Translate

Saturday, May 18, 2019

कला-संस्कृति की आड़ में कारोबार !


चुनाव में राजनातिक गतिविधियां अपने चरम पर होती हैं। इस दौरान कई बार कुछ ऐसा घटित हो जाता है जो महत्वपूर्ण तो होता है लेकिन उसपर ध्यान नहीं जाता। चुनाव के दौरान ऐसी कई घटनाएं हुईं जिसको अगर समग्रता में जोड़कर देखते हैं तो हमें एक मुकम्मल तस्वीर दिखाई देती है। चुनावी शोरगुल और कोलाहल थम चुका है। अब उन घटनाओं पर विचार करने की आवश्यकता है ताकि हमारे समाज का ध्यान उनपर जा सके, हम सब मिलकर कुछ बेहतर कर सकें। सबसे पहले मुझे याद पड़ता है कि चुनाव प्रचार के दौरान अपने एक पत्रकार मित्र को फोन किया तो वो उस वक्त बिहार के मुंगेर लोकसभा क्षेत्र की कवरेज में व्यस्त थे। राजनीति पर बातचीत के क्रम में उसने एक ऐसी बात का जिक्र किया जो बेहद महत्वपूर्ण थी। नेताओं के कैंपेन को कवर करने के क्रम में वो मुंगेर शहर जा पहुंचे थे। वही ऐतिहासिक नगरी मुंगेर जो महाभारत काल में दानवीर कर्ण के अंग प्रदेश की राजधानी था। वहां अब भी गंगा किनारे मशहूर कर्णचौरा है। मान्यता है कि वहीं बैठकर कर्ण दान किया करता थे। शहर में घूमते-टहलते, लोगों से बातचीत करते हुए पत्रकार मित्र को एक इमारत दिखी जिसका नाम था श्रीकृष्ण सेवा सदन। लोगों ने बताया कि श्रीकृष्ण सेवा सदन बिहार के पहले मुख्यमंत्री डॉ श्रीकृष्ण सिंह के नाम पर बना हुआ है। इस इमारत में श्रीकृष्ण सिंह की तमाम पुस्तकें और उनसे जुड़ी चीजें रखी हैं। मेरे मित्र को इसमें एक अच्छी स्टोरी दिखी और वो इमारत के अंदर जाकर श्री बाबू से जुड़ी चीजों को शूट कर लाया। लेकिन उसने जो बताया उसको सुनकर लगा कि हम अपनी विरासत को लेकर कितने उदासीन और लापरवाह हैं। श्रीकृष्ण सेवासदन में रखी चीजें व्यवस्थित तो थीं पर उनका रखरखाव ठीक से नहीं हो रहा है। सभी चीजों पर धूल की मोटी परत जमी है। शहर के बीचों-बीच बनी इस इमारत की अगर ठीक से देखरेख की जाए और उसकी व्यवस्था दुरुस्त हो तो यह स्थान पर्यटकों को भी आकर्षित कर सकता है। इसमें भारत के स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी भी कई यादें रखी हैं। श्रीकृष्ण सिंह के बारे में कहा जाता है कि वो बेहद पढाकू थे। एक बहुत मशहूर किस्सा है कि वो एक बार प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से मिलने दिल्ली आए। नेहरू जी से मिलने के लिए उनको कुछ देर प्रतीक्षा करनी पड़ी। जब पंडित जी आए तो श्रीकृष्ण सिंह ने उलाहना भरे स्वर में कहा कि पंडित जी अब ये स्थिति हो गई है कि आपसे मिलने के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ती है। नेहरू ने श्रीकृष्ण सिंह को दो पुस्तकें दी और कहा कि दरअसल वो पिछले दिनों पुस्तक की एक दुकान पर गए थे वहां से उनके लिए दो पुस्तकें ले आए थे। पुस्तकों को ढूंढने में ही थोड़ा वक्त लग गया। ये कहते हुए नेहरू ने श्रीकृष्ण सिंह को दो पुस्तकें दीं। श्री बाबू ने दोनों पुस्तकों को उलटा-पलटा, फिर नेहरू जी को वापस करते हुए बोले कि पंडित जी पुस्तकों के लिए आपका बहुत आभार। इस बात के लिए भी धन्यवाद कि आपने पुस्तकें खरीदते वक्त मुझको ध्यान में रखा। साथ ही श्रीकृष्ण सिंह ने नेहरू जी को कहा कि वो दोनों पुस्तकें चंद दिनों पहले पढ़ चुके हैं। नेहरू जी को थोड़ा झटका तो लगा लेकिन अपने को संभालते हुए उन्होंने श्रीबाबू का हाथ पकडा और फिर जोरदार ठहाका लगाया। तो ऐसे थे श्री कृष्ण सिंह और ऐसा था उनका अध्ययन कि पुस्तक बाजार में आई नहीं कि वो पढ़ डालते थे। उनकी किताबें अब सेवासदन में धूल खा रही हैं और अगर उनपर ध्यान नहीं दिया गया तो नष्ट हो सकती हैं।
इसी तरह से एक दिन पटना से एक वरिष्ठ रंगकर्मी और लेखक ने फोन किया और बताया कि कुछ लोग मिलकर पटना के गांधी मैदान के पास स्थित कालिदास रंगालय की इमारत पर कब्जा करना चाहते हैं। कालिदास रंगालय पटना के नाट्यकर्म का केंद्र है और वहां नाटकों का मंचन होता है। आरोप है कि शहर के प्राइम लोकेशन पर होने की वजह से कुछ लोग उसपर कब्जा कर मॉल बनवाना चाहते हैं। कालिदास रंगालय एक सोसाइटी के अंतर्गत कार्य करता है। कुछ दिनों पहले सोसाइटी में कुछ गड़बड़ी की गई और दो अलग अलग गुट उसपर अपना दावा करने लगे। एक गुट चाहता है कि इमारत को गिराकर नई इमारत बने जबकि दूसरा गुट ऐसा नहीं चाहता है। मामला फिलहाल अदालत में विचाराधीन है। कहा जा रहा है कि जो लोग इस रंगालय को नया स्वरूप देना चाहते हैं वो इस जगह पर एक मॉल बनाना चाहते हैं। उसी मॉल में एक हिस्सा रंगकर्म के लिए देना चाहते हैं। पटना के रंगकर्मियों को ये प्रस्ताव मंजूर नहीं है। इसी तरह से पटना के कदमकुंआ इलाके में बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन की एक इमारत है। एक जमाना था जब ये देशभर के साहित्य का एक महत्वपूर्ण केंद्र हुआ करता था। इसकी व्यवस्था से पंडित जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी, रामधारी सिंह दिनकर, शिवपूजन सहाय, रामवृक्ष बेनीपुरी, राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह, मोहनलाल महतो वियोगी जैसे दिग्गजज साहित्यकार जुड़े रहे हैं। आज हालत ये है कि बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन पटना का सबसे लोकप्रिय विवाह स्थल है। शादी के सीजन में ये हर दिन बुक रहता है। यहां सेल आदि लगा करते हैं। जिन उद्देश्यों के लिए बिहार साहित्य सम्मेलन की स्थापना की गई थी और जिसके आधार पर सरकार ने इस संस्था को जमीन आवंटित की थी वो अब हो नहीं रहा है। इसका जिम्मेदार कौन है?
इसी तरह की एक खबर आई उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से, जहां के हिंदी भवन को आबंटित की गई जमीन को गाजियाबाद विकास प्राधिकरण ने निरस्त करने का नोटिस दिया है। दरअसल गाजियाबाद में हिंदी भवन समिति ने 1986 में गाजियाबाद विकास प्राधिकरण से रियायती दरों पर जमीन ली थी। जिसका पूरा पैसा प्राधिकरण को जमा नहीं किया जा सका। इसी धार पर 2006 में आवंटन रद्द कर दिया गया लेकिन बावजूद इसके इस जमीन पर इमारत बनी। सभागार बने। गाजियाबाद विकास प्राधिकरण के उस वक्त के उपाध्यक्ष ने इसका शुभारंभ किया। भवन समिति का उद्देश्य हिंदी को बढ़ावा देना था। खबरों के मुताबिक जमीन आवंटन की शर्तों में ये था कि इमारत बनने के बाद उसकी बुकिंग करके व्यावसायिक लाभ नहीं कमाया जा सकेगा। लेकिन आरोप है कि कच्ची रसीद पर शादी विवाह के लिए इस भवन का आवंटन होता रहा है। अब इसकी जांच की जा रही है। देशभर में कई जगह इस तरह के हिंदी भवन हैं। राजधानी दिल्ली में भी है। हर जगह सरकार ने रियायती दरों पर हिंदी को बढावा देने के लिए जमीन आवंटित की थी जिसमें लगभग सभी आवंटन में ये शर्त रखी गई थी कि इसका व्यावसायिक उपयोग नहीं होगा। लेकिन इन भवनों का व्यावसायिक उपयोग हो रहा है। हिंदी के कार्यक्रमों के लिए भी भारी-भरकम किराया लिया जाता है।
तीन तरह की स्थितियां सामने हैं। एक तो जिसमें हम अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को संभाल नहीं पा रहे हैं, उसकी उचित देखभाल नहीं कर पा रहे हैं। दूसरी जिसमें कला-संस्कृति के नाम पर बने संस्थानों पर कब्जे की राजनीति चल रही है। तीसरी जहां भाषा और संस्कृति के नाम पर बनी संस्थाओं की आड़ में कारोबरी गतिविधियां चलाई जा रही हैं। तीनों ही स्थितियां किसी भी देश के लिए, वहां की संस्कृति के लिए, वहां के समाज के लिए, वहां के लोगों के लिए, उचित नहीं हैं। कभी हमने सोचा है कि इस तरह की स्थितियां हमारे सामने क्यों आ रही है। यह इस वजह से आ रही हैं कि हमारे देश में कोई समग्र सांस्कृतिक नीति नहीं है। आजादी के सत्तर साल बीत जाने के बाद भी संस्कृति नीति पर गंभीरता से नहीं सोचा गया। संस्कृति नीति के अभाव में हो ये रहा है कि जहां जैसे जिसको मन हो रहा है, वैसे काम हो रहा है। चार दिनों बाद ये साफ हो जाएगा कि देश में नई सरकार का गठन कौन करेगा। किस पार्टी के नेता प्रधानमंत्री पद की शपथ लेगें। सरकार के गठन के बाद हमारे समाज को खासकर बुद्धिजीवी वर्ग को सांस्कृतिक नीति पर विचार करना होगा ताकि किसी कालिदास रंगालय जैसी जगह पर मॉल बनाने की बात कोई नहीं सोच सके। हिंदी भवन में शादी समारोह के लिए कच्ची प्रतियां ना कटें, साहित्य सम्मेलन के भवनों में साडियों और कपड़ों की सेल ना लगे। ना ही किसी श्रीकृष्ण सेवासदन में हमारी विरासत पर धूल जम जाए। इसके लिए बहुत गंभीरता से प्रयास की आवश्यकता है। अगर एक बार सांस्कृतिक नीति बन गई तो विरासत का संरक्षण भी हो सकेगा और भाषा और कला संस्कृति के नाम पर जारी कारोबार को भी बंद किया जा सकेगा।

Wednesday, May 15, 2019

लड़खड़ाते बिंब से लूट ली महफिल


साहित्य और फिल्म का बहुत पुराना नाता रहा है। फिल्म भुवन शोम और सारा आकाश से सार्थक या समांतर सिनेमा की शुरुआत मानी जाती है। राजेन्द्र यादव भले ही आगरा में पैदा हुए लेकिन शोहरत के शिखर पर वो दिल्ली में रहते हुए ही पहुंचे। उनके उपन्यास सारा आकाश पर इसी नाम से फिल्म बनी। प्रेमचंद से लेकर अमृतलाल नागर और गोपाल सिंह नेपाली से लेकर पंडित नरेन्द्र शर्मा ने तक फिल्मों में अपने हाथ आजमाए। पहले ये होता था कि कवि के तौर पर स्थापित होने के बाद फिल्मों में हाथ आजमाते थे अब फिल्मों में गीत लिखकर शोहरत और सुर्खियां बटोरने के बाद हिंदी कविता में अपना स्थान तलाशते हैं। इस तलाश को गुलजार से लेकर जावेद अख्तर और प्रसून जोशी से लेकर मनोज मुंतशिर तक के लेखन में रेखांकित किया जा सकता है। हाल ही में दिल्ली में गीतकार मनोज मुंतशिर एक कार्यक्रम में आए थे। इस कार्यक्रम में हिंदी कविता की दुनिया से लगभग अपरिचित और अंग्रेजी की दुनिया में विचरण करनेवाले श्रोता उपस्थित थे। अंग्रेजी के लोग जब हिंदी में या फिर अंग्रेजी-हिंदी मिलाकर बात करते हैं तो हिंदी के लिए एक सुखद दृश्य उपस्थित होता है। इस कार्यक्रम में जो माहौल था वो हिंदी के लिए आश्वस्त करनेवाला था। कार्यक्रम की शुरुआत में मनोज मुंतशिर के परिचय के ऑडियो-वीडियो में उनको हिंदी फिल्मों में कविता की वापसी करनेवाला बताया गया। फिल्मी अंदाज में उनकी एंट्री हुई। जोरदार तालियों से स्वागत हुआ। उसके बाद कविता और शायरी पर बातें शुरू हुईं। बातचीत में ऐसा लगा कि मनोज महफिल लूटने की कला में माहिर हैं।
लेकिन जब बात कविता की होगी, हिंदी फिल्मों में कविता की वापसी की होगी तो कई प्रश्न भी उठेंगे। कविता के व्याकरण और उसके बिंबों पर बात होनी चाहिए लेकिन मनजो ने जब अपने पहले प्यार की बात उठाई तो कहा कि वो बारहवीं में थे। दो साल के बाद जब उनकी प्रमिका ने अपने पापा के नाराज होने की वजह बताकार उनसे अपने प्रेमपत्र और फोटो वापस मांगे तो मनोज ने शायरी लिखी जिसमें प्रमिका से अपनी जवानी लौटाने की बात करने लगे। यहीं बिंब का घालमेल हो गया। किशोरवस्था के प्रेम के टूट जाने के बाद अपनी प्रेमिका से जवानी वापस मांगकर कवि ने ज्यादती कर दी। मनोज की कविताई में बार बार बिंबों का खिलवाड़ देखने को मिला। इसी तरह उन्होंने जोश में साहिर लुधियानवी के गीतों के पहले हिंदी फिल्मों मजाक उड़ाया। उन्होंने कहा कि साहिर के पहले हिंदी फिल्मों के गीतों में फूल-पत्ती, मौसम आदि होते थे जिसे साहिर ने अपने गीतों से बदला । यहां वो हिंदी फिल्मों के केदार शर्मा, पंडिच नरेन्द्र शर्मा जैसे गीतकारों की परंपरा भूल गए लेकिन साहिर की शायरी सुनाकर मजमा तो लूट ही लिया। वहां मौजूद एक साहित्यकार ने कहा भी कि महफिल लूटना एक बात होती है और बौद्धिक उपस्थिति अलग।  

सुधीश पचौरी की दिल्ली की यादें


प्रो सुधीश पचौरी प्रख्यात आलोचक हैं। उन्होंने लंबे समय तक दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षण कार्य किया और वहां के उप कुलपति भी रहे। उनकी दर्जनों पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। हिंदी में उत्तर-आधुनिकता की अवधारणा को स्थापित करने का श्रेय उनको ही दिया जाता है। उन्होंने दिल्ली को लेकर मुझसे अपनी यादें साझा कीं।     

मैं आज से 51 साल पहले आगरा से चलकर एम फिल करने दिल्ली आया था। पहले गाजियाबाद में रुका, फिर मिंटो रोड आ गया। उसके बाद शक्तिनगर के पास रहने लगा था। वो दौर मेरी जिंदगी का एक ऐसा दौर था, जिसमें मैंने बहुत काम किया और बहुत कुछ सीखा भी। तब दिल्ली की इतनी आबादी नहीं हुआ करती थी। कमलानगर दिल्ली के पुराने सेठों का इलाका था। कमलानगर की पहचान राजधानी दिल्ली के फैशन स्ट्रीट के तौर पर भी थी। कहा जाता था कि देश में नए फैशन के कपड़े सबसे पहले कमलानगर की दुकानों में ही पहुंचते थे। लिहाजा कमलानगर में बहुत रौनक हुआ करती थी। कमलानगर में उस वक्त एक बेहद लोकप्रिय कैफे हुआ करता था, जहां जाकर दिल्ली युनिवर्सिटी के छात्र गमजदा गाने सुना करते थे। वहां गाने सुनने के लिए एक ऐसा यंत्र लगा था जिसमें पहले पैसा डालना होता था उसके बाद मनपसंद गाने सुन सकते थे। उस मशीन में सबसे ज्यादा पैसे किशोर कुमार और तलत महमूद के गानों के लिए डाले जाते थे। फिल्में देखने के लिए हम शक्तिनगर से मॉडल टाउन पैदल जाते थे, कई बार तो दिन मे दो-दो चक्कर लग जाते थे।
उन दिनों लोग पैदल खूब चला करते थे। नामवर सिंह तिमारपुर में कोने की एक मकान में फर्स्ट फ्लोर पर रहते थे। वहां से वो पैदल ही दरियागंज जाते थे या फिर जनयुग के कार्यलय भी पैदल ही जाया करते थे। उस समय बसों में टिकट बहुत कम था, दस पैसे के टिकट पर आप बस से दिल्ली घूम सकते थे। बाद के दिनों में हम रीगल सिनेमा के पास एक बाएं हाथ पर एक अरबी-अफगानी खाने का ठिकाना था। वहां भी अड्डा जमाते थे। मेरे साथ एक सहूलियत ये हो गई थी कि मैं सीपीएम में सक्रिय होने की वजह से ट्रेड यूनियन की बैठकों में होटलों आदि में भी जाया करता था। तो होटल का स्टाफ हमें पहचानता था। जब हम खाने जाते थे तो अतिरिक्त आतिथ्य मिलता था। फिर मेरी नौकरी लग गई। मैं पार्टी, एसएफआई, जनवादी लेखक संघ और शिक्षकों के मूवमेंट में इतना व्यस्त रहता था और इतना घूमता था कि मेरे सारे पैसे खत्म हो जाते थे। लेकिन तब इसकी चिंता भी नहीं होती थी। युवावस्था का जुनून और विचारधारा का रोमांटिसिज्म था।
उस वक्त दिल्ली विश्वविद्यालय में मार्क्सवाद की लहर थी और दिल्ली वाम विचारधारा का गढ़ हुआ करता था। युनिवर्सिटी में आइडियोलॉजिकल डिबेट की जमकर तैयारी होती थी। सारे लोग जमकर पढ़ाई करते थे, संदर्भ नोट करते थे और बेखौफ होकर अपनी बात रखते थे। विरोध का स्पेस होता था। बहस आदि में बड़ों को गिराकर या उनको मात देकर छोटे मानेजाने वाले लोग अपनी प्रतिभा का एहसास करवाते हुए आगे आते थे। उसको सभी स्वीकार भी करते थे। उन दिनों दिल्ली में जमकर धरना प्रदर्शन का भी कल्चर था। मुझे याद पड़ता है कि 1975 में धर्मवीर भारती दिल्ली में अखिल भारतीय साहित्य सम्मेलन करने आए। हमने उनका विरोध करने की ठानी। मैं और कवि स्वर्गीय पंकज सिंह कार्यक्रम स्थल पर जा पहुंचे और नारेबाजी कर अपनी आपत्ति दर्ज करवाई। ये वही दौर था जब दिल्ली युनिवर्सिटी में डॉ नगेन्द्र की तूती बोलती थी। जब वो क्लास लेकर निकलते थे तो कॉरीडोर खाली हो जाता था। वो किसी को भी किसी कॉलेज में नौकरी दे सकते थे, देते भी थे। डॉ नगेन्द्र से मेरी टकराहट हो गई थी, ये कहानी फिर कभी।
(अनंत विजय से बातचीत पर आधारित)

Saturday, May 11, 2019

अवधाऱणाओं के टकराव का चुनाव


लोकसभा चुनाव अब अपने अंतिम चरण में पहुंच चुका है। आज के मतदान के बाद अब 19 मई को आखिरी चरण के लिए वोट डाले जाएंगे। अब सबकी निगाहें 23 मई को आनेवाले चुनाव के नतीजों पर टिकी हैं। कयासों का दौर चल रहा है। सट्टा बाजार से लेकर सोशल मीडिया तक में पश्चिम बंगाल के चुनाव नतीजे को लेकर खासी उत्सुकता दिख रही है। पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से अलग किस्म की रही है। जब लंबे समय तक वहां मार्क्सवादियों का राज था और ममता बनर्जी उनको चुनौती दे रही थीं तब भी पूरे देश की रुचि बंगाल के चुनाव में रहा करती थी। अब जब ममता को भारतीय जनता पार्टी चुनौती दे रही है तब भी लोगों की निगाहें वहां टिकी हैं। जब ममता बनर्जी 2011 के अप्रैल में होनेवाले विधानसभा चुनाव में लेफ्ट फ्रंट की सरकार के सामने मजबूत चुनौती पेश कर रही थी, उस वक्त कोलकाता से लेकर सूबे के कई हिस्सों में एक एक होर्डिंग खासा चर्चित रहा था। उस होर्डिंग पर कोई राजनीतिक नारा नहीं लिखा गया था, किसी भी राजनीतिक दल के नेता की कोई तस्वीर नहीं लगी थी, किसी पार्टी का झंडा या चुनाव चिन्ह नहीं बनाया गया था। उस होर्डिंग पर लेखिका महाश्वेता देवी के अलावा बांग्ला के अन्य लेखकों की तस्वीरें लगी थीं जिसके नीचे बांग्ला में एक पंक्ति लिखी होती थी जिसका अर्थ होता है कि हमें परिवर्तन चाहिए। बंगाल में माना जाता है कि लेखकों की इस अपील का खासा असर पड़ा और ममता बनर्जी के पक्ष में माहौल बनाने में इसकी भी भूमिका रही थी। बाद में जब चुनाव के नतीजे आए और ममता बनर्जी सूबे की मुख्यमंत्री बनीं तो उन्होंने सार्वजनिक तौर पर महाश्वेता देवी और अन्य लेखकों का आभार जताया था। बाद में तो महाश्वेता देवी खुलकर और मुखर होकर ममता बनर्जी के समर्थन में आ गईं थीं।  
बंगाल में लेखकों और विद्वानों को बहुत ज्यादा प्रतिष्ठा प्राप्त है और वो समाज को प्रभावित करने की क्षमता भी रखते हैं। प्रतिष्ठा इतनी कि जब बांग्ला के मशहूर लेखक सुनील गंगोपाध्याय का निधन हुआ तो लगा कि पूरा कोलकाता उनके अंतिम दर्शन के लिए उमड़ पड़ा हो। उनकी अंतिम यात्रा में हजारों लोग शामिल हुए थे। दुर्भाग्य से यह स्थिति हिंदी में नहीं है। बंगाल के समाज में लेखकों और बुद्धिजीवियों के प्रभाव को ध्यान में रखते हुए भारतीय जनता पार्टी ने इस चुनाव में उनतक पहुंचने का प्रयास भी किया है। पार्टी के थिंक टैंक श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन के निदेशनक अनिर्वाण गांगुली और राज्यसभा के मनोनीत सदस्य स्वप्न दासगुप्ता को इस काम के लिए लगाया गया। इन दोनों लोगों ने आउटरीच कार्यक्रम के तहत उत्तर बंगाल से शुरुआत की और राज्य के अलग अलग हिस्सों में दर्जनों कार्यक्रम किए। बंगाल के बुद्धिजीवियों तक पहुंचने की कोशिश में बंकिम चंद्र चटर्जी, रामानंद चट्टोपाध्याय तक की विरासत पर कार्यक्रम आयोजित हुए, इशमें देशभर के बुद्धिजीवियों से लेकर मंत्रियों तक ने शिरकत की। बंगाल की समृद्ध सांस्कृतिक और साहित्यिक विरासत के अलावा राष्ट्रीय सुरक्षा, न्यू इंडिया के आकांक्षाओं तक पर गोष्ठियां आयोजित की गईं।
बंगाल की धरती पर अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर बहुत बातें होती रही हैं। जब वामपंथी शासन था तो उस दौर में बांग्लादेश की निर्वासित लेखिका तस्लीमा नसरीन के अधिकारों को लेकर भी राष्ट्रव्यापी बहस हुई थी। लेकिन तस्लीमा नसरीन को आखिरकार कोलकाता छोड़ना ही पड़ा था। चुनाव की गहमागहमी के बीच बंगाल जाने का अवसर मिला। पूर्व कुलपतियों से लेकर कई वरिष्ठ लेखकों और संस्कृतिकर्मियों से बात-चीत हुई। उनसे बातचीत करने पर पता चला कि बंगाल में कला-संस्कृति के क्षेत्र में बहुत कुछ बदला नहीं है, हां इतना हो गया है कि पहले जिन संस्थाओं पर वामपंथी लेखकों और संस्कृतिकर्मियों का प्रभुत्व था वहां अब तृणमूल से जुड़े या इस पार्टी की तरफ झुकाव रखनेवालों का वर्चस्व स्थापित हो गया है। इनमे से कई बुद्धिजीवी खुलकर राजनीति में शिरकत कर रहे हैं। वामपंथी शासनकाल के दौरान विरोधियों के लिए कार्यक्रमों के आयोजन में जितनी बाधाएं आती थीं वो सब अब भी आती हैं। कोलकाता के बुद्धिजीवियों ने बताया कि अगर कार्यक्रम भारतीय जनता पार्टी से जुड़े लोग कर रहे हैं तो सरकारी हॉल मिलने में बहुत दिक्कत होती है। हॉल की अगर बुकिंग हो भी गई तो कार्यक्रम से चंद घंटे पहले भी बुकिंग निरस्त कर दी जा सकती है। बुद्धिजीवियों के मुताबिक वहां एक अदृश्य भय का वातावरण बनाया गया है कि ताकि सरकार विरोधी बुद्धिजीवी खुलकर अपनी बात नहीं रख सकें, विमर्श नहीं कर सकें। यह मुमकिन भी हो सकता है क्योंकि ममता बनर्जी को साहित्यकारों की हमें परिवर्तन चाहिए की अपील के असर का अंदाज तो होगा। लेकिन इस वातावरण में भी बंगाल के लेखक अपनी विचारधारा और सोच का सार्वजनिक प्रदर्शन करने से नहीं हिचकते हैं, जबकि हिंदी के ज्यादातर लेखक इस मामले में ना सिर्फ हिचकते हैं बल्कि खुलकर राजनीति करने से भी परहेज करते हैं।
दरअसल इस चुनाव पर अगर हम नजर डालें तो ऐसा लगता है कि ये मुद्दों से अलग नैरेटिव पर लड़ा जा रहा है। अलग अलग तरीके का नैरेटिव खड़ा किया जा रहा है। इस चुनाव के दौरान अंग्रेजी में राजनीति से जुड़ी कई पुस्तकें आईं तो हिंदी में भी चंद पुस्तकों का प्रकाशन हुआ। अंग्रेजी के पुस्तकों के माध्यम से कभी सीधे तो ज्यादातर में परोक्ष रूप से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राजनीति के खिलाफ नैरेटिव खड़ा करने की कोशिश की गई। संघ की विचारधारा को समाज को बांटनेवाले साबित किया गया। इस तरह की पुस्तकों में एक दिक्कत ये होती है कि ये प्राथमिक स्रोत के आधार पर नहीं लिखे जाते हैं। हिंदुत्व और हिंदू धर्म पर जितनी भी पुस्तकें आईं उनमें से ज्यादातर ने प्राथमिक स्रोत तक पहुंचने की कोशिश नहीं की। अखबारों में उपलब्ध सामग्री या दूसरे लेखकों के निष्कर्षों को आधार बनाकर अपने मत का प्रतिपादन किया गया। क्या ये संभव है कि हिंदू धर्म या हिंदू जीवन पद्धति के बारे में बात हो और पांडुरंग वामन काणे की पुस्तक धर्मशास्त्र का इतिहास का संदर्भ नहीं लिया जाए। क्या ये संभव है कि जब हिंदू धर्म के बारे में बात हो तो पुराणों का संदर्भ नहीं लिया जाए, वेदों को उद्धृत ना किया जाए। लेकिन ऐसा हुआ नहीं, अभी आई पुस्तकों में वेदों के उन संदर्भों की व्याख्या का उल्लेख कर निर्णय पर पहुंचा गया जो पहले से उपलब्ध है। सती प्रथा पर मूल ग्रंथों में क्या कहा गया इसको देखे बगैर सती पर अखबारों में छपे लेख को आधार बनाकर हिंदुत्व को परिभाषित करने की कोशिश की गई। लेखकों ने मूल स्रोत तक पहुंचने की कोशिश नहीं की। इसको लोग फॉल्स नैरेटिव कहते हैं जबकि मेरा मानना है कि ये खतरनाक नैरेटिव खड़ा करने की कोशिश की जा रही है। फेक नैरेटिव तो झूठा होता है और वो समाज को गहरे तक नुकसान नहीं पहुंचाता पर अभी जिस तरह के नेरैचिव गढ़े जा रहे हैं वो समाज के लिए बेहद खतरनाक हैं। बंगाल की चुनावी पिच पर भारतीय जनता पार्टी इस नैरेटिव की लड़ाई में भी तृणमूल कांग्रेस से मुकाबला कर रही है। अनिर्वाण गांगुली की टीम ने वहां एक वैकल्पिक नैरेटिव खड़ा करने की कोशिश की है। पिछले दिनों पत्रकार प्रवीण तिवारी की एक पुस्तक आतंक से समझौता प्रकाशित हुई। उस पुस्तक में प्रवीण तिवारी ने साबित करने की कोशिश की है कि भगवा आतंकवाद के नाम पर साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को फंसाने का जो षड़यंत्र था, दरअसल वो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को बदनाम करने और अंतत: उसको प्रतिबंधित करने के लिए था। अपनी उस पुस्तक में प्रवीण तिवारी ने समझौता ब्लास्ट पर अपने तरीके से तथ्य प्रस्तुत किए हैं जो गंभीर विमर्श की मांग करती है।
नैरेटिव की ये लड़ाई कोई सामान्य लड़ाई नहीं है, ऐसा प्रतीत होता है कि इस काम में पीछे से बड़ी ताकतें मदद कर रही हैं। इन विषयों पर जिस तेजी से पुस्तकों का प्रकाशन होता है, उनका विमोचन होता है, उनपर लेख और समीक्षाएं प्रकाशित होने लगती हैं तो, अगर हम समग्रता में देखें, ये सुचिंतित कार्ययोजना का हिस्सा प्रतीत होती हैं। इन ताकतों का स्वार्थ इतना होता है कि वो अपनी विचारधारा का प्रचार करें और ऐसी चीजें भारतीय जनमानस के पटल पर अंकित कर सकें जिसका लाभ उनसे नजदीकी रखनेवाली विचारधारा वाले राजनीतिक दलों को हो। ये चुनाव इस लिहाज से देश में पूर्व में हुए चुनाव से थोड़ा अलग है। एक राजनीतिक विश्लेषक से पिछले दिनो बात हो रही थी तो उन्होंने बहुत सटीक कहा कि- जो चुनावी शोरगुल और मुद्दे सतह पर दिखाई देते हैं दरअसल इस बार का चुनाव उनपर लड़ा नहीं जा रहा है। इस बार का चुनाव खामोश रणनीतियों का चुनाव है। खैर जो भी अब तो दस दिन शेष रह गए हैं उसके बाद तो सबकुछ सबके सामने होगा।  

Saturday, May 4, 2019

यादों में सिमटी आर के की विरासत


अपने जीवन के अंतिम दिनों में मेरे पिता ने बहुत कम पैसों में आर के स्टूडियोज के दो स्टेज बेच दिए थे। उनके बेटे और उत्तराधिकारी के रूप में डब्बू, चिंपू और और मैं सफल फिल्में भले नहीं बना पाए लेकिन हमने संपत्ति का कोई हिस्सा नहीं बेचा। हम अपनी विरासत को संभाल कर रखे हैं। ये बातें ऋषि कपूर ने अपनी आत्मकथा खुल्लम-खुल्ला में लिखी हैं, जो 2017 में पुस्तकाकार प्रकाशित हुई थी। जब आर के स्टूडियोज के बिकने की खबर आई तो उपरोक्त पंक्तियां अचानक से दिमाग में कौंध गईं। दो साल पहले जो ऋषि कपूर अपनी विरासत को लेकर इतने बड़े दावे कर रहे थे, वो इतने कम समय में कैसे बदल गए, क्या हुआ कहा नहीं जा सकता है। क्या वजह रही कि राज कपूर के वारिसों ने, उनके बेटों ने ऐतिहासिक आर के स्टूडियोज को बेचने का फैसला किया। उन्हें यह हक है कि वो अपने पिता की संपत्ति को जिसे चाहे उसको बेचें। लेकिन भारतीय सिनेमा के इस अत्यंत महत्वपूर्ण स्मारक को गिराकर अब उसकी जगह शॉपिंग मॉल और लग्जरी अपार्टमेंट बनाए जाएंगें। राज कपूर और हिंदी फिल्म प्रेमियों के लिए ये एक झटके की तरह था। हलांकि इस बात की आशंका तभी से जताई जाने लगी थी जब स्टूडियो भयानक आग का शिकार हुआ था और कहा गया था कि सबकुछ जलकर खाक हो गया। इस तरह की बातें भी आने लगी थीं कि अब फिल्म निर्माता चेंबूर जाकर फिल्मों की शूटिंग करना नहीं चाहते हैं क्योंकि उससे ज्यादा सहूलियतें अंधेरी में उपलब्ध स्टूडियोज में है। इस वजह से आर के स्टूडियोज को चला और बचा पाना राज कपूर के वारिसों के लिए मुश्किल हो रहा था। दो एक ड़ से अधिक में फैला ये परिसर हिंदी फिल्म का एक ऐसा स्मारक था, एक ऐसी जगह थी जो दर्जनों बेहतरीन फिल्मों के बनने की गवाह रही हैं, यहां राज कपूर की मुहब्बत की शुरुआत होती है और यहीं उसपर परदा भी गिरता है। यह वो जगह थी जिसने गीत और संगीत की दुनिया को कई सितारे दिए। शंकर जयकिशन से लेकर शैलेन्द्र तक को। बॉबी की डिंपल से लेकर राम तेरी गंगा मैली की मंदाकिनी तक ने इसी परिसर में काम करके प्रसिद्धि का स्वाद चखने को मिला था।   
फिल्म इतिहासकार मिहिर बोस के मुताबिक 1950 में राज कपूर ने आर के फिल्म्स को विस्तार देने की योजना बनाई थी और आर के स्टूडियोज के नाम से चेंबूर में सभी सुविधाओं से लैस एक स्टूडियो की स्थापना की थी। उस वक्त राज कपूर का ये स्टूडियो उनके घर से करीब चार किलोमीटर की दूरी पर था। जब राज कपूर ने इस स्टूडियो की स्थापना की थी तो यह जगह उस वक्त के बंबई का बाहरी हिस्सा हुआ करता था। इलाका भी सुनसान होता था लेकिन अब इस इलाके की जमीन करोड़ की हैं। आर के स्टूडियोज के परिसर में राज कपूर का प्रसिद्ध कॉटेज होता था जहां कई ऐतिहासिक फिल्मों की शरूआती की बातें हुई थीं, कई मशहूर गानों और धुनों के बनाने- बनने पर बातें हुईं। फिल्मों को लेकर चर्चाओं के दौर चला करते थे। कई जगह तो इस बात का भी उल्लेख मिलता है कि फिल्मों पर चर्चा सत्र को राज कपूर टेप किया करते थे। अगर ये सच है तो वो टेप फिल्म निर्माण करनेवालों के लिए अमूल् हो सकते हैं। राज कपूर का कॉटेज स्टूडियो परिसर में कार्यालय के पीछे की तरफ हुआ करता था। कॉटेज में राज कपूर का एक कमरा था। अपने कॉटेज को राजकपूर अपनी कला का मंदिर मानते थे और अपने कमरे को मंदिर का गर्भगृह। राज कपूर के कमरे में सभी धर्मों के देवी देवताओं के चित्र लगे हुए थे यहां तक कि कुरान की एक आयत भी दीवार पर उकेरी गई थी।
राज कपूर के लिए सिनेमा उनकी जिंदगी हुआ करती थी। कपूर खानदान पर पुस्तक लिखनेवाली मधु जैन ने लिखा है कि राज कपूर के कॉटेज का दरवाजा फिल्मकार राज कपूर और पति, भाई, पिता, दादा राजकपूर के बीच लाइन ऑफ कंट्रोल हुआ करता था। उनके परिवार ने कभी भी इस लाइऩ को लांघने की कोशिश नहीं की। आर के स्टूडियोज में राज कपूर के कमरे के पीछ नरगिस का भी एक कमरा हुआ करता था। और आर के स्टूडियोज में ही प्रसासनिक भवन के पीछे पहली मंजिल पर नरगिस का ड्रेसिंग रूम बना था। इसके ठीक सामने राज कपूर का ड्रेसिंग रूम होता था। नरगिस और राज कपूर के अलगाव के बाद उनका ड्रेसिंग रूम आर के बैनर तले काम करनेवाली अन्य नायिकाओं के उपयोग में आने लगा था। पर राज कूपर के कॉटेज में नरगिस का जो कमरा था वो जस का तस बना रहा। उसमें नरगिस का सामना भी उसी तरह से रखा रहा था जैसा वो छोड़कर गई थी। राज कपूर ने नरगिस से अलगाव के करीब बीस साल बाद 1974 में अपने एक इंटरव्यू में बताया कि जब नरगिस ने अलग होने का फैसला किया तो वो कभी आर के स्टूडियोज में वापस नहीं लौटीं। एक दिन अचानक उनका ड्राइवर आया और राज कपूर से कहा कि बेबी ने अपने हाईहील वाले सैंडल मंगवाए हैं। राज कपूर ने ड्राइवर को कहा ले जाइए। थोड़े दिनों बाद एक दिन फिर ड्राइवर आया और उसने राज कपूर से कहा कि बेबी ने बाजा (हारमोनियम) मंगवाया है। राज कपूर ने कहा कि जब ड्राइवर नरगिस का हारमोनियम ले जा रहे थे तो उनकी समझ में आ गया कि अब सबकुछ खत्म हो गया है।
राज कपूर और नरगिस के अलगाव का गवाह भी आर के स्टूडियोज ही बना था। 1956 में एक फिल्म आई थी जागते रहो। इस फिल्म की शूटिंग शुरू हुई तो नरगिस पूरी तरह से कंट्रोल कर रही थी। हर तरह के निर्देश आदि देती थी लेकिन धीरे धीरे राज और उनके बीच के संबंध में खटास इतनी बढ़ गई कि इस फिल्म का आखिरी सीन नरगिस का आर के बैनर की अंतिम फिल्म साबित हुई। इस फिल्म के अंतिम सीन में जब प्यासा राज कपूर भटक रहे होते हैं तो नरगिस उनको पानी पिलाती हैं। नरगिस इस सीन को करना नहीं चाहती थी लेकिन वहां मौजूद सभी लोगों के आग्रह को वो टाल नहीं पाईं। माना यह गया कि ये सीन नरगिस को आर के स्टूडियोज की तरफ से दिया जानेवाला फेयरवेल था।
राज कपूर और नरगिस से जुड़े सैकड़ों किस्से और यादें तो इस जगह से जुड़े ही हैं अन्य नायक नायिकाओं और कलाकारों से जुड़े दिलचस्प किस्सों का भी ये परिसर गवाह रहा है। यहीं राज कपूर और राजेश खन्ना के बीच रात भर बात होती रही थी। राज कपूर चाहते थे कि सत्यम शिवम सुंदरम में राजेश खन्ना काम करें। उन्होंने रात को उनको अपने कॉटेज पर बुलाया और फिर रसरंजन के दौर चले लेकिन बात नहीं बन सकी। जीनत अमान के साथ शशि कपूर को इस फिल्म में रोल मिला था। इस फिल्म को लेकर ही राज कपूर और लता मंगेशकर के रिश्तों में खटास आनी शुरू हुई थी। दरअसल राज कपूर ने लता मंगेशकर के साथ मिलकर सूरत और सीरत नाम से एक फिल्म की योजना बनाई थी जो परवान नहीं चढ़ सकी थी। बाद में जब राज कपूर ने उसी थीम पर सत्यम शिवम सुंदरम बनाई तो लता को जीनत अमान का चुनाव अखर गया। लता और राज कपूर के संबंध भी बहुत मधुर थे। कई रात सता मंगेशकर ने राज कपूर के कॉटेज में तानपूरे पर गाते हुए बिताई थी। ऐसी कई घटनाओं का गवाह रहा आर के स्टूडियोज अब किताब के पन्नों में रह जाएगा। हिंदी सिनेमा के एक सौ साल के इतिहास में आर के स्टूडियोज लगभग पचास साल तक हिंदी फिल्मों के केंद्र में रहा लेकिन अब वहां गगन चुंबी इमारत होगी और ये सभी यादें उन गगन चुंबी इमारतों के नीचे दफन हो जाएंगी। इसको बचाने की कोई कोशिश भी नहीं की गई। राज कपूर जैसे शोमैन से डुड़ी यादों को सहेजने के लिए कोई पहल नहीं हुई। राज कपूर और उनकी कला सिर्फ कपूर परिवार का नहीं है वो हमारे देश का है। इसको संभालने और बचाने की जिम्मेदारी हम सबकी थी, लेकिन ऐसा हो ना सका।
जरूरत इस बात की है कि हमारे देश में एक सांस्कृतिक नीति बने जिसमें अपनी विरासत और धरोहर को संजोने के लिए ठोस कदम उठाने की नीति शामिल की जाए। ये सिर्फ फिल्मों से जुड़ा मसला नहीं है हमारी कला संस्कृति की समृद्ध विरासत कई स्थानों पर बेहतर रख-रखाव आदि के अभाव में नष्ट हो रही है। भारतीय प्राच्य विद्या का खजाना कई प्राचीन पुस्तकालयों में नष्ट होने के कगार पर है। उनको संभालने की भी जरूरत है अन्यथा एक समय ऐसा आ सकता है जब हम विकास की गगनचुंबी इमारत पर तो खड़े होंगे लेकिन हमारे पास ना तो कोई धरोहर बचेगा और ना ही हमारी विरासत होगी। इसके लिए राजनीतिक इच्छा शक्ति के साथ ठोस नीति चाहिए। 

Saturday, April 27, 2019

चुनावी कोलाहल में साहित्य का अर्धसत्य


लोकसभा चुनाव के तीन चरण संपन्न हो चुके हैं और चार चरण के चुनाव होना शेष है। चुनावी कोलाहल के बीच साहित्य, कला और संस्कृति से जुड़े सैकड़ों लोग खुलकर नरेन्द्र मोदी के पक्ष और विपक्ष में सामने आ रहे हैं। अबतक कई तरह की अपील जारी की चुकी हैं। किसी अपील में मोदी का नाम है तो किसी में बगैर मोदी के नाम के अपील जारी की गई है। जब भी कोई अपील जारी की जाती है तो उसके पक्ष और विपक्ष में सोशल मीडिया पर शोर-शराबा शुरू हो जाता है। इसी शोर शराबे के बीच हिंदी की वरिष्ठ और सम्मानित लेखिका मृदुला गर्ग ने फेसबुक पर एक टिप्पणी लिखी जिसपर विवाद हो रहा है। मृदुला गर्ग ने अपनी टिप्पणी में लिखा- कभी सोचा नहीं था कि एक वक़्त ऐसा भी आएगा जब हिन्दी के लेखक जिनमें साहित्य अकादमी से पुरस्कृत लेखक भी हैं, ताल ठोंक कर सत्तासीन राजनीतिक पार्टी को दुबारा सत्ता में लाने के लिए प्रचारक की भूमिका निभाएंगे। अपनी ही अभिव्यक्ति पर रोक का उत्सव मनाएंगे! किसलिए? क्या प्राप्त करना चाहते हैं? अपनी शर्म और साहित्यिक गरिमा का मटियामेट कर लिया तो कम अज़ कम दूसरों को तो न बरगलायें।दरअसल इस टिप्पणी में मृदुला गर्ग ने नाम नहीं लिया पर स्पष्ट रूप से उनका इशारा हिंदी की ही एक वरिष्ठ लेखिका चित्रा मुदगल की ओर था। 23 अप्रैल को पोस्ट की गई मृदुला गर्ग की इस टिप्पणी की पृष्ठभूमि यह है कि 20 अप्रैल 2019 को भारतीय साहित्यकार संगठन ने दिल्ली में एक प्रेस कांफ्रेंस करके मोदी के समर्थन में देश भर के 410 लेखकों की एक अपील जारी की थी। इस अपील में चित्रा मुद्गल का भी नाम था। उसके बाद ही मृदुला गर्ग की टिप्पणी आई।
अब जरा मृदुला गर्ग की टिप्पणी का विश्लेषण करते हैं। मृदुला जी ने कभी सोचा भी नहीं था कि हिंदी के लेखक सत्तासीन राजनीतिक पार्टी को दुबारा सत्ता में लाने के लिए प्रचारक की भूमिका निभाएंगीं। उनकी इस टिप्पणी से ऐसा प्रतीत होता है कि हिंदी के लेखकों ने पहली बार सत्तासीन राजनीतिक दल के पक्ष में कोई बयान जारी किया है। उन्हें शायद स्मरण नहीं रहा हो कि अटल बिहारी वाजपेयी के पक्ष में भी लेखकों ने एक अपील जारी की थी। वो भी तब सत्तासीन ही थे। प्रगतिशील लेखकों ने इमरजेंसी के दौरान इंदिरा गांधी के पक्ष में अपील जारी की थी, तब इंदिरा गांधी भी सत्तासीन ही थीं। राज्यों के विधानसभा चुनाव के दौरान भी कई ऐसे मसले मिल जा सकते हैं जहां हिंदी के लेखकों ने सत्तासीन पार्टी के दुबारा सत्ता में लाने के लिए अपील की हो। इस वाक्य में मृदुला जी ने जिस तरह से प्रचारक शब्द का उपयोग किया है वो ये संकेत देने के लिए है कि ये लोग राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ से जुड़े हैं। अपनी उसी टिप्पणी में मृदुला गर्ग ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए लिखा कि मोदी के समर्थन में सामने आए लेखक अपनी ही अभिव्यक्ति की रोक का उत्सव मनाएंगे। लेकिन इस टिप्पणी में वो अपनी अभिव्यक्ति की रोक वाली टिप्पणी के समर्थन में कोई तर्क नहीं दे पाईं। 2014 में मोदी के सत्ता संभालने के बाद लेखकों के एक खास वर्ग ने इस बात को जमकर प्रचारित किया कि देश में अभिव्यक्ति की आजादी खतरे में है। अघोषित आपातकाल जैसे जुमले भी उछाले गए। लेकिन इन बयानों को पुष्ट करनेवाले तथ्य कभी सामने नहीं आए। जब अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोंटा गया था तब तो प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े लेखक इंदिरा गांधी के समर्थन में नारे लगा रहे थे। जब वामपंथी शासन काल के दौरान बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन को पश्चिम बंगाल से निकाला जा रहा था तब भी लेखक बिरादरी खामोश थी। मृदुला गर्ग अपनी टिप्पणी में यह भी जानना चाहती हैं कि मोदी के समर्थन में अपील जारी करनेवाले लेखक क्या प्राप्त करना चाहते हैं?  उनको यह समझना होगा कि हर कदम कुछ प्राप्त करने के उद्देश्य से नहीं उठाए जाते। अगर वो चित्रा मुदगल पर तंज कर रही थीं, या उऩके दिमाग में चित्रा जी को अटल बिहारी वाजपेयी के शासन के दौरान प्रसार भारती का सदस्य बनाए जाने का प्रसंग था तो उनको याद रखना चाहिए कि इंद्र कुमार गुजराल जब देश के प्रधानमंत्री बने थे तो उन्होंने अपनी पसंद के लेखक राजेन्द्र यादव को प्रसार भारती का सदस्य बनाया था। जैसे जैसे मृदुला जी की टिप्पणी आगे बढ़ती गई वो और तल्ख होती चली गई। उन्होंने इन लेखकों पर साहित्यिक गरिमा को मटियामेट करने का आरोप भी जड़ा और दूसरो को न बरगलाने की नसीहत भी दी। किसी दल के पक्ष में मतदान की अपील जारी करने से साहित्यिक गरिमा कैसे मटियामेट हो गई ये भी बतातीं तो बेहतर रहता। जहां तक बरगलाने की बात है तो यह कहा जा सकता है कि अपनी टिप्पणी में अर्धसत्य पेश करके मृदुला गर्ग ही हिंदी समाज को भ्रमित कर रही हैं। महाभारत के युद्ध में तो अर्धसत्य को अश्वत्थामा को मारने और द्रोणाचार्य को कमजोर करने के लिए अर्धसत्य का सहारा लिया गया था। तब अर्धसत्य को हथियार बनाया था धर्मराज युधिष्ठिर ने। यहां भी मृदुला जी बेहद सम्मानिक हैं, उनसे अर्धसत्य की अपेक्षा नहीं की जाती है बल्कु उऩसे समग्रता की अपेक्षा की जाती है। उनकी टिप्पणी के आखिरी वाक्य में जो गुस्सा और शब्दों का चयन है वो भी अनपेक्षित है। यहां यह भी याद दिलाना जरूरी है कि चित्रा मुदगल अचानक से पाला बदलकर किसी पक्ष में खड़ी नहीं हो गई हैं। उनका स्टैंड पूरे हिंदी जगत को पहले से ज्ञात रहा है। इसलिए जो लोग चित्रा जी की अब लानत-मलामत कर रहे हैं उनको अपने स्टैंड पर फिर से विचार करना चाहिए।
मृदुला गर्ग को यह जानना जरूरी है कि इस वक्त जारी चुनाव में देशभर के कई वामपंथी लेखक जिनमें नरेश सक्सेना जैसे वरिष्ठ कवि भी हैं, बेगूसराय में पार्टी विशेष के पक्ष में प्रचार कर रहे हैं। वो ये तर्क दे सकती हैं कि ये लोग सत्ता के खिलाफ संघर्ष में शामिल हैं। अगर वो सत्ता के खिलाफ संघर्ष है तो यहां भी पलटकर उनसे ये सवाल पूछा जा सकता है कि वो क्या प्राप्त करना चाहते हैं। यहां प्राप्ति की अपेक्षा का प्रश्न ज्यादा समीचीन होगा क्योंकि वामपंथी लेखकों का इतिहास रहा है कि वो सत्ता के साथ रहकर सत्ता सुख भोगते रहे हैं। कांग्रेस ने अभी हाल ही में जिस तरह से राजस्थान और मध्यप्रदेश में लेखकों को सरकारी पद देकर उपकृत किया है उससे उनका ये इतिहास और मजबूत होता है। मृदुला गर्ग की टिप्पणी पर जब इतिहास की याद दिलाई गई तो प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े एक लेखक ने इसको मोदी फॉर्मूला करार दिया कि अब को दबाने के लिए तब की बात की जाती है। वो यह भूल गए कि अतीत से पिंड छुड़ाना आसान नहीं होता।
लेखक को हमेशा सत्ता के खिलाफ होना चाहिए ये बात बहुधा सुनाई देती है। लेकिन उनको सत्ता के खिलाफ क्यों होना चाहिए, इस बारे में कहीं कुछ ठोस सुनने को नहीं मिलता है। दरअसल वामपंथियों ने यह बहुत सुंदर तर्क गढ़ा कि लेखक को प्रतिपक्ष की आवाज होना चाहिए। इस तर्क को जनता के बीच ले जाकर पुष्ट भी किया जाता रहा। पार्टी प्रतिबद्धता वाले लेखक जो अपने को वैचरिक प्रतिबद्धता वाले लेखक भी कहते और प्रचारित करते रहे, उनमें से कइयों ने अपने लेखन से भी इस अवधारणा को पुष्ट करने की कोशिश की। लेकिन अगर हम इस सिद्धांत की कसौटी पर वामपंथ से जुड़े लेखकों को कसते हैं तो बिल्कुल ही अलग तस्वीर नजर आती है। वो तस्वीर है प्रतिपक्ष की इस सैद्धांतिकी के मुखौटे की जिसके पीछे होता है स्वार्थसिद्धि का पूरा ताना बाना। इस बात पर देशव्यापी बहस होनी चाहिए कि लेखक की भूमिका क्या हो, क्या वो संविधान में मिले अपने अधिकारों के हिसाब से काम करे या बरसों से फैलाए जा रहे भ्रम का शिकार होते रहें। जितना अधिकार मृदुला जी को अपनी बात रखने का, मोदी का विरोध करने का, सत्ता का विरोध करने का है उतना ही हक चित्रा जी को अपनी बात रखने का, मोदी का समर्थन करने का है। मोदी के विरोध से मृदुला जी के साहित्य अकादमी पुरस्कार की चमक ना तो बढ़ जाएगी और ना ही मोदी के समर्थन से चित्रा जी के साहित्य अकादमी पुरस्कार में की चमक कम हो जाएगी। दोनों हिंदी की सम्मानित लेखिका बनी रहेंगी क्योंकि अंतत: एक लेखक का मूल्यांकन उसकी कृतियों से होता है। अगर कृतियों से इतर लेखक का मूल्यांकन करने की कोशिश की जाएगी तो बड़ी-बड़ी छवियां इस तरह से धराशायी होंगी जिसका दृष्य सोवियत रूस में लेनिन की गिरती मूर्ति से भी भयावह हो सकता है।