस्सा है तो उसको इसकी जांच तो करनी ही चाहिए। पेड प्रमोशन में हिस्सा लेकर लाभ कमाने की कोशिश करनेवालों को दिल्ली पुलिस को सामने लाना चाहिए।

एक तर्क ये भी दिया जा रहा है कि प्रचार के लिए घूसखोर पंडत नाम रख दिया गया। इस तरह के तर्क के बाद दर्शक ये सोचने को विवश हो जाता है कि क्या फिल्मकारों को अब अपनी कला पर भरोसा नहीं रहा। क्या उनको अपनी स्टोरीटेलिंग पर विश्वास नहीं रहा और वो प्रचार के विभिन्न हथकंडों को अपनाने लगा। फिल्म धुरंधर ने 1000 करोड़ रुपए से अधिक का बिजनेस किया लेकिन फिल्म को सफल बनाने के लिए निर्देशक आदित्य धर ने किसी प्रकार के सनसनी फैलाने वाले हथकंडे का उपयोग नहीं किया। आदित्य धर कहानी कहने के अपने हुनर और फिल्म की कहानी पर भरोसा था। दर्शकों ने उस भरोसे को सही साबित किया। धुरंधर को लेकर भी कुछ लोगों ने नकारात्मक प्रचार करने की कोशिश की लेकिन उसको दर्शकों ने नकार दिया। हिंदी फिल्मों में जब से भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) से जुड़े लोग कहानी और गाने लिखने लगे तब से ही सनातन धर्म प्रतीकों का उपहास बढ़ा। इस स्तंभ में पिछले दिनों जावेद अख्तर से पूछे गए प्रश्न की चर्चा की थी। वो प्रश्न अब भी अनुत्तरित है कि क्या लेखक का मजहब उसकी कृति को प्रभावित करती है। अब उस प्रश्न का दायरा और बढ़ा देता हूं कि क्या लेखक की विचारधारा कहानी में जबरदस्ती अपने विचार ठूंसती है।

 

Saturday, January 31, 2026

उतरने लगा लेखक संघों के मुखौटे का रंग


हमारे देश में कम्युनिस्ट पार्टियों ने अपने बौद्धिक प्रकोष्ठ बनाए थे। उनका नाम लेखक संगठन रखा था। इन लेखक संगठनों को स्वायत्त होने का वातावरण बनाया गया था। जबकि ये परोक्ष तौर पर राजनतिक दल से जुड़े थे। लंबे समय तक यही होता रहा और इन लेखक संगठनों से जुड़े लोग राजनीतिक बयानबाजी करते रहे। राजनीतिक मुद्दों को अपनी रचनाओं में उठाते रहे। इसका लाभ उनके पितृ संगठन यानि कम्युनिस्ट पार्टियों को मिलता रहा। कालांतर में ये लेखक संगठन एक्सपोज होते चले गए। लेखक संगठन लेखकों के कल्याण के लिए कुछ नहीं करके अपने राजनीतिक आकाओं की लक्ष्य प्राप्ति का वातावरण बनाने में लगे रहे। जैसे-जैसे कम्युनिस्ट पार्टियों में विभाजन होता गया लेखक संगठन भी बंटते चले गए। प्रगतिशील के बाद जनवादी और उसके बाद जन संस्कृति नाम से संगठन बने। जनवादी लेखक संगठन और जन संस्कृति मंच तो अधिकतर वार्षिक आयोजनों तक सिमट कर रह गए हैं। नियमित रूप से फेसबुक आदि पर उनके पदाधिकारी कुछ लिखकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेते रहे हैं। फासीवाद और अधिनायकवाद जैसे नारे वर्षों से कागजों में लगते रहे हैं। यही बात अलग अलग तरीके से कम्युनिट पार्टियां भी करती रही हैं। प्रगतिशील लेखक संघ की बिहार ईकाई सक्रिय थी लेकिन अब वहां भी संगठन बंटा नजर आ रहा है। दो अलग अलग गुटों के अपने अपने पदाधिकारी हैं। ये तो इन लेखक संगठनों की स्थिति है, लेकिन अभी एक बहुत ही मजेदार स्थिति पैदा हुई है। कुछ समय पूर्व प्रगतिशील लेखक संगठन ने पूर्व पुलिस अधिकारी और कुलपति विभूति नारायण राय को अपना कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया था। 

राय के कार्यकारी अध्यक्ष बनने के बाद भी संगठन के क्रियाकलापों में तेजी आई हो ऐसा दिखा नहीं। एकाध आयोजन आदि हुए लेकिन लेखकों के व्यापक हित में संगठन ने कुछ कार्य किया हो, ज्ञात नहीं हो सका। विनोद कुमार शुक्ल और एक दो अन्य लेखकों ने प्रकाशकों को एकतरफा पत्र भेजकर पुस्तक प्रकाशन  का अधिकार वापस लेने की बात की। लेखक संगठनों ने कभी भी इन मसलों में हस्तक्षेप नहीं किया। न तो प्रकाशकों के हित में और ना ही लेखकों के हित में। इन लेखक संगठनों को ये भी समझ नहीं आ सकी कि कोई लेखक एकतरफा करार को कैसे रद कर सकता है। उसी तरह प्रकाशकों के साथ बैठकर लेखकों को मिलनेवाली रायल्टी पर भी कुछ ठोस नहीं कर सके। इनकी सारी ऊर्जा अपने राजनीतिक आकाओं को प्रसन्न करने में लगी रही। इन लेखक संगठनों ने लेखकीय अस्पृश्यता को भी जमकर बढ़ावा दिया। अपने से अलग विचारधारा वाले लेखकों के साथ संवाद नहीं करना इनकी प्राथमिकता में रहा। इस तरह लेखकों को बांटने का काम भी इन संगठनों ने किया। कभी भी इन लेखक संगठनों ने अलग अलग विचार वाले लेखकों को साथ बैठाकर साहित्यिक प्रवृत्तियों पर चर्चा करने का मंच उपलब्ध नहीं करवाया। परिणाम ये रहा कि इन लेखक संगठनों का दायरा सिकुड़ता चला गया। भारतीय समाज हमेशा से समावेशी रहा है। समाज के इस चरित्र को समझने में कम्युनिस्ट लेखक संगठन असफल रहे और अपने ही बने दायरे में घूमते रहे। विभूति नारायण राय ने प्रगतिशील लेखक संघ के कार्यकारी अध्यक्ष होने के बावजूद जब लेखक संघों की भूमिका पर सवाल उठाए तो उनके  विचार को निजी विचार माना गया। प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव सिरसा ने एक पत्र जारी किया जिसमें राय को कठघरे में खड़ा किया गया। उस पत्र में ही बताया गया कि राय ने एक इंटरव्यू में कहा कि लेखक संगठनों की अब कोई भूमिका नहीं बची है और उनको बंद कर दिया जाना चाहिए। दूसरी टिप्पणी राय की ये थी कि देश में पिछले चार दशकों से भी अधिक समय से सशक्त वामपंथी संघर्ष के अंत के आसार दिखने लगे हैं। दूसरी टिप्पणी को उन्होंने 2025 की उपलब्धि के तौर पर रेखांकित किया। 

प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव के हस्ताक्षर से जारी पत्र में लिखा गया है कि प्रगतिशील लेखक संघ का राष्ट्रीय नेतृत्व अपने कार्यकारी अध्यक्ष के विचारों से सहमत नहीं है। माओवाद के खात्मे पर सिरसा के पत्र में लिखा है कि जिन जगहों से माओवादी के सफाए को विभूति जी ने अमित शाह की उपलब्धि के तौर पर रेखांकित किया है वो सभी आदिवासी क्षेत्र हैं। जिनको माओवादी कहकर मारा गया है उन घनाओं पर भी झूठे एनकाउंटकर के आरोप लगे हैं। सिरसा के इस पत्र का विभूति नारायण राय ने उत्तर दिया और लिखा कि लेखक संगठनों को अब व्हाट्सएप लेखक संगठन कहना उचित होगा। राय ने अपने पत्र में अपनी विचारधारा का प्रदर्शन भी किया, लेकिन बहुत ही सधे तरीके से सिरसा को और उनकी आलोचना करनेवालों की ठीक से खबर भी ले ली। विभूति नारायण राय ने सिरसा के पत्र का जो उत्तर दिया है उसमें अपने इस्तीफे की पेशकश भी कर दी और संगठन के दायित्वों से मुक्त होने की बात लिखी। विभूति ने लिखा कि संगठन अनुशासन से चलता है लेकिन साहित्येतर अनुशासन किसी भी लेखक के लिए आत्महत्या जैसा है। हलांकि लेखक संघ ने उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया है। संभव है कि विभूति के तार्किक पलटवार को झेल पाने में संगठन सक्षम नहीं हो। राय ने दक्षिणपंथी सच्चिदानंद जोशी और रामबहादुर राय को कार्यक्रम में बुलाने पर भी अपना पक्ष रखा और माओवाद के खात्मे वाली टिप्पणी पर भी। प्रगतिशील लेखक संगठन के इस विवाद ने एक बार फिर से कम्युनिस्टों की बराबरी और समानता के दावों और नारों की पोल खोल दी है। कम्युनिस्ट दावे बराबरी की करते हैं लेकिन वैचारिक आधार पर समाज को बांटनेवाली ये विचारधारा अपने विरोधियों को एक मिनट भी झेल नहीं सकती। इनका चरित्र समावेशी बिल्कुल नहीं है। ये दूसरों पर फासीवादी होने का आरोप जड़ते हैं लेकिन इनका स्वयं का चरित्र फासीवादी है। ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करते हैं लेकिन अगर इनके संगठन से जुड़ा कोई व्यक्ति भी सच कहने का साहस करे तो संगठन से जुड़े लोग झुंड बनाकर उनपर आक्रमण करते हैं। उनको नेतृत्व का भी शह प्राप्त होता है। 

इस पूरे प्रसंग से एक बात साफ हो गई है कि बचे-खुचे लेखक संगठनों में आंतरिक लोकतंत्र और विमर्श की कोई जगह शेष नहीं है। इस प्रसंग में एक और खतरनाक बात सिरसा ने लिखी है। उन्होंने अन्य नामों के साथ उमर खालिद के नाम का भी उल्लेख करते हुए लिखा कि उनको कानूनी शिकंजे में फंसाकर परेशान किया जा रहा है। सिरसा को क्या ये पता नहीं कि देश की अदालतों ने उमर खालिद को जमानत देने से इंकार कर दिया है। वो दंगे का आरोपी है। दरअसल ये होता तब है जब आप राजनीतिक दल के बौद्धिक प्रकोष्ठ की तरह कार्य करते हैं। राजनीतिक दलों की राय पर चलनेवाली बुद्धिजीवियों से लेखकीय स्वतंत्रता की अपेक्षा करना ना सिर्फ बेमानी है बल्कि असंभव भी है। कम्युनिस्ट पार्टियों से संबद्ध इन लेखक संगठनों को अगर पुनर्जीवित होना है तो उनको अपने पितृ संगठनों से मुक्त होकर समावेशी और उदार बनना होगा। भारत में सोवियत रूस या चीन की नीतियां नहीं चल सकतीं, वहां का समाज अलग है और भारत का समाज अलग है।   


Saturday, January 24, 2026

साख और विश्वास पर जोखिम भरे निर्णय


भारतीय जनता पार्टी के नए अध्यक्ष ने कार्यभार संभाल लिया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह समेत पार्टी के दिग्गज नेताओं की उपस्थिति में 45 वर्ष के नितिन नवीन ने भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष पद का कार्यभार संभाल लिया। कहीं से किसी प्रकार का विरोध या विद्रोह के स्वर सुनाई नहीं दिए। जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी पार्टी के नए अध्यक्ष नितिन नवीन को उनकी कुर्सी पर बिठा रहे थे तो अचानक मेरे ध्यान में 2013 में गोवा में भारतीय जनता पार्टी कार्यकारिणी की बैठक का स्मरण हो आया। उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को पार्टी 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए कैंपेन कमेटी का अध्यक्ष बनाना चाहती थी तो कितना बवाल हुआ था। पार्टी के कई नेता पीढ़ीगत बदलाव चाहते थे। पार्टी के तत्कालीन सर्वोच्च नेता लालकृष्ण आडवाणी की जगह नेतृत्व की कमान नरेन्द्र मोदी को देने की चर्चा थी। पार्टी के एक धड़े ने तय कर लिया था कि मोदी को कमान सौंपनी है लेकिन आडवाणी और उनके खेमे को ये मंजूर नहीं था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की मोदी के नाम पर सहमति थी। गोवा में दो दिनों तक हाई वोल्टेज ड्रामा चला था। आडवाणी जी की उम्र उस समय 85 वर्ष थी और नरेन्द्र मोदी 63 वर्ष के थे। पार्टी पीढ़ीगत बदलाव के लिए तैयार हो रही थी पर आडवाणी और उनके समर्थक तैयार नहीं हो पा रहे थे। पार्टी की कार्यकारिणी की बैठक में पहले दिन आडवाणी नहीं आए। दूसरे तक उनके आने की चर्चा होती रही लेकिन आखिरकार वो नहीं आए। उनके समर्थक और पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा ने तो स्पष्ट संकेत दे दिया था कि वो नरेन्द्र मोदी के कारण नहीं आ रहे हैं। उन्होंने तब कहा भी था कि उनको नमोनिया नहीं हुआ है इस कारण वो गोवा नहीं जा रहे हैं। जसवंत सिंह, शत्रुघ्न सिन्हा जैसे नेता भी किसी बहाने से गोवा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में शामिल नहीं हुए थे। 

नरेन्द्र मोदी के बढ़ते समर्थन को देखकर लालकृष्ण आडवाणी गोवा नहीं गए थे। कार्यकारिणी की बैठक के दूसरे दिन तक ये चर्चा चलती रही थी कि दिल्ली विमानतल पर विशेष विमान खड़ा है जो आडवाणी को लकर गोवा आएगा। आडवाणी नहीं आए और उनकी अनुपस्थिति में पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने नरेन्द्र मोदी को कैंपेन कमेटी का अध्यक्ष घोषित कर दिया था। आडवाणी जी की नाराजगी बनी रही। घोषणा के अगले ही दिन उन्होंने पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह को पत्र लिखकर पार्टी के सभी पदों से त्यागपत्र देने की बात की। अपने पत्र में लालकृष्ण आडवाणी ने ये भी लिखा था कि पार्टी अपनी विचारधारा से हटती नजर आ रही है। इसके अधिकतर नेता अपना व्यक्तिगत एजेंडा चला रहे हैं। उस समय मीडिया के एक खास वर्ग ने इस विवाद को खूब हवा दी थी। गोवा प्रसंग की चर्चा सिर्फ इस कारण से ताकि पार्टी में नेतृत्व का कंट्रास्ट दिखाया जा सके। एक तरफ आडवाणी पीढ़ीगत बदलाव के लिए तैयार नहीं थे और उसको रोकने के तमाम प्रयास कर रहे थे। दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही 49 वर्ष के अमित शाह पार्टी अध्यक्ष बने। अब 45 वर्ष के नितिन नवीन पार्टी के अध्यक्ष बनाए गए हैं। भारतीय राजनीति में हमेशा से ये कहा जाता रहा है कि मजबूत नेता किसी अन्य नेता को पनपने नहीं देता है। मजबूत नेता चाहता है कि  उसके बाद नेतृत्व शून्यता की स्थिति बने। इस संबंध में इंदिरा गांधी का उदाहरण दिया जाता रहा है कि जब भी कोई कांग्रेसी मजबूत होते दिखता था तो उसके पर कतर दिए जाते थे। ये बात उस तरह के मजबूत नेता पर लागू होती है जिसको अपनी जनप्रियता या साख पर भरोसा नहीं होता है। जिस भी नेता को अपनी काबिलियत पर, जनता के बीच अपनी साख पर भरोसा होगा वो अपने संगठन को मजबूत करने का प्रयत्न करता है। नरेन्द्र मोदी लगातार तीसरी बार भारत के प्रधानमंत्री बने। उनके नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने विधानसभा चुनावों में जीत का कीर्तिमान बनाया है। नोटबंदी से लेकर कोरोना काल में जिस प्रकार से जनता ने मोदी के निर्णयों का समर्थन किया उसको भी देखा जाना चाहिए। विरोधी दलों के नेताओं का और उनके समर्थक विश्लेषकों का आकलन था कि नोटबंदी के बाद के चुनाव में मोदी को पराजय का सामना करना पड़ेगा। ये भी कहा गया कि पूरी दुनिया में जिस भी नेता ने नोटबंदी लागू की उसको जनता ने अगले चुनाव में नकार दिया। मोदी के मामले में इसके उलट हुआ। मोदी और ताकतवर बनकर उभरे। 2014 के लोकसभा चुनाव में जहां भारतीय पार्टी को 282 सीटें मिली थीं वहीं नोटबंदी के बाद हुए लोकसभा चुनाव में मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी को 300 से अधिक सीटें जीकने में कामयाब रही। लोकतंत्र में जिसको जनता पसंद करती है वही सर्वमान्य नेता माना जाता है। 

एक बात और जो नितिन नवीन के चयन से स्पष्ट हुआ है वो ये कि भारतीय जनता पार्टी जात-पात की राजनीति का निषेध करने का प्रयास कर रही है। लंबे समय तक इस देश ने जाति आधारित राजनीति और उसपर ही आधारित चयन का दौर देखा है। किसी नेता को शीर्ष पद पर चुनने या मनोनयन के पहले उसकी जाति या उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि देखी जाती रही है। बिहार और उत्तर प्रदेश के अलावा भी कई राज्यों की राजनीतिक नियुक्तियों में जातिगत संतुलन का ध्यान रखा जाता रहा है। नरेन्द्र मोदी ने भारतीय जनता पार्टी से इसकी शुरुआत की है। नितिन नवीन कायस्थ जाति के हैं जिनके वोट उनके गृह प्रदेश में भी बहुत कम हैं। बावजूद इसके उनको पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना देना, जातिगत राजनीति के निषेध की ओर बढ़ाए गए कदम की तरह देखा जा सकता है। सिर्फ नितिन नवीन ही क्यों बिहार में भारतीय जनता पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी को बनाया गया है। संजय सरावगी मारवाड़ी/वैश्य हैं और बिहार में मतदाता के लिहाज से मारवाड़ियों की संख्या बहुत नहीं है। बिहार में राजनीतिक नियुक्तियों में इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता था कि अमुक व्यक्ति यादव हैं या राजपूत हैं या कुर्मी हैं तो इनको महत्वपूर्ण पद दिया जा सकता है। ताकि उश समुदाय के वोटरों को आकर्षित किया जा सके। ये सिर्फ भारतीय जनता पार्टी में ही नहीं बल्कि सभी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों में देखा जाता रहा है। 

कहना ना होगा कि मोदी युग में जिस तरह की राजनीति हो रही है वो स्वाधीन भारत की पारंपरिक राजनीति से अलग हटकर है। इस युग की राजनीति को समझने के लिए राजनीति विज्ञान के पुराने औजार से काम नहीं चलनेवाला है। जो पुराने राजनीतिकक सिद्धांत थे उसके आधार पर आकलन बहुधा गलत परिणाम देने लगे हैं। मोदी युग की राजनीति को समझने के लिए राजनीतिक विश्लेषकों को अब नए तरीके से सोचना होगा, नए आधार पर आकलन करना होगा। जिस तरह से नरेन्द्र मोदी अपने निर्णयों से चौंकाते रहे हैं और कई बार जोखिम भरे निर्णय भी लेते हैं, इससे ये प्रतीत होता है कि उनको अपने मतदाताओं पर भरोसा है और मतदाताओं को भी उनपर विश्वास है कि उनके निर्णय देश और जनहित में ही होंगे।      


नागिन का प्यार


नाग-नागिन की कहानियां हमारे समाज को गहरे तक आकर्षित करती है। गांवों में जब संपेरे टोकरी में सांप लेकर पहुंचते हैं और किसी सार्वजनिक स्थान पर बीन बजाकर सांप को उसकी धुन पर नचाते हैं तो देखनेवालों की भीड़ जमा हो जाती थी। नाग-नागिन की प्रेम कहानी और नागमणि को लेकर भी तरह तरह की कहानियां समाज जीवन में सुनी और कही जाती रही हैं। इच्छाधारी नागिन का नाग के प्रति समर्पण की कथा लोग चाव से सुनते हैं। इतिहासकार ए एल बैशम ने अपनी पुस्तक वंडर दैट वाज इंडिया में भी इंडिया इज अ कंट्री आफ स्नेक चार्मर्स (भारत संपेरों का देश है) लिखे। बैशम की इस पुस्तक को अब भी भारतीय अकादमिक जगत में खासी प्रतिष्ठा प्राप्त है। इतना ही नहीं एक तस्वीर इंटरनेट मीडिया पर चलती रहती है जिसमें जवाहरलाल नेहरू अपने विदेशी मेहमान, संभवत: जैकलीन कैनेडी को, संपेरे की कला दिखाते नजर आते हैं। इस पृष्ठभूमि का फिल्मकारों ने भी खूब फायदा उठाया। आज से 50 वर्ष पूर्व एक फिल्म आई नागिन। 1976 में प्रदर्शित और राजकुमार कोहली निर्देशित इस फिल्म को दर्शकों ने खूब पसंद किया था। इतना ही नहीं तब से लेकर आजतक जिसने भी जिस फार्मेट में नाग-नागिन की कहानी को बेहतर ट्रीटमेंट के साथ दिखाया उसको दर्शकों ने पसंद किया। 

मल्टीस्टारर फिल्म नागिन के बाद अभिनेत्री रीना राय की गिनती हिंदी फिल्मों की शीर्ष अभिनेत्री में होने लगी। रीना राय के पहले निर्माता निर्देशक इस भूमिका के लिए सायरा बानो को लेना चाहते थे लेकिन नकारात्मक किरदार होने के कारण सायरा तैयार नहीं हुईं। इस फिल्म में इच्छाधारी नाग की भूमिका में जितेन्द्र हैं। उनके साथ सुनील दत्त, फिरोज खान, कबीर बेदी, योगिता बाली, रेखा जैसी कई कलाकारों से सज्जित इस फिल्म का आरंभ बेहद रोचक तरीके से होता है। मानवरूपी इच्छाधारी नाग जितेन्द्र पर गरुड़ आक्रमण करते हैं। ठीक उसी समय सुनील दत्त उसकी जान बचाता है। सुनील दत्त इचछधारी नाग-नागिन पर पुस्तक लिखने की चाहत की बात जितेन्द्र से करता है। वहां फिर वही कहानी दोहराई जाती है कि अमावस की रात को नागिन अपने नाग से मिलने आती है। नाग अपनी मणि को निकाल कर रख देता है। मणि की आभा में नागिन मस्त होकर नाचती है। इस बीच सुनील दत्त के एक दोस्त ने नाग को गोली मार दी। नाग मर जाता है। फिर एक कहानी। सभी दोस्त आपस में बात करते हैं कि जल्दी से मृत नाग को खोजकर जमीन में गाड़ देना चाहिए नहीं तो उसकी आंख में नागिन हत्यारों की तस्वीर देख लेगी। पर ऐसा हो नहीं पाता है और मृत नाग की आंखों में नागिन को हत्यारे और उसके दोस्तों की तस्वीर नजर आती है। नागिन रूपी रीना राय हत्यारों को चुन चुन कर मारना आरंभ कर देती है। रीना राय की बड़ी बड़ी आंखें और आंखों का रंग दर्शकों को मोहित करता है। रीना राय जब एक एक करके किरदारों की हत्या करती है तो दर्शकों को थ्रिलर का आनंद मिलता है। एक दिन सुनील दत्त को इच्छधारी नागिन का राज पता चल जाता है। प्रेमनाथ के रूप में एक साधु की एंट्री होती है जो कहता है कि इंसान बदला लेना भूल सकता है पर नागिन नहीं। ये संवाद भी काफी लोकप्रिय हुआ था। निर्देशक ने पूरी कहानी को इस तरह से बुना कि समाज में व्याप्त नाग-नागिन को दर्शक जब पर्दे पर देखता है तो वो कहानी के बहाव में बहता चला जाता है। प्रेमनाथ ने साधु के रूप में बेहद शानदार अभिनय किया और नागिन को वश में करने के उसके प्रयासों को देखते हुए दर्शकों को नागिन से सहानुभूति होती है। बहुत कम फिल्मों में ऐसा होता है कि नकारात्मक भूमिका के साथ दर्शकों की सहानुभूति होती है। 

फिल्म में रोचक मोड़ तब आता है जब सुनील दत्त अपना ताबीज साधु को वापस करता है और कहता है कि उसने नागिन को मार दिया है। इस संवाद के बाद जब साधु पूजा कर रहा होता है तो अचानक रीना राय वहां दिखती है। आश्चर्यचकित होकर प्रेमनाथ कहते हैं कि तुम मरकर कैसे जिंदा हो गई। रीना राय का साधु को दिया गया उत्तर भई उस समय खूब चर्चित हुआ था, नागिन के इंतकाम की ज्वाला को कोई ताबीज शांत नहीं कर सकता। संवाद के अलावा इस फिल्म के गीत भी बेहद लोकप्रिय हुए थे। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के संगीत में लता मंगेशकर और महेन्द्र कपूर का गाया गीत तेरे संग प्यार मैं नहीं तोड़ना लोगों की जुबां पर चढ़ गया था। कहना ना होगा कि जिस प्रकार का ट्रेंड इस फिल्म ने सेट किया था उसपर आगे चलकर श्रीदेवी और ऋषि कपूर अभिनीत फिल्म नगीना बनी। श्रीदेवी ने अपनी आंखों के मूवमेंट से नागिन के किरदार को जीवंत कर दिया था। फिल्में को कई बनीं। इतना ही नहीं एकता कपूर ने नागिन नाम से ही एक सीरियल बनाया जिसके सात सीजन आ गए हैं। नागिन टीवी सीरियल ने अपने जानर में सफलता के नए कीर्तिमान गढ़े। और तो और नागराज के नाम एक कामिक्स भी बाजार में आया था जिसको भी खूब पसंद किया गया था।   


Saturday, January 17, 2026

जुमलों के बीच दबी प्रश्न की सार्थकता


प्रतिवर्ष जनवरी के दूसरे सप्ताह में जयपुर में एक आयोजन होता है, जनवरी आफ जयपुर। इस आयोजन में राजस्थान की संस्कृति का उत्सव मनाया जाता है। राजस्थान से जुड़े कलाकार एक सत्र में प्रस्तुति देते हैं। दूसरे सत्र में या तो राष्ट्रीय स्तर का कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करता है या फिर किसी ख्यात व्यक्ति से बातचीत होती है। जनवरी आफ जयपुर में आमंत्रित अतिथि राजस्थानी व्यंजन का भी आनंद उठाते हैं। जनवरी आफ जयपुर का आयोजन संस्कृतिकर्मी संदीप भूतोड़िया-मंजरी भूतोड़िया और सौरभ कक्कड़-विनी कक्कड़ करते हैं। इस वर्ष 11 जनवरी को जय महल पैलेस में जनवरी आफ जयपुर का आयोजन हुआ। सबसे पहले पद्मश्री से सम्मानित लोकगायक अली और मोहम्मद गनी ने अपने गीतों से समां बांधा। इसके बाद प्रख्यात पटकथा लेखक-गीतकार जावेद अख्तर से बातचीत का सत्र हुआ। जावेद अख्तर से बातचीत नृत्यांगना शिंजिनी कुलकर्णी ने की। संवाद के बाद प्रश्नोत्तर का सत्र था। प्रश्न करने के लिए तीन चार हाथ उठे जिसको जावेद साहब देख नहीं पाए। उन्होंने टिप्पणी कर दी कि पहले प्रश्न पूछने में लोग हिचकते हैं। एक-दो प्रश्नों के बाद सिलसिला चल निकलता है। मैंने  पहले प्रश्न के लिए हाथ खड़ा किया था। जावेद अख्तर हमको देख नहीं पा रहे थे तो उन्होंने पूछा कि आप किधर हैं। मैंने खड़े होकर कहा कि मैं आपके राइट में हूं तो तपाक से टिप्पणी की आप तो जानते ही हैं कि राइट वालों से मेरा जरा कम ही....। मैंने जावेद अख्तर से जानना चाहा था कि, क्या फिल्म लेखक के लेखन पर उसके संस्कार, उसके पारिवारिक परिवेश और उसके धार्मिक या मजहबी मान्यताओं का प्रभाव पड़ता है। जावेद अख्तर ने इस प्रश्न को और खोलने को कहा। 

फिल्म शोले और दीवार का उदाहरण देकर प्रश्न के धागे खोले गए। फिल्म शोले के एक दृष्य में हेमा मालिनी भगवान शंकर से अरनी मन की बात करती है तो धर्मेन्द्र प्रतिमा के पीछे से भोंपू से आवाज बदलकर उत्तर देता है। अमिताभ बच्चन की एंट्री होती है और वो हेमा मालिनी को प्रतिमा के पीछे ले जाकर धर्मेन्द्र की असलियत दिखाता है। फिल्म दीवार में नायक जब मंदिर में जाता है तो भगवान से कहता है कि आज खुश तो तुम बहुत होगे। अन्य दृष्य में अमिताभ बच्चन पुलिस से बचकर भागते हैं और शशि कपूर उसका पीछा करते हैं। एक जगह वो ग्रिल से टकरा कर गिरते हैं और 786 का बिल्ला छिटक जाता है। अमिताभ बिल्ला उठाने का प्रयास करते हैं। पुलिस पीछा कर रही होती है लिहाजा वो बिल्ला थोड़कर भागते हैं। शशि कपूर चेतावनी के बाद गोली चला देता है जो अमिताभ की बांह पर लगता है। इसमें लेखक की धार्मिकता का प्रभाव दिखता है या नहीं। इतना सुनते ही जावेद साहब लगभग भड़क से गए और अपनी पुरानी दलीलें देने लगे कि आप क्या मुल्क को सीरिया जैसा बनाना चाहते हैं। आप भी क्या उनकी तरह होना चाहते हैं। उनकी बातों को सुनकर तालियां बजती थीं। मैंने सहजता से कहा कि आपके जुमलों पर तालियां बज सकती हैं लेकिन प्रश्न अनुत्तरित है। उनको लगा कि मैं उनकी लोकप्रियता पर टिप्पणी कर रहा हूं जबकि मैं तो बगैर लाउड हुए अपने प्रश्न का उत्तर चाहता था। जावेद साहब लंबी तकरीर करने लगे और दुनिया का तमाम कट्टरपंथी और मजहबी मुल्कों का उदाहरण देने लगे। प्रश्न के उत्तर पर अंत तक नहीं आए। जब मैंने उनको फिर से प्रश्न पर लाने की कोशिश की तो उन्होंने मुझे क्रास क्वेश्चनिंग ना करने की नसीहत देकर अपनी बात जारी रखी। गाजा पर बच्चों पर बम बरसाने की बात तक चले गए। अंत में कहा कि अगर आज उनको वो दृष्य लिखने होते तो नहीं लिखते। बदतमीजी न हो जाए इस कारण मैंने प्रश्न के उत्तर जानने की अपेक्षा नहीं की और बैठ गया। प्रश्नोत्तर के पूरे सत्र में जावेद साहब मेरे प्रश्न से परेशान से दिखे। मेरी मंशा उनको परेशान करने की नहीं बल्कि एक वरिष्ठ लेखक से ये जानने की थी कि लेखक का लेखन किन बातों से प्रभावित होता है। सत्र की समाप्ति के बाद एक महिला मेरे पास आईं और बोलीं कि जावेद साहब को गाजा के बच्चों पर बमबारी की याद रही लेकिन पहलगाम में धर्म पूछकर हत्या करने की वारदात उनके जेहन में नहीं थी। 

जावेद अख्तर ने प्रश्न का उत्तर टाल तो दिया लेकिन यह प्रश्न तो हिंदी सिनेमा के सामने अब भी है। क्या कारण रहा कि जब हिंदी फिल्में आरंभ हुई तो दादा साहब फाल्के से लेकर उनके बाद के कई वर्षों तक भारतीय संस्कृति के अनुसार नायक होते रहे। हिंदू देवी देवताओं और धार्मिक प्रतीक चिन्हों का उपहास नहीं उड़ाया गया। बाद में जब सलीम जावेद की जोड़ी आई तो भगवान और हिंदू धर्म के प्रतीक चिन्हों का उपहास आरंभ हुआ। उनके बाद के लेखकों ने भी ऐसा किया। तिलकधारी पुजारी को खलनायक के तौर पर चित्रित किया जाने लगा। शोले में तो अजान की आवाज सुनकर अपने बेटे की मृत्यु का गम छोड़कर पात्र उस ओर उन्मुख हो जाता है। हिंदू नायक भी मंदिरों में जाकर भगवान के सामने अपने मन की भड़ास निकालने लगा। नास्तिक टाइप के नायक गढ़े गए, जो मंदिर की सीढ़ियों पर चढ़ने में हिचकते दिखे। फिल्म मि. नटवरलाल में भी नायक भगवान कृष्ण की तस्वीर सामने जिस तरह से संवाद बोलते हैं उसको भी ध्यान में रखा जाना चहिए। इसको अभिव्यक्ति की रचनात्मक स्वतंत्रता के तौर पर रेखांकित किया जाता रहा। प्रश्न यही है कि अभिव्यक्ति की वो कथित स्वतंत्रता सिर्फ हिंदू देवी-देवताओं और हिंदू धर्म से जुड़े लोगों को लेकर ही क्यों दिखती है। किसी और मजहब को लेकर उस तरह से किसी संवाद लेखक ने मजाक किया हो याद नहीं पड़ता। मेरी जिज्ञासा बस इतनी सी थी और जावेद अख्तर जैसे वरिष्ठतम फिल्म लेखक से अपेक्षा भी थी कि वो बेलौस अंदाज में अपनी बात रखते। पर ऐसा हो न सका। 

समय का पहिया घूमता रहा और भगवान का उपहास उड़ाने की प्रवृत्ति बढ़ती चली गई। हद तो ये हुई कि उस समय से केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने भी इस तरह की प्रवृत्ति पर किसी तरह का रोक लगाने की कोशिश नहीं की। फिल्मों के बाद जब ओटीटी का युग आरंभ हुआ तो उसमें भी यही प्रवृत्ति दिखाई देने लगी। ओटीटी प्लेटफार्म पर चलनेवाले वेबसीरीज में तो मंदिरों के अंदर चुंबन दृष्य तक दिखाए जाने लगे। तर्क खजुराहो की मूर्तियों में भी इस तरह नायक नायिका को दिखाया गया है। धार्मिक ग्रंथों से कहानियां उद्धृत कर इस प्रवृत्ति का बचाव किया गया। तर्क गढे गए कि हिंदू धर्म और उसके अनुयायी बहुत उदार हैं इस कारण वो अपने अराध्य को लेकर किसी तरह की उपहासजनक टिप्पणी से आहत नहीं होते हैं। देश में बौद्धिक जगत में ऐसी विचारधारा का दबदबा था जिसमें कहा जाता था कि धर्म तो अफीम है। हिंदू धर्म पर उपहासजनक टिप्पणी या संवाद करनेवालों को प्रगतिशील कहा जाने लगा। धर्म और आस्तिकता की बात करने और उसके चिन्हों का सार्वजनिक उपयोग करनेवालों को दकियानूसी कहा गया। प्रश्न वही कि ऐसा जानबूझकर किया गया या लेखक के सामाजिक और मजहबी परिवेश ने उससे ऐसा करवाया। 


वो कमाल भी क्या खूब था


 कमाल अमरोही का नाम लेते ही  फिल्म महल, पाकीजा. दायरा और रजिया सुल्तान का नाम याद आता है। कमाल अमरोही ने बहुत कम फिल्में निर्देशित कीं लेकिन सबमें उन्होंने अपनी कला की अमिट छाप छोड़ी। वैसे तो वो 1938 से ही फिल्म जगत में कहानीकार और संवाद लेखक के रूप में उपस्थित थे। लेकिन उनको निर्देशक के रूप में पहचान मिली बांबे टाकीज की फिल्म महल से। स्वाधीनता के ठीक पहले देविका रानी ने 1946 में रशियन पेंटर से विवाह कर लिया और बांबे टाकीज में उनकी रुचि कम हो गई। उन्होंने अभिनेता अशोक कुमार और सावक वाचा को 28 लाख रुपए में बांबे टाकीज बेच दिया। अशोक कुमार ने दब बांबे टाकीज संभाला तो उस समय स्वाधीनता आंदोलन चरम पर पहुंच चुका था। पूरे देश में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच तनाव की स्थिति थी। बांबे टाकीज में काम करनेवाले हिंदू और मुस्लिम कर्मचारियों के बीच तनाव महसूस किया जा रहा था। उस दौर में अशोक कुमार और सावक वाचा ने बांबे टाकीज से कई हिंदू कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखाकर मुस्लिम कर्मचारियों को काम पर रख लिया था। वहां तनाव बढ़ रहा था। उनके लिए काम करने वाले लेखक सअदात हसन मंटो ने अशोक कुमार को चेताया था कि वो ऐसा ना करें क्योंकि इससे हिंदी बहुत नाराज हो जाएंगे। अशोक कुमार कहा करते थे कि वो ना तो हिंदू हैं और ना ही मुसलमान बल्कि वो तो कलाकार हैं। कला ही उनका धर्म है। इस सोच के अंतर्गत ही अशोक कुमार ने बांबे टाकीज की अपनी पहली फिल्म महल को निर्देशित करने के लिए एक मुस्लिम निर्देशक कमाल अमरोही को साइन किया था। नोआखाली में हिंदुओं के नरसंहार के बाद देशभर में हिंदू मुसलमान के बीच की दरार गहरी हो गई थी। ऐसे माहौल में अशोक कुमार ने क मुस्लिम निर्देशक को फिल्म सौंपने का निर्णय लिया था जिसकी बहुत आलोचना हुई थी लेकिन अशोक कुमार अपने निर्णय पर अडिग रहे। कमाल अमरोही ने ही फिल्म महल निर्देशित की जो 1949 में प्रदर्शित हुई। इस फिल्म ने इतिहास रच दिया था। इसके बाद 1953 में कमाल अमरोही ने दायरा फिल्म निर्देशित की। ये फिल्म फ्लाप रही थी और कमाल अमरोही एक बेहचर कहानी और फिल्म की तलाश में थे। उनको पाकीजा की कहानी में ये संभावना दिखी और उसको निर्देशित करने का कार्य आरंभ किया। 

फिल्म पाकीजा ने कमाल अमरोही को हिंदी फिल्मों के शीर्ष निर्देशकों की पंक्ति में खड़ा कर दिया। मीना कुमारी इस फिल्म की नायिका थीं जो कमाल अमरोही की पत्नी थीं। पाकीजा की शूटिंग के दौरान दोनों के संबंध बहुत खराब हो चुके थे। मीना कुमारी का दिल बरी तरह से टूट चुका था और वो मरणासन्न हो गई थीं। फिल्म की कहानी भी कुछ ऐसी थी कि नायिका प्यार खोजती है लेकिन ना तो उसको प्यार मिलता है ना ही सुकून। फिल्म पाकीजा में बुरी तरह टूटे हुए दिल वाली नायिका में दर्शकों को मीना कुमारी की रीयल लाइफ कहानी नजर आई थी। पाकीजा फिल्म की शूटिंग के दौरान मीना कुमारी इतनी बीमार थीं कि मुजरा करने की स्थिति में नहीं थी। ऐसे में कमाल अमरोही ने तय किया कि मीना कुमारी के डांस सीक्वेंस को पद्मा खान से करवाया जाए। पद्मा खान की कद काठी मीना कुमारी जैसी थी और उनको बुर्का पहनाकर क्लाइमैक्स का डांस शूट करवाया गया था। कैमरे और उसके उपयोग की कमाल अमरोही को कमाल की समझ और जानकारी थी। इस फिल्म को 35 एमएम कैमरे पर शूट किया गया था। कमाल अमरोही ने रील देखकर बता दिया था कि शूट किए गए कुछ सीन आउट आफ फोकस हैं। विदेश में दो बार जांच हुई तब जाकर ये बात पकड़ में आ सकी कि कुछ फ्रेम में शूट आउट आफ फोकस है। पाकीजा को पहले 1971 में रिलीज होना था लेकिन भारत पाकिस्तान युद्ध के कारण रिलीज टली। 1972 में ये फिल्म रिलीज हुई। 1971 के भारत- पाकिस्तान युद्ध में भारत की विजय हुई तो शिमला समझौते के लिए भुट्टो शिमला आए थे। वहां भुट्टो और उनकी टीम ने पाकीजा देखने की इच्छा जताई । कई पुस्तकों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि इंदिरा गांधी ने पराजित पाकिस्तान के नेताओं के लिए पाकीजा की स्क्रीनिंग की व्यवस्था करवाई थी। कमाल अमरोही के निर्देशन में बनी आखिरी फिल्म रजिया सुल्तान थी। कमाल अमरोही ने कम फिल्में की लेकिन महल और पाकीजा में उनके निर्देशन ने उनकी प्रतिभा का रंग दर्शकों को दिखाया।