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Saturday, September 13, 2025

हिंदी तन-मन, हिंदी जीवन


हिंदी दिवस के पूर्व दिल्ली के प्रतिष्ठित मिरांडा हाउस महाविद्यालय में जागरण संवादी का आयोजन हुआ। दैनिक जागरण के अपनी भाषा हिंदी को समृद्ध करने के उपक्रम ‘हिंदी हैं हम’ के अंतर्गत कई शहरों में संवादी का आयोजन होता है। इस आयोजन में हिंदी भाषा को लेकर भी विचार विनिमय होता है। दिल्ली संवादी में भी भाषा को लेकर सत्रों में चर्चा हुई। आज हिंदी दिवस के अवसर उन चर्चाओं को याद कर रहा था तो अपनी भाषा हिंदी की व्याप्ति को लेकर गर्व का अनुभव हो रहा है। हिंदी हर तरफ बढ़ रही है। देश के प्रधानमंत्री विभिन्न अंतराष्ट्रीय मंचों पर हिंदी में बोलते हैं। गृह मंत्री अमित शाह हिंदी को लेकर उत्साहित रहते हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उत्पादों के उपर हिंदी में नाम लिखा जाने लगा है। इनके बारे में विचार करते समय एक बात ध्यान में आई कि हिंदी आज पूरे राष्ट्र में समादृत और स्वीकृत हो रही है तो इसका आaधार कहां से तैयार हुआ। हिंदी के किन पुरोधाओं ने इस भाषा को स्वरूप दिया और उसके लिए किस प्रकार का श्रम किया या उनका क्या योगदान था। सबसे पहले नाम याद आता है है भारतेन्दु का। भारतेन्दु ने हिंदी के विकास में बहुत महत्वपूर्ण योगदान किया। उनके अलावा भी कई लोग थे जिन्होंने हिंदी के लिए अपनी जिंदगी खपा दी। आज अगर हिंदी की धमक वैश्विक स्तर पर महसूस की जा रही है तो उनको याद करना आवश्यक है। कुछ दिनों पहले मैंने किसी पुस्तक में बाबू श्यामसुंदर दास की आत्मकथा की चर्चा पढ़ी थी। जिज्ञासा हुई इस पुस्तक के बारे में जानने की। दैनिक जागरण के प्रयागराज के संपादकीय प्रभारी राकेश पांडे से मैंने इस पुस्तक की चर्चा की। उनसे आग्रह किया कि 1941 में इंडियन प्रेस लिमिटेड, प्रयाग से प्रकाशित श्यामसुदंर दास की आत्मकथा उपलब्द करवाएं। ये पुस्तक तो उपलब्ध नहीं थी लेकिन प्रयासपूर्वक उनहोंने उसकी फोटो प्रति उपलब्ध करवा दी। उस पुस्तक को पढ़ते ये महसू, हुआ कि व्यक्तियों के अलावा हिंदी को वैज्ञानिक स्वरूप देने के लिए कई संस्थाओं ने भी उल्लेखनीय कार्य किया। इन संस्थाओं में से एक काशी की नागरी प्रचारिणी सभा भी है। 

बाबू श्यामसुंदर दास की पुस्तक में इस बात का उल्लेख मिलता है कि 1893 में काशी में स्कूलों में डिबेटिंग क्लब होते थे। बाद में कुछ बच्चों ने अपनी डिबेटिंग सोसाइटी बनाई। गर्मी की छुट्टियों में सोसाइटी का काम बंद हो गया था। 9 जुलाई 1893 को इस सोसाइटी का एक अधिवेशन बाबू हरिदास बुआसाव के अस्तबल के ऊपरी कमरे में हुआ। इसमें आर्यसमाज के उपदेशक शंकर लाल जी आए थे।उनका बेहद जोशीला भाषण हुआ। उसके बाद ये निर्णय हुआ कि अगले सप्ताह 16 जुलाई को फिर सभा हो। इसी दिन ये तय किया गया कि नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना की जाए। बाबू श्यामसुंदर दास सभा के मंत्री चुने गए। उनके साथ पंडित रामनारायण मिश्र, ठाकुर शिवकुमार सिंह थे। ये वो समय था जब भारतेन्दु का निधन हो चुका था। हिंदी का नाम लेना भी उस समय पाप समझा जाता था। कचहरियों में इसकी बिल्कुल पूछ नहीं थी। पढ़ाई में केवल मिडिल क्लास तक इसको स्थान मिला था। अधिक संख्या में विद्यार्थी उर्दू लेते थे। वो कहते हैं कि इस अपमान के वातावरण में लड़कों के खिलवाड़ की तरह नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना हुई। वो इसको ईश्वर कृपा मानते हैं। जब सभा की स्थापना हुई तो भारतजीवन पत्र के संपादक बाबू कार्तिकप्रसाद ने इसको आश्रय दिया। धीरे धीरे सभा ने हिंदी के लिए ठोस कार्य करने की पहल की। अर्थ का संकट आया। दरभंगा के महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह से सभा ने हिंदी का शब्दकोश तैयार करने के लिए आर्थिक सहायता मांगी। उन्होने तत्काल 125 रु की सहायता भेजी। साथ में लिखा कि सभा कार्य आरंभ करे भविष्य में और सहायता पर विचार करेंगे। कांकरौली के महाराज ने भी 100 रु की मदद की। इससे ही नागरी प्रचारिणी सभा ने कार्य आरंभ किया। हिंदी के प्राचीन ग्रंथों की खोज आरंभ हुई। लोग सभा से जुड़ते गए और हिंदी की समृद्धि का कार्य चलता रहा। 

इनके अलावा हिंदी को विस्तार देने में सरस्वती पत्रिका और उसके संपादक महावीर प्रसाद द्विवेदी का योगदान बहुत महत्वपूर्ण है। 1903-04 में द्विवेदी जी ने सरस्वती पत्रिका का संपादन झांसी से किया। द्विवेदी जी बहुत तीखा लिखा करते थे इस कारण जब वो सरस्वती के संपादक हुए तो वरिष्ठ लेखकों ने उनसे असहयोग शुरू कर दिया। कई बार तो उनको सरस्वती के लिए कई लेख स्वयं लिखने पड़ते थे। 1905 में द्विवेदी जी ने झांसी छोड़ दिया और कानपुर के पास जुहीकलां गांव में रहकर सरस्वती का संपादन करने लगे। अब जुही कानपुर शहर का हिस्सा है। जुही में उनके मित्र बाबू सीताराम ने उनकी खूब मदद की। उन्होंने अपने मित्र गिरधर शर्मा नवरत्न को लिखा कि ‘ऊपर भी हमारे सीताराम हैं और नीचे भी सीताराम’। सरस्वती के माध्यम से हिंदी सेवा में द्विवेदी जी इतने तल्लीन हो गए कि वो गंभीर रूप से बीमार हो गए। वर्ष 1910 में सरस्वती के अंकों के संपादन उनके मित्र पं देवीप्रसाद शुक्ल ने किया। जब सालभऱ बाद काम पर लौटे तो दिन रात हिंदी को आकार देने के कार्य में जुटे रहे। कुछ सालों बाद फिर उनका स्वास्थ्य बिगड़ा और 1918 में सरस्वती के संपादन कार्य से दो वर्ष का अवकाश लेना पड़ा। इस बार भी संपादन का दायित्व शुक्ल जी के पास आया। फिर वो वापस लौटे लेकिन ज्यादा दिनों तक कार्य नहीं कर सके। 1921 में पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी सरस्वती के संपादक बने। द्विवेदी जी अपने गांव दौलतपुर जाकर रहने लगे। 1938 में बीमारियों ने उको जकड़ लिया और दिसंबर में देह त्याग दिया। तब तक द्विवेदी जी हिंदी को ऐसा स्वरूप प्रदान कर चुके थे कि वो युग निर्माता कहलाए। 

द्विवेदी जी की सरस्वती में ही सहायक संपादक और फिर संपादक हुए देवीदत्त शुक्ल। सरस्वती के संपादन कार्य के दौरान उन्होंने भाषा और वर्तनी को सुधारने में बहुत श्रम किया। इस दौरान उनकी आंख में भयंकर तकलीफ हुई और उनके आंखों की रोशनी समाप्त हो गई। देवीदत्त शुक्ल ने हिंदी भाषा को और समावेशी बनाया। सरस्वती में साहित्येत्तर विषयों को प्रकाशित किया। यहां सरस्वती पत्रिका के मालिक चिंतामणि घोष को भी याद करना चाहिए। उन्होंने द्विवेदी जी से लेकर सभी संपादकों को खुली छूट दी, सम्मान भी। मदन मोहन मालवीय ने हिंदी को राष्ट्र निर्माण और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से जोड़कर कार्य किया। हिंदी के इन महापुरुषों के अलावा भी अन्य कई विद्वानों ने, राजाओं ने और कुछ अफसरों ने भी हिंदी को विकसित करने में अपनी भूमिका दर्ज करवाई। सूची बहुत लंबी हो सकती है लेकिन महावीर प्रसाद द्विवेदी जैसा समपर्ण और हिंदी को स्वरूप देने की जिद कम ही लोगों में दिखती है। आज हिंदी दिवस के अवसर पर द्विवेदी जी जैसे लोगों को याद करना बहुत आवश्यक है। स्मरण तो हिंदी की उस परंपरा को भी करना होगा जिसने भाषा को समृद्ध करने के लिए हस्तलिखित ग्रंथों की खोज की, शब्दकोश तैयार करवाए। पत्रिकाएं निकालीं और हिंदी को फलने फूलने का अवसर उपलब्ध करवाया। 


Sunday, July 5, 2020

‘सरस्वती’ और श्यामा प्रसाद मुखर्जी

हिंदी साहित्य के इतिहास में ‘सरस्वती’ पत्रिका का अपना एक विशिष्ट स्थान है। इस पत्रिका का प्रकाशन सन 1900 से आरंभ हुआ तो बाबू श्यामसुंदर दास ने इसका जिम्मा संभाला था। तीन साल बाद आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी इसके संपादक बनाए गए थे जो 1920 तक रहे। इनके बाद पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी और पंडित देवीदत्त शुक्ल जैसे विद्वानों ने इस पत्रिका को संभाला था। ‘सरस्वती’ पत्रिका के माध्यम से इसके संपादकों ने हिंदी को बहुत समृद्ध किया। इस पूरे दौर मे ‘सरस्वती’ पत्रिका में उत्कृष्ट साहित्य तो छपता ही था उस दौर की प्रमुख हस्तियों पर भी लेख आदि छपा करते थे। संपादकों की दृष्टि इतनी सजग होती थी कि कोई भी महत्वपूर्ण साहित्यिक घटना या साहित्यप्रेमी से संबंधित किसी प्रसंग को विषय विशेष के विद्वान से लिखवाते थे। इस बात की चर्चा इस वजह से प्रांसंगिक है कि आज भारत माता के सपूत श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जयंती है। श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जब देश की एकता और अखंडता के लिए 23 जून को अपना बलिदान दिया था तो ‘सरस्वती’ पत्रिका में देश, समाज और साहित्य के प्रति उनके योगदान को रेखांकित करते हुए चार पन्ने का बड़ा लेख प्रकाशित हुआ था। ये लेख लिखा था उस वक्त इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के आचार्य शिवाधार पांडेय ने और उस वक्त पत्रिका के संपादक थे पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी और देवीदयाल चतुर्वेदी।
इस लेख की शुरुआत शिवाधार जी ने कुछ इस प्रकार की थी, ‘कलिकाल में भी इस भारत भूमि में नररत्न अवतार लेते हैं, कर्मभूमि में आकर अपने कर्म सुधारते हैं, परलोक संवारते हैं और संसार उद्धारते हैं। श्यामा प्रसाद मुखर्जी ऐसे ही अवतारी पुरुष थे।‘ सरस्वती पत्रिका में इस लेख का शीर्षक ‘नरकेसरी श्यामा प्रसाद मुखर्जी’ दिया गया था। अपने लेख में आचार्य शिवाधार पांडेय ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी के संस्मरण तो लिखे ही थे, उनकी लोकप्रियता को भी पाठकों के सामने प्रस्तुत किया था। देश को ये जानना चाहिए कि इस देश में ऐसे भी नेता हुए जिनके दौरे की जानकारी देने का समय नहीं होता था तो सड़क पर चूना से सिर्फ उनका नाम और स्थान लिख दिया जाता था और फिर सभा में ऐसी भीड़ उमड़ती थी कि सभास्थल पर तिल रखने की जगह नहीं होती थी। श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ ऐसा ही हुआ था 1953 में मुंबई में एक जनसभा में। ये पूरा प्रसंग विस्तार से लिखा गया है।
श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जब अंग्रेजी में स्नातक किया तो उनके पिता आशुतोष मुखर्जी ने उनसे आग्रह किया कि उनको बांग्ला में एमए करना चाहिए क्योंकि इससे भारतीय भाषाओं को मजबूती मिलेगी। श्यामा प्रसाद मुखर्जी के दिल में ये बात बैठ गई, उन्होंने बांग्ला में एमए किया। इसके बाद जब वो कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति बने तो दीक्षांत समारोह में रवीन्द्रनाथ टैगोर को आमंत्रित किया। जब टैगोर ने आमंत्रण स्वीकार कर लिया तो श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने उनसे अनुरोध किया कि वो अपना भाषणा बांग्ला में दें। टैगोर ने उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया और कलकत्ता विश्वविद्यालय में पहली बार किसी ने बांग्ला में भाषण दिया। ये अपनी भाषा के प्रति श्यामा प्रसाद मुखर्जी का प्रेम था। श्यामा प्रसाद मुखर्जी को हिंदी से भी बहुत लगाव था। जनसंघ का पहला अधिवेशन कानपुर के फूलबाग में दिसंबर 1952 में हुआ था और डॉ मुखर्जी तीन दिन तक वहां उपस्थित रहे थे, इसको भी शिवाधार पांडेय जी ने दिलचस्प तरीके से ‘सरस्वती’ के लेख में रेखांकित किया है। 

Sunday, September 20, 2015

आचार्य पर अद्भुत ग्रंथ

हिंदी की बहुत सारी ऐसी महत्वपूर्ण किताबें हैं जो अब लगभग अप्राप्य हैं, जिसकी वजह से नए जमाने के पाठकों का उनसे और उसके लेखक से परिचय नहीं है । ये ऐसे ग्रंथ हैं जिनके पुनर्प्रकाशन से हिंदी को आगे बढ़ाने में मदद मिलती या फिर हिंदी के पाठकों को समृद्ध करने में मदद मिलती । एक जमाने में काशी नागरी प्रचारिणी, नागिरी प्रचारणी सभा,खडगविलास प्रेस, नवल किशोर प्रेस आदि से इतनी महच्वपूर्ण किताबें छपी थी जो कि इस वक्त लगभग अप्राप्य हैं । पिछले दिनों पं किशोरीदास वाजपेयी की किताब हिंदी शब्दानुसान पढ़ने की जरूरत महसूस हुई । इस किताब को खोजने का प्रयास शुरू हुआ, दिल्ली से लेकर वाराणसी तक के अपने संपर्कों को खटखटाया लेकिन किताब उपलब्ध नहीं हो सकी । बाद में मित्र अरुण माहेश्वरी ने वो पुस्तक उपलब्ध करवाई । हिंदी लिखनेवालों के लिए पंडित किशोरी दास वाजपेयी की यह किताब उतनी ही आवश्यक है जितनी जिंदगी को चलाने के लिए खाना या पानी । हो सकता है मेरी यह तुलना कुछ लोगों को अतिशयोक्ति लगे लेकिन जिस तरह से किशोरीदास वाजपेयी ने हिंदी और अन्य भाषा को जोड़कर शब्दों के उपयोग को सिखाया है वह अद्भुत है । अफसोस कि यह किताब लगभग अनुपलब्ध है । अब संभवत वाणी प्रकाशन से इसके छापने की योजना बन रही है । इसी तरह से कई किताबें हैं जिसका फिर से अगर प्रकाशन किया जाना चाहिए । दूसरी बड़ी समस्या है कि जिन किताबों का फिर से प्रकाशन हुआ उसमें धीरे-धीरे खुद ही बदलाव होते चले गए । जैसे प्रेमचंद का मशहूर उपन्यास गो-दान से गोदान हो गया । जब दस जून उन्नीस सौ छत्तीस में प्रेमचंद का उपन्यास गो-दान छपा था तब गो और दान के बीच हाइफन था । इसके आवरण पृष्ठ पर यह शीर्षक अंकित है. साथ ही नीचे सरस्वती प्रेस, बनारस और हिंदी ग्रंथ रत्नाकर कार्यालय, बम्बई छपा हुआ है । अभी प्रेमचंद साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान कमल किशोर गोयनका के संपादन में प्रकाशित हुई गो-दान में कई दिलचस्प बातें हैं । जैसे कमल किशोर गोयनका ने जनार्दन प्रसाद झा द्विज को उद्धृत करते हुए लिखा है जनार्दन प्रसाद झा द्विज ने अपनी पुस्तक प्रेमचंद की उपन्यास कला में लिखा है कि प्रेमचंद ने इसका नाम गौ-दान रखा था, परंतु मेरे कहने से गौ के स्थान पर गो अर्थात गो-दान कर दिया । अब ये सब हिंदी के पाठकों के लिए दिलचस्प प्रसंग हैं । हलांकि इस प्रसंग में तो विस्तृत शोध की आवश्यकता है कि क्योंकर और कैसे गो-दान से गोदान हो गया । अपनी इस किताब में कमल किशोर गोयनका ने इस बात के पर्याप्त संकेत किए हैं कि प्रेमचंद के इस उपन्यस के मूल पाठ में भी बदलाव हुआ है । यह विषय एक अलग लेख का है, ज्सपर फिर कभी विस्तार से चर्चा होगी ।
अभी हाल ही में हिंदी के एक और पुराने  और दुर्लभ ग्रंथ का पुनर्मुद्रण हुआ है । यह है आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी अभिनंदन ग्रंथ । यह किताब आज से करीब बयासी साल पहले आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के सत्तरवें वर्ष में प्रवेश के मौके पर उन्नीस सौ तैंतीस में छपा था । दरअसल इस ग्रंथ के छपने के पीछे की भी एक दिलचस्प कहानी है । बात 1932 की है आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी एक दिन के लिए काशी पधारे थे । उस वक्त काशीनागिरी प्रचारिणी सभा की ओर से उनको एक अभिनंदन पत्र दिया गया था । बात आई गई हो गई थी । कई दिनों बाद शिवपूजन सहाय ने काशी नागिरी प्रचारिणी सभा के मंत्री से चर्चा की कि सभा को केवल मानपत्र देकर ही नहीं रह जाना चाहिए, आचार्य के अभिनंदन के लिए एक सुंदर ग्रंथ का भी प्रकाशन होना चाहिए । सभा ने आचार्य शिवपूजन सहाय के इस प्रस्ताव पर सहमति दे दी और किताब छपने का काम शुरू कर दिया गया । आर्थिक संकट से निबटने के अलावा देश दुनिया के विद्वानों की आचार्यमहावीर प्रसाद द्विवेदी के बारे में राय मंगवाने की भी बड़ी चुनौती थी । काम शुरू हुआ तो आगे चलता चला गया । आचार्य अभिनंदन ग्रंथ के प्रकाशन के लिए इसके कर्ताधर्ताओं ने बेहद बारीकी से योजना बनाई थी । उस वक्त के अखबारों में इस योजना की चर्चा शुरू की गई ताकि इस किताब के बारे में उत्सकुता का एक वातावरण तैयार हो सके । यह योजना काम कर गई थी और हिंदी पट्टी में आचार्य के उपर प्रस्तावित ग्रंथ की चर्चा शुरू हो गई थी । एक समय तो ऐसा आया था कि लगा कि अब इस किताब के प्रकाशन की योजना पर ग्रहण लग जाएगा । जब इस किताब को छापने के लिए सभा के सामने आर्थिक संकट उत्पन्न हुआ तो वो उस वक्त देश के तमाम बड़े और धनवान लोगों के पास आर्थिक सहायता के लिए पत्र भेजा गया लेकिन बड़े-बड़े लोगों ने कोई मदद नहीं की । सबने योजना को अच्छा बताते हुए उसकी तारीफ की लेकिन आर्थिक मदद करने में असमर्थता जाहिर कर दी थी । इसके बाद राजाओं के पास संदेश भेजा गया । अखबारों में चर्चा का एक लाभ यह हुआ कि राजाओं के पास इस योजना की जानकारी पहुंच चुकी थी । उस वक्त के कई राजाओं ने इस किताब को छापने के लिए आर्थिक सहायता प्रदान की । सीतामऊ के राजपरिवार ने ना केवल सौ रुपए की आर्थिक मदद की बल्कि देश भर के राजघरानों से आर्थिक मदद दिलाने में सभा की  सहायता की । उस ग्रंथ की भूमिका में भी इस बात का उल्लेख मिलता है विषम आर्थिक परिस्थिति के कारण हमें आर्थिक सहायता प्राप्त करने में बड़ी अड़चन पड़ी । हमारे उद्देश्यों से सहानुभूति रखते हुए भी बड़े-बड़े श्रीमानों तक ने हमें कोरा उत्तर दे दिया । यदि सीतामऊ के राजकुल ने हमारा हाथ ना पकड़ा होता तो संभवत: हमें यह प्रस्ताव स्थगित कर देना पड़ता । हमारी प्रार्थना पहुंचते ही वहां के विद्या रसिक महाराज महोदय ने सौ रुपए का दान देकर हमें प्रोत्साहित किया । इसके अनंतर वहां के विद्वान राजकुमार ने, जिन्होंने हिंन्दी सेवा का व्रत धारण किया है और जो हिंदी के एक श्रेष्ठ उदयीमान लेखक हैं, अपने कई इष्ट मित्र नरपतियों से हमें सहायता दिलवाई ।अब इस तरह के वाकयों से हिंदी जगत लगभग अपरिचित है । इस तरह के ऐतिहासिक महत्व की किताबों को छापने का काम साहित्य अकादमी या नेशनल बुक ट्रस्ट को करना चाहिए ।

अभी हाल ही में नेशनल बुक ट्रस्ट ने आचार्य द्विवेदी के जन्मस्थान दौलतपुर में सक्रिय संस्था आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति के सौजन्य से हासिल इस दुर्लभ ग्रंथ को फिर से छापा है । दरअसल आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के एक सौ पचासवीं वर्षगांठ पर आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति, रायबरेली ने इस दुर्लभ ग्रंथ को फिर से छपवाने का बीड़ा उठाया था । जिस तरह से पहली बार इस ग्रंथ को छपने में बाधा आई थी उसी तरह से कई कठिनाइयों का सामना इसके पुनर्प्रकाशन में भी करना पड़ा । साहित्यप्रेमी और पत्रकार अरविंद कुमार सिंह ने भी इसमें पहल की और नेशनल बुक ट्रस्ट इसको छापने के लिए तैयार हुआ । पुनर्प्रकाशित इस ग्रंथ के महत्व को रेखांकित करते हुए आलोचक मैनेजर पांडे ने विस्तार से एक लेख लिखा है । मैनेजर पांडे ने आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी को युगद्रस्टा और युगस्रस्टा करार दिया है । मैनेजर पांडे ने साफ तौर पर कहा है कि आचार्य जी की साहित्य की धारणा बहुत ही व्यापक थी । वे केवल कविता, कहानी, उपन्यास नाटक, और आलोचना को ही साहित्य नहीं मानते थे । उनके अनुसार किसी भी भाषा में मौजूद ज्ञानराशि साहित्य है । द्विवेदी जी की यही धारणा उनके लेखन में भी दिखाई देती है जब वो उस वक्त के लगभग हर विषय पर अपनी लेखनी चलाते नजर आते हैं । उनकी किताब संपत्तिशास्त्र इसका बेहतरीन नमूना है । कहा जाता है कि हिंदी में इस किताब की टक्कर की दूसरी किताब नहीं है । आचार्य अभिनंदन ग्रंथ को देखकर इस बात का अंदाज लगाया जा सकता है कि उनके समकालीन उनके बारे में क्या सोचते थे । ये अभिनंदन ग्रंथ हाल के दिनों में छप रहे अभिनंदन ग्रंथ की तरह नहीं है बल्कि यह कहा जा सकता है कि इसमें जिन लोगों की राय है उससे आचार्य की एक लेखक के तौर पर और एक व्यक्ति के तौर पर छवि का निर्माण होता है । इस किताब में मैथिलीशरण गुप्त, सियाराम शरण गुप्त, वासुदेव शरण अग्रवाल, मौलाना सैयद हुसैन शिबली, संत निहाल सिंह, जार्ज ग्रियर्सन से लेकर महादेवी वर्मा, प्रेमचंद के अलावा महात्मा गांधी की राय भी है । पिछले दिनों वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र ने हनुमान प्रसाद पोद्दार के पत्रों को संग्रहित संपादित किया था पत्रों में समय संस्कृति । इसके बाद अब आचार्य अभिनंदन ग्रंथ का प्रकाशन हिंदी के लिए एक शुभ संकेत है । हलांकि ये आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति के गौरव द्विवेदी और पत्रकार अरविंद सिंह की पहल पर हुआ है, लेकिन नेशनल बुक ट्रस्ट को इस दिशा स्वतंत्र रूप से खोजबीन कर दुर्लभ ग्रंथों के प्रकाशन की पहल करनी होगी ताकि हिंदी के नए पाठकों को अपने गौरवशाली अतीत से परिचय हो सके ।