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Saturday, October 9, 2021

प्रगतिशीलता की भारतीयता का सच


बीते शुक्रवार को कथाकार प्रेमचंद की पुण्यतिथि थी। उस दिन इंटरनेट मीडिया पर प्रेमचंद को ‘प्रगतिशील’ लेखक के तौर पर पेश करते हुए कई लोगों ने याद किया। कई लोगों ने प्रेमचंद को हिंदी का पहला ‘प्रगतिशील’ लेखक कहा तो कइयों ने उनको साम्यवादी विचारधारा के लेखक के तौर पर याद किया। इंटरनेट मीडिया की दुनिया ऐसी है कि वहां जो पहले चल जाता है ज्यादातर लोग बिना तथ्यों को जांचे परखे उसका अनुसरण करने लग जाते हैं। कुछ उत्साही वामपंथी साहित्यप्रेमियों ने प्रेमचंद को कम्युनिस्ट लेखक तक करार दे दिया। इस तरह के अधिकतर लोगों ने प्रेमचंद को प्रगतिशील लेखक संघ का संस्थापक बताते हुए उनको साम्यवादी करार दिया। इंटरनेट मीडिया पर चलनेवाले इस तरह की बातों को देखकर मनोरंजन हुआ क्योंकि प्रेमचंद न तो कम्युनिस्ट थे, न मार्क्सवादी और न ही प्रचलित अर्थों में ‘प्रगतिशील’ और न ही प्रगतिशील लेखक संघ के संस्थापक। प्रेमचंद के बारे में ऐसी बात कहने वाले उनके लेखन और व्याख्यानों को आंशिक तरीके से सामने लाते हैं। प्रगतिशील लेखक संघ की बहुत बात होती है और प्रेमचंद के भाषण की भी बहुत चर्चा होती है कि उन्होंने साहित्य को राजनीति के आगे चलनेवाली मशाल कहा आदि आदि। ऐसा प्रतीत होता है कि 1936 में दिए गए उनके व्याख्यान को लोगों ने ध्यान से पढ़ा ही नहीं। इस बात की अधिक संभावना है कि वामपंथी लेखकों-आलोचकों ने प्रेमचंद के प्रगतिशील लेखक संघ के स्थापना अधिवेशन में दिए गए व्याख्यान को जानबूझकर नेपथ्य में रखा। प्रेमचंद के गरीबों की बात को बेहद चतुराई से सर्वहारा से जोड़ते हुए मार्क्सवाद से जोड़ दिया गया। अगर प्रेमचंद के प्रगतिशील लेखक संघ के भाषण का समग्रता में विश्लेषण करें तो कई भ्रांतियां दूर होती हैं। 

प्रेमचंद ने लखनऊ में हुए उस अधिवेशन में अपने भाषण में साफ तौर पर कहा था कि ‘प्रगतिशील लेखक संघ यह नाम ही मेरे विचार से गलत है। साहित्यकार या कलाकार स्वभावत: प्रगतिशील होता है। अगर वो इसका स्वभाव न होता तो शायद वो साहित्कार ही नहीं होता। उसे अपने अंदर भी एक कमी महसूस होती है, इसी कमी को पूरा करने के लिए उसकी आत्मा बेचैन रहती है।‘ उपरोक्त कथन में प्रेमचंद ने साफ तौर पर उस प्रगतिशीलता से अपनी असहमति सार्वजनिक रूप से स्पष्ट कर दी थी जिसको लेकर इस लेखक संघ की स्थापना कि गई थी। जिसको प्रगतिशील लेखक संघ के संस्थापकों में से एक सज्जाद जहीर आगे बढ़ाना चाहते थे। सज्जाद जहीर के बारे में एक तथ्य यहां बताना आवश्यक है कि वो विभाजन के बाद पाकिस्तान चले गए थे। वहां कम्युनिस्ट पार्टी के लिए काम करते हुए पकड़े गए थे, जेल गए थे और उनको सजा हुई थी । बाद में वो भारत आ गए और जवाहरलाल नेहरू की सरकार ने उनको शरणार्थी मानते हुए नागरिकता दे दी थी। यहां भी वो कम्युनिस्ट पार्टी में सक्रिय हुए और उसके महत्वपूर्ण पद पर भी रहे। इसके अलावा प्रेमचंद के इस वक्तव्य में आध्यामिकता की बात भी कई बार आती है। साहित्य को उन्होंने मंदिर भी कहा है। जिन शब्दों, पदों और सिद्धांतों को लेकर प्रेमचंद ने अपना भाषण दिया था उससे यह स्पष्ट है कि वो साम्यवादी विचारधारा से प्रभावित नहीं थे बल्कि  भारतीय विचार और दर्शन से प्रभावित थे। यह बात बार-बार उनकी रचनाओं में भी दिखाई देती है। हिंदू धर्म की प्रगतिशीलता तो इस बात से ही स्पष्ट होती है कि वो लगातार अपने में परिवर्तन करता है। समय के साथ चलता है और अपने समाज की कुरीतियों को दूर करने के लिए अपने अंदर से ही नायक पैदा करता है। इसके दर्जनों उदाहरण इतिहास में उपस्थित हैं। इसको ओझल करने के अनेकों प्रयास हुए लेकिन वो आज भी हमारे सामने हैं।  

इस संदर्भ में मुझे प्रेमचंद साहित्य के अध्येता और आलोचक कमलकिशोर गोयनका से जुड़ा एक प्रसंग याद आता है। प्रेमचंद शताब्दी वर्ष चल रहा था।  देशभर में आयोजन हो रहे थे। इसी क्रम में हैदराबाद विश्वविद्यालय में 24 अक्तबूर 1981 को एक आयोजन हुआ था। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता नामवर सिंह ने की थी और कमलकिशोर गोयनका इसमें वक्ता के तौर पर उपस्थित थे। कार्यक्रम के अंत में जब नामवर सिंह अपने अध्यक्षीय भाषण के लिए खड़े हुए तो उन्होंने एक ऐसी बात कह दी जिसको दबाने में वामपंथी लेखकों का एक बड़ा तबका लग गया था। नामवर सिंह ने कहा था कि ‘होरी एक हिंदू किसान है और वह हिंदू किसान ही हिंदू प्रेमचंद है। प्रेमचंद गाय-बैल, खेत खलिहान, गोबर मिट्टी की बात करते हैं।‘  जैसे ही नामवर सिंह ने ये कहा कि मंच पर बैठे कमलकिशोर गोयनका खड़े हो गए और उन्होंने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि ‘नामवर सिंह का अगर ये नया चिंतन है तो वे इसका समर्थन करते हैं।‘ नामवर सिंह ने इस हस्तक्षेप के बाद अपना वक्तव्य समाप्त किया। अध्यक्षीय वक्तव्य के बाद एक नाटकीय घटनाक्रम हुआ। सभागार में उपस्थित वामपंथी कवि वेणु गोपाल मंच पर आ गए और लगभग चीखते हुए बोले कि ‘नामवर सिंह ये बताएं कि वो गोयनका के करीब आए हैं या गोयनका उनके करीब आ गए हैं।‘ नामवर सिंह ने अपनी आदत के मुताबिक कोई उत्तर नहीं दिया। बाद में वेणु गोपाल ने कमलकिशोर गोयनका को देख लेने तक की धमकी दी। इस धमकी से विचलित हुए बगैर कमलकिशोर गोयनका ने भी उनको शारीरिक और बौद्धिक दोनों तरीके के संवाद का आग्रह किया। किसी तरह बात समाप्त हुई। 

इस प्रसंग को बताने का उद्देश्य वामपंथियों के असली चरित्र को उजागर करना है। भारतीय विचार को प्रतिपादित करनेवाले लेखक या विचारक को जबरदस्ती वामपंथी बताने की प्रवृत्ति को रेखांकित करना है। उपरोक्त प्रसंग ये भी साफ होता है कि वामपंथी सही बात अपने साथी की भी नहीं सुनते हैं और उनपर भी लांछन लगाने से नहीं चूकते। इस तरह के सैकड़ों उदाहरण हैं। जब इन तथाकथित प्रगतिशीलों के सिरमौर रामविलास शर्मा ऋगवेद पर लिखने लगे तो वामपंथी नामवर सिंह ने उनको हिंदूवादी करार दिया। प्रेमचंद की भारतीय विचारों में आस्था उनकी रचनाओं में स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। प्रेमचंद की कृति गोदान में गांव की चेतना, गाय की संस्कृति, भारतीय परिवार में गाय की आकांक्षा, परिवार संस्था की रक्षा आदि रेखांकित की जा सकती है। नामवर सिंह यूं ही होरी को हिंदू नहीं कह रहे थे । प्रेमचंद का ये पात्र ईश्वर की सत्ता में विश्वास रखता है और भाग्यवादी भी है।  हंस पत्रिका के सितंबर अंक में प्रेमचंद की एक कहानी ‘रहस्य’ प्रकाशित है। यह कहानी उनके जीवनकाल में प्रकाशित होनेवाली उनकी अंतिम कहानी है। इसमें प्रेमचंद अपने पात्रों के माध्यम से मुनष्य में देवत्व की बात करते हैं। देवत्व की बात वही लेखक कर सकता है, जिसकी देव में आस्था हो, या कम से कम देव के अस्तित्व को स्वीकार करता हो। लेखक की चेतना उसकी रचनाओं में परलक्षित होती है। प्रेमचंद की चेतना उनकी कृतियों प्रेमाश्रम के चरित्र बलराज से गोदान के होरी तक में स्पष्ट रूप से भारतीय जमीन. भारतीय विचार, भारतीय संघर्ष को स्थापित करती है। वामपंथियों ने प्रेमचंद की कृतियों की अनुचित व्याख्या और बताने से ज्यादा छुपाने की अपनी प्रवृति के आधार पर मार्क्सवादी सिद्ध कर दिया। प्रेमचंद की तथाकथित प्रगतिशीलता के झूठ को पहली बार कमलकिशोर गोयनका ने तमाम तथ्यों के साथ बेनकाब किया था। इन्हीं तथ्यों के आधार पर ये साबित भी किया था कि प्रेमचंद ने अपने लिए दो लक्ष्य तय किए थे भारतीय आत्मा की रक्षा और स्वराज की प्राप्ति। इसके बाद कहने को कुछ शेष नहीं रहता कि कैसे एक भारतीय लेखक को आयातित विचारधारा का पोषक साबित करने की कोशिशें हुईं जो अब भी जारी है। 


Friday, October 8, 2021

धर्म पर हमलावर के नाम सड़क क्यों?


स्वाधीनता के बाद दिल्ली में कई सड़कों और इमारतों के नाम बदले गए। सर्कुलर रोड को देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नाम किया गया, क्लाइव रोड को त्यागराज मार्ग का नाम दिया गया। कर्जन कोड को कस्तूरबा गांधी रोड और कर्जन लेन का बलवंत राय मेहता लेन का नाम दिया गया। दिल्ली में ऐसे दर्जनों उदाहरण हैं जब मार्गों के नाम से औपनिवेशिकता के चिन्ह को मिटाकर स्वाधीनता सेनानियों या अपनी मिट्टी पर सर्वोच्च बलिदान करनेवालों का नाम दिया गया। ये काम पिछली कई सरकारों ने किया। 2014 में जब नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनी तो एक बार फिर से मांग उठी कि राजधानी में मौजूद गुलामी के निशानों को मिटाकर उसको अपने देश के सपूतों का नाम दिया जाए। 2015 में नई दिल्ली इलाके के औरंगजेब रोड का नाम बदलकर पूर्व राष्ट्रपति ए पी जे अब्दुल कलाम के नाम कर दिया गया। औरंगजेब मुगलों में सबसे क्रूर शासक था और उसने हिन्दुस्तान की जनता पर बेइतहां जुल्म ढाए थे। सिख पंथ के महान गुरु तेगबहादुर जी के साथ औरंगजेब ने क्या किया उसके बारे में पूरे देश को ज्ञात है। 

औरंगजेब ने अपने शासनकाल में सैकड़ों मंदिरों को  तोड़कर हिन्दुस्तान के इतिहास, धर्म और संस्कृति को मिटाने की कोशिश की। वो इतना कट्टर मुस्लिम शासक था कि वो चाहता था कि उसके सल्तनत में सिर्फ इस्लाम धर्म को मानने वाले रहें। वो हिन्दुस्तान की जनता को तलवार के जोर पर इस्लाम धर्म में परिवर्तित करना चाहता था। जो भी उसकी इस राह में बाधा बनने की कोशिश करता था उसको जान से मार डालता था। सत्ता के नशे में चूर एक विदेशी शासक पूरे हिन्दुस्तान की संस्कृति को मिटा देना चाहता था। ये तो हिन्दुस्तान की संस्कृति की शक्ति और उसमें जनता का विश्वास था कि औरंगजेब की तमाम कोशिशों के बावजूद मिट नहीं पाई। आज जब हम स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना रहे हैं तो हमारी क्या मजबूरी है कि जिस विदेशी शासक ने भारत और भारतीयता पर हमले कर उनको नष्ट करने की कोशिश की, उसके नाम पर एक दिल्ली के मुख्य इलाके में एक लेन है। ए पी जे अब्दुल कलाम रोड से एक लेन निकलती है जिसका नाम औरंगजेब लेन है। जब कर्जन रोड और कर्जन लेन दोनों का नाम बदल दिया गया तो औरंगजेब रोड के साथ साथ औरंगजेब लेन का नाम क्यों नहीं बदला जा सका। आज देश के मानस को ये प्रश्न मथता है। 


Saturday, October 2, 2021

तुलसीदास की उपेक्षा असंभव


हमारे देश में और पूरी दुनिया में रामकथा एक ऐसी कथा है जिसके कई पाठ उपलब्ध हैं। रामकथा को देश, काल और परिस्थिति के अनुसार लेखकों ने अपने विवेक के आधार पर लिखा। उपलब्ध रामकथाओं में गोस्वामी तुलसीदास की श्रीरामचरितमानस की लोकप्रियता असंदिग्ध है। जब तुलसीदास ने श्रीरामचरितमानस की रचना की थी तब भारतवर्ष पर विदेशी आक्रांताओं का कब्जा था। उस दौर में हमारे देश की संस्कृति को, रीति रिवाजों को, खानपान को, स्थापत्य कला आदि को बदलने का उपक्रम लगातार चल रहा था। हमारी आस्था के केंद्रों को नष्ट किया जा रहा था। तलवार के जोर पर समाज की संरचना भी बदली जा रही थी। अपनी संस्कृति और समृद्ध विरासत के प्रति लोगों की आस्था डिगने लगी थी। ऐसे विकट समय में तुलसीदास ने श्रीरामचरितमानस की रचना की और देश के सामने राम के रूप में एक ऐसा नायक प्रस्तुत किया जो विकट परिस्थितियों में अपने धर्म पर अडिग रहते हुए आकांता का समूल नाश करता है। ये ग्रंथ उस समय की मांग थी। इस विषय पर कई शोध हो चुके हैं और कई विद्वानों ने लिखा है। यहां इस पृष्ठभूमि को बताने का उद्देश्य ये है कि देश को जब 1947 में लंबे कालखंड के बाद विदेशी आक्रांताओं से मुक्ति मिली तब भी तुलसीदास रचित श्रीरामचरितमानस की लोकप्रियता में किसी तरह की कमी नहीं आई बल्कि ये बढ़ी ही। स्वाधीनता के बाद अगर अकादमिक जगत पर नजर डालते हैं तो वहां तुलसीदास और श्रीरामचरितमानस को लेकर एक उदासीनता दिखाई देती है। इस उदासीनता की वजह अकादमिक जगत पर वामपंथी विचारधारा के अनुयायियों का दबदबा रहा। 
तुलसीदास को हिंदू समाज का पथभ्रष्टक तक कहा गया और इस तरह की पुस्तकें भी प्रकाशित हुईं। तुलसीदास के पाठ को कमतर करके आंकने के अनेक प्रयास हुए। पाठ्यक्रमों में इस तरह के लेखों को प्राथमिकता दी गई जिसमें तुलसीदास की उपेक्षा हो। इस संबंध में याद पड़ता है ए के रामानुजन के एक लेख की जिसका नाम है, थ्री हंड्रेड रामायणाज, फाइव एक्जांपल एंड थ्री थाट्स आन ट्रांसलेशन। ए के रामानुजन ने देश विदेश में लिखे गए कई रामकथाओं का उदाहरण दिया। अलग अलग तरह की कथाएं बताईं लेकिन आपको ये जानकर हैरानी होगी कि रामानुजन ने अपने इस लेख में तुलसीदास का नाम सिर्फ एक जगह उल्लिखित है वहां भी तुलसी कहा गया है। दो स्थानों पर रामचरितमानस का उल्लेख मिलता है। एक जगह अहिल्या की कथा के संदर्भ में और दूसरी जगह कंबन का प्रभाव बताने के क्रम में। अब इस विद्वान को क्या कहा जाए कि वो जब रामकथा के विभिन्न पाठ का उल्लेख करता है तो उसको तुलसीदास के श्रीरामचरितमानस से कोई उद्धरण याद नहीं पड़ता। ये जानबूझकर इस ग्रंथ से कोई उद्धरण नहीं उठाते। याद पड़ता है जब 2011 में दिल्ली विश्विद्यालय के पाठ्यक्रम से इस लेख को हटाया गया था तब वामपंथी शिक्षकों, लेखकों और इतिहासकारों ने वितंडा खड़ा कर दिया था। जबकि उस लेख को हटाने का निर्णय विश्वविद्यालय की विद्वत परिषद में हुआ था। उस वक्त रामानुजन के लेख के पक्ष में कई वामपंथी लेखकों ने बड़े-बड़े लेख लिखे थे। वो लेख अकादमिक कम राजनीतिक अधिक थे। ए के रामानुजन के लेख की सीमा उसमें तुलसीदास के पाठ की अनुपस्थिति है। इसके अलावा रामानुजन ने जिन रामायण या जिन ग्रंथों की चर्चा की है उनकी रचना के समय व्याप्त स्थिति और परिस्थिति पर प्रकाश नहीं डाला है। अगर वो ऐसा कर पाते तो लेख अधिक अर्थपूर्ण होता। 

अगर रामानुजन के पूरे लेख को पढ़ें तो यह स्पष्ट होता है कि वो कोई नई बात नहीं कह रहे थे। ये सर्वज्ञात है कि रामकथा के अनेक रूप अनेक भाषाओं में उपलब्ध हैं। तुलसीदास ने स्वयं कहा है कि हरि अनंत हरिकथा अनंता, कहहिं सुनहिं बहु विधि सब संता। इसका अर्थ है कि तुलसीदास के समय से या उसके पहले से ही यह बात ज्ञात है कि रामकथा के अलग अलग स्वरूप हैं। रामकथा की व्याप्ति इतनी अधिक है कि फिल्मों में भी अलग अलग रूपों में ये दिखती रही है। सचिन भौमिक और राज कपूर की मुलाकात का प्रसिद्ध किस्सा है। सचिन भौमिक काम की खोज में राज कपूर के पास पहुंचे थे। उनको अपनी कहानी सुनाई। देर तक राज कपूर ने कहानी सुनी और अंत में कहा कि आप चाहे जिस तरह से कहानी सुनाओ लेकिन इतना याद रखना कि फिल्मों में तो एक ही कहानी होती है, राम थे, सीता थीं और रावण आ गया। ये बात राज कपूर जैसे उत्कृष्ट कलाकार को समझ आती थी लेकिन वामपंथी लेखकों को नहीं। इसलिए रामानुजन का लेख कोई नई दृष्टि देनेवाला नहीं है, बल्कि वो अलग अलग जगह व्याप्त रामकथाओं को एक जगह समेटने की कोशिश मात्र है। रामानुजन के लेख में नया सिर्फ ये था कि उसमें तुलसीदास की उपेक्षा की गई। इस उपेक्षा की वजह से इस लेख को खास विचारधारा के लोगों ने पसंद किया था। 

तुलसीदास और उनकी रामकथा को लेकर तरह तरह की भ्रांतियां फैलाने की कोशिश समय समय पर होती रही हैं। खासतौर पर जब अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का आंदोलन जोर पकड़ने लगा तो वामपंथी लेखकों ने राम के अस्तित्व पर ही प्रश्न खड़ा करना आरंभ कर दिया। तुलसीदास को धार्मिक लेखक कहकर उनका मूल्यांकन करने लगे। वामपंथी लेखकों को इस बात में महारत हासिल है कि वो अपनी राजनीति के लिए किस उक्ति को चुनें और किसको छोड़ दें। किस विद्वान को उद्धृत करें और किसको उपेक्षित कर दें। तुलसीदास की रचनाओं को कमतर दिखाने के लिए उन्होंने इस प्रविधि का सहारा लिया। उन्होंने तो सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की राय को भी ओझल कर दिया। रामविलास शर्मा ने निराला की साहित्य साधना में लिखा है,अंग्रेजी और बांग्ला के अनेक कवियों के नाम गिनाने के बाद एक दिन निराला बोले- ‘इन सब बड़ेन क पढ़ित है तो ज्यू जरूर प्रसन्न होत है पर जब तुलसीदास क पढ़ित है तो सबका अलग धरि देइत है। हमार स्वप्न इहै सदा रहा कि गंगा के किनारे नहाय के भीख मांगिके रही और तुलसीदास कै पढ़ी। (इन सब बड़े लोगों को पढ़ता हूं तो मन प्रसन्न होता है, पर जब तुलसीदास को पढ़ता हूं तो सबको अलग रख देता हूं। हमारा हमेशा से यही स्वप्न रहा है कि गंगा किनारे स्नान करके भीख मांग के रहें और तुलसीदास को पढ़ें)। हिंदी के सबसे बड़े कवियों में से एक निराला का ये कथन वामपंथियों के सामने एक चुनौती थी लिहाजा इसको ओझल कर दिया गया। 

तुलसीदास की इस बात को लेकर आलोचना करने की कोशिश की गई कि वो महिलाओं के विरोधी थे और वर्णाश्रम व्यवस्था के पोषक थे। लेकिन यहां भी अगर समग्रता में देखें तो तुलसीदास के यहां महिलाओं को प्रतिष्ठित किया गया है और सभी को समान माना गया है। ऐसे कई पद श्रीरामचरितमानस में हैं। उनके लेखन में इतनी शक्ति है कि वो आलोचकों को लगातार चुनौती देते रहते हैं। तुलसीदास को जो टेक्सट है उसको पावर टेक्सट कहा जा सकता है। ऐसा टेक्सट जिसने पीढ़ियों को न केवल प्रभावित किया बल्कि उनको संस्कारित भी किया। तुलसीदास को समझने के लिए उसके सही अर्थों को उद्घाटित करने के लिए भारतीय संदर्भों को समझना होगा। रामायण के अलग अलग रूपों को उद्धृत करके और रामकथा के अलग अलग स्वरूपों को सामने रखकर तुलसीदास की काव्य प्रतिभा के तेज को कम नहीं किया जा सकता है। तुलसीदास ने अपने समय में उत्कृष्ट साहित्य रचा, ऐसा साहित्य जिसने देश की संस्कृति पर हो रहे हमलों का न केवल प्रतिकार किया बल्कि उसके खिलाफ उठ खड़े होने की प्रेरणा भी दी। 

Friday, October 1, 2021

समाज को बांटनेवाले के नाम सड़क


अंग्रेजों की नीति थी बांटो और राज करो। यह नीति राज करने तक सीमित नहीं रही। अंग्रेजों ने भारतीय समाज को बांटने की बेहद गहरी चाल चली थी जिसकी परिणति देश के विभाजन में हुई। जब 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति हुई थी तब से अंग्रेज इस जुगत में लग गए थे कि किस तरह से भारतीय समाज को बांट दिया जाए। इसके लिए उन्होंने दूरगामी नीतियां बनानी आरंभ की थी। सबसे पहले उन्होंने भारतीयों को शासन में सीमित भागीदारी देने के लिए 1861 में इंडियन काउंसिल एक्ट लागू बनाया। इसके करीब तीन दशक बाद अधिक सुधार की घोषणा करते हुए 1892 में दूसरा इंडियन काउंसिल एक्ट बनाया गया। शासन में भारतीयों का प्रतिनिधित्व बढ़ाने की बात करते हुए इस एक्ट में और सुधार का दावा करनेवाला 1909 का इंडियन काउंसिल एक्ट बना। इस एक्ट में प्रमुख भूमिका निभाई थी उस वक्त के भारतीय मामलों के मंत्री (सेक्रेट्री आफ स्टेट फार इंडिया ) लार्ड मार्ले और तत्कालीन वायसराय लार्ड मिंटो। इसको मार्ले-मिंटो सुधार 1909 के नाम से भी जाना जाता है। इस सुधार ने ही हमारे देश में सांप्रदायिकता का बीज बोया था। इसमें पहली बार मुसलमानों को अलग प्रतिनिधित्व या अलग चुनाव क्षेत्र की बात की गई थी।  

इन कानूनों के बाद अंग्रेज एक और कानून लेकर आए थे जो मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट पर आधारित थी। इसको शासन में जनभागीदारी बढ़ानेवाला सुधार बताया गया था। लेकिन इसकी मंशा कुछ और थी। इसको उस वक्त के भारतीय मामलों के मंत्री ई एस मांटेग्यू और तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड चेम्सफोर्ड ने तैयार किया था। इन सुधारों को गवनर्नमेंट आफ इंडिया एक्ट 1919 के जरिए पेश किया गया था। इस कानून के अंतर्गत प्रांतों को कई अधिकार देने की बात की गई थी लेकिन साथ ही  मुसलमानों के अलग प्रतिनिधित्व के प्रयासों को और मजबूती दी। इस इतिहास को इस वजह से बताया जा रहा है ताकि ये याद दिलाया जा सके कि हमारे देश के बंटवारे के बीज बोनेवाले और उसको फलने-फूलने की जमीन तैयार करनेवाले कौन थे। 1919 में जिसने इस देश में सांप्रदायिकता को मजबूती दी उसके नाम से आज नई दिल्ली में एक सड़क है चेम्सफोर्ड रोड। ये रोड कनाट प्लेस को नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से जोड़ता है। इतना ही नहीं जब जलियांवाला बाग में जनरल डायर ने कहर बरपाया था उस वक्त चेम्सफोर्ड ही भारत के गवर्नर जनरल थे। चेम्सफोर्ड ने आरंभ में डायर को बचाने की कोशिश की थी। ऐसे व्यक्ति के नाम से नई दिल्ली इलाके में सड़क क्यो है? 


Monday, September 27, 2021

संघर्ष और समर्पण की सुरगाथा


लता मंगेशकर, एक ऐसा नाम जिसपर हर भारतवासी को गर्व है। संगीत की दुनिया में बेहद सम्मान के साथ इस नाम को लिया जाता है। भारत रत्न लता मंगेशकर की आवाज में जादू है, उनके अंदर ईश्वर प्रदत्त प्रतिभा है आदि आदि बातें तो हम उनके बारे में सुनते ही रहते हैं लेकिन ऐसा बहुत कम बार होता है कि उनके संघर्ष को रेखांकित किया जाए। लता मंगेशकर ने उस दौर में गाना शुरु किया था जब तकनीक इतना विकसित नहीं था। साउंड रिकार्डिंग और मिक्सिंग के इतने उन्नत यंत्र नहीं थे। महल का गाना ‘आएगा आनेवाला’ ने लता को बहुत प्रसिद्धि दी। बहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी है कि इस गाने में ध्वनि का जो उतार चढ़ाव है वो किसी तकनीक के सहारे पैदा नहीं किया गया बल्कि उसकी रिकार्डिंग उस तरह से की गई। अगर आप गाने को याद करें तो अशोक कुमार जब आईने के सामने खड़े हैं और गाना शुरु होता है तो आवाज दूर से आती लगती है, खामोश है जमाना और फिर तीन चार पंक्तियों के बाद पास से आती प्रतीत होती है। तकनीक के सहारे इस तरह का ध्वनि प्रभाव पैदा किया जा सकता है लेकिन उस वक्त इसको करने के लिए गायक को बहुत मेहनत और संतुलन साधना पड़ा था। लता मंगेशकर ने अपने एक इंटरव्यू में बताया था कि माइक्रोफोन को कमरे के बीच में रखा गया था और वो कमरे के एक कोने में खड़ी हो गई थीं। पहला छंद खामोश है जमाना गाते हुए लता जी माइक की तरफ बढ़ती जाती और जब माइक के सामने पहुंचती तो आएगा आने वाला शुरु करतीं। ये काम इतना मुश्किल था कि परफेक्शन के लिए इस प्रक्रिया को कई बार दुहराना पड़ा था। खेमचंद प्रकाश ने इस गाने को संगीतबद्ध किया था। रिकार्ड होने के बाद भी इस फिल्म के प्रोड्यूसर सावक वाचा इससे संतुष्ट नहीं थे और उनको लगता था कि ये लोकप्रिय नहीं हो पाएगा, जबकि दूसरे प्रोड्यूसर अशोक कुमार की राय भिन्न थी। इस तरह के दर्जनों उदाहरण हैं जब लता मंगेशकर ने गानों को बेहतर करने के लिए दिन दिन भर प्रयास किए। 1948- 49 वो वर्ष है जब लता मंगेशकर एक दिन में आठ आठ गाने रिकार्ड करती थीं। दो गाने सुबह, दो गाने दोपहर, दो गाने शाम और दो गाने रात में गाती थीं। कई बार ऐसा होता था कि वो सुबह घर से निकलती थीं और देर रात दो तीन बजे तक घर पहुंच पाती थीं। खाने पीने का भी कोई ठिकाना नहीं रहता था। कई बार तो ऐसा होता था कि गाने की रिकार्डिंग हो जाती थी और बाद में बताया जाता था कि रिकार्डिंग ठीक नहीं हो पाई तो फिर से गायक को बुलाया जाता था।

एक संघर्ष तो ये था लेकिन लता मंगेशकर ने वो दौर भी देखा है जब गायकों को उनके गाने का नाम नहीं मिलता था। फिल्मों में भी या बाद में जब रिकार्ड बनने लगे तो उसमें भी आरंभिक दिनों में पार्श्व गायकों को  क्रेडिट नहीं दिया जाता था। यह स्थिति बहुत लंबे समय तक रही। जब आएगा आनेवाला गाने का रिकार्ड बना तो उसपर गायिका के तौर पर कामिनी का नाम छपा । कामिनी फिल्म महल की नायिका का नाम है जिसकी भूमिका में मधुबाला थीं। कल्पना कीजिए तब लता मंगेशकर पर क्या गुजरी होगी जब उन्होंने वो रिकार्ड देखा होगा। इसके पहले जब रेडियो पर ये गाना बजाया जाता था तब इसके गायक का नाम नहीं बताया जाता था। रेडियो स्टेशन में सैकड़ों पत्र सिर्फ ये जानने के लिए आते थे कि इस गाने की गायिका कौन हैं। जब फिल्म बरसात में लता मंगेशकर को गायक के तौर पर क्रेडिट मिला तो वो बहुत खुश हुई थीं। लता मंगेशकर कोई यूं ही नहीं बन जाता। लता मंगेशकर बनने के लिए कई सालों तक तपस्या करनी होती है अपना जीवन समर्पित करना पड़ता है। मुंबई (तब बांबे) के नाना चौक इलाके के दो कमरे के छोटे से फ्लैट में मां और भाई बहनों के साथ रहते हुए लता मंगेशकर ने न दिन देखा और न रात देखी बस एक ही सपना था कि बेहतरीन गाना है। लता मंगेशकर जब भी कोई गाना गातीं तो अपने पिता मास्टर दीनानाथ मंगेशकर की दी वो सीख याद रखतीं जो उन्होंने गायन की शिक्षा आरंभ करते वक्त दी अपनी छोटी सी बेटी को दी थी। उन्होंने तब लता को कहा था कि ‘गाते समय हमेशा ये सोचना कि तुमको अपने पिता या गुरु से बेहतर गाना है।‘  लता मंगेशकर इंटरनेट मीडिया पर सक्रिय रहकर खुद को देश और समाज से जोड़े रखती हैं।