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Saturday, May 16, 2026

इतिहास लेखन की बाधा स्लीपर सेल


इतिहास एक ऐसा विषय है जिसकी चर्चा भारतीय राजनीति में निरंतर होती रहती है। भारतीय राजनीतिक दल हमेशा एक दूसरे पर दोषारोपण करने में अबतक लिखे इतिहास का सहारा लेते रहते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भारतीय इतिहास को समग्रता में देखे और लिखने की बात प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से कई बार कर चुके हैं। गृहमंत्री अमित शाह ने कुछ वर्षों पहले काशी की एक गोष्ठी में कहा था कि इतिहास लेखन में दूसरे की गलतियों को रेखांकित करने से बेहतर होगा कि अपनी लकीर लंबी की जाए। कहना ना होगा कि देश का शीर्ष नेतृत्व भारतीय इतिहास को समग्रता में लिखे जाने और देश की जनता के समक्ष प्रस्तुत किए जाने की अपेक्षा करता है। 2014 में जब नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने तब से वामपंथी इतिहास लेखन की जगह भारतीय दृष्टि से इतिहास लेखन की बात की जाने लगी थी। नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के करीब चार वर्ष बाद 2018 में भारत के समग्र इतिहास लेखन का सोच भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (इंडियन काउंसिल आफ हिस्टारिकल रिसर्च- आईसीएचआर) में आया। चार वर्षों तक वहां इसपर मंथन होता रहा। इस बीच देश की जनता ने एक बार फिर से नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी को लोकसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत दिया। 2022 में भारत के समग्र इतिहास की योजना पर कार्य आरंभ हुआ। उस समय के समाचार पत्रों में आईसीएचआऱ के चैयरमैन राघवेन्द्र तंवर के हवाले से ये बातें प्रकाशित हैं कि आईसीएचआर भारत के समग्र इतिहास के प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है। वामपंथी इतिहासकारों ने इसको इतिहास के पुनर्लेखन से जोड़कर इसकी आलोचना आरंभ कर दी। एक वामपंथी सांसद ने 2022 के दिसंबर में संसद में इसपर प्रश्न भी उठाया। शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने उस प्रश्न के उत्तर में सदन को बताया था कि इतिहास का पुनर्लेखन नहीं किया जा रहा है। आईसीएचआर ने भारत के समग्र इतिहास लेखन पर एक प्रोजेक्ट आरंभ किया है। कांग्रेस सांसद मनीषे तिवारी ने भी इस पर प्रश्न उठाया था।

प्रश्न ये नहीं है कि इतिहास का पुनर्लेखन किया जा रहा है या इतिहास लेखन के एकांगी प्रविधि से उत्पन्न रिक्त स्थानों की पूर्ति के लिए इतिहास लिखा जा रहा है। प्रश्न ये है कि आईसीएचआर ने 2018 में जो सोचा वो आठ वर्षों बाद भी भौतिक रूप से आकार नहीं ले सका है। अब तक भारत के समग्र इतिहास का एक भी खंड प्रकाशित नहीं हो पाया है। जबकि इसके लिए एक बोर्ड का गठन किया गया था। इस प्रोजेक्ट के लिए इतिहासकार सुष्मिता पांडे की नियुक्ति संपादक के पद पर की गई थी। उनके साथ प्रधानमंत्री मेमोरियल लाइब्रेरी से नरेन्द्र शुक्ल को प्रतिनियुक्ति पर लाकर इस प्रोजेक्ट से जोड़ा गया । दो और युवा विद्वानों को इस प्रोजेक्ट से जोड़ा गया था। नरेन्द्र शुक्ल वापस जा चुके हैं। कहना ना होगा कि इस प्रोजेक्ट से जुड़े लोगों के वेतन आदि का खर्च तो आईसीएचआर उठा ही रहा है। इस बीच आईसीएचआर के सदस्य सचिव रहे उमेश कदम पर 2022 में गंभीर वित्तीय अमियमितता के आरोप लगे। वो यहां से कार्यमुक्त हो गए। भारत के समग्र इतिहास के पहले खंड पर कार्य आरंभ हो चुका था। इस प्रोजोक्ट से जुड़े लोगों ने बताया कि उमेश कदम ने पदमुक्त होने के बाद पत्र लिखकर आईसीएचआर को अपने लिखित कार्यों के उपयोग से रोक दिया था। पहले खंड के लिए उन्होंने मध्यकालीन इतिहास पर लिखा था। उसकी जगह नए व्यक्ति की खोज करना और लिखवाने में समय लगा, बताया गया। इस बात को भी चार वर्ष बीत गए। अभी तक पहला खंड नहीं आ पाना आईसीएचआर की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल है। प्रभारी सचिव ओमजी उपाध्याय को आशा है कि जल्द ही पहला खंड प्रकाशित हो जाएगा। अगर ये मान भी लिया जाए कि 2022 में ये प्रोजेक्ट जमीन पर उतरा और पहला खंड 2026 में आ जाएगा तो इस हिसाब से तो आठ खंड को प्रकाशित होने में 32 वर्ष लगेंगे।

इस प्रोजेक्ट से जुड़े लोगों के अनुसार ये तय हुआ था कि भारत का समग्र इतिहास का पहला खंड परिचयात्मक होगा। इस खंड में भारत के समग्र इतिहास लेखन की आवश्यकता को स्थापित किया जाएगा। इस बात की चर्चा होगी कि भारत के इतिहास लेखन का आधार भू-राजनीतिक न होकर भू-सांस्कृतिक होगा। पहला खंड दो-ढाई सौ पृष्ठों का होना था। बढ़ते बढ़ते वो करीब ग्यारह सौ पृष्ठों का हो गया। इसके प्रकाशन के बारे में जानकारी लेने पर पता चला कि ग्यारह सौ पन्नों के पहले खंड को तीन विशेषज्ञों के पास भेजा गया है। उनसे अनुरोध किया गया है कि वो इसका मूल्यांकन करके अपनी राय दें। विशेषज्ञों के लिखे हुए को विशेषज्ञों से मूल्यांकन करवाने की क्या आवश्यकता है। क्या आईसीएचआर को इस प्रोजेक्ट से जुड़े विशेषज्ञों पर भरोसा नहीं है। इस प्रोजेक्ट की संपादक सुष्मिता पांडे विदुषी हैं। आईसीएचआर के अध्यक्ष राघवेन्द्र तंवर स्वयं विद्वान इतिहासकार हैं। ऐसे में मूल्यांकन के लिए बाहर के विद्वानों के पास भेजने की आवश्यकता क्यों ? इस बात पर भी विचार किया जाना चाहिए अगर पहला खंड परिचयात्मक और इस प्रोजेक्ट की आवश्यकता बताने वाला है तो ग्यारह सौ पृष्ठों का भारी भरकम खंड क्यों? क्या ये खंड दो-ढाई सौ पृष्ठों का नहीं होना चाहिए जो पहले तय किया गया था। तय तो ये भी किया जाना चाहिए कि ये प्रोजेक्ट कब तक पूरा होगा? क्या अनंत काल तक इस प्रोजेक्ट को चलाया जाना उचित रहेगा? क्या आईसीएचआर इसको निश्चित समय सीमा में पूरा नहीं कर सकता है। बहुत संभव है कि आईसीएचआर में अब भी वामपंथियों के स्लीपर सेल सक्रिय हों और इस प्रोजेक्ट को अपने आकाओं के कहने पर लटकाने का उपक्रम कर रहे हों। ये देखना तो अध्यक्ष का काम है कि ये प्रोजेक्ट समय पर पूरा हो। आईसीएचआर में गड़बड़ियों का समाचार भी आता रहता है. चाहे वो मदर आफ डेमोक्रेसी पुस्तक का प्रकाशन हो या सुभाषचंद्र बोस नाम की पुस्तक का गलत शीर्षक प्रकाशन का मसला हो।

दरअसल आईसीएचआर की समस्या बौद्धिक कम प्रशासनिक अधिक प्रतीत होती है। 2022 में उमेश कदम के पद छोड़ने के बाद से वहां स्थायी सदस्य सचिव नहीं हैं। पिछले वर्ष मई में अल्केश चतुर्वेदी को मंत्रालय ने सदस्य सचिव नियुक्त किया लेकिन वो इस पद पर अपना योगदान नहीं दे सके। कारण मंत्रालय और आईसीएचआर बेहतर बता सकते हैं। कुछ दिनों पूर्व फिर से सदस्य सचिव पद के लिए इंटरव्यू हुआ। पैनल तय करके नाम मंत्रालय भेज दिए गया लेकिन अबतक किसी की नियुक्ति नहीं हो सकी। अब तो ये भी संदेह होता है कि आईसीएचआर के उच्च पदों पर बैठे लोग ही नहीं चाहते हैं कि वहां सदस्य सचिव के पद पर कोई स्थायी नियुक्ति हो। अगर सदस्य सचिव आ जाते हैं तो वो संस्था को चलाएंगे, इससे यथास्थितिवादियों को परेशानी हो सकती है। लेकिन चार वर्षों से इतनी महत्वपूर्ण संस्था में सदस्य सचिव का नहीं होना शिक्षा मंत्रालय के निर्णय लेने की क्षमता पर भी प्रश्न खड़े करता है। आईसीएचआर ऐसी संस्था है जिसकी सक्रियता प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नीतियों को उनकी अपेक्षाओं को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है। बशर्ते कि सक्रिय हो।    

Saturday, November 8, 2025

इतिहास लेखन में प्रशासनिक ढिलाई


भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत एक स्वायत्त संस्था है भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद (इंडियन काउंसिल आफ हिस्टोरिकल रिसर्च यानि आईसीएचआर)। इसकी वेबसाइट पर इस संस्था के उद्देश्य का वर्णन है- भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद का प्राथमिक उद्देश्य ऐतिहासिक शोध को बढ़ावा देना और उसे दशा देना तथा इतिहास के वस्तुनिष्ठ एवं वैज्ञानिक लेखन को प्रोत्साहित और पोषित करना है। चौबीस बिंदुओं में विस्तार से वर्णित इस संस्था के उद्देश्यों में अंतिम उद्देश्य है समान्यत: देश में ऐतिहासिक अनुसंधान और उसके उपयोग को बढ़ावा देने के लिए समय-समय पर आवश्यक समझे जानेवाले सभी उपाय करना। अंतिम उद्देश्य का दायरा बहुत विस्तृत है। इस संस्था के शीर्ष पर एक अध्यक्ष होते हैं और एक सदस्य सचिव। 2022 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर उमेश अशोक कदम को आईसीएचआर के सदस्य सतिव के तौर पर नियुक्त किया गया था। वो अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके। वित्तीय अनियमितताओं के आरोप में करीब नौ महीने तक ही इस पद पर बने रह सके। प्रकाशित खबरों के मुताबिक वित्तीय अनियमितता के आरोप इतने गंभीर थे कि मंत्रालय ने लंबे समय तक संस्था को आर्थिक मदद रोक दी थी। पता नहीं उन वित्तीय अनियमिततताओं की जांच हुई या जांच पूरी नहीं हो पाई है। कोई दोषी पाया जा सका या नहीं। 

उमेश अशोक कदम जी के पद छोड़ने के बाद से ही आईसीएचआर में कार्यवाहक सदस्य-सचिव हैं। लंबे अंतराल के बाद शिक्षा मंत्रालय ने 1 मई 2025 को आईसीएचआर के अध्यक्ष को एक पत्र (एफ नंबर-3-15/2013-U.3) लिखकर सूचित किया कि प्रो अल्केश चतुर्वेदी को सदस्य सचिव के पद पर नियुक्त किया जा सकता है। पत्र के समय अल्केश चतुर्वेदी सांची विश्वविद्यालय में कुलसचिव थे। इस पत्र में आईसीएचआर के अध्यक्ष के पत्र संख्या एफ-1.1/2024/सीएचएमएन/आईसीएचआर दिनांक 9.11.2024 का हवाला देते हुए कहा कि मंत्रालय के सक्षम अधिकारी ने प्रो अल्केश चतुर्वेदी के सदस्य सचिव पद पर नियुक्ति को मंजूरी दे दी है। पहली नजर में ये पत्र सामान्य नियुक्ति पत्र लगता है लेकिन इसके तीसरे बिंदु में एक पेंच है। इस बिंदु में लिखा गया है कि आपसे अनुरोध किया जाता है कि नियुक्ति निर्देश जारी करें और इस क्रम में आईएचआर के नियमों का पालन करें। इसके बाद की पंक्ति को रेखांकित किया जाना चाहिए। इसमें कहा गया है कि नियुक्ति पत्र जारी करने के पहले संबंधित व्यक्ति के विजिलेंस क्लीयरेंस का ध्यान रखा जाए। पहली नजर में यह भी सामान्य बात लगती है, लेकिन इस पत्र में कहीं नहीं कहा गया है कि चयनित व्यक्ति के विजिलेंस क्लीयरेंस की प्रतीक्षा आईसीएचआर कब तक करे। इसके लिए कोई समय सीमा तय नहीं कि गई। दूसरा प्रश्म उठता है कि क्या चयन समिति ने जब इनके नाम पर विचार किया था या जब आईसीएचआर के अध्यक्ष ने इनके नाम की संस्सतुति मंत्रालय से की थी तो विजिलेंस क्लीयरेंस नहीं लिया गया था? 

यह तो निश्चित है कि मंत्रालय के 1 मई 2025 के सदस्य सचिव के पद पर प्रो अल्केश चतुर्वेदी को नियुक्त करने के आदेश को कार्यान्वयित करने के लिए अध्यक्ष ने कार्यवाही आरंभ की होगी। कार्यवाही के अंतर्गत ये माना जा सकता है कि अध्यक्ष ने अल्केश चतुर्वेदी से विजिलेंस क्लीयरेंस के लिए लिखा अवश्य होगा। परंतु छह महीने तक सदस्य सचिव के पद पर नियुक्ति नहीं होने से ऐसा प्रतीत होता है कि अल्केश चतुर्वेदी विजिलेंस क्लीयरेंस जमा नहीं करवा पाए हैं या उनके विजिलेंस क्लीयरेंस में कोई समस्या है। दोनों ही स्थितियों में आईसीएचआर के अध्यक्ष प्रोफेसर रघुवेंद्र तंवर को नियुक्ति की स्थितियों पर पुनर्विचार करना चाहिए। या ये माना जाए कि इस पत्र की आड़ में अनंत काल तक अल्केश चतुर्वेदी के विजिलेंस क्लीयरेंस की प्रतीक्षा की जाएगी और तबतक संस्था कार्यवाहक सदस्य सचिव के भरोसे चलता रहेगा। जिस चयन समिति ने अल्केश चतुर्वेदी का चयन किया उसने तीन नाम का पैनल भेजा था। अगर नियम अनुमति देते हों तो अध्यक्ष उस पैनल में से किसी अन्य व्यक्ति की नियुक्ति के लिए शिक्षा मंत्रालय को अनुरोध पत्र भेज सकते हैं। संभव है भेजा भी होगा लेकिन सदस्य सचिव के पद पर नियमित नियुक्ति में अनावश्यक देरी से संदेह उत्पन्न होता है। कहीं यथास्थिति बनाए रखने की कोशिश तो नहीं की जा रही है। सदस्य सचिव के पद पर नियमित नियुक्ति नहीं होने से संस्था का कामकाज भी सुचारू रूप से नहीं चल पा रहा है। संस्था के उद्देश्य भी पूरे नहीं हो पा रहे हैं। पाठकों को याद होगा कि इस स्तंभ में ही मदर आफ डेमोक्रेसी नामक पुस्तक के प्रकाशन और उसके मूल्य निर्धारण पर पहले लिखा जा चुका है। कुछ लोग तो ये कहते हैं कि लाखों रुपए मूल्य की पुस्तकें अब भी आईसीएचआर के गोदाम में धूल फांक रही है। पता नहीं कभी इसकी जांच हुई या नहीं या होगी भी या नहीं। दरअसल जिम्मेदार पद पर नियमित नियुक्ति नहीं होने से गड़बड़ियों को फलने फूलने का मैदान तैयार होता है।

गड़बड़ियों से आगे जाकर अगर हम शोध कार्यों पर ध्यान दें तो एक ही उदाहरण पर्याप्त होगा। 2022 में आईसीएचआर ने एक महात्वाकांक्षी परियोजना बनाई थी भारत के समग्र इतिहास लेखन की। योजनानुसार आठ खंडों में ये पुस्तक तैयार होनी थी। वरिष्ठ इतिहासकार सुष्मिता पांडे को इस परियोजना का जनरल एडीटर बनाया गया। प्रधानमंत्री मेमोरियल और संग्रहालय से एक व्यक्ति को प्रतिनियुक्ति पर आईसीएचआर लाया गया। करीब तीन वर्ष होने को आए अभी तक एक भी खंड पाठकों के लिए उपलब्ध नहीं हो पाया है। पहला खंड समग्र इतिहास की आवश्यकता को रेखांकित करनेवाला है। उसको अभी विशेषज्ञ देख रहे हैं यानि रेफरिंग पूल में डूब उतरा रहा है। इस हिसाब से देखा जाए तो अगले 24 वर्ष में शायद इस परियोजना को पूरा किया जा सकेगा। समग्र इतिहास लेखन अगर इस अगंभीरता से लिया जाएगा तो फिर भगवान ही मालिक हैं। आईसीएचआर जैसी संस्था का वामपंथी इतिहासकारों ने जितना उपयोग अपने विचार को फैलाने या एकांगी दृष्टि से इतिहास लिखने में किया उसका निषेध करना भी इस रफ्तार में संभव नहीं लगता है। आईसीएचआर जैसी संस्था को बेहद गंभीरता से चलाने की आवश्यकता है जिसमें निर्णय त्वरित हों, कार्य निर्धारित समय पर पूर्ण हों और प्रशासनिक बाधाओं से अकादमिक प्रक्रिया से मुक्त कराने की इच्छाशक्ति वाला कोई व्यक्ति संस्था में हो। 

2014 में जब से मोदी सरकार बनी है तभी से इतिहास को समग्र दृष्टि देने की बात हो रही है। गृहमंत्री अमित शाह ने बनारस में कुछ वर्षों पहले कहा था कि इतिहास लेखन में किसी की गलती बताने से बेहतर है हम अपनी लकीर लंबी करें। प्रधानमंत्री ने लालकिला की प्राचीर से पांच प्रण गिनाए थे उसमें से विरासत वाले प्रण का सिरा इतिहास से जुड़ता है। शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान भी कई बार राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर बात करते हुए इतिहास के समग्र लेखन की महत्ता को रेखांकित कर चुके हैं। प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और शिक्षा मंत्री की चिंता के केंद्र में इतिहास का समग्र लेखन है लेकिन बावजूद इसके आईसीएचआर में ढिलाई दिखती है। समग्र इतिहास लेखन परियोजना को लेकर व्याप्त आलस पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर रहा है। जरूरत है कि शिक्षा मंत्री अपने स्तर पर इसमें दखल दें और प्रसासनिक बाधों को दूर करने की राह संस्था को दिखाएं।    


Saturday, February 19, 2022

वैचारिक जकड़न में इतिहास लेखन


इतिहास, ये एक ऐसा शब्द है जिसको लेकर स्वाधीन भारत में लंबे समय से बहस चलती रही है। पश्चात्य और वामपंथी इतिहासकार हमेशा से इस बात को स्थापित करने में लगे रहे कि भारतीयों ने अपना इतिहास लिखा ही नहीं। कई बार तो यहां तक कह दिया जाता है कि भारतीयों के पास इतिहास लेखन का विवेक ही नहीं था। 1947 में जब देश स्वतंत्र हुआ तो वामपंथी इतिहासकारों ने विदेशी इतिहासकारों के लेखन को पत्थर की लकीर मान लिया। उनके लेखन को ही प्रचारित प्रसारित करते रहे। पीढ़ियों तक उनका लिखा इतिहास भारत के विद्यालयों से लेकर महाविद्यालयों और विश्वविद्यालय के छात्रों को पढ़ाया जाता रहा है। जब भी इतिहास लेखन ने पाश्चात्य-वामपंथी धारा से अलग हटकर कुछ करने की कोशिश की तो उसकी प्रामाणिकता को लेकर संदेह का वातावरण बनाने का प्रयास हुआ। इस प्रयास में सफलता भी मिली। अब भी वामपंथी इतिहासकारों का ये प्रयास जारी है। ताजा मामला है विक्रम संपत का। वीर सावरकर पर दो खंडों में लिखी उनकी पुस्तक में वर्णित तथ्यों में जब किसी प्रकार की कमजोरी नहीं मिली तो उनके लेखन को संदेहास्पद बनाने के लिए दूसरे हथकंडों का उपयोग किया जाना लगा। मामला इतना बढ़ा कि विक्रम संपत को अदालत की शरण लेनी पड़ी जहां से उनको राहत मिली। विक्रम संपत अकेले उदाहरण नहीं हैं । जिस भी इतिहासकार ने इतिहास लेखन का वैकल्पिक मार्ग चुना और भारतीय पौराणिक ग्रंथों के आधार पर लिखने की कोशिश की उनको नीचा दिखाने की कोशिश की गई। उनके अकादमिक कार्य को कोरी कल्पना तक करार दे दिया गया। पुराणों और वेदों में लिखे गए तथ्यों को कल्पना बताकर या साहित्य बताकर खारिज किया जाता रहा है। वामपंथी इतिहासकारों ने कभी भी पुराणों में वर्णित राजवंशों के कालखंड की तरफ देखा ही नहीं। कई इतिहासकार पुराणों की ऐतिहासिकता को भी संदिग्ध मानते हैं। संदिग्ध मानने की वजह बताए बगैर सीधा निर्णय सुना देते हैं। 

एफ ई पार्जिटर जैसे पश्चिमी विद्वान एक तरफ पुराणों में उल्लिखित कई बातों को अपने इतिहास लेखन का आधार बनाते हैं और दूसरी तरफ भारतीय इतिहास लेखन की परंपरा और प्रविधि पर संदेह भी करते हैं। उनके लेखन में ये विरोधाभास दिखता है। आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से संबद्ध संस्कृत के विद्वान आर्थर एंटनी मैकडानेल से लेकर अलबरुनी तक बेहिचक ये कहते रहे हैं कि भारतीयों को इतिहास लिखना नहीं आता है। मैकडानेल ने तो अपनी पुस्तक संस्कृत साहित्य में भी भारतीय इतिहास लेखन को लेकर निर्णयात्मक टिप्पणी की थी। उन्होंने लिखा था कि इतिहास लेखन भारतीय साहित्य की कमजोरी है, बल्कि ये कह सकते हैं कि भारतीय साहित्य में इतिहास लेखन अनुपस्थित है। वो यहीं नहीं रुकते हैं और यहां तक कह देते हैं कि भारतीय साहित्य में इतिहास बोध की कमी पूरे संस्कृत साहित्य पर एक छाया की तरह दिखाई देती है। अलबरुनी तो एक कदम आगे बढ़ जाता है जब वो कहता है कि दुर्भाग्य से हिंदुओं ने इतिहास को कालक्रम के अनुसार नहीं संजोया और वो शासकों के कालखंड को दर्ज करने को लेकर लापरवाह रहे। इस तरह की टिप्पणियों को स्वाधीन भारत के इतिहासकारों ने गंभीरता से लिया और उसके आधार पर ही व्याख्या करने में लग गए। होना ये चाहिए था कि इसको परखने की कोशिश होती लेकिन वैसा नहीं हुआ। परिणाम ये हुआ कि वो भी विदेशी इतिहासकारों और विद्वानों की तरह दोष के शिकार हो गए। विदेशी विद्वान अगर पुराणों को छोड़ भी देते और सिर्फ कल्हण की राजतरंगिणी को ही देख लेते तो उनकी भारतीय इतिहास लेखन को लेकर पैदा हुई भ्रांति दूर हो सकती थी। 

उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में पश्चिमी देशों में या पश्चिम के अकादमिक जगत में इतिहास लेखन की जो प्रविधि थी वो इतिहास लेखन की भारतीय पद्धति से बिल्कुल अलग थी। पश्चिम के इतिहासकार जब भारत का इतिहास लिखने लगे तो उन्होंने अपने देश के इतिहास लेखन के औजारों को अपनाया। स्वाधीन भारत में वामपंथियों ने मार्क्सवादी सिद्धांतों के आधार पर इतिहास लेखन किया। ये दोनों ही भारतीय इतिहास लेखन की परंपरा को समझने में विफल रहे। वो ये भी समझने में विफल रहे कि इतिहास सिर्फ कालखंड का निर्धारण या शासकों के नामों और युद्ध में जय पराजय का लेखा-जोखा मात्र नहीं है। इतिहास सिर्फ राजनीतिक घटनाओं का विवेचन भी नहीं है, इतिहास तो समवेत रूप से समाज की परंपराओं को रेखांकित करता है। इसमें राजनीति, धर्म, समाज के बनने और बिगड़ने की खोज होती है और उसके आधार पर आकलन होता है। जब भारत पराधीन हुआ तो सिर्फ राजनीतिक रूप से ही पराधीन नहीं हुआ बल्कि गुलामी ने अकादमिक जगत को भी प्रभावित किया । पाश्चात्य लेखकों के प्रभाव के पहले भारतीय इतिहास लेखन की प्रविधि और दृष्टि अलग थी जो पराधीनता के काल में बदल गई। उम्मीद की गई थी कि स्वाधीनता के बाद हम अपने प्राचीन ग्रंथों और इतिहास लेखन के तौर तरीकों को अपनाते हुए गुलामी के कालखंड का परिस्थितियों के आधार पर भारतीय पद्धति से विश्लेषण करेंगे लेकिन ऐसा हो न सका। काशी प्रसाद जायसवाल जैसे कई इतिहासकारों ने भारतीय पद्दति अपनाने की कोशिश की थी लेकिन उनको हाशिए पर डाल दिया गया। 1970 के बाद जब भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद का गठन हुआ तो तमाम वामपंथी इतिहासकार उसके कर्ताधर्ता हुए। वहां से इतिहास लेखन की धारा ऐसी बदली कि भारतीय लेखन पद्धति नेपथ्य में चली गई और मार्क्सवादी पद्धति केंद्र में आ गई। कभी उसको सुधारने की कोशिश भी नहीं की गई बल्कि उसको मजबूती ही प्रदान की गई।

स्कूली छात्रों को पढ़ाई जानेवाली किताबों में भी इन वामपंथी इतिहासकारों के मार्गदर्शन में तैयार किया गया। नेशनल काउंसिल आफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग (एनसीईआरटी) ने जिस तरह की इतिहास पुस्तकें तैयार की वो भी छात्रों को परोक्ष रूप से यही बताती रही कि भारतीयों के पास इतिहास लेखन का विवेक ही नहीं था। घटनाओं  का विचारधारा के आधार पर वर्णन किया गया। एक ही उदाहरण काफी होगा कि स्कूली छात्रों को ये पढ़ाया जाता रहा कि महात्मा गांधी की हत्या एक हिंदू ब्राह्मण ने की। ये उनको मन में एक समुदाय और जाति के खिलाफ नफरत का बीज बोने के लिए किया गया प्रतीत होता है। इस बात की क्या आवश्यकता थी कि गांधी के हत्यारे की जाति छात्रों को बताई जाए। पता नहीं कि पुस्तक में संशोधन हुआ या अब भी यही पढ़ाया जा रहा है। पिछले दिनों एनसीईआरटी के नवनियुक्त निदेशक प्रोफेसर दिनेश प्रसाद सकलानी ने अपने एक साक्षात्कार में कहा कि इतिहास लेखन का काम इतिहासकारों का है । अगर उनके पास किसी पाठ्य सामग्री को लेकर कोई शिकायत आती है तो वो विशेषज्ञों से जांच करवाने के बाद उसपर निर्णय लेंगे। अच्छी बात है पर जो शिकायतें पहले से मौजूद हैं उसकी जांच भी प्राथमिकता के आधार पर करवानी चाहिए। इस स्तंभ में कई बार एनसीईआरटी की इतिहास और अन्य विषयों के पुस्तकों में वर्णित तथ्यों को लेकर चर्चा की जा चुकी है। अनुच्छेद 370 का जिस तरह से उल्लेख एनसीईआरटी की पाठ्य पुस्तक में है उसपर निदेशक महोदय को विचार करना चाहिए। एनसीईआरटी की भूमिका इस वजह से महत्वपूर्ण है कि छात्रों को भारत का वही इतिहास पढाया जाए जो किसी विचारधारा में रंगा हुआ न हो। 

इसके अलावा अकादमिक जगत में भी इतिहास लेखन की उस प्रणाली को मजबूत करना होगा जिसमें भारतीय साहित्य में उपलब्ध तथ्यों का उपयोग हो। भारतीय साहित्य में उपलब्ध स्त्रोंतों का आधार हो। उस पूर्वग्रह से मुक्त होकर इतिहास लिखना होगा कि भारतीयों के पास इतिहास लेखन का विवेक ही नहीं है। अगर समग्रता में देखें और पौराणिक ग्रंथों में  उपलब्ध स्त्रोतों को आधार बनाया जाए तो भारतीय इतिहास लेखन की स्वदेशी प्रणाली को पुनर्जीवित किया जा सकता है।