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Saturday, April 12, 2025

साहित्यिक बाजार में नया कारोबार


कुछ दिनों पूर्व मेरे एक मित्र का फोन आया। इधर-उधर की बातें करने के बाद बोला कि यार! मैं कविताएं लिखना चाहता हूं। मुझे लगा ये सनक गया है या मजाक कर रहा है। हमाररी मित्रता लंबे समय से है उसने कभी इस तरह की बातें नहीं की। बात टालने के लिए मैंने कहा कविताएं लिखना तुम्हारे वश में नहीं है। तुम अपने करियर में अच्छा कर रहे हो वहीं ध्यान दो। उसने बहुत प्यार से उत्तर दिया। कहा मैं इस बात से सहमत हूं कि कविता लिखना कठिन है। पर सोचो अगर अनामिका जी जैसी सिद्धहस्त कवयित्री कविता लेखन की बारीकियां सिखाएंगीं तो मेरे जैसा व्यक्ति भी कविता लिख लेगा। अब मैं थोड़ा घबराया कि वो मुझे इस बात के लिए कहेगा कि मैं अनामिका जी से उसको समय दिला दूं। उसको टालने के लिए मैंने कहा कि अनामिका जी बहुत व्यस्त रहती हैं। उनका अपना लेखन है, कालेज की व्यस्तता है और पारिवारिक और सामाजिक जिम्मेदारियां हैं, वो समय नहीं दे पाएंगी। उसने तपाक से उत्तर दिया कि मुझे तो अनामिका जी का समय मिल गया है। वो हमें कविता लेखन की बारीकियां सिखाएंगी। मैंने आश्चर्य से उसकी ओर देखा। उसने मेरे मनोभाव को समझकर पूरी बात बताई कि साहित्यिक पत्रिका नईधारा ने कविता लेखन वर्कशाप का आयोजन किया है। इस वर्कशाप का विज्ञापन उसने फेसबुक पर देखा था। विज्ञापन में वकर्शाप में भाग लेने की पूरी प्रक्रिया थी। उसने प्रक्रिया पूरी की और निर्धारित शुल्क जमाकर वो निश्चिंत हो गया था। इस बात से प्रसन्न भी कि अनामिका जी से वो कविता लेखन की बारीकियां सीखने जा रहा है। 

हमारी बातचीत समाप्त हो गई लेकिन बाद में मैं सोचने लगा कि चार घंटे के वर्कशाप में कोई कविता लेखन की बारीकियां कैसे सीख सकता है। इसमें कोई शक नहीं कि अनामिका जी कविता लेखन पर विस्तार से बात कर सकती हैं। कविता का स्ट्रक्चर बता सकती हैं। हिंदी-अंग्रेजी कविता की सुदीर्घ और समृद्ध परंपरा पर बात कर सकती हैं। पर कोई किसी वर्कशाप में बारीकियां सीख कर कवि कैसे बन सकता है। कविता की उन परिभाषाओं का क्या होगा जो विभिन्न भाषाओं में प्रचलित है। हम तो बचपन से सुनते आए हैं कि वियोगी होगा पहला वो कवि आह से उपजा होगा गान। अगर वर्कशाप से कविता लिखना सीख जाएगा तो फिर न तो वियोग की आवश्यकता होगी और न ही आह की। विलियम वर्ड्सवर्थ की उस उक्ति का क्या होगा जिसमें वो कहते हैं, पोएट्री इज द स्पांटेनियस ओवरफ्लो आफ पावरफुल फीलिंग्स, इट टेक्स इट्स आरिजन फ्राम इमोशंस रिकलेक्टेड इन ट्रैंक्विलिटि। वर्ड्सवर्थ भी पावरफुल फीलिंग्स की बात कर रहे हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल का एक लंबा लेख है कविता क्या है? उसमें एक जगह शुक्ल कहते हैं, जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है उसी प्रकार ह्रदय की मुक्तावस्था रसदशा कहलाती है। ह्रदय की इसी मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द विधान करती आई है उसे कविता कहते हैं। विचार करने की बात है कि कुछ घंटों में ह्रदय की मुक्ति साधना के लिए शब्द विधान सीखा जा सकता है। इन प्रश्नों के बारे में विचार किया जाना चाहिए। वरिष्ठ कवियों की नियमित संगति कविता से, उसकी लेखन पद्धति से हमें परिचित करवा सकती है पर लिखना तो अलग ही बात है। इन दिनों कविता छंद आदि से भी दूर हो गई है तो कह सकते हैं कि बारीकियां तो बची नहीं। छंद, मीटर आदि की आवश्यकता रही नहीं। 

इन दिनों होता ये है कि जैसे ही आप फेसबुक पर कोई एक विषय सर्च करते हैं तो उसी से संबंधित पोस्ट आपकी टाइमलाइन पर आने लग जाती है। चूंकि मैंने नईधारा का विज्ञापन उनकी पोस्ट पर जाकर देखा था। विज्ञापन के नीचे लिखे विवरण को पढ़ा भी था। इसका परिणाम यह हुआ कि मेरी टाइमलाइन पर विभिन्न प्रकार के साहित्य लेखन सिखानेवाले पोस्ट आने लग गए। उनमें से तो कई लेखक ऐसे हैं जो उपन्यास और गद्य लिखना सिखा रहे हैं। उनकी अच्छी खासी फीस है। सिखानेवाले भी इस तरह के लेखक हैं जिनको अभी लेखक के तौर पर स्वयं को स्थापित करना है। स्वयं शुद्ध हिंदी लिखना सीखना है। वाक्य विन्यास ठीक हो इसपर मेहनत करने की आवश्यकता है। इन सबको देखकर मैं इस सोच में पड़ गया कि हिंदी साहित्य कितना विविधरंगी हो गया है। जो हिंदी साहित्य कभी बाजार के विरुद्ध चीखता नहीं थकता था आज उसी हिंदी साहित्य में लिखना सिखाना कारोबार हो गया है। साहित्य का बाजार सज चुका है। आकांक्षी लेखकों के लिए तरह-तरह की दुकानें हैं जिनपर विभिन्न विधाओं के बोर्ड लगे हुए हैं। उन बोर्ड को देखिए और अपनी पसंद की विधा का चयन कीजिए। भुगतान करिए और लेखक बनने की राह पर आगे बढ़ जाइए। कविता लिखना सीखिए, उपन्यास लेखन करिए, कहानियां लिखना सीखिए जो चाहें वो सीख सकते हैं। और अब तो आनलाइन के इस युग में सीखना भी आसान हो गया है। आप गाड़ी चलाते हुए सीख सकते हैं, जिम करते हुए सीख सकते हैं। 

प्रश्न ये है कि लेखन सिखाने की ये दुकानें क्यों खुल रही हैं और उनको पैसे देकर सीखने वाले मिल कहां से रहे हैं। ये जानने के लिए मैंने अपने मित्र को ही फोन मिलाया। मैंने उससे वर्कशाप के बारे में तो नहीं पूछा लेकिन कहा कि आप कवि बनकर क्या हासिल करना चाहते हैं। उन्होंने चहकते हुए कहा कि दोस्त तुम पता नहीं क्यों, समझना नहीं चाहते हो? अगर कविताएं लिखने लग गया तो रोज लिखूंगा। फेसबुक पर डालता रहूंगा। लाइक्स आदि तो मिल ही जाएंगे। सौ दिन में सौ कविताएं लिख दूंगा। आजकल दर्जनों ऐसे प्रकाशक हैं जो पैसे लेकर पुस्तकें छाप दे रहे हैं। उनसे अपनी कविताओं का संकलन छपवा लूंगा। सौ दो सौ प्रतियां बांट दूंगा। हो गया कवि। लिटरेचर फेस्टिवल में बुलाया जाने लगूंगा। कविता पाठ करने लग जाऊंगा। समाज में एक प्रतिष्ठा बन जाएगी। 

इसके बाद मैंने एक दूसरे आकांक्षी लेखक को फोन किया। उसने पिछले साल उपन्यास लेखन की वर्कशाप की थी। उसने बताया कि कहानी लिखना तो बहुत ही आसान है। आप किसी घटना को जैसे देखते हैं लिख दीजिए। अधिक से अधिक 1000 शब्द में। दस-बीस कहानी हो गई तो संग्रह प्रकाशित करवा लीजिए। एक प्रकाशक के पास पैकेज है, सिल्वर, गोल्ड और डायमंड। अगर आप डायमंड पैकेज लेते हैं तो वो आपकी पुस्तक और आपको प्रमोट करेगा, लिट फेस्ट में भी भेजने की व्यवस्था करेगा। ऐसे कई कथित उपन्यासकार या कहानीकार समकालीन हिंदी साहित्य की दुनिया में विचरण कर रहे हैं। और तो और ऐसे ही एक उपन्यासकार कहानी लिखना सिखाने की कार्यशाला का आयोजन भी करने जा रहे हैं। दरअसल साहित्य की दुनिया पिछले दिनों इतनी ग्लैमरस हो गई है कि हर कोई उस दुनिया में जाना चाहता है। वहां मंच है, सेल्फी है, सेल्फ प्रमोशन है, नेटवर्किंग का अवसर है, गासिप है। कहना ना होगा कि वहां हर चीज है जो ग्लैमरस दुनिया में होनी चाहिए। पर सबको ये समझना होगा कि साहित्य रचना एक लंबी तपस्या है जिसके बाद ही कोई विधा सधती है। ये कोई इंस्टैंट नुडल नहीं है कि झट डाला पट तैयार। 


Saturday, November 11, 2023

आचार्य रामचंद्र शुक्ल का हिंदू मन


भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला में पिछले दिनों भारतीय भाषाओं के अंतरसंबंध पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में भाग लेने का अवसर मिला। उस दौरान आचार्य रामचंद्र शुक्ल का अंग्रेजी में लिखा लेख हिंदी एंड द मुसलमान्स पर चर्चा हुई। उसी क्रम में रामचंद्र शुक्ल की तुलसी की भक्तिपरक और काव्य पद्धति को पढ़ने का मौका मिला। उसके बाद ऐसा प्रतीत हुआ कि रामचंद्र शुक्ल के साथ बाद के लेखकों ने न्याय नहीं किया। तुलसी काव्य की उनकी व्याख्या और उसके धार्मिक आधारों की विवेचना कम हुई। चर्चा इस बात की अधिक होती रही कि रामचंद्र शुक्ल ने तुलसी के सामने कबीर को याद नहीं किया। इतना ही नहीं कोशिश तो ये भी हुई कि तुलसी और कबीर को लेकर आचार्य शुक्ल और आचार्य द्विवेदी को प्रतिद्वंदी की तरह पेश किया गया। रामचंद्र शुक्ल के तुलसी काव्य पर लिखे को आगे बढ़ाने का प्रयास न के बराबर हुआ। अगर शुक्ल के लेखन के समग्र आयामों पर अगर बात होती तो उनका हिंदू मन या सनातन धर्म में उनकी आस्था सामने आ जाती। ये बात वामपंथ में आस्था रखनेवाले लेखकों और आलोचकों को स्वीकार नहीं होता, लिहाजा इस तरह का प्रपंच रचा गया कि शुक्ल के लेखन के हिंदू पक्ष के बारे में बात ही न हो। यह कार्य निराला के साथ भी किया गया, प्रेमचंद के साथ भी किया गया और कल्याण पत्रिका में प्रकाशित उनके लेखों को हिंदी के नए पाठकों से दूर रखने का बौद्धिक षडयंत्र रचा गया। इस षडयंत्र की चर्चा आगे होगी लेकिन पहले देख लेते हैं कि शुक्ल जी ने क्या लिखा है। 

तुलसी की भक्ति पद्धति में आचार्य शुक्ल ने दिल खोलकर हिंदूओं और उनके धर्म प्रतीकों पर लिखा है। लेख के आरंभ में आचार्य शुक्ल कहते हैं कि देश में मुसलमान साम्राज्य के पूर्णतया प्रतिठित हो जाने पर वीरोत्साह के सम्यक संचार के लिए वह स्वतंत्र क्षेत्र न रह गया, देश का ध्यान अपने पुरुषार्थ और बल-पराक्रम की ओर से हटकर भगवान की शक्ति और दया-दाक्षिण्य की ओर गया। देश का वह नैराश्य काल था जिसमें भगवान के सिवा कोई सहारा नहीं दिखाई देता था। आचार्य शुक्ल ने आगे कहा कि सूर और तुलसी ने इसी भक्ति के सुधारस से सींचकर मुरझाते हुए हिंदू जीवन को फिर से हरा कर दिया। भगवान का हंसता खेलता रूप दिखाकर सूरदास ने हिंदू जाति की नैराश्यजनित खिन्नता हटाई जिससे जीवन में प्रफुल्लता आ गई। पीछे तुलसीदासजी ने भगवान का लोक-व्यापारव्यापी मंगलमय रूप दिखाकर आशा और शक्ति का अपूर्व संचार किया। अब हिंदू जाति निराश नहीं है। आचार्य शुक्ल इतने पर ही नहीं रुकते हैं वो आगे कहते हैं कि सूरदास की दिव्य वाणी का मंजु घोष घर-घर क्या, एक एक हिंदू के ह्रदय तक पहुंच गया। यही वाणी हिंदू जाति को नया जीवनदान दे सकती थी। इसके बाद वो तुलसी के रामचरित की जीवनव्यापकता पर आते हैं और कहते हैं कि राम के चरित से तुलसी की जो वाणी निकली उसने राजा, रंक, धनी, दरिद्र, मूर्ख, पंडित सबके ह्रदय और कंठ में बसा दिया। गोस्वामी जी ने समस्त हिंदू जीवन को राममय कर दिया।

आचार्य शुक्ल ने सूफियों के ईश्वर को केवल अपने मन के भीतर समझने और ढूढ़ने की अवधारणा पर भी प्रहार किया। उन्होंने कहा कि भारतीय परपंरा का भक्त अपने उपास्य को बाहर लोक के बीच प्रतिष्ठित करके देखता है, अपने ह्रदय के कोने में नहीं। गोस्वामी जी भी ललकार कर कहते हैं कि भीतर ही क्यों देखें, बाहर क्यों न देखें- अन्तर्जामिहु तें बड़ बारहजामी हैं राम जो नाम लिए तें। पैज परे प्रह्लादहु को प्रगटे प्रभु पाहन तें, न हिए तें। वो स्पष्ट रूप से कहते हैं कि अगर भगवान को देखना है तो उन्हें व्यक्त जगत के संबंध से देखना चाहिए। वो यह मानते थे कि भगवान को मन के भीतर देखना योगमार्ग का सिद्धांत है भक्ति मार्ग का नहीं। सूफियों की इस अवधारणा के बाद गोस्वामी जी ने उपासना या भक्ति का केवल कर्म और ज्ञान के साथ ही सामंजस्य स्थापित नहीं किया, बल्कि भिन्न भिन्न उपास्य देवों के कारण जो जो भेद दिखाई पड़ते थे, उनका भी एक में पर्यवसान किया। इसी एक बात से ये अनुमान हो सकता है कि उनका प्रभाव हिंदू समाज की रक्षा के लिए ,उसके स्वरूप को रखने के लिए कितने महत्व का था। तुलसी के इस महत्व को बाद के दिनों में बहुत ही कम रेखांकित किया गया। आचार्य शुक्ल ने तुलसी के काव्य को लेकर इस प्रकार के जो विचार प्रस्तुत किए थे उसको भी दबाने का प्रयास किया गया। धर्म और जातीयता के समन्वय पर भी आचार्य शुक्ल ने विचार किया। उनका मानना था कि तुलसी ने अपने काव्य में जो रामरसायन तैयार किया जिसके सेवन से हिंदू जाति विदेशी मतों के आक्रमणों से बहुत कुछ रक्षित रही और अपने जातीय स्वरूप को दृढ़ता से पकड़े रही। उनका मानना था कि सारा हिंदू जीवन राममय हो गया था। वो तो यहां तक कह गए कि राम के बिना हिंदू जीवन नीरस है, फीका है, यही रामरस उनका स्वाद बनाए रहा और बनाए रहेगा। राम का मुंह देख हिंदी जनता का इतना बड़ा भाग अपने धर्म और जाति के घेरे में पड़ा रहा। न उसे तलवार हटा सकी, न धनमान का लोभ, न उपदेशों की तड़क भड़क। जिन राम को जनता जीवन के प्रत्येक स्थिति में देखती आई, उन्हें छोड़ना अपने प्रियजन को छोड़ने से कम कष्टकर न था। आचार्य शुक्ल ने बहुत बोल्ड तरीके से अपनी बात कही थी कि हमने चौड़ी मोहरी का पायजामा पहना, आदाब अर्ज किया पर राम-राम न छोड़ा। कोट पतलून पहनकर बाहर ‘डैम नानसेंस’ कहते हैं पर घर आते ही राम-राम।

अब आते हैं बौद्धिक षडयंत्र पर जहां कि रामचंद्र शुक्ल के हिंदू मन को हिंदी पाठकों से छिपाने का प्रयत्न हुआ। यशपाल से लेकर प्रकाशचंद्र गुप्त तक ने शुक्ल जी को सामंतवाद का विरोधी और जनवादियों से सहानुभूति रखनेवाला बताया। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की त्रैमासिक पत्रिका बहुवचन के प्रवेशांक( अक्तूबर-दिसंबर 1999) में सुधीश पचौरी का एक लेख प्रकाशित हुआ था, रामचंद्र शुक्ल की धर्म भूमि। विखंडनवाद के औजारों से लैस होकर सुधीश पचौरी ने रामचंद्र शुक्ल को एक धार्मिक विमर्शकार करार दिया था। लेख जब आगे बढ़ता है तो वो शुक्ल जी को एक हिंदू विमर्शकार के रूप में रेखांकित करते हैं और कहते हैं कि वो एक हिंदू विमर्शकार हैं जो अपने समय के प्रतिबिंब तो हैं ही अपने समय को सत्ता विमर्श में बदलनेवाले भी हैं और हिंदी आलोचना अभी तक उनके विमर्श से बाहर नहीं निकली है। इस लेख में सुधीश पचौरी ने शुक्ल जी की आलोचना करते हुए उनको एकार्थवादी हिंदुत्व के औजार बनते देखते हैं। सुधीश पचौरी की स्थापनाओं पर तब काफी विवाद हुआ था। यह साहित्यिक विमर्श का विषय हो सकता है लेकिन शुक्ल जी ने जिस प्रकार से हिंदी आलोचना की अस्मिता को तुलसी और सूर के काव्य के माध्यम से राम और कृष्ण से जोड़ा वो उनके हिंदू मन को सामने लाता है। आचार्य शुक्ल ने उस हिंदू मन को पकड़ा और रेखांकित किया है जो अपने अतीत को याद रखते हुए अपनी ज्ञानदृष्टि को समायनुकूल बनाने में नहीं हिचकता है। शुक्ल जी ने जर्मन वैज्ञानिक हैकल की एक पुस्तक का अनुवाद किया था जो ‘विश्वप्रपंच’ के नाम से प्रकाशित है उसकी भूमिका में उनकी समयानुकूल दृष्टि दिखती है। अपनी परंपरा और जड़ों से जुड़े रहकर भी आधुनिक बने रहने की। कहना न होगा कि शुक्ल हिंदी आलोचना के ऐसे हिरामन हैं जिनकी वैश्विक दृष्टि ने भारतीय साहित्य को समृद्ध किया। जरूरत इस बात की है कि उनके हिंदू मन पर समग्रता में विमर्श हो। 

Saturday, April 8, 2023

भ्रांतियां दूर करने की चुनौती


पिछले दिनों एक सेमिनार में हिस्सा लिया था। वहां मुगलों और अंग्रेजों पर बात हो रही थी। एक वक्ता ने मंच से कहा कि भारत में कई सारी चीजें मुगल और कई अंग्रेज लेकर आए। इन चीजों और प्रथाओं ने भारतीय समाज को अपेक्षाकृत आधुनिक बनाया। यहां से होते हुए बात हिंदी-उर्दू पर चली गई और वहां से भारतीय पहरावा और खान-पान पर। मंच से ये तक कहा गया कि भारत में सिले हुए वस्त्र मुगलों के साथ आए और उसके पहले यहां के लोग सिले हुए वस्त्रों से परिचित ही नहीं थे। इस संबंध में उन्होंने चीनी यात्री फाहयान के यात्रा वृत्तांत का उदाहरण देते हुए ये साबित करने की कोशिश की मध्यकाल के पहले भारत में सिले हुए वस्त्रों का कहीं उल्लेख नहीं मिलता। कुछ देर तक इसके पक्ष-विपक्ष में बहस चलती रही लेकिन मुगलों और अंग्रेजों के पक्ष में तर्क रख रहे सज्जन ने विदेशी लेखकों के नाम गिनाने आरंभ किए तो सभागार में बैठे लोगों को लगा कि उनकी बातों में दम है। सत्र समाप्त हुआ। इसके बाद भी लोगों के बीच इस विषय पर चर्चा होती रही। लोग पक्ष विपक्ष में तर्क देते रहे लेकिन चूंकि हमारी शिक्षा पद्धति में इस तरह की बातों को उतना महत्व नहीं दिया इस कारण नई पीढ़ी तक बातें पहुंच नहीं पाई। विदेशियों की पुस्तकों के उद्धरणों और विदेशी विद्वानों के लिखे को अंतिम सत्य मानने वाले विद्वानों ने उनके आधार पर निरंतर ये भ्रम फैलाया कि भारत में सिले हुए वस्त्रों से परिचय मुस्लिम आक्रांताओं के आक्रमण के बाद हुआ। विदेशी लेखक बकनन हैमिल्टन ने अपनी पुस्तक ईस्टर्न इंडिया में ये कहा है प्राचीन हिंदू जाति सिले हुए वस्त्र के व्यवहार से पूर्णतया अनभिज्ञ थी, उका प्रचार मुसलमानों के आक्रमण के पश्चात हुआ। उनके इसी कथन को म्योर और वाटसन जैसे यूरोपीय विद्वानों ने आधार मानकर इस धारणा को आगे बढ़ाया। जिन लोगों ने सिर्फ इन विद्वानों को पढ़ा है उनको लगता है कि ये बात सही है। जबकि भारतीय लेखन में इसका कई बार प्रमाण सहित प्रतिकार किया जा चुका है। 

हिंदी के प्रसिद्ध आलोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने सरस्वती पत्रिका में 1902 में एक लेख लिखकर प्रमाण सहित बताया था कि प्राचीन भारत में सिले हुए वस्त्रों और सुई का प्रमाण उपलब्ध है। आचार्य शुक्ल ने अपने लेख में प्राचीन ग्रंथों और प्राचीन मूर्तियों के सहारे ये स्थापित किया कि सिले हुए वस्त्रों का चलन भारत में बहुत पहले से था। उन्होंने ऋगवेद का उदाहरण दिया जहां सुई और सीने का उल्लेख है। सिव्यतु अपच शुच्य छेद्यमानय, 2(288)। वो कहते हैं कि ‘मूल शब्द शूचि है जिसके लिए ये अनुमान बांधना कि उससे कांटे या और किसी नोकीली वस्तु से अभिप्राय है, उपहासजनक होगा। यह भी विचार करने का स्थल है कि प्राचीन आर्य लोहे के शस्त्र इत्यादि बनाने में कुशल होकर भी सुई से पूरे अनभिज्ञ बने रहते।‘  उन्होंने कर्नल टेलर के इस कथन का भी सोदाहरण निषेध किया है कि प्राचीन हिंदू जाति में दर्जी का होना प्रमाणित नहीं है और न ही उनकी भाषा में इसके लिए कोई शब्द है। इस संदर्भ में आचार्य रामचंद्र शुक्ल अमरसिंह के अमर कोष का संदर्भ देते हैं। यहां यह बताना आवश्यक है कि अमरसिंह का अमरकोष ईसा से पूर्व का माना जाता है। अमरसिंह के कोष में दर्जी के लिए दो शब्द प्रयोग किए गए हैं। एक है तन्तुवाय और दूसरा है सौचिक। (तन्तुवाय: कुविंद: स्यात्तुन्नवायस्तु  सौचिक:-अमरकोष)। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने लेख में इस बात को भी रेखांकित किया है कि पाणिनी के सूत्रों में भी इस शब्द का उल्लेख है। रामायण और महाभारत के अलावा भी संस्कृत के अन्यान्य ग्रंथों में इस तरह के पहिरावों का उल्लेख है जो बगैर सुई और सीने के बन नहीं सकते। उदाहरण के तौर पर कंचुक, कंचुलिक, अंगिका, चोलक, चोल, कुर्पासक। 

इन शब्दों को अर्थ और उसके प्रयोग को देखते हैं तो इस बात के प्रमाणिक संकेत मिलते हैं कि प्राचीन काल में भारत में सुई और सिले हुए वस्त्रों की परंपरा रही है। ऐसे वस्त्र पहने जाते थे तो सिलकर ही तैयार हो सकते थे। अब अगर कंचुक शब्द के अर्थ को ही देखें तो इसका अर्थ होता है सैनिकों का कुर्ते जैसा एक विशेष वस्त्र। कई जगह ‘सन्नाह’ शब्द का प्रयोग लोहे के कवच और सूत के बने वस्त्रों के लिए भी किया जाता है। सन्नाह को कंचुक का पर्यावाची मानकर कई कोष में उसका अर्थ वाणों से बचाव के लिए लोहे से निर्मित पहिराव के तौर पर किया गया है। रामचंद्र शुक्ल इस बात को प्रमाणित करते हैं कि प्रचीन काल में कंचुक का अभिप्राय सूत से बने वस्त्रों के लिए भी किया जाता था। इस संदर्भ में वो महाभारत का उदाहरण देते हैं कि युधिष्ठिर के राज्याभिषेक के समय ऋषियों का कंचुक और पगड़ी धारण करने का उल्लेख है। (विवशुस्ते सभां दिव्यां सोष्णीषां धृतकंचुका:)। अब एक और शब्द को देखते हैं। अंगिका एक प्रकार की कुर्ती होती थी जिसको हिंदी में अंगिया कहते हैं। अंगिया शब्द संस्कृत के अंगिका का अपभ्रंश है। इस बात को प्रमाणित करता है कि प्राचीन काल में सिले हुए वस्त्र पहने जाते थे। एक शब्द है नीवी। नीवी कहते हैं इजारबंद को जो घाघरे में डाला जाता है। अगर प्राचीन काल में घाघरे नहीं थे तो नीवी का क्या काम था। 

रामचंद्र शुक्ल ने शब्दों के अलावा अपने उस लेख में मूर्तियों और उसपर उकेरे गए वस्त्रों के आधार पर इस बात को प्रमाणित किया कि प्राचीन काल में भारत में सिले हुए वस्त्रों का चलन था। उन्होंने अमरावती और ओडिशा की प्राचीन मूर्तियों और वस्त्रों को आधार बनाया है। अमरावती में कई मूर्तियां नग्नावस्था और अर्धनग्नावस्था में हैं लेकिन उनके बीच कई मूर्तियां ऐसी भी हैं जिनके वस्त्र उस काल में दर्जी के अस्तित्व के संकेत करते हैं। पुस्तक ‘एंटिक्स आफ ओडीशा’ में उदयगिरी की गुफाओं में चट्टानों से काटकर बनाई मूर्ति को एक चुस्त चपकन पहने दिखाया गया है। इस मूर्ति की अवस्था करीब 2300 साल पूर्व की मानी जाती है।ये चपकन जामे के जैसा है। पुरुषों के अलावा अगर स्त्रियों की बात करें तो इस बात के कई प्रमाण धर्मशास्त्र से लेकर बौद्धग्रंथों में भी उपलब्ध हैं कि स्त्रियां पर्याप्त वस्त्र पहनती थीं। स्त्रियों में साड़ी का प्रचलन था। संपन्न घरों की स्त्रियां घाघरा और कुर्ती और उसके उपर से कभी कभार अंगिया धारण करती थीं। आचार्य शुक्ल ने उक्त लेख के अंत में बहुत ही दिलचस्प बात कही है वो ये कि बंगाल इत्यादि प्रांतों में अधिकांश दर्जी समूह मुसलमान हैं जिसकी वजह से हेमिल्टन समेत कई लेखक भ्रमित हो गए कि दर्जी की अवधारणा भारतीय नहीं है। परंतु पूरे भारतवर्ष में ऐसा नहीं था। शेरिंग ने अपनी पुस्तक ‘हिंदू कास्ट एंड ट्राइव्स आफ बनारस’ में हिंदुओं के दर्जी होने का उल्लेख किया है।ये भी बताया है कि हिंदुओं में किस जाति के लोग दर्जी का काम करते थे। 

अगर भारत के प्राचीन गंथों को और उस समय के विदेशी लेखकों के लेखन को समग्रता में देखें तो कई प्रकार की भ्रांतियां दूर होती हैं। आवश्यकता इस बात है कि हमारे देश में जो देसी विद्वानों ने जो लिखा उसको प्रचारित प्रसारित किया जाए। उसको नई पीढ़ी को बताया और पढ़ाया जाए। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के लिए नए पाठ्यक्रम तैयार किए जा रहे हैं। नई पुस्तकें तैयार की जा रही हैं। इस कार्य में उन विद्वानों को लगाना चाहिए जो सिर्फ ग्रंथों से परिचित ना हों बल्कि उन ग्रंथों को समग्रता से देखकर छात्रों के पाठ को तैयार कर सकें। अगर ऐसा हो पाता है तो राष्ट्रीय शिक्षा नीति की सार्थकता स्थापित होगी और ये बदलाव का वाहक बन सकेगा। 


Wednesday, May 31, 2017

तुलसी और कबीर के निकष अलग

क्या यह संभव है कि एक कालखंड में या अलग अलग कालखंड में दो या तीन कवि महान हो सकते हैं? क्या एक कवि को दूसरे कवि के निकष पर कसना और फिर उनका मूल्यांकन करना उचित है ? एक कवि के पदों में से दो एक पदों को उठाकर उसको प्रचारित कर देना और दूसरे कवि के चंद पदों के आधार पर उनको क्रांतिकारी ठहरा देना कितना उचित है? पर हमारे देश के दो महान कवियों के साथ ये सब किया गया। तुलसीदास को नीचा दिखाने के लिए कबीर को उठाने का सुनियोजित खेल खेला गया। उपर जितने भी सवाल उठाए गए हैं अगर हम उनके उत्तर ढूंढते हैं तो यह खेल साफ हो जाता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपनी पुस्तक में तुलसीदास को लेकर अपनी मान्यताओं को स्थापित किया था। जब बीसबीं शताब्दी में हजारी प्रसाद द्विवेदी आए तो उनके सामने यह चुनौती थी कि वो खुद आचार्य शुक्ल से अलग दृष्टिवाले आलोचक के तौर पर खुद को स्थापित करें। खुद को स्थापित करने के लिए यह आवश्यक था कि वो कोई नई स्थापना लेकर आते या पहले से चली आ रही स्थापनाओं को चुनौती देते । द्विवेदी जी के सामने शुक्ल जी की आलोचना थी जिसमें उन्होंने तुलसी को स्थापित किया था। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने माहौल के हिसाब से कबीर की व्याख्या की और उनको क्रांतिकारी कवि सिद्ध किया। इस क्रम में उन्होंने तुलसीदास को प्रत्यक्ष रूप से कमतर आंकने की कोशिश नहीं की, लेकिन तुलसीदास पर गंभीरता से स्वतंत्र लेखन नहीं करके उनको उपेक्षित रखा । कालांतर में हिंदी साहित्य में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के शिष्यों का साहित्य पर बोलबाला रहा और उन सब लोगों ने द्विवेदी जी की स्थपना को मजबूत करने के लिए कबीर को श्रेष्ठ दिखाने के लिए अलग अलग तरह से लेखन किया और तुलसी को उपेक्षित ही रहने दिया आ फिर जहां मौका मिला उनको नीचा दिखाने का काम किया। विनांद कैलवर्त ने अपनी पुस्तक- द मिलेनियम कबीर वाणी, अ कलेक्शन आफ पदाज़ में साफ तौर पर लिखा भी है- निहित स्वार्थों ने कबीर को बहुत जल्दी हथिया लिया। सत्रहवीं सदी में गोरखपंथियों और रामानंदियों से लेकर बीसीं शताब्दी में हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे ब्राह्मणों तथा अन्य सामाजिक समूहों तक ने कबीर का इस्तेमाल अपने अपने विचारधारात्मक उद्देश्यों और फायदों के लिए किया। संभव है कि विनांद कैलवर्त की स्थापनाएं अतिरेकी हों लेकिन इस बात से कहां इनकार किया जा सकता है कि कबीर का इस्तेमाल विचारधारात्मक उद्देश्यों और फायदों के लिए किया गया
कबीर को क्रांतिकारी दिखाने और तुलसी को परंपरावादी साबित करने की होड़ में कुछ क्रांतिकारी लेखकों ने तुलसीदास को वर्णाश्रम व्यवस्था का पोषक, नारी और शूद्र विरोधी करार देकर उनकी घोर अवमानना की। रामचरित मानस की एक पंक्ति ढोल गंवार शूद्र पशु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी को पकड़कर तुलसी को कलंकित करने की कुत्सित कोशिश की गई। तुलसीदास की कविता की व्याख्या करनेवाले आलोचक या लेखक बहुधा बहुत ही सुनियोजित तरीके से तुलसीदास के उन पदों को प्रमुखता से उठाते हैं जिनसे उनकी छवि स्त्री विरोधी और वर्णाश्रम व्यवस्था के समर्थक की बनती है। तुलसीदास को स्त्री विरोधी करार देनेवाले मानस में अन्यत्र स्त्रियों का जो वर्णन है उसकी ओर देखते ही नहीं हैं। एक प्रसंग में तुलसीदास कहते हैं – कत विधि सृजीं नारि जग माहीं, पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं । इसी तरह अगर देखें तो मानस में पुत्री की विदाई के समय के प्रसंग में कहा गया है- बहुरि बहुरि भेटहिं महतारी, कहहिं बिरंची रचीं कत नारी। इसके अलावा तुलसी साफ तौर पर कहते हैं- रामहि केवल प्रेमु पिआरा। जानि लेउ जो जाननिहारा। इन पदों को आलोच्य पद के सामने रखकर तुलसीदास का मूल्यांकन किया जाना चाहिए । नारी के अलावा जब उनको शूद्रों का विरोधी कहा जाता है तब भी खास विचार के पोषक आलोचक तुलसी के उन पदों को भूल जाते हैं जहां वो रामराज्य की बात करते हुए सबकी बराबरी की बात करते हैं। तुलसी जब रामराज्य की बात करते हैं तो वो चारों वर्णों के सरयू नदी के तट पर साथ स्नान करने का वर्णन करते हैं जिसकी ओर क्रांतिकारी लेखकों का ध्यान जाता नहीं है। वो कहते हैं – राजघाट सब बिधि सुंदर बर, मज्जहिं तहॉं बरन चारिउ नर। यहां यह खेल तुलसीदास तक ही नहीं चला बल्कि निराला को लेकर भी इस तरह का खेल खेला गया। निराला ने कल्याण पत्रिका के भक्ति अंक से लेकर कई अन्य अंकों में जो लेख लिखे थे उनको ओझल कर दिया गया। नई पीढ़ी के पाठकों को इस बात का पता ही नहीं है कि भक्त निराला ने किस तरह की रचना की।

कबीर को ऊपर उठाने के खेल में जिस तरह से तुलसीदास की आलोचना की जा रही थी और जिस तरह से दोनों को सामने रखकर तुलनात्मक बातें हो रही थीं उसी क्रांतिकारी व्याख्या से उत्साहित होकर एक पत्रिका ने तुलसीदास को हिंदू समाज का पथभ्रष्टक साबित करने के लिए लेखों की एक श्रृंखला प्रकाशित की थी जो बाद मे पुस्तकाकार भी छपी। बावजूद इसके तुलसी की व्याप्ति भारतीय मानस से जरा भी नहीं डिगी। तुलसीदास के सामने कबीर को सोशल रिवोल्यूशनरी साबित करनेवाले यह भूल गए कि वे वेदांतवादी थे और वैष्णव होने की वजह से एकात्मवाद को बढ़ावा देते थे और सार्वजनिक जीवन में किसी भी तरह के आडंबर के खिलाफ थे। उन्होंने समाज मे व्याप्त आडंबर के खिलाफ चेतावनी के पद लिखे जिसको बार बार उछाल कर कबीर को क्रांति के संवाहक के तौर पर पेश किया गया। लेकिन जब राम उनके पदों में आते हैं तो उसको बिसरा दिया जाता है। वो राम को मानते रहे। राम का नाम कबीर के पदों में बार बार आता है – राम मेरे पियू, मैं राम की बहुरिया हो या राम निरंजन न्यारा के, अंजन सकल पसारा। या फिर दुलहिन गावहूं मंगल चार, हम घरि आए हो राजा राम भरतार। कबीर को राम से अलग करके देखने की गलती बार बार हुई या जानबूझकर की गई इस बारे में निश्चित तौर पर कुछ भी कहना मुश्किल है। वामपंथी लेखकों ने लगातार रामचरित मानस को धर्म से जोड़कर मूल्यांकन किया और कबीर को क्रांतिकारी समाज सुधारक और कुरीतियों पर प्रहार करनेवाले बताते रहे । यहां उनसे एक चूक हो गई। वो यह भूल गए कि किसी कवि की कृति को अगर धर्मग्रंथ का दर्जा हासिल हो जाए तो वो महान हो जाता है। आज रामचरित मानस की स्थिति क्या है, विचार करिए। लोग उसको मंदिरों में रखते हैं, उसकी पूजा होती है, जन्म मरण के समय उसका परायण होता है। एक कवि के लिए इससे बड़ी बात क्या हो सकती है। लेकिन वामपंथी बौद्धिकों को इससे घबराहट होने लगी और उन्होंने तुलसीदास को उनके विचारों के आधार पर खारिज करने की लगातार मुहिम चलाई। लेकिन तुलसीदास की कविताई में वो तेज है जिसने अपनी तमाम आलोचनाओं को अबतक धता बताते हुए अपनी लोकव्याप्ति का दायारा और बढ़ाया है।
दरअसल अगर हम देखें तो तुलसीदास के सृजन का जो कालखंड है उसमें भारतीय संस्कृति एक संक्रमण के दौर से गुजर रही थी । अपनी समृद्ध विरासत और संस्कृति के प्रति लोगों की निष्ठा कमजोर हो रही थी या कह सकत हैं कि लगभग खत्म सी होने लगी थी। एक के बाद एक लगातार हो रहे विदेशी आक्रमणों से देश जख्मी था। तुलसीदास के सामने एक कवि के रूप में चुनौती थी कि वो जनता को अपने लोक से जोड़ने वाली कोई रचना प्रस्तुत करें। यह अकारण नहीं है कि तुलसीदास जी ने रामचरित मानस की शुरुआत सरस्वती और गणेश वंदना से की- वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि/ मंगलानां च कर्त्तरौ वन्दे वाणीविनायकौ। तुलसीदास ने जब रामचरित मानस की रचना की तो उन्होंने एक आदर्श राज्य की अवधारणा को राम के माध्यम से प्रस्तुत किया, जिसे रामराज्य कहा गया। राम का चरित्र एक मर्यादा पुरुष के तौर पर पेश किया जहां वो न्याय के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। एक ऐसा राजा जिसकी प्राथमिकता में उसका राज्य उसके परिवार से पहले है। पत्नी के तौर पर जब सीता का चरित्र चित्रण किया तो एक ऐसी आदर्श पत्नी के तौर पर उसको अपनी रचना में पेश किया जो अपने पति के मान-सम्मान के लिए राजसी जीवन छोड़ने में देर नहीं लगाती। लोकोपवाद के छींटे पति पर ना पड़ें इसके लिए अग्निपरीक्षा देने को तैयार हो जाती है। पति के बनवास के वक्त उसके साथ कदम से कदम मिलाकर चलती है।  भाई हो तो लक्ष्मण और भरत जैसा जो आदर्श हैं। और तो और दुश्मन भी बनाया तो रावण को जो उद्भट विद्वान और शिव का उपासक था। तुलसीदास का जो समय था वो कबीर के समय से अलग था। तुलसीदास के सामने देश का सांस्कृतिक संकट था और वो उससे अपनी लेखनी के माध्यम से उस संकट से मुठभेड़ कर रहे थे। दूसरी तरफ कबीर समाज में व्याप्त कुरीतियों पर प्रहार कर रहे थे । इस तरह से देखें तो दोनों कवियों का निकष अलग था । तुलसीदास और कबीर की तुलना करने का उपक्रम ही गलत इरादे से किया गया था।
अस्सी के दशक में राम मंदिर का जब आंदोलन परवान चढ़ा तो हमारे वामपंथी आलोचक दिग्गजों ने राम को ही कठघरे में खड़ा करने की कोशिशें शुरू कर दीं । उन्होंने ऐसा ताना बाना बुना कि लोक में अभिवादन का जो सबसे लोकप्रिय तरीका था, राम-राम जी, उसको भी सांप्रदायिकता से जोड़ने की कोशिश की। यह अनायास नहीं हो सकता है कि हर हर महादेव कहनेवाले, या राधे राधे कहने वाले, या फिर जयश्री कृष्ण कहनेवाले सांप्रदायिक ना हों और जयश्री राम बोलनेवाले सांप्रदायिक हों। जब इन लोगों ने राम को ही संदेहास्पद बनाने की कोशिश की तो उसकी आंच से तुलसीदास भी बच ना सके। तुलसी को नीचा दिखाने के लिए इन लोगों ने कबीर का सहारा लिया। लेकिन तुलसीदास के बारे में सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की पंक्तियां ध्यातव्य हैं जिसे डॉ रामविलास शर्मा ने निराला की साहित्य साधना में लिखा है- अंग्रेजी और बांग्ला के अनेक कवियों के नाम गिनाने के बाद एक दिन निराला बोले- इन सब बड़ेन क पढ़ित है तो ज्यू जरूर प्रसन्न होत है पर जब तुलसीदास क पढ़ित है तो सबका अलग धरि देइत है। हमार स्वप्न इहै सदा रहा कि गंगा के किनारे नहाय के भीख मांगिके रही और तुलसीदास कै पढ़ी। महाप्राण निराला के यह कहने के बाद क्या बचता है। क्या कभी किसी ने ये जानने की कोशिश की कि कबीर के महिलाओँ के बारे में क्या विचार थे। अभी यह जानकारी आना शेष है। कबीर महिलाओं को लेकर उतने क्रांतिकारी नहीं हैं जितने वो कुरीतियों के खिलाफ दिखते हैं। बावजूद इसके कबीर की महानता पर कोई शक नहीं लेकिन संदेह तो तब होता है या सवाल तब उठता है जब दो महान कवियों में से एक को सिर्फ इस आधार पर हाशिए पर डालने की कोशिश होती है कि वो भारत को सांस्कृतिक रूप से जोड़ने का काम करता है। हिंदी साहित्य में इस तरह की बेइमानियां लंबे समय से चल रही हैं और इसने साहित्य का बड़ा नुकसान किया। जितनी जल्दी इस प्रवृत्ति से छुटकारा मिल सकेगा उतनी जल्दी साहित्य का भला होना शुरू हो जाएगा।     


Saturday, February 18, 2017

संपादक और प्रकाशक की साख पर सवाल

दो हजार सात में जब ओमप्रकाश सिंह के संपादन में आचार्य रामचंद्र शुक्ल ग्रंथावली का प्रकाशन हुआ था तो उसके विमोचन के मौके पर नामवर सिंह ने कहा था कि आचार्य शुक्ल के ग्रंथावली पर मैं भी काम करना चाहता था लेकिन ओमप्रकाश सिंह ने बहुत मेहनत के साथ इस ग्रंथावली का संपादन किया है । उन्होंने तब यह भी कहा था कि आचार्य शुक्ल पर यह ग्रंथावली पूर्ण है और इससे अधिक इस पर काम नहीं किया जा सकता है । लेकिन नौ साल में नामवर सिंह अपने कहे को भूल गए । नामवर सिंह के वय को देखते हुए इस विस्मरण पर आश्चर्य भी नहीं होता है। ओमप्रकाश सिंह के संपादन में आचार्य रामचंद्र शुक्ल ग्रंथावली के प्रकाशन संस्थान से प्रकाशन के बाद अब नामवर सिंह और आशीष त्रिपाठी के संपादन में राजकमल प्रकाशन ने रामचंद्र शुक्ल रचनावली का प्रकाशन किया है । ऐसा क्यों हुआ इसके बारे में तो नामवर सिंह ही बता सकते हैं लेकिन उनके सह संपादक आशीष त्रिपाठी ने रचनावली के पहले खंड में देहरी के नाम से एक छोटी सी टिप्पणी की है जिसमें एक जगह वो लिखते हैं -  रामचंद्र शुक्ल रचनावली की इच्छा प्रो नामवर सिंह के मन में पांच दशक से भी अधिक समय से बनी रही है । रामचंद्र शुक्ल की जन्मशती के अवसर पर वे ग्रंथावली का प्रकाशन करना चाहते थे । परंतु कतिपय कारणों से यह संभव ना हुआ । जब शुक्ल जी की रचनाएं कॉपीराइट से मुक्त हो गईं तो यह इच्छा फिर से तीव्र हो गई । पर किन्हीं कारणों से यह फिर संभव ना हुआ । अन्तत अब यह संभव हो पा रहा है । एक गहरी रचनात्मक इच्छा की तरह ही इसको देखा जाना चाहिए । इस टिप्पणी के अंत में आशीष त्रिपाठी लिखते हैं कि इस रचनावली के प्रकाशन से आचार्य शुक्ल पर समग्रता से बात करना संभव हो सकेगा, इस बहाने यदि पुन: उनके कार्यों पर चर्चा हो तो हमारा श्रम सार्थक होगा । इस रचनावली के प्रकाशन के बाद आचार्य शुक्ल पर बात तो हो रही है पर यह ना तो समग्रता में हो रही है और ना ही उनके कार्यों पर पुन: चर्चा कृतियों र पर हो रही है । आचार्य शुक्ल पर गलत कारणों से चर्चा हो रही है । चर्चा साहित्यक चोरी के आरोपों और किसी और की रचना को शुक्ल जी की रचना बताकर छापने पर हो रही है ।
दरअसल जैसे ही राजकमल प्रकाशन से रामचंद्र शुक्ल रचनावली छपकर आई तो हिंदी साहित्य को नजदीक से देखनेवालों को लगा कि पहले से मौजूद ग्रंथावली के बाद इसकी क्या जरूरत आन पड़ी । खैर रचनावली के संपादकों में से एक आशीष त्रिपाठी ने अपनी टिप्पणी में इसकी वजह का संकेत कर दिया है कि रामचंद्र शुक्ल की कृतियों के कॉपीराइट से मुक्त होने के बाद इस काम ने जोर पकड़ा । हर प्रकाशक को अपना कारोबार करने का हक है और उससे यह अपेक्षा करनी भी नहीं चाहिए कि वो साहित्य में नैतिकता के मूल्यों का झंडाबरदार बनेगा । राजकमल प्रकाशन भी कारोबारी है और उनको जहां भी कारोबार की संभावना दिखेगी वो उस संभावना को भुनाने का काम करेगा । वैसे अगर आशीष त्रिपाठी देहरी की टिप्पणी में शुक्ल रचनावली के कारणों का खुलासा कर देते तो बात और साफ हो जाती और उनके काम में भी पारदर्शिता रहती ।  
नामवर सिंह और आशीष त्रिपाठी के संपादन में रामचंद्र शुक्ल रचनावली जब छपकर आई तो लोगों ने उसको देखना प्रारंभ किया और दोनों को सामने रखकर उसपर चर्चा शुरू हो गई। इस चर्चा से एक बात निकलकर आ रही है कि ओमप्रकाश सिंह के संपादन में प्रकाशित रामचंद्र शुक्ल ग्रंथावली से कई अंश जस के तस उठाकर रामचंद्र शुक्ल रचनावली में रख दिए गए हैं । नामवर सिंह और आशीष त्रिपाठी के संपपादन में प्रकाशित रामचंद्र शुक्ल रचनावली में अंग्रेजी से अनुदित जो भी लेख छापे गए हैं वो ओमप्रकाश सिंह के संपादन में प्रकाशित रामचंद्र शुक्ल ग्रंथावली से उठाए गए हैं । इन लेखों को उठाते वक्त असवाधनीवश लेखों पर दी गई टिप्पणियों को भी शामिल कर लिया गया है । आरोप है कि यह कार्य साहित्यक चोरी की श्रेणी में आता है जहां बगैर आभार प्रकट किए किसी अन्य पुस्तक से उसका अंश उठा लिया जाता है । इस साहित्यक चोरी के आरोप से नामवर सिंह और आशीष त्रिपाठी को बच नहीं सकते । बच तो रामचंद्र शुक्ल रचनावली के प्रकाशक राजकमल प्रकाशन के मालिक अशोक महेश्वरी भी नहीं सकते । जब राजकमल प्रकाशन के मालिक अशोक महेश्वरी से बात की गई तो उन्होंने जो सफाई दी वो आशीष त्रिपाठी की देहरी में लिखी टिप्पणी जैसी ही है । अशोक महेश्वरी के मुताबिक – अभी विश्व पुस्तक मेला और पटना पुस्तक मेला की व्यस्तता और दिल्ली से बाहर रहने की वजह से मुझे इस प्रकरण की ठीक से जानकारी नहीं है।  रचनावली की मूल योजना के बनने और उसके छपने के बीच एक लंबा अंतराल रहा है। नामवर जी की देखरेख में सामग्री संचयन और संयोजन का काम आशीष त्रिपाठी जी कर रहे थे। समय लम्बा खींचता चला गया और नामवर जी का स्वास्थ्य गिरने लगा। नामवर जी की इस रचनावली को लेकर अधीरता बढ़ती गई। जैसे ही पूरी पांडुलिपि हमें मिली, नामवर जी के जन्मदिन को ध्यान में रख कर उसका प्रकाशन फौरी तौर पर हमने किया। अनूदित सामग्री के बारे में जो आरोप लग रहे हैं, इस बारे में हम रचनावली के संपादकों से बात कर वस्तुस्थिति को समझने की कोशिश कर रहे हैं। उसके बाद ही कोई भी निर्णय लेंगे। हाँ, किसी के साथ अन्याय न हो, इस बात का पूरा ध्यान हमारी तरफ से रखा जाएगा।‘  सवाल यही उठता है कि इस तरह की असावधानी राजकमल जैसे प्रतिष्ठित प्रकाशन गृह से कैसे हो सकती है । इतना वक्त बीत जाने के बाद भी अबतक वस्तुस्थित को समझने की कोशिश करना भी संदेह पैदा करता है । हिंदी साहित्य जगत में राजकमल प्रकाशन की प्रतिष्ठा के मद्देनजर प्रकाशक को फौरन इस साहित्यक चोरी की तफ्तीश करनी चाहिए और समग्रता में अपना पक्ष प्रस्तुत करना चाहिए । अगर ऐसा हो पाता है तो इस प्रकाशन गृह की साख बढ़ेगी नहीं तो साहित्यक चोरी के आरोप से उनकी साख पर बट्टा लगना तय है । साख का छीजना सबसे खतरनाक होता है कारोबार में भी और साहित्य में भी । यहां एकसवाल मन में यह भी उठता है कि अगर साहित्यक चोरी का मामला बनता है तो ग्रंथावली के प्रकाशक प्रकाशन ओमप्रकाश सिंह ने कोई कानूनी कार्यवाही क्यों नहीं की । 
यह माना जा सकता है कि नामवर सिंह अब उतने सक्रिय नहीं हैं कि वो पुस्तक का प्रूफ आदि देख सकें लेकिन उनके साथी संपादक ने भी कई असावधानियों को जाने दिया है । रचनावली में एक जगह नामवर जी की भूमिकानुमा लेख में छपा है इस पर फिर कभी । नामवर सिंह ने लिखना काफी पहले छोड़ दिया है उनको भाषणों का संकलन आशीष त्रिपाठी लंबे समय से कर रहे हैं । अब अगर उनके भाषण को किसी खंड की भूमिका के तौर पर प्रस्तुत किया जा रहा है तो उसमें सावधानी बरतनी चाहिए थी । नामवर जी से पूछकर उसको संपादित किया जा सकता था । वैसे भी अशोक महेश्वरी के मुताबिक नामवर सिंह की देखरेख में इस रचनावली का काम-काज चल रहा था तो उनको भी इस बारे में ध्यान रखना था । आचार्य रामचंद्र शुक्ल रचनावली के आठवें खंड में गोपाल सखा नाम का एक नाटक छपा है जिसके अंत में लिखा है – रामलाल सिंह के सौजन्य से । जबकि गोपाल सखा नाटक को शुक्ल जी का नाटक बताने पर पहले भी विवाद हो चुका है, जब यह नाटक साक्षात्कार पत्रिका में छपा था । इस पूरे विवाद के बाद यह निकलकर आया था कि गोपाल सखा नाटक शुक्ल जी का लिखा हुआ नहीं है । अब उसको एक बार फिर से आचार्य रामचंद्र शुक्ल रचनावली का हिस्सा बनाकर नामवर सिंह और आशीष त्रिपाठी ने वैधता प्रदान करने की कोशिश की है । दोनों संपादक विद्वान हैं और मानकर चलना चाहिए कि उनको गोपाल सखा नाटक पर उठे विवाद और उसके निबटारे की जानकारी होगी । अगर संपादकों के पास इस नाटक के आचार्य रामचंद्र शुक्ल का नाटक होने के बारे में कोई ठोस जानकारी हो तो उनको बताना चाहिए वर्ना हिंदी जगत से माफी मांगनी चाहिए । हिंदी साहित्य के इतिहास से छेड़छाड़ की इजाजत किसी को नहीं दी जा सकती है चाहे वो नामवर सिंह ही क्यों ना हों । अगर तथ्य सामने नहीं आते हैं तो प्रकाशक को फौरन इस नाटक को रचनावली से हटा देना चाहिए । दरअसल हिंदी में रचनावलियों को लेकर बहुत असावधानी से काम होता रहा है । ज्यादातर रचनावलियों और ग्रंथावलियों में असावधानी से ही काम हुआ है । जिससे आनेवाली पीढ़ियां गलत तथ्यों तके आधार पर काम कपने के लिए अभिश्पत हैं । अब अगर नामवर जी के संपादन और राजकमल के प्रकाशन में इस तरह की त्रुटियां रहती हैं तो हिंदी साहित्य के इतिहास का क्या होगा उसका भगवान ही मालिक है ।  



Monday, September 26, 2016

सियासत वाले साहित्यकार

प्रेमचंद ने प्रगतिशील लेखक संघ के अधिवेशन के अपने भाषण में कहा था कि साहित्य देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलनेवाली सचाई भी नहीं, बल्कि उनके आगे मशाल दिखाती हुई चलनेवाली सचाई है । पता नहीं जब प्रेमचंद ने ऐसा कहा था तो उनको इस बात का भान था या नहीं कि जिस प्रगतिशील लेखक संघ के अघिवेशन में वो ये बातें कह रहे हैं दरअसल वहीं से साहित्य के राजनीति के पीछे चलनेवाली मशाल के तौर पर बीजोरोपण हो रहा था । प्रेमचंद के लिए साहित्य, राजनीति की पथप्रदर्शक और उसको आलोक देनेवाली है लेकिन लेखक संघों अपने क्रयाकलापों से इसको निगेट किया और वो अपनी अपनी पार्टियों की पिछलग्गू बनकर मशाल थामे चलती रही । बिहार विधानसभा चुनाव के पहले पूरे देश ने देखा कि असहिष्णुता को लेकर साहित्य ने किस तरह से राजनीति का पल्लू थामा । तर्कवादी डाभोलकर, कन्नड लेखक प्रोफेसर कालबुर्गी की हत्या को लेकर कुछ लेखकों और कलाकारों ने जमकर सियासी दांव-पेंच चले । देश में केंद्र की मोदी सरकार के खिलाफ वातावरण बनाने की कोशिश हुई थी । अब एक बार फिर पुरस्कार वापसी ब्रिगेड के लेखकों- कलाकारों और उनके पैरोकारों ने कश्मीर के मसले पर एक अपील जारी की है । उड़ी में सेना के कैंप पर पाकिस्तान समर्थक आतंकवादियों के हमले में अठारह जवानों के शहीद होने के बाद छियालिस लेखकों, पत्रकारों, रंगकर्मियों आदि के नाम से अशोक वाजपेयी ने एक अपील जारी की है । इस अपील में अशोक वाजपेयी ने दावा किया है कि अलग-अलग भाषा, क्षेत्र और धर्म के सृजनशील समुदाय के लोग कश्मीर भाई-बहनों के दुख से दुखी हैं । अपने अपील में इन लेखकों-कलाकारों ने कहा है कि कश्मीर में जो हो रहा है वो दुर्भाग्यपूर्ण, अन्यायसंगत और अनावश्यक है । अब शुरुआती पंक्तियों को जोड़कर देखें तो यह लगता है कि अपीलकर्ता कश्मीर भाई-बहनों और बच्चों की पीड़ा को दुर्भाग्यपूर्ण, अन्नायसंगत और अनावश्यक बता रहे हैं । कश्मीरियत की याद दिलाते हुए अशोक वाजपेयी और छियालीस अन्य लोग बातचीत पर जोर दे रहे हैं । कश्मीर समस्या का बातचीत से हल निकालने की नीति हमेशा से रही है । सरकारें चाहे बदलती रही हों लेकिन इस रास्ते से कोई भी सरकार हटी नहीं । लेकिन सवाल यह भी खड़ा होता है कि बातचीत किससे ? देश के उन गद्दारों से जो भारतीय भूमि पर रहते हुए, भारतीय सुरक्षा व्यवस्था में महफूज रहते हुए, भारतीय पासपोर्ट रखते हुए पाकिस्तान की पैरोकारी करते हैं । क्या हुर्रियत समेत ऐसे नेता कश्मीर की जनता की नुमाइंदगी करते हैं । चलिए कुछ देर के लिए मान भी लिया जाए कि इस तरह के लोगों से बात करके भी अगर कश्मीर में सांति बहाली होती है तो बात करनी चाहिए । क्या अशोक वाजपेयी और ये तमाम लेखक-कलाकार-पत्रकार उन तस्वीरों को भूल गए जब सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल कश्मीर गया था तो सीताराम येचुरी इनके घर पहुंचे थे । इन्होंने उनेक मुंह पर दरवाजा बंद कर दिया था । बातचीत तो पिछली सरकार के दौरान दिलीप पड़गांवकर और राधा कुमार की टीम ने भी की थी, उसका क्या हुआ ।इन अपीलकर्ताओं से ये सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि कश्मीर में आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ चल सकती है क्या । पूछा तो इनसे ये भी जाना चाहिए कि क्या भारतीय गणराज्य के खिलाफ विषवमन करनेवालों से भी बातचीत की जानी चाहिए । सवाल तो इनसे ये भी पूछा जाना चाहिए कि क्या ये अपीलकर्ता बुरहान वानी को आतंकवादी मानते हैं या नहीं । इस मसले पर अपील खामोश हैं । दरअसल अपीलकर्ता लेखकों की सूची को देखें तो ये साफ नजर आता है कि इसमें से कई लोग असहिष्णुता के मुद्दे पर बेवजह का वितंडा करनेवाले रहे हैं । उस वक्त उनके आंदोलन से पूरी दुनिया में एक गलत संदेश गया था और देश की बदनामी भी हुई थी । उन्हें ये बात समझनी चाहिए कि कश्मीर का मसला बेहद संजीदा है और इस तरह की अपील से देश को बदनाम करनेवालों को बल मिलता है । समझना तो उन्हें ये भी चाहिए कि काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती है ।
इन लेखकों कलाकारों की कश्मीर को लेकर चिंता जायज है लेकिन चिंता का इजहार करने का वक्त इन्होंने गलत चुना । आतंकवादी बुरहान वानी के ढेर किए जाने के बाद जब घाटी में विरोध प्रदर्शन हो रहा था तब ये खामोश थे लेकिन उड़ी में सेना के अठारह जवानों के शहीद होने के बाद इनको कश्मीर के लोगों का दर्द परेशान करने लगा । अशोक वाजपेयी ने ये अपील बाइस सितंबर को सार्वजनिक की । इसके एक दिन पहले संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने कश्मीर के मुद्दे पर भारत को बहुत बुरा भला कहा । आतंकवादी बुरहान वानी को युवा नेता बताने से लेकर कश्मीर में मानवाधिकार की बात भी उठाई लेकिन लेखकों की इस अपील में उसका कोई जिक्र नहीं है । लेखकों की ये अपील सामान्यीकरण का शिकार है । इसमें से कुछ साफ तस्वीर उभर कर नहीं आ रही है अगर वो कश्मीर के लोगों के दुख के साथ खड़े दिखना चाहते हैं तो वो तो पूरा देश उनके साथ खड़ा है, इनको अलग से अपील की जरूरत क्यों । अपनी अपील में इन्होंने जिस तरह के शब्दों का चुनाव किया है वो भी हैरान करनेवाला है । वो कश्मीर में संयम की सलाह दे रहे हैं । संयम ठीक है लेकिन जब आपकी धरती पर कोई राष्ट्र के खिलाफ जंग का एलान करेगा तो क्या उस वक्त भी संयम से काम लेना चाहिए । क्या इन मासूम लेखकों को भारतीय संविधान की जानकारी नहीं है जहां राष्ट्र के खिलाफ साजिश और जंग को सबसे बड़ा अपराध माना गया है और सरकार को उन स्थितियों से निबटने के लिए असीम ताकत दी गई है । कश्मीर में शांति की मांग उचित है लेकिन क्या सेना के जवावों की शाहदत पर शांति चाहिए । यह वक्त कश्मीर को लेकर राजनीति का नहीं है बल्कि पूरे देश से एक आवाज उठनी चाहिए । रामचंद्र शुक्ल ने अपने साहित्य के इतिहास में कहा है –साहित्य को राजनीति से उपर रहना चाहिए और सदा उसके इशारे पर नहीं नाचना चाहिए । तो क्या इन लेखकों को शुक्ल जी की नसीहत याद नहीं रहती है या फिर राजनीति के अनुगामी बनकर ये सियासी मोहरे के तौर पर इस्तेमाल होते हैं । जरा सोचिए ।


Wednesday, October 14, 2015

अकेलेपन का स्वप्न

मुझे ध्यान नहीं आ रहा है लेकिन नामवर सिंह ने कहीं आचार्य रामचंद्र शुक्ल के हवाले से लिखा है कि कहानी सुनने वाला आगे की घटना के लिए आकुल रहता है । कविता सुनने वाला कहता है जरा फिर तो कहिए । नामवर जी ने हलांकि आचार्य रामचंद्र शुक्ल के इस मत का निषेध किया है और कहा कि निसंदेह घटना वैचित्र्यपूर्ण कहानियों को ध्यान में रखकर यह बात कही गई है लेकिन ध्वनि स्पष्ट है कि कहानी विषयक ये कुतूहल निम्न कोटि का है । नामवर जी अपनी इस धारणा के समर्थन में ई एम फोस्टर को भी उद्धृडत करते हैं जहां वो कहते हैं कि कहानी संबंधी कुतूहल अवर कोटि का है क्योंकि इसके मूल में गुहावासी आदिम मानव मनोवृत्ति है । नामवर जी का मानना है कि चूंकि यह कुतूहल आदिम है, इसलिए इसके मूल में एक प्रकार का अविवेक है । इस पर काफी लंबा विवाद हो सकता है लेकिन एक स्कूल ऑफ थॉट है जो यह मानता है कि कविता पाठकों के लिए पीछे की ओर जाती है वहीं कहानी पाठकों को आगे की ओर ले जाती है । कहानी और कविता दोनों अलग विधा है और उपरोक्त व्याख्या के मुताबिक दोनों विधाएं विपरीत दिशा में जाती हैं । अब अगर कोई लेखक इन दोनों विधाओं में लेखन करता है और उसको साधकर रखता है तो एक बड़ी चुनौती को साधने जैसा है । दो विपरीत दिशा में जा रहे घोड़े की रास को थामना और उसको काबू में करते हुए उसको मुकाम तक पहुंचाने जैसा होता है । हाल ही में ऐसे ही एक रचनाकार संजय कुंदन की कहानियों का संग्रह श्याम लाल का अकेलापन प्रकाशित हुआ है । संजय कुंदन ऐसे ही रचनाकार हैं जो कविता की दुनिया से कहानी में आए और फिर उन्होंने उपन्यास भी लिखा । संजय की कविताओं को खासी प्रसिद्धि मिली थी और मिल रही है, पाठकों का प्यार भी ।  मुझे याद आता है कि संजय कुंदन ने अपनी पहली कहानी दो हजार एक या दो में लिखी थी । कहानी का नाम था केएनटी की कार । इस कहानी के तद्भव में प्रकाशित होने के पहले उसका पाठ राजेन्द्र यादव के घर पर हुआ था । उस कहानी पाठ में मैं, यादव जी और मैत्रेयी पुष्पा थीं । केएनटी की कार की यादव जी ने खूब तारीफ की थी । दरअसल संजय कुंदन की पहली कहानी केएनटी की कार और अब समीक्ष्य संग्रह की शीर्ष कहानी श्याम लाल का अकेलापन को अगर पढें तो पाठकों को एक कहानीकार के तौर पर संजय कुंदन की विकास यात्रा समझ में आती है । संजय कुंदन की कहानियों में रात, स्वप्न और संघर्ष लगातार उपस्थित रहते हैं । ये सिर्फ उनकी कहानियों में नहीं बल्कि उनकी कविता में भी मौजूद है । जैसे उनके पहले कविता संग्रह कागज के प्रदेश में छपी एक कविता है टैक्सी स्टैंड । उसकी चंद पक्तियां हैं रात के आखिरी पहर में/ एक चिड़िया सड़क पर पैदल चलती हुई/ दिखाई पड़ रही है/ हवा में उड़ती है नींद/ सरदार जी चुटकी बजाकर भगाते हैं नींद/ चुटकियों से ही भगाते हैं वो हर दुख । अब उनकी पहली कहानी केएनटी की कार की चंद पक्तियां देखते हैं रात में उन्होंने एक डरावना सपना देखा । देखा कि उनकी सोसाइटी में एक नकाबपोश आ रहा है । धीरे धीरे चलता वो उनकी कार तक आया और उसे एक हाथ में उठा लिया । केएनटी चीखे- ऐ क्या कर रहे हो तुम । नकाबपोश ने ठहाका लगाया और बोला साले कार चलाओगे। औकात है चलाने की । बड़े आए कारवाले । अचानक कार छोटी होते-होते खिलौने की तरह हो गई । नकाबपोश ने उसे अपनी जेब में रख लिया और आकाश की ओर उठने लगा । केएनटी उसके पीछे लपके और चिल्लाने लगे चोर चोर । तभी उनकी नींद खुल गई । उनकी पत्नी भी हड़बड़ाकर उठ गई । केएनटी ने खिड़की से झांका । उनका मकान पहली मंजिल पर था । वे अपनी कार ठीक सामने खड़ी करते थे । उन्होंने देखा उनकी कार से अड़कर चौकीदार खड़ा है । उन्हें पता नहीं क्या सूझा, वे नीचे आये । उन्होंने चौकीदार से डपटकर कहा- ये गाड़ी से अलग हटो, टूट जाएगी । क्या कहते हो साब । मेरे सट जाने से गाड़ी टूट जाएगी । चौकीदार ने हंसते हुए कहा ।
अब जरा संजय कुंदन के नए संग्रह की कहानी श्यामलाल का अकेलापन की कुछ पंक्तियों पर गौर फर्मा लेते हैं ओह जल्दी से सुबह क्यों नहीं हो जाती है । उन्होंने घड़ी देखी तो रात के दो बज रहे थे । इतना समय कैसे काटा जाए, नींद तो आ नहीं रही है । श्यामलाल चुपचाप उठे । उन्होंने दरवाजा इस तरह खोला कि कोई आवाज ना हो । वे उसे सटाकर बाहर आ गए । रात के घर से निकलकर श्यामलाल अपार्टमेंट के गार्ड रूम में जा पहुंचते हैं और वहां बातचीत के क्रम में गाने बजाने का कार्यक्रम शुरू हो जाता है । फिर देखिए- श्यामलाल को किसी ने झकझोरा तो वो हड़बड़ाकर उठे । चारों ओर उजाला फैल चुका था । सामने सुपरवाइजर खड़ा था सर आप गाना गाते हुए सो गए थे, हम लोगों ने आपको डिस्टर्ब करना ठीक नहीं समझा..सर आप बहुत अच्छा गाते हैं । ये तीनों प्रसंग बताने का मकसद सिर्फ इतना है कि पाठकों को पता चल सके कि संजय कुंदन की कहानियों का जो नायक होता है वो मध्यवर्गीय चरित्र किस-किस तरह की मनोदशा में जीते हैं । समाज के बीच अपनी पहचान और हनक बनाने के लिए उनके मन में कैसे कैसे विचार आते हैं । रात को जब संजय कुंदन का नायक अकेला होता है तो अपनी अपेक्षाओं के सपने देखता है और जब वो अपेक्षाएं पूरी हो जाती हैं तो उसके खत्म होने के खतरे से आशंकित रहता है । संजय की पहली कहानी का नायक केएनटी एक कार खरीदने के सपने को जीना चाहता है । इस चक्कर में वो तमाम सघर्षों के बावजूद एक सेकेंडहैंड कार खरीद लेता है । उसके पीछे का मनोविज्ञान सिर्फ समाज से अपने आसपास के लोगों से कंपीट करने का है । इसी तरह से श्यामलाल अपने आसपास के लोगों को देखकर कुढ़ता रहता है कि उसके पास अमुक चीज नहीं है । फिर उसकी चाहत में परेशान रहता है । संजय कुंदन ने अपने समाज के लोगों के इसी मनोविज्ञान को पकड़कर कहानी में धर देते हैं किस्सागोई के छौंक के साथ ।

संजय कुंदन के इस संग्रह-श्यामलाल का अकेलापन में ग्यारह कहानियां संकलित हैं । संजय की कहानियां का मूल स्वर या कह सकते हैं कि उनकी कहानियों में एक जो अंतर्धारा बहती है वो है महानगरीय जीवन । महानगर के जीवन में बौने होते लोग और सुरसा के बदन की तरह बढ़ती उनकी महात्वाकांक्षाएं । ऐसा नहीं है कि सभी कहानियां इसी विषय पर लिखी गई है । इस संग्रह में एक कहानी है हीरो । इसका नायक चंदर ऑटो चलाता है और उसकी फिल्मों में काम करने की ख्वाहिश है । लेकिन यह कहानी चंदर से शुरू होती है और मीडिया के वर्तमान हालात पर खत्म होती है । चंदर की वजह से एक मशहूर शख्सियत की बहू की दहेज हत्या होने से बच जाती है । सास ससुर के चंगुल से उसको छुड़ा लिया जाता है । चंदर को एसपी के दफ्तर में पत्रकारों के बीच हीरो की तरह से पेश किया जाता है । सभी चैनल और अखबार वाले उसके साथ बात करते हैं । चंदर को लगता है कि मशहूर होने का उसका सपना पूरा होनावाला है । दोस्तों के साथ पार्टी करता है । लेकिन अगले दिन के सारे अखबारों और चैनलों पर उसकी बहादुरी के किस्से का एक लाइन ना तो छपता है ना ही दिखता है । फिर दो पत्रकारों की बातचीत के हवाले से कहानीकार यह बताता है कि आजकल खबरें कैसे और किन दबावों में तय होती हैं । चंदर के अंदर बहुत कुछ दरक जाता है । दरअसल चंदन तो एक पात्र मात्र है लेकिन खबरों को लेकर समाज के अंदर इन दिनों कुठ इसी तरह के विचार पनपने लगे हैं । यह प्रवृत्ति लोकतंत्र के लिए बेहतर नहीं है । यह कहानी चंदर के बहाने से मीडिया को भी कठघरे में खड़ा करती है उसपर बड़े सवाल भी उठाती है । संजय कुंदन की कहानियों को पढ़ते हुए पाठकों को यथार्थ के पठार से गुजरना होता है । नामवर जी बहुधा कहते हैं कि समझने के लिए ना कहानी को दोबारा पढ़ने की जरूरत और ना अपने ही दिमाग पर ज्यादा जोर डालने की तकलीफ । ऐसे ही लोगों की धारणा है कि कहानी में समझने के लिए कुछ नहीं होता । और जाहिर है जहां समझने के लिए कुछ नहीं होगा, वहां समझाने के लिए भी गुंजाइश नहीं होगी । ऐसे समझदार लोगों के सामने यदि कहानी के बारे में समझने की बात की जाए तो ये गुस्ताखी होगी ।‘  नामवर जी ये बातें तंज में कहते हैं । पर संजय कुंदन की कहानियों को पढ़ते हुए पाठकों को उसकी अंतर्धारा और फिर उसके परिणाम को जोड़कर देखने की जरूरत है । पाठकों को पठनीयता भी मिलती है लेकिन उनकी कहानियां समाजिक मनोविज्ञान को उघाड़ने के साथ साथ कुछ ऐेस बिंदुओं पर चोट भी करती है जो जरूरी है । संजय कुंदन अपनी पीढ़ी के उन चंद रचनाकारों में से हैं जिन्होंने विवादों और प्रचारप्रियता से दूर रहकर साहित्य सृजन का फैसला लिया है । उनके दो कविता संग्रह कागज के प्रदेश में और योजनाओं का शहर और दो कहानी संग्रह बॉस की पार्टी और श्यामलाल का अकेलापन के अलावा एक उपन्यास इसकी तस्दीक भी करते हैं । समीक्ष्य कृति श्यामलाल का अकेलापन में संजय अपनी कहानियों के माध्यम से खुद को कहानी की जमीन पर और मजबूत करते हैं ।