Translate

Monday, April 24, 2017

किसानों की समस्या का हल क्या?


इन दिनों एक बार फिर से देश के किसान और उनकी समस्याएं सुर्खियों में हैं । आमतौर पर किसान को चुनावों के वक्त तवज्जो मिलती है लेकिन इन दिनों हालात ऐसे बन रहे हैं कि चुनाव के वादों के पूरा करने को लेकर किसान की चर्चा है । उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने मंझोले और सीमांत किसानों की कर्ज माफी का एलान कर दिया है। लेकिन उत्तर प्रदेश से दूर तमिलनाडू के किसान अपनी बदहाली को लेकर नग्न होकर तमिलनाडू में प्रदर्शन कर रहे हैं, कहीं कलाई काटकर अपना विरोध और गुस्सा दिखा रहे हैं तो हाल ही में दिल्ली में प्रधानमंत्री कार्यालय के बाहर तक किसानों का प्रदर्शन पहुंच गया। मीडिया में किसानों का आंदोलन उतनी बड़ी खबर नहीं बन पाती जब तक कि कोई चौकानेवाली घटना ना हो । किसानों की बढ़ती आत्महत्या को लेकर महाराष्ट्र और कर्नाटक की सरकारों की कार्यशैली पर सवाल खड़े हो रहे हैं ।दरअसल अगर हम देखें तो आजादी के बाद से ही हमारा देश कृषि प्रधान देश रहा है लेकिन किसानों को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया जाता रहा। चुनाव के वक्त किसानों के भावनात्मक मुद्दों को उठाकर पार्टियां बोट बटोरती रही। किसानों का भी राजनीतिक इस्तेमाल उसी तरह से हुआ जिस तरह से अल्पसंख्यकों का हुआ । अल्पसंख्यकों के दिलों में डर पैदा कर, उनके वोट बटोरनेवाली पार्टियों ने कभी इसकी बेहतर तालीम से लेकर बेहतर रोजगार तक के बारे में ध्यान नहीं दिया, वादे बहुत किए गए लेकिन पूरे नहीं हुए। एक तरफ तो अल्पसंख्यकों को अपनी राजनीतिक जागीर समझनेवाली पार्टियों ने उनको खुश करने के लिए इतनी बातें की, इतनी नारेबाजी कर डाली कि बहुसंख्यकों को असुरक्षा बोध होने लगा जिसका प्रकटीकरण चुनाव दर चुनाव के नतीजों में हुआ । खासकर उत्तर प्रदेश के चुनाव में जब भारतीय जनता पार्टी ने किसी भी मुसलमान को टिकट नहीं दिया तो उसकी आलोचना तो हुई पर चुनाव नतीजे पर कोई असर नहीं पड़ा । बल्कि अब तो ये कहा जा सकता है कि पार्टी का मुसलमानों को टिकट नहीं देने का सियासी दांव सकारात्मक नतीजा दे गया ।
अल्पसंख्यकों की तरह ही किसानों के बारे में लगातार बातें होती रही लेकिन आजादी के सत्तर साल बाद भी हमारे किसान अपनी फसल के लिए इंद्र देवता की मेहरबानी पर ही निर्भर हैं। अगर मॉनसून अच्छा हुआ तो फसल अच्छी होगी नहीं तो किसान बदहाली का शिकार हो जाएगा। किसानों की बेहतरी के लिए ठोस नीति की आवश्यकता है।मौजूदा सरकार ने किसानों को ध्यान में रखकर कई कार्यक्रमों का एलान किया है लेकिन वो किसानों की समस्या को दूर करने के लिए काफी नहीं हैं । बाजार के नियमों के हिसाब यानि मांग और आपूर्ति के हिसाब से किसानों के उत्पाद का बाजार भाव तय किया जाना चाहिए। अभी तक होता क्या है जब आपूर्ति बढ़ जाती है तो किसानो को नुकसान होता है और जब आपूर्ति कम होती है तब भी किसानों को फायदा नहीं होता है क्योंकि एक तो उन पर अपने उत्पादों का दाम नहीं बढ़ाने का नैतिक दबाव रहता है दूसरे सरकारी खरीद में तय रेट पर ही अन्न खरीदे जाते हैं । इसका नुकसान ये होता है कि किसान पूंजी जमा नहीं कर पाता है । किसानों की बेहतरी के लिए यह बहुत जरूरी है कि वो पूंजी जमा करे । इसके अलावा देश पर संकट आदि आता है देश को उद्योगपतियों से ज्यादा किसानों से उम्मीद रहती है और उनको अन्नदाता आदि कहकर बरगलाया जाता रहा है ।
देश के कई राज्यों में किसानों की हालत को समझने के लिए इन आंकड़ों पर नजर डालते हैं । नेशनल सैंपल सर्वे के सिचुएशनल असेसमेंट सर्वे के मुताबिक उत्तर प्रदेश के किसान परिवारों की औसत आय चार हजार नौ सौ तेइस रुपए है और उसका खर्च छह हजार दो सौ तीस रुपए है । इस सर्वे के नतीजों के मुताबिक उत्तर प्रदेश में एक किसान परिवार को हर महीने तेरह सौ सात रुपए यानि सालभर में पंद्रह हजार छह सौ चौरासी रुपए का अतिरिक्त जुगाड़ करना पड़ता है । पैसों का यह अतिरिक्त जुगाड़ बैंकों से कर्ज से नहीं हो पाता है बल्कि ऊंचे ब्याज दर पर स्थानीय साहूकारों से लेना पड़ता है। साल दर साल किसान के परिवार पर यह कर्ज बढ़ता जाता है क्योंकि ब्याज चुकाने में ही उसका दम निकल जाता है। ऐसा नहीं है कि किसानों की यह हालत सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही है, पश्चिम बंगाल समेत देश के कई अन्य राज्यों में भी किसानों को स्थानीय साहूकारों के कर्ज के भरोसे परिवार चलाना पड़ता है ।और यही कर्ज जब बढ़ जाता है तब किसान मौत को गले लगाने के रास्ते पर चल निकलता है ।
किसान ऐसा नहीं करें इसके लिए आवश्यक है कि उनके पास एक निश्चित पूंजी हो जिससे वो अपने खर्चे का घाटा पूरा कर सके । दरअसल हम देखें तो इस दिशा में ज्यादा सोचा नहीं गया । किसानों को समाजवाद की घुट्टी आदि पिला-पिलाकर गरीब रखा गया जबकि होना यह चाहिए था कि किसानों को मांग और पूर्ति के हिसाब से उनके उत्पादों का मूल्य मिलना चाहिए था। किसानों को कारोबारियों की तरह खुलकर अपना कारोबार करने की छूट मिलनी चाहिए थी । कम आपूर्ति के वक्त उनको पैसे कमाने की छूट मिलनी चाहिए थी या उनके उत्पादों को सरकार को मांग और आपूर्ति के नियम के हिसाब से खरीदना चाहिए था ताकि उनको अधिक मूल्य या मुनाफा हासिल हो पाता और वो भविष्यके लिए पूंजा इकट्ठा कर सकते । कम आपूर्ति के दौर में सरकार उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए अलग से कोई कदम उठा सकती थी लेकिन हुआ ये कि किसानों के उत्पादनों के हितों का ध्यान रखे बगैर उपभोक्ताओं के हितों का ध्यान रखा गया । कृषि उत्पादों का मूल्य रेगुलेट करने से किसानों को बाजार में उत्पाद की कमी से जो मुनाफा हासिल हो सकता था वो हो नहीं पाया । नतीजे में पूंजी जमा नहीं हो पाई और किसान अपने नियमित खर्च के लिए साहूकार के पास जाने के लिए मजबूर हो गया । 
किसानों को आर्थिक रूप से मजबूत करने के बजाए अबतक की सरकारों ने किसानों को छोटे छोटे आर्थिक लाभ का लॉलीपॉप दिया । कभी किसानों की कर्ज माफी का दांव चला गया तो कभी बिजली बिलों की माफी दी गई । किसानों को लगातार फर्टिलाइजर पर सब्सिडी देने की नीति भी बनाई गई । खादकी इस सब्सिडी में कितने बड़े बड़े घोटाले हुए ये देश ने देखा । एक जमाने में तो सौ करोड़ से ज्यादा का यूरिया घोटाला सामने आया था जिसके छींटे एक केंद्रीय मंत्री और पूर्व प्रधानमंत्री के बेटे के दामन पर भी पड़े थे। खाद पर सब्सिडी का जो पूरा तंत्र है उससे किसानों से ज्यादा फायदा बिचौलियों और सरकारी अफसरों को हुआ। किसानों तक उचित लाभ तो पहुंचा नहीं लेकिन अफसरों और नेताओं की तिजोरियां भरती चली गईं । जरूरत इस बात की है कि किसानों को आर्थिक रूप से इतना समृद्ध किया जाए कि वो बाजार भाव पर बीज और खाद खरीद सकें । इसके लिए बाजार मे किसान को मजबूत करना होगा । किसानों के कर्ज को माफ करने की बजाए किसानों की बैंकों में जमा पूंजी पर ज्यादा ब्याज देने का प्रावधान किया जा सके । जिस तरह से बुजुर्गों को आर्थिक तौर पर मजबूत करने के लिए बैंक उनके जमा रकम पर ज्यादा ब्याज देती है उसी तरह से किसानों के लिए भी कोई नीति बनानी चाहिए । दरअसल किसानों पर दोहरी मार पड़ी । हुआ यह कि उनको बाजार के सारे नियम तो मानने पड़े लेकिन उनके उत्पादों को बाजार में खुलकर खेलने का मौका नहीं मिला । जरूरत इस बात की है किसानों को दया का पात्र नहीं बनाया जाए बल्कि उनको सचमुच अन्नदाता की हैसियत मिले ।   

Saturday, April 22, 2017

टिकते नहीं विदेशी प्रकाशक

हिंदी का इतना बड़ा बाजार दिखाई देता है कि दुनिया भर के प्रकाशकों को ये बाजार हमेशा से लुभाता रहा है । दुनिया भर के प्रकाशक, खासकर अंग्रेजी के प्रकाशक, जब हिंदी भाषा के बाजार के आकार को देखते हैं तो उनको लगता है कि इस बाजार में उनकी भी भागीदारी होनी चाहिए। इस बाजार में प्रवेश और यहां के बाजार के मुनाफे में अपनी हिस्सेदारी के उद्देश्य से नियमित अंतराल पर अंग्रेजी के प्रकाशक इस बाजार में दस्तक देते रहते हैं। पेंग्विन से लेकर हार्पर कालिंस तक ने इस बाजार में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई थी। अभी हाल ही में इंगलैंड के एक प्रकाशक 'लोटस फीट पब्लिकेशन' ने भारत में अपना कारोबार शुरू करने का एलान किया है । लोटस फीट पब्लिकेशन ने हिंदी के बाजार में शुरुआत में गीत चतुर्वेदी के लघु उपन्यास के साथ साथ मनीषा कुलश्रेष्ठ, आकांक्षा पारे, किरण सिंह, अजय नावरिया और विवेक मिश्र की लंबी कहानियों का संग्रह छापने का एलान भी किया है । उनका दावा है कि वो अन्य भारतीय भाषाओं की चुनी हुई साहित्यक कृतियों का अंग्रेजी में अनुवाद करवाकर विश्वस्तर पर उसका प्रकाशन और वितरण करेंगे । इस पहल का स्वागत किया जाना चाहिए। यह हिंदी प्रकाशन जगत में स्पदंन पैदा कर सके ऐसी उम्मीद भी की जानी चाहिए। इसके पहले भी हिंदी प्रकाशन जगत में बहुत सारे विदेशी प्रकाशन गृहों के अलावा अंग्रेजी के प्रकाशकों और बड़ी पूंजी लेकर इस कारोबार में उतरनेवालों की एक फेहरिश्त है। उदाहरण के लिए अगर हम पेंग्विन और हार्पर कालिंस को ही देखें तो इन लोगों ने बहुत ताम-झाम के साथ हिंदी प्रकाशन जगत में प्रवेश का एलान किया था । बड़े बड़े साहित्यक नामों को अपने साथ जोड़ा भी था लेकिन विशाल हिंदी पाठक में उनकी वो स्वीकार्यता नहीं बन पाई जिसकी उम्मीद जताई गई थी। धीरे धीरे इन प्रकाशनों ने हिंदी से हाथ खींचना शुरू कर लिया बल्कि कहना ये चाहिए कि साहित्यक कृतियों के प्रकाशन को कम करना शुरू कर दिया । अंग्रेजी में हिट किताबों का हिंदी अनुवाद या फिर साहित्येतर पुस्तकों का प्रकाशन शुरू कर दिया। हार्पर कांलिस ने तो सुरेन्द्र मोहन पाठक के पूर्व प्रकाशित उपन्यासो को छापकर आकर्षक पैकेजिंग में बेचना शुरु कर दिया । इसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। वो कारोबारी हैं और कारोबार में मुनाफा ही उनका लक्ष्य होता है। सुरेन्द्र मोहन पाठक की कृतियों को नया पाठक भी मिला । प्रभात प्रकाशन के निदेशक पियूष कुमार नए प्रकाशनों का स्वागत करते हैं लेकिन जब उनसे पूछा गया कि अबतक इनकी सफलता का ट्रैक रिकॉर्ड इतना बढ़िया क्यों नहीं है। पियूष कहते हैं कि जब अमेरिका में बैठा प्रकाशन गृह का सीईओ ये देखता है कि पचास करोड़ हिंदी भाषी हैं तो वो फौरन अपनी रणनीति बनाता है भारत के अपने प्रतिनिधि को आदेश देता है कि एक साल में सौ किताबें छापनी चाहिए। उसको बताया जाता है कि सालभर में मुनाफा नहीं हो सकता है तो उसको लगता है कि साल दो साल तक निवेश करना चाहिए क्योंकि बाजार का आकार बहुत बड़ा है। जब दो साल में भी मुनाफा नहीं होता है तो वो अपना कारोबार समेटने लगता है।    
इसके अलावा पुस्तकों के चयन में भी इन प्रकाशन गृहों से चूक होती है जिसकी वजह से हिंदी के पाठक इनको नही मिल पाते हैं । होता यह है कि जो भी विदेशी प्रकाशक हिंदी के बाजार में उतरने की कोशिश करता है वो हिंदी के कुछ साहित्यकारों से संपर्क करता है। अब यह संपर्क किस आधार पर होता है या बगैर किसी आधार के होता है यह कहना मुश्किल है। जब संपर्क हो जाता है तो भविष्य की उनकी सारी योजनाएं उन्हीं कुछ साहित्यकारों की सलाह पर चलने लगता है। पूर्व में तो यह भी देखने में आया कि इन सलाहकार सहित्यकारों ने अपनी और अपने दोस्तों की पूर्व प्रकाशित किताबों को नए प्रकाशन गृह से छपवाने की सलाह दी और वो किताबें छपीं भी। नतीजा क्या हुआ कि हिंदी का पाठक नए प्रकाशन गृहों की किताबों को लेकर उत्साहित नहीं हो पाया क्योंकि जो उत्पाद नई साज सज्जा में नए प्रकाशन गृह से बाजार में भेजा गया उसको पाठक पहले ही पसंद या नापसंद कर चुके थे। छपी हुई रचनाओं के प्रकाशन का पुनर्प्रकाशन ने इस तरह के प्रकाशन गृहों को बहुत नुकसान पहुंचाया। अब लोटस फीट ने जिन कहानीकारों की लंबी कहानियों को छापने का एलान किया है उसके साथ यह नहीं बताया गया है कि वो नई रचनाएं होंगी या फिर उनकी पूर्व में प्रकाशित रचनाओं को प्रकाशित किया जाएगा। अगर नई रचनाओं को संकलन छपता है तो अच्छी बात है और पाठकों में उसको लेकर एक उत्सुकता होगी लेकिन अगर कहानीकारों के पूर्व प्रकाशित संकलनों से निकालकर नया संग्रह बनाकर बाजार में भेजा जाता है तो उसकी सफलता में संदेह है। लोटस फीट ने जिन भी रचनाकारों के नाम की घोषणा की है वो सभी अगर अपनी नई रचना देते हैं और वो एक जिल्द में प्रकाशित होती है तो इसमें सफल होने की गुंजाइश ज्यादा रहेगी।
दरअसल हिंदी प्रकाशन जगत का मन-मिजाज ही ऐसा है कि यहां बहुत ज्यादा फॉर्मूलों पर या मार्कंटिंग के टूल्स का इस्तेमाल कर सफल नहीं हुआ जा सकता है। हिंदी प्रकाशन जगत खासकर साहित्यक प्रकाशन की जो दुनिया है वो बहुत कुछ व्यक्तिगत संबंधों पर ही चलती है। लेखक-प्रकाशक के बीच रूठने मनाने का दौर चलता है, शिकवा शिकायतें भी होती हैं लेकिन वो दोनों ज्यादातर मामलों में एक दूसरे का साथ छोड़ते नहीं हैं। मुझे याद पड़ता है कि कई सालों पहले रे माधव और रेनबो पब्लिकेशंस के नाम से दो प्रकाशन संस्थान हिंदी में आए थे । लेखकों को उनकी रचनाओं के लिए अग्रिम भुगतान के तौर पर मोटी रकम दी गई थी लेकिन नतीजा क्या रहा। दोनों प्रकाशन गृह का आज कोई नामलेवा नहीं है। जुतने गाजे बाजे के साथ वो आए थे उतनी ही खामोशी के साथ हिंदी के बाजार से प्रस्थान कर गए। जिन लेखकों ने अग्रिम राशि लेकर अपनी किताबें इनको दी थीं वो बाद में अन्य प्रकाशकों के यहां चक्कर लगाते देखे गए थे ताकि उनकी किताबें फिर से प्रकाशित हो सकें। कहा तो यहां तक गया कि छोटे अंतराल के लिए हिंदी प्रकाशन जगत में आए इन दो प्रकाशन संस्थानों ने इस कारोबार को फायदा की जगह नुकसान ही पहुंचाया। इस बात की पड़ताल की जानी चाहिए कि पेशेवर तरीके से चलाने का दावा करने वाले ये लोग बाजार में बरकरार क्यों नहीं रह पाए।

इससे इतर अगर हम हिंदी के प्रकाशन कारोबार को देखें तो यहां अबतक पेशवर मैकेनिज्म बन नहीं पाया है। हिंदी के प्रकाशन में बिक्री के आंकड़ों को लेखकों से साझा करने की प्रवृत्ति रही नहीं है। साल में एक बार जब रॉयल्टी का बही खाता लेखकों को भेजा जाता है तब पता लगता है कि उसकी अमुक कृति की इतनी प्रति बिकीं। लेखकों के सामने प्रकाशकों पर विश्वास करने के अलावा कोई चारा नहीं है। इससे भी बुरी स्थिति यह है कि अब भी हिंदी के अस्सी फीसदी प्रकाशक अपने लेखकों के साथ किसी भी किताब के प्रकाशन को लेकर करार नहीं करते हैं। करार नहीं होने की स्थिति में लेखक और प्रकाशक दोनों के सामने अराजक होने का विकल्प रहता है। कई बार इस तरह की अप्रिय स्थितियां सामने आईं हैं। किसी का नाम लेना यहां उचित नहीं होगा क्योंकि हिंदी के लेखकों-पाठकों को इन अप्रिय प्रसंगों की जानकारी है। अच्छा जहां करार होता भी है वहां सभी प्रकाशकों के करारनामे अलग अलग हैं। इस करारनामे का कोई स्टैंडर्ड फॉर्मेट नहीं हैं।यह सब इस वजह से भी होता है कि प्रकाशकों पर नजर रखने की या उस कारोबार को रेगुलेट करने के लिए कोई एक संस्था नहीं है जो लेखक- प्रकाशक के बीच के मसलों पर अपनी राय दे सके, विवाद की स्थिति में उसको सुलझाने की कोशिश कर सके। प्रकाशकों को चाहिए कि वो एक ऐसी संस्था बनाएं जो कि इस तरह के मसलों पर नजर रख सकें और उस संस्था के फैसले सभी सदस्यों पर लागू हों । इस संस्था में प्रकाशकों के प्रतिनिधि के अलावा लेखकों की नुमाइंदगी भी हो और साथ ही साहित्य अकादमी जैसी संस्था के प्रतिनिधि भी इस संस्था में हों। हिंदी प्रकाशन जगत में पारदर्शिता लेखक और प्रकाशक दोनों के हित में है। अगर यह पारदर्शिता रहेगी तो बहुत संभव है कि विदेशों से जो प्रकाशक नए प्रकाशन गृह शुरू करने की योजना के साथ भारत आते हैं वो यहां पहले से स्थापित प्रकाशकों के कारोबार में पूंजी लगाने के बारे में सोचें। नए प्रकाशन गृहों के आने और जाने से तो यह स्थिति बेहतर होगी कि विदेशी पूंजी का निवेश स्थानीय प्रकाशकों के कारोबार मे हो। इससे इस सेक्टर को मजबूती मिलेगी, संभव है लेखकों को ज्यादा पैसे मिलें और प्रकाशकों के मुनाफे में बढ़ोतरी हो।          

हिंदी की बाधाएं

हाल के दिनों में दो खबरें ऐसे आईं जिसको लेकर भाषा के पैरोकारों की पेशानी पर बल पड़ने लगे। पहली खबर तो ये आई कि सीबीएसई के स्कूलों में दसवीं तक हिंदी की शिक्षा को अनिवार्य किया जा रहा है और दूसरी खबर ये आई कि हिंदी पर बनाई गई संसदीय समिति की कुछ सिफारिशों को राष्ट्रपति ने मंजूरी दे दी है । इन सिफारिशों में ये भी शामिल था कि राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और अन्य मंत्री अपना भाषण हिंदी में देंगे, जिसको भी मंजूरी मिली, लेकिन शर्त के साथ। शर्त ये इनको हिंदी आती हो और वो इस भाषा में सहज हों। सीबीएसई ने हिंदी को अनिवार्य करने की खबरों से इंकार कर दिया और कहा कि भाषा को लेकर जो फॉर्मूला चल रहा है वही जारी रहेगा। लेकिन संसदीय समिति की सिफारिशों के खिलाफ एक माहौल बनाने की कोशिश की जाने लगी है। यह सत्य और तथ्य है कि भारत के लगभग साठ करोड़ लोग हिंदी बोलते और समझते हैं। यह भी माना जाने लगा है कि हिंदी एक तरीके से पूरे देश में संपर्क भाषा के तौर पर विकसित हो चुकी है और कश्मीर से कन्याकुमारी तक और कच्छ से कोलकाता तक सबलोग हिंदी समझते हैं। तो फिर हिंदी का विरोध क्यों। इसका उत्तर एक शब्द का है, राजनीति।
अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए गैर हिंदी प्रदेश के कुछ नेता इसको मुद्दा बनाकर जनता की भावनाएं भड़काना चाहते हैं। इन भावनाओं को भड़काने के पीछे भाषा से कुछ लेना देना हो ऐसा प्रतीत नहीं होता है। बल्कि ये संकेत मिलते हैं कि इसके पीछे वोटबैंक की राजनीति है। डीएमके नेता एम के स्टालिन ने पिछले चुनाव के वक्त कई इलाकों में हिंदी में अपनी पार्टी के पोस्टर लगवाए थे। अब संसदीय समिति की सिफारिश के बाद वो भी हिंदी के विरोध का झंडा लेकर खड़े हो गए हैं । इसके पहले भी वो हाईवे पर बोर्ड में हिंदी में शहरों के नाम लिखवाने को मुद्दा बनाने की कोशिश में लगे थे जो परवान नहीं चढ़ सकी। इन विरोधों के बीच केंद्र की तरफ से बार-बार ये कहा गया है कि हिंदी किसी पर थोपी नहीं जाएगी ।
दरअसल हिंदी को सरकारी नोटिफिकेशन आदि से सर्वामान्य भाषा के तौर पर स्थापित किया भी नहीं जा सकता है। इसके लिए हिंदी अपना रास्ता खुद बना रही है। हिंदी के विकास में दो सबसे बड़ी बाधा है पहली तो अंग्रेजी के पैरोकार जो खुद औपनिवेशिक मानसिकता में जी रहे हैं। उनको लगता है कि हिंदी का अगर दबदबा कायम हुआ तो उनकी धमक कमजोर हो जाएगी । इसके लिए वो लगातार प्रयत्न करते हैं कि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाएं एक दूसरे से झगड़ती रहें। जबकि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में किसी तरह का कोई झगड़ा है नहीं। अन्य भारतीय भाषाओं की कृतियों का जितना अनुवाद हिंदी में होता है उतना किसी अन्य भाषा में नहीं होता है। हिंदी समेत अन्य भारतीय भाषाओं को यह समझना होगा कि हित इसी में हैं कि वो साथ साथ चलें। कहा भी गया है कि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाएं सहोदर हैं तो फिर झगड़ा कैसा और क्यों? हिंदी के विकास में दूसरी बाधा उसका अपना तंत्र है। हिंदी को सर्वमान्य बनाने के लिए भाषा में नए शब्दों के गढ़ने की जरूरत है। कई बार हिंदी में शब्दों की कमी नजर आती है और उसके लिए अंग्रेजी के वैकल्पिक शब्द का प्रयोग करना पड़ता है । जैसे हिंदी में रोमांस, डेट आदि के लिए शब्द गढ़ने की जरूरत है । हिंदी की स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए और युवाओं के बीच पैठ बनाने के लिए एक तरह का खुलापन भी लाना होगा। अतिशुद्धतावाद से बचना होगा और अगर अन्य भाषा के शब्द सहजता से आ रहे हैं तो उसका स्वागत भी करना होगा ।

      

Tuesday, April 18, 2017

सेना को मिले पूरी छूट

कश्मीर में एक पत्थरबाज को सेना ने अपनी गाड़ी के बोनट पर बांधकर कई लोगों की जान बचाई, लेकिन बावजूद इसके मानवाधिकार के नाम पर कई लोगों ने शोर मचाना शुरू कर दिया। इस तरह की खबरें भी आई कि सेना ने कोर्ट ऑफ इंक्वायरी के आदेश दे दिए हैं जिसकी अबतक सेना ने पुष्टि नहीं की है। अगर कोर्टऑफ इंक्यावरी होती भी है तो यह सिर्फ उस घटना से जुड़े तथ्यों को जुटाने के लिए भी की जा सकती है। सेना के जिस अफसर ने उस वक्त ये फैसला लिया वह हालात को देखते हुए बिल्कुल उचित और राष्ट्रहित में लिया फैसला था। इश फैसले ने कम से कम बीस लोगों की जान बचाई। सेना और चुनाव कार्य से जुड़े अफसरों को हिंसक हो रहे पत्थरबाजों ने घेर लिया था और उनपर लगातार हमले हो रहे थे। उस वक्त सेना के उस नौजवान अफसर ने जो फैसला लिया उसकी जितनी भी तारीफ की जाए कम है ।  
पत्थरबाज को गाड़ी के आगे बांधकर जान बचाने की घटना की आलोचना करनेवालों को इस वीडियो के एक दो दिन पहले वायरल होते उस वीडियो की याद नहीं आ रही है जिसमें पत्थरबाज सीआरपीएफ के जवानों के साथ धक्कामुक्की कर रहे हैं। उनको थ्पपड़ तक मारा, लेकिन जवानों ने अपना धीरज नहीं खोया। कश्मीर के पत्थरबाजों के लिए हाय तौबा मचानेवालों ने उस घटना पर खामोशी अख्तियार कर ली गोया सेना और अर्धसैनिक बलों का सम्मान ना हो। खबरों के मुताबिक सूबे की मुख्यमंत्री ने सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत से मिलकर युवक को गाड़ी में बांधने का मुद्दा उठाया लेकिन महबूबा ने उन पत्थरबाजों पर क्या कार्रवाई की जिन्होंने अर्धसैनिक बल के जवानों को अपमानित किया। दरअसल जिन लोगों का दिल गाड़ी पर बंधे पत्थरबाज के लिए पसीज रहा है उनको यह बात समझ में आनी चाहिए कि सेना किन मुश्किल परिस्थितियों में वहां काम कर रही है । उनको समझ तो ये भी आना चाहिए कि सेना वहां आतंकवादियों से मुकाबला कर रही है और ऐसे में अपनी और अन्य लोगों की जान बचाने के लिए अगर एक शख्स क गाड़ी के आगे बांध भी दिया गया तो आसमान नहीं टूट पड़ा है ।
कश्मीर के बिड़ते हालात को लेकर केंद्र सरकार गंभीर है । सरकार सख्ती और बातचीत दोनों रास्ते पर आगे बढ़ना चाह रही है। एक तरफ सेना को पत्थरबाजों और आतंकवादियों से निबटने क लिए खुली छूट दी गई है और गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने साफ संदेश दिया है कि सेना और सुरक्षाबलों को अपने मान सम्मान से समझौता करने की जरूरत नहीं है । गड़बड़ी फैलानेवालों से निबटने के तरीके अपनाने के लिए सेना को छूट भी दी गई है और कहा गया है कि हिंसा को काबू में करने के लिए उपद्रवियों से सख्ती से पेश आएं। साथ ही गृह मंत्रालय ने सेना को यह भी निर्देश दिए हैं कि आम लोगों के साथ सुरक्षा बलों का व्यवहार संयत होना चाहिए। सुरक्षा बलों को ये भी हिदायत दी गई है कि उनको भड़काने की कोशिशें भी होंगी लेकिन उपद्रवियों पर कार्रवाई करते वक्त इस बात का ध्यान रखा जाए कि आम आदमी को परेशानी ना हो । पत्थरबाजों से निबटने के लिए भी सरकार ने अब पैलेट गन की बजे प्लासिट्क बुलेट का इस्तेमाल करने को कहा है लेकिन जरूरत पड़ने पर पैलेट गन के इस्तेमाल की इजाजत भी दी गई है। इसके अलावा केंद्र सरकार अब उन विकल्पों को भी तलाश रही है जिसमें अलवाहवादियों के किसी गुट से बातचीत हो सके। कश्मीर पर रणनीति बनाने के लिए सोमवार को गृह मंत्रालय में उच्चस्तरीय बैठक हुई जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल भी शामिल थे ।

दरअसल कश्मीर में जिस तरह से पाकिस्तान सक्रिय है और वहां के युवाओं को भड़काने में लगा है उसपर काबू करने के लिए सरकार को रणनीति बनानी होगी । सोमवार को जिस तरह से कॉलेज के छात्रों ने सड़तक पर उतरकर सुरक्षा बलों पर पत्थर बरसाना शुरू किया वो भी पाकिस्तान के उकसावे पर किया गया था। सुरक्षा बलों ने पुलवामा के एक क़लेज पर रेड डाली थी जिसके विरोध में सोमवार को छात्र उग्र हो गए। छात्रों ने तो सोपोर में सुरक्षाबलों के एक कैंप पर भी हमला कर दिया लेकिन सुरक्षाबलों ने धैर्य का परिचय देते हुए जवाबी कार्रवाई नहीं की। सवाल यही है कि छोटे-छोटे स्कूली बच्चों को कौन या किस तरह से भड़का रहा है। आतंकवादी बुरहान वानी के मारे जाने के बाद भी आतंकवादियों ने स्कूलों को निशाना बनाया था । आतंकावादी चाहते हैं कि कश्मीरी छात्र तालीम हासिल ना करें क्योंकि जाहिलों को धर्म के नाम पर बरगलाना आसान होता है । कश्मीरियों को यह बात समझ में आनी चाहिए कि ये पूरी नस्ल को जाहिल करने की चाल है। छात्रों को भड़काने के लिए पाकिस्तान मैं बैठे सरगना व्हाट्सएप और अन्य चैट एप्स का सहारा लेता है और छात्रों को बीच उकसाने वाले संदेश भेजता रहता है । गलत सलत संदेश भेजकर पाकिस्तान छात्रों को ना सिर्फ अपनी आतंकवादी हरकतों में ढाल की तरह इस्तेमाल करता है बल्कि भारती सुरक्षाबलों के खिलाफ भी उनको भड़काकर अपनी रोटियां सेंकता है । पिछले दिनों ऐसे ही एक व्हाट्सएप मैसेज की जब पड़ताल की गई थी तब पता चला था कि वो मैसेज पाकिस्तान से शुरू हुआ था जिसमें कश्मीरियों से अपील की गई थी कि अमुक जगह पर सुरक्षाबलों की मुठभेड़ चल रही है और लोग वहां पहुंचकर सुरक्षाबलों पर पत्थर फेंकें । इन स्थितियों में सेना के पास विकल्प कम बचते हैं। सेना को आतंकवादियों के अलावा पत्थरबाजों से भी निबटना पड़ता है। ऐसे में अगर किसी शख्स को गाड़ी के आगे बांधकर हालात को सामान्य किया जा रहा हो या जान बचाईजा रही हो तो ये तो गोली चलाकर अपनी जान बचाने से बेहतर ही माना जाना चाहिए।  

तेते पांव पसारिए, जेते लांबी सौर


अकबर-बीरबल से संबंधित एक मशहूर किस्सा है। अकबर हमेशा से बीरबल की तीक्ष्ण बुद्धि और प्रतिभा से प्रभावित रहते थे। लगभग हर मसले पर बीरबल से राय मशविरा करते थे। दोनों एक दूसरे पर व्यंग्य आदि भी करते थे, कहने का अर्थ यह कि दोनों में मित्रवत संबंध थे । अकबर-बीरबल के बीच के इस तरह के संबंध को देखकर अकबर के नवरत्नों समेत अन्य दरबारियों को ईर्ष्या होती थी । उन्हें जब भी मौका मिलता वो बादशाह अकबर से बीरबल की शिकायत करते कि वो जरूरत से ज्यादा बीरबल को तरजीह देते हैं । जब बीरबल के खिलाफ अन्य दरबारियों की शिकायत बढ़ने लगी तो अकबर आजिज आने लगे और एक दिन शिकायत करनेवालों को कह दिया कि आप लोग भी बीरबल जैसे गुणी बनिए और चुनौती दी कि अगर उनमें से कोई बीरबल से ज्यादा बुद्धिमान है तो उसको बीरबल से अधिक तवज्जो दी जाएगी। अकबर ने ये कह तो दिया लेकिन उनको यह बात सालती रही । एक दिन अकबर ने अपने सभी दरबारियों को दरबार में हाजिर रहने का आदेश दिया । उस निश्चित दिन अकबर ने तीन फुट लंबी और दो फुट चौड़ी एक चादर मंगवाई । अकबर ने अपने दरबारियों से कहा कि मैं यहा लेट रहा हूं । यह चादर मुझे इस प्रकार ओढ़ाना है कि सिर से पैर तक मेरा पूरा शरीर ढक जाए। एक एक करके सभी लोग आने लगे और अकबर को उस चादर से ढंकने की कोशिश करने लगे लेकिन सामान्य कद-काठी के अकबर उस चादर से पूरी तरह से ढंक नहीं पा रहे थे। जब सब दरबारियों ने कोशिश करके देख लिया तो अकबर ने बीरबल को भी चादर ओढाने के लिए कहा । बीरबल वहां पहुंचे जहां अकबर लेटे हुए थे और अकबर से कहा- तेते पांव पसारिए जेते लांबी सौर यानि चादर के अनुसार अकबर को पैर सिकोड़ने के लिए कहा । पूरा दरबार बीरबल की बात सुनकर चकित था । अकबर ने बीरबल की बात मानी और पांव सिकोड़ लिए। छोटे चादर में भी उनका शरीर ढंक गया । अब बारी अकबर की थी, उन्होंने सभी दरबारियों को संबोधित करते हुए कहा कि आप लोगों ने बीरबल की समझदारी देख ली ।
अकबर-बीरबल की इस कहानी से जो संदेश निकलते हैं वो ये कि हर शासक के पास एक तो बीरबल जैसा बुद्धिमान सलाहकार होना चाहिए और उसको पांव उतना ही फैलाना चाहिए जितनी उसकी चादर हो । दिल्ली में भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन से निकली आम आदमी पार्टी को अगर देखें तो वो रह-रहकर चादर का ध्यान नहीं रखती हैं और अपने पांव फैलाने लगती है। दो हजार चौदह के लोकसभा चुनाव के वक्त पार्टी को लगा था कि वो देश में एक वैकल्पिक राजनीतिक दल के रूप में स्वीकृत हो जाएगी और देशभर में अपने उम्मीदवार खड़े कर दिए । नतीजा सबके सामने था । अरविंद केजरीवाल और कुमार विश्वास समेत तमाम नेताओं को हार का मुंह देखना पड़ा था । इस वक्त पार्टी के नातओं ने माना था कि देशभर में चुनाव लड़ने का फैसला गलत था और उसके पहले पार्टी को दिल्ली में मजबूत करना चाहिए। जनता ने लोकसभा चुनाव के बाद 2015 में दिल्ली में हुए विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को अभूतवूर्व बहुमत दिया। एक बार फिर से अरविंद केजरीवाल की अखिल भारतीय महात्वाकांक्षा कुलांचे मारने लगी थी । पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव आए और पार्टी ने फैसला किया कि वो विधानसभा चुनावों में अपनी किस्मत आजमाएगी । पार्टी के नेता तो पंजाब में सरकार बनना तय मान रहे थे । एक बार फिर से विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी की महात्वाकांक्षा औंधे मुंह गिरी, पंजाब तक में अपेक्षित सफलता नहीं मिली। बीरबल की उक्ति एक बार फिर चरितार्थ होती नजर आई- तेते पांव पसारिए जेती लांबी सौर।
अब दिल्ली के उपचुनाव के नतीजे में जब आम आदमी पार्टी की जमानत जब्त हो गई तो पार्टी के लिए संकट का वक्त है। आम आदमी पार्टी का हर किसी से टकराना दिल्ली की जनता को रास नहीं आ रहा है। एक जमाने में जो आम आदमी पार्टी की ताकत थी वही अब इसकी कमजोरी बनती जा रही है। दिल्ली में ऐतिहासिक बहुमत मिलने के बाद आम आदमी पार्टी के नेताओं से जनता की अपेक्षा भी ऐतिहासिक थी । आम आदमी पार्टी के नेता आरोपों से लेकर कोर्ट कचहरी तक में उलझे रहे और दिल्ली की बेहतरी के लिए कुछ खास कर पाए, ये दिखा नहीं। मोहल्ला क्लीनिक से लेकर स्कूलों में बेहतर कामकाज का दावा जरूर किया गया लेकिन जिस तरह से मोहल्ला क्लीनिक में स्वास्थ्य मंत्री की बेटी को सलाहकार बनाने का मुद्दा गरमाया उसको पार्टी ठीक से हैंडल नहीं कर पाई । जाली डिग्री के मसले पर मंत्री का जेल जाना, भ्रष्टाचार में मंत्री का लिप्त पाए जाने के बाद पद से हटाया जाना, विधायक की सेक्स सीडी, इन घटनाओं से आम आदमी पार्टी की छवि छीज रही थी लेकिन पार्टी के नेता बजाए दिल्ली में अपनी जमीन मजबूत करने के दूसरे राज्यों में अपनी राजनीतिक महात्वाकांक्षा के पोषण में लगे रहे। दिल्ली की जमीन उनके हाथ से छूटती जा रही थी । आम आदमी पार्टी के मंत्रियों पर अपने चहेतों को सरकार में नियुक्ति कर मनमाने तरीके से वेतन घर आदि दिलाने का मामला भी सामने आने लगा। 
इसके अलावा अरविंद केजरीवाल के बयानों ने भी पार्टी को नुकसान पहुंचाया । प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को मनोरोगी कहना, वित्त मंत्री अरुण जेटली पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाना आदि का भी दिल्ली की जनता पर कोई असर नहीं पड़ा बल्कि जनता हर दिन इस तरह के आरोपों आदि से ऊबने लगी थी । इसका यह नुकसान हुआ कि हर कोई कहने लगा था सबसे झगड़ कर शासन नहीं चल सकता है। केजरीवाल को भले ही दिल्ली की जनता ने प्रचंड बहुमत दिया लेकिन जब दो साल बाद भी जनता की अपेक्षाएं पूरी नहीं हुईं तो उनकी नाराजगी सामने आने लगी । आम आदमी पार्टी ने जो चुनावी वादे किए थे उसमें से भी ज्यादातर हवाई ही साबित हुए। अब पार्टी के सामने एमसीडी चुनाव में अपनी प्रासंगिकता साबित करने का एक मौका है लेकिन जिस तरह से केजरीवाल चुनाव टालने की बात कर रहे हैं उससे लगता है कि उनका आत्मविश्वास हिल गया है और राजनीति में हिले आत्मविश्वास से जंग नहीं जीती जा सकती है ।   

Saturday, April 15, 2017

हिंदी के साथ फिर अन्याय

चंद दिनों पहले विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने पत्रिकाओं की एक सूची प्रकाशित की । इस सूची को प्रकाशित करने का उद्देश्य यह बताया जा रहा है कि बेहतर शोध को बढ़ावा देने और शोध की स्तरीयता को बरकरार रखने के लिए इन पत्र-पत्रिकाओं में ही रिसर्च पेपर प्रकाशित होने को अपेक्षित माना गया । विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने जिन अड़तीस हजार छह सौ तिरपन पत्रिकाओं की सूची प्रकाशित की है उसमें हिंदी समेत किसी भारतीय भाषा में निकलने वाली पत्रिका नहीं है । यह पूरी सूची मेडिकल, इंजीनियरिंग से लेकर समाज विज्ञान और साहित्य आदि सभी विषयों के शोधार्थियों के लिए है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की इस सलाह-सूची में किसी भारतीय भाषा की पत्रिका का नहीं होना जितना दुर्भाग्यपूर्ण है उससे ज्यादा दुखद ये है कि इसमें उन पत्रिकाओं को शामिल कर लिया गया है जिनका स्तरीय होना ही संदिग्ध रहा है, वो अमेरिकी पत्रिकाओं की नकल भर है। इसमें कंप्यूटर की एक ऐसी पत्रिका है जो यह बताती है कि कंप्यूटर के पार्ट्स को जोड़कर कैसे मशीन तैयार की जा सकती है । इस तरह की कई पत्रिकाएं इस सूची में मौजूद हैं । लापरवाही तो अलहदा मुद्दा है लेकिन इस सूची में हिंदी समेत भारतीय भाषाओं की किसी भी पत्रिका का नहीं होना भी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अफसरों या सूची तैयार करनेवालों को अखरा नहीं, यह स्थिति परेशान करनेवाली है ।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग देशभर के केंद्रीय विश्वविद्यालयों को धन तौ मुहैया करवाता ही है शोध या अन्य तरह के कार्यों के लिए भी पैसे देता है । अब यह समझ से परे है कि शोध की गुणवत्ता सिर्फ अंग्रेजी की पत्रिका में प्रकाशित होकर कैसे बरकरार रह सकती है । देश के सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों को धन मुहैया करवानेवाले विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को क्या यह नजर नहीं आता है कि उन्हीं केंद्रीय विश्वविद्यालयों से सैकड़ों पत्रिकाएं निकल रही हैं । अलग अलग विभागों की अलग अलग पत्रिकाएं, जिसके संपादक या तो वहां के प्रोफेसर हैं या उस युनिवर्सिटी के कुलपति । उदाहरण के तौर पर अगर हम देखें तो महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा से बहुवचन और पुस्तक वार्ता दो पत्रिकाएं निकलती हैं । बकायदा इन पत्रिकाओं के लिए विश्वविद्यालय में संपादक नियुक्त हैं और पूरा का पूरा प्रकाशन विभाग चलता है । प्रकाशन अधिकारी से लेकर प्रकाशन और वितरण का काम देखने वाले अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति की गई है । इन दोनों पत्रिकाओं के प्रधान संपादक विश्वविद्यालयके कुलपति खुद हैं, जो अपने विषय के बड़े विद्वान माने जाते हैं । तो क्या ये माना जाए कि इतने बड़े विभाग के होने और बाहर के विद्वानों से संपादन करवाने के बावजूद विश्वविद्यालय की ये दोनों पत्रिकाएं स्तरीय नहीं हैं। इनमें छपकर किसी शोधार्थी को कोई फायदा नहीं होने वाला है। कम से कम विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की पत्रिकाओं की सलाह सूची को देखकर तो यही लगता है। अगर ऐसा है तो फिर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को इन पत्रिकाओं पर होनेवाले खर्चे के बारे में गंभीरता से सोचना होगा क्योंकि अगर पत्रिकाएं स्तरीय नहीं हैं तो करदाताओं का पैसा इन पर क्यों खर्च किया जा रहा है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को इन खर्चों पर विचार करना चाहिए क्योंकि धन देने के अलावा उसके सही उपयोग हो, ये देखने की जिम्मेदारी भी उसकी ही है ।
ऐसा नहीं है कि सिर्फ महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में ही इस तरह की पत्रिकाएं निकल रही है । काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से भी प्रज्ञा नाम की पत्रिका निकलती है । इस पत्रिका में भी विश्वविद्यालय के संसाधनों का इस्तेमाल होता है । अगर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को इस पत्रिका में भी स्तरीयता नहीं दिखाई देती है तो उसको काशी हिंदू विश्वविद्यालय को इस पत्रिका को फौरन बंद करने का आदेश देना चाहिए या फिर उसकी स्तरीयता बढ़ाने के लिए विवविद्यालय को कहना चाहिए। अब तक विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने इनमें से कोई भी काम नहीं किया है । तो फिर इस सूची के पीछे की वजह क्या है । देश में उच्च शिक्षा को ठीक से चलाने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग जैसी संस्थाएं बनाई गई थी लेकिन अब वक्त आ गया है कि इस तरह की संस्थाओं के क्रियाकलापों के बारे में एक बार फिर से विचार किया जाए। जैसे वक्त बदलने के साथ हर संस्था को या व्यक्ति को बदलाव करना चाहिए उसी तरह से यूजीसी के दायरे को भी सरकार को नए सिरे से तय करना चाहिए । घिसी पिटी लीक से आगे जाकर उच्च शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रही इस संस्था में आमूल चूल बदलाव करने की जरूरत है ।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को यह बताने की जरूरत है कि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में कई ऐसी पत्रिकाएं निकल रही हैं जो अंग्रेजी में प्रकाशित कई पत्रिकाओं से बेहतर निकल रही हैं । उदाहरण के तौर समाजशास्त्री अभय कुमार दूबे के संपादन में निकलनेवाली पत्रिका प्रतिमान को देखने की जरूरत है । प्रतिमान अपने हर अंक से स्तरीयता का नया प्रतिमान स्थापित कर रहा है । इसमें जिस तरह के विषयों को लेकर लेख आदि प्रकाशित किए जाते हैं, लगता है उसके बारे में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अफसरों को जानकारी नहीं है। यह जरूरी भी नहीं कि देश की हर भाषा में निकलनेवाली पत्रिकाओ के बारे में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अफसरों को जानकारी हो लेकिन जब आप स्तरीय पत्रिकाओं की सलाह-सूची प्रकाशित कर रहे हों तो हर भाषा के जानकार को, विशेषज्ञों की एक कमेटी बनाकर इस तरह की सूची जारी करनी चाहिए । प्रतिमान के अलावा शायद विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को लखनऊ से अखिलेश के संपादन में निकलनेवाली पत्रिका तद्भव की भी जानकारी नहीं है क्योंकि अगर सूची तैयार करनेवालों को जानकारी होती तो यह संभव ही नहीं था कि तद्भव इस सूची में अपना स्थान नहीं बना पाती । तद्भव के अबतक निकले अंकों में हिंदी की इतनी बेहतरीन सामग्री छपी है जो अंग्रेजी के किसी भी जर्नल में छपी सामग्री को टक्कर दे सकती है । इसी तरह के अगर हिंदी में ही प्रकाशित नया ज्ञानोदय पर नजर डालें तो उसमें छपकर हिंदी के रचनाकार गौरव मसहूस करते हैं । नया ज्ञानोदय की एक लंबी और समृद्ध परंपरा रही है । ज्यादा पीछे नहीं जाएं तो प्रभाकर श्रोत्रिय, रवीन्द्र कालिया और अब लीलाधर मंडलोई के संपादन में इस पत्रिका ने कई तरह के रचनात्मक प्रयोग किए जो अंग्रेजी में प्रकाशित होनेवाली पत्रिकाओं में कम ही दिखाई देते हैं। राजेन्द्र यादव के संपादन में निलनेवाली पत्रिका हंस अब संजय सहाय के संपादन में निकल रही है जिसको भी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की सूची में स्थान नहीं दिया गया है। यह सूची और लंबी हो सकती है,अगर इसमें अन्य भारतीय भाषाओं में निकलनेवाली पत्रिकाओं को जोड़ लें तो। ऐसा होने पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को स्तरीयता के मानदंडों के बारे मे पुनर्विचार करने की जरूरत होगी, बशर्ते कि उनमें से कोई इन पत्रिकाओं के बारे में जानकारी जुटाने का उपक्रम करे । इस सूची के बाद एक दिक्कत ये भी हो रही है कि हिंदी के प्रोफेसर किस भाषा में शोध करें ये भी उनकी समझ में नहीं आ रहा है क्योंकि उनको शोध पत्र तो अंग्रेजी में लिखना होगा तभी उसको स्तरीय माना जाएगा । अब हिंदी के प्राध्यापकों से अंग्रेजी में शोध पत्र लिखने की अपेक्षा करना तो अत्याचार जैसा ही है और वो भी सिर्फ भाषा की वजह से इसको सहने के लिए मजबूर हैं ।

किसी सरकारी विभाग से इस तरह की कोई सूची जारी होती है तो उसमें अगर इस तरह का भाषाई छूआछूत नजर आता है तो वो संस्था को सवालों के कठघरे में तो खड़ा करता ही है, मंत्रालय की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े करती है । एक तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देते नजर आते हैं, भारतीय जनता पार्टी के नेता भूपेन्द्र यादव अदालतों में हिंदी औपर अन्य भारतीय भाषाओं में कामकाज के लिए निजी विधेयक पेश कर चुके हैं, मिजोरम में हिंदी शिक्षकों की बदहाली को लेकर वहां के गैर हिंदी भाषी सांसद सदन में मामले को उठा रहे हैं, हमारे देश के डेवलपर भारतीय भाषाओं में ऑपरेटिंग सिस्टम का विकास कर अंग्रेजी के एकाधिकार को चुनौती दे रहे हैं। ऐसे में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का इस तरह की सूची प्रकाशित करना उनकी इस मानसिकता को प्रतिबिंबित करता है जिसमें अंग्रेजी से इतर कुछ स्तरीय दिखता नहीं है । हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के साथ विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का ये व्यवहार बिल्कुल अक्ष्म्य है और इस बार में मानव संसाधन मंत्रालय को संज्ञान लेकर इस सूची को संशोधित करवाकर हिंदी समेत अन्य भारतीय भाषाओं की स्तरीय पत्रिकाओं का नाम शामिल करवाना चाहिए । 

आलोचना की जड़ता पर प्रहार


हिंदी में आलोचना की स्थिति को लेकर बहुधा सवाल खड़े होते रहे हैं। रचनाकारों से लेकर छोटे-मोटे आलोचना पुरस्कार से नवाजे गए चंद प्राध्यापकनुमा आलोचक भी इस विधा को कठघरे में खड़ा करते रहे हैं। इन छोटे मोटे आलोचकों को फेसबुक ने एक ऐसा मंच दे दिया जहां वो तीन चार लाइन की फतवेबाजी करके निकल लेते हैं, लेख आदि लिखने की मेहनत कौन करे । आलोचना एक गंभीर कर्म है और वो गहन और विशद अध्ययन की मांग करता है । बगैर अध्ययन के आलोचना करनेवाले बहुधा कृति या प्रवृत्ति के अंदर प्रवेश नहीं कर पाते हैं बल्कि रचना को छूकर और ज्यादातर उसका सार-संक्षेप बताकर निकल जाते हैं ।कहना ना होगा कि आलोचकों ने आलोचनात्मक कृतियों को इतना गंभीर बना दिया गया कि पाठक उससे दूर होते चले गए। आलोचना को पाठकों तक ले जाने की गंभीर कोशिशें हुई नहीं, बल्कि इसको और बोझिल करने की कोशिश लगातार होती रही क्योंकि ये माना जाता रहा कि आलोचना जितनी गूढ़ होगा या पाठकों की समझ में नहीं आएगी वो उतनी ही श्रेष्ठ होगी । आलोचना की भाषा को सायास कठिन बनाया गया जो अंतत: बोझिल हो गई । इसके अलावा आलोचना पिछले तीन चार दशक में एक और दुर्गुण का शिकार हुई वो ये कि उसमें देशी विदेशी विद्वानों के उद्धरणों की भरमार होती चली गई । आलोचक एक पंक्ति लिखते और फिर पूरे पृष्ठ का उद्धरण और फिर उसको जोड़ते हुए दो तीन पंक्तियां और फिर लंबे उद्धरण। पूरी किताब पढ़ने के बाद पाठक के मन में यह सवाल उठता कि आखिर लेखक क्या कहना चाहता था। इसका उत्तर उनको नहीं मिलता। जन और लोक के तमाम औजारों से आलोचना करनेवालों ने इस विधा को जन और लोक से ही दूर कर दिया ।
अभी हाल ही में आलोचर सुधीश पचौरी की एक किताब हाथ लगी जिसके शीर्षक ने बेहद चौंकाया । इस पुस्तक का शीर्षक है रीतिकाल, सेक्ससुअलिटी का समारोह और इसको वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली ने प्रकाशित किया है । सुधीश पचौरी ने हिंदी में अपने लेखन के लिए बिल्कुल नए किस्म की भाषा गढ़ी, अंग्रेजी के शब्दों की बहुतायत के साथ साथ उत्तर प्रदेश की बोलियों से शब्दों को उठाकर इस्तेमाल करने की कला उन्होंने विकसित की। हिंदी के लिए यह कितनी अच्छी स्थिति है जब हिंदी के शब्द रहते हुए वहां अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग किया गया। यह विमर्श का विषय है ।कई बार तो हमें भी लगता है कि पचौरी जी को अंग्रेजी के इतने ज्यादा शब्दों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए क्योंकि उन शब्दों के लिए हिंदी में सरल शब्द हैं । यह एक अलहदा विषय है जो अलग से संवाद की मांग करता है । फिलहाल हम बात कर रहे थे कि सुधीश पचौरी की नई किताब जो रीतिकाल पर लिखी गई है । रीतिकाल के बारे में यह आम धारणा प्रचलित है कि उस काल खंड में कवियों ने स्त्री देह का, श्रृंगार आदि का रसपूर्ण वर्णन किया है। जब से हिंदी में स्त्री विमर्श की आंधी उठी है तबसे कई बार देखा गा है कि स्त्री अधिकारों की बात करनेवालों को स्त्रियों की रीतिकालीन परिभाषा या उनके वर्णन से आपत्ति है । कई बार यह बात सामने आती है कि रीतिकालीन कवियों ने नायिकाओं के नख-शिख वर्णन किया और उनके संघर्ष आदि के बारे में कुछ भी लिखने की जहमत नहीं उठाई ।कहा तो यह जाता है कि हिंदी कविता में स्त्रीदेह की सत्ता स्थापित हुई। सुधीश पचौरी की यह किताब इस तरह की चालू धारणाओं को निगेट करती है और स्त्रीदेह की सत्ता की गंभीरता से व्याख्या करते हुए सवाल उठाती है। इस किताब से सुधीश पचौरी ये भी स्थापित करते चलते हैं कि रीतिकाल में स्त्रीदेह का वर्णन और स्त्रियों के कामुक हाव-भाव का प्रदर्शन एक अलग तरह के विमर्श की मांग करत है ।लेखक के मुताबिक देह इतिहास यानि देह पर वे दबाव जिनके जरिए जीवन की गतिविधि और इतिहास की प्रक्रियाएं एक दूसरे में हस्तक्षेप करती हैं और देह सत्ता का मतलब है ऐसी सत्ता जो मानवीय जीवन के रूपान्तरण में भूमिका निभाती हैं ।
सुधीश पचौरी कहते हैं कि रीतिकालीन स्त्रियां अपने ढंग से अपने समय की प्रोफेशनल थीं। वे बहुत हद तक पुरुषों के ऊपर निर्भर और अधीन स्त्रियां थीं। उनके हित उन्हीं को साधने पड़ते थे। वे भीअपने तरह से ताकतवर नायिकाएं थीं भले ही आजकी स्त्रियों की तुलना में उनके पास चुनाव की स्वतंत्रता नहीं थीष न स्त्री के प्रापर्टी राइट्स थे, न आधुनिक काल मे स्त्री-हित में काम करने वाले कानूनों का सहारा था, न स्त्री मुक्ति के आंदोलन थे । सुधीश पचौरी अपनी इल कृति में नायिकाभेद के समाजशास्त्र पर विस्तार से चर्चा करते हैं जो काफी पठनीय और दिलचस्प बन पड़ा है जो आमतौर पर आलोचना में मिलता नहीं है ।
रीतिकाल पर अब से पहले जितने भी आलोचनात्मक लेख आदि लिखे गए वो आचार्य शुक्ल की स्थापना को ध्यान में रखते हुए लिखे गए। सुधीश पचौरी उससे कुछ अलग ङटकर इस काल की रचनाओं में सेक्सुअलिटी को व्याख्यायित करने की कोशिश करते हैं । जब वो बिहारी सतसई के आधार पर इस काल खंड में घुसते हैं तो वो ये कहते हैं कि उस वक्त का समाज यौन-व्यस्त समाज था, जहां दोहों में परिवार भीनजर आते हैं और कई बार नायक-नायिका का प्रेम-संवाद, गुरुजनों यानि परिवार के बड़े बूढ़ों की उपस्थिति के बीच भी होता था । यह संवाद नेत्र-भाषा और अनुभावों में होता था। यहां की ज्यादातर नायिकाएं प्रेमचतुरा हैं जो आंखों के इशारों से ज्यादा काम लेती हैं । आंखों पर बिहारी की सतसई का एक दोहा है – चलत देत आभरु सुनि,उहौ परोसिंह नाह/ लसी तमासे की दृगनु हांसी आसुन माही । मतलब कि नायिका किसी पड़ोसी पर अनुरक्त है । इस समय उसका पति विदेश जा रहा है, जिससे वो अपनी आंखों में आंसू भरे हुए है । इतने में ही इसने सुना की उसका पति उसी पड़ोसी को घर संभालने का भार दे रहा है ।यह सुनते ही, हर्ष के कारण, उसकी आंसू भरी आंखों में हंसी आ गई। यह एक सखी दूसरे सखी से कहती है । अब आंखों में हंसी की तो सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है। सुधीश पचौरी की इस किताब से आलोचना की जड़ता पर प्रहार तो होता ही है, पचौरी की लाख आलोचना करें लेकिन उनकी स्थापनाओं को इग्नोर नही कर सकते ।          



  

Friday, April 14, 2017

बमबारी से निकलते सख्त संदेश


अमेरिका में अपने फैसलों के लिए आलोचनाओं और विवादों से घिरे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गुरूवार को बेहद अहम फैसला लेते हुए अफगानिस्तान के अचिन जिले में दस हजार किलो का गैर परमाणु बम गिराने का आदेश दे दिया। कहा जा रहा है कि ट्रंप ने ये फैसला अपने एक सिपाही की मौत का बदला लेने के लिए किया है लेकिन इस फैसले से ट्रंप ने कई देशो को संदेश दिए हैं । पेंटागन के दावे के मुताबिक इस जगह पर गुफाओं के जाल में इस्लामिल स्टेट के करीब आठ हजार आतंकवादी छिपे हुए थे । यह जगह पाकिस्तान की सीमा के बेहद करीब है और माना जा रहा है कि इस बमबारी में सैकड़ों आतंकवादियों की जान गई है । हलांकि पश्चिमी मीडिया और न्यूज एजेंसी की खबरों के मुताबिक दुनिया के सबसे बड़े बम से हुए हमले में सिर्फ छत्तीस आतंकवादियो की जान गई है । पेंटागन के सूत्रों का दावा है कि इस दस हजार किलो के बम से किसी भी नागरिक की जान नहीं गई है । व्हाइट हाऊस के प्रेस सेक्रेट्री सीन स्पाइसर के मुताबिक इस बम को गिराते वक्त लक्ष्य निश्चित किया गया था और उसके निशाने पर उस इलाके के सुरंग और गुफाएं थीं । अमेरिका ने इस हमले के पहले पूरी तैयारी की थी और नंगरहार प्रांत के इस इलाके में अमेरिकी फौज ने सारी खुफिया जानकारी जुटाई थी । दस हजार किलो के बम, जिसे मदर ऑफ ऑल बॉम्ब कहते हैं, को गिराने के लिए कुछ ही दिनों पहले अमेरिका से विशेष मालवाहक जहाज को अफगानिस्तान भेजा गया था । दरअसल ये वही प्रांत है जहां ओसामा बन लादेन के अल कायदा के आतंकी भी तोरा-वोरा इलाके में रहा करते थे । पाकिस्तान की सीमा से सटे होने का भी आतंकवादी फायदा उठाते रहे हैं और जब इस इलाके में खतरा बढ़ता है तब वो पाकिस्तानी सीमा में शरण लेते रहे हैं । ओसामा के मरने के बाद इस्लामिक स्टेट के आतंकवादियों ने इस इलाके की गुफाओं और सुरंगों में अपना ठिकाना बना लिया था । यहां यह याद दिलाना आवश्यक है कि डोनाल्ड ट्रंप ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान साफ किया था वो अगर सत्ता में आए तो आईएसआईएस के आतंकवादियों को नेस्तानाबूद कर देंगे ।
अब अगर अफगानिस्तान पर अमेरिकी हमले का विश्लेषण करें तो सतह पर तो यह आतंक और आतंकवादियों के खिलाफ अमेरिकी की पुरानी नीति का ही विस्तार नजर आता है लेकिन अगर सूक्ष्मता से और गहराई से इसका आंकलन करें तो संदेश बहुत साफ नजर आते हैं । इस हमले से अमेरिका ने एक साथ चीन, पाकिस्तान और उत्तर कोरिया को संदेश दिया है कि वो अपने दायरे में रहें । पाकिस्तान में पहले भी अमेरिका घुसकर ओसामा बिन लादेन को मार चुका है । अब पाकिस्तान सीमा के पास इतना बड़ा हमला कर साफ संदेश दे दिया है कि पाकिस्तान आतंकियों को पनाह ना दे वर्ना एक बार फिर से वहां भी सैन्य कार्रवाई हो सकती है । पाकिस्तान को ट्रंप प्रशासन समय समय पर अपने कदमों से आतंकवादियों की मदद के खिलाफ चेताता रहता है । अपने चुनावी अभियान के दौरान ट्रंप ने इन तीनो देशों को निशाने पर लिया था और चीन को तो करेंसी मैनिपुलेटर तक करार दे दिया था । हाल ही में शी जिन पिंग के अमेरिका दौरे के दौरान दोनों देशों के बीच रिश्तों की बर्फ पिघलती नजर आई जब ट्रंप ने शी जिन पिंग की तारीफ भी की और कहा कि वो अब चीन को करेंसी मैनिपुलेटर नहीं मानते हैं लेकिन साथ ही ट्रंप ये जोड़ना नहीं भूले कि अगर चीन उत्तर कोरिया का मसला अच्छे से सुलझा लेता है तो दोनों देशों के कारोबारी रिश्ते और बेहतर हो सकते हैं । दरअसल कुछ दिनों पहले उत्तर कोरिया ने अमेरिका के साथ परमाणु युद्ध तक की धमकी दी थी और अमेरिका इस समस्या को हमेशा के लिए निबटाना भी चाहता है । ।
अब अफगानिस्तान पर अमेरिका के दस हजार टन के बम गिराने के बाद चीन ने चिंता जताई है । चीन के कहा है कि जिस तरह से पूरे इलाके में तनाव बढ़ रहा है उसमें किसी भी तरह की घटना से इंकार नहीं किया जा सकता है । चीन की ये प्रतिक्रिया बम गिराने के बाद उत्तर कोरिया की तरफ से छठे न्यूक्लियर टेस्ट की खबरों के बीच आई है। इस तरह की खबरें आ रही हैं कि अफगानिस्तान में आतंकवादियों पर अमेरिकी हमले के बाद उत्तर कोरिया एक और परमाणु परीक्षण कर अपनी ताकत का एहसास करवा सकता है । अमेरिका ने जिस तरह से कोरियाई प्रायद्वीप में अपने विमानों का बेड़ा भेजा है उससे भी उत्तर कोरिया सख्त खफा है । उत्तर कोरिया का मानना है कि अमेरिका ने जिस तरह की कार्रवाई की है उससे इस पूरे इलाके में किसी भी वक्त परमाणु युद्ध छिड़ सकता है जिससे पूरी दुनिया की सुरक्षा और शांति खतरे में पड़ सकती है । अफगानिस्तान पर बम गिराकर जिस तरह से अमेरिका ने अपनी रणनीतिक कूटनीति में परिवर्तन करते हुए सीधी कार्रवाई की है उससे साफ है कि वो अब बानबाजी में नहीं उलझना चाहता है । उत्तर कोरिया और चीन की चिंता इसी रणनीतिक कूटनिति में बदलाव का परिणाम है । दरअसल डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिका में सत्ता में आने के बाद इस बात का अंदाज लगाया ही जा रहा था कि वो कार्रवाई के पक्षधर हैं, लिहाजा जमीनी कार्रवाई होगी । जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से ये पूछा गया कि क्या वो अफगानिस्तान पर बमबारी कर अमेरिका उत्तर कोरिया को कोई संदेश देना चाहता है तो ट्रंप ने कहा कि मुझे नहींमालूम कि इस कार्रवाई से कोई संदेश जाता है या नहीं, इससे कोई फर्क भीनगीं पड़ता कि संदेश जाता है या नहीं लेकिन उत्तर कोरिया एक समस्या है और उस समस्या को देखा जाएगा । इस बयान के बाद संदेश और साफ हो जाता है ।


इश्क वाली दीपिका


अभी एक बार फिर से चर्चा शुरू हो गई कि दीपिका और रणवीर सिंह के बीच इश्क शुरू हो गया है । दरअसल एक तस्वीर ने और दीपिका के इश्क के चर्चों ने इंटरनेट पर मौजूद अफवाहबाजों के मसाला दे दिया । उनके कई तरह के फोटो इंटरनेट पर बेवजह वायरल होते रहते हैं । अभी हाल ही में एक फोटो इतना वायरल हुआ कि लोग उसको सच मान बैठे और इस बात पर कयासबाजी शुरू हो गई कि दीपिता और रणवीर सिंह फिर एक हो गए हैं । इंटरनेट पर जो फोटो वायरल किया गया उसके साथ कहानी ये चली कि करण जौहर की पार्टी में रणवीर ने दीपिका को जोरदार तरीके से आलिंगबद्ध किया और दोनों की वो तस्वीर क कर दी गई । इंटरनेट पर इस तस्वीर के सामने आते ही दीपिका और रणवीर सिंह के फैंस खुशी से पागल हो गए और उसको साझा करना शुरू कर दिया । सोशल मीडिया साइट्स पर ये तस्वीर बेतरह साझा हुई और एक टिप्पणी तो ये आई कि इसने इंटरनेट को तोड़ डाला लेकिन वो फेक निकला । बताया गया कि दीपिका और रणवीर सिंह की ये तस्वीर फोटो शॉप का कमाल था । इसमें किसी और लड़की के चेहरे पर दीपिका की तस्वीर लगाकर किसी ने शरारत की और उसको सोशल मीडिया पर डाल दिया। बॉलीवुड की इश्कक्वीन दीपिका ने जिस तरह से नियमित अंतराल पर प्यार किया और उतनी ही नियमितता के साथ उनका ब्रेक अप होता गया उसने बॉलीवुड के इश्क को एक अलग ही परिभाषा दे डाली ।    
दीपिका के पहले बॉलीवुड में दो तरह के इश्क होते देखे गए हैं, एक तो सचमुच का इश्क जो अगर अंजाम तक नहीं भी पहुंच सकता है तो ताउम्र दोनों के दिलों में जिंदा रहता है । कई बार शादी हो जाती फिर तलाक हो जाता है तो कई बार शादी नहीं भी होती है लेकिन दोनों एक दूसरे की याद को दिल से लगाकर जिंदगी गुजार देते हैं । इस वाले इश्क की मिसाल मीना कुमारी- कमाव अमरोही से लेकर धर्मेन्द्र हेमा मालिनी से लेकर बोनी कपूर श्रीदेवी तक हैं । जैसे लोग कहते हैं कि सलमान और कटरीना का इश्क भी इसी कैटेगिरी में आता है । लंबे समय से ब्रेक अप के बाद भी ऐसा लगता है कि सलमान अपनी महबूबा कटरीना को दिल से निकाल नहीं सकते हैं । कभी टाइगर जिंदा है के सेट से कटरीना और अपनी तस्वीर ट्वीट कर दोनों के साथ होने की मुनादी करते हैं तो कभी खबर आती है कि सलमान ने फिल्म ठग्स ऑफ हिन्दोत्सान में आमिर खान के अपोजिट कटरीना कैफ को कास्ट करने के लिए आदित्य चोपड़ा को फोन किया है । ये वही वाला इश्क है जो भुलाए नहीं भूलता है ।  यह लिस्ट काफी लंबी हो सकती है । दूसरे तरह का इश्क बस करने के लिए होता है, कभी अपनी फिल्म के प्रमोशन के लिए तो कभी अपने पुराने ब्यॉय फ्रेंड को जलाने के लिए । यह लिस्ट भी बहुत लंबी है और इसमें किसी का नाम लेना ठीक नहीं होगा । बॉलीवुड की दुनिया को करीब से जानने वाले और फिल्मी दुनिया के पाठक इस तरह की जोड़ियों को बखूबी पहचनाते हैं ।
अब एक तीसरे तरह का भी इश्क होता है जो दीपिका पादुकोण को होता है । दीपिका के इश्क को अभी तक डिकोड नहीं किया जा सका है क्योंकि अगर उनके बॉलीवुड में आने के बाद से लेकर अबतक के सफर पर नजर डाला जाए तो इस तरह की बातें फिजां में तैरती रही हैं कि उनको कई साथियों से इश्क हुआ है । निहार पांड्यासे लेकर रणबीर सिंह तक के साथ । कुछ सालों पहले दीपिका रणबीर कपूर से दब ब्रेक अप हुआ तो दीपिका को दूसरे रणवीर ने सहारा दिया । कपूर से सिंह के इस यात्रा को मुकाम मिला संजय लीला भंसाली की फिल्म राम-लीला में । दोनों के बीच का केमिस्ट्री फिल्म राम-लीला के दौरान भी देखने को मिली थी और दीपिका की बर्थडे पर दोनों ने न्यूयॉर्क में साथ जश्न भी मनाया था । रणवीर और दीपिका खुले आम अपने इश्क का इजहार भी करते थे । दीपिका कोई भी ऐसा मौका हाथ से जाने नहीं देती थी जहां वो अपने और रणवीर के अफेयर का संकेत दे सकती हो । अभी हाल ही में एक अवॉर्ड फंक्शन में दीपिका और करण जौहर के बीच की चुहलबाजी में भी रणवीर का नाम आया तो उसका चेहरा खिल गया । लेकिन इस रिश्ते में भी ब्रेक अप का मुकाम आया । ये अफेयर चल ही रहा था कि दीपिका को हॉलीवुड फिल्म ट्रिपल एक्स में मौका मिला और वो विन डीजल के साथ काम करने लगी । इस फिल्म के दौरानऔर फिल्म रे प्रमोशन के दौरान जब विन डीजल इंडिया आए तो दोनों के इश्क की खबरें खूब चलीं । उसी दौर में रणवीर सिंह से ब्रेकअप भी था लिहाजा इस रिश्ते को खब हवा मिलीऔर बॉलीवुड की तमाम पत्र-पत्रिकाएं दीपिका और विन डीजल के रिश्तों के बारे में कयासबाजी करते रहे । लेकिन हर रिश्ते की तरह दीपिका का ये रिश्ता भी ब्रेकअप काशिकार हो गया । कहते है कि दीपिका को विन डीजल में संभावना नहीं दिखी तो दोनों अलग हो गए । कई लोगों का दावा है कि दीपिका अपनी फिल्मों के रिलीज के वक्त इस तरह का इश्क प्लान करती हैं और फिल्म रिलीज होने के बाद फिर हवा ए इश्क का रुख मोड़ देती हैं । दीपिका के इश्क को डिकोड करने में इस वजह से भी दिक्कत होती है कि उनका इश्क कई बार ब्रेकअप की राह पर चलकर फिर से वापस आ जाता है । जिगर मुरादाबादी साहब कहते हैं कि ये इश्क नहीं आसां, इतना ही समझ लीजै, इक आग का दरिया है और डूब के जाना है । लेकिनव बॉलीवुड में अब तो ऐसा लगता है कि ये इश्क बेहद आसां भी है आग का दरिया तो बिल्कुल भी नहीं है जिसमें डूबना पड़ता है । अब तो इश्क को सतह से करते हुए. छूटे हुए निकला जा सकता है ।