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Saturday, December 3, 2016

बदलते वक्त में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

इन दिनों देश में अभिव्यक्ति की आजादी और उसके खतरों को लेकर जमकर चर्चा हो रही है । संपादकीय लिखे जा रहे हैं, प्राइम टाइम में खबरिया चैनलों पर बहस हो रही है । होनी भी चाहिए क्योंकि इस तरह की लगातार बहसों से लोकतंत्र जीवंत रहता है । परंतु अगर गंभीरता से विचार करें तो अभिव्यक्ति की आजादी पर होनेवाली बहस सरकार के पक्ष और विपक्ष की बहस होकर रह जा रही है । कोई भी विशेषज्ञ या स्तंभकार बुनियादी सवालों की ओर जाने से कतराते हैं । इमरजेंस-इमरजेंसी कहकर वो एक तरह से इमरजेंसी की भयावहता को कम कर देते हैं । नई पीढ़ी को इससे भ्रम हो सकता है कि इमरजेंसी में इन दिनों जितनी उदारता थी । आज एक बार फिर से अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर देशव्यापी गंभीर बहस की आवश्यकता है । आज जिस तरह से कई न्यूज चैनलों पर खबरों के नाम पर फिक्शन को बढ़ावा दिया जा रहा है या अंधविश्वास को बढ़ावा दिया जाता है उस पर यह बहस होनी चाहिए कि मीडिया की अभिव्यक्ति की आजादी की सीमा कहां तक है या उसकी कोई सीमा है भी या नहीं । अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर कई बार लक्ष्मण रेखा पार हो जाती है, ये कहना मुश्किल है कि जानबूझकर या अनजाने में । चंद दिनों पहले बिग बॉस सीरियल में मशहूर क्रिकेटर युवराज सिंह के भाई जोरावर सिंह और उनकी पत्नी आकांक्षा के बीच का पारिवारिक विवाद उछला । अदालत में विचाराधीन होने के बावजूद उनकी अलग रह रही पत्नी को शो में आमंत्रित कर अपना पक्ष प्रस्तुत करने का मौका दिया गया । शो के आगाज के वक्त आकांक्षा ने दर्शकों के सामने मंच से सरेआम जोरावर की प्रतिष्ठा को तार तार कर दिया । जोरावर को इस तरह से पेश किया गया जैसे उसने एक लड़की की जिंदगी बरबाद कर दी ।एकतरफा बातें हुई, जोरावर पर कई आरोप लगे, शो के दौरान भी बातीचत में ये मसला उठा । दूसरा पक्ष अपनी सफाई देने के लिए मौजूद नहीं था ।
अभिव्यक्ति की आजादी की सीमा तो संविधान के पहले संशोधन के वक्त बहुत साफ कर दी गई थी । श्यामा प्रसाद मुखर्जी के अखंड भारत के भाषणों पर लगाम लगाने के लिए और नेहरू- लियाकत समझौते को पूरी तरह से लागू करने को लेकर पहला संविधान संशोधन किया गया । तब बहाना बना था मद्रास से निकलनेवाली पत्रिका क्रासरोड और राष्ट्रीय संघ से जुड़ी पत्रिका आर्गेनाइजर में छप रहे लेख । क्रासरोड में नेहरू की नीतियों की जोरदार आलोचना की जाती थी, जिससे वो खफा रहते थे । दोनों मामलों में अदालत ने पत्रिकाओं की स्वंतत्रता पर अंकुश लगाने से मना कर दिया था । नेहरू ने अपने मंत्रिमंडल के साथियों के साथ विचार करने के बाद संविधान में मिले अभिव्यक्ति की आजादी की लगभग पूर्ण स्वतंत्रता पर ही अंकुश लगाने का बिल संसद में दस मई उन्नीस सौ इक्यावन को पेश किया जिसे कि अठारह जून को पास कर दिया गया । मूल संविधान में प्राप्त अधिकारों में कई शर्तों का बंधन लगाया गया जिससे अभिव्यक्ति की आजादी की परिधि खींच दी गई । जबकि उस वक्त भी भारतीय दंड संहिता की धारा 295 ए मौजूद थी जिसको लगाकर अभिव्यक्ति की आजादी की पूर्णता को बाधित किया जा सकता था ।
टेलीविजन चैनलों की बहुतायत और इस माध्यम के जनमानस को प्रभावित करने की क्षमता को ध्यान में रखते हुए अभिव्यक्ति की आजादी या उसकी चौहद्दी को फिर से परिभाषित करने की आवश्यकता है । न्यूज और मनोरंजन दोनों को मिलाकर इस मामले पर विचार किया जाना चाहिए । दरअसल टेलीविजन के कार्यक्रमों की सफलता का आकंलन जिस रेटिंग से होता है उसको लेकर कई बार प्रोड्यूसर्स में भ्रम की स्थिति रहती है । बहुधा चैनलों के कर्ताधर्ताओं को ये लगता है कि दर्शक संख्या बढ़ाने के लिए सेलिब्रिटी से जुड़े विवादों को हवा देने से रेटिंग हासिल की जा सकती है । इसी भ्रम में लक्ष्मण रेखा पार हो जाती है ।  हलांकि शोज के दौरान होनेवालों सर्वेक्षणों या वोटिंग से ये अवधारणा निगेट ही होती रही है । अगर इस तरह का आंकलन सही होता तो बिग बॉस के दर्शक जोरावर से अलग रह रही उनकी पत्नी आकांक्षा शर्मा को बनाए रखते ना कि दूसरे ही सप्ताह में उसको बिग बॉस के घर से बाहर निकाल देते । सवाल वही कि क्या टी आर पी हासिल करने के लिए किसी की निजता का हनन किया जा सकता है । निजता के हनन का मामला पहले भी पेश आ चुका है जब टेनिस स्टार सानिया मिर्जा और पाकिस्तानी क्रिकेटर शोएब की शादी का एलान हुआ था । कई बार कल्पना के आधार पर शोएब की पुरानी लव स्टोरीज परोसी गई थी । अभिषेक बच्चन की शादी के वक्त भी एक महिला उसकी पत्नी का दावा करते सामने आई थी और घंटों न्यूज चैनलों पर लाइव रही थी । क्या यहां किसी तरह की रोक होनी चाहिए । न्यूज चैनलों और अन्य टीवी चैनलों के स्वनियमन का मैकेनिज्म है लेकिन उसके दायरे को बढ़ाते हिए उसको मजबूत किए जाने की जरूरत है । मुंबई पर हुए आतंकी हमले के वक्त न्यूज चैनलों के कवरजे को लेकर सवाल उठे थे जिसके बाद सरकार ने आतंकवादी हमले के दौरान कवरेज को लेकर एक गाइडलाइन तो बना दी थी लेकिन न्यूज चैनलों के सबसे पहले की आपाधापी में गड़बड़ी हो जाती है । इसी तरह से अगर देखें तो हमारे चैनलों ने इस्लामिक स्टेट के बगदादी को कई बार मारा और फिर कई बार जिंदा कर दिया । उससे जुड़ी वारदातों को इस तरह से मिर्च मसाला लगाकर पेश किया जाता है जैसे लगता है कि कोई क्राइम थ्रिलर चल रहा हो । वीभत्स वीडियो को बार बार दिखाया जाता है और कई बार तो उसके कारनामे उसको समर्थकों के बीच हीरो भी बना देते हैं । अभिव्यक्ति की आजादी संविधान हमें देता है लेकिन वही संविधान कुछ जिम्मेदारियां भी तय करता है । हम सबको उसका गंभीरता से पालन करना चाहिए वर्ना सरकार को इस संवैधानिक अधिकार पर अंकुश लगाने के मौके मिलते रहेंगे । सत्ता अपनी आलोचना बर्दाश्त नहीं करती है और उसपर लगाम लगाने के मौके ढूंढती रहती है । अभिव्यक्ति की आजादी निर्बाध चलती रहे इसके लिए जरूरी है कि पत्रकारों की हर तरह से सुरक्षा की गारंटी हो। पत्रकारों को पेशेगत जोखिम उठाने होते हैं लेकिन उन जोखिमों को कम करने की कोशिशों से अभिव्यक्ति की आजादी मजबूत होगी और संविधान में मिले अधिकारों की रक्षा भी हो सकेगी।


Friday, December 2, 2016

दूसरी औरत पर फिदा बॉलीवुड

भारतीय समाज में दूसरी पत्नी को वो दर्जा प्राप्त नहीं हो पाता है जो पहली पत्नी को मिलता था । दूसरी पत्नी को हमेशा हेय दृष्टि से ही देखा जाता रहा है । लेकिन फिल्म इंडस्ट्री के रीति रिवाज और मान्यताएं अलहदा हैं वहां दूसरी पत्नी या फिर नायकों के जीवन में आई दूसरी औरत को ही सम्मान मिलता है । कई ऐसे उदाहरण हैं जिसमें फिल्मों से जुड़े मशहूर शख्सियत अपनी पहली पत्नी को ना केवल तलाक दे देते हैं बल्कि पहली पत्नी के साथ उसी शहर में दूसरा घर बसा लेते हैं । कुछ दिनों पहले एक मशहूर फिल्म अभिनेता ने अपनी पत्नी को कहा था कि मेरी जान बख्शो क्योंकि मुझे किसी और से प्यार हो गया है । तुम धन दौलत घर-बार सब ले लो लेकिन मुझे आजाद करो । दरअसल वॉलीवुड में दो तरह के हीरो हुए हैं । एक तो मुंबई में ही पले-बढ़े और उनका सामाजिक परिवेश भी फिल्मों से ही जुड़ा रहा । नायकों का एक दूसरा तबका देश के छोटे शहरों से आया और संघर्ष के बाद सफलता के शीर्ष पर जा पहुंचा । छोटे शहरों से जो हीरो मुंबई आए उसमें से तकरीबन सभी शादी के बाद ही फिल्मों की दुनिया में आए थे । यहां आकर उनका महिलाओं का खुलापन और बिंदास स्वभाव लगातार आकर्षित करने लगा । आजाद ख्याल महिलाएं उन्हें अपनी पत्नी से ज्यादा लुभाती रही । जब धर्मेन्द्र फिल्म इंडस्ट्री में आए थे तो वो शादी शुदा थे लेकिन फिल्मी दुनिया में उन्हें उस वक्त की सुपर स्टार मीना कुमारी से इश्क हो गया । ये इश्क इतना परवान चढ़ा कि धर्मेंन्द्र का ज्यादातर वक्त मीना कुमारी के जानकी कुटीर में ही बीतने लगा । उसके बाद उन्होंने ड्रीम गर्ल हेमा मालिनी के साथ रोमांस की पींगे बढ़ानी शुरू कर दी । दोनों के बीच प्यार इतना बढ़ गया कि धर्मेंन्द्र ने कानून को ताक पर रखकर पहली पत्नी को बगैर तलाक दिए चुपके से जाकर हेमा मालिनी से दूसरी शादी रचा ली । प्यार के शिकार तो दिलीप कुमार भी हुए थे और उनका सायरा बानो से तलाक होते होते बचा था । 1982 में यह चर्चा आम थी कि दिलीप कुमार एक पाकिस्तानी महिला आसमा में इतने मशरूफ हो चुके हैं कि उन्होंने सायरा बानो को छोड़ उसके साथ घर बसा लेने का फैसला कर लिया था । किसी तरह से सायरा ने उस होनी को टालने में सफलता हासिल की । यही हाल फिल्म अभिनेता बनने की चाहत में मुंबई पहुंचे सलीम खान का भी रहा । उन्होंने डांसर हेलेन के साथ सरहदी लुटेरा और तीसरी मंजिल जैसी फिल्में की । सलीम साहब ने एक इंटरव्यू में बताया कि सलमा से उनकी मुलाकात 1959 में हुई थी और पांच सालों तक दोनों के बीच प्यार परवान चढ़ता रहा और 1964 में दोनों ने शादी कर ली । सलीम खान सलमा से मिलने से पहले हेलेन से मिल चुके थे और उनके दिल में हेलेन को लेकर प्यार की चिंगारी दबी रह गई थी । दिल में दबी चिंगारी जब तक प्यार के शोला बनकर भड़कती रहती थी । आखिरकार सलमा से शादी के सोलह साल बाद 1980 में सलीम साहब ने हेलेन से दूसरी शादी रचाई ।
अस्सी के दशक की सुपर स्टार श्रीदेवी की कहानी एकदम फिल्मी है लेकिन यहां भी पहली पत्नी को ही हार मिलती है । श्रीदेवी बोनी कपूर के गेस्ट रूम में रहती थी और धीरे धीरे दोनो ने मोहब्बत का ऐसा अफसाना लिखा कि वो गेस्ट रूम से कब उनके बेडरूम तक पहुंच गई ये बोनी की पहली पत्नी मोना कपूर को पता भी नहीं चल सका । मोना कपूर ने इस शादी अपने जीते जी मंजूरी नहीं दी और ना ही उसने बोनी को तलाक दिया । बगैर पहली पत्नी के तलाक के बोनी ने शादी की और दूसरे नीड़ का निर्माण कर लिया । आमिर खान की पहली पत्नी रीना दत्ता ने इससे उलट व्यवहार किया । जब आमिर खान ने तय किया कि वो लगान फिल्म की अपनी सहायक निर्देशक किरण राव से शादी करेंगी तो रीना दत्ता ने फौरन उनको तलाक देकर आजाद कर दिया । उनके नजदीकियों का कहना है कि रीना को जब आमिर और किरण के रिश्ते का पता चला तो उसने भी इस रिश्ते को छोड़कर आगे बढ़ने का फैसला कर लिया ।
महिला अधिकारों की बात करनेवाली शबाना आजामी भी शादी-शुदा जावेद अख्तर  के इश्क में इस तरह से मशरूफ हुई कि दोनों ने शादी रचा ली । आज जावेद और शाबाना के मोहब्बत के अफसानों की बॉलीवुड में चर्चा होती है । पति-पत्नी के रूप में दोनों की मिसाल दी जाती है । लेकिन जब शाबाना ने लेखक-गीतकार जावेद अख्तर से शादी करने का ऐलान किया था तो उसकी खूब लानत-मलामत हुई थी । शाबाना ने उस वक्त दो बच्चों- फरहान और जोया अख्तर के पिता से शादी की थी । अपनी स्त्रीवादी छवि के विपरीत उनके इस कदम से हनी ईरानी का घर टूटा था । लेकिन यहां भी शबाना की आलोचना की शिकार बनने के बावजूद आज एक सफल पत्नी की तरह समाज में प्रतिष्ठा हासिल कर चुकी है लोग यह भूल गए हैं कि वो जावेद अख्तर की दूसरी औरत हैं । हनी ईरानी की तो लोगों को याद भी नहीं है । कुछ ऐसा ही हुआ था नादिरा बब्बर के साथ जब स्त्रीवादी स्मिता पाटिल ने उनके पति के साथ विवाह कर लिया था । उस वक्त राज बब्बर ने दोनों परिवारों को साथ रखने का जोखिम उठाया था लेकिन वो उसमें सफल नहीं हो पाए थे । हलांकि स्मिता पाटिल की मौत के बाद राज बब्बर वापस नादिरा के पास लौट आए थे । इस कड़ी में ताजा नाम जुड़ा है सैफ अली खान का, जिन्होंने अपनी पत्नी अमृता सिंह को छोड़कर करीना कपूर से ब्याह रचाया । दोनों की उम्र में लंबा फासला है । करीना को मिला बेगम का दर्जा और पहली पत्नी गुमनामी के अंधेरे में खो गई । 
ऐसा नहीं है कि यह सबकुछ सिर्फ मुंबईया फिल्म इंडस्ट्री में ही हो रहा है । दक्षिण भारत के सफलतम अभिनेताओं में से एक कमल हासन ने 1978 में मशहूर डांसर वाणी गणपति से शादी की थी । वाणी किसी वजह से लंबे समय के लिए अमेरिका गई तो कमल हासन ने सारिका को सहजीवी बना लिया । इस सहजीविता के दौरान सारिका ने एक बच्ची को जन्म दिन । बच्ची के जन्म के बाद कमल हासन पर सामाजिक दबाव इतना बढ़ा कि उनको वाणी को तलाक देकर सारिका से शादी करनी पड़ी । इस तरह की अनगिनत प्रेम कहानियां फिल्मी दुनिया में है । लेकिन सवाल अब भी अनुत्तरित है कि फिल्मी दुनिया का जो समाज है उसमें पहली पत्नी के लिए ना तो किसी के दिल में दर्द है और ना ही उसको लेकर संवेदना । कहना ना होगा कि यह चमकदार वॉलीवुड का एक स्याह पक्ष है लेकिन है तो हकीकत ही और इस हकीकत के साथ ही जी रही है बॉलीवुड की पहली पत्नियां ।

Wednesday, November 30, 2016

कुशल रणनीति से विपक्ष पस्त

आठ नवंबर को रात आ बजे जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पांच सौ और हजार रुपए की नोटबंदी का एलान किया तो कई लोग सदमे में चले गए लेकिन ज्यादातर राजनीति दलों ने फौरी प्रतिक्रिया में प्रधानमंत्री मोदी के कालेधन के खिलाफ इस कदम की तारीफ की । अब भी लगभग सभी विपक्षी दल मोदी के इस फैसले को समर्थन दे रहे हैं लेकिन जैसे जैसे दिन बीत रह हैं तो वैसे वैसे इ समर्थन के साथ अगर मगर और लेकिन बढ़ते जा रहे हैं । नोटबंदी के बाद सबसे पहले सोशल मीडिया पर एक लड़की की तस्वीर विरोधियों ने वायरल करवाई जिसमें वो हाथ में दो हजार के नोटों का बंडल लिए दिखाई दे रही थी । तब बताया गया कि वो उत्तर प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष की बिटिया है । ये तस्वीर गलत निकली । फिर बीजेपी के कई प्रदेश स्तर के नेताओं की तस्वीरें सोशल मीडिया पर आईं और इस मीडियम की जो अराजकता है उसने इस तरह की तस्वीरों के जरिए माहौल बनाने की कोशिश की गई । इसी दौरान खबर फैलाई गई कि बीजेपी की बंगाल इकाई ने नोटबंदी से पहले भारी मात्रा में नकदी बैंक में जमा करवाई । उधर महाराष्ट्र के एक मंत्री की गाड़ी से बानवे लाख नकदी बरामद की गई । इन तमाम कोलाहल के बीच विपक्ष को बीजेपी पर आरोप लगाने का मौका मिल गया कि सरकार के नोटबंदी के फैसले की जानकारी बीजेपी नेताओं को पहले दे दी गई थी । विपक्ष ने अपने इन आरोपों को पुख्ता करने के लिए बिहार बीजेपी के कई जिलों में आठ नवंबर के पहले जमीन खरीदने के दस्तावेज पेश कर सनसनी फैलाने की कोशिश की ।

आरोपों के इन घटाटोप के बीच प्रधानमंत्री ने एक और राजनीतिक दांव चल दिया । उन्होंने अपनी पार्टी के सभी सांसदों और विधायकों को निर्देश जारी कर दिया कि वो आठ नवंबर से लेकर इकतीस दिसंबर के बीच अपने खातों में सभी तरह के लेनदेन का ब्यौरा पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को सौंपे । प्रधानमंत्री मोदी के इस फैसले को विपक्ष के आरोपों की हवा निकालने की रणनीति मानी जा रही है । प्रधानमंत्री का ये निर्देश केंद्र सरकार के सभी मंत्रियों पर भी लागू होगा । प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारतीय जनता पार्टी के सांसदों और विधायकों को पाई पाई का हिसाब देने का निर्देश पार्टी संसदीय दल की बैठक में सार्वजनिक तौर पर दिया । इस तरह के निर्देश जारी करके प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जनता को ये संदेश देना चाहते हैं कि नोटबंदी के इस फैसले से बीजेपी के नेताओं ने कोई बेजा फायदा नहीं उठाया है और ना ही उनको नोटबंदी के फैसले की पहले से जानकारी थी । दूसरे उन्होंने ऐसा करके अमित शाह को इस बात अधिकार दे दिया कि वो अगर किसी विधायक या सांसद के खातों में ज्यादा लेनेदेन देखें तो उससे जवाब तलब करें । अब इसके दो फायदे हैं एक तो पार्टी के पास हरेक नेता के खातों की जानकारी हो जाएगी और अगर किसी के खाते में गड़बड़ी पाई जाती है तो उसके खिलाफ कार्रवाई करके बीजेपी अपने दामन को और चमकदार बना सकती है । भारतीय जनता पार्टी के विधायकों और सांसदों के खातों की जानकारी मांगकर प्रधानमंत्री ने एक तीर से कई निशाने साधे हैं । एक कुशल राजनेता की तरह सबसे पहले तो जनता को ये संदेश दिया कि वो किसी को भी बख्शने वाले नहीं हैं और अपनी पार्टी के नेताओं से भी पारदर्शिता की अपेक्षा रखते हैं ।  इसके अलावा प्रधानमंत्री ने अपनी पार्टी के सांसदों और विधायकों को खातों का हिसाब देने का फरमान जारी कर विपक्षी दलों पर भी ऐसा करने का दबाव बना दिया है । भारतीय जनता पार्टी के नेता ये कहने भी लगे हैं कि विपक्ष भी अपने सांसदों और विधायकों के खातों का हिसाब मांगे । अब अर विपक्ष पर दबाव बढ़ता है तो उन क्षेत्रीय दलों के नेताओं की मुसीबतें बढ़ सकती हैं जिनका सारा कामकाज नकदी पर ही चलता है । इतने विशाल देश में क्या पता कि पार्टी के किस नेता ने अपने बैंक खातों में किस प्रकार का लेन देन किया है । सभी दलों के सांसदों और विधायकों के खातों की जानकारी संबंधित पार्टी में पहुंची तो फिर कई राज फाश हो सकते हैं । हलांकि आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली के मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री के भारतीय जनता पार्टी के सांसदों और विधायकों को दिए इस निर्देश की खिल्ली उड़ाते हुए कहा है कि इससे कुछ भी हासिल नहीं होगा और इससे ना ही किसी तरह की पारदर्शशिता का पता चलेगा । उन्होंने कहा कि अगर खातों की जानकारी ही लेनी है तो नोटबंदी के पहले के लेन देन की जानकारी मंगवानी चाहिए । अब उनके इस आरोप से तो यही लगता है कि बीजेपी के लोकसभा और राज्यसभा को मिलाकर करीब साढे तीन सौ सांसदों और देशभर के सैकड़ों विधायकों को नोटबंदी की जानकारी थी । इस आधार पर आरोप हल्के और हास्यास्पद लगते हैं । प्रधानमंत्री के इस फैसले के बाद अब विपक्ष कालेधन ,रेंडर करने के सरकारी स्कीम को लेकर हमलावर है । विपक्ष का आरोप है कि पचास फीसदी टैक्स के साथ इस स्कीम से कालेधन वालों का आधा पैसा साफ बच जाएगा जबकि प्रधानमंत्री ने कहा है कि कालेधन का आधा हिस्सा गरीबों के हितों में काम लाया जाएगा । नोटबंदी के फैसले के बाद आरोपों को लेकर विपक्ष लगातार अपना गोलपोस्ट बदल रहा है लेकिन अबतक उसको गोल करने में सफलता हासिल नहीं पाई है । नरेन्द्र मोदी कुशल रणनीतिकार की तरह विपक्ष की चालों को असफल कर रहे है जिसका सबसे बड़ा उदाहरण भारत बंद के दौरान विपक्षी दलों के बीच का कंफ्यूजन या फिर सबसे अपने अपने बंद और विरोध रहे जोकि लगभग बेअसर रहे थे । 

प्रतीकों की आजादी का हासिल क्या

मुंबई के हाजी अली दरगाह में महिलाओं के प्रवेश को कट्टरपंथियों पर महिलाओं की जीत के तौर पर पेश किया जा रहा है । उत्साही टिप्पणीकार इसको महिला सशक्तीकरण से जोड़कर पेश कर रहे हैं । इसके पहले इस तरह का माहौल महाराष्ट्र के शनि शिंगणापुर में महिलाओं को प्रवेश की इजाजत के वक्त भी बना था । तब भी और अब हाजी अली दरगाह मैनेजमेंट का ये फैसला सिर्फ प्रतीकात्मक हैं । लोकतंत्र में प्रतीकात्मक फैसलों का अपना एक महत्व है लेकिन प्रतीकों से किसी समस्या का हल नहीं हो सकता है या समाज में किसी सुधार को बहुत फायदा हो, ऐसा उदाहरण देखने में नहीं आता है । राजनीति में प्रतीकों का महत्व हो सकता है, है भी, लेकिन समाज में इन प्रतीकात्मक जीत का बौद्धिक जुगाली के अलावा कोई खास मतलब है नहीं । इनसे देश में महिलाओं की स्थिति पर कोई फर्क पड़नेवाला नहीं है । हाजी अली या शनि शिंगणापुर मंदिर जानेवाली अकेली महिलाओं को अब भी अपने परिवार में पूछताछ का सामना करना पड़ता है । कहां जा रही हो, किसके साथ जा रही हो, कब लौटोगी, पहुंचकर फोन कर देना आदि आदि । प्रधानमंत्री बनने के बाद लालकिले की प्राचीर से पहली बार नरेन्द्र मोदी ने जब देश को संबोधित किया था तो इस तरह की बातें करने पर उनको आलोचना का सामना करना पड़ा था । ये समाज की हकीकत है और अगर हमको इस विसंगति को दूर करना है तो इससे मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है ।
दरअसल अगर हम देखें तो पूरी दुनिया में महिलाओं की स्थिति को पांच पैमानों पर आंका जाता है- आर्थिक आजादी, बेहतर सामाजिक स्थितियां, संपत्ति का अधिकार, मनचाहा काम करने की आजादी, संवैधानिक अधिकार । हमारे देश में महिलाओं को संविधान बराबरी का अधिकार देता है, कुछ सालों पहले सुप्रीम कोर्ट ने संपत्ति पर भी बराबरी का हक दे दिया, बावजूद इसके अभी भी हमारे देश की सभी महिलाओं को आर्थिक आजादी हासिल नहीं है। भारत की स्थिति बेहद दिलचस्प है । विश्व बैंक की एक स्टडी के मुताबिक भारत में पुरुषों की तुलना में कम महिलाएं मजदूरी करती हैं । इसमें एक और दिलचस्प तथ्य है कि जब देश की आर्थिक स्थिति बेहतर होती है तो ये अनुपात और कम हो जाता है यानि की परिवार की आय बढ़ती है तो महिलाएं काम करना छोड़ देती हैं । अर्थशास्त्र इस स्थिति को अब तक व्याख्यायित नहीं कर पाए हैं ।  इसके अलावा अगर हम देखें तो लड़कियों और महिलाओं को लेकर सामाजिक हालात बहुत अच्छे नहीं हैं । उनको अब भी अपनी मर्जी से कहीं भी कभी भी आने जाने की ना तो स्वतंत्रता है और ना ही सुरक्षा । राजधानी दिल्ली में जब हालात अच्छे नहीं हैं तो गांव देहात की तो कल्पना ही की जा सकती है । आजादी के सत्तर साल बाद भी देश की राजधानी में महिलाओं के लिए सुरक्षित और खतरनाक सड़कों और डॉर्क स्पॉट पर होनेवाली बहसें इस बात का सबूत हैं कि उनकी सुरक्षा कैसी है ।
महिलाओं और लड़कियों के लिए नागरिक सुविधाएं भी कम हैं । लड़कियों के स्कूल ड्रॉप आउट होने की एक वजह वहां शौचालयों का नहीं होना भी माना जाता है । इस दिशा में जो काम हो रहे हैं वो नाकाफी हैं । अब से करीब एक दशक पहले यानि आजादी के साठ साल बाद देश के बजट में उन स्कीमों का अलग से जिक्र होने लगा जो सिर्फ महिलाओं के लिए प्रस्तावित किए गए थे । उसके बाद से देश में महिलाओं की स्थिति बेहतर बनाने के लिए कई राज्य सरकारों ने गंभीरता से सोचना शुरू किया । हालात का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि बजट में महिलाओं के लिए अलग से स्कीम बनाने का काम अबतक सिर्फ सोलह राज्यों ने ही शुरू किया है । जबकि तमाम तरह के शोध इस निष्कर्ष पर पहुंच रहे हैं कि बजट में महिलाओं के लिए स्कीमों का अलग से प्रावधान करने से उनकी हालात में सुधार दिखाई देना शुरू हो गया है । जिन राज्यों ने इस तरह की एक्सक्लूसिव स्कीमों को अपने बजट में जगह दी है वहां लैंगिक समानता को लेकर स्थिति बेहतर दिखाई दे रही है । स्कूलों में लड़कियों के नामांकन में बढोतरी दर्ज की गई है । इसका राजनीतिक फायदा भी होता है जैसे बिहार में नीतीश कुमार ने स्कूलू लड़कियों को मुफ्त में साइकिल बांटी तो उनकी लोकप्रियता बढ़ी और चुनावी नतीजों पर उसका असर दिखा । महिलाओं की स्थिति बेहतर करने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति का होना भी जरूरी है ।

हमारे देश में महिला अधिकारों के लिए बात बात पर झंडा-डंडा लेकर निकलनेवाली महिलाएं उनकी बेहतरी को या फिर उनकी आजादी को उनकी देह से जोड़ दे रही हैं । मेरा तन, मेरा मन जैसे नारे फिजां में गूंजते रहते हैं । मन और तन की आजादी महिलाओं के लिए आवश्यक हैं लेकिन उससे ज्यादा जरूरी है उनको आर्थिक आजादी मिले, उनको सुरक्षा मिले । समाज में वैसी स्थिति बने जो महिलाओं को सुरक्षित माहौल दे सके तभी तो सही मायने में मन और तन दोनों की आजादी का अनुभव कर पाएंगी । प्रतीकों से उपर उठकर नारीवादियों को भी ठोस काम करने की जरूरत है अन्यथा वो लेखों, कहानियों और सेमिनारों के दस्तावेजों में दफन हो जाएगा ।   
(30.11.2016)

साधु और वास्तु करेंगे बेड़ा पार

एक तरफ जहां नोटबंदी को लेकर पूरे देश में पक्ष और विपक्ष के बीच तलवारें खिंची हुई हैं । बैंकों के बाहर पैसों के लिए कतारें लग रही हैं वहीं दक्षिण में तेलांगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखरराव ने राजा महाराजाओं जैसे नए बने महल में वेदों की ऋचाओं के उद्घोष के साथ गृह प्रवेश किया । नौ एकड़ में करीब एक लाख स्कावयर फीट में बने इस भव्य बंगले को वास्तु के हिसाब से तैयार किया गया है, जिसमें सिनेमा हॉल से लेकर एक हजार लोगों की क्षमता का विशाल कांफ्रेंस हॉल भी है । हैदराबाद के पॉश इलाके बेगमपेट में मुख्यमंत्री के इस आवास को बनाने के लिए आसपास की पुरानी सरकारी इमारतों को गिराया गया और करीब चालीस करोड़ की लागत से आठ महीने में इसका निर्माण हुआ । वास्तु के साथ साथ भव्यता और सुरक्षा का इंतजाम इतना है कि कमरों के अलावा बॉथरूम तक में बुलेटप्रूफ शीशे लगाए गए है । ये तो उस राज्य के मुख्यमंत्री का महलनुमा निवास है जिसने अपने सूबे के गरीबों के लिए पांच लाख रुपए की लागत से करीब पौने तीन लाख घर बनाने का एलान किया था । उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक अबतक पांच फीसदी घर भी नहीं बन पाए हैं । तेलांगाना के गरीबों को दिए जानेवाले इन दो कमरों के घरों को बनाने के लिए बजट में प्रावधान होने के बावजूद संबंधित विभाग पैसे की कमी का रोना रो रहा है लेकिन मुख्यमंत्री के महल के लिए उसके पास असीमित धन है ।
यह सही है कि आंध्र प्रदेश के बंटवारे के बाद तेलांगाना का विकास तेजी से हुआ लेकिन यह विकास बेहद असंतुलित है । इंडस्ट्री और सर्विस सेक्टर में तो काफी ग्रोथ है लेकिन कृषि के क्षेत्र में विकास की रफ्तार बेहद धीमी है । इसी तरह से अगर हम देखें तो तेलांगाना के पंद्रह से उनतीस साल के नौजवानों के बीच बेरोजगारी की दर करीब आठ फीसदी है । ऐसे माहौल में चंद्रशेखर राव का खुद के लिए महलनुमा घर बनवाना कितना उचित है । चंद्रशेखर राव की शाही हवेली की चर्चा हो ही रही थी कि एक और वजह ने उनको कठघरे में खड़ा कर दिया ।
चंद्रशेखर राव के गृहप्रवेश के चंद घंटों बाद सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल होने लगा । उस वीडियो में चंद्रशेखर राव के नए बने घर के अंदर के उनके दफ्तर की कुर्सी पर एक साधु बैठे दिख रहे हैं और चंद्रशेखर राव उनके बगल में खड़े हैं । सोशल मीडिया के उस वीडियो के बारे में बताया गया कि मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे वो साधु चिन्ना जीयर स्वामी हैं । सोशल मीडिया पर इस वीडियो के वायरल होने के बाद विरोधियों ने चंद्रशेखर राव को घेरना शुरू कर दिया । कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष उत्तम रेड्डी ने मुख्यमंत्री पर वास्तु आस्था के चलते जनता का पैसा बर्बाद करने का आरोप लगाया । उनका आरोप है कि अगर बंगले की कीमत में जमीन की कीमत जोड़ दी जाए तो वो करीब डेढ सौ करोड़ तक पहुंच जाती है । दरअसल चंद्रशेखर राव का वास्तुप्रेम काफी पुराना है । जब वो तेलांगाना के मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने हैदराबाद में पुराने सचिवालय में बैठने से इंकार कर दिया था । बताया जाता है कि इसकी वजह वास्तु है । चंद्रशेखर राव ने करीब सौ करोड़ की लागत से नया सचिवालय बनवाने का एलान किया था लेकिन वो मामला फिलहाल कोर्ट में लंबित है । पत्रकारों से बातचीत में चंद्रशेखर राव ने कहा था कि इतिहास इस बात का गवाह है कि पुराने सचिवालय में बैठनेवाला कोई भी मुख्यमंत्री फला-फूला नहीं है । वो इसको तेलांगना के भविष्य से भी जोड़कर देखते हैं । नए घर में प्रवेश के पहले भी चंद्रशेखर राव ने वास्तु के हिसाब से पूजा सुदर्शन यज्ञ करवाया ।  

सवाल यही है कि राजनेताओं को क्यों खराब वास्तु से डर लगता है और क्यों वो साधुओं की शरण में जाते हैं । आज जब हमारा देश मंगल ग्रह पर अपने यान का सफल प्रक्षेपण कर चुका है और विज्ञान के क्षेत्र में इतनी प्रगति कर चुका है तो फिर वास्तुशास्त्री और साधुओं पर इतना भरोसा क्यों । अगर हम इस पर विचार करें तो हमारे देश में साधुओं और धर्मगुरुओं पर राजनेताओं के भरोसे का लंबा इतिहास रहा है । नेताओं के हाथों में अंगूठियां इस बात की गवाही देती रहती हैं । दरअसल सत्ता का स्वाद चख लेने के बाद नेता उसको छोड़ना नहीं चाहते हैं और पद पर पहुंच जाने के बाद उनमें एक खास किस्म की असुरक्षा देखने को मिलती है । अपनी इसी असुरक्षा बोध से बचने के लिए नेता वास्तुशास्त्रियों, ज्योतिषियों और साधुओं के पास पहुंचते हैं । उन्हें लगता है कि उनके आशीर्वाद या उपायों से वो सत्ता में बने रह सकते हैं । वो  भूल जाते हैं कि लोकतंत्र में सिर्फ जनता ही किसी की भी सत्ता बना और बचा सकती है । अपनी किताब वन लाइफ इज नॉट एनफ में पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह ने चंद्रास्वामी और मार्गेट थैचर के बीचे के दिलचस्प संवाद का जिक्र किया है जिसमें स्वामी ने उनके बारे में जो भविष्यवाणी की थी वो सच निकली थी । ऐसे तुक्के लगते रहते हैं जो कि बाबाओं की दुकान चमका देते हैं ।   लेकिन क्या जनता का इससे भला होता है ?
( नारद न्यूज 30.11.2016)

Tuesday, November 29, 2016

लोकपाल की राह मे रोड़ा क्यों ?

लोकपाल कानून को जनवरी दो हजार चौदह में प्रभावी बना दिया गया था । इस बात को ढाई साल से ज्यादा बीत गए हैं लेकिन अभी तक लोकपाल को नियुक्त करने की प्रक्रिया क्यों रुकी हुई है ? सरकार इस नियुक्ति प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए अध्यादेश क्यों नहीं ला रही है ? सरकार ये संदेश क्यों देना चाहती है कि वो लोकपाल की नियुक्ति के पक्ष में नहीं है । सरकार क्यों इस प्रक्रिया में देरी होने दे रही है ? कुछ इसी तरह के सवाल सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से लोकपाल कानून को अमली जामा पहनाने के बारे में पूछे हैं । एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने लोकपाल की नियुक्तु को लेकर बेहद सख्त रुख अनाया है । जनवरी दो हजार चौदह में इस कानून को नोटिफाई किया गया था उसमें लोकपाल की नियुक्ति के लिए जिस कमेटी का गठन होना है उस कमेटी में प्रधानमंत्री, लोकसभा के स्पीकर, लोकसभा में नेता विपक्ष, सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश या उनके द्वारा नामित सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के अलावा इन चारों की अनुशंसा पर राष्ट्रपति के द्वारा नामित एक न्यायविद को होना था । मई दो हजार चौदह के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस या कोई भी अन्य दल लोकसभा की दस फीसदी सीट जीतने में नाकाम रही लिहाजा लोकसभा में किसी भी दल को नेता विपक्ष की कुर्सी नहीं मिली । यहीं से लोकायुक्त की नियुक्तिमें पेंच फंस गया । केंद्र सरकार का तर्क है कि चूंकि इस वक्त लोकसभा में नेता विपक्ष नहीं हैं इस वजह से लोकपाल कानून में संशोधन करना होगा । जिसके लिए उसने बिल बनाकर संसद में पेश कर दिया है । उस बिल को संसद की स्टैंडिंग कमेटी ने भी देखकर अपनी रिपोर्ट दे दी है । सरकार का तर्क है कि इस कानून में जो संशोधन होना है वो संसद में विचाराधीन है । लेकिन सरकार के ये तर्क सुप्रीम कोर्ट के गले नहीं उतर रहे है । कोर्ट ने सरकार को सख्त लहजे में चेतावनी दी है कि संसद लंबे समय से इस पर विचार नहीं कर रही है । एक संस्था के रूप में लोकपाल को शुरू करवाने के लिए कोर्ट आदेश दे सकता है जो संसद की भावना के अनुरूप होगा । इसके बाद केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से इल मसले पर जवाब देने के लिए वक्त मांग लिया है ।
अब इस पूरे मसले से सवाल ये खड़ा होता है कि केंद्र सरकार क्यों भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए बनाई गई संस्था को प्रभावी नहीं बनाना चाहती है । क्यों नरेन्द्र मोदी सरकार लोकपाल की नियुक्ति को लेकर देरी करते या उसकी राह में रोड़ा अटकाते दिखना चाहती है । ये सवाल और तीखा हो जाता है जब ये सामने आता है कि इसी सरकार ने सीबीआई के डायरेक्टर के चयन में, केंद्रीय सूचना आयुक्त के चयन के लिए और केंदीय सतर्कता आयुक्त को चुने जावने वाली कमेटी में लोकसभा में नेता विपक्ष की मौजूदगी के कानून में संशोधन करके उसकी जगह लोकसभा में सबसे बड़े दल के नेता के नाम को मंजूरी दिलवाई है । फिर वो कौन सी बाध्यता है कि मौजूदा सरकार लोकपाल को लेकर ये जरूरी संशोधन नहीं पास करवा रही है और खुद पर अंगुली उठाने और सुप्रीम कोर्ट को लताड़ने या ये कहने का मौका दे रही है कि अगर संसद ये नहीं कर सकती है तो वो इस काम को करने में सक्षम हैं । इसके पीछे की मंशा चाहे जो हो लेकिन ये सरकार की छवि को खराब कर रही है ।
दरअसल अगर हम देखें तो लोकपाल को लेकर शुरू से ही राजनीतिक दलों में उपेक्षा का भाव रहा है । पिछले करीब छह दशक में इस कानून को पास करवाने के लिए आठ से ज्यादा बार कोशिश की गई लेकिन उसमें सफलता नहीं मिली थी । कई बार संसद में पेश होने के बावजूद लोकपाल बिल धूल खा रही थी । जब दो हजार ग्यारह में अन्ना हजारे ने लोकपाल को लेकर आंदोलन शुरू किया । पहले तो पांच अप्रैल 20111 को जंतर मंतर पर अनशन किया और फिर उसके बाद अन्ना हजारे को 16 अगस्त से दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में अनशन करना था लेकिन उनकी गिरफ्तारी से वो टल गया था । रिहा होने के बाद अन्ना 19 अगस्त से रामलीला मैदान में अनशन पर बैठे थे और तेरह दिनों तक उनके अनशन ने उस वक्त की यूपीए सरकार पर इतना दबाव बना दिया था कि संसद के विशेष सत्र में लोकपाल बिल पर बहस हुई थी । किन दो हजार ग्यारह में उस बिल को राज्यसभा से पास नहीं करवाया जा सका था । राज्यों में लोकायुक्तों के अनिवार्य गठन को लेकर कई दलों को एतराज था । उस एतराज को संसद की सेलेक्ट कमेटी के पास भेजा गया । उसके बाद कई संशोधनों के साथ दो हजार तेरह में इसको पास करवाया जा सका । पांच दशकों से जो बिल कानून बनने के लिए प्रयासरत था उसको अमली जामा पहनाया गया । इस बिल को पास करवाने के लिए राज्यसबा में कांग्रेस और बीजेपी दोनों एक साथ आए थे । ये एक ऐतिहासिक मौका था औपर उस वक्त देश की जनता को ये संदेश गया था कि भ्रष्टाचार के राक्षस से लड़ने के लिए दोनों प्रमुख विपक्षी दल साथ आ सकते हैं । लोकपाल को लेकर सक्रिय रहे अन्ना के उस वक्त के अर्जुन अरविंद केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी बनाई और पहली बार कांग्रेस के साथ तो दूसरी बार प्रचंड बहुमत से दिल्ली में सरकार भी बनाई ।

दरअसल लोकपाल एक ऐसा कानून है जिसको लेकर सभी राजनीतिक दलों में एक तरह का भय है । जिस दिल्ली में केजरीवाल ने लोकपाल आंदोलन से ताकत पाई थी उसी दिल्ली में अबतक लोकपाल कानून लागू नहीं किया जा सका है । सरकार बनने के महीनों बाद उसको दिल्ली विधानसभा से पारित करवा कर केंद्र को भेजा गया जहां वो लंबे समय से लंबित है । अरविंद केजरीवाल जिस तरह के लोकपाल कानून की वकालत करते रहे हैं उस तरह का कानून तो कोई भी नेता कहीं भी लागू नहीं होने देगा । दो हजार ग्यारह में जो भारतीय जनता पार्टी लोकपाल कानून को लेकर कांग्रेस को कठघरे में खड़ा करती थी वही भारतीय जनता पार्टी जब सत्ता में आई तो पिछले ढाई साल से इस संस्था के गठन को लेकर उदासीन है । दरअसल सत्ता का अपना एक चरित्र होता है वो किसी दल से या नेता से प्रभावित नहीं होती है । विश्व इतिहास में बहुत कम ऐसा नेता हुए हैं जिन्होंने अपनी सोच और अपने क्रियाकलाप से सत्ता का स्वभाव बदला हो, ज्यादातर नेता सत्ता के स्वभाव के हिसाब से खुद को ढाल लेते हैं । सिस्टम बदलने की बात करनेवाले नेता भी जब सत्ता में आते हैं या जब उनको सिस्टम बदलने का मौका मिलता है तो बजाए सिस्टम को बदलने के वो सिस्टम का हिस्सा बनकर राजनीति के बियावान में खो जाते हैं ।  लोकपाल कीनियुक्ति को लेकर भी कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है । अब भी वक्त है कि नरेन्द्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार लोकपाल की नियुक्ति को लेकर संसद के मौजूदा सत्र में इस कानून में संसोधन करवाए और लोकपाल की नियुक्ति की प्रक्रिया को तेज करे । लोकतंत्र में कानून का सम्मान करना जितना आवश्यक है उतना ही आवश्यक है उसका सम्मान करते दिखना ।  

Saturday, November 26, 2016

सेक्स प्रसंगों से करो तौबा- आर्चर

अंग्रेजी के मशहूर लेखक जैफ्री ऑर्चर ने भारत के युवा लेखकों को सलाह दी है कि वो सेक्स, हिंसा और भूत प्रेत के बारे में नहीं लिखें । उनकी सलाह है कि खराब भाषा से भी भारत के युवा लेखकों को बचना चाहिए । उन्होंने साफ कहा है कि भारतीय युवा लेखकों को उन्हीं विषयों पर लिखना चाहिए जिसको लेकर लेखक को खुद पर पूरा यकीन हो यानि वो विषय को लेकर कन्विंस हों। जैफ्री ऑर्चर ने कहा कि लेखक को अपना काम करना चाहिए और फिर उसको जनता पर छोड़ देना चाहिए कि वो उसको पसंद करती हैं या नहीं । उन्होंने साफ तौर पर जोर देकर ये भी कहा कि जो जनता चाहती है उस हिसाब से नहीं लिखना चाहिए बल्कि लेखक को अपने हिसाब से साहित्य सृजन करना चाहिए । जैफ्री आर्चर कोई मामूली लेखक नहीं हैं बल्कि पूरी दुनिया में उनकी लेखन का डंका बजता है । सत्तर साल की उम्र में भी वो खुद के लेखन को चुनौती देते रहे हैं और लगातार नए नए विषयों पर लिखते रहे हैं। जब उपन्यास से मन भरने लगा तो नाटक लिखना शुरू कर दिया फिर कहानी की ओर मुड़ गए। एक अनुमान के मुताबिक उनकी किताब केन एंड एबेल की करीब साढे तीन करोड़ प्रतियां बिक चुकी हैं । यह साहित्य में एक घटना की तरह है । इस किताब से पहले प्रकाशित जैफ्री ऑर्चर की दो किताबें भी बेस्ट सेलर रही हैं । दरअसल अगर हम देखें तो जैफ्री ऑर्चर ने अपना करियर लेखक के तौर पर तब शुरू किया जब वो लगभग दीवालिया हो गए थे और उनपर कर्ज का भारी बोझ आ गया था । जैफ्री ऑर्चर सौ मीटर रेस के धावक रह चुके हैं, ब्रिटेन में सांसद रह चुके हैं लेकिन कारोबार में ठोकर खाने के बाद लेखक बने । कर्ज उतारा फिर राजनीति में गए ।
आर्थिक रूप से घिरे जैफ्री ऑर्चर ने सबसे पहले नॉट अ पेनी मोर, नॉट अ पेनी लेस लिखा जिसकी सोलह देशों में जमकर बिक्री हुई । उसके बाद तो उन्होंने लेखन को ही अपना लिया और अपने बैलेंस शीट को लेखन की कमाई से ठीक किया। गूगल के मुताबिक उनका तीसरा उपन्यास केन एंड एबेल विश्व साहित्य के इतिहास में ग्यारहवां सबसे सफलतम उपन्यास है । लियो टॉलस्टॉय के वॉर एंड पीस से सिर्फ एक पायदान नीचे । जैफ्री ऑर्चर का जीवन विवादों से भी भरा रहा है और जेल भी काट चुके हैं । लिहाजा उनका अनभव संसार वैविध्यपूर्ण है । जैफ्री ऑर्चर के बारे में ये बताने का मकसद सिर्फ इतना था कि उनकी सलाह को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए । उसको माना जाए या नहीं इस बात पर कम से कम विमर्श तो होना ही चाहिए । इस लेख का मकसद भी यही है ।
जैफ्री ऑर्चर की भारत के युवा लेखकों की इस सलाह पर कई लोगों ने ये सवाल उठाए कि उनको भारत के पाठकों की रुचि का और भारतीय लेखन का उनको क्या पता । अब ऐसे लोगों की अज्ञानता पर क्या कहा जाए । जैफ्री ऑर्चर का भारत से बहुत पुराना और गहरा नाता रहा है और वो नियमित तौर पर भारत आते जाते रहे हैं और भारत के बारे में उनकी एक राय भी है । भारतीय महिलाओं के बारे में जैफ्री ऑर्चर ने हाल ही में अपने एक इंटरव्यू में कहा है कि जब भी वो भारत आते हैं तो यहां की महिलाओं को मजबूत होते देखकर खुश होते हैं । वो भारतीय महिलाओं के सशक्तीकरण की भावना का सम्मान करते हुए कहते हैं कि नई पीढ़ी को रोकने की ताकत अब किसी में नहीं है । जैफ्री ऑर्चर भारत के प्रकाशन जगत की सचाईयों से भी वाकिफ हैं और अपनी कई किताबों को सबसे पहले भारत में ही लॉंच करते रहे हैं । उनका मानना है कि भारत में पाइरेसी एक बड़ी समस्या है और अगर भारत में किताब बाद में लॉंच की जाती है तो लेखक और प्रकाशक दोनों का नुकसान हो जाता है । लिहाजा वो इसकी काट के लिए सबसे पहले अपनी किताब भारतीय बाजार में ही लॉंच करते हैं ।
अब हम आते हैं जैफ्री ऑर्चर की युवा लेखकों को दी जानेवाली सलाह पर । उन्होंने सेक्स संबंध से लेकर भूत-प्रेत की कहानियां नहीं लिखने की सलाह दी है लेकिन इन दिनों सेक्स संबंध युवा लेखकों के लेखन में लगभग अनिवार्य उपस्थिति की तरह है । कई युवा लेखकों को लगता है कि उपन्यासों में बगैर यौन संबंधों के छौंक के उसको सफल नहीं बनाया जा सकता है जबकि उनके सामने ही अमिष त्रिपाठी का उदाहरण है । जो बगैर इस तरह के विषयों को छुए दुनिया के बड़े लेखकों की लीग में शामिल हो गए हैं । दरअसल कुछ युवा, कुछ युवापन की दहलीज पार कर चुके लेखक अपनी कहानियों में यौन संबंधों का इस्तेमाल उसी तरह करते हैं जैसे कुछ फिल्मकार अपनी फिल्मों की सफलता के लिए नायिकाओं से अंग प्रदर्शन करवाते हैं । उन्हें ये सफलता का शॉर्टकट फॉर्मूला लगता है । फिल्मों में भी जहां कहानी की मांग हो वहां अंगप्रदर्शन से परहेज नहीं करना चाहिए और साहित्य में भी जहां सिचुएशन की मांग हो वहां यौन संबंधों का वर्णन होना चाहिए । साहित्य में यौन संबंधों के वर्णन को लेकर बहस पुरानी है लेकिन जिस तरह से चेतन भगत जैसे लेखकों ने जुगुप्साजनक तरीके से चटखारे लेने के अंदाज में इस तरह से प्रसंगों पर विस्तार से लिखा है उसको जैफ्री ऑर्चर की टिप्पणी के आइने में देखे जाने की जरूरत है । चेतन के नए उपन्यास वन इंडियन गर्ल के कई पन्ने तो पोर्नोग्राफी को मात देते हैं । हिंदी में जब मैत्रेयी पुष्पा का उपन्यास चाक या फिर अल्मा कबूतरी प्रकाशित हुआ था तब भी उसमें वर्णित यौन संबंधों को लेकर साहित्य जगत में अच्छा खासा विवाद हुआ था । साहित्य के शुद्धतावादियों ने तब मैत्रेयी पुष्पा के लेखन को कटघरे में खड़ा किया था । बाद में भी इस तरह के प्रसंगों को लेकर कई कृतियां आईं । कृष्णा अगिनहोत्री की आत्मकथा के दो खंड- लगता नहीं है दिल मेरा तथा ...और और औरत में इस तरह के प्रसंगों की भरमार है । हद तो बुजुर्ग लेखिका रमणिका गुप्ता ने अपनी आत्मकथा में कर दी। उनकी आत्मकथा आपहुदरी में जिस तरह क जुगुप्साजनक प्रसंगों की भरमार है वो उस किताब को साहित्य के अलग ही कोष्टक में रख देता है। जैफ्री ऑर्चर की सलाह युवा लेखकों को लेकर है । इन वरिष्ठ लेखकों की रचनाओं का उल्लेख इस वजह से किया गया ताकि लेखन की इस परंपरा को समझने में मदद मिले । यौन संबंध मानव जीवन की अनिवार्यता है लेकिन उसको कितना और कैसे उभारा जाए ये लेखक पर निर्भर करता है । अभी पिछले दिनों युवा लेखिका सोनी सिंह का संग्रह क्लियोपेट्रा प्रकाशित हुआ था । उनकी कहानियों में इस तरह के कई प्रसंग बेवजह आते हैं और जिस तरह के बिंबो का वो इस्तेमाल करती हैं वो हिंदी कहानी में कुछ जोड़ता हो इसमे संदेह है । हलांकि राजेन्द्र यादव को सोनी सिंह की कहानियां अपने बेबाक बयानी के बावजूद बौद्धिक खुराक मुहैया करवाने वाली लगती हैं । संभव है कि यादव जी की तरह के कुछ पाठक साहित्य में हों । सोनी सिंह के अलावा भी कई लेखक लेखिका इस तरह की कहानियां लिख रहे हैं । पर उनमें से ज्यादातर अपनी इस तरह की कहानियों से पाठकों को झकझोरने के बाद अलग भावभूमि पर विचरण करने लगी हैं ।  जिसको उनके कोर्स करेक्शन की तरह देखा जा रहा है ।

जैफ्री ऑर्चर की इस सलाह के बाद एक बार फिर से साहित्य में इस बात पर बहस होनी चाहिए कि साहित्यक शुचिता की सीमा कितनी हो । लेखक सिचुएशन की मांग पर कहां तक जा सकता है या जा सकती है । यौन संबंधों पर लिखने के लिए दरअसल बहुत सधे हुए दिमाग और लेखनी की जरूरत होती है । ये प्रसंग ऐसे होते हैं कि अगर लिखते वक्त लेखक का संतुलन खो गया तो वो उसके लेखन को हल्का भी कर दे सकता है या पाठक उसको रिजेक्ट भी कर सकते हैं । खुद लेखक को भी इस तरह के लेखन के पहले कन्विंस होना चाहिए । पाठकों को कहानियों की ओर आकर्षित करने के लिए इस तरह के प्रसंग जबरदस्ती नहीं ढूंसने चाहिए । जैफ्री ऑर्चर ने एक और बात कही कि बाजर की मांग के हिसाब से लेखकों को नहीं लिखना चाहिए तो वो इस ओर इशारा करते है कि लेखक तो पाठकों की रुचि का निर्माण करते हैं, रुचियों आधार पर साहित्य सृजन करनेवाले लेखक नहीं बल्कि कारोबारी होते हैं । अब हिंदी के युवा लेखकों को तय करना है कि वो वैश्विक लेखक की सलाह मानते हैं या फिर शॉर्टकट सफलता के लिए पुराने फॉर्मूले को अपनाते हैं । 

साहित्य का 'समीकरण काल'

हिंदी साहित्य में फेसबुक अब एक अनिवार्य तत्व की तरह उपस्थित है । कई साहित्यकार इस माध्यम को लेकर खासे उत्साहित रहते हैं । उनका मानना है कि फेसबुक ने नए-पुराने लेखकों को एक खुला मंच दिया जहां आकर वो अपनी बात कर सकते हैं । इस मंच पर वो अपनी रचनाएं लिख सकते हैं, यहां अपनी राय प्रकट करने के साथ-साथ बहस मुहाबिसे में भी हिस्सा ले सकते हैं । इस माध्यम की वकालत करनेवालों को ये अभिव्यक्ति का ऐसा मंच मानते हैं जहां कोई बंदिश नहीं है । लेकिन एक दूसरा पक्ष भी है जो इस असीमित अधिकार को लेकर सशंकित रहता है और उनका तर्क होता है कि इससे साहित्य में अराजकता को बढ़ावा मिलता है । सोशल मीडिया के इन दो पक्षों पर ही बहस होती रहती है लेकिन इसका एक तीसरा और दिलचस्प पक्ष भी है । फेसबुक आपको साहित्यक समीकरणों को समझने में मदद तो करता ही है कई बार इन समीकरणों को उघाड़कर रख देता है । हिंदी साहित्य में लेखकों के बीच समीकरण बनते बिगड़ते रहते हैं । इस बात को फेसबुक पर इनकी गतिविधियों से सहजता के साथ रेखांकित किया जा सकता है । हिंदी साहित्य का ये दौर समीकरणों का दौर है जहां ज्यादातक लेखक आत्ममुग्धता, आत्मश्लाघा और आत्मप्रशंसा में डूबे हैं । आत्ममुग्धता, आत्मश्लाघा और आत्मप्रशंसा ही साहित्य में नए समीकरणों को जन्म देती रहती है । इस वक्त साहित्य की दुनिया में हर रोज नए ध्रुवों और गुटों का जन्म होता है और इस जन्म की सूचना आपको फेसबुक पर मिल जाती है । फेसबुक के लोकप्रिय होने के पहले तो होता ये था कि लेखकों को किसी के पक्ष में दिखने या खड़े होने के लिए लेख आदि लिखने पड़ते थे लेकिन फेसबुक ने वो काम आसान कर दिया । अब आप लाइक या कमेंट या शेयर कर किसी के पक्ष में खड़े हो जाते हैं । कुछ सालों पहले जब महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति विभूति नारायण राय ने ज्ञानोदय पत्रिका में इंटरव्यू दिया था और उस इंटरव्यू के बाद छिनाल विवाद छिड़ा था तो मैत्रेयी पुष्पा ने उनके खिलाफ विरोध का झंडा बुलंद किया था । भारतीय ज्ञानपीठ के दफ्तर के बाहर मैत्रेयी पुष्पा के साथ नारे लगानेवाले साहित्यकार कालांतर में एक एक करके उनका साथ छोड़ गए । बिछड़े सभी बारी बारी बारी की तर्ज पर कोई वर्धा विश्वविद्यालय से जुड़ गया तो कोई कुलपति विभूति नारायण राय से किसी और तरह से उपकृत होकर उनके साथ हो लिया । इसी तरह से युवाओं को लेकर भी साहित्य में एक लंबी बहस चली थी जिसमें एक तरफ मैत्रेयी पुष्पा थीं और दूसरी तरफ कई लेखिकाएं । उस वक्त मैत्रेयी जी का खुलकर और लिखकर विरोध करनेवाली कई लेखिकाएं इन दिनों मैत्रेयी पुष्पा के साथ मंच साझा करती नजर आ रही हैं । मैत्रेयी पुष्पा भी उन लेखिकाओं के कार्यक्रमों में शिरकत कर रही हैं । तो इस तरह से अगर देखा जाए तो साहित्य जगत की इन जीवंतताओं का पता फेसबुक से ही चलता है । जीवंतता इस वजह से कह रहा हूं कि इसको गंभीरता से नहीं लिया जा सकता है और मनोरंजन के तौर पर इसका आनंद उठाना चाहिए क्योंकि ये मंच सबको एक्सपोज करता चलता है । एक्सपोज इस वजह से कि जोकमेंट किए जाते हैं वो बहुधा व्यक्तिगत हो जाते हैं । चंद सालों पहले एक लेखिका ने दूसरी लेखिका के खिलाफ फर्जी आईडी से कई आपत्तिजनक पोस्ट डाले थे । तब शायद उनको मालूममहीं रहा होगा कि कंप्यूटर और इंटरनेट के कनेक्शन की वजह से पोस्ट डालने वाले की पहचान हो सकती है । उस वक्त ये हुआ भी था और साहित्य जगत में बहुत बवाल खड़ा हुआ था ।  
गुटबाजी के इस खुले खेल के अलावा भी फेसबुक साहित्यक माहौल को जीवंत बनाए रखता है । फेसबुक को अगर आप नियमितता के साथ फॉलो करेंगे तो वहां आपको दो तीन लेखकों का एक ग्रुप नजर आएगा जो हर दिन किसी ना किसी तरह का विवाद उठाने के उपक्रम में जुड़े रहते हैं । ऐसा प्रतीत होता है कि इन लेखकों का ये छोटा गुट सुबह तय कर लेता है कि आज फलां लेखक को या फलां लेखिका को घेरना है और उसपर येनकेन प्रकारेण साहित्यक या साहित्येतर वजह से हमले करने हैं । अपनी योजना पर अमल करते हुए विवादित पोस्ट लिखे जाते हैं । उसके बाद होता है कि उन लेखकों से जुड़े छोटे-मोटे लेखक या लेखक बनने के लिए संघर्ष कर रहे कुछ लोग अति उत्साह में आकर इस या उस पक्ष पर हमलावर हो जाते हैं । साहित्य के इस खेल में बहुधा भाषिक मर्यादा की लक्षम्णरेखा लांघी जाती है, जिससे बचा जाना चाहिए । फेसबुक पर साहित्य से जुड़े कई लोग आपको ऐसे मिल जाएंगे जो अपने मठाधीश के हर पोस्ट पर किसी ना किसी तरह की टिप्पणी अवश्य करते हैं । वाह से लेकर आह टाइप की । फेसबुक पर कोई एक मठाधीश नहीं है यहां तो बडे. मंझोले और छोटे मठाधीश आपको मिल जाएंगे । कई मठाधीश तो इतने असहिष्णु हैं कि वो अपना मर्यादित विरोध नहीं झेल पाते हैं और विरोध के तर्क देनवाले को ब्लॉक कर अपना परचम लहराते रहते हैं ।

अब अगर हम विचार करें तो फेसबुक ने साहित्यक माहौल में अवश्य ही अनेक आयाम जोड़ दिए हैं लेकिन इन आयामों से साहित्य को क्या हासिल हो रहा है । हासिल हो रहा है भगवानदास मोरवाल सरीखे वरिष्ठ लेखकों का जो फेसबुक के मंच को अपनी किताब के प्रमोशन के लिए इस्तेमाल करते हैं । अपनी किताब के प्रमोशन का कोई भी मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहते हैं बल्कि मौके पैदा कर लेते हैं । फेसबुक का ये इस्तेमाल तो कोलकाता की साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त लेखिका अलका सरावगी ने भी अपनी किताब जानकीदास तेजपाल मैनशन के प्रकाशन के वक्त किया था । उन्होंने भी जमकर अपनीकिताब का प्रचार किया था । तब उसको लेकर भी विवाद खड़ा करने की कोशिश की गई थी । लेकिन देश में इंटरनेट के बढ़ते घनत्व के मद्देनजर फेसबुक जैसा माध्यम लेखकों को पाठकों तक पहुंचने का माध्यम बन सकता है । हलांकि इस माध्यम को चलानेवाले इसमें कारोबार की असीम संभवानाओं के मद्देनजर पोस्ट की पहुंच को सीमित कर दे रहे हैं बावजूद इसके लेखकों को इसका इस्तेमाल करना चाहिए । लेखकनुमा विवादप्रिय लोग तो कर ही रहे हैं, जेनुइन लेखकों को भी करना चाहिए ।