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Saturday, February 25, 2023

छद्म प्रतिरोध का स्थापत्य गढ़ता कवि

हिंदी के एक कवि हैं। नाम है अशोक वाजपेयी। पूर्व नौकरशाह हैं। महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय,वर्धा के कुलपति रहे हैं। प्रतिभाशाली इतने कि  अपने पूरे कार्यकाल में दिल्ली कार्यालय से वर्धा के विश्वविद्यालय का संचालन करते रहे। ललित कला अकादमी, नई दिल्ली के चेयरमैन रहे। अकादमी का उनका कार्यकाल विवादित रहा। कई तरह के आरोप लगे। सीबीआई जांच हुई। उनके कुछ संवेदनहीन बयान हिंदी साहित्य जगत में बहुधा गूंजते रहते हैं। भोपाल गैस त्रासदी के बाद दिया उनका बयान कि मरने वाले के साथ मरा नहीं जाता या हिंदी के लेखकों को मैंने पहली बार हवाई जहाज पर चढ़ाया अब भी हिंदी के लोगों के स्मरण में है। भोपाल गैस त्रासदी के बाद के बयान पर वो खेद प्रकट कर चुके हैं।2015 के बिहार विधानसभा चुनाव के पहले पुरस्कार वापसी अभियान के अगुवा रहे। अशोक वाजपेयी के बारे में ये चर्चा इस कारण क्योंकि उनके समर्थक एक बार फिर से उनकी जय-जयकार कर रहे हैं। प्रसंग ये है कि दिल्ली में अर्थ कल्चर फेस्टिवल के दौरान उनको काव्य पाठ के लिए आमंत्रित किया गया था। रेख्ता के सहयोग से आयोजित इस सत्र में अशोक वाजपेयी के अलावा अनामिका, बद्री नारायण, दिनेश कुशवाह और मानव कौल का नाम विज्ञापित किया गया था। यह फेस्टिवल के पहले दिन का अंतिम सत्र था। सत्र के आयोजन वाले दिन अशोक वाजपेयी ने इंटरनेट पर एक टिप्पणी लिखकर घोषणा की कि वो काव्य पाठ में शामिल नहीं होंगे। उन्होंने लिखा ‘मैं आज अर्थ और रेख्ता द्वारा आयोजित कल्चर फेस्ट में भाग नहीं ले रहा हूं क्योंकि मुझसे कहा गया कि मैं ऐसी ही कविताएं पढ़ूं जिसमें राजनीति या सरकार की सीधी आलोचना न हो। इस तरह का सेंसर अस्वीकार्य है।‘ इसके बाद उनके समर्थक इस टिप्पणी का स्क्रीन शाट लेकर फेसबुक पर लहालोट होने लगे जैसे अशोक वाजपेयी ने किसी क्रांति का शंखनाद किया हो। 

अशोक वाजपेयी के इंकार के बाद अष्टभुजा शुक्ल का नाम काव्य पाठ वाले सत्र में शामिल किया गया । अनामिका, बद्री नारायण, दिनेश कुशवाह और मानव कौल ने कविताएं पढ़ीं। साहित्य अकादमी पुरस्कार के लिए चयनित बद्री नारायण ने बताया कि उनको भी आयोजकों की तरफ से फोन आया था। फोन करनेवाले ने पूछा था कि वो किस तरह की कविताएं पढ़ेंगे। बद्री नारायण ने उनसे कहा कि वो हाशिए के लोगों को लेकर लिखी कविताओं का पाठ करेंगे।बात समापत हो गई। दिनेश कुशवाह को भी फोन कर पूछा गया था कि वो किस तरह की कविताएं पढ़ेंगे। उन्होंने तो आयोजकों को कहा कि वो जैसी कविताएं लिखते हैं वही पढ़ेंगे। उन्होंने जिज्ञासा भी प्रकट की कि ये प्रश्न क्यों पूछा जा रहा है। फोन करनेवाले ने बताया था कि ये सूचनाएं सत्र संचालक की सुविधा के लिए जुटाई जा रही हैं। बात खत्म हो गई। अब पता नहीं अशोक वाजपेयी को आयोजकों ने ऐसा क्यों कहा कि वो राजनीति या सरकार की सीधी आलोचना वाली कविता नहीं पढ़ें। वैसे अशोक वाजपेयी राजनीतिक कविता लिखने के लिए जाने भी नहीं जाते हैं। उनकी कविताओं का मूल स्वर तो प्रेम, प्रकृति और देह है। राजनीतिक कविताओं का तो वो उपहास ही करते रहे हैं। राजनीतिक कविताओं को लेकर उन्होंने एक बार टिप्पणी की थी कि इनमें अभिधा का आतंक होता है। ऐसे कवि से कोई भी आयोजक ये क्यों कहेगा कि वो राजनीति या सरकार की सीधी आलोचना वाली कविता न पढ़ें। वो भी रेख्ता जैसी संस्था जिनसे अशोक वाजपेयी का ना केवल परिचय रहा है बल्कि बहुत गहरे और पुराने संबंध भी। रेख्ता की तरफ से सफाई आई। उनकी तरफ से सिर्फ ये पूछा गया था कि अशोक जी किस विषय पर बोलने जा रहे हैं। रेख्ता की सफाई में ये भी कहा गया है कि उनकी तरफ से किसी विशेष कविता के नहीं पढ़ने या पढ़ने का कोई आग्रह नहीं किया गया था। रेख्ता के प्लेटफार्म पर तो जावेद अख्तर और कुमार विश्वास जैसे कवि अपनी कविताओं का पाठ करते रहे हैं और बहुधा राजनीतिक टिप्पणियां भी। रेख्ता का कहना है कि पूरा मसला चकित करनेवाला और अप्रसांगिक है। सचाई क्या है ईश्वर जानें। 

ऐसा प्रतीत होता है कि अशोक वाजपेयी किसी न किसी बहाने से चर्चा में बने रहने का बहाना ढूंढ़ते रहते हैं। वो हमेशा से राजनीति और सत्ता से दूर रहने का दंभ भी भरते रहे हैं। राजनेताओं के साथ मंच साझा करने को लेकर भी वो चुनिंदा स्टैंड लेते रहते हैं। किसी दल के नेता के साथ मंच साझा करने में उनको कोई आपत्ति नहीं होती है तो किसी दल के नेता के साथ वो मंच पर दिखना नहीं चाहते हैं। कई अवसरों पर उनको राजनेताओं के साथ देखा गया है, कई बार मंच पर भी। हाल ही में अशोक वाजपेयी ने राहुल गांधी की भारत-जोड़ो यात्रा में शामिल होकर अपनी प्रतिबद्धता को सार्वजनिक भी किया था। यहां वो कह सकते हैं कि ये राजनीतिक यात्रा नहीं थी लेकिन सचाई सबको पता है। लोकतंत्र में किसी को भी कहीं जाने या अपनी पसंद के दल के नेताओं के साथ दिखने की स्वतंत्रता है। अशोक वाजपेयी को भी है। जब पसंदीदा नेताओं या दल के मंच पर खड़ा होना है तो ये नैतिक स्टैंड खोखला लगता कि लेखकों को नेताओं से दूर रहना चाहिए। कांग्रेस पार्टी से उनके पुराने संबंध रहे हैं, हलांकि वो अपने लेखन में इसका साक्ष्य नहीं होने की बात करते हैं। लेखन में न सही लेकिन उनके क्रियाकलापों में तो ये निरंतर दिखता है। जब वो एक केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति थे तो गुजरात हिंसा के खिलाफ अभियान चलाया था। राष्ट्रपति को ज्ञापन आदि भी देने गए थे। अभी भी हर चुनाव के पहले चलनेवाले नरेन्द्र मोदी या भारतीय जनता पार्टी विरोधी हस्ताक्षर अभियान में उनके हस्ताक्षर दिख जाते हैं। वो इसको एक नागरिक के कर्तव्य के तौर पर प्रचारित करते हैं। उन्होंने ये स्वीकार भी किया है कि उनकी प्रशासनिक सेवाओं का दो तिहाई हिस्सा कांग्रेसी सरकारों के साथ काम करते हुए बीता है। इसमें वो ये जोड़ना नहीं भूलते कि वो सभी सरकारों को लोकतांत्रिक प्रणाली ने चुना था। प्रश्न ये उठता है कि 2014 से या उसके बाद जो सरकारें बन रही हैं क्या वो लोकतांत्रिक प्रणाली से नहीं चुनी जा रही हैं। 

अशोक वाजपेयी ने अपने एक साक्षात्कार में नामवर सिंह को अचूक अवसरवादी कहा था। उस साक्षात्कार में उन्होंने नामवर सिंह के विचलनों का साक्ष्य देने का दावा किया था। क्या राहुल गांधी के साथ उनकी पदयात्रा में शामिल होकर अशोक वाजपेयी ने स्वयं ये साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर दिया कि उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धता क्या है। पदयात्रा में शामिल होने को वो प्रतिरोध का स्थापत्य गढ़ना भी कह सकते हैं लेकिन उनकी पालिटिक्स हिंदी समाज को समझ आती है। बिहार विधानसभा चुनाव के पहले असहिष्णुता के नाम पर पुरस्कार वापसी अभियान चलाना भी उसी राजनीति का एक भाग था। अशोक वाजपेयी को उस समय आपत्ति नहीं हुई थी या कला संस्कृति पर कोई खतरा नजर नहीं आया था जब राजीव गांधी के शासनकाल में सलमान रश्दी की पुस्तक के आयात पर प्रतिबंध लगाया गया था। पुरस्कार वापसी जैसा कदम तब भी नहीं उठाया था जब मकबूल फिदा हुसैन ने भारत की नागरिकता छोड़ने का निर्णय लिया था। क्यों? क्योंकि तब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। दरअसल अशोक वाजपेयी प्रतिरोध का स्थापत्य तभी गढ़ते हुए दिखते हैं जब राजनीति या राजनीतिक स्थितियां उनके अनुकूल नहीं होती है। आज स्थितियां इस तरह की बन गई हैं कि अशोक वाजपेयी ने नामवर सिंह को जिस विशेषण से विभूषित किया था वो पलटकर उनपर ही चिपकता नजर आ रहा है। नामवर जी में हो सकता है विचलन हो लेकिन इनके कांग्रेस प्रेम में तो निरंतरता है। 

Saturday, February 18, 2023

सम्मेलन का स्वरूप बदलने की आवश्यकता


फिजी के शहर नांदी में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन समाप्त हो गया है। अड़तालीस वर्षों में विश्व हिंदी सम्मेलन ने बारह पड़ाव तय किए हैं। हर सम्मेलन के दौरान पारित प्रस्तावों पर नजर डालने से पता चलता है कि हिंदी भाषा को लेकर अलग अलग चिंताएं रही हैं। हर सम्मेलन में किसी न किसी रूप में हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाने की बात उठती ही रही है। इस बार भी दो तीन सत्रों में वक्ताओं ने इस विषय को उठाया। यह एक भावनात्मक मुद्दा है जिसको रोका नहीं जा सकता है, रोका जाना भी नहीं चाहिए। फिजी में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन में हिंदी को विश्व भाषा यानि हिंदी को बोलने-जानने वालों और उसके प्रति अनुराग रखनेवालों विश्व के सभी नागरिकों के बीच हिंदी को संपर्क और संवाद की भाषा के रूप में विकसित करने पर जोर दिया गया। अगर हम पिछले आयोजनों और उसके प्रस्तावों पर नजर डालते हैं तो यह बात थोड़ी ही अलग दिखती है। एक मंतव्य ऐसा भी है जिसकी चर्चा 2007 में भी हो चुकी थी और उसको फिर से दोहराया गया है। 13-15 जुलाई 2007 को अमेरिका के न्यूयार्क में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन के पारित मंतव्यों में से एक मंतव्य ये था कि विश्व हिंदी सचिवालय के कामकाज को सक्रिय एवं उद्देश्यपरक बनाने के लिए सचिवालय को भारत तथा विश्व के चार पांच अन्य देशों में इस सचिवालय के क्षेत्रीय कार्यालय खोलने पर विचार किया जाए। 2023 में कहा गया है कि विश्व सभ्यता को हिंदी की क्षमताओं का समुचित सहकार प्राप्त हो सके, इसके लिए यह सम्मेलन विश्व हिंदी सचिवालय को बहुराष्ट्रीय संस्था के रूप में विकसित करने तथा प्रशांत क्षेत्र सहित विश्व के अन्य भागों में इसके क्षेत्रीय केंद्र स्थापित करने की आवश्यकता का भी अनुभव कर रहा है। इसको देखकर ये लगता है कि नांदी में सम्मेलन का जो प्रतिवेदन विदेश राज्यमंत्री मुरलीधरन ने हिंदी प्रेमियों के समक्ष रखा उसको तैयार करनेवालों ने पर्याप्त तैयारी नहीं की। जो बिंदु सोलह वर्ष पहले आयोजित सम्मेलन के मंतव्य का हिस्सा रहा हो उसके ही शब्दों को थोड़ा बहुत बदलकर फिर से प्रतिवेदन का हिस्सा बनाना उचित नहीं कहा जा सकता है। इस तरह की कई चीजें फिजी के सम्मेलन में घटित हुईं जिसको लेकर विश्व हिंदी सम्मेलन के आयोजन के स्वरूप पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। 

वर्षों से विश्व हिंदी सम्मेलन का स्वरूप वही बना हुआ है। सम्मेलन में कुछ सत्र होंगे। हर सत्र में आठ-दस वक्ता होंगे । सभी अपनी-अपनी बात रखेंगे। कुछ पुस्तकों का विमोचन होगा। एक स्मारिका का प्रकाशन किया जाएगा। सम्मेलन के दौरान चार पन्ने का एक समाचार पत्र निकाला जाएगा। अब तकनीक ने बहुत से कामों को आसान कर दिया है तो इसके आयोजन और अन्य गतिविधियों को तकनीक आधारित किए जाने की आश्यकता है। उदाहरण के तौर पर अगर देखा जाए तो इस वर्ष सम्मेलन के दौरान जिस चार पन्ने के समाचार पत्र का प्रकाशन हुआ उसको अगर इलेक्ट्रानिक फार्मेट में बनाकर प्रतिदिन सभी प्रतिभागियों के व्हाट्सएप और ईमेल पर भेजने की व्यवस्था की जाती तो इसकी सार्थकता होती। उसके प्रकाशन पर आनेवाले खर्च को कम करके हिंदी भाषा के विकास पर खर्च किया जा सकता है। अगर इसका प्रकाशन इलेक्ट्रानिक फार्मेट में हो तो उसमें प्रतिदिन आयोजित होनेवाले सत्रों में हुई चर्चा को विस्तार से स्थान दिया जा सकता है। यह सम्मेलन के दौरान हुई चर्चा को भविष्य के लिए सहेज कर रखने का एक माध्यम भी हो सकता है। भविष्यय में इसका उपयोग संदर्भ सामग्री के रूप में हो सकता है। अगर ये इलेक्ट्रानिक फार्मेट में होगा तो इसकी पहुंच सम्मेलन स्थल से बाहर विश्व के अन्य देशों तक हो सकती है जहां के हिंदी प्रेमी सम्मेलन में क्या हो रहा है उसके बारे में जान समझ सकेंगे। तकनीक ने हमें अब ये सुविधा दे दी है कि प्रत्येक सत्र में हुई चर्चा के वीडियो को भी कहीं एक जगह अपलोड किया जाए ताकि दुनियाभर के हिंदीप्रेमी उसको देख सुन सकें। इसके लिए सबसे अच्छी जगह तो विश्व हिंदी सचिवालय की वेबसाइट ही हो सकती है। इस तरह के समन्वय के लिए आवश्यक है कि विश्व हिंदी सचिवालय को और सक्रिय भूमिका दी जाए। विश्व हिंदी सचिवालय की वेबसाइट पर वीडियो अपलोड करने का प्रविधान है लेकिन वहां एक आडियो फाइल अपलोड है। इस वेबसाइट को देखने के बाद ऐसा लगता है कि इसको एक ऐसे संपादक या व्यक्ति की आवश्कता है जो इसको अद्यतन रख सके। पहले ये तय भी था कि विश्व हिंदी सचिवालय की विश्व हिंदी सम्मेलनों के आयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका होगी लेकिन अबतक ऐसा हो नहीं सका है। विश्व हिंदी सचिवालय के अन्य केंद्र खोलने से अधिक आवश्यक है कि इस संस्था को ही अपेक्षाकृत अधिक सक्रिय किया जाए। वहां निरंतर कार्य हो और विश्व हिंदी सम्मेलन के दौरान हुई चर्चा और सम्मेलन की अनुशंसाओं के अनुपालन की प्रगति की समीक्षा की जाए। मेरी जानकारी के अनुसार पिछले विश्व हिंदी सम्मेलन की अनुशंसाओं के अनुपालन की समीक्षा के लिए कोई अधिकृत बैठक नहीं हो सकी है। अगर सम्मेलन में पारित प्रस्तावों या सुझावों को लेकर निरंतर कार्य नहीं होगा तो उसका कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। कुछ वर्षों के बाद फिर से उसी प्रस्ताव को पारित करने जैसी गलती संभव है। जैसा इस वर्ष हुआ।

विश्व हिंदी सम्मेलन को समय के साथ भी चलने की भी आवश्यकता है। यह अच्छा है कि फिजी में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस( कृत्रिम मेधा) पर चर्चा हुई लेकिन एक वक्ता को छोड़कर किसी ने भी गहराई से उसपर विचार नहीं किया। 2012 में दक्षिण अफ्रीका में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन के अवसर पर प्रकाशित स्मारिका में इसका उल्लेख था कि प्रगतिशील लेखक संघ ने भारत की सभी भाषाओं के लिए रोमन लिपि अपनाने का सुझाव दिया था, लेकिन देवनागरी लिपि समर्थकों ने ये कहते हुए उसे खारिज कर दिया था कि इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। आज रोमन लिपि हिंदी के सामने एक बड़े खतरे के रूप में उपस्थित है। हिंदी फिल्मों की दुनिया में लगभग सारा कार्य रोमन लिपि में होता है। एक दो अभिनेताओं को छोड़कर लगभग सारे अभिनेता स्क्रिप्ट से लेकर संवाद तक रोमन में पढ़ते हैं। इसके अलावा जो पीढ़ी उन्नत तकनीक के साथ बड़ी हो रही है उसकी भाषा भी न तो देवनागरी हो पा रही है न ही अंग्रेजी। वो अधिकतर रोमन में संवाद करते हैं और अब तो वाक्यों और शब्दों का स्थान चिन्हों ने ले लिया है। हिंदी के सामने जो इस तरह की व्यावहारिक चुनौतियां हैं उसपर विचार करना बेहद आवश्यक है। दूसरी बात ये है कि विश्व हिंदी सम्मेलन और इसके कर्ताधर्ताओं को युवाओं को इससे जोड़ने का उपक्रम करना चाहिए। सम्मेलन के सत्रों को लाइव प्रसारण हो और उसमें युवाओं की भागीदारी सुनिश्चित की जाए। उनके मन में उठने वाले प्रश्नों पर मंथन हो। कोई ऐसा तंत्र विकसित किया जाए कि पूरी दुनिया में हिंदी से प्रेम करनेवाले युवा इस सम्मेलन से आनलाइन माध्यम से जुड़ सकें। अंत में काका साहब कालेलकर की एक पंक्ति याद आ रही है जहां उन्होंने कहा था कि हिंदी को राष्ट्रभाषा के तौर पर अगर विजयी बनना है तो वह संस्कृत का सहारा छोड़ नहीं सकती है। उनका मानना था कि भारत के हरेक प्रदेश ने संस्कृत भाषा से, संस्कृत साहित्य से और संस्कृत की शब्द शक्ति से लाभ उठाया है। संस्कृत संस्कृति ही भारतीय संस्कृति का प्राण है। संस्कृत की मदद के बिना भारत की कोई भाषा पनप नहीं सकती है। विश्व हिंदी सम्मेलन के आयोजकों को, विश्व हिंदी सचिवालय को काका कालेलकर की बातों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। 

Friday, February 10, 2023

आक्रांताओं के कारण प्रवेश पर पाबंदी


पिछले दिनों दक्षिण भारत की यात्रा पर गया था। यात्रा के दौरान त्रिवेन्द्रम स्थित श्रीपद्मनाभस्वामी मंदिर में दर्शन करके परिसर के उत्तरी गेट से बाहर निकल रहा था। गेट पर पहुंचकर देखा कि एक विदेशी महिला और पुरुष गेट पर तैनात सुरक्षाकर्मी से कुछ अनुरोध कर रहे थे। वो बार बार अंग्रेजी में कुछ कह रहे थे और सुरक्षाकर्मी सिर्फ नो नो (नहीं-नहीं) कह रहे थे। हम उनकी बात सुनने के लिए रुक गए। जिज्ञासा थी कि सुरक्षाकर्मी किस बात के लिए मना कर रहे हैं और विदेशी पर्यटक का आग्रह क्या है। जब हम रुके तो सुरक्षाकर्मी उनसे कह रहे थे ओनली हिंदू। ये सुनकर विदेशी पर्यटक ने कहा कि आई एम अ हिंदू, आई डू योगा। आई नो कृष्णा, आई नो रामा एंड आई विलीव इन गाड। (मैं हिंदू हूं, मैं योग करता हूं और राम और कृष्ण को जानता हूं। मैं भगवान में विश्वास करता हूं।) इतना सुनने के बाद भी सुरक्षाकर्मी सहमत नहीं हो रहे थे और बार बार उनसे कह रहे थे कि ओनली हिंदू कैन गो ( सिर्फ हिंदू ही मंदिर परिसर में जा सकते हैं)। विदेशी पर्यटक लगातार हिंदू धर्म के बारे में अपनी जानकारी सुरक्षाकर्मियों से साझा कर रहे थे। अब उसके साथ की महिला ने भी कहना आरंभ कर दिया था कि वो भी योग करती है इसलिए वो भी हिंदू है। हमने हस्तक्षेप करने का प्रयास किया लेकिन सुरक्षाकर्मी टस से मस नहीं हो रहे थे। थोड़ी देर तक दोनों की बातें सुनने के बाद सुरक्षाकर्मियों ने उनको अपने उच्चाधिकारियों के पास भेज दिया। पता नहीं उनको श्रीपद्मनाभस्वामी के दर्शन करने का सौभाग्य मिला या नहीं। जब हम कोच्चि के डच पैलेस के अंदर श्रीमहाविष्णु मंदिर पहुंचे तो मंदिर के बाहर बोर्ड लगा था, ओनली हिंदूज आर अलाउड इनसाइड द टैंपल (मंदिर में सिर्फ हिंदूओं के प्रवेश की अनुमति है)। वहां भी विदेशी पर्यटक मंदिर के गेट तक जा रहे थे और बोर्ड देखकर वापस हो रहे थे।

इन दो मंदिरों को देखने के बाद मन में ये प्रश्न उठा कि मंदिरों में गैर-हिंदुओं का प्रवेश वर्जित क्यों है। जबकि कहा ये जाता रहा है कि हिंदू धर्म, उपासना की पद्धति भर नहीं है, वह एक समग्र जीवन दर्शन और व्यवहार प्रक्रिया है। उसमें सकारात्मक स्वीकृतियों के साथ निषेधात्मक पक्षों के उन्नयन की गंभीर दृष्टि होती है। ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद से लेकर छांदोग्योपनिषद तक में धर्म के अर्थ को स्पष्ट किया गया है। ऋगवेद में तो धर्म का अर्थ निश्चित नियम या आचरण के तौर पर उल्लिखित है। ऋगवेद और अथर्ववेद में धर्मन् शब्द का उपयोग कई बार मिलता है। जैमिनी की परिभाषा के अनुसार वेदों में प्रयुक्त अनुशासनों के अनुसार चलना ही धर्म है। धर्म का संबंध उन क्रिया-संस्कारों से है, जिनसे आनंद मिलता है और जो वेदों द्वारा प्रशंसित और प्रेरित हैं। मनुस्मृति में भी कहा गया है आचार: परमो धर्म:। धर्म की परिभाषा को लेकर, इसको उपादानों को लेकर, इसके सूत्रों को लेकर, इसके सूत्रग्रंथों को लेकर विपुल सामग्री उपलब्ध है। लेकिन कहीं भी धर्म का अर्थ उपासना पद्धति नहीं मिलता है। धर्म को जीवन जीने की पद्धति के तौर पर ही देखा गया है। अगर हिंदू धर्म को जीवन जीने की पद्धति माना गया है तो उन विदेशियों का क्या किया जाए जो ये कहते हैं कि उनका तो हिंदू धर्म में विश्वास है, वो राम और कृष्ण में भी विश्वास रखते हैं। क्या वो मंदिरों में प्रवेश कर सकते हैं। इस बारे में व्यापक हिंदू समाज को विमर्श करना चाहिए। 

उससे भी महत्वपूर्ण ये जानना है कि हिंदू मंदिरों में गैर-हिंदुओं का प्रवेश निषेध क्यों किया गया था। मंदिरों में केवल हिंदुओं को ही प्रवेश देने की व्यवस्था क्यों की गई थी। आज के संदर्भ में अगर इस प्रश्न को पूछा जाएगा तो जो खुद को कथित उदारवादी परंपरा के लेखक मानते हैं उनमें से अधिकतर इसका उत्तर जातिप्रथा और धर्मशास्त्रों में निर्दिष्ट जीवनपद्धतियों की एकांगी व्याख्या के आधार पर देंगे। कोई इसके लिए आर्य-अनार्य के सिद्धांत का सहारा लेगा तो कोई वर्ण या जाति व्यवस्था को इसका आधार बनाकर अपनी विद्वता का परिचय देने का प्रयास करेगा। क्या इस तरह के विचारों या तर्कों से सहमत हुआ जा सकता है। बिल्कुल नहीं। मंदिरों में गैर हिंदुओं के प्रवेश पर पाबंदी लगाने के पीछे का सबसे बड़ा कारण रहा है विदेशी आक्रांताओं का मंदिरों पर हमला कर उसको तोड़ना, वहां संचित धन को लूटना और समाज के सांस्कृतिक केंद्र को तहस नहस करना। भारतीय संस्कृति में मंदिरों को विशिष्ट स्थान प्राप्त है। मंदिरों से नृत्य और कला का गहरा जुड़ाव रहा है। मुगल आक्रांताओं ने जब हमारे देश पर हमला किया और तो उनको मंदिरों की सामाजिक और सांस्कृतिक महत्ता का अनुमान हो गया था। ये अकारण नहीं है कि मुगलकाल में मंदिरों पर हमले हुए, मंदिरों को तोड़ा गया। मुगलों ने मंदिरों को तोड़कर सिर्फ हिंदुओं की आस्था को नहीं तोड़ा बल्कि उन्होंने भारतीय समाज के उस केंद्र को नष्ट करने का प्रयास किया जहां लोग संगठित होते थे। मुगलों ने मंदिरों के रूप में स्थापित सामाजिक और सांस्कृतिक केंद्रों को तोड़कर भारतीय समाज को कमजोर करने का प्रयत्न किया था। समाज की ताकत पर प्रहार किया। भारतीय कला लोक के केंद्र मंदिर हुआ करते थे। जनता की आकांक्षाएं और उसके स्वप्न उन्हीं कलाओं में खुलते और खिलते थे। उत्तर भारत में मुगलों का प्रभाव रहा और वो सुदूर दक्षिण भारत तक अपना साम्राज्य स्थापित नहीं कर पाए थे तो इस कारण दक्षिण भारत के मंदिर उनसे सुरक्षित रहे। जब उत्तर भारत के मंदिरों को तोड़े जाने और उसको नष्ट करने की खबरें दक्षिण भारत तक पहुंची होंगी तो मंदिरों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर पाबंदी लगा दी गई होगी। इन बातों का प्रमाण को ढूंढे जाने की आवश्यकता है। दक्षिण भारत के मंदिर के पुजारियों या वहां पीढ़ियों से रह रहे सेवादारों से बात करने पर इस तरह की बातें सामने आती हैं। उत्तर और पश्चिम भारत के मंदिरों में भी गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर पाबंदी लगाने का प्रयास हुआ। कई मंदिरों में इस तरह की पाबंदी लगाई भी गई। उसके पीछे के कारण भी यही रहे कि मुगलों की सेना ने कई बार छलपूर्वक मंदिरों में प्रवेश करके उसको तोड़ने का कार्य किया। 

मुगलों के पराभव के बाद और अंग्रेजी राज के उदय के समय और कालांतर में उनके शासनकाल में भी मंदिरों का पौराणिक स्वरूप स्थापित नहीं हो सका। इसका कारण ये रहा कि मंदिरों पर अंग्रेज शासकों की लगातार नजर रहा करती थी। वहां होने वाली गतिविधियों पर, वहां होनेवाले धन संचय पर भी अंग्रेज नजर रखते थे। उनको लगता था कि मंदिर ही स्वाधीनता की गतिविधियों के केंद्र हो सकते हैं। अंग्रेजों ने मंदिरों के सामाजिक और सांस्कृतिक स्वरूप को बदलने का प्रयत्न किया और मंदिरों को सिर्फ धार्मिक केंद्र के रूप में प्रचारित करना आरंभ कर दिया। उनके सांस्कृतिक स्वरूप और सामाजिक भूमिका पर पाबंदियां लगाई गईं। अंग्रेजी शासन वाले कालखंड में धर्म से जुड़ी बातों को तोड़ा मरोड़ा गया। आधुनिक और अंग्रेजी शिक्षा के नाम पर धर्म की गलत व्याख्या करके उसको रिलीजन बनाकर आनेवाली पीढ़ियों के मानस में स्थापित कर दिया गया।

हिंदू समाज बहुत उदार रहा है और इसके अंदर से ही रूढ़ियों को खत्म करने को लेकर सुधारवादी पैदा होते रहे हैं। उन्होंने हिदू समाज में समय के साथ कई तरह के सुधार किए। इस तरह के कई मंदिर मिलेंगे जहां पहले गैर हिंदुओं का प्रवेश वर्जित था लेकिन वहां अब इस नियम में ढील दे दी गई है और हर तरह के धर्मावलंबी उन मंदिरों में जा रहे हैं। ये उदारवादी दृष्टि समयानुसार व्यापक होती रहती है। 


Saturday, February 4, 2023

तकनीक से समृद्ध होगी संस्कृति


एक फरवरी को केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद में बजट पेश किया। बजट पर चर्चा हो रही थी। अचानक एक सज्जन का फोन आया। कहने लगे कि इस बार प्रकाशन जगत के लिए सरकार ने कुछ नहीं किया। उल्टे डिजीटल पुस्तकालयों की घोषणा करके पुस्तक व्यवसाय के लिए एक नई चुनौती खड़ी कर दी है। इतना कहने के बाद उन्होंने कहा कि हिंदी के एक शीर्ष प्रकाशक की बजट पर प्रतिक्रिया भेज रहे हैं, उसको देख लीजिएगा। उनके फोन रखते ही हमने मेल चेक की तो प्रकाशक महोदय की हिंदी और अंग्रेजी में बजट पर प्रतिक्रिया थी। बजट में प्रकाशन जगत की उपेक्षा पर वो झुब्ध नजर आ रहे थे। इसके अलावा उन्होंने डिजीटल पुस्तकालयों की घोषणा की भी आलोचना की थी और कहा था कि कोरोना के समय से संकटग्रस्त प्रकाशन व्यवसाय को सरकार की इस पहल से झटका लगेगा। यात्रा पर होने की वजह से बजट भाषण सुन नहीं पाया था। प्रकाशक महोदय की प्रतिक्रिया पढ़ने के बाद ये जानने की इच्छा हुई कि बजट में ऐसी क्या घोषणा हुई है जिसपर हिंदी के इस शीर्ष प्रकाशक ने इतनी कठोर प्रतिक्रिया दी है।

इस बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बच्चों और किशोरों के लिए नेशनल डिजीटल लाइब्रेरी बनाने की घोषणा की। अपनी घोषणा में वित्त मंत्री ने स्पष्ट किया कि इस डिजीटल पुस्तकालय में सभी भाषाओं और विषयों की उत्कृष्ट पुस्तकें होंगी। सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा कि वो पंचायत और वार्ड स्तर पर पुस्तकालयों की स्थापना करें। इन पुस्तकालयों में इस तरह की व्यवस्था की जाए कि बच्चे और किशोर वहां बैठकर नेशनल डिजीटल लाइब्रेरी की पुस्तकों तक पहुंच सकें। इसके साथ ही वित्त मंत्री ने कहा कि सरकार देश में पढने की संस्कृति का विकास करने के लिए गैर सरकारी संगठनों के साथ मिलकर हर आयुवर्ग के छात्रों के लिए पठनीय सामग्री उपलब्ध करने का प्रयास करेगी। इस कार्य में राष्ट्रीय पुस्तक न्यास और चिल्ड्रन बुक ट्रस्ट का सहयोग भी लिया जाएगा। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास से अपेक्षा की गई है कि वो नेशनल डिजीटल लाइब्रेरी के लिए सभी भारतीय भाषाओं में उत्कृष्ट पुस्तकें उपलब्ध कराए। नेशनल डिजीटल लाइब्रेरी में सिर्फ पुस्तकें ही नहीं होंगी बल्कि किशोरों और बच्चों को कई अन्य चीजें सीखने को मिलेंगी। ये डिजीटल पुस्तकालय शिक्षा मंत्रालय के अधीन होगा। 

अवधारणा के स्तर पर नेशनल डिजीटल लाइब्रेरी की स्थापना एक बेहतर प्रयास दिखाई देता है। इसको आरंभ करके उत्कृष्टता प्रदान करने के लिए शीघ्रता से कार्य करना होगा। यह प्रयास राष्ट्रीय शिक्षा नीति को भी बल प्रदान कर सकता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में स्कूलों में जिस तरह से भारतीय भाषाओं को वरीयता देने की बात की गई है उसको लागू करने में भी डिजीटल लाइब्रेरी सहायक हो सकता है। पिछले बजट में सरकार ने देश में एक डिजीटल विश्वविद्यालय की स्थापना की घोषणा की थी। तब ये कहा गया था कि इस विश्वविद्लाय की स्थापना से छात्रों को लाभ होगा और वो कहीं से बैठकर उत्कृष्ट शिक्षा प्राप्त कर सकेंगे। एक वर्ष बीतने के बाद अभी तक उस विश्वविद्यालय को शुरू नहीं किया जा सका है। कहा जा रहा है कि इस वर्ष जून जुलाई तक ये विश्वविद्लय अस्तित्व में आ जाएगा। इसी तरह से कुछ वर्षों पूर्व इंडियन इंस्टीट्यूट आफ हेरिटेज की स्थापना की बात की गई थी। उसको लेकर कई बैठकें हुईं। समितियां भी बना दी गईं, लेकिन उस घोषणा का क्या हुआ ये अभी तक सार्वजनिक नहीं हो सका है। उस समय दावा किया गया था कि संस्कृति के क्षेत्र में ये आईआईएम और आईआईटी की तरह कार्य करेगा। इसका आरंभ नहीं होना या इसपर धीमी गति के काम होना चिंताजनक है। खैर ये संस्कृति मंत्रालय से जुड़ा मामला है, इसपर फिर कभी विस्तार से चर्चा होगी। 

अभी हम बात कर रहे थे नेशनल डिजीटल लाइब्रेरी की। हमें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि नेशनल डिजीटल लाइब्रेरी की स्थापना के साथ राज्यों में हर पंचायत और वार्ड में पुस्तकालय की स्थापना की बात भी की गई है। इस समय प्रकाशन जगह की जो स्थिति है उसमें प्रकाशकों से ये अपेक्षा करना व्यर्थ है कि वो पंचायतों तक पुस्तकों को पहुंचाने की कोई योजना बनाकर उसको साकार करें। पुस्तकों की पाठकों तक पहुंच इस वक्त प्रकाशन जगत की सबसे बड़ी समस्या है। प्रकाशकों तक की तरफ से इस समस्या को दूर करने की कोई कार्ययोजना सामने नहीं आई है। ग्राम पंचायत तो बहुत दूर की बात है महानगरों में भी पुस्तकों की दुकानें बहुत कम हैं। पुस्तकों की उपलब्धता भी। ऐसे वातावरण में नेशनल डिजीटल लाइब्रेरी की सहायता से देश के हर पंचायत में बच्चों और किशोरों तक अपने देश का साहित्य और इतिहास पहुंचाया जा सकता है। उनको अपने गौरवशाली अतीत और वर्तमान की उपलब्धियों के बारे में आसानी से बता सकते हैं।  

दूसरा एक और लाभ नेशनल डिजीटल लाइब्रेरी का है जिसको रेखांकित किया जाना बेहद आवश्यक है। बजट घोषणा में ये भी कहा गया है कि इसमें बच्चों औ किशोरों के लिए प्रचुर मात्रा में साहित्य और पठनीय सामग्री उपलब्ध होगी। अगर हम सिर्फ हिंदी की बात करें तो यहां बाल साहित्य बहुत कम मात्रा में उपलब्ध है। बाल साहित्य न तो लेखकों की प्राथमिकता में है और न ही प्रकाशकों की। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि हिंदी में बाल साहित्य लेखन पूरी तरह से उपेक्षित है। बच्चों की जो पत्रिकाए निकला करती थीं वो बंद हो चुकी हैं। एक दो पत्रिकाओं का प्रकाशन हो रहा है लेकिन उनकी पहुंच पाठकों तक नहीं बन पा रही है। हिंदी में बाल साहित्य की कमी को लकर कभी-कभार गोष्ठियों और सेममिनारों में चिंता तो व्यक्त की जाती है लेकिन इस कमी को दूर करने का कोई गंभीर प्रयास नहीं दिखाई देता है। हिंदी के लेखक एक विशेष विचारधारा के वशीभूत होकर खास प्रकार का साहित्य लिखते रह गए। उनका अधिक ध्यान समाज में फैले कथित असामनता, गरीबी और मजदूरों की समस्या पर रहा और वो इन्हीं विषयों को केंद्र में रखकर लिखते रह गए। अब अगर नेशनल डिजीटल लाइब्रेरी को समृद्ध करने के लिए राष्ट्रीय पुस्तक न्यास और चिल्ड्रन बुक ट्रस्ट की ओर से पहल की जाती है तो हिंदी की इस कमी को पूरा करने की दिशा में प्रयास आरंभ हो सकता है। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास बच्चों को ध्यान में रखकर पुस्तकें लिखवा सकता है।        

ज्ञान के साथ साथ संस्कृति के विकास और उसको मजबूत करने में भी डिजीटल लाइब्रेरी उपयोगी हो सकती है। संस्कृति को मजबूत करने के लिए यह आवश्यक है कि नई पीढ़ी के लोग अपनी विरासत के बारे नें विस्तार से जानें। नेशनल डिजीटल लाइब्रेरी भारत की सांस्कृतिक विरासत को हर ग्राम पंचायत तक पहुंचाने का एक उपक्रम भी बन सकता है। रही बात प्रकाशकों को इस पहल से चुनौती की तो तकनीक कभी भी किसी व्यवस्या के लिए चुनौती बनकर नहीं आती है बल्कि वो उस व्यवसाय के लिए संभावनाओं के नए द्वार खोलती है। जब देश में कंप्यूटर आया था तो कई दलों के लोगों ने इसका ये कहते हुए विरोध किया था कि इससे बेरोजगारी बढ़ेगी लेकिन कालांतर में कंप्यूटर की उपयोगिता हर क्षेत्र में बढ़ी और इसने रोजगार की असमीति संभावनाओ को जन्म दिया। प्रकाशकों के सामने भी अब इस डिजीटल लाइब्रेरी के लिए बच्चों और किशोरों के लिए पुस्तकें उपलब्ध करवाने की चुनौती होगी। ऐसा नहीं है कि छपी हुई पुस्तकों की महत्ता खत्म हो जाएगी लेकिन इसका डिजीटल स्वरूप आने और उसकी लाइब्रेरी बनने से उसकी व्याप्ति बढ़ेगी। अगर पुस्तकों की व्याप्ति बढ़ती है तो प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से प्रकाशकों को ही लाभ होगा। जरूरत इस बात की है कि प्रकाशक तकनीक को अपने व्यावसायिक हितों के लिए उपयोग करें।