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Saturday, July 14, 2018

'सेक्रेड गेम्स' पर शांति का षडयंत्र


इन दिनों भारतीय वेब-टेलीविजन सीरीज सेक्रेड गेम्स की चारों ओर चर्चा हो रही है, देश-विदेश के अखबारों में इस क्राइम थ्रिलर पर लेख लिखे जा रहे हैं, इसकी समीक्षा हो रही है। सोशल मीडिया पर भी इसको लेकर बहुत चर्चा हो रही है। इस सीरीज में राजीव गांधी को लेकर की गई टिप्पणी पर विवाद भी हो गया है। मामला कोर्ट तक जा पहुंचा है। असहिष्णुता का शोर मचानेवाले लोग खामोश हैं। हाथों में प्लाकार्ड थामे अभिनेत्रियों के बयान नहीं आ रहे हैं। देश छोड़ने की बात करनेवाले भी शांत हैं।अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर बुक्का फाड़कर चिल्लानेवाले लोग खामोश हो गए हैं। इन सारे लोगों भी सवाल उठाए जा सकते हैं और पूछा जा सकता है कि शांति का षडयंत्र क्यों?  सेक्रेड गेम्स नाम के इस सीरीज के निर्देशक अनुराग कश्यप ने 2016 में अपने एक फेसबुक पोस्ट में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से ये अपेक्षा की थी कि वो धौंस देनेवाले अपने समर्थकों पर लगाम लगाएं। वो अनुराग कश्यप भी खामोश हैं जबकि कांग्रेस पार्टी के लोग सेक्रेड गेम्स को लेकर हमलावर हो रहे हैं। उनकी राहुल गांधी से अपेक्षा करते हुए कोई फेसबुक पोस्ट या ट्वीट दिखाई नहीं दे रही है। अगर मुक्तिबोध की कविता पंक्ति उधार लेकर कहें तो कह सकते हैं कि सब सरदार हैं खामोश’, क्योंकि मामला अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर चुनिंदा अवसरवाद का है। किसी लेखक संगठन ने राजीव गांधी को लेकर सेक्रेड गेम्स पर पाबंदी लागने के लिए कोर्ट जाने पर कांग्रेस के नेता को कठघरे में खड़ा नहीं किया। किसी ने इस बाबत राहुल गांधी से भी प्रश्न नहीं पूछा। अगर यही काम किसी बीजेपी के छोटे से नेता ने भी किया होता तो अवॉर्ड वापसी ब्रिगेड से लेकर असहिष्णुता की बात करनेवाले लोग बिलबिलाकर प्रधानमंत्री मोदी को कठघरे में खड़ा कर चुके होते और उनसे इस मसले पर हस्तक्षेप की अपेक्षा भी करते। कई अवसरों पर इस तरह की चुनिंदा प्रतिक्रिया देखने को मिली है। खैर ये अलहदा मुद्दा है और इस पर विस्तार से कभी और चर्चा।  
फिलहाल हम बात कर रह हैं नेटफ्लिक्स पर आठ एपिसोड में प्रसारित इस धारावाहिक सेक्रेड गेम्स की। दरअसल ये 2006 में प्रकाशित विक्रम चंद्रा के इसी नाम के उपन्यास पर बनाया गया धारावाहिक है जिसको अनुराग कश्यप और विक्रमादित्य मोटवाणी ने निर्देशित किया है। नेटफ्लिक्स ने भारतीय बाजार में मजबूती हासिल करने के लिए स्थानीय कटेंट को बढ़ावा देने का फैसला किया है। इसी के तहत पहले लस्ट स्टोरीज और अब सेक्रेड गेम्स को प्रस्तुत किया गया है। भारतीय बाजार में सफलता के लिए कुछ तय फॉर्मूला है जिसपर चलने से कामयाबी मिल ही जाती है। ये फॉर्मूले हैं धर्म, हिंसा, सेक्स और अनसेंसर्ड सामग्री दिखाना। नेटफ्लिक्स ने लस्ट स्टोरीज में भी और अब सेक्रेड गेम्स में भी इन फॉर्मूलों का जमकर इस्तेमाल किया है। लस्ट स्टोरीज के अलग अलग एपिसोड को अलग-अलग निर्देशकों ने डायरेक्ट किया था। इन निर्देशकों में भी अनुराग कश्यप थे और उनके अलावा जोया अख्तर, दिवाकर बनर्जी और करण जौहर थे। लस्ट स्टोरीज में भी सेक्स प्रसंगों को भुनाने की मंशा दिखती है। अनुराग कश्यप अपनी फिल्मों में गाली-गलौच वाली भाषा के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने यही काम इस सीरीज में भी किया है, आठ एपिसोड में जमकर गाली गलौच है। गाली गलौच के बचाव में ये तर्क दिया जा रहा है कि मुंबई के जिस भौगोलिक इलाके और परिवेश की कहानी है उसमें हर शब्द के आगे और पीछे गाली होती है। अब सवाल यही उठता है कि जीवन और फिल्म या धारावाहिक या साहित्य में क्या फर्क है। फिल्म, धारावाहिक या साहित्य तो जीवन जैसी कोई चीज है जीवन तो नहीं है। अगर हम धारावाहिक या फिल्म में जीवन को सीधे-सीधे उठाकर रख देते हैं तो यह उचित नहीं होता है। जीवन को जस का तस कैमरे में कैद करना ना तो फिल्म है ना ही धारावाहिक। जिस भी फिल्म में इस तरह का फोटोग्राफिक यथार्थ दिखता है वो कलात्मक दृष्टि से श्रेष्ठ नहीं माना जाता है। अनुराग कश्यप बहुधा इस दोष के शिकार होते नजर आते हैं, यहां भी हुए हैं।
इसके अलावा सेक्रेड गेम्स में सेक्स प्रसंगों की भरमार है, अप्राकृतिक यौनाचार के भी दृश्य हैं, नायिका को टॉपलेस भी दिखाया गया है। हमारे देश में इंटरनेट पर दिखाई जानेवाली सामग्री को लेकर पूर्व प्रमाणन जैसी कोई व्यवस्था नहीं है लिहाजा इस तरह के सेक्स प्रसंगों को कहानी में ठूंसने की छूट है जिसका लाभ उठाया गया है। लगभग हर एपिसोड में इस तरह से दृश्य हैं और ये सबसे सस्ता तरीका है दर्शकों को अपनी ओर खींचने का। नवाजुद्दीन सिद्दिकि ने गैंगस्टर गायतोंडे की भूमिका निभाई है लेकिन उसके चरित्र का चित्रण लगभग सेक्स मैनियाक की तरह किया गया है। यह वही गायतोंडे है जो अपनी मां के विवाहेत्तर सेक्स संबंध को जानने के बाद इतना उत्तेजित हो जाता है कि बचपन में ही मां के प्रेमी की हत्या कर घर से भाग जाता है। आठ एपिसोड के इस धारावाहिक में धर्म का तड़का भी लगाया गया है। धर्म-राजनीति-पुलिस-माफिया का गठजोड़ तो दिखता ही है, देश के खिलाफ एक बड़ी साजिश भी है।
अगर हम नेटफ्लिक्स के इस तरह के कंटेंट की तरफ बढ़ने की वजह तलाशते हैं तो इसके कारोबारी पक्ष को देखना होगा। सक्रिय मासिक उपभोक्ता के आधार पर नेटफ्लिक्स हमारे देश का एक बड़ा और लोकप्रिय वीडियो एप है। एक सर्वे के मुताबिक इस एप पर उभोक्ताओं द्वारा बितानेवाले समय को आधार मानते हैं तो नेटफ्लिक्स सातवें स्थान पर है और डाउनलोड को आधार बनाते हैं तो वो चौदहवें स्थान पर चला जाता है। भारतीय वीडियो बाजार में नेटफ्लिक्स का मुकाबला अमेजन प्राइम वीडियो और हॉटस्टार से है। ये दोनों प्लेटफॉर्म वीडियो के साथ साथ कुछ अतिरिक्त भी ऑफर करते हैं। अमेजन प्राइम वीडियो के उपभोक्ताओं को उसके ई-कामर्स प्लेटफॉर्म पर सहूलियतें मिलती हैं तो हॉटस्टार पर आईपीएल देखने को मिलता है। इस बीच जियो ने भी अपने आप को इस बाजार में मजबूत किया है। सक्रिय मासिक उपभोक्ताओं की संख्या के आधार पर जियो टीवी तीसरे नंबर पर है, यूट्यूब और हॉटस्टार के बाद। ऐसे में नेटफ्लिक्स सेक्रेड गेम्स के जरिए भारतीय बाजार में खुद को मजबूत करने की कोशिशों में जुटा है। जिस तरह से इंटरनेट पर इस प्रोग्राम को प्रमोट किया गया है या महानगरों में होर्डिंग आदि लगे हैं उससे साफ है कि नेटफ्लिक्स की मंशा क्या है। नेटफ्लिक्स के एक अधिकारी ने कहा भी है कि स्थानीय कटेंट के अलावा तकनीकी दिक्कतों को दूर करना उनकी प्राथमिकता है। कमजोर इंटरनेट कनेक्टिविटी के बावजूद नेटफ्लिक्स पर अबाधित वीडियो देखा जा सकता है।
सेक्रेड गेम्स में अनुराग कश्यप अपनी विचारधारा के साथ उपस्थित हैं, कहीं प्रत्यक्ष तो कहीं परोक्ष रूप से। इस एपिसोड में यह दिखाया गया है कि कैसे एक निर्दोष मुस्लिम लड़को का पुलिस एनकाउंटर कर देती है। और परोक्ष रूप से राजनीतिक स्टेटमेंट तब देते हैं जब उस मुस्लिम लड़के का परिवार धरने पर बैठा होता है और उसकी कोई सुध लेनवाला नहीं होता है। सिस्टम को निशाने पर तो लेते हैं लेकिन उसके पीछे की मंशा कुछ और होती है। एक एपिसोड में तो बाबारी विध्वंस के फुटेज को लंबे समय तक दिखाया जाता है और फिर बैकग्राउंड से उसपर राजनीतिक टिप्पणी आती है। इसी तरह से मुंबई बम धमाकों के फुटेज को दिखाकर बैंकग्राउंड से टिप्पणियां आती हैं जो सीरियल निर्माता की सोच को उजागर करती है। इससके अलावा भी अनुराग कश्यप को जहां मौका मिलता है वो राजनीतिक टिप्पणी करने और मौजूदा सरकार और उसकी विचारधारा को कठघरे में खड़ा करने में नहीं चूकते हैं। अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर वैचारिक आग्रहों का प्रतिपादन उचित है लेकिन फिक्शन के नाम पर जब ये किया जाए तो उसका रेखांकन भी करना जरूरी है। सेक्रेड गेम्स में जिस तरह से लंबे लंबे सेक्स प्रसंगों या टॉपलेस नायिका को दिखाया गया है उसपर भी ध्यान देने की जरूरत है। अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर क्या अश्लीलता या पोर्न परोसने की छूट दी जा सकती है? अपनी कुंठा के सार्वजनिक प्रदर्शन किस हद तक किया जा सकता है?  इसपर विचार करने की जरूरत है। यह तर्क दिया जा सकता है कि जो भी इस तरह के प्लेटफॉर्म पर जाते हैं उनको मालूम होता है कि वहां किस तरह की सामग्री मिल सकती है। बावजूद इसके हमारे सामाजिक मार्यादा या लोकाचार का ध्यान तो रखना ही चाहिए। लोकप्रियता हासिल करने के लिए परोसी जानेवाली अश्लीलता पर विचार होना चाहिए। बेहतर तो यही होता कि फिल्मकार आत्म नियंत्रण करते और कलात्मकता के नाम पर अश्लीलता परोसने से बचते। इसका एक फायदा यह भी होता कि सरकारी हस्तक्षेप का अवसर नहीं मिल पाता।  

Saturday, July 7, 2018

मुजरिम का महिमामंडन करती फिल्म


हिंदी फिल्मों में पिछले दिन जितने भी बॉयोपिक बने लगभग सभी सफल रहे, कुछ बेहद सफल तो कुछ ने औसत कमाई की। क्रिकेटर महेन्द्र सिंह धौनी, मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर, बॉक्सर मैरी कॉम, धावक मिल्खा सिंह आदि पर बनी फिल्मों ने अच्छा बिजनेस किया। लेकिन इन बायोपिक्स में अगर मिल्खा सिंह को छोड़ दिया जाए तो सभी उन शख्सियतों को केंद्र में रखकर बनाई गई जो अपने अपने क्षेत्र में अब भी सक्रिय हैं। संभव है फिल्मकारों के मन में इन शख्सियतों की सफलता की कहानी को दर्शकों के सामने पेश करने की मंशा रही हो लेकिन इन फिल्मों से बॉयोपिक पूरा नहीं हो रहा क्योंकि इनकी जिंदगी अभी शेष है। धौनी अब भी क्रीज पर हैं तो मैरी कॉम बॉक्सिंग रिंग में। इसी तरह से हालिया रिलीज फिल्म संजू भी अभिनेता संजय दत्त की जिंदगी पर बनी है, लेकिन संजय दत्त की जिंदगी अभी काफी बाकी है। बावजूद इसके फिल्म संजू भी अन्य बॉयोपिक्स की तरह बॉक्स ऑफिस पर हिट रही है और दूसरे ही हफ्त में उसने दो सौ करोड़ का विजनेस पार कर लिया है। इस फिल्म को लेकर पहले दो हफ्ते में जिस तरह का मौहाल बना उसके आलोक में इस फिल्म को कसौटी पर कसना आवश्यक है। राजकुमार हिरानी की छवि अच्छी फिल्मों के निर्माता के तौर पर है, उनके कहानी कहने का अंदाज बेहद निराला और दर्शकों को बांधनेवाला होता है। उनकी पिछली फिल्में मुन्ना भाई एमबीबीएस, लगे रहे मुन्नाभाई, थ्री ईडियट्स और पी के जैसी फिल्मों ने इस छवि को ठोस किया था। उनकी गुनती बॉलीवुड के उन निर्देशकों में होती है जिनकी हर फिल्म बॉक्स आफिस पर सफल होती है। फिल्म संजू में राजकुमार हिरानी ने कथा का जो वितान रचा है वो फिल्म को सफल तो बनाता है लेकिन उनकी मंशा को सवालों के घेरे में लेकर भी आता है। पूरी फिल्म को इस तरह से बुना गया है कि इसमें संजय दत्त की छवि पीड़ित की बनकर उभरे। इसमें राजकुमार हिरानी ने बेहद सफाई से संजय दत्त के अलावा अमूमन सभी को गलत दिखाया है चाहे वो सिस्टम हो, नेता हो, मंत्री हो, पुलिस हो, वकील हो, दोस्त हो या फिर समाज। इसका एक फायदा यह होता है कि अगर किसी अपराधी के आसपास की सभी चीजें गलत दिखाई जाएं तो अपराधी का अपराध छोटा दिखाई देने लगता है या फिर उससे सहानुभूति होने लगती है। संजू में राजकुमार हिरानी ने यही किया है। संजय के लिए सहानुभूति बटोरने के चक्कर में राजकुमार हिरानी मुंबई बम धमाकों के गुनहगार टाइगर मेमन के लिए भी सहानुभूति बटोरते नजर आते हैं जब फिल्म में कहा जाता है कि 1992 के मुंबई दंगों में टाइगर मेमन का दफ्तर जला दिया गया था इसलिए उसने 1993 के मुंबई बम धमाकों को अंजाम दिया। इस संवाद के जरिए फिल्मकार क्या साबित करना चाहते हैं? अगर फिल्मकार को ये याद रहता कि मुंबई बम धमाकों में 257 लोगों की जान गई थी और सात सौ से अधिक लोग जख्मी हुए थे तो शायद ये संवाद नहीं होता। इस संवाद से यही संदेश जाता है कि मुंबई बम धमाके एक क्रिया की प्रतिक्रया थी। एक पंक्ति के संवाद से फिल्मकार कई बार बड़ा संदेश दे देते हैं और अपनी सोच को भी सार्वजनिक कर देते हैं। फिल्म मुक्काबाज में अनुराग कश्यप भी एक पंक्ति के डॉयलॉग से अपनी सोच को उजागर करते हैं जब किरदार कहता है कि वो आएंगें और भारत माता की जय बोलकर मार डालेंगे।  
दर्शकों की संवेदना को भुनाने के लिए फिल्म संजू में संजय दत्त के पूर्व में की गई दो शादी और पहली शादी से पैदा हुई उनकी बेटी त्रिशाला का कहीं जिक्र नहीं है लेकिन तीसरी शादी से उनके दो छोटे बच्चों को बार बार दिखाया जाता है। छोटे बच्चों को इस वजह से कि वो अपेक्षाकृत अधिक संवेदना बटोर सकते हैं। हाय! छोटे बच्चों पर क्या असर होगा, छोटे बच्चे जब स्कूल जाएंगें तो उसके साथी क्या कहेंगे आदि आदि। त्रिशाला का जिक्र नहीं होना, ऋचा शर्मा का ब्रेन ट्यूमर से से जंग और उस दौरान संजय दत्त के व्यवहार को नहीं दिखाना इसी संवेदनात्मक खेल का हिस्सा प्रतीत होता है। जब ऋचा शर्मा अमेरिका में मौत से जंग लड़ रही थी तब संजय दत्त मुंबई में इश्क कर रहे थे। संवेदनहीनता की इंतहां। बावजूद इसके फिल्मकार इस अप्रिय प्रसंग को नहीं छूते हैं। अपनी पत्नी की मौत के बाद बेटी की कस्टडी को लेकर अदालती कार्यवाही का संकेत तक फिल्म में नहीं है। अगर उस दौर के संजय के व्यवहार को दिखाया जाता तो शायद ये फिल्म दर्शकों की इतनी सहानुभूति नहीं बटोर पाती। इसी तरह से रेहा पिल्लई के साथ संजय दत्त की शादी सात साल चली, इसके बाद उनसे तलाक हो गया लेकिन इसका भी जिक्र हिरानी ने अपनी फिल्म में नहीं किया। संजय दत्त के बुरे समय में उनकी बहन नम्रता और प्रिया दत्त उनके साथ, सुनील दत्त के साथ मजबूती से खड़ी रहीं लेकिन उस रिश्ते को फिल्म में कहीं भी रेखांकित नहीं किया गया। बहन की मौन उपस्थिति फिल्म में है।     
इस फिल्म में कई आपत्तिजनक बातें भी हैं। मसलन संजय दत्त तीन सौ से अधिक महिलाओं के साथ हम बिस्तर होने की बात कहते हैं लेकिन उसको भी इस तरह से पेश किया गया है जैसे वो फख्र की बात हो, चरित्रहीनता की नहीं। अपने सबसे अच्छे दोस्त की गर्लफ्रेंड के साथ शारीरिक संबंध बनाकर भी उसको कोई ग्लानि नहीं होती। अपनी पत्नी के सामने लेखिका का किरदार निभाने वाली अभिनेत्री अनुष्का शर्मा से फ्लर्ट करता है। बात बात पर स्त्री अस्मिता का डंडा-झंडा लेकर खडी होनेवाली स्त्री विमर्शकारों का भी इसपर आपत्ति नहीं जताना भी हैरान करनेवाला है। दरअसल इस फिल्म में संजय दत्त को इस तरह से पेश किया गया है कि दर्शक उसको मुजरिम ना समझें । 1982 में संजय दत्त के नशे में अपने घर के बाहर फायरिंग करने का जिक्र उस दौर की पत्रिकाओं से लेकर उनपर प्रकाशित पुस्तकों में है लेकिन इस फायरिंग का जिक्र भी फिल्म में नहीं है। उस वक्त उनके पिता पर तो कोई खतरा नहीं था। उनको किसी तरह की कोई धमकी नहीं मिली थी। बाद में ये कहा गया है कि वो अपने पिता की रक्षा के लिए एके 56 खरीदता है, चलिए इस तर्क को क्षण भर के लिए मान भी लिया जाए तो जब वो जमानत पर पर जेल से बाहर आता है, उसके बाद अंडरवर्ल्ड के संपर्क में किस कारण से रहता है । नासिक के एक होटल से आतंकवादी छोटा शकील से बात करता है। क्यों। इस मसले पर राजकुमार हिरानी की ये फिल्म लगभग खामोश है। जबकि ये बातचीत एजेंसियों ने रिकॉर्ड की थी और उसको अदालत में पेश भी किया गया था। इसके अलावा भी इस फिल्म में तमाम राजनीतिक घटनाक्रम को दरकिनार कर दिया गया है जिसकी संजय दत्त की जिंदगी में अहमियत है। सुनील दत्त जब बेहद परेशान हो गए थे और अपनी पार्टी कांग्रेस के नेताओं ने उनसे कन्नी काटनी शुरू कर दी थी तब वो बाल ठाकरे से मिले थे। ठाकरे ने उनकी मदद का भरोसा दिया था लेकिन एक वचन लिया था कि वो मुंबई उत्तर पश्चिम से लोकसभा चुनाव नहीं लडेंगे। दत्त साहब ने वहां से 1996 और 1998 का चुनाव नहीं लड़ा था। इसी तरह से पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने भी बाल ठाकरे को फोन कर सुनील दत्त की मदद करने को कहा था। एक बातचीत में चंद्रशेखर जी ने मेरे सामने इस वाकए का जिक्र किया था। संजय दत्त के केस में शरद पवार की क्या और कैसी भूमिका थी फिल्म इसपर भी खामोश है। कयों शरद पवार के कांग्रेस से बाहर होने के बाद सुनील दत्त कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े थे।
संजय दत्त को पीड़ित दिखाने के चक्कर में राजकुमार हिरानी ने मीडिया के कंधे का भी बखूबी इस्तेमाल किया है। कहीं का ईंट और कहीं का रोड़ा जोड़कर हिरानी भानुमति का कुनबा बनाने की कोशिश करते हुए सामान्यीकरण के दोष का शिकार हो जाते हैं। वो हर दिन घर में आनेवाले समाचारपत्र की अपने पात्र के माध्यम से ड्रग्स से तुलना करवाते हैं। संजय दत्त को बचाने के चक्कर में हिरानी ने मीडिया को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की है जो कई बार बचकानी लगती है। राजकुमार हिरानी ये अपेक्षा करते हैं कि कोई सेलिब्रिटी छोटा शकील या दाऊद से बात करे और मीडिया उसको प्रश्नवाचक चिन्ह के साथ ना छापे, अदालत की तरह फैसले देते हुए खबर लिखी जाए। प्रश्नवाचक चिन्ह को इतनी अहमियत दी गई है जैसे कि पत्रकारिता बस उसी चिन्ह तक सिमटकर रह गई है। कुल मिलाकर देखें तो इस बयोपिक के माध्यम से हिरानी ने संजय दत्त को परिस्थितियों का शिकार दिखाने की कोशिश की है।

Friday, July 6, 2018

दिल्ली में बसता है मेरा दिल

फिल्म 'मुक्काबाज' में अपने लाजबाव अभिनय से दर्शकों का दिल जीतने वाली अभिनेत्री जोया हुसैन दिल्ली में पली बढ़ी हैं। इस फिल्म में गूंगी लड़की का बेहद मुश्किल अभिनय निभाकर जोया ने पहली ही फिल्म में अपने अभिनय का लोहा मनवा लिया था। जागरण फिल्म फेस्टिवल के दौरान मैंने उनसे बातचीत की। जोया ने कहा   
मैं दिल्ली में काफी समय रही हूं। ग्रेजुएशन के लिए मैंने लेडीश्रीराम कॉलेज में एडमिशन लिया था। मैं पत्रकार बनना चाहती थी इस वजह से पत्रकारिता का कोर्स चुना था। थोड़े दिनों की पढ़ाई के बाद मुझे लगा कि ये मेरे वश का नहीं है। मैं थिएटर में काम करती थी, प्रैक्टिस और शोज की वजह से मैं कॉलेज कम जा पाती थी। एलएसआर में अटेंडेंस को लेकर बहुत सख्ती भी थी। जहां तक मुझे याद है कि अस्सी फीसदी अटेंडेंस होने की वजह से एक दो महीने में ही मैंने वहां से किसी और कॉलेज में जाने का फैसला कर लिया था। मैंने वेंकटेश्वर कॉलेज में माइग्रेशन करवा लिया। वहां उस वक्त अटेंडेंस को लेकर उतनी सख्ती नहीं थी और मेरा थिएटर ग्रुप यात्रिक सैदुलाजाब इलाके में है तो कॉलेज से निकल कर वहां पहुंच जाती थी या जब वहां से मौका मिलता था तो निकलकर कॉलेज चली जाती थी। थिएटर में व्यस्ततता की वजह से कॉलेज कम जा पाती थी और किसी तरह से मैनेज करती थी। मैं दिल्ली के कई इलाकों में रही हूं लेकिन साउथ दिल्ली के मोमोज मुझे बेहद पसंद हैं। मैं मोमोज को लेकर क्रेजी हूं जहां भी जाती हूं वहां मोमोज जरूर खाती हूं। वेंकी कॉलेज से लेकर धौलाकुँआ तक खाने के इतने ज्वाइंट्स हैं जहां जाना मुझे बेहद पसंद था, दोस्तों के साथ वहा जाकर खाकर आती थी। मुझे हर तरह का खाना बहुत पसंद हैं। खान मार्केट के कई रेस्तरां में हामरी महफिल नियमित रूप से जमा करती थी। खान मार्केट के बाद हमारी पसंदीदा जगह पंडारा रोड मार्केट हुआ करी जहां हम इंडियन और चाइनीज फूड का आनंद उठाया करते थे। पंडारा रोड मार्केट में भी बेहतरीन मोमोज मिलते हैं। मेरे मोमोज को खाने की दीवानगी अबतक बरकरार है। दिल्ली से मुझे अब भी जुड़ाव और प्यार है क्योंकि ये मेरा प्यारा शहर है जहां मैंने अपनी जिंदगी के कई बेहतरीन साल बिताए हैं।

Saturday, June 30, 2018

स्थापित उद्धेश्यों से भटकती संस्था

भारत सरकार की एक संस्था है नेशनल फिल्म डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (एनएफडीसी)। सूचना और प्रसारण मंत्रालय से संबद्ध इस संस्था की स्थापना उसी वर्ष हुई जिस वर्ष देश में इमरजेंसी लगाई गई थी यानि 1975। ये संस्था पिछले कुछ दिनों से गलत वजहों से चर्चा में है। तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी ने इस संस्था की चीफ नीना लाठ को भ्रष्टाचार के आरोप में हटा दिया था। बाद में नीना कोर्ट चली गईं और मामला वहां विचाराधीन है। इस कार्रवाई के पहले भी इस संस्था की गड़बड़ियों की खबरें आती रहती थी, कभी किसी फिल्म को वित्तीय सहायता देने को लेकर तो कभी किसी छोटे मोटे आयोजन को लेकर। इसके पहले इस तरह की खबरें भी आईं कि एनएफडीसी, चिल्ड्रन फिल्म सोसाइटी ऑफ इंडिया और अन्य फिल्म से संबंधित संस्थाओं को मिलाकर एक नई संस्था बना दिया जाएगा। चर्चा तो इस बात की भी है कि इस बारे में कैबिनेट नोट भी तैयार हो गया था लेकिन चुनावी वर्ष होने की वजह से अब शायद ही इस पर फैसला हो सके। वैसे यह प्रस्ताव बहुत कुछ मौजूदा सूचना और प्रसारण मंत्री की सोच पर भी निर्भऱ करता है कि वो इसको कितना आगे बढ़ाना चाहते हैं। खैर ये अलहदा मुद्दा है जो कि राज नीति के हिसाब से तय होगी। हम चर्चा इस बात पर करेंगे कि नेशनल फिल्म डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन अपनी स्थापना के समय तय किए गए उद्देश्यों की कसौटी पर कितना खड़ा उतर रहा है।एनएफडीसी की बेवसाइट पर इसके मिशन और उद्देश्य दोनों प्रकाशित हैं। मिशन के बारे में लिखा है- एनएफडीसी का लक्ष्य सिनेमा में उत्कृष्टता के लिए के लिए परिवेश निर्मित करना और इसकी विभिन्न भाषाओं में बनी फिल्मों को सहायता और प्रोत्साहन देते हुए भारत की सांस्कृतिक विविधता को बढ़ावा देना है। मिशन के अलावा बेवसाइट पर उद्देश्य भी लिखा हुआ है। इस संस्था के मूल्यांकन के पहले इसके उद्देश्यों पर भी गौर करना आवश्यक है। उद्देश्य में उल्लिखित है कि- कौशल का विकास और सभी भाषाओं में निर्माण व सह-निर्माण, पटकथा लेखन का विकास और आवश्यकता आधारित कार्यशालाओं के जरिए भारतीय सिनेमा के विकास को सहायता देना। इसके अलावा दो और उद्देश्य बताए गए हैं, पहला है भारत और विदेश में सिनेमा के जरिए भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देना और दूसरा एक चुस्त और लचीले संगठन का निर्माण जो कि भारतीय फिल्म उद्योग की जरूरतों के प्रति क्रियाशील हो।
इससे भी एक दिलचस्प जानकारी इस संस्था की बेवसाइट के मुखपृष्ठ पर प्रकाशित है कि इसने पिछले कई वर्षों में भारत के कुछ सबसे सम्मानित फिल्मकारों के साथ काम किया है जिसमें सत्यजीत रे, मीरा नायर, अपर्णा सेन, श्याम बेनेगल, गोविन्द निहलानी, मृणाल सेन, रिचर्ड अटनबरो, अदूर गोपालकृष्णन और केतन मेहता शामिल हैं। अब अगर हम इस सूची पर विचार करें तो इसमें मौजूदा दौर के नए निर्देशक कोई नहीं नजर आता है। बेवसाइट की बैनर पर अंग्रेजी में कहते हैं का पोस्टर जरूर लगा है कि जोकि मई में रिलिज हुई थी और इसके डायरेक्टर हरीश व्यास हैं। इसके अलावा जयदीप घोष की माया बाजार, प्रिया कृष्णस्वामी की गंगूबाई जैसी फिल्में भी विज्ञापित हैं। इन फिल्मों के आधार पर अगर मिशन और उद्देश्य को देखते हैं तो एक प्रश्न मन में खड़ा होता है कि इन फिल्मों ने किस तरह का कौशल विकास किया, फिल्मों के माध्यम से कैसे भारतीय संस्कृति को मजबूत किया। पिछले कुछ वर्षों में जिन निर्देशकों के नाम यहां विज्ञापित हैं उसके बाद से जिस तरह की फिल्मों का निर्माण करने में एनएफडीसी सहायक रहा है उसने फिल्म संस्कृति को कैसे विकसित किया। संस्था की स्थापना के 43 साल बाद अगर इस संस्था के सहयोग से कमजोर फिल्मों का निर्माण हो रहा है तो ना तो ये संस्था अपने मिशन में ना ही इसके उद्देश्यों को हासिल करने में कामयाब हो रही है। करदाताओं का पैसा किस तरह से उपयोग में लाया जा रहा है, इस बारे में भी सरकार को विचार करने की जरूरत है। इस संस्था को फिल्म संस्कृति के विकास के लिए, सिनेमा में उत्कृषटा के लिए परिवेश निर्मित करना था। फिल्मों से जुड़े लोगों का मानना है कि ये संस्था अपने स्थापित उद्देश्यों से भटक गई है और अच्छी फिल्मों के निर्माण के सहयोग से ज्यादा अब ये सरकार की विज्ञापन एजेंसी हो गई है। सरकार और सार्वजनिक कंपनियों के प्रचार प्रसार में इसकी रुचि ज्यादा है।
पिछले कुछ सालों में एनएफडीसी ने क्या उल्लेखनीय कार्य किया है ये भी ज्ञात नहीं हो पा रहा है। क्या इसने किसी ऐसी कहानी का चुनाव किया या ऐसी फिल्म बनवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जिसको बनाने में वॉलीवुड कामयाब नहीं हो पाया। जाने भी दो यारो या परिणति जैसी कौन सी फिल्म एनएफडीसी के खाते में आई।एक जमाना था जब एनएफडीसी के कर्ताधर्ता उस तरह की कहानियों को तलाशते थे जिसपर मेनस्ट्रीम बॉलीवुड फिल्म नहीं बनाता था या नहबीं बना पाता था। हिंदी के बेहतरीन कथाकार विजयदान देथा की कहानी पर फिल्म बनावाई गई थी। क्या आज ऐसा सोचा भी जा रहा है या सोचा भी जा सकता है। लगता तो नहीं है। आज अगर असमिया की फिल्म विलेज रॉकस्टार नेशनल अवॉर्ड जीतती है तो वो अपने बूते पर। कहानी की पहचान कर उसको रूपहले पर्द तक लाने में एनएफडीसी नाकाम रही है। आज सिनेमा निर्माण में तकनीक की बेहद अहम भूमिका है। नए फिल्म निर्माताओं को तकनीकी तौर पर समृद्ध करने के लिए एनएफडीसी कितनी कार्यशालाएं आयोजित करती है, एनिमेशन के बदसते स्वरूप पर विशेषज्ञों के साथ कितने वर्कशॉप हुए। देश के किन हिस्सों, किस किस भाषा के फिल्म निर्माताओं से संपर्क कर कौशल विकास के लिए प्रयास करती है इसको भी बताया जाना चाहिए। एनएफडीसी से अंग्रेजी में एक पत्रिका निकालती थी- सिनेमा इन इंडिया। सिनेमा प्रेमियों को उम्मीद थी कि अंग्रेजी के बाद ये पत्रिका हिंदी और अन्य भाषाओं में निकलेगी लेकिन निकल रही पत्रिका भी बंद हो गई। कौन है इसका जिम्मेदार। पत्रिका को बंद करने के पीछे की वजह को जानने का हक भारत की उस जनता को है जिसके पैसे पर ये संस्था चल रही है।
सिनेमा में उत्कृष्टता के लिए परिवेश निर्माण के लिए जरूरी होता है कि दर्शकों को सिनेमा से जोड़ा जाए। पिछले एक दशक में पूरे देश में सिंगल थिएटर एक एक करके बंद हो गए या उसका स्वरूप बदल गया। मैं बिहार के एक छोटे से शहर जमालपुर में पैदा हुआ और भागलपुर में पढ़ा। जमालपुर और भागलपुर में जितने सिंगल थिएटर थे सब बंद हो गए एक दो को छोड़कर। जमालपुर के अवंतिका सिनेमा हॉल में हमने दर्शकों की जो दीवनगी देखी है या भागलपुर के महादेव टॉकीज में जिस तरह फिल्मों को लेकर छात्रों का हुजूम उमड़ता था वैसा दृश्य अब सिर्फ संस्मरणों में ही है। क्या कभी एनएफडीसी ने इस ओर ध्यान दिया कि सिंगल थिएटर के बंद होने से भारतीय सिनेमा को कितना नुकसान हो रहा है। क्या इस बारे में उन इलाकों में जाकर कोई चर्चा आयोजित की गई, वहां के दर्शकों की राय ली गई। क्या कभी इस बारे में सूचना और प्रसारण मंत्रालय को सलारह के रूप में कोई कार्ययोजना दी गई। करोडों के बजट वाली इस संस्था के बारे में भारत सरकार को गंभीरता से विचार करना चाहिए और सिनेमा के माध्यम से अगर भारतीय संस्कृति को मजबूत करना है तो इसकी चूलें कसनी होंगी। राजनीति और व्यक्तिगत हित से ऊपर उठकर कठोर फैसले लेने होंगे  ताकि करदाताओं की गाढ़ी कमाई का पैसा बर्बाद ना हो।
एनएफडीसी अगर अपने स्थापित उद्देश्यों से भटक गई है तो ये करदाताओं के साथ छल है। उनकी गाढ़ी कमाई को गलत जगह पर गलत तरीके से खर्च करने का अपराध भी। जिसकी सर्वोच्च स्तर पर जांच होकर जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। पिछले कई सालों में इस संस्था के कामकाज को लेकर कई कमेटियों ने ऑडिट आदि किया लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला। या संभव है कि नतीजा नहीं निकलने दिया गया हो। संभव है कि इसी गड़बड़झाले की वजह से नीति आयोग ने इस तरह की संस्थाओं को बंद करने का प्रस्ताव किया हो। संस्था बंद होती है या नहीं ये तो सरकार तय करेगी लेकिन फिल्मों के उत्कृष्ट परिवेश को बनाने के लिए और सिनेमा के माध्यम से भारतीय संस्कृति को पूरी दुनिया के सामने पेश करना है तो इस निगम को अकर्मण्यता के दलदल से बाहर निकालना होगा और गतिशील बनाना होगा। इसके लिए वहां के कर्ताधर्ताओं की जिम्मेदारी तय करनी होगी क्योंकि अराजक स्वायत्तता लोकतंत्र में मंजूर नहीं होती है। 

Friday, June 29, 2018

लेखन का ज्वांइट वेंचर


बेस्टसेलर लेखक अमीश ने अपनी नई किताब, सुहैलदेव और बहराइच का महासंग्राम का एलान किया था। इस किताब के बारे में बात करते हुए अमीश ने एक चौकानेवाली जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि विकास सिंह उनके सहलेखक हैं। पुस्तक का जो कवर जारी किया गया था उसमें भी अमीश के साथ छोटे आकार में सहलेखक के रूप में विकास सिंह का नाम छपा है। ऐसा पहली बार हो रहा है कि अमीश किसी के साथ मिलकर किताब लिख रहे हैं। रचनात्मक लेखन में यह नए तरह के ट्रेंड की शुरुआत है। अमीश के मुताबिक उन्होंने भारतीय गाथाएं श्रृंखला के लिए अलग अलग लेखकों को सहलेखक के तौर पर रखा है। इस योजना में अमीश सहलेखक के साथ आइडिया साझा करते हैं,सहलेखक उस आइडिया और विषय से संबंधित शोध अमीश की सोच के हिसाब से किताब लिखता है। जब किताब तैयार हो जाती है तो अमीश उसको देखते हैं और भाषा और कथ्य में अपने लेखन के स्टाइल के हिसाब से बदलाव कर फाइनल करते हैं। सुहैलदेव और बहराइच का महासंग्राम भी इसी तरह से लिखा गया है। अमीश का कहना है कि इस तरह से लिखकर वो हर छह महीने पर अपनी किताब पाठकों के लिए प्रस्तुत कर सकेंगे। भारतीय प्रकाशन जगत के लिए यह एक नया ट्रेंड है जहां लेखक अपनी सोच को अमली जामा पहनाने के लिए एक सहलेखक रखता है। बातचीत में अमीश ने बताया कि किताब पूरी तरह से उनकी होगी, पाठकों को कहीं से ये नहीं लगेगा किसी और ने इसका लेखन किया है। सहलेखक के होने से यह सहूलियत होगी कि मूल लेखक विषय के रिसर्च और पहले ड्राफ्ट की मेहनत से बच जाएगा और अपना अधिक समय आइडिएशन और नए प्लॉट की तलाश में लगा सकेगा।
भारत के लिए यह ट्रेंड भले ही नया हो लेकिन विदेशों में इससे मिलता जुलता प्रयोग काफी सफल रहा है। मशहूर अपराध कथा लेखक जेम्स पैटरसन तो इसको और भी व्याप्क रूप से अपने लेखन के साथ जोड़ते हैं। अपने उपन्यास प्राइवेट की सीरीज के लिए पैटरसन ने कई देशों में सहलेखक रखा वहां की स्थानीय कहानी को अपने स्टाइल में लिखा जा सके। 2014 में जेम्स पैटरसन को जब मुबंई को केंद्र में रखकर अपना उपन्यास लिखना था तो उन्होंने अश्विन सांघी को अपना सहलेखक रखा था। जेम्स पैटरसन सहलेखक को कहानी लेकर आने को कहते हैं और फिर उसको अपने स्टाइल में लिखने की सलाह देते हैं या फिर उस कहानी में सुधार करते हैं। अभी हाल ही में जेम्स पैटरसन ने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के साथ मिलकर एक उपन्यास लिखा, द मिसिंग प्रेसिंडेंट। इसमें भी साइबर अटैक,आतंकवादी हमले को विषय बनाया गया है। यह उपन्यास जबरदस्त हिट रही है। हिंदी में लेखन का ये ज्वाइंट वेंचर अगर चल पड़ा तो स्थिति बेहद दिलचस्प होगी और संभव है कि अमीश जैसे लेखकों की पुस्तकें धड़ाधड़ बाजार में आएं।