Translate

Saturday, January 9, 2021

हिंदी की मजबूती का मूलमंत्र उदारता


आज विश्व हिंदी दिवस है। इस अवसर पर एक बेहद दिलचस्प किस्सा याद आ रहा है। बात ग्यारह अप्रैल 1941 की है। जबलपुर में सेंट्रल प्रोविंस एंड बेरार स्टूडेंट्स फेडरेशन का एक सांस्कृतिक अधिवेशन होना तय हुआ था। फेडरेशन के सचिव चाहते थे कि इस अधिवेशन का शुभारंभ अभिनेता और निर्देशक किशोर साहू करें। किशोर साहू को आमंत्रित करने के लिए वो बांबे (अब मुंबई) पहुंचे और उनसे मिलकर अपना प्रस्ताव उनके सामने रखा। किशोर साहू ने उनका आमंत्रण स्वीकार कर लिया और नियत दिन वो जबलपुर पहुंच गए। उस वक्त तक किशोर साहू की तीन फिल्में लोकप्रिय हो चुकी थीं और एक निर्माता के तौर पर भी उनकी पहचान बन चुकी थी। रेलवे स्टेशन पर अभिनेता किशोर साहू के स्वागत में काफी लोग जुटे थे। स्टेशन पर ‘कॉमरेड किशोर साहू जिंदाबाद’ का नारा भी लगाया गया था। किशोर साहू ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि ‘राजनीतिक क्षेत्र में मैने कोई तीर नहीं मारा था, कोई विशेष कॉमरेडी नहीं दिखाई थी।‘ बावजूद इसके उनके स्वागत में कॉमरेड किशोर साहू जिंदाबाद का नारा लगा था। इस प्रसंग पर विचार करने से वामपंथ का वो पहलू सामने आता है जिसमें वो लोगों को छद्म नारों आदि से भरमाते रहे हैं। खैर यह अवांतर प्रसंग है जिसपर फिर कभी चर्चा। 

अभी हम हिंदी की बात कर रहे हैं। शाम को स्टूडेंट फेडरेशन के अधिवेशन का भव्य शुभारंभ हुआ था जिसकी अध्यक्षता विश्वंभरनाथ जी ने की थी। किशोर साहू ने अपना उद्घाटन भाषण अंग्रेजी में दिया था। भाषण को उपस्थित श्रोताओं ने काफी पसंद किया था। यहां तक तो सब ठीक था लेकिन किशोर साहू के बाद के वाले वक्ता जब बोलने खड़े हुए तो उन्होंने अंग्रेजी में भाषण देने के लिए किशोर साहू की जमकर आलोचना की। हिंदी फिल्मों से प्रसिद्धि पाने और भाषण अंग्रेजी में देने को लेकर भी उन्होंने किशोर साहू को घेरा था। किशोर साहू तबतक उनको जानते नहीं थे। अपनी आत्मकथा में किशोर साहू ने इस प्रसंग का विस्तार से उल्लेख किया है। किशोर ने मंच पर साथ बैठे एक व्यक्ति से उनका परिचय पूछा। साहू को बताया गया कि ‘वो यशपाल हैं और खुद को कॉमरेड बताते हैं।‘ तबतक किशोर साहू हिंदी के लेखक यशपाल से या उनके नाम से परिचित नहीं थे। तो उन्होंने उस व्यक्ति से पूछा कि कौन यशपाल ? जवाब मिला ‘अपने को कम्युनिस्ट कहता है अब फॉर्वर्ड ब्लाकिस्ट बना हुआ है और आपके जयघोष से जलकर आपकी खिल्ली उड़ाना चाहता है।‘ यशपाल ने किशोर साहू की इतनी तीखी और व्यक्तिगत आलोचना कर दी थी कि वो गुस्से से लाल-पीला हो रहे थे और मंच से ही यशपाल पर जवाबी हमला करने लगे थे। मामला गरमा गया था। कुछ अप्रिय घटने की आशंका को लेकर अधिवेशन की अध्यक्षता कर रहे विश्वंभरनाथ ने पहले तो किशोर साहू को रोका और फिर उनसे आगे कुछ नहीं बोलने का अनुरोध किया था। विश्वंभरनाथ ने यशपाल की उनके आचरण के लिए सार्वजनिक रूप से निंदा की और कहा, ’अगर किशोर साहू ने अंग्रेजी में भाषण दे दिया तो कोई पाप नहीं किया। उनका दिल और पोशाक तो भारतीय है। मगर, यशपाल जी, अगर आपको अंग्रेजी से इतनी नफरत है तो आपने यह अंग्रेजी पोशाक क्यों पहन रखी है?’ सभास्थल लोगों के ठहाके से गूंज उठा था। आपको बताते चलें कि कॉमरेड यशपाल ने तब कोट-पैंट पहना हुआ था और गले में लाल टाई बांधी हुई थी। किसी तरह अधिवेशन का उद्घाटन सत्र समाप्त हुआ लेकिन यशपाल अपने उपेक्षा से इतने आहत हो गए कि तय समय से पहले ही अधिवेशन छोड़कर जबलपुर से निकल गए। 

हिंदी दिवस पर इस किस्से का स्मरण इस वजह से हो रहा है कि आज भी कई लोग हिंदी को लेकर इतने संवेदनशील हो जाते हैं कि वो उसमें अंग्रेजी के शब्दों के उपयोग को लेकर हाय तौबा मचाने लगते हैं। गैर हिंदी भाषियों से भी अपेक्षा करते हैं कि वो हिंदी में ही बात करें और अगर लिखें तो शुद्ध लिखें। यह आग्रह उचित है लेकिन आग्रह जब जिद में और सामने वाले को अपमानित करने में बदल जाता है तो समस्या गंभीर हो जाती है। किशोर साहू ने साफ तौर पर स्वीकार किया था कि कॉलेज के डिबेट्स में अंग्रेजी में बोलते थे और किसी विषय पर लंबा बोलने के लिए वो अंग्रेजी में ही ज्यादा सहज थे। इसलिए उन्होंने स्टूडेंट्स फेडरेशन के सांस्कृतिक अधिवेशन में अंग्रेजी में भाषण दिया था। यशपाल को ये बर्दाश्त नहीं हुआ और उन्होंने किशोर साहू को लेकर सार्वजनिक रूप से व्यक्तिगत कटाक्ष कर दिया। वो यह भूल गए कि फिल्मों की दुनिया में काम करनेवाले किशोर साहू न सिर्फ एक अच्छे अभिनेता के तौर पर स्थापित थे बल्कि उनकी हिंदी में लिखी कहानियां उस दौर की प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में भी प्रकाशित हो चुकी थीं। बाद में तो किशोर साहू ने ‘परदे के पीछे’ के नाम से एक उपन्यास भी हिंदी में लिखा था। 

हिंदी को वैश्विक स्तर पर ना केवल स्वीकार्यता मिल रही है बल्कि व्याप्ति भी बढ़ रही है, लेकिन अगर हिंदी अपना मूल स्वभाव, उदारता, त्यागती है तो स्वीकार्यता और व्याप्ति दोनों में परेशानी हो सकती है। हिंदी में तो शुरू से ही दूसरी भाषा के शब्द लेने की उदारता रही है। हिंदी में आज न सिर्फ अंग्रेजी बल्कि फारसी और पुर्तगाली तक के शब्द बहुत सहजता के साथ स्वीकृत और प्रचलित हैं। इन भाषाओं के शब्दों को हिंदी ने इतनी उदारता के साथ अंगीकार किया है कि लगता ही नहीं है कि वो दूसरी भाषा के शब्द हैं। दूसरी भाषा के शब्दों को लेकर दुश्मनी का भाव नहीं होना चाहिए बल्कि देश काल और परिस्थिति के मुताबिक उसको अपने अंदर समाहित और स्वीकृत करने की उदारता होनी चाहिए। इससे ना केवल भाषा समृद्ध होती है बल्कि उसका शब्द भंडार भी व्यापक होता है। यह भी किया जा सकता है कि विदेशी भाषा के शब्दों को स्वीकार करने के पहले अन्य भारतीय भाषाओं के शब्दों को देखा, परखा और आजमाया जाए। अगर हमें भारतीय भाषाओं में उपयुक्त शब्द मिल जाते हैं तो उसको अंगीकार करने में प्राथमिकता देनी चाहिए। इस प्रयास की सफलता के लिए आवश्यक होगा कि भारतीय भाषाओं के शब्दकोशों को तैयार किया जाए। जो शब्दकोश तैयार हैं उनको जनता के बीच पहुंचाने का उपक्रम करना होगा। आज जिस तरह से इंटरनेट मीडिया का विस्तार हो रहा है, जिस तरह से देशभर में इंटरनेट का घनत्व बढ़ता जा रहा है, उसको ध्यान में रखते हुए भारतीय भाषाओं के शब्दकोशों को इंटरनेट पर उपलब्ध करवाने की कोशिश करनी चाहिए। बोलियों के शब्दों को सहेजने का प्रयास होना चाहिए। ये प्रयास व्यक्तिगत स्तर पर हो रहे हैं, लेकिन वो नाकाफी हैं। इसको संस्थागत स्तर पर शुरू करने का समय है ताकि भारतीय भाषाओं के बीच जो वैमनस्यता बोध कभी कभार गहराने लगता है उसका निषेध किया जा सके।

देश के अलग अलग हिस्सों में केंद्रीय विश्वविद्यालय हैं, वहां अगर इस काम की शुरुआत करवाई जाए तो ये शब्दकोश आसानी से कम समय में बन सकते हैं। किसी एक संस्थान पर बहुत ज्यादा वित्तीय बोझ भी नहीं पड़ेगा। इसको कुलपति चाहें तो अपने स्तर पर भी आरंभ करवा सकते हैं, लेकिन अगर सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों का केंद्रीयकृत प्रयास हो तो नतीजे बेहतर होंगे। इसकी शुरुआत संविधान में मान्यता प्राप्त भाषाओं से की जा सकती है। यह काम अगर अभी शुरू कर दिया जाए तो इससे नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रियान्वयन में भी सुविधा होगी। जिस तरह से राष्ट्रीय शिक्षा नीति भारतीय भाषाओं में साहचर्य की बात करती है और मातृभाषा में शिक्षा की बात कहती है उसके लिए सभी भाषाओं के आधुनिक शब्दकोश तैयार करने होंगे और हर वर्ष उसको अद्यतन भी करना होगा। करना भी चाहिए।  

Saturday, January 2, 2021

कलाकारों के लिए भी उम्मीदों का नववर्ष


नया वर्ष नई उम्मीद लेकर आया है। वर्ष के पहले ही दिन देश में कोरोना वैक्सीन के आपात उपयोग को मंजूरी मिल गई है। कोरोना महामारी के भीषण संकट से जूझ रहे देशवासियों के मनोबल को बढ़ाने वाला ये सुखद समाचार है। कोरोना की वैक्सीन ने जो उम्मीद जगाई है उससे देशभर के कलाकार भी खुश होंगे और उनकी उम्मीद भी जगेगी। उनके संकट के दिन भी समाप्त होने के आसार बढ़ेंगे। पिछले नौ दस महीने से कोरोना की वजह से कलाओं के प्रदर्शन पर बहुत असर पड़ा था। मंच पर अपनी कलाओं के प्रदर्शऩ से होनेवाली आय पर ग्रहण लगा हुआ है। कुछ दिनों पहले राजस्थान से खबर आई थी कि पद्मश्री से सम्मानित कालबेलिया नृत्य के लिए मशहूर गुलाबो सपेरा अपने घर की बिजली का बिल नहीं भर पा रही थीं। उन्होंने राजस्थान फोरम के अध्यक्ष पंडित विश्वमोहन भट्ट को इस बाबत एक पत्र लिखकर अपनी पीड़ा जताई थी। गुलाबो ने अपने पत्र में लिखा कि बिल का भुगतान नहीं होने की वजह से उनके घर की बिजली काट दी गई है। इस संबंध में उन्होंने राजस्थान के संस्कृति मंत्री बी डी कल्ला से भेंट कर अपनी व्यथा उनके सामने रखी थी। गुलाबो ने अपने पत्र में लिखा है कि ‘मैंने माननीय मंत्री महोदय श्रीमान बी डी कल्ला से जी से भी निवेदन किया था लेकिन उन्होंने भी असमर्थता व्यक्त करते हुए कोई मदद नहीं की।‘ राजस्थान सरकार की संवेदनहीनता के बाद गुलाबो ने राजस्थान फोरम का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने कहा कि उन्हें मदद मांगते हुए बहुत शर्म आ रही है, लोग क्या कहेंगे कि पद्मश्री से सम्मानित कलाकार बिजली का बिल नहीं भर पा रही है। लेकिन बच्चों की खातिर उन्होंने मदद मांगी। राजस्थान फोरम ने उनके बिजली बिल का भुगतान कर दिया जो करीब चौवन हजार रुपए का था। ये हालत तो उस कलाकार की है जो पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है और जिसने नृत्य की एक विधा को स्थापित कर लोकप्रिय बनाया। 

कोरोना के संकट के समय कलाकारों के सामने जीवन-यापन का बड़ा संकट उत्पन्न हो गया है। कोरोना की वजह से कलाकारों की प्रस्तुतियां बंद हो गईं।     हम इस बात की कल्पना कर सकते हैं कि जब कलाकार आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं तो उनके साजिंदों का क्या हाल होगा। मंच पर गायन प्रस्तुत करनेवाले कलाकार अपनी आय से अपने साजिंदों को भुगतान करते हैं। ज्यादातर साजिंदों को कलाकार प्रस्तुति के हिसाब से भुगतान करते हैं। कोरोना की वजह से पिछले वर्ष मार्च में लॉकडाउऩ हुआ था तब ये चिंता जाहिर की गई थी। केंद्र सरकार से भी कलाकारों के लिए मदद की अपील की गई थी। सरकार की तरफ से मदद का आश्वासन मिला था। बताया गया था कि देशभर में फैले क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों के जरिए कलाकारों की मदद की जाएगी। क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों को मदद की अपेक्षा कर रहे कलाकारों की सूची बनाने के लिए कहा गया था। पूरे देश में सात सांस्कृतिक केंद्र काम करते हैं जो अपने अपने क्षेत्रों के कलाकारों के संपर्क में रहते हैं। लेकिन सूची बनाने का काम अभी तक कहां पहुंचा ये जानकारी नहीं मिल पाई। कितने कलाकारों को मदद दी गई इसके बारे में भी ज्ञात नहीं हो सका। कई कलाकारों से बात करने के बाद ये पता चला कि कलाकारों को अभी सरकार की तरफ से कोरोना संकट के दौरान कोई आपातकालीन मदद नहीं दी जा सकी है।

इस बीच कलाकारों की मदद के लिए कुछ निजी प्रयास हुए। लोक गायिका मालिनी अवस्थी ने अपने साथियों के साथ मिलकर कलाकारों की मदद की पहल शुरू की थी। ‘सेव द रूट्स’ के नाम से। इसके तहत लोगों से कलाकारों के आर्थिक मदद की अपील की गई थी। बाद में संस्कृति गंगा न्यास भी इससे जुड़ा और अबतक इसके माध्यम से करीब आठ सौ कलाकारों को आर्थिक मदद दी जा चुकी है। राजस्थान फोरम ने भी कलाकारों की मदद का फैसला लिया है।  छोटे कलाकारों के अलावा बड़े कलाकारों को मंच से होनेवाली आय तो नहीं ही हो रही है, उनको भारत सरकार से मिलनेवाली ग्रांट भी देर सबेर मिल रही है। भारत सरकार का संस्कृति मंत्रालय कलाकारों को प्रोडक्शन ग्रांट और सैलरी ग्रांट देता है। पिछले तीन साल से इसको देने में भी देरी हो रही थी। गुरुओं को उनके शागिर्दों के लिए जो सैलरी ग्रांट मिलती थी उसको सरकार अब सीधे उनके खाते में ट्रांसफर करने लगी है। इसकी वजह से भी परेशानी हो रही है। सैलरी ग्रांट का भुगतान समय से हो अन्यथा कलाकारों को परेशानी होती है। किसी कार्यक्रम में कोई शागिर्द तीन महीने काम करता है और प्रोडक्शन के बाद छोड़ कर चला जाता है। जाने के पहले वो गुरू से तीन महीने का अपना तय वेतन लेकर चला जाता है। सरकार उस सैलरी ग्रांट को अगर दो साल बाद उस शागिर्द के खाते में सीधे ट्रांसफर करेगी तो गुरुओं को नुकसान होगा। क्योंकि गुरू तो पहले ही शागिर्द को भुगतान कर चुके हैं। इसके व्यावहारिक पक्ष को देखा जाना चाहिए। इसपर भी विचार करना चाहिए कि शागिर्द गुरुओं के स्थायी कर्मचारी नहीं होते हैं।

इसके अलावा पिछले दिनों कलाकारों को दिल्ली में मिले सरकारी घरों को खाली कराने के नोटिस की भी खूब चर्चा रही। ये सही है कि कलाकार तय समय सीमा से अधिक समय से इन घरों में रह रहे हैं। उनसे सरकारी घरों को खाली करवाना कानूनसम्मत है, लेकिन कोरोना संकट के समय मानवीय आधार पर भी विचार होना चाहिए था। बिरजू महाराज समेत कई कलाकार सरकारी घरों में रह रहे हैं। ये स्थितियां इस वजह से सामने आ रही हैं कि हमारे देश में कोई सांस्कृतिक नीति नहीं है। कांग्रेस के शासनकाल के दौरान ज्यादातार समय संस्कृति से संबंधित मामलों को चलाने का ठेका वामपंथियों के पास था। तय नीति नहीं होने की वजह से वो अपनी विचारधारा के लोगों को तरह-तरह से उपकृत करते रहते थे। भारत ने संस्कृति को लेकर यूनेस्को कंवेंशन 2005 को 15 दिसंबर 2006 को स्वीकार किया था। यूनेस्को कंवेंशन के मुताबिक कला और संस्कृति को लेकर सरकार की नीति के अंतर्गत इनको संरक्षित करने, उसके लिए कानून बनाने, आर्थिक और अन्य मदद के नियम बनाने से लेकर कार्यक्रमों की नीति बनाना तक शामिल किया गया था। इसके मूल में ये अवधारणा है कि संस्कृति सतत विकास की संवाहक होती है। इस कंवेंशन के मुताबिक सरकार को हर वर्ष अपनी एक रिपोर्ट प्रस्तुत करनी थी लेकिन पहली रिपोर्ट नरेन्द्र मोदी सरकार ने 29 अप्रैल 2015 में पेश की। इससे ये भी दिखता है कि पूर्ववर्ती यूपीए सरकार संस्कृति को लेकर कितनी गंभीर थी। दरअसल संस्कृति को लेकर जो सबसे बड़ी बाधा है वो ये कि ये सरकारों की प्राथमिकता में नहीं होती है, जिसकी वजह से इसको लेकर कोई ठोस नीति नहीं बन पाती। ठोस नीति के नहीं होने की वजह से अलग अलग विभागों की अपनी अपनी प्राथमिकताएं होती हैं, कई बार कई संस्थाएं एक ही काम कर रही होती हैं। कोरोना काल में जिस तरह से कलाकारों की समस्याएं उभर कर सामने आईं उसने सांस्कृतिक नीति पर गंभीरता से विचार करने की वजह दे दी है। संस्कृति को बेहद संवेदनशीलता के साथ समझने और उसके मुताबिक काम करने की जरूरत है। संस्कृति मंत्रालय बेहद अहम और संवेदनशील मंत्रालय है जिसके जिम्मे प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से राष्ट्र निर्माण और उसको मजबूत करने की जिम्मेदारी है। संस्कृति नीति के लिए संस्कृति मंत्रालय को पहल करनी चाहिए, इसके लिए ये सबसे उचित समय है। अगर ऐसा हो पाता है तो फिर गुलाबो जैसी प्रतिष्ठित कलाकार को अपने घर की बिजली का बिल भरने के लिए कहीं हाथ नहीं फैलना पड़ेगा।     


Saturday, December 26, 2020

सांस्कृतिक उपनिवेशवाद का प्रतिकार हो


अभी अभी क्रिसमस बीता है, उस अवसर पर एक मित्र से बात हो रही थी। उन्होंने बताया कि क्रिसमस के दो दिन पहले उनकी तीन साल की बिटिया ने उनसे पूछा कि ‘व्हेयर इज माइ क्रिसमस ट्री (मेरा क्रिसमस ट्री कहां है)?’ उसके पहले भी वो अपनी बिटिया के बारे में बताते रहते थे कि कैसे अगर वो ब्रश नहीं करती है तो उसको कार्टून सीरियल दिखाना पड़ता है आदि-आदि। वो इस बात को लेकर चिंता प्रकट करते रहते थे कि बच्चों पर इन कार्टून सीरियल्स का असर पड़ रहा है। लेकिन जब क्रिसमस ट्री वाली बात बताते हुए उन्होंने कहा कि एक दिन ऐसा भी आ सकता है कि बच्चे कहने लगें कि ‘टुडे इज संडे, लेट्स गो टूट चर्च’ ( आज रविवार है, चलो चर्च चलते हैं) । ये सुनने के बाद मुझे लगा कि उनकी बातों में एक गंभीरता हैं। उनसे बातचीत होने के क्रम में ही एक और मित्र से हुई बातचीत दिमाग में कौंधी। उसने भी अपने दो साल के बेटे के उच्चारण के बारे में बताया था कि वो इन दिनों ‘शूज’ को ‘शियूज’ कहने लगा है। इन दोनों में एक बात समान थी कि दोनों के बच्चे यूट्यूब पर चलनेवाले सीरियल ‘पेपा पिग’ देखते हैं और दोनों उसके दीवाने हैं। लॉकडाउन के दौरान जब बच्चे स्कूल नहीं जा रहे थे और घर पर थे तो ‘पेपा पिग’ और भी लोकप्रिय हो गया। यूट्यूब पर इसका अपना चैनल है जिसको लाखो बच्चे देखते हैं। ‘पेपा पिग’ चार साल की है जिसका एक भाई है ‘जॉर्ज’ और उसके परिवार में मम्मी पिग और डैडी पिग हैं। बच्चे इसके दीवाने हैं कि ‘पेपा पिग’ के चित्र वाला स्कूल बैग से लेकर पानी की बोतल, लंच बॉक्स तक बाजार में मिलते है। बच्चे इन सामग्रियों को बहुत पसंद करते हैं। कई छोटे बच्चों के माता-पिता से बात हुई तो उन्होंने कहा कि ‘पेपा पिग’ उनके लिए बहुत मददगार है क्योंकि जब बच्चा जिद करता है या खाना नहीं खाता है तो उसको ‘पेपा पिग’ के उस जिद से संबंधित वीडियो दिखा देते हैं और वो खाने को तैयार हो जाता है। ये कार्टून कैरेक्टर के वीडियोज को ब्रिटेन की एक कंपनी बनाती है और उसको यूट्यूब पर नियमित रूप से अपलोड करती है। 

ये बातें बेहद सामान्य बात लग सकती है। ‘पेपा पिग’ के वीडियोज के संदर्भ में ये तर्क भी दिया जा सकता है कि वो परिवार की संकल्पना को मजबूत करता है। ये बात भी सामने आती है कि ब्रिटेन में जब पारिवारिक मूल्यों का लगभग लोप हो गया तब बच्चों को परिवार नाम की संस्था की महत्ता के बारे में बताने के लिए ‘पेपा पिग’ का सहारा लिया गया है। वो वहां काफी लोकप्रिय हो रहा है लेकिन उन्होंने इन वीडियोज को अपने धर्म, अपनी संस्कृति के हिसाब से बनाया है। लेकिन जिस तरह का असर हमारे देश के बच्चों पर पड़ रहा है, जिस तरह की बातों का उल्लेख ऊपर किया गया है, उसके बाद इन वीडियोज के हमारे देश में प्रसारण के बारे में विचार किया जाना चाहिए। अगर मेरे मित्रों की कही गई बातों का ध्यान से विश्लेषण करें तो इससे बच्चों के दिमाग में एक ऐसी संस्कृति की छाप पड़ रही है जो भारतीय नहीं है। बालमन पर पड़ने वाले इस प्रभाव का दूरगामी असर हो सकता है। बच्चे अपनी भारतीय संस्कृति से दूर हो सकते हैं। इस बात पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है कि क्या इन वीडियोज से हमारे सांस्कृतिक मूल्यों का और अधिक क्षरण होगा। इस समय संचार माध्यमों का उपयोग अपने हितों का विस्तार देने के औजार के तौर पर किया जा रहा है. इसका ध्यान रखना अपेक्षित है। तकनीक के हथियार से सांस्कृतिक और धार्मिक उपनिवेशवाद को मजबूत किया जा सकता है। ‘पेपा पिग’ के माध्यम से जो बातें हमारे देश के बच्चे सीख रहे हैं वो तो कम से कम इस ओर ही इशारा कर रहे है। बाल मनोविज्ञान भी इस बात की पुष्टि करता है कि बच्चे जब इस तरह के वीडियोज देखते हैं तो वो अपने आसपास की दुनिया को भी वैसा ही समझने लगते हैं। इसका असर बच्चों के बौद्धिक स्तर पर भले न पड़ता हो लेकिन उसका सामाजिक जीवन प्रभावित होता है। जब सामाजिक जीवन प्रभावित होता है तो संस्कृति प्रभावित होती है।

अभी हाल में भारत सरकार ने क्यूरेटेड और नॉन क्यूरेटेड सामग्री को लेकर मंत्रालयों के बीच स्थिति स्पष्ट की थी। वीडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स या ओवर द टॉप प्लेटफॉर्म (ओटीटी), जहां क्यूरेटेड सामग्री दिखाई जाती है, उसको सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अधीन किया गया था। नॉन क्यूरेटेड सामग्री दिखाने वाले जिसमें यूट्यूब, फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म्स आते हैं को इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अधीन किया गया। ये इन प्लेटफॉर्म्स पर चलनेवाले कंटेट पर बेहतर तरीके से ध्यान देने के लिए किया गया है। यूट्यूब पर चलनेवाले चैनलों पर अगर भारतीय संस्कृति को प्रभावित करनेवाले वीडियोज हैं तो भारत सरकार को इसको गंभीरता से लेना चाहिए। ऐसा करना इस वजह से भी आवश्यक है क्योंकि हमने वो दौर भी देखा है जब कांग्रेस ने वामपंथियों को संस्कृति और उससे जुड़े विभाग आउटसोर्स किए थे। उस दौर में कालिदास के नाटकों पर चेखव के नाटकों और प्रेमचंद के उपन्यास ‘गोदान’ पर मैक्सिम गोर्की के उपन्यास ‘मां’ को तरजीह दी गई। परिणाम ये निकला कि हमारा सांस्कृतिक क्षरण बहुत तेजी से हुआ। शिक्षा, भाषा, साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में जितना काम होना चाहिए था वो हो नहीं पाया। अंग्रेजी के दबदबे की वजह से सांस्कृतिक उपनिवेशवाद को मजबूती मिली। इसका असर बच्चों पर भी पड़ा। भारतीय भाषाओं के बाल साहित्य को अंग्रेजी में उपलब्ध सामग्री ने नेपथ्य में धकेल दिया। अब तकनीक के माध्यम से जिस तरहसे भारतीय संस्कृति को दबाने का प्रयास किया जा रहा है उसका प्रतिकार जरूरी है।  

प्रतिकार का दूसरा एक तरीका ये हो सकता है कि बच्चों के लिए बेहतर वीडियोज बनाकर यूट्यूब से लेकर अन्य माध्यमों पर प्रसारित किए जाएं। इसको ठोस योजना बनाकर क्रियान्वयित किया जाए।। भारतीय संस्कृति, भारतीय परंपरा और भारतीयता को चित्रित करते वीडियोज को बेहद रोचक तरीके से पेश करना होगा ताकि बच्चों की उसमें रुचि पैदा हो सके। हमारे पौराणिक कथाओं में कई ऐसे चरित्र हैं जो बच्चों को भा सकते हैं, जरूरत है उनकी पहचान करके बेहतर गुणवत्ता के साथ पेश किया जाए। इसके लिए सांस्थानिक स्तर पर प्रयास करना होगा क्योंकि ‘पेपा पिग’ का जिस तरह का प्रोडक्शन है वो व्यक्तिगत प्रयास से बनाना और उसकी गुणवत्ता के स्तर तक पहुंचना बहुत आसान नहीं है। इसके लिए बड़ी पूंजी की जरूरत है। व्यक्तिगत स्तर पर छिटपुट प्रयास हो भी रहे हैं लेकिन वो काफी नहीं हैं क्योंकि उनकी पहुंच बहुत ज्यादा हो नहीं पा रही है। हमारे देश को आजाद हुए सात दशक से अधिक बीत चुके हैं लेकिन हमने अबतक अपनी संस्कृति को केंद्र में रखकर ठोस काम नहीं किया। आजादी के पचहत्तर साल पूरे होने के मौके पर फिल्म जगत के बड़े निर्माताओं ने फिल्में बनाने की घोषणा की है। करण जौहर ने इसकी घोषणा करते हुए ट्वीटर पर प्रधानमंत्री को टैग भी किया है। जरूरत इस बात की है कि करण और उनके जैसे बड़े निर्माता बच्चों के लिए मनोरंजन सामग्री बनाने के बारे में भी विचार करें। ‘पेपा पिग’ के स्तर का प्रोडक्शन हो जिसमें भारतीय संस्कृति के बारे में बताया जाए। अगर हम ऐसा कर पाते हैं तो ना केवल अपनी संस्कृति को सांस्कृतिक औपनिवेशिक हमलों से बचा पाएंगे बल्कि आनेवाली पीढ़ी को भी भारतीयता से जोड़कर रख पाएंगे। 


Thursday, December 24, 2020

पौराणिक भारतीय कथाओं में दिलचस्पी


कोरोना की छाया में बीत रहे इस वर्ष में भारतीय दर्शकों को पौराणिक और ऐतिहासिक कथाओं में गहरी दिलचस्पी देखने को मिली। लॉकडाउन के दौरान जब दूरदर्शन पर रामायण और महाभारत सीरियल दिखाने का एलान हुआ था तब इस बात की आशंका भी थी कि इतने लोकप्रिय धारावाहिकों को दूसरी बार देखा जाएगा कि नहीं। तमाम आशंकाओं को धता बताते हुए रामायण धारावाहिक ने लोकप्रियता के नए कीर्तिमान स्थापित किए। अप्रैल में प्रसारित एपिसोड को करीब पौने आठ करोड़ दर्शकों ने देखा। रामायण के दर्शकों का ये आंकड़ा हाल फिलहाल में पूरी दुनिया में किसी भी सीरीज को हासिल नहीं हो सका है। मशहूर और बेहद लोकप्रिय सीरीज ‘द गेम ऑफ थ्रोन्स’ और ‘बिग बैंग थ्योरी’ को भी इतने अधिक दर्शक नहीं मिले थे। उनके दर्शक भी पौने दो करोड़ तक पहुंच सके थे। तब प्रसार भारती के सीईओ शशि शेखर वेम्पति ने ट्वीट कर देशभर के दर्शकों का शुक्रिया अदा किया था और साथ ही ये जानकारी भी साझा की थी कि टीआरपी (टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट) जारी करनेवाली संस्था बीएआरसी के मुताबिक इस वर्ष के तेरहवें सप्ताह में दूरदर्शन देशभर में सबसे अधिक देखा जानेवाला चैनल बन गया। सिर्फ रामायण ही नहीं बल्कि महाभारत को भी दर्शकों ने बेहद चाव से देखा। इसके अलावा चाणक्य और शक्तिमान को मिले दर्शकों ने दूरदर्शन को अपने पुराने सीरीज के पुनर्प्रसारण का रास्ता दिखाया।

कोरोना काल के दौरान के दौरान रामायण और महाभारत को मिली अपार सफलता ने एक बार फिर से साबित किया कि हमारे देश के दर्शकों में धर्म और अध्यात्म से संबंधित चीजों को देखने जानने और समझने की लालसा है। जरूरत इस बात की है कि उनको इस तरह की श्रेष्ठ सामग्री दिखाई जाए। देश का युवा वर्ग भी अपनी परंपराओं और अध्यात्म में खासी रुचि रखता है, ये बात भी इन सीरीज की लोकप्रियता ने साबित की। हमारे देश में आध्यात्म का जो बल है, अध्यात्म की जो आतंरिक अनुभूति है उसका प्रकटीकरण भी कोरोना काल के दौरान हुआ। इसको ध्यान में रखते हुए एक बार फिर से पौराणिक और ऐतिहासिक कथाओं पर आधारित फिल्में और सीरीज बनाए जाने लगे हैं। आनेवाले दिनों में पृथ्वीराज चौहान से लेकर महाभारत की कहानियों पर आधारित फिल्में आने वाली हैं। हमारा देश कथावाचकों का देश रहा है। कथावाचन की हमारे यहां सुदीर्घ परंपरा रही है। इस कथावाचन का आधार भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक पात्र और चरित्र रहे हैं। फिल्मों में भी कथावाचन की इस परंपरा के सूत्र को खोजने और उसको पकड़कर दर्शकों तक पहुंचाने की कोशिशें इस वर्ष आरंभ हो चुकी है।  

देसी कहानियों के बोलबाला का वर्ष


वर्ष 2020 खत्म होने को आया। लगभग पूरा वर्ष कोराना संकट से जूझते ही बीता। कोरोना वायरस के फैलाव को रोकने के लिए किए गए लॉकडाउन की वजह से पूरे देश के सिनेमा हॉल कई महीनों तक बंद रहे। कोरोना के भय के कम होने के बाद जब सिनेमा हॉल खुले तब भी दर्शकों का पुराना प्यार नहीं मिल पाया है। मनोरंजन के विकल्प के तौर पर लोगों की रुचि वीडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स में बढ़ी। फिल्में भी वहीं रिलीज होने लगीं। वीडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स या ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म्स पर दर्शकों की संख्या में भी अभूतपूर्व इजाफा हुआ, महानगरों से लेकर छोटे शहरों और कस्बों तक में। ये वो घटनाएं रहीं जिनके बारे में चर्चा होती रही है लेकिन कोरोना संकट के दौरान पिछले नौ महीने में कुछ ऐसा मंहत्वपूर्ण हुआ जिसने मनोरंजन जगत को बहुत गहरे तक प्रभावित किया। उसकी दिशा में अहम बदलाव देखने को मिला। सबसे पहले जिस महत्ववपूर्ण बदलाव को रेखांकित करने की जरूरत है वो है कहानियों में भारतीय परिवेश और भारतीयता का बढ़ता चलन। अगर हम इस वर्ष रिलीज हुई फिल्मों और वेब सीरीज पर नजर डालें तो इनकी कहानियों में भारतीयता बोध उभर कर सामने आता है। फिल्मकारों ने उन कहानियों को तवज्जो दी और दर्शकों ने भी उसको पसंद किया जिसमें अपनी माटी की मिट्टी की खुशबू थी, अपने आसपास की कहानी होने का लगाव सा था या अपने समाज में घटी या घट रही घटनाओं का चित्रण है। जैसे अगर हम बात करें तो सबसे पहले जून में रिलीज हुई फिल्म ‘गुलाबो सिताबो’ का कथानक जेहन में आता है। एक हवेली के माध्यम से मिर्जा और उनकी बेगम के बीच रची गई इस कॉमेडी ड्रामा में लखनऊ का परिवेश साकार हो उठता है। इस फिल्म की कहानी के साथ साथ संवाद में भी लखनऊ की पूरी संस्कृति उपस्थित है। ‘गुलाबो सिताबो’ की रिलीज के अगले ही महीने एक और फिल्म आई जिसमें हमारे आसपास की ही एक और कहानी को दर्शकों ने खूब पसंद किया, ये फिल्म थी ‘शकुंतला देवी’। इस फिल्म में गणित की जीनियस शकुंतला देवी के बहाने दर्शकों को आजादी पूर्व के दक्षिण भारत के एक गांव का परिवेश दिखता है। वहां के सामाजिक यथार्थ से सामना होता है और फिर ये कहानी महानगरों से होती हुई दर्शकों को देश विदेश ले जाती है। इस पूरी कहानी में भारतीय परिवार के सस्कारों को स्थापित किया गया है। एक और फिल्म का उल्लेख करना आवश्यक है वो है ‘गुंजन सक्सेना, द करगिल गर्ल’। इस फिल्म में भी एक भारतीय महिला अफसर की जाबांजी के किस्से को फिल्मी पर्दे पर उतारा गया है। 

हम इन फिल्मों में एक साझा सूत्र की तलाश करें तो हमें अपने देसी परिवेश और यहां का संघर्ष दिखाई देता है, भारतीय होने का गौरव दिखाई देता है। कोरोना संकट शुरू होने के पहले एक फिल्म आई थी तान्हाजी, इसमें भी हमारे देश के उस नायक को फिल्मी पर्दे पर उतारा गया था जिसकी वीरता के किस्से लोकगाथाओं में गूंजते हैं। इन सबके मद्देनजर ये भी कहा जा सकता है कि ये वर्ष फिल्मों में लेखकों की वापसी का वर्ष भी रहा। बीच में इस तरह की कहानियां आ रही थीं जिनके बारे में ‘माइंडलेस कॉमेडी’ जैसे शब्द कहे जाते थे लेकिन इस वर्ष जितनी भी कहानियां आईं उसमें अगर कॉमेडी भी थी तो उसका एक अर्थ था, एक संदेश था। इस तरह की एक और फिल्म आई ‘छलांग’, जिसकी कहानी हरियाणा के एक गांव के स्कूल के इर्द गिर्द चलती है। ये भी एक कॉमेडी ड्रामा ही है लेकिन इसमें भी हरियाणा का परिवेश जीवंत हो उठता है। एक जमाना था जब विदेशी फिल्मों के प्लॉट उठातक उसको भारतीय स्थितियों में ढालकर चित्रित किया जाता था। यहां तक अब तक की सबसे हिट फिल्म मानी जानेवाली ‘शोले’ को भी कुरुसोवा की फिल्म सेवन समुराई पर आधारित माना गया था। लेकिन इस वर्ष को भारतीय फिल्मों में भारतीय कहानियों के वर्ष के तौर पर याद किया जाएगा। 

इसी तरह से अगर हम वेब सीरीज देखें तो उसमें भी भारतीय कहानियों की मांग ही बढ़ी। वीडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स पर दुनियाभर की सीरीज मौजूद हैं लेकिन भारतीय कहानियों और लोकेल पर पर बनी सीरीज अधिक पसंद की गईं। इस साल रिलीज हुई वेब सीरीज पर नजर डालें तो चाहे वो आर्या हो, पाताल लोक हो, आश्रम हो, बंदिश बैंडिट्स हो, पंचायत हो इन सबमें हमारे आसपास की कहानियां हैं। ना सिर्फ कहानियों में बल्कि इन सीरीज की भाषा और मुहावरों में भी देसी बोली के शब्दों को जगह मिलने लगी है। अगर हम याद करें तो एक वेब सीरीज आई थी जामताड़ा, सबका नंबर आएगा। इस फिल्म के संवाद में ‘कनटाप’ शब्द का उपयोग हुआ है। ये शब्द कानपुर और उसके आसपास में प्रयोग किया जाता है। इसी तरह से वेब सीरीज आर्या में भी राजस्थान की भाषा सहज रूप से आती है और लोग उसको स्वीकार भी करते हैं और पसंद भी। इन बिंदुओं को ध्यान में रखते हुए ये कहा जा सकता है कि ये वर्ष भारतीय मनोरंजन जगत के आत्मनिर्भर होने और अपनी आंतरिक सामर्थ्य को पहचानने का वर्ष भी रहा। 

Saturday, December 19, 2020

कृतियों से गाढ़ी होती आश्वस्ति


वर्ष दो हजार बीस बीतने को आया। चंद दिनों बाद ये वर्ष भी इतिहास के पन्नों में दर्ज होकर रह जाएगा। पर दो हजार बीस को कोरोना की वजह से सदियों तक याद किया जाता रहेगा। कोरोना के अलावा भी कुछ ऐसी घटनाएं घटीं जिनको इतिहास याद रखेगा। अगर साहित्य सृजन की दृष्टि से देखें तो ये वर्ष बहुत उत्साहजनक नहीं रहा लेकिन कुछ रचनाएं ऐसी आईं जो सालों तक याद रखी जाएंगी। तीन साल पहले मशहूर और विवादित लेखिका वेंडि डोनिगर की एक किताब आई थी, ‘द रिंग ऑफ ट्रूथ, मिथ्स ऑफ सेक्स एंड जूलरी’ । उस पुस्तक के शोघ का दायरा और पूरी दुनिया के ग्रंथों से संदर्भ लेने की मेहनत पर इस स्तंभ में टिप्पणी की गई थी। तब इस बात पर अफसोस हुआ था कि हिंदी के समकालीन लेखक इस तरह का लेखन क्यों नहीं कर रहे हैं। जबकिं हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में इस तरह के लेखन की एक लंबी परंपरा रही है। वेंडि डोनिगर ने उक्त किताब में इस बात पर शोध किया था कि अंगूठियों का कामेच्छा से क्या संबंध रहा है ? क्यों पति-पत्नी से लेकर प्रेमी-प्रेमिका के लिए अंगूठी इतनी महत्वपूर्ण रही है और है। कभी अंगूठी प्यार का प्रतीक बन जाती है तो कभी इसका उपयोग वशीकरण यंत्र के तौर पर किए जाने की चर्चा मिलती है। कई धर्मग्रंथों और शेक्सपियर से लेकर कालिदास और तुलसीदास के साहित्य से उन्होंने अंगूठी के बारे में सामग्री इकट्ठा कर उसपर विस्तार से लिखा था। 

इसी तरह से इस वर्ष मार्च में पत्रकार क्रिस्टीना लैंब की एक पुस्तक आई थी, ‘ऑवर बॉडीज देयर बैटलफील्ड, व्हाट वॉर डज टू अ वूमन’। करीब तीस साल तक युद्ध और हिंसाग्रस्त इलाके की रिपोर्टिंग करनेवाली पत्रकार क्रिस्टीना ने अपनी इस किताब में कई देशों में सैन्य कार्रवाइयों से लेकर आतंकवादी हिंसा में औरतों पर होनेवाले जुल्मों का दिल दहलानेवाला वर्णन किया है। उन्होंने अपनी किताब में सच्ची घटनाओं और पीड़ितों से बातचीत के आधार पर ये बताया है कि युद्ध और हिंसा के दौरान या फिर आतंकवादी हमले के दौरान बलात्कार को हथियार के तौर इस्तेमाल किया जाता है। जबकि 1919 में ही दुनिया के सभी देशों ने बलात्कार को युद्ध अपराध की श्रेणी में मान लिया था। इस पुस्तक का रेंज व्यापक है और इसका कैनवस ये सोचने को मजबूर करता है कि हिंदी में इस तरह का काम क्यों नहीं हो पा रहा है। 

लेकिन पिछले साल दो ऐसी पुस्तकें आईं जिसने हिंदी में हो रहे काम के प्रति एक आश्वस्ति दी। पहला काम किया है उत्तर प्रदेश के एटा में जन्मे बयासी साल के लेखक महेन्द्र मिश्र ने। उन्होंने सिनेमा पर बहुत श्रमपूर्वक एक पुस्तक लिखी ‘भारतीय सिनेमा’। साढे सात सौ पन्नों की इस पुस्तक में महेन्द्र मिश्र ने विस्तार से भारतीय सिनेमा के बारे में लिखा है। उन्होंने भारतीय भाषाओं में बनने वाले सिनेमा को इसमें समेटा है। जाहिर सी बात है हिंदी फिल्मों पर ज्यादा विस्तार है लेकिन महेन्द्र मिश्र ने मणिपुरी, कर्बी, बोडो, मिजो और मोनपा भाषा कि फिल्मों के बारे में भी बताया है। इसके अलावा तमिल, तेलुगू हरियाणवी, छत्तीसगढ़ी फिल्मों पर भी जानकारियां हैं। लेखक ने लिखा है पुस्तक की भूमिका में लिखा है ‘जब हम सिनेमा की बात करते हैं तो अक्सर यही समझा जाता है कि मुंबई में बनने वाली हिंदी फिल्में ही भारत का सिनेमा है। यह धारणा केवल उत्तर भारत या हिंदी भाषी प्रदेशों में रहनेवालों की नहीं है, देश की बड़ी आबादी वाले कई महानगरों के निवासी भी यही सोचते हैं। देश के अन्य भाषाओं में बननेवाली मुख्यधारा की सैकड़ों फिल्मों के बारे में, खासकर तमिल तेलुगू, मलयालम भाषा की फिल्मों के बारे में कम लोग जानते हैं।‘ महेन्द्र मिश्र ने अपनी इस पुस्तक से इस स्थापित धारणा को तोड़ने की कोशिश की है। अपनी इस पुस्तक में महेन्द्र मिश्र ने सभी भाषाओं की महत्वपूर्ण फिल्मों के को अपने लेखन का आधार बनाया है। हिंदी में अबतक फिल्मों पर समग्रता में बहुत काम नहीं हुआ है। तथाकथित मुख्यधारा के हिंदी साहित्यकारों ने, जो वामपंथ के प्रभाव में रहे, फिल्म अध्ययन को उतना महत्व नहीं दिया जितना मिलना चाहिए था। हिंदी के लोग अब भी नहीं भूले हैं कि जब ज्ञानपीठ पुरस्कार अर्पण समारोह में अमिताभ बच्चन को आमंत्रित किया गया था तो अशोक वाजपेयी समेत कई साहित्यकारों ने इसको मर्यादा के खिलाफ बताया था। महेन्द्र मिश्र की इस पुस्तक से एक उम्मीद जगी है कि भविष्य में भी भारतीय फिल्मों पर गंभीर काम हो सकेगा। 

इसी तरह से उत्तर प्रदेश के ही रामपुर के राजकीय महिला महाविद्यालय में कार्यरत डॉ अलिफ नाजिम ने एक बेहद महत्वपूर्ण काम किया है। उन्होंने उर्दू के महान शायर मुंशी दुर्गा सहाय सुरूर जहानाबादी की कविताओं को एक जगह जमा करके उनके समग्र का संपादन किया। कई बार इस बात को लेकर भ्रम हो जाता है कि सुरूर जहानाबादी बिहार के कवि थे और इनका जन्म बिहार के जहानाबाद में हुआ था। लेकिन सचाई तो ये है कि सुरूर जहानाबादी का बिहार के जहानाबाद से कोई लेना देना नहीं है। अलिफ नाजिम साहब लिखते हैं कि ‘जो जहानाबाद दुर्गा सहाय सुरूर के उपनाम का हिस्सा बनकर साहित्य की दुनिया में अमर हो गया है उसका संबंध बिहार से नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश से है।‘ ये पीलीभीत जिले का एक कस्बा है। अपनी जिंदगी के शुरुआती दिन जहानाबाद में बिताने के बाद रोजगार की तलाश में दुर्गा सहाय मेरठ आ गए और यहां विद्या प्रकाशन में सहायक संपादक की नौकरी कर ली। अलिफ नाजिम के मुताबिक दुर्गा सहाय ने यहीं अपने नाम के साथ सुरूर लगाना शुरू किया। सुरूर को सैंतीस साल की उम्र मिली। इतनी छोटी उम्र में उनकी पत्नी और बेटे का निधन हो गया। पत्नी की मृत्यु के सदमे से उबरे तो ‘दुनिया की उजड़ी गुई दुल्हन’ जैसी कविता लिखकर अपनी चुप्पी तोड़ी। बेटे की मौत पर ‘दिले-बेकरार सोजा’ जैसी रचना लिखी जिसको पढ़कर किसी का भी ह्रदय द्रवित हो सकता है। इतनी छोटी उम्र में ही सुरूर को बेहद प्रसिद्धि मिली थी। अल्लामा इकबाल से सुरूर के संबंध बहुत अच्छे थे और इकबाल उनकी बहुत इज्जत करते थे। इकबाल ने एक दौर में अपने आप को शायरी से अलग कर लिया था। तब सुरूर ने एक कविता लिखी जिसका शीर्षक था, ‘फिजा-ए-बरशगाल और प्रोफेसर इकबाल’। ये कविता 1906 में लाहौर से प्रकाशित होनेवाले अखबार ‘मखजन’ में प्रकाशित हुई। इसको पढ़कर इकबाल ने तुरंत एक नई कविता लिखकर संपादक को भेज दी। संपादक को लिखे अपने पत्र में इकबाल ने लिखा कि ‘सुरूर मेरी खामोशी तोड़ना चाहते हैं, वो कहीं खफा न हो जाएं इसलिए ये गजल भेज रहा हूं।‘ इससे सुरूर की महत्ता समझी जा सकती है। आज भी देश के जिन भी विश्वविद्यालयों में उर्दू पढ़ाई जाती है लगभग सभी में सुरूर की कविताएं पढ़ाई जाती हैं। अलिफ नाजिम ने देशभर के अलग अलग पुस्तकालायों से खोजकर सुरूर की कविताओं को समग्र में संग्रहीत कर बड़ा काम किया है। 

एक बात जो रेखांकित करने योग्य है वो ये कि ‘भारतीय सिनेमा’ और ‘सुरूर जहानाबादी समग्र’ दोनों का प्रकाशन दिल्ली से नहीं हुआ, दोनों के लेखक दिल्ली में नहीं रहते। एक का प्रकाशन प्रयागराज से हुआ है तो दूसरे का प्रकाशन बठिंडा, पंजाब से हुआ है। ये सिर्फ इस वजह से कह रहा हूं कि दिल्ली में हो रहे लेखन को ज्यादा महत्व न देकर हमें अपने देश के अलग अलग हिस्सों के विद्वानों के कामों को रेखांकित करना चाहिए। इससे हिंदी के बारे में बन रही गलत राय का भी निषेध हो सकेगा।