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Saturday, April 11, 2026

सांस्कृतिक संस्थाओं का हो पुनर्गठन


मार्च के अंतिम सप्ताह में दिल्ली में साहित्य अकादेमी ने एक बड़ा साहित्य उत्सव का आयोजन किया। जानकारों के मुताबिक आयोजन पर करीब तीन करोड़ रुपए खर्च होते हैं। संगीत नाटक अकादेमी की बेवसाइट पर कई कार्यक्रमों की सूचना मिलती है। ये संस्था विभिन्न अवसरों पर झांकियों से लेकर परेड का आयोजन करती है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय प्रतिवर्ष भारत रंग महोत्सव का आयोजन करता है। इसका बजट भी करीब पांच करोड़ के आसपास रहता है। इस आयोजन का उद्देश्य देश में नाट्य संस्कृति का विकास करना और रंगकर्मियों को एक राष्ट्रीय मंच उपलब्ध करना है। ललित कला अकादेमी की वेबसाइट पर अनेक प्रकार के हो चुके और होनेवाले इवेंट की जानकारी है। ये सभी संस्थान संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध हैं। ध्यान से देखने पर ये प्रतीत होता है कि ये संस्थाएं इवेंट मैनजमेंट कंपनी बन गई हैं। संस्कृति मंत्रालय के कई इवेंट ये संस्थाएं करवाती हैं। स्वाधीनता के अमृत महोत्सव के समय साहित्य अकादेमी ने रंगोली प्रतियोगिता जैसे अखिल भारतीय आयोजन में सहयोग किया था। अगर अकादमियों से आगे बढ़कर देखें तो संस्कृति मंत्रालय की ही एक और संस्था है सांस्कृतिक स्त्रोत एवं प्रशिक्षण केंद्र। इस संस्था का मुख्यालय दिल्ली में है। इस संस्था के निदेशक का पद जनवरी 2024 से खाली बताया जाता है। इस संस्था को एक सोसाइटी चलाती है। संस्था की वेबसाइट के मुताबिक सोसाइटी के सदस्यों की जगह खाली है। पता नहीं कब से। मंत्रालय के एक अधिकारी प्रभारी निदेशक के तौर पर संस्था का कामकाज देख रहे हैं। साहित्य अकादेमी और ललित कला अकादेमी का कामकाज मंत्रालय के अधिकारी देख रहे हैं। ललित कला अकादेमी के चेयरमैन के अधिकारों को लेकर विवाद हुआ था। जिसके बाद मंत्रालय ने उनके अधिकार कम कर दिए थे। उन्होंने संस्था आना छोड़ दिया। ललित कला अकादेमी एक ऐसी संस्था है जिसके पास अमूल्य कलाकृतियों की धरोहर है लेकिन उनकी उचित देखभाल और सुरक्षा पर प्रश्न उठते रहे हैं।

संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत ही क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र भी आते हैं। भारत सरकार ने सात जोनल कल्चरल सेंटर का गठन किया था। इन संस्थाओं का मूल उद्देश्य स्थानीय लोककलाओं का संरक्षण और संवर्धन था। इन क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों का मुख्यालय पटियाला, नागपुर, उदयपुर, प्रयागराज, कोलकाता, दीमापुर, और तंजावुर में है। 2024 में लोकसभा में अपने लिखित उत्तर में संस्कृति मंत्री ने बताया कि संस्कृति मंत्रालय इन क्षेत्रीय सांस्कृति केंद्रों के माध्यम से 14 राष्ट्रीय संस्कृति महोत्सव, चार क्षेत्रीय राष्ट्रीय महोत्सव का आयोजन करती है। इसके अलावा कला और संस्कृति के विकास के लिए कम से कम 42 क्षेत्रीय संस्कृति उत्सवों का आयोजन क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों के द्वारा किया जाता है। इन केंद्रों के चेयरमैन उन राज्यों के राज्यपाल होते हैं जिस राज्य में क्षेत्रीय केंद्र का मुख्यालय होता है। अगर राज्यपाल की रुचि कला-संस्कृति में है तो कार्य सुचारू रूप से चलता है अन्यथा नहीं। पूर्वी क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र के चेयरमैन बंगाल के पूर्व राज्यपाल सी वी आनंद बोस थे। उनकी सांस्कृति संस्थाओं के कामकाज में  रुचि कम थी। आर एन रवि के राज्यपाल बनने से कला जगत आशान्वित है। इन सांस्कृतिक केंद्रों का उद्देश्य कला और संस्कृति का संवर्धन और संरक्षण था। आयोजनों से उद्देश्य की आंशिक पूर्ति हो सकती है लेकिन मूल उद्देश्य कैसे पूरा होगा, इसपर चर्चा होनी चाहिए। कुल मिलाकर अगर मोटे तौर पर देखा जाए तो इन केंद्रों ने कला-संस्कृति से जुड़े संस्कृति मंत्रालय के आयोजन किए। 

संस्कृति मंत्रालय से आगे बढ़ते हैं और शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत तीन संस्थानों को देखते हैं, ये संस्थाएं हैं, आगरा स्थित केंद्रीय हिंदी संस्थान, दिल्ली स्थित केंद्रीय हिंदी निदेशालय और मैसूर का केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान। केंद्रीय हिंदी संस्थान का उद्देश्य है हिंदी का विकास और प्रसार। कमोबेश यही उद्देश्य केंद्रीय हिंदी निदेशालय का भी है। केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान का उद्देश्य सभी भारतीय भाषाओं का संवर्धन और संरक्षण है। इसमें हिंदी भी शामिल है। तीनों संस्थान अलग अलग शहरों में हैं। तीनों का प्रशासनिक ढांचा है, तीनों के कर्मचारी और अधिकारी अलग हैं परंतु तीनों के उद्देश्य एक हैं। तीनों एक ही मंत्रालय के अधीन हैं लेकिन तीनों अलग अलग काम कर रही हैं और तीनों में समन्वय न्यूनतम है। इसी तरह संगीत नाटक अकादेमी और भारतीय नाट्य विद्यालय के कई कार्यों में समानता है। दिल्ली में कुछ ही मीटर की दूरी पर इनके कार्यालय हैं लेकिन दोनों संस्थाओं में समन्वय न्यूनतम है, जबकि दोनों संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध हैं। ललिता कला अकादेमी और नेशनल गैलरी आफ माडर्न आर्ट के उद्देश्यों को देखें तो दोनों में कई समानताएं दिखाई देंगी। कामकाज भी एक जसा ही है लेकिन समन्वय न्यूनतम। ये दोनों संस्थाएं भी संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत हैं। कला और संस्कृति से जुड़ी संस्थाओं को देखें तो कई ऐसी संस्थाएं हैं जिनके उद्देश्य लगभग एक हैं लेकिन उनके बीच समन्वय का अभाव है। इन सबके अलावा इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र भी है जो कला और संस्कृति के क्षेत्र में काम कर रही है।

स्वाधीनता के बाद देश में जब कला और संस्कृति से जुड़ी हुई संस्थाएं बनने लगीं तो अलग अलग विधाओं के लिए अलग अलग अकादमियों की स्थापना हुई। कालांतर में जब कांग्रेस सरकार ने कला और संस्कृति को वामपंथियों को आउटसोर्स कर दिया तो और संस्थाएं बनीं। अपने लोगों को स्थापित करने के लिए संस्थाएं बनाई जाने लगीं। परिणाम ये हुआ कि संस्थाएं बन गई और मनचाहे लोगों के हाथों में इनकी कमान सौंपी गईं। उद्देश्यों की ओवरलैपिंग के बारे में विचार नहीं किया जा सका। स्वाधीनता के इतने वर्षों बाद जब भारत विकसित राष्ट्र की राह पर चल पड़ा है तो आवश्यकता इस बात की है कि इन संस्थाओं के क्रियाकलापों पर पुनर्विचार हो। इनके उद्देश्यों को लेकर भी पुनर्विचार की आवश्यकता है। जहां दो संस्थाओं के उद्देश्य एक हैं उनका विलय किया जाना चाहिए। बेहतर तो ये होगा कि कला और संस्कृति से जुड़ी सभी संस्थाओं का पुनर्गठन किया जाए और एक ऐसी संस्था बने जहां अंतराष्ट्रीय स्तर के कार्य हों, शोध हों और उसका प्रचार प्रसार हो। भाषा, संस्कृति और कला से जुड़े अलग-अलग विभाग उस बड़ी संस्था के प्रशासनिक नियंत्रण में हों ताकि समन्वय बेहतर हो सके और कार्यों में दुराव न हो। मंत्रालय आयोजनों से आगे जाकर नीति निर्माण के कार्य में जुटे। भारत की अपनी संस्कृति नीति बनाई जाए। इन संस्थाओं के पुनर्गठन के बाद जिस संस्था का निर्माण हो वो व्यापक स्तर पर कार्य करे। पुनर्गठन के बाद भारतीय संस्कृति के संवर्धन और विकास के लिए अगर एक बड़ी संस्था बनती है तो उसका काम भारत समेत दुनिया के अन्य देशों में भारतीय संस्कृति, कला और लेखन को लेकर जाने का हो। करीब दो वर्ष पहले जब गोविंद मोहन संस्कृति मंत्रालय के सचिव थे तब भारत की संस्कृति के वैश्विक प्रचार प्रसार के लिए नीति बनाने को लेकर दिल्ली के भारत मंडपम में देशभर के विद्वानों ने मंथन किया था। उसके बाद उस पहल का क्या हुआ पता नहीं चल पाया। आज इस बात की आवश्यकता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विकसित भारत के लक्ष्य को ध्यान में रखकर कला संस्कृति, भाषा के लिए काम करनेवाली संस्थाओं का परीक्षण और पुनर्गठन हो। 


Saturday, April 4, 2026

फिल्मों के सामाजिक सरोकार


इस वर्ष जनवरी के आखिर में जब रानी मुखर्जी अभिनीत फिल्म मर्दानी-3 रिलीज हुई थी तब दिल्ली से लापता हो रही बच्चियों का मुद्दा जोर-शोर से उठा था। एक रिपोर्ट के हवाले से ये समाचार चर्चा में आया था कि दिल्ली और आसपास के इलाकों से भारी संख्या में किशोरियां और महिलाएं गायब हो रही हैं। उस समय आए आंकड़े बेहद डरानेवाले थे। तब भी ये भी कहा गया था कि जिस रिपोर्ट के हवाले से मुद्दा बनाया जा रहा था उसमें गायब हुई लड़कियों की बरामदगी के आंकड़े नहीं दिखाए गए थे। आंकड़ों को लेकर जब चर्चा बढ़ी को दिल्ली पुलिस हरकत में आई। पुलिस ने एक्स पर एक पोस्ट किया। उसमें लिखा कि, चंद संकेतों या प्रारंभिक जानकारी को जांचने के बाद ये सामने आया कि दिल्ली से गुमशुदा लड़कियों की संख्या पेड प्रमोशन का हिस्सा है। दिल्ली पुलिस ने स्पष्ट किया था कि डर का माहौल बनाकर लाभ कमाने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। इस तरह का वातावरण बनानेवालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। संयोग ऐसा था कि मर्दानी 3 में भी दिल्ली और इसके आसपास के इलाकों से बच्चियों के गायब होने की कहानी थी। दिल्ली पुलिस के पेड प्रमोशन वाले पोस्ट के बाद चर्चा कम जरूर हुईं लेकिन समाचारपत्रों में लड़कियों के गायब होने के बारे में कुछ न कुछ सामग्री प्रकाशित होती रही। गुमशुदा होनेवाली लड़कियों की संख्या के साथ साथ बरामदगी की संख्या भी प्रकाशित हुई। इससे इंटरनेट मीडिया से बना भ्रम कुछ कम हुआ और राजधानी और इसके आसपास के क्षेत्रों के निवासियों में भय भी कम हुआ। 

फिल्म मर्दानी-3 में बच्चियों का अपहरण कर उनको विदेश भेजने और उनपर दवाओं के ट्रायल की बहुत मार्मिक और भयावह कहानी है। फिल्मकार ने ये दिखाने का प्रयास किया है कि मानव तस्करी सिर्फ देह व्यापार के लिए नहीं होती बल्कि इसके अनेक रूप होते हैं। इस फिल्म में बच्चियों का अपरहण किया जाता था और जिनका ब्लड ग्रुप खास किस्म का होता था उसको विदेश ले जाकर उसपर कैंसर की दवाई का टेस्ट किया जाता था। अगवा की गई जिन लड़कियों का ब्लड ग्रुप उस समूह का नहीं होता है उनसे भीख मंगवाने से लेकर अन्य गैरकानूनी कार्य करवाए जाते थे। कैंसर की दवाई का जिन लड़कियों पर टेस्ट किया जाता था उनकी हालत बहुत खराब हो जाती थी और कुछ समय बाद तड़प तड़प कर उनकी मृत्यु होते दिखाया गया। इस सिंडिकेट में लड़कियों के लिए काम करने वाली एक संस्था और उसके प्रमुख की संलिप्तता भी दिखाई गई थी। कहानी थोड़ी फिल्मी भी होती है। जांच कर रही पुलिस आफिसर को सस्पेंड कर दिया जाता है लेकिन वो विभाग के अपने साथियों का साथ श्रीलंका जाकर इस गैंग का खात्मा करती है। फिल्म में कई टर्न और ट्विस्ट हैं, जो फिल्म को रोचक बनाने और दर्शकों को बांधने के लिए किए गए हैं, पर मूल कहानी तो लड़कियों का गिनी पिग की तरह इस्तेमाल करने की ही है। फिल्म की कहानी, संभव है काल्पनिक हो लेकिन मानव तस्करी का जो पहलू इसमें दिखाया गया है उसको देखकर गायब होने वाली लड़कियों को लेकर समाज को चिंतित होना चाहिए। ये अपराध बेहद संगठित और समाज के इज्जतदार लोगों की सरपरस्ती में चलता हुआ दिखाया गया है। वैसे लोग जो पैसे की खातिर किसी की जान को बेचने या जान लेने में नहीं हिचकते हैं। 

फिल्म से वापस समाज में लौटते हैं। तीन चार दिन पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने बच्चों की तस्करी को लेकर एक याचिका पर सुनवाई के दौरान बेहद कठोर टिप्पणी की। अदालत ने कहा मानक संचालन प्रक्रिया (स्टैंडर्ड आपरेटिंग प्रोसिड्योर) और न्यायिक आदेशों के बावजूद दिल्ली बच्चों की तस्करी की मंडी बन चुकी है। हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस और राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग से ये जानना चाहा कि बच्चों की तस्करी को रोकने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने एक बेहद ही डराने और चौंकानेवाली बात कही। याचिकाकर्ता ने एक घटना का उल्लेख करते हुए बताया कि दिल्ली के आनंद विहार रेलवे स्टेशन से एक बच्ची को बचाकर पुलिस को सौंपा गया था। आरोप लगाया गया कि पुलिस ने बचाई गई बच्ची को बाल कल्याण समिति के सामने पेश करने की बजाए उसको वापस तस्करों को सौंप दिया। बाद में वही बच्ची फिर से तस्करों के पास से मिली। अगर ये आरोप सही हैं तो ये हमारे सिस्टम पर बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह है। कोर्ट ने इस आरोप का संज्ञान लिया है। हलांकि इस सुनवाई के दौरान ये बात भी सामने आई कि 2018 से लेकर 2024 के बीच रेलवे सुरक्षा बल ने रेलवे परिसर से 84000 बच्चों को बचाया भी। इस तरह से कई अन्य आंकड़े भी कोर्ट के समझ रखे गए थे। आज जब हमारी पुलिस व्यवस्था अत्याधुनिक तकनीकी उपकरणों और सुविधाओं से युक्त है तब कोर्ट की तस्करी की मंडी बनने जैसी टिप्पणी भयावह है। आज भी अगर बच्चों की तस्करी हो रही है तो उसका किन अपराध में उपयोग हो रहा होगा इस बारे में सोचकर सिहरन होती है। 

कई बार ये कहा जाता है कि फिल्में समाज के लिए संदेश देने का काम करती है। मर्दानी 3 में कम उम्र की लड़कियों का अपहरण करके विदेश भेजने की बात हो या वेबसीरीज डेल्ही क्राइम-3 में कम उम्र की लड़कियों को विदेश में बेचने की कहानी, एक संकेत तो समाज को दिया ही जा रहा है। इस तरह की कहानियां फिल्मों में आ रही हों और उसी समय इस तरह के केस कोर्ट में भी सुनवाई के लिए आ रहे हों तो ये प्रतीत होता है कि फिल्में कुछ तो कहने का प्रयास कर रही हैं। फिल्मों को बहुधा मनोरंजन कह कर खारिज कर दिया जाता है, लेकिन कई बार उनसे निकलनेवाले संदेश को पकड़ने की आवश्यकता भी है। 1950 में व्ही शांताराम की एक फिल्म आई थी दहेज। स्वाधीन भारत में दहेज की समस्या को लेकर ये फिल्म बनी थी। इस बात की कई बार चर्चा होती है कि बिहार विधानसभा में दहेज की कुरीति पर चर्चा के दौरान इस फिल्म का नाम कई बार आया था। कहा तो यहां तक जाता है कि बिहार में दहेज उन्मूलन कानून बनने के पीछे इस फिल्म की प्रेरणा थी। इस बात में सचाई हो या ना हो लेकिन इतना तो तय है कि व्ही शांताराम ने अपने फिल्म के माध्यम से इस कुरीति को चर्चा के केंद्र में ला दिया था। फिल्मों से ऐसे कई उदाहरण दिए जा सकते हैं। आज अगर मर्दानी-3 में बालिकाओं की तस्करी का मुद्दा उठा है तो समाज को इस घृणित अपराध के बारे में गंभीरता से विचार करना चाहिए। सरकार और पुलिस तो अपने स्तर पर प्रयास करेंगी, अदालतों में सुनवाई होगीं, आदेश पारित होंगे लेकिन जबतक हमारा समाज इस अपराध के खिलाफ सजग होकर नहीं उठेगा तबतक बेटियों की तस्करी पर लगाम लगा पाना संभव नहीं है। आज जब हमारा देश विकसित बनने की राह पर अग्रसर है तब इस तरह के अपराध की समाज में कोई जगह होनी नहीं चाहिए।