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Saturday, July 30, 2022

उपन्यास सम्राट प्रेमचंद का हिंदू मन


आज उपन्यास सम्राट प्रेमचंद की जयंती है। 1880 में आज के ही दिन प्रेमचंद का जन्म हुआ था। आज एक बार फिर मार्क्सवादी लेखक और मार्क्सवाद में आस्था रखनेवाले प्रेमचंद को कम्युनिस्ट और प्रगतिशील और जाने किन विशेषणों से विभूषित करेंगे। इस तरह की प्रवृति बहुत लंबे समय से हिंदी साहित्य में चल रही है। प्रेमचंद के लेखन का मूल्यांकन करते समय मार्क्सवादी आलोचकों ने समग्रता में उनके कृतित्व को ध्यान में नहीं रखा। प्रेमचंद की उन कृतियों को या उन कार्यों को जानबूझकर ओझल कर दिया गया जिससे उनकी एक अलग ही छवि बनती है। प्रेमचंद को जबरन मार्क्सवादी बताने का ये खेल हिंदी साहित्य में लंबे समय तक चलता रहा। स्कूल और कालेज की पुस्तकों में प्रेमचंद की रचनाओं की व्याख्या इस तरह से की जाती रही कि उनकी आस्था मार्क्सवाद में थी और उनकी रचनाओं में ये प्रतिबंबित होती थी। विश्वविद्यालयों के हिंदी विभागों में मार्क्सवादियों का बोलबाला रहा है जिसकी वजह से छात्रों के मानस पर प्रेमचंद की मार्क्सवादी लेखक की छवि अंकित करवाने में उनको अधिक परेशानी नहीं हुई।  जिस भी लेखक ने प्रेमचंद की रचनाओं को समग्रता में सामने लाने का प्रयत्न किया उनको हाशिए पर रखने का उपक्रम मार्क्सवादियों ने चलाया, खासतौर पर विश्वविद्यालयों में। परिणाम ये हुआ कि लंबे कालखंड तक प्रेमचंद की रचनाओं का मूल्यांकन एकतरफा होता रहा। छात्र भी प्रेमचंद के लेखकीय व्यक्तित्व के एक ही रूप से परिचित होते रहे। ये सिर्फ प्रेमचंद के साथ ही नहीं किया गया बल्कि हिंदी के तमाम लेखकों के साथ ऐसा किया गया। निराला के उन लेखों को साहित्य जगत में सामने ही नहीं आने दिया गया जो उन्होंने कल्याण पत्रिका में लिखे थे। निराला ने कल्याण पत्रिका के अलग अलग अंकों में कई लेख लिखे थे लेकिन उसपर हिंदी में चर्चा नहीं हुई। 

प्रेमचंद की रचनाओं में हिंदू संस्कृति को लेकर कितना कुछ लिखा गया है या उनकी कहानियों में हिंदू संस्कृति किस तरह से मुखर हुई है इसपर प्रेमचंद साहित्य के विद्वान कमलकिशोर गोयनका ने काफी लिखा है। गोयनका को विचारधारा विशेष के विरुद्ध जाकर लिखने की कीमत भी चुकानी पड़ी। अपमान झेलना पड़ा।  साहित्यिक मंच पर सरेआम धमकियां दी गईं। लेकिन कहते हैं न कि सत्य को बहुत दिनों तक रोका नहीं जा सकता है। अब प्रेमचंद के अनेक रूप उपस्थित हो रहे हैं। पिछले दिनों विश्वविद्यालय प्रकाशन, काशी ने प्रेमचंद के संपादन में 1933 में प्रकाशित हंस पत्रिका के काशी अंक का पुनर्प्रकाशन किया। अक्तूबर-नवंबर 1933 में प्रकाशित पत्रिका के इस अंक के लेखों को देखकर संपादक प्रेमचंद की रुचि का पता चलता है। प्रेमचंद के संपादन में निकली इस पत्रिका में एक लेख प्रकाशित है, काशी: हिंदू संस्कृति का केंद्र। इसमें लेखक ने लिखा है- ‘मध्य युग में देश पर बाहरवालों के कितने ही हमले हुए। उत्तर भारत का कोई भी प्रसिद्ध नगर उनके विनाशकारी प्रभाव से नहीं बचा। काशी पर भी सुल्तान नियाल्तगीन, कुतबुद्दीन इबुक के, तथा मुगल-काल में भी कितने ही हमले हुए, परंतु काशी की महिमा का मुख्य आधार व्यापारिक अथवा राजनीतिक महत्ता कभी नहीं रहा, उसका अटूट संबंध तो धर्म और संस्कृति से था। यदि कोई विजयी शासक नगर में लूटपाट मचा देता, मंदिर या मूर्तियों को विध्वंस्त करवा देता, अथवा लोगों का दमन करने लगता तो यह अवश्य था कि काशी कुछ दिनों के लिए श्रीविहीन हो जाती परंतु उसपर कोई वास्तविक प्रभाव न पड़ता था। हर साल फिर ग्रहण पड़ते, अमावस्या और एकादशी आतीं और उनके साथ ही साथ आता- स्त्री-पुरुषों का विशाल जनसमूह जो काशी की गलियों, घाटों और मंदिरों में समा जाता। फिर सदा की भांति प्रात: और संध्या आरती, काशी नगरी में घंटे और शंख के गंभीर निनाद के साथ भक्तों की कंठ ध्वनि मिलकर फिर वही अपूर्व समां बांध देती, मानो कुछ हुआ ही न हो।‘  इस उद्धरण से कई बातें स्पष्ट रूप से सामने आती हैं। पहला ये कि बाहर से कई हमले काशी पर हुए, मुगलों ने भी किए। मंदिर और मूर्तियां नियमित अंतराल पर तोड़ गए, लेकिन हिंदू संस्कृति में वो ताकत है कि वो इन हमलों को न केवल झेल गई बल्कि वापस उठ खड़ी हुई। प्रेमचंद अपने संपादन में इस तरह के लेख प्रकाशित करके उस वक्त अपना सोच देश के सामने रख रहे थे। 

हंस पत्रिका के इसी अंक में प्रेमचंद ने  काशी विश्वनाथ मंदिर पर भी एक लेख प्रकाशित किया। इस लेख का एक महत्वपूर्ण अंश देखा जाना चाहिए, ‘काशी के श्रीविश्वनाथ मंदिर में स्वयंजात ज्योति:स्वरूप लिंग हैं, इनके ही दर्शन और अर्चन से भक्त लोग अपनी समस्त कामनाओं की पूर्ति के साथ-साथ मोक्ष जैसा अलभ्य प्राप्त करने काशी आते हैं। स्वर्गीय महारानी अहित्याबाई ने पंच मंडप-संयुक्त एक विशाल मंदिर बनवा दिया। 51 फीट ऊंचा यह वर्तमान मंदिर कीमती लाल पत्थरों से बना है। इसके बाद ही सन् 1839 ई. में सिख जाति के मुकुटमणि पंजाब केशरी स्वर्गीय महाराजा रणजीत सिंह ने मंदिर के ऊपरी हिस्से को स्वर्ण मंडित करके उसकी सौगुनी शोभा बढ़ा दी।‘  इस लेख की ही कुछ और पंक्तियां, मुसलमान शासकों ने प्राचीन मंदिर को तोड़ा था, उन्हीं ने वर्तमान मंदिर के सिंहद्वार के सामने एक नौबतखाना बनवा दिया, जहां अबतक नौबत बजती है, जिसके ऊपर से विजातीय लोग दर्शन किया करते हैं। केवल दर्शन ही नहीं अंग्रेज लोग पूजोपहार और दक्षिणा भी दे जाते हैं। सम्राट पंचम जार्ज से लेकर प्रत्येक वायसराय विश्वनाथ-दर्शन कर चुके हैं। अभी हाल ही में जब लार्ड इरविन आए थे तब श्रद्धा के साथ चांदी के पूजा-पात्र उपहारस्वरूप भेंट कर गए थे। इस तरह विश्वनाथ इस समय समस्त जातियों द्वारा सम्मानित और पूजित होकर काशी में सुख से विराज रहे हैं।‘ 

उपरोक्त दोनों उद्धरणों में एक बात जो समान है कि मुस्लिम आक्रांताओं ने काशी में मंदिर और मूर्तियां तोड़ीं। इस पत्रिका के कई अन्य लेखों में भी मंदिरों के तोड़े जाने का प्रसंग आया है। एक और लेख है काशी का इतिहास उसमें भी लेखक ने विस्तार से काशी पर हुए अनके हमलों का उल्लेख किया है। इसमें इस बात का जिक्र भी है कि शाहजहां ने भी काशी में मंदिर तुड़वाए थे। धर्मांध औरंजगजेब ने यहां के मंदिर तुड़वाने की आज्ञा प्रचलित की जिनके चिन्ह स्वरूप ज्ञानवापी और बेनीमाधन की मस्जिदें अभी तक मौजूद हैं। औरंगजेब ने तो काशी का नाम बदलकर मुहम्मदाबाद रखा था पर वो प्रचलित नहीं हो पाया। लेकिन मुगलकाल में काशी की जो टकसाल थी वहां के कुछ सिक्कों और कागजों में ये नाम मिलता है। मंदिरों और मूर्तियों को तोड़े जाने के अलावा प्रेमचंद के संपादन में निकले इस अंक से एक और ध्वनि निकलती है वो है हिंदू धर्म और संस्कृति की । 

इस अंक से प्रेमचंद की हिंदू धर्म और संस्कृति में आस्था का पता चलता है। बार बार मंदिरों के तोड़े जाने का उल्लेख इस बात की ओर संकेत करता है कि संपादक इससे आहत था।  उसको अपनी पत्रिका के माध्यम से आमजन तक पहुंचाना भी चाहता था क्योंकि अगर इन लेखों में प्रयुक्त वक्तव्यों, उद्धरणों और घटनाओं के आवरण को हटाकर भीतर छिपी मूल भावनाओं को देखें आपको प्रेमचंद का हिंदू मन दिखाई देगा। वो हिंदू मन जो अपने मंदिरों के तोड़े जाने से आहत है, वो हिंदू मन जो अपनी संस्कृति पर हुए हमलों से दुखी है, वो हिंदू मन जो सनातन संस्कृति की शक्ति को जानता है, वो हिंदू मन जो अपनी परंपरा से विद्रोह का खोखला नारा नहीं लगता बल्कि अपनी परंपरा को अपनी लेखनी से समृद्ध करता है। जो मार्क्सवादी लेखक विचारधारा की शिलाखंड पर बैठकर प्रेमचंद के साम्यवादी होने का शोर मचाते हैं उनको प्रेमचंद के संपादन में प्रकाशित पत्रिकाओं के अंक देखने चाहिए। 


Saturday, July 23, 2022

रचनात्मकता से समृद्ध होंगी भाषाएं


दो दिन पहले राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की घोषणा हुई। फीचर फिल्मों और लोकप्रिय सितारों को पुरस्कार मिले। उनकी खूब चर्चा हुई लेकिन कुछ फिल्मों का उल्लेख नहीं हो पाया। ये उन भाषाओं में बनी फिल्में हैं जो हमारे देश के अलग अलग हिस्सों में बोली जाती हैं। कई बार छोटे भूभाग पर बोली जानेवाली भाषा में बेहतरीन फिल्म देखने को मिल जाती हैं कई बार ऐसा होता कि भौगोलिक रूप से बड़े क्षेत्र में बोली जानेवाली भाषा में अच्छी फिल्में बनती हैं। दो दिन पहले घोषित राष्ट्रीय पुरस्कार में बेस्ट नान फीचर फिल्म के लिए डांगी भाषा की फिल्म टेस्टीमनी आफ एना चुनी गई। इस भाषा के बारे में कम ही जानकारी है। गुजरात का एक जिला है डांग जो महाराष्ट्र की सीमा से लगता है। उस जिले में आदिवासी आबादी है और वहां डांगी बोली जाती है। इस छोटे से आदिवासी बहुल जिले में बोली जानेवाली भाषा में बनी नान फीचर फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार में स्वर्ण कमल प्रदान किया जाएगा। इसी तरह 2020 के लिए ही बेस्ट शार्ट फिल्म कर्बी भाषा में बनी एक फिल्म को दिए जाने की घोषणा की गई है। हरियाणवी में दादा लख्मी पर बनी फिल्म , दिमासा में अमी बरुआ की फिल्म और टुलू में संतोष माडा की फिल्म को सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार दिया जाएगा। इसके अलावा राजस्थानी की एक फिल्म को भी सम्मानित करने की घोषणा की गई है।

उपरोक्त सभी भाषाओं पर विचार करें तो इनमें से कोई भी भाषा संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं है। राजस्थानी को छोड़कर सभी भाषाएं अपेक्षाकृत छोटे भूभाग की भाषा है लेकिन इन भाषाओं में लगातार फिल्में बन रही हैं। लगातार इस वजह से कि पिछले तीन वर्षों के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की सूची देखने पर इस तरह की कई भाषाओं की फिल्में दिखती हैं जिनको स्वर्ण कमल या रजत कमल से सम्मानित किया गया है। 2017 में तो निर्देशक की पहली सर्वोत्तम फिल्म का अवार्ड लक्षद्वीप में बोली जानेवाली भाषा जेसरी में बनी फिल्म सिंजर को दिया गया था। इस फिल्म का चयन करनेवाली जूरी के अध्यक्ष मशहूर फिल्मकार शेखर कपूर थे। करीब 115 मिनट की ये फिल्म लक्षद्वीप में रहनेवाले एक मछुआरे पर वैश्विक आतंकवाद के प्रभाव की कहानी है। फिल्म में ये दिखाया गया है कि जब उसकी बहन और मंगेतर को आईएसआईएस के आतंकवादियों के चंगुल से छुड़ाया जाता है तो पता चलता है कि उनके साथ बलात्कार हुआ है। स्थिति तब और जटिल हो जाती है जब पता चलता है कि युवतियां गर्भवती हैं। जब उनसे संवाद होता है तो ये बात सामने आती हैं कि वो अपना गर्भ गिराने को तैयार नहीं हैं। इस पूरी कहानी और नायक के मन के द्वंद्व को निर्देशक पैंपली ने बेहतरीन तरीके से दर्शकों के सामने रखा है। फिल्म के साथ साथ निर्देशक को भी सम्मानित किया गया था। इसी वर्ष लद्दाखी और टुलू भाषा में बनी फिल्मों को भी पुरस्कृत किया गया था। अगले वर्ष के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में भी राजस्थानी, गारो, सेरदुकपेन जैसी भाषाओं में बनी फिल्मों को सम्मानित किया गया। अगले वर्ष यानि 2019 में पर्यावरण पर सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार मोनपा में बनी फिल्म को दिया गया। इसके साथ ही खासी, मीशिंग, पानिया, टुलू और छत्तीसगढ़ी में बनी फिल्मों को भी पुरस्कार मिले।

उपरोक्त सारी भाषा संविधान की आठवीं अनुसूची में नहीं है। कहने का अर्थ ये है कि संविधान की आठवीं अनुसूची में नहीं होते हुए भी इन भाषाओं में बेहतर कार्य हो रहा है। वो अपनी जमीन से जुड़ी कहानियों और अपने समाज में फैली कुरीतियों पर अपनी कला के माध्यम से प्रहार कर रहे हैं। अच्छी बात ये है कि कला जगत इनके कार्यों को रेखांकित भी कर रहा है। आवश्यकता इस बात की है कि इन भाषाओं में अधिक से अधिक काम हो ताकि उन इलाकों में फैली कहानियों को देश के सामने लाया जा सके। अब जैसे इस वर्ष अभिनेता यशपाल शर्मा की फिल्म दादा लख्मी को सर्वश्रेष्ठ हरियाणवी फिल्म का पुरस्कार देने की घोषणा की गई है। दादा लख्मी हरियाणवी के प्रसिद्ध कवि और कलाकार थे। उनको हरियाणा में सूर्य कवि कहा जाता है। लोक कला के क्षेत्र में दादा लख्मी की बहुत प्रतिष्ठा है। अभिनेता यशपाल शर्मा ने श्रमपूर्वक दादा लख्मी के जीवन को पर्द पर उतारा है। इसके लिए उनको इस बात की आवश्कता नहीं हुई कि हरियाणवी संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल भाषा हो। किसी भी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग अपनी जगह सही हो सकती है लेकिन उस भाषा के लोगों का ये भी दायित्व होता है कि वो अपनी भाषा में बेहतर काम करें और उसको समृद्ध बनाएं।

इस देश में भाषा के नाम पर स्वाधीनता के बाद से राजनीति हो रही है। कभी राष्ट्रभाषा के नाम पर तो कभी राज्यों के बंटवारे के नाम पर तो कभी शिक्षा नीति में भाषा को मिलनेवाली प्राथमिकता के नाम पर। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के आने के बाद भी भाषा को लेकर एक विभाजन करने की कोशिश की गई थी लेकिन राष्ट्रीय शिक्षा नीति में मातृभाषा का उल्लेख होने की वजह से वो विभान संभव नहीं हो पाया। कला जगत में भाषा के नाम पर राजनीति अपेक्षाकृत कम है लेकिन जो कलाकार भाषा के आधार पर कला से महत्व चाहते हैं उनको अपनी भाषा में रचनात्मक कार्य करना चाहिए। रचनात्मक कार्यों से उस भाषा के प्रति लोगों के मन में एक आकर्षण पैदा होगा और वो अधिक लोगों तक पहुंच सकेगी। अगर हम लक्षद्वीप में बोली जानेवाली भाषा जेसरी में बनी फिल्म संजर का ही उदाहरण लें तो निर्देशक ने अपनी कला के माध्यम से अपनी भाषा को वैश्विक मंच तक पहुंचाया। जिस प्रकार से उन्होंने अपनी फिल्म ने वैश्विक आतंकवाद और उसके प्रभाव का मुद्दा उठाया और उसको वैश्विक मंचों पर सराहना मिली। उसने फिल्म से साथ साथ जेसरी भाषा के बारे में जानने की उत्सकुकता भी पैदा की। इस तरह के प्रयासों से न केवल भाषा का फैलाव होता है बल्कि भाषा को मजबूती भी मिलती है।

देश के अलग अलग हिस्सों में बोली जानेवाली भाषा में फिल्में बनने का एक और लाभ है।    हमारे यहां कथावाचन की एक सुदीर्घ और लंबी परंपरा रही है। उस परंपरा को समृद्ध करने के लिए अपने देश की हर भाषा में जो कदम कदम पर कहानियां बिखरी पड़ी हैं, जो लोककथाएं सुनाई जाती हैं उनको फिल्मों के माध्यम से दुनिया के सामने लाया जा सकते है। 2017 में ही एक फिल्म पुरस्कृत हुई थी जिसका नाम है विलेज राकस्टार और इसकी निर्देशक हैं रीमा दास। असमिया में बनी इस फिल्म में एक उत्तर पूर्व के एक 10 वर्षीय बच्ची धुनू की कहानी है। वो अपना राक बैंड बनाना चाहती है। इस फिल्म में उसके सपने और संघर्ष के बीच चलती कथा है जिसमें उसकी विधवा मां है और लड़कों का एक समूह है। इसको जिस तरह से निर्देशक ने कहानी में पिरोया है वो अद्भुत है। पिछले दिनों कान में आयोजित फिल्म फेस्चिवल में भारत को दुनिया का कंटेंट हब बनाने की बात हुई थी। तमाम तरह की सहूलियतों के साथ साथ हमारे देश की सैकड़ों भाषा में फैली कहानियां भी इस योजना में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है। अगर हम गंभीरता से अपनी भाषा को समृद्ध और मजबूत करना चाहते हैं तो उसमें रचनात्मक कार्य करें। दुनियाभर का उदाहरण हमारे सामने है कि कोई भी भाषा आंदोलन से न तो दीर्घजीवी हुई है और न ही समृद्ध। उसमें होनेवाले रचनात्मक कार्य ही उस भाषा को और उसको बरतनेवालों को दीर्घायु बनाते हैं।  

दक्षिण में लहराया स्वदेशी का झंडा


भारतीय स्वाधीनता संग्राम में कश्मीर से कन्याकुमारी तक के लोगों ने एकजुट होकर भाग लिया और योगदान दिया। यह इतिहासकारों की समस्या रही कि उन्होंने स्वाधीनता का इतिहास लिखते समय स्वतंत्रता संग्राम के कई ऐसे नायकों को या तो भुला दिया या उनके महत्व का आकलन सही तरीके नहीं किया गया। दक्षिण भारत के स्वाधीनता सेनानियों की तो ब्रिटिश इतिहासकारों ने उपेक्षा ही की। सुनील खिलनानी ने अपनी पुस्तक इनकारनेशंस में इतिहासकार डेविड वाशब्रुक को उद्धृत किया है। उनके मुताबिक ‘1895 से 1916 के बीच मद्रास (अब चेन्नई) की सड़कों पर कोई ब्रिटिश विरोधी कुत्ता शायद ही भौंका होगा। तूतीकोरन अपवाद था।‘ जब डेविड वाशब्रुक तूतीकोरन को अपवाद मान रहे थे तो उसकी वजह थे, वी ओ चिंदबरम पिल्लै। चिंदबरम पिल्लै ने न केवल ब्रिटिश कंपनियों को चुनौती दी बल्कि उन्होंने स्वदेशी के नारे को साकार भी किया। उन्होंने समंदर में ब्रिटिश कंपनियों के एकाधिकार को चुनौती दी थी। इसकी भी बेहद दिलचस्प कहानी है। चिदंबरम पिल्लै का जन्म 1872 में हुआ था। अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद वो वकालत करने के लिए तूतीकोरन पहुंचे थे। यहां वो शैव सभा के संपर्क में आए और उनका रुझान साहित्य और संस्कृति की ओर हुआ। शैव सभा में सक्रिय चिदंबरम पिल्लै का लेखकों से संपर्क बढ़ा और एक दिन उनके किसी साथी ने उनको बाल गंगाधर तिलक के लेख आदि पढने को दिए। चिंबरम पिल्लै पर तिलक के लेखन का जबरदस्त प्रभाव पड़ा और उनका युवा मन देश को गुलामी की बेड़ियों के आजाद करवाने के लिए तड़पने लगा। 

इस बीच अंग्रेजों ने बंगाल के विभाजन का निर्णय लिया जिसकी देशभर में कठोर प्रतिक्रिया हुई। देशभर में अंग्रजी वस्तुओं का बहिष्कार आरंभ हुआ। युवा पिल्लै ने भी विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के साथ साथ अंग्रेजों के स्कूलों और अन्य संस्थाओं के बहिष्कार की भी अपील की। अब वो सक्रिय राजनीति में आ चुके थे। पिल्लै ने विदेशी वस्तुओं और संस्थाओं के बहिष्कार के लिए अपने इलाके के लोगों को शपथ दिलानी शुरू की। पिल्लै ने लोगों को पानी में खड़े होकर मां काली की शपथ दिलाई थी कि वो विदेशी सामान और संस्थाओं का बहिष्कार करेंगे। इसका जबरदस्त असर तूतीकोरन और आसपास के इलाके में हुआ। इस दौरान ही चिदंबरम पिल्लै ब्रिटिश पुलिस की नजरों में आ गए थे। इतने से पिल्लै का मन नहीं भरा था और वो कुछ बड़ा करके ब्रिटिश राज को चुनौती देना चाहते थे। वो जिस इलाके में रहते थे वो व्यापार का बड़ा केंद्र था। वहां के समुद्री तट पर ब्रिटिश इंडिया स्टीम नेविगेशन कंपनी के जहाजों का कब्जा था। इनके माध्यम से ब्रिटिश कंपनियां भारतीय उत्पाद एक जगह से दूसरे जगह ले जाकर बेचती और मुनाफा कमाती थी। पिल्लै के मन में ये विचार पनप रहा था कि एक देसी जहाज कंपनी होनी चाहिए ताकि यहां के व्यापारियों को लाभ मिल सके। उन्होंने 1906 के अप्रैल में एक योजना बनाई और उसपर अमल आरंभ कर दिया। दिसंबर 1906 में पिल्लै ने अपनी कंपनी स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कंपनी बनाई और इस कंपनी का एक जहाज समंदर में उतार दिया। इनकी कंपनी का रेट कम होने की वजह से इनको अधिक यात्री और कारोबारी मिलने लगे। इससे बौखलाई ब्रिटिश कंपनी ने पुलिस और प्रशासन का सहारा लिया। स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कंपनी को कानूनी अड़चनें लगाकर बाधित करने का प्रयास किया जाने लगा लेकिन चिदंबरम ने हार नहीं मानी। उन्होंने पैसे जुटाकर दो और जहाज खरीद लिए। ये दोनों जहाज पहलेवाले से बड़े थे। इन दोनों जहाजों पर पिल्लै ने हरा, पीला और लाल झंडा पेंट करवाकर बड़े बड़े अक्षरों में वंदे मातरम लिखवा दिया था। उनका ये प्रयोग बहुत सफल रहा था और लोग उनको स्वदेशी पिल्लै कहने लगे थे। 

ये सब चल ही रहा था कि पिल्लै ने एक और युवा साथी शिवम के साथ मिलकर तूतीकोरन में मिल मजदूरों का आंदोलन आरंभ कर दिया। अधिक सुविधा और वेतन की मांग करते हुए कोरल मिल में हड़ताल हो गई। ये हड़ताल इतनी सफल रही कि अंग्रेजों ने मजदूरों से समझौता करना पड़ा। इसके बाद पूरे इलाके में चिदंबरम पिल्लै की लोकप्रियता और बढ़ गई और इससे बढा उनका हौसला भी। लेकिन अंग्रेजों ने चिदंबरम को फंसाने की योजना बना ली थी और उनको देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। इनकी गिरफ्तारी के विरोध में तूतीकोरन में भयंकर हिंसा और आगजनी हुई थी। अंग्रेज सरकार ने आनन-फानन में पिल्ले को डबल उम्रकैद की सजा सुनाकर जेल भेज दिया। जेल में उको आम कैदी की तरह रखा गया और हाड़तोड़ मेहनत करवाई जाती थी। चिंदबरम पिल्लै ने हाईकोर्ट में अपील की और फिर उनका केस प्रीवी काउंसिल तक गया। उनकी सजा कम हुई और चार साल के बाद उनको रिहा कर दिया गया। इन चार सालों में स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कंपनी लगभग बंद हो चुकी थी और जहाज बिक गए थे। उनका वकालत का लाइसेंस रद कर दिया गया था। बाद में गांधी से मतभेद के चलते पिल्लै ने 1920 में कांग्रेस पार्टी छोड़ दी। फिर बैंक मैनेजर की नौकरी की। इससे ऊबकर उन्होंने वकालत का लाइसेंस वापस करने की अपील की जिसको न्यायालय ने मान लिया। वो फिर से वकालत भी करने लगे और कांग्रेस पार्टी भी ज्वाइन कर ली। धीरे धीरे वो गुमनामी में चले गए और 1936 में तूतीकोरन के कांग्रेस के कार्यलय में अंतिम सांसे लीं। स्वदेशी का झंडा बुलेंद करनेवाले इस स्वाधीनता सेनानी ने शिपिंग में जिस तरह के स्वावलंबन की राह दिखाई थी उसपर आगे चलकर भारतीय कंपनियों ने काम किया। 

Saturday, July 16, 2022

इंदिरा, इमरजेंसी और कंगना


कंगना रनोट बेहद प्रतिभाशाली अभिनेत्री हैं। कई फिल्मों में उनका उत्कृष्ट अभिनय देखने को मिला है। कमर्शियल फिल्मों में उनकी सफलता की कहानी तो सबको मालूम है। कई बार वो लीक से हटकर फिल्में करती हैं और उसमें अपने अभिनय से दर्शकों का मन मोह लेती हैं। पिछले दिनों तमिलनाडु की मुख्यमंत्री रही जयललिता की जिंदगी पर उनकी फिल्म थलाइवी आई थी। उस फिल्म में कंगना ने जयललिता के किरदार को पर्दे पर अपने अभिनय कौशल से जीवंत कर दिया था। तमिल और हिंदी में बनी इस फिल्म में उनके अभिनय की बेहद सराहना हुई थी। अब कंगना ने एक और बेहद चुनौतीपूर्ण विषय और पात्र का चयन किया है। अब वो आपातकाल पर फिल्म बना रही हैं। इस फिल्म में वो इंदिरा गांधी की भूमिका में होंगी। कंगना ने इस फिल्म का एक छोटा सा वीडियो इंटरनेट मीडिया पर साझा किया है। उसको देखकर लगता है कि कंगना ने इस किरदार को निभाने के लिए बहुत श्रम किया है। छोटे से वीडियो में कंगना ने इंदिरा गांधी के हाव-भाव और उनके बोलने के स्टाइल को पूरी तरह से किरदार में उतार दिया है। इस वीडियो को देखकर इस बात का अंदाज लग रहा है कि इस फिल्म में कंगना की एक और दमदार और यादगार भूमिका दर्शकों के सामने होगी। इस फिल्म को कंगना स्वयं निर्देशित भी कर रही हैं। इमरजेंसी भारतीय लोकतंत्र का वो काला अध्याय है जिसने समाज के हर अंग को प्रभावित किया था। उस दौर की अनेक कहानियां अब भी लोगों की स्मृतियों में शेष हैं। इमरजेंसी में जितना कुछ घटा या जिस प्रकार से इंदिरा गांधी के इस निर्णय और संजय गांधी के तानाशाही रवैये ने लोगों को परेशान किया उस अनुपात में फिल्में नहीं बनीं। रचनात्मक लेखन भी न के बराबर हुआ। लेख आदि अवश्य लिखे गए, पत्रकारों और राजनेताओं की पुस्तकें आईं लेकिन बहुत कम साहित्यकारों ने इमरजेंसी को विषय बनाकर उपन्यास या कहानी लिखी। 

हिंदी फिल्मों की अगर बात करें तो एक फिल्म याद आती है वो है किस्सा कुर्सी का। अमृत नाहटा की ये फिल्म इमरजेंसी के पहले बन गई थी और सेंसर बोर्ड के पास प्रमाणन के लिए गई थी। जबतक सेंसर बोर्ड से इसको प्रमाण पत्र मिलता तबतक देश में इमरजेंसी लागू कर दी गई थी।  इस फिल्म में संजय गांधी और इंदिरा गांधी के क्रियाकलापों पर कटाक्ष किया गया था। संजय गांधी की कार फैक्ट्री लगाने के मंसूबों पर व्यंग्य भी था। संजय गांधी को जब इसका पता लगा तो वो भड़क गए थे। उसके बाद तो जो हुआ वो इतिहास में दर्ज है। कई जगह इस बात का उल्लेख मिलता है कि सेंसर बोर्ड में जमा किए गए फिल्म के प्रिंट को उस वक्त के सूचना और प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ल के आदेश पर जब्त कर लिया गया था। संजय गांधी इससे संतुष्ट नहीं हुए। वो चाहते थे कि फिल्म के सभी प्रिंट नष्ट कर दिए जाएं। उनकी इस इच्छा की पूर्ति के लिए दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने बांबे (अब मुंबई) के प्रभादेवी इलाके में एक फिल्म प्रोसेसिंग लैब पर छापा मारा। छापे में फिल्म के निगेटिव समेत सभी प्रिंट जब्त कर लिए गए और उसको लेकर पुलिसवाले दिल्ली आ गए। इस बात का भी उल्लेख मिलता है कि पूरी सामग्री को मारुति कार फैक्ट्री के कैंपस में लाकर जला दिया गया था। इस फिल्म में मनोहर सिंह, शबाना आजमी और सुरेखा सीकरी मुख्य भूमिका में थे। बाद में वो फिल्म फिर से बनी और रिलीज हुई परंतु मूल फिल्म नष्ट कर दी गई। इस फिल्म को लेकर केस मुकदमा भी हुआ था।

ये तो इमरजेंसी के दौर की बात है लेकिन इमरजेंसी लगने के कुछ महीने पहले 1975 में एक फिल्म आई थी जिसका नाम था आंधी। फिल्म रिलीज हो गई। उसके बाद ये बात फैल गई कि ये फिल्म इंदिरा गांधी के जीवन पर है। फिर क्या था। इस फिल्म के निर्माताओं को घेरने की कोशिश होने लगी और आखिरकार इस फिल्म को बैन कर दिया गया। आई एस जौहर की एक फिल्म नसबंदी भी आई थी जिसमें इमरजेंसी के दौर में नसबंदी को लेकर की गई ज्यादतियों को दिखाया गया था। इस फिल्म को भी कई तरह की बाधाओं का सामना करना पड़ा था। जबकि ये फिल्म इमरजेंसी के बाद बनी थी। 2017 में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त निर्माता मधुर भंडारकर ने इंदु सरकार के नाम से फिल्म बनाई। इस फिल्म के खिलाफ पूरे देश में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन आदि किया। हैरत की बात ये कि उस वक्त सेंसर बोर्ड ने भी इस फिल्म की रिलीज की राह में रोड़े अटकाए थे। क्या ये माना जाए कि उपरोक्त फिल्मों का हश्र देखकर इमरजेंसी पर फिल्म बनाने का साहस कम फिल्म निर्माताओं ने किया या इसकी कोई और वजह रही है। दरअसल अगर हम समग्रता में देखें तो इसके अलावा भी कई वजहें नजर आती हैं। एक तो यही कि अधिकतर फिल्म निर्माता कारोबारी हैं और वो अपने व्यवसाय में किसी प्रकार का झंझट नहीं चाहते हैं। वो चाहते हैं कि फिल्म में निवेश करें और मुनाफा कमाएं। ये प्रवृत्ति फिल्मकारों को किसी प्रकार का जोखिम लेने से रोकती है। ये अनायास नहीं है कि गांधी पर इस देश में बहुत कम फिल्में बनीं। एक संपूर्ण फिल्म बनी भी स्वाधीनता के पैंतीस साल बाद। उसको भी एक विदेशी रिचर्ड एटनबरो ने बनाई। 

एक और महत्वपूर्ण बात जो इस संदर्भ में रेखांकित की जानी चाहिए वो ये कि हिंदी में राजनीतिक विषयों पर कहानियां कम लिखी गईं। उपन्यास और भी कम। स्वाधीनता के बाद भारत-पाकिस्तान के विभाजन पर जो कल्ट फिल्म मानी जाती है वो है गरम हवा। वो इस्मत चुगताई की कहानी पर आधारित है। विभाजन की त्रासदी पर हिंदी के लेखकों से अधिक पंजाबी के लेखकों ने लिखा क्योंकि वो भारत पाकिस्तान विभाजन से ज्यादा प्रभावित हुए थे। उसकी त्रासदी को नजदीक से देखा और महसूसा था। स्वाधीन भारत के इतिहास में कई ऐसी राजनीतिक घटनाएं हैं जिनपर बेहतरीन फिल्में बन सकती हैं। उनपर लिखा कम गया इस कारण फिल्मकारों का ध्यान भी उनपर कम गया। अगर हम स्वाधीनता के बाद के राजनीतिक घटनाक्रम पर बात करें तो भाषा को लेकर आंदोलन और प्रांतों का विभाजन। उसके बाद की हिंसा। कांग्रेस में विभाजन और इंदिरा गांधी का उदय। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए चुनाव में राजीव गांधी को अकल्पनीय बहुमत और पांच साल में ही जनता का मोहभंग। विश्वनाथ प्रताप सिंह का प्रधानमंत्री बनने का घटनाक्रम और संसदीय दल की बैठक के पहले की साजिशें और बैठक के दौरान का नाटकीय घटनाक्रम। कई राजनीतिक विषय हैं जिनपर फिल्में बन सकती हैं। निर्माता निर्देशक जोखिम उठाएं तो उनको सफलता भी मिल सकती है। विवेक अग्निहोत्री ने लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु और कश्मीर नरसंहार पर फिल्म बनाने का जोखिम उठाया। एक में उनको अपेक्षाकृत कम सफलता मिली लेकिन दूसरी फिल्म में जनता ने उनको इतना प्यार दिया जिसकी कल्पना भी उन्होंने नहीं की होगी। 

अब कंगना रनोट इमरजेंसी पर फिल्म बना रही हैं तो ये उम्मीद की जानी चाहिए कि जो बाधाएं उनके पूर्ववर्ती फिल्मकारों के सामने आई थीं वो उसका सामना कंगना को नहीं करना पड़ेगा। इमरजेंसी के दौरान धरपकड़, पाबंदियां और जुल्म तो हैं ही उस दौर में संजय गांधी और उनकी महिला मित्रों की भी कई कहानियां इधर उधर पुस्तकों और पत्र-पत्रिकाओं में बिखरी हुई हैं। अगर कंगना की टीम ने उन कहानियों को फिल्म की कहानी में ठीक से पिरो दिया तो फिर फिल्म की सफलता में कोई संदेह नहीं रहेगा। संभव है कि इस सफलता से और भी फिल्मकार राजनीतिक फिल्म बनाने के लिए प्रेरित हों।  


Saturday, July 9, 2022

ओटीटी प्लेटफार्म्स की चुनौतियां


कोरोना काल में जब लाकडाउन की वजह से सिनेमा हाल बंद हुए और लोग घरों से बाहर नहीं निकल रहे थे, ऐसे में ओवर द टाप (ओटीटी) प्लेटफार्म्स काफी लोकप्रिय हुए थे। घर बैठे उनके सामने मनोरंजन का एक ऐसा विकल्प था जहां देश विदेश की असंख्य सामग्री उपलब्ध थी। सिर्फ महानगरों में ही नहीं बल्कि छोटे शहरों में भी इन ओटीटी प्लेटफार्म को डाउनलोड करके लोगों ने मनोरंजन के इस नए विकल्प को अपनाया था। कोरोना की पहली और दूसरी लहर के दौरान इन प्लेटफार्म्स पर बड़े सितारों की फिल्में भी रिलीज हुईंन थीं। उस समय दुनिया में ये आकलन किया गया था कि भारत ओटीटी प्लेटफार्म्स का या वीडियो आन डिमांड स्ट्रीमिंग प्लेटफार्म्स का सबसे तेजी से बढ़ता हुआ बाजार है। अनुमान ये भी लगाया गया था कि इस वर्ष के अंत तक देश में स्मार्ट फोन या इंटरनेट की सुविधा वाले मोबाइल फोन के उपभोक्ताओं की संख्या 80 करोड़ पहुंच जाएगी। इस संख्या को ध्यान में रखते हुए ओटीटी प्लेटफार्म्स ने भारतीय बाजार को लेकर अपनी रणनीति बनाई और यहां निवेश किया। वैश्विक स्तर पर भी कोरोना के दौर में इस माध्यम को दर्शकों ने अपनाया था। आपदा में मिले इस अवसर की वजह से इन प्लेटफार्म्स को चलानेवाली कंपनियों को दो साल में काफी मुनाफा हुआ। कोरोना का भय कम होने की वजह से अब इन कंपनियों के सामने अपनी उस सफलता को बनाए रखने की चुनौती है। चुनौती तो ग्राहकों की संख्या को बरकरार रखने की भी है। 

कनाडा की मार्केटिंग विशेषज्ञ रेबेका आल्टर ने अपने एक लेख में लोकप्रिय ओटीटी प्लेटफार्म नेटफ्लिक्स की वैश्विक चुनौतियों के बारे में लिखा है। रेबेका के मुताबिक इस वर्ष की पहली तिमाही में नेटफ्लिक्स ने दो लाख ग्राहक खो दिए और विशेषज्ञों का अनुमान है कि दूसरी तिमाही में करीब बीस लाख ग्राहक इस प्लेटफार्म को छोड़ सकते हैं। रेबेका इसके लिए यूक्रेन युद्ध की वजह से रूस में अपनी सेवाएं बंद करने के नेटफ्लिक्स के फैसले को तो जिम्मेदार मानती ही है, साथ ही ग्राहक शुल्क में बढ़ोतरी को भी एक कारण माना है। वैश्विक बाजार की बात छोड़ भी दें तो अपने देश में भी नेटफ्लिक्स की सेवाएं अन्य सभी ओटीटी प्लेटफार्म्स से महंगी हैं। नेटफ्लिक्स मोबाइल पर देखने की सुविधा देने के एवज में प्रतिमाह 149 रु लेता है जो कि एक वर्ष का 1788 रु बनता है। अन्य लोकप्रिय ओटीटी प्लेटफार्म वार्षिक शुल्क के तौर पर हजार रुपए तक लेती हैं। अमेजन प्राइम, डिजनी हाटस्टार और सोनी लिव आदि का वार्षिक शुल्क एक हजार रु से कम ही है। लेकिन इन सभी प्लेटफार्म के सामने सबसे बड़ी चुनौती है अपने ग्राहकों को जोड़े रखने की। कोरोना महामारी के दौरान जितने ग्राहक जुड़े थे उनको बनाए रखना इनके लिए बेहद कठिन होता जा रहा है। एक अनुमान के मुताबिक भारत में 2020 के अप्रैल से लेकर जुलाई तक विभिन्न ओटीटी प्लेटफार्म्स से करीब तीन करोड़ नए ग्राहक जुड़े थे। जो अब लगातार कम होते जा रहे हैं। इन प्लेटफार्म्स को नजदीक से जाननेवाले और इनकी गतिविधियों पर नजर रखनेवालों का अनुमान है कि कोरोना काल में जितने ग्राहक इन प्लेटफार्म्स से जुड़े थे उनमें से करीब आधे ग्राहकों ने सब्सक्रिप्शन का नवीनीकरण नहीं करवाया। वैश्विक स्तर पर भी लगभग यही स्थिति है। सबसे बड़ा कारण कोरोना का भय खत्म होने लगा है और सिनेमा हाल खुल गए हैं। 

ओटीटी प्लेटफार्म्स से दर्शक क्यों जुड़े रहें, अगर इसका उत्तर ढूंढे तो सबसे पहले तो इन प्लेटफार्म्स पर उपलब्ध मनोरंजन सामग्री की गुणवत्ता की बात होगी। दूसरी वजह इनको देखने का शुल्क। इसके अलावा हमारे देश में इन प्लेटफार्म्स को विवादों के कारण भी काफी फायदा मिला था। ओटीटी प्लेटफार्म पर उपलब्ध कंटेंट को लेकर जब विवाद होता है और उसकी चर्चा होती है तो इन प्लेटफार्म्स को नए ग्राहक मिलते हैं। लोग उस सामग्री को देखना चाहते हैं। ग्राहकों की यही चाहत उनसे इन प्लेटफार्म्स को डाउनलोड करवाती है। अब अगर इन प्लेटफार्म्स पर उपलब्ध मनोरंजन सामग्री का आकलन करते हैं तो पाते हैं कि वहां बहुत अधिक दुहराव होने लगा है। पहले कुछ सामग्री चौंकाती थी और दर्शकों को अपने साथ रोकती थी। अब लगातार एक ही तरह की सामग्री उपलब्ध होने लगी तो दर्शकों के लिए वो सामान्य बात हो गई। नेटफ्लकिस पर पहले ‘लस्ट स्टोरीज’ और ‘सेक्रेड गेम्स’ जैसी सीरीज आई जिसमें नग्नता और भयंकर हिंसा थी। इन प्लेटफार्म्स पर किसी प्रकार की प्रमाणन की आवश्यकता नहीं है इस वजह वो सेंसर बोर्ड की कैंची से मुक्त होकर खुले आम नग्नता और यौनिकता परोस रहे थे। हिंसा के नाम पर शरीर के अंगों को इस तरह से काटकर दिखा रहे थे कि कुछ दर्शकों को झटका लगता था। भाषा के स्तर भी सारी मर्यादा तोड़कर भरपूर गाली गलौच भरे संवाद भी दर्शकों को चौंका रहे थे। इन सबसे होनेवाली चर्चा से ग्राहक बढ़ रहे थे। धीरे धीर इनकी नवीनता खत्म हो गई।  

इसके अलावा भारतीय संस्कृति को लेकर विवादास्पद टिप्पणियां या दृश्य दिखाने पर भी जमकर विवाद हुए। लैला जैसी सीरीज भी आई जिसने हिंदू मानस को झकझोरा था। नेटफ्लिक्स पर ही एक सीरीज आई थी ‘द सूटेबल बाय’। इसमें मंदिर प्रांगण में चुंबन दृश्य पर जमकर बवाल हुआ था। केस मुकदमे भी हुए। प्लटफैर्म को अपेक्षित प्रचार मिला और परिणामस्वरूप उसके ग्राहक भी बढ़े। इसी तरह से अगर देखें तो सभी ओटीटी प्लेटफार्म ने अलग अलग तरीके से दर्शकों की जेब से पैसे निकलवाने का उपक्रम किया। जो ओटीटी प्लेटफार्म मुफ्त में कंटेंट दिखा रहा था उसने वेब सीरीज के बीच में विज्ञापन दिखाना आरंभ कर दिया। इतनी बार विज्ञापन आता है कि दर्शक परेशान हो जाते हैं। तभी स्क्रीन पर एक फ्लैश आता है कि अगर आप बगैर विज्ञापन या बिना अवरोध के वेब सीरीज देखना चाहते हैं तो अमुक राशि देकर वार्षिक ग्राहक बनें। इसके अलावा कई प्लेटफार्म्स ने तय ग्राहक शुल्क पर एक ही डिवाइस पर देखने की सुविधा दी। मोबाइल की अलग दर और मोबाइल और टीवी पर देखने के लिए अलग दर। इन सब झंझटों से भी ग्राहक इनसे दूर हुए। एक और बात जिसको रेखांकित करना आवश्यक है वो ये कि इन प्लेटफार्म्स ने हिंदी फिल्मों के बड़े सितारों को भारी भरकम रकम देकर उके साथ कंटेंट के लिए समझौता किया। सामग्री अर्जित करने के लिए निवेश किया गया लेकिन उसको अपेक्षित दर्शक नहीं मिले। डिजनी हाटस्टार पर अजय देवगन की एक वेब सीरीज आई जिसका नाम था रुद्रा, द एज आप डार्कनेस। अजय देवगन की वजह से प्लेटफार्म ने इसपर भारी भरकम रकम खर्च की लेकिन ये सीरीज अपेक्षित सफलता अर्जित नहीं कर सकी। जानकारों का मानना है कि इससे भारी नुकसान हुआ। इसी तरह कुछ फिल्में भी खरीदी गईं जिनको सफलता नहीं मिली। 

इन ओटीटी प्लेटफार्म्स के सामने जो सबसे बड़ी चुनौती है वो है लगातार कटेंट में इस तरह का बदलाव जिससे दर्शकों को अपनी ओर खींचने और फिर उनको रोके रखने में सफलता मिल सके। विवाद की गुंजाइश अब लगभग खत्म सी हो गई है क्योंकि सभी निर्माता अब इसकी परिणति से बचना चाहते हैं। वो सतर्क होकर सीरीज बनाने लगे हैं। तीसरे अगर भारतीय बाजार में उनको बने रहना है और लंबे समय तक मुनाफे का कारोबार करना है तो ये आवश्यक है कि वो अपने शुल्क निर्धारण पर काम करें। भारत में इंटरनेट की लोकप्रियता की एक वजह उसका सस्ता होना भी है। अगर ये सस्ते पैकेज पर अपना कंटेंट उपलब्ध करवाने के बारे में सोच सकते हैं तो इनकी ग्राहक संख्या बढ़ सकती है। कस्बों और गांवों तक पहुंचना है तो उनको अपना ग्राहक शुल्क कम रखना ही होगा। आधार बढ़ाकर भी मुनाफा बढ़ाया जा सकता है।  


Saturday, July 2, 2022

लड़खड़ाती हिंदी आलोचना


समकालीन हिंदी साहित्य में होनेवाले विमर्शों में अधिकतर लेखक आलोचना को लेकर उदासीन दिखाई पड़ते हैं। कुछ युवा और कई अधेड़ होते लेखक तो आलोचना के अंत की घोषणा करते नजर आते हैं। फेसबुकजीवी लेखक तो आलोचना की आवश्यकता को ही नकार रहे हैं। उनके मुताबिक साहित्य को न तो आलोचक की आवश्यकता है और न ही आलोचना की। हिंदी आलोचना पर कई तरह के आरोप लगते हैं। कुछ कहते हैं कि आलोचना रचना केंद्रित नहीं रही और वो लेखक केंद्रित हो गई है। आलोचकों के अलग अलग खेमे हैं और वो अपने खेमे के लेखकों की औसत रचनाओं को भी कालजयी साबित करने में जुटे रहते हैं। इसकी वजह से आलोचना की साख छीजती है। इसमें दो राय नहीं कि आलोचक की व्यक्तिगत रुचि और संबंधों के निर्वाह की वजह से आलोचना विधा को नुकसान पहुंचा है। इसके अलावा एक महत्वपूर्ण तथ्य को भी रेखांकित किया जाना चाहिए। इस वक्त जो आलोचक सक्रिय हैं उनकी तैयारी भी उतनी नहीं है कि वो किसी रचना को व्याख्यायित करके पाठकों के सामने उसके अर्थ खोल सकें। आलोचना पर लगनेवाले तमाम आरोप सही हो सकते हैं लेकिन जो लोग आलोचना की आवश्यकता पर प्रश्न उठाते हैं उनको समझना चाहिए कि आलोचना के बिना रचना और रचनाकार की प्रतिष्ठा स्थापित नहीं हो सकती है। 

स्वाधीनता के बाद से देखें तो हिंदी साहित्य की अलग अलग विधा में अलग अलग तरह की प्रवृत्तियां दिखाई पड़ती हैं। उदाहरण के लिए कहानी में नई कहानी, अकहानी, आंचलिक कहानी, सचेतन कहानी, समांतर कहानी आदि का दौर दिखाई देता है। कविता में भी नई कविता,अकविता, प्रयोगवादी कविता, प्रगतिवादी कविता की चर्चा होती है। कविता और कहानी की इन प्रवृत्तियों को स्थापित करने में आलोचकों की बड़ी भूमिका रही है। समकालीन हिंदी साहित्यिक परिदृश्य में कोई विशेष प्रवृति नजर नहीं आती है, क्यों? क्योंकि समकालीन दौर के आलोचक इस विधा को गतिशील बनाए रखने में चूक गए। आलोचना के कई दशक पुराने औजारों के आधार पर ही रचना को परखने की ऐतिहासिक भूल हुई। हिंदी आलोचना पर तमाम तरह के आरोप लगते हैं, लेकिन आलोचना की दयनीय स्थिति क्यों हुई इसके पीछे के कारणों को जानने की गंभीर कोशिश नहीं होती। ये कोशिश इसलिए नहीं होती है कि अगर इन कारणों तक पहुंचेगें तो हिंदी आलोचना के पुराने गढ़ और मठ ध्वस्त होने लगेंगे। पाश्चात्य आलोचना के सिद्धांतों की नकल करते हुए पूर्व में जो विद्वतापूर्ण व्याख्याएं की गईं है वो सारी मान्यताएं संदेह के घेरे में आ जाएंगी। संस्कृत काव्यशास्त्र में रचना को समझने की जो प्रविधि है वो बेहद वैज्ञानिक है। इसमें जिस शब्द शक्ति की बात है वो पाश्चात्य आलोचना में कहां दिखाई देती है। हमारे देश का रस सिद्धांत या ध्वनि सिद्धांत कितनी बारीकी से कविता को विन्यस्त करता है इसकी कल्पना भी आई ए रिचर्ड्स को नहीं थी। जिस विदेशी लेखक को रस सिद्धांत या धव्नि सिद्धांत के बारे में जानकारी नहीं थी उससे सीखकर भारतीय आलोचक हिंदी कविता की व्याख्या कर रहे थे। ठीक से याद नहीं आ रहा है लेकिन कहीं पढ़ा था कि संस्कृत के अलंकारशास्त्र और उपमा के बारे में पश्चिमी आलोचकों की अज्ञानता उनको हास्यास्पद बना देती है। 

पश्चिम के आलोचकों के अलावा हिंदी आलोचना में मार्क्सवादी सिद्धातों के आधार पर रचना की आलोचना की गई। इस विचारधारा के लेखकों ने मार्क्सवादी सिद्धांतों की जड़ता को अपनी ताकत बनाने की कोशिश की। परिणाम ये हुआ कि मार्क्सवादी आलोचना जड़ होती चली गई और उनका विकास अवरुद्ध होता गया। रामचंद्र शुक्ल के बाद आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी और रामविलास शर्मा ने रचना से मुठभेड़ करते हुए आलोचना के अपने प्रतिमान बनाए। कुछ हद तक नामवर सिंह ने भी। नामवर के बाद जो भी ख्यात आलोचक हुए वो रचना से टकराने में हिचकते नजर आते हैं। मार्क्सवादी विचारधारा के प्रभाव में वो रचना को लेकर समाज की ओर जाते तो हैं लेकिन समग्रता से मूल्यांकन नहीं कर पाते हैं। इसका एक और दुपरिणाम ये हुआ कि रचना को खोलने के जो औजार रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा के यहां दिखाई देते हैं वो बाद के आलोचकों के यहां नहीं दिखते हैं। इन औजारों की अनुपस्थिति के कारण हिंदी आलोचना की धार कुंद होती चली गई और इस विधा में एक वैचारिक सन्नाटा पसरता चला गया। अशोक वाजपेयी कभी कभार आलोचना में तलवारबाजी करते हैं लेकिन वो भी इस विधा को गतिशील नहीं बना पाते हैं। उनकी अपनी सीमाएं हैं जिसको वो पार नहीं कर पाते हैं। बाद के आलोचकों ने भी रचना के पाठ में समय के साथ हो रहे बदलाव को पकड़ने की कोशिश नहीं की और वो आलोचना के नए प्रतिमान गढ नहीं पाए।  

पिछले दिनों सुधीश पचौरी की एक पुस्तक आई है ‘नयी साहित्यिक सांस्कृतिक सिद्धान्तकियां’। इस पुस्तक में सुधीश पचौरी ने आलोचना के नए प्रतिमान स्थापित करने की कोशिश की है। उन्होंने रचना से टकराने और फिर उसके आधार पर उसको व्याख्यित करने का आग्रह किया है। सुधीश पचौरी स्पष्ट रूप से कहते हैं कि रचना सिर्फ रचना नहीं होती वह एक जटिल और पेचीदा नेटवर्क का हिस्सा होती है। इसको वो अलग तरीके से सामने रखते हैं। इस संदर्भ में वो जायसी की पद्मावत और तुलसीदास के रामचरित मानस का उदाहरण देकर नया प्रतिमान गढ़ने का प्रयास करते हैं। वो बताते हैं कि रामचंद्र शुक्ल ने करीब नब्बे वर्ष पहले जायसी के पद्मावत की भूमिका लिखी थी और उसे प्रेमगाथाओं की काव्य परंपरा में ऊंचा स्थान दिया था। इसमें उन्होंने लौकिक प्रेम की अलौकिकता के बारे में बताया था। शुक्ल जी का ये पाठ ही पद्मावत का अंतिम पाठ बन गया। उनकी स्थापना है कि जैसे ही संजय लीला भंसाली ने 2017 में फिल्म पद्मावत बनानी आरंभ की तो इसका नया पाठ सामने आने लगा। जैसे जैसे फिल्म को लेकर विवाद बढ़ा तो पद्मावत के तीन पाठ सामने आए। सुधीश पचौरी मानते हैं कि पद्मावत का पहला पाठ फिल्मी पाठ था जिसे निर्माता निर्देशक बना रहा था जो दो सौ करोड़ रुपए की आर्थिकी से जुड़ा था। दूसरा पाठ कर्णी सेना का क्षत्रियवादी (जातिवादी) पाठ था जिसमें इस्लाम विरोधी पाठ भी सक्रिय था। तीसरा पाठ राजनीतिक रहा जिसको संसद की बहसों और चुनाव के दौरान देखा गया। उनके मुताबिक इसके बाद पद्मावत का अकादमिक पाठ भी बदला। इसी तरह से जब तुलसीदास ने रामचरित मानस की रचना की थी तो उस समय का उसका पाठ अलग था और अब बिल्कुल अलग है। अब उसको पावर टेक्सट कहा जा सकता है। 

अपनी इस पुस्तक में सुधीश पचौरी ने हिंदी आलोचना की सीमाओं पर ठीक से विचार किया है। वो मानते हैं कि आरंभ में हिंदी आलोचना खुद को संस्कृत से जोड़कर देखती थी। धीरे-धीरे वो इससे दूर होती चली गई। बाद में अंग्रेजी साहित्य शास्त्र ने उसकी जगह ले ली। वो बेहद तल्ख अंदाज में कहते हैं कि संस्कृत का काव्यशास्त्र जो हिंदी को उत्तराधिकार में मिला था उसकी कुंजियां बना ली गईं लेकिन उसमें गहरे नहीं उतरा गया। इसलिए उसका नया संस्कार नहीं हो सका। सुधीश पचौरी ने अपनी इस पुस्तक में भारतीय काव्यशास्त्र की परंपरा से रस, छंद, अलंकार, रीति, वक्रोक्ति, ध्वनि आदि पर विस्तार से प्रकाश डाला है। उन्होंने ध्वनि सिद्धांत के पुनर्पाठ की बात भी की है और इसकी पश्चिम के सिद्धांत और सिद्धांतकारों की स्थापनाओं से तुलना करके इसकी श्रेष्ठता साबित की है। हिंदी आलोचना को अगर कठघरे में खड़ा करना है तो इस तरह से करना होगा जैसे सुधीश पचौरी ने किया है। अगर हमें हिंदी आलोचना की दुर्दशा की बात करनी है तो उसकी भूल गलतियों को लेकर गंभीरता से विमर्श करना होगा।न इसका महत्वपूर्ण लाभ ये होगा कि जो ऐतिहासिक भूलें हुई हैं उसका परिमार्जन हो सकेगा।

Saturday, June 25, 2022

अमृत काल में सकारात्मक पहल


देश में इस वक्त राष्ट्रपति चुनाव की हलचल है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की तरफ से द्रौपदी मुर्मू को उम्मीदवार बनाया गया है जबकि विपक्ष की ओर से पूर्व बीजेपी नेता यशवंत सिन्हा राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार हैं। नरेन्द्र मोदी के बारे में कहा जाता है कि वो हमेशा अपने निणयों से चौंकाते हैं। इस बार भी उन्होंने ओडीशा की आदिवासी महिला नेता द्रोपदी मुर्मू को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाकर चौंकाया। नरेन्द्र मोदी के इन चौंकानेवाले निर्णयों के पीछे एक सुविचारित और सुचिंतित सोच होता है। जब द्रोपदी मुर्मू के नाम की घोषणा हुई तो उसको लेकर विपक्षी खेमे से सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं आई। हर चीज में, हर निर्णय में नकारात्मकता खोजनेवाले लिबरल झंडाबरदारों ने भी द्रोपदी मुर्मू को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाने के निर्णय को भी उसी ढंग से लिया।  कुछ लोगों ने इस आधार पर इस निर्णय की आलोचना आरंभ कर दी कि राष्ट्रपति बनाकर किसी समुदाय का क्या भला हो सकता है। क्या ए पी जे अब्दुल कलाम को राष्ट्रपति बनाने से मुसलमानों का भला हो गया। ऐसे बालक बुद्धि लोगों को राजनीतिक टिप्पणियों से बचना चाहिए। राजनीति में हमेशा से प्रतीकों का महत्व रहा है। प्रतीकों की राजनीति का असर भी समाज पर होता है। आज दलितों में अपने सम्मान का भाव गाढ़ा हुआ है। इसके पीछे के कारणों की पड़ताल करेंगे तो उसमें एक कारण प्रतीकों की राजनीति भी नजर आती है। इस तरह के प्रतीकों से किसी समुदाय के लोगों के मन में सम्मान का भाव तो जगता ही है वो समाज के अन्य समुदा के लोगो के साथ जुड़ते भी हैं। उनके अंदर ये भावना बी उत्पन्न होती है कि देश उनके समुदा का सम्मान करता है और उनके बीच का कोई किसी भी सर्वोच्च पद पर पहुंच सकते हैं। ये भावना और ये सोच परोक्ष रूप से देश को मजबूत करता है। किसी भी देश की जनता का जब उस देश की व्यवस्था में भरोसा गाढ़ा होता है तो वो राष्ट्रहित में होता है। 

बालक बुद्धि लिबरल्स को ये समझना चाहिए कि जब द्रोपदी मुर्मू राष्ट्रपति बन जाएंगी तो देश के आदिवासी समुदाय के लोगों पर उसका कितना सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। आदिवासी समुदाय के लोग जब ये देखेंगे कि देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर उनके बीच की एक महिला विराजमान है तो उनके अंदर जो गर्व का भाव पैदा होगा वो हमारे राष्ट्र के समावेशी आधार को मजबूती प्रदान करेगा। एक आदिवासी महिला का नाम देश के सबसे उच्च संवैधानिक पद के लिए प्रस्तावित करने के लिए स्वाधीनता के अमृत महोत्सव वर्ष से अधिक उपयुक्त कोई समय हो नहीं सकता। राजनीति में हर कदम के प्रतीकात्मक महत्व के साथ साथ जमीनी प्रभाव भी होता है। द्रोपदी मुर्मू को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाकर भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने कई स्तर पर जनआकांक्षा का ध्यान रखा। अगर हम ऐतिहासिक दृष्टि से विचार करें तो इस वक्त ओडीशा का जो क्षेत्र है वो लंबे कालखंड से अपनी उपेक्षा को लेकर कभी मुखर तो कभी मौन विरोध करता रहा है। प्रचीन भारत के इतिहास पर नजर डालें तो सम्राट अशोक के शासनकाल में कलिंग में भयानक युद्ध लड़ा गया था। इस युद्ध की भयावहता के बारे में बहुत अधिक लिखा जा चुका है। उस युद्ध के बाद उस क्षेत्र पर या उस क्षेत्र के लोगों पर बहुत अधिक ध्यान दिया हो ऐसा उल्लेख इतिहास की पुस्तकों में नहीं मिलता है। कलिंग युद्ध के बाद एक लंबा कालखंड बीतता है। उसके बाद जब मुगलों ने उस क्षेत्र पर कब्जा किया तो उन्होंने वहां लूटपाट की, वहां के नागरिकों पर अत्याचर किए लेकिन उस क्षेत्र को मुख्य धारा में लाने कि कोशिश नहीं दिखती। मुगलों के बाद जब अंग्रेजों ने वहां अपना राज कायम किया तो उन्होंने भी वहां के प्राकृतिक संसाधनों को तो लूटा, मानव संसाधन का दोहन किया लेकिन उस क्षेत्र पर बहुत अधिक ध्यान नहीं दिया। उस क्षेत्र में अपनी उपेक्षा को लेकर रोष भी रहा है। 

ओडिया लेखक बिजय चंद्र रथ की एक पुस्तक है ‘जयी राजगुरु, खोर्धा विद्रोह के अप्रतिम क्रांतिकारी’ जिसका हिंदी में अनुवाद सुजाता शिवेन ने किया है। इस पुस्तक में ओडिशा के कम ज्ञात स्वाधीनता संग्राम सेनानी राजगुरु जयकृष्ण महापात्र की कहानी है। अंग्रेजों ने कटक पर आक्रमण करके उसको अपने अधिकार में ले लिया था। ईस्ट इंडिया कंपनी के सैनिक या उसके मुखिया पहले स्थानीय राजाओं के साथ समझौता करते थे और फिर खुद को मजबूत करने के बाद समझौते से मुकर जाया करते थे। इस तरह का बर्ताव  ईस्ट इंडिया कंपनी ने खोर्धा के राजा के साथ किया। कंपनी सरकार ने राजा के साथ किए गए करार को मानने से इंकार कर दिया। परिणाम ये हुआ कि वहां विद्रोह की आग सुलगने लगी। 1804 में जब वहां की जनता ने कंपनी सरकार के खिलाफ विद्रोह कर दिया । राजगुरु जयकृष्ण महापात्र ने इस विरोध का नेतृत्व किया लेकिन अंग्रेजों ने उनको बंदी बना लिया और फिर उनकी जान ले ली। पुस्तक में जनश्रुतियों के हवाले से ये बताया गया है कि कंपनी सरकार के सैनिकों ने राजगुरु को पेड़ की दो टहनियों से बांध दिया। इसके बाद उन टहनियों को विपरीत दिशा में गिरा दिया। राजगुरु का शरीर दो हिस्सों में फट गया और उनकी मृत्यु हो गई। इस नृशंसता का कोई दस्तावेजी साक्ष्य मौजूद नहीं है लेकिन वहां के लोक में मौखिक रूप से राजगुरु की ये कहानी अब भी जीवंत है। इतिहासकारों ने इस वीर की भी उपेक्षा की। क्रांतिकारी योद्धा जयकृष्ण महापात्र, जिनको उस क्षेत्र के लोग जयी राजगुरु के नाम से जानते हैं, के संघर्ष और उनके बलिदान के बारे में कम ही लोगों को पता है। उस क्षेत्र के नायकों की उपेक्षा का ये उदाहरण है। उस क्षेत्र के कई नायक इस तरह की उपेक्षा के शिकार बने। 

ये सिर्फ ओडीशा क्षेत्र की बात नहीं है बल्कि अगर पूरे देश के आदिवासियों पर नजर डालें तो अनेक ऐसे क्रांतिकारी या क्रांतिवीर हैं जिनकी इतिहास लेखन में घोर उपेक्षा की गई है। भगवान बिरसा मुंडा के बारे में तो सब जानते हैं लेकिन तिलका मांझी से लेकर सिदो मुर्मू और कान्हो मुर्मू के बारे में पूरे देश को बताया जाना चाहिए था। जून 1855 में संताल हूल विद्रोह के बारे में भी अब जाकर थोड़ी बहुत जानकारी उपलब्ध होने लगी है अन्यथा भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इस अध्याय के बारे में स्वाधीन भारत के इतिहासकारों ने न्याय नहीं किया। अब भी इस विद्रोह के बारे में, उसके नायकों के बारे में, उनकी वीरता के बारे में विस्तार से राष्ट्र को बताने की आवश्यकता है। इतनी उपेक्षाओं के बीच अगर आदिवासी समाज की किसी महिला को देश के राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया गया है तो विपक्षी दलों समेत तमाम बौद्धिकों को इसका स्वागत करना चाहिए था। 2014 में जब नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने थे तो उन्होंने सबका साथ और सबका विकास की बात की थी। बाद में उन्होंने इसको और व्यापक बनाकर इसमें प्रयास और विश्वास भी जोड़ा। सबका साथ और सबका विकास को वामपंथ से जुड़े बौद्धिकों ने मुसलमानों से जोड़कर देखने और व्याख्यायित करने की कोशिश की। इसको नारे और जुमला आदि कहकर उपहास भी किया। जबकि अगर पिछले आठ साल में नरेन्द्र मोदी सरकार के निर्णयों को देखा जाए तो ये नारा नहीं बल्कि भारतीय समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर आगे बढ़ने का उपक्रम नजर आता है। भारतीय संविधान भी तो यही कहता है कि बिना किसी भेदभाव के सभी वर्गों को समान अवसर मिलना चाहिए। द्रोपदी मुर्मू को देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर बिठाकर कृतज्ञ राष्ट्र उन आदिवासी नायकों को श्रद्धांजलि तो देगा ही उनको सपनों को भी साकार होते देखेगा।

सिनेमा पर आपातकाल का कहर

सिनेमा एक ऐसा माध्यम है जिसका भारतीय समाज पर जबरदस्त प्रभाव पड़ता है। सिने अभिनेता और अभिनेत्रियों की लोकप्रियता का कई बार राजनीति में उपयोग किया जाता है। कभी चुनाव जीतने के लिए तो कभी भीड़ जुटाने के लिए। दब देश में इमरजेंसी लगी थी और संजय गांधी खुद को इंदिरा गांधी के राजनीतिक वारिस के तौर पर स्थापित करने में लगे थे तब उन्होंने भी फिल्मी क
लाकारों की लोकप्रियता का सहारा लेने की कोशिश की थी। जब इंदिरा गांधी ने देश पर इमरजेंसी थोपी उस वक्त कांग्रेस पार्टी में इंदिरा इज इंडिया और इंडिया इज इंदिरा का नारा हकीकत हो चुका था। कांग्रेस पार्टी के दिग्गज नेता घुटने टेक चुके थे। संजय गांधी का बोलबाला था। इमरजेंसी में हुई ज्यादतियों का सारा ठीकरा इंदिरा गांधी के सर फोड़ा जाता है और संजय गांधी की कारगुजारियों पर कम चर्चा होती है। इमरजेंसी के दौरान फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े कलाकारों पर जो पाबंदियां लगाई गईं उसके लिए संजय गांधी और उस दौर के उनके चमचे जिम्मेदार थे। इमरजेंसी के दौर में किशोर कुमार के गानों पर प्रतिबंध की खूब चर्चा होती है लेकिन देवानंद की फिल्मों और उनकी फिल्मों के गानों पर लगे प्रतिबंध के बारे में कम ही लोगों का पता है। देवानंद पर प्रतिबंध की वजह भी लगभग वही है जिसकी वजह से किशोर कुमार के गानों को प्रतिबंधित किया गया। 

देश में जब इमरजेंसी लगी थी तो हिंदी फिल्मों के ज्यादातर नायक और नायिकाएं उसके पक्ष में थे। बाद में उनमें से कइयों को कांग्रेस सरकार ने राज्यसभा में नामित करके पुरस्कृत भी किया। इनमें से एक अभिनेत्री तो वो भी हैं जो इन दिनों अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर और फासीवाद की आहट पर लगातार टिप्पणी करती हैं। ये अभिनेत्री इमरजेंसी के दौर में कांग्रेस के एक कार्यक्रम में नृत्य करने आई थीं और स्टेज पर परफार्म भी किया था। संजय गांधी के पक्ष में माहौल बनाने के लिए काम भी किया था। दिलीप कुमार और नरगिस तो घोषित तौर पर कांग्रेस और संजय गांधी के पक्ष में थे और हिंदी फिल्मों के अन्य कलाकारों को उनके पक्ष में मोबलाइज भी कर रहे थे। देवानंद ने अपनी  आत्मकथा रोमांसिंग विद लाइफ में संजय गांधी के समर्थकों के बारे में लिखा है। उन्होंने लिखा है कि इमरजेंसी के दौर में युवा कांग्रेस की एक बेहद खूबसूरत और आकर्षक महिला बांबे (अब मुंबई) आई थी और उसने बालीवुड में संजय के पक्ष में समर्थन जुटाने का अभियान चलाया था। वो चाहती थी कि हिंदी फिल्मों के लोकप्रिय अभिनेता और अभिनेत्री संजय गांधी की अगुवाई में दिल्ली में होनेवाली रैली में शामिल हों। देवानंद को भी उसने तैयार कर लिया। देवानंद जब दिल्ली की रैली में पहुंचे तो दिलीप कुमार वहां पहले से मंच पर मौजूद थे। देवानंद के मुताबिक उस रैली में संजय गांधी को नेता के तौर पर स्थापित करनेवाले भाषण हो रहे थे और नारे लग रहे थे। रैली खत्म होने के बाद देवानंद को कहा गया कि उनको दूरदर्शन के स्टूडियो जाकर युवा कांग्रेस और उसके नेता की प्रभावी नेतृत्व क्षमता के बारे में अपनी बात रिकार्ड करवानी है। देवानंद ने लिखा है कि ऐसा प्रतीत हो रहा था कि उस वक्त की प्रोपगंडा मंशीनरी एकदम से फासीवादी तरीके से हर अवसर और हर व्यक्ति का उपयोग संजय गांधी की छवि चमकाने में लगी हुई थी। देवानंद को प्रोपगंडा मशीनरी का ये प्रस्ताव नहीं भाया और उन्होंने न सिर्फ दूरदर्शन जाने से मना कर दिया बल्कि इसका विरोध भी किया। उस दौर में कई अभिनेताओं और अभिनेत्रियों ने इमरजेंसी और संजय गांधी के पक्ष में बयान दिया था जो दूरदर्शन पर प्रसारित भी हुआ था। अगर दूरदर्शन के आर्काइव में वो सामग्री हो तो उसको निकालकर देश की जनता को बताना चाहिए कि कौन कौन से फिल्मी कलाकार इमरजेंसी के पक्ष में थे। खैर.. ये अवांतर प्रसंग है। 

देवानंद के मना करने की उस वक्त की सरकार में बेहद तीखी प्रतिक्रिया हुई। दूरदर्शन पर उनकी फिल्मों को तो बैन किया ही गया किसी भी सरकारी माध्यम में देवानंद का नाम नहीं आए ऐसी व्यवस्था बना दी गई। ये जानकर देवानंद को बहुत बुरा लगा था और उन्होंने उस वक्त के सूचना और प्रसारण मंत्री से इसकी शिकायत भी की थी लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला। जब वो बांबे लौटे तो एक पार्टी मं उनको इस बात का एहसास हुआ कि उनके मना करने का कांग्रेस नेतृत्व ने कितना बुरा माना है। एक पार्टी में उनको अभिनेत्री नरगिस मिलीं और उनका हाथ पकड़कर एक कोने में ले गईं। वहां उन्होंने देवानंद से कहा कि आपने संजय गांधी के पक्ष में बोलने से मना कर अच्छा नहीं किया। उन्होंने देवानंद को दूरदर्शन पर जाने की सलाह भी दी। जब देवानंद ने उनको भी मना किया तो वो झल्ला गईं और बोली कि आप बेवजह हठ कर रहे हैं। आपको ये हठ छोड़ देना चाहिए। देवानंद नहीं माने और उन्होंने लिखा है कि उसके बाद वो संजय गांधी के चमचों और दरबारियों के निशाने पर आ गए थे। देवानंद की फिल्म देस परदेश रिलीज होनेवाली थी और उनको डर सता रहा था कि संजय गांधी के दरबारी उनकी फिल्म को नुकसान न पहुंचा दें। डर जायज भी था क्योंकि इमरजेंसी के दौर में जो भी संजय गांधी के विरोध में गया था उसको काफी परेशानियां झेलनी पड़ी थीं। फिल्मकारों को भी और कलाकारों को भी।   

Saturday, June 18, 2022

फिल्मों की सफलता की नई राह


कोरोना महामारी के दौर में सिनेमाघरों के बंद होने का फिल्म उद्योग पर बहुत बुरा असर पड़ा था। फिल्म प्रदर्शन का व्यवसाय बंद होने के कारण भारतीय फिल्म उद्योग पर भी संकट मंडराने लगा था। कई फिल्में पूरी हो गई थीं लेकिन उनका प्रदर्शन लगातार टलता रहा था। बड़े प्रोड्यूसर तो किसी तरह से फिल्मों की रिलीज के टलनेवाले नुकसान को झेल गए लेकिन छोटे प्रोड्यूसरों पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ा। कई फिल्में आधे में बंद हो गईं तो कई फ्लोर पर ही नहीं जा सकीं। कोरोना महामारी का प्रकोप कम होने के बाद कई तरह की पाबंदियों के साथ जब सिनेमाघर खुले तो भी अपेक्षित कारोबार नहीं हो पा रहा था। इन परिस्थितियों को देखते हुए फिल्मों पर लिखनेवाले कुछ लेखकों ने फिल्म व्यवसाय के बदलते स्वरूप को रेखांकित करना आरंभ कर दिया। सिनेमाघर के कारोबार पर भई प्रश्नचिन्ह लगाना आरंभ कर दिया। उन्होंने महामारी के कारण सिनेमाघरों में दर्शकों की कम उपस्थिति को दर्शकों की बदलती रुचि मान लिया। सिनेमाघरों के बजाए वो एप आधारित प्लेटफार्म को फिल्मों के प्रदर्शन के नए प्लेटफार्म के तौर पर स्थापित करने में जुट गए। सिनेमाहाल में जानेवाले परंपरागत दर्शकों को लेकर जल्दबाजी में टिप्पणी करने लगे। इस तरह के आकलन और निष्कर्ष पर पहुंचने के पहले उन्होंने कोरोना और उसके फैलाव की आशंका पर विचार किया हो, ऐसा नहीं लगता। बंद और वातानुकूलित वातावरण में कोरोना के फैलने की आशंका जताई गई थी। ये बात कहीं न कहीं परंपरागत सिने दर्शकों के अवचेतन मन में थी। इस वजह से सिनेमाघरों में दर्शकों की अपेक्षित उपस्थिति नहीं हो रही थी पर सिनेमा के प्रति प्रेम कम नहीं हो रहा था। जैसे जैसे कोरोना के मरीजों की संख्या कम हुई, अधिकांश लोगों को वैक्सीन की डोज लगी, निश्चिंतता बढ़ने लगी। और बढ़ने लगी सिनेमाघरों में दर्शकों की संख्या भी। फिल्मों के व्यवसाय के विभिन्न आयामों का आकलन करनेवाली संस्था ओरमैक्स मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक इस वर्ष जनवरी से लेकर अप्रैल तक रिलीज फिल्मों ने चार हजार करोड़ रुपए से अधिक का बिजनेस किया। इसका अर्थ ये हुआ कि इस वर्ष हर महीने फिल्मों ने एक हजार करोड़ रुपए से अधिक का कारोबार किया। फिल्म इंडस्ट्री के लिए ये बेहद सुखद आंकड़ा है। लेकिन इस कारोबार में एक संदेश भी है, उसपर हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के लोगों को विचार करना चाहिए।

इस वर्ष जिन फिल्मों को दर्शकों का प्यार मिला उसमें दक्षिण भारतीय फिल्मों के हिंदी संस्करण का योगदान अधिक है। ओरमैक्स मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार फिल्मों के बिजनेस में मूल रूप से हिंदी में बनी फिल्मों की हिस्सेदारी अड़तीस प्रतिशत है जबकि साउथ की हिंदी में डब की गई फिल्मों की हिस्सेदारी साठ प्रतिशत है। अब जरा दक्षिण भारत की उन फिल्मों पर विचार करते हैं जिनको दर्शकों का अपार स्नेह मिला और जिसने पांच सौ करोड़ रुपए से अधिक का व्यवसाय किया। ओरमैक्स मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक फिल्म केजीएफ चैप्टर 2 ने 1008 करोड़ का कारोबार किया वहीं आरआरआर ने 875 करोड़ रु और द कश्मीर फाइल्स ने 293 करोड़ रु का बिजनेस किया। द कश्मीर फाइल्स की असाधारण सफलता के पीछे असधारण वजहें हैं। इसकी सफलता पर इस स्तंभ में पहले भी विचार किया जा चुका है। अब अगर हम केजीएफ चैप्टर 2 और आरआरआर की बात करें तो इसमें ज्ञान, भाषण और सैद्धांतिकी की प्रत्यक्ष बातें नहीं हैं। लेकिन फिल्मकार ने परोक्ष रूप से बहुत बड़ा संदेश दिया है। दर्शकों ने फिल्मकार के उस संदेश को पकड़ा भी और उसको पसंद भी किया। आरआरआर की कहानी राम, भीम और सीता के इर्द गिर्द घूमती है। राम-सीता और भीम हमारे दो महान पौराणिक ग्रंथ- रामायण और महाभारत के पात्र हैं। इस फिल्म की कहानी इस तरह से लिखी गई है कि राम और भीम एक दूसरे की मदद करते हैं। सीता-राम और भीम की ये कहानी कहीं न कहीं रामराज्य में भीम की महत्ता को स्थापित करने का परोक्ष संदेश देती है। दर्शकों को ये अच्छा लगता है। इसके अलावा फिल्म की भव्यता भी दर्शकों को बांधती है। इसी तरह से फिल्म केजीएफ चैप्टर 2 में का नायक अपने संवाद में राजनीति में वंशवाद की विषबेल पर टिप्पणी करता है। फिल्म में नायक जब वंशवाद पर टिप्पणी करता है तो सिनेमाहाल में तालियां गूंजती हैं। इसका अर्थ ये है कि दर्शक फिल्मकार की सोच से खुद को एकाकार करता है। इन दो फिल्मों से उदाहरण से ये संकेत तो मिलता ही है कि आज का दर्शक मनोरंजन के साथ साथ अपनी परंपरा और विरासत से खुद को एकाकार करना चाहता है। साथ ही उसको मनोरंजक तरीके से समकालीन राजनीति की विसंगतियों पर की गई टिप्पणियां भी पसंद आती हैं। फिल्मों में इस तरह मनोरंजन की चाशनी में लिपटी राजनीतिक टिप्पणियों को देखने पर एक शिफ्ट का संकेत भी है। इसके पहले तो हिंदी फिल्मों में इस तरह के संवाद सुनने को मिलते थे कि वो आएंगे भारत माता की जय के नारे लगाएंगे और तुम्हारी हत्या कर देंगे। इस संबंध में हिंदी फिल्मों के कई उदाहरण हमारे सामने हैं।   

इस वर्ष जनवरी से अप्रैल के बीच रिलीज फिल्मों से जो सकारात्मक संकेत मिले हैं वो उसके बाद रिलीज फिल्मों में भी दिखाई देता है। मनोरंजन, मनोरंजन और मनोरंजन यही फिल्मों की सफलता का आधार है। इस वर्ष मई में दो फिल्में रिलीज हुई जिसके कारोबारी परिणाम इस अवधारणा को मजबूती प्रदान करते हैं। एक फिल्म है भूल भुलैया-2 और दूसरी फिल्म है अनेक। भूल भुलैया 2 को दर्शकों ने खूब पसंद किया। चार सप्ताह में इसका कलेक्शन करीब पौने दो सौ करोड़ रुपए तक पहुंच गया है जबकि फिल्म अनेक बाक्स आफिस पर बुरी तरह से पिट गई। पहले भूल भुलैया 2 पर विचार करते हैं कि क्यों दर्शकों ने इसको पसंद किया जबकि ये 2007 में आई फिल्म भूल भुलैया का सीक्वल है।इसमें कर्तिक आर्यन, तब्बू और कियारा आडवाणी लीड रोल में हैं। ये हारर मूवी है बावजूद इसके इसमें जबरदस्त हास्य है। पिछले दिनों एक निजी बातचीत में गीतकार और कवि प्रसून जोशी ने फिल्मों के बारे में बेहद महत्वपूर्ण बात कही थी। कोरोना महामारी के बाद के दौर में जिस तरह की फिल्में सफल हो रही हैं, उनको देखकर प्रसून जोशी की बात सहसा याद आ गई। प्रसून ने कहा था कि ‘ऐसा लगता है कि हमारा ये युग मनोरंजन का युग है। अब लोग रिश्तों में भी मनोरंजन तलाशने लगे हैं। आज लोग अपने परिवार में भी इंटरटेनिंग पर्सनैलिटी की तलाश करने लगे हैं। पुत्र भी पिता से अपेक्षा करता है कि वो इंरटेनिंग हों।‘ अगर आज हमारा समाज परिवार में भी इंटरटेनमेंट खोज रहा है तो उसके पीछे के मनोविज्ञान को समझना होगा। इंटरटेनमेंट को खुशहाली के व्यापक अर्थ में देखा जाना चाहिए। समाज के इन बदलते मनोभावों को जो फिल्मकार अपनी फिल्मों में दिखा पा रहे हैं उनको दर्शक मिल रहे हैं और वो अच्छा मुनाफा भी कमा रहे हैं। जो फिल्मकार इसमें असफल हो जा रहे हैं उनको दर्शकों का प्यार नहीं मिल पाता है। आज जब फिल्म उद्योग पटरी पर लौटता दिख रहा है तो फिल्मकारों को बेहद सावधानी के साथ व्यापक अर्थ और संदर्भ में दर्शकों के मनोरंजन का ध्यान रखना होगा। फिल्मों के पुराने घिसे पिटे फार्मूले को छोड़कर मनोरंजन के नए रास्ते तलाशने होंगे। सितारों की छवि के सहारे फिल्म हिट हो जाए ये आवश्यक नहीं है. छवि के साथ साथ कहानी में दर्शकों को बांधे रखने की क्षमता भी होनी चाहिए। पौराणिक कथा को भी अगर फिल्मकार नए संदर्भ और समकालीन विमर्श से परोक्ष रूप से नहीं जोड़ पाएंगे तो फिल्मों की सफलता में संदेह है। ऐसा लगता है कि दक्षिण भारत के फिल्मकार इस ट्रेंड को समझ गए हैं। 


Saturday, June 11, 2022

सत्य को भी चाहिए शक्ति का आधार


शुक्रवार को जुमे की नमाज के बाद देश के कई राज्यों में जिस तरह से उपद्रव और बवाल हुआ उसके बाद हिंदुओं और मुसलमानों के रिश्तों को लेकर चर्चा आरंभ हो गई है। न्यूज चैनलों और इंटरनेट मीडिया पर पर कई स्वयंभू विचारक नए नए सिद्धांत पेश कर रहे हैं। कुछ लोग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत के हाल में संघ शिक्षा वर्ग के तृतीय वर्ष के समापन समारोह में दिए उनके वक्तव्य को उद्धृत कर रहे हैं। कुछ उत्साही विश्लेषक मोहन भागवत के वक्तव्य के उस अंश को उद्धृत करते हुए उनकी आलोचना कर रहे हैं जहां उन्होंने ज्ञानवापी के संदर्भ में अपनी बात रखी। वो लगातार चीख रहे थे कि संघ ने मुसलमानों को लेकर अपना स्टैंड बदल लिया है और अब संघ अपनी मुस्लिम विरोध की छवि में सुधार करना चाहता है। इंटरनेट मीडिया पर हिंदुत्व की ध्वजा लेकर विचरण करनेवाले कई विद्वान तो मोहन भागवत के इस बयान की तुलना लालकृष्ण आडवाणी के जिन्ना के मजार पर लिखी टिप्पणी से कर बैठे। उनकी इन बचकानी टिप्पणियों पर बात करने से पहले जरा देख लेते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा क्या था। 

सरसंघचालक ने कहा था कि ज्ञानवापी का अपना एक इतिहास है जिसको हम बदल नहीं सकते हैं। इसको न आज के हिंदू ने बनाया न आज के मुसलमानों ने बनाया। ये उस समय घटा। इस्लाम बाहर से आया, आक्रामकों के साथ आया। उस आक्रमण में भारत की स्वतंत्रता चाहनेवाले व्यक्तियों का मनोधैर्य खर्च करने के लिए देवस्थान तोड़े गए, जिनकी संख्या हजारों में है। उनमें से कइयों का हिंदुओं की आस्था में विशेष स्थान है। आगे उन्होंने कहा कि हिंदुओं को लगता है कि पुनर्उत्थान का कार्य करना चाहिए। राममंदिर का एक आंदोलन हुआ अब उस तरह का आंदोलन नहीं करना है। लेकिन इश्यू जो मन में हैं वो उठते तो हैं। वो किसी के विरुद्ध नहीं हैं। ...आपस में मिल बैठकर सहमति से रास्ता निकालना चाहिए। हर बार सहमति से रास्ता नहीं निकलता तो संविधान सम्मत न्याय व्यवस्था को मानना चाहिए और उसपर प्रश्न चिन्ह नहीं लगाना चाहिए। इसी क्रम में वो कहते हैं कि ज्ञानवापी में हिंदुओं की श्रद्धा है लेकिन हर मस्जिद में शिवलिंग क्यों देखना। उसके आगे भी उनका वक्तव्य चलता है जिसमें वो बाहर से आई पूजा पद्धति को अपनाने वालों को भी भारतीय बताते हैं। उनके और हिंदुओं के पूर्वजों के एक होने की बात करते हैं। लेकिन उनका पूरा जोर शक्ति पर होता है। 

अपने वक्तव्य के आरंभ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने बहुत स्पष्टता के साथ राष्ट्र और राष्ट्रीयता की बात रखी। विस्तार से धर्म और स्व को परिभाषित किया। समन्वय, संतुलन, सबको साथ लेकर चलने, सबकी उन्नति करना ही स्व है और उसके आधार पर ही देश के तंत्र को स्थापित करने की बात होती है। धर्म के संरक्षण के लिए मोहन भागवत जी ने स्पष्ट किया कि वो दो प्रकार से होता है। एक तो जब धर्म पर आक्रमण होता है तो उसको आक्रमण से बचाना होता है, बलिदान देना होता है। लड़ाई भी करनी पड़ती है। इसके अलावा धर्माचरण के माध्यम से धर्म की अभिवृद्धि की बात भी उन्होंने की। संघ प्रमुख ने जो बात रखी वो कोई नई बात नहीं कही है। नए विचारकों के लिए ये नई बात हो सकती है लेकिन मुसलमानों को लेकर संघ का ये विचार वर्षों से रहा है। हिंदुत्व और आक्रामक हिंदुत्व को परिभाषित करनेवाले राजनीतिक विश्लेषक गुरुजी गोलवलकर का नाम लेना नहीं भूलते हैं और ना ही भूलते हैं उनकी पुस्तक ‘वी आर आवर नेशनहुड डिफाइंड’ को। इस पुस्तक के आधार पर वो मुसलमानों के प्रति संघ की सोच को व्याख्यायित करते हैं। लेकिन हिंदुत्व को या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सोच को विश्लेषित करनेवाले नए विचारक इस तथ्य से या तो अनभिज्ञ हैं या फिर उसको जानबूझकर उजागर नहीं करते कि जिस वक्त गुरु गोलवलकर ने ये पुस्तक लिखी थी वो न तो संघ के पदाधिकारी थे और न ही सरसंघचालक। मुसलमानों को लेकर संघ का क्या सोच रहा है इसको जानने के लिए गुरू गोलवलकर और पत्रकार सैफुद्दीन जिलानी की 30 जनवरी 1970 की बातचीत देखनी चाहिए। ये बातचीत नरेन्द्र ठाकुर के संपादन में प्रकाशित पुस्तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण में संकलित है। इसमें जब सैफउद्दीन साहब ने मुसलमानों को लेकर उनके दृष्टिकोण के बारे में पूछा तो गुरुजी का कहना था कि हमें ये बात हमेशा ध्यान में रखनी होगी कि हम सबके पूर्वज एक ही हैं। हम सब उनके वंशज हैं। आप अपने-अपने धर्मों का प्रामाणिकता से पालन करें परंतु राष्ट्र के मामले में हम सबको एक रहना चाहिए। राष्ट्रहित के लिए बाधक सिद्ध होनेवाले अधिकारों और सहूलियतों की मांग बंद होनी चाहिए। हम हिंदू हैं, इसलिए हम विशेष सहूलियतों या अधिकारों की कभी बात नहीं करते। इसी बातचीत में गुरूजी एक जगह कहते हैं कि भारतीयकरण का अर्थ सबको हिंदू बनाना तो नहीं है। तो अगर गुरू गोलवलकर की बातों को ध्यान से देखें तो यही लगेगा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वर्तमान सरसंघचालक मोहन भागवत उन्हीं बातों को समकालीन परिप्रेक्ष्य में आगे बढ़ा रहे हैं। संघ अपनी नीति पर कायम है, न तो कोई स्टैंड बदला है और न ही राष्ट्रविरोधियों को लेकर साफ्ट हुआ है। 

हिंदू धर्म और संघ की नीतियों के नए विश्लेषकों को मोहन भागवत जी के हाल के भाषण को फिर से सुनना समझना चाहिए। इस भाषण में मोहन भागवत ने एकाधिक स्थान पर शक्ति की महत्ता को रेखांकित किया है। वो तो यहां तक कहते हैं कि सत्य को भी शक्ति का आधार चाहिए होता है। बिना शक्ति के दुनिया नहीं मानती। उनके वक्तव्य की बारीकियों को समझे बिना किसी तरह का विश्लेषण अधूरा लगता है। वो हिंदू समाज को शक्ति देने की बात कर रहे हैं। बार बार कर रहे हैं, क्योंकि उनका मानना है कि बगैर शक्ति के दुनिया आपकी बात मानना तो दूर सुनेगी भी नहीं। आज अगर भारत में हिंदुओं की बात सुनी जा रही है तो उसके पीछे समाज की शक्ति है। वो स्पष्ट तौर पर कहते हैं कि दुनिया में दुष्ट लोग हैं जो हमको जीतना चाहेंगे इसलिए शक्ति की आराधना करनी चाहिए। उनके लगभग इकतीस मिनट के भाषण में हिंदू समाज को शक्ति देने की बात प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से कई बार आती है। मोहन भागवत की आलोचना करनेवाले व्याख्याकारों और टीकाकारों को उनके वक्तव्य को समग्रता में देखना चाहिए। संघ प्रमुख ने न तो संघ का कोई स्टैंड बदला है न ही वो मुसलमानों को खुश करने के लिए ऐसी बात कर रहे हैं। संघ हमेशा से भारतीय मुलमानों को यहां का मानता है। उनको आक्रमणकारियों के साथ जोड़कर नहीं देखता है और यही अपेक्षा करता है कि इतिहासकार और भारतीय मुसलमान भी अपने को भारतीय मानें और आक्रांताओं के साथ खुद को जोड़कर नहीं देखें। नए नए संघ विचारक बने टीवी चैनलों की खिड़कियों पर रात दिन टंगे रहनेवाले स्वयंभू विद्वान किसी भी चीज को समग्रता में नहीं देख पाते हैं। नतीजा यह होता है कि किसी वक्तव्य के एक छोटे हिस्से के आधार पर उसका मूल्यांकन करके निर्णय देने लग जाते हैं और दोष के शिकार हो जाते हैं। हर मस्जिद में शिवलिंग खोजने का जो बयान है उसके पहले भी काफी देर तक हिंदू समाज को शक्ति देने की, धर्म की, स्व की, धर्माचरण के बारे में कहा गया लेकिन न तो उसको सुनने की किसी को फुर्सत है और न ही उसकी बारीकियों को विश्लेषित करने की कला। इसका नुकसान ये होता है कि समाज में गलत संदेश जाता है और भ्रम की स्थिति बनती है। इससे बचा जाना चाहिए।  


Saturday, June 4, 2022

सत्य होती सत्यजित राय की चिंताएं


प्रख्यात फिल्मकार सत्यजित राय के शताब्दी वर्ष में उनकी फिल्मों पर चर्चा हो रही है। फिल्म  निर्माण की उनकी कला के बारे में सेमिनार और गोष्ठियां आदि आयोजित हो रही हैं। फ्रांस में आयोजित होनेवाले कान फिल्म फेस्टिवल से लेकर देश के फिल्म उत्सवों में उनकी फिल्मों का प्रदर्शन किया जा रहा है। कुछ फिल्मकार उनके जीवन और उनकी कला पर डाक्यूमेंट्री भी बना रहे हैं। लेकिन सत्यजित राय के जन्म शताब्दी वर्ष में फिल्मों को लेकर उन्होंने जो चिंताएं व्यक्त की थीं उनपर भी बात होनी चाहिए। फिल्मों की कहानियों और फिल्म और साहित्य के रिश्ते पर उन्होंने जो चिंता व्यक्त की थीं, उसपर कम बात होती है। 1980 में सत्यजित राय ने एक सेमिनार में कहा था कि इन दिनों लेखन में एक खास तरह की गिरावट देखी जा सकती है। अब जिस तरह के उपन्यास प्रकाशित हो रहे हैं या कहानियां छप रही हैं वो फिल्मकारों को फिल्म बनाने के लिए उकसा नहीं पा रही हैं। लेखकों ने एक खास किस्म की लेखन प्रविधि अपना ली है । वो अपने लेखन में जोखिम नहीं उठा रहे हैं और किसी प्रकार का प्रयोग भी नहीं कर पा रहे हैं। नतीजा ये हुआ है कि उनके लेखन में एक ठहराव आ गया है। सत्यजित राय के समकालीन लेखन पर इस टिप्पणी का बंगाल के लेखकों ने प्रतिवाद किया था और फिर कहा था कि ये लेखकों का दायित्व नहीं है कि वो फिल्मकारों को ध्यान में रखकर कहानियां या उपन्यास लिखे। लेखकों और सत्यजित राय के बीच इस विषय पर लंबा संवाद हुआ था। करीब चालीस वर्ष बाद आज भी सत्यजित राय के प्रश्न चुनौती बनकर लेखकों के सामने खड़े हैं। इस प्रश्न का उत्तर ढूंढना चाहिए कि समकालीन लेखन में ऐसे उपन्यास या कहानियां क्यों नहीं लिखी जा रही हैं जो फिल्मकारों को प्ररित कर सकें कि वो उसपर उत्साहित होकर फिल्म बनाने के लिए आगे आएं। 

इन प्रश्नों का उत्तर ढूंढने के लिए हमें अतीत में जाना होगा। हमें ये देखना होगा कि कैसे लेखकों ने एक विचारधारा का दामन थामा और वो फार्मूलाबद्ध लेखन के जाल में फंसते चले गए। 1967 में जब नक्सबाड़ी आंदोलन का आरंभ हुआ तो उससे बंगाल के अलावा हिंदी प्रदेश के लेखक भी प्रभावित हुए। नक्सलवाद के रोमांटिसिज्म में हिंदी लेखन भी फंसा और इसमें भी नक्सलवाद का या मार्क्सवाद का प्रभाव दिखने लगा। इस आंदोलन के प्रभाव में ही समांतर सिनेमा का आरंभ हुआ जिसको न्यू वेव सिनेमा भी कहा गया। हिंदी सिनेमा भी इससे अछूता नहीं रहा और यहां भी इस समानंतर सिनेमा की छतरी के नीचे फिल्मकारों ने फिल्में बनानी शुरू की। उस वक्त की सरकार की तरफ से भी इन फिल्मकारों को मदद मिली थी। फिल्म डेवलपमेंट कारपोरेशन ने इस तरह की फिल्म बनाने वालों को आर्थिक मदद की । मुनाफा या फिल्म पर आनेवाले खर्चे की चिंता नहीं होने की वजह से समांतर सिनेमा से जुड़े फिल्मकारों ने कला को छोड़कर विचारधारा को दिखाना आरंभ कर दिया। सरकारी खर्चे से बबनेवाली फिल्मों की चर्चा तो बहुत हुई लेकिन दर्शकों का प्यार कम मिला। ये दौर बहुत लंबे समय तक चला। अपनी विचारधारा के फिल्मकारों को फिल्म समीक्षकों ने बढ़ाना और स्थापित करना आरंभ कर दिया। सत्यजित राय जब तक जीवित रहे वो इस इस तरह की फिल्मो के चक्कर में नहीं पड़े। उनपर हमले भी हुए, उनकी फिल्मों की आलोचना भी होने लगी। उनपर बंगाल की संस्कृति से दूर जाने के आरोप भी लगाए गए लेकिन वो हर तरह की फिल्म बनाते रहे और वैश्विक स्तर पर उनकी फिल्मों को सराहना मिली। आज भी कान फिल्म फेस्टिवल के दौरान सत्यजित राय की फिल्मों का न केवल प्रदर्शन होता है बल्कि उनकी फिल्म कला पर चर्चा होती है। जैसे जैसे विचारधारा का प्रभाव कम हुआ उसके आधार पर बनी फिल्में भी नेपथ्य में चली गईं। उपन्यास और कहानी के नाम पर वैचारिकी परोसनेवाले लेखक भी पिछड़ गए। 

वैचारिक लेखन के कई नुकसान सामने आए। विशेष रूप से अगर हम हिंदी में उपन्यास और कहानी लेखन को देखें तो वामपंथी विचारधारा के प्रभाव में जिस तरह से यथार्थ के नाम पर लेखन आरंभ हुआ वो एकांगी होता चला गया। कहानी में किस्सागोई का स्थान नारेबाजी ने ले लिया। गांव-देहात, किसान-मजदूर के नाम पर लिखी जानेवाली कहानियों में परोक्ष रूप से विचारधारा को मजबूत करनेवाली बातें कही जाने लगीं। विचारधाऱा के खूंटे से बंधे लेखकों की कृतियों में कथित यथार्थवाद जड़ हो गया। मजदूरों, गरीबों और किसानों की समस्याएं बदलीं, उनका संकट बदला लेकिन हिंदी के अधिकांश लेखक उन समस्याओं को या संकट को पकड़ने में नाकाम रहे। लगातार एक तरह के लेखन से पाठक भी दूर होते गए और साहित्यिक कृतियों पर फिल्म बनानेवालों के सामने भी संकट आ खड़ा हो गया। जिसको सत्यजित राय ने अस्सी के शुरुआती दशक में ही भांप कर प्रकट कर दिया था। सत्यजित राय ने जब कहानियों में विविधता और प्रयोगात्मकता की ओर संकेत किया था तो उसके करीब एक दशक बाद देश में आर्थिक उदारीकरण का दौर आरंभ हुआ। वामपंथ के किले ढहने लगे थे, वामपंथी विचारधारा के सामने बड़ी चुनौती आकर खड़ी हो गई थी। रूस और चीन में भी खुलेपन की बयार बहने लगी। लेकिन विचारधारा वाले लेखक इस बदलाव को भांप नहीं पा रहे थे। भारतीय समाज भी पर आर्थिक उदारीकरण का गहरा प्रभाव पड़ा। भारत में एक नया मध्यवर्ग पैदा हो गया। भारत में गरीबों का किसानों का, मजदूरों का जीवन स्तर बेहतर होने लगा था। 

आर्थिक उदारीकरण के बाद नए मध्यवर्ग की आशा और आकांक्षाएं बदलने लगी थीं। मध्यवर्ग की बदलती आशा और आकांक्षाओं का प्रकटीकरण साहित्य में आनुपातिक रूप में कम हो रहा था। भारत के इस मध्यवर्ग की जीवनशैली को अंधाधुंघ शहरीकरण ने भी प्रभावित किया। युवाओं और महिलाओं की समस्याओं और सपने भी अलग हो गए। विचारधारा की गुलामी की बेड़ियों में जकड़े हिंदी के लेखक यथार्थ के नाम पर जो परोस रहे थे वो इस बदले हुए यथार्थ से कोसों दूर था। परिणाम यह हुआ कि ऐसे लेखन के पाठक कम होते चले गए और तब हिंदी के लेखकों ने हिंदी में पाठकों की कमी का रोना आरंभ कर दिया। लेखकों के इस रुदन में कई प्रकाशक भी शामिल हो गए। उन्होंने भी पुस्तकों की कम होती बिक्री के बारे में कहना शुरु कर दिया। इस स्थिति पर अगर समग्रता से विचार किया जाए तो इस समस्या के मूल में हिंदी लेखकों का अपने पाठकों की रुचि को समझ पाने में नाकामी बड़ी वजह है। अब भी अगर स्वाधीनता क बाद के समय में किसानों और मजदूरों की समस्या का समकालीन बताकर पाठकों के सामने पेश किया जाएगा तो पाठक उसको स्वीकार करेंगे इसमें संदेह है। अब कुछ युवा लेखकों ने अपने समय को अपने उपन्यासों में या अपनी कहानियों में स्थान देना शुरू किया है तो उनको पाठक मिलने लगे हैं। हिंदी में पाठक नहीं है, यह अवधारणा गलत है। पाठक हैं और वो खरीदकर पढ़ना भी चाहते हैं लेकिन जरूरत इस बात की है कि उनकी रुचि की पुस्तकें लिखी जाएं और वो अपने पाठकों तक पहुंचने का उपक्रम करें। फिल्मकार भी साहित्यिक कृतियों पर फिल्में बनाना चाहते हैं। फिल्म एक ऐसा माध्यम है जो समय के साथ चलता है और अपने समय के यथार्थ को दर्शकों के सामने पेश करता है।  साहित्यिक कृतियों से कहानियां उठाकर निर्देशक उसको इस तरह से पेश करता है कि कई बार कहानी बदली हुई लगती है लेकिन वो माध्यम की मांग होती है। सत्यजित राय ने भी प्रेमचंद की कृति शतरंज के खिलाड़ी में कई बदलाव किए थे। आज अगर साहित्य को व्यापक दर्शक/पाठक वर्ग तक पहुंचना है तो उसको फिल्म के साथ साहचर्य स्थापित करने के बारे में सोचना चाहिए। 


Saturday, May 28, 2022

औरंगजेब पर अज्ञान का प्रदर्शन


काशी में ज्ञानवापी परिसर स्थित मस्जिद के सर्वे और अदालती कार्यवाही के बाद कई तरह के इतिहासकार सामने आने लगे हैं। वामपंथी रुझान और वामपंथी विचारधारा के पोषक कुछ साहित्यकार और लेखक भी इस विषय पर अपने अज्ञान का सार्वजनिक प्रदर्शन कर रहे हैं। कई तो मुगल बादशाह औरगंजेब के समर्थन में भी तर्क खोजकर ला रहे हैं। इंटरनेट मीडिया पर इस तरह के मनोरंजक टिप्पणियां देखी जा सकती हैं। एक लेखक महोदय तो किसी किताब से हवाले से ये तक लिख गए कि मंदिर के तहखाने में बलात्कार हुआ था और औरंगजेब को पता चला तो उसने उस जगह को अपवित्र मानकर मंदिर को ध्वस्त करवा दिया। इस मनोरंजक तर्क को लिखते समय लेखक महोदय ये भूल गए कि अगर कोई जगह अपवित्र हो गई तो वहां मंदिर गिराकर मस्जिद कैसी बनवाई जा सकती है। क्या मंदिर को ध्वस्त करके मस्जिद बनाकर किसी जगह को पवित्र किया जा सकता है? बलात्कार को लेकर अगर औरंगजेब इतना ही संवेदनशील था तो बीजापुर और गोलकुंडा आक्रमण के समय बलात्कर की असंख्य घटनाओं पर उसका दिल क्यों नहीं पसीजा था। दक्षिण भारत पर औरंगजेब के आक्रमण के समय जितनी बलात्कार की घटनाएं हुई उसकी तुलना सिर्फ 1971 में पूर्वी पाकिस्तान (अब बंगलादेश) में पाकिस्तानी सैनिकों की क्रूरता से की जा सकती है। दरअसल वामपंथियों का और स्वयं को धर्मनिरपेक्ष बतानेवाले लेखकों और इतिहासकारों का ये पुराना शौक रहा है। उनके लेखन में विदेशी आक्रांताओं को लेकर एक खास किस्म की उदारता दिखाई देती है। इसके पीछे की वजह क्या है ये पता नहीं लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि इस प्रकार के स्वयंभू इतिहासकार समाज के लिए खतरनाक हैं। इनकी अज्ञानता की वजह से और गलत स्थापनाओं के कारण दो समुदायों के बीच नफरत पैदा होती है। 

औरंगजेब को लेकर वामपंथी लेखकों को सर जदुनाथ सरकार की पुस्तक पढ़नी चाहिए जिससे इस क्रूर शासक के बारे में सबकुछ स्पषट हो जाएगा। पांच खंडों में प्रकाशित सरकार की पुस्तक ‘हिस्ट्री आफ औरंगजेब’ में जदुनाथ सरकार ने सप्रमाण बताया है कि किस फरमान के अंतर्गत काशी के मंदिर को तोड़ा गया था। उन्होंने फरमान का स्त्रोत भी बताया है, छद्म इतिहासकार की तरह सिर्फ मनगढ़ंत बातें नहीं की है । एजेंडा के तहत इतिहास लेखन या टिप्पणी करनेवालों ने सर जदुनाथ सरकार की पुस्तक या तो पढ़ी नहीं या पढ़कर भी अनभिज्ञ बने रहते हैं। हिंदुओं से घृणा करनेवाले शासक औरंगजेब के पक्ष में वामपंथी इतिहासकार पहले भी अनेक तरह के छद्म रचते रहे हैं। कुछ दशक पहले ये थ्योरी पेश करने की कोशिश की गई थी औरंगजेब हिंदुओं को लेकर उदार था। इसके लिए ये तर्क दिया जाता था कि उसने मनसबदारी प्रथा को बढ़ावा दिया। उसके कालखंड में अकबर के समय से अधिक हिंदू मनसबदार थे। यह सही है कि औरंगजेब के कालखंड में हिंदू मनसबदारों की संख्या अधिक थी लेकिन इसकी वजह उसका हिंदू प्रेम नहीं बल्कि मनसबदारी को बढ़ावा देना था। औरंगजेब के समय हिंदू मनसबदारों की संख्या जरूर अधिक दिखाई देती है लेकिन अगर इसको आनुपातिक तौर पर देखा जाए तो वो कम थी। अर्धसत्य बताना मार्क्सवादियों की पुरानी आदत रही है। तभी तो किसी ने व्यग्यात्मक लहजे में कहा था कि मार्क्सवादी इतिहासकारों के पास ईश्वर से भी अधिक ताकत होती है क्योंकि ईश्वर अतीत नहीं बदल सकता है लेकिन इस विचारधारा के इतिहास लेखकों के पास अतीत को बदलने की शक्ति होती है। हिंदुओं पर लगनेवाला कर जजिया को अकबर ने खत्म किया था लेकिन औरंगजेब ने उस कर को फिर से लागू कर दिया था। उसने हिंदुओं की तीर्थयात्रा पर भी कर लगा दिया था। जदुनाथ सरकार ने अपनी पुस्तक में श्रमपूर्वक औरंगजेब के सारे कारनामों को कलमबद्ध किया है। इस वजह से मार्क्सवादी इतिहासकार सामूहिक रूप से एजेंडे के तहत जदुनाथ सरकार का नाम सुनते ही अलग रास्ते पर चले जाते हैं। 

दरअल अगर हम उपलब्ध ऐतिहासिक साक्ष्यों को समग्रता में देखते हैं तो ये पता चलता है कि विदेश से आए मुस्लिम शासकों ने हिंदुओं पर कितना और किस तरह से घृणित अत्याचार किए। 1953 में केंद्र सरकार की सहमति के बाद अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग ने फारसी और अरबी में उपलब्ध ऐतिहासिक महत्व की सामग्री और स्त्रोत का हिंदी में अनुवाद और प्रकाशन आरंभ किया था। हिंदी में अनुवाद का कार्य सैयद अतहर अब्बास रिजवी ने किया था। इस योजना के अंतर्गत तुगलककालीन भारत के नाम से 1956 में पहली बार पुस्तक छपी। बाद में राजकमल प्रकाशन ने 2008 और 2016 में इन पुस्तकों का पुर्नप्रकाशन किया। 1320 से लेकर 1359 तक का तुगलक वंश का इतिहास तमाम तरह के अरबी फारसी के ऐतिहासिक पुस्तकों और यात्रियों के विवरणों के आधार पर प्रस्तुत किया गया है। तीन खंडों में प्रकाशित इस पुस्तक के पहले खंड में इब्ने बत्तूता का यात्रा विवरण भी है। इसमें बत्तूता ने मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल में ईद के विशेष दरबार  की चर्चा की है। वो कहते हैं, ‘ईद के दिन महल में फर्श बिछाए जाते हैं और उन्हें बड़े सुंदर ढंग से सजाया जाता है। दरबार के कक्ष के बाहर वारगाह खड़ी की जाती है । यह एक बहुत बड़े मंडप के समान होती है (पृ 188)।‘ इसमें आगे दरबार और अवसर विशेष पर लगनेवाले सिंहासन की भव्यता का वर्णन है। आगे वो लिखते हैं, ‘हाजिब तथा नकीब अपने स्थानों पर खड़े होते हैं। तत्पश्चात गायक तथा नर्तकियां प्रविष्ट होती हैं। सर्वप्रथम काफिर (हिंदू) राजाओं की पुत्रियां जो उस वर्ष युद्ध में बंदी बनाई जाती हैं, आकर गाती नाचती हैं। तत्पश्चात वो अमीरों और मुख्य परदेशियों को प्रदान कर दी जाती हैं। इसके उपरांत अन्य काफिरों की पुत्रियां आकर नाचती गाती हैं। जब वे नाच गा चुकती हैं तो सुल्तान उन्हें अपने भाइयों, संबंधियों और मलिकों के पुत्रों आदि को दे देता है। सुल्तान ये दरबार अस्त्र की नमाज के पश्चात करता है। दूसरे दिन पुन: इसी प्रकार अस्त्र के उपरांत दरबार होता है। इसमें गायकायें लाई जाती हैं। जब वे नाच जा चुकती हैं तो सुल्तान उन्हें ममलूक के अमीरों (मुख्य दासों) को दे देता है (पृ 189)।‘ आगे बत्तूता सातवें दिन तक का विवरण देता है। ईद के समय लगनेवालों इन दरबारों में हिंदू राजाओं की बेटियों के साथ तुगलक क्या सलूक करता है वो स्पष्ट है। इस पुस्तक में इस तरह की कई घटनाओं का वर्णन है। सुल्तान के कर्मचारियों के खाने के लिए चावल कूटने के लिए लाई जानेवाली स्त्रियों की मृत्य का प्रसंग भी ह्रदय विदारक है। वो लिखते हैं कि सुल्तान के महल में सैकड़ों स्त्रियां नित्य मृत्यु को प्राप्त होती थीं।... जब वो रुग्ण हो जाती थीं धूप में पड़ जाती थीं और मर जाती थीं। (पृ.297)। क्या कभी इसपर मार्क्सवादियों ने समग्रता में विचार किया। क्या स्त्री विमर्श के झंडाबरदारों ने इसपर ध्यान दिया। 

दरअसल मुगलों समेत तमाम विदेशी आक्रांताओं ने हिन्दुस्तान की जनता पर भयानक अत्याचार किए। कईयों के शासन काल में सैकड़ों मंदिर तोड़े गए और इन सबके प्रमाण उपलब्ध हैं। जरूरत इस बात की है कि उन उपलब्ध प्रमाणों को जनता के सामने लाया जाय। सत्य और तथ्य के सामने आने से कई तरह की गलतफहमियां दूर होती हैं। जो लोग औरंगजेब से लेकर तुगलक और बाबर का गुणगान करके देश की जनता को बरगलाने का काम करते हैं वो एक्सपोज होंगे। जो भ्रमित होकर औरंगजेब को अपना पूर्वज मानते हैं उनके सामने भी अपने अतीत पर पुनर्विचार करने का अवसर पैदा होगा। आजादी के अमृत महोत्सव वर्ष में अगर इतिहास को तथ्यों के आधार पर लिखने और उसके प्रकाशन का कार्य आरंभ हो सके तो अच्छा रहेगा। इसको एक मिशन के तौर पर आरंभ करके पूरा करना चाहिए। ये कार्य देशहित में आवश्यक है। 

संघर्ष का नया आयाम


स्वाधीनता का आंदोलन जब अपने चरम की ओर बढ़ रहा था तब अंग्रेजों ने भारत में संवैधानिक सुधारों के लिए ब्रिटिश संसद के सदस्यों की एक कमेटी जान साइमन की अध्यक्षता में भेजी थी, जिसको साइमन कमीशन के नाम से जाना जाता है। ये वर्ष 1928 था। साइमन कमीशन का पूरे देश में काफी विरोध हुआ था। एक आठ साल की बच्ची, जिसके पिता ब्रिटिश राज में जज थे, भी साइमन कमीशन के विरोध में आंदोलन में कूद पड़ी थीं। उसके पिता बहुत नाराज हुए, कई तरह की पाबंदियां लगाने की कोशिश की लेकिन वो बच्ची नहीं मानी। जज साहब का नाम था हरिप्रसाद मेहता और उनकी बेटी का नाम था उषा मेहता। कौन जानता था कि जिस आठ साल की बच्ची ने साइमन कमीशन का विरोध किया था वो बड़ी होकर स्वाधीनता की लड़ाई में एक नया आयाम जोड़ देगी। गुजरात में अपनी आरंभिक पढ़ाई करने के बाद उषा मेहता मुंबई के विल्सन कालेज में आ गई थीं। उषा की आंखों में एक अलग ही सपना था। जब गांधी जी ने नौ अगस्त 1942 को  मुंबई में अंग्रेजों भारत छोड़ो का आरंभ किया उस वक्त उषा मेहता ने अपनी पढ़ाई छोड़ दी और आजादी के आंदोलन में सक्रिय हो गईं। भारत छोड़ो आंदोलन के आह्वान के बाद गांधी जी समेत कई कांग्रेसी नेता गिरफ्तार कर लिए गए। कुछ युवा नेता इस आंदोलन की अलख जगा रहे थे लेकिन उनकी आवाज जनता तक नहीं पहुंच पा रही थी और वो बापू के संदेश को पूरे देश में पहुंचाने के लिए प्रयत्न कर रहे थे 

संदेश पहुंचाने की इसी बेचैनी में बांबे (अब मुंबई) में कुछ युवाओं ने एक बैठक की जिसमें उषा मेहता, विट्ठलदास झवेरी के अलावा नरीमन अबराबाद प्रिंटर भी शामिल थे। इस मीटिंग में भारत छोड़ो का संदेश वृहत्तर जनसुमदाय तक पहुंचाने के लक्ष्य पर चर्चा हो रही थी। आरंभ में वो लोग समाचार पत्र निकालने पर चर्चा कर रहे थे और लगभग तय हो गया था कि एक अखबार निकाला जाए। पुस्तकों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि उषा मेहता ने बैठक में अखबारों को लेकर अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों की चर्चा की। फिर विकल्प पर विचार आरंभ हुआ। उषा मेहता ने रेडियो की चर्चा की तो सबका ध्यान नरीमन प्रिंटर की ओर गया। कुछ ही समय पहले नरीमन ब्रिटेन से रेडियो की तकनीक सीखकर भारत लौटा था। थोड़ी देर बाद तय हुआ कि स्वाधीनता के विचार को जनता तक पहुंचाने के लिए गुप्त रेडियो आरंभ किया जाए। उषा मेहता को समाचार पढ़ने की जिम्मेदारी दी गई। नरीमन और उषा नेहता ने साथ मिलकर पुराने ट्रांसमीटरों को जोड़कर गुप्त रेडियो सेवा आरंभ किया। कहा जाता है कि पुराने ट्रांसमीटर आदि जुटाने में शिकागो रेडियो के उस समय के मालिक ननका मोटवाणी ने इन युवाओं की मदद की थी। हौसले को पंख लगते देर नहीं लगी और 14 अगस्त 1942 को किसी अज्ञात स्थान पर इस गुप्त रेडियो की स्थापना की गई। 27 अगस्त को इसका पहला प्रसारण हुआ। उषा मेहता की आवाज गूंजी, ये कांग्रेस की रेडियो सेवा है जो भारत के किसी हिस्से से प्रसारित की जा रही है। इस पहले प्रसारण में उषा मेहता ने रेडियो की फ्रीक्वेंसी भी बताई थी।  

इस गुप्त रेडियो के प्रसारण से अंग्रेजों के कान खड़े हो गए। उन्होंने इसके बारे में पता लगाना आरंभ कर दिया। गुप्त रेडियो के प्रसारणकर्ता एक प्रसारण के बाद जगह बदल देते थे। इसपर गांधी के विचारों का प्रसारण भी होने लगा। अंग्रेजो की परेशानी बढ़ने लगी और उन्होंने खोजबीन तेज कर दी। आखिरकार तीन महीने से कुछ अधिक समय बाद अंग्रेजों ने नवंबर 1942 में प्रसारण स्थान का पता लगा लिया और उषा मेहता को साथियों समेत गिरफ्तार कर लिया गया। मुकदतमा चला और उनको चार साल की जेल की सजा हुई। इस गुप्त रेडियो का प्रसारण तीन महीने ही हुआ लेकिन इन तीन महीनों में उषा मेहता ने अपने प्रसारण से जनता को जागरूक करने का कार्य किया। .वाओं में ये विश्वास भी भर दिया कि आजादी के आंदोलन में तकनीक का सहारा लिया जा सकता है। 1946 में जेल से उनकी रिहाई हुई। उषा मेहता का योगदान इस मायने में विशिष्ट है कि उन्होंने उस समय तकनीक का सहारा लिया जब इसके बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था। स्वाधीनता के बाद उषा मेहता ने मुंबई विशश्वविद्यालय से जुड़कर शिक्षा के क्षेत्र में कार्य किया। 25 मार्च 1920 को सूरत के पास एक गांव में जन्मी उषा मेहता का निधन अस्सी वर्ष की उम्र में 2000 में हुआ। 

Saturday, May 21, 2022

भारत के भविष्य का उत्सव


फ्रांस में आयोजित विश्व प्रसिद्ध कान फिल्म फेस्टिवल में हिंदी के कालजयी कवि जयशंकर प्रसाद की कविता।  यह सोचना या कल्पना करना थोड़ा कठिन था लेकिन फेस्टिवल के इस संस्करण में ये हुआ। इंडिया फोरम के एक कार्यक्रम में अभिनेत्री वाणी त्रिपाठी टिक्कू ने जयशंकर प्रसाद की कविता की पंक्तियों से एक चर्चा सत्र का समापन किया। जब वाणी ने जयशंकर प्रसाद की कविता की पंक्तियां, हिमाद्री तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती, स्वयं प्रभा समुज्जवला स्वतंत्रता पुकारती, अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़-प्रतिज्ञ सोच लो, प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो-बढे चलो, सुनाई तो हाल तालियों से गूंज उठा। वाणी ने ‘बढ़े चलो’ से भारतीय दर्शन को जोड़कर आगे बढ़ने की बात कही। कान फिल्म फेस्टिवल के दौरान हिंदी के कई वाक्य और मुहावरे गूंजे। सूचना प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने इंडिया फोरम के मुख्य मंच से अपनी बात ही हिंदी गीत ‘है प्रीत जहां की रीत सदा, मैं गीत वहां के गाता हूं, भारत का रहनेवाला हूं, भारत की बात सुनाता हूं’ से आरंभ की। गीतकार और लेखक प्रसून जोशी ने भी भारत की रचनात्मकता को ‘बेचैन सपने’ जैसे पद से जोड़ा और कुछ कर गुजरने की बात की। लगभग इसी समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वडोदरा के युवा शिविर को संबोदित कर रहे थे। उन्होंने भी कुछ इसी तरह की बात की। उन्होंने भारत को दुनिया की नई उम्मीद बताते हुए कहा था कि कोरोनाकाल में संकट के बीच दुनिया को वैक्सीन और दवाईयां पहुंचाने से लेकर बिखरी हुई सप्लाई चेन के बीच आत्मनिर्भर भारत की उम्मीद तक, वैश्विक अशांति और संघर्षों के बीच शांति के लिए एक सामर्थ्यवान राष्ट्र की भूमिका तक, भारत आज दुनिया की नई उम्मीद है। ऐसे वक्त में जब देश में कुछ राजनीतिज्ञ हिंदी और भाषा को लेकर राजनीति कर रहे हों तो वैश्विक मंच पर भारत के गौरव को, भारतीय दर्शन को, भारत के युवाओं के सपनों को हिंदी में अभिव्यक्त करना न सिर्फ हिंदी बल्कि भारतीय भाषाओं का भी सम्मान है। वोट की राजनीति के लिए भाषा को हथियार बनाकर समाज को बांटने की जुगत में लगे नेताओं को ये बात समझनी होगी कि भारत की आकांक्षाओं को  वैश्विक स्तर पर ले जाने के लिए वैश्विक मंचों पर भारतीय भाषा में बात करनी होगी। हिंदी के लोगों को भी इस बात का ध्यान रखना होगा कि हिंदी की उन्नति का रास्ता भी भारतीय भाषाओं के आंगन से होकर जाता है। इस बार कान फिल्म महोत्सव में भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने इस सोच को पूरी दुनिया के सामने रखा। यह अनायास नहीं था कि मंत्री अनुराग ठाकुर जब भारतीय प्रतिनिधिमंडल के साथ रेड कार्पेट पर चल रहे थे तो उनकी शेरवानी के बटन पर हिंदी, मराठी, गुजराती समेत अन्य भारतीय भाषाओं में भारत लिखा था। 

भारतीय फिल्मों को वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान को गाढ़ा करना है तो उसको भारत की कहानियों पर ध्यान देना होगा। अभिनेता माधवन ने ठीक कहा कि उत्तर प्रदेश से लेकर मध्य प्रदेश तक में भारतीय समाज के नायकों की, उनकी सफलताओं की कहानियां बिखरी हैं। उन कहानियों पर फिल्में बनाई जाएं तो भारतीय फिल्मों की व्याप्ति पूरी दुनिया में होगी। आर्यभट्ट से लेकर सुंदर पिचाई तक भारतीयों की सफलता की कहानी पूरी दुनिया को बताने की जरूरत है। माधवन ने इसरो के वैज्ञानिक नंबी नारायणन की जिंदगी पर आधारित फिल्म राकेट्री, द नंबी इफेक्ट बनाई है जिसका प्रदर्शन कान में हुआ। ये फिल्म हिंदी, तमिल, तेलुगू समेत कई भारतीय भाषाओं में बनाई गई है। वैज्ञानिकों और तकनीक के महारथियों के जीवन पर बनी फिल्मों में अलग-अलग देशों के दर्शकों की रुचि इस वजह से संभव है कि उनके कार्य को कई देश के लोग जानते हैं। आज अगर गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई और माइक्रोसाफ्ट के सत्य नडेला की सफलता की कहानी को फिल्मों में चित्रित किया जाता है तो वो न केवल दुनिया के युवाओं को आकर्षित करेगी बल्कि भारत के गौरव को भी दुनिया में स्थापित कर सकेगी। आज अगर कोई फिल्मकार कोरोनाकाल में भारत की महामारी से लड़ने की जिजीविषा को केंद्र में रखकर फिल्म बनाता है तो पूरी दुनिया उसको ध्यान से देखेगी। कोरोनाकाल में जिस तरह से भय का वातावरण बना था और उस वातावरण में भारत ने वैक्सीन बनाया। भयंकर भय के उस माहौल में इस विशाल देश में वैक्सीन को अलग अलग राज्यों तक पहुंचाना और करोड़ों लोगों का टीकाकरण कराना किसी थ्रिलर से कम नहीं है। 

यह भी एक सुखद संयोग है कि कान फिल्म महोत्सव अपनी स्थापना के पचहत्तरवें साल में है, भारत अपनी स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना रहा है और भारत और फ्रांस के राजनयिक संबंध के भी 75 साल हो रहे हैं। इस संयोग को कान फिल्म फिल्म फेस्टिवल ने उत्साह के साथ समरोहपूर्वक मनाने का निर्णय लिया। भारत को फेस्टिवल के दौरान सम्मानित देश (कंट्री आफ आनर) का दर्जा दिया गया। ये पहली बार हो रहा है कि फिल्म फेस्टिवल के दौरान किसी भी देश को सम्मानित देश के तौर पर आमंत्रित किया गया है। कान फिल्म फेस्टिवल में चेतन आनंद की 1946 की फिल्म ‘नीचा नगर’ को सम्मानित किया जा चुका है, सत्यजित राय की फिल्म पाथेर पंचाली को भी । 2013 में अमिताभ बच्चन और लियेनार्दो द कैप्रियो ने संयुक्त रूप से कान फिल्म फेस्टिवल के औपचारिक शुरुआत की घोषणा की थी। भारत के फिल्मकार समय समय पर कान फिल्म फोस्टिवल की जूरी में नामित होते रहे हैं। अब कान फिल्म फेस्टिवल ने भारत की फिल्मों को,यहां की कहानियों को लेकर विशेष रुचि दिखाई है। कान फिल्म फेस्टिवल में भारतीय फिल्मों और फिल्मकारों को इतना महत्व मिलना ये साबित करता है कि पूरी दुनिया भारतीय मनोरंजन जगत को बहुत संजीदगी से देख रही है। मशहूर फिल्मकार और भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान, पुणे के चेयरमैन शेखर कपूर ने कान फिल्म फेस्टिवल के मंच से कहा कि ये भविष्य का उत्सव है। 

अब जब पूरी दुनिया भारतीय फिल्मों की ओर एक उम्मीद भरी नजरों से देख रही है तो भारतीय फिल्मकारों खासतौर पर हिंदी के फिल्म निर्माताओं और निर्देशकों के सामने उन उम्मीदों पर खरा उतरने की चुनौती है। ऊलजलूल कहानियों से आगे जाकर, बेवजह की मारधाड़ और यौनिकता से आगे जाकर भारत के गौरव को स्थापित करनेवाली कहानियों को लेकर फिल्में बनानी होंगी। फिल्मकारों के लिए मुनाफा पहली प्राथमिकता है, होनी भी चाहिए लेकिन सिर्फ मुनाफे के लिए फिल्म बनाकर इस कला को समृद्ध नहीं किया जा सकता है। कला की उत्कृष्टता को बरकरार रखकर भी मुनाफा कमाया जा सकता है। पूर्व में कई फिल्मकारों ने ऐसा किया भी है। फिल्म ‘रंग दे बसंती’ और ‘तारे जमीं पर’ आदि का उदाहरण दिया जा सकता है। राजमौली ने अपनी फिल्मों में साबित किया है कि कला की भव्यता से भी जमकर पैसा कमाया जा सकता है। इस काम में राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम की महती भूमिका हो सकती है। भारत सरकार की इस संस्था को आगे आकर उन फिल्मकारों की पहचान करनी होगी जो भारतीय भूभाग पर बिखरी कहानियों की खोज करें। साथ ही उन फिल्मकारों को चिन्हित करें जो इन कहानियों पर उत्कृष्ट फिल्में बनाकर दर्शकों के सामने पेश कर सकें। इसके लिए आवश्यक है कि भारतीय फिल्म विकास निगम के पुनर्गठन के कार्य में तेजी लाई जाए। इसको अफसरशाही और लालफीताशाही की जकड़न से मुक्त किया जाए। फिल्म की समझ रखनेवाले, भारतीय कहानियों को, भारतीय भाषाओं में समझने और उसको भारतीय भाषाओं में ही अभिव्यक्त करनेवालों की भूमिका बढ़ाई जाए। अगर ऐसा हो पाता है तो न केवल भारतीय फिल्मों का भला होगा बल्कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दुनिया जिस ‘नई उम्मीद’ की बात कर रहे हैं वो भारतीय फिल्म जगत में भी साकार हो सकेगा। 


Tuesday, May 17, 2022

दृढ इच्छाशक्ति से सिक्किम का विलय


स्वाधीनता के बाद जब रजवाड़ों के भारत में विलय के समय का इतिहास देखा जाए तो जवाहरलाल नेहरू अपने मित्रों को लेकर उदार दिखते हैं। कश्मीर में वो शेख अब्दुल्ला को लेकर साथ चलने पर लगातार बल देते थे। कश्मीर को लेकर उनके बयानों से उलझन भी पैदा होती थी। सरदार कई बार नेहरू के कदमों से खिन्न भी हो जाते थे। जून 1946 में नेहरू शेख अब्दुल्ला के समर्थन में कश्मीर जाना चाहते थे। सरदार पटेल ने उसका विरोध किया था। 11 जुलाई 1946 को डी पी मिश्रा को पटेल ने लिखा, ‘उन्होंने (नेहरू ने) हाल में बहुत सी ऐसी बातें कही हैं, जिनसे जटिल उलझनें पैदा हुई हैं। कश्मीर के संदर्भ में उनकी गतिविधियां, संविधान सभा में सिख चुनाव में हस्तक्षेप, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अधिवेशन के तुरंत बाद प्रेस कांफ्रेंस बुलाना, ये सभी कार्य भावनात्मक पागलपन के थे और इनसे हम सभी को इन मामलों को हल करने में बहुत ही तनावपूर्ण स्थिति का सामना करना पड़ा था। किंतु इन सभी निष्कलंक एवं अविवेकपूर्ण बातों को उनके स्वतंत्रता प्राप्ति के आवेश का असमान्य उत्साह माना जा सकता है।‘ महाराजा हरि सिंह से नेहरू के अच्छे संबंध नहीं थे इस वजह से उनको कश्मीर के भारतीय गणतंत्र में विलय के लिए सरदार पटेल पर निर्भर रहना पड़ रहा था। लेकिन ऐसी कोई मजबूरी सिक्किम को लेकर नहीं थी। आजादी के समय सिक्किम का राजा थोंडुप नामग्याल, नेहरू के मित्र थे। 1947 मे जब भारत को आजादी मिली तो सरदार पटेल और संविधान सभा के सलाहकार बी एन राव इस मत के थे कि सिक्किम का भारत में विलय किया जाना चाहिए लेकिन नेहरू ने इसका विरोध किया था। 

सिक्किम के भारत में विलय पर प्रामाणिक पुस्तक लिखने वाले जी बी एस सिद्धू ने अपनी पुस्तक, सिक्किम, डान आफ डेमोक्रेसी में उपरोक्त प्रंसग का भी उल्लेख किया है। प्रामाणिक इस वजह से कि वो इस अभियान का हिस्सा थे। उनके मुताबिक जवाहरलाल नेहरू अपने आदर्शवाद, एशिया को लेकर अपनी दृष्टि और चीन की स्थिति को ध्यान में रखकर इस विलय का विरोध कर रहे थे। नेहरू चाहते थे कि सिक्किम को विशेष दर्जा मिले। ये सब तब हो रहा था जब सिक्किम स्वाधीनता के पहले चैंबर आफ प्रिसेंस और संविधान सभा का सदस्य भी था। बावजूद इसके थोंडुप नामग्याल सिक्किम को स्वतंत्र राष्ट्र के तौर पर कायम रखना चाहता था। उसने तो आजादी के करीब एक पखवाड़े पहले दार्जिलिंग को सिक्किम में मिलाने की चाल भी चली थी जो नाकाम हो गई थी। इस मामले में नेहरू की चली और सिक्किम को विशेष दर्जा दिया गया। फरवरी 1948 में सिक्किम के साथ भारत सरकार ने एक समझौता किया जिसमें 11 मामलों को छोड़कर सभी अधिकार सिक्किम के राजा को दिए गए। इसमें विदेश और रक्षा मामले भारत सरकार के पास रहे। 1950 में सिक्किम के राजा और भारत सरकार के बीच एक और समझौता हुआ। सिक्किम की जनता इससे खुश नहीं थी और वहां लगातार लोकतंत्र के पक्ष में आंदोलन चल रहा था। तत्कालीन भारत सरकार इसको दबाने में नामग्याल का सहयोग कर रही थी। राजा ने एक अमेरिकी महिला से शादी कर ली थी जिसके बारे में ये धारणा थी वो सीआईए की एजेंट है। 

कालांतर में जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं नामग्याल दिल्ली आए। उनसे मिले और भारत के साथ सिक्किम की जारी संधि से मुक्त होकर स्वतंत्र राष्ट्र की अपेक्षा जाहिर की। यही वो निर्णायक मोड़ था जब इंदिरा गांधी ने फैसला किया कि सिक्किम का पूर्ण रूप से भारत में विलय होना चाहिए। इस बीच बंग्लादेश की समस्या सामने आई लेकिन साथ ही साथ सिक्किम को लेकर कूटनीतिक और रणनीतिक स्तर पर तैयारी आरंभ हो चुकी थी। टी एन कौल उस समय विदेश सचिव थे। वो सिक्किम के भारत में पूर्ण विलय की बजाए चाहते थे कि पूर्व में हुए समझौते के आधार पर एक स्थायी संधि की जाए। इस स्थायी संधि के लिए कौल ने एक ड्राफ्ट तैयार किया और उसपर मंत्रियों के समूह में चर्चा हुई। इस चर्चा में तत्ताकलीन सेनाध्यक्ष जनरल मानिक शा को भी बुलाया गया था। सिद्धू की पुस्तक के मुताबिक किसी मंत्री ने इसपर कुछ नहीं बोला लेकिन जनरल मानिक शा ने कहा कि आपलोग चाहे जो भी निर्णय लें लेकिन मुझे तो सैनिकों की तैनाती और आपरेशन की स्वतंत्रता है।  जनरल शा के इस वाक्य से संदेश स्पष्ट था। इंदिरा गांधी ने अपने पिता नेहरू की सोच के उलट सिक्किम को पूरी तरह से भारतीय गणराज्य का हिस्सा बनाने का जिम्मा रिसर्च एंड एनलैसिस विंग( आरएडब्लू) के चीफ आर एन काव को सौंपा। ये वो दौर था जब पाकिस्तान के दो टुकड़े हो चुके थे और बंग्लादेश अस्तित्व में आ चुका था। काव ने रा के ही एक अधिकारी जी बी एस सिद्धू को इसका जिम्मा सौंपा। 

सिक्किम का ये आपरेशन आम खुफिया आपरेशन की तरह नहीं था। इसमें राजनीतिक तंत्र का उपयोग करके लक्ष्य हासिल करना था। सिद्धू ने सिक्किम में लोकतंत्र के समर्थक नेताओं के साथ संपर्क बढ़ाना आरंभ किया। उन्होने सिक्किम नेशनल कांग्रेस के दोरजी काजी और जनता कांग्रेस के महासचिव एस के राय को विश्वास में लिया और उनको हर तरह की मदद देने लगे। उद्देश्य था कि नामग्याल को अलग थलग करना, लोकतांत्रिक ताकतों को मजबूत करना और चुनाव करवाकर विलय को अंजाम देना। सिद्धू को काव का स्पष्ट निर्देश था कि वो अपनी गतिविधियों की जानकारी किसी भारतीय अधिकारी के साथ भी साझा न करें। इस मिशन की जानकारी सिर्फ तीन लोगों को थी, सिद्धू, कोलकाता में रा के अफसर पी एन बनर्जी और काव। इंदिर जी को को तो थी ही।  सिद्धू उस वक्त के सिक्किम कांग्रेस के नेता दोरजी काजी को मजबूत कर रहे थे। वो भारत के साथ विलय के लिए जनमत तैयार कर रहे थे। अप्रैल 1973 में राजा के विरोध की आग इतनी तेज हो गई कि उसको भारत सरकार के साथ एक समझैता करना पड़ा। तय हुआ कि भारत के निर्वाचन आयोग की देखरेख में राज्य में विधानसभा के चुनाव होंगे। अप्रैल 1974 में सिक्किम में चुनाव करवाए गए जिसमें सिक्किम कांग्रेस को 32 में 31 सीटें मिली। 

अब इस आपरेशन का दूसरा चरण आरंभ हुआ। रा के सामने ये चुनौती थी कि सिक्किम के सभी नवनिर्वाचित सदस्य काजी के पक्ष में एकजुट रहें और भारत के साथ विलय का प्रस्ताव पारित हो। नई दिल्ली से कोई निर्देश आने तक राजा की साजिशों पर ध्यान रखा जाए। सिक्किम के अन्य नेता के सी प्रधान और बी बी गुरुंग पर भी नजर रखी जा रही थी। नई दिल्ली से हरी झंडी मिलते ही विधानसभा से एक प्रस्ताव पारित हुआ कि भारत के साथ सक्रिय संबंध बनाए जाएं और संवैधानिक संस्थाओं के साथ मिलकर काम किया जाए। नामग्याल ने इसका कड़ा विरोध किया। लेकिन तबतक तय हो चुका था कि सिक्किम में  जनमत संग्रह करवाया जाए। नामग्याल जनमत संग्रह के लिए राजी नहीं हो रहा था। वो इसको किसी तरह फेल करना चाहता था। उसकी संदिग्ध गतिविधियां तेज हो गई थीं। तब भारतीय सेना को उसके महल में हल्की सैन्य कार्रवाई करनी पड़ी थी। उसके कुछ दिनों जनमत संग्रह हुआ और 97 फीसदी ने सिक्किम के भारत में विलय को मंजूरी दी। इसके बाद पहले लोकसभा और फिर राज्यसभा में विलय को मंजूरी दी और राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के साथ ही सिक्किम भारत का अंग बन गया। नेहरू ने ‘स्वतंत्रता प्राप्ति के आवेश के असमान्य उत्साह’ में जो गलती की थी उसको उनकी बेटी की दृढ़ इच्छाशक्ति ने सुधारा।