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Thursday, March 20, 2014

सूना हुआ जीवंत कोना

जिंदगी की पिच पर खुशवंत सिंह शतक से चूक गए और निन्यानवे साल की उम्र में उनका निधन हो गया । कहते हैं कि हर किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता लेकिन खुशवंत सिंह ने ना केवल मुकम्मल जिंदगी जी बल्कि उन्हें मुकम्मल जहां भी मिला । विदेश सेवा में अफसर से लेकर संपादक, इतिहासकार और राजनेता तक का जीवन जिया और हर जगह अपनी अमिट छाप छोड़ी । खुशवंत सिंह को विवादों में बड़ा मजा आता था और उनके करीबी बताते हैं कि वो जानबूझकर विवादों को हवा देते थे । उनके करीबी लेखकों का तो यहां तक कहना है कि विवादों से उन्हें लेखकीय उर्जा मिलती थी और यही ऊर्जा उनसे जीवन पर्यंन्त स्तंभ लिखवाती रही । उनका स्तंभ- विद मलाइस टुवर्ड्स वन एंड ऑल लगभग पचास साल तक चला और माना जाता है कि भारत में सबसे लंबे समय तक चलनेवाला और सबसे लोकप्रिय स्तंभ था । इस स्तंभ में मारियो मिरांडा का बनाया एक कार्टून भी छपता था जिसमें बल्ब के अंदर वो बैठे थे । मारियो उनके साथ एक पत्रिका में काम करते थे । अबतक खुशवंत सिंह की लगभग अस्सी किताबें छप चुकी हैं। पिछले साल भी उनकी एक किताब आई थी । उस किताब पर पंजाब के एक विश्वविद्यालय में एक कार्यक्रम हुआ था जिसमें खुशवंत सिंह के बेटे राहुल सिंह ने उनका एक वक्तव्य पढा था । अपने संदेश में खुशवंत सिंह ने कहा था- लगता है कि वक्त आ गया है मुझे अब मर जाना चाहिए और मरने के बाद मैं एक ऐसे व्यक्ति के रूप में पहचान चाहता हूं जिसने ताउम्र लोगों को हंसाया । खुशवंत सिंह ने अपने पाठकों को हंसाया जरूर लेकिन अपनी टिप्पणियों और लेखों से लोगों को सोचने पर मजबूर भी किया था । उनकी किताब ट्रेन टू पाकिस्तान और दो खंडों में सिखों का इतिहास काफी चर्चित रहा था । उनकी आत्मकथा का हिंदी अनुवाद सच, प्यार और थोड़ी सी शरारत जब छपा तो अपने प्रसंगों की वजह से काफी चर्चित हुआ था ।
खुशवंत सिंह इंदिरा गांधी के बेहद करीब थे और उन्होंने इमरजेंसी के दौरान उनका समर्थन भी किया था लेकिन बाद में जब इंदिरा गांधी ने ऑपरेशन ब्लूस्टार को मंजूरी दी तो वो उनके खिलाफ हो गए और पद्म सम्मान वापस कर दिया । यहां यह बात गौर करने लायक है कि खुशवंत सिंह ने चरमपंथी नेता जरनैल सिंह भिंडरावाले और उनकी नीतियों का जमकर विरोध किया था । खुशवंत सिंह पाकिस्तान के हदाली में उन्नीस सौ पंद्रह में पैदा हुए थे और बंटवारे के बाद भारत आ गए थे । खुशवंत सिंह के पिता सरदार सोभा सिंह को लुटियन दिल्ली बनाने का ठेका मिला था । दिल्ली के ही सुजान सिंह पार्क में खुशवंत सिंह ने अंतिम सांसे ली । खुशवंत सिंह के जाने के बाद साहित्य और पत्रकारिता का एक जीवंत कोना सूना हो गया है ।   
 

Sunday, March 16, 2014

ताकि मिल सके नोबेल पुरस्कार...

साहित्य अकादमी ने इस साल से एक बेहद अहम शुरुआत की है । अकादमी ने चौबीस भाषाओं के सम्मानित साहित्यकारों से संवाद का एक खुला कार्यक्रम आयोजित किया था । साहित्य अकादमी के सालाना साहित्योत्सव में अकादमी पुरस्कार से पुरस्कृत लेखकों के साथ संवाद कार्यक्रम में एक सुधी पाठक ने बेहद ही अहम सवाल उठाया । एक पाठक ने वहां मौजूद लेखकों से पूछा कि रवीन्द्र नाथ टैगोर के बाद किसी भी भारतीय लेखक को नोबेल पुरस्कार क्यों नहीं मिला । अलग अलग लेखकों के अलग अलग तर्क थे लेकिन कोई भी इस सवाल का सही जवाब नहीं दे पा रहे थे। लेकिन इस बात पर लेखकों के बीच मतैक्य था कि साहित्य अकादमी को लेखकों की रचनाओं को एक वृहत्तर पाठक वर्ग तक पहुंचाने और पढ़वाने के लिए और काम करना होगा । जिस वक्त साहित्य अकादमी के मुख्यालय रवीन्द्र भवन के लॉन में लेखकों के साथ यह संवाद चल रहा था ठीक उसी वक्त अकादमी भवन में साहित्य अकादमी की साधारण सभा के सदस्यों की समांतर बैठक चल रही थी । उस बैठक में भी इस बात पर चिंता व्यक्त की गई कि गुरुदेव टैगोर के बाद भारत के किसी लेखक को नोबेल पुरस्कार क्यों नहीं मिल पाया । भारतीय प्रकाशकों के प्रतिनिधि के तौर पर जनरल काउंसिल के सदस्य अरुण माहेश्वरी ने इस इस बात पर जोर दिया कि साहित्य अकादमी में भारतीय भाषा के लेखकों और उनकी रचनाओं के अंतराष्ट्रीय स्तर पर प्रचार प्रसार के लिए एक इंटरनेशनल सेल का गठन किया जाना चाहिए । अरुण माहेश्वरी ने बैठक में अपनी तरफ से एक चार सूत्रीय प्रस्ताव भी पेश किया जिसमें किताबों की मार्केटिंग से लेकर उनके अनुवाद तक के बारे में सुझाव दिए गए थे । साहित्य अकादमी की आमसभा के सदस्य अरुण माहेश्वरी ने इस बात पर भी अफसोस जाहिर किया कि नोबेल पुरस्कार को छोड़कर अन्य अंतराष्ट्रीय पुरस्कारों के लिए भारतीय भाषा के लेखकों की भागीदारी सुनिश्चित करवाने के लिए साहित्य अकादमी के पास कोई योजना नहीं है । इन तर्कों में दम भी है । हमें अगर अपने देश के लेखकों को अंतराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करना है तो इसके लिए सुनियोजित तरीके से काम करना होगा । अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार के जूरी के सदस्यों तक उनकी भाषा में कृतियों को पहुंचाने का इंतजाम करना होगा । यह जिम्मेदारी साहित्य अकादमी को ही उठानी होगी ।  

दरअसल साहित्य अकादमी की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि वहां विश्वविद्यालय शिक्षकों का बोलबाला है । इन शिक्षकों का कॉकस इस तरह से काम करता है कि बाहर के लोगों को ये अकादमी में घुसने ही नहीं देते हैं और ना ही उनके किसी रचनात्मक प्रस्ताव को आगे बढ़ाने में रुचि दिखाते हैं । साहित्य अकादमी का एक मुख्य काम एक भाषा की श्रेष्ठ रचना का अनुवाद दूसरी भाषा में करवाना भी है । अनुवाद का यह काम जितनी तेजी से होना चाहिए वो हो नहीं पाता है । चार-पांच साल पहले लेखकों से अनुवाद करवाकर रख लिए जाते हैं । अनुवादक को भुगतान भी हो जाता है लेकिन किताबें नहीं छप पाती हैं । वितरण की बात तो छपने के बाद सामने आती हैं । अनुवाद की इस धीमी गति से चलने की वजह से कई बार अच्छी कृतियों को पढ़ने से दूसरी भाषा का पाठक महरूम रह जाता है । अकादमी को भारतीय भाषा के लेखकों को अंतराष्ट्रीय स्तर पर ले जाने के लिए बहुत यत्न करने होंगे । विश्वविद्यालय के शिक्षकों से इतर लेखकों को अपने साथ जोड़ना होगा और उनकी सलाह पर विचार भी करना होगा । घिसे पिटे ढर्रे पर चलकर भारतीय भाषाओं को अंतराष्ट्रीय स्तकर पर मान्यता नहीं मिल सकती है । 

अन्ना के असफल पड़ाव

भारतीय राजनीति और समाज सेवा के क्षेत्र में अन्ना हजारे एक ऐसा नाम हैं जिसे दो हजार ग्यारह के पहले महाराष्ट्र के एक इलाके के ही लोग जानते थे । महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में अन्ना हजारे के गांव रालेगण सिद्धि को समाज सुधार के मॉडल के तौर पर देखा जाने लगा था । अन्ना हजारे ने वहां के सरपंच के साथ मिलकर पूरे इलाके की तस्वीर बदलने में अहम भूमिका निभाई थी । एक जमाने में गांव में शराब की दर्जनों दुकानें थी और वहां पानी की बेहद दिक्कत थी । अन्ना हजारे ने शराबबंदी के खिलाफ मुहिम सफलतापूर्वक मुहिम चलाई और वाटर हारवेस्टिंग के जरिए रालेगण सिद्धि को पानी के मसले में आत्मनिर्भर बनाया । अन्ना के प्रयासों का ही नतीजा था कि रालेगण सिद्धि में प्रति व्यक्ति औसत आय तकरीबन राजधानी दिल्ली के प्रति व्यक्ति औसत आय तक पहुंच गई । उनके आंदोलनों की वजह से महाराष्ट्र के कई मंत्रियों को कुर्सियां गंवानी पड़ी, कई नेताओं को जेल भी जाना पड़ा । इस तरह से अन्ना हजारे महाराष्ट्र में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक योद्धा के रूप में जाने गए । कालांतर में अन्ना हजारे ने महाराष्ट्र के प्रत्येक ब्लॉक में एक संयोजक नियुक्त किया जो उन्हें इलाके में हो रहे भ्रष्टाचार की जानकारी देता था और अन्ना के निर्देश के हिसाब से उसके खिलाफ काम करता था । बाद में जब अरविंद केजरीवाल ने अरुणा राय और उनके संगठन से अलग होकर जनलोकपाल की लड़ाई लड़ने का फैसला किया तो केजरीवाल को आंदोलन के लिए एक चेहरे की दरकार पड़ी । अन्ना हजारे के रूप में केजरीवाल को एक ऐसा शख्स मिला जो बुजुर्ग होने के साथ साथ धोती कुर्ता और गांधी टोपी पहनता था । जिसका कोई परिवार नहीं था और वो मंदिर में रहता था । भारतीय जनमानस को लुभाने के लिए एक आदर्श छवि थी । अन्ना हजारे के नेतृत्व में दिल्ली में भ्रष्टाचार के खिलाफ एलान ए जंग हुआ । भ्रष्टाचार के खिलाफ लोगों का गुस्सा इतना था कि उस आंदोलन को अभूतपूर्व समर्थन मिला । अन्ना हजारे का चेहरा और अरविंद केजरीवाल की सूक्ष्मतम स्तर की योजना ने रंग दिखाया । उसके बाद की बातें इतिहास हैं ।

दो साल के अंदर जब अरविंद केजरीवाल की राजनीतिक महात्वाकांक्षा ने आम आदमी पार्टी का गठन किया तो अन्ना हजारे ने अपने आपको केजरीवाल की महात्वाकांक्षा से खुल को अलग कर लिया । दोनों के बीच बढ़ रही संवादहीनता ने तल्खी को भी बढ़ाव दिया । दिल्ली विधानसभा चुनाव के पहले अन्ना हजारे ने अरविंद केजरीवाल को अपना नाम इस्तेमाल नहीं करने को कहा जिसे आम आदमी पार्टी ने लगभग मान लिया । इस बीच अन्ना हजारे और पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वी के सिंह ने देशभर में जनतंत्र यात्रा की । इस यात्रा की सफलका को लेकर दो तरह के मत हैं । केजरीवाल के सिपहसालारों ने अन्ना के नए सहयोगियों पर उनको बरगलाने का आरोप लगाया । दोनों खेमों में जमकर आरोप प्रत्यारोप का दौर चला । इस बीच संसद से लोकपाल बिल पास होने के चंद दिन पहले अन्ना रालेगण सिद्धि में अनशन पर बैठ गए । उनके अनशन के दौरान संसद ने लोकपाल बिल पास कर दिया ।  बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने इस बात का श्रेय अन्ना हजारे को दिया । यह सब दिल्ली विधानसभा के चुनाव में आम आदमी पार्टी की ऐतिहासिक जीत के बाद हो रहा था । कई राजनीति विश्लेषकों की राय थी कि अरविंद केजरीवाल के बढ़ते असर को कम करने के लिए कांग्रेस और बीजेपी ने मिलकर अन्ना को इसका श्रेय देने की रणनीति बनाई थी । इस दौरान किरण बेदी लगातार अन्ना के साथ डटी रहीं और केजरीवाल पर ट्विटर के जरिए हमले करती रहीं । गौरतलब है कि दो साल पहले तक किरण बेदी और अरविंद केजरीवाल कंधे से कंधा मिलाकर दिल्ली में जनलोकपाल की लड़ाई लड़ रही थी । जब अन्ना और केजरीवाल के बीच टकराहट हुई तो बेदी ने अन्ना के साथ रहने का फैसला किया । बाद में किरण बेदी भी बीजेपी की और झुकी और अन्ना के सहयोगी जनरल वी के सिंह ने तो बकायदा बीजेपी का दामन थाम लिया और पार्टी की सदस्यता ले ली । किरण बेदी भी मोदी की शान में कसीदे पढ़ती नजर आई । अन्ना फिलहाल अलग थलग पड़ते नजर आए । टीम अन्ना में काफी बदलाव आ चुका था । हमेशा से अपने आपको राजनीति से अलग रहने का ऐलान करते रहे अन्ना हजारे के नए रणनीतिकारों ने उन्हें पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के करीब पहुंचा दिया । अन्ना हजारे ने देश के कई पार्टी के नेताओं को पत्र लिखकर 17 बिंदुओं पर उनका राय मांगी । ममता बनर्जी ने अन्ना के खत का जवाब दिया तो अन्ना को ममता बनर्जी में देश का नया नायक नजर आने लगा । ममता बनर्जी के दूत मुकुल रॉय से मिलने के बाद अन्ना की दिल्ली में ममता बनर्जी से मुलाकात हुई । नतीजे में अन्ना ने ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवारों का लोकसभा चुनाव में समर्थन का ऐलान कर दिया । आनन फानन में अन्ना हजारे का तृणमूल को समर्थन का विज्ञापन टीवी चैनलों पर नजर आने लगा । अन्ना के नए रणनीतिकारों और ममता के सिपहसालारों को लगने लगा कि दिल्ली अब दूर नहीं है । इस पूरी रणनीति के पीछे हरियाणा के एक राजनेता उद्योगपति की बेहद सक्रिय भूमिका रही । इतना तक तो ठीक था । दिल्ली के ऐतिहासिक मैदान में अन्ना और ममता की संयुक्त रैली का आयोजन किया गया था लेकिन रैली में ना तो अन्ना पहुंचे और ना ही लोग । हजार दो हजार लोगों के सामने ममता बनर्जी ने दावा किया कि ये अन्ना की रैली थी लिहाजा भीड़ नहीं होने की जिम्मेदारी उनकी नहीं है । इसके पहले एक नाटकीय घटनाक्रम में पश्चिम बंगाल के टीपू मस्जिद के इमाम ने ममता को अन्ना हजारे से दूर रहने की सलाह दी । इमाम साहब ने इशारों इशारों में ममता को चेतावनी देते हुए अन्ना को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का आदमी बता दिया । अब ममता धर्मसंकट में थी । वो पश्चिम बंगाल के मुसलमानों के बीच गलत संदेश नहीं देना चाहती थी । ममता दिल्ली पहुंची, रैली में शामिल हुईं, अन्ना हजारे नहीं पहुंचे । अन्ना की खराब तबीयत का हालचाल लेने बीजेपी के नेता जनरल वी के सिंह तो पहुंचे लेकिन ममता बनर्जी नहीं पहुंची । संकेत सबकुछ ठीक-ठाक होने का नहीं है । दो साल में अन्ना हजारे के इतने सहयोगी बदल चुके हैं कि अन्ना की राष्ट्रव्यापी विश्वसीनयता संदिग्ध हो गई है । दिल्ली में रामलीला मैदान में फ्लॉप रैली से राजनीतिक दलों से अन्ना हजारे का खौफ भी कम होता दिख रहा है । यही सारे दल चाहते भी थे । सोचना तो उन राजनीतिक टिप्पणीकारों को भी पड़ेगा जो कि दो हजार ग्यारह में अन्ना को मिल रहे जनसमर्थन के आधार पर उनका मूल्यांकन कर बैठे । हड़बड़ी में इन राजनीतिक टीकाकारों ने अन्ना को छोटे गांधी से लेकर दूसरे महात्मा तक की उपाधि दे डाली थी । जबकि दो साल में यह बात साबित हो गई कि अन्ना हजारे में कोई राष्ट्रव्यापी सोच या दृष्टि नहीं है । गांधी के बरक्श अन्ना हजारे को खड़ा करनेवाले इन राजनीति पंडितों को ना तो इतिहास बोध है और हड़बड़ी में उन्होंने तुलनात्मकता के आधारभूत सिद्धांतों का पालन करना भूल गए ।अरविंद केजरीवाल उनको राष्ट्रीय फलक पर लेकर आए और उसके बाद से अन्ना कभी इनके तो कभी उनके साथ रहे । कोई विजन या कोई विकल्प जनता के सामने पेश नहीं कर पाए । रालेगण सिद्धि से दिल्ली की अन्ना हजारे की इस यात्रा में कई पड़ाव और अवसर मिले लेकिन वो इन अवसरों का अबतक लाभ नहीं उठा पाए हैं । इतिहास किस तरह अन्ना को याद करेगा यह लोकसभा चुनाव के मई में आनेवाले नतीजे के बाद तय हो जाएगा । 

Tuesday, March 11, 2014

राहुल गांधी के नाम खुला पत्र

आदरणीय श्री राहुल गांधी जी, लोकसभा चुनाव का ऐलान हो गया है और आपकी पार्टी हर हाथ को शक्ति देते हुए तरक्की करना चाहती है, मतलब यह है कि वो तीसरी बार विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की सत्ता पर काबिज होने का यत्न कर रही है । कांग्रेस ने इस लोकसभा चुनाव के मद्देनजर आपके कंधों पर उसे सत्ता तक पहुंचाने की जिम्मेदारी सौंपी है । आप भी प्राणपन से इस जिम्मेदारी को पूरा करने में लगे हुए हैं । पार्टी को सत्ता तक पहुंचाने के लिए आपकी पार्टी ने बिहार में लालू यादव से समझौता किया । आपको स्मरण दिला दें कि हाल ही में चारा घोटाले में राष्ट्रीय जनता दल के नेता लालू प्रसाद यादव को अदालत ने सजा सुनाई थी । वो जेल गए थे और फिलहाल जमानत पर बाहर हैं । लालू यादव चुनाव भी नहीं लड़ सकते हैं । आपको यह भी याद होगा कि पिछले साल सितंबर में आप अचानक दिल्ली के प्रेस क्लब पहुंचे थे और आपने दागियों को बचाने के सरकार के मंसूबे पर पानी फेर दिया था । आपने तब गुस्से में कहा था कि इस तरह के अध्यादेश को फाड़कर कूड़ेदान में डाल दिया जाना चाहिए । तब पूरे देश में आपके उस कदम की सराहना हुई थी और माना गया ता कि अगर कांग्रेस में पार्टी में आपकी चलेगी तो राजनीतिक शुचिता को तवज्जो मिलेगी । पर अफसोस राहुल जी, आपके उस गुस्से में दिए गए बयान का तात्कालिक असर तो अध्यादेश के रद्द होने में दिखा था लेकिन उसी सजायाफ्ता नेता का साथ लोकसभा चुनाव में गठबंधन करने से आप सवालों के घेरे में आ गए हैं । लालू यादव से गठबंधन के बाद आपके विरोधी आप पर राजनीतिक ड्रामेबाजी का आरोप भी लगाने लगे हैं । तो क्या यह मान लिया जाए कि आपने भी चुनावी गणित को ध्यान में रखते हुए अपने कदम पीछे खींच लिए हैं । राहुल जी, आप युवा हैं, देश को आपसे बड़ी उम्मीदें हैं । आप जब राजनीति में शुचिता की बात करते हैं तो पूरा देश आपको ध्यान से सुनता है । ज्यादातर लोग उसकी सराहना भी करते हैं । लेकिन यह क्या राहुल जी आपके फैसले का आपकी ही पार्टी में सिर्फ छह महीने तक सम्मान हो सका । आपको गंभीरता से विचार करना होगा । सोचना तो आपको यह भी चाहिए कि क्या पार्टी में अब भी वही होता है जो आप चाहते हैं या फिर आपको चेहरा बनाकर पार्टी आपका इस्तेमाल कर रही है और फैसले पर्दे के पीछे कांग्रेस के खुर्राट नेता लेते हैं जिनमें से कइयों को आपकी माता जी का आशीर्वाद प्राप्त है ।
राहुल गांधी जी, आप हमेशा सार्वजनिक तौर पर सिस्टम को बदलने की बात करते हैं । आप सिस्टम बदलने की बात इतनी बार कर चुके हैं कि लोग अब उस बदलाव की आपसे अपेक्षा भी करने लगे हैं । राहुल जी आप जिस पार्टी के उपाध्यक्ष हैं उसकी विरासत काफी समृद्ध है । महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में व्यवस्था में बदलाव की बात की थी और उन्होंने एक सभ्यता को एक राष्ट्र बनाने के लिए काम किया और उसमें सफलता हासिल की । उन्होंने एक सभ्यता को राष्ट्र बनाने के लिए अविभाजित भारत की सामाजिक और भौगोलिक स्थितियों को ध्यान में रखते हुए अपना एक विजन पेश किया था । गांधी ने एक भाषा के सिद्धांत को राष्ट्र की अवधारणा से अलग करने जैसा साहसिक कदम उठाया था । एक इस पूरे व्यवस्था को बदलने और वैकल्पिक व्यवस्था को लागू करवाने में गांधी को तकरीबन सत्ताइस साल लगे । उन्नीस सौ बीस के आसपास गांधी को व्यवस्था बदलने के उनके इरादों में जनता का समर्थन मिलना शुरू हुआ और उन्नीस सौ सैंतालीस में जाकर देश आजाद हुआ । जनता के समर्थन और अपनी अटल इच्छा शक्ति की बदौलत गांधी ने अपने सहयोगियों के साथ भारत को स्वतंत्रता दिलवाई । अंग्रेजों की गुलामी से आजादी दिलवाना व्यवस्था में बदलाव का एक बेहतरीन नमूना है । कम्युनिस्टों ने भी रूस और युगोस्लाविया में व्यवस्था परिवर्तन की कोशिश की लेकिन वह जोर जबरदस्ती के बल पर किया गया इसलिए दीर्घायु नहीं हो सका ।
व्यवस्था में बदलाव का दूसरा नमूना है भारत की चुनाव व्यवस्था । आपको ज्ञात होगा कि जब 1952 में पहली बार देश में लोकसभा का चुनाव हुआ था तो देश में तकरीबन साढे सत्रह करोड़ वोटर थे । पूरे चुनाव की प्रक्रिया में लगभग छह महीने लगे थे । उस वक्त निरक्षर मतदाताओं की संख्या तकरीबन पचहत्तर फीसदी थी, लिहाजा चुनाव चिन्ह का प्रयोग किया गया था। आगामी लोकसभा चुनाव में मतदाताओं की संख्या अस्सी करोड़ से ज्यादा है और चुनाव में लगनेवाला कुल वक्त अस्सी दिन है । यह एक क्रांतिकारी बदलाव है जिसको हासिल करने में चुनाव आयोग को आदी सदी का वक्त लगा । तो राहुल जी सिस्टम कोई कमरे का बल्ब नहीं है जिसे आप जब चाहें बदल दें । आप सिस्टम में बदलाव की बातें तो करते हैं लेकिन उसके लिए आप कोई विजन अबतक पेश नहीं कर पाए हैं । आप अपनी हर सभा में सूचना के अधिकार की दुहाई देते हैं । यह बात सही है कि इस कानून के बनने के बाद सरकारी कामकाज में पारदर्शिता आई है लेकिन राहुल जी जब इसी सूचना के अधिकार के तहत राजनीतिक दलों को लाने की बात होती है तो आप खामोश हो जाते हैं । संसद इस बाबत कानून में संशोधन कर देती है तो भी आप खामोश रहते हैं । आखिर क्यों । क्या आपकी इस खामोशी की वजह जानने का हक देश की जनता को नहीं है ।
राहुल गांधी जी आप भ्रष्टाचार के खिलाफ दिखने की कोशिश करते भी नजर आते हैं । आपकी स्वच्छ छवि, निर्दोष मुस्कुराहट और भ्रष्टाचार के खिलाफ आपका गुस्सा जनता को आप पर भरोसा करने की वजहें प्रदान करती हैं । आप भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कानून बनाकर उसको खत्म करने की वकालत करते रहते हैं लेकिन आप भ्रष्टाचार रूपी बरगद की जड़ को खत्म करने की बजाए उसकी टहनियों की काट छांट करना चाहते हैं । राजनीति शास्त्र के पंडितों का मानना है कि भ्रष्टाचार की एक अहम वजह चुनाव के दौरान अभियान और प्रचार पर पार्टियों द्वारा किया जाने वाला बेतहाशा खर्च है। राजनीति को बेहद नजदीक से अध्ययन करनेवालों का मानना है कि आजादी के छह दशक बाद भी राजनीतिक दलों के चुनाव खर्च का बड़ा हिस्सा औद्योगिक घरानों से आता है । आप इस बात को देश की जनता से बेहतर तरीके से जानते हैं कि औद्योगिक घरानों का कैसा पैसा राजनीतिक दलों के खजाने तक पहुंचता है । राजनीतिक दलों को पैसा मुहैया करानेवाले लोग कारोबारी हैं और चुनाव के वक्त किए गए निवेश से मोटा मुनाफा वसूलना जानते हैं ।
एक दूसरी प्रवृत्ति ने भी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को कमजोर किया है। सत्तर के दशक में इंदिरा गांधी की स्थिति मजबूत होने के बाद कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र खत्म हो गया । इसका नतीजा यह हुआ कि किसी भी तरह के भ्रष्टाचार के खिलाफ पार्टी के अंदर से आवाज आनी बंद हो गई । आपको पता होगा कि आपके दादाजी फिरोज गांधी ने संसद के अंदर उस वक्त की सरकार को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जमकर घेरा था । गौरतलब है कि जवाहरलाल नेहरू उस वक्त देश के प्रधानमंत्री थी और फिरोज गांधी उनके दामाद । यह पार्टियों में आतंरिक लोकतंत्र की खूबसूरती थी । लेकिन यह इंदिरा गांधी के वक्त खत्म हो गया । कांग्रेस की देखा-देखी अन्य दल भी इसी राह पर चल पड़े । भारत की मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी में इस वक्त तो ये हालात है कि सिर्फ और सिर्फ एक व्यक्ति फैसला ले रहा है और बाकी लोग उस फैसले का अनुसरण कर रहे हैं । तमाम क्षेत्रीय दलों में आंतरिक लोकतंत्र की बात सोचना भी बेमानी है । वो सारे दल एक व्यक्ति या परिवार के इर्द गिर्द सिमटे हुए हैं । ऐसी स्थिति में अगर उस परिवार का कोई भ्रष्ट हो जाता है तो फिर उसपर अंकुश लगानेवाला कोई बचता नहीं है । राहुल जी, आपने अपनी पार्टी के अनुषांगिक संगठनों में आंतरिक लोकतंत्र की शुरुआत की है । लेकिन आपका वह कदम ऊंट के मुंह में जीरे जैसा है । अगर आप सचमुच व्यवस्था में बदलाव करना चाहते हैं तो आपको कांग्रेस पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र बहाल करने की दिशा में कदम उठाना होगा । आपको अपने परनाना जवाहरलाल नेहरू की तरह पार्टी के अन्य नेताओं के विचारों को जगह देनी होगी ताकि नेतृत्व की किसी भी गलती पर पार्टी के नेता खुलकर अपने विचार रख सकें । अगर आप पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र बहाल करने और पार्टियों को मिलनेवाले चंदे को पारदर्शी बनाने में कामयाब हो जाते हैं तो ही आपकी व्यवस्था परिवर्तन की बातों में वजन आ जाएगा ।
राहुल गांधी जी, आप महिला सशक्तीकरण और समावेशी विकास की भी लगातार वकालत करते हैं । दोनों बातें सुनने में काफी अच्छी लगती हैं । आपकी पार्टी ने पिछले दस सालों से देश पर शासन किया । अगर महिलाओं के अधिकारों को लेकर आप सचमुच संजीदा होते तो संसद में उनके आरक्षण पर सार्थक पहल होती । आप यह तर्क नहीं दे सकते कि आपकी पार्टी पूर्ण बहुमत में नहीं थी लिहाजा आप इस तरह के क्रांतिकारी कदम नहीं उठा सकते थे । आपकी पार्टी ने अमेरिका के साथ परमाणु करार के वक्त और खुदरा बाजार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के फैसले के वक्त यह साबित किया था कि अगर इच्छाशक्ति हो तो संसद में बिल पारित करवाया जा सकता है । चलिए संसद में पास ना भी करवाया होता कम से कम कांग्रेस पार्टी इसको पास करवाने की कोशिश करती तो नजर आती लेकिन अफसोस आप सिर्फ अपने भाषणों से महिलाओं को सशक्त करवाना चाहते हैं । उसी तरह से समावेशी विकास और हर तबके तक विकास का लाभ पहुंचाने की आपकी तड़प की तारीफ करनी होगी लेकिन जब नतीजे को देखते हैं तो लगता है कि वहां भी सिर्फ हवाई किले बनाए जा रहे थे । राहुल जी आप शिक्षा की बात भी करते हैं लेकिन क्या आपको मालूम है कि प्राथमिक शिक्षा की क्या हालत है देश में । उच्च शिक्षा के क्षेत्र में एक केंद्रीय विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त करने में मंत्रालय को छह महीने लगते हैं । आपकी सरकार ने शिक्षा का अधिकार दिया लेकिन उसको लागू करने में वो पूरी तरह से नाकाम रही । राहुल जी अब बातें बहुत हो गई अब कड़े फैसले का वक्त आ गया है ।

Saturday, March 8, 2014

जन्म शताब्दी के बहाने से उठे सवाल

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर कहते हैं जातियों का सांस्कृतिक विनाश तब होता है जब वे अपनी परंपराओं को भूलकर दूसरों की परंपराओं का अनुकरण करने लगती हैं...जब वे मन ही मन अपने को हीन और दूसरों को श्रेष्ठ मानकर मानसिक दासता को स्वेच्छया स्वीकार कर लेती हैं । पारस्परिक आदान प्रदान तो संस्कृतियों का स्वाभाविक धर्म है, परंतु जहां प्रवाह एकतरफा हो, वहां यही कहा जाएगा कि एक जाति दूसरी जाति की सांस्सकृतिक दासी हो रही है । किन्तु सांस्कृतिक गुलामी का इन सबसे भयानक रूप वह होता है, जब कोई जाति अपनी भाषा को छोड़कर दूसरों की भाषा को अपना लेती है और उसी में तुतलाने को अपना परम गौरव मानने लगती है । यह गुलामी की पराकाष्ठा है, क्योंकि जो जाति अपनी भाषा में नहीं सोचती, वह अपनी परम्परा से छूट जाती है और उसके स्वाभिमान का प्रचंड विनाश हो जाता है । दिनकर के इस कथन में मैं यह जोड़ना चाहता हूं- जो समाज अपनी भाषा के लेखकों को याद नहीं रख सकता, जो उनका उचित सम्मान नहीं कर सकता, जो उनके लिखे को अपनी आनेवाली पीढ़ियों को हस्तगत नहीं कर सकता, जो अपने महान लेखकों की विरासत को संभाल नहीं सकता वह समाज कालांतर में साहित्यक और सांस्कृतिक रूप से पंगु हो जाता है । हमारे समाज, विशेषकर साहित्यक समाज में अपने महान लेखकों को याद करने की परंपरा धीरे धीरे खत्म होती जा रही है । लेखकों के जन्म दिवस या पुण्य तिथि पर रस्म अदायगी के लिए छोटे मोटे समारोह हो जाते हैं लेकिन हमने कभी गंभीरता से इस बात को नहीं सोचा कि आनेवाली पीढ़ियों को हिंदी समाज के बड़े लेखकों से कैसे परिचित करवाया जाए । साहित्य और संस्कृति तो खैर सरकार की प्राथमिकता में कहीं होती नहीं है । चिंता की बात यह है कि साहित्य समाज भी अपने लेखकों को लेकर उदासीन दिखता है । यह बहुत दुखद है कि आज की हमारी पीढ़ी को अपनी भाषा में बात करने में गौरव महसूस नहीं होता है बल्कि उसे अंग्रेजी में तुतलाने में परम गौरव का अनुभव होता है । हमारी शिक्षा व्यवस्था इस तरह की हो गई है कि अंग्रेजी स्कूलनुमा दुकानें हर गली मुहल्ले में खुल गई हैं जो कि बच्चों को ना तो सही से अंग्रेजी का ज्ञान दे पा रहे हैं और हिंदी तो बस पढ़ाने के लिए पढ़ाई जाती है । इस तरह से हमारा हिंदी समाज भाषाई गुलामी की ओर बढता जा रहा है ।
हम इस भाषाई गुलामी के चंगुल में जाने की पड़ताल करें तो राजनीतिक नेतृत्व की उदासीनता के अलावा हमारी भी अपने साहित्यक नायकों के प्रति उदासीनता बड़ी वजह है । कई यूरोपियन देशों में यह परंपरा है कि वहां स्कूल कॉलेजों के अलावा सड़कों और हवाई अड्डों के नाम उनकी भाषा के महान लेखकों के नाम पर रखे जाते हैं । अमेरिका में सड़कों और सरकारी इमारतों के नाम लेखकों के नाम पर हैं । भारत में तो परिवार विशेष के सदस्यों को ही यह विशेष इज्जत बख्शी जाती है । हमारे लिए बेहद अफसोस की बात है कि कोई बड़ा हवाई अड्डा किसी लेखक के नाम पर नहीं है । दिल्ली में कोई सड़क प्रेमचंद से लेकर किसी भी हिंदी के बड़े लेखक के नाम पर नहीं है । हर जगह गांधी, गांधी और गांधी । सड़कों या इमारतों का नाम किसी मशहूर शख्सियत के नाम पर रखने का यह फायदा होता है कि नई पीढ़ी उनके बारे में जानना चाहती है । वह इस बात की तफ्तीश करती है कि अमुक नाम के व्यक्ति का क्या योगदान है । इस तरह से पीढ़ी दर पीढ़ी उस व्यक्ति विशेष की प्रासंगिकता बनी रहती है । हमारे यहां राजनेताओं को यह गौरव हासिल है लेकिन साहित्यकारों को नहीं । इमारतों और सड़कों के नामकरण की तो छोड़िए साहित्यकारों की जन्म शताब्दी पर भी देश में व्यापक आयोजन नहीं होता है । जन्म शताब्दी वर्ष पर समारोह का एलान होता है लेकिन वो बस रस्म अदायगी भर होकर रह जाता है ।
इस साल हिंदी और उर्दू के मशहूर लेखक कृश्न चंदर का जन्म शताब्दी वर्ष है लेकिन अबतक कहीं भी किसी तरफ से कोई सुगबुगाहट नहीं सुनाई दे रही है । ना तो साहित्य अकादमी की तरफ से ना ही उर्दू अकादमी की तरफ से । इन दोनों अकादमियों से अपेक्षा इस वजह से ज्यादा है क्योंकि कृश्न चंदर हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओं में समान अधिकार से लिखते थे । कृश्न चंदर की हिंदी और उर्दू में रचनात्मक आवाजाही उन्हें एक विशिष्टता प्रदान करती है । कृश्न चंदर के जन्म को लेकर कई भ्रांतियां हैं। कहीं तो इस बात का उल्लेख है कि वो लाहौर में पैदा हुए, कहीं उनका जन्मस्थान पुंछ बताया जाता है तो किसी प्रकाशन में उनके जन्म स्थान के रूप में वजीराबाद का जिक्र है । लेकिन पिछले दिनों एक अखबार में कृश्न चंदर के छोटे भाई उपेन्द्र चोपड़ा के हवाले से खबर छपी कि उनका जन्म राजस्थान के भरतपुर में हुआ था । कृश्न चंदर के पिता डॉक्टर थे और उनके जन्म के समय वो भरतपुर इलाके में तैनात थे । जन्मस्थान चाहे भरतपुर रहा हो लेकिन कृश्नचंदर की मौत के बाद लाहौर से निकलने वाले साप्ताहिक व्यू प्वाइंट में उनका आखिरी खत छपा था । जिसमें कृश्न चंदर ने स्वीकार किया था कि वो लाहौरिया हैं । कृश्न चंदर ने लिखा कि उन्होंने लाहौर में शिक्षा और प्रसिद्धि दोनों पाई । अपने उस खत में कृश्न चंदर ने इस बात को भी शिद्दत से स्वीकार किया था कि लाहौर का उनके लिए वही स्थान है जो शरीर के लिए आत्मा का होता है । आजादी के बाद कृश्न चंदर लाहौर से हिंदुस्तान आ गए । बंटवारे के बाद मिली आजादी को कृश्न चंदर हमेशा से त्रासद आजादी मानते रहे और उसी के आलोक में उन्होंने कई कहानियां और रचनाएं लिखी । यह वही दौर था जब कृश्न चंदर के अलावा सआदत हसन मंटो, बलवंत सिंह, उपेन्द्र नाथ अश्क, अली सरदार जाफरी, राजेन्द सिंह बेदी और यशपाल जैसे तरक्की पसंद लेखक अपनी रचनाओं से समाज को झकझोर रहे थे । एक तरफ मंटो जहां समाज की रूढ़ियों पर चोट कर रहे थे वहीं कृश्न चंदर अपनी रचनाओं के माध्यम से दबे कुचलों और हाशिए के लोगों को वाणी दे रहे थे । उनकी स्थितियों और संघर्ष को चित्रित कर रहे थे । अपनी मशहूर कहानी कचड़ा बाबा में कृश्न चंदर ने बताया है कि किस तरह से कूड़े के ढेर के पास अपनी जिंदगी बसर करनेवाले एक शख्स को जब कूड़े के ढेर में एक लावारिस नवजात मिलता है तो उसकी जिंदगी बदल जाती है । इस कहानी में कृश्न चंदर की रचनात्मकता और उसका व्यापक फलक उभर कर सामने आता है । इसी तरह से जामुन के दरख्त कहानी में कृश्न चंदर ने लालफीताशाही और अफसरशाही को निशाने पर लिया था और बताया था कि किस तरह से वो अपनी ताकत का बेजा इस्तेमाल कर रहे हैं । कृश्न चंदर की कहानियों का रेंज काफी व्यापक था लेकिन सारी कहानियों में एक सूत्र था वह था समाज में फैली कुरीतियों और बुराइयों पर प्रहार । कालांतर में कृश्न चंदर ने फिल्मी दुनिया में भी अपने हाथ आजमाए और उनकी कहानियों पर कई फिल्में भी बनी । कृश्न चंदर के बीस उपन्यास, तीस कहानी संग्रह प्रकाशित हैं । अस्सी के दशक में पाकिस्तान के एक प्रकाशक ने उनकी सौ कहानियों का एक संग्रह भी प्रकाशित किया था । हिंदी में भी उनकी रचनाएं उपलब्ध हैं । हिंदी साहित्य समाज का यह दायित्व बनता है कि कृश्न चंदर के जन्म शताब्दी वर्ष में उनकी रचनाओं के बारे में नई पीढ़ी को बताया जाए । लेकिन सवाल फिर से मुंह बाए खड़ा है कि हम अपनी भाषा के लेखकों का सम्मान कब कर पाएंगे । हमें हमने लेखकों पर गुमान करना होगा तभी हम हमारी भाषा को चौतरफा हमले से बचा पाएंगे । आजादी के बाद गिरिजा कुमार माथुर ने लिखा था- आज जीत की रात पहरुए, सावधान रहना / दुश्मन है खूंखार पहरुए, सावधान रहना । हिंदी पर जिस तरह से हमले हो रहे हैं उसमें हिंदी के पहरुओं को सावधान रहने की जरूरत तो है ही साथ ही आवश्यकता इस बात की भी है कि उसे हर स्तर पर हमें मजबूती देनी होगी । भाषा को मजबूती मिलेगी उसमें रचना करनेवालों को मजबूत करके।
 

Monday, March 3, 2014

ई बुक्स का बढ़ता चलन

दिल्ली में हाल ही में संपन्न हुए विश्व पुस्तक मेले में इस बात के संकेत मिले कि भारत में भी ई बुक्स की तरफ पाठकों का आकर्षण बढ़ा है । ई बुक्स के बारे में जानने समझने के लिए भारी संख्या में पाठकों ने संबंधित स्टॉल का रुख किया था । दिल्ली के प्रगति मैदान में, जहां विश्व पुस्तक मेला आयोजित हुआ था, किताबों के पोस्टर और बैनर के अलावा किंडल व्हाइट के भी पोस्टर काफी संख्या में लगे थे । पाठकों के बीच किंडल और ईबुक्स को लेकर चर्चा भी रही । हिंदी के मंडप में भी ईबुक्स के बारे में वरिष्ठ लेखकों के बीच भी बातें हो रही थी । हलांकि हिंदी के वरिष्ठ लेखक छपे हुए के आगे ई बुक्स के महत्व को बिल्कुल ही नकार रहे थे । हिंदी मंडप के अंदर ही साहित्य और मीडिया पर हुई एक गोष्ठी में इस बात पर खासी चिंता व्यक्त की गई कि हिंदी के लेखक तकनीक को अपनाने को तैयार नहीं हैं । उस गोष्ठी में एक बात उभर कर आई कि हिंदी के स्थापित लेखकों में से कई तो इंटरनेट की दुनिया से अनभिज्ञ हैं और उन्हें इस बात का मलाल भी नहीं है, बल्कि उन्हें इस बात का फख्र है कि उनके पास ईमेल अकाउंट नहीं है । आज जब पूरी दुनिया का लेखकीय और पाठकीय परिदृश्य बदल रहा है । फिजिकल से वर्चुअल की ओर कदम बढ़ चुके हैं ऐसे में हिंदी के वरिष्ठ लेखकों का तकनीक को लेकर हठ खतरनाक हो सकता है । आज जमाना पूरी तरह से बदल गया है । जब देश में मोबाइल क्रांति आई थी तो कहा जाता था मोबाइल फर्स्ट लेकिन देश में इंटरनेट के बढ़ते घनत्व के बाद अब यह नारा बदलकर मोबाइल ओनली तक पहुंच गया है । इस बात को साफ तौर पर देखा जा सकता है कि देश में थ्री जी तकनीक के प्रसार की वजह से स्मार्ट फोन उपभोक्ताओं की संख्या में जबरदस्त इजाफा हुआ है । विदेश के अलावा देसी मोबाइल फोन निर्माताओं ने भी बड़ी स्क्रीन साइज और बेहतर रिजोल्यूशन वाले मोबाइल फोन बाजार में पेश किया । इस तरह के मोबाइल के मॉडल ग्राहकों के बीच खासे लोकप्रिय भी हो रहे हैं । भारतीय बाजार में बड़ी स्क्रीन की लोकप्रियता और खपत को देखते हुए आई फोन ने भी अपनी परंपरा और लीक से हटते हुए बड़े स्क्रीन वाले मोबाइल फोन लॉंच करने का ऐलान किया है । यह सब पाठकों की सहूलियत को ध्यान में रखकर किया जा रहा है । बदले हालात में अब यह बात साफ हो गई कि पाठक अब अपने मन की करेगा । अब पाठक यह तय करेगा कि वो किस प्लेटफॉर्म पर कोई रचना पढ़ना चाहता है । वह छपी हुई किताबें पढ़ना चाहता है या फिर ई बुक्स पढ़ना चाहता है । सामाजशास्त्रीय विश्लेषण करने से हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि इक्कीसवीं सदी के पाठकों की रुचि में सत्तर और अस्सी के दशक के पाठकों की रुचि में जमीन आसमान का अंतर आ चुका है । सन 1991 को हम इस रुचि का प्रस्थान बिंदु मान सकते हैं । हमारे देश में 1991 से अर्थव्वयस्था को विदेशी कंपनियों के लिए खोला गया और उससे करीब सात साल पहले देश में संचार क्रांति की शुरुआत हो चुकी थी । हमारे देश के लिए ये दो बहद अहम पड़ाव थे जिसका असर देश की साहित्य संस्कृति पर बेहद गहरा पड़ा । संचार क्रांति और उदारीकरण का असर यह हुआ कि देश में पश्चिमी संस्कृति से देश की जनता का परिचय हुआ । जो बातें अबतक सुनी जाती थी वो प्रत्यक्ष रूप से देखी जानी लगी ।
बाजारवाद और नवउदारवाद के प्रभाव में भारत में आम जनता की और खासकर युवा वर्ग की रुचि में बदलाव तो साफ तौर पर रेखांकित किया जा सकता है । युवा वर्ग और इन दशकों में जवान होती पीढ़ी में धैर्य कम होता चला गया और एक तरह से इंस्टैंट का जमाना आ गया चाहे वो कॉफी हो या अफेयर । यह अधीरता कालांतर में और बढ़ी । यह लगभग वही दौर था जब हमारे देश के आकाश को निजी टेलीविजन के तरंगों के लिए खोल दिया गया । मतलब यह है कि देश में कई देशी विदेशी मनोरंजन और न्यूज चैनलों ने अपना प्रसारण शुरू किया । यह वही वक्त था जब हिंसा प्रधान फिल्मों की जगह बेहतरीन रोमांटिक फिल्मों ने ली । मार-धाड़ वाली फिल्मों की बजाय शाहरुख काजोल की रोमांटिक फिल्मों को जबरदस्त सफलता मिली । लगभग इसी वक्त राष्ट्रीय अखबारों के पन्ने रंगीन होने लगे और फिल्मों के रंगीन परिशिष्ट अखबारों का एक अहम अंग बन गया । यह सब बताने का तात्पर्य यह है कि नवें दशक में हमारे देश की लोगों की पसंद बदलने लगी । आज की युवा पीढ़ी की आदतों को देखें तो वो ऑन द मूव पढ़ना चाहती है । उसके लिए मोबाइल फोन या फिर किंडल से बेहतर कोई प्लेटफॉर्म हो ही नहीं सकता है । किंडल एक ऐसा प्लेटफॉर्म है जहां आप किताबों के ई वर्जन डाउनलोड कर सकते हैं और फिर उसको अपनी सुविधानुसार पढ़ सकते हैं । कई साइट्स तो फ्री में ई बुक्स डाउनलोड करने की सुविधा प्रदान करती है अन्यथा कीमत चुकाकर ईबुक्स खरीदने का ऑप्शन तो आपके पास है ही । पूरी दुनिया में ई बुक्स की सफलता के बरक्श अगर हम हिंदी प्रकाशन की तुलना करते हैं तो वो काफी पिछड़ा हुआ नजर आता है । हिंदी के कुछ प्रकाशकों ने अब इस दिशा में पहल की शुरुआत की है । इस बार के पुस्तक मेले के आयोजक नेशनल बुक ट्रस्ट ने भी व्यापक पाठक वर्ग को ध्यान में रखते हुए अपने बेहतरीन प्रकाशनों को ई प्लेटफॉर्म पर लांच करने के इरादों का ऐलान किया ।1957 में नेशनल बुक ट्र्स्ट की स्थापना के पीछे उद्देश्य था पाठकों के बीच पढ़ने की संस्कृति का विकास किया जाए । अपनी स्थापना के सत्तावन साल बाद नेशनल बुक ट्रस्ट ने पहला ईबुक्स जारी किया । दिल्ली के इस विश्व पुस्तक मेले में केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री डॉक्टर पल्लम राजू ने विवेकानंद पर पहली ई बुक जारी की । इसके साथ ही नेशनल बुक ट्रस्ट, जो कि अठारह भाषाओं में किताबें छापता है, ने ई बुक्स की ओर तेजी से कदम बढ़ाने के संकेत दिए । एनबीटी ने एलान कि है कि एंडरॉयड और एप्पल प्लेटफॉर्म पर उनकी संस्था का ऐप बनाया जाएगा ताकि पाठक उसे अपने मोबाइल, टैबलेट या आईपैड पर डाउनलोड कर मनपसंद कृतियों तक पहुंच सकें । एनबीटी के मुताबिक पहले ये काम बच्चों की किताबों के लिए किया जाएगा ।
दो हजार सात में अंतराष्ट्रीय स्तर पर कारोबार करनेवाली कंपनी अमेजॉन ने इलेक्ट्रानिक बुक रीडर किंडल लॉच किया था। शुरुआत में इसकी कीमत तकरीबन पच्चीस हजार रुपए रखी गई थी । ई बुक्स की लोकप्रियता को बढ़ाने में किंडल का खासा योगदान है । अमेजॉन ने बहुत सोच-समझकर ये रीडिग डिवाइस लांच किया था । ऑनलाइन कारोबार करनेवाली इस कंपनी के पास तकरीबन दस लाख किताबों के इलेकट्रानिक फॉर्मेट के अधिकार थे । कंपनी ने उसको भुनाने के लिए बाजार में किंडल को उतारा जो काफी लोकप्रिय हुआ । किंडल के साथ साथ कई किताबें प्री लोडेड आती हैं और बाद में आप चाहें तो नई से नई किताबें खरीदकर डाउनलोड कर सकते हैं । किंडल पर मौजूद ई बुक्स बाजार से खरीदी गई किताबों से सस्ती होती हैं । ऱखने में आसानी होती है । हजारों किताबें एक छोटे से टेबलेटनुमा डिवाइस में स्टोर की जा सकती हैं । एक बार डाउनलोडकर लेने के बाद इंटरनेट कनेक्शन की भी जरूरत नहीं पड़ती है। जब चाहें जहां चाहें पाठक अपनी पसंद की किताबें पढ़ सकते हैं । इस डिवाइस को किसी कंप्यूटर या तार से जोड़ने का झंझट भी नहीं है । इस डिवाइस पर अखबारों का स्बसक्रिप्शन लेकर अखबार भी पढ़े जा सकते हैं ।  पिछले साल   एल जेम्स कीमशहूर  फिफ्टी शेड्स ट्रायोलॉजी यानि तीन किताबें फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे, फिफ्टी शेड्स डार्कर, फिफ्टी शेड्स फ्रीड अमेरिका में प्रिंट और एडीशन दोनों श्रेणी मेंकई हफ्तों तक बेस्ट सेलर बनी रही । फिफ्टी शेड्स ट्रायोलॉजी लिखे जाने की कहानी बेहद दिलचस्प है टीवी की नौकरी छोड़कर पारिवारिक जीवन और बच्चों की परवरिश के बीच एरिका जेम्स ने फैनफिक्शन नाम के बेवसाइट पर शौकिया तौर पर मास्टर ऑफ यूनिवर्स के नाम से एक सीरीज लिखना शुरू किया रीडर्स की मांग पर उसे बार बार लिखने को मजबूर होना पड़ा ।पाठकों के दबाव में एरिका ने अपनी कहानियों का पुर्नलेखन किया और उसे रीडर्स के लिए पेश कर दिया पात्रों के नाम और कहानी के प्लॉट में बदलाव करके जब उसकी पहली किश्त बेवसाइट पर प्रकाशित हुई तो वह पूरे अमेरिका में वायरल की तरह फैल गई । सालभर के अंदर इसने अमेरिका में धूम मचा दी  इस पूरे प्रसंग को लिखने का उद्देश्य बुक्स की बढती लोकप्रियता बताना है । विदेश में लेखकों की कोशिश ये होने लगी कि उन पाठकों की झुधा शांत करे जो अपने प्रिय लेखक की कृतियां एक क्लिक से डाउनलोड कर पढ़ना चाहता है
  रीडिंग और राइटिंग के पहले के दौर में लेखक साल में एक कृति की रचना कर लेते थे तो उसे बेहद सक्रिय लेखक माना जाता था जॉन ग्रीशम जैसा लोकप्रिय लेखक भी साल में एक ही किताब लिखता था पाठकों को भी साल भर अपने प्रिय लेखकों की कृति का इंतजार रहता था पुस्तक छपने की प्रक्रिया भी वक्त लगता था लेकिन वक्त बदला, स्टाइल बदला, लेखन और प्रकाशन की प्रक्रिया बदली अब तो लेखन का दौर गया है लेखन और पाठक के इस दौर में पाठकों की रुचि में आधारभूत बदलाव देखने को मिल रहा है इंटरनेट के इस दौर में पाठकों का लेखकों से भावनात्मक संबंध की जगह सीधे संवाद ने ले ली । ऑनलाइन रहकर लेखक पाठकों से बात करते हैं और उनकी पसंद जानते हैं ट्विटर पर सवालों के जवाब देते हैं पेसबुक पर अपना स्टेटस अपडेट कर पाठकों की प्रतिक्रिया हासिल करते हैं
विदेशों में ई रीडर्स की बढ़ती तादाद का फायदाउठाने के लिए  प्रकाशकों ने एक रणनीति बनाई हुई है किसी बड़े लेखक की कोई अहम कृति प्रकाशित होनेवाली होती है तो प्रकाशक लेखकों से आग्रह कर प्रकाशन के पहले रीडर्स के लिए छोटी छोटी कहानियां लिखवाते हैं जो सिर्फ डिजिटल फॉर्मेट में उपलब्ध होती है इसका फायदा यह होता है कि छोटी कहानियों की लोकप्रियता से लेखक के पक्ष में एक माहौल बनता है और आगामी कृति के लिए पाठकों के बीच उत्सुकता पैदा होती है जब उत्सुकता अपने चरम पर होती है तो प्रकाशक बाजार में उक्त लेखक की किताब पेश कर देता है मशहूर और बेहद लोकप्रिय ब्रिटिश थ्रिलर लेखक ली चाइल्ड ने भी अपने उपन्यास के पहले कई छोटी छोटी कहानियां सिर्फ डिजीटल फॉर्मेट में लिखी उन्होंने साफ तौर पर माना कि ये कहानियां वो अपने आगामी उपन्यास के लिए पाठकों के बीच एक उत्सुकता का माहौल बनाने के लिए लिख रहे हैं चाइल्ड के मुताबिक दौड़ में बने रहने के लिए ऐसा करना बेहद जरूरी भी है इन स्थितियों की तुलना में अगर हम हिंदी लेखकों की बात करें तो वहां एक पिछड़ापन नजर आता है ।ज्यादातर लेखकों की अपनी कोई बेवसाइट नहीं है दो-चार प्रकाशकों को छोड़ दें तो हिंदी के प्रकाशकों की भी बेवसाइट नहीं है । नतीजा यह कि हिंदी में लेखकों पर पाठकों की पसंद का दबाव नहीं बन पाता और वो अपनी रफ्तार से लेखन करते हैं फिर रोना रोते हैं कि पाठक नहीं । ई बुक्स की बढ़ती लोकप्रियता हिंदी के लेखकों के लिए एक अवसर दे रही है। जरूरत है इस अवसर का लाभ उठाने और इंटरनेट के फैलाव के साथ साथ विशाल पाठक वर्ग तक पहुंचने की ।