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Friday, February 16, 2018

भक्तिभाव से लिखी जीवनी


इन दिनों बॉलीवुड के फिल्म कलाकारों के हॉलीवुड की फिल्मों और टी वी सीरियल्स में काम करने को लेकर खासी चर्चा होती है। प्रियंका चोपड़ा से लेकर दीपिका पादुकोण तक की। हमेशा जब भी किसी भारतीय कलाकार को विदेशी फिल्मों में काम मिलता है तो वो खबर बनती है। लेकिन इन चर्चा के बीच हम भूल जाते हैं कि प्रियंका चोपड़ा के हॉलीवुड में काम करने से लगभग दशकों पहले भारतीय फिल्मों का एक सितारा विदेशी फिल्माकाश पर चमक चुका था। इस सितारे का नाम था शशि कपूर। शशि कपूर ने 1967 में प्रिटी पॉली फिल्म में काम किया था। कहना ना होगा कि शशि कपूर बॉलीवुड के पहले अंतराष्ट्रीय कलाकार थे जिनको प्रसिद्धि मिली थी। दरअसल हम बहुधा सबसे पहले सिंड्रोम के शिकार होकर गलतियां कर बैठते हैं। शशि कपूर के मामले में तो कई बार ऐसा हुआ। इन्हीं स्थितियों से प्ररित होकर असीम छाबड़ा ने शशि कपूर पर एक मुक्कमल किताब लिखने की योजना बनाई थी जो शशि के जीवन काल में ही पूरी हो गई थी। इस किताब का नाम है शशि कपूर, द हाउस होल्डर, द स्टार। लेखक ने साफ तौर पर इस बात को स्वीकार किया है कि शशि कपूर पर पुस्तक लिखने के दौरान जब उसने कपूर खानदान की दूसरी पीढ़ी के तीसरे सितारे के इंटरव्यू को पढ़ना शुरू किया तो उन्हें इस बात का एहसास हुआ कि लोगों ने शशि के व्यक्तित्व के कितने पहलुओं को भुला दिया है।
इस पुस्तक में असीम छाबड़ा ने शशि कपूर की शुरुआती जिंदगी पर विस्तार से प्रकाश डाला है कि किस तरह से उनका जेनिफर से इश्क हुआ। दोनों एक ही नाटक कंपनी में काम करते थे और वहीं इश्क पनपा था। जेनिफर की पिता की मर्जी के खिलाफ दोनों ने शादी करने का फैसला किया था, शादी की भी थी। इन प्रसंगों में असीम छाबड़ा ने उपलब्ध अलग अलग तथ्यों को सामने रखा है ताकि पाठकों को समग्रता में घटनाओं को पता लग सके। अफवाहों पर विराम लग सके और सचाई समाने आ सके। शशि कपूर एक बेहतरीन इंसान और सच्चे अर्थों में प्रोफेशनल थे । पर इस किताब को पढ़ते हुए कई बार ऐसा लगता है कि शशि प्रोफेशनलिज्म पर दिल की बातों को या रिश्तों को तरजीह देते थे लेकिन जब वो दिल से कुछ करते थे तो उसका ढिंढोरा नहीं पीटते थे। शबाना आजमी के साथ का एक वाकया बेहद मशहूर है। 1986 में शबाना आजामी ने कोलाबा की झुग्गियों को हटाने के सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था और भूख हड़ताल पर बैठ गई थीं। भूख हड़ताल के पांचवें दिन शबाना की तबीयत बिगड़ने लगी थी और उनका रक्तचाप बहुत कम होने लगा था। शशि कपूर को ये बात पता चली तो वो सीधे उस वक्त के महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री शंकर राव चव्हाण के पास जा पहुंचे। उनके कहा कि आपको जब जरूरत होती है तो पूरी फिल्म इंडस्ट्री आपके समर्थन में खड़ी हो जाती है। शंकर राव चव्हाण ने तुरंत संबंधित विभाग के मंत्री को बलाया और उनसे कहा कि जाकर शबाना आजमी की हड़ताल तुड़वाएं। शशि कपूर और मंत्री दोनों हड़ताल स्थल पर पहुंचे और जूस मंगवा कर शाबाना की हड़ताल खत्म करवाई। जाहिर सी बात है कि मांगे मान ली गईं। हड़ताल तोड़ने के बाद जब शबाना मंच पर आईं और वो शशि कपूर को धन्यवाद देने ही वाली थीं कि उनकी नजर शशि पर पड़ी जो अपनी गाड़ी में बैठकर जा रहे थे। जाने के पहले उन्होंने कहा था कि ये आंदोलनकारियों की जीत है और उनका इससे कोई लेना देना नहीं है। शशि कपूर से जुड़े इस तरह के कई वाकए इस किताब में हैं जहां वो अपने साथी कलाकारों को सेट से लेकर व्यक्तिगत जीवन में मदद करते रहते थे।
लेकिन अगर हम समग्रता में असीम छाबड़ा की इस किताब पर विचार करते हैं तो ये भक्तिभाव में डूबकर लिखी किताब प्रतीत होती है जिसमें तथ्यों को अपने निष्कर्षों के हिसाब से कई जगह पर घुमाया गया है। शुरुआत के अध्याय में लेखक इस तरह से लिखते हैं ताकि पाठकों को लगे कि वो वस्तुनिष्ठ होकर समग्रता में शशि के व्यक्तित्व को सामने रख रहे हैं लेकिन जैसे जैसे किताब आगे बढ़ती है वैसे वैसे लेखक पर भक्ति हावी होती जाती है। लेखक जब उनको व्यस्ततम स्टार कहते हैं तो ये ध्वनित होता है कि वो उस दौर के सुपरस्टार थे । लेखक के मुताबिक शशि कपूर साठ से लेकर अस्सी के दशक तक लगातार सफलता की बुलंदियों पर रहे लेकिन इन बुलंदियों के बारे में बात करते हुए वो राजेन्द्र कुमार, दिलीप कुमार, राज कपूर, शम्मी कपूर की सफलता क़ा बस उल्लेख भर कर देते हैं। इसी तरह से जब वो सत्तर की दशक की बात करते हैं तो राजेश खन्ना की रिकॉर्डतोड़ सफलता को गहराई से रेखांकित नहीं करते हैं। उसके बाद अमिताभ बच्चन का जिक्र भर होता चलता है। लेखक इस बात से भी बचते नजर आते हैं कि शशि कपूर की सफलता में उनके को स्टार का बड़ा रोल रहा है। दीवार, त्रिशूल, शर्मीली, प्यार का मौसम, आमने सामने, चोर मचाए शोर आदि पर विस्तार से चर्चा बगैर शशि पर मुकम्मल किताब नहीं हो सकती है। दीवार के जिस रोल को लेकर शशि की तारीफ होती है वो रोल पहले नवीन निश्चल को मिलने वाला था लेकिन इसका उल्लेख दिखता नहीं है। निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि शशि कपूर के व्यक्तित्व औक कृत्तित्व पर यह मुकम्मल पुस्तक नहीं है। 

Saturday, February 10, 2018

जलेस के जलसे पर सवाल


एक लेखक संगठन है। जनवादी लेखक संघ। दिल्ली में उसका केंद्रीय कार्यालय है। भारतीय जनता पार्टी और जनवादी लेखक संघ का दफ्तर दिल्ली की एक ही सड़क पर स्थित है। यह लेखक संगठन हिंदी और उर्दू के लेखकों का संगठन है। अभी इसका राष्ट्रीय सम्मेलन झारखंड के धनबाद में हुआ। सम्मेलन का उद्घाटन अंग्रेजी के पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन ने किया। हिंदी के लेखक असगर वजाहत को इसका अध्यक्ष चुना गया। चुनाव के वक्त अधिवेशन में असगर वजाहत अनुपस्थित थे। वजह उऩका कहीं अन्यत्र व्यस्त होना बताया गया। महासचिव मुरली मनोहर प्रसाद सिंह और उप महासचिव संजीव कुमार बने रहे। इस वर्ष जनवरी में यह सब संपन्न हो गया। उपर से देखने पर ये बातें सामान्य लगती हैं लेकिन कुछ पूर्व जनवादियों को सिद्धार्थ वरदराजन से जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय सम्मेलन का शुभारंभ करवाना खल गया। उनके मुताबिक यह जनवादी लेखक संघ के सांगठनिक कौशल की कमजोरी है जो किसी बड़े हिंदी या उर्दू के लेखक से सम्मेलन के उद्घाटन को ना करवा कर अंग्रेजी के पत्रकार से करवाता है । दूसरी बात जिसको लेकर साहित्यिक हलके में चर्चा रही वो ये कि जनवादी लेखक संघ के शीर्ष पदाधिकारी अब पूर्वी दिल्ली इलाके के निवासी हो गए। यह महज एक संयोग हो सकता है लेकिन सवाल यह भी उठता है कि जनवादी लेखक संघ को हिन्दुस्तान के अन्य शहरों से कोई अध्यक्ष, महासचिव या उप महासचिव क्यों नहीं मिलता है। जनवादी लेखक संघ में कुछ चुनिंदा लोगों का वर्चस्व कायम क्यों हैं। इससे बेहतर तो प्रगतिशील लेखक संघ है जो हर साल देश के अलग अलग हिस्से के लेखकों को शीर्ष पदों की नुमाइंदगी के लिए चुनते हैं। जनवादी लेखक संघ तो दिल्ली से पूर्वी दिल्ली में आ डटा है। खैर थोड़ी बहुत चर्चा के बाद बात आई गई हो गई।
इस बीच जनवादी लेखक संघ से पूर्व में जुड़े कोलकाता के लेखक अरुण माहेश्वरी ने धनबाद में आयोजित जलेस के राष्ट्रीय सम्मेलन को लेकर एक लंबी पोस्ट फेसबुक पर डाल दी। इस स्तंभ में पहले भी इस बात की चर्चा की जा चुकी है कि साहित्य के मसले अब फेसबुक पर स्थान पाने लगे हैं। ऐसा प्रतीत होने लगा है कि सभी तरह के साहित्यिक मसले फेसबुक पर हल हो जाएंगे। जनवादी लेखक संघ के धनबाद सम्मेलमन के संपन्न होने के बाद अरुण माहेश्वरी ने अपनी पोस्ट में लिखा- यद्यपि संजीव कुमार ने सम्मेलन के सांगठनिक सत्र और सचिव की रिपोर्ट के सूत्रीकरण पर विवादों का एक लाईन में संकेत दिया है, लेकिन कुछ इस प्रकार मानो वह सब किसी गोपनीय संगठन की गोपनीय बातें हो, जिनका खुले में उल्लेख करना पाप है! उनसे उस सम्मेलन में अनुपस्थित लेखकों का कोई सरोकार नहीं हो सकता है ! कहना न होगा, संजीव कुमार ने खुद ही अपनी रिपोर्ट से जलेस के इस राष्ट्रीय सम्मेलन को अजीब प्रकार से रहस्यमय बना दिया है । आज जब हर लेखक और संस्कृतिकर्मी अपनी सांसों पर मोदी-आरएसएस के फासीवाद के जहरीले सामाजिक दबाव को महसूस कर रहा है, उस समय लेखकों के एक राष्ट्रीय सम्मेलन की रिपोर्ट में उसका कहीं कोई उल्लेख तक न होना और भी रहस्यमय है? सीपीआई(एम) के सर्वोच्च नेतृत्व में चल रही गुटबाज़ी आज जगजाहिर है और दुनिया इस बात को भी जानती है कि सीपीआई(एम) के सर्वोच्च नेतृत्व में अभी ऐसे तत्वों ने अपना बहुमत बना रखा है जो मोदी-आरएसएस को फासीवादी नहीं मानते और उनके खिलाफ व्यापकतम मोर्चा तैयार करने के विचारों के विरोधी हैं । हमारा अनुमान है कि इन तत्वों ने ही अपने जनवादी केंद्रीयतावादके पवित्र अस्त्र के प्रयोग से जनवादी लेखक संघ की तरह के एक जन-संगठन की स्वायत्तता को पूरी तरह से रौंद डाला हैं ।
इस सम्मेलन में हिंदी के एक प्रतिष्ठित कथाकार असगर वजाहत को जलेस का अध्यक्ष बनाया गया है । हम नहीं जानते कि क्या वे भी मोदी-आरएसएस को फासीवादी नहीं मानते और इनके खिलाफ सभी धर्म-निरपेक्ष और जनतांत्रिक ताक़तों के व्यापकतम मोर्चे के विरोधी हैं ? बहरहाल, हमारी दृष्टि में लगता है यह सम्मेलन जलेस नामक एक ऐतिहासिक संगठन को मौत के मुँह में धकेल देने वाला सम्मेलन हुआ है, क्योंकि जनवाद की रक्षा के जिस बुनियादी उद्देश्य पर इस संगठन की नींव पड़ी थी, अब क्रमश: क्षय की एक बहु-स्तरीय प्रक्रिया के बीच से होते हुए अंत में उसी उद्देश्य को ठुकरा कर इसकी प्राण-सत्ता का ही अंत कर दिया गया है । प्रलेस का एक दुखांत हमने बिहार के ही गया में आंतरिक आपातकाल के दिनों में देखा था, अब उसी पिंडदानको प्रहसन के तौर पर हम झारखंड के शहर में दोहराते हुए देख रहे हैं।
अरुण माहेश्वरी की इस पोस्ट का जनवादी लेखक संघ के उप महासचिव संजीव कुमार ने बेहद आक्रामक तरीके से उत्तर दिया और एक नया शब्द चूर्ख गढ़ते हिए अरुण माहेश्वरी पर पलटवार किया- सबसे झूठा आरोप चूरख ने यह लगाया कि जलेस के राष्ट्रीय सम्मेलन की रिपोर्ट (उसका आशय सम्मेलन में पेश केंद्र की रिपोर्ट से ही होगा) में साम्प्रदायिक फ़ासीवाद का कहीं जिक्र नहीं है. जिसकी भाषा की समझ का हाल आप देख चुके हैं, उसका ऐसा मानना कतई आश्चर्यजनक नहीं.
साम्प्रदायिक फ़ासीवादी उभार पूरी रिपोर्ट की केन्द्रीय चिंता है और अगर आप शब्द की मौजूदगी ढूंढने पर बजिद हों तो उसके भी दसियों उदाहरण रिपोर्ट में हैं. पहले खंड का शीर्षक ही है : साम्प्रदायिक फ़ासीवाद के अच्छे दिन’ ”. इस खंड में 1.1 से लेकर 1.8 तक, आठ बिंदु हैं जिनमें साम्प्रदायिक फ़ासीवाद की विभिन्न अभिव्यक्तियों पर विचार किया गया है।संजीव कुमार जी के इस उत्तर पर पक्ष और विपक्ष में बातें शुरू हो गई । कई लोगों ने चूरख शब्द पर आपत्ति जताई और हिंदी के प्रतिष्ठित कवि बोधिसत्व ने तो उनसे इस शब्द को वापस लेने की मांग की। बोधिसत्व ने तो यहां तक लिखा कि सांगठनिक बहसों में किसी तरह से किसी गाली की आवश्यकता क्यों? आप उत्तर दें लिहाड़ी नहीं लें..विरोध और आलोचना को सहज लें....संगठन संगठन ही है हस्तिनापुर का सिंहासन तो नहीं कि उस पर और उसके नियंताओं पर सवाल न उठाया जा सके?’
बवाल बढ़ा तो संजीव जी ने एक और पोस्ट लिखी जिसमें उन्होंने अपनी पिछली पोस्ट पर शर्मिदंगी का जिक्र किया। लेकिन वो पोस्ट खेद की शक्ल में व्यंग्य था। संजीव कुमार और अरुण माहेश्वरी में सीधे सीधे भी विवाद हुआ। ट्रोल से लेकर भक्त आदि जैसे शब्द भी इस्तेमाल किए गए। इस पूरे विवाद में साहित्यिक मर्यादा तार-तार हुई। अब सवाल यह उठता है कि अरुण माहेश्वरी को अचानक से जनवादी लेखक संघ के क्रियाकलापों से क्यों दिक्कत होने लगी। कुछ सालों पहले तक जब वो जनवादी लेखक संघ में पदाधिकारी थे तो क्या उस वक्त संगठन में इस तरह की बातें नहीं होती थी। हिंदी साहित्य जगत और वामपंथी लेखक संगठनों के क्रियाकलापों पर नजर रखनेवाले लोगों का कहना है कि जब प्रोफेसर जगदीश्वर चतुर्वेदी ने जनवादी लेखक संघ छोड़ा था तब अरुण माहेश्वरी ने कोई स्टैंड क्यों नहीं लिया था।
रही बात जनवादी लेखक संघ के क्रियाकलापों को लेकर तो वहां लोकतांत्रिक प्रक्रिया की अपेक्षा करना व्यर्थ है। जिस कथित फासीवाद की चर्चा दोनों महानुभावों ने अपनी अपनी पोस्ट में किया है वह बहुत विद्रूप रूप में जनवादी लेखक संघ में उपस्थित है और वर्षों से वहां राज कर रहा है। नीचे के स्तर पर नए पदाधिकारियों का बदलाव चुनाव के जरिए होता रहा है लेकिन शीर्ष स्तर पर बहुत बदलाव नहीं होता है। पहले चंचल चौहान लंबे समय तक जनवादी लेखक संघ को चलाते रहे, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह के साथ, अब मुरली बाबू ओर संजीव कुमार चला रहे हैं। इस संघटन की उपयोगिता और सार्थकता पर तो तब बात हो जब इसमें लोकतंत्र दिखाई दे। यहां कुछ भी कहना बेमानी सा लगता है क्योंकि होता वही है तो शीर्ष पर बैठे दो लोग चाहते हैं। दूसरी बात जो यह कही जाती है वो यह कि इस लेखक संगठन का पदाधिकारी वही बन सकता है जो सीपीएम का सदस्य हो। इस वजह से भी शीर्ष के पदाधिकारियों मे ज्यादा बदलाव देखने को नहीं मिलता है। जो लेखक जमे हैं वो अपनी जगह पर बने रहते हैं। पहले भी मैं यह कह चुका हूं ये लेखक संगठन अपनी राजनीतिक पार्टियों के बौद्धिक प्रकोष्ठ की तरह काम करते हैं। जब आप किसी राजनीतिक दल के पिछलग्गू बन जाते हैं या फिर उस पार्टी के बौद्धिक प्रकोष्ठ बन जाते हैं तो आपको स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने का अधिकार नहीं रह जाता है और आपको हर महत्वपूर्ण फैसले के लिए अपनी पार्टी के आलाकमान का मुंह जोहना पड़ता है। जब लेखक अपने राजनीतिक अकाओं की तरफ देखकर फैसले लेते हैं तो उनकी पहली प्राथमिकता पार्टी का हित हो जाता है और लेखक नेपथ्य में चला जाता है। यह बात पूरे देश ने इमरजेंसी के समय देखा जब प्रगतिशील लेखक संघ ने इमरजेंसी का समर्थन किया था। क्या लेखक संगछनों की अब कोई उपयोगिता बची है। विचार करें।  


Saturday, February 3, 2018

खत की आड़ में प्रसिद्धि की चाहत


संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावत को लेकर उठा विवाद फिल्म की रिलीज के बाद शांत होने लगा था। उसी वक्त फिल्म अभिनेत्री स्वरा भास्कर ने पद्मावत के निर्देशक संजय लीला भंसाली को एक लंबा उपदेशात्मक खत लिखकर एक और विवाद उठाने की कोशिश की। स्वरा के खत से बॉलीवुड में थोडा उद्वेलन हुआ। शाहिद कपूर और दीपिका ने अपने अंदाज में जवाब दिया। विवेक अग्निहोत्री समेत कई अन्य लोगों ने भी स्वरा के खत का उत्तर दिया। स्वरा ने फिल्म पद्मावत के बहाने से देश में महिलाओं को लेकर जो सवाल उठाए हैं उसपर समग्रता में विचार किया जाना आवश्यक प्रतीत होता है। स्वरा अपने खत में इस बात को रेखांकित करती हैं कि उन्होंने टिकट खरीदकर ये फिल्म देखी लेकिन वहां उनको ये महसूस हुआ कि संजय लीला भंसाली ने जौहर और सती को महिमामंडित किया है। उत्तेजना में उन्होंने यहां तक कह डाला कि आपकी भव्य फिल्म को देखने के बाद मुझे योनि जैसा होने का एहसास हुआ. मुझे ऐसा लगा कि मैं महज एक योनि में सीमित कर दी गयी हूं। स्वरा के विचारों का सम्मान किया जाना चाहिए लेकिन किसी भी विचार को अतीत की कसौटी पर भी कसे बिना उसकी वस्तुनिष्ठता का पता नहीं चल पाता है।
स्वरा के खत को अगर हम ठीक से ठहरकर पढ़ें तो शुरू से ही उसमें एक व्यंग्यात्मक भाव है। फिल्म पद्मावत के बहाने वो अपने विचारों को बढ़ाती हुई नजर आती हैं। इसके पहले कि स्वरा के विचारों को लेकर बात हो उनके पत्र की पहली पंक्ति पर बात कर लते हैं जो दोषपूर्ण ही नहीं महज कल्पना पर आधारित है। उस पंक्ति में स्वरा फिल्म पद्मावत में 70 कट की बात करती हैं जो गलत है। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड की सदस्या वाणी त्रिपाठी टिक्कू ने जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के दौरान मंच से ये बात साफ कर दी थी कि फिल्म पद्मावत में कोई कट नहीं लगाया गया है। जयपुर लिट फेस्ट में भी एक सत्र में संचालक सलिल त्रिपाठी ने भी कुछ इसी तरह की बात की थी। सलिल त्रिपाठी पेन इंटरनेशनल से जुड़े हुए हैं और पुरस्कार वापसी के दौर में काफी सक्रियता से असहिष्णुता को लेकर लेखन कर रहे थे। खैर ये अलग प्रसंग है। अब वापस लौटते हैं स्वरा के पत्र पर जहां वो कहती हैं – और आज के इस सहिष्णुभारत में, जहां मीट को लेकर लोगों की हत्याएं हो जाती हैं और किसी आदिम मर्दाने गर्व की भावना का बदला लेने के लिए स्कूल जाते बच्चों को निशाना बनाया जाता है, उसके बीच आपकी फिल्म रिलीज हो सकी, यह अपने आप में बहुत बड़ी बात है. इसलिए आपको एक बार फिर से बधाई।  बहुत चतुराई से स्वरा भास्कर ने फिल्म पद्मावत के बहाने देश में दो साल पहले चली सहिष्णुता और असहिष्णुता की बहस को भी छेड़ने की कोशिश की है। इससे भी इस खत को लिखने की मंशा के संकेत तो मिलते ही हैं। तंज कसते हुए वो इस बात का उल्लेख करती हैं कि भारत में मीट के लिए हत्या हो रही है। फिर वो सुनी सुनाई बातों पर यकीन कर उसको प्रचारित करने के दोष की शिकार हो रही हैं। कल्पना और परसेप्शन के आधार पर अपने तथ्य निर्मित करती चल रही हैं। और जब कल्पना के आधार पर यथार्थ का निर्माण होता है तो वो बहुत खोखला होता है।
अपने इस पत्र में स्वरा भास्कर ने ये भी दावा किया है कि उन्होंने संजय लीला भंसाली के लिए ट्विटर पर आभासी लठैतों से डटकर मुकाबला किया। स्वरा ने अपने पक्ष के साथ एक वीडियो क्लिप भी लगाया जिसमें वो फिल्म पद्मावत के बचाव का दावा कर रही हैं। उस वीडियो में भी अगर पहली पंक्ति देखी जाए तो वहां वो ये कहती नजर आ रही हैं कि विवाद जानबूझकर खड़ा किया गया और बढ़ने दिया गया। किसने जानबूझकर विवाद खड़ा किया, उनका इशारा किसकी ओर था, इसको साफ करना चाहिए। क्या वो इसके लिए संजय लीला भंसाली को जिम्मेदार मान रही हैं? लेकिन जो एक और बड़ी चूक स्वरा से हुई वो ये जब वो कहती हैं कि – मैंने पूरी सच्चाई के साथ यह यकीन किया कि और आज भी करती हूं कि इस देश के हर दूसरे व्यक्ति को वह कहानी कहने का हक है, जो वह कहना चाहता है और जिस तरह से कहना चाहता है।वह अपनी नायिका के पेट को जितना चाहे उघाड़ कर दिखा सकता है और ऐसा करते उन्हें अपने सेटों को जलाए जाने का, मारपीट किए जाने, अंगों को काटे जाने, जान जाने का डर नहीं सताएगा। हर व्यक्ति को कहानी कहने का हक है, जो वो कहना चाहता है लेकिन जिस तरह से कहना चाहता है उसकी कुछ सीमाएं संविधान में तय की गई हैं। अभिव्यक्ति की आजादी संपूर्ण नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) में भारत की जनता को अभिव्यक्ति की आजादी का हक दिया गया है लेकिन उसके साथ ही संविधान का अनुच्छेध 19(2) इस हक की सीमाएं भी तय कर देता है। इसलिए कोई भी नायिका के पेट को जितना चाहे उघाड़कर नहीं दिखा सकता है। संविधान के अंतर्गत जो व्यवस्था है उसका सम्मान तो करना ही होगा । हां, ये भी साथ साथ देखा जाना चाहिए कि संविधान इसके उल्लंघन की स्थिति में कानून हाथ में लेने की इजाजत नहीं देता है । किसी भी प्रकार की हिंसा या हिंसा की धमकी कानूनन अपराध है। लेकिन स्वरा के पत्र में इस तरह की कई बातें हैं। बहुधा उत्तेजना में तर्क भटकने लगते हैं।
अपने इस पत्र में स्वरा ने एक बात गंभीरता से रेखांकित करने की कोशिश की है वो ये कि फिल्म सती या जौहर को बढ़ावा देती है। अपनी इस बात को पुष्ट करने के लिए स्वरा बहुत जोरदार तरीके से स्त्रियों की स्थितियों के बारे में बातें करती चलती हैं। भंसासी को 13 वीं शताब्दी से लेकर 21 वी शताब्दी के भारत की याद दिलाती हैं। एक माध्यम के तौर पर फिल्म के ताकत की तरफ भी इशारा करती हैं । यह ठीक है लेकिन स्वरा इस बात को भूल गई हैं कि इस फिल्म के पहले चार बड़े डिसक्लेमर लगाए गए हैं जिसमें फिल्म निर्माता की तरफ से कहा गया है कि यह जायसी के महाकाव् पद्मावत पर आधारित है। यह फिल्म सती या जौहर को महिमामंडित नहीं करती है आदि। स्वरा के पत्र के बाद इस फिल्म की अभिनेत्री दीपिका ने ठीक ही कहा प्रतीत होता है। दीपिका ने कहा कि ऐसा लगता है कि फिल्म शुरू होने के पहले वो पॉपकॉर्न खाने चली गई थीं जिससे कि फिल्म की शुरुआत में दिखाई गए डिसक्लेमर उनसे छूट गए। वैसे भी 13 वीं शताब्दी की स्थितियों का अगर चित्रण हो रहा है तो उसमें 21वीं शताब्दी की सोच को घुसाना उचित नहीं होगा। क्या फिल्म बाजी राव मस्तानी को बहुविवाह और व्यभिचार को बढ़ावा देने और इन कुप्रथाओ को बढ़ावा देनेवाला माना जाएगा। मैं यहां स्वरा की खुद की फिल्म तनु वेड्स मनु की चर्चा नहीं करना चाहता हूं क्योंकि उस फिल्म की कहानी तो उनको याद ही होगी। उस वक्त उनके अंदर का पत्र लेखक खामोश रहा।
अपने इस पत्र में स्वरा ने अपने समर्थन में विभाजन के वक्त के भारतीय महिलाओं के दर्द का उल्लेख कर इसको गंभीर बनाने की कोशिश की है। कुछ साहित्यक कृतियों का उदाहरण भी दिया है। लेकिन स्वरा भी उसी दोष का शिकार हो जाती हैं जिसके शिकार तुलसीदास की पंक्ति ढोल गंवार... को व्याख्यायित करनेवाले होते हैं। रामचरित मानस में चुलसीदास की इन दो पंक्तियों के आधार पर उनको पिछड़ी जातियों और महिलाओं का विरोधी करार देने की कोशिश लगातार की जाती रही, बगैर संदर्भ को समझे कि ये पंक्ति कौन कहता है। तुलसीदास की पंक्तियों की व्याख्या करनेवाले आलोचक या लेखक बहुधा बहुत ही सुनियोजित तरीके से तुलसीदास के उन पदों को प्रमुखता से उठाते हैं जिनसे उनकी छवि स्त्री विरोधी और वर्णाश्रम व्यवस्था के समर्थक की बनती है। तुलसीदास को स्त्री विरोधी करार देनेवाले मानस में अन्यत्र स्त्रियों का जो वर्णन है उसकी ओर देखते ही नहीं हैं। एक प्रसंग में कहा गया हैं – ‘कत विधि सृजीं नारि जग माहीं, पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं। इसी तरह अगर देखें तो मानस में पुत्री की विदाई के समय के प्रसंग में कहा गया है- बहुरि बहुरि भेटहिं महतारी, कहहिं बिरंची रचीं कत नारी। इसके अलावा तुलसी साफ तौर पर कहते हैं- रामहि केवल प्रेमु पिआरा। जानि लेउ जो जाननिहारा।आकलन सदैव समग्रता में होना चाहिए। स्वरा के इस खत से उसको दो मिनट की प्रसिद्धि अवश्य मिल गई लेकिन अगर वो इस खत से बौद्धिक होने का रास्ता ढूंढ रही है तो वो भटकती हुई नजर आती है।  


Wednesday, January 31, 2018

'काली करतूतों के अलावा सब ईमानदारी से लिखा'


सुरेन्द्र मोहन पाठक हिंदी में सबसे ज्यादा पढे जाने वाले लेखकों में से एक हैं। अब तक उनकी 298 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं और भारत में अपराध कथाओं के बेताज बादशाह माने जाते हैं। आगामी फरवरी के पहले सप्ताह में उनकी आत्मकथा ना बैरी ना कोई बेगानाप्रकाशित होने जा रही है। अपनी आत्मकथा के प्रकाशन के पूर्व उन्होंने मुझसे खास बातचीत की।

प्रश्न- अपराध कथाएं या जासूसी उपन्यास लिखते लिखते आत्मकथा लिखने का ख्याल कैसे आया?

उत्तर- ख्याल मुझे नहीं आया, मेरी एडिटर मीनाक्षी ठाकुर को आया। उसने ना सिर्फ मुझे बायो लिखने को कहा- कहा, पूछा नहीं कि मैं लिख सकता हूं या नहीं और प्रस्ताव को प्रकाशकीय मजबूती देने के लिए एडवांस में कांट्रैक्ट भी भेज दिया। तब मुझे गंभीरता से अपने अंतर को टटोलना पड़ा कि क्या मैं बायो लिख सकता था, क्या मेरी गुजरी जिंदगी में ऐसा गैरमामूली कुछ घटित हुआ था कि उसे बायो में समेटा जा सकता ! मुझे ऐसा कुछ दिखाई ना दिया। जो दिखाई दिया वो इतना था कि 50-60 पृष्ठों में चुक जाता। असमर्थता दिखाने की जगह मैंने फैसला किया कि लिखना शुरू करता हूं, कुछ बन पड़ा तो ठीक वर्ना हाथ खड़े कर दूंगा। जब कलम चली तो मेरे सामने 1200 प्रिटेंड पेजे का व्यापक मैटर था। मेरा ईश्वर ही जानता है कि कौन सा शैतान मुझपर सवार हुआ जो कि मैं एक गैरवाकिफ सब्जेक्ट पर एकमुश्त इतना लिख पाया। 

प्रश्न- आपने अपनी आत्मकथा का नाम ना बैरी ना कोई बेगाना रखा है, इसके पीछे की सोच क्या है?

उत्तर- ना बैरी ना कोई बेगाना नाम गुरू गोविंद सिंह के एक वाक पर आधारित है। जो कहता है न कोई बैरी नहीं बिगाना, सगल संग हम को बनि आयी। मैंने अपनी गुजरी जिंदगी को रिव्यू किया तो उसमें मुझे ना कोई दुश्मन दिखाई दिया, न कोई गैर लगा, इस सबमें कोई खामी पायी तो खुद में पायी। लिहाजा मैंने वाक के एक हिस्से को टाइटल के लायक बनाने के लिए और संक्षिप्त किया और बायो के पहले खंड का नाम ना बैरी ना कोई बेगाना रखा । ये मेरे पाठकों की जानकारी में आते ही फौरन क्लिक कर गया और ये नाम फाइनल हुआ। वर्ना संपादक का पसंदीदा नाम पाठकनामा था।

प्रश्न- चंद दिनों में आपकी आत्मकथा प्रकाशित होनेवाली है। आपने अपनी आत्मकथा में सैमुअल गोल्डविन को कोट किया है जो कहते हैं कि आत्मकथा मरने के बाद प्रकाशित होनी चाहिए। लेकिन आपने तो लिख डाला?

उत्तर- सैमुअल गोल्डविन की उक्ति आई डोंट थिंक एनीवन शुड राइट देयर आटोबॉयोग्राफी अनटिल आफ्टर दे आर डेड व्यंग्यात्मक है। इसका अर्थ ये है कि जीते जी बायो लिखना बेतहाशा दुश्मन बनाने का आसान तरीका है। प्रशस्तिगान से तो बायो नहीं बनती, बनती है तो पठनीय नहीं बनती। बायो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लेखक का दखल बनाती है, अब अगर वो अभिव्यक्ति का वक्त आने पर अपने हाथ मर्यादाओं से, लोकलाज से बंधा पाता है तो कैसी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता? अगर आप आप किसी को भड़काने, आंदोलित करने के लिए स्वतंत्र नहीं हैं तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कोई मायने ही नहीं रहते । कोई माई का लाल किसी को राजी नहीं कर सकता, विवादास्पद कुछ लिखा जाएगा तो निंदक तो बनेंगे ही। शाद इसलिए सैम गोल्डविन का इशारा है कि आत्मकथा को मरणोपरांत छपना ही बेहतर होता है। तब कोई कहनेवाले की जुबान नहीं पकड़ सकता है, जबकि जीवन काल में लिखी गई आत्मकथा का तीव्र विरोध होना, कोर्ट कचहरी तक होना आम बात है।

प्रश्न- आपने अपनी पत्नी की वॉर्निंग और पुत्री की चेतावनी के बाद आत्मकथा लिखने का जोखिम उठाया । कैसे मनाया उन दोनों को ?

उत्तर- पत्नी और पुत्री की वार्निंग अकादमिक थी, जिसका मंतव्य मुझे उस अंजाम से खबरदार करना था जो करीबी रिश्तेदारों, दोस्तों के बारे में कुछ खराब लिखने से मेरा हो सकता था। बायो में मैंने गढ़ी हुई कोई बात नहीं लिखी, वही लिखा जो मेरे साथ घटित हुआ। विवादास्पद बातों के मेरे पास दस्तावेजी सबूत है। इसलिए मुझे यकीन है कि किसी का ये कहने का मुंह नहीं बनेगा कि मैंने गलत लिखा या बढ़ा चढ़ा कर लिखा। अगर ऐसी कोई बात लिखना गलता है, तो उसे कहना गलत क्यों नहीं है। कहकर डैमेज कर चुकने के बाद उसके कलमबद्ध बयान पर सेंसर लगाना मैं नहीं समझता कि ठीक है। ये तो यों होगा कि जबरा मारे पर रोने ना दे।   

प्रश्न- आपकी पत्नी और बेटी ने आत्मकथा के कुछ अंशों को सेंसर किया या नहीं?

उत्तर- कुछ सेंसर नहीं किया, सब ठीक-ठाक पाया। अलबत्ता अगले भाग में ऐसी नौबत आ सकती है क्योंकि उसमें परिपक्व जीवन के किस्से हैं और तब के हैं जब मेरे सामाजिक सरोकरों में बहुत विविधता आ चुकी थी। तब शायद कुछ बातों पर ऐतराज हो लेकिन वो ऐतराज मुझे कुबूल नहीं होगा। इसलिए क्योंकि जो मैंने लिखा है, ईमानदारी से लिखा है, उसमें फैवरिकेटेड कोई बात नहीं है।

प्रश्न- आपने अपने बचपन को जीवन का बेहतरीन हिस्सा कहा है, कोई खास वजह जबकि उस दौर में आपने विभाजन का दंश झेला?

उत्तर- बचपन इग्नोरेंस का दौर होता है। बच्चा उन बातों को नहीं समझता जो वयस्कों के लिए गंभीर होती हैं। इसलिए अंजाम से बेखबर होता है। विभाजन का दौर मैंने देखा लेकिन उसकी विभीषिका को समझने की मेरी उम्र नहीं थी। बचपन मां-बाप की छत्रछाया का सुख पाने का वक्त होता है– कुछ बुरा होता है तो मां बाप झेलते हैं, अच्छा होता है तो बच्चा उसका सुख पाता है। इन बातों में फर्क करना कभी बच्चे का सरोकार नहीं बन पाता है। बच्चे के लिए ये बड़ी घटना है कि उसका खिलौना टूट गया, न कि ये कि देश का विभाजन हो गया। इसलिए मैंने बचपन को जिन्दगी का बेहतरीन हिस्सा करार दिया है।  

प्रश्न- अपने जवानी के बारे में लिखते हुए आप कहते हैं कि जुल्म सहने से भी जालिम की मदद होती है। ये व्यवस्था के प्रति गुस्सा है या आजादी से मोहभंग का दर्द ?

उत्तर- सकल संसार इस बात से सहमत है कि जुल्म सहने से जालिम की मदद होती है। बुराई की जीत इसलिए भी होती है क्योंकि सच्चाई ने विरोध के लिए सामने आना जरूरी न समझा। बुरा उम्मीदवार इसलिए चुनाव जीत जाता है क्योंकि अच्छे वोटर वोट देने नहीं जाते। जुल्म सारी दुनिया में होता है, ऐसा न होता तो अमेरिका में माफिया की समांतर सरकार न चल रही होती। फर्क ये है कि बाहर इन ताकतों का अनुपात बहुत कम है जबकि हमारे यहां ये ज्यादा है । कोई माई का लाल, वो दुनिया के किसी हिस्से में हो, बुराई का समूल नाश नहीं कर सकता, लेकिन विरोध तो कर सकता है। मुझे क्या, मेरे साथ तो ना हुआ वाली प्रवृत्ति को को तिलांजलि दे सकता है। आपको जुल्म से ऐतराज ना होना इस बात का सबूत है कि आप जुल्म का शिकार होने के लिए बैठे हैं।

प्रश्न- लगभग चार सौ पन्नों की अपनी आत्मकथा में आपने कितना बताया और कितना छुपाया?

उत्तर- कुछ नहीं छुपाया। सबकुछ बहुत ईमानदारी से कलमबद्ध किया, फिर भी उन बातों को नजरअंदाज किया जो मेरी बहुत ही काली करतूतों से संबंधित थीं और जो मेरे करीबियों की निगाह में मुझे शैतान ठहरा सकती थी। मैं उम्मीद करता हूं कि अभी चंद और साल मुझे जीना है और बाकी का जीवन अपने पर कालिख पोत कर जियूं ये तो ठीक न होगा। लिहाजा मैं ने अपनी जिंदगी की बहुत सी अन्दरुनी , छवि को धव्स्त करनेवाली बातों से परहेज किया। कहते हैं कि आज तक दो ही बायो ईमानदारी से लिखी गई, एक महात्मा गांधी की और दूसरी रूसो की। मेरे जैसा निहायत मामूली इंसान बायो लिखने के सिलसिले में कैसे इन महान विभूतियों जैसा हैसला अपने आप में पैदा कर सकता है ? ऐसी बातें लिखने का हौसला क्योंकर मैं दिखा सकता हूं कि बीबी नफरत करने लगे, औलाद हिकारत से देखने लगे।

प्रश्न- आपका उपन्यास हीराफेरी दैनिक जागरण बेस्टसेलर में नंबर वन पर रहा है। दैनिक जागरण बेस्टसेलर को लेकर आपकी क्या राय है

उत्तर- ये अच्छी शुरुआत दैनिक जागरण ने की है जो लेखन के क्षेत्र में हिन्दी लेखकों की औकात बनाने में ही कारगर नहीं होगी, हिन्दी की भी औकात बनाने में कारगर होगी जो कि वर्तमान में संदिग्ध है। इस मुबारक कदम के दूरगामी नतीजे आने में अभी वक्त लगेगा। इसका उदाहरण मैं खुद हूं। मैंने इतना कामयाब उपन्यास लिखा जिसे अमेजन ने भी 2017 में बेस्टसेलर करा दिया लेकिन फिर भी हीराफेरी का प्रकाशक अब मेरा प्रकाशक नहीं है। उसे अपने ही छापे उपन्यास की कामयाबी से कुछ लेना देना नहीं है। लेखक उसके लिए पहले भी नोबॉडी था और अब भी नोबॉडी है। ये हिन्दी लेखक का ही नहीं बल्कि हिंदी का भी अपमान है। बाहरी मुल्कों में कोई रचना बेस्टसेलर घोषित होती है तो उसका प्रकाशक तुरंत उसका नया संस्करण प्रकाशित करता है जिस पर इस बात पर जोर देती टैगलाइन होती है और दूसरे वो ग्रंथ कई भाषाओं में अनुवाद के अनुबंधित हो जाती है। यहां ऐसा कुछ नहीं होता, न निकट भविष् में होनेवाला है। शायद आगे चलकर कुछ हो। 

Monday, January 29, 2018

हिंदी में प्रकाशन महत्वपूर्ण- थरूर


शशि थरूर की राजनेता के अलावा एक विशिष्ट लेखक की भी पहचान है। उनकी अबतक 15 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। अभी हाल ही में वाणी प्रकाशन से उनकी हिंदी में एक पुस्तक अंधकार काल, भारत में ब्रिटिश साम्राज्य प्रकाशित हुई है। एक और अन्य पुस्तक मैं हिंदू क्यों हूं, भी हिंदी में प्रकाशित होनेवाली है। हिंदी में पुस्तकों का प्रकाशन और संयुक्त राष्ट्र में हिंदी का आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलाने का विरोध। इन सारे मुद्दों पर डॉ शशि थरूर ने मुझसे खुलकर बातचीत की।  

प्रश्न- सबसे पहले तो हिंदी में आपकी किताब प्रकाशित होने पर मेरी बधाई स्वीकारें। हिंदी में छपने का विचार कैसे आया
थरूर- धन्यवाद। मेरा मानना है कि गुलामी या परतंत्रता के जो हमारे अनुभव रहे हैं वो हमारे पाठकों तक उनकी अपनी भाषा में पहुंचे। हिंदी में मेरी पुस्तक के प्रकाशित होने से इस वजह से मैं बहुत खुश हूं। हलांकि मैंने इस पुस्तक को मूल रूप में अंग्रेजों की भाषा में ही लिखा है लेकिन अब तो अंग्रेजी भी भारतीय भाषा बन चुकी है। फिर भी लाखों लोग इस पुस्तक के संदेश को तबतक समझ नहीं सकते जबतक कि वो उनकी मातृभाषा में ना हो। इस लिहाज से हिंदी में इसका प्रकाशन मेरे लिए महत्वपूर्ण है ।
प्रश्न- संयुक्त राष्ट्र में हिंदी को आधिकारिक भाषा बनाने का आपने संसद में विरोध किया। अगर ऐसा होता है तो क्या इस पर भारतीयों को गर्व नहीं होगा?
थरूर- देखिए इस मसले पर मेरा रुख तीन तर्कों पर आधारित है। पहला तो ये कि अबतक अगर हिंदी संयुक्त राष्ट्र की भाषा की आधिकारिक भाषा नहीं बन पाई तो देश को क्या नुकसान हुआ? जब वाजपेयी जी, मोदी जी या सुषमा जी चाहती हैं कि संयुक्त राष्ट्र में हिंदी में भाषण दें तो वो ऐसा करते ही हैं। होता यह है कि उस वक्त कोई भारतीय राजनयिक उनके भाषण का अंग्रेजी अनुवाद करता है जो संबंधित देशों की भाषा में अनुदित हो जाती है। दूसरा ये कि संयुक्त राष्ट्र में बोलने का उद्देश्य पूरी दुनिया तक अपने विचारों को पहुंचाना होता है। जब एक भारत की एक आधिकारिक भाषा, अंग्रेजी, वहां समझी जा रही है तो फिर दूसरी को लाने का मतलब क्या है? मेरा मानना है कि जो भी भारतीय नेता संयुक्त राष्ट्र में हिंदी बोलता है वो अपने देश की जनता से बात कर रहा होता है, पूरी दुनिया से नहीं। मैं जानना चाहता हूं कि क्या अरुण जेटली विश्व बैंक की बैठकों में हिंदी में बात करते हैं? क्या वो हिंदी में बात करके उतने प्रभावी रह पाएंगें। तीसरी और अंतिम बात कि सुषमा जी के लिए ये सुविधाजनक है कि वो संसद में ये बयान दें कि सरकार हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाने के लिए 400 करोड़ देने को तैयार है। लेकिन हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि हमारा देश बहुभाषी है और हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा नहीं है। उस स्थिति की कल्पना कीजिए जब कोई गैर हिंदी भाषी देश का प्रधानमंत्री या विदेश मंत्री बनेगा!
प्रश्न- हिंदी का विरोध करके क्या आप 2019 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर भाषाई राजनीति करना चाहते हैं?
थरूर – 2019 का चुनाव लड़ने के लिए कई अन्य महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। मोदी सरकार की नाकामी, अर्थव्वस्था की पतली हालत, पेट्रोल, डीजल और गैस के दामों में इजाफा, युवाओं के सामने बेरोजगारी की समस्या आदि। पर आपको बता दूं कि हिंदी पर मेरा जो स्टैंड है वो दक्षिण भारत में बहुत लोकप्रिय है। सिर्फ वहीं नहीं बल्कि पूरे देश में जो लोग हिंदी, हिंदू और हिन्दुत्व की राजनीति के विरोधी हैं उन्होंने भी मेरे रुख का समर्थन किया है। मेरा मत बिल्कुल साफ है कि किसी पर कोई भाषा थोपी नहीं जानी चाहिए।
प्रश्न- अंधकार काल जैसी ऐतिहासिक किताब लिखने की योजना कैसे बनी और इसके लिए कितना रिसर्च करना पड़ा?
थरूर- देखिए आपको बताऊं कि 15 मिनट का भाषण देना एक बात है और करीब साढे तीन सौ पेज की किताब लिखना अलग। मेरे सामने जो सबसे बड़ी चुनाती थी वो ये कि मैंने जो बोला उसको विस्तार से तर्कों और तथ्यों के साथ प्रस्तुत करूं। इसके लिए गहन शोध की जरूरत थी।मैं चाहता था कि तिथियां सही हों, तथ्य ठोक बजाकर रखे जाएं, आंकड़े त्रुटिहीन हों। इस वक्त ये करना सत्तर के दशक की तुलना में आसान है जब मैंने पीएचडी की थी। अभी तो 18वीं और 19वीं शताब्दी के दस्तावेज से लेकर किताबें तक ई फॉर्मेट में उपलब्ध है । जब मैंने लिखना शुरू किया तो मुझे मालूम था कि क्या लिखना है लेकिन मुझे उसके समर्थन में अकाट्य तथ्यों को जुटाना था। पुरानी पुस्तकों के अलावा मैंने इस वक्त के विद्वानों के इस विषय के लेखन को खंगाला और उसको पढ़ा।
प्रश्न- आपकी 15 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, अंधकार काल और पूर्व की पुस्तकों को लिखने के दौरान क्या फर्क महसूस किया आपने?
थरूर- अंधकार काल इस मायने में अलहदा है कि इसको लिखने की वजह मेरा एक भाषण बना। पूर्व की मेरी सारी पुस्तकें मेरी सोच और योजना का मूर्तरूप हैं। इस बार मैं अपने सार्वजनिक भाषण के समर्थन में पुस्तक लिखने बैठा था। हां और जैसा कि मैंने उपर कहा कि इस पुस्तक में मेरे शोध का स्तर मेरे पूर्ववर्ती शोध से काफी गहन रहा। अपनी पीएचडी थीसिस के बाद इतना गहन शोध मैंने नहीं किया था।

प्रश्न- आपने अपनी किताब अंधकार काल में विस्तार से इस बात का निषेध किया है कि लोकतंत्र और राजनीतिक एकता अंग्रेजों की देन है। दैनिक जागरण के पाठकों को इस बारे में बताइए।
थरूर- सबसे पहले मैं ये बात साफ कर दूं कि आइडिया ऑफ इंडियाकी परिकल्पना आइडिया ऑफ ब्रिटेन से काफी पहले का है। हमारे वेदों में भारतवर्ष की भौगोलिक सीमा हिमालय से लेकर समुद्र तक बताई गई है । हमारे जो भी शासक रहे हैं, चाहे वो 2400 साल पहले के चंद्रगुप्त मौर्य हों या 300 साल पहले के औरंगजेब, सभी की ख्वाहिश इस भूभाग पर राज करने की रही। भारतीय इतिहास में, चाहे वो मौर्य हों, गुप्त हों या मुगल हों, जिस तरह की राजनीतिक एकता की ललक दिखाई देती है उसके मद्देनजर ये कहा जा सकता है कि अगर अंग्रेज भारतीय उपमहाद्वीप को एक सूत्र में नहीं बाधते तो मराठा या कोई अन्य जोड़ता। मराठा और मुगलों के संबंध को देखकर हम ये कह सकते हैं कि बहुत संभव है कि हमारे यहां भी ब्रिटिशर्स की तरह संवैधानिक राजतंत्र होता। यहां हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि अंग्रेजों ने बांटो और राज करो की नीति के तहत योजनाबद्ध तरीके से हिंदुओं और मुस्लमानों के बीच नफरत के बीज बोए। 1857 की क्रांति के वक्त हिंदुओं और मुसलमानों को कंधे से कंधा मिलाकर लड़ते देख अंग्रेजों को होश फाख्ता हो गए थे। उन्होंने उसी वक्त प्रण किया था कि ऐसा फिर नहीं होने देना है। लॉर्ड एलफिस्टन ने लिखा था बांटो और राज करो के पुराने रोमन सिद्धांत को अपनाना चाहिए। इसी योजना के तहत मुसलमानों के लिए अलग वोटिंग की व्यवस्था की गई थी ताकि मुसलमान सिर्फ मुसलमानों को चुन सकें। आसन्न राष्ट्रीय आंदोलन को कमजोर करने के लिए विभाजन के बीज बोए गए थे।
प्रश्न- एक जगह आप कहते हैं कि महात्मा गांधी का अहिंसा का सिद्धांत अन्य औपनिवेशिक शासन में फल फूल नहीं सकता था, क्यों?
थरूर- भारत की स्वतंत्रता ने औपनिवेशिक काल के खात्मे की शुरुआत की थी लेकिन कई देशों में आजादी के लिए लोगों को बेतरह यातना सहनी पड़ी थी। आंदोलनकारी बूटों से कुचले गए थे, शासकों के कहर से बचने के लिए लोगों को घर बार छोड़कर भागना पड़ा था। खूनी संघर्ष हुए थे। अहिंसा उस तरह के माहौल के लिए उचित नहीं था। अहिंसा का सिद्धांत वहीं काम कर सकता है जहा के शासक नैतिकता की और राष्ट्रीय अंतराष्ट्रीय माहौल का लिहाज करते हों। अहिंसा का सिद्धांत हिटलर के खिलाफ नहीं चल सकता था। जहां गैस चैंबर जैसी यातना का प्रावधान हो वहां अहिंसा के सिद्धांत की सफलता संदिग्ध रहती है। स्टालिन और माओ के राज में गांधी का ये सिद्धांत कारगर नहीं हो सकता है। गांधी के अहिंसा का सिद्धांत वहीं चल सकता है जहां के शासकों की मानसिकता हो कि आप हमें हमारी गलती बताओ हम खुद को सजा देंगे। मुझे इस बात पर कोई आश्चर्य नहीं हुआ था जब नेल्सन मंडेला को रंगभेद के खिलाफ अहिंसा का सिद्धांत अपनाते नहीं देखा जबकि उन्होंने खुद मुझसे कहा था कि गांधी जी उनके लिए हमेशा से विराट प्रेरणा के स्त्रोत रहे हैं। मुंबई पर आतंकी हमले के बाद गांधी का आतंक के खिलाफ एकमात्र विरोध होता उपवास, लेकिन इससे आतंकियों पर क्या कोई फर्क पड़ता । बावजूद इसके गांधी की महानता कम नहीं होती है। महात्मा ने हमें सत्य, अहिंसा और शांति की राह दिखाई। उन्होंने औपनिवेशक शक्तियों की साख पर प्रहार किया था। अहिंसा अन्य दुश्मनों के खिलाफ सफल नहीं हो सकती है ये तथ्य है, मेरी मंशा गांधी का अनादर करना नहीं है।
प्रश्न- आपने ये भी कहा है कि ब्रिटिश प्रधानमंत्री को 2019 में जालियांबाग नरसंहार के लिए माफी मांगनी चाहिए। इस प्रतीकात्मकता से क्या होगा?
थरूर- जालियांवाला बाग अंग्रेजों की बर्बरता का प्रतीक है। जालियांवाला बाग नरसंहार को अंजाम देने के पहले कोई चेतावनी नहीं दी गई। हजारों मासूम औरतों और बच्चों को मौत के घाट उतार दिया गया।  ये कांड अंग्रेजों की स्वशासन देने की वादाखिलाफी को भी दर्शाता है, जिसका वादा उन्होंने प्रथम विश्वयुद्ध के समर्थन के एवज में किया था। बावजूद उस वादे के रॉलेट एक्ट पास किया गया था। इतना ही नहीं इस नरसंहार को अंजाम देनेवाले जनरल डायर को पुरस्कृत किया गया। 13 अप्रैल 2019 को इस बर्बर नरसंहार के सौ साल पूरे हो रहे हैं। अंग्रेजों के पास अपनी बर्बरता पर माफी मांगने का इससे बेहतर अवसर क्या होगा।
प्रश्न- क्या आपको लगता है कि ब्रिटिश कभी भारतीयों से माफी मांगेगे?
थरूर- कुछ दिनों पहले तक मैं भी कहता था कि वो माफी नहीं मांगेंगे क्योंकि अगर वो भारत से माफी मांगेगें तो उनको 130 अन्य देशों से माफी मांगनी होगी। लेकिन वक्त बदलता दिख रहा है। जब मैंने पिछले साल ब्रिटेन में ये मांग उठाई तो आश्चर्यजनक रूप से मुझे सकारात्मक संकेत महसूस हुए। मैंने उनको  कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो का उदाहरण दिया जिसमें उन्होंने कोमगाटा मारू की घटना के लिए माफी मांगी। लेबर पार्टी के सांसद वीरेन्द्र शर्मा ने हाउस ऑफ कामंस में भारत से माफी की मांग उठाई। अगर कोई ब्रिटिश प्रधानमंत्री भारत से माफी मांगने का साहस नहीं जुटा पाता है तो ब्रिटिश रॉयल परिवार को माफी मांगनी चाहिए क्योंकि सारी बर्बरता तो उनके ही नाम पर की गई।
प्रश्न- आपकी नई किताब व्हाई आई एम अ हिंदू अंग्रेजी में प्रकाशित हुई है, क्या इसको भी हिंदी में प्रकाशित करवाने की योजना है?
थरूर- जी, बिल्कुल। मुझे लगता है कि वाणी प्रकाशन इस पुस्तक को भी प्रकाशित करने के लिए उत्सुक है। लेकिन अनुवाद में तो वक्त लगेगा ।


वक्र में तब्दील 'समानांतर'


इस वक्त देश और दुनिया के साहित्यक में जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल को लेकर चर्चा जारी है लेकिन हिंदी साहित्य जगत में जयपुर में ही प्रगतिशील लेखक संघ के आयोजन समानांतर साहित्य उत्सव को लेकर भी बातें हो रही हैं, खासकर फेसबुक पर। दरअसल कुछ दिनों पहले राजस्थान प्रगतिशील लेखक संघ ने साहित्य में बढ़ती अपसंस्कृति के खिलाफ उन्हीं दिनों में जयपुर में लिटरेचर फेस्टिवल आयोजित करने का एलान किया जिन दिनों जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल आयोजित होना था। आयोजन प्रगतिशील लेखक संघ का था इसलिए इसके अध्यक्ष ऋतुराज को इसका संयोजक बनाया गया। इस आयोजन का एलान करते हुए ऋतिराज के जो बयान अखबारों में छपे उसके मुताबिक उनका मानना था कि जयपुर लिट फेस्ट एक व्यावसायिक इवेंट बन गया है जो कि पर्यटन, होटल और प्रकाशन जगत द्वारा स्पांसर किया जाता है। ये पर्यटन सीजन के दौरान चलनेवाला एक तमाशा है जिसमें कथित तौर पर आए सेलिब्रिटी का दर्शक स्वागत करते हैं। उन्होंने तब ये भी कहा था कि समांतर साहित्य महोत्सव युवा लेखकों को नकली और गंभीर लेखन के फर्क को समझने की समझ को भी विकसित करेगा। तो कुल मिलाकर जिस तरह से बयान छपे या इस आयोजन से जुडे लोगों ने फेसबुक पर पोस्ट लिखा उससे ये संदेश गया कि ये जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के विरोध में आयोजित किया जा रहा है। पत्रकार और लेखक ईश मधु तलवार को इस आयोजन का मुख्य समन्वयक और विवादित लेखक कवि कृष्ण कल्पित को फ्सेटिवल का संयोजक नियुक्त किया गया। फेसबुक पर इसका जोरदार प्रचार किया जाने लगा। फेसबुक पर इस फेस्टिवल के सोंजक कृष्ण कल्पित ने अपनी (कु)ख्याति के मुताबिक विवादास्पद पोस्ट लिखने शुरू किए। गधों की फोटो लगाकर उसकी तुलना जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में आमंत्रित लेखकों से की गई। जयपुर में सांस्कृतिक रूप से सक्रिय संदीप भूतोड़िया की पुरानी तस्वीर को लगाकर उनके बयान लिखे जाने लगे। विश्वसीनयता पर सवाल उठे तो उस पोस्ट को डिलीट कर दिया। संयोजक को लेकर लगातार आपत्तियां आने लगी। इस आयोजन के उद्घाटनकर्ताओं और शामिल होनेवाले के नामों को लेकर संशय बना रहा। कई लोगों ने नाम होने के बावजूद आने से इंकार करना शुरू कर दिया। ज्यादातर लोगों की आपत्ति इस फेस्टिवल के संयोजक को लेकर था जिन्होंने पूर्व में लेखिकाओं के खिलाफ बेहद आपत्तिजनक बातें की हैं। अनामिका से लेकर गगन गिल और गीताश्री तक को। हसीनाबाद जैसी उपन्यास लिखकर चर्चित लेखिका गीताश्री ने विरोध का मोर्चा खोला और अपनी फेसबुक पर लिखा- किसी भी समूह या मंडल में कृष्ण कल्पित की उपस्थिति स्त्री गरिमा के लिए संघर्षरत स्त्री लेखिकाओं के लिए भयावह स्मृतियों का एक पूरा सिलसिला उकेर देने वाली तकलीफ़ पैदा करती है और समूह या मंडल की प्रगतिशीलता पर भी बुनियादी सवाल खड़े करती है! प्रगतिशील लेखक संघ के अन्य सदस्यों के प्रति सम्मान रखती हुई भी बहनापे में विश्वास करने वाली कोई स्वाभिमानी स्त्री वहाँ नहीं जा पाएगी! पने बुलाया, आभार, पर उपर्युक्त कारण से मैं वहाँ जा न पाऊँगी!
मुझे क्षमा करें. आयोजन में मेरे परम मित्र ईश मधु तलवार जी से विशेष क्षमा कि वे समझेंगे मेरी मन:स्थिति
दरअसल अनामिका पर जब कृष्ण कल्पित ने विवादास्पद टिप्पणी की थी उस वक्त गीताश्री ने अनामिका का पक्ष लिया था तो गुस्से में कृष्ण कल्पित ने उनके खिलाफ बेहद अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया था। गीताश्री ने अपने पोस्ट में प्रकरांतर से अन्य लेखिकाओं को भी ललकारा कि उनको इस आयोजन से अपने आपको अलग रखना चाहिए। आश्चर्य की बात ये रही कि लेखिकाओं का जितना समर्थन गीताश्री को मिलना चाहिए था वो नहीं मिला। अनामिका और गगन गिल को भी इस मोर्चे पर सक्रिय होना चाहिए था। उधर स्त्री अस्मिता को लेकर लगातार अपने लेखन और पोस्ट से क्रांतिवीर लेखिकाओं ने भी इस मसले पर चुप्पी साध रखी है। क्या स्त्री अस्मिता की बात भी सुविधानुसार तय होगी, ये बड़ा सवाल है। फेसबुक पर जारी चर्चा के मुताबिक तो मैत्रेयी पुष्पा ने कहा कि शानदार साहित्य उत्सव में शानदार स्त्रियां ही बुलाई जाती हैं। मैत्रेयी पुष्पा को साफ करना चाहिए कि शानदार स्त्रियों से उनका तात्पर्य क्या है। किस तरह की स्त्रियों को वो इस कोष्ठक में रखती हैं। प्रगतिशील लेखक संघ के मंच से स्त्रियों के बारे में ये बात कही गई है तो अब तो संघ से भी अपेक्षा है कि वो इस मसले पर अपना स्टैंड साफ करेंगे। ऋतुराज जैसे वरिष्ठ और संजीदा कवि से ये अपेक्षा की जा सकती है क्योंकि प्रगतिशील लेखक संघ का पूर्व का स्टैंड स्त्रियो को लेकर ढुलमुल रहा है। सफाई तो आयोजकों को भी देनी चाहिए ।   
इसके बाद अशोक वाजपेयी की वहां उपस्थिति को लेकर प्रचार शुरू हो गया। जिस जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के विरोध में ये समानांतर साहित्य उत्सव का आयोजन हो रहा था उसमें सक्रिय रहनेवाले अशोक वाजपेयी को प्रगतिशील लेखक संघ द्वारा बुलाना उनके घोषित उद्देश्य से भटकना था। लेकिन केदारनाथ सिंह की तबीयत खराब होने और सुरजीत पातर की उपस्थिति संदिग्ध होने की खबरों के बाद आयोजक अशोक वाजपेयी में अपने आयोजन को सफल बनाने की संभावना देखने लगे। जमकर प्रचार हुआ लेकिन आयोजन से दो दिन पहले अशोक वाजपेयी ने समानांतर साहित्य उत्सव से अपने को अलग कर लिया। उन्होंने राजस्थान प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष ऋतुराज को पत्र में लिखा- स्वयं लेखकों द्वारा उनके एक संगठन के माध्यम से समानांतरसाहित्य उत्सव आयोजित करने की पहल का आप जानते हैं मैंने स्वागत किया था और आपके निमंत्रण पर उसमें राष्ट्र, हिंसा और साहित्यविषय पर एक व्याख्यान देना भी स्वीकार किया था।
मुझे तब पता नहीं था कि इस आयोजन का संयोजक एक ऐसा व्यक्ति है जो विशेषतः अन्य लेखिकाओं पर घोर अभद्रता और अश्लीलता की हद तक जाकर अत्यंत आपत्तिजनक टिप्पणियाँ करने के लिए बदनाम है। ऐसे व्यक्ति के संयोजक रहते और उसकी अब भी जारी अभद्रता के चलते मुझे लगता है इस समारोह में भाग लेना उस अभद्र और अश्लील कदाचार को वैध या उचित ठहराना होगा और उसके लेखिका-विरोधी कदाचरण का प्रकारांतर से साथ देना भी होगा। मेरा अंतःकरण इसकी इजाज़त नहीं देता। इसलिए मैं खेदपूर्वक इस समारोह से अपने को अलग कर रहा हूँ।आपसे से अनुरोध है कि वे मेरा व्याख्यान कृपया रद्द कर दें और सभी लेखक- बंधुओं से मेरी ओर से क्षमा माँग लें।अशोक वाजपेयी के इस बयान ने समानांतर साहित्य महोत्सव का रास्ता वक्र बना दिया। कष्ण कल्पित ने पूर्व में जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की फेस्टिवल डायरेक्टर नमिता गोखले के खिलाफ बेहद अपमानित करनेवाली भाषा का इस्तेमाल किया था और ऐसे विशेषणों को उपयोग किया था जो कि उनके लेखक होने पर सवाल खड़ा करता है। लेखकों से ऐसी दोयम दर्जे की भाषा की अपेक्षा नहीं की जाती है।
दरअसल अगर हम पूरे आयोजन को लेकर समग्रता में विचार करें तो यह बात समझ में आती है कि इसकी बुनियाद ही गलत रही। बीच में जिस तरह से इसके उद्देश्यों को लेकर एक पर्चा जारी कियी गया था उसमें भी प्रकरांतर से जयपुर लिट फेस्ट का विरोध ही था। एक आयोजन के खिलाफ दूसरा आयोजन करने से जो संदेश गया वो अच्छा नहीं था। अगर कोई नकारात्मक चीज हो रही थी तो उसको नकारात्मकता से नहीं बल्कि सकारात्मकता के साथ प्रतिरोध करना चाहिए। नहीं त होता यह है कि आयोजन दीर्घजीवी नहीं हो पाता है।  किसी भी भाषा या आयोजन का सिर्फ इस आधार पर विरोध करना उचित नहीं है कि वहां आपकी महात्वाकांक्षाओं को जगह नहीं मिलती है। शनिवार से शुरु हुए इस साहित्य महोत्सव के मंच से वक्ताओं ने जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल को लेकर जो बाते की उससे इस बात को बल मिलता है। प्रतिरोध के नाम पर कुंठा का सार्वजनिक इजहार से साहित्य का भला नहीं होगा। क्या समानांतर लिटरेचर फेस्टिवल के लिए ये बेहतर नहीं होता कि वो कृष्ण कल्पित को इस आयोजन से अलग करते या उनसे सार्वजनिक रूप से महिलाओं के खिलाफ अपमानजनक शब्दों के इस्तेमाल पर खेद प्रकट करवाते। ऐसा हो नहीं सका। हो तो ये भी नहीं सका कि इस आयोजन को एक गरिमा प्रदान की जाती और जयपुर साहित्य उत्सव के खिलाफ भड़ास का मंच नहीं बनने दिया जाता। सवाल यही कि रोके कौन। यहां तो प्रगतिशील लेखक संघ के साथ कुछ अन्य वामदलों से सबंधित लेखकों ने इसका समर्थन दिया। तो क्या ये माना जाए कि समानांतर साहित्य उत्सव महिलाओं को अपमानित करने का एक उपक्रम था क्योंकि कृष्ण कल्पित के अलावा मैत्रेयी पुष्पा ने भी वहां स्त्री के खिलाफ बयान दिया। आनेवाले दिनों में इस सवाल ये सवाल प्रगतिशील लेखक संघ के लिए मुश्किल खड़ी कर सकता है क्योंकि आधी आबादी को कठघरे में खड़ा करके, उसको अपमानित करनेवाली टिप्पणी कर हिंदी में बच निकलने का इतिहास रहा नहीं है।