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Saturday, September 22, 2018

मृत्यु पर मौन क्यों ‘सरकार’ ?


दिल्ली की हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष और हिंदी के वामपंथी कवि-आलोचक विष्णु खरे का निधन हो गया। विष्णु खरे को चंद महीने पहले ही केजरीवाल सरकार ने, मैत्रेयी पुष्पा के कार्यकाल खत्म होने के बाद, हिंदी अकादमी का उपाध्यक्ष नियुक्त किया था। उनके निधन के बाद दिल्ली  के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने शोक जताते हुए कोई ट्वीट नहीं किया जबकि मुख्यमंत्री हिंदी अकादमी का अध्यक्ष भी होता हैं। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की जगह उनके उप ने ट्वीट कर विष्णु खरे के निधन पर शोक जताया। मनीष सिसोदिया ने ट्वीट किया हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष, साहित्य पत्रकारिता जगत की बड़ी हस्ती और हम सबके प्रेरणास्त्रोत श्री विष्णु खरे जी का देहावसान हो गया है। उनके निधन से साहित्य जगत को अपूरणीय क्षति हुई है। परमपिता परमात्मा उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें। इस दुखद क्षण में हम सब उनके परिवार के साथ हैं। अरविंद केजरीवाल के ट्वीट नहीं करने पर सोशल मीडिया पर सवाल खडे होने लगे हैं। किसी को ये संवेदनहीनता नजर आ रही है तो कोई ये कह रहा है कि अरविंद केजरीवाल ने मनीष सिसोदिया के दबाव में विष्णु खरे को अकादमी का उपाध्यक्ष बनाया था लिहाजा वो शुरू से खरे साहब को लेकर उदासीन थे। वजह चाहे जो हो पर एक संस्थान के उपाध्यक्ष के निधन पर उसी संस्थान के अध्यक्ष का सार्वजनिक रूप से शोक प्रकट नहीं करना खेदजनक और असंवेदनशील है। हिंदी अकादमी को नजदीक से जानने वाले लोग इसकी एक अलग ही वजह बताते हैं। दिल्ली के साहित्यिक हलके में इस बात की चर्चा है कि अरविंद केजरीवाल चाहते थे कि मैत्रेयी पुष्पा को एक और कार्यकाल मिले, आम आदमी पार्टी के नेता दिलीप पांडे भी इसी मत के थे लेकिन मनीष सिसोदिया, मैत्रेयी जी की जगह पर किसी और को लाना चाहते थे। मनीष सिसोदिया ने इसके लिए अपने एक पत्रकार मित्र की सलाह पर विष्णु खरे का नाम आगे बढाया और फिर उसको अनुमोदन भी करवा लिया। जब विष्णु खरे जी को दिल्ली की हिंदी अकादमी का उपाध्यक्ष बनाया गया था तब भी ये सवाल उठा था कि दिल्ली-एनसीआर के लेखक को छोड़कर विष्णु खरे जी को मुंबई से क्यों लाया गया। लेकिन सरकार के अपने फैसले होते हैं जिनकी आलोचना समय के साथ दबती चली जाती है।  अब खरे साहब के निधन के बाद तो ये बातें बिल्कुल ही अर्थहीन हो गई हैं।  अब केजरीवाल के पक्ष के लोग इस बात को लेकर शोरगुल कर रहे हैं कि साहित्य और राजनीति को अलग रखा जाना चाहिए। मुझे इस संदर्भ में साहित्य और राजनीति के संबंधों पर लिखा विजयदेव नारायण साही का एक लेख याद आ रहा है। अपने उस लेख में विजयदेव नारायण साही ने उस वक्त कहा था जिस तरह से आज राजनीति से साहित्य को अलग रखने का नारा लगानेवाले मध्यवर्गीय कलाकार प्रतिक्रियावादी हैं, उसी तरह से राजनीति की तानाशाही में कैद करके समस्त साहित्य को पार्टी का अस्त्र मात्र घोषित करनेवाले कला के दुश्मन हैं। साहित्य और राजनीति का इस तरह से घालमेल किया गया कि वो अलग हो ही नहीं सकती, कम से कम जबतक साहित्य पर मार्क्सवाद का प्रभाव है। यह मैं इस वजह से कह रहा हूं क्योंकि लेनिन के प्रसिद्ध लेख पार्टी साहित्य और पार्टी संगठन का असर भारत के लेखकों, खासतौर पर हिंदी के लेखकों पर बड़ा गहरा पड़ा था। लेनिन के उस लेख में कहा गया था कि साहित्य को सर्वहारा के साझा उद्देश्य का अंग होना चाहिए और उसे पार्टी यंत्र का दांता और पेंच बन जाना चाहिए। लेनिन के उस लेख की व्याख्या इस तरह के की गई जिसमें प्रतिबद्धता को पार्टी की सदस्यता से जोड़ दिया गया। सालों तक इस प्रतिबद्धता को कायम रखा गया, कमोबेश अब भी है। तो जब हम साहित्य को राजनीति से अलग रखने की बात करते हैं तो वो सुविधा के हिसाब से इस्तेमाल करनेवाली बात लगती है। साहित्य और राजनीति का हमारे समाज में गहरा संबंध रहा है। लेकिन राजनीतिज्ञों में साहित्य या साहित्यकारों को लेकर जिस तरह की उदासीनता इस वक्त है वैसा पहले कभी देखने को नहीं मिला है। राजनीति को साहित्य के प्रति संवेदनशील होने की जरूरत है। किसी वरिष्ठ लेखक की मृत्यु पर सरकार का मौन सवालों के घेरे में है।  
सिर्फ राजनीति और राजनेता ही संवेदनहीन हुए हों ऐसा नहीं है। विष्णु खरे जी जब जिंदगी की जंग लड़ रहे थे, तो हिंदी अकादमी में उनकी पूर्ववर्ती उपाध्यक्ष मैत्रेयी पुष्पा की एक टिप्पणी भी विवादास्पद हो गई है। मैत्रेयी पुष्पा ने पहले अपनी वॉल पर युवा कवि शायक आलोक का एक पत्र लगाया जो कि उऩको ही संबोधित था। पत्र में लिखा था आभारी हूं कि हम दिल्ली में बसे कुछ युवा जो संघर्षरत हैं, और साहित्यिक वैचारिक रचनात्मकता से जुड़े हैं, उन्हें आपने समय समय पर हिन्दी अकादमी मंच पर आमंत्रित किया और कुछ आर्थिक लाभ भी दिया ताकि हमारा हौसला न टूटे. युवा कवि प्रकाश ने अपने संघर्ष से तंग आकर आत्महत्या कर ली. उसके बाद श्री वाजपेयी ने वार्षिक युवा संगम का आयोजन शुरू किया और माह दूमाह पर युवा कवियों से कविताएं पढ़ा उन्हें कुछ आर्थिक लाभ देते हैं. उन्होंने प्रकाश-वृत्ति योजना का शिलान्यास भी किया है जहां युवा कवियों के प्रथम संग्रह छाप वे अपनी ग्लानि धो रहे. क्या हम भी आत्महत्या कर लें ताकि आचार्य विष्णु खरे की हिन्दी अकादमी जो मृतकों व मृत्यु-उत्सुक कवियों के ही आयोजन में लगी है वह शायक-वृत्ति या अविनाश-वृत्ति योजना का शिलान्यास कर शेष रह जाते युवा कवियों का कुछ कल्याण कर सके?’ इसके उत्तर में मैत्रेयी ने जो लिखा उसको लेकर उनपर हमले शुरू हो गए हैं। मैत्रेयी पुष्पा ने शायक के पत्र का उत्तर भी फेसबुक पर ही दिया और लिखा- तुम्हारी चिट्ठी का क्या जवाब दूं? मैंने युवा कलमकारों और कलाकारों के लिए जो संकल्प लिये थे और कार्यान्वित किये, मेरे वो इरादे पुरानी पीढ़ी को घातक लगे, जैसे उनकी सत्ता छिन रही हो। परिणाम तुम युवकों युवतियों के सामने है। हिंदी अकादमी....। मैत्रेयी पुष्पा के इस उत्तर को विष्णु खरे की परोक्ष आलोचना माना गया। पुरानी पीढ़ी और बूढ़े जैसे शब्दों का इस्तेमाल भी उनके लिए लिए ही किया गया जान पड़ा। चर्चा तो ये भी चली कि मैत्रेयी ने ही शायक को कहकर वो खत लिखवाया फिर उसका उत्तर दिया। क्योंकि शायक का खत मैत्रेयी जी ने अपनी फेसबुक वॉल पर लगाया और दस मिनट बाद ही उसका उत्तर भी पोस्ट कर दिया। इस पूरे प्रकरण के पीछे हिंदी अकादमी की पत्रिका इंद्रप्रस्थ भारती का नया अंक और हिंदी अकादमी के आयोजनों में एक खास विचारधारा के लोगों को बुलाना है। मैत्रेयी पुष्पा ने अपने कार्यकाल के अंतिम दिनों में इंद्रप्रस्थ भारती का कहानी विशेषांक तैयार किया था और पूर्व की घोषणा के अनुसार कहानीकारों की कहानियां तय कर दी गई थीं। इस बीच उनका कार्यकाल समाप्त हो गया और विष्णु खरे ने कार्यकाल संभालते ही उसमें काफी बदलाव कर दिए। साहित्य जगत को इसकी जानकारी भी मैत्रेयी पुष्पा के फेसबुक वॉल पर उनकी पोस्ट से ही हुई थी। अब शायक आलोक के पत्र के माध्यम से मैत्रेयी ने जिस प्रकार से विष्णु खरे और आयोजनों में बुलाए जानेवाले बुजुर्ग लेखकों पर निशाना साधा उसकी टाइमिंग गलत हो गई। मैत्रेयी के पोस्ट के सात-आठ घंटे के बाद ही विष्णु खरे जी का निधन हो गया। उसके बाद विवाद और बढ़ गया।
ऐसा प्रतीत होता है कि अब मैत्रेयी जी फेसबुक पर विवाद खड़ा कर उसका आनंद उठाने लगी हैं। जैसे राजेन्द्र जी किया करते थे, वो भी पहले विवाद उठाते थे और फिर किनारे बैठकर उसका मजा लिया करते थे। पिछले एक साल में मैत्रेयी ने कई विवादास्पद पोस्ट लिखी, छठ के दौरान नाक तक सिंदूर लगाने को लेकर की गई विवादास्पद टिप्पणी भी उसमें शामिल है। फेसबुक पर जिस रफ्तार से विवाद वायरल होते हैं, उसका दायरा फैलता है, पक्ष और विपक्ष में दलीलें आती हैं वो विवाद उठानेवाले को आनंद से भर देने के लिए काफी होते हैं। हिंदी अकादमी और विष्णु खरे को लेकर भले ही विवाद खडा करने की कोशिश की जा रही हो लेकिन हमारे भारतीय संस्कार में किसी की मृत्यु के बाद उनके बारे में आलोचनात्मक नहीं लिखने की परंपरा रही है। अपशब्द का इस्तेमाल तो वर्जित ही होता है। विष्णु खरे जी के निधन के बाद भले ही केजरीवाल मौन रहे हों, उनकी मृत्य के पहले मैत्रेयी पुष्पा की टिप्पणी आपत्तिजनक हो लेकिन उनकी मृत्यु के फौरन बाद तो हम सबको मृतात्मा की शांति के लिए प्रार्थना करना चाहिए, विवाद को हवा देकर भारतीय परंपरा की मर्यादा को ना तोड़ें। अगर बात करनी ही है, तो विष्णु खरे की कविताओं पर बात हो, उनकी रचनात्मकता को कसौटी पर कसा जाए।

Sunday, September 16, 2018

‘पुरस्कार वापसी’ अभियान नहीं साजिश !


साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष विश्वनाथ तिवारी ने अपनी पत्रिका दस्तावेज में लंबा संपादकीय लिखकर अवॉर्ड वापसी की मुहिम के संगठित अभियान होने का दावा किया है। अपने दावे के समर्थन में उन्होंने कई प्रमाण भी प्रस्तुत किए हैं। तिवारी ने अपने संपादकीय में लिखा पुरस्कार लौटाने या इस्तीफा देने वाले लेखकों के भी तीन वर्ग थे - एक, वे जो मोदी सरकार और अकादमी के व्यक्तिगत विरोध के चलते आंदोलन के अगुआ और मुख्य किरदार थे। इनकी संख्या 5 से अधिक नहीं थी। इनमें वाजपेयी और वामदलों के लेखक शामिल हैं। दूसरे, वे जो इन मुख्य किरदारों के घनिष्ठ या मित्रा थे जिन्होंने मित्र धर्म के निर्वाह या व्यक्तिगत दबाव और पैरवी में ऐसा किया। इनकी संख्या लगभग 25 थी। तीसरे, वे जो लेखकों की सहज क्रांतिकारी या यशलिप्सु प्रवृत्ति वश इस महोत्सव में अपना नाम चमकाने और लोकप्रियता हासिल करने के लिए (जैसा कि हिंदी के प्रसिद्ध आलोचक प्रो. नामवर सिंह ने कहा है) शामिल हो गए। इनकी संख्या लगभग 15 है। इस प्रकार विश्लेषक महसूस करते हैं कि कुल पांच लेखकों ने अपनी पूर्व प्रतिबद्धता, व्यक्तिगत विरोध और राजनीतिक कारणों से असहिष्णुता का इतना बड़ा मुद्दा खड़ा किया। मुझे प्रामाणिक सूत्रों से खबर मिली और अनेक लेखकों ने व्यक्तिगत बातचीत में बताया भी कि उनसे पुरस्कार लौटाने के लिए संपर्क किए गए।
इनमें नामवर सिंह, कुंवरनारायण और केदारनाथ सिंह जैसे नाम भी हैं। लीलाधर जगूड़ी और अरुण कमल उन दिनों सिक्किम यात्रा पर थे जब एक पत्रकार ने कई बार उन्हें पुरस्कार लौटाने के लिए प्रेरित किया। जगूड़ी पर तो कई लोगों ने फोन करके दबाव बनाया। जैसा कि उन्होंने मुझे बताया। सतीश कुमार वर्मा, राजेंद्र प्रसाद मिश्र, गोविंद मिश्र आदि ने भी ऐसा ही बताया। रामशंकर द्विवेदी ने फोन पर बताया कि उन्हें साहित्य अकादेमी के एक अवकाश प्राप्त लेखक ने फोन पर पुरस्कार लौटाने के विषय में पूछा। वे पांच लेखक जो इस आंदोलन के संचालक थे अपने निकट के लेखकों द्वारा उनके परिचित लेखकों को बार-बार फोन कराकर पूछते रहते थे - ‘‘आप कब लौटा रहे हैं? या ‘‘क्या आप नहीं लौटा रहे हैं?’’ आदि। यह पुरस्कार लौटाने के लिए अप्रत्यक्ष अनुरोध था। इस बात के पक्के प्रमाण हैं कि असहिष्णुता विरोधी आंदोलन स्वतःस्फूर्त नहीं था, बल्कि इसके लिए कुछ लेखकों ने देश व्यापी नेटवर्किंग और अभियान चलाया था।साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष विश्वनाथ तिवारी इथने पर ही नहीं रुके उन्होंने अपने संपादकीय में अंग्रेजी के वरिष्ठतम लेखक शिव के कुमार का उनको लिखा ई मेल भी प्रस्तुत किया। उस ईमेल में 93 वर्षीय लेखक ने साफ तौर पर लिखा है कि उनपर भी साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने का दबाव बनाया जा रहा है। इतना ही नहीं कुछ लेखक उनको ये भी सलाह दे रहे हैं कि वो अपना पद्मभूषण भी लौटाने का एलान कर दें। लेकिन शिव के कुमार से साफ तौर पर माना था कि ये पूरा आंदोलन राजनीतिक मंशा से चलाया जा रहा था।
अपने इस विस्तृत लेख में विश्वनाथ तिवारी ने अशोक वाजपेयी और के की दारूवाला समेत कई लेखकों के उस दौर के क्रियाकलापों और मीडिया में उऩके बयानों को भी सामने रखा है। एक जगह वो लिखते हैं कि एक टी.वी. चैनल पर जब अशोक वाजपेयी से एंकर ने पूछा कि मकबूल फिदा हुसैन जिस समय देश छोड़कर गए या सलमान रश्दी की पुस्तक प्रतिबंधित हुई, कांग्रेस की सरकार थी। तब उन्होंने विरोध नहीं किया। इस पर वाजपेयी जी का चेहरा उतर गया। ऐसे ही किसी प्रश्न पर केकी एन. दारूवाला मौन हो गए। उन्होंने 1984 (सिखों की हत्या के वर्ष) में पुरस्कार लिया था। वाजपेयी जी ने 1994 में पुरस्कार लिया था जिसके दो वर्ष पहले अयोध्या में विवादित ढांचे का ध्वंस हुआ था। इसी तरह से उन्होंने एक टीवी चैनल ने  उस दौर में असहिष्णुता पर एक बहस आयोजित की थी । विश्वनाथ तिवारी लिखते है कि उस बहस में गोविंद मिश्र, गिरिराज किशोर, गणेश देवी, मंगलेश डबराल, मुनव्वर राणा आदि उसमें उपस्थित थे। बहस के बीच में ही राणा ने अपने झोले से अकादमी का प्रतीक चिन्ह और चोंगे की जेब से चेक बुक निकाल कर मेज पर रख दिया और कहा कि इसे अकादमी कार्यालय तक पहुंचा दें। क्या यह स्वतःस्फूर्त था? क्या राणा घर से योजनापूर्वक इसे लौटाने की नीयत से साथ नहीं ले गए थे? राणा ने अकादमी पुरस्कार के लिए कुछ ऐसी अपमानजनक बातें कहीं जिस पर अकादमी पुरस्कार प्राप्त लेखकों को उनकी भर्त्सना करनी चाहिए थी। राणा ने कहा कि प्रतीक चिन्ह कहीं उनके घर के कोने में पड़ा था जिसे उन्होंने ढूंढ़कर निकलवाया। वे इसे अपने ड्राइंगरूम में रखने लायक नहीं समझते। वे इसे गोमती में बहा देना चाहते हैं। आदि। यह तब है जब राणा को अकादमी पुरस्कार दिए जाने के बाद एक विवाद छिड़ा था कि वे मंच के कवि हैं, उन्हें यह पुरस्कार मिलना ही नहीं चाहिए था।उस दौर में की घटनाएं इस तरह की घटी थीं जिससे इस बात के साफ संकेत मिल रहे थे कि पुरस्कार वापसी आंदोलन की व्यूह रचना की गई थी।
अपने इस लेख में विश्वनाथ तिवारी ने अशोक वाजपेयी को भी निशाने पर लिया है वो अशोक वाजपेयी को पुरस्कार वापसी के कथित आंदोलन का सूत्रधार भी मानते हैं। दरअसल अशोक वाजपेयी साहित्य अकादमी के साथ मिलकर विश्व कविता सम्मेलन करना चाहते थे। जो तिवारी जी के अकादमी अध्यक्ष रहते नहीं हो सका था जिसपर अशोक वाजपेयी ने लिखा था कि जब तक साहित्य अकादमी का वर्तमान निजाम पदासीन है तब तक मैं एक लेखक के रूप में अपने को साहित्य अकादमी से अलग रखूंगा। साहित्य अकादमी के एक और निजाम के दौरान पहले भी मैंने अपने को उससे अलग रखा था। मेरे न होने से अकादमी को कोई फर्क नहीं पड़ता और मुझे अकादमी के होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। एक सार्वजनिक और राष्ट्रीय संस्थान के अनैतिक आचरण में सहभागिता करना लेखकीय अंतःकरण की अवमानना होगी।इस टिप्पणी के उत्तर में विश्वनाथ तिवारी ने लिखा कि इसकी अंतर्कथा अति संक्षेप में यह है कि वाजपेयी जी विश्व कविता के आयोजन में अपने रजा फाउंडेशन को अकादमी के साथ जोड़ना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने कांग्रेस शासन काल में प्रशासन के बड़े अधिकारियों से काफी दबाव डलवाया। यह मामला कई महीनों चला और अंत में साहित्य अकादमी ने जब रजा फाउंडेशन को साथ न लेने का निर्णय लिया तो वाजपेयी जी ने क्रुद्ध होकर उपर्युक्त टिप्पणी लिखी।हलांकि अशोक वाजपेयी ने विश्वनाथ तिवारी के लेख के बाद अपने स्तंभ में इसका खंडन किया और साफ किया कि वो नहीं बल्कि कांग्रेस सरकार उनको विश्व कविता सम्मेलन करने को कह रही थी। दरअसल विश्व कविता समारोह को किसी की नजर लग गई। अशोक जी ने पहले साहित्य अकादमी के साथ मिलकर विश्व कविता समारोह करना चाहा फिर बाद में वो बिहार सरकार से साथ मिलकर इस आयोजन को करना चाह रहे थे। कमेटी आदि भी बन गई थी, यह भी तय हो गा था कि उसका एक सचिवालय दिल्ली में होगा। विश्व कविता समारोह को लेकर बजट भी बिहार सरकार के संस्कृति विभाग ने घोषित कर दिया गया था। संस्कृति विभाग ने अपने साला कैलेंडर में भी इस आयोजन को शेड्यूल कर दिया था। लेकिन वो भी संभव नहीं हो सका। इस स्तंभ में बिहार में आयोजित होनेवाले विश्व कविता सम्मेलन की अंतर्कथा का प्रमुखता से पहले उल्लेख हो चुका है। अशोक जी ने अभी लिखा है कि पिछले वर्ष चम्पारण सत्याग्रह शती के अवसर पर मैंने विश्व कविता समारोह करने का प्रस्ताव बिहार सरकार से निजी स्तर पर किया था. वह मान लिया गया. बाद में बिहार के कवियों की ज़रूरत से ज़्यादा शिरकत और सरकारी सुस्ती से क्षुब्ध होकर मैंने अपने को अलग कर लिया. और बाद में सरकार में फेर-बदल के कारण वह नहीं ही हो पाया।यह ठीक हो सकता है लेकिन इसमें कुछ और भी है जिसकी परदादारी है। 
दरअसल अगर हम एक बार फिर से उस दौर को याद करें तो यह बात साफ हो जाती है कि पुरस्कार वापसी का प्रपंच रचा गया था ताकि बिहार चुनाव में नीतीश कुमार को फायदा पहुंचाया जा सके। कई साहित्यकारों ने जेडीयू के महासचिव के सी त्यागी के घर बैठकर आगे की कार्ययोजना पर विचार भी कर लिया था। लेकिन पुरस्कार वापसी के इन कर्ताधर्ताओं को शायद इस बात का अंदाजा नहीं रहा होगा कि नीतीश कुमार ही पाला बदलकर भारतीय जनता पार्टी और नरेन्द्र मोदी के साथ हो लेंगे। लेकिन जबतक बिहार में नीतीश लालू की सरकार रही तो पुरस्कार वापसी में शामिल लेखकों ने वहां से भरपूर लाभ लेने की कोशिश की, कुछ को पुरस्कार वापसी का इनाम भी मिला। अब तो यह साफ हो गया है कि कालबुर्गी की हत्या तो सिर्फ बहाना थी, निशाना नरेन्द्र मोदी थे।


Saturday, September 8, 2018

साहित्यिक विवाद का वधस्थल फेसबुक


साहित्यिक पत्रिका पाखी में छपे हिंदी के लेखक-अध्यापक विश्वनाथ त्रिपाठी से की गई बातचीत पर जारी विवाद के बीच मशहूर कथाकार ह्रषिकेश सुलभ ने फेसबुक पर दो महत्वपूर्ण टिप्पणियां की थीं। एक तो उन्होंने लिखा फेसबुक एक वधस्थल है। दूसरी टिप्पणी भदेस लोकक्ति में थी। उन्होंने लिखा कुछ लोग पूतवो मीठ, भतरो मीठ में लगे हैं। ऐसे लोग वधिकों से कम खतरनाक नहीं हैं। सुलभ जी की ये दो टिप्पणियां फेसबुक पर सक्रिय लिखने पढ़ने वालों की मानसिकता को लेकर बेहद सटीक है। इन दिनों साहित्यकारों को जिस तरह से फेसबुक पर घेर कर मारने या मारने की कोशिश की प्रवृत्ति बढ़ी है उसने इस मंच को एक वधस्थल में तब्दील कर दिया है। फेसबुक पर कुछ ऐसे साहित्यिक गिरोह सक्रिय हैं जो सुबह से ही शिकार की तलाश में रहते हैं। चतुर शिकारी की तरह उनको यह मालूम होता है कि किस मुद्दे को कितना हवा देकर किसी का वध करना है। विश्वनाथ त्रिपाठी के प्रकरण को ही अगर देखें तो दो तीन स्वयंभू लोग बजाए इस मसले की तार्किक परिणति तक ले जाने की कोशिश करने के लोग अपना अपना हिसाब बराबर करने में लग गए। किसी को प्रेम भारद्वाज से दिक्कत थी तो वो प्रेम भारद्वाज को घेरने लग गए, किसी को अपूर्व जोशी से परेशानी थी तो वो जोशी पर हमलावर होने लगे। किसी को विश्वनाथ त्रिपाठी से अपना स्कोर सेट करना था तो वो उसमें लग गए। दूसरी बात जो सुलभ ने कही उसका अर्थ है कि बेटा भी प्यारा और पति भी प्यारा। इस पूरे विवाद में तो कई ऐसे लोग दिखे जो पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों तरह की टिप्पणियों से सहमति जता रहे थे। यहां भी सहमत वहां भी सहमत। दरअसल ऐसे लोगों को पता ही नहीं चलता है कि साहित्यिक विवाद में किस तरह का स्टैंड लेना है। उनको तो बस फेसबुक पर अपनी उपस्थिति दर्ज करानी होती है। उनको लगता है कि साहित्य समाज उनकी उपस्थिति को दर्ज करे लेकिन उपस्थिति दर्ज करनेवाने के चक्कर में इस तरह के लोग लगातार हास्यास्पद होते चले जाते हैं।
इस पूरे विवाद में साहित्य के नेपथ्य में चले जाने या फिर उस इंटरव्यू में त्रिपाठी जी कृति व्योमकेश दरवेश की तथ्यात्मक गलतियों पर सार्थक चर्चा होते होते रह गई। एक साहित्यकार की टिप्पणी थी कि किताब की कमजोरियों से ध्यान हटाने के लिए यह सारा प्रपंच रचा गया। किसी भी कृति में अगर कोई कमजोरी है तो उसपर किसी भी कालखंड में बात हो सकती है। वह कृति चाहे कितनी भी चर्चित क्यों ना रही हो, कितनी भी पुरस्कृत रही हो जब भी नए तथ्य सामने आएंगें तो उसपर बात होनी चाहिए और साहित्य जगत में ऐसा होता भी रहा है। तो व्योमकेश दरवेश को इससे अलग क्यों रखा जाना चाहिए। वह कोई पवित्र ग्रंथ या किताब तो है नहीं कि उसपर सवाल उठानेवाले ईशनिंदा के दोषी करार दे दिए जाएंगें। कथाकार प्रभात रंजन ने पाखी में प्रकाशित विश्वनाथ त्रिपाठी की बातचीत में तथ्यात्मक गलतियों को छोटी मोटी गलतियां करार दिया लेकिन इस क्रम में उन्होंने उस पुस्तक की एक बड़ी गलती की ओर इशारा कर दिया। उन्होंने सवाल उठाया कि हजारी प्रसाद द्विवेदी ज्योतिष विद्या में प्रवीण थे लेकिन उक्त पुस्तक में त्रिपाठी ने उसपर नहीं लिखा है। प्रभात रंजन का आरोप था कि अल्पना मिश्र ने भी इस बिंदु पर त्रिपाठी को क्यों नहीं घेरा। दरअसल त्रिपाठी जी इस किताब में इतनी त्रुटियां हैं कि उसके दूसरे संस्करण को ठीक करने के लिए प्रकाशक ने एक अन्य आलोचक को दिया गया। पहले संस्करण और दूसरे संस्करण में कई चीजें बदली गईं। इस स्तंभ में उसपर पहले भी चर्चा हो चुकी है। दरअसल त्रिपाठी जी जिस अभिनंदन ग्रंथ के हवाले से इस किताब में तथ्यों को लिया वो त्रुटिपूर्ण था और उसको ही आधार बनाकर गुरू आख्यान रच दिया। ऐसा प्रतीत होता है कि विश्वनाथ त्रिपाठी ने हजारी प्रसाद द्विवेदी पर प्रकाशित अभिनंदन ग्रंथ का गहनता से अध्ययन नहीं किया। वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह और गौरव अवस्थी को अथक प्रयास के बाद 83 साल बाद आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी अभिनंदन ग्रंथ का पुनर्प्रकाशन हो पाया था। इसको ही ढंग से देख लेते।   
इस किताब को बचाने के लिए जिस तरह से विश्वविद्लाय शिक्षक एकजुट हुए उसको देखते हुए एक साहित्यकार ने इसकी तुलना आरुषि हत्याकांड के दौरान सीबीआई के एक पूर्व निदेशक के बयान से की जो उस वक्त के अखबारों में सूत्रों के हवाले से छपा था। सीबीआई के निदेशक के हवाले से उस वक्त ये कहा गया था कि इस केस में उनको पिता नाम की संस्था को बचाना था,( वी हैव टू सेव द इंस्टीट्यूशन ऑफ फादर)। उनका मानना है कि व्योमकेश दरवेश को लेकर जिस तरह की एकजुटता दिखी उसको देखकर कहा जा सकता है कि शिक्षकों की संस्था को बचाना उद्देश्य हो सकता है। (वी हैव टू सेव द इंस्टीट्यूशन ऑफ द टीचर- क्रिटिक)। कुछ विद्वान आलोचकों की राय है कि व्योमकेश दरवेश जीवनी नहीं बल्कि संस्मरण है।चलिए अगर यह मान लिया जाए कि वो संस्मरण है तो क्या संस्मरणों में ताजमहल को दिल्ली में दिखाने की छूट लेखक को दी जा सकती है। क्या रचनात्मक स्वतंत्रता के नाम पर लाल किला को पटना में दिखाया जा सकता है।
दरअसल इस पूरे विवाद की जड़ में पाखी पत्रिका में विश्वनाथ त्रिपाठी की एक टिप्पणी थी जिसको लेकर घमासान मचा। पहले त्रिपाठी जी लानत मलामत शुरू हो गई क्योंकि प्रकाशित टिप्पणी में आपत्तिजनक बातें थीं। बाद में बहस इस दिशा में मुड़ गई कि साक्षात्कार प्रकाशित होने के पहले त्रिपाठी जी को दिखाया जाना चाहिए। अभिव्यक्ति की आजादी के कई पैरोकार जो सुबह शाम इसको लेकर छाती कूटते हैं वो चाहे अनचाहे प्री सेंसरशिप की वकालत करने लगे। पत्रकारों को ये राय दी जाने लगी कि इंटरव्यू छपने के पहले दिखा लेना चाहिए। इंटरव्यू छपने के पहले क्यों दिखा लेना चाहिए? अगर आज यही मांग प्रधानमंत्री या अन्य मंत्रियों की तरफ से आए तो एकदम से इसी फेसबुक बवाल मच जाएगा, ऐसा लगेगा कि इमरजेंसी से बुरे दिन आ गए। इंटरव्यू लेनेवाले और इंटरव्यू देनेवालों दोनों को यह पता होता है कि वो क्या पूछ रहे हैं और क्या बोल रहे हैं। कई बार जब मनमाफिक नहीं छपता है या उसपर विवाद हो जाता है तो लोग अपनी सुविधानुसार मीडिया पर अपने बयान को तोड़-मरोड़कर छापने का आरोप लगा देते हैं लेकिन उनको भी पता होता है कि जन्नत की हकीकत क्या है।
प्रेम भारद्वाज ने अंतत: विश्वनाथ त्रिपाठी से मिलकर इस पूरे प्रकरण पर खेद जता दिया लेकिन उन्होंने कुछ सवाल भी खड़े किए हैं। पाखी बनाम आदमीनामा शीर्षक से प्रेम भारद्वाज ने एक लंबी पोस्ट लिखी है और कुछ सवाल उठाए हैं- आदमी का जवाब आदमी होना चाहिए भीड़ नहीं। आलोचना और हत्या में फ़र्क होना चाहिए। खिर वह कौन सा माइंडसेट है जो आदमी को आदमी नहीं रहने देता, उसके भीतर की हिंसा को बार-बार उभार देता है? वह कौन सी प्रवृत्ति है जो हर अच्छी-बुरी घटना में साजिश, मकसद और गणित ढूंढ़ती हैवह कौन सी सोच है जो हमें आदमी से जज बना देती है और कबीलाई मानसिकता की ओर धकेलती है- कभी गाय, कभी मांस का टुकड़ा, ‘कभी एक विवादके बहाने हमला बोला जाता है? यही वह पल होता है जब आदमी विवेकशील व्यक्ति से विवेकहीन भीड़ के रूप में तब्दील हो जाता है। ऐसी भीड़ आपके साथ कुछ भी कर सकती है।
कुछ दिन हुए जब नामवर सिंह द्वारा भगवान कहे जाने के अपराध में उनके प्रति गाली- गलौज की भाषा का इस्तेमाल किया गया। वह भी त्रिपाठी जी के गुरु और उम्र में उनसे भी बड़े, 93 साल के हैं। फिर वह कौन सी प्रवृत्ति थी जिसने उनकी उम्र और उनके काम को नज़रअंदाज़ कर उनके साथ सड़कछाप जेबकतरे को पकड़कर सजा देने जैसा व्यवहार किया?उसके भी पहले मैनेजर पांडेय की एक तस्वीर लगती है तब उनके प्रति अपमान का ज़हर उगलने के पीछे कौन सी प्रवृत्ति काम कर रही थी?’
अब समय आ गया है हिंदी साहित्य के जुड़े लोगों को गंभीरता से इसपर विचार करने की आवश्यकता है कि फेसबुक पर जिस तरह से लिटरेरी लिंचिंग को अंजाम दिया जाता है उसको रोकने के लिए क्या किया जाना चाहिए। क्योंकि जब साहित्यकार के खोल में बैठे गिरोहबाज भाषा की मर्यादा को भूलकर साहित्यिक विमर्श को व्यक्तिगत कर देते हैं और चरित्रहनन से लेकर उसमें परिवार तक को शामिल करने का कुचक्र रचते हैं। इस प्रवृत्ति को तत्काल रोका जाना जरूरी है। स्वस्थ साहित्यिक विवाद का हमेशा स्वागत होना चाहिए लेकिन स्वस्थ विवाद के लिए स्वस्थ मानसिकता का होना भी आवश्यक है।

Saturday, September 1, 2018

फिल्म म्यूजियम का अधूरा सपना ?


यूपीए सरकार के दस साल के शासन के दौरान पूर्व में बनी कई महात्वाकांक्षी योजनाओं पर काम शुरू हुआ था, करोडों खर्च हुए लेकिन वो पूरा नहीं हो पाया। ऐसी ही एक योजना थी मुंबई में नेशनल म्यूजियम फॉर इंडियन सिनेमा के निर्माण की। यह संस्था सूचना और प्रसारण मंत्रालय के फिल्म डिवीजन के अंतर्गत बनाया जाना था। अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में मुंबई में भारतीय सिनेमा का संग्रहालय बनाने की योजना बनी थी। 2003 में पी के नायर की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन कर दिया था जिसको म्यूजियम के बारे में सुझाव देना था। इस कमेटी की रिपोर्ट पांच साल बाद आई। उसके बाद लंबी सरकारी कार्यवाहियां चलती रही, बिल्डिंग के लिए टेंडर आदि हुए, क्यूरेशन के लिए समझौता हुआ। इन योजनाओं को अमली जामा पहनाने के लिए कमेटी बनी थीं, उनकी जिम्मेदारियां भी तय की गई थी लेकिन जिम्मेदारियों के साथ जवाबदेही नहीं तय की गई। 18 अप्रैल 2011 को श्याम बेनेगल की अध्यक्षता में सोलह सदस्यों की एक सलाहकार समिति बनाई गई। इस समिति में अदूर गोपालकृष्णन,यश चोपड़ा, सब्यसाची मुखर्जी, गौतम घोष, सई परांजपे जैसे दिग्गजों को शामिल किया गया था। इसमें सूचना और प्रसारण मंत्रालय से फिल्मों से संबंधित संयुक्त सचिव को भी सदस्य बनाया गया था। इस समिति के लिए नौ काम तय किए गए थे जिसमें सिनेमा से संबंधित ऐतिहासिक महत्व की वस्तुओं की पहचान करना, सिनेमा से जुड़े लोगों के बीच आपसी संबंध बनाने की कोशिश करना, सामग्री जुटाने के लिए प्रक्रिया बनाना, प्रस्तावित म्यूजियम में सामानों और कलाकृतियों की प्रदर्शनी से लेकर इसके मास्टर प्लान को देखना, थीम आदि के बारे में सलाह देना से लेकर सिनेमा से संबंधित सामग्री के दस्तावेजीकरण आदि शामिल था। इस कमेटी के बाद 16 दिसबंर 2011 को एक और समिति बनी जो कि सलाहकार समिति को सहायता देने के लिए बनाई गई थी जिसमें कंटैंट के लिए ग्यारह लोगों की समिति थी और खरीद के लिए अदूर गोपालकृष्णन और पी के नायर समेत आठ लोगों की एक अलग समिति बनाई गई। इनका मुख्य काम कलाकृतियों की खरीद करना था और इनकी भूमिका भी अलग से तय की गई थी। 2011 में सलाहकार समिति के गठन के बाद 2017 के जनवकी तक उऩकी पंद्रह बैठकें हुई लेकिन म्यूजियम जिस हालत में है उसको देखरर लगता है दिग्गजों की सोच अच्छी हो सकती है पर वो व्यावहारिक नहीं थे।
इस म्यूजियम को लेकर सिनेमा की इतनी बड़ी बड़ी शख्सियतों की सलाहकार समिति और उनको मदद करने के लिए बनी दो अन्य समितियों के होने के बावजूद इसको समय पर पूरा नहीं किया जा सका। भारतीय सिनेमा के सौ साल पूरे होने के अवसर पर इसको खोला जाना था लेकिन इस म्यूजियम को औपचारिक तौर पर अबतक सिनेमा प्रेमियों के लिए नहीं खोला जा सका है। 2014 में सरकार बदल गई और नरेन्द्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार ने कामकाज संभाला। लेकिन सलाहकार समिति वही चलती रही, उसकी बैठकें होती रहीं, बहसें होती रहीं। पंद्रह बैठकों में जो चर्चा हुई उसको पढ़ने के बाद लगता है कि विद्वता और व्यावहारिकता एक साथ नहीं चल सकती है। बहस इस बात पर होती रही कि  सिनेमा कहा जाए या मूविंग इमेज कहा जाए, बॉलीवुड कहा जाए या हिंदी फिल्म कहा जाए आदि आदि । पंद्रह बैठकों पर करदाताओं की गाढ़ी कमाई के पैसे लगते रहे, पर नतीजा कुछ नहीं। इस लंबी कालावधि में मुंबई के मौजूदा गुलशन महल के अलावा एक और पांच मंजिला इमारत बना दी गई। इस इमारत का डिजाइन इस तरह से है कि अगर पचास साठ बच्चों का एक समूह वहां पहुंच जाए और कैमरे को देखना चाहे तो कैमरा गिर जाएगा।  
यह जानना बेहद दिलचस्प और मनोरंजक है कि दिग्गजों की इस सलाहकार समिति के रहते नेशनल काउंसिल ऑफ साइंस म्यूजियम को फिल्म म्यूजियम के क्यूरेशन का काम दिया गया और इस काम के लिए संस्था को 10 करोड़ से अधिक की राशि देना तया किया गया। दिलचस्प और मनोरंजक इस वजह से कहा कि फिल्म म्यूजियम के क्यूरेशन का काम अलग है और साइंस म्यूजियन के क्यूरेशन का काम अलग है। साइंस वाले जब फिल्म म्यूजियम का काम करेंगे तो कल्पना ही की जा सकती है कि वो कैसा काम कर पाएंगें। गुलशन महल में म्यूजियम का जो काम हुआ उसको देखकर सलाहकार समिति की कार्य करने की क्षमता पर तो सवाल खड़े होते ही हैं, इतने सालों तक चला करोडों का खर्चे पर भी प्रश्नचिन्ह लगता है। पंद्रह बैठकों पर में आने के लिए सदस्यों को बिजनेस क्साल का हवाई टिकट, पांच सितारे होटल में उनके रहने की व्यवस्था आदि पर तो लाखों खर्च हुए होंगे और वो खर्च करदाताओं की कमाई का है।    
इस बीच जब स्मृति ईरानी सूचना और प्रसारण मंत्री बनीं तो उन्होंने जनवरी 2018 में सलाहकार समिति की जगह पर सात लोगों की एक इनोवेशन कमेटी बना दी जिसमें प्रसून जोशी, पीयूष पांडे, वाणी त्रिपाठी, विनोद अनुपम और अतुल तिवारी जैसे फिल्म से जुड़े लोगों को शामिल किया गया। इसकी पहली ही बैठक में अबतक पर हुए कामकाज का जो आंकलन किया गया वो बेहद चौंकाने वाला है। गुलशन महल के हेरिटेज विंग को इस समिति ने पोस्टर प्रदर्शनी करार दिया। इस समिति ने म्यूजियम के मौजूदा स्वरूप और वहां जिस तरह के कंटेंट प्रदर्शित किए गए हैं उसको सही नहीं माना और कहा कि जो भी चीज प्रदर्शित की गई है उसके बारे में सही से बताया नहीं गया है। नई समिति की एक ही बैठक हुई है जिसमें म्यूजियम के मौजूदा हालात पर 17 कठोर टिप्पणियां की गई हैं। अतुल तिवारी ने लिखित तौर पर अपना आकंलन प्रस्तुत किया है। इसमें उन्होंने गुलशन महल को वहां प्रदर्शित सामानों के दबावों से मुक्त करने की सलाह दी है। उन्होंने तो म्यूजियम में इस्तेमाल की गई हिंदी पर भी सवाल उटाते हुए उसको सरल बनाने की सलाह दी है। इसके अलावा भी बहुत सारी विसंगतियां पाई गईं। अब सवाल यही उठता है कि सात साल तक करोड़ों खर्च करने के बाद भी अगर कोई काम इस स्थिति में है तो इसकी जवाबदेही किसकी है। विद्वान सलाहकार समिति ने गांधी और सिनेमा के नाम से एक गैलरी बनाने की सलाह दी थी, जो बनी भी। अब उसको स्वतंत्रता संग्राम और सिनेमा के साथ जोड़कर संपूर्ण गैलरी बनाने की बात की जा रही है।
दरअसल अगर हम देखें तो कांग्रेस ने अपने शासन काल के दौरान कला, सिनेमा और संस्कृति को वामपंथियों को आउटसोर्स कर दिया था। उनको इस तरह के संस्थानों का झुझुना पकड़ाकर उनका समर्थन लेते रहे थे। ये काम इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी के दौरान शुरू किया था, जब सीपीआई ने इमरजेंसी का समर्थन किया था। बाद की कांग्रेस सरकारों ने इसको कायम रखा और मोदी सरकार के सत्ता में आने के पहले तक ये सब बगैर किसी बाधा के चलते रहा। जब 2014 में मोदी सरकार बनी तब ये बात चली थी कि इस तरह से संस्थानों को वामपंथियों के प्रभाव और प्रभुत्व से मुक्त किया जाएगा। कई संस्थाओं को मुक्त करने की कोशिश भी की गई, वामपंथियों को अपना गढ़ छिनने की आशंका भी हुई थी लेकिन कला, फिल्म और संस्कृति से जुड़े मंत्री इतने सहिष्णु बने रहे कि ज्यादातर पुरानी व्यवस्था को कायम रहने दिया गया। अब अगर हम फिल्म म्यूजियम के काम को ही देखें तो 2018 में जाकर एक नई समिति का गठन हुआ जिसकी एक फरवरी 2018 को एक बैठक हो पाई है। उसके बाद से इस समिति की भी कोई बैठक नहीं हुई है। पिछले सात महीनों में म्यूजियम को लेकर कितना काम हुआ यह भी सामने आना शेष है। प्राप्त जानकारी के मुताबिक 25 जनवरी 2018 तक इस म्यूजियम पर एक सौ छत्तीस करोड़ इकतालीस लाख खर्च हो चुके हैं। अब यहां सवाल उठता है कि जो काम 2013 में एक खास मौके पर पूरा होना था और उसको पूरा करने में श्याम बेनेगल और अदूर गोपालकृष्णन जैसे लोग लगे थे वो काम अबतक पूरा नहीं हो पाया है। बगैर जवाबदेही के जिम्मेदारी का ये बेहतरीन नमूना है। सिनेमा एक ऐसा माध्यम है जिसकी विरासत को संभालना हमारी जिम्मेदारी है क्योंकि सिनेमा के माध्यम से इतिहास भी दर्ज होता चलता है। आजादी के पूर्व हमारा समाज कैसा था, आजादी के वक्त कैसा था, नेहरू के बाद का दौर कैसा रहा, इंदिरा से लेकर अबतक का दौर कैसा है, फिल्मों के रील और चिप में सबकुछ दर्ज हो रहा है। 15 साल बीतने के बाद भी अटल सरकार की इस महत्वपूर्ण परिकल्पना को साकार नहीं किया जा सका है। सवाल यह उठता है कि हम अपनी कला संस्कृति को लेकर कब गंभीर हो पाएंगे।  

भाषा को तकनीक से जोड़ने का संकल्प


मॉरीशस में हाल ही में संपन्न हुए विश्व हिंदी सम्मेलन का शुभारंभ करते हुए विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने एक बेहद महत्वपूर्ण बात कही। सुषमा स्वराज ने कहा कि पूर्व में हुए ज्यादातर विश्व हिंदी सम्मेलन हिंदी साहित्य पर केंद्रित होते थे और सत्रों की संरचना उसी हिसाब से की जाती थी। उनका मानना था कि हिंदी में उच्च कोटि का साहित्य रचा जा रहा है लेकिन अगर भाषा की समझ खत्म हो जाएगी तो पढ़ेगा कौन? इसलिए भोपाल के दसवें विश्व हिंदी सम्मेलन में हिंदी भाषा को बढ़ाने, बचाने और उसकी शुद्धता को बरकरार रखने की कोशिश शुरू की गई थी। हिंदी के संवर्धन और उसकी शुद्धता को बचाने और बढ़ाने की जिम्मेदारी भारत की है। भाषा को साहित्य के दायरे से निकालकर विस्तार देने की कोशिश का दावा किया गया। मॉरीशस में आयोजित सम्मेलन में भाषा को और आगे ले जाकर संस्कृति के साथ जोड़ने की कोशिश दिखाई देती है। भाषा और संस्कृति में तो बहुत मजबूत रिश्ता होता है। जिस समाज में भाषा का लोप होता है वहां संस्कृति के लोप का भी खतरा उत्पन्न हो जाता है। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने भी कहा था- जातियों का सांस्कृतिक विनाश तब होता है जब वो अपनी परंपराओं को भूलकर दूसरों की परंपराओं का अनुकरण करने लगती है।..जब वो मन ही मन अपने को हीन और दूसरो को श्रेष्ठ मानकर मानसिक दासता को स्वेच्छया स्वीकार कर लेती है। पारस्परिक आदान प्रदान तो संस्कृतियों का स्वाभाविक धर्म है, किंतु जहां प्रवाह एकतरफा हो वहां यही कहा जाएगा कि एक जाति दूसरी जाति की सांस्कृतिक दासी हो रही है। किन्तु सांस्कृतिक गुलामी का इन सबसे भयानक रूप वह होता है, जब कोई जाति अपनी भाषा को छोड़कर दूसरों की भाषा को अपना लेती है और उसी में तुतलाने को अपना परम गौरव मानने लगती है। यह गुलामी की पराकाष्ठा है, क्योंकि जो जाति अपनी भाषा में नहीं सोचती, वह परंपरा से छूट जाती है और उसके स्वाभिमान का प्रचंड विनाश हो जाता है। दिनकर ने उपरोक्त चार पांच पंक्तियों में भाषा और संस्कृति के गहरे संबंध को रेखांकित किया है और इससे असहमति की कोई वजह नजर नहीं आती है। उन्होंने हिंदी भाषी लोगों के अंग्रेजी प्रेम पर परोक्ष रूप से तंज भी कसा था जब वो अन्य भाषा में तुतलाने की बात कर रहे थे। इस लिहाज से अगर देखें तो भाषा को साहित्य के दायरे से बाहर निकालकर उसको संस्कृति से जोड़ने की कोशिश करना या उसपर मंथन करना विश्व हिंदी सम्मेलन की सार्थकता मानी जा सकती है। 28 से 30 अगस्त 1976 तक मॉरीशस में ही आयोजित दूसरे विश्व हिंदी सम्मेलन की अंतिम गोष्ठी में डॉ हजरी प्रसाद द्विवेदी ने कहा था, यह जो विश्व हिंदी सम्मेलन है, इसका अभी दूसरा ही वर्ष है। बहुत बालक भी नहीं शिशु है।अभी तो यह पैदा ही हुआ है, एक दो साल का बच्चा है। लेकिन इसको देखकर लगता है कि एक महान भविष्य का द्वार उनमुक्त हो रहा है।बताते चलें कि पहला विश्व हिंदी सम्मेलन 10 से 12 जनवरी 1975 को नागपुर में आयोजित हुआ था। द्विवेदी जी के इस कथन पर गंभीरता से विचार करना होगा कि दो सम्मेलनों के बाद विश्व हिंदी सम्मेलनों में क्या हुआ और उसने जो राह पकड़ी उससे भाषा को कितनी समृद्धि मिली क्योंकि वो बालक अब तैंतालीस साल का युवक हो चुका है।  
ग्यारहवें विश्व हिंदी सम्मेलन में हिंदी को तकनीकी रूप से समृद्ध करने की पहल दिखाई देती है, यह पहल भोपाल में आयोजित दसवें सम्मेलन में भी दिखाई दी थी। उसके पहले भी छिटपुट रूप से इस पर चर्चा होती रही है। ग्यारहवें विश्व हिंदी सम्मेलन में भी तकनीक को लेकर बहुत दावे किए गए और भविष्य के लिए अपेक्षाओं का अंबार भी पेश किया गया। अशोक चक्रधर ने बहुत सटीक टिप्पणी तकनीक और भाषा को लेकर की। उन्होंने कहा कि आप एसएमएस लेकर आइए, उससे किसी का कोई विरोध नहीं है लेकिन जब एसएमएस हमारे संदेश की हत्या कर ना आए। अगर यह हमारे संदेश की हत्या कर आगे बढ़ता है तो हिंदी के लोगों को उसका विरोध करना चाहिए। इस बात पर भी लंबी चौड़ी बहस होती रही है कि तकनीक अपने साथ अपनी भाषा लेकर चलती है। चले लेकिन तकनीक की भाषा हमारी हिंदी को नेपथ्य में ना डाल दे। कोशिश इस बात की भी होनी चाहिए कि हिंदी तकनीक को अपनाए और तकनीक भी हिंदी को अपनाए। ये हो रहा है पर अपेक्षित रफ्तार से नहीं जिसकी वजह से तकनीक तो भाषा पर हावी होती जा रही है पर तकनीक में हिंदी भाषा के उपयोग का अनुपात वो नहीं है जो होना चाहिए। विश्व हिंदी सम्मेलन के सत्रों में तो भाषा को लेकर तकनीक के उपयोग पर जोर दिया गया लेकिन खुद सम्मेलन की बेवसाइट या सोशल मीडिया पर सम्मेलन के सत्रों की उपस्थिति बहुत कम रही। बेवसाइट को अपडेट करने की ओर किसी का ध्यान नहीं गया. ट्विटर और फेसबुक के माध्यम से वृहत्तर हिंदी भाषी समाज को जोड़ने की कोशिश नहीं हुई। विश्व हिंदी सम्मेलन में प्रौद्योगिकी के माध्यम से हिंदी सहित भारतीय भाषाओं के विकास पर भी चर्चा हुई। कंठस्थ, लीला, प्रवाह जैसे तरह के सॉफ्टवेयर के उद्घोष के साथ डिजीटल इंकलाब का नारा भी लगाया गया। अगर हिंदी अपने साथ अन्य भारतीय भाषाओं को लेकर चलने लगे तो यह स्थिति बहुत अच्छी होगी। हिंदी को लेकर अन्य भारतीय भाषाओं के मन में जो आशंका है वो दूर होगी। प्रौद्योगिकी के माघ्यम से अगर हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के बीच सामंजस्य या आवाजाही का माहौल बन सकता है तो यह स्थिति सबके लिए लाभप्रद होगी, हिंदी का भी शब्द भंडार बढ़ेगा और अन्य भारतीय भाषाओं के शब्दों में भी बढोतरी होगी। समाज से भाषाई कटुता खत्म होगी और उसपर होनेवाली राजनीति भी बंद हो सकेगी।
विश्व हिंदी सम्मेलन हो और उसमें हिंदी को विश्वभाषा बनाने का और संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाने पर चर्चा ना हो यह संभव ही नहीं है। पहले विश्व हिंदी सम्मेलन में भी इसकी चर्चा हुई थी और वहां हिंदी को आधिकारिक भाषा नहीं माने जाने पर विनावा भावे ने क्षोभ प्रकट करते हुए कहा था कि यूएनओ में स्पेनिश को स्थान है, अगरचे स्पेनिश बोलने वाले पंद्रह-सोलह करोड़ ही हैं। हिंदी का यूएनओ में स्थान नहीं है यद्यपि उसके बोलनेवालों की संख्या लगभग छब्बीस करोड़ है। कालांतर में लगभग सभी हिंदी सम्मेलनों में हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाने का संकल्प लिया जाता रहा। इस बार भी सुषमा स्वराज ने इसका जिक्र किया लेकिन साथ ही इसको लेकर व्यावहारिक दिक्कत बताई। उन्हेंने कहा कि अगर यूएन हिंदी को आधिकारिक भाषा के तौर पर मान्यता देता है तो उसपर आनेवाले खर्च को सभी सदस्य देशों को वहन करना पड़ेगा। इस नियम को लेकर कठिनाई आ रही है। लेकिन विदेश मंत्री ने हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा की सूची में शामिल करवाने की प्रतिबद्धता भी दोहराई। दरअसल संयुक्त राष्ट्र में हिंदी भाषाई संवेदनशीलता का मुद्दा है जिसको कोई भी सरकार छोड़ना नहीं चाहती। आज भी अटल बिहारी वाजपेयी का संयुक्त राष्ट्र में हिंदी में दिए गए पहले भाषण की खूब चर्चा होती है।   
ग्यारहवें विश्व हिंदी सम्मेलन में जिस तरह की अनुशंसाएं आई हैं या जो संकल्प लिया गया है अगर उसपर दस फीसदी भी काम हो सका तो हिंदी के लिए बेहतर होगा। अपेक्षा यह करनी चाहिए कि काम जमीन तक पहुंचे सिर्फ फाइलों, स्मारिकाओं और पुस्तकों में ना रहे। इससे भाषा मजबूत होगी और भाषा मजबूत होगी तो संस्कृति को मजबूlr मिलेगी और इन दोनों की मजबूती से राष्ट्र शक्तिशाली होगा।

Saturday, August 25, 2018

सवालों के घेर में ‘व्योमकेश दरवेश’


राजेन्द्र यादव के जीवित रहते साहित्यिक परिदृश्य जीवंत बना रहता था। वो अपनी पत्रिका हंस में या अन्यत्र भी अपनी टिप्पणियों या अपने साक्षात्कार आदि के माध्यम से कुछ ऐसा कह जाते थे या कुछ ऐसा लिख देते थे जिससे हिंदी जगत में बौद्धिक चहल-पहल बनी रहती थी। उनके निधन के बाद हिंदी साहित्य जगत में जीवंतता और खिलंदड़ापन की कमी महसूस होती है। यादव जी लगातार कुछ साहित्यिक शरारतें करते रहते थे, इन शरारतों से ज्यादातर विवाद होते थे, उन विवादों की वजह से संवाद होता था, साहित्य के पाठकों को एक अलग किस्म का रस और आनंद मिलता था। यादव जी तो हर वक्त इस फिराक में ही रहते थे कि कैसे कोई साहित्यिक विवाद उठे, वो साथी लेखकों को उकसाते रहते थे, विवाद सुझाते भी रहते थे। साहित्यिक पत्रिका पाखी के संपादक प्रेम भारद्वाज यदा-कदा अपने संपादकीय या अपने आयोजनों से हिंदी साहित्य के सन्नाटे को तोड़ने की कोशिश करते रहते हैं। कभी विभूति नारायण राय और मैत्रेयी पुष्पा की अपनी पत्रिका के कवर पर हंसते हुए फोटो छापकर तो कभी किसी विषय विशेष पर दो ध्रुव पर बैठे लेखकों को सामने लाकर माहौल को जीवंत बनाने की कोशिश करते हैं। लेकिन उनमें विवादों को खड़ा करने को लेकर राजेन्द्र यादव जैसी निरंतरता नहीं है। प्रेम भारद्वाज विवाद तो खड़ा करते हैं पर थोड़ा हिचकते भी हैं, यादव जी की तरह बिंदास होकर फ्रंट फुट पर नहीं खेलते हैं।
पाखी के अगस्त अंक में हिंदी के वरिष्ठ आलोचक और गद्यकार विश्वनाथ त्रिपाठी से एक लंबी बातचीत छपी है जिसमें कथाकार अल्पना मिश्रा ने त्रिपाठी जी को घेर लिया। दरअसल दो हजार ग्यारह में त्रिपाठी जी की पुस्तक व्योमकेश दरवेश प्रकाशित हुआ था। यह पुस्तक उन्होंने अपने गुरू आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की जिंदगी को आधार बनाकर लिखी थी। पुस्तक प्रकाशन के बाद उसपर काफी चर्चा हुई और ढेरों पुरस्कार प्राप्त हुए। पाखी में प्रकाशित बातचीत में प्रेम भारद्वाज ने विश्वनाथ त्रिपाठी से इस पुस्तक पर बात शुरू की और उनके सामने द्विवेदी जी कुल गोत्र की रचनाकार अल्पना मिश्र को सामने कर दिया। अल्पना मिश्र ने कहा कि जबसे ये पुस्तक आई है तो इसको आचार्च द्विवेदी की प्रामाणिक जीवनी के तौर पर देखा या माना जा रहा है। अल्पना मिश्र ने त्रिपाठी जी की इस पुस्तक की तथ्यात्मक भूलों की ओर इशारा करते हुए त्रिपाठी जी से उत्तर की अपेक्षा की। अल्पना ने अपने प्रश्न में बताया कि त्रिपाठी जी ने द्विवेदी जी के गांव का नाम गलत लिखा, आचार्य द्विवेदी की मां का नाम गलत लिखा। अल्पना ने एक और तथ्य सामने रखा कि द्विवेदी जी की एक पुत्री का निधन लिवर सिरोसिस से हुआ जबकि त्रिपाठी जी ने तीनों पुत्रियों की मौत की वजह इस बीमारी को बता दिया है। अल्पना मिश्र पूरी तैयारी के साथ आई थी और उन्होंने एक के बाद एक तथ्यात्मक भूलों को गिनाना शुरू कर दिया। त्रिपाठी जी ने अपनी पुस्तक में लिखा कि आचार्य जी की पत्नी दूसरी कक्षा तक पढ़ी हैं जो कि अल्पना के मुताबिक गलत है। अब त्रिपाठी जी को कोई उत्तर सूझ नहीं रहा था, उन्होंने जो बताया वो चौंकानेवाला था। उनके मुताबिक वो द्विवेदी जी के गांव गए वहां उन्हें एक शख्स मिला जिसने खुद को आचार्य द्विवेदी का पौत्र बताया। उस व्यक्ति ने त्रिपाठी जी को विश्वनाथ द्विवेदी पर प्रकाशित एक अभिनंदन ग्रंथ दिया। त्रिपाठी जी ने उस व्यक्ति के कहे और उस अभिनंदन ग्रंथ को ब्रह्मसत्य मानते हुए व्योमकेश दरवेश की रचना कर डाली। प्रेम भारद्वाज ने उनसे यह भी जानने की कोशिश की कि जब इस पुस्तक को लिखने में 15-17 साल लगे तो इतनी तथ्यात्मक भूले क्यों हैं? त्रिपाठी जी इसका कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाए।
अल्पना मिश्र ने तो कहा कि उन्होंने व्योमकेश दरवेश के बाद त्रिपाठी जी से मिलने की कई कोशिशें की जो कामयाब नहीं हो पाईं। विश्वनाथ त्रिपाठी ने इसको भी अजीब तरह से लिया और कहा कि कहानीकारों की अपनी एक ऐंठ होती है। मैं जानता हूं लोग कैसे मिलते हैं। जिसको मिलना होता है वो मिल ही लेते हैं। त्रिपाठी जी किताब भूलों से भरी है लेकिन फिर भी हिंदी साहित्य जगत के कई पुरोधाओं ने, खासकर विश्वनाथ त्रिपाठी की विचारधारा के लोगों ने, इन सारी भूलों को नजरअंदाज करते हुए ऐसा माहौल बनाया जैसे कोई अप्रतिम पुस्तक लिख दी गई हो। नामवर सिंह ने तो इस पुस्तक को अपनी किताब दूसरी परंपरा की खोज से बेहतर बताया। अब सवाल यही से शुरू होते हैं। नामवर सिंह भी आचार्य द्विवेदी के काफी करीबी थे, उन्हें व्योमकेश दरवेश की गलतियां क्यों नहीं दिखाई दीं। क्यों नहीं हिंदी के अन्य विद्वानों ने व्योमकेश दरवेश पर उंगली उठाई।
इस स्तंभ में एक भयानक भूल की ओर 2014 में इशारा किया गया था। व्योमकेश दरवेश के पहले संस्करण में पृष्ठ संख्या 214 पर यशपाल और साहित्य अकादमी विवाद के संदर्भ में त्रिपाठी जी लिखते हैं  ‘यशपाल के विषय में विवाद हुआ ।कहते हैं कि दिनकर ने आपत्ति दर्ज की कि झूठा सच के लेखक ने किताब में जवाहरलाल नेहरू के लिए अपशब्दों का प्रयोग किया है ।नेहरू भारत के प्रधानमंत्री होने के साथ-साथ अकादमी के अध्यक्ष भी थे । नेहरू तक बात पहुंची हो या ना पहुंची हो, द्विवेदी जी पर दिनकर की धमकी का असर पड़ा होगा । भारत के सर्वाधिक लोकतांत्रिक नेता की अध्यक्षता और पंडित हजारीप्रसाद द्विवेदी के संयोजकत्व में यह हुआ । अगर यह सच है तो अकादमी के अध्यक्ष और हिंदी के संयोजक दोनों पर धब्बा है यह घटना और मेरे नगपति मेरे विशाल के लेखक को क्या कहा जाए जो अपने समय का सूर्य होने की घोषणा करता है। अब यहीं विश्वनाथ त्रिपाठी का दिनकर को लेकर पूर्वग्रह सामने आता है । जबकि यह पूरा प्रसंग ही इससे उलट है । डी एस राव की किताब फाइव डिकेड्स, अ शॉर्ट हिस्ट्री ऑफ साहित्य अकादमी के पृष्ठ संख्या 197 पर लिखा है  एक्जीक्यूटिव बोर्ड की बैठक में नेहरू ने जानना चाहा कि यशपाल के झूठा सच को अकादमी पुरस्कार क्यों नहीं मिला तो हिंदी के संयोजक हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा कि उसमें नेहरू जी को बुरा भला कहा गया है । नेहरू जी ने कहा कि पुरस्कार नहीं देने की ये कोई वजह नहीं होनी चाहिए । इसपर द्विवेदी जी ने जवाब दिया कि सिर्फ वही एकमात्र कारण नहीं था बल्कि और भी अन्य बेहतर किताबें पुरस्कार के लिए थी । अर्थात द्विवेदी जी ने यशपाल को साहित्य अकादमी पुरस्कार नहीं दिया । कालांतर में यह बात सुननियोजित तरीके से फैलाई गई कि इसके पीछे दिनकर थे लेकिन वो गलत तथ्य है । इस पूरे प्रसंग से यह साबित होता है कि विश्वनाथ त्रिपाठी या तो स्मरण दोष के शिकार हो गए या जानबूझकर दिनकर को बदनाम करने की साजिश के हिस्सा बने । अगर स्मरण दोष के शिकार हुए होते तो यह नहीं कहते- मेरे नगपति मेरे विशाल के लेखक को क्या कहा जाए जो अपने समय का सूर्य होने की घोषणा करता है। यह दिनकर पर व्यक्तिगत प्रहार था। दरअसल दिनकर अपने जीवन काल में लगातार वामपंथियों के निशाने पर रहे लेकिन चूंकि वो इतने बड़े पाए के लेखक थे कि आयातित विचारधारा के लेखक उनकी रचनात्मकता को प्रभावित नहीं कर सके। बाद मे जब व्योमकेश दरवेश का दूसरा संस्करण प्रकाशित हुआ तो दिनकर के प्रसंग में त्रिपाठी जी ने सक्रियता दिखाई और मुझे बताया गया है कि दिनकर का नाम और अपने समय का सूर्य वाली लाइन हटा दी गई है। अगर ये पंक्तियां हटा दी गई हैं तो यह मान लेना चाहिए कि त्रिपाठी जी ने दुर्भावनावश वो पंक्ति लिखी थी और तथ्य के सामने आने के बाद उसको हटा लेना उचित समझा।
व्योमकेश दरवेश को लेकर जो शोर शराबा मचाया गया, उसको जिस तरह से प्रचारित किया गया, उसको जितने पुरस्कार मिले वो सब अब सवालों के दायरे में है। हिंदी मे रचनाओं के पाठ और पुनर्पाठ की बहुत चर्चा होती है, अब वक्त आ गया है कि त्रिपाठी जी की इस कृति का पुनर्पाठ हो, भक्तिभाव की बजाए इस पुस्तक को तथ्यों की कसौटी पर फिर से कसा जाए। अगर अल्पना जी के दिए गए तथ्य सही हैं तो त्रिपाठी जी को या फिर उस पुस्तक के प्रकाशक को इन तथ्यों को सुधारने का उपक्रम किया जाना चाहिए क्योंकि इतिहास को बदल देना, या उसके साथ छेड़छाड़ करना आनेवाली पीढ़ियों के साथ छल करना है। पाखी को इस सार्थक चर्चा के आयोजन के लिए और चर्चा को दर्शन से हटाकर त्रिपाठी जी की पुस्तक पर लाकर अल्पना मिश्र को आगे करने के लिए प्रेम भारद्वाज की तारीफ की जानी चाहिए।