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Saturday, January 14, 2017

कविता की अनुपस्थिति !

दिल्ली में चल रहे विश्व पुस्तक मेले का आज आखिरी दिन है । विश्व पुस्तक मेले में ताबड़तोड़ किताबों का विमोचन हुआ । हर विधा की सैकड़ों किताबों का मेलार्पण हुआ कभी लेखक मंच पर तो कभी प्रकाशकों के स्टॉल पर ही विमोचन हुआ । कहीं ताजा ताजा छप कर आई किताबों का विमोचन हुई तो कहीं पखवाड़े भर पहले छपी किताबों को वहां मौजूद लेखकों से मेलार्पण करवा दिया गया । जाहिर है कि इस तरह के मेलार्पण सोशल मीडिया के लिए किए करवाए गए । इसमें कोई बुराई भी नहीं है कम से कम फेसबुक आदि पर फोटो पोस्ट करने से पाठकों तक जानकारी तो पहुंची कि अमुक लेखक की अमुक किताब अमिक प्रकाशन से प्रकाशित हुई । किताबों की बड़ी संख्या में विमोचन और मेले में हर दिन पाठकों की उपस्थिति ने पुस्तकों को लेकर पाठकों के बढ़ते प्रेम की ओर भी इशारा किया जिससे एक आश्वस्तिकरक स्थिति बनी । मेले पर नोटबंदी का भी कोई असर दिखाई नहीं दिया । पाठकों की स्टॉलों पर भीड़ लगी रही और खरीद भी हुई । इतना बदलाव अवश्य देखने को मिला कि लगभग सभी प्रकाशकों ने पेटीएम से या फिर क्रेडिट कार्ड से भुगतान की सहूलियत का इंतजाम कर रखा था । मेले में किताबों पर चर्चा के दौरान छिटपुट विवाद भी हुए । मैत्रेयी पुष्पा की राजेन्द्र यादव पर लिखी किताब पर चर्चा के दौरान लेखकों में पीढ़ियों की टकराहट भी देखने को मिली । लेकिन जिस एक बात को रेखांकित किया जाना आवश्यक है वह है हिंदी के स्थापित कवियों के संग्रह का मेले के दौरान प्रकाशित नहीं होना । उपन्यासकार भगवानदास मोरवाल ने अपनी टीम से एक सर्वे करवाया है जिसकी सूचना उन्होंने फेसबुक पर साझा की है ।
मोरवाल जी द्वारा करवाए गए सर्वे के मुताबिक - मेले से हिंदी कविता लगभग पूरी तरह अनुपस्थित है. प्रकाशकों के स्टाल्स पर एक के बाद एक ,कहानी संग्रह और उपन्यासों के लोकार्पण और उन पर चर्चा कराई जा रही है ,या हो रही है वहां कविता एक तरह से उपेक्षित-सी रही है. हिंदी के बड़े कवि कुंवर नारायण, केदारनाथ सिंह, अशोक वाजपेय, विष्णु खरे, मंगलेश डबराल , लीलाधर जगूड़ी, उदय प्रकाश,कृष्ण कल्पित , अनामिका, सविता सिंह , नरेश सक्सेना , लीलाधर मंडलोई, मदन कश्यप का कोई कविता संग्रह मेले में नहीं आया । इसके अलावा भी संजय कुंदन, पवन करन, संजय चतुर्वेदी, कात्यायनी , अनीता वर्मा जैसे उनके बाद की पीढ़ी के कवियों के संग्रह भी प्रकाशित नहीं हुए । इस सर्वे के मुताबिक लगभग यही स्थिति फेसबुक से उपजे युवा कवि-कवयित्रियों की भी रही। चर्चा हुई भी होगी तो उस तरह नहीं जिस तरह मंचीय कवियों और ग़ज़लों के नाम पर लोकप्रिय शायरी को प्रोत्साहित किया जा रहा है । अगर इस सर्वे के नतीजों को सही माना जाए तो कविता के लिए ये स्थिति उत्साहजनक तो नहीं ही कही जाएगी । हिंदी के कवियों को इस पर विचार करने की जरूरत है कि क्या वजह है कि प्रकाशन जगत के इस सबसे बड़े आयोजन में स्थापित कवियों की अनुपस्थिति दर्ज की गई । क्या कविता अपने समय से पिछड़ गई है या फिर कविता को लेकर पाठकों में कोई उत्साह नहीं रहा जिसका प्रभाव प्रकाशकों की उदासीनता के रूप में सामने आ रहा है । दूसरी बात ये भी देखने को मिली कि छोटे छोटे कई प्रकाशकों की सूची के नए प्रकाशनों में कविता संग्रहों को अच्छी खासी जगह मिली हुई है । तो क्या कविता को लेकर प्रकाशन का अर्थशास्त्र बदल रहा है । या फिर कोई और वजह है । कविता एक ऐसी विधा है जो साहित्य को हमेशा से नये आयाम देती रही है अगर उसपर किसी तरह की आंच आती है तो यह गंभीर बात होगी ।


किताब पढ़ी नहीं है लेकिन...

दिल्ली में राष्ट्रीय पुस्तक न्यास द्वारा आयोजित विश्व पुस्तक मेला आज समाप्त हो रहा है । इस वर्ष का विश्व पुस्तक मेला कई मायनों में अनोखा रहा । पुस्तक मेलों में हर वर्ष ताबड़तोड़ पुस्तक विमोचन होते रहे हैं लेकिन इस बार ये मेला विमचनों के रेला के लिए याद किया जाएगा । यह कोई बहुत असमान्य बात नहीं है, समय बीतने के साथ साथ हर चीज में बढ़ोतरी होती ही है । लेकिन इसके साथ जो असमान्य प्रवृत्ति देखने को मिली वो ये कि जिन पुस्तकों का विमोचन महानुभाव कर रहे थे उनको उसके बारे में कोई जानकारी नहीं होती थी । विमोचन के बाद अमूमन हर वक्ता यह कहता था मैंने इनकी कहानी पढ़ी नहीं है लेकिन..., मैंने इनका उपन्यास पढ़ा नहीं है लेकिन...। क्या आलोचक, क्या वरिष्ठ कथाकार सबों की जुबां पर यही लफ्ज आते थे । यह प्रवृत्ति लगभग सभी प्रकाशकों के विमोचनों में देखने को मिली । सवाल यही उठता है कि विमोचनों की इतनी हड़बड़ी क्यों ? क्यों नहीं इस बात का इंतजार किया जा रहा था कि जिस भी पुस्तक का विमोचन हो, विमोचनकर्ता तैयारी के साथ आएं । कृति पर थोड़ी बात हो ताकि वहां मौजूद पाठकों के बीच जारी होनेवाली किताब को लेकर उत्सुकता बने और वो इसको खरीद सकें । हालात तो ये हो रहे थे कि विमोचन वाले स्टॉल के आगे से कोई वरिष्ठ, कनिष्ठ, समकालीन रचनाकार गुजर रहा हो तो उनको भी बुला लिया जाता था कि आइए आइए जरा विमोचन कर दीजिए । गुजरनेवाले भी खुशी खुशी किताब हाथ में लेकर पंक्ति में खड़े हो जाते थे । समारोह में शामिल होनेकी तस्वीर कैमरे में कैद हो जाती थी । भारतीय परंपरा में खुशी बांटने की परंपरा भी है लेकिन हद तब हो जाती थी जब खुशी बांटने के लिए विमोचन समारोह में शामिल होने वाले लेखक से कहा जाता था कि आप भी विमोचित कृति पर कुछ बोलिए । फिर वही शब्द गूंजता हैं, मैंने इस कृति को पढ़ा तो नहीं है लेकिन...। यहां जानबूझकर किसी विमोचनकर्ता का नाम नहीं लिखा जा रहा है क्योंकि लेख का उद्देश्य इस प्रवृत्ति को रेखांकित करना है किसी का नाम लेकर उनका उल्लेख करना नहीं । इसके अलावा इस बार कई पुस्तक विमोचन हाईटेक रहे । लेखकों ने तकनीक का फयदा उठाया । जिस लेखक की किताब विमोचित हो रही हो और वो किसी वजह से पुस्तक मेले में मौजूद नहीं रह पाया तो उनके मित्रों ने उनको फोन कर स्पीकर ऑन कर दिया या फिर स्काइप या वीडियो क़लिंग के जरिए उनको कार्यक्रम से जोड़ लिया । यह तकनीक का फायदा रहा लेकिन वीडियो कॉल या फोन के जरिए जुड़े लेखक को भी सुनना पड़ा कि- इनकी कृति मैंने पढ़ी तो नहीं है लेकिन...। विश्व पुस्तक मेले की इस प्रवृत्ति को इस वजह से भी रेखांकित किए जाने की जरूरत है क्योंकि प्रसिद्धि की फौरी चाहत में साहित्य पिछड़ता जा रहा है । पढ़ी नहीं है लेकिन... की प्रवृत्ति ज्यादातर वरिष्ठ लेखकों में देखने को मिली, कुछ प्रौढ होते लेखक भी इस तरह से विमोचन करते घूमते दिखे । दरअसल होता क्या है कि लेखकों को लगता है कि अपने से वरिष्ठों से विमोचन करवाकर फोटो उतार लिए जाएं और उसको फेसबुक पर चढ़ा कर लाइक्स की लोकप्रियता हासिल कर ली जाए । ज्यादातर विमोचनों को देखकर यही लगा कि इस बार भी पुस्तक मेले में फेसबुक को ध्यान में रखकर बहुत से काम किए गए । लेकिन फेसबुक की लाइक्स से साहित्य सृजन में गहराई आए या फिर बेहतर रचना के लिए लेखक और मेहनत करें ऐसा अबतक देखने को नहीं मिला है ।
इसके अलावा इस वर्ष के पुस्तक मेले में साहित्य की वरिष्ठम पीढ़ी की लगभग अनुपस्थिति भी दर्ज की गई । ऐसा लगता है कि नामवर सिंह अस्वस्थता और कड़ाके की ढंड की वजह से कम आ पाए । कुंवर नारायण बहुत कम बाहर निकलते हैं । विश्वनाथ त्रिपाठी और अशोक वाजपेयी मेले में दिखाई अवश्य दिए लेकिन एकाध विमोचन या कार्यक्रमों की अध्यक्षता की ही जानकारी मिल पाई । इसके अलावा कई वरिष्ठ साहित्यकार अकेले घूमते नजर आए । तो क्या इन वरिष्ठ लेखकों का दौर या आकर्षण या फिर इनसे अपने कृति के बारे में प्रमाण-पत्र लेने का दौर खत्म हो गया । या फिर इन लोगों ने इतने प्रमाण-पत्र बांट दिए कि अब उनके स्टॉक में सर्टिफिकेट्स खत्म हो गए हैं । यह भी हो सकता है कि वरिष्ठतम लेखकों ने नई पीढ़ी के आकांक्षाओं की रफ्तार से तालमेल नहीं बिठा पाए और नेपथ्य में चले गए । वाजपेयी जी जैसे स्टार लेखकों की स्टार वैल्यू को छीजता देखकर दुख होता है । एक जमाना होता था कि पुस्तक मेले में वाजपेयी जी के आगमन के साथ हिन्दी के हॉल में लगता था कि बहार आ गई हो । वो जब चलते थे तो उनके आगे पीछे लेखकों की फौज होती थी । इस बार वैसा नजारा देखने को नहीं मिला । वाजपेयी जी के अकेले होने की वजह उनका सत्ता से दूर होना भी हो सकता है । यह पहली बार हुआ है कि वाजपेयी जी की सत्ता प्रतिष्ठान में कोई पूछ नहीं रही । वो किसी सरकारी पद आदि पर भी नहीं हैं, लिहाजा हिंदी लेखकों को पहली बार हवाई यात्रा करवाने जैसा दंभपूर्ण बयान भी नहीं दे सकते हैं, पुरस्कार आदि देना तो दूर की बात है । अब यह देखना दिलचस्प होगा कि साहित्यक सत्ता के केंद्रों की अहमियत कम होने के बाद नया साहित्यक सत्ता केंद्र उभरेगा या फिर उसका विकेन्द्रीकरण हो जाएगा ।
विश्व पुस्तक मेले में छिटपुट विवाद भी हुआ । हिंदी अकादमी दिल्ली की उपाध्यक्ष और मशहूर उपन्यासकार मैत्रेयी पुष्पा और अपेक्षाकृत नई पीढ़ी की लेखिकाओं में टकराहट लंबे समय से चल रही है । पुस्तक मेले में एक बार फिर से प्रत्यक्ष रूप से इस टकराहट से पाठक भी रूबरू हुए । एक चर्चा के दौरान लेखकीय विरासत के बाबत पूछे गए सव सवाल का जब मैत्रेयी पुष्पा ने नकारात्मक जवाब दिया तो विवाद बढ़ा । वहां मौजूद उपन्यासकार अल्पना मिश्र ने विरोध दर्ज करवाया । अब सवाल यही है कि लेखकीय विरासत है क्या ? क्या लेखन कोई संपत्ति है जिसकी विरासत किसी को सौंपी जाए या फिर उसकी वसीयत की जाए । दरअसल पिछले दिनों नासिरा शर्मा ने एक पत्रिका में अपनी साहित्यक वसीयत लिखी थी और कुछ रचनाकारों का नाम भी लिया था । उनके वसीयतनामे के बाद विरासत की साहित्यक राजनीति शुरू हो गई । संगीत में तो विरासत फिर भी मुमकिन है लेकिन साहित्य में विरासत की अवधारणा ही गलत है । बेहतर साहित्यक लेखन तो वो होता है जो परंपरा से अलग हटकर अपनी राह खुद बनाए । यह बात भी समझ से परे है कि मैत्रेयी पुष्पा से स्वीकृति की मोहर क्यों लगवाने की जरूरत है । मैत्रेयी ने अपने तरह का लेखन किया और अब नई पीढ़ी की लेखिकाएं अपनी तरह का लेखन कर रही हैं । इस विवाद की जड़ में विरासत आदि होगा लेकिन आपत्ति इस बात को लेकर ज्यादा हुई होगी कि मैत्रेयी पुष्पा ने मनीषा कुलश्रेष्ठ का नाम ले लिया । कुछ दिनों पहले जब मैत्रेयी पुष्पा ने अपेक्षाकृत युवा लेखिकाओं को निशाने पर लेते हुए एक लेख लिखा था तब मनीषा कुलश्रेष्ठ ने भी विरोध का झंडा उठाया था । अब बदले साहित्यक परिदृश्य में मैत्रेयी जी ने मनीषा को बेहतर रचनाकार माना तो उनसे सवाल पूछे जाने लगे । स्त्री लेखन में साहित्यक विरासत की गूंज मेले में रही लेकिन एक दो दिनों में ही ये थम सा गया । इन दिनों हिंदी साहित्य में असहिष्णुता भी बढती जा रही है । कोई भी अपनी रचनात्मक आलोचना सुनने को तैयार नहीं है । अगर किसी ने रचना की भी आलोचना कर दी तो लेखक आगबबूला हो जाता है । प्रकरांतर में इस प्रवृत्ति का नुकसान साहित्य की अलग अलग विधाओं को होता है । देश में बढ़ती असहिष्णुता को लेकर छाती कूटनेवालों में भी सहिष्णुता का आभाव दिखाई देता है । वो अपनी आलोचना तो क्या ही बर्दाश्त करेंगे अपनी रचना पर भी आलोचनात्मक टिप्पणी उनको नहीं सुहाती है । लेखकों के लिए आत्ममंथन का वक्त है ।

इस बार विश्व पुस्तक मेले के पहले प्रकाशकों को इस बात का अंदेशा था कि नोटबंदी का असर दिखाई देगा । कई प्रकाशकों ने कार्ड से लेकर पेटीएम तक से भुगतान लेने का इंतजाम किया हुआ था । लेकिन जिन प्रकाशकों के यहां ईपेमेंट का इंतजाम नहीं था उनको भी कोई दिक्कत नहीं हुई । नोटबंदी का किसी प्रकार का कोई असर देखने को नहीं मिला । भारी संख्या में पाठक पुस्तक मेले में पहुंचे और जमकर खरीदारी की । आमतौर पर होता था कि हिंदी के मंडप में अंग्रेजी की तुलना में कम पाठक पहुंचते थे लेकिन इस बार ऐसा प्रतीत हो रहा है कि हिंदी के पाठकों ने अंग्रेजी वालों को पीछे छोड़ दिया है, संख्या के लिहाज से भी और बिक्री के हिसाब से भी । यह हिंदी के लिए सुखद संकेत है ।