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Saturday, June 16, 2018

नईवाली हिंदी की चुनौतियां


करीब तीन साल पहले की बात रही होगी,हिंदी प्रकाशन जगत में एक जुमला बहुत तेजी से चला, नई वाली हिंदीनई वाली हिंदी की इस तरह से ब्रांडिंग की गई जैसे हिंदी नई चाल में ढलने लगी हो। हिंद युग्म प्रकाशऩ ने इसको अपना टैग लाइऩ बनाया। वहां से प्रकाशित होनेवाले उपन्यासों और कहानी संग्रहों को नई वाली हिंदी की कृतियां कहकर प्रचारित किया जाने लगा। सोशल मीडिया से लेकर साहित्य उत्सवों तक में इस नई वाली हिंदी पर चर्चा शुरू हो गई। इसका एक असर ये हुआ कि पाठकों को लगा कि नई वाली हिंदी कुछ नयापन लेकर आई है। इस बीच दैनिक जागरण बेस्टसेलर की सूची आई जिसमें इस नई वाली हिंदी के कई लेखकों ने शीर्ष पर जगह बनाई। जागरण की हर तिमाही प्रकाशित बेस्टसेलर की सूची में नई वाली हिंदी के लेखकों ने लगातार जगह बनाई। इस सूची में नई वाली हिंदी के लेखकों के अलावा नरेन्द्र कोहली, रमेश कुंतल मेघ, गुलजार, जावेद अख्तर, यतीन्द्र मिश्र जैसे लेखकों ने भी जगह बनाई। लेकिन दैनिक जागरण बेस्टसेलर में नई वाली हिंदी के लेखकों के लगातार बने रहने से इसपर देशव्यापी चर्चा शुरू हो गई। जब चर्चा जोर पकड़ने लगी तो वो नई वाली हिंदी के लेखकों की कृतियों में अंग्रेजी के शब्दों के उपयोग पर चली गई, फिर एकाधिक बार इन कृतियों में रोमन में लिखे वाक्यों को लेकर चर्चा हुई, कभी सकारात्मक तो कभी नकारात्मक लेकिन नई वाली हिंदी चर्चा में बनी रही। कुछ लेखकों ने प्रेमचंद से लेकर हिंदी के अन्य लेखकों की कृतियों को उद्धृत करते हुए ये बताया कि उन लोगों ने भी अपनी अपनी रचनाओं में अंग्रेजी के वाक्यों का प्रयोग किया है जो देवनागरी में छपी रचनाओँ के मध्य है। कुछ लोगों ने कहा कि साहित्यिक कृतियों में हिंदी को अपनी शुद्धता के साथ उपस्थित होना चाहिए तो कइयों ने भाषा को लेकर इस तरह की बात को दुराग्रह माना। कुछ लोगों ने बोलचाल की भाषा को अपनाने की वकालत करनी शुरू कर दी। बोलचाल की भाषा में हिंदी लिखने की बात भी नई नहीं है। हिंदी के महत्वपूर्ण कवि भवानी प्रसाद मिश्र की एक कविता है- जिस तरह हम बोलते हैं उस तरह तू लिख/और इसके बाद भी हमसे बड़ा तू दिख। दशकों पहले भवानी बाबू जैसे कवि ने साहित्य में भी बोलचाल की भाषा की वकालत की थी। यह बहस अब भी जारी है, जारी रहनी भी चाहिए। भाषा को लेकर लगातार मंथन होने के अपने फायदे भी हैं। लेकिन इस नई वाली हिंदी में ब्राडिंग के अलावा भाषा के स्तर पर नया क्या था ये पाठकों के सामने आना शेष है।
भवानी बाबू बोलचाल की भाषा को साहित्य की भाषा बनाने का आग्रह तो करते हैं लेकिन अगली पंक्ति में वो इससे भी महत्वपूर्ण बात करते हैं जिसको रेखांकित किए जाने की जरूरत है। भवानी प्रसाद मिश्र अपनी इसी कविता में इसी पंक्ति के बाद कहते हैं कि चीज ऐसी दे कि जिसका स्वाद सिर चढ़ जाए/बीज ऐसा बो कि जिसकी बेल बन बढ़ जाए। कहने का मतलब यह है कि वो रचना की स्तरीयता और उसके उत्कृष्ट होने को लेकर भी कवियों और लेखकों को ललकारते हैं। हमें इस नई वाली हिंदी के लेखकों की रचनाओं पर विचार करने का वक्त आ गया है। नई वाली हिंदी के लेखक सत्य व्यास की किताब बनारस टॉकीज जबरदस्त हिट रही, बिकी भी। सत्य व्यास को जमकर शोहरत मिली। बेस्टसेलर की सूची में भी इसने लगातार अपना स्थान बनाए रखा है। अपनी इस किताब में सत्य व्यास ने बनारस हिंदी विश्वविद्यालय को केंद्र में रखा और वहां की कहानी को बेहद दिलचस्प अंदाज में पाठकों के सामने पेश किया। अब तो इस कृति पर फिल्म भी बन रही है। इसके बाद सत्य व्यास का दूसरा उपन्यास आया, दिल्ली दरबार। अपने इस उपन्यास में लेखक ने दिल्ली विश्वविद्यालय और वहां के छात्र जीवन को केंद्र में रखा। यह पुस्तक भी चर्चित हुई, लेकिन लोकप्रियता और बिक्री में ये बनारस टॉकीज को पार नहीं कर सकी। हलांकि सत्य के इस उपन्यास में भी पठनीयता थी, भाषा का प्रवाह भी था लेकिन विषयगत नवीनता नहीं थी। बनारस टॉकीज के बाद निखिल सचान का उपन्यास यूपी 65 आया। निखिल सचान की इसके पहले नमक स्वादानुसार और जिंदगी आइस पाइस के नाम से दो पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी थी। निखिल का ये पहला उपन्यास था जिसमें बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के आईआईटी के परिवेश में बुनी एक इंजीनियर के इश्क और शिक्षा व्यवस्था से उसके मोहभंग की कहानी है। वही विश्वविद्यालय और वही छात्रों के बीच का जीवन। निखिल के इस उपन्यास को सफलता मिली लेकिन अपेक्षाकृत कम। इसके बाद कई उत्साही युवाओं ने युनिवर्सिटी कैंपस को लेकर उपन्यास लिखे। ऐसा नहीं है कि नई वाली हिंदी में सिर्फ उपन्यास लिखे जाने लगे। इसमें कहानियां और व्यंग्य आदि भी लिखे गए। नई वाली हिंदी के एक और ब्रांड अंबेसडर बने दिव्य प्रकाश दुबे। उनका कहानी संग्रह मुसाफिर कैफे खूब चर्चित हुआ। उनकी और कृतियां मसाला चाय और टर्म्स एंड कंडिशंस अप्लाई ने भी जमकर चर्चा बटोरी, पाठकों का प्यार भी मिला। इसी समय ये दावा किया गया कि हिंदी साहित्य में एक नई विधा का उदय हुआ है। ये दावा किया गया अजीत भारती के बैचलर व्यंग्य संग्रह बकर पुराण में। 2016 में प्रकाशित इस किताब में लेखक ने लिखा- बकर साहित्य हिंदी साहित्य की एक नई विधा है जो सड़के के पास की चाय दुकानों, गोलगप्पे के ठेलों, स्कूल कॉलेज के हॉस्टलों से होते हुए बैचलरों के उस कमरे पर पहुंचता है जहां गालिब है, मोमिन है, ट्रॉटवस्की है, आंद्रे ब्रेतां है और कास्मोपॉलिटन का पुराना-सा इशू भी है। अब बकर साहित्य हिंदी साहित्य की नई विधा के तौर पर स्थापित हो पाया या नहीं ये तो समय तय करेगा लेकिन साहित्य की नई विधा स्थापित करने का दावा लप्रेक ने भी किया था जिसका हश्र हिंदी जगत ने देख लिया। तीन-चार लेखकों से आगे नहीं बढ़ पाई वो कथित विधा।  
नई वाली हिंदी की ब्रैंडिंग के बाहर के लेखक चेतन भगत और पंकज दूबे ने भी युनिवर्सिटी जीवन को केंद्र में रखकर उपन्यास लिखे। पंकज दूबे को भी जो सफलता लूजर कहीं कामें मिली थी वैसी सफलता उनको बाद के उपन्यासों में नहीं मिल पाई। चेतन को भी नहीं। तो क्या अब ये वक्त आ गया है कि नई वाली हिंदी के कई लेखकों को ये समझना होगा कि पाठकों को भाषा के चमत्कार से बहुत देर और दूर तक चमत्कृत नहीं किया जा सकता है। मुझे तो यही लगता है कि नई वाली हिंदी के लेखकों को अब नए विषयों की तलाश करनी चाहिए। कॉलेज युनिवर्सिटी की किस्से बहुत हो गए। क्योंकि इनसे अलग हटकर भी जिसने लिखा उनको सफलता मिली। अनु सिंह चौधरी ने इससे अलग हटकर नीला स्कार्फ और मम्मा की डायरी लिखी। जिसे काफी सराहा गया। इसी तरह से भगवंत अनमोल ने जिंदगी फिफ्टी फिफ्टी लिखी जिसको भी खूब पसंद किया गया। प्रियंका ओम की मुझे तुम्हारे जाने से नफरत है को भी लोगों ने सराहा। नई वाली हिंदी के युवा लेखकों के सामने अभी पूरी जिंदगी पड़ी है, हिंदी साहित्य जगत को उनसे बहुत उम्मीदें हैं। उन्होंने हिंदी साहित्य की उस जड़ता को तोडा जो किसी खास तरह की यथार्थवादी रचनाओं को ही श्रेष्ठ मानती थी। उन्होंने हिंदी से उन पाठकों को भी जोड़ा जो इन खास तरह की रचनाओं से उबकर साहित्य से विमुख होने लगे थे। एक योगदान इनका और है कि इन्होंने हिंदी के कई प्रकाशकों को भी इस तरह की कृतियां छापने के लिए उकसाया। इन्होंने अपनी सफलता से अपने आलोचकों का मुंह भी बंद किया जो इस नई वाली हिंदी के लेखकों को खारिज करने के लिए उनको हल्की फुल्की पुस्तकें कहा करते थे और ये भी तर्क देते थे कि इन पुस्तकों का स्थायी महत्व नहीं है। अब इनके सामने यही चुनौती है कि वो कैसे अपने लेखन में विषय का विस्तार करते हैं, अपने अलग अलग अनुभवों को कैसे कथानक में पिरोकर पाठकों के सामने पेश करते हैं। अगर वो ऐसा कर पाते हैं तो फिर उनको साहित्य के केंद्र में स्थापित होने से कोई रोक नहीं सकेगा लेकिन अगर वो अपने लेखन के दायरे का विस्तार नहीं कर पाएंगें तो बहुत संभव है उनकी हालत भी अमिताभ बच्चन के एंग्री यंग मैन के किरदार की तरह हो जाएगी जिसकी शुरुआत तो होती है दीवार और त्रिशूल जैसी फिल्मों से लेकिन अंत होता है लाल बादशाह और तूफान जैसी फिल्मों से। अमिताभ को भी तो सफलता के लिए परदे पर अपनी छवि बदलनी ही पड़ी थी।

Saturday, June 9, 2018

सफल होती नायिका प्रधान फिल्में


तीन साल पहले की बात है, कुमाऊं लिटरेचर फेस्टिवल में फिल्मों पर एक सत्र चल रहा था जिसमें फिल्मी शख्सियतों पर पुस्तकें लिखनेवाले लेखक शामिल थे। राजेश खन्ना के जीवनीकार गौतम चिंतामणि और यासिर उस्मान, शशि कपूर के जीवनीकार असीम छाबड़ा के अलावा अन्य लोग थे। सत्र का संचालन फिल्म पत्रकार मयंक शेखर कर रहे थे। इस चर्चा के दौरान किसी वक्ता ने ये कह दिया कि हिंदी में नायिकाएं अपने बूते पर फिल्मों को हिट नहीं करवा पाती हैं। इस बयान के बाद वहां मौजूद श्रोताओं के बीच तीखी प्रतिक्रिया हुई और श्रोताओं के हस्तक्षेप की वजह से चर्चा काफी गरम हो गई थी। मंच पर बैठे सभी वक्ता बैकफुट पर आ गए थे। मंचासीन सभी वक्ता इस बात पर एकमत हो गए कि उनके कहने का आशय ये था कि हिंदी फिल्मों के इतिहास में कोई महिला सुपरस्टार नहीं हुई जो अपने दम पर फिल्म को लगातार हिट करवा सके। किसी तरह बात संभली थी लेकिन इसके बाद चर्चा इस पर होने लगी थी कि बॉलीवुड नायक प्रधान क्यों है। क्यों नायिकाओं को नायकों से कम पैसे मिलते हैं। क्यों नायकों से नायिकाओं के बारे में उनकी पसंद पूछी जाती है, आदि आदि। यह बात उस वक्त होकर खत्म हो गई लेकिन उक्त वक्ता की टिप्पणी मन के किसी कोने अंतरे में धंसी रह गई।
हाल ही में कई फिल्में इस तरह की आईं है जिसमें नायिकाओं ने अपने बूते पर फिल्म को हिट करवाया। आलिया भट्ट ने अपने अभिनय के बूते पर फिल्म राजी को 100 करोड़ के क्लब में शामिल करवा दिया। इस फिल्म में कोई स्टार नायक नहीं है, बावजूद इसके ये फिल्म सुपर हिट रही। इससे तो एक और दिलचस्प बात जुड़ी है कि इस फिल्म का निर्देशन भी एक महिला ने किया है, मेघना गुलजार। राजी की रिलीज के चंद दिनों बाद एक और फिल्म आई वीरे द वेडिंग। इस फिल्म ने भी दो हफ्ते में करीब साठ करोड़ का बिजनेस किया है, जिसको बेहतर प्रदर्शन माना जा सकता है। इसमें भी कोई स्टार नहीं है बल्कि चार नायिकाएं करीना कपूर खान, सोनम कपूर आहूजा, शिखा और स्वरा भास्कर है। हलांकि इस फिल्म में सफल होने के लिए तमाम तरह का मसाला डाला गया । फिल्म में महिलाओं की बातचीत में गालियों की भरमार है, यौनिकता का प्रदर्शन है, स्वछंदता की वकालत की गई है और इसको फेमिनिस्ट फिल्म कहकर प्रचारित भी किया गया। फेमिनिज्म की आड़ में सेक्सुअलिटी से लेकर गाली गलौच को आधिनिक महिलाओं की जीवन शैली का हिस्सा बताकर पेश किया गया है। दरअसल कुछ फिल्मकारों को लगता है कि गाली गलौच करके, फ्री सेक्स की वकालत करके ही महिलाएं स्वतंत्र हो सकती हैं। फिल्म  वीरे द वेडिंग के कर्ताधर्ता इसी दोष के शिकार हो गए। ऐसे फिल्मकारों को स्त्री स्वतंत्रता और स्वछंदता का भेद समझना होगा। फिल्म अच्छी कमाई करने की राह पर भले ही अग्रसर दिखाई देती हो लेकिन इस फिल्म का स्थायी महत्व होगा, इसमें संदेह है। हां, कमाई के लिहाज से इसको याद रखा जा सकता है। फेमिनिज्म पर पूर्व में भी कई फिल्में बनीं जो भारतीय हिंदी सिनेमा में आज भी याद की जा सकती हैं। स्मिता पाटिल और शबाना आजमी अभिनीत फिल्म अर्थ में नारी स्वतंत्रता का जो चित्रण है वो स्थायी है। फिल्म के क्लाइमैक्स पर शादीशुदा कुलभूषण खरबंदा अपनी प्रेमिका स्मिता पाटिल को छोड़कर वापस अपनी पत्नी शबाना आजमी के पास पहुंचता है और माफी मांगता है। शबाना आजामी उसको माफी देने से मना करती है और कहती है कि अगर मैं किसी मर्द के साथ इतने दिन गुजारकर तुम्हारे पास वापस आती तो क्या मुझे माफ कर देते। फिल्म यहां खत्म हो जाती है। स्त्री स्वतंत्रता का उत्स है इस फिल्म में। बगैर किसी शोर शराबे के, बगैर किसी गाली गलौच के। उस फिल्म की नायिका जितनी बोल्ड और बिंदास थी, वीरे द वेडिंग में वो बात नहीं है। खैर ये अलहदा मुद्दे हैं उसपर फिर कभी विस्तार से बात होगी।
फिलहाल हम बात कर रहे हैं नायिका के केंद्रीय रोल में फिल्मों के सफल होने की। इसी तरह की एक फिल्म आई थी हिचकी। ये फिल्म भी रानी मुखर्जी ने अपने बूते पर सफल करवाई। हिचकी फिल्म की नायिका टूरेट सिंड्रोम से पीड़ित होती है जिसके बारे में कम लोगों को पता था। ये एक न्यूरोसाइकेट्रिक समस्या है जो किसी को भी बचपन से ही हो सकती है। इस फिल्म को भी पर्याप्त सफलता मिली। इसके पहले मॉम फिल्म भी सफल रही। ऐसा नहीं है कि नायिका प्रधान फिल्में पहले हिट नहीं होती रही हैं। नायिका प्रधान फिल्मों के हिट होने का एक लंबा इतिहास है । फिल्म मदर इंडिया से लेकर फिल्म लज्जा तक और फिर फिल्म कहानी से से लकर क्वीन तक। हर दौर में महिला प्रधान फिल्में बनती रही हैं, लेकिन हाल के दिनों में महिला प्रधान फिल्मों के सफल होने की संख्या बढ़ी है। समकालीन समय में हम क्वीन को इस सफलता का प्रस्थान बिंदु मान सकते हैं। 2014 में रिलीज हुई इस फिल्म क्वीन में कंगना रनौट ने अपने अभिनय के बल पर शानदार सफलता हासिल की थी। फिल्मी दुनिया के ट्रेड पंडितों के मुताबिक क्वीन के निर्माण पर करीब 13 करोड़ रुपए खर्च हुए थे और फिल्म ने सौ करोड़ से ज्यादा का बिजनेस किया था। इस तरह से देखें तो इस फिल्म ने अपनी लागत के करीब नौ गुना ज्यादा रकम का बिजनेस किया। श्रीदेवी की फिल्म मॉम भी सफल रही थी। उसने भी अपने लागत से कई गुणा ज्यादा का बिजनेस किया था।
ऐसा नहीं है कि इस दौर में सभी नायिका प्रधान फिल्म सुपरहिट ही रहीं। विद्या बालन की फिल्म बेगम जान जिसे मशहूर निर्देशक श्रीजित मुखर्जी ने निर्देशित किया था वो ज्यादा बिजनेस नहीं कर पाई। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक करीब बीस करोड़ में बनी ये फिल्म तीस करोड़ का ही बिजनेस कर पाई। हलांकि विद्या की ही एक और फिल्म तुम्हारी सुलु ने औसत बिजनेस किया। बीस करोड़ की लागत से बनी फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर 50 करोड़ का कारोबार किया।
दरअसल स्त्रियों को लेकर वही फिल्में ज्यादा दर्शकों को अपनी ओर खींच रही हैं जिसमें स्त्री पात्रों को लेकर ज्यादा जिम्मेदार किस्म की कथानक पर फिल्में बन रही हैं। हमारे देश में 1991 में आर्थिक उदारीकरण के दौर और खुले बाजार की वजह से कई ऐसी फिल्में आई जिनमें स्त्री चरित्रों का इस्तेमाल फिल्मकारों ने अपने व्यावसायिक हितों को ध्यान में रखते हुए किया और खुलेपन के तर्क की ओट में नायिकाओं के कपड़े कम करते चले गए। यह उन्नीस सौ सत्तर या उन्नीस सौ अस्सी के दौर की फिल्मों से अलग थी। ब्रिटिश अभिनेत्री एमा थॉमसन का हॉलीवुड फिल्मों को लेकर एक मशहूर कथन है- 1980 या उस दौर के आसपास बनने वाली फिल्में का नैतिक स्तर बिल्कुल शून्य था। मुनाफा ही उसका उद्देश्य था, जिसका सीधा संबंध उन भूमिका से रहा है जो फिल्मों में नायिकाओं को दी जाती रही हैं। उस दौर में स्त्री का मतलब या तो भोली भाली स्त्री या नायकों को अपने हाव-भाव से लुभानेवाली नायिका। इस कथन के आलोक में हम हिंदी फिल्मों के 1990 से लेकर 2000 तक के दौर को देख सकते हैं बल्कि दो चार साल आगे तक भी। लेकिन अब जब नए लेखकों का दौर आया है तो उन्होंने हिंदी फिल्मों में भारतीय स्त्रियों की परंपरागत छवि को ध्वस्त करते हुए उसका एक नया रूप गढ़ा है।इस नए रूप में कई बार विचलन भी देखने को मिलता है लेकिन वो ज्यादातर यथार्थ के करीब होती हैं। जैसे अगर हम दो हजार ग्यारह में आई फिल्म डर्टी पिक्चर को देखें, जो दक्षिण भारतीय फिल्मों की नायिका सिल्क स्मिता की जिंदगी पर बनी थी, में तमाम मसालों और सेक्सी दृश्यों की भरमार के के बावजूद यथार्थ बहुत ही खुरदरे रूप में मौजूद था। नायिका प्रधान फिल्मों की सफलता इस ओर भी संकेत दे रही है कि अगर कहानी अच्छी हो, उस कहानी का फिल्मांकन बेहतर हो तो वो सफल हो सकती है। यह भी प्रतीत होता है कि हिंदी दर्शकों की रुचि का भी परिष्कार हो रहा है और अब वो यथार्थवादी फिल्मों को तुलनात्मक रूप से ज्यादा पसंद करने लगा है। उदाहऱम के तौर पर अगर हम 2016 में रिलीज हुई फिल्म पिंक का उदाहरण लें तो वो फिल्म अपनी कहानी और उसके बेहतरीन चित्रण की वजह से दर्शकों को खूब पसंद आई। 23 करोड़ की लागत से बनी फिल्म ने 100 करोड़ से ज्यादा बिजनेस किया। इस तरह की फिल्मों की सफलता से यह उम्मीद जगी है कि अगर हिंदी फिल्मों में स्त्री पात्रों का चित्रण यथार्थपरक तरीके से किया जाए तो वो समाज पर असर भी डालेंगी और कारोबार भी अच्छा करेगी।

Saturday, June 2, 2018

संस्कृति को लेकर उदासीन सरकार


देश में जब जब भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनी है तब-तब उसपर शिक्षा और संस्कृति के भगवाकरण के आरोप लगाए जाते रहे हैं। आरोप के साथ ये जरूर जोड़ा जाता है कि ये भगवाकरण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कहने पर होता है। पाठ्यक्रम और स्कूली शिक्षा में बदलाव के आरोप भी आम रहे हैं। जब 2014 में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार बनी तो इन आरोपों की फेहरिश्त में एक इल्जाम और जुड़ गया। वो आरोप था शैक्षणिक और सांस्कृतिक संस्थाओं में दक्षिणपंथी विचारधारा के लोगों को बिठाने का यानि संस्थाओं को संघ से डुड़े लोगों के हवाले करने का। 2014 में जब स्मृति ईरानी को मानव संसाधन विकास मंत्री बनाया गया था तो उनपर भी इस तरह के आरोप लगे थे। अपने उपर लगे आरोपों पर स्मृति ईरानी ने संसद में उदाहरण समेत जोरदार तरीके से खंडन किया था और देश के सामने तथ्यों को सामने रख दिया था। दरअसल शिक्षा और संस्कृति को लेकर किसी भी तरह के सकारात्मक बदलाव को भी आरएसएस की चाल तक करार दिया जाता रहा है। मोदी सरकार के दौरान जब शैक्षणिक और सांस्कृति संस्थानों पर नियुक्तियां शुरू हुईं तो वामपंथी विचारधारा के लोगों को लगा कि इस क्षेत्र में उनका एकाधिकार खत्म होने लगा है तो वो और ज्यादा हमलावर होते चले गए। इमरजेंसी के समर्थन के एवज में इंदिरा गांधी ने शैक्षणिक और सांस्कृतिक संस्थाओं को वामपंथी विचारधारा के लेखकों और कार्यकर्ताओं को अनौपचारिक रूप से सौंप दिया था। शिक्षा और संस्कृति को वामपंथियों को सौंपने का नतीजा यह रहा कि आज भारत में चिंतन परंपरा लगभग खत्म हो गई। इतिहासकारों ने नेहरू का महिमामंडन शुरू किया और उसके एवज में भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद ने अपने अनुवाद परियोजना में सीपीएण के महासचिव नम्बूदरीपाद की कृतियों का अनुवाद प्रकाशित किया। इसपर कभी हो हल्ला मचा हो, या पार्टी की विचारधारा को बढ़ाने के आरोप लगे हों, याद नहीं आता। इतने लंबे समय से जारी इस एकाधिकार को 2014 में जब चुनौती मिलने लगी तो विरोध स्वाभाविक था।
अगर हम वस्तुनिष्ठ होकर विचार करें तो 2014 के बाद मोदी सरकार ने इन संस्थाओं में जिन लोगों की नियुक्ति की उनकी मेधा और प्रतिभा पर किसी तरह का प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया जा सकता है, चाहे वो भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद में बी बी कुमार जी की नियुक्ति हो या इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में राम बहादुर राय और डॉ सच्चिदानंद जोशी की नियुक्ति हो, संगीत नाटक अकादमी में बेहतरीन कलाकार शेखर सेन को जिम्मेदारी दी गई हो या राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के चेयरमैन के तौर पर बल्देव भाई शर्मा की नियुक्ति। इन सब लोंगों ने अपने अपने क्षेत्र में लंबी लकीर खींची। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास में तो बल्देव भाई की अगुवाई में पूरे देश में पुस्तक संस्कृति के प्रोन्नयन के लिए इतना काम हुआ जो पहले शायद ही हुआ हो। गांवों तक पुस्तक मेले का आयोजन से लेकर संस्कृत के पुस्तकों का प्रकाशन तक हुआ। जहां इतनी सारी नियुक्तियां होती हैं वहां एकाध अपवाद भी होते हैं। यहां भी हुए।
यह आरोप भी पूरी तरह से गलत है कि आंख मूंदकूर सिर्फ उनकी ही नियुक्तियां की गईं जो भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा के लोग थे। कई नियुक्तियां तो ऐसे विद्वानों की भी हुईं जो पूर्व में संघ और भारतीय जनता पार्टी के आलोचक रहे हैं। सरकार पर जिस तरह के हमले विरोधी विचारधारा के लोगों ने किए उसका एक नुकसान यह हुआ कि नियुक्तियों में सरकार धीमे चलने की नीति पर चलने लगी। अगर हम एक नजर डालें तो देख सकते हैं कि संस्कृति मंत्रालय के अधीन कई ऐसी स्वायत्त संस्थाएं हैं जिनमें काफी समय बीत जाने के बाद भी उनके प्रमुखों की और प्रशासकों की नियुक्ति नहीं हुई। ललित कला अकादमी इसका उदाहरण है जहां लंबे समय तक प्रशासक से काम चलाया गया। मंत्रालय के संयुक्त सचिव इसके कर्ताधर्ता रहे। इसकी गवर्निंग बॉडी को भारत सरकार ने भंग कर दिया और इस संस्था की बेवसाइट के मुताबिक अब तक इसका गठन नहीं हो सका है। अभी हाल में वरिष्ठ कलाकार उत्तम पचारने को इसका चेयरमैन नियुक्त किया गया है लेकिन अभी भी यहां स्थायी सचिव की नियुक्ति नहीं की जा सकी है। इसी तरह से अगर हम देखें तो सांस्कृतिक स्त्रोत और प्रशिक्षण केंद्र, जिसे सीसीआरटी के नाम से जाना जाता है, में चेयरमैन की नियुक्ति नहीं की जा सकी है। सीसीआरटी का काम शिक्षा को संस्कृति से जोड़ने का है। यह संस्कृति मंत्रालय संबद्ध एक स्वायत्त संस्था है। इस संस्था के बारे में उपलब्ध जानकारी है कि केन्द्र का मुख्य सैद्धांतिक उद्देश्य बच्चों को सात्विक शिक्षा प्रदान कर उनका भावात्मक व आध्यात्मिक विकास करना है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सीसीआरटी संस्कृति पर आधारित शैक्षिक कार्यक्रमों का आयोजन करता है और उनमें विचारों की स्पष्टता, स्वतन्त्रता, सहिष्णुता तथा संवेदनाओं का समावेश किया जाता है।यह उद्देश्य तो संघ को अच्छा लग सकता है लेकिन एक वर्ष से ज्यादा समय से यहां कोई अध्यक्ष नहीं हैं। इतने महत्वपूर्ण संस्था का अध्यक्ष ना होना संस्कृति मंत्रालय के काम करने के तरीके पर प्रश्न खड़ा करता है और इस बात के संकेत भी देता है कि संघ इन नियुक्तियों में दखल नहीं देता है। इसी तरह से संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध एक और संस्था है राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, इसके चेयरमैन रतन थियम का कार्यकाल 2017 में खत्म हो गया लेकिन अबतक किसी की नियुक्ति नहीं हुई और संस्था बगैर अध्यक्ष के चल रही है। इस सूची में कई अन्य नाम और भी हैं। देश में पुस्तकों और पुस्तक संस्कृति के उन्नयन के लिए बनाई गई संस्था राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन के अध्यक्ष ब्रज किशोर शर्मा का कार्यकाल भी समाप्त हो चुका है लेकिन उनकी जगह भी संस्कृति मंत्रालय ने किसी की नियुक्ति नहीं की है। नतीजा यह हो रहा है कि वहां लगभग अराजकता है। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के दो ट्रस्टी फिल्मकार चंद्रप्रकाश द्विवेदी और पूर्व आईपीएस के अरविंद राव ने महीनों पहले इस्तीफा दे दिया लेकिन उनकी जगह संस्कृति मंत्रालय ने किसी को नियुक्त नहीं किया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब पद संभाला था तो उन्होंने यह कहा था कि यथास्थितिवाद उनको किसी भी कीमत पर मंजूर नहीं है लेकिन कई मंत्रालयों को देखकर लगता है कि प्रधानमंत्री ने स्वयं वहां यथास्थितिवाद के देवताओं को स्थापित कर रखा है।
अब अगर एक नजर भाषा के विकास के लिए बनाई गई संस्थाओं पर डालते हैं तो वहां भी कई ऐसे संस्थान हैं जो बगैर अध्यक्ष या निदेशक के चल रहे हैं। हिंदी को लेकर ये सरकार बहुत संवेदनशील रही है। इसको संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाने को लेकर भी सरकार ने इच्छाशक्ति दिखाई थी लेकिन केंद्रीय हिंदी निदेशालय में सालों से नियमित निदेशक नहीं हैं। पहले राष्ट्रीय सिंधी भाषा संवर्धन परिषद के निदेशक डॉ रवि टेकचंदानी इसका अतिरिक्त प्रभार संभाल रहे थे और अब वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली आयोग के चेयरमैन अवनीश कुमार इसको संभाल रहे हैं। इसमें एक और दिलचस्प तथ्य है कि वो गणितज्ञ हैं लेकिन सरकार ने उनको वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली के अलावा हिंदी का जिम्मा भी सौंप रखा है। केंद्रीय हिंदी निदेशालय में स्थायी निदेशक की नियुक्ति नहीं होने से कई नुकसान हैं क्योंकि इस संस्था का उद्देश्य हिंदी को अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान करना, हिंदी भाषा के माध्यम से जन-जन को जोड़ना और हिंदी को वैश्विक धरातल पर प्रतिष्ठित करना है। इसमें कई सालों से निदेशक का नहीं होना सरकार की हिंदी को लेकर उदासीनता को दर्शाता है। इसी तरह से मानव संसाधन विकास मंत्रालय की एक और स्वायत्त संस्था है राष्ट्रीय सिंधी भाषा संवर्धन परिषद, उनके निदेशक का कार्यकाल भी खत्म हो गया है और उनको तीन महीने का विस्तार दिया गया है। यह कुछ ऐसे उदाहरण हैं जो इंगित करते हैं कि सरकार भाषा और संस्कृति को लेकर कितनी गंभीर है। इसी वर्ष मार्च में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक से में भाषा को लेकर महत्वपूर्ण प्रस्ताव पास किया गया था जिसमें भारतीय भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन की आवश्यकता पर जोर दिया गया। भाषा के संरक्षण और संवर्धन के लिए सरकारों, नीति निर्धारकों और स्वयंसेवी संगठनों से प्रयास करने की अपील की गई थी। संघ की अपील के बाद करीब तीन महीने तक ऐसा होना भी ये दर्शाता है कि संघ का सरकार में कितना दखल है। संस्कृति मंत्री और शिक्षा मंत्री को इस दिशा में व्यक्तिगत रुचि लेकर काम करना होगा ताकि इन संस्थाओं को बदहाली से बचाया जा सके। और सबसे महत्वपूर्ण बात ये कि इन मंत्रियों को यथास्थितिवाद के मकड़जाले को भी तोड़ना होगा।



Saturday, May 26, 2018

पुस्तक खरीद का लापरवाह तंत्र


किसी भी देश की संस्कृति में पुस्तकों का बड़ा योगदान माना जाता है। जर्मनी में जब नाजियों के ताकतवर होने और उत्थान का दौर था तब भी पुस्तकें महत्वपूर्ण थीं। पुस्तकों के इतिहास में 10 मई 1933 को पूरी दुनिया में काला दिन के तौर पर याद किया जाता है। नाजीवादी ये मानते थे कि साहित्य मनुष्य की भावनाओं को जगाता है और भावना लोगों को दुर्बल बनाती है। नाजियों के उस दौर में जर्मनी में विश्व साहित्य की उन महत्वपूर्ण कृतियों को जला दिया गया था, जिसके बारे में प्रचारित किया गया था कि वो जर्मनी के संस्कृति के खिलाफ है। इन रचनाओं को जलाने का काम बर्लिन विश्वविद्यालय के प्रांगण में किया गया था। जर्मन स्टूडेंट एसोसिएशन ने किताबें जलाने का काम देश के अन्य विश्वविद्यालयों में किया था जो कि करीब महीने भर तक चलता रहा था। चूंकि पुस्तकों का जलाने का काम बर्लिन विश्विविद्यालय से शुरु हुआ था इस वजह से इसको बर्लिन बुक बर्निंग या बर्लिन बुक ब्लास्ट के नाम से जाना जाता है। जर्मनी के लोगों के दिमाग पर पुस्तकों को जलाने की दुर्भाग्यपूर्ण घटना की छाप थी और नाजियों के पतन के बाद वहां इस घटना पर तीखी प्रतिक्रिया हुई थी। जिस दिन किताबें जलाई गईं थीं उसी दिन बर्लिन विश्वविद्यालय के उसी जगह को विश्व भर की किताबों से पाट दिया गया था। ये काम अब हर साल वहां किया जाता है । उसी स्थान पर लोग तख्तियों पर उन लेखकों के नाम लिखकर जमा होते हैं जिनकी किताबें 1933 में जला दी गई थी । बर्लिन में उस दिन को किताब उत्सव की तरह मनाया जाता है । हर जगह पर लोग किताब पढ़कर एक दूसरे को सुनाते हैं, रेस्तरां से लेकर फुटपाथ तक, चौराहों से लेकर पार्कों तक में । यह विरोध का एक अनूठा तरीका है। विरोध की वजह से जर्मनी में पुस्तक संस्कृति और मजबूत हुई। इस पूरी घटना को बताने का मकसद सिर्फ इतना बताना है कि जर्मनी में पुस्तकों को लेकर कितना प्यार, आदर और अपनापन है। वहां की सरकारें भी पुस्तकों की संस्कृति के विकास के लिए लगातार प्रयत्नशील रहती हैं। इसी तरह से अगर हम देखें तो पुस्तकों को लेकर यूरोप के कई देशों में और अमेरिका में भी एक खास किस्म का आकर्षण है। वैसे ये आकर्षण हमारे देश में भी था, किसी जमाने में हर शहर में एक अच्छा पुस्तकालय हुआ करता था, साथ ही गांवों में भी कम से कम एक कमरे का पुस्तकालय अवश्य होता था। कालांतर में ये पुस्तकालय बंद होते चले गए, शहरों के पुस्तकालयों की हालत भी खस्ता हो गई।
भारत में पुस्तक संस्कृति के विकास और पुस्तकालयों की व्यवस्था को मजबूत करने के लिए कई संस्थाएं हैं। ऐसी ही एक संस्था है राजा राम मोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन। यह संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध एक स्वायत्तशासी संस्था है।  ये संस्था देशभर में सार्वजनिक पुस्तकालयों को सहयोग करने और उसको मजबूत करने के लिए केंद्र सरकार की नोडल एजेंसी है। इस संस्था का प्रमुख कार्य देशभर में पुस्तकालय संबंधित गतिविधियों को मजबूत करना तो है ही, साथ ही राष्ट्रीय पुस्तकालय नीति और नेशनल लाइब्रेरी सिस्टम बनाना भी है। इस संस्था के अध्यक्ष संस्कृति मंत्री या उसके द्वारा नामित व्यक्ति होते हैं। साथ ही इसको सुचारू रूप से चलाने के लिए बाइस सदस्यों की एक समिति होती है जिसका मनोनयन भारत सरकार करती है। इस समिति में प्रख्यात शिक्षाविद, लेखक, वरिष्ठ पुस्तकालयाध्यक्ष, प्रशासनिक अधिकारी आदि मनोनीत होते हैं। राजा राम मोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन का एक मुख्य उद्देश्य राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ पुस्तकालयों को मजबूत करने की दिशा में काम करना भी है। यह संस्था केंद्रीय स्तर पर भी पुस्तकों की खरीद करती है और राज्य सरकारों को भी पुस्तकों की खरीद के लिए धन मुहैया करवाती है। इसको मैचिंग ग्रांट भी कहते हैं जिसका मतलब होता है कि अगर राज्य सरकार 25 लाख पुस्तकों की खरीद के लिए देती है तो फाउंडेशन भी 25 लाख की राशि उस राज्य सरकार को देती है। फाउंडेशन का उद्देश्य बहुत अच्छा है लेकिन इस संस्था की बेवसाइट पर जो जानकारी है वो इसके पिछड़ते जाने का संकेत देने के लिए काफी है। संस्था की बेवसाइट के मुताबिक आखिरी प्रोजेक्ट 2011-12 में दिया गया था और टैगोर फेलोशिप 2010-2012 तक के लिए दिया गया था। उसके बाद इस दिशा में कोई काम नहीं हुआ, ऐसा प्रतीत होता है।
दरअसल ये संस्था मुख्यत: पुस्तकों की खरीद और राज्य सरकारों को अनुदान देने तक सिमट गई है। राजा राममोहन राय फाउंडेशन में पुस्तकों की जो खरीद होती है उसके कोई तय मानक नहीं है, मोटे तौर पर कुछ बिंदु हैं जिनको खरीद के वक्त ध्यान रखना होता है। अलग अलग विधाओं और भाषाओं के लिए खरीद का प्रतिशत तय किया गया है। सालभर प्रकाशक और लेखक अपनी पुस्तकों को इस संस्था में जमा करवा सकते हैं और फिर उनकी एक सूची तैयार होती है। इस सूची को तैयार करने के वक्त से ही गड़बड़ियां शुरू हो जाती है। लापरवाही का आलम ये कि अगर आपने डाक से पुस्तकें भेजीं तो बहुत संभव है कि वो सूची में शामिल नहीं होंगी। पुस्तकों की खरीद की कमेटी में इस वक्त संस्था के चेयरमैन समेत ग्यारह लोग हैं। मानक तय नहीं होने की वजह से पुस्तकों की खरीद में अराजक स्थिति होती है। जिन पुस्तकों की कीमत 400 रु से कम होती है उसकी अधिकतम 350 प्रतियां खरीदे जाने की बात सुनी जाती है लेकिन इन दिनों अराजकता का ये आलम है कि किसी भी पुस्तक की सत्रह, पच्चीस और चालीस पुस्तकों की खरीद के ऑर्डर जा रहे हैं। इसके पीछे क्या सोच है, क्या वजह है, इस बारे में देश की जनता को पता होना चाहिए। ये भी तय होना चाहिए कि किसी एक प्रकाशक से कितनी पुस्तक ली जाएगी। यह अकारण नहीं हो सकता है कि किसी खास दौर में किसी खास प्रकाशक की पुस्तकें ज्यादा खरीद ली जाती हैं। इसके अलावा यह भी देखने में आया है कि पुस्तक खरीद कमेटी की जब बैठक होती है तो कुछ सदस्य कई दिन कोलकाता मुख्यालय में रुकते हैं तो कुछ सदस्य दो एक दिन में ही वापस लौट जाते हैं। ऐसा क्यों होता है। क्या पुस्तक खरीद कमेटी का कोई कोरम आदि होता है या सब भगवान भरोसे चल रहा है। होना तो ये चाहिए कि पुस्तक क्रय समिति की हर बैठक के बाद खरीद के लिए चयनित पुस्तकों की सूची और कमेटी के उपस्थित सदस्यों की जानकारी भी बेवसाइट पर डाल देनी चाहिए। राजा राम मोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन का सालाना बजट करीब 50 करोड़ रुपए है जो कि करदाताओं की गाढ़ी कमाई का पैसा है। इसके साथ किसी भी तरह की गड़बड़ी करदाताओं के साथ तो छल होगा ही, पुस्तकों की संस्कृति के निर्माण की दिशा में बाधक भी।
इसके अलावा एक और चीज पर गौर करना आवश्यक है कि जो मैचिंग ग्रांट राज्य सरकारों को दी जाती है उस अनुदान की उपयोगिता और बेहतर पुस्तकों की खरीद में फाउंडेशन का कितना दखल होता है। नियमानुसार फाउंडेशन के चेयरमैन का एक प्रतिनिधि राज्य स्तरीय बैठक में होना चाहिए लेकिन कितने होते हैं। बहुधा नहीं होते हैं। अंग्रेजी की किताबों की स्तरीयता को लेकर कई बार पूर्व में भी सवाल उठे हैं। कट-पेस्ट के दौर में पुस्तकें बहुत आसानी से तैयार हो जाती है, पुस्तक खरीद समिति क पास उसकी स्तरीयता को जांचने का कोई मैकेनिज्म होता है क्या ? दरअसल सस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत चलनेवाली कई स्वायत्त संस्थाओं के काम-काज को लेकर काफी सवाल उठते रहे हैं। इनमें से ज्यादातर के साथ बजट की उपयोगिता को लेकर एक एमओयू भी है, उसपर संबंधित संस्थाओं की सहमति भी है, लेकिन हकीकत में तस्वीर कुछ अलग होती है। यह अकारण नहीं है कि पुस्तकों की खरीद पर भारी भरकम रकम खर्च हो रही है लेकिन पुस्तक संस्कृति का ह्रास हो रहा है। पुस्तक संस्कृति के विकास, उसके उन्नयन के लिए राष्ट्रीय पुस्तकालय नीति का होना आवश्यक है। राजा राममोहन राय फाउंडेशन के उद्देश्यों में ये शामिल भी है। इस नीति को बदलते वक्त के साथ अपडेट करना होगा, पाठकों की रुचि का ध्यान रखना होगा। पुस्तकों की गुणवत्ता और उसकी सरकारी खरीद के लिए बेहद सख्त नियम बनाने होंगे। राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन जैसी संस्थाओं की जबावदेही संस्कृति मंत्रालय पर है। क्या संस्कृति मंत्रालय से ये उम्मीद की जा सकती है कि वो देश में पुस्तकालयों की वर्तमान हालात पर ध्यान देगी? जितनी जल्दी, उतना बेहतर।


Saturday, May 19, 2018

सोशल मीडिया का अराजक तंत्र


कर्नाटक में राजनीतिक गहमागहमी के बीच कांग्रेस पार्टी ने रामधारी सिंह दिनकर की एक कविता की कुछ पंक्तियां ट्वीट की, सदियों की ठंढी-बुझी राख सुगबुगा उठी/मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है/दो राह, समय के रथ का घर्घर नाद सुनो/सिंहासन खाली करो कि जनता आती है। इस ट्वीट के साथ कांग्रेस के ट्वीटर हैंडल से एक लेख का लिंक भी साझा किया गया। उस लेख में जनता की ताकत के बारे में बताया गया था। इस ट्वीट के सत्रह घंटे बाद तक इसको तेइस सौ के करीब लाइक, आठ सौ रिट्वीट और सात सौ के करीब जवाब दिए गए। कहानी अब शुरू होती है। इस कविता के ट्वीटर पर पोस्ट होने के बाद सोशल मीडिया पर सक्रिय लोगों ने कांग्रेस की लानत मलामत शुरू कर दी। कहा ये जाने लगा कि ये कविता दिनकर जी ने इंदिरा गांधी के विरोध में लिखी थी, जब इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लगाई थी। लोग इतने पर ही नहीं रुके और कहने लगे कि ये कविता दिनकर ने जयप्रकाश नारायण के कहने पर लिखी थी और संपूर्ण क्रांति के दौर में बेहद लोकप्रिय हुई थी। यह भी आधा सच है। किसी ने भी इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि दिनकर जी का निधन 1974 में हो गया था और देश में इमरजेंसी 1975 में लगाई गई थी।कुछ लोगों ने सही बात कहने की भी कोशिश की लेकिन ज्यादातर लोग गलत ही लिखने लगे थे, जिसकी वजह से सही बात दब सी गई। दरअसल ये पंक्तियां दिनकर की कविता जनतंत्र का जन्म की शुरुआती चार पंक्तियां हैं। दिनकर ने ये कविता पहले गणतंत्र दिवस के मौके पर लिखी गई थी जो उनके संग्रह धूप और धुंआ नाम के संग्रह में संकलित है जो 1951 में प्रकाशित हुआ। बाद में जब जयप्रकाश नारायण ने संपूर्ण क्रांति का उद्घोष किया था तब उन्होंने पटना में दिनकर की इन पंक्तियों का गाया था। जयप्रकाश नारायण ने दिनकर की 1950 में लिखी कविता को संपूर्ण क्रांति का नारा बनाया था, जब वो अपने भाषणों में कहा करते थे कि सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।  
कर्नाटक की राजनीति से संबंधित एक और ट्वीट इतिहासकार और स्तंभकार रामचंद्र गुहा ने किया। उन्होंने लिखा, भारत सरकार के अटॉर्नी जनरल कैसे एक राजनीतिक दल के राज्य इकाई का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं या उसकी तरफ से बोल रहे हैं। कर्नाटक के सियासी घमासन के बीच इस ट्वीट का संदर्भ सुप्रीम कोर्ट से है जहां इस मामले पर कांग्रेस के विधायक की याचिका पर सुनवाई हुई थी। सर्वोच्च अदालत में इस केस की सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल मौजूद थे। रामचंद्र गुहा के इस ट्वीट को भी सोशल मीडिया पर करीब तीन हजार लोगों ने लाइक किया, हजार के करीब रिट्वीट हुआ और साढे तीन सौ लोगों ने उनको उत्तर दिया। इस ट्वीट के उत्तर में कई लोगों ने रामचंद्र गुहा को ये बताने की कोशिश की कि अटॉर्नी जनरल भारत सरकार का पक्ष रख रहे थे। सुप्रीम कोर्ट में जो याचिका (536/2018) दायर की गई थी उसमें भारत सरकार को भी प्रतिवादी बनाया गया था। जब किसी याचिका में भारत सरकार को प्रतिवादी बनाया जाता है, और वो मामला महत्वपूर्ण होता है तो उसमें भारत सरकार की तरफ से अटॉर्नी जनरल ही पेश होते हैं। यह बात रामचंद्र गुहा को पता नहीं हो, ऐसा प्रतीत नहीं होता है। बावजूद इसके उन्होंने ट्वीट कर ये सवाल उठाया और सोशल मीडिया के जरिए एक अलग तरह का माहौल बनाने की कोशिश की। उनको जब इस बारे में जब उत्तर देनेवालों ने सुप्रीम कोर्ट की याचिका के पहले पृष्ठ को वहां लगाया तब भी रामचंद्र गुहा ने अपनी इस गलती को नहीं सुधारा। स्तंभ लिखे जाने तक उनका ये ट्वीट मौजूद है। उनकी तरफ से कोई भूल सुधार नहीं किया गया है और ना ही खेद प्रकट किया गया है।
ये दो उदाहरण सोशल मीडिया की अराजकता को दर्शाने के लिए काफी है। इस तरह के कई उदाहरण सोशल मीडिया पर देखने को मिलते हैं जहां संदर्भ गलत होते हैं, उद्धरण गलत होते हैं, किसी की रचना को किसी और का बताकर पेश कर दिया जाता है। इसके बावजूद किसी की कोई जिम्मेदारी नहीं होती है। सोशल मीडिया ने बहुत लोगों को लेखक भी बना दिया, विशाल पाठक वर्ग या अपने समर्थकों से जुड़ने का एक मंच दिया, जनता से सीधा संवाद करने का अवसर दिया, यह इस माध्यम का एक सकार्तामक पक्ष हो सकता है, लेकिन साथ ही सोशल मीडिया ने जनता को बरगलाने का मौका भी दिया। अब रामचंद्र गुहा जैसे बड़े विद्वान माने जाने वाले लेखक अगर इस तरह के ट्वीट करते हैं और फिर उसपर खेद भी नहीं जताते हैं तो इसको क्या माना जाए? अखबार में कोई लेख छपता है तो उसकी जिम्मेदारी होती है, लेखक की साख होती है, उनसे सवाल जवाब हो सकते हैं लेकिन सोशल मीडिया पर क्या? लिखने की भी आजादी और जिम्मेदारी से भी आजादी। चंद लोगों में ही ये ईमानदारी है कि वो अपना गलत ट्वीट या पोस्ट डिलीट कर देते हैं, या खेद प्रकट करते हैं। दरअसल अगर हम देखें तो सोशल मीडिया पर लोग हड़बड़ी में बहुत रहते हैं, कहीं कुछ सुना, कहीं कुछ पढ़ा, कहीं कुछ जाना बस उसको लेकर सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दिया। बगैर उसकी सत्यता जांचे, बगैर उसकी प्रामाणिकता की पड़ताल किए। दिलीप कुमार साहब से लेकर मन्ना डे के निधन को लेकर कई बार मशहूर हस्तियों तक ने ट्वीट कर दिए थे।
सोशल मीडिया पर सक्रिय बहुत सारे लोग अपनी बात रखते इस तरह से रखते हैं जैसे वो पत्थर की लकीर खींच रहे हों, जिसे मिटाना संभव नहीं है। गलत तथ्य के साथ जब पत्थर की लकीरवाला आत्मविश्वास या वज्र धारणा मिल जाती है तो स्थिति खतरनाक हो जाती है। दिनकर की ही एक और कविता समर शेष है की आखिरी दो पंक्ति सोशल मीडिया पर बार-बार उद्धृत की जाती है,समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याघ्र/जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।इस पंक्ति को अलग अलग संदर्भ में उद्धृत किया जाता है। इसकी और पंक्तियां पढ़ने पर यह स्पष्ट होता है कि वो कविता गांधी की हत्या के बाद लिखी गई थी जिसमें कवि दुखी भी है और समाज मे व्याप्त विषम स्थितियों पर चोट करता है।
अब अगर हम गहराई से इस पर विचार करें तो सोशल मीडिया के तमाम सकारात्मक पक्ष के बावजूद ये एक राजनीतिक औजार भी बन गया है। किसी के भी पक्ष या विपक्ष में माहौल बनाने का औजार । राजनीतिक दलों के नेता और कार्यकर्ता इसका जमकर उपयोग कर रहे हैं। चूंकि इस प्लेटफॉर्म पर किसी तरह की पाबंदी नहीं है, कोई रोक-टोक नहीं है, इस वजह से अराजकता भी है। दिक्कत तब शुरू हो जाती है जब लेखक और स्तंभकार इस मंच पर गलत तथ्य पोस्ट करने लगते हैं। जब कोई मशहूर व्यक्ति, लेखक या कवि इस मंच पर तथ्यहीन बातें कहता है तो उसका असर बहुत देर तक रहता है और दूर तक जाता है। तकनीक के विस्तार और इंटरनेट के बढ़ते घनत्व की वजह से सोशल मीडिया की पहुंच लगातार बढ़ती जा रही है। सोशल मीडिया के इस बढ़ते प्रभाव को देखते हुए कनाडा के तत्कालीन प्रधानमंत्री पीयर ट्रूडो का वाशिंगटन प्रेस क्लब में 1969 में दिए भाषण की एक पंक्ति याद आ रही है। ट्रूडो ने कनाडा और अमेरिका के रिश्तों को लेकर अपने संबोधन में कहा था कि आपके (अमेरिका के) पड़ोस में रहना उसी तरह से है जैसे हाथी के साथ सोना ( स्लीपिंग विद एन एलिफेंट )। इस बात का कोई अर्थ नहीं है कि हाथी से आपकी कितनी दोस्ती है और वो कितना शांत रहता है, उसकी हर हरकत या हिलने डुलने का भी आप पर असर पड़ना तय है। ट्रूडो अमेरिका की आर्थिक ताकत को लेकर बोल रहे थे। एक अनुमान के मुताबिक उस वक्त अमेरिका की जीडीपी, कनाडा से दस गुना ज्यादा थी। उनके कहने का अर्थ ये था कि अमेरिका के किसी भी कदम से कनाडा प्रभावित होगा ही। उसी तरह से सोशल मीडिया भी ऐसा ही हाथी बन गया है जिसका असर हम सब पर पड़ना तय है। सोशल मीडिया रूपी से हाथी अभी और बड़े आकार का होगा और हमको और हमारे समाज को और प्रभावित करेगा। और अगर ये हाथी अराजक हो तो उसके खतरे का अंदाज सहज ही लगाया जा सकता है। जरूरत इस बात की है कि सोशल मीडिया के इस आसन्न खतरे को लेकर किसी तरह के नियमन पर विचार किया जाए। नियमन का स्वरूप क्या होगा ये देशव्यापी बहस के बाद तय हो।