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Sunday, November 10, 2024

प्रगतिशीलता का अधिनायकवाद


इन दिनों हिंदी साहित्य जगत में एक बार फिर से वाम दलों से संबद्ध लेखक संगठनों की चर्चा हो रही है। चर्चा इस बात पर नहीं हो रही है कि लेखक संगठनों ने लेखकों के हित में कोई कदम उठाया है बल्कि इस बात पर हो रही है कि जनवादी लेखक संघ के संस्थापक सदस्य और राष्ट्रीय अध्यक्ष असगर वजाहत ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। उन्होंने 2 नवंबर को अपना त्यागपत्र संगठन के महासचिव और कार्यकारिणी सदस्यों को भेजा। उसके बाद गुरुवार को प्रगतिशील लेखक संघ के उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष पद से वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना ने भी त्यागपत्र दे दिया। उनके त्याग पत्र में उनका दर्द झलक रहा है। नरेश सक्सेना ने लिखा कि मैं मित्रों की असहमति का सम्मान करता हूं, किंतु अपने प्रति व्यंग्य और संदेह का नहीं। हार्दिक विनम्रता के साथ मैं तत्काल प्रभाव से उत्तर प्रदेश प्रगतिशील लेखख संघ के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देता हूं। गौर करने की बात है कि नरेश सक्सेना जी ने ये बात फेसबुक पर लिखी। उनके लिखने के बाद उनके समर्थन और विरोध में टिप्पणियां आने लगीं। कम्युनिस्ट पार्टी के प्रति आस्थावान कुछ लेखकों ने उनको नसीहत दी तो अधिकतर लेखकों ने उनका समर्थन किया। कर्मेन्दु शिशिर ने अच्छी टिप्पणी की, संगठन और सृजन दोनों का अपना महत्व है। जब एक रचनाकार को संगठन और सृजन में चयन करना पड़े तो सच्चा रचनाकार तो सृजन का ही चयन करेगा। असगर वजाहत जैसे बड़े कथाकार/नाटककार और नरेश सक्सेना जैसे बड़े कवि को जब संगठन ही ट्रोल करने लगे तो वो क्या करें। नरेश सक्सेना का त्याग पत्र और उनपर आई टिप्पणियों को पढ़ने के बाद इस बात के संकेत मिलते हैं कि संघ की कोई बैठक चंडीगढ़ में हुई थी जिसमें ये तय किया गया था कि संघ से जुड़ा कोई लेखक किस मंच पर जाएगा ये संगठन तय करेगा। 

कम्युनिस्ट पार्टियों के बौद्धिक प्रकोष्ठ की तरह काम करनेवाला प्रगतिशील लेखक संघ हो, जनवादी लेखक संघ हो या जन संस्कृति मंच सबमें एक अधिनायकवादी प्रवृत्ति दिखाई देती है। इस संबंध में राहुल सांकृत्यायन से जुड़ा एक प्रसंग का उल्लेख उचित होगा। स्वाधीनता के बाद दिसंबर 1947 में हिंदी साहित्य सम्मेलन का एक अधिवेशन बांबे (अब मुंबई) में होना था। राहुल सांकृत्यायन को अधिवेशन की अध्यक्षता के लिए मंत्रित किया गया था। उस समय राहुल सांकृत्यायन कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य थे। जब वो बांब पहुंचे तो पार्टी के कार्यालय पहुंचे। वहां कामरेडों ने उनके तैयार भाषण की कापी पढ़ी। उसके बाद तो वहां विवाद खड़ा हो गया। राहुल सांकृत्यायन ने अपने भाषण में लिखा था इस्लाम को भारतीय बनना चाहिए। उनका भारतीयता के प्रति विद्वेष सदियों से चला आया है। नवीन भारत में कोई भी धर्म भारतीयता को पूर्णतया स्वीकार किए बिना फल फूल नहीं सकता।ईसाइयों, पारसियों और बौद्धों को भारतीयता से एतराज नहीं फिर इस्लाम को ही क्यों? इस्लाम की आत्मरक्षा के लिए भी आवश्यक है कि वह उसी तरह हिन्दुस्तान की सभ्यता, साहित्, इतिहास, वेशभूषा, मनोभाव के साथ समझौता करे जैसे उसने तुर्की, ईरान और सोवियत मध्य-एशिय़ा के प्रजातंत्रों में किया। कामरेड चाहते थे कि राहुल अपने लिखे भाषण में बदलाव करें। उन हिस्सों को हटा दें जहां उन्होंने इस्लाम के भारतीयकरण की बात की है। मामला काफी गंभीर हो गया। राहुल जी भाषण में संशोधन के लिए बिल्कुल तैयार नहीं हो रहे थे। कम्युनिस्ट पार्टी के कामरेड ने उनको पत्र लिखा और कहा कि आप अपने भाषण में आवश्यक रूप से ये कहें कि ये पार्टी का स्टैंड नहीं है। इसका राहुल सांकृत्यायन ने बहुत अच्छा इत्तर दिया । उन्होंने लिखा कि पार्टी की नीति के साथ नहीं होने के कारण वो स्वयं को पार्टी में रहने लायक नहीं समझते हैं और उन्होंने पार्टी छोड़ दी। कुछ ऐसा ही भाव नरेश सक्सेना के त्याग पत्र से भी प्रतिबिंबित हो रहा है। 

एक भयावह उदाहरण है शायर कैफी आजमी की पत्नी शौकत कैफी से जुड़ा।  शौकत कैफी ने अपनी किताब ‘यादों की रहगुजर’ में लिखा है कि जब उनकी शादी हुई तो वो मुंबई में एक कम्यून में रहते थे। उनका जीवन सामान्य चल रहा था। उनके घर एक बेटे का जन्म हुआ था। अचानक सालभर में बच्चा टी बी का शिकार होकर काल के गाल में समा गयॉ। इस विपदा से शौकत पूरी तरह से टूट गई थीं। अपने इस पहाड़ जैसे दुख से उबरने की कोशिश में जैसे ही शौकत को पता चला कि वो फिर से मां बनने जा रही हैं तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा । अपनी इस खुशी को शौकत ने कम्यून में साझा की । उस वक्त तक शौकत कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ले चुकी थी । जब शौकत की पार्टी को इसका पता चला तो तो पार्टी ने शौकत से गर्भ गिरा देने का फरमान जारी किया। उस वक्त शौकत पार्टी के इस फैसले के खिलाफ अड़ गईं थी और तमाम कोशिशों के बाद बच्चे को जन्म देने की अनुमति मिली थी। स्वाधीनता, स्त्री अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करनेवाले कम्युनिस्ट पार्टी के लोगों को जैसे ही अवसर मिलता है इनको दबाने का पूरा प्रयत्न करते हैं। नरेश सक्सेना इसके हालिया शिकार हैं।  

Saturday, February 17, 2018

गंगा-जमुनी तहजीब का स्वांग


जब भी हमारे देश में सौहार्द की बात होती है, दो समुदायों के बीच प्रेम की बात होती है या जब भी कभी दो समुदायों के बीच किसी भी प्रकार की टकराहट या वैमनस्यता की बात होती है, तब एक शब्द युग्म बार बार हमारे सामने आता है। गंगा-जमुनी तहजीब। बहुत जोर-शोर से इस गंगा-जुमनी तहजीब को बचाने और उसको कायम रखने की वकालत की जाती है। कथित रूप से समाज को बांटनेवाली ताकतों को गंगा-जुमनी तहजीब के जुमले से भारत में व्याप्त बहुलतावाद के सिद्धांत की याद दिलाई जाती है। इस शब्द युग्म के हवाले से दो समुदायों के बीच समरसता को मजबूत करने की दुहाई भी दी जाती है। अब जरा हम इस गंगा-जमुनी-तहजीब की पड़ताल साहित्य के क्षेत्र में करते हैं। जनवादी लेखक संघ के अध्यक्ष और कथाकार असगर वजाहत ने पिछले साल अक्तूबर में एक बातचीत में कहा था, जो कि प्रकाशित भी है, कि आज की समकालीन हिंदी कविता गंगा जमुनी चेतना से बहुत दूर चली गई है और उसने यूरोपीय कविता का दामन थाम लिया है। यही वजह है कि हमारे हिंदी कवियों के अनुवाद किसी एशियाई भाषा में कम या नहीं, जबकि सीधे यूरोप की भाषाओं में अधिक होते हैं और कवि इस पर गर्व करते हैं। असगर वजाहत आगे कहते हैं कि आज के पूरे परिदृश्य को समझने के लिए इतिहास में जाने की आवश्यकता है। हम सब जानते हैं कि फारसी लिपि में लिखी खड़ी बोली कविता का प्रारंभ 12-13 वीं शताब्दी में हो चुका था और 400 साल की यात्रा तय करती हुई यह 19वीं शताब्दी में विश्व स्तर की कविता बन चुकी थी। यह वह समय था, जब खड़ी बोली कविता के लिए देवनागरी लिपि का प्रयोग नहीं या बहुत कम किया जाता था। यही कारण था कि 19वीं शताब्दी के प्रारंभ में अयोध्या प्रसाद खत्री ने खड़ी बोली कविता आंदोलन चलाया था। उन्होंने उस समय नागरी लिपि में खड़ी बोली हिंदी कविता की चार शैलियों का उल्लेख किया है। और गंगा- जमुनी चेतना से संपन्न मुंशी स्टाइल के अंतर्गत मीर तकी मीर और नजीर अकबराबादी की कविता को इसमें शामिल किया है। उन्होंने मुंशी शैली को हिंदी खड़ी बोली कविता के लिए आदर्श शैली माना था। मुंशी शैली या गंगा-जमुनी काव्य संस्कार है क्या? यह मिली-जुली उत्तर भारत की उस संस्कृति का नाम है, जो मध्य एशिया और उत्तर भारत का सांस्कृति समन्वय थी। इस परंपरा के अंतर्गत जो कविता लिखी गयी, वह गंगा-जमुनी संस्कार की कविता कही जाती है। यह भावना, विचार और शैली के अदभुत संयोजन पर आधारित थी, और है। आधुनिक भारत में मुंशी स्टाइल हिंदी कविता की मुख्यधारा नहीं बन सकी। इसके कई कारण हैं। पहला कारण तो यह है कि बीसवीं शताब्दी में उर्दू-हिंदी विवाद या विभाजन शुरू हो गया था और हिंदी और उर्दू दोनों अलग होकर अपनी अलग पहचान बना रही थीं। गंगा-जमुनी संस्कार क्योंकि समन्वय की चेतना है, इसलिए उसे काफी हद तक अस्वीकार कर दिया गया था। दूसरा कारण, हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिकता का बढ़ना था। इस कारण भी उर्दू और हिंदी का भेद उभारा गया था और मिली-जुली संस्कृति की भावना कमजोर पड़ गई थी।
असगर वजाहत साहब इतिहास में जाने की बात अवश्य करते हैं और इतिहास के चुनिंदा अंशों को उद्धृत भी करते हैं। लेकिन वो एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न से टकराए बिना आगे निकलते हैं और अपनी राय प्रकट कर देते हैं। वो साहित्य में गंगा-जमुनी संस्कार के छीजते जाने के लिए हिंदी उर्दू के बीच के विभाजन या हिंदू मुस्लिम सांप्रदायिकता को जिम्मेदार ठहराते हैं। अब जरा ऐतिहासिक तथ्यों के आलोक में इस कथन की पुष्टि कर ली जाए। असगर वजाहत साहब जिस हिंदी उर्दू-हिंदी विभाजन की बात करते हैं उसका असर हिंदी साहित्य पर तो दिखाई नहीं देता है। उर्दू के जितने रचनाकारों का हिंदी में अनुवाद हुआ है, उसकी संख्या उनकी इस स्थापना को खारिज कर देते हैं। सालों तक हिंदी के पाठक कृश्न चंदर को हिंदी का ही लेखक मानते रहे क्योंकि उनकी रचनाएं हिंदी में अनुदित होकर छपती थी उसमें अनुवादक का नाम बहुधा होता नहीं था। कृश्न चंदर हिंदी में अनूदित होकर ही बेहद लोकप्रिय हुए। इसी तरह अगर हम देखें तो कुर्तुल एन हैदर, सअदात हसन मंटो, इकबाल, गालिब, मीर, से लेकर जौन एलिया और इंतजार हुसैन तक की ढेरों रचनाओं का हिंदी में अनुवाद हुआ और अब भी हो रहा है। हिंदी के लोगों ने बगैर किसी भेदभाव के उनको ना केवल अपनाया बल्कि रचनाकार के तौर पर उनको सर माथे पर बिठाया। एक अनुमान के मुताबिक गालिब के जितने दीवान हिंदी में प्रकाशित हैं उतने दीवान तो उर्दू में भी प्रकाशित नहीं हैं। अहमद फराज के गजलों और शायरी को लेकर हिंदी में दो खंडों में असासा का प्रकाशन हुआ। ये फेहरिश्त बहुत लंबी है। लेकिन इसकी तुलना में अगर हम हिंदी के लेखकों की रचनाओं का उर्दू में अनुवाद ढूंढते हैं तो वो ना के बराबर मिलती है। क्या उर्दू ने सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, जयशंकर प्रसाद, रामधारी सिंह दिनकर, सुमित्रानंदन पंत, हरिवंश राय बच्चन, महादेवी वर्मा, मुक्तिबोध, अज्ञेय जैसे दिग्गज हिंदी के लेखकों को अपनाया। क्या उनकी रचनाएं उसी अनुपात में उर्दू में अनूदित हुईं जिस अनुपात में उर्दू के कवियों और लेखकों का अनुवाद हिंदी में हुआ। इस प्रश्न का उत्तर है नहीं। तो फिर हम किस गंगा-जुमनी तहजीब की बात करते हैं और उसपर आसन्न खतरे को लेकर छाती कूटते हैं। उस गंगा-जमुनी तहजीब में जहां हिंदी ने तो बहुत उदारता के साथ उर्दू के लेखकों को अपनाया, उनको प्रकाशित किया लेकिन उर्दू ने वो गर्मजोशी नहीं दिखाई। क्या ये भाषाई सांप्रदायिकता नहीं है? इसपर नए सिरे से विचार करने की जरूरत है। असगर वजाहत गंगा-जमुनी संस्कार को समन्वय की चेतना मानते हैं और इसी वजह से उसको काफी हद तक अस्वीकार कर देने की बात करते हैं । प्रश्न यह है कि समन्वय की चेतना को किसने बाधित किया, इसका उत्तर ढूंढने की कोशिश की जानी चाहिए।
इस बात पर भी विचार करने की जरूरत है कि उर्दू में हिंदी के कवियों लेखकों को लेकर उत्साह क्यों नहीं दिखाई देता है। उर्दू पाठकों का एक विशाल वर्ग है। इस विशाल पाठक वर्ग को हिंदी की रचनात्मकता से वंचित रखने का उपक्रम इतने सालों से जारी है लेकिन इसको लेकर साहित्य के किसी कोने अंतरे में किसी प्रकार की कोई बहस हुई हो, ऐसा ज्ञात नहीं है। यह अनायास तो नहीं हो सकता है कि हिंदी के लेखकों को लेकर उर्दू में उदासीनता का भाव हो क्योंकि अगर अनायास होता तो ये इतने लंबे कालखंड तक नहीं चलता। गंगा-जमुनी तहजीब या गंगा-जमुनी काव्य संस्कार की पौरोकारी करनेवाले लेखकों को इस असंतुलन की इतनी लंबे समय तक याद क्यों नहीं आई। उर्दू के तमाम सरकारी-गैरसरकारी संस्थानों के रहनुमाओं ने ये क्यों नहीं सोचा कि उर्दू के पाठकों को दिनकर और बच्चन की रचनाएं पढ़ाई जाएं। उनका परिचय मुक्तिबोध और शमशेर बहादुर सिंह की कविताओं से करवाया जाए। असगर वजाहत हिंदू मुस्लिम सांप्रदायिकता के उभार की बात करते हैं लेकिन ये साहित्य में, खासतौर पर हिंदी में, तो दिखाई नहीं देता है। हिंदी के प्रकाशकों से लेकर पाठकों तक ने उर्दू के लेखकों को खूब प्रतिष्ठा दी लेकिन उर्दू के प्रकाशकों, पाठकों और लेखकों ने हिंदी के लेखकों को लेकर किसी तरह का कोई उत्साह नहीं दिखाया। ये कैसी सांप्रदायिकता है साहब, इसपर गौर करें।
साहित्य में गंगा-जमुनी तहजीब के झंडाबरदारों ने इतने सालों से ये सवाल नहीं उठाया,उनकी चुप्पी भी सवालों के कठघरे में है। प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ, जन संस्कृति मंच ने कभी इस सवाल से मुठभेड़ करने की कोशिश की हो तो उसको सार्वजनिक किया जाना चाहिए। प्रगतिशीलता के ध्वजवाहकों ने भी मुक्तिबोध को समग्र रूप में उर्दू में उपलब्ध करवाने का कोई जतन किया हो तो उसको भी हिंदी के पाठकों के सामने लाना चाहिए। गंगा-जमुनी तहजीब में गंगा भी है और जमुना भी है लेकिन साहित्य में तो ऐसा प्रतीत होता है कि गंगा की धारा बगैर किसी भेदभाव के लगातार सबको समेटे आगे बढ़ रही है लेकिन जमुना का बहाव कमजोर या बाधित हो रहा है। कुछ लोग ये प्रश्न उठा सकते हैं कि भाषा में इस तरह के सवाल उठाकर एक खास किस्म की सांप्रदायिक दृष्टि प्रतिपादित की जा रही है ।ऐसे लोगों को विनम्रतापूर्वक कीनिया के मशहूर लेखक गुअवा थिन्योंगों के उस कथन की याद दिलाना चाहूंगा जहां वो कहते हैं भाषा का चरित्र दोहरा होता है। भाषा संवाद का माध्यम तो होती ही है, साथ ही वो संस्कृति की संवाहक भी होती है। अगर हम भाषा की इस दोहरी भूमिका और चरित्र को मानते हैं तो गंगा-जमुनी तहजीब या गंगा-जमुनी साहित्यिक संस्कार एक स्वांग नजर आता है।  

Saturday, February 10, 2018

जलेस के जलसे पर सवाल


एक लेखक संगठन है। जनवादी लेखक संघ। दिल्ली में उसका केंद्रीय कार्यालय है। भारतीय जनता पार्टी और जनवादी लेखक संघ का दफ्तर दिल्ली की एक ही सड़क पर स्थित है। यह लेखक संगठन हिंदी और उर्दू के लेखकों का संगठन है। अभी इसका राष्ट्रीय सम्मेलन झारखंड के धनबाद में हुआ। सम्मेलन का उद्घाटन अंग्रेजी के पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन ने किया। हिंदी के लेखक असगर वजाहत को इसका अध्यक्ष चुना गया। चुनाव के वक्त अधिवेशन में असगर वजाहत अनुपस्थित थे। वजह उऩका कहीं अन्यत्र व्यस्त होना बताया गया। महासचिव मुरली मनोहर प्रसाद सिंह और उप महासचिव संजीव कुमार बने रहे। इस वर्ष जनवरी में यह सब संपन्न हो गया। उपर से देखने पर ये बातें सामान्य लगती हैं लेकिन कुछ पूर्व जनवादियों को सिद्धार्थ वरदराजन से जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय सम्मेलन का शुभारंभ करवाना खल गया। उनके मुताबिक यह जनवादी लेखक संघ के सांगठनिक कौशल की कमजोरी है जो किसी बड़े हिंदी या उर्दू के लेखक से सम्मेलन के उद्घाटन को ना करवा कर अंग्रेजी के पत्रकार से करवाता है । दूसरी बात जिसको लेकर साहित्यिक हलके में चर्चा रही वो ये कि जनवादी लेखक संघ के शीर्ष पदाधिकारी अब पूर्वी दिल्ली इलाके के निवासी हो गए। यह महज एक संयोग हो सकता है लेकिन सवाल यह भी उठता है कि जनवादी लेखक संघ को हिन्दुस्तान के अन्य शहरों से कोई अध्यक्ष, महासचिव या उप महासचिव क्यों नहीं मिलता है। जनवादी लेखक संघ में कुछ चुनिंदा लोगों का वर्चस्व कायम क्यों हैं। इससे बेहतर तो प्रगतिशील लेखक संघ है जो हर साल देश के अलग अलग हिस्से के लेखकों को शीर्ष पदों की नुमाइंदगी के लिए चुनते हैं। जनवादी लेखक संघ तो दिल्ली से पूर्वी दिल्ली में आ डटा है। खैर थोड़ी बहुत चर्चा के बाद बात आई गई हो गई।
इस बीच जनवादी लेखक संघ से पूर्व में जुड़े कोलकाता के लेखक अरुण माहेश्वरी ने धनबाद में आयोजित जलेस के राष्ट्रीय सम्मेलन को लेकर एक लंबी पोस्ट फेसबुक पर डाल दी। इस स्तंभ में पहले भी इस बात की चर्चा की जा चुकी है कि साहित्य के मसले अब फेसबुक पर स्थान पाने लगे हैं। ऐसा प्रतीत होने लगा है कि सभी तरह के साहित्यिक मसले फेसबुक पर हल हो जाएंगे। जनवादी लेखक संघ के धनबाद सम्मेलमन के संपन्न होने के बाद अरुण माहेश्वरी ने अपनी पोस्ट में लिखा- यद्यपि संजीव कुमार ने सम्मेलन के सांगठनिक सत्र और सचिव की रिपोर्ट के सूत्रीकरण पर विवादों का एक लाईन में संकेत दिया है, लेकिन कुछ इस प्रकार मानो वह सब किसी गोपनीय संगठन की गोपनीय बातें हो, जिनका खुले में उल्लेख करना पाप है! उनसे उस सम्मेलन में अनुपस्थित लेखकों का कोई सरोकार नहीं हो सकता है ! कहना न होगा, संजीव कुमार ने खुद ही अपनी रिपोर्ट से जलेस के इस राष्ट्रीय सम्मेलन को अजीब प्रकार से रहस्यमय बना दिया है । आज जब हर लेखक और संस्कृतिकर्मी अपनी सांसों पर मोदी-आरएसएस के फासीवाद के जहरीले सामाजिक दबाव को महसूस कर रहा है, उस समय लेखकों के एक राष्ट्रीय सम्मेलन की रिपोर्ट में उसका कहीं कोई उल्लेख तक न होना और भी रहस्यमय है? सीपीआई(एम) के सर्वोच्च नेतृत्व में चल रही गुटबाज़ी आज जगजाहिर है और दुनिया इस बात को भी जानती है कि सीपीआई(एम) के सर्वोच्च नेतृत्व में अभी ऐसे तत्वों ने अपना बहुमत बना रखा है जो मोदी-आरएसएस को फासीवादी नहीं मानते और उनके खिलाफ व्यापकतम मोर्चा तैयार करने के विचारों के विरोधी हैं । हमारा अनुमान है कि इन तत्वों ने ही अपने जनवादी केंद्रीयतावादके पवित्र अस्त्र के प्रयोग से जनवादी लेखक संघ की तरह के एक जन-संगठन की स्वायत्तता को पूरी तरह से रौंद डाला हैं ।
इस सम्मेलन में हिंदी के एक प्रतिष्ठित कथाकार असगर वजाहत को जलेस का अध्यक्ष बनाया गया है । हम नहीं जानते कि क्या वे भी मोदी-आरएसएस को फासीवादी नहीं मानते और इनके खिलाफ सभी धर्म-निरपेक्ष और जनतांत्रिक ताक़तों के व्यापकतम मोर्चे के विरोधी हैं ? बहरहाल, हमारी दृष्टि में लगता है यह सम्मेलन जलेस नामक एक ऐतिहासिक संगठन को मौत के मुँह में धकेल देने वाला सम्मेलन हुआ है, क्योंकि जनवाद की रक्षा के जिस बुनियादी उद्देश्य पर इस संगठन की नींव पड़ी थी, अब क्रमश: क्षय की एक बहु-स्तरीय प्रक्रिया के बीच से होते हुए अंत में उसी उद्देश्य को ठुकरा कर इसकी प्राण-सत्ता का ही अंत कर दिया गया है । प्रलेस का एक दुखांत हमने बिहार के ही गया में आंतरिक आपातकाल के दिनों में देखा था, अब उसी पिंडदानको प्रहसन के तौर पर हम झारखंड के शहर में दोहराते हुए देख रहे हैं।
अरुण माहेश्वरी की इस पोस्ट का जनवादी लेखक संघ के उप महासचिव संजीव कुमार ने बेहद आक्रामक तरीके से उत्तर दिया और एक नया शब्द चूर्ख गढ़ते हिए अरुण माहेश्वरी पर पलटवार किया- सबसे झूठा आरोप चूरख ने यह लगाया कि जलेस के राष्ट्रीय सम्मेलन की रिपोर्ट (उसका आशय सम्मेलन में पेश केंद्र की रिपोर्ट से ही होगा) में साम्प्रदायिक फ़ासीवाद का कहीं जिक्र नहीं है. जिसकी भाषा की समझ का हाल आप देख चुके हैं, उसका ऐसा मानना कतई आश्चर्यजनक नहीं.
साम्प्रदायिक फ़ासीवादी उभार पूरी रिपोर्ट की केन्द्रीय चिंता है और अगर आप शब्द की मौजूदगी ढूंढने पर बजिद हों तो उसके भी दसियों उदाहरण रिपोर्ट में हैं. पहले खंड का शीर्षक ही है : साम्प्रदायिक फ़ासीवाद के अच्छे दिन’ ”. इस खंड में 1.1 से लेकर 1.8 तक, आठ बिंदु हैं जिनमें साम्प्रदायिक फ़ासीवाद की विभिन्न अभिव्यक्तियों पर विचार किया गया है।संजीव कुमार जी के इस उत्तर पर पक्ष और विपक्ष में बातें शुरू हो गई । कई लोगों ने चूरख शब्द पर आपत्ति जताई और हिंदी के प्रतिष्ठित कवि बोधिसत्व ने तो उनसे इस शब्द को वापस लेने की मांग की। बोधिसत्व ने तो यहां तक लिखा कि सांगठनिक बहसों में किसी तरह से किसी गाली की आवश्यकता क्यों? आप उत्तर दें लिहाड़ी नहीं लें..विरोध और आलोचना को सहज लें....संगठन संगठन ही है हस्तिनापुर का सिंहासन तो नहीं कि उस पर और उसके नियंताओं पर सवाल न उठाया जा सके?’
बवाल बढ़ा तो संजीव जी ने एक और पोस्ट लिखी जिसमें उन्होंने अपनी पिछली पोस्ट पर शर्मिदंगी का जिक्र किया। लेकिन वो पोस्ट खेद की शक्ल में व्यंग्य था। संजीव कुमार और अरुण माहेश्वरी में सीधे सीधे भी विवाद हुआ। ट्रोल से लेकर भक्त आदि जैसे शब्द भी इस्तेमाल किए गए। इस पूरे विवाद में साहित्यिक मर्यादा तार-तार हुई। अब सवाल यह उठता है कि अरुण माहेश्वरी को अचानक से जनवादी लेखक संघ के क्रियाकलापों से क्यों दिक्कत होने लगी। कुछ सालों पहले तक जब वो जनवादी लेखक संघ में पदाधिकारी थे तो क्या उस वक्त संगठन में इस तरह की बातें नहीं होती थी। हिंदी साहित्य जगत और वामपंथी लेखक संगठनों के क्रियाकलापों पर नजर रखनेवाले लोगों का कहना है कि जब प्रोफेसर जगदीश्वर चतुर्वेदी ने जनवादी लेखक संघ छोड़ा था तब अरुण माहेश्वरी ने कोई स्टैंड क्यों नहीं लिया था।
रही बात जनवादी लेखक संघ के क्रियाकलापों को लेकर तो वहां लोकतांत्रिक प्रक्रिया की अपेक्षा करना व्यर्थ है। जिस कथित फासीवाद की चर्चा दोनों महानुभावों ने अपनी अपनी पोस्ट में किया है वह बहुत विद्रूप रूप में जनवादी लेखक संघ में उपस्थित है और वर्षों से वहां राज कर रहा है। नीचे के स्तर पर नए पदाधिकारियों का बदलाव चुनाव के जरिए होता रहा है लेकिन शीर्ष स्तर पर बहुत बदलाव नहीं होता है। पहले चंचल चौहान लंबे समय तक जनवादी लेखक संघ को चलाते रहे, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह के साथ, अब मुरली बाबू ओर संजीव कुमार चला रहे हैं। इस संघटन की उपयोगिता और सार्थकता पर तो तब बात हो जब इसमें लोकतंत्र दिखाई दे। यहां कुछ भी कहना बेमानी सा लगता है क्योंकि होता वही है तो शीर्ष पर बैठे दो लोग चाहते हैं। दूसरी बात जो यह कही जाती है वो यह कि इस लेखक संगठन का पदाधिकारी वही बन सकता है जो सीपीएम का सदस्य हो। इस वजह से भी शीर्ष के पदाधिकारियों मे ज्यादा बदलाव देखने को नहीं मिलता है। जो लेखक जमे हैं वो अपनी जगह पर बने रहते हैं। पहले भी मैं यह कह चुका हूं ये लेखक संगठन अपनी राजनीतिक पार्टियों के बौद्धिक प्रकोष्ठ की तरह काम करते हैं। जब आप किसी राजनीतिक दल के पिछलग्गू बन जाते हैं या फिर उस पार्टी के बौद्धिक प्रकोष्ठ बन जाते हैं तो आपको स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने का अधिकार नहीं रह जाता है और आपको हर महत्वपूर्ण फैसले के लिए अपनी पार्टी के आलाकमान का मुंह जोहना पड़ता है। जब लेखक अपने राजनीतिक अकाओं की तरफ देखकर फैसले लेते हैं तो उनकी पहली प्राथमिकता पार्टी का हित हो जाता है और लेखक नेपथ्य में चला जाता है। यह बात पूरे देश ने इमरजेंसी के समय देखा जब प्रगतिशील लेखक संघ ने इमरजेंसी का समर्थन किया था। क्या लेखक संगछनों की अब कोई उपयोगिता बची है। विचार करें।  


Sunday, April 3, 2016

खत्म होती विधा को संजीवनी !

हिंदी साहित्य में कई ऐसी विधाएं हैं जो वक्त के साथ साथ हाशिए पर चली गई जैसे तकनीक के फैलाव ने पत्र साहित्य का लगभग खात्मा कर दिया है । एक जमाना था जब साहित्यकारों के पत्रों के संकलन नियमित अंतराल पर छपा करते थे और उन संकलों से उस दौर का इतिहास बनता था । उदाहरण के तौर पर अगर देखें तो भदन्त आनंद कौसल्यायन कृत भिक्षु के पत्र जो आजादी पूर्व उन्नीस सौ चालीस में छपा था, काफी अहम है । उसके बाद तो हिंदी साहित्य में पत्र साहित्य की लंबी परंपरा है । जेल से लिखे जवाहरलाल नेहरू के इंदिरा गांधी के नाम पत्र तो काफी लोकप्रिय हुए । जानकी वल्लभ शास्त्री ने निराला के पत्र संपादित किए तो हरिवंश राय बच्चन ने पंत के दो सौ पत्रों को संकलित किया । नेमिचंद्र जैन ने मुक्तिबोध के पत्रों को पाया पत्र तुम्हारा के नाम से संकलित किया जो समकालीन हिंदी साहित्य की धरोहर हैं । हिंदी पत्र साहित्य के विकास में साहित्यक पत्रिका सरस्वती, माधुरी, ज्ञानोदय, साप्ताहिक हिन्दुस्तान आदि का अहम योगदान है । चांद पत्रिका का पत्रांक तो साहित्य की वैसी धरोहर जिसे हर साहित्य प्रेमी सहेजना चाहता है ।
इसी तरह से अगर हम देखें तो हिंदी साहित्य में नाटक लिखने का चलन लगभग खत्म सा हो गया है । साहित्य की हाहाकरी नई पीढ़ी, जो अपने लेखन पर जरा भी विपरीत टिप्पणी नहीं सुन सकती, का नाटक की ओर झुकाव तो दिखता ही नहीं है । कविता लिखना बेहद आसान है, उसके मुकाबले कहानी लेखन थोड़ा ज्यादा श्रम की मांग करता है । नाटक में सबसे ज्यादा मेहनत की आवश्यकता होती है । इंस्टैंट प्रसिद्धि की चाहत में नई पीढ़ी के लेखकों में उतना धैर्य नहीं है कि वो नाटक जैसी विधा, जो कि वक्त, श्रम और शोध तीनों की मांग करती है, पर अपना फोकस करें । जितनी देर में एक नाटक लिखा जाएगा उतनी देर में तो दर्जनों कविताए और चार छह कहानियां लिख कर हिंदी साहित्य को उपकृत किया जा सकता है । आज के दौर के स्टार युवा लेखकों में नाटक लिखने और उसको साधने का ना तो धैर्य दिखाई देता है और ना ही हुनर । नाट्य लेखन आज के दौर में लिखे जा रहे कविता और कहानी की तरह सहज नहीं है । नाटक लेखन करते वक्त लेखकों को अभिनय, संगीत, नृत्य के अलावा अन्य दृश्यकलाओं के बारे में ज्ञान होना आवश्यक है । इस ज्ञान के लिए बेहद श्रम की जरूरत है क्योंकि जिस तरह से हमारे समाज की स्थितियां जटिल से जटिलतर होती जा रही हैं उसको नाटक के रूप में प्रस्तुत कर दर्शकों को अपनी बात संप्रेषित करना एक बड़ी चुनौती है । नाटक लेखन का संबंध नाटक मंडलियों से भी है क्योंकि श्रेष्ठ नाटक मंडली का आभाव नाट्य लेखन को निरुत्साहित करता है । मंचन में नए नए प्रयोगों के अभाव ने भी नाट्य लेखन को प्रभावित किया है । मोहन राकेश के नाटकों के बाद संभवत पहली बार ऐसा हुआ कि हिंदी का नाट्य लेखन पराजय, हताशा और निराशा के दौर से बाहर आकर संघर्ष से परास्त होते आम आदमी को हिम्मत बंधाने लगा । हिंदी साहित्य में उन्नीस सौ साठ के बाद जिस तरह से मोहभंग का दौर दिखाई देता है उससे नाट्य लेखन भी अछूता नहीं रहा । इस दौर में लिखे गए नाटक मानवीय संबंधों की अर्थहीनता को उजागर करते हुए जीवन के पुराने गणितीय फॉर्मूले को धव्स्त करने लगा । इनमें सुरेन्द्र वर्मा का नाटक द्रौपदी, मुद्रा राक्षस का सन्तोला, कमलेश्वर की अधूरी आवाज, शंकर शेष का घरौंदा से लेकर मन्नू भंडारी का बिना दीवारों के घर प्रमुख हैं । इसके अलावा हम भीष्म साहनी के कबिरा खड़ा बाजार में, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के नाटक बकरी और रमेश उपाध्याय के नाटक पेपरवेट को नहीं भुला सकते । इसके बाद एक और प्रवृत्ति देखने को मिली । अच्छे साहित्य को जनता तक पहुंचाने के लिए मशहूर उपन्यासों और कहानियों का नाट्य रूपांतर होने लगा । मन्नू भंडारी के महाभोज का नाट्य रूपांतर काफी लोकप्रिय है । बाद में विदेशी नाटकों के अनुवाद भी होने लगे जिसमें भारतीय परिवेश का छौंक लगाकर स्थनीय दर्शकों को जोड़ने की शुरुआत हुई । इसी दौर में शेक्सपीयर, ब्रेख्त, कैरल, चैपर आदि के नाटकों का अनुवाद हुआ था । रघुवीर सहाय ने तो शेक्सपीयर के नाटक मैकबेथ का हिंदी अनुवाद बरनम वन के नाम से किया था । अन्य भारतीय भाषाओं के लेखकों के हिंदी अनुवाद भी होने लगे । बादल सरकार, गिरीश कर्नाड, विजय तेंदुलकर आदि के अनुवाद खूब पसंद किए गए । इन सभी देसी विदेशी नाटकों ने हिंदी नाटक को नई दिशा तो दी है उसको नई दृष्टि से भी संपन्न किया । लेकिन अनुवादों के इस दौर ने भी हिंदी में नाटक लेखन को हतोत्साहित किया । लंबे वक्त बाद असगर वजाहत का नाटक जिस लाहौर नइ देख्या ओ जम्याइ नइ- छपा तो हिंदीजगत में धूम मच गई।
अभी हाल ही में लमही पत्रिका में हिंदी की युवा लेखिका इंदिरा दांगी का नाटक आचार्य छपा है । सबसे पहले तो इस युवा लेखिका की इस बात के लिए दाद देनी चाहिए उसने इस दौर में कहानी और उपन्यास लेखन के अलावा नाटक लिखा । इंदिरा दांगी अपने दौर की सर्वाधिक चर्चित लेखिका है और उसको कलमकार कहानी पुरस्कार से लेकर साहित्य अकादमी का युवा पुरस्कार मिल चुका है । इंदिर दांगी के इस उपन्यास को पढ़ते हुए पाठकों के सामने हिंदी साहित्य का पूरा परिदृश्य आपकी आंखों के सामने उपस्थित हो जाता है । यह पूरा नाटक एक साहित्यक पत्रिका के संपादक विदुर दास और युवा लेखिका रोशनी के इर्द-गिर्द चलती है । इस नाटक का ओपनिंग सीन अंधकार से शुरू होता है जहां नायिका रोशनी आती है और बहुत ही बेसिक से सवाल उठाती है कि साहित्य क्या होता है । जरा संवाद पर नजर डालते हैं – साहित्य क्या होता है ? क्या जिसमें सहित का भाव निहित हो वही साहित्य है ? फिर हंसी । यही तो असली नब्ज है, सरकार सहित । प्रशंसा और प्रशंसकों से शुरू ये कोरा सफर विदेश यात्राओं, मोटी स्कॉलरशिप, हल्के-वजनी अवॉर्डों और हिंदी प्रोफेसर की नौकरी से लेकर अकादमी अध्यक्ष पदों की नपंसुसक कर देनेवाली कुर्सियों तक पहुंचते-पहुंचते कितना कुछ सहित लादता चला जाता है । उन्हें कृपया ना गिनें । लिखनेवाले का लेखिका होना एक दूसरा ही टूल है सफलता का जिसका प्रयोग हर भाषा, हर काल, हर साहित्य में यकीनन बहुतों ने किया होगा और बहुतों को करना बाकी है । तौबा । इसके बाद नायिका मुंह पर हाथ रखती है और सयानपन से मुस्कुराते हुए कहती है स्त्री विरोधी बात ।

अब इस पहले दृश्य को ही लीजिए तो ये नाटक आज के दौर को उघाड़कर रख देता है । इंदिरा दांगी ने जिस तरह के शब्दों का प्रयोह किया है वो इस दौर पर एक तल्ख टिप्पणी है । स्त्री विरोधी बात कहकर जिसको उसकी नायिका मुंह पर हथेली रख लेती है वो एक बड़ी प्रनृत्ति की ओर इशारा करती है । ये प्रवृत्ति कितनीमुखर होती चली जाती है ये नाटक के दृश्यों के आगे बढ़ते जाने के बाद साफ होती गई है । जब वो कहती है कि लिखनेवाला का लेखिका होना एक टूल है जिसका इस्तेमाल होता है तो वो साहित्य के स्याह पक्ष पर चोट करती है । इसी तरह से शोधवृत्ति से लेकर प्रोफेसरी तक की रेवड़ी बांटे जाने पर पहले ही सीन में करार प्रहार है । अकादमी अध्यक्ष पद की नपुंसक कर देनेवाली कुर्सी से भी लेखिका ने देशभर की अकादमियों के कामकाज पर टिप्पणी की है । इस नाटक को पढ़नेवालों को ये लग सकता है कि यहां एक मशहूर पत्रिका का संपादक मौजूद है, साथ ही मौजूद है उसकी चौकड़ी भी । लेकिन इस नाटक के संपादक को किसी खास संपादक या इसके पात्रों को किसी लेखक लेखिका से जोड़ कर देखना गलत होगा । इस तरह के पात्र हिंदी साहित्य में यत्र तत्र सर्वत्र बिखरे पड़े हैं । जरूरत सिर्फ नजर उठाकर देखने की है । नाट्य लेखन के बारे में मेरा ज्ञान सीमित है लेकिनअपने उस सीमित ज्ञान के आधार पर मैं कह सकता हूं इंदिरा दांगी के इस नाटक में काफी संभावनाएँ हैं और इसके मंचन से इसको और सफलता मिल सकती है । फिलहाल साहित्य के कर्ताधर्ताओं को इस ओर ध्यान देना चाहिए कि एक बिल्कुल युवा लेखिका ने एक लगभग समाप्त होती विधा को जिंदा करने की पहल की है । अगर उसको सफलता मिलती है तो इस विधा को भी संजीवनीमिल सकती है । कुछ और युवा लेखक इस विधा की ओर आकर्षित हो सकते हैं । अगर ऐसा हो पाता है तो हम अपनी एक समृद्ध विरासत को संरक्षित करने में कामयाब हो सकेंगे ।    

Sunday, March 20, 2016

असगर वजाहत को श्लाका सम्मान

दिल्ली की हिंदी अकादमी में जब से मैत्रेयी पुष्पा ने उपाध्यक्ष का पद संभाला है तब से अकादमी की सक्रियता काफी बढ़ गई है । हर महीने ताबड़तोड़ आयोजन हो रहे हैं- कविता, कहानी, नाटक से लेकर पत्रकारिता तक के विषयों पर विमर्श आयोजित किए जा रहे हैं । अब हिंदी अकादमी ने पिछले दो साल से रुके पुरस्कारों को भी फिर से देना शुरू किया है । दरअसल दिल्ली में सरकारों के बनने बिगड़ने के खेल में पिछले दो साल से साहित्यक पुरस्कार नहीं दिए जा रहे थे । अब अकादमी ने पुरस्कार की राशि बढ़ाते हुए एक बार फिर से इन पुरस्कारों का एलान किया है । इस बार हिंदी अकादमी का सबसे बड़ा पांच लाख रुपए का श्लाका सम्मान हिंदी के वरिष्ठ लेखक असगर वजाहत को दिया गया है । इसके अलावा राजी सेठ को भी हिंदी अकादमी ने सम्मानित करने का एलान किया है । हिंदी अकादमी के पुरस्कृत लेखक-पत्रकारों की सूची लगभग अविवादित है । कहना न होगा कि मैत्रेयी पुष्पा की अगुवाई में बेहतर लेखकों का चयन हुआ है । पुरस्कार की चयन समिति में जो लोग थे उनमें से एक को छोड़कर दो से बहुत उम्मीद नहीं की जा सकती थी क्योंकि उनको हिंदी साहित्य से बहुत लेना देना है नहीं । जिन एक का लेना देना है वो बेहद सौम्य हैं । दरअसल मैत्रेयी पुष्पा का चयन समिति में इस तरह के लोगों को रखने का प्रयोग भी सही रहा और उनके चुनाव को चयन समिति ने सहूलियतें दी बाधा पैदा नहीं की होंगी । साहित्य से इतर जिन लोगों को पुरस्कार दिया गया वो आम आदमी पार्टी की नीतियों और नेताओं के प्रशंसक रहे हैं । सरकारी अकादमियों को ऐसे फैसले लेने होते हैं । संतोष कोली के नाम पर शुरू किया गया पुरस्कार छत्तीसगढ़ की सोनी सोरी को दिया गया है । सोनी सोरी के साथ क्या हुआ है ये ज्ञात है और उसको दोहराने का ये अवसर नहीं है।  
असगर वजाहत इस वक्त हिंदी के उन गिने चुने लेखकों मे जो विवादों से परे हैं । उनकी प्रतिबद्धता को लेकर कभी कभार कोने अंतरे से हल्की फुल्की आवाज उठती रहती है लेकिन कमोबेश वो पाठकों के प्यारे हैं । उनके उपन्यासों की पठनीयता और पाठकों से सीधे संवाद करने की उनकी कला उनकी रचानओं को अलग करती हैं । असगर वजाहत के उपन्यासों के अलावा उनका एक नाटक- जिस लाहौर नइ देख्या ओ जम्याइ नइ- बेहद लोकप्रिय रहा है और उसके हजारों मंचन हो चुके हैं । आज के करीब दस साल पहले हिंदी की एक समाचार पत्रिका के एक सर्वेक्षण में असगर वजाहत को हिंदी के दस श्रेष्ठ लेखकों में चुना गया था । उपन्यासों और नाटक के अलावा असगर वजाहत के यात्रा संस्मरण भी बेहतरीन माने जाते हैं । ईरान और आजरबाइजान की यात्रा को केंद्र में रखकर असगर वजाहत ने चलते तो अच्छा था के नाम से एक किताब लिखी जो इस विधा में अपना अलग मुकाम रखती है । असगर वजाहत की लेखन के अलावा चित्रकला में भी गहरी रुचि है । मुजे याद है कि आजमगढ़ के जोकहरा में रामानंद सरस्वती पुस्तकालय में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान असगर वजाहत ने बातों बातों में एक रेखाचित्र बनाया और मुझे भेंट कर दिया । लगभग बारह तेरह साल बाद भी मैंने उस खूबसूरत चित्र को संभाल कर रखा है । असगर वजाहत उन लेखकों में हैं जिनकीओर साहित्य अकादमी का ध्यान नहीं गया, ऐसे में हिंदी अकादमी का उनको श्लाका सम्मान से सम्नानित करना संतोष की बात है । वैसे तो साहित्य अकादमी का ध्यान अबतक किसी भी मुस्लिम लेखक की ओर नहीं गया जो हिंदी में लिखते हैं चाहे वो राही मासूम रजा हो, मंजूर एहतेशाम हो या फिर नासिरा शर्मा । यह साहित्य अकादमी की अपनी बौद्धिक सांप्रदायिकता है जो अब जाकर रेखांकित होनी शुरू हुई है ।   


Sunday, January 31, 2016

सेक्लयुर चैंपियनों की असलियत !

हाल के दिनों में पूरे देश में दो मुद्दे की खासी चर्चा हुई । सबसे पहले तो लेखकों, फिल्मकारों और कलाकारों ने देशभर में असहिष्णुता का मुद्दा उठाकर खूब शोर-शराबा किया । असहिष्णुता पर मचे कोलाहल के उस दौर में कन्नड़ लेखक कालबुर्गी, कॉमरेड पानसरे आदि की हत्या के साथ साथ अखलाक की हत्या का भी मुद्दा उठाकर माहौल बनाने की कोशिश की गई थी । बिहार चुनाव में बीजेपी की हार के बाद असहिष्णुता का मुद्दा थोड़ा शांत पड़ गया था लेकिन गाहे बगाहे कोई ना कोई इसको उठाकर मुद्दा बनाने की फिराक में रहने लगा था । इस बीच हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र रोहित वेमुल्ला की आत्महत्या में असहिष्णुता के मसीहाओं को फिर से एक बार सियासत की संभावना दिखी और वो जोर शोर से इसको दलित उत्पीड़न से जोड़कर शोर मचाने लगे । यह ठीक है कि लोकतंत्र में वैसी परिस्थितियां नहीं बननी चाहिए कि किसी को भी आत्महत्या जैसा कदम उठाने को मजहबूर होना पड़े । रोहित की मौत लोकतंत्र के चेहरे पर एक बदनुमा दाग है । लेकिन उससे भी ज्यादा व्यथित करनेवाली प्रवृत्ति है उसको भुनाने की कोशिश करना । उसपर सियासत करना । दलित और मुसलमानों को लेकर साहित्य और संस्कृति से जुड़े लोग खासे उत्तेजित हो जाते हैं । आक्रामक भी । लेकिन ये उनकी सियासत का हिस्सा है । वो दलितों और मुसलमानों को आगे करके अपनी चालें चलते हैं । इसका एक फायदा यह होता है कि आप समाज सुधारक और धर्मनिरपेक्ष होने का तमगा एक साथ हासिल कर लेते हैं । लेकिन जब दलितों और मुसलमानों के योगदान को रेखांकित या सम्मानित करने का वक्त आता है तो चैंपियन उनके खिलाफ ही काम करते नजर आते हैं । लेकिन ये खिलाफत इतनी खामोशी से होता है किसी को पता भी नहीं चलता है । इसके कई प्रमाण और दृष्टांत हिंदी साहित्य जगत में यहां वहां बिखरे हुए हैं लेकिन उनको सामने नहीं लाया जाता है ।
पिछले साल का साहित्य अकादमी पुरस्कार हिंदी के वयोवृदध लेखक रामदरश मिश्र को उनके कविता संग्रह पर दिया गया । असहिष्णुता के मुद्दे पर साहित्य अकादमी पुरस्कार वापसी के कोलाहल के बीच रामदरश मिश्र से बेहतर चयन शायद ही कोई होता । साहित्यक हलके में यह बात लगभग सबको मालूम भी थी कि इस बार रामदरश जी को पुरस्कृत किया जाना है । बानवे साल के रामदरश मिश्र जी को पुरस्कार देने पर कोई विवाद तो नहीं हुआ लेकिन यह सवाल जरूर उठा कि साहित्य अकादमी पुरस्कार हाल के दिनों में लेखकों की उम्र को देखकर दिया जाने लगा है । यह बात भी कही गई कि साहित्य अकादमी पुरस्कार अब कृति पर देने की बजाए लाइफटाइम अचीवमेंट के तौर पर दिया जाना चाहिए । रामदरश मिश्र जी को उनके कविता संग्रह आग पर हंसी के लिए पुरस्कृत किया गया, जो कि उनके ही रचे साहित्य में तुलनात्मक रूप से कमजोर कृति है । इस बात पर भी गौर किया जाना चाहिए की रामदरश जी को अगर इस उम्र में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला तो फिर किस उम्र में उनके कद के लेखकों को अकादमी की महत्तर सदस्यता से सम्मानित किया जाएगा । दरअसल साहित्य अकादमी पुरस्कारों को लेकर अकादमी के संविधान में आमूल चूल सुधार की आवश्यकता है । सुधार की आवश्यकता तो अकादमी के संविधान में साधारण सभा की सदस्यता को लेकर भी है लेकिन फिलहाल हम अकादमी पुरस्कार की बात कर रहे हैं । साहित्य अकादमी पुरस्कारों में सत्तर के दशक से गड़बड़ियां शुरू हो गई । अगर ठीक से साहित्य अकादमी के इतिहास का विश्लेषण करें तो पाते हैं कि मार्क्सवादियों के साथ ही अकादमी में गड़बड़झाले का प्रवेश हुआ । 12 मार्च 1954 को तत्कालीन उपराष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था कि साहित्य अकादमी का उद्देश्य शब्दों की दुनिया में मुकाम हासिल करनेवाले लेखकों की पहचान करना, उन लेखकों को प्रोत्साहित करना और आम जनता की रुचियों का परिष्कार करना है । इसके अलावा अकादमी को साहित्य और आलोचना के स्तर को बेहतर करने के लिए भी प्रयास किया जाना चाहिए । 1954 में साहित्य अकादमी पुरस्कार देने के प्रस्ताव पर चर्च हुई थी और 1955 में पहला साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया था । हिंदी के लिए पहला साहित्य अकादमी माखनलाल चतुर्वेदी को उनकी कृति हिम तरंगिणी पर दिया गया था । आश्चर्य की बात है कि पहले पुरस्कार से लेकर अबतक किसी भी मुसलमान लेखक को हिंदी में लेखन के लिए पुरस्कृत करने योग्य नहीं माना गया । यह साहित्य अकादमी की कार्यप्रणाली और संकीर्णतावादी दृष्टिकोण को उजागर करनेवाली बात है या फिर उसके कर्ताधर्ताओं की सोच का प्रदर्शन ।
यह सही है कि साहित्य, जाति, धर्म वर्ण, संप्रदाय आदि से उपर होता है और रचनाओं को किसी खांचे में बांधना उचित नहीं होगा । लेकिन अगर साठ साल के लंबे अंतराल में एक खास समुदाय के लेखकों की पहचान और सम्मान ना हो तो प्रश्न अंकुरित होने लगते हैं । हिंदी में लिखनेवाले मुस्लिम लेखकों की एक लंबी फेहरिश्त है । काला जल जैसा कालजयी उपन्यास लिखनेवाले गुलशेर खां शानी, आधा गांव जैसे बेहतरीन उपन्यास के लेखक राही मासूम रजा, सूखा बरगद जैसे उपन्यास के रचयिता मंजूर एहतेशाम को भी साहित्य अकादमी ने सम्मानित करने के योग्य नहीं माना । झीनी झीनी बीनी चदरिया के लेखक अब्दुल बिस्मुल्लाह के अलावा नासिरा शर्मा और असगर वजाहत अपने लेखन से लगातार हिंदी साहित्य को समृद्ध कर रहे हैं लेकिन अकादमी इनको लेकर भी उदासीन ही नजर आती है । क्या वजह है कि हिंदी में लिखनेवाले मुस्लिम लेखकों की तरफ साहित्य अकादमी का ध्यान नहीं गया । अगर यह संयोग मात्र है तो बहुत दुखद है । अकादमी के क्रियाकलापों को देखकर, खासकर सत्तर के बाद, लगता है कि यह संयोग नहीं है । सत्तर के दशक के बाद साहित्य अकादमी पर धर्मनिरपेक्षता के चैंपियनों का कब्जा रहा । सहिष्णुता के उस कथित बेहतर माहौल में किसी भी मुस्लिम लेखक को पुरस्कार नहीं मिलना बेहद अफसोसनाक है । अगर हम गहराई से विचार करें तो अल्पसंख्यकों के नाम पर अपनी दुकान चलानेवालों ने उनके नाम की तख्ती तो लगाई लेकिन कभी भी उस तख्ती को सम्मान नहीं दिया । दरअसल साहित्य अकादमी पर इमरजेंसी के बाद जो भी शख्स हिंदी भाषा के कर्ताधर्ता रहे उनमें से ज्यादातार ने खास विचारधारा के ध्वजवाहकों को सम्मानित किया । मेधा और प्रतिभा पर अपने लोगों को तरजीह दी गई । ये पीरियड काफी लंबे समय तक चला और मुस्लिम लेखकों के साथ अन्याय होता चला गया । अपनों को रेवड़ी बांटने के चक्कर में इनका सांप्रदायिक चेहरा दबा रहा लेकिन अब वक्त आ गया है कि उनके चेहरे से नकाब उठाया जाए और उन सभी से ये सवाल पूछा जाए कि शानी, रजा, मंजूर एहतेशाम, असगर वजाहत को क्यों नजरअंदाज किया । साहित्य अकादमी के कथित सेक्युलर लेखकों ने साहित्य अकादमी ने उर्दू में लिखने वाले गोपीचंद नारंग, गुलजार जैसे हिंदू लेखकों को सम्नानित किया लेकिन हिंदी कर्ताधर्ता वो दरियादिली नहीं दिखा सके । उपर जिन लेखकों का नाम लिखा गया है उनमें से किसी की भी कृति अबतक साहित्य अकादमी प्राप्त किसी भी कृति से किसी भी मानदंड पर कमजोर नहीं है । फिर आखिर क्यों कर ऐसा हुआ । सुरसा के मुंह की तरह ये सवाल साहित्य अकादमी के सामने खड़ा है ।

बात सिर्फ मुस्लिम लेखकों की ही नहीं है । साहित्य अकादमी ने संभवत: अबतक किसी दलित लेखक को भी सम्मानित नहीं किया । इसके पीछे क्या वजह हो सकती है । जब भी जो भी हिंदी भाषा के संयोजक रहे उन्होंने अपने हिसाब से पुरस्कारों का बंटवारा किया । वर्तमान अध्यक्ष विश्वनाथ तिवारी जब हिंदी भाषा के संयोजक के चुनाव में खड़े हुए थे तब हिंदी के ही एक अन्य लेखक ने दावेदारी ठोकी थी लेकिन तब उनको यह समझा दिया गया कि संयोजक होने से पुरस्कार नहीं मिल पाएगा, लिहाजा वो नाम वापस ले लें । हुआ भी वही । जब सौदेबाजी, क्षेत्रवाद, जातिवाद के आधार पर पुरस्कार दिए जाते रहे तो फिर दलितों और मुसलमानों के मुद्दों के चैंपियन क्यों खामोश रहे । साहित्य के इन मठाधीशों के खिलाफ किसी कोने अंतरे से आवाज नहीं उठी थी, जो भी आवाज उठाने की हिम्मत करता उसको हाशिए पर धकेल दिया जाता था । इस परिस्थिति को देखते हुए अलेक्सांद्र सोल्झेनित्सिन के कथन का स्मरण होता है यह एक नियम है कि शिक्षित लोग मशीनगन के सामने भी उतना कायरतापूर्ण व्यवहार नहीं करते जितना बड़बोले वामपंथी लफ्फाजों के सामने । यह अकारण नहीं है कि अलेक्सांद्र सोल्झेनित्सिन इस तरह की बात करते थे । दरअसल इन बड़बोले वामपंथी लफ्फाजों ने वर्षों तक सही बात कहनेवालों का मुंह बंद करके रखा । सोवियत संघ के पतन के बाद से जिस तरह से इनके प्रकाशन और संस्थान आदि बंद हुए तो उनकी लफ्फाजी थोड़ी कमजोर हुई । वक्त आ गया है कि साहित्य अकादमी में इन्होंने जो गलतियां की उसको सुधारा जाए । अकादमी के संविधान में संशोधन करके तमाम योग्य मुस्लिम और दलित लेखकों को मरणोपरांत पुरस्कृत किया जाए ।