नायक कहता है, मिस शीतल साहनी, मैं एक बात आपको भी कहना चाहूंगा। लड़कियों को छेड़नेवाले ऐसे थर्ड क्लास गुंडों को पकड़ना और उन्हें सबक सिखाना हमारा फर्ज है और वो हम करते हैं। पर कुछ फर्ज लड़कियों का भी है। नायिका पूछती है, क्या फर्ज है मैं समझी नहीं। जरा देखिए अपने आप को, इस तरह के कपड़े पहनकर अगर आप बाहर सड़क पर निकलेंगी तो गुंडों की सीटियां नहीं बजेंगी तो क्या मंदिर की घंटियां बजेंगी। उत्तर मिलता है, क्या खराबी हैं इन कपड़ों में। कहा जाता है कि बहुत कम हैं। सुना था एक जमाने में लड़कियों को कपड़ों का बहुत शौक हुआ करता था ये आजकल आप लोग कपड़ों के मामले में कंजूस क्यों होती जा रही हैं। नायिका का उत्तर मैं क्या पहनती हूं ये मेरा पर्सनल मामला है। नायक प्रतिवाद करते हुए कहता है कि ये तो उसी तरह की बात हुई कि वो लोफर कहे कि सीटी बजाना मेरा पर्सनल काम है। हर वो काम जिससे दूसरों को परेशानी हो पर्सनल नहीं हो सकता। लड़की पूछती है कि मेरे इस लिबास से दूसरों को क्या परेशानी हो सकती है। जवाब- ये तो उस लोफर से पूछना पड़ेगा जिसने आपको देखकर सीटी बजाई। बहरहाल आप एक शरीफ घराने की शरीफ लड़की हैं और अगर थोड़े से शरीफाना कपड़े पहने लें तो किसी को कोई दिक्कत नहीं होगी। ये संवाद है आज से 46 वर्ष पूर्व की फिल्म दोस्ताना का।
फिल्म दोस्ताना के लेखक हैं सलीम- जावेद यानि सलीम खान और जावेद अख्तर। हिंदी फिल्मों की सफल लेखक जोड़ी। जावेद अख्तर स्वयं को तरक्कीपसंद लेखक के तौर पर पेश करते रहे हैं। उनकी प्रगतिशील सोच का उदाहरण है दोस्ताना का ये संवाद। ऐसा भी नहीं है कि उक्त लंबा संवाद कहानी की मांग हो। कहानी तो लगभग यहीं से आरंभ ही होती है। नायिका जीनत अमान बहुत कम कपड़ों में जा रही होती और पेंटल उनको छेड़ता है। जीनत अमान उसको पकड़कर थाने ले आती है। पुलिस उसको हवालात में बंद कर देती है। उसके बाद इंस्पेक्टर की भूमिका निभा रहे अमिताभ बच्चन नायिका को कम कपड़ों पहनने को लेकर ज्ञान उड़ेलने लगते हैं। अमिताभ तो वही संवाद बोलते हैं जो लेखक ने लिखा होगा। जावेद अख्तर और सलीम खान की जोड़ी के बारे में कहा जाता है कि सलीम खान कहानी लिखते थे, उसको रोमांचक मोड़ देनेवाले प्रसंग जोड़ते थे और जावेद अख्तर संवाद लिखते थे। अब दोस्ताना के उपरोक्त संवाद से लेखक द्वय की महिलाओं और उसके कपड़ों को लेकर सोच उजागर होता है। माना जाता है कि कोई भी लेखक दो चीजों से प्रभावित होता है। एक तो उसका परिवेश और दूसरा उसका नजरिया। आज से 46 वर्ष पूर्व के परिवेश का तो अनुमान लगाया जा सकता है लेकिन महिलाओं के कम कपड़ों को लेकर जावेद अख्तर और सलीम खान के नजरिए का पता या संकेत तो उक्त संवाद से मिलता ही है। आज जावेद अख्तर नैतिकता की मीनार पर खड़े होकर चाहे जितनी बड़ी-बड़ी बातें कर लें लेकिन उनकी लिखी फिल्में, उसके संवाद चीख चीख कर उनकी असलियत बताते चलते हैं। ये तो इन लेखकों की सौभाग्य है कि हिन्दुस्तान में फिल्मों को लेकर गंभीर अध्ययन कम होता है, अन्यथा इस तरह के लेखन करनेवाले लेखकों को महान तो नहीं ही माना जाता। उनके लिखे संवाद आदि पर तुलनात्मक अध्ययन होता। फिल्मों के दृष्य और संवाद के साथ साथ गीतों पर भी समग्रता में विचार होता। इस वैचारिकक मंथन से क्या निकलता इसका अनुमान पाठक लगा सकते हैं।
बात सिर्फ महिलाओं के कम कपड़ों पर उपदेश की नहीं है। उस पूरे संवाद में एक पंक्ति में जिस तरह से मंदिर की घंटी की बात की गई है वो भी लेखकों के सोच का परिचायक है। इस वाक्य को एक बार फिर से देखा जाना चाहिए जहां लेखक एक पुरुष पात्र के मुंह से कहलवाता है कि इस तरह के कपड़े पहनकर अगर आप बाहर सड़क पर निकलेंगी तो गुंडों की सीटियां नहीं बजेंगी तो क्या मंदिर की घंटियां बजेंगी। लेखक को गुंड़ों की सीटियां के सामने मंदिर की घंटियां नजर आई थी। मंदिर की घंटी और गुंडे की सीटी में तुलना का क्या औचित्य। औचित्य को अगर छोड़ भी दिया जाए तो इस तुलना की उपयुक्तता पर विचार किया जाना चाहिए। जावेद अख्तर के लेखन में हिंदू धर्म प्रतीकों को लेकर इस तरह की हल्की टिप्पणियां पहले भी रेखांकित की जा सकती हैं। इसलिए इस संवाद को लेकर किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। लेकिन दर्शकों को पता तो होना चाहिए कि प्रगतिशीलता का दावा करनेवाले लेखक की असलियत क्या है। महिलाओं और धार्मिक प्रतीकों के बारे में वो क्या सोचता है। जावेद अख्तर बहुधा व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बातें करते हुए नजर आते हैं। जब वो मंच से इस तरह की जुमलेबाजी करते हैं तो खूब तालियां बजती हैं। इस तरह की बातों रीलों पर लाइक्स भी बटोरते हैं। साहित्यिक मंचों पर इस तरह की बातें कर गंभीर लेखक और कवि होने का दावा पेश करते हैं पर उनके लिखे फिल्मी संवाद उनके सोच को सामने रख देते हैं। यह नहीं कहा जा सकता है कि फिल्मों की कहानी में तो फार्मूला और सफलता को ध्यान में रखकर लिखी जाती है। लिखी जाती होगी लेकिन लेखक के विचार तो उसमें आते ही हैं। ये सिर्फ जावेद अख्तर के साथ नहीं होता है बल्कि फिल्मों के सभी लेखकों के लेखन को देखने पर यही पता चलता है। अपने लेखन में लेखक वैचारिक छौंक लगाता ही है।
जावेद अख्तर खुद को नास्तिक भी घोषित करते रहे हैं। अपनी इस छवि को बल प्रदान करने के लिए मंचों पर इस्लाम को लेकर भी कटु बातें कह जाते हैं। लेकिन वो बातें इस्लामिक समाज की कुरीतियों तक ही होती हैं। किसी मंच या फिल्मी संवाद में उन्होंने इस्लाम से संबंधित किसी उपमा का, किसी प्रतीक का उपहास किया हो ऐसा दिखाई नहीं देता है। जब उनसे कभी किसी मंच पर कोई व्यक्ति इससे संबंधित प्रश्न पूछ लेता है तो वो इसको बहुत चतुराई के साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़ देते हैं। इमोशनल होकर ये पूछने लग जाते हैं कि क्या आप अपने मुल्क को सीरिया बनाना चाहते हैं। दर्शकों को लगता है कि देखो कितनी अच्छी बातें कर रहा है। फिर कुछ और मजेदार बातें, क्रोधित होने का अभिनय और जनता की तालियां। लेकिन इन तालियों से ना तो मूल प्रश्न का उत्तर मिलता है और ना ही जावेद अख्तर के लेखन से उपजे विचार की तार्किकता सिद्ध होती है। जावेद अख्तर की ये कैसी नास्तिकता है जो उनको सिर्फ हिंदू धर्म प्रतीकों का उपहास करने की अनुमति देता है। क्या हिंदुओं की सहनशीलता और सहिष्णुता उनको इस तरह की उपहासजनक टिप्पणियां करने का साहस देता है। ये उनकी कैसी प्रगतिशीलता है जो लड़कियों के कम कपड़ों पर टिप्पणियां करवाता है। आज कुछ राजनीतिक दल देश में स्मैश द पैट्रियार्की का ना बुलंद करते हैं, मनुस्मृति को प्रश्नों के कठघरे में खड़ा करते हैं। करिए, लेकिन जावेद अख्तर जैसे लेखकों के सोच को और उस तरह के लेखन तो भी रेखांकित कर प्रश्नांकित करने की आवश्यकता है।



