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Sunday, April 14, 2019

साहित्य के तिलिस्म में जासूसी लेखन


साहित्य में वो दौर महफिलों का था, कॉफी हाउस से लेकर कई साहित्यिक ठीहों पर साहित्यकारों का जमावड़ा हुआ करता था। जहां साहित्य की विभिन्न विधाओं और प्रवृत्तियों पर बहसें हुआ करती थीं, एक दूसरे की रचनाओं पर बातें होती थीं,रचनाओं की स्वस्थ आलोचना होती थी। इन साहित्यिक जमावड़ों और महफिलों का साहित्य सृजन में बड़ी भूमिका रही है। कई साहित्यकारों ने अपने संस्मरणों में इन साहित्यिक ठीहों पर होनेवाले दिलचस्प किस्सों को लिखा है। ऐसा ही एक बेहद दिलचस्प वाकया है एक साहित्यिक महफिल का जिसमें राही मासूम रजा, इब्ने सफी, इब्ने सईद और प्रकाशक अब्बास हुसैनी के अलावा कई और साहित्यकार बैठे थे। चर्चा देवकीनंदन खत्री के उपन्यास चंद्रकांता की शुरू हो गई। अचानक राही मासूम रजा ने एक ऐसी बात कह दी कि वहां थोड़ी देर के लिए सन्नाटा छा गया। राही मासूम रजा ने कहा कि बगैर सेक्स प्रसंगों के तड़का के जासूसी उपन्यास लोकप्रिय नहीं हो सकता है। इब्ने सफी, रजा की इस बात से सहमत नहीं हो पा रहे थे। दोनों के बीच बहस बढ़ती जा रही थी। सफी लगातार राही मासूम रजा का प्रतिवाद कर रहे थे। अचानक राही मासूम रजा ने अपने खास अंदाज में इब्ने सफी को चुनौती देते हुए कहा कि वो बगैर सेक्स प्रसंग के जासूसी उपन्यास लिखकर देख लें कि उसका क्या हश्र होता है। सफी ने रजा की इस चुनौती को स्वीकार किया और बगैर किसी सेक्स प्रसंग के एक जासूसी उपन्यास लिखा। जिसे प्रकाशक अब्बास हुसैनी ने अपने प्रकाशन निकहत पॉकेट बुक से प्रकाशित किया। वो उपन्यास जबरदस्त हिट हुआ और उसने जासूसी उपन्यासों की दुनिया में तहलका मचा दिया। इस सफलता के बाद इब्ने सफी जासूसी उपन्यास की दुनिया के बेताज बादशाह बन गए थे। यह भी एक दिलचस्प तथ्य है कि इब्ने सफी बंटवारे के वक्त पाकिस्तान नहीं गए बल्कि पांच साल बाद 1952 में पाकिस्तान गए। वहां जाने के बाद भी उनके उपन्यास प्रकाशित होने के लिए अब्बास हुसैनी के पास आते थे जो उर्दू और देवनागरी लिपि में छपा करते थे। बाद में अनुदित होकर अन्य भाषा के पाठकों तक पहुंचते थे। इब्ने सफी इतने लोकप्रिय थे और उनकी कीर्ति इतनी थी कि अगाथा क्रिस्टी जैसी मशहूर लेखिका ने भी ये माना था कि वो बेहद मैलिक लेखन करते हैं। इब्ने सफी का इमरान सीरीज काफी लोकप्रिय हुआ था। माना जाता है कि इब्ने सफी ने ही जासूस जोड़ी की शैली में लिखना शुरू किया जिसे बाद के कई लेखकों ने अपनाया। इब्ने सफी के उपन्यास प्रकाशित करने के पहले अब्बास हुसैनी दो पत्रिकाएं निकालते थे जासूसी दुनिया और रूमानी दुनियाजासूसी दुनिया में सफी साहब और रूमानी दुनिया में राही मासूम रजा लिखा करते थे। कहा तो ये भी जाता है कि जब जरूरत होती थी तो राही मासूम रजा भी नाम बदलकर जासूसी कहानियां लिखा करते थे। इब्ने सफी की सफलता के दौर में ही इलाहाबाद से जासूसी पंजा नाम की पत्रिका में अकरम इलाहाबादी भी एक जासूसी कथा श्रृंखला लिखा करते थे। ये सीरीज बेहद लोकप्रिय थी। जासूसी पंजा में प्रकाशित होनेवाली जासूसी कथा की लोकप्रियता को देखकर ही हिंद पॉकेट बुक्स ने एक रुपए मूल्य के पुस्तकों की सीरीज छापनी शुरू की थी। प्रकाशन जगत में यह प्रयोग काफी सफल रहा था।  
इसके पहले हिंदी उस दौर को देख चुकी थी जब देवकीनंदन खत्री के उपन्यास चंद्रकांता के तिलिस्मी कथा के सम्मोहन में पाठक उलझे थे। उनकी लोकप्रियता इतनी जबरदस्त थी कि उसको पढ़ने के लिए लोग हिंदी सीखते थे। चंद्रकांता की लोकप्रियता और पाठकों में तिलिस्मी-ऐयारी कथा की भूख को देखते हुए देवकीनंदन खत्री के दो पुत्रों ने विपुल मात्रा में जासूसी लेखन किया। उनके एक लड़के दुर्गाप्रसाद खत्री ने स्थानीय पात्रों और घटनाओं को केंद्र में रखते हुए जासूसी उपन्यास लिखे तो उनके दूसरे बेटे परमानंद खत्री ने कई विदेशी जासूसी उपन्यासों का अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद किया। उनके अलावा भी उस दौर में अन्य लेखकों ने विदेशी जासूसी उपन्यासों का हिंदी में अनुवाद किया। उर्दू लेखक जफर उमर का एक जासूसी उपन्यास प्रकाशित हुआ जिसके बारे में कहा जाता है कि वो एक विदेशी उपन्यास का अनुवाद था। यह उपन्यास भी बेहद लोकप्रिय हुआ। उसी समय तीरथराम फिरोजपुरी ने भी कई जासूसी उपन्यासों का अनुवाद उर्दू में किया जो बाद में हिंदी में भी छपा। हिंदी में जासूसी उपन्यासों की चर्चा गोपाल राम गहमरी के बगैर अधूरी है। गोपाल राम गहमरी पत्रकार थे और कई पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े थे। उन्होंने 1900 में जासूस नाम की पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया। जब इस पत्रिका का विज्ञापन उनके संपादन में निकलनेवाले समाचारपत्र भारत मित्र में प्रकाशित हुआ तो लोगों में नई पत्रिका के कंटेंट को लेकर उत्सकुकता का भाव पैदा हुआ। जासूस पत्रिका का विज्ञापन इतना रोचक और दिलचस्प तरीके से लिखा गया था कि उसके एडवांस बुकिंग से गहमरी साहब को करीब पौने दो सौ रुपए मिले थे। सैकड़ों की संख्या में वार्षिक ग्राहक बने थे। आज मार्केटिंग के नाम पर प्री-बुकिंग का चाहे जितना शोर मचे और उसको नई प्रवृत्ति बताई जाए लेकिन ये काम गहमरी ने आज से एक सौ उन्नीस साल पहले सफलतापूर्वक कर दिखाया था। अपनी पत्रिका जासूस को लेकर गहमरी बेहद संवेदनशील थे। हर अंक में एक नए जासूसी उपन्यास के प्रकाशन की चुनौती अपने उपर ले रखी थी, नतीजा यह होता था कि या तो वो किसी दूसरी भाषा के जासूसी उपन्यास का अनुवाद करते थे या फिर मौलिक उपन्यास लिखते थे। अनुमान और उपलब्ध तथ्यों और संस्मरणों के मुताबिक गोपाल राम गहमरी ने साठ से अधिक मौलिक जासूसी उपन्यास लिखे और करीब डेढ़ सौ अन्य भाषा के उपन्यासों का हिंदी में अनुवाद किया था। गोपाल राम गहमरी ने ही हिंदी को देवकीनंदन खत्री की ऐयारी की जगह जासूसी शब्द दिया। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने लेखन में गहमरी का उल्लेख किया है, उनके काम को रेखांकित भी किया है लेकिन जितनी महत्ता इस विधा को मिलनी चाहिए थी उतनी हिंदी के आलोचकों ने इसको दी नहीं। आलोचकों की उदासीनता की वजह से ही इस विधा का उतनी मजबूती से विकास नहीं हो सका जिसकी ये हकदार थी। उपेक्षा से किसी विधा के लगभग खत्म होने का यह नमूना है।  
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात जब देश में हिंदी साहित्य को मजबूती मिलने लगी तो जासूसी की इस विधा के योगदान को भी लगभग नकार दिया गया। इस बात को भी शिद्दत से रेखांकित नहीं किया गया कि हिंदी के प्रसार में जासूसी उपन्यासों और पत्रिकाओं की अहम भूमिका थी। हिंदी के आलोचक जब मार्क्सवाद के प्रभाव में आए और उस विचारधारा ने मजबूती से आकार ग्रहण करना शुरू किया तो हिंदी साहित्य में अजीब तरह की वर्णवादी व्यवस्था ने भी जन्म लिया। इस साहित्यिक वर्णवादी व्यवस्था में कविता को शीर्ष पर रखकर साहित्य का आकलन शुरू हुआ। कहना ना होगा कि इस वजह से कई विधाएं अस्पृश्य होती चली गईं। हिंदी में सिनेमा पर लंबे समय तक गंभीर लेखन नहीं हो पाया क्योंकि उसको लोकप्रिय विधा कहकर गंभीरता से लिया ही नहीं गया। लोक और जन की बात करनेवालों ने लोकप्रिय विधा के मूल्यांकन की जरूरत ही नहीं समझी। इसी तरह से जासूसी उपन्यासों को हाशिए पर डाल दिया गया और उनको दशकों तक लुगदी साहित्य कहकर मजाक उडाया जाता रहा। कर्नल रंजीत, ओम प्रकाश शर्मा, सुरेन्द्र मोहन पाठक, अनिल मोहन, मनोज आदि के जासूसी उपन्यासों ने भी खूब धूम मचाई लेकिन वो तथाकथित मुख्यधारा के साहित्य़ में प्रवेश नहीं पा सके। जेम्स हेडली चेज के हिंदी में अनुदित उपन्यासों की खूब मांग होती थी, इसके लोकप्रिय होने की वजह इसमें सेक्स प्रसंगों का होना भी माना जा सकता है। जब वेदप्रकाश शर्मा का उपन्यास वर्दी वाला गुंडा प्रकाशित होनेवाला था तो कई शहरों में उस उपन्यास के होर्डिंग लगे थे। ये उपन्यास खूब बिक रहे थे, पाठक इनको हाथों हाथ ले रहे थे लकिन हिंदी साहित्य के मूर्धन्य आलोचक इसको अपनाने और मानने को तैयार नहीं थे। परिणाम यह हुआ कि हिंदी में जासूसी उपन्यास लिखनेवाले कम होते चले गए। दो सौ उपन्यास लिखनेवाले सुरेन्द्र मोहन पाठक को पिछले पांच सात सालों में तथाकथिक मुख्यधारा के साहित्य में स्वीकृति मिलनी शुरू हुई है।
दूसरी एक और वजह ये रही कि शीतयुद्ध खत्म होने के बाद जासूसों से जुड़ी खबरें कम आने लगीं थीं। एक दौर था जब रूस की खुफिया एजेंसी केजीबी और अमेरिका की एजेंसी सीआईए से जुड़ी खबरें लगातार आती थीं, जिससे जासूसों के क्रियाकलापों को लेकर एक उत्सकुकता का माहौल बनता था। इस माहौल की वजह से भी जासूसी उपन्यासों की मांग बढ़ती थी। इस माहौल का ही असर था कि पॉकेट बुक्स के अलावा बाल पाकेट बुक्स भी छपने लगे थे। बाल पॉकेट बुक छात्रों को ध्यान में रखकर छपते थे। 1980 के दशक में राजन-इकबाल के जासूसी सीरीज के उपन्यासों की धूम रहती थी। हमें याद है कि अपने स्कूली दिनों में जमालपुर रेलवे स्टेशन पर व्हीलर की दुकान पर जाकर राजन-इकबाल सीरीज के उपन्यासों की अग्रिम बुकिंग करवाया करते थे। अगर अग्रिम बुकिंग नहीं करवा पाते थे तो इस बात की कोई गारंटी नहीं होती थी कि आपको उपन्यास मिल ही जाएगा। कहा ये भी जाता है कि टीवी और इंटरनेट के फैलाव ने भी जासूसी उपन्यासों की लोकप्रियता को कम किया, लेकिन ये वजह उपयुक्त नहीं प्रतीत होती है। अगर ऐसा होता तो अंग्रेजी में जासूसी उपन्यासों की इतनी जबरदस्त मांग कैसे रहती। वहां तो हमसे पहले से टीवी भी है और इंटरनेट भी। इस नतीजे पर पहुंचने के लिए शोध की आवश्यकता है।

Wednesday, January 31, 2018

'काली करतूतों के अलावा सब ईमानदारी से लिखा'


सुरेन्द्र मोहन पाठक हिंदी में सबसे ज्यादा पढे जाने वाले लेखकों में से एक हैं। अब तक उनकी 298 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं और भारत में अपराध कथाओं के बेताज बादशाह माने जाते हैं। आगामी फरवरी के पहले सप्ताह में उनकी आत्मकथा ना बैरी ना कोई बेगानाप्रकाशित होने जा रही है। अपनी आत्मकथा के प्रकाशन के पूर्व उन्होंने मुझसे खास बातचीत की।

प्रश्न- अपराध कथाएं या जासूसी उपन्यास लिखते लिखते आत्मकथा लिखने का ख्याल कैसे आया?

उत्तर- ख्याल मुझे नहीं आया, मेरी एडिटर मीनाक्षी ठाकुर को आया। उसने ना सिर्फ मुझे बायो लिखने को कहा- कहा, पूछा नहीं कि मैं लिख सकता हूं या नहीं और प्रस्ताव को प्रकाशकीय मजबूती देने के लिए एडवांस में कांट्रैक्ट भी भेज दिया। तब मुझे गंभीरता से अपने अंतर को टटोलना पड़ा कि क्या मैं बायो लिख सकता था, क्या मेरी गुजरी जिंदगी में ऐसा गैरमामूली कुछ घटित हुआ था कि उसे बायो में समेटा जा सकता ! मुझे ऐसा कुछ दिखाई ना दिया। जो दिखाई दिया वो इतना था कि 50-60 पृष्ठों में चुक जाता। असमर्थता दिखाने की जगह मैंने फैसला किया कि लिखना शुरू करता हूं, कुछ बन पड़ा तो ठीक वर्ना हाथ खड़े कर दूंगा। जब कलम चली तो मेरे सामने 1200 प्रिटेंड पेजे का व्यापक मैटर था। मेरा ईश्वर ही जानता है कि कौन सा शैतान मुझपर सवार हुआ जो कि मैं एक गैरवाकिफ सब्जेक्ट पर एकमुश्त इतना लिख पाया। 

प्रश्न- आपने अपनी आत्मकथा का नाम ना बैरी ना कोई बेगाना रखा है, इसके पीछे की सोच क्या है?

उत्तर- ना बैरी ना कोई बेगाना नाम गुरू गोविंद सिंह के एक वाक पर आधारित है। जो कहता है न कोई बैरी नहीं बिगाना, सगल संग हम को बनि आयी। मैंने अपनी गुजरी जिंदगी को रिव्यू किया तो उसमें मुझे ना कोई दुश्मन दिखाई दिया, न कोई गैर लगा, इस सबमें कोई खामी पायी तो खुद में पायी। लिहाजा मैंने वाक के एक हिस्से को टाइटल के लायक बनाने के लिए और संक्षिप्त किया और बायो के पहले खंड का नाम ना बैरी ना कोई बेगाना रखा । ये मेरे पाठकों की जानकारी में आते ही फौरन क्लिक कर गया और ये नाम फाइनल हुआ। वर्ना संपादक का पसंदीदा नाम पाठकनामा था।

प्रश्न- चंद दिनों में आपकी आत्मकथा प्रकाशित होनेवाली है। आपने अपनी आत्मकथा में सैमुअल गोल्डविन को कोट किया है जो कहते हैं कि आत्मकथा मरने के बाद प्रकाशित होनी चाहिए। लेकिन आपने तो लिख डाला?

उत्तर- सैमुअल गोल्डविन की उक्ति आई डोंट थिंक एनीवन शुड राइट देयर आटोबॉयोग्राफी अनटिल आफ्टर दे आर डेड व्यंग्यात्मक है। इसका अर्थ ये है कि जीते जी बायो लिखना बेतहाशा दुश्मन बनाने का आसान तरीका है। प्रशस्तिगान से तो बायो नहीं बनती, बनती है तो पठनीय नहीं बनती। बायो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लेखक का दखल बनाती है, अब अगर वो अभिव्यक्ति का वक्त आने पर अपने हाथ मर्यादाओं से, लोकलाज से बंधा पाता है तो कैसी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता? अगर आप आप किसी को भड़काने, आंदोलित करने के लिए स्वतंत्र नहीं हैं तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कोई मायने ही नहीं रहते । कोई माई का लाल किसी को राजी नहीं कर सकता, विवादास्पद कुछ लिखा जाएगा तो निंदक तो बनेंगे ही। शाद इसलिए सैम गोल्डविन का इशारा है कि आत्मकथा को मरणोपरांत छपना ही बेहतर होता है। तब कोई कहनेवाले की जुबान नहीं पकड़ सकता है, जबकि जीवन काल में लिखी गई आत्मकथा का तीव्र विरोध होना, कोर्ट कचहरी तक होना आम बात है।

प्रश्न- आपने अपनी पत्नी की वॉर्निंग और पुत्री की चेतावनी के बाद आत्मकथा लिखने का जोखिम उठाया । कैसे मनाया उन दोनों को ?

उत्तर- पत्नी और पुत्री की वार्निंग अकादमिक थी, जिसका मंतव्य मुझे उस अंजाम से खबरदार करना था जो करीबी रिश्तेदारों, दोस्तों के बारे में कुछ खराब लिखने से मेरा हो सकता था। बायो में मैंने गढ़ी हुई कोई बात नहीं लिखी, वही लिखा जो मेरे साथ घटित हुआ। विवादास्पद बातों के मेरे पास दस्तावेजी सबूत है। इसलिए मुझे यकीन है कि किसी का ये कहने का मुंह नहीं बनेगा कि मैंने गलत लिखा या बढ़ा चढ़ा कर लिखा। अगर ऐसी कोई बात लिखना गलता है, तो उसे कहना गलत क्यों नहीं है। कहकर डैमेज कर चुकने के बाद उसके कलमबद्ध बयान पर सेंसर लगाना मैं नहीं समझता कि ठीक है। ये तो यों होगा कि जबरा मारे पर रोने ना दे।   

प्रश्न- आपकी पत्नी और बेटी ने आत्मकथा के कुछ अंशों को सेंसर किया या नहीं?

उत्तर- कुछ सेंसर नहीं किया, सब ठीक-ठाक पाया। अलबत्ता अगले भाग में ऐसी नौबत आ सकती है क्योंकि उसमें परिपक्व जीवन के किस्से हैं और तब के हैं जब मेरे सामाजिक सरोकरों में बहुत विविधता आ चुकी थी। तब शायद कुछ बातों पर ऐतराज हो लेकिन वो ऐतराज मुझे कुबूल नहीं होगा। इसलिए क्योंकि जो मैंने लिखा है, ईमानदारी से लिखा है, उसमें फैवरिकेटेड कोई बात नहीं है।

प्रश्न- आपने अपने बचपन को जीवन का बेहतरीन हिस्सा कहा है, कोई खास वजह जबकि उस दौर में आपने विभाजन का दंश झेला?

उत्तर- बचपन इग्नोरेंस का दौर होता है। बच्चा उन बातों को नहीं समझता जो वयस्कों के लिए गंभीर होती हैं। इसलिए अंजाम से बेखबर होता है। विभाजन का दौर मैंने देखा लेकिन उसकी विभीषिका को समझने की मेरी उम्र नहीं थी। बचपन मां-बाप की छत्रछाया का सुख पाने का वक्त होता है– कुछ बुरा होता है तो मां बाप झेलते हैं, अच्छा होता है तो बच्चा उसका सुख पाता है। इन बातों में फर्क करना कभी बच्चे का सरोकार नहीं बन पाता है। बच्चे के लिए ये बड़ी घटना है कि उसका खिलौना टूट गया, न कि ये कि देश का विभाजन हो गया। इसलिए मैंने बचपन को जिन्दगी का बेहतरीन हिस्सा करार दिया है।  

प्रश्न- अपने जवानी के बारे में लिखते हुए आप कहते हैं कि जुल्म सहने से भी जालिम की मदद होती है। ये व्यवस्था के प्रति गुस्सा है या आजादी से मोहभंग का दर्द ?

उत्तर- सकल संसार इस बात से सहमत है कि जुल्म सहने से जालिम की मदद होती है। बुराई की जीत इसलिए भी होती है क्योंकि सच्चाई ने विरोध के लिए सामने आना जरूरी न समझा। बुरा उम्मीदवार इसलिए चुनाव जीत जाता है क्योंकि अच्छे वोटर वोट देने नहीं जाते। जुल्म सारी दुनिया में होता है, ऐसा न होता तो अमेरिका में माफिया की समांतर सरकार न चल रही होती। फर्क ये है कि बाहर इन ताकतों का अनुपात बहुत कम है जबकि हमारे यहां ये ज्यादा है । कोई माई का लाल, वो दुनिया के किसी हिस्से में हो, बुराई का समूल नाश नहीं कर सकता, लेकिन विरोध तो कर सकता है। मुझे क्या, मेरे साथ तो ना हुआ वाली प्रवृत्ति को को तिलांजलि दे सकता है। आपको जुल्म से ऐतराज ना होना इस बात का सबूत है कि आप जुल्म का शिकार होने के लिए बैठे हैं।

प्रश्न- लगभग चार सौ पन्नों की अपनी आत्मकथा में आपने कितना बताया और कितना छुपाया?

उत्तर- कुछ नहीं छुपाया। सबकुछ बहुत ईमानदारी से कलमबद्ध किया, फिर भी उन बातों को नजरअंदाज किया जो मेरी बहुत ही काली करतूतों से संबंधित थीं और जो मेरे करीबियों की निगाह में मुझे शैतान ठहरा सकती थी। मैं उम्मीद करता हूं कि अभी चंद और साल मुझे जीना है और बाकी का जीवन अपने पर कालिख पोत कर जियूं ये तो ठीक न होगा। लिहाजा मैं ने अपनी जिंदगी की बहुत सी अन्दरुनी , छवि को धव्स्त करनेवाली बातों से परहेज किया। कहते हैं कि आज तक दो ही बायो ईमानदारी से लिखी गई, एक महात्मा गांधी की और दूसरी रूसो की। मेरे जैसा निहायत मामूली इंसान बायो लिखने के सिलसिले में कैसे इन महान विभूतियों जैसा हैसला अपने आप में पैदा कर सकता है ? ऐसी बातें लिखने का हौसला क्योंकर मैं दिखा सकता हूं कि बीबी नफरत करने लगे, औलाद हिकारत से देखने लगे।

प्रश्न- आपका उपन्यास हीराफेरी दैनिक जागरण बेस्टसेलर में नंबर वन पर रहा है। दैनिक जागरण बेस्टसेलर को लेकर आपकी क्या राय है

उत्तर- ये अच्छी शुरुआत दैनिक जागरण ने की है जो लेखन के क्षेत्र में हिन्दी लेखकों की औकात बनाने में ही कारगर नहीं होगी, हिन्दी की भी औकात बनाने में कारगर होगी जो कि वर्तमान में संदिग्ध है। इस मुबारक कदम के दूरगामी नतीजे आने में अभी वक्त लगेगा। इसका उदाहरण मैं खुद हूं। मैंने इतना कामयाब उपन्यास लिखा जिसे अमेजन ने भी 2017 में बेस्टसेलर करा दिया लेकिन फिर भी हीराफेरी का प्रकाशक अब मेरा प्रकाशक नहीं है। उसे अपने ही छापे उपन्यास की कामयाबी से कुछ लेना देना नहीं है। लेखक उसके लिए पहले भी नोबॉडी था और अब भी नोबॉडी है। ये हिन्दी लेखक का ही नहीं बल्कि हिंदी का भी अपमान है। बाहरी मुल्कों में कोई रचना बेस्टसेलर घोषित होती है तो उसका प्रकाशक तुरंत उसका नया संस्करण प्रकाशित करता है जिस पर इस बात पर जोर देती टैगलाइन होती है और दूसरे वो ग्रंथ कई भाषाओं में अनुवाद के अनुबंधित हो जाती है। यहां ऐसा कुछ नहीं होता, न निकट भविष् में होनेवाला है। शायद आगे चलकर कुछ हो। 

Tuesday, February 28, 2017

हिंदी लेखन के पंचमुखी दीपक

बहुधा हिंदी के साहित्यकार हिंदी में पाठकों की कमी का रोना रोते रहते हैं, इस बात पर भी लगातार मंथन होता आया है कि हिंदी की किताबें बिकती नहीं हैं ।  लेकिन इस रुदन के पीछे की वजहों पर यदा-कदा वो भी अगंभीरता से ही बात होती है, जो गोष्ठियों आदि तक ही सीमित रहती है । दरअसल पिछले चार पांच दशकों में साहित्य में एक ऐसी वर्ण व्यवस्था बनाई गई जिसने लेखकों के साथ साथ पाठकों का भी वर्गीकरण कर दिया है । बेहद लोकप्रिय उपन्यास लेखक वेद प्रकाश शर्मा के निधन के बाद एक बार फिर यह साहित्यक वर्णव्यवस्था विमर्श के केंद्र में है । वेदप्रकाश शर्मा के गुजरने के बाद जिस तरह से कथित मुख्यधारा के लेखकों ने उनको लुगदी साहित्यकार कहकर संबोधित किया वह बेहद क्षुब्ध करने जैसा था । वेदप्रकाश शर्मा को लुगदी लेखक कहकर एक बार फिर से साहित्य में वर्णव्यवस्था को पोषक सामने आ गए । लुगदी लेखन, लोकप्रिय लेखन, गंभीर लेखन की पुरानी बहस फिर से साहित्यक विमर्श के केंद्र में है । साहित्य में इस तरह के बहस व्यर्थ हैं क्योंकि साहित्य तो साहित्य है और उसको किसी खांचे में डालकर पाठकों को भ्रमित करने की कोशिश होती है और एक खास किस्म के लेखन को बढ़ावा देने की जुगत होती है, बहुधा खोटे सिक्के को चलाने की कवायद भी । जिसे हिंदी साहित्य में लुगदी कहकर और जिनके लेखकों को पल्प राइटर कहकर हाशिए पर डाल दिया जाता रहा दरअसल वो हिंदी के पाठकों के केंद्र में रहे । चाहे वो गुलशन नंदा हों, रानू हों, सुरेन्द्र मोहन पाठक हों या फिर वेद प्रकाश शर्मा ।
वेद प्रकाश बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे और उनका लिखा इतना अधिक लोकप्रिय होता था कि पाठकों को उनके हर नए उपन्यास का इंतजार रहता था । उनके उपन्यासों की अग्रिम बुकिंग हुआ करती थी । लगभग दो सौ उपन्यास लिखनेवाले वेदप्रकाश शर्मा का हाल ही में लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया । कम ही लोगों को यह बात मालूम होगी कि वेद प्रकाश शर्मा के मशहूर उपन्यास वर्दी वाला गुंडा की करीब आठ करोड़ प्रतियां बिकी थीं । राजीव गांधी की हत्या पर जब यह उपन्यास लिखा गया था तब शुरुआत में ही इसकी पंद्रह लाख प्रतियां छापी गई थीं । हिंदी के पाठकों में इस उपन्यास को लेकर दीवानगी थी । उन्नीस सौ तेरानवे में छपे इस उपन्यास के लिए कई शहरों में पोस्टर और होर्डिंग लगे थे । मेरे जानते किसी राजनीतिक शख्सियत की हत्या और उसकी साजिश पर लिखा गया हिंदी का यह इकलौता उपन्यास है । वेद प्रकाश शर्मा के उपन्यासों को जासूसी या हल्का उपन्यास माना जाता रहा लेकिन हिंदी के स्वनामधन्य आलोचक ये भूल जाते रहे कि पूरी दुनिया में जासूसी उपन्यासों की जबरदस्त मांग रही है और उनके लेखक बेहद लोकप्रिय । इस संदर्भ में पाब्लो नेरूदा का एक इंटरव्यू याद आता है । जब पाब्लो नेरूदा से पूछा गया कि अगर उनके घऱ में आग लग जाए तो वो क्या बचाना चाहेंगे । नेरूदा ने फौरन उत्तर दिया कि वो कुछ जासूसी उपन्यासों के साथ घर से निकलना चाहेंगे । पाब्लो नेरूदा का यह वाक्य जासूसी उपन्यास लेखक की महत्ता को समझने के लिए काफी है ।
वेद प्रकाश शर्मा के उपन्यास तो लोकप्रिय होते ही थे उनके कई उपन्यासों पर फिल्में भी बनीं । जिन उपन्यासों पर फिल्में बनीं वो हैं- वर्दी वाला गुंडा, सबसे बड़ा खिलाड़ी और इंटरनेशनल खिलाड़ी प्रमुख हैं । उन्नीस सौ पचासी में उनके उपन्यास बहू मांगे इंसाफ पर शशिलाल नायर के निर्देशन में बहू की आवाज के नाम से फिल्म बनी थी ।  उन्होंने कई फिल्मों की स्क्रिप्ट और सीरियल के लिए भी लेखन किया । वेद प्रकाश शर्मा हर साल दो तीन उपन्यास लिखते थे और हर उपन्यास की शुरुआती डेढ लाख प्रतियां छपती थीं । जब वेद प्रकाश शर्मा का सौवां उपन्यास कैदी नंबर 100 छप रहा था तो प्रकाशकों ने ढाई लाख प्रतियां छापने का एलान किया था । हिंदी साहित्य के तथाकथित मुख्यधारा के लेखकों के लिए यह संख्या कल्पना से परे, किसी दूसरी दुनिया का आंकड़ा लगता है । यह वेद प्रकाश शर्मा की लोकप्रियता का कमाल था जिसकी वजह से प्रकाशकों में आत्मविश्वास था ।
यह वेदप्रकाश शर्मा की भाषा का ही कमाल था कि आज के तमाम खबरिया चैनल उससे अछूते नहीं हैं । दर्शकों के बीच लोकप्रियता की होड़ में न्यूज चैनलों की भाषा को उनके कार्यक्रमों के नाम से समझा जा सकता है जिसपर वेदप्रकाश शर्मा की छाप लक्षित की जा सकती है । चंद बानगी है - लुटेरी दुल्हन, बीबी का नशा, बहू मांगे इंसाफ, साजन की साजिश, हत्यारा कौन, जुर्म, सनसनी, सास बहू और साजिश आदि । किसी भी लेखक के लिए लोकप्रिय होने के बाद यह संतोष की बात होती है कि उसने अपनी भाषा को किस हद तक अपनी लेखनी से प्रभावित किया और कितने लोगों ने उसका अनुसरण किया ।
वेद प्रकाश शर्मा का जन्म उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के एक गांव में हुआ था । उनके उपन्यास लेखन बनने की भी दिलचस्प कहानी है । बात 1972 की थी और वेद प्रकाश शर्मा गर्मी की छुट्टियों में अपने गांव गए थे । वहां उन्होंने खाली समय में लिखना शुरू किया और कई कॉपियां भर दी । जब उनके पिता को पता चला तो उन्होंने उनकी जमकर पिटाई की और बालक वेदप्रकाश की मां से बोले लो अब पहले तो सिर्फ पढ़ता था अब तो लिखने भी लगा है । उस वक्त किसे मालूम था कि कॉपियों में कथा लिखनेवाला अपनी लेखनी से कीर्तिमान स्थापित करेगा । दरअसल अगर हम समग्रता में देखें तो वेद प्रकाश शर्मा साहित्य का पंचमुखी दीपक थे जिनमें प्रतिभा की बाती पांचो दिशाओं में जलती थी । कथित मुख्यधारा के लेखक भले ही उनको लुगदी लेखक माने लेकिन वेदप्रकाश शर्मा को पाठकों का जो प्यार मिला वो अप्रतिम है ।  


Saturday, June 30, 2012

लुगदी साहित्य की दुर्दशा

सूरजमुखी, प्सासी नदी, प्यासे रास्ते, पतझड़ का सावन, झील के उस पार, शर्मीली, चिंगारी, पाले खां, चैंबूर का दादा, लाल निशान, नरक का जल्लाद, पिशाच का प्यार, वर्दी वाला गुंडा ये कुछ ऐसे नाम थे जो साठ के दशक से लेकर अस्सी के दशक हिंदी पट्टी में लोकप्रियता का पैमाना हुआ करता था । ये नाम थे उन उपन्यासों के जिनको रानू, गुलशन नंदा, सुरेन्द्र मोहन पाठक और वेदप्रकाश शर्मा जैसे लेखक लिखा करते थे । इन उपन्यासों की बिक्री सबसे ज्यादा रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड के बुक स्टॉल से हुआ करती थी । उस दौर में इन किताबों की इतनी धूम रहती थी कि लेखकों को अग्रिम रॉयल्टी दी जाती थी । उपन्यासों की अग्रिम बुकिंग होती थी । कई छोटे शहरों के रेलवे स्टेशन पर तो इन उपन्यासों को छुपाकर रखा जाता था और दुकानदार अपने खास ग्राहकों को काउंटर के नीचे से निकालकर देते थे । लेकिन जब से नब्बे के दशक में टीवी ने दबे पांव लोगों के घरों में दस्तक दी तो उसका सबसे ज्यादा असर इन उपन्यासों पर ही पड़ा । धीरे धीरे टीवी ने हिंदी मध्यवर्गीय पाठकों औप परिवारों पर अपना कब्जा कर लिया और उनकी उस झुधा को शांत करने लगे जिनकी पूर्ति उक्त इपन्यास किया करते थे । कुछ चर्चित टीवी कार्यक्रमों के नाम भी इस तरह के ही होने लगे जुर्म, हत्यारा कौन, सनसनी, सीआईडी, सास बहू और साजिश, बनेगी अपनी बात, तारा आदि । क्राइम और सेक्स की जो भूख लुगदी साहित्य से मिटती थी उसे अब टीवी पूरा करने लग गया था । लिहाजा धीरे-धीरे इस तरह के उपन्यासों की मांग कम होती चली गई और अब तो यह इंडस्ट्री मरणासन्न है ।

अगर हम थोड़ा पीछे जाएं तो हम मान सकते हैं कि हिंदी में पल्प फिक्शन की शुरुआत इब्ने सफी के उपन्यासों से हुई । इब्ने सफी, इब्ने सईद और राही मासूम रजा तीनों दोस्त थे । एक दिन बातचीत में उनके बीच जासीसी उपन्यासों पर चर्चा हो रही थी । बातों बातों में रजा ने कहा कि बगैर सेक्स का तड़का डाले जासूसी उपन्यास लोकप्रिय नहीं हो सकता है । इब्ने सफी ने इसे चुनौती के तौर पर लिया और बगैर सेक्स प्रसंग के पहला उपन्यास लिखा । वह उपन्यास जबरदस्त हिट हुआ । फिर तो इब्ने सफी ने जासूसी उपन्यासों की दुनिया में तहलका मचा दिया । इब्ने सफी के इमरान सीरीज के उपन्यासों की बदौलत उनके मित्र अली अब्बास हुसैनी ने एक प्रकाशन गृह खोल लिया । अभी कुछ दिनों पहले एक बार फिर से हॉर्पर कॉलिंस ने इब्ने सफी के उपन्यासों को प्रकाशित करना शुरू किया है । उसी वक्त के आसपास इलाहाबाद से जासूसी पंजा नाम की पत्रिका में अकरम इलाहाबादी भी एक जासूसी सीरीज लिखा करते थे जो उन दिनों बेहद लोकप्रिय था । जासूसी पंजा की लोकप्रियता के मद्देनजर डायमंड पॉकेट बु्क्स और हिंद पॉकेट बुक्स ने एक रुपए की सीरीज की किताबें छापनी शुरू की । लेकिन इस तरह के रहस्य और रोमांच से भरे कथानक वाले उपन्यासों की धूम मची साठ के दशक के बाद जब जब गुलशन नंदा, रानू, सुरेन्द्र मोहन पाठक, अनिल मोहन, कर्नल रंजीत और मनोज जैसे लेखकों ने इस साहित्य को एक नई उंचाई तक पहुंचा दिया । रानू और गुलशन नंदा तो हिंदी पट्टी के तकरीबन हर घर तक पहुंच रहे थे । रानू और गुलशन नंदा महिलाओं और नए नए जवान हुए कॉलेज छात्र-छात्राओ की पहली पसंद हुआ करते थे । गुलशन नंदा तो इतने लोकप्रियय हुए कि उनके उपन्यास- झील के उस पार, शर्मीली और चिंगारी पर फिल्म भी बनी जो हिट रही । गुलशन नंदा ने जब 1962 में अपना पहला उपन्यास लिखा तो उसकी दस हजार प्रतियां छपी । ये प्रतियां बाजार में आते ही खत्म हो गई और मांग के मद्देनजर दो लाख प्रतियां छपवानी पड़ी थी । पहले उपन्यास  की सफलता से उत्साहित प्रकाशक ने फिर तो गुलशन नंदा के उपन्यासों का पहला संस्करण ही पांच लाख का छपवाना शुरू कर दिया । जो कि ऐताहिसक आंकड़ा था । उस दौर में उन उपन्यासों की कीमत पांच रुपय़े हुआ करती थी और सारा खर्चा काटकर भी प्रकाशक को हर प्रति पर एक रुपए का मुनाफा होता था जो कि उस वक्त के लिहाज से बेहतरीन मुनाफा माना जाता था ।  इस तरह के उपन्यासों की मांग यात्राओं के दौरान बेहद ज्यादा होती थी । छोटी और लंबी यात्रा करनेवाले पांच से दस रुपए तक का यह उपन्यास खरीद लेते थे । इनकी लोकप्रियता का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि सुरेन्द्र मोहन पाठक का उपन्यास पैंसठ लाख की डकैती की अबतक पच्चीस लाख से ज्यादा प्रतियां बिक चुकी हैं । भले ही चालीस साल में ये आंकड़ा हासिल हुआ हो लेकिन हिंदी के लिए यह स्थिति अकल्पनीय है । इस तरह के उपन्यासों की लोकप्रियता को देखते हुए कई घोस्ट राइटर्स ने भी पैसे की खातिर लिखना शुरू कर दिया । मनोज ऐसा ही काल्पनिक नाम था जिसकी आड़ में कई लेखक लिखा करते थे ।

जासूसी और हल्की रोमांटिक कथाओं का बड़ा बाजार बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और कुछ कुछ राजस्थान के अलावा दिल्ली और मुंबई जैसे महानगर भी थे । इन रोमांटिक उपन्यासों में जिस तरह का हल्का फुल्का सेक्स प्रसंग होता था उसने भी इन्हें लोकप्रिय बनाया ।  सा सत्तर के दशक में भारतीय समाज में सेक्स प्रसंगों को लेकर इस तरह का खुलापन नहीं था । लोग बाग घर परिवार में भी सेक्स प्रसंगों के बारे में बातें करते हुए कतराते थे । घर की लड़कियां और महिलाएं तो इस बारे में सिर्फ सोचकर ही रह जाती थी । उस माहौल में रोमांस और सेक्स प्रसंगों की चर्चा करके लेखकों ने अपनी कृतियों को पठनीय बना दिया था । कई घरों में तो किशोरवय के लड़के लड़कियां रानू और गुलशन नंदा को अपने अभिभावकों से छिपकर पढ़ते थे । उस दौर में इन उपन्यासों के लोकप्रिय होने के सामाजिक कारण थे । लेकिन जब नब्बे के दशक में टीवी आया तो रोमांस और सेक्स प्रसंगों पर सीरियल्स में खुलकर बातें होने लगी थी । इससे गुलशन नंदा और रानू के उपन्यासों के पाठक कम होने लगे । टीवी में इन प्रसंगों की जैसे जैसे बढ़ोतरी हुई वैसे वैसे पल्प फिक्शन खत्म होने लगा । दर्शक में तब्दील हो चुके पाठकों को टीवी में उपन्यास से ज्यादा मसाला मिलने लगा । सास बहू सीरियल्स के रूप में महिलाओं को एक नया स्वाद मिला और वो अपने आप को उन पात्रों से आईडेंटिफाई करने लगी । हम कह सकते हैं कि पल्प फिक्शन या लुगदी साहित्य का आखिरी लोकप्रिय उपन्यास वर्दी वाला गुंडा था । इसके लेखक वेद प्रकाश शर्मा हैं । राजीव गांधी की हत्या को केंद्र में रखकर लिखे गए इस उपन्यास के लिए उत्तर भारत के शहरों में होर्डिंग लगे थे, एडवांस बुकिंग हुई थी । नतीजा यह हुआ कि जब यह उपन्यास बाजार में आया तो आते ही खत्म हो गया । रीप्रिंट पर रीप्रिंट करने पड़े । वेद प्रकाश शर्मा के उपन्यासों का बाजार अब भी थोडा़ बहुत बचा है । लेकिन वो स्वर्णिम दौर खत्म हो गया लगता है । इसके साथ ही खत्म हो गया मेरठ से चलनेवाला यह कारोबार । हिंदी के ये उपन्यास मेरठ से छपा करते थे और वहीं से देशभर में भेजे जाते थे । टेलीविजन ने भारत में इस लोकप्रिय विधा को लगभग समाप्त कर दिया कई लोगों को इस बात पर आपत्ति है लेकिन तमाम आपत्तियों और तर्कों के बावजूद इतना तो तय है कि टीवी ने इनकी लोकप्रियता को जबरदस्त नुकसान पहुंचाया । हाल के दिनों में जिस तरह से कुछ नए प्रकाशकों ने इन पुराने उपन्यासों को छापकर बेचने की योजना बनाई है उससे एक बार इसके फिर से जी उठने की उम्मीद जगी है । उम्मीदें कितनी कामयाब होती है यह अभी समय के गर्भ में हैं ।