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Saturday, August 9, 2025

सनातन मूल्यों में प्रेमचंद की आस्था


परिचित ने यूट्यूब का वीडियो लिंक भेजा। वीडियो के आरंभ में एक पोस्टर लगा था। उसपर लिखा था क्या कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद हिंदुत्ववादी थे? कौन उनकी विरासत को हड़पना चाहता है? यूं तो यूट्यूब के वीडियोज को गंभीरता से नहीं लेता लेकिन पोस्टर के प्रश्नों को देखकर जिज्ञासा हुई। देखा तो एक स्वनामधन्य आलोचक से बातचीत थी। सुनने के बाद स्पष्ट हुआ कि एक विशेष उद्देश्य से वीडियो बनाया गया है। इस बातचीत में कई तथ्यात्मक गलतियां और झूठ पकड़ में आईं। स्वयंभू आलोचक ने कई बार प्रेमचंद के एक लेख क्या हम वास्तव में राष्ट्रवादी हैं? को उद्धृत करते हुए राष्ट्रवादियों को कठघरे में खड़ा करने का यत्न किया। इस लेख के आधार पर ये साबित करने का प्रयास किया कि प्रेमचंद ने राष्ट्रवादियों को भला बुरा कहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार प्रेमचंद ने ये लेख 1934 के आरंभ में लिखा था। उनका ये लेख स्वतंत्र रूप से नहीं लिखा गया था बल्कि भारत पत्रिका में ज्योति प्रसाद निर्मल के लिखे गए लेख की प्रतिक्रिया में था। यह ठीक है कि उस लेख में प्रेमचंद ने जाति व्यवस्था की आलोचना की है और एक जातिमुक्त समाज की बात की है। प्रेमचंद ने उस लेख में ज्योति प्रसाद निर्मल को केंद्र में रखकर उनको ब्राह्मणवादी बताया। ये भी माना कि उनकी कहानियों को कई ब्राह्मण संपादकों ने प्रकाशित किया, जिनमें वर्तमान के संपादक रमाशंकर अवस्थी, सरस्वती के संपादक देवीदत्त शुक्ल, माधुरी के संपादक रूपनारायण पांडे , विशाल भारत के संपादक बनारसीदास चतुर्वेदी आदि प्रमुख हैं। प्रेमचंद अपने इसी लेख में हिंदू समाज को पाखंड और अंधविश्वास से मुक्त करने की बात प्रमुखता से करते हैं लेकिन कहीं भी राष्ट्रवादियों की आलोचना नहीं करते। वो उन राष्ट्रवादियों की आलोचना करते हैं जो पाखंड और कर्मकांड को प्रश्रय देते हैं। पर इसी लेख में वो कहते हैं कि मुरौवत में भी पड़कर आदमी अपने धार्मिक विश्वास को नहीं छोड़ सकता। कुल मिलाकर जिस लेख को आलोचक माने जानेवाले व्यक्ति अपने तर्कों का आधार बना रहे हैं उसका संदर्भ ही अलग है। खैर... वामपंथी आलोचकों की यही प्रविधि रही है, संदर्भ से काटकर तथ्यों को प्रस्तुत करने की। 

आलोचक होने के दंभ में इस बातचीत में एक सफेद झूठ परोसा गया। एक किस्सा सुनाया गया जो कल्याण पत्रिका और हनुमानप्रसाद पोद्दार से संबंधित है। कहा गया कि ‘प्रेमचंद धर्म को लेकर इतने सचेत थे कि जब कल्याण पत्रिका के संपादक-प्रकाशक हनुमानप्रसाद पोद्दार ने प्रेमचंद से कहा कि हमारी पत्रिका में सारे बड़े साहित्यकार लिख रहे हैं, सारे बड़े लेखक लिख रहे हैं, आपने अभी तक कोई लेख नहीं दिया। तो प्रेमचंद ने कहा कि आपकी तो धार्मिक पत्रिका है, इस धार्मिक पत्रिका में मेरा की लिखने का स्थान नहीं बनता। समझ में नहीं आता कि मैं किस विषय पर लिखूं क्योंकि ये हिंदू धर्म पर केंद्रित पत्रिका है। अब जरा खुद को विद्वान मानने और मनवाने की जिद करनेवाले इस व्यक्ति की सुनाई कहानी की पड़ताल करते हैं। वो किस्से के मार्फत बताते हैं कि प्रेमचंद ने हनुमानप्रसाद पोद्दार को धार्मिक पत्रिका कल्याण में लिखने से मना कर दिया था। कथित आलोचक जी से अगर कोई प्रमाण मांगा जाएगा तो वो कागज मांगने की बात करके उपहास उड़ा सकते हैं। हम ही प्रमाण देते हैं। 1931 में प्रकाशित कल्याण के कृष्णांक में प्रेमचंद का एक लेख प्रकाशित है। इस लेख का शीर्षक है श्रीकृष्ण और भावी जगत। कल्याण का ये विशेषांक कालांतर में पुस्तकाकार प्रकाशित हुआ। अब भी बाजार में उपलब्ध है। इस लेख में प्रेमचंद ने भगवान श्रीकृष्ण को कर्मयोग के जन्मदाता के रूप में संसार का उद्धारकर्ता माना है। वो लिखते हैं कि यूरोप ने अपनी परंपरागत संस्कृति के अनुसार स्वार्थ को मिटाने का प्रयत्न किया और कर रहा है। समष्टिवाद और बोल्शेविज्म उसके वह नये अविष्कार हैं जिनसे वो संसार का युगांतर कर देना चाहता है। उनके समाज का आदर्श इसके आगे और जा भी न सकता था, किंतु अध्यात्मवादी भारत इससे संतुष्ट होनेवाला नहीं है। ये वो प्रमाण है जिससे स्वयंभू आलोचक का सफेद झूठ सामने आता है। आश्चर्य तब होता है जब सार्वजनिक रूप से झूठ का प्रचार करते हैं और प्रेमचंद को अधार्मिक भी बताते हैं। 

प्रेमचंद को लेकर इस बातचीत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और संघियों (इस शब्द को बार-बार कहा गया) पर प्रश्नकर्ता और उत्तरदाता दोनों आरोप लगाता हैं। इन आरोपों में कोई तथ्य नहीं सिर्फ अज्ञान और प्रेमचंद का कुपाठ झलकता है। ऐसा प्रतीत होता कि बगैर किसी तैयारी के ये साक्षात्कार किया गया। ऐसे व्यक्ति को मंच दिया गया जो झूठ का प्रचारक बन सके। प्रेमचंद ने ना सिर्फ कल्याण के अपने लेख बल्कि एक अन्य लेख स्वराज्य के फायदे में भी लिखा ‘अंग्रेज जाति का प्रधान गुण पराक्रम है, फ्रांसिसियों का प्रधान गुण स्वतंत्र प्रेम है, उसी भांति भारत का प्रधान गुण धर्मपरायणता है। हमारे जीवन का मुख्य आधार धर्म था। हमारा जीवन धर्म के सूत्र में बंधा हुआ था। लेकिन पश्चिमी विचारों के असर से हमारे धर्म का सर्वनाश हुआ जाता है, हमारा वर्तमान धर्म मिटता जाता है, हम अपनी विद्या को भूलते जाते हैं।‘ हिंदू-मुसलमान संबंध पर बात करते हुए प्रेमचंद को इस तरह से पेश किया गया जैसे कि उनको मुसलमानों से बहुत प्रेम था।  इसको भी परखते हैं। अपने मित्र मुंशी दयानारायण निगम को 1 सितंबर 1915 को प्रेमचंद एक पत्र लिखते हैं जिसका एक अंश, ‘अब हिंदी लिखने की मश्क (अभ्यास) भी कर रहा हूं। उर्दू में अब गुजर नहीं। यह मालूम होता है कि बालमुकुंद गुप्त मरहूम की तरह मैं भी हिंदी लिखने में जिंदगी सर्फ (खर्च) कर दूंगा। उर्दू नवीसी में किस हिंदू को फैज (लाभ) हुआ है, जो मुझे हो जाएगा।‘  इससे प्रेमचंद के आहत मन का पता चलता है। प्रेमचंद के साथ बेईमानियों की एक लंबी सूची है। हद तो तब हो गई जब उनके कालजयी उपन्यास ‘गोदान’ का नाम ही बदल दिया गया। पंडित जनार्दन झा ‘द्विज’ ने अपनी ‘पुस्तक प्रेमचंद की उपन्यास कला’ में स्पष्ट किया है कि प्रेमचंद ने पहले अपने उपन्यास का नाम गौ-दान रखा था। द्विज जी के कहने पर उसका नाम गो-दान किया गया। गो-दान 1936 में सरस्वती प्रेस, बनारस और हिंदी ग्रंथ-रत्नाकर कार्यालय, बंबई (अब मुंबई) से प्रकाशित हुआ था। गो-दान कब और कैसे गोदान बन गया उसपर चर्चा होनी चाहिए।। बेईमान आलोचकों ने सोचा कि क्यों ना उनके उपन्यास का नाम ही बदल दिया जाए ताकि मनमाफिक विमर्श चलाने में सुविधा हो। ऐसा ही हुआ। अगर गौ-दान या गो-दान के आलोक में इस उपन्यास को देखेंगे तो उसकी पूरी व्याख्या ही बदल जाएगी। दरअसल प्रेमचंद पूरे तौर पर एक धार्मिक हिंदू लेखक थे जो अपने धर्म में व्याप्त कुरीतियों पर निरंतर अपनी लेखनी के माध्यम से वार करते थे। इस धार पर उनको ना तो कम्युनिस्ट बनाया जा सकता है और ना ही नास्तिक। हां, झूठे किस्से सुनाकर भ्रम जरूर फैला सकते हैं। पीढ़ियों तक प्रेमचंद के पाठकों को बरगला सकते हैं। प्रेमचंद की धार्मिक आस्था और धर्मपरायणता को संदिग्ध कर उनको कम्युनिस्ट बताने का झूठा उपक्रम चला सकते हैं। पर सच अधिक देर तक दबता नहीं है। 


Thursday, July 13, 2023

तथ्यहीन आधार पर नैरेटिव


पिछले दिनों कल्याण पत्रिका चर्चा में रही। गीता प्रेस को गांधी शांति पुरस्कार की घोषणा हुई थी। कुछ दिनों बाद प्रधानमंत्री अपने गोरखपुर दौरे के समय गीता प्रेस गए। पुरस्कार की घोषणा और प्रधानमंत्री के गीता प्रेस जाने के समय इस बात का बार-बार उल्लेख किया गया कि कल्याण पत्रिका के अंकों में महात्मा गांधी की हत्या पर कुछ भी नहीं प्रकाशित किया गया। ऐसा कहनेवालों ने कल्याण पत्रिका और इसके संपादक को गांधी विरोधी करार दिया। इस तरह की टिप्पणियां की गईं जिसके भ्रम का वातावरण बने कि कल्याण के संपादक हनुमानप्रसाद पोद्दार और बापू के हत्यारे के बीच संबंध थे। उनके ऐसा कहने के पीछे अंग्रेजी में प्रकाशित एक पुस्तक गीता प्रेस एंड द मेकिंग आफ हिंदू इंडिया में उल्लिखित प्रसंग का सहारा लिया गया। इस पुस्तक के लेखक अक्षय मुकुल हैं। उन्होंने अपने पुस्तक के पेज 58 पर लिखा है कि गीता प्रेस ने गांधी की हत्या पर खामोशी ओढ़ ली थी। कल्याण के लिए जिस व्यक्ति का आशीर्वाद और लेखन बेहद महत्वपूर्ण था उसी पत्रिका में अप्रैल 1948 के अंक तक एक बार भी उनका (गांधी) उल्लेख नहीं हुआ। इस अंक में पोद्दार ने गांधी से अपनी विभिन्न मुलाकातों के बारे में लिखा। बाद के अंकों में भी गांधी का लेखन कल्याण में प्रकाशित हुआ। लेकिन अक्षय मुकुल ये प्रश्न उठाते हैं कि फरवरी और मार्च 1948 के अंक में गांधी के बारे में कुछ भी प्रकाशित क्यों नहीं हुआ। अक्षय ने हाल के अपने लेख में भी इस ओर फिर से संकेत किया है। मुकुल इस बात का भी दावा करते हैं कि कल्याण के संपादक हनुमानप्रसाद पोद्दार, महात्मा गांधी के कटु आलोचक थे। इस संबंध में वो कुछ प्रसंगों और पत्रों का हवाला देते हैं जहां पोद्दार गांधी के विचारों की आलोचना करते है। अक्षय मुकुल ने जो व्याख्या की हैं उसमें कई दोष रह गए हैं। 

गांधी की हत्या 30 जनवरी 1948 को हुई थी। कल्याण पत्रिका का जनवरी अंक बहुत सारे ग्राहकों को भेजा जा चुका था। कुछ अंक ग्राहकों को नहीं भेजे जा सके थे। गांधी की हत्या का समाचार आते ही बचे हुए अंकों का डिस्पैच रोककर उसमें तीन पन्ने अलग से लगाए गए। एक पूरे पन्ने पर बापू की तस्वीर लगाई गई जिसके ऊपर लिखा गया ‘महाभागवत बापू’ और तस्वीर के नीचे लिखा गया ‘सकल लोक मां सहु ने बंदे’। एक पेज पर राघवदास जी की एक टिप्पणी प्रकाशित है जिसका शीर्षक है ‘महाभागवत पूज्य बापू जी’। उसमें राघवदास जी ने लिखा है कि पूज्य बापू जी कहा करते थे मेरा ह्रदय चीरकर देखो तो उसमें राम-राम लिखा मिलेगा। बहुतों को ये बात समझने में बहुत दिक्कत होती हो, पर जब हम उनको तारीख 30.1.48 को साढे पांच बजे बजे गोली का शिकार होते देखते हैं तो उनके मुंह से हे राम, हे राम यह दो शब्द ही निकलते हैं। मैंने गोली का अभ्यास करनेवालों से बातें की तो उन्होंने मुझे बताया कि गोली लगने पर मुख की आकृति बिगड़ जानी चाहिए, परेशानी चेहरे पर आनी चाहिए पर वैसा नहीं हुआ... कितना सुंदर स्वरूप है इस महाभागवत का। ग्रंथों में संतों के वर्णन पढ़े थे. पर प्रत्यक्ष रूप से देखने का अवसर इसी महापुरुष के जीवन में हमें मिला। बोलिए महाभागवत की जय। राघवदास जी की कल्याण में प्रकाशित इस टिप्पणी में गहरी श्रद्धा परिलक्षित होती है।    

अब नजर डाल लेते हैं कल्याण के 1948 के जनवरी अंक में तत्कालीन संपादक हनुमानप्रसाद पोद्दार की टिप्पणी पर। वो लिखते हैं, पूज्य महात्मा जी संत थे, महापुरुष थे मानवमात्र का हित चाहनेवाले थे और विश्व की एक महान विभूति थे। वे धर्म और जाति के भेद से ऊपर उठे हुए थे और सत्य और अहिंसा के सच्चे पुजारी थे। वे मानवता के खरे प्रतीक थे। ईश्वर की प्रार्थना के समय जाते हुए उनकी निर्मम हत्या करके हत्यारे ने अपना तो लौकिक और पारलौकिक महान अहित किया ही, हिंदू जाति पर भी-जो धर्मत: और स्वभावत: अहिंसाप्रिय है- कलंक का अमिट टीका लगा दिया। अगर हनुमानप्रसाद पोद्दार गांधी को नापसंद करते, तो कलंक का अमिट टीका जैसी कठोर टिप्पणी हिंदू जाति पर नहीं करते।  अपनी इस टिप्पणी में हनुमानप्रसाद पोद्दार लिखते हैं कि बापू के साथ उनका पारिवारिक संबंध था। बापू उनको पुत्र के समान मानते और स्नेह करते थे। उनके स्नेह की एक एक बात याद करके दिल भर आता है। इस तरह की टिप्पणियों को पढ़ने के बाद क्या संदेह रह जाता है कि हनुमानप्रसाद पोद्दार गांधी को पसंद नहीं करते थे। वैचारिक मतभेद हो सकते हैं लेकिन उसको व्यक्तिगत द्वेष की तरह देखना और व्याख्यायित करने में अंतर है। अक्षय मुकुल इस अंतर को समझ नहीं पाए या समझ कर अनदेखी की। एक और बात मुकुल ने जोर देकर पूछी है कि कल्याण पत्रिका के 1948 के फरवरी और मार्च अंक में गांधी का उल्लेख क्यों नहीं है। यहां भी मुकुल की लापरवाही या तथ्यों की अनदेखी दिखाई देती है। प्राथमिक स्त्रोत तक नहीं पहुंचने की लापरवाही या किसी खास कारण से अनदेखी। 1948 के फरवरी अंक में हिंदू विधवा के नाम से बापू की टिप्पणी है, कवर पर भी उल्लेख है। तो क्या ये माना जाए कि लेखक इतना लापरवाह था कि वो बगैर देखे बड़े-बड़े दावे कर रहा था या वो जानबूझकर कुछ तथ्यों को छिपाकर एक नैरेटिव बनाने की कोशिश कर रहा था। अनुत्तरित तो ये प्रश्न है। 1926 से लेकर 1948 तक बापू की कई टिप्पणियां कल्याण के विभिन्न अंकों में प्रकाशित हुईं। 

एक और दोषपूर्ण टिप्पणी अक्षय ने अपनी पुस्तक में की है कि गीता प्रेस के निजी अभिलेखागार में गांधी की हत्या से संबंधित कोई रेफरेंस उपलब्ध नहीं है। पिछले सप्ताह मैं गोरखपुर में था।  गीता प्रेस जाकर कल्याण के उस अंक को स्वयं देखा जिसमें बापू की हत्या पर तीन पृष्ठ हैं। यह अंक उनके अभिलेखागार में उपलब्ध है। कोई भी अनुमति लेकर देख सकता है। मुझे लगता है कि मुकुल ने कल्याण पत्रिका की फाइल देखी ही नहीं। उसने उन विशेषांकों को देखा जो बाद में पुस्तकाकार प्रकाशित हुए। प्रतिवर्ष कल्याण का जनवरी अंक विशेषांक होता है जो बाद में पुस्तकाकार प्रकाशित होता है। जनवरी 1948 का अंक भी विशेषांक था, नारी अंक, जो कालांतर में पुस्तकाकार प्रकाशित हुआ। अब जो नारी अंक बाजार में उपलब्ध है उसमें गांधी की हत्या के प्रसंग पर राघवदास जी, पोद्दार जी की टिप्पणियां नहीं हैं। गांधी का चित्र भी नहीं है। ये तो पुस्तक प्रकाशन जगत की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है। जब किसी पत्रिका के विशेषांक को पुस्तकाकार प्रकाशित किया जाता है तो उसमें तात्कालिक या घटनात्मक टिप्पणियां नहीं रखी जाती हैं। बिना फाइल देखे सिर्फ बाद में प्रकाशित पुस्तक के आकार पर टिप्पणी करना ये दर्शाता है कि लेखक कितनी लापरवाही से तथ्यों को इकट्ठा कर रहा था। प्राथमिक स्त्रोत तक नहीं पहुंच रहा था। लेकिन बड़े बड़े प्रश्न खड़े कर रहा था। 

कल्याण, गांधी और हनुमानप्रसाद पोद्दार के संबंधों को समझने के लिए जो दृष्टि चाहिए वो अक्षय मुकुल के पास नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि अक्षय मुकुल ने एक विशेष नैरेटिव को बल देने के लिए ये पुस्तक लिखी। पुरस्कृत हुए। अब उसी पुस्तक में वर्णित गलत तथ्यों और प्रसंगों को उद्धृत नैरेटिव बनाए जा रहे हैं। इंटरनेट मीडिया के दौर में लोगों के पास किसी भी प्रसंग या घटना को समग्रता में देखने या उसकी पड़ताल करने का धैर्य नहीं है। अगर मैं भी गोरखपुर के गीताप्रेस जाकर इन प्रसंगों को नहीं देखता समझता तो संभव है कि मान लेता कि कल्याण में बापू की हत्या के बाद कुछ नहीं प्रकाशित हुआ। 


Saturday, June 24, 2023

औपनिवेशिक ताकतों का प्रतिकार


गीता प्रेस, गोरखपुर को गांधी शांति पुरस्कार देने की घोषणा होते ही इंटरनेट मीडिया और अन्य समाचार माध्यमों में सकारात्मक और नकारात्मक टिप्पणियां देखने को मिलने लगीं। कांग्रेस पार्टी ने तो एक पुस्तक की आड़ लेकर गीता प्रेस की तुलना गोडसे से कर डाली। कांग्रेस की इस तुलना के बाद मामले ने तूल पकड़ा और गीता प्रेस के साथ-साथ इससे जुड़े हनुमानप्रसाद पोद्दार के बारे में भी अनाप-शनाप लिखा जाने लगा। किसी ने उनको हिंदू सांप्रदायिकता से जोड़ा, किसी ने उनके संपादन में निकलनेवाली पत्रिका कल्याण में मुस्लिम लेखकों की खोज आरंभ कर दी, किसी ने उनको राष्ट्रीय स्वयंसेव संघ का एजेंडा चलानेवाला व्यक्ति बताया। हनुमानप्रसाद पोद्दार जी के बारे में विभिन्न प्रकार की टिप्पणियां पढ़ते हुए स्वर्गीय नरेन्द्र कोहली की एक बात याद आई। जब भी श्रीरामचरितमानस या महाभारत के बारे में कोई पाठक उनसे मूर्खतापूर्ण प्रश्न करता था तो वो हंसते हुए कहते थे कि अज्ञान असीमित होता है जबकि ज्ञान की सीमा होती है। हुनमानप्रसाद पोद्दार के बारे में भी अधिकतर टिप्पणीकारों ने असीमित अज्ञान का ही प्रदर्शन किया है। दरअसल होता ये है कि जब आप पूर्वाग्रह से भर कर किसी का आकंलन करते हैं या किसी एजेंडा के तहत किसी व्यक्तित्व या संस्थान का मूल्यांकन करते हैं तो उनके योगदानों को एकांगी होकर देखते हैं। गीता प्रेस और हनुमानप्रसाद पोद्दार पर टिप्पणी करते समय भी कई लोग इस दोष के शिकार हो गए। एक तो अज्ञान दूसरे एजेंडा। कांग्रेस ने क्यों हनुमानप्रसाद पोद्दार की तुलना गोडसे से की ये वही जानें लेकिन मुझे लगता है कि कांग्रेस पार्टी में हिंदुत्व और हिंदू महापुरुषों को लेकर एक भ्रम की स्थिति है जिसका प्रदर्शन उस पार्टी के नेता नियमित अंतराल पर करते रहते हैं। खैर हम राजनीति की बात नहीं करके पुस्तक और कल्याण पत्रिका को केंद्र में रखकर चर्चा करेंगे। 

गीता प्रेस की स्थापना 1923 में हुई। उस समय को याद करना चाहिए। भारत अंग्रेजों के अधीन था। उसके पहले हमारा देश मुगलों और अन्य आक्रांताओं की यातनाओं को झेल चुका था। भारतीय संस्कृति को लगातार मिटाने के प्रयास मुगलकाल में भी हुए और अंग्रेजों ने भी उसको आगे बढ़ाया। ऐसे कठिन समय में गीता प्रेस की स्थापना हुई। हिंदू धार्मिक ग्रंथों के इस प्रकाशन गृह ने हिंदुओं को बेहद सस्ते दामों पर अपने पौराणिक ग्रंथों से परिचय करवाया। गीता प्रेस के योगदान को इस दृष्टि से भी देखे जाने की आवश्यकता है कि इसने स्वाधीनता संग्राम के लिए देश के जनमानस को तैयार किया। भारतीय पौराणिक ग्रंथों का प्रकाशन और उसको जन-जन तक पहुंचाकर गीता प्रेस ने जो कार्य किया है उसके समांतर विश्व इतिहास में कम उदाहरण मिलते हैं। इन ग्रंथों को पढ़कर, धर्म के प्रति, न्याय के प्रति, अपने अधिकारों के प्रति, समाज के प्रति और देश के प्रति जनता के मन जो भावना जाग्रत हुई उसके आकलन के बिना गीता प्रेस और उसके योगदान पर लिखा नहीं जा सकता है। यह तो भारतीय इतिहास लेखन की दोषपूर्ण पद्धति रही है कि उसने हिंदू धर्म से जुड़ी संस्थाओं और संस्थानों के योगदानों की चर्चा तक नही की। अगर कहीं उल्लेख करने की मजबूरी हुई तो एक पंक्ति में लिख दिया। आज फ्रांस के प्रकाशक गालीमर की चर्चा पूरी दुनिया में होती है क्योंकि उस देश के लेखकों ने इस प्रकाशन गृह के बारे में, उसके योगदान के बारे में लिखा लेकिन गीता प्रेस को धार्मिक पुस्तकों का प्रकाशन करार देकर उसको हाशिए पर डालने का प्रयास हुआ। 

गीता प्रेस से प्रकाशित पत्रिका कल्याण में प्रेमचंद से लेकर निराला तक ने लेख लिखे हैं। वामपंथी इतिहासकारों ने इसकी चर्चा तक नहीं की। यहां तक की जब इन लेखको का मूल्यांकन करते हुए आलोचनात्मक पुस्तकें लिखी गईं तो कल्याण में प्रकाशित उनके लेखों  की उपेक्षा की गई। अगर निराला और प्रेमचंद के कल्याण में प्रकाशित लेखों को सामने रखा जाता तो उनको वामपंथी विचार का लेखक सिद्ध करने में परेशानी होती। वो भारतीय विचारों के लेखक के तौर पर देश के सामने होते। प्रेमचंद ने कल्याण के कृष्णांक में जो लेख लिखे थे वो गीता प्रेस से पुस्तकाकार प्रकाशित है और अब भी बाजार में उपलब्ध हैं। हिंदी साहित्य से जुड़े नंददुलारे वाजपेयी, महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचंद, मैथिलीशरण गुप्त, सियारामशरण गुप्त, सियारामशरण गुप्त, कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर, चतुरसेन शास्त्री और बनारसीदास चतुर्वेदी जैसे दिग्गज रचनाकार कल्याण पत्रिका के संपादक हनुमान प्रसाद पोद्दार के संपर्क में थे। नंददुलारे वाजपेयी ने तो 24.12.1931 के अपने पत्र में लिखा भी, कल्याण के द्वारा आप समाज की जो सेवा कर रहे हैं वो मुझे बहुत अच्छी लगती है। आपने महर्षि शंकराचार्य आदि के मूल्यावान ग्रंथों की प्रकाशन व्यवस्था करके हिंदी पर बड़ा उपकार किया है। 

गीता प्रेस और कल्याण पत्रिका ने सनातन संस्कृति को बल देने का कार्य भी किया। देश सैकड़ों वर्षों से गुलामी की जंजीर में जकड़ा हुआ था। सनातन पर दूसरी संस्कृति को थोपने के लगातार प्रयास हो रहे थे। ऐसे वातावरण में सनातनी ग्रंथों का प्रकाशन और सनातनी विचारों से पूर्ण पत्रिका कल्याण के द्वारा गीता प्रेस ने औपनिवेशिक ताकतों का प्रतिकार किया। कल्याण पत्रिका ने न केवल सनातनी संस्कृति को बल दिया बल्कि उसने हिंदी भाषा के क्षितिज का भी विस्तार किया। जब देश में अंग्रेज शासक उर्दू को बढ़ावा दे रहे थे तो कल्याण के जरिए और अपने प्रकाशनों के जरिए गीता प्रेस हिंदी को मजबूती प्रदान कर रही थी। 1932 के 12 मार्च को बनारसीदास चतुर्वेदी ने हनुमान प्रसाद पोद्दार को एक पत्र लिखकर कहा कि कल्याण के 16 हजार ग्राहक हैं। यदि आप उसके मूल्य में चार आने की भी वृद्धि कर दें और उस चार हजार रुपयों से हिंदी के लेखकों से अच्छे लेख लिखाने और अनुवाद आदि कराने में व्यय करे तो अनेक लेखकों का आप उद्धार कर सकते हैं। अपने इसी पत्र में चतुर्वेदी जी ने हनुमानप्रसाद पोद्दार जी को स्वर्गीय गणेश शंकर विद्यार्थी का अनुसरण करने की सलाह दी और लिखा, स्वर्गीय गणेश शंकर विद्यार्थी को मैं सच्चा आस्तिक और भक्त मानता हूं। इस पंक्ति से भी एजेंडा लेखन की पोल खुलती है जो गणेश शंकर विद्यार्थी को वामपंथी सिद्ध करते रहे हैं। आवश्यकता इस बात की है कि गीता प्रेस गोरखपुर के योगदान का मूल्यांकन समग्रता में किया जाए। 

इस पूरे प्रकरण से एक बात और स्पष्ट हो गई है कि वर्तमान समय में जो विचारधारा का संघर्ष चल रहा है उसमें पुस्तकों की महत्वपूर्ण भूमिका है। कर्नाटक चुनाव के पहले देवारुण महादेव की एक पतली सी पुस्तक आई थी आरएसएस, द लांग एंड शार्ट आफ इट। इस पुस्तक का फोरवर्ड रामचंद्र गुहा ने आफ्टरवर्ड योगेन्द्र यादव ने लिखा था। कवर पर हिंदी लेखिका गीतांजलिश्री की टिप्पणी प्रकाशित थी। कन्नड में लिखी गई इस पुस्तक का अंग्रेजी में अनुवाद करवाया गया। चुनाव के पहले प्रदेश में माहौल बनाने के लिए इस पुस्तक को चर्चित करने और पाठकों तक पहुंचाने का उपक्रम किया गया। जैसा कि इस पुस्तक के नाम से जाहिर है कि इसका केंद्रीय विषय राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ है। इसमें लेखक ने राष्ट्रीय संव्यंसेवक संघ के कार्यक्रमों की आलोचना की। कुछ गलत तथ्यों के साथ भी। जब देश के तथाकथित बड़े लेखक और इतिहासकार उसकी चर्चा करते हैं तो आम पाठकों के बीच उस पुस्तक को लेकर एक उत्सुकता पैदा होती है। यह सही है कि पुस्तकों का चुनावी राजनीति पर सीधा असर नहीं होता है लेकिन पुस्तकों में प्रकाशित विचार मतदाताओं को परोक्ष रूप से प्रभावित करते हैं। इस वक्त विचारधारा विशेष के लेखक और बुद्धीजीवी पुस्तकों के माध्यम से राजनीति करने में लगे हैं और उनको हिंदी और अंग्रेजी के कुछ प्रकाशकों का साथ भी मिल रहा है। वैकल्पिक विचारधारा के लेखकों को भी पुस्तक का उत्तर पुस्तक से ही देना होगा।    


Sunday, June 14, 2015

पत्रों से खुलते राज

हिंदी साहित्य के इतिहास में पत्र साहित्य की समृद्धशाली परंपरा रही है । हिंदी में पत्र साहित्य को अमूमन तीन भागों में बांटा जाता है- पहला व्यक्तिगत पत्रों के संकलन, कई किताबों के परिशिष्ट आदि में उससे जुड़े पत्रों का संकलन और पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित पत्रों का संकलन । ये तीनों ही हिंदी के लिए बेहद अहम हैं लेकिन व्यक्तिगत पत्रों के संकलन से कई बार ऐसे राज खुलते हैं जो अबतक किसी के संज्ञान में नहीं आया था । माना यह जाता रहा है कि हिंदी के पत्र साहित्य नए पाठकों के साथ साथ अन्य विधाओं में रुचि रखनेवालों को भी ज्ञान और अनुभव के ऐसे प्रदेश में लेकर जाता जो कि उसके लिए एकदम से अनजाना होता है । हाल ही में मैने एक ऐसे ही अनजाने प्रदेश में प्रवेश किया । आज की युवा पीढ़ी कल्याण पत्रिका के नाम से अंजान है लेकिन वो लोग जो अभी अपने युवावस्था के उतर्रार्ध में हैं उनके लिए कल्याण पत्रिका का नाम अनजाना नहीं है । एक जमाना था जब कल्याण पत्रिका हर घर के लिए जरूरी पत्रिका हुआ करती थी । हमें याद है कि हर महीने की लगभग नियत तारीख को डाकिया एक खाकी कागज में लिपटी मुड़ी हुई पत्रिका देकर जाता था । उस तारीख का घर में सबको इंतजार रहता था । कालांतर में कल्याण की प्रसार संख्या कम होती चली गई । यह भी शोध का विषय है कि कल्याण जैसी अत्यंत लोकप्रिय पत्रिका लगभग समाप्त कैसे हो गई । शोध तो इस बात की भी होनी चाहिए कि कल्याण को धार्मिक पत्रिका के तौर पर प्रचारित किसने और क्यों किया। उनकी मंशा क्या थी । कल्याण में सामाजिक बुराइयों और धार्मिक पाखंड पर भी लेख छपते थे । खैर यह एक अवांतर प्रसंग जो विस्तार से एक स्वतंत्र लेख की मांग करता है । हम बात कर रहे थे हिंदी में पत्र साहित्य की और उसके माध्यम से पाठकों के ज्ञान के अछूते संसार में प्रवेश की । कल्याण के संस्थापक हनुमान प्रसाद पोद्दार जी के पत्रों के कुछ ऐसे ही राज ऱुल रहे हैं जिनके बारे में अभी देश के कम ही लोगों को मालूम होगा । हनुमान प्रस्दा पोद्दार जी ने गोविंद वल्लभ पंत को एक पत्र लिखा है जिसमें वो पंत जी जी के ही पत्र को उद्धृत करते हैं आप इतने महान हैं, इतने ऊंचे महामानव हैं कि भारतवर्ष को क्या, सारी मानवी दुनिया को इसके लिए गर्व होना चाहिए । मैं आपके स्वरूप के महत्व को न समझकर ही आपको भारत रत्न कीउपाधि से सम्मानित करना चाहता था । आपने उसे स्वीकार नहीं किया, यह बहुत अच्छा किया । आप इस उपाधि से बहुत ऊंचे स्तर पर हैं । मैं तो हृद्य से आपको नमस्कार करता हूं । अपने उसी पत्र में हनुमान प्रसाद पोद्दार ने यह भी लिखा है कि यह सब पढ़कर उनको संकोच हुआ है और अंत में लिखते हैं- आपके आदेशानुसार पत्र को जला दिया है, आप भी मेरे इस पत्र को गुप्त ही रखिएगा ।‘   इस पत्र से यह बात खुलती है कि गोविंद वल्लभ पंत, जो उस वक्त के गृह मंत्री थे, ने उनको भारत रत्न देने का प्रस्ताव किया था । भारत रत्न देने का फैसला उस वक्त के राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की सहमति से हुआ था । गोविंद वल्लभ पंत को महावीर प्रसाद पोद्दार से सहमति लेने का जिम्मा सौंपा गया था । लेकिन पोद्दार जी ने भारत रत्न लेने से विनम्रतापूर्वक इंकार कर दिया था । इस बात की पुष्टि डॉ राजेन्द्र प्रसाद के पुत्र मृत्युंजय प्रसाद की एक टिप्पणी से भी साबित होती है पूज्य पिताजी की यह आंतरिक अभिलाषा थी कि श्रीभाई जी को ( हनुमान प्रसाद पोद्दार को लोग भाईजी ही रहते थे) भारत रत्न की उपाधि से विभूषित करके उनके आध्यात्मिक व्यक्तित्व को राजकीय सम्मान प्रदान करने का अवसर मिले । परंतु ऐसे सम्मानों अभिनंदनों के प्रति श्रीभाई जी की घोर उपरामता के कारण उनकी वह सात्विक अभिलाषा पूर्ण नहीं हो सकी । अब अगर पंत को लिखे हनुमानप्रसाद पोद्दार जी के पत्र और मृत्युंजय प्रसाद की टिप्पणी को जोड़कर देखते हैं तो यह बात साफ हो जाती है कि हनुमानप्रसाद पोद्दार जी ने देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान लेने से इंकार कर दिया था । अब ये तथ्य और प्रसंग कहीं अन्यत्र नहीं मिलते हैं । इस तरह के प्रामाणिक खुलासे साहित्य की इस विधा पत्र साहित्य में संभव है । पत्रकारिता और पत्रकारों के सरोकारों से जुड़े एक बड़े नाम अच्युतानंद मिश्र के संपादन में निकली एक किताब पत्रों में समय संस्कृति से इन तथ्यों पर से पर्दा हटा है । पत्रों में समय संस्कृति जिसे प्रभात प्रकाशन ने छापा है ।
अच्युतानंद मिश्र के संपादन में निकली इस किताब को पढ़ने के बाद उस दौर के साहित्य और साहित्यकारों के पुनर्मूल्यांकन का सवाल उठता है । हनुमान प्रसाद पोद्दार जी के पत्रों को पढ़ते हुए यह साफ तौर पर सामने आती है कि उस वक्त कल्याण में समाज के हर क्षेत्र और वर्ग के विद्वान लिखा करते थे । हनुमान प्रसाद पोद्दार का पत्र व्वहार नंद दुलारे वाजपेयी, जयशंकर प्रसाद, प्रेमचंद, महावीर प्रसाद द्विवेदी, मैथिलीशरण गुप्त, सियारामशरण गुप्त, कन्हैयालाल मिश्र, चतुरसेन शास्त्री आदि के सात लगातार होता रहता था । तीन मार्च बत्तीस का प्रेमचंद का एक पत्र है जिसमें वो कहते हैं आपके दो कृपा पत्र मिले। काशी से पत्र यहां आ गया था । हंस के विषय में आपने जो सम्मति दी है उससे मेरा उत्साह बढ़ा । मैं कल्याण के ईश्वरांक के लिए अवश्य लिखूंगा । क्या कहें आप काशी गए और मेरा दुर्भाग्य कि मैं लखनऊ में हूं । भाई महावीर प्रसाद बाहर हैं या भीतर मुझे ज्ञात नहीं । उनकी स्नेह स्मृतियां मेरे जीवन की बहुमूल्य वस्तु हैं । वह तो तपस्वी हैं, उन्हें क्या खबर कि प्रेमभी कोई चीज है । इसी तरह के कई पत्र हैं जिनसे उस वक्त के परिदृश्य से परदा हटता है, धुंध भी छंटती है ।

इस किताब को पढ़ते हुए जेहन में एक बात बार बार कौंध रही थी कि  वर्तमान समय को पकड़ने और उसको दर्ज करवने के लिए पत्र तो नहीं होंगे । इंटरनेट के फैलाव ने पत्रों की लगभग हत्या कर दी है । पत्रों की जगह ईमेल ने ली है । पत्रों की जगह एसएमएस ने ले ली है । पत्रों की बजाए अब फेसबुक पर संवाद होने लगे हैं । तकनीक ने पत्रों को महसूस करने के अहसास से हमें महरूम कर दिया । इन भावनात्मक नुकसान के अलावा एक और नुकसान हुआ है वह ये कि पत्रों में एक वक्त का इतिहास बनता था । उस वक्त चल रहे विमर्शों और सामाजिक स्थितियों पर प्रामाणिक प्रकाश डाला जा सकता था लेकिन पत्रों के खत्म होने से साहित्य की एक समृद्ध विधा तो लगभग खत्म हो ही गई है इतिहास का एक अहम स्त्रोत भी खत्म होने के कगार पर है । अब अगर हम महावीर प्रसाद पोद्दार जी के पत्रों की बात करें या मुक्तिबोध को लिखे पत्रों की बात करें तो यह साफ तौर पर कह सकते हैं कि इन संग्रहों में उस दौर को जिया जा सकता है । अच्युतानंद मिश्र जी द्वारा संपादित इस किताब में निराला जी का एक पत्र है सत्रह अक्तूबर उन्नीस सौ इकतीस का जिसमें वो लिखते हैं प्रिय श्री पोद्दार जी, नमो नम: । आपका पत्र मिला । मैं कलकत्ता सम्मेलन में जाकर बीमार पड़ गया । पश्चात घर लौटने पर अनेक गृह प्रबंधों में उलझा रहा । कई बार विचार करने पर भी आपके प्रतिष्ठित पत्र के लिए कुछ नहीं लिख सका । क्या लिखूं , आपके सहृद्य सज्जनोचित बर्ताब के लिए मैं बहुत लज्जित हूं । आपके आगे के अंकों के लिए कुछ-कुछ अवश्य भेजता रहूंगा । एक प्रबंध कुछ ही दिनों में भेजूंगा ।अब निराला के इन पत्रों या कल्याण में छपे निराला के लेखों का सामने आना शेष है । अगर मेरी स्मृति मेरा साथ दे रही है तो नंदकिशोर नवल द्वारा संपादित निराला रचनावली में ना तो ये पत्र हैं और ना ही कल्याण में छपी उनकी रचनाएं । निराला की राम की शक्ति पूजा और अन्य रचनाओं के आधार पर जिस तरह से उनको प्रगतिशीलता या जनवादिता का ताज पहनाकर वामपंथी घूम रहे हैं यह उनके रचना पक्ष का एक चेहरा है । जिस तरह से निराला को अनीश्वरवादी बताकर कुछ अज्ञानी आलोचत यश लूट रहे हैं वह निराला के प्रति अन्याय है । जिस तरह से निराला ने अपने अभिवादन में नमो नम: का इस्तेमाल किया है उसपर ध्यान देने की जरूरत है । इसका यह मतलब कदापि नहीं निकाला जाना चाहिए कि निराला हिंदूवादी थी या निराला धार्मिक थे । अनुरोध इस बात का है कि अगर निराला के बारे में कुछ नए तथ्य सामने आए हैं तो उनके समग्र मूल्यांकन में उन लेखों और तथ्यों को भी शामिल किया जाना चाहिए । कहने का अर्थ यह है कि निराला के इन पत्रों के माध्यम से अगर साहित्येतास सही किया जा सकता है तो हमें बगैर किसी वाद विवाद में पड़े संवाद के आधार पर उसोक दुरुस्त कर देना चाहिए ।