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Saturday, May 31, 2025

भाषा के नाम पर विभाजनकारी खेल


भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध और उसके बाद की राजनीति के घमासान के बीच एक मुद्दे पर चर्चा नहीं हो पाई। ये मुद्दा देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। मुद्दा है भारतीय भाषाओं के बीच परस्पर सामंजस्य बढ़ाने का। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के कार्यान्वयन में इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य हो रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी गैर-हिंदी प्रदेश की जनसभाओं में जनता के अनुमति लेकर हिंदी में बोलते हैं। हाल ही में गुजरात की एक जनसभा में उन्होंने गुजराती में बोलना आरंभ किया। सभा में उपस्थित लोगों से गुजराती में पूछा कि क्या वो हिंदी में भाषण दे सकते हैं। जब सभा में सकारात्मक स्वर गूंजा तब प्रधानमंत्री मोदी ने हिंदी में भाषण दिया। एक सरफ सरकार के स्तर पर भारतीय भाषाओं के बीच मतभेद कम करने के प्रयास किए जा रहे हैं तो दूसरी तरफ बीच-बीच में कुछ ऐसा घटित हो जाता है जो भारतीय भाषाओं के बीच वैमनस्यता बढ़ाने वाला होता है। हाल ही में अपनी फिल्म के प्रमोशन के सिलसिले में अभिनेता कमल हासन ने एक ऐसा बयान दे दिया जिसके बाद दक्षिण भारत की दो भाषाओं के समर्थकों के बीच तनाव हो गया है। कमल हासन ने कहा कि कन्नड भाषा तमिल से पैदा हुई है। इसके बाद कर्नाटक में कमल हासन का विरोध आरंभ हो गया। उनकी फिल्म के पोस्टर जलाए गए। कहा जा रहा है कि उनकी फिल्म का प्रदर्शन भी कर्नाटक में नहीं होगा। हर रोज कमल हासन का विरोध हो रहा है लेकिन वो निरंतर अपनी बात पर डटे हुए हैं। कह रहे हैं कि अपने बयान के लिए क्षमा नहीं मांगेगे। अब पता नहीं इस विवाद से उनकी फिल्म को लाभ होगा या नहीं। जो भी हो वो तो समय बताएगा। 

इस बीच एक ऐसी खबर आई जिसको सुनकर चौंका। पता चला कि तमिलनाडु की सत्ताधारी पार्टी द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) ने कमल हासन  की राज्यसभा की उम्मीदवारी को समर्थन देने का निर्णय लिया है। उनके समर्थन के बाद मक्कल निधि माय्यम पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर कमल हासन की जीत तय है। मक्कल निधि माय्यम कमल हासन की ही पार्टी है। तमिलनाडू में अगले वर्ष विधानसभा चुनाव होनेवाले हैं। ऐसे में ये देखना दिलचस्प होगा कि कमल हासन के राज्यसभा में जाने के बाद वहां की राजनीति में क्या बदलाव आते हैं। कमल हासन अभिनेता के तौर पर तो तमिलनाडू में लोकप्रिय हैं लेकिन राजनीति में बहुत दिनों से हाथ पैर मारने के बावजूद कुछ विशेष कर नहीं पाए । कमल हासन ने 2018 में मक्कल निधि मायय्म नाम से एक पार्टी बनाई थी। उसके बैनर तले 2019 का लोकसभा चुनाव भी लड़ा था। उस चुनाव में भी उनकी पार्टी का खाता नहीं खुल पाया था। कुछ चुनावी विशेषज्ञों और वामपंथी उदारवादी राजनीतिज्ञों को उम्मीद थी कि कमल हासन और उनकी पार्टी विधानसभा चुनाव में बेहतर करेगी । चुनाव को त्रिकोणीय कर देगी। पर ऐसा हो नहीं सका था। जब तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के परिणाम आए थे तो कमल हासन कोयंबटूर दक्षिण सीट से भारतीय जनता पार्टी महिला मोर्चा की अध्यक्ष वनाथी श्रीनिवासन से पराजित हो गए। उनकी पार्टी का भी बुरा हाल रहा। तमिल-कन्नड़ विवाद के बीच कमल हासन को डीएमके ने राज्यसभा में भेजने का निर्णयय लिया है, पता नहीं ये संयोग है या प्रयोग। अगर संयोग है तो राजनीति में इस तरह के संयोग बिरले होते हैं। अगर ये प्रयोग है तो खतरनाक है। क्योंकि इसकी बुनियाद में भाषाई वैमनस्यता है। दो राज्यों के बीच तनाव बढ़ाने वाले को पुरस्कृत करने का प्रयोग उचित नहीं कहा जा सकता है। 

एक तरफ तमिल और तेलुगु के बीच विवाद खड़ा किया जा रहा है तो दूसरी ओर 22 मई को केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने अपने से संबद्ध सभी स्कूलों को एक 2023 के राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा के आलोक में आरंभिक शिक्षा की भाषा को लेकर एक दिशानिर्देश जारी किया है। स्कूली शिक्षा के लिए तैयार किए गए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा में आरंभिक शिक्षा मातृभाषा में करवाने की अनुशंसा की गई थी। प्री प्राइमरी से लेकर ग्रेड दो तक को आर 1 और आर 2 की भाषा पढ़ाने की सलाह दी गई है। अबतक चले आ रहे त्रिभाषा फार्मूले में बदलाव किया गया है। पहले त्रिभाषा फार्मूला का मतलब होता था कि मातृभाषा, अंग्रेजी और तीसरी भाषा के तौर पर अहिंदी भाषी राज्य में हिंदी। लेकिन आर-1 और आर 2 में इसको पलट दिया गया है। इसमें अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त की गई है। उसके स्थान पर भारतीय भाषाओं को प्राथमिकता दी गई है। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा में किसी भाषा विशेष का उल्लेख न करते हुए उसे समभाव से परिभाषित किया गया। एक नए सोच को सामने रखते हुए पहली, दूसरी और तीसरी भाषा की जगह आर-1, आर-2 और आर-3 शब्द  का प्रयोग किया गया। आर-1 में मातृभाषा या राज्य की भाषा को स्थान दिया गया। इसमें मातृभाषा और राज्य दोनों को रखा गया क्योंकि यह जरूरी नहीं कि मातृभाषा और राज्य भाषा एक हो। आर-2 में आर-1 के अलावा कोई भी भाषा, आर-3 में आर-1 और आर-2 के अलावा कोई भी भारतीय भाषा। इसका परिणाम ये हो रहा है कि अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त हो गई। सीबीएसई ने अपने स्कूलों को इसी फार्मूले को लागू करने का दिशा निर्देश जारी किया है।

सीबीएसई के इस नए दिशा निर्देश के पीछे के उद्देश्यों को समझने की आवश्यकता है। बच्चों को जब आरंभिक शिक्षा दी जी है तो वो मौखिक होती है। मौखिक शिक्षा जब मातृभाषा में दी जाएगी तो वो ना केवल पनी भाषा से परिचित होंगे बल्कि उनके घर परिवार का जो वातावरण होगा उसको समझने में भी मदद होगी। कुछ लोग महानगरीय स्कूलों का हवाला देकर इस फार्मूले में मीनमेख निकालने का प्रयास कर रहे हैं। उनका कहना है कि महानगरों के स्कूलों में विभिन्न मातृभाषा वाले बच्चे आते हैं। ऐसे में उनकी मातृभाषा के अनुसार पढ़ाई का माध्यम तय करने में कठिनाई होगी। कठिनाई तो हर नए काम में आती है लेकिन फिर रास्ता भी उन्हीं कठिनाइयों के बीच से निकलता है। जब मानस में अंग्रेजी अटकी होगी तो इस कठिनाई को दूर करने में बाधाएं आएंगी। राष्ट्रीय शिक्षा नीति इस बाधा को दूर करने का उपाय ढूंढती है। कुछ लोगों का कहना है कि ऐसा करके हिंदी थोपी जा रही है। इस तरह की बातें भी वही लोग कर रहे हैं जिनको भारतीय भाषाओं के उन्नयन से परेशानी है। वो चाहते हैं कि अंग्रेजी का वर्चस्व बना रहे। आर 1 को व्यावहारिक नहीं मानने वालों का तर्क है कि अगर एक ही स्कूल में गुजराती, मराठी और कन्नड़ भाषी परिवार के बच्चे पहुंचते हैं तो वो क्या पढ़ेंगे। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा में इस बात का ध्यान रखा गया है और उनके लिए राज्य भाषा का विकल्प उपलब्ध करवाया गया है। अब समय आ गया है कि भाषा के नाम पर जो विभाजनकारी खेल खेला जा रहा है उसको रोका जाए क्योंकि उससे किसी हितधारक का लाभ नहीं है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लागू करने से हमारी शिक्षा पद्धति औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त होगी जो अकादमिक क्षेत्र के लिए अति आवश्यक है।