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Saturday, January 20, 2024

अकारण विवाद,आधारहीन तर्क


अयोध्याजी में श्रीराम लला की प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव में एक दिन शेष है। राम लला की प्राण प्रतिष्ठा के पहले कुछ भगवाधारियों ने प्राण प्रतिष्ठा के समय को लेकर प्रश्न उठाए तो कुछ ने अर्धनिर्मित मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा पर सवाल खड़े किए। इन भगवाधारियों की आलोचना की आड़ में एक पूरा इकोसिस्टम सक्रिय हुआ और इनको बड़ा संत महात्मा और सनातन का ज्ञाता मानते हुए सरकार और प्रधानमंत्री की आलोचना आरंभ कर दी। इससे जनमानस में ये शंका हुई कि आलोचना योजनाबद्ध ढंग से आरंभ किया गया। सनातन या हिंदू धर्म में हर किसी को प्रश्न करने का अधिकार है। ये एक मात्र ऐसा धर्म है जिसमें अपनी श्रद्धा के अनुसार अपने भगवान चुनने तक की स्वतंत्रता है। आप चाहें जिस भगवान की पूजा करें, जिसके भक्त बनना चाहें उसके बनें। हिंदू धर्म समग्रता में एक भगवान और एक किताब वाले धर्मों से अलग है। अगर उत्तर आधुनिक शब्दावली में कहें तो हिंदू धर्म पूरी दुनिया का एकमात्र लोकतांत्रिक धर्म है। लोकतंत्र में नागरिकों को जितना अधिकार है उससे अधिक अधिकार हिंदू धर्म अपने अनुयायियों को देता है। इसलिए इन भगवाधारियों के प्रश्नों का कोई विरोध नहीं है। लेकिन जिस प्रकार से सरकार विरोधी इकोसिस्टम ने इस विरोध को प्रतिकार का स्वरूप दिया उसकी आलोचना तो होनी ही चाहिए। प्रश्न और प्रतिकार के अंतर को समझना होगा। राममंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा को लेकर प्रश्न उठाते हैं तो एक संवाद का जन्म होता है। भारतीय संस्कृति में संवाद का अपना एक महत्व रहा है और रहेगा। प्रश्न से आगे जाकर जब प्रतिकार आरंभ होता है तो तो वो आस्था का प्रतिकार होता है। श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति का जो संघर्ष रहा है वो इसी आस्था के प्रतिकार से जुड़ा रहा। श्रीरामजन्मभूमि पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय में भी इस आस्था का सम्मान किया गया। यह बात इकोसिस्टम से जुड़े लोगों को समझ नहीं आ रही है। केंद्र सरकार या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का विरोध करने की उसकी जो योजना है उसमें वो आस्था पर प्रहार करके उसको खंडित करने का प्रयत्न करते नजर आने लगे हैं। मोदी विरोध से राम विरोध तक पहुंच गए हैं। यहीं पर उनका अज्ञान और भारतीय जनमानस को समझने की कमजोरी उजागर होती है। 

श्रीराम से जुड़े दो ग्रंथ वाल्मीकि रचित रामायण और तुलसीदास रचित श्रीरामचरितमानस को महत्वपूर्ण माना जाता है। तुलसी के श्रीरामचरितमानस की व्याप्ति किसी भी धर्मग्रंथ से कम नहीं है। उपरोक्त प्रश्नों के आलोक में इन दो ग्रंथों में वर्णित प्रसंगों पर दृष्टि डालते हैं। सबसे पहले मुहुर्त की बात करते हैं और देखते हैं कि वाल्मीकि रामायण में श्रीराम ने मुहुर्त के बारे में क्या कहा है। वाल्मीकि रामायण के युद्ध कांड के चतुर्थ सर्ग में मुहुर्त की चर्चा है। जब श्रीराम वानर सेना के साथ समुद्र तट पर पहुंचते हैं और हनुमान उनको लंकापुरी का वर्णन सुनाते हैं। उस वर्णन को सुनकर श्रीराम कहते हैं कि हनुमन! मैं तुमसे सच कहता हूं-तुमने उस भयानक राक्षस की जिस लंकापुरी का वर्णन किया है उसे मैं शीघ्र नष्ट कर डालूंगा। हनुमान से बात समाप्त करने के बाद श्रीराम ने सुग्रीव से कहा, अस्मिन् मुहुर्ते सुग्रीव प्रयाणमभिरोचय/ युक्तो मुहूर्ते विजये प्राप्तो मध्यं दिवाकर:। अर्थ ये हुआ कि – सुग्रीव! तुम इसी मुहुर्त में प्रस्थान की तैयारी करो। सूर्यदेव दिन के मध्य भाग में जा पहुंचे हैं, इसलिए इस विजय नामक मुहुर्त में हमारी यात्रा उपयुक्त होगी। श्रीराम जिस विजय मुहुर्त की बात कर रहे हैं उसके बारे में व्याख्या ये है कि दिन में दोपहरी के समय अभिजित मुहूर्त होता है इसी को विजय मुहूर्त भी कहते हैं । लंका प्रस्थान के लिए श्रीराम ने स्वयं दोपहर के इस मुहुर्त को चुना था तो श्रीरामजन्मभूमि पर बने मंदिर में भव्य समारोह के लिए इस मुहुर्त पर प्रश्न उठाना उचित नहीं प्रतीत होता है। ज्योतिष रत्नाकर में इस मुहूर्त में दक्षिणयात्रा निषिद्ध है लेकिन यहां तो किसी प्रकार की यात्रा की ही नहीं जा रही है। श्रीराम ने जब लंका विजय के प्रस्थान के लिए अभिजित मुहूर्त चुना था तो उससे अधिक पवित्र और सटीक मुहूर्त क्या हो सकता है। 

अब श्रीरामचरितमानस का वो प्रसंग देखते हैं जब श्रीराम समुद्र के किनारे शिव जी की पूजा करना चाहते हैं। यह प्रसंग भी लंका कांड का है। श्रीराम और उनकी सेना के सामने लंका जाने के लिए समुद्र को पार करने की समस्या थी। जामवंत ने नल नील को बुलाकर कहा कि मन में श्रीराम जी के प्रताप को स्मरण करके सेतु तैयार करो, कुछ भी परिश्रम नहीं होगा। फिर उन्होंने वानरों के समूह से वृक्षों और पर्वतों के समूह को उखाड़ लाने को कहा, धावहु मर्कट बिकट बरूथा। आनहु बिटप गिरिन्ह के जूथा।।सुनि कपि भालु चले करि हूहा।जय रघुबीर प्रताप समूहा।। वानर भालू अपना काम करके वृक्षों और पर्वतों के समूह ले आते हैं और नल नील उनको सेतु का आकार देने लगते हैं। सेतु की सुंदर रचना देखकर कृपा सिंधु श्रीराम कहते हैं- परम रम्य उत्तम यह धरनी। महिमा अमित जाइ नहीं बरनी।। करिहउं इहां संभु थापना। मोरो ह्रदयं परम कलपना।। श्रीराम को सुनकर सुग्रीव ने अपने दूत भेजे और ऋषियों को समुद्र तट पर बुलाया। फिर वहीं पर श्रीराम ने शिवलिंग की स्थापना करके उनकी पूजा अर्चना की। लंका कांड में तुलसीदास जी ने लिखा है- सुनि कपीस बहु दूत पठाए। मुनिवर सकल बोलि लै आए।। लिंग थापि विधिवत करि पूजा। सिव समान प्रिय मोहि न दूजा।। अगर इस प्रसंग को देखे तो भगवान की पूजा के लिए कहां किसी मंदिर या स्थान की आवश्यकता पड़ी। श्रीराम ने समुद्र किनारे शिवलिंग की स्थापना की और मुनियों की उपस्थिति में उनकी पूजा की। शिवलिंग भी पूजा के पहले ही बनाया गया। कथित शंकराचार्य आदि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आलोचना इस आधार पर कर रहे हैं कि वो अर्धनिर्मित मंदिर में पूजा कर रहे हैं। आलोचना करनेवाले इन भगवाधारियों को रामायण और श्रीरामचरितमानस में वर्णित इन प्रसंगों को देखना चाहिए। कहां कोई मंदिर कहां कोई शिखर। बस सागर का किनारा, श्रेष्ठ मुनियों की उपस्थिति और भगवान शंकर के प्रति आस्था। शिवलिंग की स्थापना भी हुई और पूजा भी। निर्मित- अर्धनिर्मित की कोई बात ही नहीं है। जहां हमारे ग्रंथों में इस तरह की बातें हो वहां मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा को लेकर उठनेवाले प्रश्नों को इन प्रसंगो के आलोक में देखना चाहिए। प्रश्न करनेवालों को प्रभु श्रीराम के इस वचन का भी ध्यान रखना चहिए- होइ अकाम जो छल तजि सेइहि।भगति मोरि तेहि संकर देहहि।। मम कृत सेतु जो दरसनु करिही। सो बिनु श्रम भवसागर तरिही।। जो छल छोड़कर निष्काम होकर श्रीरामजी की सेवा करेंगे उन्हें शंकर जी मेरी भक्ति देंगे। श्रीराम के वचन सबको अच्छा लगा और शंकर जी की पूजा के पश्चात सभी ऋषि मुनि अपने अपने आश्रमों में लौट गए।

अयोध्या धाम में श्रीराम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह में प्रश्न खड़ा करनेवाले यहां तक कह रहे हैं कि संविधान की शपथ लेनेवाले प्रधानमंत्री प्राण प्रतिष्ठा नहीं कर सकते। होता यह है कि जब विरोध के लिए विरोध करना हो तो ऐसे ऊलजलूल तर्क ढूंढे जाते हैं जो कई बार हास्यास्पद हो जाते हैं। संविधान की शपथ का तर्क भी ऐसा ही है। एक सज्जन ने तो यहां तक कह दिया कि नव्य मंदिर जन्म स्थान से तीन किलोमीटर दूर बन रहा है। आधारहीन, तथ्यहीन बयान। प्रश्न करनेवाले की मंशा और उसके ज्ञान पर ही सवाल खड़े हो रहे हैं। श्रीराम और उनका चरित इस देश के लोक मानस में अंकित है। उसका प्रतिकार देश की जनता को शायद ही मंजूर हो। सोमवार को दोपहर विजय या अभिजित मुहूर्त में नव्य मंदिर में प्रभु श्रीराम की मनोहारी मूर्ति की स्थापना हो रही है। उनके साथ पूर्व में स्थापित रामलला विराजमान भी होंगे। मंगल की कामना होनी चाहिए।  


Saturday, January 6, 2024

भक्ति ज्ञान और सदाचार की त्रिवेणी


अयोध्या में श्रीराम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के पहले देश के अनेक शहरों में दैनिक जागरण श्रीरामोत्सव की चर्चा कवि चेतन कश्यप से हो रही थी। बातचीत के क्रम में उन्होंने बताया कि गायक मुकेश ने श्रीरामचरितमानस को आज से 50 वर्ष पूर्व गाया था। मुकेश के गाए चौपाइयों का पहला एलपी रिकार्ड एचएमवी से 1973 में आया था। ये बालकांड पर आधारित था। तब एचएमवी ने ये घोषणा की थी कि तुलसी रामायण, भारत व्यापी मानस चतु:शताब्दी समारोह में एचएमवी के योगदान स्वरूप एक विशिष्ट एल्बम के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। पहले एल्बम को पहला पुष्प बताया गया था। मानस की चतु:शताब्दी के शुभ अवसर पर मानस के रचयिता का पुण्य स्मरण स्वाभाविक था। कहा गया था कि गोस्वामी तुलसीदास हिंदी भाषा के तो सर्वश्रेष्ठकवि हैं ही संसार भर में वो सर्वाधिक लोकप्रिय और प्रतिष्ठित महाकवि माने जाते हैं। उनका सबसे महान ग्रंथ रामचरितमानस है जिनकी चौपाइयां और दोहे शिलालेख और सुभाषित पुष्प बन गए हैं। उन्होंने जनता के मनोराज्य में रामराज्य के आदर्शों को सदा के लिए प्रतिष्ठित कर दिया है। 1974 में उन्होंने मानस के सभी खंडों को गाया था जिसका रिकार्ड भी तब आया था, जो आज भी बेहद लोकप्रिय है। आज भी मुकेश के गाए इन चौपाइयों का अपना अलग महत्व और लोकप्रियता है। कहनेवाले तो यहां तक कहते हैं कि अगर मुकेश के एक काम को याद किया जाएगा तो वो है उनका ये गायन। तुलसी रामायण के नाम से आए इस रिकार्ड का जो कवर था उसके ऊपर एक टिप्पणी भी प्रकाशित थी, ‘तुलसी रामायण की कथावस्तु रामचरितमानस से संकलित है। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस का शुभारंभ विक्रम संवत 1631 में रामनवमी के दिन अयोध्या में किया था। विगत चार सौ वर्षों में रामचरितमानस की लोकप्रियता और प्रतिष्ठा निरंतर बढ़ती रही है। किसान का कच्चा मकान हो या आलीशान राजमहल , गृहस्थ का घर हो या महात्मा का आश्रम, देश हो या विदेश, सर्वत्र रामचरितमानस हिंदी भाषा का सर्वोत्तम और सर्वमान्य पवित्र ग्रंथ माना जाता है। निरक्षर श्रोता हो शास्त्री वक्ता ,सामानय जन हो या अतिविशिष्ट व्यक्ति, हिंदी भाषी हो या अहिंदी भाषी, देशी भाष्यकार हो या विदेशी अनुवादक, सबने रामचरितमानस से महत्व को शिरोधार्य किया। अनेक देशी और विदेशी भाषा में ये ग्रंथ अनुदित है। किंतु सर्वोपरि महत्व तो रामचरितमानस का यह है कि इसकी पावन वाणी कोटि-कोटि जन के मन में भक्ति ज्ञान और सदाचार की त्रिवेणी बनी है। विगत चार सौ वर्षों से रामचरितमानस जनमानस में राम भक्ति का कमल खिलानेवाले सूर्य के समान प्रकाशित रहा है।‘ आज से 50 वर्ष पूर्व जो एल्बम आया था उसमें मुकेश के अलावा वाणी जयराम, कृष्णा कल्ले, पुष्पा पागदरे, प्रदीप चटर्जी, सुरेन्द्र कोहली और अंबर कुमार की आवाज भी थी। इसकी संगीत रचना मुरली मनोहर स्वरूप ने की थी और संकलन पंडित नरेन्द्र शर्मा ने किया था। इस समय जब पूरा देश राममय हो रहा है तब मुकेश के साथ इन कलाकारों के योगदान का स्मरण भी किया जाना चाहिए। उस दौर में जब तकनीक इतनी उन्नत नहीं थी तब भी मुकेश के गाए तुलसी रामायण हर उस घर में गूंजती थी जिस घर में रिकार्ड प्लेयर होता था। 

श्रीरामचरितमानस की लोकप्रियता का कारण कई वामपंथी विचारक इसका धर्म से जुड़ा होना मानते हैं। उनका मत है कि तुलसीदास ने चूंकि धर्म और भगवान पर लिखा इस कारण श्रीरामचरितमानस लोकप्रिय है। ऐसे विचारक जब इस तरह की टिप्पणी करते तो यह भूल जाते हैं कि यदि भगवान, धर्म और भक्ति ही किसी रचना का आधार होती तो भक्तिकाल के लगभग सभी कवि लोकप्रिय होते। उस काल के सभी कवियों ने इन्हीं को आधार बनाकर लिखा। लेकिन न तो सूरदास, न केशवदास न ही नाभादास जैसे भक्तिकाल के कवियों को तुलसीदास और उनकी कृति श्रीरामचरितमानस जैसी लोकप्रियता मिल पाई। विश्वनाथ त्रिपाठी ने लिखा है कि ‘तुलसीदास की लोकप्रियता का कारण यह है कि उन्होंने अपनी कविता में अपने देखे हुए जीवन का बहुत गहरा और व्यापक चित्रण किया है। उन्होंने राम के परंपरा प्राप्त रूप को अपने युग के अनुरूप बनाया। उन्होंने राम की संघर्ष कथा को अपने समकालीन समाज और अपने जीवन के संघर्ष कथा के आलोक में देखा। उन्होंने वाल्मीकि और भवभूति के राम को पुन:स्थापित नहीं किया है, अपने युग के राम को चित्रित किया है। उनके दर्शन और चित्रण के राम ब्रह्म हैं लेकिन उनकी कविता के राम लोक-नायक हैं।‘ त्रिपाठी ने जो लोक-नायक शब्द उपयोग किया है उसका जो लोक है उसमें ही तुलसी के रामचरित की लोकप्रियता के कारण हैं। लोक में राम या कह सकते हैं कि लोक के राम। राम का जो चरित्र चित्रण तुलसी ने किया है उसमें कहीं भी अहंकार नहीं है। लोक कभी भी अहंकारी नायकों को पसंद नहीं करता है। इसके अलावा राम का जो समर्पण दिखता है वो अप्रतिम है। जब वो छात्र होते हैं तो अपने गुरू के लिए समर्पित होते हैं, जब पुत्र होते हैं तो पिता के लिए, उनके वचन के लिए राज का त्याग कर वन गमन कर जाते हैं। कहीं किसी प्रकार का मलाल नहीं, क्षोभ नहीं। जब पति होते हैं तो पत्नी की हर इच्छा को पूरी करने का समर्पण दिखता है। पत्नी के खिलाफ हुए अत्याचार का प्रतिकार करने के लिए अयोध्या से सेना नहीं बुलाते, अपने दम पर अपनी सेना बनाते हैं और रावण को सबक सिखाते हैं। जब मित्र होते हैं तो सुग्रीव के साथ खड़े होते हैं। 

यह अकारण नहीं है कि प्रेमचंद भी कहते हैं कि उनके आदर्श राम और कृष्ण हैं। 1932 में प्रेमचंद ने एक निबंध लिखा था जाग्रति। उसमें वो लिखते हैं कि ‘हमारे जीवन का उद्देश्य प्रभुत्व की प्राप्ति नहीं बल्कि परमार्थ संचय है। हमारे जीवन का आदर्श स्वार्थ की अंधी उपासना नहीं संसार की निधि को समेटकर अपनी थैली में भर लेना नहीं वरन संसार में इस तरह रहना है कि हमसे किसी को हानि न हो। किसी को कष्ट न हो किसी का गला न दबे। हमारे आदर्श चरित्र नेपोलियन जैसे नहीं जो संसार पर अधिकार प्राप्त करना चाहता था न क्लाइब और क्रामबेल जैसे न ही लेनिन और मुसोलिनी जैसे। हमारे आदर्श चरित्र कृष्ण और राम और अशोक जैसे राजा अर्जुन और भीष्म जैसे योद्धा और गांधी जैसे गृहस्थ हैं। हमारा विश्वास संघर्ष में नहीं सहयोग में है। प्रेमचंद की इन पंक्तियों में हमें तुलसी के राम का चरित स्पष्ट रूप से दिखता है। बाल्यकाल से लेकर राज्याभिषेक तक श्रीराम कहीं भी संघर्ष के लिए उद्यम करते नहीं दिखते। रामचरित में सहयोग का भाव है। इसलिए जब मुकेश रामचरित को गाते हैं तो लोगों के दिल को छूते हैं। पंति नरेन्द्र शर्मा का सहयोग भी इस एल्बम में मिला था। नरेन्द्र शर्मा ऐसे कवि गीतकार थे जिन्होंने भारतीय परंपरा और शब्द संपदा का उपयोग अपने गीतों में किया और लोकप्रियता भी हासिल की। लता मंगेशकर जब ‘राम रतन धन पायो’ नाम का एल्बम तैयार कर रही थीं तब नरेन्द्र शर्मा ने उनसे कहा कि ‘राम ऐसे अकेले भगवान हुए हैं कि अगर कोई उनकी तन मन से सेवा करे तो तो उसका सारा कार्य सिद्ध होता है। राम ही वो ईश्वर हैं जो सत्य के छोर पर खड़े होकर आपको अंत में निर्वाण की दशा में ले जाते हैं। नरेन्द्र शर्मा की इस बात का लता पर इतना असर हुआ कि उनकी राम में श्रद्धा बढ़ने लगी थी। लता ने माना था कि ‘तभी से मैं राम भक्त हूं और मैं मानती हूं कि उनके जैसा चरित्र बल किसी दूसरे पौराणिक किरदार में नहीं मिलेगा। राम और उनके चरित की लोक में इतनी व्याप्ति है कि हर कोई उनमें अपना आदर्श ढूंढ लेता है। 


Saturday, October 2, 2021

तुलसीदास की उपेक्षा असंभव


हमारे देश में और पूरी दुनिया में रामकथा एक ऐसी कथा है जिसके कई पाठ उपलब्ध हैं। रामकथा को देश, काल और परिस्थिति के अनुसार लेखकों ने अपने विवेक के आधार पर लिखा। उपलब्ध रामकथाओं में गोस्वामी तुलसीदास की श्रीरामचरितमानस की लोकप्रियता असंदिग्ध है। जब तुलसीदास ने श्रीरामचरितमानस की रचना की थी तब भारतवर्ष पर विदेशी आक्रांताओं का कब्जा था। उस दौर में हमारे देश की संस्कृति को, रीति रिवाजों को, खानपान को, स्थापत्य कला आदि को बदलने का उपक्रम लगातार चल रहा था। हमारी आस्था के केंद्रों को नष्ट किया जा रहा था। तलवार के जोर पर समाज की संरचना भी बदली जा रही थी। अपनी संस्कृति और समृद्ध विरासत के प्रति लोगों की आस्था डिगने लगी थी। ऐसे विकट समय में तुलसीदास ने श्रीरामचरितमानस की रचना की और देश के सामने राम के रूप में एक ऐसा नायक प्रस्तुत किया जो विकट परिस्थितियों में अपने धर्म पर अडिग रहते हुए आकांता का समूल नाश करता है। ये ग्रंथ उस समय की मांग थी। इस विषय पर कई शोध हो चुके हैं और कई विद्वानों ने लिखा है। यहां इस पृष्ठभूमि को बताने का उद्देश्य ये है कि देश को जब 1947 में लंबे कालखंड के बाद विदेशी आक्रांताओं से मुक्ति मिली तब भी तुलसीदास रचित श्रीरामचरितमानस की लोकप्रियता में किसी तरह की कमी नहीं आई बल्कि ये बढ़ी ही। स्वाधीनता के बाद अगर अकादमिक जगत पर नजर डालते हैं तो वहां तुलसीदास और श्रीरामचरितमानस को लेकर एक उदासीनता दिखाई देती है। इस उदासीनता की वजह अकादमिक जगत पर वामपंथी विचारधारा के अनुयायियों का दबदबा रहा। 
तुलसीदास को हिंदू समाज का पथभ्रष्टक तक कहा गया और इस तरह की पुस्तकें भी प्रकाशित हुईं। तुलसीदास के पाठ को कमतर करके आंकने के अनेक प्रयास हुए। पाठ्यक्रमों में इस तरह के लेखों को प्राथमिकता दी गई जिसमें तुलसीदास की उपेक्षा हो। इस संबंध में याद पड़ता है ए के रामानुजन के एक लेख की जिसका नाम है, थ्री हंड्रेड रामायणाज, फाइव एक्जांपल एंड थ्री थाट्स आन ट्रांसलेशन। ए के रामानुजन ने देश विदेश में लिखे गए कई रामकथाओं का उदाहरण दिया। अलग अलग तरह की कथाएं बताईं लेकिन आपको ये जानकर हैरानी होगी कि रामानुजन ने अपने इस लेख में तुलसीदास का नाम सिर्फ एक जगह उल्लिखित है वहां भी तुलसी कहा गया है। दो स्थानों पर रामचरितमानस का उल्लेख मिलता है। एक जगह अहिल्या की कथा के संदर्भ में और दूसरी जगह कंबन का प्रभाव बताने के क्रम में। अब इस विद्वान को क्या कहा जाए कि वो जब रामकथा के विभिन्न पाठ का उल्लेख करता है तो उसको तुलसीदास के श्रीरामचरितमानस से कोई उद्धरण याद नहीं पड़ता। ये जानबूझकर इस ग्रंथ से कोई उद्धरण नहीं उठाते। याद पड़ता है जब 2011 में दिल्ली विश्विद्यालय के पाठ्यक्रम से इस लेख को हटाया गया था तब वामपंथी शिक्षकों, लेखकों और इतिहासकारों ने वितंडा खड़ा कर दिया था। जबकि उस लेख को हटाने का निर्णय विश्वविद्यालय की विद्वत परिषद में हुआ था। उस वक्त रामानुजन के लेख के पक्ष में कई वामपंथी लेखकों ने बड़े-बड़े लेख लिखे थे। वो लेख अकादमिक कम राजनीतिक अधिक थे। ए के रामानुजन के लेख की सीमा उसमें तुलसीदास के पाठ की अनुपस्थिति है। इसके अलावा रामानुजन ने जिन रामायण या जिन ग्रंथों की चर्चा की है उनकी रचना के समय व्याप्त स्थिति और परिस्थिति पर प्रकाश नहीं डाला है। अगर वो ऐसा कर पाते तो लेख अधिक अर्थपूर्ण होता। 

अगर रामानुजन के पूरे लेख को पढ़ें तो यह स्पष्ट होता है कि वो कोई नई बात नहीं कह रहे थे। ये सर्वज्ञात है कि रामकथा के अनेक रूप अनेक भाषाओं में उपलब्ध हैं। तुलसीदास ने स्वयं कहा है कि हरि अनंत हरिकथा अनंता, कहहिं सुनहिं बहु विधि सब संता। इसका अर्थ है कि तुलसीदास के समय से या उसके पहले से ही यह बात ज्ञात है कि रामकथा के अलग अलग स्वरूप हैं। रामकथा की व्याप्ति इतनी अधिक है कि फिल्मों में भी अलग अलग रूपों में ये दिखती रही है। सचिन भौमिक और राज कपूर की मुलाकात का प्रसिद्ध किस्सा है। सचिन भौमिक काम की खोज में राज कपूर के पास पहुंचे थे। उनको अपनी कहानी सुनाई। देर तक राज कपूर ने कहानी सुनी और अंत में कहा कि आप चाहे जिस तरह से कहानी सुनाओ लेकिन इतना याद रखना कि फिल्मों में तो एक ही कहानी होती है, राम थे, सीता थीं और रावण आ गया। ये बात राज कपूर जैसे उत्कृष्ट कलाकार को समझ आती थी लेकिन वामपंथी लेखकों को नहीं। इसलिए रामानुजन का लेख कोई नई दृष्टि देनेवाला नहीं है, बल्कि वो अलग अलग जगह व्याप्त रामकथाओं को एक जगह समेटने की कोशिश मात्र है। रामानुजन के लेख में नया सिर्फ ये था कि उसमें तुलसीदास की उपेक्षा की गई। इस उपेक्षा की वजह से इस लेख को खास विचारधारा के लोगों ने पसंद किया था। 

तुलसीदास और उनकी रामकथा को लेकर तरह तरह की भ्रांतियां फैलाने की कोशिश समय समय पर होती रही हैं। खासतौर पर जब अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का आंदोलन जोर पकड़ने लगा तो वामपंथी लेखकों ने राम के अस्तित्व पर ही प्रश्न खड़ा करना आरंभ कर दिया। तुलसीदास को धार्मिक लेखक कहकर उनका मूल्यांकन करने लगे। वामपंथी लेखकों को इस बात में महारत हासिल है कि वो अपनी राजनीति के लिए किस उक्ति को चुनें और किसको छोड़ दें। किस विद्वान को उद्धृत करें और किसको उपेक्षित कर दें। तुलसीदास की रचनाओं को कमतर दिखाने के लिए उन्होंने इस प्रविधि का सहारा लिया। उन्होंने तो सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की राय को भी ओझल कर दिया। रामविलास शर्मा ने निराला की साहित्य साधना में लिखा है,अंग्रेजी और बांग्ला के अनेक कवियों के नाम गिनाने के बाद एक दिन निराला बोले- ‘इन सब बड़ेन क पढ़ित है तो ज्यू जरूर प्रसन्न होत है पर जब तुलसीदास क पढ़ित है तो सबका अलग धरि देइत है। हमार स्वप्न इहै सदा रहा कि गंगा के किनारे नहाय के भीख मांगिके रही और तुलसीदास कै पढ़ी। (इन सब बड़े लोगों को पढ़ता हूं तो मन प्रसन्न होता है, पर जब तुलसीदास को पढ़ता हूं तो सबको अलग रख देता हूं। हमारा हमेशा से यही स्वप्न रहा है कि गंगा किनारे स्नान करके भीख मांग के रहें और तुलसीदास को पढ़ें)। हिंदी के सबसे बड़े कवियों में से एक निराला का ये कथन वामपंथियों के सामने एक चुनौती थी लिहाजा इसको ओझल कर दिया गया। 

तुलसीदास की इस बात को लेकर आलोचना करने की कोशिश की गई कि वो महिलाओं के विरोधी थे और वर्णाश्रम व्यवस्था के पोषक थे। लेकिन यहां भी अगर समग्रता में देखें तो तुलसीदास के यहां महिलाओं को प्रतिष्ठित किया गया है और सभी को समान माना गया है। ऐसे कई पद श्रीरामचरितमानस में हैं। उनके लेखन में इतनी शक्ति है कि वो आलोचकों को लगातार चुनौती देते रहते हैं। तुलसीदास को जो टेक्सट है उसको पावर टेक्सट कहा जा सकता है। ऐसा टेक्सट जिसने पीढ़ियों को न केवल प्रभावित किया बल्कि उनको संस्कारित भी किया। तुलसीदास को समझने के लिए उसके सही अर्थों को उद्घाटित करने के लिए भारतीय संदर्भों को समझना होगा। रामायण के अलग अलग रूपों को उद्धृत करके और रामकथा के अलग अलग स्वरूपों को सामने रखकर तुलसीदास की काव्य प्रतिभा के तेज को कम नहीं किया जा सकता है। तुलसीदास ने अपने समय में उत्कृष्ट साहित्य रचा, ऐसा साहित्य जिसने देश की संस्कृति पर हो रहे हमलों का न केवल प्रतिकार किया बल्कि उसके खिलाफ उठ खड़े होने की प्रेरणा भी दी।