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Saturday, September 14, 2019

गांधी, हिंदी और हिन्दुस्तानी


हिंदी दिवस की पूर्व संध्या पर दैनिक जागरण के आयोजन में एक सत्र का विषय था, गांधी और हिंदी। इस सत्र में वक्ताओं ने गांधी के हिंदी प्रेम को रेखांकित किया। इस चर्चा में एक बात सामने आई कि गांधी हिंदी को राष्ट्रभाषा के तौर पर स्थापित करना चाहते थे। दरअसल गांधी शुरुआत में तो ऐसा चाहते थे, कहा भी था लेकिन बाद के दिनों में वो हिन्दुस्तानी की पैरोकारी करने लगे थे। गांधी और हिंदी के संबंधों को समग्रता में समझने के लिए हमें हिंदी के आंदोलनों की ऐतिहासिकता में जाना होगा। पहले गांधी का हिंदी प्रेम और बाद के दिनों में हिन्दुस्तानी प्रेम गांधी के विचारों का ऐसा विचलन है जिसमें राजनीति को देखना होगा। इस विचलन को समझने के लिए हमें हिंदी को लेकर चलाए गए आंदोलनों और प्रयासों को भी देखना होगा। हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के प्रयास गांधी के आगमन के बहुत पहले से हो चुका था। 1826 में राममोहन राय ने बंगदूत नाम का एक साप्ताहिक पत्र निकाला था जिसमें हिंदी, अंग्रेजी, बांग्ला और फारसी के लेख छपा करते थे। राममोहन राय हिंदी में लिखते थे और दूसरों को भी हिंदी में लिखने के लिए कहा करते थे। राममोहन राय के बाद ब्राह्म समाज को केशवचंद्र सेन ने संभाला था। केशवचंद्र सेन हिंदी के बड़े हिमायती थी। ठीक से याद नहीं है पर कहीं इस बात का उल्लेख मिलता है कि एक बार स्वामी दयानंद कलकत्ता गए थे को केशवचंद्र सेन के साथ ठहरे थे। उस वक्त वो सत्यार्थ प्रकाश लिख रहे थे। केशवचंद्र सेन से इसपर उनकी बातें होने लगीं। जब सेन साहब को पता चला कि स्वामी जी संस्कृत में सत्यार्थ प्रकाश की रचना कर रहे हैं तो उन्होंने स्वामी जी को इसको हिंदी में लिखने की सलाह दी थी। केशव जी की सलाह के बाद ही स्वामी जी ने सत्यार्थ प्रकाश को हिंदी में लिखा। इस बात के भी पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध हैं कि केशवचंद्र सेन जी ये महसूस करते थे कि भारत की एकता के लिए और इसकी स्वतंत्रता के लिए एक ऐसी भाषा की आवश्यकता है जो पूरे देश की संपर्क भाषा हो। वो इसके लिए हिंदी को सबसे उपयुक्त मानते थे। सेन ने अपनी पत्रिका सुलभ समाचार के 1875 के किसी अंक में बंग्ला में इस विषय पर एक लेख भी लिखा था और अपना मत हिंदी के पक्ष में प्रस्तुत किया था।
बंकिमचंद्र चटर्जी ने भी ये भविष्यवाणी की थी कि हिंदी एक दिन इस देश की राष्ट्रभाषा होकर रहेगी क्योंकि इसकी सहायता से ही भारत में एकता स्थापित होगी। डॉ सुनीति कुमार चटर्जी के मुताबिक 1877 में बंगदर्शन में एक लेख छपा था जिसके लेखक का नाम नहीं था पर सभी का अनुमान था कि वो लेख बंकिमचंद्र चटर्जी ने लिखा था। उस लेख में भी हिंदी को भारत को जोड़ने वाली भाषा के तौर पर रेखांकित किया गया था। महर्षि अरविंद ने भी साप्ताहिक पत्रिका धर्म में लिखा था कि भाषा-भेद से देश की एकता में बाधा नहीं पड़ेगी। सबलोग अपनी मातृभाषा की रक्षा करते हुए,हिंदी को साधारण भाषा के रूप में अपनाकर, इस भेद को खत्म कर देंगे।इस पृष्ठभूमि की चर्चा करने का उद्देश्य सिर्फ इतना है कि जब 1885 में कांग्रेस की स्थापना हुई उसके पहले से ही देशभर में ये माहौल बना हुआ था कि हिंदी ही इस देश को एक सूत्र में जोड़ने का काम कर सकती है। हिंदी ही वो भाषा है जो इस देश की राष्ट्रभाषा बन सकती है। साफ है कि जब गांधी भारत लौटे तो उस वक्त पूरे देश के मानस में हिंदी को लेकर एक अपनत्व या कहें कि उसके पक्ष में एक खास किस्म का माहौल बना हुआ था। दक्षिण अफ्रीका से गांधी के भारत आने के पहले ही 10 अक्तूबर 1910 को हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग की स्थापना हो चुकी थी और पंडित मदन मोहन मालवीय उसके अध्यक्ष और पुरषोत्तमदास टंडन इसके महामंत्री बन चुके थे। अदालतों की भाषा हिंदी हो इसके लिए काम शुरू हो चुका था। गांधी इस बात को भांप गए थे कि हिंदी को भारत की एकता और स्वतंत्रता के लिए उपयोग में लाया जा सकता है।  
अब जरा हिन्दुस्तानी के इतिहास को समझने की कोशिश करनी होगी। अकबर के समय से ही राजकाज की भाषा फारसी चली आ रही थी। बाद में भी ये चलता रहा। 1837 में कंपनी राज ने फारसी को कठिन मानते हुए आम जनता के लिए भारतीय भाषाओं में काम करने का आदेश जारी किया। इस आदेश के बाद बंगला, ओडिया, गुजराती और मराठी में संबंधित भूभाग में काम होने लगा। संयुक्त प्रांत, बिहार और मध्यप्रदेश का जो इलाका है वहां काम करनेवालों ने अंग्रेज अफसरों को ये समझा दिया कि उर्दू ही हिन्दुस्तानी है। इसका परिणाम यह हुआ कि इन प्रांतों में अदालतों की भाषा उर्दू ही रह गई। जब मदन मोहन मालवीय जी ने अदालतों में फारसी की जगह पर नागरी लिपि का आंदोलन शुरू किया और ये जोर पकड़ने लगा तो मुसलमानों की तरफ से इसका विरोध शुरू हुआ। यहीं से भाषा के प्रश्न में संप्रदाय का प्रवेश होता है। हम कह सकते हैं कि भाषाई संप्रदायवाद का बीज कचहरी में नागरी आंदोलन के विरोध के दौरान बोया गया जो बाद में फला-फूला। 1857 की क्रांति के दौरान अंग्रेजों को ये बात समझ आ गई थी कि हिंदू और मुसलमानों के बीच की खाई को और चौड़ा किए उनका राज ज्यादा दिनों तक चलनेवाला नहीं है। इसको भांपते हुए बरतानिया हुकूमत अदालतों में नागरी लिपि की मांग को खारिज करने लगी। लेकिन 1881 में अंग्रेजो को समझ आया कि जनता की भाषा हिंदी और लिपि नागरी है तो अदालतों में फारसी के साथ साथ नागरी के उपयोग की अनुमति भी दे दी गई।
इस स्थिति में गांधी ने हिंदी को राष्ट्रभाषा कहना शुरू कर दिया था। वो हर जगह इस आशय का भाषण भी देने लगे थे। दक्षिण के लोगों को भी हिंदी सीखने के लिए प्रेरित करने लगे थे। कब ये हिंदी प्रेम हिन्दुस्तानी प्रेम में बदल गया इसको ठीक ठीक चिन्हित करने में कठिऩाई है क्योंकि गांधी एक तरफ हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए काम कर रहे थे तो दूसरी तरफ हिन्दुस्तानी की वकालत करने में लग गए थे। 28 मार्च 1919 के तूतीकोरन में उन्होंने हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा बताया था लेकिन 1920 या उससे थोड़ा पहले से गांधी के वक्तव्य गड्डमड्ड होने लगे थे। जब हिंदी को लेकर आंदोलन जोर पकड़ने लगा तब 1925 के कांग्रेस अधिवेशन में एक प्रस्ताव पास होता है कि पार्टी का सारा काम-काज, महासचिवों का काम सब आमतौर पर हिन्दुस्तानी में होगा। फिर 1935 में गांधी ने हिंदी और हिन्दुस्तानी पर अपना मत और स्पष्ट किया और बोले – हिंदी उस भाषा का नाम है जिसे हिंदू और मुसलमान कुदरती तौर पर बगैर प्रयत्न के बोलते हैं। इसी में वो आगे कहते हैं कि हिन्दुस्तानी और उर्दू में कोई फर्क नहीं है। देवनागरी में लिखी जाने पर वो हिंदी और अरबी में लिखी जाने पर उर्दू कही जाती है। हरजिन सेवक के 1 फरवरी 1942 में वो फिर से भ्रम पैदा करते हैं जब अपने लेख में लिखते हैं कि हिंदी और उर्दू के मेल से एक ऐसी जबान तैयार करनी है जो सबके काम आ सके। गांधी धीरे धीरे इसको हिंदू-मुस्लिम एकता के औजार के तौर पर इस्तेमाल करने लगे। देश की एकता के लिए भाषा को राजनीति का औजार गांधी ने बनाया। पहले हिंदी की वकालत करके और फिर उसके बाद हिन्दुस्तानी की वकालत करके। 1915 से लेकर 1947 तक हिंदी और हिन्दुस्तानी को लेकर उनके इतने भ्रमित करनेवाले बयान और लेख उपलब्ध हैं कि उससे किसी निषकर्ष पर पहुंचना बेहद मुश्किल काम है। 1945 तक तो गांधी हिन्दुस्तानी के इतने पक्ष में आ गए थे उनके सर्वमान्य नेता होने के बावजूद उनको साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ा। जयपुर के सम्मेलन के खुले अधिवेशन में गांधी के इस्तीफे को रखा गया। रात दो बजे तक इसपर मंथन हुआ और आखिर गांधी का इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया। सदस्यों ने भारी मन से गांधी के इस्तीफे को स्वीकार किया लेकिन इस बात के संकेत मिले कि भाषा के नाम पर वो गांधी से भी दूबर जाने को तैयार थे।
गांधी हिंदी को लेकर आग्रही थे, बहुत काम किया, बहुत लेख लिखे, भाषण दिए लेकिन इतना ही उन्होंने हिन्दुस्तानी के लिए भी किया। गांधी ये कहते भी थे किसी विषय पर अगर उनकी अलग अलग राय है तो उनकी बाद में प्रकट की गई राय ही अंतिम राय होगी। गांधी की हिंदी को लेकर क्या राय रही है इसपर गंभीर मंथन की जरूरत है। मंथन बगैर किसी पूर्वग्रह के, बगैर किसी राजनीति के और बगैर किसी धर्म और संप्रदाय के दबाव के।

Sunday, September 8, 2019

वेब सीरीज के नियमन पर हो मंथन


पिछले दिनों इस तरह की खबरें आई कि सरकार वेब सीरीज पर दिखाई जानेवाली सामग्री को लेकर विचार विमर्श शुरू करने जा रही है । खबरों के मुताबिक सरकार इस बात पर विचार कर रही है कि वेब सीरीज पर जो कुछ भी दिखाया जा रहा है उसको लेकर इस महीने से मंथन शुरू हो रहा है। पिछले दिनों सूचना और प्रसारण मंत्री प्रकाश जावडेकर केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड और फिल्म इंडस्ट्री के लोगों से मिले थे। उस बैठक में मंत्री ने भी इस बात की ओर इशारा किया था कि सरकार जल्द ही वेब पर दिखाई जानेवाली सीरीज और उसके कंटेंट को लेकर उससे जुड़े सभी लोगों से बातचीत करनेवाली है। दरअसल पिछले दिनों कई वेब सीरीज ऐसी आईं जिनमें भयानक हिंसा और अश्लील दृश्यों की भरमार दिखाई देती है। कहानी की मांग से इतर कई निर्माताओं ने जबरदस्ती हिंसा और यौनिक दृष्यों को पेश किया। माना गया कि ये सब लोकप्रियता हासिल करने के उद्देश्य से दिखाया गया। जब इस, तरह के कंटेंट की बहुतायत होने लगी तो उसपर लेख आदि लिखे जाने लगे। इस स्तंभ में भी कई बार इस ओर इशारा किया गया। अभी पिछले दिनों नेटफ्लिक्स पर एक वेब सीरीज का दूसरा सीजन दिखाया गया था। इस सीरीज का नाम है सेक्रेड गेम्स। इसमें कई संवाद ऐसे हैं जो साफ तौर पर इसके निर्देशक की सोच को दर्शाते हैं और समाज को बांटने जैसा है। जैसे एक जगह जब एक मुसलमान अभियुक्त से पुलिस पूछताछ के क्रम में कहती है कि उसको यूं ही नहीं उठाकर पूछताछ किया जा रहा है तो अभियुक्त कहता है कि इस देश में मुसलमानों को उठाने के लिए किसी वजह की जरूरत नहीं होती है। अब इस बात पर विचार किया जाना आवश्यक है कि इस सीरीजज क निर्माता और निर्देशक इस तरह के संवाद किसी पात्र के माध्यम से सामने रखकर क्या हासिल करना चाहते हैं। इस तरह के कई प्रसंग और संवाद इस सीरीज में है। इसके पहले सीजन में भी इस तरह के अनेक दृश्य और संवाद दिखाए गए थे। मुसलमानों के मन में देश की व्यवस्था के खिलाफ एक खास किस्म के गुस्से और नफरत का प्रकटीकरण नियमित तौर पर होता रहा है। अभी ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब इसी तरह की एक वेब सीरीज आई थी लैला। इस पूरी सीरीज में हिंदू धर्म को लेकर जो भयावह तस्वीर पेश की गई थी। जिस तरह से हिंदू लड़कियों के मुसलमान लड़के से शादी करने के परिणामों की बेहद आऐपत्तिजनक तस्वीर पेश की गई थी वो निश्चित तौर पर समाज को बांटनेवाले या एक समुदाय के खिलाफ दूसरे समुदाय के मन में शंका के बीज बोने जैसा था। मुस्लिम लड़कों से शादी करनेवाली हिंदू लड़कियों के शुद्धिकरण को लेकर जिस तरह के संवाद और दृश्य पेश किए गए थे, उसको देखने के बाद स्वाभाविक तौर पर मन में यह प्रश्न उठते हैं कि इसके पीछे का एजेंडा क्या है। इसके पीछे एक खास तरह की विचारधारा का पोषण और एक दूसरी विचारधारा को पुष्ट करने की मंशा को रेखांकित किया जा सकता है। इस तरह की एजेंडा सीरीज की पहचान इसके निर्देशकों के नाम और उनके पूर्व के काम को देखकर साफ तौर पर किया जा सकता है।
इसी तरह से अगर हम देखें तो कई सीरीज में देश को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से बदनाम करने की कोशिशें भी दिखाई देती हैं। एक सीरीज में तो यहां तक दिखा दिया गया है कि कश्मीर में भारतीय वायुसेना के विमान स्कूल पर बम गिराकर छात्रों को मार डालते हैं। ये कैसी क्लपनाशीलता है जिसमें एक देश की सेना को ही कठघरे में खड़ा कर दिया जाए। एक और सीरीज में कश्मीर की जेल का चित्रण है जिसमें ये दिखाया जाता है कि वहां का जेलर एक पाकिस्तानी लड़की का जेल में ही रेप करता है। निर्माताओं को ये मालूम होना चाहिए कि भारतीय जेल में महिला कैदियों के साथ किसी तरह की यौनिक हिंसा करना कितना मुश्किल है। इस तरह के केंटेंट हमारे देश की संस्थाओं को ना केवल बदनाम करते हैं बल्कि उनके खिलाफ जनता के मन में नफरत और जहर भी भरते हैं। कलात्मक अभिव्यक्ति के नाम पर इस तरह की छूट दी जानी चाहिए, इसपर विचार करना आवश्यक है।
समाज में नफरत के बीज बोने के अलावा सेक्रेड गेम्स में जिस तरह के अश्लील दृश्य और अप्राकृतिक यौनाचार दिखाई गए थे या दिखाए जा रहे हैं, उस तरह के दृश्यों के लिए क्या हमारा समाज तैयार है, इसपर भी गहरे मंथन और विचार विमर्श की जरूरत है। इसी तरह से लस्ट स्टोरीज में जिस तरह के यौन प्रसंगों को उभारा गया था उसको भी कलात्मक अभिव्यक्ति की श्रेणी में डालकर प्रश्न नहीं पूछना अनुचित होगा। क्या हमारा समाज पश्चिमी देशों की तरह इस बात के लिए तैयार है कि टॉपलेस नायिकाओं और रति प्रसंगों का सार्वजनिक प्रदर्शन हो। कई वेब प्लेटऑर्म तो ऐसे हैं जो अपने को हॉट और वाइल्ड एंड लस्टफुल कहकर प्रचारित भी करते हैं। सरकार को इसके नियमन के बारे में भी विचार करना चाहिए, क्योंकि फिल्मों और वेब सीरीज के लिए दोहरे मानदंड उचित नहीं है। फिल्मों में गाली हो तो उसको बीप करना होता है, बेव सीरीज पर गालियों की भरमार, फिल्मों में लंबे चुंबन दृष्यों पर कैंची और वेब सीरीज में रति प्रसंगों को फिल्माने की छूट। फिल्मों में विकृत हिंसा के दृष्यों को संपादित करने का नियम तो बेव सीरीज में हिंसा के जुगुप्साजनक दृष्यों की भरमार। अश्लील दृश्यों की भरमार वाले सीरीज दिखानेवाले ये तर्क देते हैं कि इंटरनेट पर तो कितने ही पोर्न साइट हैं जहां इस तरह की सामग्री मौजूद है तो जिनको इस तरह के दृष्य देखने होंगे वो वहां बहुत आसानी से देख सकते हैं। लेकिन इस तरह के तर्क देनेवालों को यह सोचना चाहिए कि इंटरनेट पर मौजूद पोर्न सामग्री और इस तरह के वैध प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध पोर्न को देखने में फर्क है। यहां कहानी की शक्ल में इसको पेश किया जाता है। दूसरा तर्क ये दिया जाता है कि इन प्लेटफॉर्म पर जानेवाले लोग जानते हैं कि वो क्या करने जा रहे हैं. वो इनकी सदस्यता लेते हैं, शुल्क अदा करते हैं और उसके बाद वेब सीरीज देखते हैं। तो किसी को भी क्या सामग्री देखनी है ये चयन करने का अधिकार तो होना ही चाहिए। ठीक बात है कि हर किसी को अपनी रुचि की सामग्री देखने का अधिकार होना चाहिए लेकिन उन अपरिपक्व दिमाग वाले किशोरों का क्या जिनके हाथ में बड़ी संख्या में स्मार्टफोन भी है, उसमें इंटरनेट कनेक्शन भी है और इतने पैसे तो हैं कि वो इन ओवर द टॉप प्लेटफॉर्म की सदस्यता ले सके। क्या हम या इन प्लेटफॉर्म पर सामग्री देनेवाली संस्थाएं ये चाहती हैं कि हमारे देश के किशोर मन को अपरिपक्वता की स्थिति से ही इस तरह से मोड दिया जाए कि आगे चलकर इस तररह की सामग्री को देखनेवाला एक बड़ा उपभोक्ता वर्ग तैयार हो सके। इसके अलावा जो एक और खतरनाक बात यहां दिखाई देती है वो ये कि इन प्लेटफॉर्म्स पर कई तरह के विदेशी सीरीज भी उपलब्ध हैं जहां पूर्ण नग्नता परोसी जाती है। ऐसी हिंसा दिखाई जाती है जिसमें मानव शरीर को काटकर उसकी अंतड़ियां निकाल कर प्रदर्शित की जाती हैं। जिस कंटेंट को भारतीय सिनेमाघरों में नहीं दिखाया जा सकता है उस तरह के कंटेंट वहां आसानी से उपलब्ध हैं। चूंकि वेब सीरीज के लिए किसी तरह का कोई नियमन नहीं है लिहाजा वहां बहुत स्वतंत्र नग्नता और अपनी राजनीति चमकाने या अपनी राजनीति को पुष्ट करनेवाली विचारधारा को दिखाने का अवसर उपलब्ध है। इस तरह की सामग्री को जब लगातार दिखाया जाता है तो कहीं न कहीं से इसके निमयन को लेकर बात शुरू होती है।
फिछले दिनों इस तरह की वेब सीरीज दिखानेवाले कई प्लेटफॉर्म्स ने स्व नियमन करने की कोशिश की लेकिन सभी के बीच सहमति नहीं बन पाने से यह बहुत प्रभानी नहीं हो पाया है। किसी भी कंटेंट पर सेंसरशिप अंतिम कदम होना चाहिए उसके पहले सभी तरह के विकल्पों पर विचार करना होगा। क्या इस तरह की कोई ऐसी स्वयत्त संस्था बन सकती है जो इन वेब सीरीज पर दिखाए जानेवाले कंटेंट की शिकायत मिलने पर विचार करे और उसपर फैसला ले लेकिन इस संस्था को इतना अधिकार होना चाहिए कि उसके फैसले का सम्मान हो और उसको लागू करवाने के लिए उसके पास वैध अधिकार हों। अगर इस दिशा में कुछ नहीं किया गया तो इंटरनेट की इस दुनिया में अराजकता और बढ़ेगी और फिर उसको काबू करने के लिए बेहद कठोर कदम उठाने होंगे जो बेवजह विवाद को जन्म दे सकते हैं।

Saturday, August 31, 2019

बयान से बेनकाब होती विचारधारा


इन दिनों एक बार फिर से बुकर पुरस्कार से सम्मानित लेखिका अरुंधति राय चर्चा में हैं। 2011 में दिए उनके एक भाषण के अंश को पाकिस्तानी मीडिया ने भारत को बदनाम करने की नीयत से छाप दिया। पाकिस्तान के हुक्मरानों ने भी उसकी आड़ में भारत को घेरने की कोशिश की। अरुंझति के उस बयान के सामने आते ही सोशल मीडिया पर एक बवंडर सा उठा, जमकर चर्चा शुरू हो गई। भारत और बांग्लादेश के ट्वीटर उपभोक्ताओं ने उनकी लानत-मलामत शुरू की और डबलस्टैंडर्ड हैशटैग के साथ ये मसला ट्वीटर पर ट्रेंड करने लगा। दरअसल 2011 में अरुंधति राय ने एक चर्चा के दौरान घोर आपत्तिजनक बातें कही थीं। ये ऐसी बातें हैं जो सीधे सीधे राष्ट्र के खिलाफ हैं। उनका अंदाज ही भारत को अपमानित करने जैसा था और कहीं से भी ये नहीं लग रहा था कि एक भारतीय बोल रहा हो। भारत के बारे में अरुंधति ने कहा कि वो भारत जैसी जगह के बारे में बात कर रही हैं जहां कश्मीर, मणिपुर, नगालैंड, मिजोरम में तब से युद्ध हो रहे हैं जब से भारत एक संप्रभु राष्ट्र बना। भारत जब गुलामी की बेड़ियों से आजाद हुआ तब से ही वो एक औपनिवेशिक राष्ट्र बन गया। तमाम झंझावातों के बीच हिन्दुस्तान का लोकतंत्र मजबूत और परिपक्व हुआ ये अरुंधति को ना तो दिखा और ना ही वो समझ पाई। अपने जहर बुझे बयान में अरुंधति ने कहा कि वि भारत में 1947 से ही कश्मीर, मणिपुर, नगालैंड, मिजोरम, पंजाब, तेलंगाना, गोवा, हैदराबाद में निरंतर युद्ध जारी है और भारत ने अपने ही आवाम के खिलाफ सेना की तैनाती की और युद्ध किया। अरुंधति का पाकिस्तान प्रेम तब झलक उठा जब वो बोली कि पाकिस्तान ने अपनी सेना को उस तरह से अपने देश की जनता के खिलाफ इस्तेमाल नहीं किया जिस तरह से लोकतांत्रिक भारत ने किया। उनका ये वीडियो सामने आते ही भारत और बांग्लादेश में तीखी प्रतिक्रिया हुई। बांग्लादेश के लोगों ने अरुंधति को 1971 के महीनों में पाकिस्तानी सेना के पूर्वी बंगाल में किए कुकृत्यों की याद दिलानी शुरू कर दी। एक के बाद एक अत्याचार की फेहरिश्त सामने आने लगी। दरअसल अरुंधति जैसे लोग भारत के खिलाफ बोलकर अंतराष्ट्रीय सुर्खियां बटोरते हैं। अरुंधति की इस चर्चा को सुनते हुए मुझे 24 फरवरी 2016 को तत्कालीन मानव संसाधन मंत्री स्मृति इरानी का लोकसभा में दिया भाषण याद आ गया। स्मृति इरानी के भाषण के पहले तृणमूल कांग्रेस के सांसद डॉ सुगतो बोस ने भाषण दिया था और उनके भाषण पर सोनिया गांधी और राहुल गांधी मुग्ध थे, तालियां बजा रहे थे। जब स्मृति इरानी के बोलने की बारी आई तो उन्होंने भी सुगतो बोस के भाषण की सराहना की लेकिन सोनिया और राहुल गांधी के सामने बोस की बहन शर्मिला बोस की किताब के कुछ पन्ने खोल दिए थे। जिस सुगतो बोस के भाषण पर कांग्रेसी लहालोट हो रहे थे उन्हीं की बहन इतिहासकार शर्मिला बोस ने एक किताब लिखी थी, द डेड रेकनिंग। उस किताब में शर्मिला बोस ने लिखा है कि बांग्लादेश मुक्ति संग्राम एक भ्रांति है, मिथ्या है, पाकिस्तानी सेना ने पूर्वी बंगाल के लोगों पर किसी तरह का कोई अत्याचार किया ही नहीं था, जिसको बचाने के लिए इंदिरा गांधी गई थीं। दरअसल अरुंधति ने कोई नया राग नहीं छेड़ा है बल्कि इस तरह के जहर बुझे बयान या लेखन लंबे समय से होते रहे हैं। बहुधा पाकिस्तान के पक्ष में।
अरुंधति तो इतने पर ही नहीं रुकी उसने तो भारत की इस तरह की तस्वीर पेश की जैसे यहां दलितों और अल्पसंख्यकों को सेना की मदद से कुचला जा रहा हो, उनके खिलाफ सेना का उपयोग कर उनका दमन किया जा रहा हो। अरुंधति अपने भाषण में प्रश्न उठाती हैं कि ये कौन लोग हैं जिनके खिलाफ भारत ने युद्ध झेड़ रखा है या युद्ध करना तय किया है। फिर खुद ही उसका उत्तर देती है पूर्वोत्तर में आदिवासियों, कश्मीर और हैदराबाद में मुसलमानों, तेलंगाना में आदिवासियों, गोवा में क्रिश्चियन और पंजाब में सिखों के खिलाफ। इतना बोलते बोलते वो यह भी कह जाती हैं कि ये सब अपर कास्ट हिंदू स्टेट की तरफ से किया जा रहा है। अब इस अंतिम वाक्य से ही उनका एजेंडा साफ हो जाता है। ये सीधे-सीधे समाज को बांटनेवाला बयान है, देश के खिलाफ वहां की जनता को उकसानेवाला बयान है। जब वो ये बात कह रही थीं तब वो भूल गईं थीं कि उस वक्त देश को तीन अल्पसंख्यक समुदाय के लोग ही चला रहे थे, मनमोहन सिंह जो उस वक्त देश के प्रधानमंत्री थे वो सिख समुदाय से आते हैं, सत्ताधारी दल कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी क्रिश्चियन और उनके राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल मुसलमान। क्या तब किसी कोने से ये आवाज आई थी कि बहुसंख्यक हिंदुओं के देश में तीन सबसे ताकतवर शख्सियत जो सत्ता चला रहे थे वो अल्पसंख्यक समुदाय के थे। नहीं। आज भी इस तथ्य को रेखांकित करना इस वजह से आवश्यक हो गया क्योंकि अरुंधति के बयान को पाकिस्तान अपने हक में प्रचारित करने में लगा है। अरुंधति जिन माओवादियों और अलगाववादियों को भारत की आवाम मान रही हैं उनकी आस्था भारत में कभी नहीं रही। वो भारत को तोड़ने का सपना देखते रहे और किसी भी संप्रभु राष्ट्र को अपने देश की संप्रुभता और अखंडता को अक्षुण्ण रखने का अधिकार है। अब भी अरुंधति के पक्ष में लेख लिखे जा रहे हैं लेकिन उनके समर्थक ये भूल गए हैं कि भारत में कभी भी माओवादियों या नक्सलियों के खिलाफ सेना का इस्तेमाल नहीं किया गया।
दरअसल अरुंधति जैसे लोगों की, उन जैसे लेखकों की बुनियाद ही भारत वोध पर टिकी है। वो वैश्विक मंचों पर जाकर भारत में हो रहे तमाम तरह के कथित अत्याचारों पर, कथित मानवाधिकार हनन पर भाषण देती रही हैं। उनके समर्थन में लेख लिखनेवाले कुछ लोग अभी हाल में प्रकाशित उनकी किताब मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैप्पीनेस से उदाहरण देकर उनका बचाव करने की कोशिश करने में लगे हैं। जब ये पुस्तक प्रकाशित हुई थी तो इसको फिक्शन कहकर प्रचारित-प्रसारित किया गया था, बुकर प्राइज के लिए उसको फिक्शन कैटेगरी में ही नामित भी किया गया था। अब उनके समर्थक उस उपन्यास को ही तथ्य के तौर पर पेश कर रहे हैं। अगर हम अरुंधति के समर्थकों के तर्कों मान भी लें तो उस किताब में और भी बूहुत कुछ लिखा गया है। अरुंधति का उपन्यास द मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैप्पीनेस’ एक लड़के की कहानी से शुरू होता है। घटनाओं के बाद जैसे ही पात्रों के बीच संवाद शुरू होता है वैसे ही लेखक पर एक्टिविस्ट हावी हो जाता है और वो अपनी वैचारिकी का बोझ पाठकों पर लादने लग जाती है। फिक्शन की आड़ लेकर जब अरुंधति कश्मीर के परिवेश में घुसती हैं वो अपने पूर्वग्रहयुक्त नजरिए को सामने रखती नजर आती हैं। कश्मीर के परिवेश की भयावहता का वर्णन करते हुए वो लिखती हैं – ‘मौत हर जगह है, मौत ही सबकुछ है, करियर, इच्छा, कविता, प्यार मोहब्बत सब मौत है। मौत ही जीने की नई राह है । जैसे जैसे कश्मीर में जंग बढ़ रही है वैसे वैसे कब्रगाह भी उसी तरह से बढ़ रहे हैं जैसे महानगरों में मल्टी लेवल पार्किंग बढ़ते जा रहे हैं।‘ कश्मीर की समस्या में उनको जंग नजर आ रहा था। अपनी सैद्धांतिकी को फिक्शन की चाशनी में लपेटकर पेश कर रही हैं ताकि निकल गया तो ठीक है पाठकों के दिमाग में बात घर कर जाएगी और अगर ज्यादा आलोचना हुई तो उसको फिक्शन कहकर पल्ला झाड़ लिया जाएगा। उस उपन्यास का एक पात्र बिप्लब दासगुप्ता एक सरकारी मुलाजिम है, जो जमकर शराब पीता है, और कश्मीर में पदस्थापित है। उनकी हरकतों को भी अरुंधति ने विषय बनाया है। संकेत ये कि सरकारी मुलाजिम ठीक व्यवहार नहीं करते। उस उपन्यास में अरुंधति ने बताया है कि किस तरह परिस्थियों के चलते कश्मीरी युवक आतंकवादी बन जाता है, कहीं भी आतंक की असली वजह पर , उसकी जमीन तैयार करने में पाकिस्तान की भूमिका पर जोर डाला है, ऐसा याद नहीं पड़ता। अब भले ही अरुंधति ने अपने भारतीय सेना की तैनाती को लेकर दिए अपने बयान पर माफी मांग ली है लेकिन जो जहरीली सोच अंदर तक घुसी है उसका क्या किया जा सकता है, इसपर विचार करना चाहिए। मशहूर रूसी लेखक सोल्झेनित्सिन ने लिखा था- कम्युनिस्ट विचारधारा एक ऐसा पाखंड है जिससे सब परिचित हैं, नाटक के उपकरणों की तरह उसका इस्तेमाल भाषण के मंचों पर होता है । तो क्या ये माना जाए कि अरुंधति वो पाखंड रच रही थीं और भाषण के मंच का इस्तेमाल कर रही थी।

Wednesday, August 28, 2019

साहित्य की अप्रतिम अमृता


अमृत कौर। सौ साल पहले एक ऐसी शख्सियत का जन्म हुआ था जिसने अपनी लेखनी और अपने व्यक्तित्व से भारतीय साहित्य को गहरे तक प्रभावित किया और दुनिया उसको अमृता प्रीतम के नाम से जानती है। उन्होंने जो जिया उसको ही लिखा । अविभाजित भारत में पैदा हुई अमृता को साहित्य का संस्कार विरासत में मिला। उनके पिता एक साहित्यिक पत्रिका के संपादक थे और माता शिक्षिका। जब ये बहुत कम उमर् की थीं तो इनकी मां का निधन हो गया और तब ही इन्होंने किताबों को अपना दोस्त बना लिया था। जब उनकी मां का विधन हुआ तो वो ग्यारह साल की थी और अपने पिता के साथ लाहौर चली गई थीं। अमृता को नजदीक से जाननेवालों का मानना है कि मां के असमय निधन की वजह से उनके स्वभाव में विद्रोह के बीज पड़ गए। जब भारत-पाकिस्तान का विभाजन हुआ तो वो लाहौर से दिल्ली आईं। विभाजन की त्रासदी और दर्द ने उनके विद्रोह को और हवा दी। तबतक उऩकी शादी प्रीतम सिंह से हो चुकी थी। लाहौर में रहते हुए अमृता प्रीतम रेडियो में काम करने लगी थी। उनका रेडियो में काम करना उनके परिवार को रास नहीं आ रहा था। एक दिन उऩके एक बुजुर्ग रिश्तेदार ने उनसे पूछा कि तुम्हें रेडियो में कितने पैसे मिलते हैं तो अमृता ने कहा दस रुपए प्रतिमाह। बुजुर्ग ने तपाक से कहा कि वो रेडियो की नौकरी छोड़कर घर में रहा करें और वो उनको हर महीने बीस रुपए दिया करेंगे। अमृता प्रीतम ने साफ मना कर दिया और कहा कि उनको अपनी आजादी और आत्मनिर्भर होना पसंद है। अमृता प्रीतम ने एक जगह लिखा भी है कि कई बार बच्चों के मां-बाप उनको डरा कर रखना चाहते हैं लेकिन वो नहीं जानते कि डरा हुआ बच्चा डरा हुआ समाज का निर्माण करता है। इसी सोच के साथ अमृता सृजन करती थीं। मात्र सत्रह साल की उम्र में इनकी पहली रचना प्रकाशित हो गई थी। फिर ये सिलसिला थमा नहीं था और वो निरंतर लिखकर भारतीय समाज में व्याप्त रूढ़ियों को चुनौती देती रहीं। उनका लिखा और उनके आजाद ख्याल समाज के ठेकेदारों को चुनौती देते थे, लिहाजा उनका विरोध भी होता था।
अमृता प्रीतम जब जीवित रहीं तो उनकी रचनाओं को लेकर उनके जीवन को लेकर विरोध होता रहा, उनके निधन के बाद उनके प्यार के चर्चे होते रहे, पहले सज्जाद हैदर के साथ, फिर साहिर के साथ और बाद में इमरोज के साथ। यह साहित्य की विडंबना ही कही जाएगी कि अमृता प्रीतम की रचनाओं पर उतना काम नहीं हुआ जितने की वो हकदार थीं। अमृता प्रतीम को ज्ञानपीठ सम्मान मिला, उनको साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिला, उनको पद्मश्री से नवाजा गया। दुनियाभर के अन्य सम्मान उनको मिले। उनकी आत्मकथा रसीदी टिकट बेहतरीन कृति है जिसमें बहुत बेबाकी और साहस के साथ अमृता पाठकों को अपनी जिंदगी के उन इलाकों में लेकर भी गईं जहां आमतौर पर लेखक जाने से हिचकिचाते हैं या जाते ही नहीं हैं। उनके पाठक उनकी रचनाओं से बेइंतहां मोहब्बत करते थे। लेकिन उनके समकालीन लेखकों को उनके साथी रचनाकारों को उनकी कामयाबी रास नहीं आती थी। इन सबसे बेफिक्र अमृता अपने लेखऩ में और इमरोज के साथ प्यार में डूबी रही थीं।
अमृता प्रतीम विभाजन के बाद दिल्ली आ गईं और अपने अंतिम दिनों तक वो हौज खास की अपनी कोठी में रहीं। दिल्ली में उनकी जिंदगी का सबसे महत्वपूर्ण कालखंड गुजारा, संघर्ष और सम्मान का कालखंड। यहां उनके और इमरोज का प्यार परवान चढ़ा। एक ऐसा रिश्ता जिसपर हजारों पन्ने लिखे गए लेकिन उस प्यार को परिभाषित नहीं किया गया। शुरुआत में जब इमरोज पटेल नगर में रहते थे और उर्दू की मशहूर पत्रिका शमां में काम करते थे तो कई बार अमृता उनके मिलने उनके दफ्तर पहुंच जाती थीं। इमरोज ने दफ्तर में अपने बैठने की जगह के आसपास कई महिलाओँ के चित्र बनाकर रखे हुए थे, वो पत्रिका के लिए भी महिलाओँ के चित्र बनाते थे। एक दिन अमृता ने इमरोज से पूछा कि वो औरतें के चित्र तो बनाते हैं, उनके अपनी कूची से उऩके चेहरे में इस तरह से रंग भर देते हैं कि वो बेहद खूबसूरत दिखाई देती हैं लेकिन क्या कभी वूमन विद ए माइंड चित्रित किया है? इमरोज के पैस कोई जवाब नहीं था। इमरोज ने कला के इतिहास को खंगाला लेकिन उन्हें इस तरह की औरत का कोई चित्र नहीं मिला, तब जाकर उनकी समझ में आया कि अमृता ने कितनी बड़ी बात कह दी, औरतों को सदियों से जिस्म ही समझा गया उनके मन को समझने की कोशिश नहीं हुई। इमरोज और अमृता का जो प्यार था उसमें एक खास किस्म का बौद्धिक विमर्श भी दिखता है जिसको भी व्याख्यायित करने की कोशिश की जानी चाहिए। 1958 का एक प्रसंग है तब इमरोज दिल्ली के पटेल नगर इलाके में रहते थे। दोनों मिलते और पैदल ही घूमा करते इसकी एक बानगी उमा त्रिलोक ने अपनी किताब, अमृता इमरोज में पेश की है। इमरोज ने उनको बताया- हम घूमते रहे, घूमते रहे हलांकि हमें जाना कहीं नहीं था। धरती पर बिखरे फूलों की तरह हम भी उनपर बिखर गए। आसमान को कभी खुली आंखों से देखते तो कभी बंद करके। पुरानी इमारतों की सीढ़ियों पर चढञते उतरते हम एक ऐसी इमारत की छत पर पहुंच गए, जहां से यमुना दिखाई देती थी। अमृता ने मुझसे पूछा क्या तुम पहले किसी और के साथ यहां आए हो? मैंने कहा मुझे नहीं लगता कि मैं मैं कभी भी कहीं भी किसी के साथ गया हूं। हम घूमते रहे और जहां भी दिल चाहा, रुक कर चा पी लेते सबकुछ खूबसूरत था। फिर समय का चक्र चला और इमरोज और अमृता एक साथ रहने लगे। अमृता के दो बच्चे थे जिन्हें इमरोज स्कूटर पर स्कूल छोड़ने जाते थे लेकिन आए दिन पुलिस उनको पकड़ लेती और चालान काट देती थी। फिर दोनों ने तय किया कि वो एक कार खरीद लेते हैं। दोनों ने पांच-पांच हजार रुपए लगाए और दस हजार रुपए में फिएट कार खरीद ली। जब रजिस्ट्रेशन करवाने गए तो दोनों के नाम से रजिस्ट्रेशन का आवेदन दिया। अफसर ने पूछा कि दोनों के बीच रिश्ता क्या है तो उनको बताया गया कि दोनों दोस्त हैं। वो ये मानने को तैयार नहीं था कि एक महिला और एक पुरुष दोस्त भी हो सकते हैं। खैर किसी तरह से रजिस्ट्रेशन संभव हुआ।
अमृता प्रीतम को ज्योतिष पर भरोसा था या नहीं ये कहना मुश्किल है लेकिन इमरोज के साथ रहने के पहले वो एक ज्योतिषी से ये जानने पहुंची थीं कि उनका ये रिश्ता बनेगा या नहीं। उमा त्रिलोक की पुस्तक में इस बात का उल्लेख है कि अमृता की इस जिज्ञासा को सुनने के बाद ज्योतिषी ने आड़ी-तिरछी रेखाएं खींची और कहा कि ये रिश्ता सिर्फ ढाई घंटे का है। गुस्से में अमृता ने कहा कि ऐसा नहीं हो सकता। तब ज्योतिष ने और गणना की और कहा कि अगर ढाई घंटे का नहीं है तो ढाई दिन या अधिकतम ढाई साल तक चलेगा। खिन्न मन से अमृता ने कहा था कि अगर ढाई ही करना है तो ढाई जन्म क्यों नहीं। ज्योतिषी के पास कोई उत्तर नहीं था। वो हमेशा ये भी कहा करती थीं कि उनकी कुंडली में सातवें स्थान पर चंद्रमा था बाद में उसकी जगह पर आकर इमरोज बैठ गए। अमृता और इमरोज के प्रेम पत्र भी साहित्य की थाती हैं। एक पत्र की भाषा और भाव दोनों से इसका अंदाज लग सकता है। एक बार इमरोज मुंबई गए तो अमृता ने उनको एक खत लिखा- तुम जितनी सब्जी लेकर दे गए थे, वो खत्म हो गई है, जितने फल लेकर दे गए थे वो भी खत्म हो गए हैं। फ्रिज खाली पड़ा हुआ है। मेरी जिंदगी भी खाली होती हुई लग रही है- तुम जितनी सांस छोड़ गए थे वे खत्म हो रही हैं...  इस तरह के दर्जनों खत हैं जिसमें प्रेम के उन बिंबों का उपयोग किया गया है जो अप्रतिम है।
दिल्ली में रहते हुए अमृता प्रीतम और हिंदी की लेखिका कृष्णा सोबती के बीच ऐतिहासिक विवाद हुआ और मामला अदालत तक पहुंचा था। दरअसल हुआ ये था कि अमृता प्रीतम की एक कृति छपी जिसका नाम था हरदत्त का जिंदगीनामा। उनके किताब को पाठक हाथों-हाथ लेते थे। कृष्णा सोबती को लगा कि अमृता प्रीतम ने अपनी तिताब का शीर्षक उनके चर्चित उपन्यास जिंदगीनामा से उड़ा लिया है। उन्होंने अमृता प्रीतम पर यह आरोप लगाते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया। जब ये विवाद उठा तो देशभर के साहित्य जगत में इसकी खूब चर्चा हुई थी। पक्ष-विपक्ष में लेखकों ने लेख आदि भी लिखे थे। गोष्ठियों में भी इसकी खूब चर्चा होती थी। जब केस चल रहा था तब कई लेखकों ने कृष्णा सोबती को समझाने की कोशिश की थी कि जिंदगीनामा शब्द का प्रयोग पहले भी हुआ है और फारसी में इस शीर्षक से कई पुस्तकें मौजूद हैं। मशहूर लेखक खुशवंत सिंह ने भी तब कहा था कि श्रद्धेय गुरू गोविंद सिंह की जीवनी भी उनके एक शिष्य ने जिंदगीनामा के नाम से लिखी थी जो कृष्णा सोबती के उपन्यास से काफी पहले छपी थी। लेकिन कृष्णा जी केस लड़ने पर अडिग रहीं तब अमृता प्रीतम ने भी ठान लिया कि वो इस लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाएंगी। ये केस पच्चीस वर्षों तक चला था। कृष्णा जी की बद्धिक संपदा को लेकर संघर्ष करने की जिंद को अमृता ने परास्त किया और इसका फैसला अमृता प्रीतम के पक्ष में आया। लेकिन वो इस फैसले को देख-सुन नहीं सकीं। वो तबतक दुनिया छोड़कर जा चुकी थीं। दिल्ली में अमृता प्रीतम ने ना केवल सृजनात्मक शोहरत हासिल की बल्कि इसी धरती पर उनकी जिंदगी पूर्ण भी हुई।

Saturday, August 24, 2019

बहिष्कार से नहीं संवाद से बनेगी बात


लगभग एक पखवाड़े पहले पटना में रहनेवाले हिंदी के उपन्यासकार रत्नेश्वर ने फेसबुक पर एक टिप्पणी लिखी, इस समय हिन्दी के कई सुपर हिट गीत लिखने वाले मनोज मुंतशिर के साथ एक शाम। मनोज मुंतशिर ने तेरी गालियां से लेकर तेरे संग यारा, ‘मेरे रश्के-कमर आदि अनेक लोकप्रिय गीत लिखे हैं। इनके गीत अभी क्या हिन्दी और क्या अहिन्दी सबकी जुबान पर चढ़े हुए हैं। कलम श्रृंखला के अंतर्गत चाणक्य होटल में मनोज मुंतशिर मुखातिब थे। कार्यक्रम खत्म होने के बाद कार्यक्रम संयोजक एवं संचालिका अन्विता प्रधान मेरे पास आईं और मुझे धन्यवाद देते हुए कहा- 'आपका धन्यवाद कि आप आए। अन्यथा हिन्दी के एक भी प्रतिष्ठित लेखक का नहीं आना खटकता। अब सवाल यह है कि हिन्दी का ढिंढोरा पीटने वाले, हिन्दी से यश पाने वाले, हिन्दी का पुरस्कार लेनेवाले स्वनामधन्य लेखक इसमें शामिल क्यों नहीं हुए! हिन्दी के गंभीर लेखक हिन्दी सिनेमा को स्तरहीन मानते हैं और उसे अपने साहित्य के बराबर का दर्जा नहीं देते। यह आज से नहीं हमेशा से है। जिस सिनेमा ने हिन्दी को हिन्दी भाषी क्षेत्रों में ही नहीं अहिन्दी आमजन तक पहुंचाने में जबरदस्त भूमिका निभाई। वह हमारे लिए अछूत जैसा क्यों है? हिन्दी के गंभीर लेखकों का अपना महत्त्व है पर भाषा को जन-जन तक पहुंचाने का काम हिन्दी सिनेमा ने उनसे कहीं ज्यादा किया है। अन्यथा संस्कृत के तो एक-से-एक प्रकांड विद्वान हमारे बीच रहे हैं पर वह क्यों आमजन के बीच सिर्फ मंत्रों में सिमट कर रह गई। हिन्दी की सर्वमान्य समृद्धि चाहिए तो सबको समान दर्जा देना ही होगा। अहिन्दी भाषियों की टूटी फूटी हिन्दी के उपहास से भी बचना होगा। अन्यथा ढोल पीटते रह जाएंगे और हिन्दी संस्कृत की राह चल पड़ेगी। रत्नेश्वर की टिप्पणी के उत्तरार्ध से असहमि होते हुए मुझे लगा कि फिल्म को लेकर तथाकथित गंभीर साहित्याकारों के मन में जो उपेक्षा भाव की बात उन्होंने की है उसको रेखांकित किया जाना आवश्यक है। पटना के कथित गंभीर साहित्यकारों की कलम कार्यक्रम में अनुपस्थिति की रत्नेश्वर की टिप्पणी का वरिष्ठ लेखिका उषाकिरण खान ने प्रतिवाद किया। ठीक किया, लेकिन कलम के हर कार्यक्रम में जिनकी आवश्यक उपस्थिति होती है उन सभी का ना होना रत्नेश्वर की आशंका को पुष्ट ही करता है। मनोज मुंतशिर हमारे दौर के महत्वपूर्ण कवि-गीतकार हैं। उनकी कविताओं का संग्रह जागरण बेस्टसेलर की सूची में शामिल हो चुका है। उनके गीत तो लोकप्रिय होते ही हैं। उनके कार्यक्रम में पटना के कथित गंभीर साहित्यकारों का ना आना साहित्यकारों के अहंकार को भी दर्शाता है। ये ऐसा अहंकार है जो आपको अघोषित बहिष्कार करने के लिए बाध्य करता है। जब आप किसी का बहिष्कार करते हैं तो आप संवाद बाधित करते हैं। संवाद बाधित होने से लोकतंत्र कमजोर होता है। लेकिन विचारधारा विशेष के लेखकों को लोकतंत्र से क्या देना वो तो विदेशों में बैठे अपने आकाओं के इशारे पर साहित्यिक कदमों को भी तय करते हैं। यह अलग बात है कि अब उनके विदेशी आका थोड़े कमजोर हो गए हैं और दिशा निर्देश के साथ धन नहीं भेज पाते हैं तो उनके समर्थक थोड़े उदासीन हो गए हैं। लेकिन अंग्रेजी की एक कहावत है न कि पुरानी आदतें देर से जाती हैं, तो ये भी अबतर पुरानी आदतों से उबर नहीं पाए हैं। मनोज मुंतशिर के कार्यक्रम को लेकर पटना के साहित्यकारों की उदासीनता खेदजनक है। खास तौर पर उन लेखकों की उदासीनता जो बिना नागा कलम के कार्यक्रम में उपस्थित रहते थे। इस तरह की कई टिप्पणी रत्नेश्वर के पोस्ट पर भी है।
आजकल वामपंथियों के प्रिय लेखक अशोक वाजपेयी भी फिल्मों पर या फिल्मी शख्सियतों पर लेखन को दोयम दर्जे का ही मानते रहे हैं, कुमार शाहनी जैसे फिल्मकारों को छोड़कर ।एक सम्मान समारोह में उन्होंने लता पर लिखी किताब के बारे में बेहद हल्की टिप्पणी की थी। यह एक प्रकार का आभिजात्य भी है। एक बार अशोक वाजपेयी ने ज्ञानपीठ पुरस्कार समारोह में अमिताभ बच्चन को बुलाने को लेकर भी तंज किया था। तब भी खासा विवाद हुआ था। लेकिन अशोक वाजपेयी यह भूल जाते हैं कि अमिताभ बच्चन का अभिनय कला में तो अप्रतिम योगदान है ही हिंदी के प्रचार प्रसार में भी वो किसी भी साहित्यकार से अधिक योगदान कर रहे हैं। अमिताभ बच्चन इस बात पर जोर देते हैं कि उनको स्क्रिप्ट देवनागरी में दी जाए जबकि बॉलीवुड में ज्यादातर स्क्रिप्ट रोमन में लिखी जाती हैं। इसी तरह से भोपाल में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन में अमिताभ को बुलाए जाने पर हिंदी के लेखकों ने बहुत अनाप शनाप लिखा था। सोशल मीडिया पर बेहद सक्रिय एक अध्यापक-लेखक ने उस समय लिखा था कि- हिंदी साहित्य में अभिनेता अमिताभ बच्चन के योगदान के बारे में गूगल से लेकर राष्ट्रीय पुस्तकालय तक पर कहीं कोई रचना नहीं मिलेगी । इसके बावजूद उनको मोदी सरकार ने दसवें विश्व हिंदी सम्मेलन के समापन सत्र में आमंत्रित किया ।यह संकेत है कि मोदी जी की निष्ठा साहित्य में नहीं मुंबईया सिनेमा में है। अब इतने विद्वान लेखक को क्या बताया जाए कि ये विश्व हिंदी साहित्य सम्मेलन नहीं था । मैं यह मानकर चलता हूं कि उनको इतना तो ज्ञान होगा ही कि साहित्य और भाषा में थोड़ा फर्क तो है । रही बात अमिताभ बच्चन के हिंदी साहित्य में योगदान की तो ना तो अमिताभ बच्चन ने और ना ही उस वक्त की सरकार ने कभी ये दावा किया था कि बच्चन साहब बड़े साहित्यकार हैं । पर हिंदी के प्रचार प्रसार को लेकर अमिताभ के प्रयास सराहनीय है । वयोवृद्ध फिल्मी गीतकार गुलजार की भी यही पीड़ा है कि हिंदी साहित्य जगत के कथित गंभीर आलोचक और कवि उनको कवि नहीं मानते। गुलजार की ये पीड़ा तो कई बार सार्वजनिक रूप से झलक भी जाती है। दरअसल ये हिंदी के इस तरह के लेखक ये समझ नहीं पा रहे हैं कि हिंदी फिल्मों और टेलीविजन सीरियलों ने उनकी भाषा को कितना विस्तार दिया। मुझे याद है कि 2012 में जोहिनसबर्ग में विश्व हिंदी सम्मेलन हुआ था। जोहिनसबर्ग में जिस टैक्सी से हमलोग एयरपोर्ट से होटल जा रहे थे उसका ड्राइवर वहां के लोकल एफएम चैनल लोटस पर हिंदी के गाने सुन रहा था। जब मैंने उन, पूछा कि क्या वो हिंदी गाने सनझते हैं तो उसने अंग्रेजी में उत्तर दिया था कि वी डोंट अंडरस्टैंड हिंदी बट वी एंजॉय हिंदी सांग्स। कोई भी भाषा जब किसी दूसरी भाषा के लोगों को आनंद देने लगे तो समझिए कि उस भा। की संप्रेषणीयता अपने उरूज पर है। विष्व हिंदी सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में मॉरिशस के उस वक्त के कला और संस्कृति मंत्री चुन्नी रामप्रकाश ने भी ये माना था कि हिंदी के प्रचार प्रसार में बॉलीवुड फिल्में और टीवी पर चलनेवाले हिंदी सीरियल्स का बड़ा योगदान है। उन्होंने सभा को हिंदी में संबोधित कर मजमा तो लूटा ही था, वहां मौजूद सभी लोगों का दिल भी जीत लिया था। चुन्नी रामप्रकाश ने सार्वजनिक तौर पर स्वीकार किया था कि उनकी जितनी भी दक्षता हिंदी में है वो हिंदी फिल्मों और टीवी की बदौलत। लेकिन हिंदी के कथित गंभीर साहित्यकार इस बात को कभी नहीं मानते। उनका तो तर्क ये होता है कि हिंदी सीरियल्स और सिनेमा में उपयोग में लाई जानेवाली भाषा हिंदी का नाश कर रही है। इस तरह की धारणा हिंदी की सबसे बड़ी शत्रु है।
हिंदी सिनेमा एक गंभीर विधा है और सिनेमा पर लेखन रचनात्मक साहित्य की श्रेणी में आता है। सिनेमा के लिए लिखनेवाले भी उतना ही महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं जितना कथित तौर पर गंभीरता से उपन्यास या कविता लिखने वाले हिंदी के लेखक या कवि। हिंदी के प्रचार प्रसार में फिल्मों का बहुत योगदान है । दरअसल फिल्मी कलाकारों को लेकर हिंदी के वामपंथी लेखक कभी संजीदा नहीं रहे । फिल्म वालों को बुर्जुआ संस्कृति का पोषक मानकर उनकी लगातार उपेक्षा की जाती रही । हिंदी फिल्मों के बड़े से बड़े गीतकार को हिंदी का कवि नहीं माना गया जबकि विचारधारा का झंडा उठाकर घूमनेवाले औसत कवियों को महान घोषित कर दिया गया । मनोज मुंतशिर के कार्यक्रम में कथित गंभीर साहित्यकारों का नहीं आना इसी मानसिकता का प्रकटीकरण था। आज जरूरत इस बात की है कि वामपंथी विचारधारा के लेखकों को किसी को भी अस्पृश्य मानने की अपनी मानसिकता से बाहर निकलें, हर तरह की विधा को महत्व दें और हर तरह की विचारधारा के साथ संवाद करें। अस्पृश्यता के सिद्धांत को अपनाकर वामपंथियों ने अबतक अपना बहुत नुकसान कर लिया है और अगर वक्त रहते नहीं चेते तो नुकसान भी नदी के कटान की तरह तेजी से उनकी बची-खुची जमीन को लील जाएगा।

सोबती पर लिखूंगी संस्मरण- मुद्गल


चित्रा मुद्गल हिंदी की वरिष्ठ कथाकार हैं। अपने जीवन में पचहत्तर बसंत देख चुकी चित्रा मुद्गल पिछल छह दशक से सृजनरत हैं। उनको साहित्य अकादमी समेत कई प्रतिष्ठित पुरस्कार मिल चुके हैं। उन्होंने गुजराती और मराठी में भी कविताएं लिखी हैं। ुउन्होंने दिल्ली शहर के अपने अनुभव मुझसे साझा किए। 
सबसे पहले आपको एक दिलचस्प बात बताऊं क्योंकि उसका दिल्ली से गहरा संबंध है। मेरे पिताजी बड़े जमींदार थे, मां प्रतापगढ़ इलाके के बड़े तालुकेदार घराने की थी, दादी अमेठी की बडे परिवार से थीं। ऐस में जब मैंने फरवरी 1965 में अवधनारायण मुदगल से शादी की तो हमारे पूरे खानदान में हंगामा मच गया। किसी के गले ये बात उतर ही नहीं रही थी कि हमारे परिवार की लड़की अपनी मर्जी से शादी कर लेगी वो भी अपनी जाति से बाहर के लड़के से। हमारे घर में हमेशा ये कहा जाता कि जो भी लड़की ऐसी जुर्रत करेगी उसको आंगन के बाहर के ढंके हुए कुंए में डाल दिया जाएगा और कह दिया जाएगा कि पांव फिसलने से कुंए में गिर गई। जब मैंने अवध से शादी की तो मेरे पिताजी बहुत नाराज हुए। मेरे प्रेम विवाह ने उनको अंदर तक हिला दिया था और वो इसको स्वीकार नहीं कर पा रहे थे। वो इस जुगत में लगे हुए थे कि अवध को किसी तरह से जेल भिजवा दें और फिर मेरी शादी अपनी मर्जी से करवा सकें। वो सोच रहे थे कि जैसे ही अवध जेल जाएगा तो लड़की के सर से मोहब्बत का खुमार उतर जाएगा। हम पिता के सामर्थ्य से डरकर अप्रैल 1965 में मुंबई से दिल्ली आ गए। दिल्ली आकर सबसे पहले सर्वेश्वर भाई साहब के घर पर एक महीना रुके। उसके बाद राजेन्द्र यादव और मन्नू भंडारी के साथ भी महीने भर रुके। लोग कहते हैं कि मैं और अवध शादी कर भागकर दिल्ली आ गए थे। ये बात गलत है। हमें भागने  की जरूरत ही नहीं थी। दो महीने में ही हम फिर वापस मुंबई लौट गए थे। बाद में जब मेरे पिता बीमार पड़े और कोमा में जाने के पहले मेरा हाथ पकड़कर मुझसे कहा कि मैं सोचता था कि मां-बाप अपने बच्चों के लिए सुख खरीद सकते हैं पर अब मुझे लगता है कि सुख खरीदा नहीं जा सकता था। ये मेरे लिए बहुत ही भावुक क्षण था।
1979 से लेकर 1982 का दौर मेरे लिए बहुत उथल पुथल का रहा। मेरे पति अवध सारिका पत्रिका में काम करते थे। प्रबंधन ने सारिका को दिल्ली शिफ्ट करने का फैसला लिया। प्रबंधन कमलेश्वर से छुट्टी पाना चाहता था। उनको लगता था कि कमलेश्वर नौकरी तो सारिका की करते हैं लेकिन जुटे फिल्म लिखने में रहते हैं। इसको खत्म करने के लिए सारिका को मुंबई से दिल्ली शिफ्ट कर दिया गया। अवध को सारिका का सहायक संपादक बनाकर दिल्ली भेजा गया। जब हम दिल्ली आए तो लारेंस रोड में रहने लगे। पर मेरा मुंबई आना जाना-लगा रहता था। बच्चों की पढ़ाई थी और मैं भी वहां ट्रेड यूनियन में सक्रिय थी। लारेंस रोड के बाद हमारा नया ठिकाना बना था दरियागंज, वहां भी हम रहे। जब अवध को सारिका का संपादक बनाया गया तो हमें ग्रेटर कैलाश में शिफ्ट करने का विकल्प दिया गया था, पर हमारे दोस्तों ने सलाह दी कि अपने जैसे लोगों के बीच रहना चाहिए। फिर हमलोग मयूर विहार फेज 1 में शिफ्ट कर गए। उस समय मयूर विहार में अदभुत माहौल था। काला जल जैसा कालजयी उपन्यास लिखने वाले शानी के फ्लैट पर हर दिना लेखकों का जमावड़ा लगता था। साहित्यिक अड्डेबाजी होती थी, कहानियों से लेकर दुनिया जहान की बातें होती थीं। शाऩी के घऱ होनेवाली उस बैठक में विष्णु खरे और प्रयाग शुक्ल लगभग नियमित थे, बाद में विजयमोहन सिंह भी आने लगे। शानी की पत्नी मुझे टिफिन में अच्छा खाना बनवाकर भेजती थी। वो मजाक में कहती भी थीं कि बेचारी ठकुराइन को ब्राह्मण से शादी कर घास-फूस खाना पडता है। मयूर विहार में मैंने कई घर बदले लेकिन आजतक वो इलाका छोड़ा नहीं। मैं कृष्णा सोबती जी के पड़ोस में भी लंबे समय तक रही और उनकी कई निजी बातों की साक्षी रही। मेरे नए उपन्यास में इऩ बातों पर लिखने की सोच रही हूं।   
(अनंत विजय से बातचीत पर आधारित)