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Saturday, June 14, 2025

रील्स की मायावी दुनिया का धोखा


आज से करीब दो दशक पूर्व की बात है। तब मैत्रेयी पुष्पा का हिंदी साहित्य में डंका बज रहा था। एक के बाद एक चर्चित उपन्यास लिखकर उन्होंने साहित्य जगत में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज की थी। गोष्ठियों में भी उनकी मांग थी। लोग उनको सुनना चाहते थे। मैत्रेयी पुष्पा भी अपने ग्रामीण अनुभवों के आधार पर बात रखती तो महानगरीय परिवेश में रहनेवालों को नया जैसा लगता। मुझे जहां तक याद पड़ता है कि दिल्ली के हिंदी भवन में एक गोष्ठी थी। उसमें मैत्रेयी पुष्पा भी वक्ता थीं। विषय स्त्री विमर्श से जुड़ा हुआ था। मैत्रेयी के अलावा जो भी वक्ता थीं वो स्त्री विमर्श को लेकर सैद्धांतिक बातें कर रही थी। मंच से बार बार सीमोन द बोव्आर के उपन्यास सेकेंड सेक्स का नाम लिया जा रहा था। सीमोन की स्थापनाओं पर बात हो रही थी और उसको भारतीय परिदृष्य से जोड़कर बातें रखी जा रही थीं। उनमें से अधिकतर ऐसी बातें थीं जो अमूमन स्त्री विमर्श की गोष्ठियों में सुनाई पड़ती ही थीं। अब बारी मैत्रेयी के बोलने की थी। उन्होंने माइक संभाला और फिर बोलना आरंभ किया। स्त्री विमर्श पर आने के पहले उन्होंने एक ऐसी बात कही जो उस समय नितांत मौलिक और उनके स्वयं के अनुभवों पर आधारित थी। उन्होंने कहा कि जब से औरतों के हाथ में मोबाइल पहुंचा है वो बहुत सश्कत हो गई हैं। उनको एक ऐसा सहारा या साथी मिल गया जो वक्त वेवक्त उनके काम आता है, उनकी मदद करता है। गांव की महिलाएं भी घूंघट की आड़ से अपनी पीड़ा दूर बैठे अपने हितचिंतकों को या अपने रिश्तेदारों को बता सकती हैं। संकट के समय मदद मांग सकती हैं। इस संबंध में मैत्रेयी पुष्पा ने कई किस्से बताए जो उनकी भाभी से जुड़े हुए थे। मैत्रेयी पुष्पा ने अपने गंवई अंदाज में मोबाइल को स्त्री सशक्तीकरण से जोड़कर ऐसी बात कह दी जो उनके साथ मंच पर बैठी अन्य स्त्रियों ने शायद सोची भी न होगी। जब मैत्रेयी बोल रही थीं तो सभागार में जिस प्रकार की चुप्पी थी उससे ऐसा प्रतीत हो रहा था कि अधिकतर लोग उनकी इस स्थापना से सहमत हों। 

आज से दो दशक पहले मैत्रेयी पुष्पा ने जब ऐसा बोला था तब शायद ही सोचा होगा कि मोबाइल स्त्रियों और पुरुषों की दबी आकांक्षाओं के प्रदर्शन का भी कारक भी बनेगा। पिछले दिनों मित्रों के साथ स्क्रीन पर व्यतीत होनेवाले समय पर बातचीत हो रही थी। चर्चा में सभी ये बताने में लगे थे कि किन किन प्लेटफार्म पर उनका अधिक समय व्यतीत होता है। ज्यादातर मित्रों का कहना था कि इंस्टा और एक्स की रील्स देखने में समय जाता है। इस चर्चा में ही एक मित्र ने कहा कि वो जब घरेलू और अन्य महिलाओं के वीडियो देखते हैं तो आनंद दुगुना हो जाता है। जिनको डांस करना नहीं आता वो भी डांस करते हुए वीडियो डालती हैं। कई बार तो पति पत्नी के बीच के संवाद भी रील्स में नजर आते हैं। उसमें वो रितेश देशमुख और जेनेलिया की भोंडी नकल करने का प्रयास करते हैं। इस चर्चा के बीच एक बहुत मार्के की बात निकल कर आई। इंस्टा की रील्स एक ऐसा मंच बन गया है जो महिलाओं और पुरुषों के मन में दबी आकांक्षाओं को भी सामने ला रही हैं। जिन महिलाओं को चर्चित होने का शौक था, जिनको पर्दे पर आने की इच्छा थी, जिनको डांस सीखने और मंच पर अपनी कला को प्रदर्शित करने की इच्छा थी वो सारी इच्छाएं पूरी हो रही हैं। रील्स और इंस्टा के पहले इस तरह की आकांक्षाएं मन में ही दबी रही जाती थीं। उनके अंदर कुंठा पैदा करती थीं। मोबाइल और इंटरनेट की सुविधा नहीं होने से जो महिलाएं नृत्य कला का प्रदर्शन करना चाहती थीं वो कर नहीं पाती थीं। इसमें बहुत सी अधेड़ उम्र की महिलाओं को भी रील्स में देखा जा सकता है। कई तो अजीबोगरीब करतब करते हुए नजर आती हैं। लेकिन अपने मन का कर तो रही हैं। रील्स का ये एक सकारात्मक पक्ष माना जा सकता है। जैसे मोबाइल फोन ने महिलाओं को सशक्त किया उसी तरह से इंटरनेट और इंटरनेट प्लेटफार्म्स ने महिलाओं की आकांक्षाओं को पंख दिए। अब वो बगैर किसी लज्जा के, संकोच के अपने मन का कर रही हैं और समाज के सामने उसको प्रदर्शित भी कर रही हैं। 

रील्स को लेकर पहले भी इस स्तंभ में चर्चा हो चुकी है जिसमें रोग से लेकर शेयर बाजार में निवेश के टिप्स तक और धन कमाने से लेकर भाग्योदय तक के नुस्खों को केंद्र में रखा गया था। रील्स पर हो रही चर्चा में एक चिकित्सक मित्र ने एक मजेदार बात कही। उन्होंने कहा कि रील्स ने डाक्टरों का बहुत फायदा करवाया है। रील्स देखकर स्वस्थ रहने के नुस्खे अपनाने वाले लोग बढ़ते जा रहे हैं। स्वस्थ रहने के तरीकों को देखकर उनको अपनाने से बहुधा समस्या हो जा रही है। जैसे रील्स में सेंधा नमक को लेकर बहुत अच्छी-अच्छी बातें कही जाती हैं। सलाह देनेवाले सेंधा नमक को स्वास्थ्य के लिए उपयोगी बताते हैं। रील्स देखकर लोग सेंधा नमक खाने लग जाते हैं। बगैर ये सोचे समझे कि आयोडाइज्ड नमक खाने के क्या लाभ थे और छोड़ देने के क्या नुकसान। जब शरीर में सोडियम पोटाशियम का संतुलन बिगड़ता है तो चिकित्सकों के पास भागते हैं। पता चलता है कि ये असंतुलन निरंतर सेंधा नमक ही खाते रहने से हुआ। अगर आयोडाइज्ड नमक भी खाते रहते तो सभवत: ऐसा नहीं होता। स्वस्थ रहने के इसी तरह के कई नुस्खे आपको इंस्टाग्राम पर मिल जाएंगे। सभी इस तरह से बताए जाते हैं कि देखनेवालों का एक बार तो मन कर ही जाता है कि वो उसको अपना लें। इस बात का उल्लेख रील्स में नहीं होता है कि सलाह देनेवाले चिकित्सक या न्यूट्रिशनिस्ट हैं या नहीं। 

रील की दुनिया बहुत मनोरंजक है। समय बहुत सोखती है। कई बार वहां अच्छी सामग्री भी मिल जाती है लेकिन एआई के इस दौर में प्रामाणिकता को लेकर संशय मन में बना रहता है। किसी का भी वीडियो बनाकर उसमें उनकी ही आवाज पिरोकर वायरल करने का चलन भी बढ़ रहा है। ऐसे में इस आभासी दुनिया को सिर्फ और सिर्फ मनोरंजन के लिए ही उपयोग किया जाना चाहिए। मन में दबी इच्छाओं को पूर्ण करने का मंच माना या बनाया जा सकता है। इस माध्यम को गंभीरता से लेने की आवश्यकता नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि वो दिन दूर नहीं जब लोग इससे ऊबकर फिर से छपे हुए अक्षरों की ओर लौटेंगे। जिस प्रकार की प्रामाणिकता प्रकाशित शब्दों या अक्षरों की होती है वैसी इन आभासी माध्यमों में नहीं होती है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि अभी इस माध्यम का समाज पर प्रभाव पड़ रहा है। लोग कई बार यहां सुझाई या कही गई बातों को सही मानकर अपनी राय बना लेते हैं। लेकिन जैसे-जैसे देश में शिक्षितों की संख्या बढ़ेगी, लोगों की समझ बनेगी तो इसको विशुद्ध मनोरंजन के तौर पर ही देखा जाएगा सूचना के माध्यम के तौर पर नहीं। 


Saturday, September 2, 2023

पुरस्कारों में ‘सिस्टम’ का दखल


दिल्ली में आयोजित एक साहित्यिक समारोह में काफी दिनों बाद जाना हुआ। आमतौर पर साहित्यिक समारोहों के पहले और बाद में कुछ मित्र एक जगह जमा होकर साहित्यिक विषयों पर चर्चा करते हैं। उस आयोजन में कई मित्र मिल गए। शाम हो गई थी और दो घंटे के आयोजन के बाद सबको चाय की तलब हो रही थी। तय हुआ कि कहीं बैठकर चाय पी जाए। हम पांच मित्र पास की एक चाय दुकान पहुंचे। चाय बनाने को कहा गया। चाय आते ही चर्चा आरंभ हो गई। विभिन्न विधाओं में हो रहे साहित्यिक लेखन से चर्चा आरंभ हुई और फिर कब वो पुरस्कारों पर चली गई पता ही नहीं चला। कुछ ही दिनों पहले वर्ष 2023 के लिए श्रीलाल शुक्ल स्मृति इफको सम्मान की घोषणा हुई थी। इस वर्ष का सम्मान हिंदी उपन्यासकार मधु कांकरिया को देने की घोषणा हुई थी। ये पुरस्कार उर्वरक क्षेत्र की सहकारी संस्था इंडियन फारमर्स फर्टिलाइजर कोआपरेटिव (इफको) लिमिटेड की ओर से दिया जाता है। सम्मानित होनेवाले साहित्यकार को ग्यारह लाख रुपए का चेक, एक प्रतीक चिन्ह और प्रश्स्ति पत्र दिया जाता है। मधु कांकरिया को पुरस्कार की घोषणा पर चर्चा होने लगी। उनका आरंभिक उपन्यास पत्ताखोर मैंने पढ़ा था। मुझे पसंद आया था इस कारण मैंने चयन की प्रशंसा कर दी। मेरी प्रशंसा सुनकर  एक मित्र ने कहा, काश! उपन्यासों की विषयवस्तु और लेखन शैली के आधार पर पुरस्कार दिए जाते। अगर ऐसा होता तो श्रीलाल जी की स्मृति में दिया जानेवाला ये पुरस्कार चित्रा मुद्गल या मैत्रेयी पुष्पा आदि को दिया जाना चाहिए था। उसके मुताबिक ये पुरस्कार एक विचारधारा विशेष से जुड़े लेखकों को दिया जाता है। उसका इशारा वामपंथी लेखकों की ओर था। हम पांच मित्रों में से दो तो घोर और घोषइत तौर पर वामपंथी लेखक थे। उनमें से एक ने फौरन इसका प्रतिवाद किया और कहा कि चित्रा जी और मैत्रेयी जी इस पुरस्कार या सम्मान के लिए उचित पात्रता नहीं रखती हैं। बेहतर होता कि पुरस्कार के निर्णय की आलोचना करने से पहले उसके नियमों को देखा जाता। इस पुरस्कार के नियमों के अनुसार न तो चित्रा जी की पात्रता है और न ही मैत्रेयी जी की। मेरे चेहरे पर सहमति का भाव उभरा था। मैंने तो उत्साह में कह भी दिया कि प्रत्येक पुरस्कार की पात्रता की नियमावली होती है। निर्णायक मंडल उसके आधार पर ही आपस में विचार विमर्श करता है और फिर किसी एक लेखक का चयन किया जाता है।

जिस मित्र ने चित्रा जी और मैत्रेयी जी का नाम लिया था वो अपने मोबाइल में कुछ ढूंढने में व्यस्त था। अचानक उसका चेहरा चमका और वो कुछ पढने लगा- मूर्धन्य कथाशिल्पी श्रीलाल शुक्ल की स्मृति में वर्ष 2011 में शुरु किया गया यह सम्मान प्रत्येक वर्ष हिंदी के ऐसे लेखक को दिया जाता है जिसकी रचनाओं में मुख्यत: ग्रामीण और कृषि जीवन तथा विस्थापन, हाशिए का समाज और भारत के बदलते यथार्थ का चित्रण किया गया हो। उसके इतना कहते ही एक वामपंथी मित्र ने कहा कि तुमलोग हर जगह व्हाट्सएप युनिवर्सिटी का ज्ञान देने लगते हो। ये साहित्य की दुनिया है यहां व्हाट्सएप फार्वर्ड से कुछ भी न तो साबित होगा न ही स्थापित। जब वो ये तंज कर रहा था तो नियम पढनेवाला मित्र मुस्करा रहा था। इस बीच दूसरे वामपंथी मित्र ने भी अपने कामरेड की बातों से सहमति जताते हुए प्रश्न उछाला, साहित्य में भी अब व्हाट्सएप ज्ञान चलाओगे क्या। मुस्कुरा रहे मित्र ने फिर से अपने मोबाइल को देखा और विनम्रता से कहा कि आप दोनों ठीक कह रहे हैं। मैंने व्हाट्यएप पर ही आए संदेश को पढ़ा। लेकिन ये फार्वर्ड संदेश बल्कि इफको की प्रेस रिलीज है। अगर प्रेस रिलीज में सही लिखा गया है तो समकालीन रचनाकारों में मैत्रेयी पुष्पा से अधिक किसने ग्रामीण जीवन औऐर हाशिए के समाज पर लिखा है। चाक से लेकर अलमा कबूतरी जैसे उनके उफन्यासों को याद करिए। चित्रा जी ने भी हाशिए के समाज पर भी लिखा है। बदलते भारत के यथार्थ का चित्रण भी उनकी रचनाओं में है। वो निरंतर बोले जा रहा था। दोनों कामरेड असहमत थे। लेकिन उनके पास तर्क नहीं थे तो उन्होंने निर्णायक मंडल के विवेक की आड़ ली। 

बात निर्णायक मंडल के विवेक पर आ गई थी। मैंने पिछली बार की तरह ही तर्क दिया कि पुरस्कार तो निर्णायक मंडल ही तय करेगा। उसको मधु कांकरिया की रचनाएं बेहतर दिखी होंगी। मैं ये कहकर चर्चा समाप्त करना चाहता था। परंतु जिस मित्र ने रचना के आधार पर पुरस्कार की बात आरंभ की थी वो तो डटा हुआ था। उसने कहा अच्छा चलो जरा निर्णायक मंडल के नाम देख लेते हैं। उसने फिर मोबाइल में व्हाट्सएप खोला और इफको की प्रेस रिलीज से पढ़कर बताया कि निर्णायक मंडल में असगर वजाहत, अनामिका, प्रियदर्शन, रवीन्द्र त्रिपाठी, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह और उत्कर्ष शुक्ल थे। नाम सुनकर मेरे वामपंथी मित्र ने तर्क उछाला कि इतने वरिष्ठ लेखकों के निर्णायक मंडल के निर्णय पर प्रश्न कैसे खड़ा किया जा सकता है। इतना सुनते ही वो बोले कि कि जरा निर्णायक मंडल में शामिल लेखकों की विचारधारा और लेखक संगठनों से जुड़ाव देख लो। असगर वजाहत और मुरली मनोहर प्रसाद सिंह तो जनवादी लेखक संघ से सक्रिय रूप से संबद्ध हैं। अनामिका को छोड़कर जो दो लोग हैं उनका रुझान भी वामपंथ की ओर है जो साहित्य जगत में ज्ञात है। युवा लेखक की मैं नहीं जानता। इतना सुनते ही दोनों वामपंथी मित्र भड़क गए। कहने लगे कि लेखक संगठनों से जुड़े होने का क्या मतलब है। सरकारी पुरस्कारों पर टिप्पणी करने लगे कि सरकार भी तो अपने लोगों को पुरस्कृत करती है। अपनी विचारधारा के लोगों को सम्मानित करती है आदि आदि। 

हम चारों मित्र इस चर्चा में शामिल थे। हमारा पांचवां मित्र चुपचाप चाय पी रहा था और मुस्कुरा रहा था। जैसे बातचीत का आनंद ले रहा हो। अचानक वो पुरस्कारों पर सवाल उठानेवाले मित्र को देखकर बोला कि भाई, तुमको द कश्मीर फाइल्स फिल्म का वो संवाद याद करना चाहिए जिसमें कहा गया है कि सरकार भले बदल गई हो लेकिन सिस्टम तो हमारा ही चलता है। वही सिस्टम चल रहा है। सिस्टम के पसंदीदा लोग पुरस्कृत हो रहे हैं। देखा नहीं कुछ दिनों पहले भारत सरकार ने केंद्रीय हिंदी निदेशालय, दिल्ली और केंद्रीय हिंदी संस्थान के सभी पुरस्कार बंद कर दिए। उधर वित्त मंत्रालय के अधीन आनेवाले बैंक आफ बड़ौदा ने 61 लाख रुपए के पुरस्कार बांट दिए। उसकी निर्णायक समिति देख लो। अध्यक्षता बुकर पुरस्कार विजेता गीतांजलिश्री ने की और उसमें अरुण कमल, पुष्पेश पंत, अनामिका आदि थे। इनमें से अधिकांश की विचारधारा ज्ञात है। गीतांजलिश्री राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की मुखर आलोचक हैं, सरकार की भी। अरुण कमल लंबे समय तक प्रगतिशील लेखक संघ में रहे। इन सबने 25 लाख के प्रथम पुरस्कार के लिए उर्दू उपन्यास अल्लाह मियां का कारखाना को चुना। अब दोनों वामपंथी मित्र ढीले पड़ने लगे थे। मैंने सोचा कि बात बदली जाए। मैंने फिल्म की चर्चा आरंभ करने का प्रयास किया। लेकिन पाचवें मित्र रुके नहीं। कहने लगे कि चुनाव वर्ष में सरकार ने अपने अधिकतर साहित्यिक और भाषाई पुरस्कार बंद कर दिए लेकिन सिस्टम वाले पुरस्कार दे रहे हैं। इफको का पुरस्कार भले ही सरकारी नहीं हो लेकिन बैंक आफ बड़ौदा का पुरस्कार तो पूरी तरह से सरकारी है। इफको भी भारत सरकार के सहकारिता मंत्रालय से किसी न किसी तरह से तो जुड़ा ही है। पता नहीं क्यों सरकार ‘सिस्टम’ को खुलकर खेलने का अवसर प्रदान कर रही है। बात राजनीति की ओर मुड़ते देख मैंने चाय पर चर्चा खत्म करवाई। घर लौटते समय पांचवें मित्र की बात दिमाग में कुलबुला रही थी। 


Saturday, November 20, 2021

श्रद्धांजलि के बहाने विवाद को हवा


हाल ही में हिंदी की उपन्यासकार और कहानीकार मन्नू भंडारी का निधन हुआ। कुछ लेखिकाओं ने मन्नू भंडारी को श्रद्धांजलि देने के लिए आयोजित किए जानेवाले कार्यक्रमों में मन्नू जी के अवदानों पर चर्चा न करके उसको अपनी भड़ास निकालने का मंच बना दिया। जमकर व्यक्तिगत खुन्नस निकाले गए। इस तरह की बातें की गईं जो न होतीं तो साहित्य की गरिमा बनी रहती। इंटरनेट मीडिया के अराजक मंच फेसबुक पर भी पक्ष विपक्ष में टिप्पणियां देखने को मिलीं। कई बुजुर्ग लेखिकाओं ने मन्नू भंडारी के निधन के बाद चर्चित लेखिका मैत्रेयी पुष्पा को निशाने पर लिया और परोक्ष रूप से उनको मन्नू जी से विश्वासघात का आरोप तक लगा दिया। आरोप की शक्ल में पेश की गई बातों से ये लग रहा था कि जैसे मैत्रेयी पुष्पा ने राजेन्द्र यादव को बरगला दिया था, जिससे मन्नू भंडारी को बेहद मानसिक पीड़ा हुई थी। आरोपों  को इस तरह से पेश किया गया कि सारी गलती सिर्फ मैत्रेयी पुष्पा की थी और राजेन्द्र यादव बेचारे बहुत ही मासूम थे। उनकी कोई गलती थी ही नहीं, वो तो भटक गए थे। यह सही है कि राजेन्द्र यादव ने मैत्रेयी पुष्पा को अवसर दिया लेकिन अगर मैत्रेयी में प्रतिभा नहीं होती तो क्या वो इतने लंबे समय तक साहित्य में टिकी रह सकती थीं। राजेन्द्र यादव ने दर्जनों प्रतिभाहीन लेखिकाओं को मैत्रेयी पुष्पा से अधिक अवसर अपनी साहित्यिक पत्रिका हंस में दिए। उनकी पुस्तकों पर प्रायोजित समीक्षाएं भी प्रकाशित की लेकिन आज उनमें से कोई भी लेखिका मैत्रेयी जैसी ऊंचाई पर नहीं पहुंच पाईं। दरअसल जब कोई महिला सफल होती है और वो पुरुषों के साथ काम करती है तो उसको इस तरह के अपमान का विष पीना पड़ता है। मैत्रेयी पुष्पा ने देर से लिखना आरंभ किया लेकिन उनके कई उपन्यास इतने सधे हुए हैं कि वो साहित्याकाश पर छा गईं। उस वक्त भी मैत्रेयी पुष्पा पर तमाम तरह के लांछन लगे थे। राजेन्द्र यादव की भी आलोचना हुई थी लेकिन इतने सालों के बाद अब जब मन्नू भंडारी नहीं रहीं तो उन बातों को एक बार फिर से उभार कर बुजुर्ग लेखिकाएं क्या हासिल करना चाहती हैं, पता नहीं।  मत्रैयी पुष्पा ने अपनी सफाई में कई बातें कहीं जो वो पहले भी अपनी आत्मकथा या राजेन्द्र यादव पर लिखी अपनी पुस्तक में कह चुकी हैं। काफी कुछ मन्नू भंडारी ने अपनी आत्मकथा में भी लिख दिया है। लेकिन फिर से वातावरण कुछ ऐसा बना कि लगा कि ये लेखिकाएं कुछ नया रहस्योद्घाटन कर रही हैं। 

मन्नू भंडारी और राजेन्द्र यादव पति पत्नी थे लेकिन इनके संबंध सहज नहीं थे, ये बात ज्ञात है। इन दोनों ने समय समय पर अपने साक्षात्कारों में इस तरह की बातें भी की थीं जिसको लेकर हिंदी जगत इनके संबधों के बारे में परिचित है। इन दोनों से रचनात्मक लेखन का सिरा काफी पहले छूट गया था। वर्षों बाद जब मन्नू भंडारी ने अपनी आत्मकथा लिखी तो हिंदी के आलोचकों को उसमें साहस का आभाव दिखा। मन्नू भंडारी अपनी आत्मकथा में राजेन्द्र यादव से आब्सेस्ड दिखती हैं। आज मन्नू भंडारी के निधन के बाद ऐसी बातें हो रही हैं जिनको सुनकर 2009 का साहित्यिक परिदृश्य सहसा याद आ जाता है। इस वर्ष राजेन्द्र यादव और मन्नू भंडारी ने अपनी शादी को लेकर या अपने दांपत्य जीवन को लेकर एक साहित्यिक पत्रिका में कई ऐसी बातें कहीं थीं जिसने हिंदी साहित्य जगत को शर्मसार किया था। जहां तक मुझे याद पड़ता है कि 2009 में साहित्यिक पत्रिका कथादेश के मार्च अंक में मन्नू भंडारी ने एक लंबा लेख लिखा था। उस लेख में मन्नू जी ने स्पष्ट तौर पर कहा था कि सच का सामना करने का साहस हो तभी साक्षात्कार दें। परोक्ष रूप से वो  ये नसीहत राजेन्द्र यादव को दे रही थीं। इस पूरे लेख में मन्नू भंडारी ने ये साबित करने की कोशिश की थी कि राजेन्द्र यादव ने उनकी शादी के विषय में जो गलत बातें की उसको वो ठीक कर रही हैं। यहां यह बताना आवश्यक है कि कथादेश के 2009 के जनवरी अंक में राजेन्द्र यादव का एक लंबा साक्षात्कार प्रकाशित हुआ था जिसमें उन्होंने अपनी और मन्नू भंडारी की शादी की परिस्थितियों का उल्लेख किया था। राजेन्द्र यादव के उस साक्षात्कार के उत्तर में मन्नू भंडारी ने लेख लिखा था और किन परिस्थितियों में दोनों की शादी हुई थी इसको अपने हिसाब से हिंदी साहित्य जगत के सामने रखा था। अपने उस लेख में मन्नू भंडारी राजेन्द्र यादव से सच कहने की अपेक्षा करती हैं लेकिन जब उकी बारी आती है तो वो खुद राजेन्द्र यादव की प्रेमिका मीता का असली नाम बताने से कन्नी काट लेती हैं। मन्नू भंडारी ने अपनी आत्मकथा में उन स्थितियों का भी उल्लेख नहीं किया जिसकी वजह से उन्होंने राजेन्द्र यादव को घर से निकाला था। उसका नाम लेने से भी परहेज कर गईं जिसकी वजह से उन्होंने राजेन्द्र यादव को घर से निकाला था। दोनों ने अपने जीवन काल में जमकर एक दूसरे के बारे में जितना बताया उससे अधिक छिपाया भी। आज से बारह-तेरह वर्षों पहले तक यादव-भंडारी दंपति के बारे में हिंदी की साहित्यिक पत्रिकाओं में जमकर लिखा जाता था। उस दौर में तो यहां तक चर्चा होती थी कि दोनों कुछ लिख नहीं पा रहे हैं तो अपने दांपत्य के विवादित स्वर को उभार कर चर्चा में बने रहते हैं। लेकिन समय के साथ इस तरह की बातें कम होने लगीं। कालांतर में राजेन्द्र यादव का निधन हो गया और मन्नू भंडारी बीमार रहने लगीं तो इस लेखक दंपति के बीच के विवाद को साहित्य जगत लगभग भूल चुका था। 

मन्नू भंडारी के बहाने हिंदी की चंद बुजुर्ग लेखिका जिस तरह की बातें कर रही हैं उससे तो स्त्री विमर्श के उनके प्रतिपादित सिद्धांतों पर भी प्रश्न खड़े हो रहे हैं। उनके तर्क हैं कि राजेन्द्र यादव ने किसी अन्य स्त्री के चक्कर में मन्नू भंडारी की उपेक्षा की। यहां तक तो इन बुजुर्ग लेखिकाओं के स्त्री विमर्श पर आंच नहीं आती है लेकिन जब एक ऐसे पुरुष से साथ और संबल की अपेक्षा की जाती है जो वफादार नहीं होता है तो फिर प्रश्न तो उठेंगे। क्या स्त्री मुक्ति और स्त्री चेतना की बातें सिर्फ किस्से कहानियों में ही ठीक लगते हैं। क्या सिर्फ कहानियों के पात्र ही क्रांतिकारी फैसले ले सकती हैं क्या सिर्फ कहानियों की शादीशुदा नायिकाएं ही अपने दांपत्य से त्रस्त आकर विकल्प की ओर बढ़ती हैं। अगर इस तरह की बातें सिर्फ किस्से कहानियों तक सीमित हैं तो फिर स्त्री विमर्श की बातें खोखली हैं। दूसरी बात ये कि हमारे यहां मृत व्यक्ति को लेकर स्तरहीन बातें कहने की परंपरा नहीं रही है।व्यक्ति की मृत्यु के बाद तुरंत उसकी आलोचना या उसके संबंधों के बहाने से उसको विवादित करने को हमारे समाज में अच्छा नहीं माना जाता है। लेकिन मन्नू भंडारी की तथाकथित मित्रों ने उनके निधन के तुरंत बाद उनके और राजेन्द्र यादव के बीच के तनावपूर्ण संबंध की बात उठाकर इस परंपरा का ना सिर्फ निषेध किया बल्कि नए लेखकों के सामने एक खराब उदाहरण प्रस्तुत किया। बेहतर होता कि ये बुजुर्ग लेखिकाएं मन्नू भंडारी के साहित्यिक योगदान या अवदान पर चर्चा करतीं। उनकी रचनाओं के बारे में नई पीढ़ी को अवगत करवाती या फिर उसको नए सिरे से व्याख्यायित करने का उपक्रम करतीं। विवादित प्रसंगों की बजाय अगर उनकी संयुक्त कृति एक इंच मुस्कान के लिखे जाने की प्रक्रिया पर चर्चा होती तो उनकी प्रयोगधर्मिता का पता चलता। ये भी पता चलता कि दो अलग अलग व्यक्ति कैसे इतना प्रवाहपूर्ण उपन्यास लिख पाए। काश! ऐसा हो पाता। 


Thursday, May 30, 2019

ये वो दिल्ली तो नहीं...


मैत्रेयी पुष्पा हिंदी की वरिष्ठ और चर्चित उपन्यासकार हैं। इनकी कहानियों पर टेलीफिल्मों का भी निर्माण हो चुका है। ये दिल्ली की हिंदी अकादमी की उपाध्यक्ष रह चुकी हैं। इनको सार्क लिटरेरी अवॉर्ड समेत कई प्रतिष्ठित पुरस्कार मिल चुके हैं। वो आज से पांच दशख पहले दिल्ली आई थीं, उनसे उनकी यादों के बारे में मैंने बातचीत की। 

मैं आज से करीब 51 साल पहले ग्वालियर से दिल्ली आई। मेरे पति डॉ आर सी शर्मा को आल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एम्स) में नौकरी मिली थी। कुछ दिनों तक एम्स के हॉस्टल में रहे, फिर साउथ एक्स में किराए के घर में रहे। जल्द ही एम्स के वेस्टर्न कैंपस में हमें घर मिल गया। उस वक्त सरकारी आवास के लिए इतनी लंबी लाइऩ नहीं होती थी बल्कि घरों की ही लाइऩ होती थी कि कोई भी पसंद कर लो। एम्स के वेस्टर्न कैंपस और एम्स के मुख्य इमारत के बीच की जो सड़क थी वो एकदम सूनी रहती थी। उस वक्त दिल्ली में सड़कों में एकदम भीड़-भाड़ नहीं होती थी। कभी अखबारों में पढ़ते कि उस वक्त के कलकत्ता या बंबई में जाम लग गया तो हम चर्चा किया करते थे कि पता नहीं जाम कैसा होता है और वो कैसे लगता है। एक और दिलचस्प किस्सा बताती हूं। एक दिन हम अपने बच्चों के साथ अपनी गाड़ी से कहीं जा रहे थे। डॉक्टर साब गाड़ी चला रहे थे और मेरी बेटी मोहिता उनके साथ बैठी थी। हमलोग पीछे की सीट पर थे। कार का अगला दरवाजा खुला रह गया और मोहिता चलती कार से नीचे गिर गई। लेकिन सड़क पर ट्रैफिक नहीं होने की वजह से कोई दुर्घटना नहीं हुई। अब इस तरह की बात सोची भी नहीं जा सकती है। उस वक्त दिल्ली की सड़कों पर दो ही गाड़ियां दिखती थीं अंबेसडर और फिएट।
तब दिल्ली में जगह ही जगह हुआ करती थी। फ्लैट सिस्टम आया नहीं था। क्वाटर होते थे ज्यादातर, दो मंजिले। पहले मुनरिका इलाके में फ्लैट बने जिसकी कीमत 45000 रु थी, उसके बाद सफदरजंग इलाके में फ्लैट बने जो 52000 के थे। तब मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए ये फ्लैट महंगे थे।
दिल्ली में हम साथी डॉक्टरों के परिवारों के साथ जमकर पिकनिक करते थे। घर से खाना बनाकर कभी बुद्धा गार्डन या लोदी गार्डन तो कभी चिड़ियाघर तो कभी कुतुबमीनार। उस वक्त एम्स के अंदर एकदम गांव जैसा अपनापन था। घूमने के लिए चांदनी चौक जाते थे। स्कूटर पर बैठते थे और तुरंत पहुंच जाते थे क्योंकि ट्रैफिक होता नहीं था। हां, करोलबाग मार्केट और सरोजनीनगर बाजार में अपेक्षाकृत भीड़ हुआ करती थी इस वजह से हम इन बाजारों में लगभग नहीं जाते थे। अपने पड़ोसियों के साथ खूब घूमते फिरते थे। हमारे आपसी संबंध बहुत अच्छे थे। मेरी पड़ोसी पीएचडी कर रही थीं तो मैं उनके पति के लिए खाना बना देती थी। एम्स में इफ्तार की दावतें खूब हुआ करती थीं, कभी हमारे घर तो कभी डॉ गुप्ता के घर तो कभी डॉ शर्मा के घर तो कभी इल्माना के घर। पिकनिक से लेकर दावतों के लिए हम सब साउथ एक्सटेंशन मार्केट में शॉपिंग किया करते थे। इतने सालों से नोएडा में रहने के बाद अब भी खरीदारी के लिए हम साउथ एक्सटेंशन ही जाते हैं। उस वक्त हमारे मनोरंजन का एक और साधन होता था फिल्में देखना। गौतम नगर में सुदर्शन नाम का एक सिनेमा हॉल था। हमारे घर के पास था लेकिन पुराना होने की वजह से हम उसमें कम ही फिल्में देखते थे। मुझे याद है कि हमने ब्रह्मचारी फिल्म सुदर्शन सिनेमा हॉल में ही देखी थी। उस वक्त सफदरजंग में कमल सिनेमा बना ही था। वहां हम ज्यादा जाया करते थे। अच्छी फिल्म देखने तो दरियागंज के गोलचा सिनेमा तक पहुंच जाते थे। चिड़ियाघर के पास एक सिनेमा हॉल हुआ करता था वहां भी हम गाहे बगाहे फिल्म देखने चले जाते थे। मुझे याद है कि फिल्म अनोखी रात हमने वहीं देखी थी।
दिल्ली में जब हम आए थे तो तब बहुत सुकून था, हमने 1971 युद्ध भी देखा, 1975 की इमरजेंसी भी देखी और 1984 में सिख विरोधी दंगे भी देखे, मंडल कमीशन के लागू होने के बाद की हिंसा भी देखी । पर दो प्रसंग अब भी कचोटते हैं। एक तो 1971 के युद्ध के समय जब एम्स में दो मुस्लिम डॉक्टरों को निगरानी की जिम्मेदारी नहीं दी गई थी। हम कई दिनों तक उन दोनों का सामना नहीं कर पाते थे। दूसरी 1984 में। मेरी झांसी की एक दोस्त थी वो सिख थी। हम साथ ही रहते थे लेकिन जब सिख विरोधी दंगा हुआ तो वो हमपर विश्वास नहीं कर पाई और कहीं और रहने चली गईं। बाद में उसने कहा भी कि भरोसा नहीं था। अब इतने सालों बाद जब पलटकर देखती हूं तो लगता है कि ये वो दिल्ली तो नहीं।
(अनंत विजय से बातचीत पर आधारित)   

Saturday, October 6, 2018

विवाद से उठते बड़े सवाल


हिंदी साहित्य को लेकर फेसबुक पर बहुधा ऐसे विवाद उठते रहते हैं जिनका लक्ष्य किसी लेखक को नीचा दिखाना होता है। फेसबुकिया विवादों से साहित्यिक सवाल कम ही उठते रहे हैं। हिंदी साहित्य में वाद-विवाद का इतिहास काफी पुराना है। अगर हम विवादों के इतिहास पर नजर डालें तो पहले के विवादों और अब के विवादों में जमीन आसमान का अंतर नजर आता है। पहले रचनात्मक बहसें हुआ करती थीं। किसी खास रचना को लेकर, किसी स्थापना को लेकर विवाद हुआ करता था।  हिंदी में स्वस्थ साहित्यिक विवादों की परंपरा रही है, हलांकि उन्नीस सौ नब्बे के बाद के दौर को याद करें तो यह पाते हैं कि उस दौर में साहित्यिक विवादों का स्तर गिरने लगा था और साहित्यिक सवाल गौण होने लगे थे। व्यक्तिगत आरोप प्रत्यारोप प्रमुख होते चले गए। उस वक्त जो प्रमुख विवाद उठे उसमें कवि उपेन्द्र कुमार की कहानी झूठ का मूठ को लेकर उठा विवाद था। उसी दौर में पहल पत्रिका के संपादक ज्ञानरंजन ने एक पुस्तिका छापी थी उसको लेकर भी खूब विवाद हुआ था। पहल पर लगे आरोपों पर ज्ञानरंजन ने जो सफाई दी थी उसकी भाषा देखिए, प्रोफेसर कॉलोनी भोपाल में शराब पीकर एक रमणी के घर के पास कार भिड़ा देने की खबरें भी अखबारों में हैं, पर हमको इसको पीली पत्रकारिता का हिस्सा मानते हैं।...एक कुलपति अपार राशि सालों तक केवल पत्रिकाएं निकालने, गोष्ठियां करने, अपना व्याख्यान जगह जगह करवाने, स्वागत करने में खरच् करता रहा। अपनी साहित्यिक हवस को पूरा करने में लगाता रहा। अपने कुनबे के लोगों को यहां वहां विभिन्न प्रकार के लाभ देने में लगाता रहा, वह अपने क़लम में सार्वजनिक कोषों का प्रगतिशील वामपंथी संगठनों या पत्रिकाओं द्वारा उपयोग की बात लिखते शरमाता भी नहीं। स्पष्ट है कि ये टिप्पणी अशोक वाजपेयी पर थी। जो अगले हिस्से में ज्ञानरंजन ने स्पष्ट भी कर दिया था। उसके बाद उन्होंने राजेन्द्र यादव पर मुलायम सिंह यादव से विज्ञापन और लालू यादव से पुरस्कार लेने की बात को रेखांकित किया था। लब्बोलुआब ज्ञानरंजन ये कहना चाहते थे कि यादव होने का फायदा राजेन्द्र जी ने बखूबी उठाया। ज्ञानरंजन ने उस वक्त प्रभाष जोशी पर भा हमला बोला था। उन्होंने लिखा था कि प्रभाष जोशी वही हिंदू हैं जिन्होंने देवराला सती कांड का प्रबल समर्थन करनेवाला संपादकीय लिखा था। जिन्होंने सती कांड को महिमामंडित किया और कभी उसको रिग्रेट नहीं किया। थकान और वृद्धत्व की वजह से ये लोग इस सचाई को शायद भूल गए। इसका विरोध लगभग एक सैकड़ा लेखकों ने किया, इसकी निंदा भी की थी। यह एक सर्वविदित तथ्य है कि प्रभाष जोशी आर एस एस हेडक्वार्टर महाल नागपुर के सर्वाधिक प्रिय व्यक्ति थे और वहां दिन रात उनके लिए दरवाजे खुले रहते थे। वहां प्रभाष जोशी की सत्ता थी। लेकिन राज्यसभा में जाने में मदद न करने की वजह से वे आखिरकार नाराज हुए, दूर हुए। रातोरात कोई परिवर्तन नहीं हो गया। मित्रों आपको शायद पता कि प्रभाष जी ही हरिशंकर परसाईं के घोर विरोधी थे। ज्ञानरंजन यहीं नहीं रुके थे उन्होंने नामवर जी पर भी हमला बोला था सारे प्रघानमंत्रियों से मैत्री के बावजूद वे न तो दूतावासों में जा सके, न राज्यपाल बन सके, न राज्यसभा में प्रवेश पा सके। साहित्य अकादमी अलग निकल गई। अब नोचे जाने के लिए हमलोग बचे हैं। अंत में उनकी टिप्पणी थी नामवर जी का ठंडा कसाईपन, मुद्रा राक्षस की कालिखी उमंग और राजेन्द्र यादव की जो हमसे टकराएगा चूर चूर हो जाएगा वाली धमकी हमारे लिए संघर्ष की नई राह खोलती है। इस तरह के शब्दों में व्यक्तिगत हमले शुरू हो गए थे। बकायदा पुस्तिका छाप कर क्योंकि तब फेसबुक जमाना नहीं था।
ये वही दौर था जब राजेन्द्र यादव के लेख होना/सोना एक खूबसूरत दुश्मन के साथ को लेकर भी साहित्य जगत में जमकर वाद विवाद हुए थे। यहां यह बताना जरूरी है कि जब साहित्य अकादमी के चुनाव में महाश्वेता देवी और गोपीचंद नारंग के बीच मुकाबला हुआ था तो उस वक्त हिंदी जगत ने एक बेहद अप्रिय विवाद देखा था। गोपीचंद नारंग पर जिस तरह के आरोप लगाए गए थे वो बेहद घटिया थे। कहा गया था कि अगर नारंग अध्यक्ष बन गए तो साहित्य अकादमी संस्कार भारती की सैटेलाइट बन जाएगी। उस वक्त अपने सारे मतभेदों को भुलाकर नामवर सिंह, अशोक वाजपेयी और राजेन्द्र यादव एक हो गए थे। गोपीचंद नारंग के खिलाफ साहित्यिक महागठबंधन बना था। महागठबंधन बना तो जरूर था लेकिन उसका फायदा महाश्वेता देवी को नहीं हो सका था और नारंग पर तमाम घटिया आरोपों के बावजूद उनकी जीत हुई थी और साहित्यिक महागठबंधन हार गया था।  इस तरह के कई विवादास्पद किस्से हैं। और अभी हाल मे जिस तरह से विश्वनाथ त्रिपाठी प्रकरण में साहित्यिक गरिमा तार तार हुई वो सबसे सामने है।
ताजा विवाद उठा हिंदी की वरिठ लेखिका उषाकिरण खान की एक टिप्पणी से जो उन्होंने उपन्यासकार रजनी गुप्त के हाल में प्रकाशित उपन्यास किशोरी बिन्नू का ब्लर्ब लगा कर लिखी। ऊषा किरण खान ने लिखा- मैत्रेयी पुष्पा जी ने सच कहा कि किशोरी बिन्नू बुंदेलखंड के हर गाँव में मिलेगी। मैं कहती हूँ भारत के सभी गांव में रहती है ऐसी स्त्री। यहां तक तो सब सामान्य था लेकिन इस पोस्ट पर मैत्रेयी की टिप्पणी से विवाद की ज्वाला भड़क गई। मैत्रेयी ने लिखा- किशोरी बिन्नू नामक रजनी गुप्त के उपन्यास का फ्लैप मैंने नहीं लिखा है। यह इस उपन्यास की लेखिका की धोखाधड़ी है। मेरे नाम का इस्तेमाल करना कानूनन अपराध है। ऐसी लेखिकाएं ही आज के लेखन को संदेहास्पद बनाती हैं। मैत्रेयी पुष्पा की इस टिप्पणी पर रजनी गुप्त ने सफाई दते हुए मैत्रेयी को संबोधित टिप्पणी की। उसमें लिखा- यह उपन्यास किशोरी का आसमां के नाम से पहले छपा था जिसकी भूमिका आपने ही लिखी थी। रजनी गुप्त ने फिर कई टिप्पणियां की जिसमें वो लगातार ये जताने की कोशिश करती रही कि ये वही पुराना उपन्यास है सिर्फ शीर्षक बदला है। कुछ बचकानी दलीलें भी दीं कि ये दूसरा संस्करण है, सिर्फ शीर्षक ही तो बदला है। जब उनपर ये आरोप लगा कि ये पाठकों के साथ छल है तो उन्होंने कहा कि नए उपन्यास में पहले पृष्ठ पर ये साफ तौर पर लिखा है कि ये उपन्यास पहले फलां नाम से छप चुका है। विवाद इतना बढ़ा कि मैत्रेयी पुष्पा ने लिखा कि रजनी गुप्त झूठ और धोखेबाजी की मास्टर हैं। फिर क्या था अन्य लोग भी इसमें कूद पड़े । कुछ रजनी के पक्ष में मैत्रेयी को कोसने लगे तो कुछ ने रजनी को नसीहत दी कि आपको मैत्रेयी को बताना चाहिए थे। मारने पीटने तक की अमर्यादित बातें हुईं। कुछ लोगों ने मजे लिए तो कुछ ने गंभीरता से सवाल उठाए। इस पूरे प्रकरण में सबसे अच्छी भूमिका प्रकाशक की रही, प्रकाशन ने फौरन खेद प्रकट किया, मैत्रेयी जी से माफी मांगी और फ्लैप को बाजर से वापस लेने का एलान कर दिया।
इस पूरे प्रकरण को देखने समझने के बाद मेरे मन में कुछ सवाल उठ रहे हैं। पहली बात तो ये कि जो उपन्यास एक दशक पहले किसी अन्य प्रकाशन से छपा हो उसको नए प्रकाशक से दूसरे नाम से छपवाने का औचित्य क्या है। अगर छपवाना ही था तो नाम क्यों बदला गया? नाम बदला गया तो पुराने फ्लैप लेखक को सूचित क्यों नहीं किया गया। नए उपन्यास किशोरी बिन्नू में फ्लैप पर जो छपा है उसको देखने पर लगता है कि पूर्व में लिखे से छेड़छाड़ की गई। नए फ्लैप में लिखा है साहित्य जगत में लेखिका का नाम नया नहीं है, लेकिन प्रस्तुत उपन्यास का तेवर नया है, जिसका नाम है किशोरी बिन्नू। अब सवाल यही है कि अगर मैत्रेयी ने किशोरी का आसमां का फ्लैप लिखा था तो उसमें जाहिर सी बात है किशोरी का आसमां लिखा होगा, वो यहां वो किशोरी बिन्नू कैसे हो गया। इस बात का उत्तर तो रजनी गुप्त को देना चाहिए। अगर उन्होंने इसको बदला है तो इस बात की सूचना मैत्रेयी पुष्पा को दिया जाना चाहिए था। जो कि इस केस में नहीं हुआ प्रतीत होता है। यह क्या है इसको परिभाषित करने की आवश्यकता नहीं है। दरअसल हिंदी में प्रोफेशनलिज्म का घोर अभाव है और कोई किसी का नाम कहीं भी इस्तेमाल करते वक्त ये भूल जाता है कि आने वाले दिनों में ये समस्या हो सकती है। इस समस्या से जो विवाद उठता है वो इतना विद्रूप होता है जो साहित्य जगत को शर्मिंदा करने के लिए काफी होता है। इस पूरे प्रकरण में भी यही हुआ। झूठ, फरेब, मक्कारी से लेकर बीहड़ में ले जाकर मारने पीटने जैसे शब्दों का इस्तेमाल हुआ, शर्मसार तो हिंदी साहित्य ही हुआ। पता नहीं कब हिंदी में प्रोफेशनलिज्म आ पाएगा?


Saturday, September 22, 2018

मृत्यु पर मौन क्यों ‘सरकार’ ?


दिल्ली की हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष और हिंदी के वामपंथी कवि-आलोचक विष्णु खरे का निधन हो गया। विष्णु खरे को चंद महीने पहले ही केजरीवाल सरकार ने, मैत्रेयी पुष्पा के कार्यकाल खत्म होने के बाद, हिंदी अकादमी का उपाध्यक्ष नियुक्त किया था। उनके निधन के बाद दिल्ली  के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने शोक जताते हुए कोई ट्वीट नहीं किया जबकि मुख्यमंत्री हिंदी अकादमी का अध्यक्ष भी होता हैं। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की जगह उनके उप ने ट्वीट कर विष्णु खरे के निधन पर शोक जताया। मनीष सिसोदिया ने ट्वीट किया हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष, साहित्य पत्रकारिता जगत की बड़ी हस्ती और हम सबके प्रेरणास्त्रोत श्री विष्णु खरे जी का देहावसान हो गया है। उनके निधन से साहित्य जगत को अपूरणीय क्षति हुई है। परमपिता परमात्मा उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें। इस दुखद क्षण में हम सब उनके परिवार के साथ हैं। अरविंद केजरीवाल के ट्वीट नहीं करने पर सोशल मीडिया पर सवाल खडे होने लगे हैं। किसी को ये संवेदनहीनता नजर आ रही है तो कोई ये कह रहा है कि अरविंद केजरीवाल ने मनीष सिसोदिया के दबाव में विष्णु खरे को अकादमी का उपाध्यक्ष बनाया था लिहाजा वो शुरू से खरे साहब को लेकर उदासीन थे। वजह चाहे जो हो पर एक संस्थान के उपाध्यक्ष के निधन पर उसी संस्थान के अध्यक्ष का सार्वजनिक रूप से शोक प्रकट नहीं करना खेदजनक और असंवेदनशील है। हिंदी अकादमी को नजदीक से जानने वाले लोग इसकी एक अलग ही वजह बताते हैं। दिल्ली के साहित्यिक हलके में इस बात की चर्चा है कि अरविंद केजरीवाल चाहते थे कि मैत्रेयी पुष्पा को एक और कार्यकाल मिले, आम आदमी पार्टी के नेता दिलीप पांडे भी इसी मत के थे लेकिन मनीष सिसोदिया, मैत्रेयी जी की जगह पर किसी और को लाना चाहते थे। मनीष सिसोदिया ने इसके लिए अपने एक पत्रकार मित्र की सलाह पर विष्णु खरे का नाम आगे बढाया और फिर उसको अनुमोदन भी करवा लिया। जब विष्णु खरे जी को दिल्ली की हिंदी अकादमी का उपाध्यक्ष बनाया गया था तब भी ये सवाल उठा था कि दिल्ली-एनसीआर के लेखक को छोड़कर विष्णु खरे जी को मुंबई से क्यों लाया गया। लेकिन सरकार के अपने फैसले होते हैं जिनकी आलोचना समय के साथ दबती चली जाती है।  अब खरे साहब के निधन के बाद तो ये बातें बिल्कुल ही अर्थहीन हो गई हैं।  अब केजरीवाल के पक्ष के लोग इस बात को लेकर शोरगुल कर रहे हैं कि साहित्य और राजनीति को अलग रखा जाना चाहिए। मुझे इस संदर्भ में साहित्य और राजनीति के संबंधों पर लिखा विजयदेव नारायण साही का एक लेख याद आ रहा है। अपने उस लेख में विजयदेव नारायण साही ने उस वक्त कहा था जिस तरह से आज राजनीति से साहित्य को अलग रखने का नारा लगानेवाले मध्यवर्गीय कलाकार प्रतिक्रियावादी हैं, उसी तरह से राजनीति की तानाशाही में कैद करके समस्त साहित्य को पार्टी का अस्त्र मात्र घोषित करनेवाले कला के दुश्मन हैं। साहित्य और राजनीति का इस तरह से घालमेल किया गया कि वो अलग हो ही नहीं सकती, कम से कम जबतक साहित्य पर मार्क्सवाद का प्रभाव है। यह मैं इस वजह से कह रहा हूं क्योंकि लेनिन के प्रसिद्ध लेख पार्टी साहित्य और पार्टी संगठन का असर भारत के लेखकों, खासतौर पर हिंदी के लेखकों पर बड़ा गहरा पड़ा था। लेनिन के उस लेख में कहा गया था कि साहित्य को सर्वहारा के साझा उद्देश्य का अंग होना चाहिए और उसे पार्टी यंत्र का दांता और पेंच बन जाना चाहिए। लेनिन के उस लेख की व्याख्या इस तरह के की गई जिसमें प्रतिबद्धता को पार्टी की सदस्यता से जोड़ दिया गया। सालों तक इस प्रतिबद्धता को कायम रखा गया, कमोबेश अब भी है। तो जब हम साहित्य को राजनीति से अलग रखने की बात करते हैं तो वो सुविधा के हिसाब से इस्तेमाल करनेवाली बात लगती है। साहित्य और राजनीति का हमारे समाज में गहरा संबंध रहा है। लेकिन राजनीतिज्ञों में साहित्य या साहित्यकारों को लेकर जिस तरह की उदासीनता इस वक्त है वैसा पहले कभी देखने को नहीं मिला है। राजनीति को साहित्य के प्रति संवेदनशील होने की जरूरत है। किसी वरिष्ठ लेखक की मृत्यु पर सरकार का मौन सवालों के घेरे में है।  
सिर्फ राजनीति और राजनेता ही संवेदनहीन हुए हों ऐसा नहीं है। विष्णु खरे जी जब जिंदगी की जंग लड़ रहे थे, तो हिंदी अकादमी में उनकी पूर्ववर्ती उपाध्यक्ष मैत्रेयी पुष्पा की एक टिप्पणी भी विवादास्पद हो गई है। मैत्रेयी पुष्पा ने पहले अपनी वॉल पर युवा कवि शायक आलोक का एक पत्र लगाया जो कि उऩको ही संबोधित था। पत्र में लिखा था आभारी हूं कि हम दिल्ली में बसे कुछ युवा जो संघर्षरत हैं, और साहित्यिक वैचारिक रचनात्मकता से जुड़े हैं, उन्हें आपने समय समय पर हिन्दी अकादमी मंच पर आमंत्रित किया और कुछ आर्थिक लाभ भी दिया ताकि हमारा हौसला न टूटे. युवा कवि प्रकाश ने अपने संघर्ष से तंग आकर आत्महत्या कर ली. उसके बाद श्री वाजपेयी ने वार्षिक युवा संगम का आयोजन शुरू किया और माह दूमाह पर युवा कवियों से कविताएं पढ़ा उन्हें कुछ आर्थिक लाभ देते हैं. उन्होंने प्रकाश-वृत्ति योजना का शिलान्यास भी किया है जहां युवा कवियों के प्रथम संग्रह छाप वे अपनी ग्लानि धो रहे. क्या हम भी आत्महत्या कर लें ताकि आचार्य विष्णु खरे की हिन्दी अकादमी जो मृतकों व मृत्यु-उत्सुक कवियों के ही आयोजन में लगी है वह शायक-वृत्ति या अविनाश-वृत्ति योजना का शिलान्यास कर शेष रह जाते युवा कवियों का कुछ कल्याण कर सके?’ इसके उत्तर में मैत्रेयी ने जो लिखा उसको लेकर उनपर हमले शुरू हो गए हैं। मैत्रेयी पुष्पा ने शायक के पत्र का उत्तर भी फेसबुक पर ही दिया और लिखा- तुम्हारी चिट्ठी का क्या जवाब दूं? मैंने युवा कलमकारों और कलाकारों के लिए जो संकल्प लिये थे और कार्यान्वित किये, मेरे वो इरादे पुरानी पीढ़ी को घातक लगे, जैसे उनकी सत्ता छिन रही हो। परिणाम तुम युवकों युवतियों के सामने है। हिंदी अकादमी....। मैत्रेयी पुष्पा के इस उत्तर को विष्णु खरे की परोक्ष आलोचना माना गया। पुरानी पीढ़ी और बूढ़े जैसे शब्दों का इस्तेमाल भी उनके लिए लिए ही किया गया जान पड़ा। चर्चा तो ये भी चली कि मैत्रेयी ने ही शायक को कहकर वो खत लिखवाया फिर उसका उत्तर दिया। क्योंकि शायक का खत मैत्रेयी जी ने अपनी फेसबुक वॉल पर लगाया और दस मिनट बाद ही उसका उत्तर भी पोस्ट कर दिया। इस पूरे प्रकरण के पीछे हिंदी अकादमी की पत्रिका इंद्रप्रस्थ भारती का नया अंक और हिंदी अकादमी के आयोजनों में एक खास विचारधारा के लोगों को बुलाना है। मैत्रेयी पुष्पा ने अपने कार्यकाल के अंतिम दिनों में इंद्रप्रस्थ भारती का कहानी विशेषांक तैयार किया था और पूर्व की घोषणा के अनुसार कहानीकारों की कहानियां तय कर दी गई थीं। इस बीच उनका कार्यकाल समाप्त हो गया और विष्णु खरे ने कार्यकाल संभालते ही उसमें काफी बदलाव कर दिए। साहित्य जगत को इसकी जानकारी भी मैत्रेयी पुष्पा के फेसबुक वॉल पर उनकी पोस्ट से ही हुई थी। अब शायक आलोक के पत्र के माध्यम से मैत्रेयी ने जिस प्रकार से विष्णु खरे और आयोजनों में बुलाए जानेवाले बुजुर्ग लेखकों पर निशाना साधा उसकी टाइमिंग गलत हो गई। मैत्रेयी के पोस्ट के सात-आठ घंटे के बाद ही विष्णु खरे जी का निधन हो गया। उसके बाद विवाद और बढ़ गया।
ऐसा प्रतीत होता है कि अब मैत्रेयी जी फेसबुक पर विवाद खड़ा कर उसका आनंद उठाने लगी हैं। जैसे राजेन्द्र जी किया करते थे, वो भी पहले विवाद उठाते थे और फिर किनारे बैठकर उसका मजा लिया करते थे। पिछले एक साल में मैत्रेयी ने कई विवादास्पद पोस्ट लिखी, छठ के दौरान नाक तक सिंदूर लगाने को लेकर की गई विवादास्पद टिप्पणी भी उसमें शामिल है। फेसबुक पर जिस रफ्तार से विवाद वायरल होते हैं, उसका दायरा फैलता है, पक्ष और विपक्ष में दलीलें आती हैं वो विवाद उठानेवाले को आनंद से भर देने के लिए काफी होते हैं। हिंदी अकादमी और विष्णु खरे को लेकर भले ही विवाद खडा करने की कोशिश की जा रही हो लेकिन हमारे भारतीय संस्कार में किसी की मृत्यु के बाद उनके बारे में आलोचनात्मक नहीं लिखने की परंपरा रही है। अपशब्द का इस्तेमाल तो वर्जित ही होता है। विष्णु खरे जी के निधन के बाद भले ही केजरीवाल मौन रहे हों, उनकी मृत्य के पहले मैत्रेयी पुष्पा की टिप्पणी आपत्तिजनक हो लेकिन उनकी मृत्यु के फौरन बाद तो हम सबको मृतात्मा की शांति के लिए प्रार्थना करना चाहिए, विवाद को हवा देकर भारतीय परंपरा की मर्यादा को ना तोड़ें। अगर बात करनी ही है, तो विष्णु खरे की कविताओं पर बात हो, उनकी रचनात्मकता को कसौटी पर कसा जाए।

Sunday, October 1, 2017

साजिश, गॉसिप और साहित्य

इन दिनों सहिष्णुता और असहिष्णुता की बातें बहुधा सुनाई देती हैं। लेखक पर हमला हो जाए तो , पत्रकार पर हमला हो जाए तो, किसी का लेख किसी भी वजह से ना छप पाए तो, ट्वीटर के कमेंट पर कोई ट्रोल हो जाए तो, फेसबुक पर किसी बात पर विवाद हो जाए तो ये शब्द हवा में गूंजने लगता है। लेकिन हमारे साहित्यकार अपने व्यवहार में कितने असहिष्णु हो गए हैं उसपर किसी का ध्न नहीं जाता, उसको कोई रेखांकित नहीं करता। आप फेसबुक पर आधे घंटे का वक्त बिताएं तो आपको पता चल जाएगा कि साहित्य जगत में कितनी असहिष्णुता है। पुराने लेखकों में नए लेखकों को लेकर सम्मान भाव के दर्शन ही दुर्लभ हो गए हैं, वरिष्ठ लेखकों में भी अपने से अपेक्षाकृत कनिष्ठ पीढ़ी के लेखकों को लेकर सदाशयता की कमी देखने को मिलती है। जनवरी में विश्व पुस्तक मेले के दौरान मैत्रेयी पुष्पा और अपेक्षाकृत युवा लेखिकाओं के बीच जिस तरह का अप्रिय विवाद हुआ था उसकी गूंज अब भी गाहे बगाहे फेसबुक पर दिख जाती है। ये तो सिर्फ एक उदाहरण मात्र है, ऐसे कई मसले साहित्य में दिखते रहते हैं जहां सहि।णुता के कम होते जाने का संकेत मिलता रहता है। पहले भी दो पीढ़ियों के लेखकों के बीच साहित्.क विवाद होते रहे हैं, रचनात्मकता के स्तर पर उसका जवाब दिया जाता रहा है लेकिन व्यक्तिगत टिप्पणियां नहीं होती थीं। अब तो हालात बहुत अलग हो गए हैं।
नई और पुरानी पीढ़ी का द्वंद भी हर दौर में देखने को मिलता रहा है । नई पीढ़ी खुद को परंपरा या विरासत के डंडे से हांके जाने को लेकर विरोध भी प्रकट करती रही है कभी उग्र होकर तो कभी शांति से विरोध करके तो कभी अपनी रचनाओं से पुरानी पीढ़ी से लंबी लकीर खींचकर । इस परिपाटी का निर्वाह कमोबेश हर युग में हुआ है लेकिन समकालीन साहित्यक परिदृश्य में एक अलग ही किस्म की रस्साकशी देखने को मिल रही है । हिंदी साहित्य में आमतौर पर यह माना जाता है कि दस साल में लेखकों की एक नई पीढ़ी सामने आ जाती है । लेखकों की जो नई पीढ़ी सामने आती है वो अपने से पुरानी पीढ़ी के लेखन का अपनी रचनात्मकता से विस्तार करती है । अबतक तो यही होता आया है कि अपेक्षाकृत नई पीढ़ी अपने से पहले वाली पीढ़ी को रचनात्मक स्तर पर चुनौती देती रही है । चाहे वो नई कहानी का दौर रहा हो या या फिर बीटनिक पीढ़ी का किसी भी अन्य पीढ़ी को देखें तो यह साफ तौर पर नजर आती है ।युवावस्था की दहलीज को पार चुकी पीढ़ी खुद को परंपरा और विरासत के नाम पर हांके जाने के खिलाफ तो नजर आती है लेकिन उसको अपने से पुरानी पीढ़ी को रचनात्मकता के नाम पर नकारने की बेचैनी नहीं दिखाई देती है । ऐसी स्थिति में अंतोनियो ग्राम्शी का एक कथन याद आता है कि- युद्ध क्षेत्र में दुश्मन के सबसे कमजोर मोर्चे पर हमला करके जीत हासिल कर लेना भले ही सफल रणनीति हो, पर बौद्धिक क्षेत्र में सबसे मजबूत और मुश्किल मोर्चे पर विजय ही असली विजय है। बीच की पीढ़ी को सबसे मजबूत मोर्चे पर फतह के बारे में सोचना होगा।
अगर हम भारतेन्दु युग से लेकर अबतक के परिदृश्य पर नजर डालें तो लगभग इसी तरह की प्रवृत्ति को रेखांकित किया जा सकता है । तो अब क्यों कर ऐसा हो रहा है कि रचनात्मक स्तर पर अपेक्षित यह पीढ़ियों का संघर्ष एक अलग ही रूप लेता जा रहा है । रचनाओं के माध्यम से होनेवाले संघर्ष की बजाए यह व्यक्तिगत संघर्ष में तब्दील हो गया है जो साहित्यक माहौल में एक अलग ही किस्म की कटुता के वातावरण का निर्माण कर रहा हो जो चिंता का विषय है । साहित्य की इस प्रवृत्ति पर विचार करने की आवश्यकता है । दस साल में अगर पीढ़ियों के बदल जाने या नई पीढ़ी के साहित्यक परिदृश्य पर आगमन के सिद्धांत को मानें तो इस वक्त हिंदी साहित्य में करीब आठ पीढ़ियां सक्रिय हैं । नामवर सिंह और रामदरश मिश्र जैसे नब्बे पार लेखकों से लेकर श्रद्धा थवाइत तक ।इसको हम हिंदी की रचनात्मकता की ताकत मान सकते हैं ।
फिर इसकी क्या वजह है कि बीच की दो तीन पीढ़ी अपनी मौजूदगी को लेकर या साहित्यक परिदृश्य में अपनी उपस्थिति को लेकर इतनी संवेदनशील हो रही है । उसको अपने से वरिष्ठ पीढ़ी से अपने लेखन की वैधता पर मुहर क्यों चाहिए । क्या यही वजह है कि एक पत्रिका वरिष्ठ लेखिका नासिरा शर्मा से साहित्यक विरासत को संभालने वाले लेखकों की एक सूची जारी करवाती है। मैत्रेयी पुष्पा से उनकी दो पीढ़ी बाद की लेखिकाओं को प्रमाण-पत्र क्यों चाहिए। बीच की पीढ़ी की कुछ लेखिकाओं के अंदर मिड एज क्राइसिस जैसी रचनात्मक क्राइसिस जैसा कुछ दिखाई देता है। उस पीढ़ी के लेखकोंलेखिकाओं को अपने लेखन पर भरोसा करते हुए साहित्यक विरासत या वसीयत की फिक्र नहीं करनी चाहिए। अगर हम संजीदगी से इसपर विचार करते हैं तो यह लगता है कि यह मामला इतना सरल नहीं है और इसको इस तरह से देखने पर यह समस्या के विश्लेषण का सरलीकरण हो सकता है । बीच की पीढ़ी के लेखकों के बीच अपनी रचनाओं की मान्यता को लेकर जो बेचैनी दिखाई देती है दरअसल वो इस वजह से है कि उस पीढ़ी के पास अपना कोई आलोचक नहीं है । आज के दौर के ज्यादातर लेखक आलोचकों को नकारने में लगे रहते हैं । बहुधा मुक्तिबोध की पंक्ति तोड़ने ही होंगे सारे गढ़ और मठ को नारे की तरह इस्तेमाल करते हुए । आलोचकों को नकराने की यह प्रवृति इन दिनों ज्यादा बढ़ गई है ।

आलोचना की अपनी दिक्कतें हैं, वो सतही हो गई है, उसमें पूर्वग्रह ज्यादा दिखाई देता है आदि आदि । बावजूद इसके साहित्य में इस विधा की अपनी एक अहमियत है जिसको नकारने की ना तो आवश्यकता है और ना ही गढ़ और मठ तोड़ने की नारेबाजी की । आलोचना की गलत प्रवृत्तियों पर रचनात्मक तरीके बात होनी चाहिए । वैसे भी हिंदी आलोचना के इतने बुरे दिन नहीं आए हैं कि उसको रचनाकारों से किसी भी तरह के प्रमाण-पत्र की आवश्यकता हो । बावजूद इसके आलोचना के खिलाफ जिस तरह का माहौल बनाया जा रहा है वह साहित्य की हर विधा के लिए नुकसानदेह हो सकती है । जो पीढ़ी इन दिनों अपने से पुरानी पीढ़ी से विरासत और वसीयत की मांग कर रही है अगर उस पीढ़ी के लेखकों की रचनाओं पर गंभीरता से विचार होता तो यह दिक्कत नहीं आती । सालों से लिख रहे लेखकों/लेखिकाओं के रचनाकर्म पर गंभीरता से विचार करनेवाला कोई आलोचक सामने नहीं आ रहा है । जो खुद के आलोचक होने का दावा करते हैं वो उतनी तैयारी के साथ इस कर्म में नहीं उतरते हैं । आलोचना के लिए जिस अध्ययन की आवश्यकता होती है या फिर जिस तरह से वैश्विक प्रवृत्तियों के बरक्श देसी रचनाओं को रखकर तुलनात्मक विश्लेषण की आवश्यकता होती है उसका सर्वथा अभाव दिखता है । जिन लोगों के सर पर युवा आलोचक की कलगी लगाई जा रही है उनके लेखन को देखकर भी निराशा होती है । या तो वो मार्क्सवाद के भोथरे औजारों से आलोचना करने में लगे हैं या फिर अलग अलग लेखकों से समीक्षानुमा टिप्पणी लिखवाकर किताब का संपादन कर आलोचक बने बैठे हैं । मामला यहीं तक नहीं रुकता है । कई बार आलोचनात्मक लेखों को पढ़ने के बाद मन में यह सवाल उठता है कि आलोचक की राय क्या है । होता यह है कि वो लिखना शुरू करते ही उद्धरण देना शुरू कर देते हैं । नेम ड्रापिंग कर कर के अपने लेख को वजनदार बनाने के चक्कर में उनका खुद का कोई मत सामने आ नहीं पाता है । इसका सबसे ज्यादा नुकसान उस लेखक का होता है जिसकी रचनाओं पर उस लेख में विचार किया जाता है । ना तो रचना पर बात हो पाती है ना ही रचना के क्राफ्ट आदि पर । अगर कोई आलोचक सामने आकर उक्त पीढ़ी की लेखिकाओंलेखकों पर गंभीरता से विचार करेगा तो पीढ़ीगत संघर्ष दिखाई नहीं देगी । इसके अलावा उस पीढ़ी को यह भी करना होगा कि वो अपनी बी पीढ़ी के साथी लेखकों की रचनाओं पर लिखना शुरू करे । इसका एक फायदा ये होगा कि उनकी रचनाओं पर बात शुरू हो जाएगी । राजेन्द्र यादव, कमलेश्वर और मोहन राकेश की त्रयी ने भी ये किया था जिसका उनके लेखन को कितना फायदा हुआ ये तो इतिहास में दर्ज है । अपने साथी लेखकों की रचनाओं को खारिज करने की बजाए वो उसपर विमर्श की शुरुआत करें, कटुता भी घटेगी और स्वीकार्यता भी बढ़ेगी। आवश्यकता तो इस बात की भी है कि साहित्यक साजिशों, गॉसिपों से आगे जाकर रचनात्मक विमर्श को तवज्जो दी जाए ताकि कुछ सकारात्मक निकले और बाद की पीढी के सामने एक मिसाल पेश हो ।   

Monday, February 13, 2017

प्रवासी बहाना, स्तरहीनता निशाना

दिल्ली की हिंदी अकादमी की उपाध्यक्ष और वरिष्ठ उपन्यासकार मैत्रेयी पुष्पा ने हाल ही में फेसबुक पर एक टिप्पणी की – दिल्ली विश्वविद्यालय के अन्तर्गत आनेवाले ज़्यादातर कॉलेजों का हाल यह है कि उनके यहाँ की साहित्यक गोष्ठी के नाम के साथ 'अन्तर्राष्ट्रीय ' शब्द जुड़ जाये ,बस इसी लालच में विदेशों से छुट्टी मनाने आये औसत दर्जे के कहानी और कविता लेखकों को बुलाना नहीं भूलते । साहित्यक गोष्ठियों में जहाँ जाओगे "उन्हें" पाओगे जो दोनों हाथों में लड्डू की मुद्रा में मुस्करा रहे होते हैं । मैत्रेयी पुष्पा की इस टिप्पणी पर साहित्य जगत में अच्छा खासा विवाद हो गया । प्रवासी लेखक तेजेन्द्र शर्मा ने अपनी फेसबुक वॉल पर मैत्रेयी जी की इस पोस्ट को उद्धृत करते हुए मैत्रेयी पुष्पा पर जोरदार हमला बोला और उनको इशारों इशारों में साहित्य की अरविंद केजरीवाल बता दिया । तेजेन्द्र शर्मा ने व्यंग्य लेखक प्रेम जनमेजय के भी एक पोस्ट को उद्धृत किया- "इसी मौसम में प्रवासी साहित्यकार भी तो आते हैं - प्रजनन और थोड़े दिन ठहरने के लिये। कुछ दाना चुगने आते हैं और कुछ दाना डालने आते हैं। इसी समय तो हिंदी साहित्य का वसंत आता है। प्रवासी साहित्यकारों की काली कोयल कूकती है। काले कौए भी कांव-कांव करते हैं। कौओं तक के लिये पलक पावड़े बिछाए जाते हैं। आजकल कोयल हो या कौवा काले का बोलबाला है। यशस्वी प्रवासी को साधारण से लेकर असाधारण प्रकाशक तक संपूर्ण निहारते हैं। हवा में हाथ हिला कर या मुस्कान फेंक कर भ्रम में डाल जाता है। पीतल की चमक सोने को कुंठिंत कर रही है। घर की मुर्गियां दाल के बराबर भी नहीं रहीं उन्हें बर्ड फ़्लू हो गया है।" तेजेन्द्र शर्मा ने लिखा कि मैत्रेयी पुष्पा की तो समझ में आती है। वे तो पूरी युवा पीढ़ी के लेखन को नकार चुकी हैं। क्योंकि केजरीवाल ने उन्हें दिल्ली हिन्दी अकादमी का उपाध्यक्ष बनाया है, वे उसी की भाषा भी बोल रही हैं। मगर प्रेम जनमेजय के मन की कुण्ठा मुझे समझ नहीं आई। अगर उनको लगता है कि उपरोक्त भाषा किसी व्यंग्य की है तो व्यंग्य का अन्धकार युग आने में देर नहीं है। यह केवल अपने मन की भड़ास की अभिव्यक्ति है। प्रेम तो सुधा ओम धींगरा, दिव्या माथुर, सुषम बेदी और ज़किया ज़ुबैरी आदि के साहित्य पर समय समय पर बोल चुके हैं। उनकी गोष्ठियां अपने घर में आयोजित भी की हैं। प्रवासी लेखकों को लेकर मन में ऐसी कुण्ठा क्यों है। प्रेम जनमेजय तो व्यंग्य लेखक हैं उनकी बातें चुटीली होंगी ।
हो सकता है कि लंदन में रह रहे कहानीकार तेज्नद्र शर्मा को किसी की कुंठा समझ में नहीं आ रही हो लेकिन प्रवासी साहित्य को लेकर जिस तरह से ढोल पीटा जाता है उससे तो यही लगता है । देश के बाहर रहनेवाले कुछ लेखक अपनी पहचान को लेकर बहुत परेशान रहते हैं । अपने देश से निकलने के पहले ही अपने भारत प्रवास के दौरान के कार्यक्रमों को इस तरह से विज्ञापित, प्रचारित करते हैं कि जैसे शहंशाह अकबर के यात्रा के पहले मुनादी की जा रही हो । यह क्या है ।आत्मश्लाघा, आत्मप्रचार और आत्मदंभ में डूबे प्रवासी लेखक अपनी दुंदुभि खुद ही बजाते घूमते रहते हैं । दरअसल कुछ प्रवासी लेखकों ने अपने देश में अपने लेखन की एजेंसी दे रखी है जिसके अभिकर्ता समय समय पर बदलते रहते हैं जो उनके हितों का ध्यान रखते हैं । बदले में अभिकर्ताओं को क्या  मिलता है यह ज्ञात नहीं है क्योंकि यह गोपनीय होता है ।  दूसरी बात यह कि साहित्य, साहित्य होता है उसको प्रवासी और निवासी के खांचे में बांधना ही गलत है । दरअसल अगर हम देखें तो हिंदी का जो प्रवासी साहित्य है उसका एक बड़ा हिस्सा विदेशों से लाए जानेवाले मोजे, टाई, कलम और इत्र की शीशियों पर टिका है । अब इसको ज्यादा विस्तार देने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि हिंदी के पाठक बेहद सजग हैं और वो साहित्यकारों की हर गतिविधि पर नजर रखते हैं । प्रवासी नामकरण कर देने से साहित्य का एक अलग खांचा बन जाता है और फिर उन खाचों में रहनेवाले लेखक अपने बीच ही तुलना का आग्रह करते हैं । इसका एक फायदा यह होता है कि औसत रचनाएं भी नजर में आ जाती हैं । जो लोग प्रवासी साहित्य के झंडाबरदार हैं उनको अपनी रचनाओं के अलावा अन्य कृतियां या काम दिखाई नहीं देते हैं । स्व के शोरगुल में वो दूसरे लेखकों को नजरअंदाज करते चलते हैं । कहना ना होगा कि प्रवासी साहित्य का ये परिदृश्य बेहद एकहरा है जबकि इसको प्रामाणिकता हासिल करने के लिए समावेशी होना पड़ेगा । अगर प्रवासी साहित्य को समकालीन भारतीय साहित्य में मजबूती से स्थापित करना है तो हमें विदेशों में रह रहे भारतीय भाषाओं के सभी लेखकों की रचनाओं को साथ लेकर चलना ही नहीं होगा उसपर विचार और मंथन भी करना होगा । इकहरे प्रचार प्रसार से फौरी तौर पर प्रसिद्धि तो मिल सकती है, मिल भी रही है , लेकिन उसका कोई स्थायी महत्व नहीं होगा । जिस तरह से प्रवासी साहित्य का कोलाहल गूंज रहा है उसमें डॉ पी जयरामन का नाम लगभग नहीं लिया जाता है । लंबे समय से अमेरिका में रह रहे पी जयरामन जी जिस खामोशी के साथ हिंदी साहित्य के लिए काम कर रहे हैं वो प्रवासी लेखकों के लिए उदाहरण है । डॉ पी जयरामन ने तमिल के भक्त कवियों की रचनाओं का अनुवाद किया है जो कि दस खंडों में प्रकाशित है । तमिल से हिंदी में अनुवाद और उसको पाठकों की सुविधानुसार शब्दों के साथ पिरोना एक ऐतिहासिक काम था और इस काम ने हिंदी और तमिल के बीच की खाई को पाटने की कोशिश तो की ही दोनों भाषाओं के बीच एक मजबूत सेतु निर्माण का कार्य भी किया । डॉ जयरामन पिछले करीब चार दशकों से अमेरिका में रह रहे हैं और वहां हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए सक्रिय हैं । नब्बे साल की उम्र में भी उनकी काम करने की ललक देखते ही बनती है । चार छह कहानियां लिखकर, दो चार पत्रिकाओं के अंक अपने उपर प्रकाशित करवा अगर कोई साहित्यकार महान बन सकता तो अबतक कई महान साहित्यकार स्थापित हो चुके होते ।
मैत्रेयी पुष्पा ने अपनी पोस्ट में एक और सवाल उठाया जिसपर विस्तार से गंभीरतापूर्वक विचार करने की जरूरत है ।मैत्रेयी जी ने कहा कि दिल्ली विश्वविद्यालय के अन्तर्गत आनेवाले ज़्यादातर कॉलेज अपनी साहित्यक गोष्ठियों में इस वजह से विदेशों से आए औसत दर्ज के लेखकों को बुलाते हैं ताकि उनके सेमिनारों में अंतराष्ट्रीय शब्द जुड़ सके । यह प्रवृत्ति पिछले कई सालों से जोर पकड़ रही है । तेजेन्द्र शर्मा ने उत्तेजना में भले ही मैत्रेयी जी को बुरा भला कह दिया हो लेकिन उनकी चिंता दिल्ली विश्वविद्यालयों में सेमिनारों के गिरते स्तर को लेकर थी । जब अंतराष्ट्रीय सेमिनार की परिकल्पना की गई होगी तो यह माना गया होगा कि ऐसे आयोजनों में विदेशों के उन विद्वानों को आमंत्रित किया जाएगा जिन्होंने अपनी लेखनी से संबंधित विषय में सार्थक हस्तक्षेप किया हो । अब अगर इस अवधारणा पर विचार करें तो तेजेन्द्र शर्मा को अपनी टिप्पणियों पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता होगी या फिर ये बताने की कि उनके लेखकीय योगदान ने किस तरह से संबंधित विषय या विधा में हस्तक्षेप किया । मैत्रेयी पुष्पा और प्रेम जनमेजय पर हमलावर होने की बजाए अगर वो अपनी उपलब्धियों को बताते तो सार्थक होता । क़ॉलेजों का क्या है वो तो अपनी नैक की रैकिंग को लेकर चिंतित रहते हैं और शिक्षक अपने प्रमोशन में जुड़नेवाले प्वाइंट के लिए जुगाड़रत । इस तरह के सेमिनारों से दोनों का फायदा होता है, कागजी खानापूरी हो जाती है लेकिन विद्यार्थियों को क्या नई दृष्टि मिलती है, मैत्रेयी की टिप्पणी में छिपे इस सवाल का उत्तर सामने आना चाहिए । दरअसल हर वर्ष के आखिरी तिमाही में शैक्षणिक सेमिनारों की बाढ़ सी आ जाती है । देशभर के महाविद्यालय या फिर विश्वविद्यालयों के विभाग अपने अपने यहां सेमिनार आयोजित करते हैं । कुछ लोग तो इसको साहित्य की मार्च लूट भी कहते हैं । विश्वविद्लायों इस तरह के सेमिनार के लिए अनुदान देनेवाली संस्थाओं को इनकी गुणवत्ता पर भी ध्यान देने के लिए एक मैकेनिज्म को बनाने की आवश्यकता है ताकि साहित्य की इस मार्च लूट पर लगाम लगाई जा सके । अगर फंडिंग एजेंसी इस तरह के सेमिनारों की स्तरीयता बनाने या बचाने के लिए कोई मैकेनिज्म बना सकेंगे तो विद्यार्थियों का भी भला होगा और साहित्य का भी । विद्यार्थियों में वैश्विक दृष्टि का निर्माण होगा और अपने यहां के साहित्य को नई प्रवृत्तियों के बरक्श रखकर तुलनात्मक अध्ययन के द्वार खुल सकेंगे । लेकिन अगर यथास्थिति बरकरार रही तो करदाताओं के पैसे बर्बाद होते रहेंगे और बहुत संभव है कि जब पानी सर से उपर चला जाए तो सरकार इसको रोकने के लिए दखल दे । तब विश्वविद्लायों की स्वायत्ता का रोना रोया जाएगा, बेहतर हो उस आसन्न रुदन के पहले स्थितियां ठीत कर ली जाएं ।    


Saturday, January 7, 2017

कहानी को बचाने की चुनौती

इन दिनों कहानी पर लिखना बर्रे के छत्ते में हाथ डालने जैसा है, सात्विक कहानियों पर अगर लिख दें तो चल भी जाएगा लेकिन स्त्रीवादी कहानी पर लिखना बेहद जोखिम का काम है । दरअसल हम सहिष्णुता की बहुत बात करते हैं लेकिन जहां कहीं भी जरा सी आलोचना दिख जाए या उसका अंदेशा भी दिखे तो कहानीकार या फिर उनके गुर्गे हमलावर हो जाते हैं । साहित्यक पत्रिका हंस से राजेन्द्र यादव ने हिंदी साहित्य में स्त्री विमर्श की शुरुआत की । स्त्री मुक्ति के नाम पर या स्त्री विमर्श के नाम पर देह मुक्ति पर्व मनाया जाने लगा था । स्त्री विमर्श के नाम पर देह विमर्श होने लगा था । स्त्री विमर्श के पैरोकार राजेन्द्र यादव ने कुछ लेखिकाओं को सिमोन और वर्जिनिया वुल्फ की घुट्टी पिलाई । सिमोन का नाम उस दौर में स्त्री विमर्श का नारा बनकर रह गया था । सिमोन की स्वच्छंदता की कसमें खाई जाने लगी थी । राजेन्द्र यादव ने इस प्रवृत्ति को खूब जमकर बढाया । लेकिन यादव जी भारतीय समाज और उसके मनोविज्ञान को ठीक से भांप नहीं सके । जिन लेखिकाओं को उन्होंने सिमोन बनाने की ठानी थी या जिनको वर्जिनिया वुल्फ की तरह देखना चाहते थे वो उनके रास्ते पर चली तो सही लेकिन हिचक के साथ । इस हिचक ने हिंदी साहित्य में थोड़ा सिमोन, थोड़ा वर्जीनिया वुल्फ की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया । यादव जी की लेखिकाएं सिमोन जैसा साहस नहीं दिखा पाईं । लेकिन राजेन्द्र यादव ने लेखक लेखिकाओं की पूरी पीढ़ी तैयार की जो इस तरह का बोल्ड लेखन कर सकें । बोल्ड लेखन की आड़ में राजेन्द्र यादव ने कई लेखकों को कहानीकार बना दिया जिन्हें कलम पकड़ने की तमीज नहीं थी । उनमें से चंद लेखिकाओं के पास भाषा का कौशल था लिहाजा वो देहगाथा को भी संभाल ले गईं । विषयगत प्रयोग भी किए और आधुनिक कहानियों के साथ साथ ग्रामीण जीवन पर भी सफलतापूर्वक लिखा । इस बात को पहले भी कहा जा चुका है कि बोल्ड लेखन सबके वश की बात नहीं है, बोल्ड लेखन के लिए भाषा पर पकड़ होनी चाहिए । ज्यादा पीछे नहीं जाते हैं । कृष्णा सोबती की मित्रो मरजानी को देखें, मृदुला गर्ग की कृति चितकोबरा को देखें, मैत्रेयी पुष्पा की चाक या फिर अलमा कबूतरी को देखें तो उसमें जो देहगाथा आती है उसमें पाठकों को जुगुप्सा नहीं होती है । चाक की सारंग का जो प्रसंग है वो बहुत स्वाभाविक तरीके से उपन्यास में आता है और पाठक वहां उसको यौन प्रसंग के तौर पर देखने की बजाए एक घटना के तौर पर देखते हैं । हलांकि इन सब ने अपने दौर में इस तरह के बोल्ड लेखन का विरोध झेला था लेकिन वो विरोध वक्त के साथ दफन हो गया । यह विरोध इस वजह से दफन हुआ कि उन रचनाओं में  कंटेंट था । पिछले साल प्रकाशित बुजुर्ग लेखिका रमणिका गुप्त की आत्मकथा आपहुदरी को देखें । भाषा के स्तर पर बेहद फूहड़ और यौन घटनाओं की बहुलता ने पाठकों को बेहद निराशा किया ।
अगर हम पिछले साल को उदाहरण के तौर पर लें तो कहानी विधा के लिए उसको बेहतर नहीं माना जा सकता है । एक ही तरह कि कहानियां, एक ही तरह का यथार्थ, एक ही तरह की भावभूमि जैसे कहानीकारों के पास कहने को नया कुछ है ही नहीं । घिसी पिटी लीक पर फॉर्मूलाबद्ध कहानियों की बाढ़ रही । मशहूर नाटककार इब्सन ने अपने नाटक घोस्ट्स की भूमिका में लिखा है – हमारी सीमा के प्रसार का समय आ गया है । लेकिन सवाल यही है कि क्या सीमा के प्रसार के नाम पर क्रांतिकारी नारेबाजी से काम चलेगा या फिर कुछ सार्थक रचना होगा । इसपर विचार करना होगा कि क्या बोल्ड लेखन के उद्घोष या फिर देहगाथा का परचम लहराकर नई सीमा तय की जा सकती है । क्या सालों से चले आ रहे विचार का कोई परिष्कार हो पाया है । आधुनिकता के नारे के बीच विचार तो गौण हो ही गया है परंपरा को भी हम भूलने लगे हैं । दरअसल पारंपरिक विचारों में जबतक नवीनता के साथ सृजन नहीं होगा तबतक आधुनिकता का दावा बेमानी है । आधुनिकता का नारा खोखला लगता रहेगा । व्यक्तिगत कुंठा से परे जाकर समाज के बड़े सवालों से टकराते हुए जब हम आधुनिकता का दावा करते हैं तो यह भी देखना होता है कि रचना में अपने समय या समाज को झकझोरने का माद्दा है या नहीं । बोल्ड लेखन के नाम पर राजेन्द्र यादव और उनके सिपहसलारों ने आधुनिक और आधुनिकता के मानदंडों को इतना उलझा दिया कि उसको चिन्हित करने में कठिनाई होने लगी है । समय सापेक्ष आधुनिकता को लेकर भ्रम की स्थिति बना दी गई । समसमायिकता के चित्रण को आधुनिकता से जोड़ दिया गया जिससे स्थिति और विकट होने लगी । स्त्री पुरुष संबंधों के आधुनिक होने का आधार दैहिक संबंध होने लग गए । यहां इस बात को फिर से दोहराना आवश्यक है कि दैहिक संबंधों का चित्रण भाषा का कुशल चितेरा ही कर सकता है ।
हिंदी कहानी को लेकर जिस तरह की उदासीनता पाठकों में देखने को मिल रही है वो बहद चिंता का विषय है । कहानी की बुनियादी शर्त है कि उसमें पठनीयता हो और पाठकों का पढ़ने में मन लगे । बीते साल में कहानी की पठनीयता में जबरदस्त कमी महसूस की गई और पाठकों का कहानी में मन लगने की बजाए मन उचटने के संकेत मिले । नई कहानी के शोरगुल के बीच नामवर सिंह ने लिखा था कि – भाषा इधर की कहानियों की काफी बदली है, यह भी कह सकते हैं कि मंजी है । यहां तक हिंदी गद्य का अत्यंत निखरा हुआ रूप आज की कहानी में ही सबसे अधिक मिलता है । कहानी में एक भी फालतू शब्द ना आये, इसके प्रति आज का लेखक बहुत सतर्क है । तब नामवर सिंह ने इसको कहानी के लिए शुभ लक्ष्ण माना था । नामवर सिंह के इस कथन के आलोक में आज की कहानियों पर विचार करने से लगता है कि कहानी में भाषा के स्तर पर ना तो कोई बदलाव दिखाई देता है और ना ही कोई कहानीकार अपनी कहानियों में भाषा के साथ खिलंदड़ापन ही करता दिखाई देता है । इसके अलावा आज की कहानियों में भी कई फालतू शब्द भी आवारागर्दी करते नजर आते हैं । भाषा को निखारने की बात तो छोडिए जो भाषा सही से लिख नहीं पाते हैं, जिनकी वर्तनी से लेकर व्याकरण तक दोषपूर्ण है उनको भी कहानीकार मान लिया जाता है । भाषा के अलावा कहानी से कहानीपन भी तो गायब होता चला गया ।
आज की कहानियों के कथानक पर अगर हम विचार करें तो पाते हैं वो लगभग सपाट है । कहीं किसी भी तरह का उतार चढ़ाव नहीं, नामवर जी इसकी तुलना बहुधा पहाड़ी रास्तों से करते हैं जहां कदम कदम पर आकस्मिक मोड़ मिलते हैं । रूसी कथाकार चेखव को ऐसी कहानियों का जनक माना जाता है और उनके प्रभाव में यह प्रवृत्ति विश्वव्यापी हो गई । हिंदी भी इससे अछूती नहीं रही । नामवर सिंह के मुताबिक ये कहानी में यथार्थवाद की विजय का पहला उद्घोष था । जिस वक्त चेखव ने यह प्रयोग किया था उस वक्त पाठकों ने इसको काफी पसंद किया था क्योंकि इसमें एक नयापन था । हिंदी में भी यथार्थवादी कहानियां इस वजह से ही स्वीकृत और प्रशंसित हुईं । कहानी की इस तकनीक की सफलता से हिंदी कहानी के ज्यादातर कथाकारों ने इसको अपनाया । नतीजा यह हुआ कि हिंदी में यथार्थवादी कहानियों की बाढ़ सी आ गई । धीरे-धीरे पाठकों को इस तकनीक से लिखी गई कहानियों में दुहराव नजर आने लगा । हाल में तो यथार्थवादी कहानियों के नाम पर सीधे-सीधे घटनाओं को लिखा जाने लगा । इसने कहानी विधा का बहुत नुकसान किया । कथानक की साम्यता ने पाठकों को निराश करना शुरू कर दिया । बल्कि कई कहानीकारों पर तो नकल का इल्जाम भी लगा जबकि कथानक में समानता चेखव की तकनीक को अपनाने की वजह से आ रही थी । जब भीहम यथार्थवादी कहानियों की बात करते हैं तो हमें प्रेमचंद और जैनेन्द्र के बीच की एक दिलचस्प बातचीत का स्मरण हो आता है । प्रेमचंद ने जैनेन्द्र से कहा कि उपन्यास लिखो उपन्यास । जैनेन्द्र ने पूछा कि कैसे लिखें तो प्रेमचंद ने कहा कि घर में नाते-रिश्तेदार जो हों उनको ही लेकर लिख दो । प्रेमचंद की इस सीख को कहानीकारों ने सालों तक उपयोग किया । उदय प्रकाश की कहानियों में  तो इसको अब भी देखा जा सकता है । उसके बाद कहानी  सालों तक कहानीकारों ने रेणु के प्रभाव में कहानियां लिखीं थी । इसी क्रम को ईदगे बढ़ाते हुए आधुनिकता के नाम पर राजेन्द्र यादव ने कम से कम एक दशक तक देह को केंद्र में रखकर कहानियां लिखवाईं । लेकिन हिंदी कहानी को अब अपना रास्ता बदलना होगा । अगर वक्त रहते हिदीं कहानी ने अपना रास्ता नहीं बदला तो उसके सामने गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता है ।


Saturday, November 26, 2016

सेक्स प्रसंगों से करो तौबा- आर्चर

अंग्रेजी के मशहूर लेखक जैफ्री ऑर्चर ने भारत के युवा लेखकों को सलाह दी है कि वो सेक्स, हिंसा और भूत प्रेत के बारे में नहीं लिखें । उनकी सलाह है कि खराब भाषा से भी भारत के युवा लेखकों को बचना चाहिए । उन्होंने साफ कहा है कि भारतीय युवा लेखकों को उन्हीं विषयों पर लिखना चाहिए जिसको लेकर लेखक को खुद पर पूरा यकीन हो यानि वो विषय को लेकर कन्विंस हों। जैफ्री ऑर्चर ने कहा कि लेखक को अपना काम करना चाहिए और फिर उसको जनता पर छोड़ देना चाहिए कि वो उसको पसंद करती हैं या नहीं । उन्होंने साफ तौर पर जोर देकर ये भी कहा कि जो जनता चाहती है उस हिसाब से नहीं लिखना चाहिए बल्कि लेखक को अपने हिसाब से साहित्य सृजन करना चाहिए । जैफ्री आर्चर कोई मामूली लेखक नहीं हैं बल्कि पूरी दुनिया में उनकी लेखन का डंका बजता है । सत्तर साल की उम्र में भी वो खुद के लेखन को चुनौती देते रहे हैं और लगातार नए नए विषयों पर लिखते रहे हैं। जब उपन्यास से मन भरने लगा तो नाटक लिखना शुरू कर दिया फिर कहानी की ओर मुड़ गए। एक अनुमान के मुताबिक उनकी किताब केन एंड एबेल की करीब साढे तीन करोड़ प्रतियां बिक चुकी हैं । यह साहित्य में एक घटना की तरह है । इस किताब से पहले प्रकाशित जैफ्री ऑर्चर की दो किताबें भी बेस्ट सेलर रही हैं । दरअसल अगर हम देखें तो जैफ्री ऑर्चर ने अपना करियर लेखक के तौर पर तब शुरू किया जब वो लगभग दीवालिया हो गए थे और उनपर कर्ज का भारी बोझ आ गया था । जैफ्री ऑर्चर सौ मीटर रेस के धावक रह चुके हैं, ब्रिटेन में सांसद रह चुके हैं लेकिन कारोबार में ठोकर खाने के बाद लेखक बने । कर्ज उतारा फिर राजनीति में गए ।
आर्थिक रूप से घिरे जैफ्री ऑर्चर ने सबसे पहले नॉट अ पेनी मोर, नॉट अ पेनी लेस लिखा जिसकी सोलह देशों में जमकर बिक्री हुई । उसके बाद तो उन्होंने लेखन को ही अपना लिया और अपने बैलेंस शीट को लेखन की कमाई से ठीक किया। गूगल के मुताबिक उनका तीसरा उपन्यास केन एंड एबेल विश्व साहित्य के इतिहास में ग्यारहवां सबसे सफलतम उपन्यास है । लियो टॉलस्टॉय के वॉर एंड पीस से सिर्फ एक पायदान नीचे । जैफ्री ऑर्चर का जीवन विवादों से भी भरा रहा है और जेल भी काट चुके हैं । लिहाजा उनका अनभव संसार वैविध्यपूर्ण है । जैफ्री ऑर्चर के बारे में ये बताने का मकसद सिर्फ इतना था कि उनकी सलाह को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए । उसको माना जाए या नहीं इस बात पर कम से कम विमर्श तो होना ही चाहिए । इस लेख का मकसद भी यही है ।
जैफ्री ऑर्चर की भारत के युवा लेखकों की इस सलाह पर कई लोगों ने ये सवाल उठाए कि उनको भारत के पाठकों की रुचि का और भारतीय लेखन का उनको क्या पता । अब ऐसे लोगों की अज्ञानता पर क्या कहा जाए । जैफ्री ऑर्चर का भारत से बहुत पुराना और गहरा नाता रहा है और वो नियमित तौर पर भारत आते जाते रहे हैं और भारत के बारे में उनकी एक राय भी है । भारतीय महिलाओं के बारे में जैफ्री ऑर्चर ने हाल ही में अपने एक इंटरव्यू में कहा है कि जब भी वो भारत आते हैं तो यहां की महिलाओं को मजबूत होते देखकर खुश होते हैं । वो भारतीय महिलाओं के सशक्तीकरण की भावना का सम्मान करते हुए कहते हैं कि नई पीढ़ी को रोकने की ताकत अब किसी में नहीं है । जैफ्री ऑर्चर भारत के प्रकाशन जगत की सचाईयों से भी वाकिफ हैं और अपनी कई किताबों को सबसे पहले भारत में ही लॉंच करते रहे हैं । उनका मानना है कि भारत में पाइरेसी एक बड़ी समस्या है और अगर भारत में किताब बाद में लॉंच की जाती है तो लेखक और प्रकाशक दोनों का नुकसान हो जाता है । लिहाजा वो इसकी काट के लिए सबसे पहले अपनी किताब भारतीय बाजार में ही लॉंच करते हैं ।
अब हम आते हैं जैफ्री ऑर्चर की युवा लेखकों को दी जानेवाली सलाह पर । उन्होंने सेक्स संबंध से लेकर भूत-प्रेत की कहानियां नहीं लिखने की सलाह दी है लेकिन इन दिनों सेक्स संबंध युवा लेखकों के लेखन में लगभग अनिवार्य उपस्थिति की तरह है । कई युवा लेखकों को लगता है कि उपन्यासों में बगैर यौन संबंधों के छौंक के उसको सफल नहीं बनाया जा सकता है जबकि उनके सामने ही अमिष त्रिपाठी का उदाहरण है । जो बगैर इस तरह के विषयों को छुए दुनिया के बड़े लेखकों की लीग में शामिल हो गए हैं । दरअसल कुछ युवा, कुछ युवापन की दहलीज पार कर चुके लेखक अपनी कहानियों में यौन संबंधों का इस्तेमाल उसी तरह करते हैं जैसे कुछ फिल्मकार अपनी फिल्मों की सफलता के लिए नायिकाओं से अंग प्रदर्शन करवाते हैं । उन्हें ये सफलता का शॉर्टकट फॉर्मूला लगता है । फिल्मों में भी जहां कहानी की मांग हो वहां अंगप्रदर्शन से परहेज नहीं करना चाहिए और साहित्य में भी जहां सिचुएशन की मांग हो वहां यौन संबंधों का वर्णन होना चाहिए । साहित्य में यौन संबंधों के वर्णन को लेकर बहस पुरानी है लेकिन जिस तरह से चेतन भगत जैसे लेखकों ने जुगुप्साजनक तरीके से चटखारे लेने के अंदाज में इस तरह से प्रसंगों पर विस्तार से लिखा है उसको जैफ्री ऑर्चर की टिप्पणी के आइने में देखे जाने की जरूरत है । चेतन के नए उपन्यास वन इंडियन गर्ल के कई पन्ने तो पोर्नोग्राफी को मात देते हैं । हिंदी में जब मैत्रेयी पुष्पा का उपन्यास चाक या फिर अल्मा कबूतरी प्रकाशित हुआ था तब भी उसमें वर्णित यौन संबंधों को लेकर साहित्य जगत में अच्छा खासा विवाद हुआ था । साहित्य के शुद्धतावादियों ने तब मैत्रेयी पुष्पा के लेखन को कटघरे में खड़ा किया था । बाद में भी इस तरह के प्रसंगों को लेकर कई कृतियां आईं । कृष्णा अगिनहोत्री की आत्मकथा के दो खंड- लगता नहीं है दिल मेरा तथा ...और और औरत में इस तरह के प्रसंगों की भरमार है । हद तो बुजुर्ग लेखिका रमणिका गुप्ता ने अपनी आत्मकथा में कर दी। उनकी आत्मकथा आपहुदरी में जिस तरह क जुगुप्साजनक प्रसंगों की भरमार है वो उस किताब को साहित्य के अलग ही कोष्टक में रख देता है। जैफ्री ऑर्चर की सलाह युवा लेखकों को लेकर है । इन वरिष्ठ लेखकों की रचनाओं का उल्लेख इस वजह से किया गया ताकि लेखन की इस परंपरा को समझने में मदद मिले । यौन संबंध मानव जीवन की अनिवार्यता है लेकिन उसको कितना और कैसे उभारा जाए ये लेखक पर निर्भर करता है । अभी पिछले दिनों युवा लेखिका सोनी सिंह का संग्रह क्लियोपेट्रा प्रकाशित हुआ था । उनकी कहानियों में इस तरह के कई प्रसंग बेवजह आते हैं और जिस तरह के बिंबो का वो इस्तेमाल करती हैं वो हिंदी कहानी में कुछ जोड़ता हो इसमे संदेह है । हलांकि राजेन्द्र यादव को सोनी सिंह की कहानियां अपने बेबाक बयानी के बावजूद बौद्धिक खुराक मुहैया करवाने वाली लगती हैं । संभव है कि यादव जी की तरह के कुछ पाठक साहित्य में हों । सोनी सिंह के अलावा भी कई लेखक लेखिका इस तरह की कहानियां लिख रहे हैं । पर उनमें से ज्यादातर अपनी इस तरह की कहानियों से पाठकों को झकझोरने के बाद अलग भावभूमि पर विचरण करने लगी हैं ।  जिसको उनके कोर्स करेक्शन की तरह देखा जा रहा है ।

जैफ्री ऑर्चर की इस सलाह के बाद एक बार फिर से साहित्य में इस बात पर बहस होनी चाहिए कि साहित्यक शुचिता की सीमा कितनी हो । लेखक सिचुएशन की मांग पर कहां तक जा सकता है या जा सकती है । यौन संबंधों पर लिखने के लिए दरअसल बहुत सधे हुए दिमाग और लेखनी की जरूरत होती है । ये प्रसंग ऐसे होते हैं कि अगर लिखते वक्त लेखक का संतुलन खो गया तो वो उसके लेखन को हल्का भी कर दे सकता है या पाठक उसको रिजेक्ट भी कर सकते हैं । खुद लेखक को भी इस तरह के लेखन के पहले कन्विंस होना चाहिए । पाठकों को कहानियों की ओर आकर्षित करने के लिए इस तरह के प्रसंग जबरदस्ती नहीं ढूंसने चाहिए । जैफ्री ऑर्चर ने एक और बात कही कि बाजर की मांग के हिसाब से लेखकों को नहीं लिखना चाहिए तो वो इस ओर इशारा करते है कि लेखक तो पाठकों की रुचि का निर्माण करते हैं, रुचियों आधार पर साहित्य सृजन करनेवाले लेखक नहीं बल्कि कारोबारी होते हैं । अब हिंदी के युवा लेखकों को तय करना है कि वो वैश्विक लेखक की सलाह मानते हैं या फिर शॉर्टकट सफलता के लिए पुराने फॉर्मूले को अपनाते हैं । 

साहित्य का 'समीकरण काल'

हिंदी साहित्य में फेसबुक अब एक अनिवार्य तत्व की तरह उपस्थित है । कई साहित्यकार इस माध्यम को लेकर खासे उत्साहित रहते हैं । उनका मानना है कि फेसबुक ने नए-पुराने लेखकों को एक खुला मंच दिया जहां आकर वो अपनी बात कर सकते हैं । इस मंच पर वो अपनी रचनाएं लिख सकते हैं, यहां अपनी राय प्रकट करने के साथ-साथ बहस मुहाबिसे में भी हिस्सा ले सकते हैं । इस माध्यम की वकालत करनेवालों को ये अभिव्यक्ति का ऐसा मंच मानते हैं जहां कोई बंदिश नहीं है । लेकिन एक दूसरा पक्ष भी है जो इस असीमित अधिकार को लेकर सशंकित रहता है और उनका तर्क होता है कि इससे साहित्य में अराजकता को बढ़ावा मिलता है । सोशल मीडिया के इन दो पक्षों पर ही बहस होती रहती है लेकिन इसका एक तीसरा और दिलचस्प पक्ष भी है । फेसबुक आपको साहित्यक समीकरणों को समझने में मदद तो करता ही है कई बार इन समीकरणों को उघाड़कर रख देता है । हिंदी साहित्य में लेखकों के बीच समीकरण बनते बिगड़ते रहते हैं । इस बात को फेसबुक पर इनकी गतिविधियों से सहजता के साथ रेखांकित किया जा सकता है । हिंदी साहित्य का ये दौर समीकरणों का दौर है जहां ज्यादातक लेखक आत्ममुग्धता, आत्मश्लाघा और आत्मप्रशंसा में डूबे हैं । आत्ममुग्धता, आत्मश्लाघा और आत्मप्रशंसा ही साहित्य में नए समीकरणों को जन्म देती रहती है । इस वक्त साहित्य की दुनिया में हर रोज नए ध्रुवों और गुटों का जन्म होता है और इस जन्म की सूचना आपको फेसबुक पर मिल जाती है । फेसबुक के लोकप्रिय होने के पहले तो होता ये था कि लेखकों को किसी के पक्ष में दिखने या खड़े होने के लिए लेख आदि लिखने पड़ते थे लेकिन फेसबुक ने वो काम आसान कर दिया । अब आप लाइक या कमेंट या शेयर कर किसी के पक्ष में खड़े हो जाते हैं । कुछ सालों पहले जब महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति विभूति नारायण राय ने ज्ञानोदय पत्रिका में इंटरव्यू दिया था और उस इंटरव्यू के बाद छिनाल विवाद छिड़ा था तो मैत्रेयी पुष्पा ने उनके खिलाफ विरोध का झंडा बुलंद किया था । भारतीय ज्ञानपीठ के दफ्तर के बाहर मैत्रेयी पुष्पा के साथ नारे लगानेवाले साहित्यकार कालांतर में एक एक करके उनका साथ छोड़ गए । बिछड़े सभी बारी बारी बारी की तर्ज पर कोई वर्धा विश्वविद्यालय से जुड़ गया तो कोई कुलपति विभूति नारायण राय से किसी और तरह से उपकृत होकर उनके साथ हो लिया । इसी तरह से युवाओं को लेकर भी साहित्य में एक लंबी बहस चली थी जिसमें एक तरफ मैत्रेयी पुष्पा थीं और दूसरी तरफ कई लेखिकाएं । उस वक्त मैत्रेयी जी का खुलकर और लिखकर विरोध करनेवाली कई लेखिकाएं इन दिनों मैत्रेयी पुष्पा के साथ मंच साझा करती नजर आ रही हैं । मैत्रेयी पुष्पा भी उन लेखिकाओं के कार्यक्रमों में शिरकत कर रही हैं । तो इस तरह से अगर देखा जाए तो साहित्य जगत की इन जीवंतताओं का पता फेसबुक से ही चलता है । जीवंतता इस वजह से कह रहा हूं कि इसको गंभीरता से नहीं लिया जा सकता है और मनोरंजन के तौर पर इसका आनंद उठाना चाहिए क्योंकि ये मंच सबको एक्सपोज करता चलता है । एक्सपोज इस वजह से कि जोकमेंट किए जाते हैं वो बहुधा व्यक्तिगत हो जाते हैं । चंद सालों पहले एक लेखिका ने दूसरी लेखिका के खिलाफ फर्जी आईडी से कई आपत्तिजनक पोस्ट डाले थे । तब शायद उनको मालूममहीं रहा होगा कि कंप्यूटर और इंटरनेट के कनेक्शन की वजह से पोस्ट डालने वाले की पहचान हो सकती है । उस वक्त ये हुआ भी था और साहित्य जगत में बहुत बवाल खड़ा हुआ था ।  
गुटबाजी के इस खुले खेल के अलावा भी फेसबुक साहित्यक माहौल को जीवंत बनाए रखता है । फेसबुक को अगर आप नियमितता के साथ फॉलो करेंगे तो वहां आपको दो तीन लेखकों का एक ग्रुप नजर आएगा जो हर दिन किसी ना किसी तरह का विवाद उठाने के उपक्रम में जुड़े रहते हैं । ऐसा प्रतीत होता है कि इन लेखकों का ये छोटा गुट सुबह तय कर लेता है कि आज फलां लेखक को या फलां लेखिका को घेरना है और उसपर येनकेन प्रकारेण साहित्यक या साहित्येतर वजह से हमले करने हैं । अपनी योजना पर अमल करते हुए विवादित पोस्ट लिखे जाते हैं । उसके बाद होता है कि उन लेखकों से जुड़े छोटे-मोटे लेखक या लेखक बनने के लिए संघर्ष कर रहे कुछ लोग अति उत्साह में आकर इस या उस पक्ष पर हमलावर हो जाते हैं । साहित्य के इस खेल में बहुधा भाषिक मर्यादा की लक्षम्णरेखा लांघी जाती है, जिससे बचा जाना चाहिए । फेसबुक पर साहित्य से जुड़े कई लोग आपको ऐसे मिल जाएंगे जो अपने मठाधीश के हर पोस्ट पर किसी ना किसी तरह की टिप्पणी अवश्य करते हैं । वाह से लेकर आह टाइप की । फेसबुक पर कोई एक मठाधीश नहीं है यहां तो बडे. मंझोले और छोटे मठाधीश आपको मिल जाएंगे । कई मठाधीश तो इतने असहिष्णु हैं कि वो अपना मर्यादित विरोध नहीं झेल पाते हैं और विरोध के तर्क देनवाले को ब्लॉक कर अपना परचम लहराते रहते हैं ।

अब अगर हम विचार करें तो फेसबुक ने साहित्यक माहौल में अवश्य ही अनेक आयाम जोड़ दिए हैं लेकिन इन आयामों से साहित्य को क्या हासिल हो रहा है । हासिल हो रहा है भगवानदास मोरवाल सरीखे वरिष्ठ लेखकों का जो फेसबुक के मंच को अपनी किताब के प्रमोशन के लिए इस्तेमाल करते हैं । अपनी किताब के प्रमोशन का कोई भी मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहते हैं बल्कि मौके पैदा कर लेते हैं । फेसबुक का ये इस्तेमाल तो कोलकाता की साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त लेखिका अलका सरावगी ने भी अपनी किताब जानकीदास तेजपाल मैनशन के प्रकाशन के वक्त किया था । उन्होंने भी जमकर अपनीकिताब का प्रचार किया था । तब उसको लेकर भी विवाद खड़ा करने की कोशिश की गई थी । लेकिन देश में इंटरनेट के बढ़ते घनत्व के मद्देनजर फेसबुक जैसा माध्यम लेखकों को पाठकों तक पहुंचने का माध्यम बन सकता है । हलांकि इस माध्यम को चलानेवाले इसमें कारोबार की असीम संभवानाओं के मद्देनजर पोस्ट की पहुंच को सीमित कर दे रहे हैं बावजूद इसके लेखकों को इसका इस्तेमाल करना चाहिए । लेखकनुमा विवादप्रिय लोग तो कर ही रहे हैं, जेनुइन लेखकों को भी करना चाहिए ।