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Saturday, July 29, 2023

कलाओं के संरक्षण और संवर्धन की चुनौती


मणिपुर पर संसद में चल रहे गतिरोध और शोरशराबे के बीच 24 जुलाई को राज्यसभा में संस्कृति मंत्रालय से जुड़ी राष्ट्रीय अकादमियां और अन्य सांस्कृतिक संस्थाओं के कामकाज से संबंधित एक रिपोर्ट पेश की गई। इस रिपोर्ट में अकादमियों के बीच समन्वय पर टिप्पणी की गई है। इसके अलावा इन अकादमियों और संस्कृतिक संस्थाओं की चुनौतियों और अवसरों पर भी बात की गई है। 96 पन्नों की यह महत्वपूर्ण रिपोर्ट है। इस रिपोर्ट में संसदीय समिति ने 2015 के पुरस्कार वापसी अभियान के कारणों पर मंथन किया और अपने सुझाव दिए। एक बार फिर याद दिला दें कि बिहार विधानसभा चुनाव के पहले सुनियोजित तरीके से असहिष्णुता को मुद्दा बनाकर पुरस्कार वापसी का अभियान चलाया गया था। इस स्तंभ में पुरस्कार वापसी अभियान की चर्चा कई बार हो चुकी है, उसके प्रमुख रणनीतिकारों के बारे में विस्तार से लिखा गया है इसलिए उन सबको दोहराना उचित नहीं होगा। 

पुरस्कार वापसी अभियान के करीब आठ वर्ष बाद संसदीय समिति ने उसपर विचार किया है। समिति ने स्पष्ट रूप से कहा है कि अकादमियों को पुरस्कार देने के पहले संभावित लेखकों, कलाकारों से एक वचन पत्र लेना चाहिए कि अगर उनको पुरस्कार दिया जाता है तो वो भविष्य में उसको नहीं लौटाएंगे। बौद्धिक जगत में इसको केंद्र सरकार से जोड़कर आलोचना हो रही है। कहा जा रहा है कि सरकार अब लेखकों को पुरस्कार देने के पहले वचन पत्र लेना चाहती है। आलोचना करनेवाले यह भूल गए कि पुरस्कार वापसी अभियान के समय एक लेखक ने घोषणा करके खूब प्रचार हासिल किया। जब मामला ठंडा पड़ गया तो साहित्य अकादमी को पत्र लिखकर पुरस्कार वापसी पर खेद प्रकट करते हुए पुरस्कार अपने पास रखने का आग्रह किया। अकादमी के संविधान में पुरस्कार वापसी का कोई प्रविधान ही नहीं है इसलिए उसने किसी का लौटाया गया पुरस्कार स्वीकार नहीं किया। पुरस्कार वापसी अभभियान के समय कई लेखकों ने साहित्य अकादमी परिसर में कदम न ऱकने की कसम खाई थी। वो भी राजनीतिक कसम साबित हुआ । अब वो सभी लेखक साहित्य अकादमी के कार्यक्रमों में न केवल नजर आते हैं बल्कि सक्रिय सहयोग भी कर रहे हैं। संसदीय समिति ने ठीक लिखा है कि पुरस्कार वापसी अभियान पूरी तरह से राजनीति से प्रेरित था। अकादमी के प्रतिष्ठित पुरस्कारों को राजनीतिक का औजार बनने से रोकने के लिए समिति ने वचन पत्र का सुझाव दिया है। संसदीय समिति का मानना है कि इस तरह राजनीतिक अभियानों का हिस्सा बनने से पुरस्कारों की प्रतिष्ठा कम होती है। अकादमियों का ये दायित्व है कि वो अपने द्वारा दिए जाने वाले पुरस्कारों के सम्मान को बनाए रखने का प्रयास करे। संसदीय समिति ने ये भी सुझाव दिया है कि अगर वचन पत्र के बावजूद कोई लेखक या कलाकार पुरस्कार वापसी करता या करती है तो उसके नाम पर भविष्य में किसी भी प्रकार के पुरस्कार के लिए विचार नहीं किया जाए। 

संसदीय समिति की रिपोर्ट के इस बिंदु पर जितनी चर्चा हुई उसकी वजह से अन्य महत्वपूर्ण निष्कर्षों या राय पर चर्चा नहीं हो पाई। बौद्धिक जगत अगर इन टिप्पणियों पर चर्चा करता तो देश में साहित्य कला संस्कृति को लेकर एक सकारात्मक वातावरण बनता। संसदीय समिति की रिपोर्ट के दो अन्य बिंदुओं को रेखांकित किया जाना चाहिए। वो है कला और संस्कृति से जुड़े अधिकारियों की संवेदनशीलता और अकादमी और अन्य सांस्कृतिक संस्थाओं में अधिकारियों और कर्मचारियों की कमी। संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि सांस्कृतिक प्रबंधन से जुड़े अधिकतर अधिकारियों और कर्मचारियों को इसका बहुत कम ज्ञान है। समिति ने इसके लिए व्यापक स्तर पर कर्मचारियों को प्रशिक्षण देने की अपेक्षा की है। कहा गया है कि मंत्रालय पहले इन कर्मचारियों के प्रशिक्षण क्षेत्रों का आकलन करे और फिर उसके आधार पर कला प्रबंधन के लिए इनके प्रशिक्षण का प्रबंध करे। संस्कृति मंत्रालय में समय-समय पर रेलवे, आयकर, रेलवे लेखा, डाक सेवा और अन्य सर्विस के अधिकारी महत्वपूर्ण पदों पर रहे हैं, अब भी हैं। इनसे कला और कलाकारों को लेकर उस तरह की संवेदशीलता की अपेक्षा नहीं की जा सकती। सूचना सेवा के अधिकारी को अगर कला के संरक्षण का जिम्मा दिया जाएगा तो उनको परेशानी होगी और संरक्षण का कार्य प्रभावित होगा। रेलवे या लेखा विभाग के अधिकारी को अगर नाट्य प्रशिक्षण का कार्य देखने का दायित्व होगा तो उनसे इसकी अपेक्षा नहीं की जा सकती है कि वो हमारे देश की नाट्य परंपराओं को जानें और उसकी संवेदनशीलता को समझते हुए इस क्षेत्र को समृद्ध करने में अपना योगदान दे सकें। इस संबंध में भी इस स्तंभ में कई बार लिखा जा चुका है कि देश में एक संस्कृति नीति बने और कला संस्कृति के अधिकारियों का एक कैडर बने। संसदीय समिति जब अगली बार अपनी रिपोर्ट तैयार करे तो सांसदों को इस दिशा में मंथन करते हुए सरकार को अपनी सुझावों से अवगत करवाना चाहिए। 

संसदीय समिति ने दूसरी एक महत्वपूर्ण तथ्य को रेखांकित किया है वो है इन अकादमियों और संस्थाओं में अधिकारियों और कर्माचरियों की कमी। संसदीय समिति ने सूक्ष्मता से इसका आकलन किया है और बताया है कि संगीत नाटक अकादमी में 111 स्वीकृत पद हैं जिनमें से 65 रिक्त हैं। ललित कला अकादमी में 170 में से 99 पद रिक्त हैं। साहित्य अकादमी में 175 में से 44 पद रिक्त हैं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में 176 में से 82 पद रिक्त हैं। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के 248 स्वीकृत पदों में से 88 रिक्त हैं। इस तरह से देखा जाए तो सात संस्थाओं के 1078 स्वीकृत पदों में 450 पद रिक्त हैं। यानि औसतन एक तिहाई से अधिक पद रिक्त हैं। अभी हाल ही में राष्ट्रीय संग्रहालय से जुड़ी एक बेहद रोचक जानकारी संज्ञान में आई। वहां के एक अधिकारी अगले महीने सेवानिवृत होने जा रहे हैं। उनके पास कलाकृतियों के संरक्षण का दायित्व है। संस्था में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जिनको वो सेवानिवृत्ति के वक्त चार्ज दे सकें। अगर चार्ज नहीं देंगे तो उनको सेवानिवृत्ति पर मिलनेवाली जमा राशि आदि नहीं मिल पाएगी। उनको कहा जा रहा है कि संस्थान उनको किसी अन्य विधि से सेवा में बनाए रखना चाहती है लेकिन वो सेवानिवृत्ति होना चाहते हैं। देखना होगा कि किस प्रकार से ये मामला परिणति तक पहुंचता है। कला और संस्कृति के इस विषय को संस्कृति मंत्रालय को गंभीरता से देखने की आवश्यकता है। संसदीय समिति ने अपनी पिछली रिपोर्ट में भी और इस रिपोर्ट में भी मंत्रालय को इन पदों को जल्द से भरने का सुझाव दिया है लेकिन पता नहीं किन कारणों से ये संभव नहीं हो पा रहा है। अगले वर्ष लोकसभा के चुनाव हैं और अगर इस वर्ष दिसंबर या अगले वर्ष जनवरी तक भर्तियां नहीं हो पाती हैं तो फिर मसला जून जुलाई तक टल जाएगा। यह कला संस्कृति के लिए अच्छी स्थिति नहीं होगी। 

संस्कृति मंत्रालय का प्राथमिक दायित्व कला और संस्कृति का संरक्षण और सवर्धन है। अगर संस्कृति मंत्रालय अपने इन दायित्वों से हटकर कार्यक्रमों के आयोजन में ही अपनी पूरी ऊर्जा लगा देती है तो फिर संरक्षण और संवर्धन का क्या होगा जिसपर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लगातार बल देते हैं। कार्यक्रमों का तात्कालिक महत्व होता है, वो आयोजित होने चाहिए लेकिन संस्कृति मंत्रालय को बहुत गंभीरता के साथ कला संस्कृति को समृद्ध करनेवाले दीर्घकालीन योजनाएं बनाकर उसके क्रियान्वयन पर कार्य करने की आवश्यकता है। संस्कृति मंत्री किशन रेड्डी के पास पहले से पर्यटन और अन्य मंत्रालय की जिम्मेदारी है। अब तो उनको तेलंगाना का प्रदेश अध्यक्ष भी बना दिया गया है। ऐसे में उनके सामने बड़ी चुनौती है कि वो किस तरह से मंत्रालय के अपने प्राथमिक दायित्व का निर्वहन कर पाते हैं।      


Saturday, July 22, 2023

प्रभावी नीति की आवश्यकता


ओवर द टाप ( ओटीटी) प्लटफार्म्स पर दिखाई जानेवाली सामग्री के विनियमन को लेकर जो त्रिस्तरीय व्यवस्था बनाई गई थी, उसके परिणाम संतोषजनक नहीं दिखाई दे रहे हैं। न  तो अश्लीलता रुक रही है और न ही विवादित प्रसंग। सरकार की तरफ से लगातार ओटीटी प्लेटफार्म्स को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। उनको सरकारी समारोहों में भागीदार बनाया जा रहा था। स्वाधीनता के अमृत महोत्सव से लेकर गोवा में आयोजित होनेवाले अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल तक में उनकी भागीदारी के रास्ते खोले जा रहे थे। इस वर्ष तो फिल्म फेस्टिवल में ओटीटी के लिए पुरस्कार की भी घोषणा की गई है। दूसरी तरफ इन प्लेटफार्म्स पर दिखाई जानेवाली सामग्री को लेकर शिकायतें भी बढ़ती जा रही थीं। ओटीटी प्लेटफार्म्स की सामग्रियों के प्रमाणन को लेकर एक संस्था बनाने पर भी निरंतर चर्चा हो रही है। लोगों को लगता है कि भारत जैसे देश में ओटीटी प्लेटफार्म्स पर किसी तरह का रेगुलेशन नहीं होने से अराजकता को बढ़ावा मिल रहा है। इन चर्चाओं को ध्यान में रखते हुए कुछ दिनों पहले सूचना और प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने ओटीटी प्लेटफार्म्स के प्रतिनिधियों के साथ एक बैठक की जिनमें इन सब बिंदुओं पर विस्तार से चर्चा हुई। इस चर्चा में सरकार ने अपना रुख साफ कर दिया। अनुराग ठाकुर ने नसीहत दी कि ओटीटी प्लेयर्स को कलात्मक स्वतंत्रता के नाम पर अश्लीलता दिखाने से बचना चाहिए। मंत्री ने इन प्लेटफार्म्स को सलाह दी कि वो भारत की सांस्कृतिक परंपराओं और विविधताओं को लेकर सतर्क भी रहें और संवेदनशील भी। बताया जाता है कि इस बैठक में लस्ट स्टोरीज और राना नायडू जैसे सीरीज की सामग्री को लेकर चर्चा हुई। पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में आकर जिस तरह की सामग्री परोसी जा रही है वो भारतीय समाज के लिए कितना उचित है। चर्चा तो इस बात पर भी हुई कि कि ओटीटी प्लेटफार्म्स के रेगुलेशन को लेकर जो त्रिस्तरीय व्यवस्था है उसमें एक स्तर और जोड़ा जाए। ओटीटी पर दिखाई जानेवाली सामग्री की स्क्रिप्ट को शूटिंग के पहले एक कमेटी देखे। ओटीटी प्लेटफार्म्स के प्रतिनिधियों को 15 दिनों का समय दिया गया है ताकि वो इसको लेकर कोई व्यवस्था बनाएं और सरकार को सुझाएं। हलांकि ये व्यवस्था कितनी व्यावहारिक होगी ये देखनेवाली बात होगी।

ओटीटी प्लेटफार्म्स  पर दिखाई जाने वाली सामग्री को लेकर देश में लंबे समय से चर्चा हो रही है। सामग्री के पक्ष और प्रतिपक्ष में कई प्रकार के तर्क सामने आते रहते हैं। कई बार यहां दिखाई जानेवली वेब सीरीज को लेकर हंगामा तक हो चुका है। मामला पुलिस से लकर अदालतों तक में गया है। वेब सीरीज में गालियों की भरमार, यौनिकता और नग्नता का प्रदर्शन, जबरदस्त हिंसा और खून खराबा, अल्पसंख्यकों की स्थिति को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणियां, कई बार सेना और सैनिकों की छवि खराब करने जैसे प्रसंग भी सामने आते रहे हैं। कोरोना काल के पहले जब ओटीटी प्लेटफार्म्स और वेब सीरीज हमारे देश में लोकप्रिय हो रहे थे तब कई निर्माताओं ने सेक्स और गाली गलौच के जरिए लोकप्रिय होने का रास्ता चुना था। कई विदेशी वेब सीरीज में तो नग्नता आम बात थी। ओटीटी को लेकर किसी प्रकार का कोई नियमन नहीं होने के कारण नग्न दृश्यों के प्रदर्शन पर किसी प्रकार का कोई प्रतिबंध नहीं था। अब भी नहीं है। कोरोना काल में ओटीटी बेहद लोकप्रिय हो गया। नेटफ्लिक्स ने दिसंबर 2021 में ग्राहकों को कम मूल्य पर अपनी सेवाएं उपलब्ध करवाना आरंभ किया। नेटफ्लिक्स ने दो तरह की रणनीति अपनाई थी। एक तो ग्राहकों को जो शुल्क देना पड़ता था उसको कम किया और अपने प्लेटफार्म पर भारतीय फिल्में और भारतीय कहानियों पर बनीं वेब सीरीज को प्राथमिकता देना आरंभ कर दिया। इंडस्ट्री को जानकारों का मानना है कि नेटफ्लिक्स को इसका काफी लाभ हुआ। इसी तरह से प्राइम वीडियो, हाटस्टार आदि ने भी भारतीय कहानियों को केंद्र में रखकर कहानियां पेश करनी शुरु कर दी। उनको भी इसका लाभ हुआ। कहना न होगा कि कोरोना के बाद जिस तरह से ओटीटी प्लेटफार्म्स ने स्थानीय कंटेंट को बढ़ावा दिया और ग्राहकों के शुल्क को युक्तिसंगत बनाया उससे इनकी लोकप्रियता काफी बढ़ी।

एक तरफ ओटीटी प्लेटफार्म्स की लोकप्रियता बढ़ रही थी लेकिन साथ ही साथ वहां दिखाई जानेवाली सामग्री को लेकर विवाद भी बढ़ने लगे थे। सरकार की नजर भी इनपर थी। इंडस्ट्री को लोगों को लेकर लंबे समय तक चले विचार विमर्श के बाद फरवरी 2021 में इंटरनेट मीडिया को लेकर केंद्र सरकार ने एक गाइडलाइन जारी की थी। उसके अंतर्गत ही ओटीटी प्लेटफार्म्स को लेकर एक त्रिस्तरीय शिकायत निवारण व्यवस्था बनाई गई थी। तब ओटीटी प्लेटफार्म्स से जुड़े लोगों ने इसका स्वागत किया था। उस व्यवस्था का कोई खास प्रभाव देखने को नहीं मिला। वेब सीरीज और ओटीटी पर दिखाई जानेवाली सामग्री को लेकर विवाद जारी रहे। शिकायतें भी आती रहीं उसका निबटारा भी होता रहा लेकिन विवाद फिर भी जारी रहे। बाद के दिनों में एक खास प्रकार की प्रवृत्ति दिखाई देने लगी कि इन ओटीटी प्लेटफार्म्स पर दिखाई जानेवाली सामग्री में कभी प्रत्यक्ष तो बहुधा परोक्ष रूप से राजनीतिक विचारों को उठाने और गिराने का खेल चलने लगा। संवाद से लेकर दृश्यों तक में। अभिव्यक्ति की रचनात्मक स्वतंत्रता और यथार्थ  की आड़ में नग्नता और गाली गलौच दिखाने का चलन कम नहीं हुआ। इस वर्ष अप्रैल में संसदीय समिति ने ओटीटी प्लेटफार्म पर दिखाई जानेवाली अश्लीलता पर चिंता प्रकट की थी। समिति के अधिकांश सदस्यों का मानना था कि जिस प्रकार की अश्लीलता इन सीरीज में दिखाई जाती है वो भारतीय संस्कृति के विरुद्ध है। इसका दुष्प्रभाव समाज पर पड़ता है। सरकार और समाज के स्तर पर भी इसको लेकर निरंतर मंथन हो रहा है।ओटीटी प्लेटफार्म्स भी अपने ग्राहकों की संख्या को बढ़ाने, उसको कायम रखने के लिए लगातार कंटेंट में प्रयोग करते रहे। अब भी कर भी रहे हैं। यह एक अलग विषय है जिसपर फिर कभी चर्चा होगी।

प्रश्न ये उठता है कि जब इस देश में फिल्मों को लेकर एक प्रकार के प्रमाणन की व्यवस्था है तो फिर् ओटीटी को लेकर क्यों नहीं इस तरह की व्यवस्था बन सकती है। ओटीटी का आकार इतना व्यापक होता जा रहा है कि अगर इसके लिए किसी प्रमाणन की व्यवस्था तय होती है तो उसके लिए काफी संसाधन की आवश्यकता होगी। अगर प्रोडक्शन के पहले स्क्रिप्ट देखने की व्यवस्था बनाई जाती है तो इसके लिए भी क्षेत्रीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर समितियों का गठन करना होगा। अगर इसके अलावा किसी तरह की कोई व्यवस्था बनाई जाती है तो उसके भी व्यावहारिक पक्ष को देखने की आवश्यकता होगी। इस स्तंभ में पहले भी कई बार ओटीटी की सामग्रियों के प्रमाणन या फिर किसी अलग प्रकार के मैकेनिज्म की चर्चा हो चुकी है। आज जिस प्रकार से इन प्लेटफार्मस पर वेब सीरीज के माध्यम से राजनीति की जा रही है या जिस प्रकार से हिंदुत्व और उसके प्रतीक चिन्हों पर टिप्पणियां की जाती हैं उसको ध्यान में रखना चाहिए। धर्म विशेष या समुदाय विशेष को बदनाम करने वाले कंटेंट का इंटेंट देखा जाना चाहिए। आलोचना हो लेकिन आलोचना के पीछे राजनीतिक उद्देश्य न हो। आलोचना के पीछे किसी राजनीतिक लक्ष्य को हासिल करने की मंशा न हो। क्योंकि जब मनोरंजन राजनीति का औजार बनता है तो कई बार समाज का बड़ा वर्ग उसको समझ नहीं पाता है और वो परोक्ष रूप से लोकतंत्र को कमजोर करता है। ओटीटी आज एकक ऐसे सेक्टर के तौर पर उभरा है जहां अनेक प्रकार की संभावनाएं हैं। उन संभावनाओं को बाधित किए बगैर ओटीटी प्लेटफार्म्स को लेकर एक प्रभावी नियमन होना चाहिए। विमर्श काफी लंबे समय से चल रहा है अब वक्त है कि सरकार एक नीति बनाकर उसको लागू कर दे।  

Thursday, July 13, 2023

तथ्यहीन आधार पर नैरेटिव


पिछले दिनों कल्याण पत्रिका चर्चा में रही। गीता प्रेस को गांधी शांति पुरस्कार की घोषणा हुई थी। कुछ दिनों बाद प्रधानमंत्री अपने गोरखपुर दौरे के समय गीता प्रेस गए। पुरस्कार की घोषणा और प्रधानमंत्री के गीता प्रेस जाने के समय इस बात का बार-बार उल्लेख किया गया कि कल्याण पत्रिका के अंकों में महात्मा गांधी की हत्या पर कुछ भी नहीं प्रकाशित किया गया। ऐसा कहनेवालों ने कल्याण पत्रिका और इसके संपादक को गांधी विरोधी करार दिया। इस तरह की टिप्पणियां की गईं जिसके भ्रम का वातावरण बने कि कल्याण के संपादक हनुमानप्रसाद पोद्दार और बापू के हत्यारे के बीच संबंध थे। उनके ऐसा कहने के पीछे अंग्रेजी में प्रकाशित एक पुस्तक गीता प्रेस एंड द मेकिंग आफ हिंदू इंडिया में उल्लिखित प्रसंग का सहारा लिया गया। इस पुस्तक के लेखक अक्षय मुकुल हैं। उन्होंने अपने पुस्तक के पेज 58 पर लिखा है कि गीता प्रेस ने गांधी की हत्या पर खामोशी ओढ़ ली थी। कल्याण के लिए जिस व्यक्ति का आशीर्वाद और लेखन बेहद महत्वपूर्ण था उसी पत्रिका में अप्रैल 1948 के अंक तक एक बार भी उनका (गांधी) उल्लेख नहीं हुआ। इस अंक में पोद्दार ने गांधी से अपनी विभिन्न मुलाकातों के बारे में लिखा। बाद के अंकों में भी गांधी का लेखन कल्याण में प्रकाशित हुआ। लेकिन अक्षय मुकुल ये प्रश्न उठाते हैं कि फरवरी और मार्च 1948 के अंक में गांधी के बारे में कुछ भी प्रकाशित क्यों नहीं हुआ। अक्षय ने हाल के अपने लेख में भी इस ओर फिर से संकेत किया है। मुकुल इस बात का भी दावा करते हैं कि कल्याण के संपादक हनुमानप्रसाद पोद्दार, महात्मा गांधी के कटु आलोचक थे। इस संबंध में वो कुछ प्रसंगों और पत्रों का हवाला देते हैं जहां पोद्दार गांधी के विचारों की आलोचना करते है। अक्षय मुकुल ने जो व्याख्या की हैं उसमें कई दोष रह गए हैं। 

गांधी की हत्या 30 जनवरी 1948 को हुई थी। कल्याण पत्रिका का जनवरी अंक बहुत सारे ग्राहकों को भेजा जा चुका था। कुछ अंक ग्राहकों को नहीं भेजे जा सके थे। गांधी की हत्या का समाचार आते ही बचे हुए अंकों का डिस्पैच रोककर उसमें तीन पन्ने अलग से लगाए गए। एक पूरे पन्ने पर बापू की तस्वीर लगाई गई जिसके ऊपर लिखा गया ‘महाभागवत बापू’ और तस्वीर के नीचे लिखा गया ‘सकल लोक मां सहु ने बंदे’। एक पेज पर राघवदास जी की एक टिप्पणी प्रकाशित है जिसका शीर्षक है ‘महाभागवत पूज्य बापू जी’। उसमें राघवदास जी ने लिखा है कि पूज्य बापू जी कहा करते थे मेरा ह्रदय चीरकर देखो तो उसमें राम-राम लिखा मिलेगा। बहुतों को ये बात समझने में बहुत दिक्कत होती हो, पर जब हम उनको तारीख 30.1.48 को साढे पांच बजे बजे गोली का शिकार होते देखते हैं तो उनके मुंह से हे राम, हे राम यह दो शब्द ही निकलते हैं। मैंने गोली का अभ्यास करनेवालों से बातें की तो उन्होंने मुझे बताया कि गोली लगने पर मुख की आकृति बिगड़ जानी चाहिए, परेशानी चेहरे पर आनी चाहिए पर वैसा नहीं हुआ... कितना सुंदर स्वरूप है इस महाभागवत का। ग्रंथों में संतों के वर्णन पढ़े थे. पर प्रत्यक्ष रूप से देखने का अवसर इसी महापुरुष के जीवन में हमें मिला। बोलिए महाभागवत की जय। राघवदास जी की कल्याण में प्रकाशित इस टिप्पणी में गहरी श्रद्धा परिलक्षित होती है।    

अब नजर डाल लेते हैं कल्याण के 1948 के जनवरी अंक में तत्कालीन संपादक हनुमानप्रसाद पोद्दार की टिप्पणी पर। वो लिखते हैं, पूज्य महात्मा जी संत थे, महापुरुष थे मानवमात्र का हित चाहनेवाले थे और विश्व की एक महान विभूति थे। वे धर्म और जाति के भेद से ऊपर उठे हुए थे और सत्य और अहिंसा के सच्चे पुजारी थे। वे मानवता के खरे प्रतीक थे। ईश्वर की प्रार्थना के समय जाते हुए उनकी निर्मम हत्या करके हत्यारे ने अपना तो लौकिक और पारलौकिक महान अहित किया ही, हिंदू जाति पर भी-जो धर्मत: और स्वभावत: अहिंसाप्रिय है- कलंक का अमिट टीका लगा दिया। अगर हनुमानप्रसाद पोद्दार गांधी को नापसंद करते, तो कलंक का अमिट टीका जैसी कठोर टिप्पणी हिंदू जाति पर नहीं करते।  अपनी इस टिप्पणी में हनुमानप्रसाद पोद्दार लिखते हैं कि बापू के साथ उनका पारिवारिक संबंध था। बापू उनको पुत्र के समान मानते और स्नेह करते थे। उनके स्नेह की एक एक बात याद करके दिल भर आता है। इस तरह की टिप्पणियों को पढ़ने के बाद क्या संदेह रह जाता है कि हनुमानप्रसाद पोद्दार गांधी को पसंद नहीं करते थे। वैचारिक मतभेद हो सकते हैं लेकिन उसको व्यक्तिगत द्वेष की तरह देखना और व्याख्यायित करने में अंतर है। अक्षय मुकुल इस अंतर को समझ नहीं पाए या समझ कर अनदेखी की। एक और बात मुकुल ने जोर देकर पूछी है कि कल्याण पत्रिका के 1948 के फरवरी और मार्च अंक में गांधी का उल्लेख क्यों नहीं है। यहां भी मुकुल की लापरवाही या तथ्यों की अनदेखी दिखाई देती है। प्राथमिक स्त्रोत तक नहीं पहुंचने की लापरवाही या किसी खास कारण से अनदेखी। 1948 के फरवरी अंक में हिंदू विधवा के नाम से बापू की टिप्पणी है, कवर पर भी उल्लेख है। तो क्या ये माना जाए कि लेखक इतना लापरवाह था कि वो बगैर देखे बड़े-बड़े दावे कर रहा था या वो जानबूझकर कुछ तथ्यों को छिपाकर एक नैरेटिव बनाने की कोशिश कर रहा था। अनुत्तरित तो ये प्रश्न है। 1926 से लेकर 1948 तक बापू की कई टिप्पणियां कल्याण के विभिन्न अंकों में प्रकाशित हुईं। 

एक और दोषपूर्ण टिप्पणी अक्षय ने अपनी पुस्तक में की है कि गीता प्रेस के निजी अभिलेखागार में गांधी की हत्या से संबंधित कोई रेफरेंस उपलब्ध नहीं है। पिछले सप्ताह मैं गोरखपुर में था।  गीता प्रेस जाकर कल्याण के उस अंक को स्वयं देखा जिसमें बापू की हत्या पर तीन पृष्ठ हैं। यह अंक उनके अभिलेखागार में उपलब्ध है। कोई भी अनुमति लेकर देख सकता है। मुझे लगता है कि मुकुल ने कल्याण पत्रिका की फाइल देखी ही नहीं। उसने उन विशेषांकों को देखा जो बाद में पुस्तकाकार प्रकाशित हुए। प्रतिवर्ष कल्याण का जनवरी अंक विशेषांक होता है जो बाद में पुस्तकाकार प्रकाशित होता है। जनवरी 1948 का अंक भी विशेषांक था, नारी अंक, जो कालांतर में पुस्तकाकार प्रकाशित हुआ। अब जो नारी अंक बाजार में उपलब्ध है उसमें गांधी की हत्या के प्रसंग पर राघवदास जी, पोद्दार जी की टिप्पणियां नहीं हैं। गांधी का चित्र भी नहीं है। ये तो पुस्तक प्रकाशन जगत की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है। जब किसी पत्रिका के विशेषांक को पुस्तकाकार प्रकाशित किया जाता है तो उसमें तात्कालिक या घटनात्मक टिप्पणियां नहीं रखी जाती हैं। बिना फाइल देखे सिर्फ बाद में प्रकाशित पुस्तक के आकार पर टिप्पणी करना ये दर्शाता है कि लेखक कितनी लापरवाही से तथ्यों को इकट्ठा कर रहा था। प्राथमिक स्त्रोत तक नहीं पहुंच रहा था। लेकिन बड़े बड़े प्रश्न खड़े कर रहा था। 

कल्याण, गांधी और हनुमानप्रसाद पोद्दार के संबंधों को समझने के लिए जो दृष्टि चाहिए वो अक्षय मुकुल के पास नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि अक्षय मुकुल ने एक विशेष नैरेटिव को बल देने के लिए ये पुस्तक लिखी। पुरस्कृत हुए। अब उसी पुस्तक में वर्णित गलत तथ्यों और प्रसंगों को उद्धृत नैरेटिव बनाए जा रहे हैं। इंटरनेट मीडिया के दौर में लोगों के पास किसी भी प्रसंग या घटना को समग्रता में देखने या उसकी पड़ताल करने का धैर्य नहीं है। अगर मैं भी गोरखपुर के गीताप्रेस जाकर इन प्रसंगों को नहीं देखता समझता तो संभव है कि मान लेता कि कल्याण में बापू की हत्या के बाद कुछ नहीं प्रकाशित हुआ। 


Tuesday, July 11, 2023

कोलाहल में दबती फिल्म निर्माण कला


बीते शुक्रवार को फिल्म 72 हूरें रिलीज हुईं। इस फिल्म का भी कुछ लोगों ने एजेंडा और प्रोपगैंडा फिल्म बताकर विरोध किया।न कई लोग इसको एक समुदाय विशेष को बदनाम करनेवाली फिल्म बताने में जुटे रहे। इसके पहले जब फिल्म द केरल स्टोरी रिलीज हुई थी तो भी इसी तरह का वातावरण बना था। द केरल स्टोरी के पहले द कश्मीर फाइल्स के प्रदर्शन के बाद इसके निर्देशक विवेक अग्नहोत्री को काफी विरोध झेलना पड़ा था। उनको जान से मरने की धमकियां भी मिली थीं। इन सबके बीच शाह रुख खान की फिल्म पठान आई थी। उसके एक गाने में अभिनेत्री के वस्त्र को लेकर विवाद हुआ था। इन विवादों में एक बात समान रूप से देखने को मिलती है। अधिकतर लोग फिल्म को बिना देखे उसका विरोध करते हैं। यह मैं अपने व्यक्तिगत अनुभव से कह रहा हूं। पिछले दिनों द केरल स्टोरी को लेकर भी मेरा यही अनुभव रहा था और अब 72 हूरों को लेकर भी ऐसा ही हो रहा है। जो लोग 72 हूरों को एजेंडा और प्रोपगैंडा फिल्म बता रहे हैं उनमें से अधिकतर ने ये फिल्म नहीं देखी है। मजे की बात ये कि फिल्म को एजेंडा और प्रोपगैंडा बतानेवाले अधिकतर लोग इस बात को सार्वजनिक रूप से स्वीकार भी कर रहे हैं कि उन्होंने फिल्म नहीं देखी है। ये कैसा विरोध? किसी भी रचनात्मक कृति की आलोचना उसको बिना देखे या पढ़े कैसे की जा सकती है, ये समझ से परे है।

फिल्मों को लेकर इस तरह के वाद-विवाद की वजह से फिल्म कला का नुकसान हो रहा है। शोर मचाकर फिल्म हिट करवा लेने की बढ़ती प्रवृत्ति की वजह से देश में फिल्म संस्कृति के विकास की दिशा भटक रही है। इसपर हमें गंभीरता से विचार करना चाहिए। विवादों के इस कोलाहल में फिल्म कला या फिल्म के क्राफ्ट उसकी कहानी और ट्रीटमेंट पर बात नहीं होती है। फिल्म पर गंभीरता से लेखन नहीं हो रहा है। फिल्मों पर लिखनेवाले अधिकतर लोग भी चाहे-अनचाहे इन विवादों का हिस्सा बन जाते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि फिल्म के क्राफ्ट पर बात हो, छायांकन और दृश्यांकन कला पर चर्चा हो। संवादों में जो फूहड़पन है और गीतों में जिस तरह से शब्दों का उपयोग हो रहा है उसपर बात होनी चाहिए। निर्देशकों की कला और संगीतकारों के प्रयोगों पर मंथन होना चाहिए। ये नहीं हो रहा है। हमेशा से इस तरह की बातें कम होती थीं लेकिन होती थीं। अब तो लगभग नहीं के बराबर हो रही हैं। कोरोना महामारी के दौरान फिल्म फेस्टिवल्स का आयोजन भी बाधित हुआ था। इस कारण वहां होनेवाले विमर्श भी नहीं हो पाए। फिल्मों पर गंभीर बात करने-कराने और उसके क्राफ्ट पर चर्चा करवाने में फिल्म फेस्टिवल्स की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। जागरण फिल्म फेस्टिवल जैसे उत्सव देश के अठारह शहरों में आयोजित किए जाते हैं। जिनमें देश-विदेश की बेहतरीन फिल्में दिखाई जाती हैं। फिल्मों से जुड़े लोगों से संवाद होता है। निर्देशकों से उनके सोच के बारे में दर्शकों को जानने समझने का अवसर मिलता है। इस तरह के आयोजन देश में फिल्म संस्कृति के विकास में महत्वपूर्ण होते हैं। फिल्म फेस्टिवल्स की उपयोगिता असंदिग्ध है, इस पर फिर कभी बात होगी। 

फिल्मों पर जारी शोरगुल के बीच जब क्राफ्ट की बात होती है तो बिमल राय, व्ही शांतारम, सत्यजित राय, गुरुदत्त जैसे फिल्मकार याद आते हैं। आज गुरुदत्त की जयंती है। तीन दिन बाद 12 जुलाई को बिमल राय की जयंती है। बिमल राय की फिल्मों ने जिस तरह से भारतीय सिनेमा को ऊंचाई प्रदान की उसमें कई बार वो सत्यजित राय से बड़े फिल्मकार दिखाई देते हैं। उनकी फिल्म दो बीघा जमीन, सुजाता और बंदिनी को देखकर लगता है कि हमारे देश में कितनी उन्नत फिल्में बना करती थीं। फिल्मों की कहानियों में उसके पात्रों के माध्यम से बिमल राय जिस प्रकर से मानव मन की उलझनों को या यों कहें कि मनोविज्ञान के उलझे रेशे को दिखाते हैं वो अप्रतिम है। बिमल राय ये मानते थे कि मानव मन के अंदर चलनेवाले द्वंद्व का चित्रण दर्शकों को बांधता है। बिमल राय फिल्मों में यौनिकता के अत्यधिक प्रदर्शन के विरुद्ध थे। वो कहा करते थे कि फिल्मों में सेक्स सीन की बहुलता वही दिखाते हैं जिनको प्यार और प्रेम की समझ नहीं होती है। फिल्म दो बीघा जमीन में बिमल राय ने जिस प्रकार से स्वाधीनता के बाद औद्योगिक विकास और किसानों की समस्या को दिखाया है वो दर्शकों को झकझोरता है। इस फिल्म को देखकर किसी विदेशी आलोचक ने फिल्मकार की उस दृष्टि की प्रशंसा की थी जिसमें वो अपने देश के आर्थिक विकास की क्रूरता को रेखांकित करता है। बिमल राय की फिल्म देवदास, मधुमति और यहूदी की खूब चर्चा होती है क्योंकि ये फिल्में व्यावसायिक रूप से भी काफी सफल रही थीं। इन फिल्मों से दिलीप कुमार का अभिनय निखरा था। बिमल राय की फिल्म देवदास की तुलना प्रथमेश बरुआ की 1935 में बनी फिल्म देवदास से की जाती रही है। अधिकतार फिल्म इतिहासकारों का मानना है कि बिमल राय की फिल्म बरुआ की फिल्म से बेहतर बनी थी। बिमल राय की एक फिल्म की चर्चा कम होती है। ये फिल्म भारतीय फिल्मों के इतिहास में उल्लेखनीय मानी जा सकती हैं। ये फिल्म है परख। यह फिल्म तीसरे आम चुनाव के पहले की है। इस फिल्म में बिमल राय ने चुनावी राजनीति को विषय बनाया था और उसपर व्यंग्यात्मक लहजे में प्रहार किया था। फिल्मकार ने इस फिल्म में गांव में चलनेवाली राजनीतिक दांव-पेंच को बेहद सूक्ष्मता से पकड़ा और उसको अपने फिल्म के माध्यम से दर्शकों के सामने पेश कर दिया था। चुनाव किस तरह से एक शांत गांव को अशांत बनाता है, यह देखना हो तो फिल्म परख देखी जानी चाहिए।

पिछले कुछ वर्षों से ये कहा जाने लगा कि फिल्में सिर्फ मनोरंजन के लिए होती हैं। बिमल राय इससे अलग सोचते थे। वो मानते थे कि फिल्में दर्शकों का मनोरंजन तो करे ही विषय विशेष को लेकर बौद्धिक रूप से समृद्ध भी करे। बिमल राय की फिल्मों में ये दिखता भी है। इंटरनेट मीडिया के इस युग में फिल्मों पर लिखनेवाले बढ़े हैं, फेसबुक से लेकर ट्विटर पर आपको फिल्मों के कई प्रकार के विशेषज्ञ मिल जाएंगे लेकिन फिल्मों के क्राफ्ट पर गंभीरता से विमर्श का आभाव दिखता है। आज अधिकतर फिल्मकारों की रुचि बाक्स आफिस के आंकड़ों में रह गई है। इस आंकड़ों में रुचि रखना गलत नहीं है लेकिन बाक्स आफिस के अलावा फिल्मों के कंटेंट और उसके ट्रीटमेंट पर भी ध्यान रखना चाहिए। फिल्म निर्माण का उद्देश्य लाभ कमाना होना चाहिए। लेकिन लाभ के लिए कला को समाप्त करने की प्रवृत्ति रोकने के भी प्रयास किए जाने चाहिए। कलात्मकता के नाम पर फूहड़ता या यौनिकता के अत्यधिक प्रदर्शन से तात्कालिक लाभ तो हो सकता है लेकिन उससे कला का नुकसान होता है। याद पड़ता है कि जब बिमल राय की फिल्में देवदास, मधुमति और यहूदी जबरदस्त कामयाब हुईं तो इस बात की चर्चा आरंभ हो गई थी कि बिमल राय भी व्यावसायिकता की होड़ में शामिल हो गए हैं। इन तीन फिल्मों के बाद बिमल राय ने बंदिनी और सुजाता बनाकर इस धारणा का निषेध किया था। कहने का अर्थ ये है कि अगर आपके पास फिल्म निर्माण की कला होगी तो बाक्स आफिस भी आपके साथ होगा और बेहतर फिल्में भी बनेंगी। आज जिन फिल्मकारों के पास फिल्म की समझ दिखाई देती है उनको प्रोड्यूसर मिलने में कठिनाई होती है। आज बहुत कम ऐसे प्रोड्यूसर बचे हैं जो फिल्मों की बारीकियों को समझते हैं। ऐसे में दर्शकों का दायित्व बढ़ जाता है कि वो बेहतर फिल्मों के लिए दबाव बनाएं। 


Saturday, July 1, 2023

प्रतिभा विकास में भाषा बाधक न बने


दिल्ली विश्वविद्यालय के शताब्दी समारोह में भाग लेने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मेट्रो रेल से विश्वविद्यालय गए। मेट्रो की यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री ने साथ यात्रा कर रहे छात्रों से बातचीत की। छात्रों से चर्चा के समय प्रधानमंत्री मोदी ने बहुत ही अच्छी बात कही जिसपर देशव्यापी सोच बनना चाहिए। प्रधानमंत्री ने एक छात्र से जानना चाहा कि वो मूल रूप से कहां के रहनेवाले हैं। छात्र ने बताया कि वो रांची, झारखंड का है। प्रधानमंत्री ने सहजता से पूछा कि बाहर के किसी को दोस्त बनाया। रांची के उस छात्र ने उत्साह से बताया कि यूपी के लड़कों से दोस्ती की। वो जिस कालेज में पढ़ते हैं उसका प्रबंधन बालाजी मंदिर भी चलाते हैं तो वहां तेलुगु भाषी भी हैं। उसने तेलुगु बोलनेवालो से भी दोस्ती की है। वो उत्साह से बोले जा रहा था लेकिन प्रधानमंत्री कुछ और जानना चाह रहे थे। वो जानना चाह रहे थे कि दक्षिण भारत के राज्यों के छात्रों से दोस्ती की और उनसे उनकी भाषा के पांच-दस वाक्य सीखे या नहीं। प्रधानमंत्री के इतना बोलते ही एक छात्रा फटाक से बोल पड़ी कि उसने ऐसा किया है। एक वाकया भी बताया। वो अपने कालेज परिसर में थी तो उसने देखा कि एक लड़की फोन पर बात कर रही थी। बातचीत की भाषा वो नहीं समझ पा रही थी। बात खत्म होने के बाद उसने जानना चाहा कि किस भाषा में बात हो रही थी। पता चला कि बातचीत मलयालम में हो रही थी। इसके बाद उसने उस लड़की से अनुरोध किया कि उसे भी मलयालम के कुछ वाक्य बता दे। जैसे कि अगर को किसी को हैलो करना हो या हालचाल पूछना हो तो मलयालम में कैसे और क्या बोलेंगे। जब उस लड़की ने मलयालम में बताना आरंभ किया तो हिंदी भाषी लड़की ने फोन पर रिकार्ड कर लिया, ताकि बाद में उसको सुनकर सीख सके। इसी तरह से एक छात्रा ने बताया कि उसने मणिपुरी छात्राओं से मित्रता करके उनको हिंदी सिखाई तो असम की छात्रा ने बताया कि दिल्ली विवविद्यालय में अपने अध्ययन के दौरान उसने अपने कई साथियों का असमिया सिखाई। 

देखने में ये पूरा प्रसंग बहुत सामान्य लग रहा है लेकिन अगर सूक्ष्मता और गंभीरता से विचार करें तो एक देश के प्रधानमंत्री अपने देश के छात्रों को देश के अलग अलग हिस्सों में बोली जानेवाली भाषाओं को सीखने के लिए प्रेरित कर रहे थे। सहजता के साथ। इस देश ने भाषा के नाम पर अतीत में बहुत हिंसा झेली है। राज्यों का बंटवारा देखा है। खून खराबा देखा है। भारतीय भाषाओं को राजनीति का औजार बनते देखा है। अभी भी कभी कभार इस तरह के प्रसंग देखने को मिल जाते हैं। तमिलनाडु जैसे भाषाई रूप से समृद्ध प्रदेश के नेता अकारण हिंदी विरोध का झंडा उठाते रहते हैं। अब स्थितियां कुछ बदलती दिखने लगी हैं। सत्ता के शीर्ष स्तर पर बैठे नेताओं ने भारतीय भाषाओं को आगे बढ़ाने और उसके बल देने का उपक्रम आरंभ किया है। भाषा की राजनीति अपेक्षाकृत कम होने लगी है। प्रधानमंत्री मोदी से बातचीत के क्रम में एक छात्र ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भारतीय भाषाओं के महत्व की चर्चा की। इसपर प्रधानमंत्री मोदी का उत्तर बेहद सधा हुआ था। सधा हुआ इस वजह से कि उन्होंने अंग्रेजी की आलोचना नहीं की। बिना अंग्रेजी की आलोचना के उन्होंने भारतीय भाषाओं की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि हमारे देश के गांवों में बहुत प्रतिभा है लेकिन अधिकतर को अंग्रेजी का सौभाग्य नहीं मिला तो वे प्रतिभाएं बाधित हो गईं, रुक गईं। बातचीत के क्रम में ही प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि प्रतिभा के विकास में भाषा बाधक नहीं होनी चाहिए। इस बातचीत से जो संदेश निकल रहा था वो ये भी था कि भारतीय भाषाओं के बीच किसी प्रकार का वैमनस्य नहीं होना चाहिए। हर भारतीय को मातृभाषा के अलावा एक और भाषा सीखनी चाहिए। 

पिछले दिनों भारतीय भाषाओं के बीच बेहतर समन्वय और अतीत की कटुता को दूर करने के लिए वाराणसी और गुजरात में तमिल संगम जैसे कार्यक्रम हुए। उसके पहले पिछले वर्ष शिमला में साहित्य अकादमी ने उन्मेष नाम से चार दिनों का एक कार्यक्रम किया था। शिमला में आयोजित उस कार्यक्रम में भारतीय भाषाओं के चार सौ के करीब लेखकों की भागीदारी रही थी। विभिन्न विषयों पर मंथन किया गया था। आगामी अगस्त के पहले सप्ताह में फिर से साहित्य अकादमी भोपाल में उन्मेष का आयोजन कर रही है। इसमें भी भारतीय भाषाओं के विद्वानों की भागीदारी होगी। तमिल से लेकर कश्मीरी तक, गुजराती-मराठी से लेकर बांगला और पूर्वोत्तर की भाषाओं के लेखकों के बीच विचारों का आदान-प्रदान होगा। अगर देखा जाए तो केंद्र सरकार के स्तर पर भारतीय भाषाओं के बीच संवाद बढ़ाने का प्रयास निरंतर चल रहा है। 

स्वाधीनता के पहले हिंदी और तमिल के बीच इतना अधिक साहचर्य था कि 1910 में तत्कालीन मद्रास से काशी आकर बी कृष्णस्वामी अय्यर ने घोषणा की थी कि हिंदी ही भारत की राष्ट्रभाषा हो सकती है। तमिल और हिंदी भाषा के बीच कृतियों के अनुवाद की बेहद समृद्ध परंपरा थी। जयशंकर प्रसाद की कालजयी कृति कामायनी और आंसू दोनों काव्यों के अनुवाद तमिल में प्रकाशित हुए थे। प्रेमचंद के उपन्यास सेवासदन का भी तमिल में अनुवाद हुआ था और उसपर तो तमिल में एक फिल्म भी बनी थी। सुब्रह्मण्य भारती की रचनाओं को अनुवाद हिंदी में हो रहा था। आपको ये जानकर आश्चर्य हो सकता है कि तमिल के महावि कंब के रामायण का हिंदी में अनुवाद बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, पटना से प्रकाशित हुआ था। अन्य भारतीय भाषाओं के बीच भी अनुवाद के क्रम चलते रहते थे। स्वाधीनता के कुछ वर्षों बाद जब भाषा के आधार पर राजनीति आरंभ हुई तो ये प्रक्रिया बाधित हुई। राजनीति ने भाषा को औजार बनाकर भारत को बांटने का काम किया। स्वाधीनता के पहले दक्षिण, पश्चिम और पूर्वी भारत से हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की बात उठती रहती थी। उन प्रदेशों के लोगों के मस्तिष्क में हिंदी को लेकर आशंका के बीज बो दिए गए। संविधान सभा में देश की भाषा समस्या पर तीन दिनों तक चर्चा हुई थी। वहां पुरषोत्तमदास टंडन जी के विचारों को आज याद करने की आवश्यकता है। टंडन जी को इस कारण क्योंकि वो हिंदी के प्रचंड समर्थक थे। जब हिंदी में अंतरराष्ट्रीय अंकों की स्वीकार या अस्वीकार करने पर बात हो रही तो किसी ने कहा कि जनमत लेने से तो हिंदी आएगी नहीं। इसपर टंडन जी का उत्तर था कि ‘यदि विभिन्न प्रांत हिंदी को स्वीकार नहीं करते हैं तो मैं किसी भी स्थिति में उनपर हिंदी लादने को तौयार नहीं हूं। प्रांत हिंदी को ग्रहण करेंगे या नहीं यह निश्चय तो उन्हीं को करना है। जो लोग आज जिम्मेदारी की जगहों पर बैठे हैं उनसे मैं अपील करूंगा कि वे अपनी अन्तरात्मा की बारीक आवाज को सुनने की कोशिश करें और ऐसी कोई भी बात स्वीकार नहीं करें जो उनके प्रांतों को अमान्य होगी।‘ 

भाषा को लेकर जिस प्रकार को जोश और उत्साह स्वाधीनता के पहले दिखता है वो स्वाधीनता के बाद शिथिल हो गया। जब भाषा में राजनीति का प्रवेश हुआ तो उसने भारतीय भाषाओं को लड़ाकर अंग्रेजी की स्थिति मजबूत कर दी। जब देश की अर्थव्यवस्था को खोला गया या उदारीकरण का दौर चला तब भी भारतीय भाषाओं को मजबूत करने के लिए कोई विशेष प्रयास नहीं किया गया। अंग्रेजी की स्थिति शासकों की भाषा वाली बनी रही। प्रधानमंत्री मोदी के आने के बाद भारतीय भाषाओं को लेकर एक सुचिंतित मुहिम शुरु हुई है। ये मुहिम निरंतर आगे बढ़ रही है जो भारतीय भाषाओं के लिए सुखद है।