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Tuesday, January 17, 2017

दिलचस्प किस्सों की दास्तां

कयामत से कयामत तक एक ऐसी फिल्म जिसने अस्सी के दशक के आखिर में बॉलीवुड फिल्मों के लिए टेंड सेटर बना । उस ट्रेंड पर चलकर आगे भी कई फिल्में बनीं । अभी इस फिल्म को केंद्र में रखकर गौतम चिंतामणि ने एक किताब- कयामत से कयामत तक, द फिल्म दैट रिवाइव्ड हिंदी सिनेमा लिखी । इस वक्त जितने भी लोग फिल्मों पर लिख रहे हैं उसमें गौतम चिंतामणि को गंभीरता से लिया जा रहा है । इसके पहले उन्होंने राजेश खन्ना पर भी एक किताब- डार्क स्टार- लिखी थी जिसे पाठकों ने हाथों हाथ लिया था । उसका हिंदी अनुवाद भी बेस्ट सेलर बना । अपनी इस किताब कयामत से कयामत तक में गौतम चिंतामणि ने इस फिल्म के आइडिया लेकर उसके बनने और रिलीज होने तक की कहानी को समेटा है । इस किताब की भूमिका फिल्म के डायरेक्टर मंसूर खान ने लिखी है । इस किताब में लेखक गौतम चिंतामणि ने दो पीढ़ियों की सोच में आ रहे बदलाव को बेहद संजीदगी से पकड़ा और लिखा है । मंसूर खान और उनके पिता नासिर हुसैन के बीच फिल्मों को लेकर जिस तरह से बहसें होती थीं उसको पढ़ते हुए बॉलीवुड के बदलाव को भी पकड़ा जा सकता है । फिल्म के अंत को लेकर दोनों के बीच बहस स्क्रिप्ट, कास्ट और कॉस्टूयम को लेकर मंथन बेहद दिलचस्प है । इन बहसों के साथ गौतम पीढ़ियों में आ रहे बदलाव को तोसामने रखते ही हैं अस्सी के दशक की फिल्मों की पड़ताल भी करते चलते हैं ।
फिल्म में आमिर खान को लीड रोल में लेने का भी दिलचस्प किस्सा है । आमिर खान उस वक्त नासिर हुसैन के असिस्टेंट हुआ करते थे । फिल्म मंजिल-मंजिल पर बात करने के लिए आमिर और नासिर लोनावला के एक रिसॉर्ट में थे । संयोग से वहीं जावेद अख्तर भी रुके थे जो उन दिनों शेखर कपूर और राहुल रवैल के दो प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे । उन्हें पता चला कि नासिर हुसैन भी वहीं हैं तो जावेद उनके कमरे में पहुंच गए । कमरे में आमिर खान को बैठा देखकर जावेद ने पूछा कि ये कौन हैं ? नासिर हुसैन ने जब बताया आमिर उनके असिस्टेंट हैं तो जावेद साहब ने कहा- अरे ! ये असिस्टेंट क्यों है, इसे तो आपका हीरो होना चाहिए । बात आई गई हो गई लेकिन तीन-चार महीने बाद जब एक दिन नासिर साहब ने आमिर को बलाकर कहा कि वो उनके साथ एक फिल्म बनाने का फैसला कर चुके हैं । तो इस तरह से आमिर का कयामत से कयामत तक में पहुंचने का रास्ता बना । बाद में हलांकि आमिर को भी तय प्रक्रिया से गुजरना पड़ा था । इसी तरह से जूही चावला के चुनाव को लेकर भी किस्सा दिलचस्प है । कयामत से कयामत तक फिल्म में संगीत को लेकर मंसूर खान ने अपनी गाड़ी में बैठकर संगीतकार के साथ ट्यून तय किया था । पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा लिखकर जब मजरूह सुल्तानपुरी लाए तो नासिर खुश नहीं हुए । पापा कहते हैं को लेकर नासिर साहब से उसकी गर्मागर्म बहस हुई लेकिन नासिर साहब के कहने से मंसूर  मान गये । पूरी फिल्म में नासिर हुसैन की इतनी ही बात मानी गई, ऐसा लगता है ।   
अंग्रेजी में इस तरह की किताबें को देखकर ये लगता है कि काश हिंदी के लेखक भी फिल्मों पर इतनी ही गंभीरता से किताबें लिखते । हिंदी में हाल के दिनों में फिल्मों पर किताबें लिखने का चलन शुरू हुआ है लेकिन अपेक्षा के मुताबिक लेखन नहीं हो रहा है । अब भी सिनेमा पर गंभीर किताबें अंग्रेजी में ही आती हैं जो चर्चित होने के बाद हिंदी में अनुदित होकर पाठकों तक पहुंचती हैं । 
(8 जनवरी 2016, अमर उजाला)

जायरा वसीम के मसले पर बौद्धिक पाखंड

कश्मीर की सोलह साल की लड़की जायरा वसीम ने फिल्म दंगल में अपनी भूमिका से लोगों का दिल जीत लिया था । गीता फोगट के बचपन का रोल करनेवाली जायरा ने अपने सशक्त अभिनय से ना केवल आमिर खान को प्रभावित किया था बल्कि दर्शकों पर भी अपने अभिनय की छाप छोड़ी थी । हाल ही में जायरा नसीम जब फिल्म की सफलता के बाद जब अपने घर कश्मीर गईं तो सूबे की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती से मिलीं । शनिवार को मुख्यमंत्री से उनकी मुलाकात की फोटो सोशल मीडिया पर आने के बाद उनको ट्रोल किया जाने लगा । परेशान जायरा वसीम ने सोशल मीडिया पर ही इस मुलाकात को लेकर पोस्ट लिखी और माफी मांगी । उन्होंने लिखा कि हाल ही में उनकी मुलाकात से कुछ लोग खफा हो गए हैं लिहाजा वो माफी मांगती हैं । उन्होंने दो पोस्ट लिखे और दोनों को बाद में डिलीट भी कर दिया । एक पोस्ट में तो उन्होंने यहां तक लिख दिया कि कश्मीरी युवा उनको रोल मॉडल नहीं मानें, सूबे में और भी लोग हैं । जायरा ने यह भी लिखा कि उनकी मंशा किसी को भी ठेस पहुंचाने की नहीं थी । इसके बाद सोशल मीडिया पर उनको घेरा जाने लगा तो उन्होंने एक और पोस्ट लिखी और अनुरोध किया इस मसले को तूल ना दिया जाए लेकिन इसके बाद अपने इस पोस्ट को भी डिलीट कर दिया । दरअसल कश्मीर में पिछले दिनों जिस तरह का बवाल रहा उसके बाद वहां के चंद लोगों ने जायरा को मुख्यमंत्री के बहाने से निशाने पर लिया । किसी ने यह सोचने की कोशिश भी नहीं की कि एक सोलह साल की बच्ची पर क्या गुजरेगी । अभी जिसने अपनी सफलता को ठीक से एंजॉय भी नहीं किया उसपर इस तरह का हमलावर रुख अख्तियार कर कश्मीरी अलगाववादी वहां के युवा को क्या संदेश देना चाहते हैं । जायरा वसीम को जान से मारने तक की धमकी दी गई । इस बच्ची का जुर्म क्या है । क्यों इसको राजनीति का शिकार बनाया जा रहा है । जायरा को जान से मारने की धमकी का मुद्दा जम्मू कश्मीर विधानसभा में भी उठा और आसन ने सरकार को इस मसले पर ध्यान देने का निर्देश दिया । शनिवार से जायरा वसीम के साथ यह सब घटित हो रहा है लेकिन इस बारे में छिटपुट प्रतिक्रिया ही देखने को मिल रही है । सूबे के पूर्व मुख्यमंत्री इमर अबदुल्ला और लेखक गीतकार जावेद अख्तर ने जरूर ट्वीट कर इस मुद्दे पर जायरा को समर्थन दिया ।

सवाल समर्थन का तो है लेकिन उससे भी बड़ा सवाल है अभिव्यक्ति की आजादी के पैरोकारों की खामोशी का है। दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में बुक्का फाड़कर लेक्के रहेंगे आजादी चिल्लानेवाले भी खामोश हैं । उनकी जुबां पर ताला लग गया है । जायरा को कश्मीरी कट्टरपंथियों की तरफ से जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं लेकिन अभिव्यक्ति की आजादी के चैंपियन खामोश हैं । जायरा वसीम एक कलाकार है और कलाकार को मिल रही धमकियों पर कलाकारों और लेखकों का खामोश रहना चिंता का सबब है । बात-बात पर देश में फासीवाद की आहट सुननेवाले भी जायरा पर जारी शोरगुल को सुन नहीं पा पा हैं । जनवादी लेखक संघ, प्रगतिशील लेखक संघ और जन संस्कृति मंच भी तीन दिन बीत जाने के बाद भी इस घटना पर आधिकारिक प्रतिक्रिया देने से बच रहे हैं । ऐसा क्यों होता है इसको जब सूक्ष्मता से विश्लेषित करते हैं तो बौद्धिक पाखंड का बहुत ही वीभत्स और सांप्रदायिक रूप सामने आता है । जायरा को अगर इसी तरह की धमकी किसी अनाम से हिंदू संगठन से मिली होती तो फिर देखते ये लोग किस तरह से आसमान सर पर उठा लेते । पाठकों को याद होगा कि किस तरह से जेएनयू में उमर खालिद के मसले पर बड़े बड़े लेख लिखे गए थे । उस वक्त जिनको भी सामाजिक ताना-बाना टूटता नजर आ रहा था उनको भी जायरा को मिल रही धमकी दिखाई नहीं देती है । यह चुनी हुई चुप्पी देश के लिए तो खतरनाक है ही लोकतंत्र के लिए भी बेहद नुकसानदायक है । जब एक समुदाय यह देखता है कि दूसरे समुदाय के मसले पर अभिव्यक्ति की आजादी के चैंपियन खामोश हो जाते हैं तो एक खास किस्म की प्रतिक्रिया घर करने लगती है जिसका विस्फोट तुरंत नहीं होता है लेकिन लंबे समय तक जब बार बार इस तरह की चुनी हुई चुप्पी देखी जाती है तो विरोध का स्वर मजबूत होने लगता है । ऐसे कई मौके आए जब खुद को गरीबों, शोषितों और वंचितों की मसीहा बताने वाली विचारधारा के पोषक चुनी हुई चुप्पी ओढ़ लेते हैं । पिछले दिनों जब केरल की सरकार ने लेखक कमल चवारा पर देशद्रोह का मुकदमा लगाया तब भी कमोबेश वामपंथी विचारधारा के ध्वजवाहक खामोश रहे । खामोश इस वजह से रहे कि वहां उनकी विचारधारा वाली पार्टी का शासन था, वर्ना अगर किसी अन्य विचारधारा वाली पार्टी का शासन होता तो फिर ये बताते नहीं थकते कि दिल्ली के बाद अब केरल में भी फासीवाद आ पहुंचा है । तमिल लेखक मुरुगन ने जब नहीं लिखने का ऐलान किया था और कहा था कि एक लेखक की मौत हो गई है तब भी देशभर के एक खास विचारधारा के लोगों ने जमकर शोरगुल मचाया था । जब कमल चवारा ने ये ऐलान किया कि अगर उनपर से देशद्रोह का मुकदमा नहीं हटाया गया तो अपनी सारी किताबें जला देंगे तो कहीं कोई स्पंदन तक नहीं हुआ । अब वक्त आ गया है कि देशभर के उन बौद्धिकों को अगर अपनी साख बचानी है तो समान भाव से सवाल खड़े करने होंगे बगैर विचारधारा या धर्म-संप्रदाय पर ध्यान दिए, वर्ना हाशिए पर जा चुके ये लोग इतिहास के बियावान में बिला जाएंगें । 

Monday, January 16, 2017

बाबा के भेष में बहुरूपिया !

इन दिनों खबरिया चैनलों पर साधु की वेशभूषा में एक शख्स कई राजनीतिक दावे कर रहा है । इंदिरा गांधी से नजदीकी और चंद्रशेखर और नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बवनाने में अपनी भूमिका का बखान कर रहा है । वो यहीं तक नहीं रुकता है, उसका दावा है कि उसने सलमान खान को थप्पड़ मारा है और बॉलीवुड से लेकर हॉलीवुड तक की कई अभिनेत्रियां उसकी शिष्या हैं । ये साधुनुमा शख्सियत है स्वयंभू बाबा ओम, जिसका असली नाम विनोदानंद झा है । ओम पर साइकिल चोरी से लेकर विस्फोटक रखने तक के मामले में टाडा जैसे केस दिल्ली के थानों में दर्ज हैं । फिर क्या वजह है कि एक आरोपी को नेशनल न्यूज चैनलों पर इतनी तवज्जो मिल रही है । दरअसल टीवी सीरियल बिग बॉस में ओम ने जिस तरह का उधम मचाया उसने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा । साधु के वेश में महिला के साथ स्वीमिंग पूल में नहाने से लेकर नागिन डांस करनेवाले बाबा को शर्तों को तोड़ने के आरोप में बिग बॉस के घऱ से बाहर कर दिया गया था । बड़बोले बाबा ने अपने बयानों से न्यूज चैनलों का ध्यान अपनी ओर खींचा । बाबा में टीआरपी की संभावनाएं देखते हुए बड़े बड़े चैनलों के संपादक तक उसका इंटरव्यू करने कूद पड़े । ओम को स्टूडियो में बुलाकर पूरे देश को घंटों तक उनका बकवास सुनाया गया । इन शोज़ के दौरान उनका बड़बोलापन बढ़ता चला गया । एक शो के दौरान दर्शकों में बैठी एक महिला को बेहद असंसदीय शब्द कहने से भीड़ और मेहमान दोनों भड़क गए और जमकर लात जूते चले । बाबजूद इसके शो चलता रहा, ओम दावे करते रहे ।
दरअसल अगर हम देखें तो ओम पिछले साल एक न्यूज चैनल के स्टूडियो में हुए थप्पड़ कांड से चर्चित हुआ । उसके पहले भी वो एक न्यूज चैनल के दफ्तर में पिटते पिटते बचे थे । लाइव शो में हुए थप्पड़ कांड के बाद वो चर्चित हो गए । महिला को थप्पड़ मारने के बाद पुलिस के डर से स्टूडियो से ये कहते हुए रफूचक्कर हो गए थे कि उनकी मुलायम सिंह यादव से बात हो गई है । उस केस का क्या हुआ ज्ञात नहीं है लेकिन ओम का हौसला उसके बाद बुलंद हो गया । ओम का उद्भव न्यूज चैनलों की भीड़ भरी दुनिया में उस वक्त हुआ जब डिबेट शो के दौरान चीखने चिल्लाने का दौर शुरू हुआ । ओम जैसी बेसिर-पैर की बातें करनेवाले लोग न्यूज चैनलों के प्रोड्यूसर्स की पसंद बनने लगे । खुद को हिंदी धर्म का रक्षक घोषित करनेवाले ओम का मकसद सिर्फ स्टूडियो में हंगामा करना और विरोधियों को बोलने नहीं देना होता था । उस वक्त ओम की मांग इतनी ज्यादा थी कि उसके टाइम स्लॉट बुक घंटे के हिसाब से बुक हुआ करते थे । स्टूडियो में थप्पड़ कांड के बाद ओम की मांग कम होने लगी थी लेकिन बिग बॉस के सीजन दस ने इस स्वयंभू बाबा को नया जीवन दे दिया । बिग बॉस में उलजलूल हरकतों ने ओम को फिर से चर्चा में ला दिया । हिंदू बाबा के नाम से खुद को प्रचारित करनेवाला ये बाबा हंसी का पात्र बनता चला गया और किसी भी सीरियल में एक अहमकनुमा जोकर तो चाहिए ही होता है ।

ओम को अहमियत से दो सवाल उठते हैं एक तो न्यूज चैनलों के कर्ताधर्ताओं पर । क्यों और कैसे उलजलूल बातें करनेवालों को इतना एयर टाइम दिया जाता है । यह सही है कि न्यूज चैनलों के लिए टीआरपी आवश्यक है लेकिन टीआरपी यानि रेटिंग के लिए कुछ भी किया जाए । कई वैसे लोग भी जो इस तरह के बाबा, भूत प्रेत आदि को टीवी पर दिखाए जाने के खिलाफ होते थे, संपादक बनते ही इनके ही शरण में जाते दिखने लगते हैं । ओम के कारनामों के दौरान और बाद में इस तरह की बातें सुनाई देती हैं कि फलां चैनल का इनके बयानों से कोई लेना देना नहीं है या फिर चैनल उनकी बातों और क्रियाकलापों से इत्तफाक नहीं रखता है । सही है इस तरह के डिस्क्लेमर बोले जाने चाहिए ताकि दर्शकों को जागरूक किया जा सके । लेकिन केबल एंड टेलीविजन एक्ट कहता है कि ब्राडकास्टर यानि चैनल की भी उतनी ही जिम्मेदारी होती है, जितना बोलने वाले की । किसी भी तरह का भड़काऊ बयान, आपत्तिजनक कटेंट, या फिर असंसदीय भाषा के टेलीकास्ट करने की जिम्मेदारी चैनलों की भी होती है । ओम के मामले में कई चैनल इस कानून की धाराओं का उल्लंघन करते दिखे । अब अगर सरकार उनको नोटिस देती है तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमले का शोर मचने लगेगा । जरूरत जिम्मेदारी समझने की है । दूसरी तरफ जिस तरह से हिंदू धर्मगुरू होने दा दावा करनेवाला ये शख्स ओछी हरकतें कर रहा है उसके बारे में संत समाज को भी सोचना चाहिए । क्या कोई वेशभूषा से साधु होता है या फिर आचरण- व्यवहार से, इस पर विचार करने की आवश्यकता है । ओम को अंतराष्ट्रीय मीडिया हिंदू गॉडमैन लिख रहे हैं जिससे पूरी दुनिया में हिंदी संतों की छवि खराब हो रही है । संतों की प्रतिनिधि सभा अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद को ओम की हरकतों का संज्ञान लेना चाहिए और उसपर अंकुश लगाने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए । 

Saturday, January 14, 2017

कविता की अनुपस्थिति !

दिल्ली में चल रहे विश्व पुस्तक मेले का आज आखिरी दिन है । विश्व पुस्तक मेले में ताबड़तोड़ किताबों का विमोचन हुआ । हर विधा की सैकड़ों किताबों का मेलार्पण हुआ कभी लेखक मंच पर तो कभी प्रकाशकों के स्टॉल पर ही विमोचन हुआ । कहीं ताजा ताजा छप कर आई किताबों का विमोचन हुई तो कहीं पखवाड़े भर पहले छपी किताबों को वहां मौजूद लेखकों से मेलार्पण करवा दिया गया । जाहिर है कि इस तरह के मेलार्पण सोशल मीडिया के लिए किए करवाए गए । इसमें कोई बुराई भी नहीं है कम से कम फेसबुक आदि पर फोटो पोस्ट करने से पाठकों तक जानकारी तो पहुंची कि अमुक लेखक की अमुक किताब अमिक प्रकाशन से प्रकाशित हुई । किताबों की बड़ी संख्या में विमोचन और मेले में हर दिन पाठकों की उपस्थिति ने पुस्तकों को लेकर पाठकों के बढ़ते प्रेम की ओर भी इशारा किया जिससे एक आश्वस्तिकरक स्थिति बनी । मेले पर नोटबंदी का भी कोई असर दिखाई नहीं दिया । पाठकों की स्टॉलों पर भीड़ लगी रही और खरीद भी हुई । इतना बदलाव अवश्य देखने को मिला कि लगभग सभी प्रकाशकों ने पेटीएम से या फिर क्रेडिट कार्ड से भुगतान की सहूलियत का इंतजाम कर रखा था । मेले में किताबों पर चर्चा के दौरान छिटपुट विवाद भी हुए । मैत्रेयी पुष्पा की राजेन्द्र यादव पर लिखी किताब पर चर्चा के दौरान लेखकों में पीढ़ियों की टकराहट भी देखने को मिली । लेकिन जिस एक बात को रेखांकित किया जाना आवश्यक है वह है हिंदी के स्थापित कवियों के संग्रह का मेले के दौरान प्रकाशित नहीं होना । उपन्यासकार भगवानदास मोरवाल ने अपनी टीम से एक सर्वे करवाया है जिसकी सूचना उन्होंने फेसबुक पर साझा की है ।
मोरवाल जी द्वारा करवाए गए सर्वे के मुताबिक - मेले से हिंदी कविता लगभग पूरी तरह अनुपस्थित है. प्रकाशकों के स्टाल्स पर एक के बाद एक ,कहानी संग्रह और उपन्यासों के लोकार्पण और उन पर चर्चा कराई जा रही है ,या हो रही है वहां कविता एक तरह से उपेक्षित-सी रही है. हिंदी के बड़े कवि कुंवर नारायण, केदारनाथ सिंह, अशोक वाजपेय, विष्णु खरे, मंगलेश डबराल , लीलाधर जगूड़ी, उदय प्रकाश,कृष्ण कल्पित , अनामिका, सविता सिंह , नरेश सक्सेना , लीलाधर मंडलोई, मदन कश्यप का कोई कविता संग्रह मेले में नहीं आया । इसके अलावा भी संजय कुंदन, पवन करन, संजय चतुर्वेदी, कात्यायनी , अनीता वर्मा जैसे उनके बाद की पीढ़ी के कवियों के संग्रह भी प्रकाशित नहीं हुए । इस सर्वे के मुताबिक लगभग यही स्थिति फेसबुक से उपजे युवा कवि-कवयित्रियों की भी रही। चर्चा हुई भी होगी तो उस तरह नहीं जिस तरह मंचीय कवियों और ग़ज़लों के नाम पर लोकप्रिय शायरी को प्रोत्साहित किया जा रहा है । अगर इस सर्वे के नतीजों को सही माना जाए तो कविता के लिए ये स्थिति उत्साहजनक तो नहीं ही कही जाएगी । हिंदी के कवियों को इस पर विचार करने की जरूरत है कि क्या वजह है कि प्रकाशन जगत के इस सबसे बड़े आयोजन में स्थापित कवियों की अनुपस्थिति दर्ज की गई । क्या कविता अपने समय से पिछड़ गई है या फिर कविता को लेकर पाठकों में कोई उत्साह नहीं रहा जिसका प्रभाव प्रकाशकों की उदासीनता के रूप में सामने आ रहा है । दूसरी बात ये भी देखने को मिली कि छोटे छोटे कई प्रकाशकों की सूची के नए प्रकाशनों में कविता संग्रहों को अच्छी खासी जगह मिली हुई है । तो क्या कविता को लेकर प्रकाशन का अर्थशास्त्र बदल रहा है । या फिर कोई और वजह है । कविता एक ऐसी विधा है जो साहित्य को हमेशा से नये आयाम देती रही है अगर उसपर किसी तरह की आंच आती है तो यह गंभीर बात होगी ।


किताब पढ़ी नहीं है लेकिन...

दिल्ली में राष्ट्रीय पुस्तक न्यास द्वारा आयोजित विश्व पुस्तक मेला आज समाप्त हो रहा है । इस वर्ष का विश्व पुस्तक मेला कई मायनों में अनोखा रहा । पुस्तक मेलों में हर वर्ष ताबड़तोड़ पुस्तक विमोचन होते रहे हैं लेकिन इस बार ये मेला विमचनों के रेला के लिए याद किया जाएगा । यह कोई बहुत असमान्य बात नहीं है, समय बीतने के साथ साथ हर चीज में बढ़ोतरी होती ही है । लेकिन इसके साथ जो असमान्य प्रवृत्ति देखने को मिली वो ये कि जिन पुस्तकों का विमोचन महानुभाव कर रहे थे उनको उसके बारे में कोई जानकारी नहीं होती थी । विमोचन के बाद अमूमन हर वक्ता यह कहता था मैंने इनकी कहानी पढ़ी नहीं है लेकिन..., मैंने इनका उपन्यास पढ़ा नहीं है लेकिन...। क्या आलोचक, क्या वरिष्ठ कथाकार सबों की जुबां पर यही लफ्ज आते थे । यह प्रवृत्ति लगभग सभी प्रकाशकों के विमोचनों में देखने को मिली । सवाल यही उठता है कि विमोचनों की इतनी हड़बड़ी क्यों ? क्यों नहीं इस बात का इंतजार किया जा रहा था कि जिस भी पुस्तक का विमोचन हो, विमोचनकर्ता तैयारी के साथ आएं । कृति पर थोड़ी बात हो ताकि वहां मौजूद पाठकों के बीच जारी होनेवाली किताब को लेकर उत्सुकता बने और वो इसको खरीद सकें । हालात तो ये हो रहे थे कि विमोचन वाले स्टॉल के आगे से कोई वरिष्ठ, कनिष्ठ, समकालीन रचनाकार गुजर रहा हो तो उनको भी बुला लिया जाता था कि आइए आइए जरा विमोचन कर दीजिए । गुजरनेवाले भी खुशी खुशी किताब हाथ में लेकर पंक्ति में खड़े हो जाते थे । समारोह में शामिल होनेकी तस्वीर कैमरे में कैद हो जाती थी । भारतीय परंपरा में खुशी बांटने की परंपरा भी है लेकिन हद तब हो जाती थी जब खुशी बांटने के लिए विमोचन समारोह में शामिल होने वाले लेखक से कहा जाता था कि आप भी विमोचित कृति पर कुछ बोलिए । फिर वही शब्द गूंजता हैं, मैंने इस कृति को पढ़ा तो नहीं है लेकिन...। यहां जानबूझकर किसी विमोचनकर्ता का नाम नहीं लिखा जा रहा है क्योंकि लेख का उद्देश्य इस प्रवृत्ति को रेखांकित करना है किसी का नाम लेकर उनका उल्लेख करना नहीं । इसके अलावा इस बार कई पुस्तक विमोचन हाईटेक रहे । लेखकों ने तकनीक का फयदा उठाया । जिस लेखक की किताब विमोचित हो रही हो और वो किसी वजह से पुस्तक मेले में मौजूद नहीं रह पाया तो उनके मित्रों ने उनको फोन कर स्पीकर ऑन कर दिया या फिर स्काइप या वीडियो क़लिंग के जरिए उनको कार्यक्रम से जोड़ लिया । यह तकनीक का फायदा रहा लेकिन वीडियो कॉल या फोन के जरिए जुड़े लेखक को भी सुनना पड़ा कि- इनकी कृति मैंने पढ़ी तो नहीं है लेकिन...। विश्व पुस्तक मेले की इस प्रवृत्ति को इस वजह से भी रेखांकित किए जाने की जरूरत है क्योंकि प्रसिद्धि की फौरी चाहत में साहित्य पिछड़ता जा रहा है । पढ़ी नहीं है लेकिन... की प्रवृत्ति ज्यादातर वरिष्ठ लेखकों में देखने को मिली, कुछ प्रौढ होते लेखक भी इस तरह से विमोचन करते घूमते दिखे । दरअसल होता क्या है कि लेखकों को लगता है कि अपने से वरिष्ठों से विमोचन करवाकर फोटो उतार लिए जाएं और उसको फेसबुक पर चढ़ा कर लाइक्स की लोकप्रियता हासिल कर ली जाए । ज्यादातर विमोचनों को देखकर यही लगा कि इस बार भी पुस्तक मेले में फेसबुक को ध्यान में रखकर बहुत से काम किए गए । लेकिन फेसबुक की लाइक्स से साहित्य सृजन में गहराई आए या फिर बेहतर रचना के लिए लेखक और मेहनत करें ऐसा अबतक देखने को नहीं मिला है ।
इसके अलावा इस वर्ष के पुस्तक मेले में साहित्य की वरिष्ठम पीढ़ी की लगभग अनुपस्थिति भी दर्ज की गई । ऐसा लगता है कि नामवर सिंह अस्वस्थता और कड़ाके की ढंड की वजह से कम आ पाए । कुंवर नारायण बहुत कम बाहर निकलते हैं । विश्वनाथ त्रिपाठी और अशोक वाजपेयी मेले में दिखाई अवश्य दिए लेकिन एकाध विमोचन या कार्यक्रमों की अध्यक्षता की ही जानकारी मिल पाई । इसके अलावा कई वरिष्ठ साहित्यकार अकेले घूमते नजर आए । तो क्या इन वरिष्ठ लेखकों का दौर या आकर्षण या फिर इनसे अपने कृति के बारे में प्रमाण-पत्र लेने का दौर खत्म हो गया । या फिर इन लोगों ने इतने प्रमाण-पत्र बांट दिए कि अब उनके स्टॉक में सर्टिफिकेट्स खत्म हो गए हैं । यह भी हो सकता है कि वरिष्ठतम लेखकों ने नई पीढ़ी के आकांक्षाओं की रफ्तार से तालमेल नहीं बिठा पाए और नेपथ्य में चले गए । वाजपेयी जी जैसे स्टार लेखकों की स्टार वैल्यू को छीजता देखकर दुख होता है । एक जमाना होता था कि पुस्तक मेले में वाजपेयी जी के आगमन के साथ हिन्दी के हॉल में लगता था कि बहार आ गई हो । वो जब चलते थे तो उनके आगे पीछे लेखकों की फौज होती थी । इस बार वैसा नजारा देखने को नहीं मिला । वाजपेयी जी के अकेले होने की वजह उनका सत्ता से दूर होना भी हो सकता है । यह पहली बार हुआ है कि वाजपेयी जी की सत्ता प्रतिष्ठान में कोई पूछ नहीं रही । वो किसी सरकारी पद आदि पर भी नहीं हैं, लिहाजा हिंदी लेखकों को पहली बार हवाई यात्रा करवाने जैसा दंभपूर्ण बयान भी नहीं दे सकते हैं, पुरस्कार आदि देना तो दूर की बात है । अब यह देखना दिलचस्प होगा कि साहित्यक सत्ता के केंद्रों की अहमियत कम होने के बाद नया साहित्यक सत्ता केंद्र उभरेगा या फिर उसका विकेन्द्रीकरण हो जाएगा ।
विश्व पुस्तक मेले में छिटपुट विवाद भी हुआ । हिंदी अकादमी दिल्ली की उपाध्यक्ष और मशहूर उपन्यासकार मैत्रेयी पुष्पा और अपेक्षाकृत नई पीढ़ी की लेखिकाओं में टकराहट लंबे समय से चल रही है । पुस्तक मेले में एक बार फिर से प्रत्यक्ष रूप से इस टकराहट से पाठक भी रूबरू हुए । एक चर्चा के दौरान लेखकीय विरासत के बाबत पूछे गए सव सवाल का जब मैत्रेयी पुष्पा ने नकारात्मक जवाब दिया तो विवाद बढ़ा । वहां मौजूद उपन्यासकार अल्पना मिश्र ने विरोध दर्ज करवाया । अब सवाल यही है कि लेखकीय विरासत है क्या ? क्या लेखन कोई संपत्ति है जिसकी विरासत किसी को सौंपी जाए या फिर उसकी वसीयत की जाए । दरअसल पिछले दिनों नासिरा शर्मा ने एक पत्रिका में अपनी साहित्यक वसीयत लिखी थी और कुछ रचनाकारों का नाम भी लिया था । उनके वसीयतनामे के बाद विरासत की साहित्यक राजनीति शुरू हो गई । संगीत में तो विरासत फिर भी मुमकिन है लेकिन साहित्य में विरासत की अवधारणा ही गलत है । बेहतर साहित्यक लेखन तो वो होता है जो परंपरा से अलग हटकर अपनी राह खुद बनाए । यह बात भी समझ से परे है कि मैत्रेयी पुष्पा से स्वीकृति की मोहर क्यों लगवाने की जरूरत है । मैत्रेयी ने अपने तरह का लेखन किया और अब नई पीढ़ी की लेखिकाएं अपनी तरह का लेखन कर रही हैं । इस विवाद की जड़ में विरासत आदि होगा लेकिन आपत्ति इस बात को लेकर ज्यादा हुई होगी कि मैत्रेयी पुष्पा ने मनीषा कुलश्रेष्ठ का नाम ले लिया । कुछ दिनों पहले जब मैत्रेयी पुष्पा ने अपेक्षाकृत युवा लेखिकाओं को निशाने पर लेते हुए एक लेख लिखा था तब मनीषा कुलश्रेष्ठ ने भी विरोध का झंडा उठाया था । अब बदले साहित्यक परिदृश्य में मैत्रेयी जी ने मनीषा को बेहतर रचनाकार माना तो उनसे सवाल पूछे जाने लगे । स्त्री लेखन में साहित्यक विरासत की गूंज मेले में रही लेकिन एक दो दिनों में ही ये थम सा गया । इन दिनों हिंदी साहित्य में असहिष्णुता भी बढती जा रही है । कोई भी अपनी रचनात्मक आलोचना सुनने को तैयार नहीं है । अगर किसी ने रचना की भी आलोचना कर दी तो लेखक आगबबूला हो जाता है । प्रकरांतर में इस प्रवृत्ति का नुकसान साहित्य की अलग अलग विधाओं को होता है । देश में बढ़ती असहिष्णुता को लेकर छाती कूटनेवालों में भी सहिष्णुता का आभाव दिखाई देता है । वो अपनी आलोचना तो क्या ही बर्दाश्त करेंगे अपनी रचना पर भी आलोचनात्मक टिप्पणी उनको नहीं सुहाती है । लेखकों के लिए आत्ममंथन का वक्त है ।

इस बार विश्व पुस्तक मेले के पहले प्रकाशकों को इस बात का अंदेशा था कि नोटबंदी का असर दिखाई देगा । कई प्रकाशकों ने कार्ड से लेकर पेटीएम तक से भुगतान लेने का इंतजाम किया हुआ था । लेकिन जिन प्रकाशकों के यहां ईपेमेंट का इंतजाम नहीं था उनको भी कोई दिक्कत नहीं हुई । नोटबंदी का किसी प्रकार का कोई असर देखने को नहीं मिला । भारी संख्या में पाठक पुस्तक मेले में पहुंचे और जमकर खरीदारी की । आमतौर पर होता था कि हिंदी के मंडप में अंग्रेजी की तुलना में कम पाठक पहुंचते थे लेकिन इस बार ऐसा प्रतीत हो रहा है कि हिंदी के पाठकों ने अंग्रेजी वालों को पीछे छोड़ दिया है, संख्या के लिहाज से भी और बिक्री के हिसाब से भी । यह हिंदी के लिए सुखद संकेत है ।    

Tuesday, January 10, 2017

बरकती, ममता और फतवे की सियासत

कोलकाता के एक मस्जिद के कथित शाही इमाम बरकती ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ फतवा जारी किया । बरकती ने बकायदा एक प्रेस कांफ्रेंस में अपमानजनक फतवा जारी किया जिसके पीछे बैनर पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की बड़ी सी तस्वीर लगी थी । बरकती ने हिंदी और अंग्रेजी में अपमानजनक फतवा जारी किया । यह मानना मेरे लिए मुमकिन नहीं है कि इस मसले की जानकारी पुलिस को नहीं होगी या जिस वक्त देश के प्रधानमंत्री के खिलाफ फतवा जारी किया जा रहा था उस वक्त वहां पुलिस मौजूद नहीं रही होगी । अगर ऐसा था तो पुलिस ने उसी वक्त बरकती के खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं की । अगर किसी कारणवश उस वक्त कार्रवाई नहीं हो पाई तो क्या बाद में कोई कार्रवाई की गई । अबतक तो ज्ञात नहीं है । तो क्या ये मान लिया जाए कि बरकती ने वो फतवा राज्याश्रय के तहत किया । प्रत्यक्ष ना सही परोक्ष रूप से बरकती के उस कदम को सूबे की सरकार का समर्थन हासिल था । बरकती और ममता बनर्जी की सियासी नजदीकियां जगजाहिर हैं और अपने इस राजनीतिक संबध को बरकती सार्वजनिक रूप से जाहिर भी कर चुके हैं । इससे इस बात का अंदेशा तो बढ़ता ही है कि ममता बनर्जी के इशारे पर बरकती ने ये काम किया है । अगर उनके इशारे पर नहीं भी किया तो जिस तरह से पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की उससे तो ये साफ पता चलता है कि कहीं ना कहीं से बरकती इस बात को लेकर आश्वस्त थे कि प्रधानमंत्री के खिलाफ फतवा देने के बाद भी उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होगी । इस्लाम में किसी फैसले या फरमान को  फतवा कहते हैं । इसकी एक प्रक्रिया होती है कि कोई भी मुसलमान अपने मजहबी मसले को लेकर हाकिम के सामने पेश होता है और वो मजहबी हाकिम उसपर अपना फैसला सुनाता है । बरकती के फतवे के मसले में भी ये जानना दिलचस्प होगा कि प्रधानमंत्री मोदी को लेकर क्या मजहबी विवाद था या फिर किसने फतवे की अर्जी दी थी । शाही इमाम बरकती को इस मसले को साफ करना चाहिए । इस मसले की मांग तो मुस्लिम बुद्धिजीवी की तरफ से भी की जानी चाहिए कि बरकती ने किस मजहबी विवाद को सुलझाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ फतवा जारी किया क्योंकि इस्लाम में फतवे की बड़ी भूमिका है वो और वो संचित होते रहते हैं ताकि भविष्य में इस तरह के मसलों पर राय दी जा सके । फतवे जो हैं वो मुस्लिम उम्मते के लिए लिटरेचर बन जाते हैं जिसका उपयोग स्थनीय स्तर तक किया जाता है । जब भी मुस्लिम समुदाय के बीच किसी तरह का विवाद होता है तो लोग स्थनीय मौलवी के पास जाते हैं इस वक्त वो मौलवी मजहबी हाकिम के फतवों का सहारा लेकर विवाद सुलझाने की कोशिश करता है । इस संदर्भ में यह जानना और जरूरी है कि बरकती ने किसकी शंका पर फतवा जारी किया । तीन तलाक के मुद्दों पर जिस तरह से कुछ मुस्लिम संगठन विरोध कर रहे हैं उनका आधार ये फतवे ही हैं । तीन तलाक को लेकर तरह तरह के फतवे दिए गए हैं जो विरोधाभसी हैं ।
बरकती के इस फतवे से कई सवाल खड़े होते हैं । पहला सवाल तो राज्य सरकार पर ही खड़ा होता है जिसकी चर्चा उपर की जा चुकी है । दूसरा सवाल खड़ा होता है कि इस तरह के धर्मगुरुओं को सियासत में सीधे पर उतरना चाहिए । किसी मस्जिद के सदर को प्रधानमंत्री के खिलाफ उकसाने का हक किसने दिया । तीसरा सवाल उठता है उन बुद्धिजीवियों पर जो हर बात पर छाती कूटते रहते हैं । उन बुद्धिजीवियों पर जो भारतीय जनता पार्टी के सांसद साक्षी महाराज जैसे लोगों के बयान पर तो शोर शराबा करते हैं लेकिन बरकती जैसों की इन हरकतों पर खामोश रह जाते हैं । जिन बुद्धिजीवियों को तमिलनाडू से लेकर केरल तक, महाराष्ट्र से लेकर गुजरात तक ये लगता है कि लेखकों की अभिव्यक्ति की आजादी पर पहरा लगा दिया गया है वो बुद्धिजीवि बरकती के फतवे पर खामोश हैं । साध्वी प्राची जैसी महिला जो भारतीय जनता पार्टी से नहीं जुड़ी है उसके बयान के आधार पर प्रधानमंत्री को कठघरे में खड़ा लोग इस वक्त खामोश क्यों हैं, असहिष्णुता के मुद्दे पर डंडा-झंडा लेकर शोरगुल करनेवाले लोग इस वक्त कहां हैं । अब अगर हम सवाल दर सवाल इनके जवाब ढूंढने की कोशिश करते हैं तो चौंकानेवाली तस्वीर सामने आती है । अभी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने धर्म के आधार पर वोट मांगने को लेकर सख्त निर्णय दिया है । बरकती के इस फतवे के बाद सुप्रीम कोर्ट के उक्त फैसले को व्याख्यित करने की जरूरत है । क्या धर्म के नाम पर प्रत्यक्ष रूप से वोट मांगना ही गलत है या फिर परोक्ष रूप से भी सियासी फायदा लेना गलत है । पश्चिम बंगाल में करीब अट्ठाइस फीसदी मुसलमानों के वोट हैं । इन्हींवोटों को चक्कर में पश्चिम बंगाल में बरकती जैसी शख्सियतों को बढ़ावा दिया जाता है । इन्हीं मुस्लिम वोट बैंक के चक्कर में वामपंथी सरकारों से लेकर ममत बनर्जी सरकार तक तस्लीमा नसरीन को कोलकाता से निर्वासित कर देती है । तुष्टीकरण की इस नीति के खिलाफ भी कभी सहिष्णु बुद्धिजीवियों ने कुछ बोला, लिखा हो ज्ञात नहीं है । वामपंथ में आस्था रखनेवाले बौद्धिकों का ये दोहरा चरित्र बेहद खतरनाक है क्योंकि इसका असर सियासत पर तो पड़ता ही है , साहित्य को भी ये गहरे तक प्रभावित करता है । पाठकों को लगता है कि उसका नायक, जो लेखक होता है, ईमानदार नहीं है । जब पाठक इस तरह की प्रवृत्ति को लक्षित करता है तो उसका भरोसा लेखकों से उठने लगता है जो आगे चलकर साहित्य को भी प्रभावित करता है ।


Saturday, January 7, 2017

कहानी को बचाने की चुनौती

इन दिनों कहानी पर लिखना बर्रे के छत्ते में हाथ डालने जैसा है, सात्विक कहानियों पर अगर लिख दें तो चल भी जाएगा लेकिन स्त्रीवादी कहानी पर लिखना बेहद जोखिम का काम है । दरअसल हम सहिष्णुता की बहुत बात करते हैं लेकिन जहां कहीं भी जरा सी आलोचना दिख जाए या उसका अंदेशा भी दिखे तो कहानीकार या फिर उनके गुर्गे हमलावर हो जाते हैं । साहित्यक पत्रिका हंस से राजेन्द्र यादव ने हिंदी साहित्य में स्त्री विमर्श की शुरुआत की । स्त्री मुक्ति के नाम पर या स्त्री विमर्श के नाम पर देह मुक्ति पर्व मनाया जाने लगा था । स्त्री विमर्श के नाम पर देह विमर्श होने लगा था । स्त्री विमर्श के पैरोकार राजेन्द्र यादव ने कुछ लेखिकाओं को सिमोन और वर्जिनिया वुल्फ की घुट्टी पिलाई । सिमोन का नाम उस दौर में स्त्री विमर्श का नारा बनकर रह गया था । सिमोन की स्वच्छंदता की कसमें खाई जाने लगी थी । राजेन्द्र यादव ने इस प्रवृत्ति को खूब जमकर बढाया । लेकिन यादव जी भारतीय समाज और उसके मनोविज्ञान को ठीक से भांप नहीं सके । जिन लेखिकाओं को उन्होंने सिमोन बनाने की ठानी थी या जिनको वर्जिनिया वुल्फ की तरह देखना चाहते थे वो उनके रास्ते पर चली तो सही लेकिन हिचक के साथ । इस हिचक ने हिंदी साहित्य में थोड़ा सिमोन, थोड़ा वर्जीनिया वुल्फ की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया । यादव जी की लेखिकाएं सिमोन जैसा साहस नहीं दिखा पाईं । लेकिन राजेन्द्र यादव ने लेखक लेखिकाओं की पूरी पीढ़ी तैयार की जो इस तरह का बोल्ड लेखन कर सकें । बोल्ड लेखन की आड़ में राजेन्द्र यादव ने कई लेखकों को कहानीकार बना दिया जिन्हें कलम पकड़ने की तमीज नहीं थी । उनमें से चंद लेखिकाओं के पास भाषा का कौशल था लिहाजा वो देहगाथा को भी संभाल ले गईं । विषयगत प्रयोग भी किए और आधुनिक कहानियों के साथ साथ ग्रामीण जीवन पर भी सफलतापूर्वक लिखा । इस बात को पहले भी कहा जा चुका है कि बोल्ड लेखन सबके वश की बात नहीं है, बोल्ड लेखन के लिए भाषा पर पकड़ होनी चाहिए । ज्यादा पीछे नहीं जाते हैं । कृष्णा सोबती की मित्रो मरजानी को देखें, मृदुला गर्ग की कृति चितकोबरा को देखें, मैत्रेयी पुष्पा की चाक या फिर अलमा कबूतरी को देखें तो उसमें जो देहगाथा आती है उसमें पाठकों को जुगुप्सा नहीं होती है । चाक की सारंग का जो प्रसंग है वो बहुत स्वाभाविक तरीके से उपन्यास में आता है और पाठक वहां उसको यौन प्रसंग के तौर पर देखने की बजाए एक घटना के तौर पर देखते हैं । हलांकि इन सब ने अपने दौर में इस तरह के बोल्ड लेखन का विरोध झेला था लेकिन वो विरोध वक्त के साथ दफन हो गया । यह विरोध इस वजह से दफन हुआ कि उन रचनाओं में  कंटेंट था । पिछले साल प्रकाशित बुजुर्ग लेखिका रमणिका गुप्त की आत्मकथा आपहुदरी को देखें । भाषा के स्तर पर बेहद फूहड़ और यौन घटनाओं की बहुलता ने पाठकों को बेहद निराशा किया ।
अगर हम पिछले साल को उदाहरण के तौर पर लें तो कहानी विधा के लिए उसको बेहतर नहीं माना जा सकता है । एक ही तरह कि कहानियां, एक ही तरह का यथार्थ, एक ही तरह की भावभूमि जैसे कहानीकारों के पास कहने को नया कुछ है ही नहीं । घिसी पिटी लीक पर फॉर्मूलाबद्ध कहानियों की बाढ़ रही । मशहूर नाटककार इब्सन ने अपने नाटक घोस्ट्स की भूमिका में लिखा है – हमारी सीमा के प्रसार का समय आ गया है । लेकिन सवाल यही है कि क्या सीमा के प्रसार के नाम पर क्रांतिकारी नारेबाजी से काम चलेगा या फिर कुछ सार्थक रचना होगा । इसपर विचार करना होगा कि क्या बोल्ड लेखन के उद्घोष या फिर देहगाथा का परचम लहराकर नई सीमा तय की जा सकती है । क्या सालों से चले आ रहे विचार का कोई परिष्कार हो पाया है । आधुनिकता के नारे के बीच विचार तो गौण हो ही गया है परंपरा को भी हम भूलने लगे हैं । दरअसल पारंपरिक विचारों में जबतक नवीनता के साथ सृजन नहीं होगा तबतक आधुनिकता का दावा बेमानी है । आधुनिकता का नारा खोखला लगता रहेगा । व्यक्तिगत कुंठा से परे जाकर समाज के बड़े सवालों से टकराते हुए जब हम आधुनिकता का दावा करते हैं तो यह भी देखना होता है कि रचना में अपने समय या समाज को झकझोरने का माद्दा है या नहीं । बोल्ड लेखन के नाम पर राजेन्द्र यादव और उनके सिपहसलारों ने आधुनिक और आधुनिकता के मानदंडों को इतना उलझा दिया कि उसको चिन्हित करने में कठिनाई होने लगी है । समय सापेक्ष आधुनिकता को लेकर भ्रम की स्थिति बना दी गई । समसमायिकता के चित्रण को आधुनिकता से जोड़ दिया गया जिससे स्थिति और विकट होने लगी । स्त्री पुरुष संबंधों के आधुनिक होने का आधार दैहिक संबंध होने लग गए । यहां इस बात को फिर से दोहराना आवश्यक है कि दैहिक संबंधों का चित्रण भाषा का कुशल चितेरा ही कर सकता है ।
हिंदी कहानी को लेकर जिस तरह की उदासीनता पाठकों में देखने को मिल रही है वो बहद चिंता का विषय है । कहानी की बुनियादी शर्त है कि उसमें पठनीयता हो और पाठकों का पढ़ने में मन लगे । बीते साल में कहानी की पठनीयता में जबरदस्त कमी महसूस की गई और पाठकों का कहानी में मन लगने की बजाए मन उचटने के संकेत मिले । नई कहानी के शोरगुल के बीच नामवर सिंह ने लिखा था कि – भाषा इधर की कहानियों की काफी बदली है, यह भी कह सकते हैं कि मंजी है । यहां तक हिंदी गद्य का अत्यंत निखरा हुआ रूप आज की कहानी में ही सबसे अधिक मिलता है । कहानी में एक भी फालतू शब्द ना आये, इसके प्रति आज का लेखक बहुत सतर्क है । तब नामवर सिंह ने इसको कहानी के लिए शुभ लक्ष्ण माना था । नामवर सिंह के इस कथन के आलोक में आज की कहानियों पर विचार करने से लगता है कि कहानी में भाषा के स्तर पर ना तो कोई बदलाव दिखाई देता है और ना ही कोई कहानीकार अपनी कहानियों में भाषा के साथ खिलंदड़ापन ही करता दिखाई देता है । इसके अलावा आज की कहानियों में भी कई फालतू शब्द भी आवारागर्दी करते नजर आते हैं । भाषा को निखारने की बात तो छोडिए जो भाषा सही से लिख नहीं पाते हैं, जिनकी वर्तनी से लेकर व्याकरण तक दोषपूर्ण है उनको भी कहानीकार मान लिया जाता है । भाषा के अलावा कहानी से कहानीपन भी तो गायब होता चला गया ।
आज की कहानियों के कथानक पर अगर हम विचार करें तो पाते हैं वो लगभग सपाट है । कहीं किसी भी तरह का उतार चढ़ाव नहीं, नामवर जी इसकी तुलना बहुधा पहाड़ी रास्तों से करते हैं जहां कदम कदम पर आकस्मिक मोड़ मिलते हैं । रूसी कथाकार चेखव को ऐसी कहानियों का जनक माना जाता है और उनके प्रभाव में यह प्रवृत्ति विश्वव्यापी हो गई । हिंदी भी इससे अछूती नहीं रही । नामवर सिंह के मुताबिक ये कहानी में यथार्थवाद की विजय का पहला उद्घोष था । जिस वक्त चेखव ने यह प्रयोग किया था उस वक्त पाठकों ने इसको काफी पसंद किया था क्योंकि इसमें एक नयापन था । हिंदी में भी यथार्थवादी कहानियां इस वजह से ही स्वीकृत और प्रशंसित हुईं । कहानी की इस तकनीक की सफलता से हिंदी कहानी के ज्यादातर कथाकारों ने इसको अपनाया । नतीजा यह हुआ कि हिंदी में यथार्थवादी कहानियों की बाढ़ सी आ गई । धीरे-धीरे पाठकों को इस तकनीक से लिखी गई कहानियों में दुहराव नजर आने लगा । हाल में तो यथार्थवादी कहानियों के नाम पर सीधे-सीधे घटनाओं को लिखा जाने लगा । इसने कहानी विधा का बहुत नुकसान किया । कथानक की साम्यता ने पाठकों को निराश करना शुरू कर दिया । बल्कि कई कहानीकारों पर तो नकल का इल्जाम भी लगा जबकि कथानक में समानता चेखव की तकनीक को अपनाने की वजह से आ रही थी । जब भीहम यथार्थवादी कहानियों की बात करते हैं तो हमें प्रेमचंद और जैनेन्द्र के बीच की एक दिलचस्प बातचीत का स्मरण हो आता है । प्रेमचंद ने जैनेन्द्र से कहा कि उपन्यास लिखो उपन्यास । जैनेन्द्र ने पूछा कि कैसे लिखें तो प्रेमचंद ने कहा कि घर में नाते-रिश्तेदार जो हों उनको ही लेकर लिख दो । प्रेमचंद की इस सीख को कहानीकारों ने सालों तक उपयोग किया । उदय प्रकाश की कहानियों में  तो इसको अब भी देखा जा सकता है । उसके बाद कहानी  सालों तक कहानीकारों ने रेणु के प्रभाव में कहानियां लिखीं थी । इसी क्रम को ईदगे बढ़ाते हुए आधुनिकता के नाम पर राजेन्द्र यादव ने कम से कम एक दशक तक देह को केंद्र में रखकर कहानियां लिखवाईं । लेकिन हिंदी कहानी को अब अपना रास्ता बदलना होगा । अगर वक्त रहते हिदीं कहानी ने अपना रास्ता नहीं बदला तो उसके सामने गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता है ।


धुनों के खिलाड़ी

भारतीय संगीत के सफर में कई मुकाम आए और कई संगीतकारों ने अपनी धुनों से इसको ना केवल समृद्ध किया बल्कि उसको लेकर सफल प्रयोग भी किए । संगीत की धुनों के साथ ऐसे ही प्रयोगधर्मी कलाकार थे राहुल देव बर्मन जिन्हें पंचम के नाम से भी जाना जाता है । पंचम नाम की भी एक दिलचस्प कहानी है । बात उन दिनों की थी जब उनके पिता सचिन देव बर्मन कोलकाता से मुंबई आ गए थे और बाल राहुल भी छुट्टियों में अपने पिता के पास आ जाते थे । उनको भी सुर लगाने का शौक था । एक दिन एक गीत के रिहर्सल के दौरान अशोक कुमार ने राहुलदेव बर्मन से भी सुर लगाने को कहा लेकिन वो का उच्चारण ठीक से नहीं कर पा रहे थे । उनके के मनोरंजक उच्चारण का मजाक उडाने के क्रम में उनका नामकरण पंचम हो गया । कहा जाता है कि दादामुनि अशोक कुमारे ने ये नाम उनको दिया था । बचपन से संगीकार बनने की ख्वाहिश पाले सचिन दा को महमूद ने अपनी फिल्म छोटे नवाब में मौका दिया था । हलांकि इसके पहले गुरुदत्त भी उनसे अपनी एक फिल्म के लिए उनको साइन किया था लेकिन फिल्म बन नहीं पाई थी । संगीतकार के तौर पर फिल्मों में संगीत देने के पहले पंचम दा ने ब्रजेन विश्वास से तबला और अली अकबर खान से सरोद की शिक्षा ली थी । हारमोनियम पर उनका हाथ पहले से साफ था । तबले की इस शिक्षा का उत्स देखने को मिला था फिल्म शोले में जब फिल्म में जब दो घुड़सवार रेलवे स्टेशन से रामगढ की ओर जाते हैं । रेलवे स्टेशन से रामगढ़ तक जाने के रास्ते में संगीत की बारीकियों को अगर ध्यान से देखें तो इसमें गिटार, फ्रेंच हॉर्न और तबला तरंगों के कंपनों से जिस तरह की प्रभावोत्पादकता पैदा होती है वह कोई सधा हुआ संगीतकार ही कर सकता है । जब घुड़सवार गांवों की पगडंडियों से गुजरते हैं तो धुन एकदम से बदलकर देहाती माहौल का आभास देता है । जब वो ठाकुर के घर के पास पहुंचते हैं तो एक बार फिर से धुन अपनी राह बदलती है शहनाई के रास्ते होते हुए वापस अपने शुरुआती धुन पर लौटती है ।

जब पंचम मुंबई आए थे तो उनके नाम के साथ लगा देव बर्मन उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती थी । उन्हें अपने पिता से अलग राह ढूंढनी थी । उन्होंने दुनियाभर के संगीत को सुना और उसके बाद उन्होंने जिस तरह की धुनों की रचना की उसने देव बर्मन के नाम को सार्थक किया । राहुल देव बर्मन पर बहुधा ये आरोप लगता रहा कि वो अपने धुनों में बहुत लाउड होते हैं । होते भी थे, लेकिन धुनों पर उनकी पकड़ इतनी जबरदस्त थी कि वो इस लाउडनेस को कर्णप्रिय बना देते थे । धुनों की रचना करने में उनको महारथ हासिल थी और कई बार तो वो गाने के बोल सुनते सुनते ही मन ही मन धुनों की रचना कर डालते थे । फिल्म सागर के दौर की एक बेहद दिलचस्प कहानी है । जावेद अख्तर फिल्म के डॉयलॉग लिखने के लिए खंडाला में थे अचानक उनको फिल्म की संगीत को लेकर होनेवाली बैठक के लिए मुंबई का बुलावा आया । आर डी बर्मन ने जावेद अख्तर को एक धुन दी हुई थी जिसके अनुसार उनको गाना लिखना था । जावेद अख्तर कोशिश करके हार चुके थे लेकिन धुन के हिसाब से गाने के बोल बन नहीं पा रहे थे । वजह ये थी कि जावेद अख्तर एक ऐसी पंक्ति उस गाने में रखना चाहते थे लेकिन वो उसके मीटर में फिट नहीं बैठ रही थी । लिहाजा जावेद ने पंचम दा के दिए गए धुन को दरकिनार करते हुए अपनी मर्जी का गीत लिख दिया । जब जावेद खंडाला से मुंबई आए तो राहुल देव बर्मन और रमेश सिप्पी अपनी टीम के साथ उनका इंतजार कर रहे थे । जावेद ने घुसते ही कहा कि वो धुन के हिसाब से गाना नहीं लिख पाए हैं । पंचम दा ने कहा कि चलो जो गाना तुमने लिखा है वही मुझे लिखवाओ । जावेद गाना लिखवाने लगे । जैसे ही राहुल देव ने गाना लिखकर खत्म किया उन्होंने हारमोनियम उठाई और धुन के साथ गाने लगे – चेहरा है या चांद खिला है, जुल्फ घनेरी शाम है क्या । मतलब ये कि गाना लिखते लिखते ही राहुलदेव ने उसकी धुन तैयार कर ली । सागर फिल्म का ये गाना बेहद हिट रहा था । ऐसे कई किस्से हैं पंचम दा से जुड़े । दरअसल अगर हम देखें तो पंचम दा में ये खूबी थी कि वो संगीत के माध्यम से दृश्यों में जीवन के रंग भर देते थे । हर क्षेत्र में कई लोग सफल होते हैं लेकिन बदलते वक्त के साथ उनको भुला दिया जाता है लेकिन चंद लोग ही ऐसे होते हैं जो सफल तो होती ही हैं अपने अभूतपूर्व कामों से विधा को एक नई ऊंचाई देते हैं । आरडी बर्मन ने भी मौजूदा वाद्य यंत्रों के साथ साथ नए वाद्ययंत्रों के साथ नई धुन और नई संवेदना के साथ ऐसा संगीत रचा जो कालजयी हो गया । सत्तर और अस्सी के दशक के पंचम के बनाए धुन आज भी समकालीन लगते हैं । आर डी बर्मन को बहुत ही कम उम्र मिली और चौवन साल की उम्र में ही संगीत का ये सितारा डूब गया । 

लेखक, प्रकाशक और पैसे का तिलिस्म ·

दिल्ली में विश्व पुस्तक मेला शुरू हो चुका है । सोशल मीडिया पर लेखकों का उत्साह देखते ही बन रहा है । जिस लिहाज से सोशल मीडिया पर किताबों के छपने और उसके लोकार्पित होने के कार्ड पोस्ट हो रहे हैं उससे तो यही लगता है कि कम से कम प्रकाशकों पर नोटबंदी का कोई असर नहीं पड़ा है । पुस्तक मेले में आ रही किताबों को देखकर भी यही लग रहा है कि कविता संग्रह तक छापने में प्रकाशकों के सामने कोई दिक्कत नहीं है । थोक के भाव से कविता संग्रहों के प्रकाशन की सूचना सोशल मीडिया पर साझा की जा रही हैं । सतह पर भले ही यह दिखता हो लेकिन कुछ नए प्रकाशकों ने लेखकों, कवियों, कहानीकारों की प्रसिद्ध होने की चाहत में अपने कारोबार का रास्ता ढूंढ लिया । कविता संग्रह या कहानी संग्रह छपवाने के लिए लेखक कवि पैसे खर्च करने के लिए तैयार हैं । कविता संग्रह का रेट तीस हजार के करीब बताया जा रहा है जिसमें तय ये होता है कि जितने पैसे लेखक देगा उतने मूल्य की किताब उनको दे दी जाएगी । हलांकि ये कोई नई प्रवृत्ति नहीं है । ये पहले से होता आया है लेकिन अब सांस्थानिक रूप से होने लगा है । पहले प्रकाशक भी और लेखक भी छिप छिपाकर ये काम करते थे लेकिन अब तो बकायदा करार करने के बाद ये काम हो रहा है । हिंदी के कई प्रकाशक तो अब खुलकर इस कारोबार में आ गए हैं । तकनीक ने इस काम को और आसान बना दिया है । डिजीटल प्रिंटिंग से किताबें छापने की सहूलियत के बाद तो एक प्रति से लेकर पच्चीस प्रति तक छापने की छूट मिल गई है । लेखक या प्रकाशक जितना चाहे या फिर जितनी प्रतियों का सौदा हो जाए उतनी प्रतियां छाप ली जाती हैं । डिजीटल प्रिंटिंग से निकाली गई किताब छपाई की अन्य तकनीक के मुकाबले देखने में सुंदर भी लगती है । विमोचन या लोकार्पण के वक्त उसकी तारीफ भी हो जाती है । सोशल मीडिया पर खूबसूरत कवर आदि पोस्ट होने से लेखक को वहां प्रसिद्धि भी मिल जाती है । लाइक्स से लोकप्रियता भी तय हो जाती है।  
इस प्रवृत्ति के बढ़ने पर सवाल नैतिकता का नहीं है, किसी भी लेखक को अपनी किताब अपने धन से छपवाने का पूरा हक है । अगर लेखक के पास पैसा है और प्रकाशक छापने के लिए तैयार है तो किसी का भी इसपर आपत्ति उठाना गलत है । सवाल तो पारदर्शिता का है । जो भी किताब लेखक के पैसे या सेल्फ फाइनेंसिंग स्कीम के तहत छपें उस किताब पर यह बात छपी होनी चाहिए । इससे पाठकों को लेखक को समझने में सहूलियत होगी । पाठकों को पता होगा कि अमुक कृति लेखक ने खुद छपवाई है और फलां कृति प्रकाशक ने अपनी पूंजी से छपवाई है । फेसबुक पर मीडिया पर पेड न्यूज को लेकर हमलावर दिखनेवाले नैतिकता के साहित्यक ठेकेदार इस प्रवृत्ति पर मुंह खोलने को तैयार नहीं दिखाई देते हैं । ना ही प्रकाशकों से रॉयल्टी का रार करनेवाले लेखक इस तरह की मांग करते दिखाई देते हैं कि लेखक के पैसे से छपी किताबों पर इस बात का उल्लेख होना चाहिए । लेखकों के पैसे से छपी किताबों पर इस तरह की जानकारी का ना होना एक तरह से पाठकों का छल भी है । लेखकों के संगठन भी इस मसले पर खामोश हैं । सहिष्णुता, असिहष्णुता जैसे मुद्दों पर एक मंच पर आनेवाले लेखक संगठन और अन्य साहित्यक संगठन भी इस मुद्दे पर खामोश हैं । आखिर क्यों ? क्या लेखकीय पारदर्शिता और ईमानदारी के मुद्दे पर इन संगठनों की खामोशी इनको कठघरे में खड़ा नहीं करती है ।

अगर इस धंधे में पारदर्शिता आ जाए तो लेखक और भाषा दोनों का भला होगा । प्रकाशन के धंधे में अब तो कई कंपनियां ऐसी भी आ गई हैं जो प्रिंट ऑन डिमांड का काम कर रही हैं । इनके काम करने का तरीका ये होता है कि जितनी प्रतियों का आदेश मिलता है वो इतनी ही प्रतियां छाप कर ग्राहक को भेज देते हैं । पहले वो ऑनलाइन स्टोर में किताब का कवर और उसका परिचय पोस्ट करवाते हैं और जैसे जैसे ग्राहक किताब का आर्डर करते हैं वैसे वैसे छाप कर ग्राहकों को भेजते रहते हैं । आदेश मिलने के चौबीस घंटे के अंदर किताब छपकर ग्राहक को भेज दिया जाता है । यह काम किसी भी किताब के लिए अंतराष्ट्रीय बाजार में ग्राहकों तक पहुंचने का बेहतर रास्ता है । अगर अमेरिका में बैठा कोई पाठक अमुक लेखक की किताब खरीदना चाहता है तो वो ऑनलाइन स्टोर में उसका आदेश देता है और उसी देश का प्रकाशक उस किताब को छापकर ग्राहक को भेज देता है । यह तकनीक की सहूलियत है और इसका फायदा हिंदी के लेखकों को उठाना चाहिए । बजाए बाजार का फायदा उठाने के हिंदी के वैसे लेखक जो फौरी प्रसिद्धि चाहते हैं वो उसके ट्रैप में फंस जा रहे हैं । सेल्फ फाइनेंसिंग बुरी बात नहीं है, बुरा है इसका गुपचुप तरीके से होना। अगर किसी लेखक के पास पैसा है तो वो इसको साहित्य में निवेश करना चाहता है तो इसको सोच समझ कर इस तरह से निवेश किया जाना चाहिए कि लेखक के फायदे के साथ साथ साहित्य का भी भला हो । इस तरह की प्रवृत्ति पर वृहत्तर लेखक समुदाय को मिल बैठकर बात करनी चाहिए वर्ना आनेवाले दिनों में इसका जो सबसे बड़ा नुकसान दिखाई देता है वह है साहित्य की साख पर बट्टा । जिसके भी पास पच्चीस तीस हजार रुपए होंगे वो अपनी किताब छपवाकर बेचने लग जाएगा । किसी भी प्रकार अगर वो दो चार पाठकों को बेचने में भी सफल हो जाता है तो उन दो चार पाठकों का तो मोहभंग होगा और वो अपने को ठगा हुआ महसूस करेगा । लेखक संगठनों को , लेखकों को , अकादमियों को इस बारे में गंभीरता से विचार करना चाहिए और पारदर्शिता के बारे में जरूरी कदम उठाने चाहिए । सोचना तो भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय को भी चाहिए जो पुस्तकों को छपने के पहले आईएसबीएन नंबर प्रदान करती है । नंबर देने के पहले उसको प्रकाशकों से यह जानकारी देना अनिवार्य कर देना चाहिए कि किसी पूंजी से इस पुस्तक का प्रकाशन हो रहा है । अगर ऐसा हो पाता है तो इसके दीर्घकालिक परिणाम होंगे और साहित्य का भला होगा । साख तो कायम रहेगी ही ।