Translate

Tuesday, June 27, 2017

कल्पना और घटना का बोझिल कोलाज

हाल में अंग्रेजी की दो किताबें आईं है, जो अपने प्रकाशन के पूर्व से ही चर्चा में बनी हुई है। पहली किताब है अमीष त्रिपाठी की सीता, द वॉरियर ऑफ मिथिला और दूसरी किताब है बुकर पुरस्कार से सम्मानित मशहूर लेखिका अरुंधति राय का उपन्यास द मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैप्पीनेस। इन दोनों पुस्तकों के प्रकाशन के पूर्व अंग्रेजी मीडिया ने पाठकों के बीच इसको लेकर जबरदस्त उत्सुकता का वातावरण बनाया। लेखकों के साक्षात्कार से लेकर सोशल मीडिया पर इसको हिट करवाने की तरकीब का भी इस्तेमाल किया गया। नतीजा सामने है। दोनों पुस्तकें धड़ाधड़ बिक रही हैं। अमीष त्रिपाठी का अपना एक अलग पाठक वर्ग है और खास विषय है तो अरुंधति ने पिछले दो दशकों में अपने एक्टिविज्म से एक अलग ही तरह का वैश्विक पाठक वर्ग तैयार किया है। अरुंधति राय का पहला उपन्यास गॉड ऑफ स्माल थिंग्स उन्नीस सौ सत्तानवे में आया था, जिसपर उन्हें बुकर पुरस्कार मिला था। यह भारत में रहकर लेखन करनेवाले किसी लेखक को पहला बुकर था। गॉड ऑफ स्माल थिंग्स के प्रकाशन के बीस साल बाद अरुंधति का दूसरा उपन्यास आया है। पूरी दुनिया में अरुंधति के इस उपन्यास का इंतजार था, भारत में भी उनके पाठकों को । दो उपन्यासों के प्रकाशन के अंतराल के बीच अरुंधति ने कश्मीर समस्या, नक्सल समस्या, भारतीय जनता पार्टी खासकर नरेन्द्र मोदी के उभार पर बहुत मुखरता से अपने विचार रखे। इनका विरोध भी हुआ और उनके इस तेवर ने ही उनको वैश्विक स्तर पर एक विचारक के रूप में मान्यता भी दिलाई । अरुंधति का अपना एक पक्ष है, उनके अपने तर्क हैं, जिससे सहमति या असहमति एक अलहदा मुद्दा है लेकिन वो विचारोत्तेजक अवश्य है। जितनी मुखरता से वो भारत की उपरोक्त समस्याओं पर अपने विचारों को प्रकट करती रही हैं, तो यह लाजमी था कि ये सब विचार किसी ना किसी रूप में उनके उपन्यास में आएं। आए भी हैं। द मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैप्पीनेस के पात्रों की पृष्ठभूमि इन्हीं इलाकों से है। पात्रों के संवाग के केंद्र में भी बहुधा इन समस्याओं को लेखिका जगह देती चलती हैं।
अरुंधति का यह उपन्यास द मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैप्पीनेस बेहद रोचक तरीके से शुरू होता है । शुरुआत एक लड़के की कहानी से होती है कि किस तरह से उसके अंदर स्त्रैण गुण होता है और अंतत; वो किन्नरों के समूह में शामिल हो जाता है। यहां भी जो संवाद है उसमें अरुंधति का एक्टिविस्ट उनके लेखक पर हावी दिखता है । किन्नरों के बीच के संवाद में यह कहा जाता है कि दंगे हमारे अंदर हैं, जंग हमारे अंदर है, भारत-पाकिस्तान हमारे अंदर है आदि आदि। लेकिन कहानी जैसे जैसे आगे बढ़ती है तो लेखक पर एक्टिविस्ट पूरी तरह से हावी हो जाता है। फिक्शन की आड़ लेकर जब अरुंधति कश्मीर के परिवेश में घुसती हैं तो उनकी भाषा बेहद तल्ख हो जाती है, बहुधा फिक्शन की परिधि को लांघते हुए वो अपने सिद्धांतों को सामने रखती नजर आती हैं। कश्मीर के हालात और कश्मीरियों के दुखों का विवरण देते हुए वो पाठकों को उस भाषा से साक्षात्कार करवाती हैं जिस भाषा से कोफ्त हो सकती है क्योंकि पाठक फिक्शन समझ कर इस पुस्तक को पढ़ रहा होता है। कश्मीर के परिवेश की भयावहता का वर्णन करते हुए वो लिखती हैं – मौत हर जगह है, मौत ही सबकुछ है, करियर, इच्छा, कविता, प्यार मोहब्बत सब मौत है। मौत ही जीने की नई राह है । जैसे जैसे कश्मीर में जंग बढ़ रही है वैसे वैसे कब्रगाह भी उसी तरह से बढ़ रहे हैं जैसे महानगरों में मल्टी लेवल पार्किंग बढ़ते जा रहे हैं। इस तरह की भाषा बहुधा वैचारिक पुस्तकों या लेखों में पढ़ने को मिलती है।
अरुंधति का यह उपन्यास, दरअसल, कई पात्रों की कहानियों का कोलाज है। शुरुआत होती है अंजुम के किन्नर समुदाय में शामिल होने से। उसके बाद कई कहानियां एक के बाद एक पाठकों के सामने खुलती जाती हैं। केरल की महिला तिलोत्तमा की कहानी जो अपनी सीरियन क्रश्चियन मां से अलग होकर दुनिया को अपनी नजरों से देखती है। इस पात्र को देखकर अरुंधति के पहले उपन्यास गॉड ऑफ स्माल थिंग्स की ममाची की याद आ जाती है क्योंकि दोनों पात्र रंगरूप से लेकर हावभाव और परिवेश तक में एक है। इसके साथ ही शुरू होती है एक और दास्तां जो तीन लोगों के इर्द गिर्द घूमती है। एक है सरकारी अफसर बिप्लब दासगुप्ता जो जमकर शराब पीता है, और कश्मीर में पदस्थापित है। एक पत्रकार और एक कश्मीरी । उपन्यास में अरुंधति ने बताया है कि किस तरह परिस्थियों के चलते ये कश्मीरी युवक आतंकवादी बन जाता है। यही युवक तिलोत्तमा को कश्मीर की हालात से परिचित कराता है। यहां पर एक बार फिर से संवाद के दौर में कश्मीर की ऐतिहासिकता को लेकर अरुंधति के विचार प्रबल होने लगते हैं । पाठकों पर जब इस तरह के विचार लादने की कोशिश होती है तो उपन्यास बोझिल होने लगता है । वैचारिकी अरुंधति की ताकत हैं और इस उपन्यास में वो इसको मौका मिलते ही उड़ेलने लगती हैं । कुल मिलाकर अगर हम देखें तो अरुंधति के भक्त पाठकों को यह उपन्यास भा सकता है लेकिन फिक्शन पढ़ने वालों को निराशा हाथ लगेगी

Monday, June 26, 2017

दिखने लगा मेक इन इंडिया का असर

आज से तीन साल पहले जब नरेन्द्र मोदी ने देश की कमान संभाली थी तब उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी चलता है एटीट्यूड के भंवर जाल से देश को बाहर निकालना। घोटालों में फंसी यूपीए सरकार की वजह से प्रशासन लगभग फैसले लेने में हिचकने लगा था। ऐसे माहौल में फैसले लेने वाली सरकार के तौर पर एनडीए सरकार की छवि निर्माण का मुद्दा भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सामने था।  इन दो चुनौतियों के अलावा जो सबसे बड़ी चुनौती थी वो थी देश के युवाओं के लिए रोजगार के अवसर मुहैया करवाना। दो हजार तेरह चौदह में देश में निवेश का माहौल नहीं होने की वजह से विदेशी पूंजी उस रफ्तार से नहीं आ पा रही थी जिसकी दरकार एक विकासशील देश होने के नेता हमें थी। प्रधानमंत्री मोदी ने मेक इन इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, स्टैंडअप इंडिया जैसे कार्यक्रमों की शुरुआत करके विदेशी पूंजी को आमंत्रित करने का काम शुरू किया। रक्षा उतपादन के क्षेत्र में भी निजी निवेश को बढ़ावा देने के लिए विदेशी निवेश की सीमा बढ़ा दी गई।  मेक इन इंडिया का एक बड़ा उद्देश्य यह था कि विदेशी धरती पर बनने वाले साजो समान भारत की धरती पर बनें ताकि यहां के लोगों को रोजगार मिल सके। ज्यादातर कंपनियां हमारे पड़ोसी देश चीन में अपना बेस बनाकर बैठी थीं और वहां सस्ते श्रम और कम लालफीताशाही की वजह से प्रोडक्शन कर मुनाफा कमाती थी। प्रधानमंत्री मोदी ने जब मेक इंडिया कार्यक्रम की शुरुआत की थी तो एक उद्देश्य युवाओं के लिए रोजगार के अवसर उपलब्ध करवाने का भी था। यही उद्देश्य स्टार्टअप इंडिया का भी था।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इन कार्यक्रमों की वजह से देश में अलग अलग सेक्टर में रोजगार के अवसर उपलब्ध हुए भी, जिसकी पुष्टि हाल ही में जारी संयुक्त राष्ट्र की संस्था इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन ने भी की है। इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत ने दो हजार सोलह में रोजगार के ज्यादा अवसर पैदा किए। रिपोर्ट के मुताबिक दक्षिण एशिया में जो करीब एक करोड़ चौतीस लाख नए रोजगार दिए गए उनमें से ज्यादातर भारत में ही दिए गए। इस रिपोर्ट में ये भी माना गया है कि भारत की सात दशमलव छह फीसदी की विकास दर की वजह से ही दक्षिण एशिया की विकास दर छह दशमलव आठ फीसदी पर कायम रह पाई। यूएन की इस संस्था की रिपोर्ट में भारत को लेकर कई उत्साहजनक बातें कही गई हैं। इस तरह से अगर हम देखें तो इतना तो कहा ही जा सकता है कि भारत में रोजगार के ज्यादा अवसर पैदा होने लगे हैं। आईएलओ की इसी रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि भारत में दो हजार सत्रह और दो हजार अठारह में बेरोजगारी में मामूली बढ़ोतरी होगी । इनके आंकलन के मुताबिक दो हजार सत्रह में 17.8 मिलियन से बढ़कर दो हजार अठारह में अठारह मिलियन पहुंचने का अनुमान है। इस मामूली वृद्धि को भी रोजगार के नए अवसर पैदा करने के नतीजे के तौर पर देखा जाना चाहिए अन्यथा वैश्विक बेरोजगारी में वृद्धि की दर लगभग पांच फीसदी प्रतिवर्ष है। बेरोजगारी को उसके औसत वृद्धि से कम दर पर रोकना भी तभी संभव होता है जब रोजगार के नए अवसर पैदा किए जाएं।
मोदी सरकार के तीन साल पूरे होने पर विपक्ष ने सरकार पर जो आरोप लगाए उनमें बढ़ी बेरोजगारी भी एक है। बेरोजगारी एक ऐसा कारतूस है जिसको किसी भी तरह के गन में फिट किया जा सकता है और किसी भी टारगेट पर फायर किया जा सकता है। सफलता की उम्मीद भी की जा सकती है। बेरोजगारी एक मसला नहीं है जिसका हल पलक झपकते हो जाए। इसके लिए दीर्घकालीन योजनाएं बनानी पड़ती हैं और इन योजनाओं को जमीन पर उतारने में वक्त भी लगता है। मेक इन इंडिया कार्यक्रम को शुरु हुए अभी सिर्फ तीन साल हुए हैं। तमाम विदेशी कंपनियां भारत में अपने प्रोडक्ट को बनाने के लिए तैयार हैं, बल्कि कइयों ने तो उत्पादन शुरू कर दिया है। चीन की मोबाइल कंपनी से लेकर एप्पल तक ने भारत में अपना काम काज शुरू कर दिया है। अब जाकर इसके ठोस नतीजे दिखाई देने लगे हैं जिसका व्यापक असर आनेवाले दिनों में और दिखाई देगा। हाल ही में अमेरिकी फाइटर प्लेन एफ 16 बनाने वाली कंपनी ने टाटा के साथ करार किया है। अमेरिकी कंपनी लाकहीड मार्टिन अब भारत में टाटा एडवांस डिफेंस सिस्टम लिमिटेड के साथ मिलकर एफ 16 का उत्पादन करेगी। रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में ये करार बेहद अहम माना जा रहा है। एक तो इससे हमारे देश की रक्षा के क्षेत्र में दूसरे पर निर्भरता कम होगी और आयात निर्यात का संतुलन भी बेहतर होगा। इस वक्त दुनिया के छब्बीस देश एफ 16 फाइटर प्लेन का उपयोग अपनी रक्षा सेवाओं में करते हैं। भारत में इसके उत्पादन के शुरू होने से इन देशों को फाइटर प्लेन की स्पलाई यहां से भी संभव हो सकेगी। अब अगर ज्यादा उत्पादन होगा तो प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों रूप में स्थनीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। इसी तरह से राफेल और एडीएजी की रिलायंस डिफेंस में जिस तरह क करार हुआ है वह भी बेहद उत्साहवर्धक है। इस डील से भी ना केवल लोकल प्रोडक्शन होगा बल्कि रोजगार भी बढ़ेंगे।

तीन साल क बाद अब जिस तरह के संकेत मिल रहे हैं उससे विपक्षी दलों समेत देश की जनता के सामने यह तस्वीर उभरनी शुरू हो गई है कि मौजूदा सरकार देश में बेरोगारी खत्म करने के लिए गंभीरता से प्रयासरत है। जीएसटी के लागू होने के बाद एक बार फिर से विदेशी निवेशकों का देश की अर्थव्यवस्था में भरोसा बढ़ेगा क्योंकि कर के मकड़जाल से उनको मुक्ति मिलेगी। वह स्थिति भी बेरोजगारी को रोकने में मददगार होगी। 

Saturday, June 24, 2017

संस्थाओं को खत्म करने की कवायद!

अब से करीब तीन साल पहले मई, दो हजार चौदह में जब केंद्र में नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में सरकार बनी थी तो उन्होंने कई प्रयोग किए। कई संस्थाओं के नाम से लेकर उसके काम काज में भी आमूल-चूल परिवर्तन किए गए। ऐसी ही एक संस्था थी योजना आयोग। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने योजना आयोग का पुनर्गठन करते हुए उसका नाम बदलकर नीति आयोग कर दिया और टीम इंडिया की अवधारणा को मजबूत करने के लिहाज से उसके कामकाज में भी बदलाव किए गए। जाहिर सी बात है नीति आयोग की टीम में भी नए चेहरों को जगह दी गई। इस बात पर भी जोर था कि लालफीताशाही को हतोत्साहित किया जाए और देश को मजबूत करने की दिशा में ठोस नीतियां बनाकर उनका किय्रान्वयन किया जाए। यह एक बहुत ही अच्छी सोच थी जिसका अमूमन हर तरफ स्वागत ही हुआ था। शुरुआत में नीति आयोग ने बेहतर तरीके से काम भी किया, अब भी कर रहे होंगे लेकिन हाल के दिनों में नीति आयोग ने कुछ विवादास्पद सुझाव देकर सरकार को बैकफुट पर जाने को मजबूर कर दिया। कुछ दिनों पहले नीति आयोग ने कृषि पर कर लगाने का प्रस्ताव देकर सरकार की किरकिरी करवा दी थी। नीति आयोग के सदस्य बिबेक देबरॉय ने आयोग की एक बैठक में किसानों को खेती से होनेवाली आय पर टैक्स लगाने का सुझाव दिया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में हुई नीति आयोग की इस बैठक में बिबेक देबरॉय ने तीन साल की कार्ययोजना को पेश करते समय कृषि से होनेवाली आय को आयकर के दायरे में लाने की वकालत की। बिबेक देबरॉय ने कहा था कि आयकर का दायरा बढ़ाने का यह एक तरीका हो सकता है। बिबेक ने तमाम तरह के आयकर कानूनों का हवाला देते हुए अपना पक्ष रखा था। नीति आयोग के विजन डॉक्यूमेंट में एक हेडर है- इनकम टैक्स ऑन एग्रिकल्चर इनकम जो कहता है कि अभी खेती से होनेवाली आय में हर तरह की ठूट मिली है चाहे किसानों को कितनी भी आय हो। जबकि कृषि से होनेवाली आय में छूट देने का उद्देश्य किसानों को संरक्षण देना था। कभी कभार इस छूट का बेजा इस्तेमाल भी होता है और खेती के अलावा अन्य आय को भी कृषि आय के रूप में दिखाकर टैक्स में छूट हासिल किया जाता है। काले धन की समस्या से निबटने के लिए इस तरह के चोर दरवाजों को बंद करना होगा। नीति आयोग के सदस्य बिबेक देबरॉय के इस बयान के बाहर आते ही पूरे देश में हंगामा मच गया। किसानों का मुद्दा हमेशा से हमारे देश में संवेदनशील रहा है सरकार की किरकिरी होते देख वित्त मंत्री अरुण जेटली ने स्वयं मोर्चा संभाला और साफ कर दिया कि सरकार का कृषि से होनेवाली आय को कर के दायरे में लाने का कोई इरादा नहीं है । वित्त मंत्री अरुण जेटली के बयान के अड़तालीस घंटे भी नहीं बीते थे कि केंद्र सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम ने भी खेती पर टैक्स की बात कहकर सरकार को फिर धर्मसंकट में डाल दिया था। खेती से होनेवाली आय पर टैक्स लगाने के नीति आयोग के प्रस्ताव को लेकर घिरी सरकार अभी संभली भी नहीं थी कि नीति आयोग ने एक और सुझाव दे डाला जिसपर सरकार ने अमल करना भी शुरु कर दिया है।
यह सुझाव है कई मंत्रालयों के अंतर्गत काम कर रही स्वायत्त संस्थाओं के अलग अलग संस्थाओं में विलय करने का और कुछ संस्थाओं को कंपनी की तरह बनाने का। नीति आयोग ने कुछ छह सौ उनासी संस्थाओं को चिन्हित किया है जिन्हें चरणबद्ध तरीके से पुनर्गठन के नाम पर अलग अलग संस्थाओं में मिलाकर नई पहचान देने का काम शुरू किया जा चुका है। पहले चरण में उन स्वायत्त संस्थाओं को चिन्हित किया गया है जो सोसाइटीज एक्ट के तहत निबंधित होकर काम करते हैं । सुझाव है कि भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद, इंडियन काउंसिल ऑफ फिलॉसफिकल रिसर्च और  इंडियन काउंसिल ऑफ सोशल साइंस रिसर्च को एक साथ मिलाकर एक नई संस्था का गठन किया जाए या फिर इन सबको जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के साथ विलय कर दिया जाए। इसी तरह से सिंधी भाषा के प्रचार प्रसार के लिए बनी संस्था नेशनल काउंसिल फॉर प्रमोशन ऑफ सिंधी लैंग्वेज को मैसूर से सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ लैंग्लेज के साथ और उर्दू के विकास के लिए गठित नेशनल काउंसिल ऑफ प्रमोशन ऑफ उर्दू को जामिया मीलिया या मौलाना आजाद उर्दू विश्वविद्यालय के साथ जोड़ दिया जाए। अब तक करीब चालीस संस्थाओं के विलय या उसको बंद करने पर काम शुरू हो चुका है। नीति आयोग के सुझावों के मुताबिक पुणे की फिल्म और टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया और सत्जित राय फिल्म और टेलीविजन संस्थान को मिलाकर एक कर देने का। इसी तरह से देश की प्रतिष्ठित पत्रकारिता संस्थान इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन को जामिया मीलिया यूनिवर्सिटी या जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के साथ विलय का प्रस्ताव है। तर्क ये दिए जा रहे हैं कि जिन छह सौ उनासी स्वायत्त संस्थाओं को चिन्हित किया गया है उनपर बहत्तर हजार करोड़ का खर्च हो रहा है । एक तर्क यह भी है कि इनमें से कई संस्थाएं एक ही तरह के काम कर रही हैं, लिहाजा उनका विलय जरूरी है। इस प्रस्ताव पर काफी तेजी से काम हो रहा है और इन संस्थाओं को आपत्तियां भेजने की खानापूरी करने को भी कहा गया है। जब ये संस्थाएं आपत्ति भेज रही हैं तो उनको कहा जा रहा है कि विलय की तैयारी करिए। पुनर्गठन या फिर वित्तीय अनुशासन बहाल करने के नामपर यह प्रस्ताव देखने में अवश्य अच्छा लगता है लेकिन इसके नतीजे बहुत गंभीर होने वाले हैं।
इस वर्ष केंद्र सरकार दीन दयाल उपाध्याय की जन्मशती वर्ष मना रही है और उनके सिद्धातों को, उनके विचारों को फैलाने का काम भी कर रही है। दीनदयाल उपाध्याय जी की पूरी सैद्धांतिकी विकेन्द्रकरण को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से बढ़ावा देती है। पंडित जी के जन्मशती वर्ष में बजाए विकेन्द्रीकरण को बढ़ावा देने के ये सरकार केंद्रीकरण को बढ़ावा दे रही है। इसपर ध्यान देने की जरूरत है। आश्चर्य की बात है कि स्वायत्त संस्थाओं को मजबूत करने के नाम पर इनका व्यावसायीकरण करने की योजना परवान चढ़ाई जा रही है और हमारा बौद्धिक वर्ग खामोश है। पहले इस तरह की कई संस्थाओं को अपने खर्च का तीस फीसदी खुद से जुटाने का आदेश दिया गया था और अब उनके सामने अस्तित्व का संकट खड़ा किया जा रहा है।
अब अगर हम एक दो उदाहरण से इस प्रस्ताव की खामियों को समझने की कोशिश करें तो वो खतरे साफ हो जाते हैं। केंद्रीय हिंदी संस्थान को संभवत: इलाहाबाद विश्वविद्यालय या काशी हिंदू विश्वविद्यालय में विलय करने का विकल्प दिया गया है। इस संस्था को कमजोर कर सरकार हिंदी के साथ चाहे अनचाहे अन्याय कर रही है। यह संस्थान हिंदी के विकास और प्रचार प्रसार के लिए गंभीरता से काम कर रही है। यहां प्रतिवर्ष बयालीस देशों के दो सौ छात्र हिंदी सीखते हैं जो अपने अपने देश में जाकर हिंदी का प्रचार प्रसार करने में सहयोग करते हैं। इस संस्थान में गैर हिंदी प्रदेशों के शिक्षकों को प्रशिक्षित किया जाता है। ये संस्था अनुवादकों को तैयार करती है। इसी तरह से एक और संस्थान है, केंद्रीय हिंदी निदेशालय, यह संस्था भी अपने प्रकाशनों और आयोजनों से हिंदी को समृद्ध कर रही है। अब इनको उन विश्वविद्यालयों के साथ जोड़ने की बात की जा रही है जो खुद जांच के दायरे में है। इनमें से कई विश्वविद्यालयों को मंत्रालय लगभग निकम्मा या बदतर परफार्मेंस करनेवाले की श्रेणी में रखती है। अगर विश्वविद्यालयों के साथ इन संस्थानों को जोड़ दिया तो ये भी उसी तरह की संस्कृति के शिकार हो जाएंगे।

सरकार को अपने लोक कल्याणकारी स्वरूप को नहीं भूलना चाहिए। किसी भी संस्था को बनाना बहुत मुश्किल होता है और उसको खत्म करने में ज्यादा वक्त नहीं लगता है। जब इन संस्थाओं का गठन किया गया था तब से लेकर अबतक इनमें जो काम हुआ है उसका ऑडिट होना चाहिए। उसके बाद ही किसी तरह का फैसला होना चाहिए। अगर इन संस्थाओं में संतोषजनक काम नहीं हुआ तो उसके लिए कोशिश करनी चाहिए। संस्थाओं को खत्म कर देने से कुछ हजार करोड़ रुपए की बचत हो सकती है लेकिन उससे जो भाषा, कला और संस्कृति को नुकसान होगा उसका आंकलन नीति आयोग के अफसर नहीं कर सकते। वैसे भी अगर देखा जाए तो भाषा के लिए काम रही संस्थाओं पर सरकार प्रतिवर्ष, एक अनुमान के मुताबिक, चार सौ करोड़ ही खर्च करती है। इन संस्थाओं को कंपनियों में बदलकर उनसे मुनाफे की अपेक्षा नहीं की जा सकती है क्योंकि ये जो काम कर रही हैं उसको नफे नुकसान के पैमाने पर मापा नहीं जा सकता है। 

Monday, June 19, 2017

राहुल से हो पाएगा क्या?

पिछले तीन चार सालों से नियमित अंतराल पर इस बात के कयास लगते रहे हैं कि कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी को पार्टी की कमान सौंपी जाने वाली है। सोनिया गांधी की बीमारी के बाद कयास का अंतराल कम होता चला गया है। जब भी कांग्रेस के सामने किसी तरह की क्राइसिस या राजनीति का अहम पड़ाव आता है तो इस तरह की खबरें आने लगती हैं कि राहुल गांधी के पार्टी के अध्यक्ष के तौर पर ताजपोशी अमुक वक्त तक हो जाएगी। पर अबतक ऐसा हो नहीं पाया है। अभी हाल ही में राष्ट्रपति चुनाव को लेकर रणनीति बनाने के लिए कांग्रेस के तमाम आला नेता जब सोनिया गांधी की अध्यक्षता में बैठे तो एक बार फिर से इस बात के कयास लगने लगे कि राहुल गांधी को पार्टी की रहनुमाई सौंप दी जाएगी। पिछले साल सात नवंबर को कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में इस बात पर जमकर चर्चा हुई थी कि राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी संभालनी चाहिए। कार्यसमिति के ज्यादातर सदस्य इस पक्ष में थे भी लेकिन तब दिग्विजय सिंह ने कहा था कि सोनिया गांधी की अनुपस्थिति में इस तरह का कोई फैसला लेना उचित नहीं था। गौरतलब है कि उस वक्त सोनिया गांधी तबीयत खराब होने की वजह से उक्त बैठक में शामिल नहीं हो पाई थी।
इस साल के अंत तक कांग्रेस पार्टी में संगठनात्मक चुनाव होने हैं। राहुल गांधी को पार्टी अध्यक्ष पद सौंपने की एक बार फिर से तैयारी शुरू हो गई है। कयासबाजी भी। अब सवाल यही है कि राहुल गांधी कांग्रेस पद की जिम्मेदारी से भाग रहे हैं या फिर पार्टी में उनकी ताजपोशी को लेकर दो मत हैं। पार्टी से जुड़े कुछ नेताओं का दावा है कि राहुल गांधी लोकतांत्रिक तरीके से चुनकर पार्टी अध्यक्ष बनना चाहते हैं जबकि ज्यादातर नेता चाहते हैं कि कांग्रेस कार्यसमिति राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष नामित कर दे और फिर उसके बाद राष्ट्रीय अधिवेशन में उनके नाम पर मुहर लग जाए। यह तो वो बातें हैं जो सिद्धांत रूप से सामने आने पर अच्छी लगती हैं लेकिन इसके अलावा भी उनके अध्यक्ष बनने में एक पेंच है। वो पेंच है पार्टी के वो नेता जो सोनिया गांधी की पीढ़ी के हैं। वो चाहते हैं कि मौजूदा व्यवस्था ही चलते रहे जिसते तहत पार्टी के बारे में अंतिम फैसला लेने का हक सोनिया गांधी के हाथ में ही रहे और राहुल गांधी उपाध्यक्ष के तौर पर काम करते रहे। उनके तर्क हैं कि सोनिया गांधी के नेतृत्व में विपक्ष एकजुट हो सकता है लेकिन नीतीश और ममता बनर्जी जैसे दिग्गजों को राहुल गांधी का नेतृत्व मंजूर ना हो। इस तरह के तर्क देकर राहुल गांधी की ताजपोशी में फच्चर फंसाया जाता रहा है ।

देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस इस वक्त उस दौर से गुजर रही है जहां नेतृत्व को लेकर नेताओं से लेकर कार्यकर्ताओं तक में एक भ्रम और उलझन लक्षित किया जा सकता है । सोनिया के नेपथ्य में रहने की वजह से पुरानी पीढ़ी के नेता स्वत: परिधि पर चले गए थे और राहुल गांधी के आसपास के नेता पार्टी के केंद्र में दिखाई देने लगे थे । यह संसद और उसके बाहर दोनों जगह पर साफ तौर पर देखा जा सकता था । सोनिया के नेपथ्य में जाने के बावजूद उनके इर्दगिर्द के नेता भले ही पृष्ठभूमि में चले गए हों लेकिन उनकी ताकत कम नहीं हुई थी । ये जरूर हुआ कि राहुल गांधी के नजदीकी नेताओं का भाव बढ़ गया । इस परिस्थिति में पार्टी के फैसलों और नेताओं के बयान में एकरूपता नहीं दिखाई देती है । कुछ नेताओं का मानना है कि राहुल गांधी जब नोटबंदी का विरोध कर रहे थे और धीरे-धीरे अन्य विपक्षी दलों के नेता उनके साथ आते दिख रहे थे वैसे में राहुल गांधी बगैर सबको विश्वास में लिए प्रधानमंत्री मिलकर विपक्षी एकता के प्रयासों को झटका दे गया । दरअसल अगर हम देखें तो दो हजार नौ के लोकसभा चुनाव के बाद ही राहुल गांधी को कमान सौपने की मांग के बाद से यह भ्रम की स्थिति बनी हुई है । इस भ्रम ने दो हजार चौदह के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की लुटिया डुबोई थी । सात आठ साल से यह स्थित बनी हुई है और एक के बाद एक चुनाव हारने के बाद यह और बढ़ता चला जा रहा है । नेतृत्व में भ्रम की वजह से पार्टी का कोई सीधा रास्ता नहीं बन पा रहा है जिसपर चला जा सके।
दो हजार उन्नीस का आमचुनाव अब आ ही चला है । एक तरह से देखें तो उसमें डेढ साल का वक्त बचा है क्योंकि छह महीने पहले से तो आचार संहिता आदि लगा दी जाती है। अब वक्त कांग्रेस के हाथ से लगभग निकल चुका है। य़ूपी चुनाव के बाद तो जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री ओमर अबदुल्ला ने कह ही दिया था कि अब दो हजार चौबीस की तैयारी करनी चाहिए। दरअसल अगर कांग्रेस अब भी राहुल गांधी के हाथ में कमान सौंपती है तो उनके अबतक के अप्रोच को देखकर लगता नहीं है कि वो बहुत गंभीरता से इस जिम्मेदारी को निभा ले जाएंगे। पहले ही कई बार कहा जा चुका है कि राजनीति चौबीस घंटे का काम है इसको कैजुअल तरीके से नहीं किया जा सकता है। अब जब देश में किसान अपनी समस्या को लेकर उग्र हो रहे हैं तो राहुल गांधी इटली चले गए हैं और पार्टी में फिर से सभी नेता हो गए हैं। अगर कांग्रेस को 2019 की लड़ाई में बने भी रहना है तो राहुल गांधी को कमान फौरन सौंपनी होगी और राहुल बाबा को भी खालिस राजनेता की भूमिका में उतरना होगा क्योंकि उनका मुकाबला अमित शाह जैसे मेहनती अध्यक्ष से है।


Saturday, June 17, 2017

पाठकीयता के भूगोल का हो विस्तार

इन दिनों हिंदी पर खूब बातें हो रही हैं लेकिन हिंदी को लेकर जितनी गंभीरता से कोशिश होनी चाहिए उतनी कोशिश हो नहीं रही है। छात्रों तक हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए जिस तरह के उद्यम की जरूरत है उतना हो नहीं पा रहा है। स्कूली बोर्ड में हिंदी में फेल होनेवाले छात्रों की संख्या बढ़ रही है। अंग्रेजी स्कूलों में हिंदी को लेकर खास उत्साह नहीं होता है, माता पिता भी चाहते हैं कि उनके बच्चे फर्राटेदार अंग्रेजी बोलें। इसमें अभिभावकों का भी दोष नहीं है। आजादी के सत्तर साल बाद भी हमारे गणतंत्र में अबतक हिंदी को रोजगार की भाषा नहीं बनाया जा सका है। भाषा को लेकर, उसके संवर्धन को लेकर, उसके भूगोल के विस्तार को लेकर जितना काम होना चाहिए उतना हो नहीं पा रहा है। इसपर से बोलियों को हिंदी से अलग करने की कोशिशें भी शुरू हो गई हैं। कई बोलियां को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने का आंदोलन चलाया जा रहा है। बोलियों की अस्मिता जैसे भावनात्मक जुमले गढ़े जा रहे हैं । बोलियों को अलग करने को लेकर चल रही मुहिम ने हिंदी के सामने एक अलग तरह का संकट खड़ा कर दिया है। हिंदी भाषियों को बोलियों के नाम पर बांटने की कोशिशें शुरू हो गई है। ऐसे माहौल में साहित्य में नई वाली हिंदी की बातें जोर पकड़ने लगी है । ऐसी किताबें प्रकाशित की जाने लगी हैं जिसकी मार्केटिंग के लिए इस नई वाली हिंदी का सहारा लिया जा रहा है । इस नई वाली हिंदी में बोलचाल की भाषा को जस का तस रखा गया है । इसका नतीजा यह हुआ है कि कई किताबों में आधे आधे पन्ने अंग्रेजी में लिखे जा रहे हैं और नई वाली हिंदी के नाम पर छप भी रहे हैं। उसपर हिंदी में लहालोट होनेवालों की भी कोई कमी नहीं है लेकिन इस बात पर गंभीरता से विचार होना चाहिए कि इससे भाषा का कितना नुकसान या फायदा हो रहा है।  
इसको कई बार भाषा के विस्तार के तौर पर भी समझ लिया जाता है । एक खास आयुवर्ग के समाज पर लिखते वक्त अगर बोलचाल की भाषा को जस का तस रख दिया जाता है और तर्क यह दिया जाता है कि इससे पाठकीयता बढ़ती है। इस नतीजे पर पता नहीं कैसे पहुंच जाते हैं क्योंकि ऐसा कोई सर्वेक्षण आदि अभी हुआ नहीं है।
दरअसल साहित्य और पाठकीयता,यह विषय बहुत गंभीर है और उतनी ही गंभीर मंथन की मांग करता है । आजादी के पहले हिंदी में दस प्रकाशक भी नहीं थे और इस वक्त एक अनुमान के मुताबिक तीन सौ से ज्यादा प्रकाशक साहित्यक कृतियां छाप रहे हैं । प्रकाशन जगत के जानकारों के मुताबिक हर साल हिंदी की करीब दो से ढाई हजार साहित्यक किताबें छपती हैं । अगर पाठक नहीं हैं तो किताबें छपती क्यों है । यह एक बड़ा सवाल है जिससे टकराने के लिए ना तो लेखक तैयार हैं और ना ही प्रकाशक । क्या लेखक और प्रकाशक ने अपना पाठक वर्ग तैयार करने के लिए कोई उपाय किया । हम साठ से लेकर अस्सी के दशक को देखें तो उस वक्त पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस ने हमारे देश में एक पाठक वर्ग तैयार करने में अहम भूमिका निभाई । पीपीएच ने उन दिनों एक खास विचारधारा की किताबों को छाप कर सस्ते में बेचना शुरू किया । हर छोटे से लेकर बड़े शहर तक रूस के लेखकों की किताबें सहज, सस्ता और हिंदी में उपलब्ध होती थी । हिंदी के प्रकाशकों को उनसे सीखना चाहिए। उसके इस प्रयास से हिंदी में एक विशाल पाठक वर्ग तैयार हुआ । सोवियत रूस के विघटन के बाद जब पीपीएच की शाखाएं बंद होने लगीं तो ना तो हिंदी के लेखकों ने और ना ही हिंदी के प्रकाशकों ने उस खाली जगह को भरने की कोशिश की । फॉर्मूलाबद्ध रचनाओं ने पाठकों को निराश किया । नई सोच और नए विचार सामने नहीं आ पाए । यह प्रश्न उठ सकता है कि इससे पाठकीयता का क्या लेना देना है । संभव है कि इस प्रसंग का पाठकीयता से प्रत्यक्ष संबंध नहीं हो लेकिन इसने परोक्ष रूप से पाठकीयता के विस्तार को बाधित किया है । अगर किसी ने विचारधारा के दायरे से बाहर जाकर विषय उठाए तो उसे हतोत्साहित किया गया । नतीजा यह हुआ कि साहित्य से नवीन विषय छूटते चले गए और पाठक एक ही विषय को बार बार पढ़कर उबते से चले गए । विषयों की विविधता की कनी ने भी पाठकों को निराश किया। 
दरअसल नए जमाने के पाठक बेहद मुखर और अपनी रुचि को हासिल करने के बेताब हैं । नए पाठक इस बात का भी ख्याल रख रहे हैं कि वो किस प्लेटफॉर्म पर कोई रचना पढ़ेंगे । अगर अब गंभीरता से पाठकों की बदलती आदत पर विचार करें तो पाते हैं कि उनमें काफी बदलाव आया है । पहले पाठक सुबह उठकर अखबार का इंतजार करता था और आते ही उसको पढ़ता था लेकिन अब एक वर् ऐसा है जो अखबार के आने का इंताजर नहीं करता है । खबरें पहले जान लेना चाहता है । खबरों के विस्तार की रुचिवाले पाठक अखबार अवश्य देखते हैं । खबरों को जानने की चाहत उससे इंटरनेट सर्फ करवाता है । इसी तरह से पहले पाठक किताबों का इंतजार करता था । किताबों की दुकानें खत्म होते चले जाने और इंटरनेट पर कृतियों की उपलब्धता बढ़ने से पाठकों ने इस प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करना शुरू किया । हो सकता है कि अभी किंडल और आई फोन या आई पैड पर पाठकों की संख्या कम दिखाई दे लेकिन जैसे जैसे देश में इंटरनेटका घनत्व बढ़ेगा वैसे वैसे पाठकों की इस प्लेटफॉर्म पर संख्या बढ़ सकती है । हलांलकि विदेशों में ई बुक्स को लेकर होनेवाले सर्वे के नतीजे उत्साहजनक नहीं हैं।
अगर संपूर्णता में विचार करें तो पाठकीयता के बढ़ने घटने के लिए कई कड़ियां जिम्मेदार हैं । पाठकीयता को एक व्यापक संदर्भ में देखें तो इसके लिए कोई एक चीज जिम्मेदार नहीं है इसका एक पूरा ईकोसिस्टम है । जिसमें सरकार, टेलीकॉम, सर्च इंजन, लेखक, डिवाइस मेकर, प्रकाशक, मीडिया सब शामिल हैं । इन सबको मिलाकर पाठकीयता का निर्माण होता है । सरकार, प्रकाशक और लेखक की भूमिका सबको ज्ञात है । टेलीकॉम यानि कि फोन और उसमें लोड सॉफ्टवेयर, सर्च इंजन, जहां जाकर कोई भी अपनी मनपसंद रचना को ढूंढ सकता है भी अहम है। पाठकीयता के निर्माण का एक पहलू डिवाइस मेकर भी हैं । डिवाइस यथा किंडल और आई प्लेटफॉर्म जहां रचनाओं को डाउनलोड करके पढ़ा जा सकता है । प्रकाशक पाठकीयता बढ़ाने और नए पाठकों के लिए अलग अलग प्लेटफॉर्म पर रचनाओं को उपलब्ध करवाने में महती भूमिका निभाता है ।
हिंदी साहित्य को पाठकीयता बढ़ाने के लिए सबसे आवश्यक है कि वो इस ईको सिस्टम के संतुलन को बरकरार रखे । इसके अलावा लेखकों और प्रकाशकों को नए पाठकों को साहित्य की ओर आकर्षित करने के लिए नित नए उपक्रम करने होंगे । पाठकों के साथ लेखकों के बाधित संवाद को बढ़ाना होगा । देश भर के अलग अलग शहरों में हो रहे करीब साढे तीन सौ लिटरेचर फेस्टिवल भी इसको बढ़ाने में सहायक हो सकते हैं । इसके अलावा लेखकों को इंटरनेट के माध्यम से पाठकों से जुड़ कर संवाद करना चाहिए और अपनी रचनाओं पर फीडबैक भी लें । फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे की लेखिका ई एल जेम्स ने ट्राइलॉजी लिखने के पहले इंटरनेट पर एक सिरीज लिखी थी और बाद में पाठकों की राय पर उसे उपन्यास का रूप दिया । उसकी सफलता अब इतिहास में दर्ज हो चुकी है और उसे दोहराने की आवश्यकता नहीं है । इन सबसे ऊपर हिंदी के लेखकों को नए नए विषय भी ढूंढने होंगे । जिस तरह से हिंदी साहित्य से प्रेम गायब हो गया है उसको भी वापस लेकर आना होगा । आज भी पूरी दुनिया में प्रेम कहानियों के पाठक सबसे ज्यादा हैं । हिंदी में बेहतरीन प्रेम कथा की बात करने पर धर्मवीर भारती की गुनाहों की देवता और मनोहर श्याम जोशी का उपन्यास कसप ही याद आता है । इस वर्ष जनवरी में दिल्ली में आयोजित विश्व पुस्तक मेले में पुस्तक प्रेमों की भारी भीड़ ने एक बार फिर से साबित किया कि लोगों में पढ़ने की भूख है । जरूरत है पाठकों की रुचि को ध्यान में रखकर लिखा जाए और अगर इसपर आपत्ति हो तो पाठकों के अंदर की रुचि का परिष्कार करने का उपक्रम किया जाए ताकि पाठतों में साहित्य पढ़ने का एक संस्कार विकसित हो सके । हिंदी को इस मामले में अन्य भारतीय भाषाओं के साथ मिलकर कदम आगे बढ़ाना चाहिए ।
एक और पहलू है जिसपर हिंदी और हिंदी साहित्य को गंभीरता से विचार करना चाहिए वह है बाल साहित्य। हिंदी में बाल साहित्य की कमी भी पाठकों की कमी का एक कारण हो सकती है। है भी। इस ओर ध्यान देकर गंभीरता से काम होना चाहिए ताकि भविष्य के पाठक तैयार हो सकें । तभी हिंदी का भी विस्तार होगा और हिंदी मजबूत होगी।