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Saturday, August 3, 2024

सरकार और संगठन का द्वंद्व पुराना


इन दिनों उत्तर प्रदेश की राजनीति में संगठन बड़ा या सरकार को लेकर खूब चर्चा हो रही है। उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशव मौर्य के बयान कि सरकार से संगठन बड़ा होता है, के बाद ये चर्चा तेज हो गई थी। उनके बयान के इस वाक्य की अलग अलग तरीके से व्याख्या की गई। इसको सरकार और संगठन के बीच मनमुटाव के तौर पर भी रेखांकित किया गया। राजनीतिक विश्लेषकों ने लोकसभा चुनाव परिणाम में भारतीय जनता पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिलने से जोड़कर इसकी व्याख्या प्रस्तुत की। सरकार और संगठन के बीच चल रही इस चर्चा के बीच उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो सत्यकाम ने पुरुषोत्तम दास टंडन की जयंती पर एक व्याख्यान के लिए आमंत्रित किया। उस व्याख्यान की तैयारी के सिलसिले में जानकारी जुटाने के क्रम में एक टंडन और नेहरू ने जुड़ा एक बेहद रोचक प्रसंग मिला। वो प्रसंग भी सरकार और संगठन से जुड़ता है। स्वाधीनता के बाद 1950 में कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव होना था। पुरुषोत्तम दास टंडन कांग्रेस के अध्यक्ष पद के उम्मीदवार होना चाहते थे। जबकि उस वक्त के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू नहीं चाहते थे कि पुरुषोत्तम दास टंडन कांग्रेस के अद्यक्ष बनें। टंडन अपनी उम्मीदावरी को लेकर अडिग थे। वो नेहरू की मुसलमानों की तुष्टीकरण की नीति को लेकर न केवल असहमत थे बल्कि उसका खुलकर विरोध भी करते थे। नेहरू ने कई नेताओं के जरिए टंडन को संदेश भिजवाया कि वो अध्यक्ष पद से अपनी उम्मीदवारी वापस ले लें। टंडन को सरदार पटेल से लेकर अन्य प्रदेशों के संगठन का समर्थन था। वो किसी भी कीमत पर अपनी उम्मीदावरी वापस लेने को तैयार नहीं थे। नेहरू को निरंतर ये संदेश मिल रहा था कि टंडन अपनी उम्मीदावरी वापस नहीं लेंगे। 

इस बीच तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने इस मसले को सार्वजनिक करने का निर्णय लिया। उन्होंने 8 अगस्त 1950 को एक पत्र टंडन को लिखा। इस पत्र के टंडन तक पहुंचते ही सरकार और संगठन के बीच का झगड़ा सार्वजनिक हो गया। नेहरू ने जो पत्र लिखा था उसमें उन्होंने टंडन को नसीहत दी थी। नेहरू ने लिखा था कि इस वक्त कांग्रेस बुरे दौर से गुजर रही है और उसको अगर फिर से पार्टी में उर्जा का संचार नहीं किया गया तो इसकी बुरी हालत हो सकती है। पार्टी आतंरिक कलह से जूझ रही है और पार्टी नेताओं की लालसा बढ़ती जा रही है। नेहरू ने अपने पत्र में आगे लिखा कि ऐसा प्रतीत होता है कि आपको लगता है कि मैं जो कुछ कर और कह रहा हूं वो गलत है। मैं भी आपके भाषणों के बारे में सुनता और पढ़ता हूं और मेरा ये विश्वास दृढ़ होता जाता है कि आप भारत में उन ताकतों का समर्थन कर रहे हैं जो देश के लिए ठीक नहीं हैं। मुझे लगता है कि इस समय देश के सामने जो चुनौतियां हैं उसमें पार्टी में एकता आवश्यक है। हमें मुसलमानों की समस्याओं पर एकजुट होकर न सिर्फ विचार करना चाहिए बल्कि उनको सुलझाने का प्रयास भी करना चाहिए। हम ऐसा तो नहीं ही कर पा रहे हैं बल्कि अल्पसंख्यकों के प्रति पाकिस्तान के कदमों की आड़ में असहिष्णुता दिखा रहे हैं। अफसोस है कि आप उस जमात को समर्थन कर रहे हैं जो सांप्रदायिक है। नेहरू के इस पत्र के बाद संगठन में खेमेबंदी और तेज हो गई। जो बातें अबतक पार्टी में चल रही थीं वो खुलकर सामने आ गई। टंडन मजबूती के साथ अपनी उम्मीदवारी पर अड़े रहे। नेहरू को इस बात का अनुमान होने लगा था कि कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव में उनका खेमा कमजोर पड़ रहा है। पटेल समेत दक्षिण के कई नेता टंडन के समर्थन में थे।  

अब जवारलाल नेहरू के सामने बड़ा संकट खड़ा हो गया क्योंकि उन्होंने तो सार्वजनिक रूप से टंडन की उम्मीदवारी का विरोध कर दिया था। अध्यक्ष का चुनाव उनकी प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया था। जवाहरलाल नेहरू ने टंडन के विरोध नें जे बी कृपलानी को अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया था। अब नेहरू ने एक ऐसा दांव चला जिसकी कल्पना उस समय के कांग्रेस के नेताओं को नहीं था। उन्होंने घोषणा कर दी कि अगर टंडन जीत जाते हैं तो वो उनकी अध्यक्षता वाली कांग्रेस कार्य समिति में किसी कीमत पर नहीं रहेंगे। नेहरू की इस घोषणा के बाद इस बात की चर्चा होने लगी थी कि संगठन बड़ा या सरकार। यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि ये सब तब हो रहा था जब देश को स्वाधीन हुए लगभग तीन वर्ष हुए थे। विभाजन की विभीषिका का दंश पूरा देश झेल रहा था। पुरुषोत्तम दास टंडन विभाजन का दंश झेल रही बहुसंख्यक हिंदू जनता के पक्ष में खड़े थे। वो निरंतर उनकी समस्याओं को उठा रहे थे और मुसलमान और उनके समर्थक नेताओं को प्रश्नों के घेरे में खड़ा कर रहे थे। मुसलमान नेताओं पर उनके प्रहार से नेहरू नाखुश थे लेकिन कांग्रेस में टंडन का समर्थन बढ़ता जा रहा था। गोविंद वल्लभ पंत ने भी टंडन का समर्थन कर दिया था। तत्कालीन मैसूर प्रांत के मुख्यमंत्री के हुनुमंथैय्या ने तो पत्र लिखकर टंडन को समर्थन दिया था। अपने पत्र में उन्होंने स्पष्ट किया था कि नेहरू सरकार ने स्वाधीन भारत के लिए जो राह चुनी है उससे वो असहमत हैं और चाहते हैं कि टंडन और पटेल मिलकर भारत को एक ऐसा नेतृत्व प्रदान करें जो नेहरू की नीतियों से पृथक हो। 

नेहरू की तमाम कोशिशों के बावजूद पुरुषोत्तम दास टंडन ने उनके उम्मीदवार जे बी कृपलानी को संगठन चुनाव में पराजित कर दिया। ये कृपलानी की हार से अधिक नेहरू की हार थी। टंडन की जीत के बाद नेहरू बेहद खफा हुए थे। पर न तो उन्होंने सरकार में पद छोड़ा था और न ही कांग्रेस कार्य समिति की सदस्यता। कार्य समिति में वो टंडन के निर्णयों पर निरंतर प्रश्न चिन्ह लगाते रहते थे। उन्होंने अपनी हार के लिए सरदार पटेल और हनुमंथैय्या को भी जिम्मेदार माना था और दोनों के विरुद्ध लगातार काम करने लगे थे। टंडन करीब एक वर्ष से कुछ अधिक समय तक पार्टी के अध्यक्ष रहे पर नेहरू ने उनके खिलाफ ऐसा माहौल बनाया कि उन्हें आखिरकार इस्तीफा देना पड़ा। उन्होंने नेहरू की राजनीतिक चालों को समझते हुए भी पद छोड़ दिया था। वो नहीं चाहते थे कि सरकार और संगठन के बीच निरंतर हो रहे झगड़े के कारण पार्टी की छवि खराब हो। पहले आमचुनाव में पार्टी को नुकसान हो। टंडन के इस्तीफे के बाद नेहरू खुद पार्टी के अध्यक्ष बने। लंबे समय तक प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष दोनों पद पर रहे। 

टंडन ने ये साबित किया था कि संगठन सरकार से बड़ा होता है लेकिन नेहरू ने टंडन को घेरकर इस्तीफा करवाकर ये दिखा दिया कि सरकार संगठन से बड़ा होता है। कालांतर में नेहरू ने पार्टी पर भी अपना दबदबा कायम कर लिया और अपनी मर्जी के अध्यक्ष बनवाते रहे। टंडन पर दबाव बनाकर नेहरू ने इस्तीफे तो ले लिया लेकिन पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र समाप्त होने की राह भी खोल दी।   


Saturday, July 1, 2023

प्रतिभा विकास में भाषा बाधक न बने


दिल्ली विश्वविद्यालय के शताब्दी समारोह में भाग लेने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मेट्रो रेल से विश्वविद्यालय गए। मेट्रो की यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री ने साथ यात्रा कर रहे छात्रों से बातचीत की। छात्रों से चर्चा के समय प्रधानमंत्री मोदी ने बहुत ही अच्छी बात कही जिसपर देशव्यापी सोच बनना चाहिए। प्रधानमंत्री ने एक छात्र से जानना चाहा कि वो मूल रूप से कहां के रहनेवाले हैं। छात्र ने बताया कि वो रांची, झारखंड का है। प्रधानमंत्री ने सहजता से पूछा कि बाहर के किसी को दोस्त बनाया। रांची के उस छात्र ने उत्साह से बताया कि यूपी के लड़कों से दोस्ती की। वो जिस कालेज में पढ़ते हैं उसका प्रबंधन बालाजी मंदिर भी चलाते हैं तो वहां तेलुगु भाषी भी हैं। उसने तेलुगु बोलनेवालो से भी दोस्ती की है। वो उत्साह से बोले जा रहा था लेकिन प्रधानमंत्री कुछ और जानना चाह रहे थे। वो जानना चाह रहे थे कि दक्षिण भारत के राज्यों के छात्रों से दोस्ती की और उनसे उनकी भाषा के पांच-दस वाक्य सीखे या नहीं। प्रधानमंत्री के इतना बोलते ही एक छात्रा फटाक से बोल पड़ी कि उसने ऐसा किया है। एक वाकया भी बताया। वो अपने कालेज परिसर में थी तो उसने देखा कि एक लड़की फोन पर बात कर रही थी। बातचीत की भाषा वो नहीं समझ पा रही थी। बात खत्म होने के बाद उसने जानना चाहा कि किस भाषा में बात हो रही थी। पता चला कि बातचीत मलयालम में हो रही थी। इसके बाद उसने उस लड़की से अनुरोध किया कि उसे भी मलयालम के कुछ वाक्य बता दे। जैसे कि अगर को किसी को हैलो करना हो या हालचाल पूछना हो तो मलयालम में कैसे और क्या बोलेंगे। जब उस लड़की ने मलयालम में बताना आरंभ किया तो हिंदी भाषी लड़की ने फोन पर रिकार्ड कर लिया, ताकि बाद में उसको सुनकर सीख सके। इसी तरह से एक छात्रा ने बताया कि उसने मणिपुरी छात्राओं से मित्रता करके उनको हिंदी सिखाई तो असम की छात्रा ने बताया कि दिल्ली विवविद्यालय में अपने अध्ययन के दौरान उसने अपने कई साथियों का असमिया सिखाई। 

देखने में ये पूरा प्रसंग बहुत सामान्य लग रहा है लेकिन अगर सूक्ष्मता और गंभीरता से विचार करें तो एक देश के प्रधानमंत्री अपने देश के छात्रों को देश के अलग अलग हिस्सों में बोली जानेवाली भाषाओं को सीखने के लिए प्रेरित कर रहे थे। सहजता के साथ। इस देश ने भाषा के नाम पर अतीत में बहुत हिंसा झेली है। राज्यों का बंटवारा देखा है। खून खराबा देखा है। भारतीय भाषाओं को राजनीति का औजार बनते देखा है। अभी भी कभी कभार इस तरह के प्रसंग देखने को मिल जाते हैं। तमिलनाडु जैसे भाषाई रूप से समृद्ध प्रदेश के नेता अकारण हिंदी विरोध का झंडा उठाते रहते हैं। अब स्थितियां कुछ बदलती दिखने लगी हैं। सत्ता के शीर्ष स्तर पर बैठे नेताओं ने भारतीय भाषाओं को आगे बढ़ाने और उसके बल देने का उपक्रम आरंभ किया है। भाषा की राजनीति अपेक्षाकृत कम होने लगी है। प्रधानमंत्री मोदी से बातचीत के क्रम में एक छात्र ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भारतीय भाषाओं के महत्व की चर्चा की। इसपर प्रधानमंत्री मोदी का उत्तर बेहद सधा हुआ था। सधा हुआ इस वजह से कि उन्होंने अंग्रेजी की आलोचना नहीं की। बिना अंग्रेजी की आलोचना के उन्होंने भारतीय भाषाओं की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि हमारे देश के गांवों में बहुत प्रतिभा है लेकिन अधिकतर को अंग्रेजी का सौभाग्य नहीं मिला तो वे प्रतिभाएं बाधित हो गईं, रुक गईं। बातचीत के क्रम में ही प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि प्रतिभा के विकास में भाषा बाधक नहीं होनी चाहिए। इस बातचीत से जो संदेश निकल रहा था वो ये भी था कि भारतीय भाषाओं के बीच किसी प्रकार का वैमनस्य नहीं होना चाहिए। हर भारतीय को मातृभाषा के अलावा एक और भाषा सीखनी चाहिए। 

पिछले दिनों भारतीय भाषाओं के बीच बेहतर समन्वय और अतीत की कटुता को दूर करने के लिए वाराणसी और गुजरात में तमिल संगम जैसे कार्यक्रम हुए। उसके पहले पिछले वर्ष शिमला में साहित्य अकादमी ने उन्मेष नाम से चार दिनों का एक कार्यक्रम किया था। शिमला में आयोजित उस कार्यक्रम में भारतीय भाषाओं के चार सौ के करीब लेखकों की भागीदारी रही थी। विभिन्न विषयों पर मंथन किया गया था। आगामी अगस्त के पहले सप्ताह में फिर से साहित्य अकादमी भोपाल में उन्मेष का आयोजन कर रही है। इसमें भी भारतीय भाषाओं के विद्वानों की भागीदारी होगी। तमिल से लेकर कश्मीरी तक, गुजराती-मराठी से लेकर बांगला और पूर्वोत्तर की भाषाओं के लेखकों के बीच विचारों का आदान-प्रदान होगा। अगर देखा जाए तो केंद्र सरकार के स्तर पर भारतीय भाषाओं के बीच संवाद बढ़ाने का प्रयास निरंतर चल रहा है। 

स्वाधीनता के पहले हिंदी और तमिल के बीच इतना अधिक साहचर्य था कि 1910 में तत्कालीन मद्रास से काशी आकर बी कृष्णस्वामी अय्यर ने घोषणा की थी कि हिंदी ही भारत की राष्ट्रभाषा हो सकती है। तमिल और हिंदी भाषा के बीच कृतियों के अनुवाद की बेहद समृद्ध परंपरा थी। जयशंकर प्रसाद की कालजयी कृति कामायनी और आंसू दोनों काव्यों के अनुवाद तमिल में प्रकाशित हुए थे। प्रेमचंद के उपन्यास सेवासदन का भी तमिल में अनुवाद हुआ था और उसपर तो तमिल में एक फिल्म भी बनी थी। सुब्रह्मण्य भारती की रचनाओं को अनुवाद हिंदी में हो रहा था। आपको ये जानकर आश्चर्य हो सकता है कि तमिल के महावि कंब के रामायण का हिंदी में अनुवाद बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, पटना से प्रकाशित हुआ था। अन्य भारतीय भाषाओं के बीच भी अनुवाद के क्रम चलते रहते थे। स्वाधीनता के कुछ वर्षों बाद जब भाषा के आधार पर राजनीति आरंभ हुई तो ये प्रक्रिया बाधित हुई। राजनीति ने भाषा को औजार बनाकर भारत को बांटने का काम किया। स्वाधीनता के पहले दक्षिण, पश्चिम और पूर्वी भारत से हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की बात उठती रहती थी। उन प्रदेशों के लोगों के मस्तिष्क में हिंदी को लेकर आशंका के बीज बो दिए गए। संविधान सभा में देश की भाषा समस्या पर तीन दिनों तक चर्चा हुई थी। वहां पुरषोत्तमदास टंडन जी के विचारों को आज याद करने की आवश्यकता है। टंडन जी को इस कारण क्योंकि वो हिंदी के प्रचंड समर्थक थे। जब हिंदी में अंतरराष्ट्रीय अंकों की स्वीकार या अस्वीकार करने पर बात हो रही तो किसी ने कहा कि जनमत लेने से तो हिंदी आएगी नहीं। इसपर टंडन जी का उत्तर था कि ‘यदि विभिन्न प्रांत हिंदी को स्वीकार नहीं करते हैं तो मैं किसी भी स्थिति में उनपर हिंदी लादने को तौयार नहीं हूं। प्रांत हिंदी को ग्रहण करेंगे या नहीं यह निश्चय तो उन्हीं को करना है। जो लोग आज जिम्मेदारी की जगहों पर बैठे हैं उनसे मैं अपील करूंगा कि वे अपनी अन्तरात्मा की बारीक आवाज को सुनने की कोशिश करें और ऐसी कोई भी बात स्वीकार नहीं करें जो उनके प्रांतों को अमान्य होगी।‘ 

भाषा को लेकर जिस प्रकार को जोश और उत्साह स्वाधीनता के पहले दिखता है वो स्वाधीनता के बाद शिथिल हो गया। जब भाषा में राजनीति का प्रवेश हुआ तो उसने भारतीय भाषाओं को लड़ाकर अंग्रेजी की स्थिति मजबूत कर दी। जब देश की अर्थव्यवस्था को खोला गया या उदारीकरण का दौर चला तब भी भारतीय भाषाओं को मजबूत करने के लिए कोई विशेष प्रयास नहीं किया गया। अंग्रेजी की स्थिति शासकों की भाषा वाली बनी रही। प्रधानमंत्री मोदी के आने के बाद भारतीय भाषाओं को लेकर एक सुचिंतित मुहिम शुरु हुई है। ये मुहिम निरंतर आगे बढ़ रही है जो भारतीय भाषाओं के लिए सुखद है। 


Monday, June 23, 2014

सियासत की आग पर भाषा की हांडी

केंद्रीय गृह मंत्रालय के हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने का विरोध शुरू हो गया है । गृह मंत्रालय ने सोशल मीडिया पर हिंदी के उपयोग को बढ़ावा देने की पहल और कोशिश शुरू की है । गृह मंत्रालय ने अपने आदेश में कहा है कि सरकारी विभागों और सार्वजनिक उपक्रमों के ट्विटर, फेसबुक और अन्य जगहों पर बनाए गए आधिकारिक खातों में राजभाषा हिंदी को नजरअंदाज करके केवल अंग्रेजी का ही प्रयोग किया जा रहा है । गृह मंत्रालय के मुताबिक सभी विभागों को इन आधिकारिक खातों में हिंदी अथवा अंग्रेजी और हिंदी दोनों भाषाओं में प्रयोग किया जाना चाहिए जिसमें हिंदी को पहले रखा जाने का आदेश है । इस आदेश के खबर बनते ही लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद तमिलनाडू में सियासी जमीन की तलाश में जुटे डीएमके के नेता करुणानिधि को इसमें संभावना नजर आई । उन्होंने फौरन गृह मंत्रालय के हिंदी को बढ़ावा देने के निर्देश के फैसले का विरोध करते हुए बयान जारी कर दिया। करुणानिधि ने कहा कि हिंदी को प्राथमिकता दिए जाने को गैर-हिंदी भाषी लोगों के साथ भेदभाव करने और उन्हें दूसरे दर्जे के नागरिक मानने के प्रयास की दिशा में पहला कदम समझा जाएगा । डीएमके नेता करुणानिधि का यह बयान ना केवल हास्यास्पद है बल्कि पूरे तरीके से राजनीति से प्रेरित है । दोनों बेटों के बीच जारी कलह, टेलीकॉम घोटाले में बेटी और पत्नी के आरोपी होने और सबसे बड़ी बात लोकसभा चुनाव में पूरे राज्य से सूपड़ा साफ होने के बाद करुणानिधि के पास कोई मुद्दा बचा नहीं है और वो हाशिए पर चले गए हैं । इस स्थिति में वो एक बार फिर से हिंदी विरोध का राग अलापकर तमिलनाडू के लोगों की भावनाएं भड़काकर अपनी राजनीति चमकाने की फिराक में हैं । हिंदी का एक कहावत है, शायद करुणानिधि को पता ना हो, काठ की हांडी बार बार नहीं चढ़ती । साठ के दशक में हिंदी की हांडी को राजनीति के चूल्हे पर चढ़ाकर करुणानिधि और उनकी पार्टी ने लंबे समय तक तमिलनाडू पर राज किया । साठ के दशक का वह वक्त कुछ और था और पांच दशक बाद का वक्त अब कुछ और है । देश की, देशवासियों की प्राथमिकताएं बदल गई हैं । अब वो भाषा के नाम पर मरने मारने के लिए उतारू होनेवाले नहीं हैं । इसके अलावा भाषा के नाम पर राजनीति चमकाने की नेताओं की चाल भी जनता की समझ में आ चुकी है, लिहाजा हिंदी विरोध की हांडी से इस बार सत्ता निकलने वाली नहीं है । करुणानिधि का सवाल है कि संविधान की आठवीं अनुसूचि में शामिल सभी भाषाओं में से हिंदी को ही प्राथमिकता देने का एलान क्यों किया गया है । उन्होंने संचार के लिए हिंदी में रुचि दिखाने के केंद्र के फैसले को भटकावपूर्ण कदम करार दिया है । करुणानिधि स्वयं अच्छे लेखक रहे हैं लेकिन उनका यह तर्क कि संचार के माध्यम के लिए भाषा विशेष को तवज्जो देना भटकाव है, गले नहीं उतरता है । हिंदी को तमाम विरोध और संघर्षों के बाद राजभाषा का दर्जा हासिल हुआ था । अब अगर राजभाषा में सरकारी कामकाज के प्रचार प्रसार को बढ़ावा देने पर अमल शुरू करने की पहल हो रही है तो यह भटकाव कैसे है । करुणानिधि के बयान के बाद जयललिता ने भी विरोध जताने की रस्म अदायगी कर दी है ।
दरअसल अगर हम इतिहास पर एक नजर डालें तो डीएमके की बुनियाद ही भारत विरोध रहा है । मद्रास प्रेसिडेंसी में तमाम दलों ने साथ आकर डीएमके की स्थापना की थी । उसके अगुवा रहे सी एम अन्नादुरैई ने जोर शोर से अलग तमिल देश की मांग उठाई थी और कहा था कि तमिल राज्य के बनने के बाद ही तमिल अपनी क्षमताओं का इस्तेमाल कर सकते हैं । डीएमके के अलगाववावदी रुख की वजह से इस पार्टी के चुनाव लड़ने पर पाबंदी लगा दी गई थी । इसकी वजह संविधान का अनुच्छेद उन्नीस था जो किसी भी तरह के अलगाववादी दल को चुनाव लड़ने से रोकता था । 1962 में चीन के आक्रमण के दौरान डीएमके के नेताओं ने जेल से ही चीनी हमले का विरोध किया था । उसके बाद नेहरू के रुख में बदलाव आया और उन्होंने आर्टिकल उन्नीस में संशोधन करवा दिया ताकि डीएमके चुनाव लड़ सके । यह ठीक है कि बाद के वर्षों में डीएमके का अलगाववादी रुख उस तरह से मुखर नहीं हुआ । लेकिन जनवरी उन्नीस सौ पैंसठ में एक बार फिर से हिंदी के विरोध में तमिलनाडू में जबरदस्त हिंसा शुरू हो गई थी । तमिलनाडू के लोगों को लगता था कि हिंदी को बढ़ावा देने से तमिलों का हक छिन जाएगा । जबकि ऐसा था नहीं । उस वक्त की सूचना और प्रसारण मंत्री इंदिरा गांधी ने बगैर प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री को बताए तमिलनाडू जाकर भाषाई हिंसक आंदोलन को बातचीत से सुलझाया था । इंदिरा गांधी की पहल का दाद दी गई थी । हलांकि लालबहादुर शास्त्री को इंदिरा गांधी का यह कदम अच्छा नहीं लगा था । खैर यह एक अवांतर प्रसंग है जिसपर कभी बाद में चर्चा होगी । इस पूरे प्रसंग को बतलाने का मतलब यह है कि हिंदी को बढ़ावा देने से अन्य भाषाओं पर कोई खतरा नहीं है, यह बात अन्य भाषा के लोगों को समझानी होगी । अन्य भारतीय भाषाओं के लोगों से संवाद कायम करना होगा नहीं तो करुणानिधि जैसे लोग भाषा की भावना भड़का कर राजनीति की रोटी सेंकने में कामयाब होते रहेंगे । 
महात्मा गांधी ने यह बात आजादी के पहले ही साफ कर दी थी कि हिंदी के प्रचार प्रसार से किसीभी अन्य प्रांतीय भाषा को कोई खतरा नहीं उत्पन्न होगा । 20 अप्रैल 1935 को हिंदी साहित्य सम्मेलन के चौबीसवें अधिवेशन में इंदौर में गांधी जी ने कहा था – ‘मैं हमेशा यह मानता रहा हूं कि किसी भी हालत में प्रांतीय भाषाओं को मिटाना नहीं चाहते । हमारा मतलब तो सिर्फ यह है कि विभिन्न प्रांतों के पारस्परिक संबंध के लिए हम हिंदी सीखें । ऐसा कहने से हिंदी के प्रति हमारा कोई पक्षपात प्रकट नहीं होता । हिंदी को हम राष्ट्रभाषा मानते हैं । वह राष्ट्रीय होने के लायक है । वही भाषा राष्ट्रीय बन सकती है जिसे अधिक-संख्यक लोग जानते बोलते हों और जो सीखने में सुगम हो । ऐसी भाषा हिंदी ही है ।‘  हिंदी के प्रति गांधी का प्रेम सर्वविदित है लेकिन वो हिंदी के साथ साथ सभी भारतीय भाषाओं की प्रगति के भी सबसे बड़े पैरोकार थे । नौ जुलाई उन्नीस सौ अड़तीस के हरिजन सेवक में गांधी जी ने लिखा- शिक्षा का माध्यम तो एकदम और हर हालत में बदलना चाहिए और इन्य प्रान्तीय भाषाओॆ को उसका वाजिब स्थान मिलना चाहिए । इसके अलावा संविधान सभा में पुरुषोत्तमदास टंडन ने कहा था कि –‘ मैं नहीं चाहता कि हिंदी को अनिच्छुक लोगों पर लादा जाए , यदि आप यह समझते हैं कि जिन लोगों का आप प्रतिनिधित्व करते हैं, वे इसे स्वीकार नहीं करेंगे, तो मैं माननीय सदस्यों से कहूंगा कि वो इस विधान के पक्ष में मत ना दें ।‘ हिंदी के लोगों की अन्य भारतीय भाषाओं को लेकर हमेशा से सोच रही है । कुछ निहित स्वार्थ के लोगों ने हिंदी को अन्य भारतीय भाषा के दुश्मन के तौर पर पेश कर प्रचारित कर दिया । यहां एक और उदाहरण देना सही होगा । सरकारी भाषा आयोग की एक बैठक में भाषा के सवाल पर सदस्यों के बीच तीखी बहस हो रही थी । उस बहस में हस्तक्षेप करते हुए बालकृष्ण शर्मा नवीन ने कहा था कि – यदि हिंदी देश की एकता में रोड़ा बनती है तो मैं इसे गहरे सागर में डुबो दूंगा । हिंदी के नुमाइंदों की इस तरह की प्रतिक्रियाएं यह साफ करती हैं कि वो हिंदी को सर्वग्राह्य बनाना चाहते थे । हिंदी को अन्य भारतीय भाषा पर थोपना नहीं चाहते थे, अब भी नहीं चाहते हैं । यह बात गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने भी साफ कर दी । राजनाथ सिंह ने कहा कि सभी भारतीय भाषाएं अहम हैं और उनका मंत्रालय सभी भारतीय भाषाओं के विकास और प्रचार के लिए प्रतिबद्ध है । यह प्रतिबद्धता जरूरी भी है क्योंकि अन्य भाषाओं के सहयोग को लेकर ही हिंदी को बढ़ाया जा सकता है  । अन्य भारतीय भाषा के लोगों को भी समझना होगा कि उनकी भाषा के फैलाव के लिए भी हिंदी का होना आवश्यक है । एक छोटे से उदाहरण से इसको समझा जा सकता है । अगर किसी अन्य भारतीय भाषा का दूसरी भाषा में अनुवाद करवाना हो तो पहले उसके हिंदी अनुवाद की जरूरत पड़ती है । क्योंकि हिंदी को छोड़कर ऐसे अनुवादक कम हैं जो भारतीय भाषाओं में ही अुनवाद कर सकें । हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को सहोदर भाषा के तौर पर काम करना होगा ताकि दोनों एक दूसरे के साथ चलकर अपनी अपनी मंजिल पा सकें । करुणानिधि जैसे लोगों राजनीति को पहचानकर तमिल भाषियों को ही उनके मंसूबों को असफल करना होगा ।