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Saturday, January 23, 2021

राजनीति का औजार बनते वेब सीरीज


वेब सीरीज ‘तांडव’ को लेकर पिछले दिनों खूब हंगामा हुआ। केस मुकदमा तक बात पहुंची। वेब सीरीज से जुड़े लोगों से पुलिस ने पूछताछ की। उनके बयान दर्ज हुए। पुलिस की पूछताछ के पहले हो रहे विरोध की वजह से निर्माताओं ने माफी भी मांगी। हर बार की तरह इस बार भी भावनाएं आहत होने की बात उठी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से लेकर कलात्मक स्वतंत्रता की बात भी की गई। इन तमाम विवादों और कोलाहल के बीच निर्माताओं ने वेब सीरीज में आपत्तिजनक प्रसंगों को हटाने की बात की और सूचना और प्रसारण मंत्रालय को उनके समर्थन और मार्गदर्शन के लिए धन्यवाद भी दिया। हो सकता है कि इस वेब सीरीज में से कुछ अंश हटा दिए गए हों। लेकिन ‘तांडव’ पर उठे विवाद से जो प्रश्न उठे हैं वो अभी अनुत्तरित हैं। इन प्रश्नों पर कलाकारों को और कला से जुड़े लोगों को खुले दिल से बहस करनी चाहिए। वेब सीरीज ‘तांडव’ में हिंदू धर्म के देवी देवताओं के चित्रण पर आपत्ति उठी थी। धर्मिक भावनाएं आहत होने की बात की गई। जिन अंशों पर आपत्ति की गई थी उनको हटाने और निर्माताओं के माफी मांग लेने से मामला ठंडा पड़ता जा रहा है लेकिन इस औसत कहानी वाली वेब सीरीज में जिस तरह से खुले आम राजनीतिक टिप्पणियां की गईं हैं वो भावनाओं को आहत करने से अधिक गंभीर सवाल उठाते हैं। इसके आरंभिक एपिसोड में जो कुछ संवाद हैं या दृश्यों से जो कहने की कोशिश की गई है वो ये है कि ‘मुसलमानों को चिन्हित कर मारा’। सलीम और अयूब के संदर्भ में जो संवाद हैं उसमें एक वाक्य है, ‘हमलोगों को मारना बहुत आसान होता है। मेरा नाम भी किसी आतंकवादी संगठन से जोड़ देंगे’। इस तरह के संवाद बेहद गंभीर निहितार्थ लिए हुए होते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि इस तरह के संवादों के जरिए देश की एक बड़ी आबादी को भड़काने का उपक्रम किया गया है। इस वेब सीरीज पर तो राजद्रोह का केस दर्ज किया जाना चाहिए। भारतीय दंड संहिता की धारा 124(ए) के अनुसार ‘जब कोई व्यक्ति लिखित में या संकेतों में या प्रत्यक्ष प्रस्तुतिकरण या किसी अन्य विधि से भारत सरकार के प्रति घृणा या अवमान पैदा करने का प्रयास करता है तो वो राजद्रोह करता है।‘ 

वेब सीरीज तांडव के जिस संवाद का जिक्र ऊपर किया गया है उससे साफ तौर पर भारत सरकार के खिलाफ घृणा पैदा करने की कोशिश नजर आती है। व्यवस्था के खिलाफ एक पूरे समुदाय को भड़काने की कोशिश भी नजर आती है। किसी समस्या की ओर ध्यान दिलाना और किसी समस्या को लेकर जजमेंटल होना दोनों अलग अलग बात हैं। ‘तांडव’ में ही ऐसा हुआ है ये भी नहीं है, इसके पहले के वेब सीरीज में भी और उसके पहले की कुछ फिल्मों में भी इस तरह के संवाद और दृश्य रखे हैं जो मुसलमानों के मन में भारत सरकार के खिलाफ घृणा के बीज बोने जैसे हैं। इसके पहले एक सीरीज आई थी जिसका नाम है ‘पाताल लोक’ । उस सीरीज में भी मुसलमानों को लेकर इसी तरह की बातें की गई थीं। उस सीरीज में पुलिसवालों के बीच की आपसी बातचीत में मुसलमानों के लिए जिस तरह के विश्लेषण गढ़े गए थे वो भी प्रत्यक्ष रूप से पुलिस और परोक्ष रूप से भारत सरकार के खिलाफ घृणा पैदा करने जैसा था। सीबीआई तक को मुसलमानों के खिलाफ चित्रित किया गया था। सिर्फ संवादों में ही नहीं बल्कि काल्पनिकता की आड़ में भी दृश्यों को इस तरह से चित्रित किया गया था कि इस नैरेटिव को मजबूती मिले कि सरकार मुसलमानों के खिलाफ है। इसके पहले ‘सेक्रेड गेम्स’ में भी दिखाया गया था कि कैसे पुलिस निर्दोष मुस्लिम लड़के को फर्जी मुठभेड़ में मार गिराती है। इसके बाद संवाद के जरिए राजनीतिक बयान दिया जाता है और कहा जाता है कि उस मुस्लिम लड़के का परिवार धरने पर बैठा है और सिस्टम से उसकी सुध लेनेवाला कोई नहीं है। इसी वेब सीरीज में बाबरी विध्वंस के फुटेज लंबे समय तक दिखाकर बैकग्राउंड से राजनीतिक टिप्पणियां आती रहती हैं। इसके पहले एक फिल्म आई थी ‘मुक्काबाज’, उसमें बगैर किसी संदर्भ के एक संवाद है कि ‘वो आएंगे तुमको मारेंगे और भारत माता की जय कहकर चले जाएंगे’। मंशा स्पष्ट है। किसी चरित्र को पहले की फिल्मों में भी सांप्रदायिक दिखाया जाता रहा है लेकिन पूरे सिस्टम को एक ही रंग में रंगने का प्रयास इन दिनों ज्यादा दिखाई देता है। खासतौर पर वेब सीरीज में। 

वेब सीरीज में इस तरह के प्रसंगों या दृष्यों को देखने के बाद साफ तौर पर एक पैटर्न नजर आता है जिसमें कि सीरीज के निर्माता मनोरंजन के इस माध्यम का उपयोग किसी खास विचारधारा को पुष्ट करने और किसी विचारधारा को बदनाम करने के लिए करते हैं। इस पहलू पर भी विचार किया जाना चाहिए कि इन वेब सीरीज के निर्माता हिंदू धर्म प्रतीकों को अपमानित क्यों करते हैं? अगर मुसलमानों को लेकर की गई टिप्पणियों और हिंदू धर्म प्रतीकों के अपमान के चित्रण को जोड़कर देखेंगे तो तस्वीर साफ नजर आती है। ये तस्वीर है राजनीति की, ये तस्वीर है इन वेब सीरीज के राजनीति का औजार बन जाने की। एक तरफ मुसलमानों के मन में मौजूदा सरकार के खिलाफ, उसकी संस्थाओं के खिलाफ जहर भरने का काम कर रहे हैं और दूसरी तरफ आप हिंदुओं के धार्मिक प्रतीकों का अपमान कर रहे हैं। जब आप हिंदू धर्म प्रतीकों का अपमान करते हैं तो मंशा ये हो सकती है कि आप एक समुदाय विशेष के मन में अपनी साख जमाना चाह रहे हों। ये तब और सही प्रतीत होता है जब इन वेब सीरीज को बनानेवाला एक निर्माता शाहीन बाग पहुंचता है और आंदोलन के दौरान मंच पर खढ़े होकर बिरयानी खाते हुए अपनी तस्वीरें खिंचवाता है। ये बहुत ही खतरनाक प्रवृत्ति की  का संकेत है। इस प्रवृत्ति के लिए ये वेब सीरीज इस वजह से भी सुविधाजनक है क्योंकि वीडियो स्ट्रीमिंग साइट्स के लिए या ओवर द टॉप प्लेटफॉर्म को लेकर हमारे देश में किसी प्रकार की कोई आचार संहिता नहीं है। 

देश में पिछले दो लोकसभा चुनाव के नतीजों में भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा को बहुमत की स्वीकृति मिली। वामपंथी विचारधारा या उसकी तरफ झुकी हुई विचारधारा को जनता ने नकार दिया। लगातार दो नकार से वामपंथ के अनुयायी बौखला भी गए हैं और कुंठित भी होते नजर आ रहे हैं। अब जब उनको जनता के मध्य जाकर अपनी लोकप्रियता वापस प्राप्त करने का कोई रास्ता नहीं मिल पा रहा है तो उन्होंने मनोरंजन के इस अराजक माध्यम को अपनी राजनीति का औजार बनाया है। यह अनायास नहीं है कि ‘तांडव’ जैसी घटिया स्टोरी को बड़े कलाकार और बड़ा प्लेटफॉर्म मिलता है। ये एक ऐसी कहानी है जिसमें न तो निरंतरता है न ही रोचकता और न ही कहानी लेखक को भारतीय राजनीति की समझ। इस कहानी में सिर्फ एजेंडा भरा गया है और अखबारों से उठाकर घटनाओं का भोंडा कोलाज बनाने का प्रयास किया गया है। इस कहानी पर तो कायदे से चोरी का केस भी दर्ज होना चाहिए। ब्राहमण प्रोफेसर और उसके दलित प्रेमी के बीच का जो संवाद है वो हिंदी के कहानीकार उदय प्रकाश की कहानी ‘पीली छतरीवाली लड़की’ से जस का तस उठा लिया गया है। अब समय आ गया है कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय और केंद्र सरकार इस बात को समझे कि इन वेब सीरीज के बहाने राजनीति हो रही है। ये वेब सीरीज राजनीति के औजार से राजनीति का हथियार बनें उसके पहले ही एक सम्यक और व्यापक आचार संहिता बने जो इन सब बातों का ख्याल रख सके।   


Saturday, January 16, 2021

समय के साथ चलने की बड़ी चुनौती


इक्कीसवीं सदी का दूसरा दशक समाप्त हो गया और अब हम तीसरे दशक में प्रवेश कर चुके हैं। रचनात्मक लेखन में भी इन दो दशकों में कई बदलाव देखने को मिले। कुछ लेखकों ने अपनी कहानियों में या उपन्यासों में नए प्रयोग किए, भाषा के स्तर पर भी और कथ्य के स्तर पर भी। बावजूद इसके हिंदी में साहित्य के जितने पाठक होने चाहिए वो नहीं हैं। कहानी, कविता, उपन्यास से लेकर आलोचना और निबंध आदि की पुस्तकों की बिक्री के आंकड़े उत्साहजनक नहीं हैं। कई बार ये कहा जाता है कि पुस्तकों की बिक्री के आंकड़े जानने का कोई वैज्ञानिक तरीका हमारे पास नहीं है इस वजह से ये भ्रम बनता है। हो सकता है कि इसमें सचाई हो लेकिन अगर पुस्तकों की बिक्री होती है तो इसके संकेत तो मिलने ही लगते हैं। सुरेन्द्र वर्मा के उपन्यास ‘मुझे चांद चाहिए’ का उदाहरण दिया जा सकता है। खैर ये अलग विषय है जिसपर फिर कभी चर्चा होगी। अभी हम बात कर रहे हैं कि हिंदी में कहानियों या उपन्यासों के लेखन प्रविधि में कोई बदलाव हुआ या नहीं। भाषा के स्तर पर कोई नया प्रयोग हुआ कि नहीं। अगर हम सबसे पहले कहानी की बात करें तो मुझे लगता है कि हिंदी कहानी की दुनिया बहुत नहीं बदली । हिंदी कहानी समय के साथ चल नहीं पा रही है और पिछड़ती नजर आ रही है। आज के ज्यादातर कहानीकार अब भी बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में लिखी गई कहानियों के विषय से अलग जाकर कोई नवोन्मेष करते नहीं दिख रहे। हिंदी की कहानियां गावों से मुक्त नहीं हो पाई है। हिंदी कहानी गांव की भाषा से भी कहां मुक्त हो पाई है। 

जब हम हिंदी कहानी के कम होते पाठक की बात करते हैं तो तमाम साहित्यिक गुणों और अवगुणों की चर्चा करते हैं लेकिन एक बेहद महत्वपूर्ण बात की ओर हमारा ध्यान नहीं जाता है। हिंदी के कहानीकार ऐसे दोष का शिकार हो रहे हैं जिसको रेखांकित किया जाना आवश्यक है। हिंदी के कहानीकार अब भी गांव भी भाषा लिख रहे हैं जबकि कहानी की पहुंच शहरी पाठक तक अधिक है। ज्यादातर कहानियां गांव की पृष्ठभूमि पर लिखी जा रही हैं जबकि उनकी पहुंच शहरी पाठकों तक अपेक्षाकृत अधिक है। हिंदी के ज्यादातर कहानीकार अपनी कहानियों में अपने पात्रों को उन घटनाओं और परिस्थियों से मुठभेड़ करवाते हैं जो गांव की होती हैं। शहरी घटनाओं और शहरी परिस्थितियों को चित्रित करने का हुनर अभी हिंदी के कम कहानीकारों के पास है। परिणाम ये होता है कि शहरी पाठक गांव की भाषा और परिस्थितियों या घटनाओं से अपना तादात्म्य नहीं बना पाता है और वो हिंदी कहानी से विमुख होने लगते हैं। शहरी पाठक को इस वजह से रेखांकित कर रहा हूं क्योंकि साहित्यिक कृतियों की पहुंच गांवों की अपेक्षा शहरों में अधिक है। गांवों और कस्बों में पुस्तकों की दुकानें कम हो रही हैं, कम तो शहरों में भी हैं लेकिन शहरी इलाकों में ऑनलाइन या ई कॉमर्स प्लेटफॉर्म इस कमी को बहुत हद तक पूरा कर देते हैं। हिंदी के कहानीकारों को इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता है। हिंदी के कुछ कहानीकारों ने शुरुआती कहानियों में शहरी परिवेश को उठाया  लेकिन फिर वो गांव चले गए। हिंदी कहानी की इस स्थिति को देखते हुए मुझे फ्रांसीसी कथाकार सार्त्र का एक कथन याद पड़ता है। सार्त्र ने कभी कहा था कि वो एक ऐसे लेखक हैं जिनको इस बात की चिंता है कि उनके पाठक तो हैं पर पब्लिक नहीं है (वी हैव रीडर्स बट वी हैव नो पब्लिक)। सार्त्र अपने पाठकों से आगे जाकर अपने लिए जनता की तलाश करते हैं उसके लिए प्रयत्न करते हैं। लेखन के स्तर पर भी और पाठकों से आत्मीयता बढ़ाने के अन्य काम करते हुए भी। लेकिन हिंदी के कहानीकार अपने पाठकों की ही बहुत अधिक चिंता नहीं करते हैं तो उनसे ये अपेक्षा करना, कि वो अपनी रचनाओं के लिए ‘पब्लिक’ की तलाश करेंगे, व्यर्थ है। 

यही हाल हिंदी के उपन्यासों का भी है। जहां तक उपन्यासों की पहुंच है वहां की भाषा में उपन्यास कम लिखे जा रहे हैं। हिंदी के पाठक हैं, वो पढ़ना भी चाहते हैं लेकिन उनको उनकी पसंद की सामग्री नहीं मिल पाती है। आज भी हिंदी में लिखे जा रहे अधिकांश उपन्यासों की कथावस्तु या उसकी भाषा काफी पुरानी हो गई है। हिंदी उपन्यास भी हिंदी कहानियों की तरह गांव से बाहर नहीं निकल पा रही है। उपन्यासों में गांव में आ रहे बदलावों को रेखांकित नहीं किया जा रहा है। समकालीनता की हिंदी में बहुत बातें होती है लेकिन लेखन को समकालीन बनाने के लिए वैसे विषय नहीं उठाए जाते हैं। कोरोना काल में जिस तरह से शहरों में काम करनेवाले लोग अपने गांव की ओर लौटे, उसने गांव का पूरा समीकरण बदल दिया। पारिवारिक से लेकर सामाजिक संरचना पर असर पड़ा लेकिन हिंदी कहानी या हिंदी उपन्यास इस बदलाव को अबतक नहीं पकड़ पाई है। इसके पहले की सामाजिक घटनाओं को भी समकालीन हिंदी रचनाशीलता में स्थान नहीं बना पाई है। दो चार लेखक लिखते तो हैं लेकिन वो पर्याप्त नहीं माना जा सकता है। यह अनायास नहीं है कि हिंदी में विभाजन पर बहुत ज्यादा नहीं लिखा गया, न ही उसकी त्रासदी पर और ना ही उसके सामाजिक असर पर। यशपाल और भीष्म साहनी ने लिखा जरूर पर इतनी बड़ी त्रासदी के लिए वो बहुत कम है। भारत का विभाजन मानवता के इतिहास में सबसे बड़ी घटनाओं में से एक है। इस बात पर हिंदी के साहित्यकारों को गंभीरता से विचार करना चाहिए कि समय को पकड़ पाने और उसको अपनी रचनाओं में उतार पाने में वो क्यों पिछड़ जा रहे हैं। इक्सीवीं शताब्दी के दूसरे दशक में हिंदी में कुछ नए लेखक आए जिन्होंने अपनी रचनाओं में शहरी युवाओं की कहानियां उनकी भाषा में लिखीं। पाठकों ने ऐसे लेखकों को पसंद भी किया। उनके उपन्यासों को लेकर साहित्य जगत में चर्चा भी हुई लेकिन वो अपनी ही बनाए खांचे को तोड़कर बाहर नहीं निकल पाए और खुद को दोहराने लगे। विश्वविद्यालय कैंपस से बाहर निकलते ही उनके लेखन की सीमाएं सामने आ गईं। 

इससे इतर अगर हम देखें तो सिनेमा ने बदलते हुए समय को पकड़ा। जब व्यवस्था से विद्रोह की बात थी तो एंग्री यंग मैन आया। जब देश में उदारीकरण की आहट सुनाई देने लगी तो तो हिंदी सिनेमा में एंग्री यंग मैन की जगह ऐसे नायक ने ले ली जो कॉलेज का छात्र है। उसके अपने सपने हैं, वो अपने फैसले खुद लेना चाहता है। फिर जब हिंदी सिनेमा इक्कीसवीं सदी में प्रवेश करता है तो उसकी कहानियां फिर बदलती हैं और वो शहरों की यथार्थवादी कहानियों तक आता है। समाज में प्रचलित उन मुद्दों पर फिल्में बनने लगती हैं जिसपर कम बात होती थी। फिल्मों में संवाद की भाषा बदलती है, गानों के बोल बदलते हैं। विकी डोनर, पीकू, दम लगाके हईसा, बैंड बाजा बारात, लेडीज वर्सेज रिकी बहल से लेकर गली बॉय तक पहुंचती है। इस बदलाव को लोगों ने पसंद भी किया और फिल्में हिंट भी हुईं। सार्त्र के शब्द उधार लेकर अगर कहें तो इन फिल्मों को ‘पब्लिक’ भी मिली। हिंदी कहानीकारों के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वो समय के साथ चलें और उन पाठकों का ध्यान रखें जहां तक उनकी रचनाएं पहुंच सकती हैं। अगर ऐसा हो पाता है तो वो हिंदी कथा जगत के लिए एक आदर्श स्थिति होगी। अन्यथा हिंदी कहानी भी उसी गति को प्राप्त हो जाएगी जिस गति को हिंदी की आर्ट फिल्में प्राप्त हुईं। 

जिंदगी नाम है कुछ लम्हों का


उर्दू के मशहूर शायर और गीतकार कैफी आजमी का हैदराबाद, औरंगाबाद और मुंबई से खास रिश्ता है। उनके जीवन में प्रेम का प्रवेश हैदराबाद में होता है, परवान औरंगबाद में चढ़ता है और अंजाम तक मुंबई में पहुंचता है। किस्सा कुछ यूं है कि हैदराबाद में एक मुशायरा हो रहा था। इस मुशायरे में कैफी आजमी, मजरूह सुल्तानपुरी और सरदार जाफरी जैसे शायर शामिल थे। श्रोताओं में पहली पंक्ति में सफेद कुर्ता, सफेद शलवार और इंद्रधनुषी दुपट्टा पहने एक बेहद खूबसूरत युवती बैठी थी। मुशायरा खत्म हुआ तो वहां उपस्थित लड़कियों ने ऑटोग्राफ के लिए कैफी को घेर लिया लेकिन सफेद कपड़ों वाली वो हसीन लड़की सरदार जाफरी की ओर गई और उनका ऑटोग्राफ लिया। बाद में वो कैफी के पास पहुंची तो उन्होंने अपने ऑटोग्राफ के साथ एक बेहद अजीबोगरीब शेर लिख दिया। जब वो बाहर निकल रहे थे तो उस युवती ने कैफी से पूछा कि उनकी कॉपी पर इतना खराब शेर क्यों लिखा ? कैफी ने फौरन कहा कि आप भी तो पहले सरदार जाफरी के पास गईं थीं। इतना सुनते ही वो युवती हंसी और कहते हैं कि दोनों के बीच प्यार की शुरुआत यहीं से होती है। वो युवती शौकत थीं। दिन बीते दोनों के बीच प्यार बढ़ता गया। 

दोनों ने अपने प्यार का इजहार भी बेहद रूमानी अंदाज में किया। हैदराबाद के मुशायरे के बाद कैफी, मजरूह और सरदार जाफरी औरंगबाद आ गए। ये लोग शौकत के पिता के मेहमान बने और उनके घर पर ही रुके। एक दिन शौकत और कैफी एक कमरे में बैठे बातें कर रहे थे। शादी विवाह की बातें होने लगीं तो अचानक शौकत ने कहा कि वो उनका हाथ देखना चाहती हैं। शौकत के हाथ में कैफी का हाथ था और वो उनकी लकीरें देख रही थीं। देखते देखते शौकत ने कहा कि आपकी किस्मत में तो प्रेम विवाह लिखा है। फिर शौकत ने अनूठे अंदाज में प्रपोज कर दिया। एक कागज पर लिखा- ‘जिंदगी के सफर में अगर तुम मेरे हमसफर होते तो यह जिंदगी इस तरह जैसे फूलों पर से नसीमे-सहर’। लिखने के बाद उन्होंने ये कागज का टुकड़ा कैफी को दिया। कैफी ने इसको पढ़ा और शौकत की आंखों में आंख डालकर कहा, ‘मेरी जिंदगी की किस्मत इन्हीं आंखों में है’। 

शौकत और कैफी के बीच प्यार अब परवान चढ़ने लग गया था। लेकिन शौकत की मां इसके पक्ष में नहीं थीं। परिवार ने शौकत पर काफी पाबंदियां लगाईं लेकिन प्रेम पत्रों को रोका नहीं जा सका। शौकत के पिता अपनी बेटी के साथ थे और वो अपनी बेटी को लेकर कैफी से मिलने मुंबई पहुंचे। शौकत जब कैफी से शादी के अपने फैसले पर डटी रही तो उन्होंने सज्जाद जहीर से दोनों की शादी करवाने का अनुरोध किया। तय दिन पर सज्जाद जहीर के घर पर शौकत और कैफी के घर दोनों का निकाह हो गया। निकाह के दौरान भी एक दिलचस्प प्रसंग हुआ। जब काजी ने शौकत से पुछवाया कि उनको अतहर हुसैन रिजवी से निकाह कुबूल है तब शौकत को उनका असली नाम पता चला। लेकिन पेंच तो ये फंसा कि दूल्हा शिया और दुल्हन सुन्नी। ऐसे में तो दो काजी निकाह करवा सकते हैं। अब सब एक दूसरे का मुंह ताकें कि दूसरे काजी का इंतजाम कहां से हो। खैर किसी तरह से सज्जाद जहीर ने मामला निबटाया और निकाह संपन्न हुआ। इस शादी में इस्मत आपा, मजाज,जोश मलीहाबाद, अशफाक बेग, मेहंदी, मुनीष सक्सेना आदि शामिल हुए। शौकत और कैफी की शादी के बाद महफिल जमी तो जोश और मजाज ने जमकर शायरी सुनाई। ये महफिल चल ही रही थी कि अचानक मुनीष और मेहंदी को शरारत सूझी और उन्होंने जोश साहब से कहा कि ‘हैदराबाद में एक रिवाज है कि निकाह वाले दिन दूल्हे के पिता के सर पर सुनहरा पाउडर मला जाता है, और अभी तो आप ही कैफी के पिता हैं। जोश साहब तैयार हो गए और सबने जोश के गंजे सर पर जमकर पाउडर लगाया। तब जोश साहब की महबूबा ने शौकत को मुंहदेखाई के तौर पर दो रुपए दिए थे। कैफी ने अपनी पत्नी को शादी के बाद पहला तोहफा एक किताब दिया था, जिसका नाम था ‘इंसान का उरूज’। इस अनूठी प्रेम कहानी में कई ऐसे लम्हे हैं जो बेहद दिलचस्प हैं, खुद शौकत कैफी ने इन लम्हों को अपने संस्मरणों में कलमबद्ध किया है। 

Saturday, January 9, 2021

हिंदी की मजबूती का मूलमंत्र उदारता


आज विश्व हिंदी दिवस है। इस अवसर पर एक बेहद दिलचस्प किस्सा याद आ रहा है। बात ग्यारह अप्रैल 1941 की है। जबलपुर में सेंट्रल प्रोविंस एंड बेरार स्टूडेंट्स फेडरेशन का एक सांस्कृतिक अधिवेशन होना तय हुआ था। फेडरेशन के सचिव चाहते थे कि इस अधिवेशन का शुभारंभ अभिनेता और निर्देशक किशोर साहू करें। किशोर साहू को आमंत्रित करने के लिए वो बांबे (अब मुंबई) पहुंचे और उनसे मिलकर अपना प्रस्ताव उनके सामने रखा। किशोर साहू ने उनका आमंत्रण स्वीकार कर लिया और नियत दिन वो जबलपुर पहुंच गए। उस वक्त तक किशोर साहू की तीन फिल्में लोकप्रिय हो चुकी थीं और एक निर्माता के तौर पर भी उनकी पहचान बन चुकी थी। रेलवे स्टेशन पर अभिनेता किशोर साहू के स्वागत में काफी लोग जुटे थे। स्टेशन पर ‘कॉमरेड किशोर साहू जिंदाबाद’ का नारा भी लगाया गया था। किशोर साहू ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि ‘राजनीतिक क्षेत्र में मैने कोई तीर नहीं मारा था, कोई विशेष कॉमरेडी नहीं दिखाई थी।‘ बावजूद इसके उनके स्वागत में कॉमरेड किशोर साहू जिंदाबाद का नारा लगा था। इस प्रसंग पर विचार करने से वामपंथ का वो पहलू सामने आता है जिसमें वो लोगों को छद्म नारों आदि से भरमाते रहे हैं। खैर यह अवांतर प्रसंग है जिसपर फिर कभी चर्चा। 

अभी हम हिंदी की बात कर रहे हैं। शाम को स्टूडेंट फेडरेशन के अधिवेशन का भव्य शुभारंभ हुआ था जिसकी अध्यक्षता विश्वंभरनाथ जी ने की थी। किशोर साहू ने अपना उद्घाटन भाषण अंग्रेजी में दिया था। भाषण को उपस्थित श्रोताओं ने काफी पसंद किया था। यहां तक तो सब ठीक था लेकिन किशोर साहू के बाद के वाले वक्ता जब बोलने खड़े हुए तो उन्होंने अंग्रेजी में भाषण देने के लिए किशोर साहू की जमकर आलोचना की। हिंदी फिल्मों से प्रसिद्धि पाने और भाषण अंग्रेजी में देने को लेकर भी उन्होंने किशोर साहू को घेरा था। किशोर साहू तबतक उनको जानते नहीं थे। अपनी आत्मकथा में किशोर साहू ने इस प्रसंग का विस्तार से उल्लेख किया है। किशोर ने मंच पर साथ बैठे एक व्यक्ति से उनका परिचय पूछा। साहू को बताया गया कि ‘वो यशपाल हैं और खुद को कॉमरेड बताते हैं।‘ तबतक किशोर साहू हिंदी के लेखक यशपाल से या उनके नाम से परिचित नहीं थे। तो उन्होंने उस व्यक्ति से पूछा कि कौन यशपाल ? जवाब मिला ‘अपने को कम्युनिस्ट कहता है अब फॉर्वर्ड ब्लाकिस्ट बना हुआ है और आपके जयघोष से जलकर आपकी खिल्ली उड़ाना चाहता है।‘ यशपाल ने किशोर साहू की इतनी तीखी और व्यक्तिगत आलोचना कर दी थी कि वो गुस्से से लाल-पीला हो रहे थे और मंच से ही यशपाल पर जवाबी हमला करने लगे थे। मामला गरमा गया था। कुछ अप्रिय घटने की आशंका को लेकर अधिवेशन की अध्यक्षता कर रहे विश्वंभरनाथ ने पहले तो किशोर साहू को रोका और फिर उनसे आगे कुछ नहीं बोलने का अनुरोध किया था। विश्वंभरनाथ ने यशपाल की उनके आचरण के लिए सार्वजनिक रूप से निंदा की और कहा, ’अगर किशोर साहू ने अंग्रेजी में भाषण दे दिया तो कोई पाप नहीं किया। उनका दिल और पोशाक तो भारतीय है। मगर, यशपाल जी, अगर आपको अंग्रेजी से इतनी नफरत है तो आपने यह अंग्रेजी पोशाक क्यों पहन रखी है?’ सभास्थल लोगों के ठहाके से गूंज उठा था। आपको बताते चलें कि कॉमरेड यशपाल ने तब कोट-पैंट पहना हुआ था और गले में लाल टाई बांधी हुई थी। किसी तरह अधिवेशन का उद्घाटन सत्र समाप्त हुआ लेकिन यशपाल अपने उपेक्षा से इतने आहत हो गए कि तय समय से पहले ही अधिवेशन छोड़कर जबलपुर से निकल गए। 

हिंदी दिवस पर इस किस्से का स्मरण इस वजह से हो रहा है कि आज भी कई लोग हिंदी को लेकर इतने संवेदनशील हो जाते हैं कि वो उसमें अंग्रेजी के शब्दों के उपयोग को लेकर हाय तौबा मचाने लगते हैं। गैर हिंदी भाषियों से भी अपेक्षा करते हैं कि वो हिंदी में ही बात करें और अगर लिखें तो शुद्ध लिखें। यह आग्रह उचित है लेकिन आग्रह जब जिद में और सामने वाले को अपमानित करने में बदल जाता है तो समस्या गंभीर हो जाती है। किशोर साहू ने साफ तौर पर स्वीकार किया था कि कॉलेज के डिबेट्स में अंग्रेजी में बोलते थे और किसी विषय पर लंबा बोलने के लिए वो अंग्रेजी में ही ज्यादा सहज थे। इसलिए उन्होंने स्टूडेंट्स फेडरेशन के सांस्कृतिक अधिवेशन में अंग्रेजी में भाषण दिया था। यशपाल को ये बर्दाश्त नहीं हुआ और उन्होंने किशोर साहू को लेकर सार्वजनिक रूप से व्यक्तिगत कटाक्ष कर दिया। वो यह भूल गए कि फिल्मों की दुनिया में काम करनेवाले किशोर साहू न सिर्फ एक अच्छे अभिनेता के तौर पर स्थापित थे बल्कि उनकी हिंदी में लिखी कहानियां उस दौर की प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में भी प्रकाशित हो चुकी थीं। बाद में तो किशोर साहू ने ‘परदे के पीछे’ के नाम से एक उपन्यास भी हिंदी में लिखा था। 

हिंदी को वैश्विक स्तर पर ना केवल स्वीकार्यता मिल रही है बल्कि व्याप्ति भी बढ़ रही है, लेकिन अगर हिंदी अपना मूल स्वभाव, उदारता, त्यागती है तो स्वीकार्यता और व्याप्ति दोनों में परेशानी हो सकती है। हिंदी में तो शुरू से ही दूसरी भाषा के शब्द लेने की उदारता रही है। हिंदी में आज न सिर्फ अंग्रेजी बल्कि फारसी और पुर्तगाली तक के शब्द बहुत सहजता के साथ स्वीकृत और प्रचलित हैं। इन भाषाओं के शब्दों को हिंदी ने इतनी उदारता के साथ अंगीकार किया है कि लगता ही नहीं है कि वो दूसरी भाषा के शब्द हैं। दूसरी भाषा के शब्दों को लेकर दुश्मनी का भाव नहीं होना चाहिए बल्कि देश काल और परिस्थिति के मुताबिक उसको अपने अंदर समाहित और स्वीकृत करने की उदारता होनी चाहिए। इससे ना केवल भाषा समृद्ध होती है बल्कि उसका शब्द भंडार भी व्यापक होता है। यह भी किया जा सकता है कि विदेशी भाषा के शब्दों को स्वीकार करने के पहले अन्य भारतीय भाषाओं के शब्दों को देखा, परखा और आजमाया जाए। अगर हमें भारतीय भाषाओं में उपयुक्त शब्द मिल जाते हैं तो उसको अंगीकार करने में प्राथमिकता देनी चाहिए। इस प्रयास की सफलता के लिए आवश्यक होगा कि भारतीय भाषाओं के शब्दकोशों को तैयार किया जाए। जो शब्दकोश तैयार हैं उनको जनता के बीच पहुंचाने का उपक्रम करना होगा। आज जिस तरह से इंटरनेट मीडिया का विस्तार हो रहा है, जिस तरह से देशभर में इंटरनेट का घनत्व बढ़ता जा रहा है, उसको ध्यान में रखते हुए भारतीय भाषाओं के शब्दकोशों को इंटरनेट पर उपलब्ध करवाने की कोशिश करनी चाहिए। बोलियों के शब्दों को सहेजने का प्रयास होना चाहिए। ये प्रयास व्यक्तिगत स्तर पर हो रहे हैं, लेकिन वो नाकाफी हैं। इसको संस्थागत स्तर पर शुरू करने का समय है ताकि भारतीय भाषाओं के बीच जो वैमनस्यता बोध कभी कभार गहराने लगता है उसका निषेध किया जा सके।

देश के अलग अलग हिस्सों में केंद्रीय विश्वविद्यालय हैं, वहां अगर इस काम की शुरुआत करवाई जाए तो ये शब्दकोश आसानी से कम समय में बन सकते हैं। किसी एक संस्थान पर बहुत ज्यादा वित्तीय बोझ भी नहीं पड़ेगा। इसको कुलपति चाहें तो अपने स्तर पर भी आरंभ करवा सकते हैं, लेकिन अगर सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों का केंद्रीयकृत प्रयास हो तो नतीजे बेहतर होंगे। इसकी शुरुआत संविधान में मान्यता प्राप्त भाषाओं से की जा सकती है। यह काम अगर अभी शुरू कर दिया जाए तो इससे नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रियान्वयन में भी सुविधा होगी। जिस तरह से राष्ट्रीय शिक्षा नीति भारतीय भाषाओं में साहचर्य की बात करती है और मातृभाषा में शिक्षा की बात कहती है उसके लिए सभी भाषाओं के आधुनिक शब्दकोश तैयार करने होंगे और हर वर्ष उसको अद्यतन भी करना होगा। करना भी चाहिए।  

Saturday, January 2, 2021

कलाकारों के लिए भी उम्मीदों का नववर्ष


नया वर्ष नई उम्मीद लेकर आया है। वर्ष के पहले ही दिन देश में कोरोना वैक्सीन के आपात उपयोग को मंजूरी मिल गई है। कोरोना महामारी के भीषण संकट से जूझ रहे देशवासियों के मनोबल को बढ़ाने वाला ये सुखद समाचार है। कोरोना की वैक्सीन ने जो उम्मीद जगाई है उससे देशभर के कलाकार भी खुश होंगे और उनकी उम्मीद भी जगेगी। उनके संकट के दिन भी समाप्त होने के आसार बढ़ेंगे। पिछले नौ दस महीने से कोरोना की वजह से कलाओं के प्रदर्शन पर बहुत असर पड़ा था। मंच पर अपनी कलाओं के प्रदर्शऩ से होनेवाली आय पर ग्रहण लगा हुआ है। कुछ दिनों पहले राजस्थान से खबर आई थी कि पद्मश्री से सम्मानित कालबेलिया नृत्य के लिए मशहूर गुलाबो सपेरा अपने घर की बिजली का बिल नहीं भर पा रही थीं। उन्होंने राजस्थान फोरम के अध्यक्ष पंडित विश्वमोहन भट्ट को इस बाबत एक पत्र लिखकर अपनी पीड़ा जताई थी। गुलाबो ने अपने पत्र में लिखा कि बिल का भुगतान नहीं होने की वजह से उनके घर की बिजली काट दी गई है। इस संबंध में उन्होंने राजस्थान के संस्कृति मंत्री बी डी कल्ला से भेंट कर अपनी व्यथा उनके सामने रखी थी। गुलाबो ने अपने पत्र में लिखा है कि ‘मैंने माननीय मंत्री महोदय श्रीमान बी डी कल्ला से जी से भी निवेदन किया था लेकिन उन्होंने भी असमर्थता व्यक्त करते हुए कोई मदद नहीं की।‘ राजस्थान सरकार की संवेदनहीनता के बाद गुलाबो ने राजस्थान फोरम का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने कहा कि उन्हें मदद मांगते हुए बहुत शर्म आ रही है, लोग क्या कहेंगे कि पद्मश्री से सम्मानित कलाकार बिजली का बिल नहीं भर पा रही है। लेकिन बच्चों की खातिर उन्होंने मदद मांगी। राजस्थान फोरम ने उनके बिजली बिल का भुगतान कर दिया जो करीब चौवन हजार रुपए का था। ये हालत तो उस कलाकार की है जो पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है और जिसने नृत्य की एक विधा को स्थापित कर लोकप्रिय बनाया। 

कोरोना के संकट के समय कलाकारों के सामने जीवन-यापन का बड़ा संकट उत्पन्न हो गया है। कोरोना की वजह से कलाकारों की प्रस्तुतियां बंद हो गईं।     हम इस बात की कल्पना कर सकते हैं कि जब कलाकार आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं तो उनके साजिंदों का क्या हाल होगा। मंच पर गायन प्रस्तुत करनेवाले कलाकार अपनी आय से अपने साजिंदों को भुगतान करते हैं। ज्यादातर साजिंदों को कलाकार प्रस्तुति के हिसाब से भुगतान करते हैं। कोरोना की वजह से पिछले वर्ष मार्च में लॉकडाउऩ हुआ था तब ये चिंता जाहिर की गई थी। केंद्र सरकार से भी कलाकारों के लिए मदद की अपील की गई थी। सरकार की तरफ से मदद का आश्वासन मिला था। बताया गया था कि देशभर में फैले क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों के जरिए कलाकारों की मदद की जाएगी। क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों को मदद की अपेक्षा कर रहे कलाकारों की सूची बनाने के लिए कहा गया था। पूरे देश में सात सांस्कृतिक केंद्र काम करते हैं जो अपने अपने क्षेत्रों के कलाकारों के संपर्क में रहते हैं। लेकिन सूची बनाने का काम अभी तक कहां पहुंचा ये जानकारी नहीं मिल पाई। कितने कलाकारों को मदद दी गई इसके बारे में भी ज्ञात नहीं हो सका। कई कलाकारों से बात करने के बाद ये पता चला कि कलाकारों को अभी सरकार की तरफ से कोरोना संकट के दौरान कोई आपातकालीन मदद नहीं दी जा सकी है।

इस बीच कलाकारों की मदद के लिए कुछ निजी प्रयास हुए। लोक गायिका मालिनी अवस्थी ने अपने साथियों के साथ मिलकर कलाकारों की मदद की पहल शुरू की थी। ‘सेव द रूट्स’ के नाम से। इसके तहत लोगों से कलाकारों के आर्थिक मदद की अपील की गई थी। बाद में संस्कृति गंगा न्यास भी इससे जुड़ा और अबतक इसके माध्यम से करीब आठ सौ कलाकारों को आर्थिक मदद दी जा चुकी है। राजस्थान फोरम ने भी कलाकारों की मदद का फैसला लिया है।  छोटे कलाकारों के अलावा बड़े कलाकारों को मंच से होनेवाली आय तो नहीं ही हो रही है, उनको भारत सरकार से मिलनेवाली ग्रांट भी देर सबेर मिल रही है। भारत सरकार का संस्कृति मंत्रालय कलाकारों को प्रोडक्शन ग्रांट और सैलरी ग्रांट देता है। पिछले तीन साल से इसको देने में भी देरी हो रही थी। गुरुओं को उनके शागिर्दों के लिए जो सैलरी ग्रांट मिलती थी उसको सरकार अब सीधे उनके खाते में ट्रांसफर करने लगी है। इसकी वजह से भी परेशानी हो रही है। सैलरी ग्रांट का भुगतान समय से हो अन्यथा कलाकारों को परेशानी होती है। किसी कार्यक्रम में कोई शागिर्द तीन महीने काम करता है और प्रोडक्शन के बाद छोड़ कर चला जाता है। जाने के पहले वो गुरू से तीन महीने का अपना तय वेतन लेकर चला जाता है। सरकार उस सैलरी ग्रांट को अगर दो साल बाद उस शागिर्द के खाते में सीधे ट्रांसफर करेगी तो गुरुओं को नुकसान होगा। क्योंकि गुरू तो पहले ही शागिर्द को भुगतान कर चुके हैं। इसके व्यावहारिक पक्ष को देखा जाना चाहिए। इसपर भी विचार करना चाहिए कि शागिर्द गुरुओं के स्थायी कर्मचारी नहीं होते हैं।

इसके अलावा पिछले दिनों कलाकारों को दिल्ली में मिले सरकारी घरों को खाली कराने के नोटिस की भी खूब चर्चा रही। ये सही है कि कलाकार तय समय सीमा से अधिक समय से इन घरों में रह रहे हैं। उनसे सरकारी घरों को खाली करवाना कानूनसम्मत है, लेकिन कोरोना संकट के समय मानवीय आधार पर भी विचार होना चाहिए था। बिरजू महाराज समेत कई कलाकार सरकारी घरों में रह रहे हैं। ये स्थितियां इस वजह से सामने आ रही हैं कि हमारे देश में कोई सांस्कृतिक नीति नहीं है। कांग्रेस के शासनकाल के दौरान ज्यादातार समय संस्कृति से संबंधित मामलों को चलाने का ठेका वामपंथियों के पास था। तय नीति नहीं होने की वजह से वो अपनी विचारधारा के लोगों को तरह-तरह से उपकृत करते रहते थे। भारत ने संस्कृति को लेकर यूनेस्को कंवेंशन 2005 को 15 दिसंबर 2006 को स्वीकार किया था। यूनेस्को कंवेंशन के मुताबिक कला और संस्कृति को लेकर सरकार की नीति के अंतर्गत इनको संरक्षित करने, उसके लिए कानून बनाने, आर्थिक और अन्य मदद के नियम बनाने से लेकर कार्यक्रमों की नीति बनाना तक शामिल किया गया था। इसके मूल में ये अवधारणा है कि संस्कृति सतत विकास की संवाहक होती है। इस कंवेंशन के मुताबिक सरकार को हर वर्ष अपनी एक रिपोर्ट प्रस्तुत करनी थी लेकिन पहली रिपोर्ट नरेन्द्र मोदी सरकार ने 29 अप्रैल 2015 में पेश की। इससे ये भी दिखता है कि पूर्ववर्ती यूपीए सरकार संस्कृति को लेकर कितनी गंभीर थी। दरअसल संस्कृति को लेकर जो सबसे बड़ी बाधा है वो ये कि ये सरकारों की प्राथमिकता में नहीं होती है, जिसकी वजह से इसको लेकर कोई ठोस नीति नहीं बन पाती। ठोस नीति के नहीं होने की वजह से अलग अलग विभागों की अपनी अपनी प्राथमिकताएं होती हैं, कई बार कई संस्थाएं एक ही काम कर रही होती हैं। कोरोना काल में जिस तरह से कलाकारों की समस्याएं उभर कर सामने आईं उसने सांस्कृतिक नीति पर गंभीरता से विचार करने की वजह दे दी है। संस्कृति को बेहद संवेदनशीलता के साथ समझने और उसके मुताबिक काम करने की जरूरत है। संस्कृति मंत्रालय बेहद अहम और संवेदनशील मंत्रालय है जिसके जिम्मे प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से राष्ट्र निर्माण और उसको मजबूत करने की जिम्मेदारी है। संस्कृति नीति के लिए संस्कृति मंत्रालय को पहल करनी चाहिए, इसके लिए ये सबसे उचित समय है। अगर ऐसा हो पाता है तो फिर गुलाबो जैसी प्रतिष्ठित कलाकार को अपने घर की बिजली का बिल भरने के लिए कहीं हाथ नहीं फैलना पड़ेगा।     


Saturday, December 26, 2020

सांस्कृतिक उपनिवेशवाद का प्रतिकार हो


अभी अभी क्रिसमस बीता है, उस अवसर पर एक मित्र से बात हो रही थी। उन्होंने बताया कि क्रिसमस के दो दिन पहले उनकी तीन साल की बिटिया ने उनसे पूछा कि ‘व्हेयर इज माइ क्रिसमस ट्री (मेरा क्रिसमस ट्री कहां है)?’ उसके पहले भी वो अपनी बिटिया के बारे में बताते रहते थे कि कैसे अगर वो ब्रश नहीं करती है तो उसको कार्टून सीरियल दिखाना पड़ता है आदि-आदि। वो इस बात को लेकर चिंता प्रकट करते रहते थे कि बच्चों पर इन कार्टून सीरियल्स का असर पड़ रहा है। लेकिन जब क्रिसमस ट्री वाली बात बताते हुए उन्होंने कहा कि एक दिन ऐसा भी आ सकता है कि बच्चे कहने लगें कि ‘टुडे इज संडे, लेट्स गो टूट चर्च’ ( आज रविवार है, चलो चर्च चलते हैं) । ये सुनने के बाद मुझे लगा कि उनकी बातों में एक गंभीरता हैं। उनसे बातचीत होने के क्रम में ही एक और मित्र से हुई बातचीत दिमाग में कौंधी। उसने भी अपने दो साल के बेटे के उच्चारण के बारे में बताया था कि वो इन दिनों ‘शूज’ को ‘शियूज’ कहने लगा है। इन दोनों में एक बात समान थी कि दोनों के बच्चे यूट्यूब पर चलनेवाले सीरियल ‘पेपा पिग’ देखते हैं और दोनों उसके दीवाने हैं। लॉकडाउन के दौरान जब बच्चे स्कूल नहीं जा रहे थे और घर पर थे तो ‘पेपा पिग’ और भी लोकप्रिय हो गया। यूट्यूब पर इसका अपना चैनल है जिसको लाखो बच्चे देखते हैं। ‘पेपा पिग’ चार साल की है जिसका एक भाई है ‘जॉर्ज’ और उसके परिवार में मम्मी पिग और डैडी पिग हैं। बच्चे इसके दीवाने हैं कि ‘पेपा पिग’ के चित्र वाला स्कूल बैग से लेकर पानी की बोतल, लंच बॉक्स तक बाजार में मिलते है। बच्चे इन सामग्रियों को बहुत पसंद करते हैं। कई छोटे बच्चों के माता-पिता से बात हुई तो उन्होंने कहा कि ‘पेपा पिग’ उनके लिए बहुत मददगार है क्योंकि जब बच्चा जिद करता है या खाना नहीं खाता है तो उसको ‘पेपा पिग’ के उस जिद से संबंधित वीडियो दिखा देते हैं और वो खाने को तैयार हो जाता है। ये कार्टून कैरेक्टर के वीडियोज को ब्रिटेन की एक कंपनी बनाती है और उसको यूट्यूब पर नियमित रूप से अपलोड करती है। 

ये बातें बेहद सामान्य बात लग सकती है। ‘पेपा पिग’ के वीडियोज के संदर्भ में ये तर्क भी दिया जा सकता है कि वो परिवार की संकल्पना को मजबूत करता है। ये बात भी सामने आती है कि ब्रिटेन में जब पारिवारिक मूल्यों का लगभग लोप हो गया तब बच्चों को परिवार नाम की संस्था की महत्ता के बारे में बताने के लिए ‘पेपा पिग’ का सहारा लिया गया है। वो वहां काफी लोकप्रिय हो रहा है लेकिन उन्होंने इन वीडियोज को अपने धर्म, अपनी संस्कृति के हिसाब से बनाया है। लेकिन जिस तरह का असर हमारे देश के बच्चों पर पड़ रहा है, जिस तरह की बातों का उल्लेख ऊपर किया गया है, उसके बाद इन वीडियोज के हमारे देश में प्रसारण के बारे में विचार किया जाना चाहिए। अगर मेरे मित्रों की कही गई बातों का ध्यान से विश्लेषण करें तो इससे बच्चों के दिमाग में एक ऐसी संस्कृति की छाप पड़ रही है जो भारतीय नहीं है। बालमन पर पड़ने वाले इस प्रभाव का दूरगामी असर हो सकता है। बच्चे अपनी भारतीय संस्कृति से दूर हो सकते हैं। इस बात पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है कि क्या इन वीडियोज से हमारे सांस्कृतिक मूल्यों का और अधिक क्षरण होगा। इस समय संचार माध्यमों का उपयोग अपने हितों का विस्तार देने के औजार के तौर पर किया जा रहा है. इसका ध्यान रखना अपेक्षित है। तकनीक के हथियार से सांस्कृतिक और धार्मिक उपनिवेशवाद को मजबूत किया जा सकता है। ‘पेपा पिग’ के माध्यम से जो बातें हमारे देश के बच्चे सीख रहे हैं वो तो कम से कम इस ओर ही इशारा कर रहे है। बाल मनोविज्ञान भी इस बात की पुष्टि करता है कि बच्चे जब इस तरह के वीडियोज देखते हैं तो वो अपने आसपास की दुनिया को भी वैसा ही समझने लगते हैं। इसका असर बच्चों के बौद्धिक स्तर पर भले न पड़ता हो लेकिन उसका सामाजिक जीवन प्रभावित होता है। जब सामाजिक जीवन प्रभावित होता है तो संस्कृति प्रभावित होती है।

अभी हाल में भारत सरकार ने क्यूरेटेड और नॉन क्यूरेटेड सामग्री को लेकर मंत्रालयों के बीच स्थिति स्पष्ट की थी। वीडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स या ओवर द टॉप प्लेटफॉर्म (ओटीटी), जहां क्यूरेटेड सामग्री दिखाई जाती है, उसको सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अधीन किया गया था। नॉन क्यूरेटेड सामग्री दिखाने वाले जिसमें यूट्यूब, फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म्स आते हैं को इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अधीन किया गया। ये इन प्लेटफॉर्म्स पर चलनेवाले कंटेट पर बेहतर तरीके से ध्यान देने के लिए किया गया है। यूट्यूब पर चलनेवाले चैनलों पर अगर भारतीय संस्कृति को प्रभावित करनेवाले वीडियोज हैं तो भारत सरकार को इसको गंभीरता से लेना चाहिए। ऐसा करना इस वजह से भी आवश्यक है क्योंकि हमने वो दौर भी देखा है जब कांग्रेस ने वामपंथियों को संस्कृति और उससे जुड़े विभाग आउटसोर्स किए थे। उस दौर में कालिदास के नाटकों पर चेखव के नाटकों और प्रेमचंद के उपन्यास ‘गोदान’ पर मैक्सिम गोर्की के उपन्यास ‘मां’ को तरजीह दी गई। परिणाम ये निकला कि हमारा सांस्कृतिक क्षरण बहुत तेजी से हुआ। शिक्षा, भाषा, साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में जितना काम होना चाहिए था वो हो नहीं पाया। अंग्रेजी के दबदबे की वजह से सांस्कृतिक उपनिवेशवाद को मजबूती मिली। इसका असर बच्चों पर भी पड़ा। भारतीय भाषाओं के बाल साहित्य को अंग्रेजी में उपलब्ध सामग्री ने नेपथ्य में धकेल दिया। अब तकनीक के माध्यम से जिस तरहसे भारतीय संस्कृति को दबाने का प्रयास किया जा रहा है उसका प्रतिकार जरूरी है।  

प्रतिकार का दूसरा एक तरीका ये हो सकता है कि बच्चों के लिए बेहतर वीडियोज बनाकर यूट्यूब से लेकर अन्य माध्यमों पर प्रसारित किए जाएं। इसको ठोस योजना बनाकर क्रियान्वयित किया जाए।। भारतीय संस्कृति, भारतीय परंपरा और भारतीयता को चित्रित करते वीडियोज को बेहद रोचक तरीके से पेश करना होगा ताकि बच्चों की उसमें रुचि पैदा हो सके। हमारे पौराणिक कथाओं में कई ऐसे चरित्र हैं जो बच्चों को भा सकते हैं, जरूरत है उनकी पहचान करके बेहतर गुणवत्ता के साथ पेश किया जाए। इसके लिए सांस्थानिक स्तर पर प्रयास करना होगा क्योंकि ‘पेपा पिग’ का जिस तरह का प्रोडक्शन है वो व्यक्तिगत प्रयास से बनाना और उसकी गुणवत्ता के स्तर तक पहुंचना बहुत आसान नहीं है। इसके लिए बड़ी पूंजी की जरूरत है। व्यक्तिगत स्तर पर छिटपुट प्रयास हो भी रहे हैं लेकिन वो काफी नहीं हैं क्योंकि उनकी पहुंच बहुत ज्यादा हो नहीं पा रही है। हमारे देश को आजाद हुए सात दशक से अधिक बीत चुके हैं लेकिन हमने अबतक अपनी संस्कृति को केंद्र में रखकर ठोस काम नहीं किया। आजादी के पचहत्तर साल पूरे होने के मौके पर फिल्म जगत के बड़े निर्माताओं ने फिल्में बनाने की घोषणा की है। करण जौहर ने इसकी घोषणा करते हुए ट्वीटर पर प्रधानमंत्री को टैग भी किया है। जरूरत इस बात की है कि करण और उनके जैसे बड़े निर्माता बच्चों के लिए मनोरंजन सामग्री बनाने के बारे में भी विचार करें। ‘पेपा पिग’ के स्तर का प्रोडक्शन हो जिसमें भारतीय संस्कृति के बारे में बताया जाए। अगर हम ऐसा कर पाते हैं तो ना केवल अपनी संस्कृति को सांस्कृतिक औपनिवेशिक हमलों से बचा पाएंगे बल्कि आनेवाली पीढ़ी को भी भारतीयता से जोड़कर रख पाएंगे।