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Tuesday, March 28, 2017

क्षेत्रीय क्षत्रपों की अहमियत

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव नतीजों के दिन एक न्यूज चैनल पर चर्चा के दौरान बीजेपी के एक उत्साही नेता ने लगभग नारेबाजी की शक्ल में कहा कि ये बीजेपी से ज्यादा नरेद्र मोदी की जीत है । बहुत विनम्रता से उनको नरेन्द्र मोदी का प्रधानमंत्री बनने के पहले बीस मई दो हजार चौदह को संसद भवन के सेंट्रल हॉल में दिया भाषण याद दिलाया । उस भाषण में उन्होंने भावुक होकर कहा था कि पार्टी उसके कार्यकर्ता के लिए मां समान होती है और मां पर कोई कृपा नहीं करता है बल्कि सेवा करता है । कहना ना होगा कि नरेन्द्र मोदी अपने इस वाक्य से पार्टी और संगठन की अहमियत बता रहे थे । प्रधानमंत्री बनने के बाद भी नरेन्द्र मोदी ने पार्टी और संगठन की अहमियत को दरकिनार नहीं किया। उन्होंने लगभग तीन वर्षों के अपने कार्यकाल में बीजेपी को सांगठनिक रूप से मजबूत करने काम किया । जिन राज्यों में बीजेपी को विधानसभा चुनावों में जीत मिली वहां उन्होंने स्थानीय नेतृत्व को उभारने और मजबूत करने की योजना पर गंभीरता से काम हुआ । उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ को सूबे की कमान सौंपकर एक बार नरेन्द्र मोदी ने फिर से अपनी इस कार्ययोजना को परवान चढाया । मोदी ने योगी को मुख्यमंत्री बनाकर आडवाणी-वाजयेपी युग से आगे जाकर पार्टी को युवा नेतृत्व देने का साहस भी दिखाया । ना सिर्फ योगी को बल्कि अपने विश्वासी रक्षा मंत्री मनोहर पार्रिकर को भी गोवा भेजकर वहां पार्टी की स्थिति मजबूत करने का दांव चल दिया । पार्रिकर के दिल्ली आने के बाद से पार्टी गोवा में बिखर गई थी । इसके पहले भी उन्होंने महाराष्ट्र में ब्राह्णम देवेन्द्र फड़णवीस को, झारखंड में गैर आदिवासी रघुवर दास को, हरियाणा में गैर जाट मनोहर लाल खट्टर को, असम में सर्वानंद सोनोवाल को सूबे की कमान सौंपी थी । गुजरात में तमाम अटकलों के बावजूद विजय रूपानी को कमान मिली थी । विधानसभा चुनावों में जीत के बाद तो अटकलें ये भी लग रही हैं कि शिवराज सिंह चौहान, रमन सिंह और वसुंधरा को दिल्ली लाकर वहां नए नेतृत्व के हाथ में सत्ता दी जाएगी । अगर ऐसा होता है एंटी इनकंबेंसी को कम करने की कोशिश के तौर पर देखा जाएगा । दरअसल अगर देखा जाए तो मोदी उन लोगों को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं जिनकी छवि बेदाग है और जो दबाव में नहीं आते हैं । देवेन्द्र फड़णवीस को ही लें तो वो शिवसेना के जरा भी दबाव में नहीं आते हैं और पार्टी को लगातार मजबूत भी करते चल रहे हैं । ऐसी ही छवि योगी आदित्यनाथ की भी है । इसके साथ ही मोदी जिनको चुनते हैं उनके आसपास एक कवच भी तैयार कर देते हैं जैसे योगी के मुख्यमंत्री बनने के बाद फौरन सूबे के सभी सांसदों को बुलाकर संदेश दे दिया कि वो ट्रांसफर पोस्टिंग के लिए मुख्यमंत्री के पास सिफारिश ना करें । इस तरह से वो स्थानीय या क्षेत्रीय नेतृत्व को मजबूत करते हैं । राजनीतिक तौर पर इसके कई फायदे हैं । एक तो संगठन मजबूत हो रहा है दूसरे अपनी पसंद का मुख्यमंत्री बनाकर नरेन्द्र मोदी अपनी स्थिति को भी मजबूत कर रहे हैं । हलांकि इस वक्त पार्टी में उनको कोई चुनौती नहीं है लेकिन वो भविष्य के मद्देनजर अपनी रणनीति तय करते चल रहे हैं ।

अब बीजेपी की तुलना में अन्य दलों में देखें तो इसका साफ अभाव दिखता है । कांग्रेस ने सायास वर्षों तक स्थानीय नेतृत्व को कमजोर करने का ही काम किया। इंदिरा गांधी से लेकर राजीव गांधी तक ने किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री को मजबूत नहीं होने दिया । कांग्रेस के इन दो नेताओं के दौर में शायद ही कोई ऐसा मुख्यमंत्री होगा जिसने पद पर अपना कार्यकाल पूरा किया हो । कांग्रेस में इंदिरा गांधी के दौर में किचन कैबिनेट और राजीव गांधी के दौर में कोटरी हुआ करती थी, इनमें तमाम वो नेता होते थे जो गणेश परिक्रमा में यकीन रखते थे । लंबे समय तक चली इस कोटरी की पॉलिटिक्स ने कांग्रेस को पंगु कर दिया । सांगठनिक क्षमताओं की बजाए उन नेताओं को तरजीह दी जाने लगी जो नेता व्यक्ति पूजा में प्रवीण थे । यही वह दौर था जब भारत को राजवंशीय लोकतंत्र कहा जाने लगा था क्योंकि एक परिवार के इर्दगिर्द पार्टी सिमट गई थी । इंदिरा गांधी ने जिस दरबारी संस्कृति को बढावा दिया था उसको संजय-राजीव-सोनिया ने आगे बढ़ाया । राहुल गांधी ने जरूर शुरुआत में संगठन के चुनाव आदि की पहल की थी लेकिन उसको वो आगे नहीं बढ़ा पाए और दरबारियों ने उनको अपने चंगुल में ले लिया । कांग्रेस की इस राजवंशीय संस्कृति का असर अन्य पार्टियों पर भी पड़ा चाहे वो डीएमके हो, एआईएडीएमके हो,नेशनल कांफ्रेंस हो, जेडीएस हो, समाजवादी पार्टी हो । समाजवादी पार्टी, नेशनल कांफ्रेंस और डीएमके जैसी कुछ पार्टियों के नेताओं ने अपने बेटों को पार्टी सौंप दी लेकिन मायावती, ममता और जयललिता ने दूसरी पंक्ति के नेता तैयार नहीं किए । नीतीश कुमार तक ने इस मसले पर कुछ खास नहीं किया । बहुधा यह इस वजह से भी होता है कि इनको लगता है कि अगर मजबूत नेता उभर गया तो उनकी कुर्सी को खतरा हो सकता है । इस मनोविज्ञान के तहत ही कमजोर नेताओं को आगे बढाया जाता है। कांग्रेस को अगर दो हजार चौबीस के लोकसभा चुनाव में मुकाबले में रहना है तो उसको अपने क्षेत्रीय क्षत्रपों को अहमियत देनी होगी, क्योंकि पार्टी की जो हालत है उसमें दो हजार उन्नीस के लोकसभा चुनाव तक उसको सांगठनिक रूप से मजबूत कर नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व को चुनौती देना संभव नहीं लग रहा है । कांग्रेस के नेता भले ही पार्टी में बदलाव की बात करें लेकिन ये बदलाव जमीनी होंगे तभी लाभ हो पाएगा । 

Monday, March 27, 2017

सेहत पर सार्थक पहल

सरकार ने नई स्वास्थ्य नीति की घोषणा संसद में कर दी है. स्वास्थ्य के क्षेत्र में यह एक बड़ा ऐतिहासिक कदम है. लेकिन मीडिया में उसे वह तवज्जो नहीं मिली, जो मिलनी चाहिए थी. नरेन्द्र मोदी की अगुआई में देश ने आजादी के बाद सही मायनों में दो बुनियादी चीजों पर खास ध्यान दिया है. शिक्षा और स्वास्थ्य! नई स्वास्थ्य नीति न केवल जनोन्मुखी है, बल्कि इसमें दो बातें बेहद खास हैं. एक तो सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्यों केंद्रों में साधारण रोगों के लिए जनसाधारण को कोई खर्च नहीं करना होगा. उन्हें डाक्टरी सेवा और दवा मुफ्त मिलेगी. 
नई स्वास्थ्य नीति मकसद सभी नागरिकों को सुनिश्चित स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराना बताया गया है. नई राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति का प्रारूप पिछले दो साल से सरकार के पास लंबित था. इसको लेकर कुछ हलकों में आलोचना भी हुई थी. लेकिन सरकार इस पर काम कर रही थी, और पूरी तरह से आस्वस्त होने के बाद इसे हरी झंडी दी गई है. नई नीति में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का दायरा बढ़ाने पर जोर है. मसलन, अभी तक इन केंद्रों में रोग प्रतिरक्षण, प्रसव पूर्व और कुछ अन्य रोगों की जांच ही होती थी. लेकिन नई नीति के तहत इसमें गैर संक्रामक रोगों की जांच भी शामिल होगी. सरकार की नई स्वास्थ्य नीति यह दावा करती है कि इससे देश में नागरिकों की औसत उम्र 67.2 वर्ष से बढ़कर 70 वर्ष हो जाएगी. यही नहीं उत्तम स्वास्थ्य पाकर उनकी कार्य-क्षमता दोगुनी हो सकती है. नवजात शिशुओं की मृत्यु दर घटेगी. सरकार का कहना है कि इस काम में देश के कुल मद का तकरीबन 2.5 पैसा लगेगा. इसे अगर कुल खर्च में जोड़ें तो यह लगभग तीन लाख करोड़ रुपए बैठता है. यह खर्च अभी सरकारी इलाज पर हो रहे खर्च से डेढ़ से दो गुना है. पर इसका फायदा देश के असली जरूरतमंदों ग्रामीणों, गरीबों और पिछड़ों को मिलेगा.
ऐसा पहली बार हुआ है कि सरकार के ने उन लोगों को ध्यान में रखकर अपनी योजना बनाई है, जो अपने खून-पसीने से, मजदूरी से खेती से, उत्पाद से देश का निर्माण करते हैं, बुनियाद गढ़ते हैं, संपत्ति पैदा करते हैं, लेकिन उनके पास अपना इलाज करवाने तक के लिए पैसे नहीं होते. दुर्भाग्य से आजादी के बाद से ऐसे लोगों के समुचित स्वास्थ्य के लिए कोई खास सरकारी नीति नहीं थी, और धीरे-धीरे ही सही बढ़ते- बढ़ते ऐसे लोगों की संख्या लगभग 100 करोड़ से ऊपर हो गई.
नई स्वास्थ्य नीति की सबसे अच्छी बात यह है कि इसमें एलोपेथी के साथ देश की पारंपरिक चिकित्सा-प्रणालियों पर काफी जोर दिया गया है. इन चिकित्सा-पद्धतियों में नए-नए वैज्ञानिक अनुसंधानों को प्रोत्साहित किए जाने की बात भी कही गई है. आयुर्वेद, योग, यूनानी, होम्योपेथी और प्राकृतिक चिकित्सा पर सरकार विशेष ध्यान दे, तो ज्यादा से ज्यादा लोगों को फायदा होगा और इलाज का खर्च भी घटेगा.
यदि देश में डाक्टरों की कमी पूरी करनी हो तो मेडिकल की पढ़ाई स्वभाषाओं में तुरंत शुरु की जानी चाहिए. आज देश में एक भी मेडिकल कालेज ऐसा नहीं है, जो हिंदी में पढ़ाता हो. सारी मेडिकल की पढ़ाई और इलाज वगैरह अंग्रेजी माध्यम से होते हैं. यही ठगी और लूटपाट को बढ़ावा देती है. उत्तर प्रदेश कैडर के आईएएस भूपेन्द्र सिंह ने दवाओं के दाम का निर्धारण करने वाले महकमे की कमान संभालने के बाद मोदी जी की नीतियों पर चलते हुए दवा कंपनियों की मुश्कें कसीं और कई जीवनोपयोगी दवाओं के मूल्य में हजार फीसदी तक की कमी करा दी. ह्रदय रोगियों के लिए स्टेंट की कीमतों में ऐतिहासिक कमी की गई है जो किएक बड़ी राहत है । अस्पतालों की मनमानी कीमत वसूलने पर भी रोक लगाने की पहल हुई है ।
स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्ढा की यह पहल प्रशंसनीय है कि उन्होंने कुछ बहुत मंहगी दवाओं के दाम बांध दिए हैं और स्टेंटभी सस्ते करवा दिए हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक काम और करना चाहिए. जिस तरह स्वच्छ भारत अभियान और आदर्श गांव लेकर उन्होंने जनप्रतिनिधियों को बांधा उसी तरह, उन्हें चाहिए कि जनता के सभी चुने हुए प्रतिनिधियों, सरकारी कर्मचारियों और उनके परिजनों के लिए यह अनिवार्य करवा दें कि उनका इलाज सरकारी अस्पतालों में ही होगा. तय है कि नई सरकारी नीति के बाद वीआईपी लोगों की पहुंच से साल भर के भीतर ही ये अस्पताल निजी अस्पतालों से बेहतर सेवाएं देने लगेंगे.
नई नीति की खास बात यह भी है कि इसमें जिला अस्पतालों के पुनरुद्धार पर भी विशेष जोर दिया गया है. यह एक महत्त्वपूर्ण बदलाव है. यह जाहिर तथ्य है कि सरकारी अस्पतालों ने स्वास्थ्य देखरेख के क्षेत्र में अपना महत्त्व खो दिया है. अगर व्यक्ति जरा भी सक्षम है तो इलाज और सेहत निजी अस्पताल में करवाता है. इनसे एक तो स्वास्थ्य सेवाएं गरीबों से दूर हुई हैं, दूसरी तरफ उपचार संबंधी कई बुराईयां भी उभरी हैं. स्वास्थ्य सेवा की जगह व्यवसाय बन गया, तो प्राइवेट अस्पतालों में मरीजों की गैर-जरूरी जांच तथा अनावश्यक दवाएं देने की शिकायतें बढ़ती गईं.
ऐसे में अगर नई स्वास्थ्य नीति के बाद सरकारी इलाज बेहतर होगा तो राष्ट्रहित में इससे बेहतर बात क्या होगीयाद रहे कि स्वास्थ्य राज्य सूची का विषय है. ऐसे में अब यह राज्य सरकारों पर निर्भर है कि वे इस नई नीति को कितनी गंभीरता से लेती हैं. केंद्र के सामने बड़ी चुनौति राज्यों से मिलकर स्वास्थ्य क्षेत्र को प्राथमिकता देने और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तथा जिला अस्पतालों को स्वास्थ्य देखभाल में केंद्रीय स्थान देने की ठोस रणनीति बनाने की होगी. अच्छा है कि यूपी और उत्तराखंड में स्वास्थ्य महकमों में लूट मचाने वाले हार चुके हैं, और जनसेवक सरकार केंद्र की नीतियों पर अमल करेंगी.


राइट टू रिकॉल की जटिलताएं

अब चुनाव हो गया, नतीजा आ गया, बैठो पांच साल तक । चुनाव के नतीजों के बाद इस तरह के जुमले खूब सुनने को मिलते हैं । अगर कोई इलाका अपने जनप्रतिनिधि से नाराज होता है तब भी यह बात उभर कर आती है कि अब तो निश्चित अवधि तक अमुक विधायक या सांसद को झेलना ही होगा । यह इस वजह से होता है कि अभी जो जन प्रतिनिधित्व कानून हमारे देश में लागू है उसमें जनप्रतिनिधियों को एक बार चुन लिए जाने के बाद पांच साल बाद होनेवाले चुनाव में ही उसके भाग्य का फैसला मतदाता कर सकता है । इन पांच सालों में चाहे उसपर कितने भी संगीन इल्जाम लगे उसका बाल भी बांका नहीं हो सकता है चंद अपवादों को छोड़कर, जिसमें सदन को उसको हटाने का अधिकार है या फिर तीन साल से ज्यादा की सजा होने के बाद उसको सांसदी या विधायकी छोड़नी पड़ती है । काफी लंबे समय से देश में इस व्यवस्था को लेकर विमर्श होता आया है । सांसदों और विधायकों के आचरण में जिस तरह का लगातार क्षरण देखने को मिल रहा है या जिस तरह से उनपर गैंगरेप से लेकर हत्या और अन्य वारदातों के संगीन इल्जाम लगते रहे हैं उसकी पृष्ठभूमि में राइट टू रिकॉल की मांग समय समय पर होती रही है । दो हजार ग्यारह में जब अन्ना हजारे ने भ्रश्टाचार के खिलाफ दिल्ली से अपनी मुहिम की शुरुआत की थी उस वक्त भी राइट टू रिकॉल की मांग की गई थी । यूपीए टू के दौरान बड़े बड़े घोटालों के सामने आने के बाद भी इस मांग ने जोर पकड़ा था । अब भारतीय जनता पार्टी के युवा सांसद वरुण गांधी ने जनप्रतिनिधित्व कानून में संशोधन करने का एक प्रस्तावित बिल पेश किया है । इस बिल के प्रस्ताव के मुताबिक किसी भी सांसद या विधायक के कामकाज या आचरण से उसके मतदाता संतुष्ट नहीं हैं तो उसको निश्चित अवधि के बीच हटाया जा सकेगा ।भारतीय जनता पार्टी के सांसद वरुण गांधी के इस प्रस्तावित बिल के मुताबिक सांसद या विधायक को दो साल के अंदर उनके कामकाज के आधार पर हटाने की प्रक्रिया प्रारंभ की जा सकती है । लेकिन हटाने की यह प्रक्रिया इतनी आसान नहीं होगी । प्रस्तावित बिल के मुताबिक अगर जीते हुए प्रतिनिधि को मिले हुए वोट में से पचहत्तर फीसदी उनके कामकाज से खुश नहीं हैं तो इस प्रक्रिया को उस इलाके का कोई भी मतदाता शुरू कर सकता है । इसके लिए उसको संबधित सदन के स्पीकर के पास अपना पक्ष रखना होगा कि वो क्यों अमुक विधायक या सांसद को हटाना चाहते हैं । अपने आवेदन पत्र के साथ उस मतदाता को उस मतदान क्षेत्र के एक चौथाई वोटरों के दस्तखत भी अपने समर्थन में जुटाने होंगे ।
प्रस्तावित बिल के मुताबिक स्पीकर को जब इस तरह का आवेदन पत्र मिलेगा तो वो उसको चुनाव आयोग को इसकी प्रामाणिकता की जांच के लिए भेजेंगे । चुनाव आयोग को इस आवेदन पत्र के साथ एक चौथाई वोटरों के दस्तखत की प्रामाणिकता की जांच करने का दायित्व भी दिया जाएगा । इसके बाद चुनाव आयोग उस मतदान क्षेत्र में दस जगहों पर वोटिंग करवाएगा । इस वोटिंग में अगर चुने गए विधायक या सांसद को मिले वोट का तीन चौथाई उसको हटाने के पक्ष में होता है तो उसको हटाने का फैसला माना जाएगा । अब यह प्रक्रिया उपर से दिखने में जितनी आसान लगती है दरअसल उतनी है नहीं । यह एक बेहद जटिल प्रक्रिया है । इसको लागू कैसे किया जाएगा । कौन से वो आधार होंगे जिसकी बिनाह पर कोई भी मतदाता अपने निर्विचित प्रतिनिधि को हटाने की मांग कर सकेगा । क्या उन आधारों की इजाजत संविधान देता है, आदि आदि ।इसके अलावा एक और दिक्कत आ सकती है वह है कि चुनाव आयोग किस तरह से आवेदन पत्र के साथ नत्थी किए गए मतदाताओ के दस्तखत का सत्यापन करेगा । उसमें कितना वक्त लगेगा । एक अनुमान के मुताबिक एक सांसद के चुनाव में करीब पंद्रह सत्रह लाख लोग वोट करते हैं । अगर पंद्रह लाख वोट भी माने जाएं तो आवेदन के साथ पौने चार लाख वोटरों के हस्ताक्षर का सत्यापन करना होगा । क्या यह प्रक्रिया व्यावहारिक है । या फिर कोई और मैकेनिज्म बनाने के बारे में विचार करना होगा । वरुण गांधी भी इस बात को मानते हैं कि उनका जो प्रस्तावित बिल है वह बहस का एक आधार प्रदान करता है और इस कानून को लागू करने के पहले इसकी प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए जो भी सुझाव आते हैं उसका स्वागत होगा । अब जबकि वरुण गांधी ने एक बार फिर से इस राइट टू रिकॉल को कानूनी जामा पहनाने की पहल शुरू की है तो इस तरह के तर्क फिर से सामने आने लगे हैं ।
राइट टू रिकॉल के पक्ष और विपक्ष में भी कई तर्क है । इस कानून की पैरोकारी करनेवालों का दावा है कि इसके लागू होने से जनप्रतिनिधियों को अपने कानम के प्रति ज्यादा जवाबदेह बानाय जा सकता है । उनका तर्क है कि हाल के दिनों में जिस तरह से चुनाव जीतने के बाद जनप्रतिनिधि गायब हो जाते हैं और जनता की परवाह नहीं करते हैं, राइट टू रिकॉल के लागू हो जाने के बाद से जनप्रतिनिधि अपने काम को लेकर अपेक्षाकृत ज्यादा गंभीर हो पाएंगे । इसके पक्षधर इस बात की वकालत भी करते हैं कि इसके लागू होने से राजनीति के अपराधीकरण और राजनीति में भ्रष्टातार पर भी पर भी अंकुश लगया जा सकेगा । इसके पक्ष में एक तर्क यह भी दिया जाता है कि अगर किसी को किसी का चुनाव करने का अधिकार है तो उसको अपने चुने हुए को हटाने का हर भी होना चाहिए । कुछ लोग तो यहां तक तर्क देते हैं कि अगर ये लागू होता है तो चुनाव में धनबल के इस्तेमाल पर भी रोक लगेगी क्योंकि चुनाव लड़नेवालों के अवचेतन मन में यह बात होगी कि जनता जब चाहे उनको हटा भी सकती है । इसके विरोधियों का सबसे मजबूत तर्क ये है कि इस कानून के लागू होने से लोकतंत्र के अराजक तंत्र में बदल जाने का खतरा पैदा हो जाएगा । इस तर्क के मुताबिक जनप्रतिनिधियों के सर पर हमेशा रिकॉल की तलवार लटकती रहेगी और वो किसी भी तरह का जोखिम लेने से बचने की कोशिश करते रहेंगे । किसी भी क्रांतिकारी सुधार की पहल करने से पहले लाख बार सोचेंगे । यह स्थिति किसी भी लोकतंत्र या उनसे जनप्रतिनिधियों के लिए आदर्श स्तिति नहीं हो सकती है । भारत में जहां सालों भर किसी ना किसीतरह के चुनाव चलते रहते हैं उसमें अगर ये राइट टू रिकॉल लागू हो जाता है तो चुनाव आयोग को सामान्य चुनाव कराने के अलावा रिकॉल चुनाव भी करवाते रहने होंगे । यह स्थिति भी अराजक स्थिति हो सकती है । इसेक विरोधियों का एक तर्क यह भी है कि इसके लागू होने से जनप्रतिनिधियों को संविधान में मिले अधिकारों की कटौती भी संभव है ।

हमारे देश में जिस तरह से धर्म और जाति के आधार पर चुनाव होते हैं उसमें राइट टू रिकॉल के लागू होने से एक अलग किस्म की सामाजिक संरचना के जन्म लेने का खतरा भी है जिसमें जनप्रतिनिधियों को उसके काम के आधार पर नहीं बल्कि उसकी जाति और धर्म के आधार पर रिकॉल का खतरा रहेगा । इसलिए इस तरह के कानून पर विचार करते समय उसकी जटिलताओं पर भी सूक्ष्मता से विचार किया जाना चाहिए । पश्चिम के देशों का उदाहरण देने के पहले हमें अपने देश की स्थितियों और परिस्थितियों को समझना होगा क्योंकि बगैर सोचे समझे आयातित प्रवृत्तियों से लाभ की बजाए नुकसान का खतरा है ।  

Saturday, March 25, 2017

सबूतों से आस्था की इमारत मजबूत

अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण । यह देश के हिंदुओं के लिए संवेदना से आगे जाकर आस्था का सवाल है । आजादी के बाद और खासकर अस्सी के दशक के बाद यह मुद्दा इतना संवेदनशील रहा है कि इसने लोगों को गहरे तक प्रभावित किया । राम जन्मभूमि को लेकर देश ने आंदोलनों का ज्वार देखा, बाबरी मस्जिद का विध्वंस देखा, सरकारों की बर्खास्तगी देखी, इस मुद्दे को देश की सियासत की धुरी बनते देखा, प्रचंड बहुमत से जीते राजीव गांधी की सरकार के दौर में मंदिर का ताला खुलते और विवादित स्थल के बाहर शिलान्यास होते देखा और अब देख रहे हैं अदालतों में चल रही लंबी कानूनी लड़ाई । अगर यह मुद्दा पिछले सत्त साल से लोगों को लगातार मथ रहा है तो समझना चाहिए कि यह जनमानस में कितने गहरे तक पैठा हुआ है । सितंबर दो हजार दस में जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मसले में फैसला दिया और जमीन को तीन हिस्से में बांटने का हुक्म दिया तो सभी पक्षकार सुप्रीम कोर्ट चले गए और इस फैसले के खिलाफ अपील कर दी । तब से यह मसला वहां लंबित है । हाल ही में बीजेपी सांसद सुब्रह्ण्यम स्वामी ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया कि वो इस मसले पर रोजाना सुनवाई कर अपना फैसला सुनाएं । स्वामी की याचिका पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने जो टिप्पणी की उसपर पूरे देश में एक बार फिर से सियासत गर्मा गई है । सर्वेच्च अदालत के मुख्य न्यायाधीश जे एस खेहर ने अपनी टिप्पणी में कहा कि धर्म और आस्था से जुड़े मसले आपसी सहमति से सुलझाए जांए तो बेहतर रहेगा । सर्वसम्मति से किसी समाधान पर पहुंचने के लिए आप नए सिरे से प्रयास कर सकते हैं । अगर आवश्यकता हो तो आपको इस विवाद को खत्म करने के लिए मध्यस्थ भी चुनना चाहिए । अग इस केस के पक्षकार की रजामंदी हो तो मैं भी मध्यस्थों के साथ बैठने के लिए तैयार हूं । चीफ जस्टिस ने इसके साथ ही अपने साथी जजों के सेवाओं की पेशकश भी की । राम मंदिर के मसले पर यह सुप्रीम कोर्ट का फैसला नहीं है सिर्फ टिप्पणी है लेकिन इस टिप्पणी में मुख्य न्यायाधीश ने एक बेहद अहम बात कह दी है जिसको रेखांकित किया जाना आवश्यक है । जस्टिस खेहर ने कहा कि धर्म और आस्था के मसले में बातचीत का रास्ता बेहतर होता है। क्या यह माना जाना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट ने मान लिया है कि राम मंदिर का मुद्दा धर्म के साथ साथ आस्था का भी है । अगर कोर्ट ऐसा मानती है तो फिर बातीचत की सूरत नहीं बनने पर उससे इसी आलोक में फैसले की अपेक्षा की जा सकती है ।  
हलांकि इस पूरे विवाद में सुब्रह्ण्यम स्वामी ना तो पक्षकार हैं और ना ही किसी पक्षकार के वकील लेकिन फिर भी उन्होंने इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट में अपनी बात रखी है, जिसपर कोर्ट ने उक्त टिप्पणी करते हुए उनको इकतीस मार्च को फिर बुलाया है । कोर्ट के इस प्रस्ताव को लगभग सभी पक्षकारों ने ठुकरा दिया है और कोर्ट से आग्रह किया है कि वो फैसला करें जो सभी पक्षों को मान्य होगा । श्रीराम जन्मभूमि न्यास के महंत नृत्य गोपालदास ने साफ किया है कि उनको किसी भी तरह की मध्यस्थता स्वीकार नहीं है । उनका तर्क है कि विवादित स्थल पर सभी पुरातात्विक साक्ष्य मंदिर के पक्ष में है । उधर आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्डसमेत कई मुस्लिम संगठन अदालत के बाहर इस मसले के समाधान को लेकर आशान्वित नहीं हैं ।   दरअसल अगर हम देखें तो बातचीत से सुलग इस वजह से भी संभव नहीं है क्योंकि इसमें कुछ लेना और कुछ देना पड़ता है, जिसकी ओर सुप्रीम कोर्ट ने भी इशारा किया था । जिस देश में राम मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में आदर्श मानकर पूजे जाते हों वहां उनके जन्मस्थल को लेकर लेन देन होना अफसोसनाक तो है ही करोड़ों लोगों की आस्था के साथ खिलवाड़ भी है । और फिर सवाल सिर्फ आस्था का नहीं है, आस्था तो लंबी अदालती लड़ाई के दौर में सबूतों की जमीन पर और गहरी होती चली गई है । अगर हम दो हजार दस के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को देखें तो उसमें भी उस जगह को राम जन्मभूमि मान लिया गया था । इसके अलावा पुरातत्व विभाग की रिपोर्टों भी इसके पक्ष में ही है । दस हजार पन्नों के अपने फैसले में कोर्ट ने जमीन के मालिकाना हक का फैसला कर दिया था । हाईकोर्ट के इस फैसले के पहले भी सात या आठ बार बातचीत से इसको हल करने की नाकाम कोशिशें हुई थीं । शिया पॉलिटिकल कांफ्रेंस के सैयद असगर अब्बास जैदी ने भी कोशिश की थी और प्रस्ताव दिया था कि जहां रामलला विराजमान हैं वहां राम का भव्य मंदिर बने मुस्लिम समुदाय के लोग पंचकोशी परिक्रमा के बाहर मस्जिद बना लें । लेकिन यह मुहिम परवान नीं चढड सकी थी । दो हजार चार के बाद जस्टिस पलोक बसु ने भी इस दिशा में प्रयास किया था लेकिन वो भी सफल नहीं हो सका । चंद्रशेखर से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी की सरकारों ने भी इस दिशा में गंभीर कोशिश की थी लेकिन कभी मंदिक समर्थकों ने तो कभी मंदिर विरोधियों ने इस मुहिम को सफल नहीं होने दिया। दो हजार एक में तो कांची के शंकराचार्य ने भी मध्यस्थता की कोशिश की थी लेकिन उस वक्त विश्व हिंदू परिषद के विरोध की वजह से शंकराचार्य ने अरने कदम पीछे खींच लिए ।

मध्यस्थता की बात सुनने में बहुत अच्छी लगती है लेकिन मामला इतना जटिल है कि इस तरह का कोई फॉर्मूला सफल हो ही नहीं सकता है । अगर किसी हाल में बातचीत की सूरत बनती भी है तो स्वामी और ओवैशी जैसे अलग अलग कौम के अलग अलग रहनुमा सामने आ जाएंगे जिससे पेंच फंसना तय है । मध्यस्थता की बजाए इस मसले पर देश के मुस्लिम समुदाय को बड़ा दिल दिखाना चाहिए और अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए आगे आकर उदाहरण पेश करना चाहिए । इससे दोनों समुदायों के बीच आपसी सद्भाव बढ़ेगा क्योंकि यह तो तय है कि भारत के मुसलमानों के लिए भी आक्रमणकारी औरंगजेब से ज्यादा राम उनके अपने हैं । क्या इस देश में कोई मुसलमान ऐसा होगा जो अपने को औरंगजेब के साथ कोष्टक में रखना चाहेगा । अगर ऐसा नहीं होता है तो फिर सोमनाथ मंदिर की तर्ज पर सरकार को कदम उठाकर राम मंदिर के निर्माण का रास्ता प्रशस्त करना चाहिए ।   

राजेन्द्र यादव होने की चाहत

कई सालों से यह कहा जाता रहा है कि दिल्ली देश की साहित्यक राजधानी भी है । चंद सालों पहले तक यह भी कहा जाता था कि नामवर सिंह, राजेन्द्र यादव, अशोक वाजपेयी इस राजधानी के सत्ता केंद्र हैं । इन्हीं चर्चाओं के बीच रवीन्द्र कालिया नया ज्ञानोदय के संपादक बनकर दिल्ली आए तो वो भी एक सत्ता केंद्र के तौर पर देखे जाने लगे थे हलांकि वो इस बात से लगातार इंकार करते थे । राजेन्द्र यादव जी और रवीन्द्र कालिया जी का निधन हो गया । नामवर जी अपनी बढ़ती उम्र की वजह से उतने सक्रिय नहीं हैं और अशोक वाजपेयी की सत्ता से दूरी उनको केंद्र से उठाकर परिधि तक पहुंचा चुकी है। ऐसी स्थिति में देश की कथित साहित्यक राजधानी में कोई सत्ता केंद्र रहा नहीं, छोटे-छोटे मठनुमा केंद्र बचे हैं लेकिन वो लेखकों के बड़े समुदाय को अपनी ओर आकर्षित नहीं कर पा रहे हैं । सेमिनार, गोष्ठियों में बुलाकर उपकृत भर कर सकने की क्षमता इन मठाधीशों के पास है । हिंदी में जो तीन चार साहित्यक पत्रिकाएं निकल रही हैं उनमें से भी सत्ता केंद्र बनने की ललक किसी संपादक में दिखाई नहीं देती है । नया ज्ञानोदय के संपादक लीलाधर मंडलोई पत्रिका को संजीदगी से निकाल रहे हैं और विवाद आदि से दूर ही रहते हैं । कथादेश के संपादक हरिनारायण जी पत्रिका के शुरुआती दौर से ही पत्रिका की आवर्तिता को लेकर ही संघर्षरत रहे हैं और वहां जो भी लोग जुड़े हैं वो सभी लगभग मध्यमार्गी रहे हैं, लिहाजा पत्रिका नियमित निकालकर ही संतुष्ट नजर आते है । अब रही साहित्यक पत्रिका हंस की बात तो राजेन्द्र यादव के निधन के बाद संजय सहाय ने उसका जिम्मा संभाला । अपने संपादकीय में वो लगातार हमलावर और आक्रामक दिखते हैं लेकिन अमूमन सभी संपादकीयों में उनकी पसंद और नापसंदगी दिखने लगती है, विचारधारा के स्तर पर विरोध कम दिखता है । इसके अलावा संजय सहाय की अगुवाई में जो अंक निकल रहे हैं उसमें ज्यादातर में योजना का अभाव दिखता है । सामान्य कहानी, कविता, लेख , स्तंभ आदि आते रहते हैं और छपते रहते हैं । संजय जी के सामने यादव की विरासत एक बड़ी चुनौती बनकर खड़ी है और उस चुनौती से मुठभेड़ करना आसान नहीं है, इस बात को वो स्वीकार भी कर चुके हैं । अभी हंस का एक विशेषांक निकला है रहस्य रोमांच, भूत-प्रेत आदि पर । संपादकीय संयोजन में कोई खास छाप यह अंक नहीं छोड़ पाई ।  
प्रेम भारद्वाज के सापंदन में पाखी में बहुधा एक स्पार्क दिखता है, यादव जी की तरह साहित्य की जमीन पर विवाद उठाने की ललक भी दिखाई देती है । कई बार तो विवाद उठाने में सफल भी होते रहे हैं । अभी हाल ही में अल्पना मिश्र के साक्षात्कार पर साहित्य जगत में काफी हलचल दिखी । जिस तरह के प्रश्न और उत्तर थे वो पत्रिका की विवाद उठाने की मंशा को साफ कर रहे थे । पाखी में इल तरह के प्रयोजनों से यह सवाल उठता है कि क्या कोई साहित्य में राजेन्द्र यादव होना चाहता है । फेसबुक पर इस बारे में सवाल और कई दिलचस्प उत्तर भी पोस्ट किए जा चुके हैं । इस सिलसिले मुसाफिर कैफे जैसी चर्चित कृति के युवा लेखक और दिल्ली की साहित्यक राजनीति से दूर मुंबई में रहनेवाले दिव्य प्रकाश दूबे की बात का स्मरण हो रहा है । मुंबई में एक साहित्यक बैठकी के दौरान दिव्यप्रकाश जी ने कहा था कि हिंदी में कई लेखक इस वक्त राजेन्द्र यादव होना चाहते हैं । ज्यादातर लेखकों के मन के कोने-अंतरे में ये ख्वाहिश पलती रहती है और वो हमेशा राजेन्द्र यादव होने की फिराक में लगे रहते हैं । संभव है दिव्य ने ये बातें मजाक में कही हों लेकिन दिल्ली के कई लेखकों पर यह बात लागू होती है । लेखक राजेन्द्र यादव तो होना चाहते हैं लेकिन उनके अंदर वो आग, वो साहस, वो सक्रियता, वो आकर्षण, वो नवाचारी स्वभाव कहां हैं । इसके अलावा नए लोगों को आगे बढ़ाने की कला भी तो नहीं है ।            
राजेन्द्र यादव के छिहत्तरवें जन्मदिन पर जब भारत भारद्वाज और साधना अग्राल के संपादन में हमारे युग का खलनायक नाम की पुस्तक का प्रकाशन हुआ था तब उसके शीर्षक पर हिंदी जगत चौंका था लेकिन यादव जी ने खूब मजे लिए थे । यह राजेन्द्र यादव का जिगरा था कि उन्होंने इस शीर्षक को भी इंज्वाय किया था । इस पुस्तक के संपादक भारत भारद्वाज ने लिखा था -  राजेन्द्र यादव के लेखन का रेंज ही बहुत बड़ा नहीं है, उनकी दिलचस्पी और रुचि का रेंज भी । इन्होंने विश्व साहित्य का अधिकांश महत्वपूर्ण पढ़ रखा है , ठीक है कि वो सार्त्र भी होना चाहते हैं और अपनी दुनिया में अपने लिए एक सिमोन भी तलाश करते रहते हैं । घर-बार भी इन्होंने छोड़ा, यह छोटी बात नहीं है । हमें देखना यह है कि अपनी जिंदगी में कितनी छूट इन्होंने ली ।अब इसमें सिमोन और सार्त्र वाली बात ही यादव जी के बाद की पीढ़ी के लेखकों को आकर्षित करती है । राजेन्द्र यादव होने की चाहत पालने वाले कई लेखक सार्त्र तो होना चाहते हैं, सिमोन की तलाश में मंडी हाउस से लेकर साहित्यक गोष्ठियों में नजर भी आते हैं , लेकिन उनमें यादव जी वाला साहस नहीं है । राजेन्द्र यादव जी ने जो किया वो खुल्लम खुल्ला किया, प्यार किया तो डंके की चोट पर, फलर्ट तो वो खुले आम करते ही रहते थे । जब मन्नू जी ने उनको घर से निकाला था तब भी उन्हें किसी तरह का कोई मलाल नहीं था, बल्कि वो उस अप्रिय प्रसंग को भी अपनी आजादी के तौर पर देखते थे । 
उनकी जिंदगी के आखिरी दिनों में जब एक अप्रिय प्रेम प्रसंग आया तो भी वो डरे नहीं, लड़ाई झगड़े के बाद जब पंचायत बैठी तो हंस के दफ्तर में उन्होंने अपनी पुत्री और वकीलों के सामने स्वीकार किया कि वो प्रेम में हैं और उसी लड़की से प्रेम करते हैं । किस शख्स में इतनी हिम्मत होती है कि वो बुढ़ापे में सार्वजनिक तौर पर समाज के सामने अपने प्रेम को स्वीकार करने का साहस दिखा सके । यहां तो लोग जवानी में अपने प्रेम को छिपाते घूमते हैं । सार्त्र बनने के लिए इसी तरह के साहस और समाज से टकराने के जज्बे की जरूरत होती है । लेकिन दिल्ली में मौजूद हिंदी के लेखक बगैर इस साहस और जज्बे के राजेन्द्र यादव बनना चाहते हैं । मुझे याद आता है कि करीब दस-बारह साल पहले एक पत्रिका में राजेन्द्र यादव के पंज प्यारे के नाम से किसी ब्रह्मराक्षस का लेख छपा था जिसमें उनके शिष्यों की सूची थी । जिसमें संजीव, शिवमूर्ति, प्रेम कुमार मणि,भारत भारद्वाज आदि के नाम थे । इस सूची का भी कोई लेखक भी यादव जी वाला साहस नहीं दिखा पाया । अगर हम राजेन्द्र यादव की शख्सियत पर विचार करें तो इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि यह उनके व्यक्तित्व का वो हिस्सा है जो उनकी ही वजह से प्रचारित हुआ और उनको बदनामी भी दिलाया । लेकिन राजेन्द्र यादव को अपना छपा हुआ नाम और फोटो देखकर बहुत खुशी होती थी और वो इसके लिए कई तरह के जोखिम उठाने को तैयार रहते थे।

राजेन्द्र यादव बनने के लिए समकालीन साहित्यक परिदृश्य पर पैनी नजर होनी चाहिए । ऐसी नजर जो नए से नए और पुराने से पुराने लेखकों से बेहतर लिखवाने का उपक्रम कर सके । यादव जी को यह भी मालूम होता था कि किस लेखक में क्या लिखने की क्षमता है और एक संपादक के लिए इस दृष्टि का होना बेहद आवश्यक है । इसके अलावा एक संपादक के तौर पर राजेन्द्र यादव ने कई घपले भी किए । उन्होंने कहानीकारों की खूबसूरत तस्वीरें छापनी शुरू की,खासकर महिला कथाकारों की । उनको लगता था कि पाठक कहानीकारों की तस्वीरों को देखकर हंस खरीद लेंगे । यह परंपरा आज भी कायम है । हंस के माध्यम से यादव जी ने लेखकों को उठाने और गिराने का खेल भी खूब खेला । जैसे मैत्रेयी पुष्पा और संजीव की कृतियों की कई कई समीक्षाएं एक साथ छापकर उसको स्थापित करने की चाल चलते थे । इतना ही नहीं वो तो समीक्षाओं में लेखक को बगैर बताए अपनी तरफ से जोड़ भी देते थे । यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है जब उन्होने मेरे एक लेख के अंत में कुछ ऐसा जोड़ दिया जो बिल्कुल वांछित नहीं था । गिराने का खेल इस तरह होता था कि जिसको वो पसंद नहीं करते थे या जो उनके दरबार में मत्था नहीं टेकता था उसकी नोटिस भी नहीं लेते थे । यहां सिर्फ एक अपवाद काम करता था कि रचना अगर उनको पसंद आ जाए तो फिर किसी की नहीं सुनते थे । राजेन्द्र यादव बनने की चाहत रखने के लिए जोखिम उठाने के लिए तैयार रहना होगा, तभी सार्त्र की सिमोन की तलाश पूरी होगी ।  

जिन्दगी जो जिया वो लिखा

चंद सालों पहले तक हिंदी में यह परंपरा थी कि जो लेखक कहानी, कविता, उपन्यास आदि से विमुख होने लगते थे वो संस्मरण और आत्मकथा की ओर मुड़ते थे । लेकिन पिछले कई सालों से यह प्रवृत्ति बदली है । यह महज संयोग है या योजनाबद्ध तरीके किया गया, पता नहीं, लेकिन धीरेन्द्र अस्थाना के साठ वर्ष पूरे होते ही उनकी आत्मकथा जिन्दगी का क्या किया प्रकाशित होकर पाठकों के हाथों पहुंच गई है । धीरेन्द्र अस्थाना अपनी पीढ़ी के सर्वाधिक प्रतिभाशाली रचनाकारों में से एक हैं लेकिन वो लंबे समय तक दिल्ली में रहने के बावजूद दिल्ली की साहित्य की राजनीति को समझ नहीं पाए और ना ही उसका हिस्सा बन पाए, प्रचार प्रसार से भी दूर रहे । जिन्दगी का क्या कियाएक कथाकार की आत्मकथा नहीं है । इसमें एक पत्रकार का संघर्ष है, एक पुत्र का अपने पिता से लगातार चलनेवाला विद्रोह है, अपनी पत्नी के साथ जिंदगी को जीने और उसको खूबसूरत बनाने की कोशिशें हैं, फिर अपने पुत्र की बेहतरी के लिए एक पिता की तड़प है और इन सबके बीच है एक कहानीकार का अपने अंदर के लेखक को बचाकर रखने की जद्दोजहद । हिंदी में ज्यादातर आत्मकथा जितना बताते हैं उससे कहीं ज्यादा छुपाते हैं । खुद को कसौटी पर कसने का साहस हिंदी के आत्मकथा लेखकों में लगभग नहीं के बराबर है लेकिन धीरेन्द्र अस्थाना ने वो साहस दिखाया है । ऐसा नहीं है कि धीरेन्द्र अस्थाना ने कुछ भी नहीं छुपाया है, लेकिन अपेक्षाकृत वो अधिक खुले हैं । खुद को भी जिंदगी और परिवार की कसौटी पर कसा है । अपने पिता और परिवार को लेकर उनके मन में जो था उसको बगैर किसी लाग लपेट के लिखा है । नौकरी छूटने पर परेशान होकर शराब पीने और फिर अपनी पत्नी पर हाथ उठाने की स्वीकारोक्ति भी इस आत्मकथा में है ।
मेरठ में पैदा होनेवाले धीरेन्द्र अस्थाना की जिंदगी ने देश के कई शहरों में अपना पड़ाव डाला । मेरठ से लेकर आगरा, शामली, देहरादून, मुंबई , दिल्ली और फिर आखिकार मुंबई में आकर जिंदगी खूंटा गाड़कर बैठ गई । धीरेन्द्र अस्थाना की आत्मकथा में आगरा में उनके प्रेम के बीच में पिता का बाधा के तौर पर उपस्थित होने का वर्णन बेहद रोचक है । बाग में प्रेमिका की गोद में सर रखकर बैठे नायक का पिता अचानक से वहां उरस्थित हो जाए तो फिर क्या हालत हो सकती है यह कल्पना करिए । उनके इस गुण को देखते हुए बाद के दिनों में राजेन्द्र यादव कहा भी करते थे धीरेन्द्र के मरने के बाद कई शहरों में उनकी प्रेमिकाओं के पत्र और पुत्र दोनों मिलेंगे ।
लेकिन दिल्ली और मुंबई की जिंदगी में धीरेन्द्र् अस्थाना ने जो संघर्ष किया है वह संघर्ष बगैर उनकी अर्धांगिनी ललिता अस्थाना के असंभव था । अपनी इस आत्मकथा के बहाने धीरेन्द्र अस्थाना ने दिल्ली और मुंबई की सामाजिकता का भी आंकलन किया है । प्रसंगवश वो बताते हैं कि दिल्ली की पानी में ही अजनबियत के तत्व तैरते रहते हैं । जबकि मुंबई वाले पांच सात साल बाद भी मिलें तो आत्मयीता से भरपूर होते हैं । धीरेन्द्र अस्थाना की इस आत्मकथा में मुंबई में उनकी पहली पारी का बेहद सुंदर चित्रण है तो दूसरी पारी में खुद को एडजस्ट करने की दास्तां है । कुल मिलाकर अगर देखें तो जिन्दगी का क्या किया धीरेन्द्र अस्थाना की एक ऐसी रचना है जो हिंदी की इस विधा में अपना एक अलग स्थान बनाएगी, अगर आलोचकों ने ईमानदारी से इसका मूल्यांकन किया तो

Friday, March 24, 2017

सलमान का प्यार जिंदा है !

बहुत पुरानी कहावत है कि सच्चा प्यार कभी मरता नहीं है लेकिन फिल्मी प्यार को कई बार खत्म होते देखा गया है । बॉलीवुड की चमकती दमकती दुनिया में कोई चाहे किसी को भी कितना भी प्यार करे कई बार उसको खत्म होने में कोई वक्त नहीं लगता है । फिल्मी प्यार के पनपने, परवान चढ़ने और खत्म होते कई बार देखा गया है । फिल्मों के कई हीरोज़ ने कई बार अपने प्यार को सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है तो बहुधा अपने दोस्तों से साझा किया है । अभी हाल ही में प्रकाशित अपनी आत्मकथा खुल्लम खुल्ला में ऋषि ने अपनी गर्लफ्रेंड यास्मीन से अपने संबधों के बारे में खुलकर लिखा है । ऋषि ने माना है कि एक फिल्म पत्रिका में उनके और डिंपल के बीच रोमांस की खबरों ने यास्मीन को उनसे अलग कर दिया यास्मीन के गम में वो कई दिनों तक डूबे रहे थे और एक दिन होटल में यास्मीन को देखकर शराब के नशे में हंगामा किया था जब होटल में उन्होने यास्मीन को एक दूसरे शख्स के साथ देखा तो उनके पीछे रेस्त्रां तक गए और उनसे दो टेबल दूर बैठकर शराब पीने लगे ऋषि ने एक शराब की बोतल यास्मीन के टेबल पर भिजवाया भी जिसे उसने ठुकरा दिया था तबतक ऋषि अपने दोस्तों के साथ अठारह हजार रुपए की शराब पी चुके थे । इसी किताब में ऋषि कपूर ने अपने पिता राज कपूर और नरगिस के बीच के प्यार को बेहद खूबसूरती से लिखा है - पापा और नरगिस के प्रेम संबंध के बारे में उनकी मां समेत सभी को जानकारी थी उनकी मां कृष्णा ने राज-नरगिस के इस अफेयर का बहुत विरोध आदि नहीं किया या इस विवाहेत्तर संबंध को लेकर घर में लड़ाई झगड़े की नौब नहीं आई थी पर जब नरगिस से राज कपूर का ब्रेकअप हुआ और वैजयंतीमाला से प्रेम संबंध बना तो कृष्णा अपने बच्चों के साथ राज कपूर का घर छोड़कर होटल में रहने चली गई थीं और बाद में अलग घर में रहने लगी थी राज कपूर ने तमाम कोशिशें की, मिन्नतें कीं लेकिन कृष्णा घर तभी लौटीं जब राज और वैजयंती के बीच ब्रेकअप हो गया इसी तरह से मीना कुमारी के धर्मेन्द्र से लेकर दिलीप कुमार तक से प्यार के किस्से आम हैं लेकिन प्यार शादी की दहलीज तक नहीं पहुंच सका था । ऐसा नहीं है कि बॉलीवुड के नायक-नायिकाओं के बीच पनपा प्यार अंजाम तक नहीं पहुंचता है । दिलीप कुमार सायरा बानो से लेकर काजोल-अजय देवगन और अभिषेक बच्चन- एश्वर्या तक के अफेयर शादी और सुखी वैवाहिक जीवन तक में बदले ।
मोहब्बत के इन तमाम अफसानों के बीच कई मशहूर किस्से सलमान खान के भी हैं  । सलमान खान को हर दौर में अलग हीरोइंस से प्यार हुआ, इकरार भी हुआ, अफेयर भी लंबे समय तक चला लेकिन उससे आगे कभी नहीं बढ़ सका । सलमान खान के तमाम अफेयर्स में से उनका कटरीना के साथ का अफेयर सबसे खास और लंबे समय तक चला । जब भी सलमान खान से किसी भी प्रेस कांफ्रेंस में कटरीना के बारे में पूछा जाता है तो उनके चेहरे पर एक खास किस्म की चमक दिखाई देती है जिसमें प्यार की गर्मी को अंडरलाइन किया जा सकता है । ऐश्वर्या राय से ब्रेकअप के बाद सलमान खान की जिंदगी में कटरीना कैफ आईं और फिर दोनों ने एक दूसरे में सुकून ढूंढ लिया । दोनों ने एक के बाद एक कई सफल फिल्में की । दोनों के बीच ऑनस्क्रीन और ऑफस्क्रीन केमिस्ट्री जबरदस्त रही थी । लेकिन सलमान खान की ये प्रेमिका भी उनके साथ ज्यादा दिनों तक नहीं टिक सकी । दोनों के ब्रेकअप की खबरें भी आने लगी थी लेकिन इस संबंध के टूटने की मुनादी कर दी समुद्र तट पर छुट्टियां मना रही कटरीना और रणवीर कपूर की तस्वीरों ने । बिकिनी में कटरीना और छुट्टी के मूड में दिख रहे रणवीर की इन तस्वीरों ने उस वक्त खूब सुर्खियां बटोरी थी । रणवीर और कटरीना के संबंधों को करीना कपूर ने एक इंटरव्यू में स्वीकार भी कर लिया था । लेकिन रणवीर कटरीना का रोमांस या अफेयर ज्यादा दिन नहीं चल पाया । उस दौर में सलमान खान ने कटरीना से चुटकी भी ली थी और दोनों में दूरियां साफ तौर पर दिखती थी । कटरीना, सलमान खान के साथ दिखना नहीं चाहती थीं और ना ही सलमान के बारे में किसी तरह की टिप्पणी करती थी ।

अब जब सलमान खान एक बार फिर से कटरीना के साथ टाइगर जिंदा है में काम कर रहे हैं तो कहा जा रहा है कि दोनों के बीच का प्रेम एक बार फिर से फूट पड़ा है । लगभग पांच साल के बाद दोनों एक साथ किसी फिल्म में आ रहे हैं और इन दिनों टाइगर जिंदा है कि शूटिंग के लिए ऑस्ट्रिया में हैं । टाइगर जिंदा है के सेट से जब कटरीना ने अपनी फोटो शेयर की थी तब उनके फैंस निराश हो गए थे क्योंकि फ्रेम में सलमान भाई नहीं थे । ट्विटर से लेकर फेसबुक पर सलमान के फैंस ने भी निराशा जाहिर की थी । इस पर अभी बातें हो ही रही थी कि सलमान खान ने कटरीना के साथ अपनी एक पिक्चर ट्वीट कर दी । फोटो में दोनों के बीच केमिस्ट्री बेहतरीन लग रही है लेकिन उससे भी अहम है ट्विट पर सलमान की टिप्पणी । फोटो के साथ सलमान ने लिखा – बैक टुगेदर, इन टाइगर जिंदा है । इस टिप्पणी में बैक टुगेदर को डिकोड करने की जरूरत है । अभी चंद दिनों पहले कटरीना कैफ से एक इंटरव्यू में पूछा गया था कि बॉलीवुड में कौन उनको परिवार की तरह महसूस करवाता है तो उन्होंने बगैर वक्त गंवाए कहा था सलमान खान । इसके पहले भी जब वो बिग बॉस के सेट पर अपनी फिल्म फितूर के प्रमोशन के लिए पहुंची थी तब भी सलमान और उनके बीच के संवाद का अंदाज कुछ अलग कहानी बयां कर रहा था । तो क्या मान लिया जाए कि पांच साल पहले जिस प्यार की डोर टूट सी गई थी वो ऑस्ट्रिया के खूबसूरत लोकेशन पर एक बार फिर से जुड़ने लगी है । इस प्यार की डोर को इस वजह से भी जुड़ता देखा जा रहा है क्योंकि सलमान की गर्लफ्रेंड लूलिया वेंतूर कटरीना की वजह से ही ऑस्ट्रिया नहीं जा पा रही है । टाइगर जिंदा है की शूटिंग खत्म होते होते प्यार के फूल भी पूरी तरह से खिल चुके होंगे । 

Tuesday, March 21, 2017

महिलाएं और चर्च आमने-सामने

पिछले दिनों केरल से खबर आई थी कि चर्च के एक वरिष्ठ पादरी को एक नाबालिग से रेप के आरोप में गिरफ्तार किया गया था । पीड़ित नाबालिग के एक बच्ची को जन्म देने के बाद ये मामला खुला था । चर्च में पादरी के यौन अपराध की यह पहली घटना नहीं थी, चर्च और उसके पादरी से जुड़ी इस तरह की घटनाएं नियमित अंतराल पर सुर्खियां बनती रही हैं । इन घटनाओं को चर्च के कर्ताधर्ता, कानून व्यवस्था से जुड़ा मुद्दा बताकर दरकिनार करने की कोशिश करते रहे हैं । अब केरल में ईसाइयों के समूहों ने चर्च के पादरियों से जुड़ी इन घटनाओं का प्रतिवाद शुरू कर दिया है । हाल ही में केरल के कोच्चि में आर्कबिशप के घर के बाहर केरल कैथोलिक रिफॉर्म मूवमेंट से जुड़े लोगों ने धरना-प्रदर्शन किया । उनकी मांग है कि महिलाओं और लड़कियों का कन्फेशन पादरियों की बजाए नन्स के सामने करवाया जाए । ईसाई संगठन के लोगों का कहना है कि कन्फेशन के वक्त पादरी महिलाओं और लड़कियों से ना केवल असुविधाजनक सवाल पूछते हैं बल्कि उनकी हालात का फायदा भी उठाकर धर्म की आड़ में यौन शौषण करते हैं । केरल में आर्क बिशप के घऱ के बाहर प्रदर्शन कर रहे लोगों का दावा है कि बाइबिल में इस बात का कहीं भी जिक्र नहीं है कि कन्फेशन या सैक्रामेंट सिर्फ पादरी ही करवा सकते हैं । इस संगठन के मुताबिक अगर महिलाओं को नन्स के सामने कन्फेशन की इजाजत दे दी जाती है तो पादरियों से जुड़े यौन अपराध की घटनाएं कम हो सकती हैं । केरल में ईसाई संगठनों के इस प्रदर्शन का चर्च प्रशासन पर कोई खास असर दिख नहीं रहा है । केरल कैथोलिक बिशप काउंसिल ने नन के सामने महिलाओं या लड़कियों की कन्फेशन की मांग को ठुकरा दिया है । उनका कहना है कि छिटपुट घटनाओं के आधार पर बाइबिल के आधारभूत सिद्धांतों से समझौता नहीं किया जा सकता है । उनका कहना है कि महिलाओं को पादरी या प्रीस्ट का दर्जा नहीं दिया जा सकता है क्योंकि यह धर्म सम्मत नहीं है ।
चर्च में पादरियों द्वारा कन्फेशन के दौरन यौन शोषन की घटनाओं की पुष्टि सात- आठ साल पहले पहले कैथोलिक चर्च में छब्बीस साल तक नन रही सिस्टर जेसमी की आत्मकथा- आमीन, एन ऑटोबॉयोग्राफी ऑफ ए नन, से भी हुई थी । सिस्टर जेसमी ने अपनी आत्मकथा में लिखा था कि जब वो कन्फेशन के लिए गई थी तो उसको वहां का वातावरण बेहद रहस्यमयी लगा था । उसकी साथी कुलसुम और मारिया ने उसको बताया था कि जो भी लड़की कन्फेशन के लिए प्रीस्ट के कमरे में जाती है, फादर उसको किस करता है । जब जेसमी कन्फेशन रूम में जाती है तो वहां मौजूद फादर उससे किस करने की इजाजत मांगता है । वो बाहर निकल आती है।  दूसरी बार भी उसको दबाव डालकर उसी प्रीस्ट के पास कन्फेशन के लिए भेजा जाता है जहां वो अपना विरोध जताते हुए कहती है कि किस को लेकर कांग्रेगेशन की लड़कियों में रोष है । फादर का तर्क है – मैंने हर किसी से किस करने की इजाजत ली है और जिसने मना किया है उसको मैंने किस नहीं किया। और ये सब तो बाइबिल के अनुरूप है । लेकिन जेसमी के सवाल जवाब से फादर खफा हो जाते हैं और कन्फेशन के सत्र को खत्म कर देते हैं । बाद में जेसमी को अपने कमरे में बुलाकर बाइबिल का हवाला देते हैं । सेन्ट पॉल ने कहा है कि एक दूसरे का अभिवादन पवित्र चुंबन से करें । पीटर कहते हैं – एक दूसरे को प्यार के चुंबन से विश करो आदि आदि । जब सिस्टर जेसमी की आत्मकथा छपी थी तब भी इस बात को लेकर काफी बखेड़ा हुआ था और देश विदेश मे चर्चों से इस किताब पर आपत्ति आई थी, पाबंदी लगाने की मांग भी की गई थी ।
ऐसा नहीं है कि पादरियों के यौन अपराध की घटनाएं और महिलाओं के अधिकार की मांग पहली बार की जा रही है । पहले भी अंतराष्टीय स्तर पर इस तरह की मांग उठती रही है । चर्च में महिलाओं को पुरुषों के बराबर भूमिका पर कई बार विमर्श हुआ है, पूरे यूरोप में इस पर लंबे समय तक बहस चली है, लेकिन अंतत: बाइबिल का हवाला देकर महिलाओं को प्रीस्ट बनने से रोक दिया जाता रहा है । अपने सुधारवादी रवैये के लिए मशहूर पोप फ्रांसिस ने भी पिछले साल साफ तौर पर कह दिया था कि कोई भी महिला कभी भी रोमन कैथोलिक चर्च में प्रीस्ट नहीं हो सकती है । उन्होंने कहा था कि सेंट पोप जॉन पॉल द्वितीय के शब्द इस मसले पर अंतिम है । उन्होंने उन्नीस सौ चौरानबे के उस दस्तावेज का भी हवाला दिया जिसके मुताबिक महिलाएं कभी भी प्रीस्ट नहीं बन सकती हैं । पोप फ्रांसिस को महिलाओं के हितों के पैरोकार के तौर पर जाना जाता था लेकिन महिलाओं को प्रीस्ट बनाने के मसले पर वो पोप जॉन पॉल द्वितीय की तरह ही परंपरावादी साबित हुए । दरअसल धर्म और धर्मग्रंथों की व्याख्या की आड़ में तकरीबन सभी धर्मों में महिलाओं को उनके हक से दूर रखा जाता है । समय की मांग को देखते हुए सभी धर्म के कर्ताधर्ताओं को बराबरी के मूलभूत सिद्धांत को तवज्जो देते हुए फैसले करने चाहिए । किसी भी धर्म में जबतक महिलाओं को बराबरी का हक नहीं मिलता है और पितृसत्ता कायम रहती है तबतक उस धर्म को लेकर आधी आबादी के मन में संशय बरकरार रहेगा । यह संशय किसी भी धर्म के लिए उचित नहीं है ।