Translate

Saturday, September 19, 2026

सेंसर बोर्ड के समझ नई चुनौतियां


नौ वर्षों के लंबे अंतराल और प्रतीक्षा के बाद केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (चलन  में सेंसर बोर्ड) का पुनर्गठन किया गया। 2017 में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड में नए सदस्यों का मनोनयन हुआ था। नियमानुसार हर तीन साल में नया बोर्ड बनाया जाना चाहिए। इस वर्ष मई में जब केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के अध्यक्ष प्रसून जोशी को प्रसार भारती का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था तब चर्चा हुई थी कि सेंसर बोर्ड का नए सिरे से गठन होगा। प्रसून जोशी के बाद शशिशेखर वेंपति को सेंसर बोर्ड का अध्यक्ष नियुक्त किया गया लेकिन बोर्ड के नए सदस्यों की घोषणा नहीं हुई। अध्यक्ष की नियुक्ति के लगभग चार महीनों बाद 16 सितंबर को सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने अगले तीन वर्षों के लिए सेंसर बोर्ड के 18 नए सदस्यों के नाम की घोषणा कर दी। सेंसर बोर्ड में सिनेमा से जुड़े लोगों को प्राथमिकता दी गई है। फिल्मकार, अभिनेता, लेखक और रंगमंच से जुड़े लोगों को सदस्य बनाकर सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने बोर्ड के गठन को तर्कसंगत बनाया। पर प्रश्न ये उठता है कि जिस बोर्ड का गठन तीन वर्षों बाद यानि 2020 में हो जाना चाहिए था उसके गठन में इतनी देरी क्यों हुई। पिछले नौ वर्षों में सेंसर बोर्ड कई बार विवादों में घिरी थी। तब के अध्यक्ष प्रसून जोशी ने अपने सूझबूझ से उन विवादों का हल निकाल लिया था। नए बोर्ड के सामने अब नई तरह की चुनौतियां हैं। अब फिल्मकारों में सेंसर बोर्ड को फिल्म के प्रचार के टूल के तौर पर उपयोग करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। बोर्ड के गठन से ऐसा प्रतीत होता है कि मंत्रालय को इन चुनौतियों का अनुमान है इस कारण से विभिन्न क्षेत्रों में फिल्मों से जुड़े लोगों को सदस्य बनाया गया है। 

फिल्म सेंसर बोर्ड के गठन के बाद मनोरंजन की बदलती दुनिया को दृष्टिगत रखते हुए 1952 के सिनेमैटोग्राफी एक्ट में समयानुकूल बदलाव करने की चुनौती थी। मनोरंजन की दुनिया के बदलते स्वरूप और तकनीक के कारण बदलते समय के हिसाब से एक्ट में बदलाव पर लंबे समय से विमर्श हो रहा था। कोई निणय नहीं लिया जा सका था। सूचना और प्रसारण मंत्रालय में बैठे यथास्थिवाद के देवता बदलावों को नोटिफाई नहीं कर पा रहे थे। जिस दिन सेंसर बोर्ड के सदस्यों के नाम घोषित किए गए उसी दिन सरकार ने फिल्म प्रमाणन को लेकर एक नई गाइडलाइन भी जारी कर दी। 35 वर्षों बाद जारी इस गाइडलाइन में ड्रग्स और बच्चों को लेकर स्पष्टता दी गई है। दर्शकों के वर्गीकरण को और भी स्पष्ट किया गया है। 2016 में जब स्वर्गीय अरुण जेटली सूचना और प्रसारण मंत्री थी तो श्याम बेनेगल की अध्यक्षता में उन्होंने एक समिति बनाई थी। उस समिति की सिफारिशों को आंशिक रूप से समय समय पर लागू किया जाता रहा। अब जब मनोरंजन की दुनिया के साथ-साथ समाज भी बदल रहा है तो इसमें और भी सुधार की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। 35 वर्षों बाद सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने ये कदम उठाया है। इस गाइडलाइन के आरंभ में ही कहा गया है कि कलात्मक और सृजनात्मक अभिव्यक्ति को बाधित नहीं किया जाएगा। प्रमाणन को सामाजिक बदलाव के अनुसार तय किया जाए। नए गाइडलाइन में अश्लीलता पर भी एक पंक्ति है। हम सब जानते हैं कि अश्लीलता को परिभाषित करना बहुत मुश्किल है। जहां जुगुप्साजनक अश्लीलता होगी उसकी पहचान तो आसानी से की जा सकती है। बहुत लंबा चुंबन दृष्य हो या इंटीमेट सीन, दोनों को देखकर सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि ये कहानी की मांग है या फिर फिल्मकार की मुनाफा कमाने की मंशा। 

गाडलाइन की एक और बिंदु ने ध्यान खींचा, जिसमें ये लिखा गया है कि सेंसर बोर्ड फिल्म के समाज पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन करते हुए प्रमाणन का निर्णय ले। कई बार फिल्मकार बहुत चालाकी से पात्रों के नाम आदि के आधार पर ये संदेश देने की कोशिश करते हैं कि अमुक समुदाय पीड़ित है और अमुक समुदाय उसको दबा रहा है या उसपर अत्याचार कर रहा है। फिल्म मुक्काबाज के एक संवाद का उदाहरण कई बार दिया जा चुका है। संवाद है – वो आएंगे और पीट-पीटकर तुम्हारी हत्या कर देंगे और भारत माता की जय का नारा लगाकर चले जाएंगे। संवाद से स्पष्ट था कि फिल्मकार किसको टार्गेट कर रहे थे। इस संवाद का फिल्म की कहानी और संबंधित दृश्य से बहुत अधिक लेना देना नहीं था। लेना-देना था तो फिल्मकार के सोच और उसकी राजनीतिक मानस और प्रतिबद्धता से। फिल्मों के माध्यम से राजनीति करने की, अपनी विचारधारा को आगे बढ़ाने की और विरोधी विचारधारा को गिराने का खेल इन दिनों काफी बढ़ गया है। बहुत सारे ऐसे फिल्मकार हैं जो मोदी सरकार के विरोधी हैं और वो अपनी कहानी और संवाद के माध्यम से सरकार के विरुद्ध माहौल बनाने के लिए फिल्म की कलात्मक और सृजनात्मक स्वतंत्रता का सहारा लेते हैं। पहले भी ऐसा होता था पर कम।  

पिछले दिनों ऐसी खबरें आई थीं कि पंजाबी फिल्म दस्तार को लेकर सेंसर बोर्ड ने कड़ा रुख अपनाया था। उसमें कई कट्स लगाने की सलाह दी गई थी। इस फिल्म के दृष्य और संवाद ऐसे थे जो कि व्यापक समाज हित में नहीं थे। आतंकवादियों को लेकर गांवों में जिस तरह के दृष्य दिखाकर उनको महिमामंडित करने की कोशिश की गई थी वो व्यापक समाज और देशहित में नहीं था। आतंकवादियों के पड़ोसी देश में जाने को लेकर परिवार में जो संवाद होता था वो भी अनुचित था। इसके पहले फिल्म सतलुज को पिछले चार वर्षों से सेंसर सर्टिफिकेट नहीं मिला था तो उसके पीछे कारण है। वो फिल्म सिस्टम पर सवाल उठाने के आवरण में देश पर प्रश्न खड़े करती है। सेंसर बोर्ड  के सामने इस तरह के कंटेंट को देखना और उसका प्रमाणन बड़ी चुनौती है। सेंसर बोर्ड के क्षेत्रीय कार्यालयों को भी सुधारना होगा। वहां से पूर्व में भ्रष्टाचार की खबरें ती रही हैं। जो फिल्में क्षेत्रीय स्तर पर प्रमाणित की जाती हैं उसमें पारदर्शिता और जिम्मेदारी तय करने की आवश्यकता है। अकारण किसी फिल्म को रोका न जाए और कारण हो तो किसी फिल्म को प्रमाण पत्र दिया भी न जाए। चतुर फिल्म निर्माताओं ने ऐसी जुगत निकाली है कि फिल्म मुंबई में बनाओ लेकिन सर्टिफिकेशन के लिए कोलकाता या दिल्ली में आवेदन करो। क्यों। 

सूचना और प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव के पास कई अहम जिम्मेदारियां हैं। पर एक काम अच्छा किया गया कि सेंसर बोर्ड के चेयरमैन शशिशेखर वेंपति को बनाया गया। शशिशेखर वेंपति तकनीक में माहिर हैं। उनके इस हुनर का लाभ सेंसर बोर्ड के क्रियाकलापों को और पारदर्शी बनाने में किया जाना चाहिए। हलांकि सेंसर बोर्ड का एक्स हैंडल जो 2022 के बाद से निष्क्रिय था उसको सक्रिय किया गया है। दरअसल फिल्म एक ऐसी विधा है जिसका समाज पर व्यापक प्रभाव है। इस कारण लोगों की इसमें अधिक रुचि होती है। कोई फिल्म विवादित होती है तो चर्चा बटोरती है। कोई सूत्र मिल जाए तो प्रधानमंत्री तक को लपेटे में लेने का प्रयास किया जाता है। नए बोर्ड के समझ चुनौतियां भी हैं और अवसर भी। 


Saturday, September 12, 2026

विचारधारा की जकड़न में फिल्मकार


हिंदी फिल्मों के एक निर्देशक हैं तिग्मांशु धूलिया। उन्होंने कई फिल्में निर्देशित की हैं। कुछ में अभिनय भी किया है। लोग उनको फिल्म पान सिंह तोमर के निर्देशक के तौर पर जानते हैं। इस फिल्म को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला था। पिछले दिनों एक कार्यक्रम में उनका भाषण हुआ। तिग्मांशु ने करीब आधे घंटे के अपने उद्बोधन में दुनिया जहान की बातें की। पूंजीवाद के खतरे से लेकर इप्टा (भारतीय जन नाट्य संघ) से जुड़े किस्से सुनाए। चूंकि वो फिल्मों से जुड़े हैं तो फिल्मी बातें अधिक हुईं। राजनीति पर भी गए। अपने अनुभव भी साझा किए। अपना मत भी रखा। उनका मानना था कि इन दिनों हिंदी फिल्मों से कहानी गायब हो गई है। फिल्म धुरंधर का उदाहरण देते हुए उपहास के अंदाज में उसकी कहानी पर प्रश्न खड़ा किया। बोले कि बस एक व्यक्ति है जो पाकिस्तान जाता है। वहां तबाही मचाता है। ऐसी टिप्पणी करनेवाले तिग्मांशु को ये बताना चाहिए था कि कहानी क्या होती है। क्या कहानी सिर्फ उन फिल्मों में ही होती है जो लेफ्ट इकोसिस्टम के निर्देशक बनाते हैं। फिल्म धुरंधर में अगर कहानी नहीं दिखाई देती है तो उनको कहानी की परिभाषा का फिर से अध्ययन करना चाहिए। हिंदी के कई आलोचकों ने कहानी की परिभाषा दी है। अगर तिग्मांशु उन परिभाषाओं को एक बार देख लेते तो बेहतर तरीके से अपनी बात रख पाते। 

तिग्मांशु ने ये भी कहा कि हिंदी फिल्मों में हिंसा बहुत हो गई है। समाज क्रोध में है। यह बात आंशिक रूप से सही हो सकती है लेकिन सामान्यीकरण भी है। फिल्मों में हिंसा दिखाई जा रही है पर कई ऐसी फिल्में बन रही हैं जिनमें हिंसा नहीं होती। हिंसा तो कहानी पर निर्भर करती है। पिछले दिनों कई बेहतर प्रेम कहानी आई हैं जिसको दर्शकों ने पसंद किया। फिल्म सैयारा इसका सबसे सशक्त उदाहरण है। चूंकि उन्होंने कहा कि वो फिल्में नहीं देखते। संभव है कि इस कारण उनको हिंदी फिल्मों की दुनिया में क्या घट रहा है इसका अनुमान कम हो। तिग्मांशु धूलिया की बातों के आलोक में उनकी फिल्म घमासान को परख लेते हैं। बीते शुक्रवार को उनकी फिल्म घमासान रिलीज हुई। ये फिल्म 2006 के उत्तर प्रदेश की कहानी कहती है। उत्तर प्रदेश का एक दस्यु सम्राट जिसका बुंदेलखंड इलाके में खौफ है। राजनीति से उसका संबंध और चुनाव के बाद फिल्म के अंत में उसके एनकाउंटर पर कहानी समाप्त होती है। ये एक ऐसी कहानी है जो दर्जनों बार हिंदी फिल्मों में कही जा चुकी है। तिग्मांशु ने जिस तरह से इस फिल्म को बुना है वो भी पुरानी प्रविधि है। एक ही कहानी को बार बार दोहराने से कथा का मूल तत्त्व, उत्सुकता, समाप्त हो जाता है। उनकी शिकायत है कि हिंदी फिल्में हिंसा के एक विशेष टेंपलेट में फंस गई है। घमासान देखने के बाद तो यही लगता है कि तिग्मांशु स्वयं डकैतों की समस्या और उसके खात्मे के हिंदी फिल्मों के पुराने टेंपलेंट में फंसे हैं। अपनी ही फिल्म पान सिंह तोमर से एक इंच भी आगे नहीं जा पाए हैं। राजनीति का तड़का लगाने का प्रयास अवश्य किया है लेकिन वो फार्मूला भी बहुत ही पुराना हो चुका है। रही बात हिंसा की तो इस फिल्म में तिग्मांशु ने भी दस कटे हुए सर का सार्वजनिक प्रदर्शन किया है। क्लोज शाट भी दिखाया है। यहां वो हिंसा को कहानी की मांग बताकर उचित करार दे सकते हैं। यही बात अन्य फिल्मों पर भी लागू होगी। अपनी फिल्म में हिंसा दिखाना कहानी की मांग और कोई दूसरा दिखाए तो वो एक टेंपलेट। गजब विचार है। 

उन्होंने अपने व्याख्यान में दो उदाहरण दिए और बताया कि जवाहरलाल नेहरू कितने उदार थे। जब एक फिल्म सेंसर बोर्ड में अटक गई तो दिलीप कुमार ने नेहरू से गुहार लगाई। नेहरू ने फिल्म देखकर सेंसर बोर्ड को फिल्म रिलीज करने को कहा। तिग्मांशु को ये कदम उदारता लग सकती है। पर यह एक खतरनाक प्रवृत्ति थी कि एक वैधानिक संस्था के निर्णय को प्रधानमंत्री ने पलट दिया। आज अगर ऐसी कोई छोटी सी घटना हो जाए तो यही लोग आसमान सर पर उठा लेंगे। संविधान की दुहाई देने लगेंगे। उनकी एक और बात को रेखांकित करने की आवश्कता है कि 2017 तक सब ठीक था लेकिन पता नहीं क्यों उसके बाद फिल्मी दुनिया अचानक क्यों बदल गई। वो ये भी कह गए कि 2017 तक ‘इनको’ (वर्तमान सरकार को) फिल्मों की समझ नहीं थी। कैसा अजीब तर्क है। तिग्मांशु जैसे वामपंथी पता नहीं क्यों नहीं समझ पा रहे हैं कि देश का मूड बदल चुका है। दर्शकों की पसंद बदल गई है। दस्यु और उनके आतंक की कहानी अब दर्शक नहीं सुनना/देखना चाहते हैं। कई बार देख लेने के बाद उनको ये दोहराव लगता है। न कहानी अलग, न ही ट्रीटमेंट अलग न ही कोई चौंकानेवाली बात।

दरअसल तिग्मांशु और उन जैसे वामपंथी निर्देशकों की कठिनाई अलग है। अब उनकी फिल्में चल नहीं रही हैं तो वो दर्शकों के सर पर इसका ठीकरा फोड़ना चाहते हैं। इसी इकोसिस्टम के एक और निर्देशक हैं सुधीर मिश्रा। एकाध अच्छी फिल्में बनाईं हैं। जब उनकी फिल्म अफवाह रिलीज हुई तो वो दर्शकों को बांटने लगे थे। अफवाह और द केरल स्टोरी एक साथ रिलीज हुई थी। द केरल स्टोरी सुपर हिट रही और अफवाह बुरी तरह पिट गई। तब सुधीर ने एक्स पर लिखा था- ‘द कश्मीर फाइल्स के बारे में लिबरल्स को शिकायत रहती है। क्यों? विवेक अग्निहोत्री ने एक फिल्म बनाई और उसके दर्शक इस फिल्म को देखने के लिए थिएटर में आए। लेकिन जब हम फिल्म बनाते हैं तो हमारे दर्शक, जो विवेक की आलोचना करते हैं, चुपचाप बैठे रहते हैं। वो फिल्म देखने के लिए सिनेमा हाल नहीं पहुंचते हैं।‘ ये टिप्पणी कुंठा की पराकाष्ठा है। तिग्मांशु उसी राह पर हैं। 

तिग्मांशु जब फिल्मकारों की लाचारगी की बात करते हुए कहते हैं कि जब अच्छी कहानी कहनेवाले फिल्मकारों पर संकट आता हो तो कोई बचाने नहीं आता। भाईचारा खत्म हो गया है। तिग्मांशु धूलिया जी इस भाईचारे को खत्म करने का आरंभ तो आप जैसे कलाकारों ने ही 2014 में किया था। जब लोकसभा चुनाव का प्रचार अपने अंतिम चरण में था तो इम्तियाज अली, विशाल भारद्वाज, नंदिता दास, कबीर खान, महेश भट्ट जैसे लोगों ने परोक्ष रूप से कांग्रेस के पक्ष में और नरेन्द्र मोदी के विरोध में खुला पत्र लिखा था। आप जब नेहरू फैन होने की बात करते हैं तो 2014 की आपका बयान याद आता है कि मोदी को प्रधानमंत्री के पद पर देखना दुखद होगा। आपकी प्रतिबद्धता स्पष्ट है । आपलोगों को अगर राजनीति करनी है तो खुलकर राजनीति के मैदान में उतरिए। कला और फिल्मों को औजार मत बनाइए। दर्शक समझ चुके हैं आपलोग कब समझेंगे । जितनी जल्दी समझ जाएं वो फिल्मी दुनिया के लिए बेहतर होगा। और हां ! लोकतंत्र 1793 में फ्रांस में आरंभ नहीं हुआ था। उसके बहुत पहले से भारत में वैशाली में लोकतांत्रिक शासन प्रणाली चल रही थी। अपने देश को, अपने अतीत को समझिए, उसपर गर्व करिए दर्शकों को समझ जाएंगे। 


Saturday, September 5, 2026

प्रयोगधर्मिता से ‘एक्शन’ में नायिकाएं,


हाल के दिनों में दो नायिका प्रधान फिल्में आई। दोनों एक्शन फिल्म है। दोनों फिल्मों में बच्चियों की जिंदगी केंद्र में है। जुलाई में शिव रवैल के निर्देशन में आई फिल्म अल्फा में आलिया और शरवरी मुख्य भूमिका में हैं। जबकि इसी महीने देवाशीष मखीजा के निर्देशन में बनी फिल्म गांधारी आई। इसमें तापसी पन्नू मुख्य भूमिका में है। गांधारी के पहले तापसी और कंगना के बीच विवाद भी उठा था। कई बार देखा गया है कि जब कोई फिल्म रिलीज होनेवाली होती है तो उससे जुड़े नायक-नायिका या कहानी को लेकर विवाद होता है। कुछ लोगों का मानना है कि फिल्म की रिलीज के समय इस तरह के विवाद उठाने के पीछे मंशा फिल्म को चर्चित करने की होती है। कंगना और तापसी के बीच के विवाद को तापसी ने खत्म करने का प्रयास किया, लेकिन विवाद की चर्चा तो हो ही गई। फिल्म को इससे कितना लाभ मिला ये कहना तो कठिन है लेकिन विवाद की टाइमिंग को तो रेखांकित किया ही जाना चाहिए। इस लेख का विषय दो नायिकाओं के बीच विवाद की चर्चा नहीं हे। चर्चा तो नायिका प्रधान एक्शन फिल्मों की करना चाह रहे हैं। 

हिंदी फिल्मों में इस बात की बहुत चर्चा होती रही है कि नायिकों को सिर्फ उनके ग्लैमर औरर आकर्षण के कारण फिल्मों में शो पीस की तरह रखा जाता है। ये बात तो कई दशकों से कही सुनी जा रही है कि हिंदी फिल्मों में नायिकाओं को पेड़ के चारों तरफ घूमते हुए डांस करना और रोमांटिक सीन देने के लिए फिल्मों रखा जाता है। पिछले सालों में तो चर्चा ये होने लगी थी नायक और नायिकाओं को फिल्म में काम करने के लिए एक समान पैसे मिलते हैं या नहीं। अगर नायिकाओं को कम दिए जाते हैं तो क्यों। एक दौर ऐसा भी आया था कि फिल्मों में माधुरी दीक्षित को कई नायकों से अधिक पैसे मिलते थे। टीवी की दुनिया में स्मृति इरानी को साथी पुरुष कलाकारों से अधिक पैसे मिला करते थे। लेकिन ये एक दो उदाहरण हैं। हिंदी फिल्मों में नायकों को अधिक और नायिकाओं को कम पैसे मिलते रहे हैं। अभी भी मिल रहे हैं। इसके पीछे का कारण तो सिर्फ व्यवसाय ही नजर आता है। इसमें नायक नायिका में भेद-भाव की मानसिकता जैसी कोई बात ना तो समझ आती है और ना ही नजर। फिल्म उद्योग पूरी तरह से कारोबारी दुनिया है जहां सबकुछ लाभ-हानि को ध्यान में रखकर होता है। अगर कोई फिल्म नायक के नाम और छवि पर सफल होती है तो उसका बाजार भाव बढ़ जाता है। अगर कोई फिल्म नायिका अपने कंधे पर उठाकर सफलता की सीढ़ी चढ़ती है तो उसका बाजार भाव निश्चित रूप से बढता है। 

फिल्म अल्फा यशराज फिल्म्स की स्पाई यूनिवर्श की कहानी है। इसमें अनिल कपूर, बाबी देओल, ऋतिक रोशन भी हैं लेकिन कहानी आलिया भट्ट और शरबरी के इर्द गिर्द ही घूमती है। कहानी अच्छी है। स्पाई यूनिवर्स की कहानियों में सरप्राइज एलिमेंट बहुत होते हैं। इस फिल्म में भी है। बाबी देओल का जो फिल्मी चरित्र है वो खुद को देशभक्त कहता है लेकिन अंत में उसका भेद खुलता है और वो पाकिस्तानी एजेंट होता है। वो सेना और आर एंड डब्ल्यू को चकमा देने में सफल रहता है। कहानी बहुत सधे तरीके से आगे बढ़ती है। फिल्म में मार-धाड़ बहुत है लेकिन निर्देशक ने फिल्म को जुगुप्साजनक हिंसा से बचा लिया है। हिंसक दृष्यों को देखकर मन खराब नही होता है। आलिया अपने एक्शन दृष्यों में स्वाभाविक लगती है लेकिन शबरबी की एंट्री के साथ ही वो आलिया पर भारी पड़ती दिखती है। आलिया की तुलना में शरबरी का रोल कम है लेकिन जितनी भी देर वो पर्द पर रहती है आलिया को टक्कर देती नजर आती है। अपने अपियरेंस से, अपने एटीट्यूड से और अपने अभिनय से। इस फिल्म में निर्देशक शिव रवैल की भी प्रशंसा की जानी चाहिए कि उन्होंने कथानक को बहुत मजबूती से बुना। दर्शक कहीं उबता नहीं है। कहानी में सरप्राइज एलिमेंट्स भी हैं जो कथानक के बढने के साथ साथ खुलता है। दर्शकों के मन में फिल्म देखते हुए ये चलता रहता है कि आगे क्या। यही आगे क्या किसी फिल्म की सफलता का पैमाना होना चाहिए, खासकर अगर स्पाई यूनिवर्स की फिल्म है तो। शिव रवैल ने इसके पहले भोपाल गैस त्रासदी पर आधारित वेबसीरीज द रेलवे मैन निर्देशित की थी। उस सीरीज को दर्शकों का प्यार मिला था और शिव के काम की सराहना हुई थी। शिव रवैल एक समृद्ध विरासत को भी आगे बढ़ा रहे हैं, उनके पिता राहुल रवैल और दादा एचएस रवैल ने कई सुपर हिट फिल्में बनाई थीं। फिल्म अल्फा में शिव रवैल ने पहली बार निर्देशक की भूमिका का निर्वाह किया है। 

फिल्म गांधारी में तापसी पन्नू अपनी छवि के अनुरूप किरदार निभा रही हैं। एक मध्यमवर्गीय परिवार की महिला जिसकी बेटी का अपहरण हो जाता है। बेटी की तलाश में पूरी फिल्म है। तापसी ने एक्शन करने का भी प्रयास किया है लेकिन जब वो फाइट सीन देती है तो स्वाभाविक नहीं लगती हैं। अपनी बेटी की तलाश करते करते उसको छह साल से कम उम्र की बच्चियों को अवैध तरीके से विदेश भेजने के गैंग का पता चलता है। कहानी बहुत उलझी हुई है और कथानक में गैप है जिसको भरने में निर्देशक विफल रहे हैं। दर्शकों को चौंकाने के चक्कर में कथानक की निरंतरता बाधित होती है। फिल्म में धर्म का ज्ञान भी दिया गया है लेकिन ये आउट आफ प्लेस लगता है। जैसे तापसी की ही एक अन्य फिल्म अस्सी में जबरदस्ती हिंदी के कवियों का नाम पात्रों से कहलवाया गया था। ना तो उसकी कोई प्रासंगिकता थी और ना ही आवश्यकता। निर्देशक और फिल्म लेखक को लगा होगा कि उन नामों के उल्लेख से उनको हिंदी साहित्य का ज्ञाता मान लिया जाएगा। फिल्म गांधारी के कई दृश्यों में तापसी स्वाभाविक भी लगी है। जब वो दृष्टिहीन महिला के रोल में थाने के बाहर बैठकर बेबस दिखती हैं। ये बहुत ही पावरफुल सीन है। ऐसा फिल्म में बहुत कम जगह दिखा है। कई जगह तो अस्वाभिवक से लगने वाले दृष्य भी निर्देशक ने ठूंसे हैं। बहुरूपियों की दुनिया को दिखाने का प्रयत्न भी किया गया है लेकिन उस दुनिया को लेकर और रिसर्च करने की जरूरत थी। 

फिल्म अल्फा और गांधारी को देखने के बाद लगता है कि हिंदी की फिल्मी दुनिया अब नायिका प्रधान फिल्मों में ज्यादा निवेश करने लगी है। कंगना की फिल्म भारत भाग्य विधाता भी नायिका प्रधान थी। नायिका प्रधान फिल्म बनाना अच्छी बात है लेकिन कहानी और उसके ट्रीटमेंट को लेकर बहुत सजग और सावधान रहने की आवश्कता होती है। जहां भी अनावश्यक रूप से नायिका को सुपर हीरो बनाने या दिखाने का प्रयास होता है, दर्शक फौरन भांप लेता है। परिणाम फिल्म असफलता के रास्ते पर चल पड़ती है। बावजूद इसके अगर नायिकाओं को लीड रोल और विशेषकर एक्शन रोल में लेकर फिल्में बनने लगी हैं तो यह एक सुखद ट्रेंड है। हिंदी दर्शकों को के लिए भी और फिल्मकारों के लिए भी।    


Saturday, August 29, 2026

पुस्तक को चर्चित करने का खेल


कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी की संस्मरणात्मक पुस्तक के भारत में प्रकाशन को लेकर विवाद जैसा हो गया है। बताया जा रहा है कि सोनिया गांधी की पुस्तक बिलांगिंग,ए जर्नी आफ लव के भारत में प्रकाशन पर लेखक और प्रकाशक में मतभेद है। इस पर चर्चा करने के पहले जरा इस पुस्तक की घोषणा की पृष्ठभूमि देखते हैं। पहले इंटरनेट मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म्स पर इस पुस्तक का कवर आया। लोगों ने पोस्ट करना आरंभ किया, सोनिया जी की पुस्तक आ रही है। उत्सुकता का वातावरण बनाया गया। एक्स और फेसबुक पर कवर के बाद कहा जाने लगा कि सोनिया गांधी ने अपनी पुस्तक में राजीव गांधी से मिलने से लेकर गांधी परिवार की बहू बनने तक की घटनाओं का उल्लेख किया है। जो लोग भी पोस्ट कर रहे थे उनमें से किसी ने पुतक पढ़ी नहीं थी। पुस्तक 10 नवंबर को बाजार में आ रही है। अमेरिका का प्रकाशक इसको प्रकाशित कर रहा है। राजीव और सोनिया ने प्रेम विवाह किया था। किताब के नाम में जर्नी आफ लव को उनकी प्रेमकथा से जोड़कर लोगों ने पोस्ट लिखे। पुस्तक के प्रति उत्सुकता का वातावरण गाढ़ा हुआ। अब चर्चा हो रही है कि प्रकाशक पेंग्विन इंडिया ने भारत में उनकी पुस्तक को छापने से मना कर दिया है। इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स पर चर्चा ने जोर पकड़ा। बताया जाने लगा कि प्रकाशक ने लेखिका से कुछ प्रसंगों और अंशों को बदलने का आग्रह किया गया। लेखिका ने प्रकाशक की बात मानने से इंकार कर दिया। इसको विवाद का रूप दिया गया। इस प्रसंग को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़कर देखा जाने लगा। 

प्रकाशक पेंग्विन ने अपनी तरफ से सफाई दी। घोषणा की कि सोनिया गांधी की पुस्तक पेंग्विन से प्रकासित नहीं हो रही है। आगे लिखा कि प्रकाशक होने के नाते उनका विशेषाधिकार और जिम्मेदारी है कि वो किसी भी पुस्तक के किसी भी प्रसंग का फैक्ट चेक करें। लेखक को अपनी राय से अवगत करवाएं, जो कि पुस्तक के हित में हो। ये प्रकाशन जगत की समान्य प्रक्रिया है। पेंग्विन ने आधिकारिक बयान में कहा वो अब भी इस पुस्तक को छापने के इच्छुक हैं। साथ ही बताया कि प्रकाशक और लेखक के बीच जो भी बात हुई है उसकी गोपनीता बरकरार रखना चाहते हैं। पेंग्विन ने सही कहा है। कथेतर पुस्तकों में फैक्ट चेक करने की आवश्यकता होती है। फिक्शन में तो किसी तरह प्रसंग काल्पनिक कहकर चल जाता है। जब आप किसी पुस्तक को संस्मरणात्मक कहते हैं या किसी घटना के आधार पर लिखते हैं तो उसकी प्रामाणिकता तो सिद्ध करनी ही होती है। ये तो प्रकाशन जगत की सामान्य प्रक्रिया है। जो लेखक कथेतर गद्य लिखते हैं उनको ये पता भी है। मैंने ही लोकसभा चुनाव में अमेठी में राहुल गांधी की हार और स्मृति इरानी की जीत को केंद्र में रखकर अमेठी संग्राम नाम की पुस्तक लिखी थी। उस पुस्तक के कई प्रसंगों पर प्रकाशक ने आपत्ति जताई थी। कइयों की उसकी प्रामणिकता के बारे में आशंकित थे। प्रियंका गांधी से संबंधित एक घटना मेरी पुस्तक में उल्लिखित है। प्रियंका पर टिप्पणी सुनने के बाद  स्मृति इरानी ने एक बेहद कठोर निर्णय लिया था। उस निर्णय का उनके चुनाव परिणा पर असर पड़ सकता था। इस प्रेसंग को लेकर प्रकाशक आश्वस्त नहीं थे। उन्होंने प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए बोला। जब उस घटना के साक्षियों के वर्जन आए तब प्रकाशक संतुष्ट हुए। दूसरी पुस्तक मार्क्सवाद का अर्धसत्य को लेकर भी प्रकाशक के कुछ प्रश्न थे। जिनको हमने साथ बैठकर हल किया था। यह तो लेखक और प्रकाशक के बीच चलनेवाली एक रुटीन प्रक्रिया है। लेकिन इन तमाम बातों के बीच सोनिया गांधी की पुस्तक को लेकर उत्सुकता का वातावरण बना हुआ है। 

इंटरनेटट मीडिया पर अब इस तरह की बातें आ रही हैं कि सोनिया जी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की एक भेंट के प्रसंग को लेकर प्रकाशक ने आपत्ति जताई। चीन-भारत संबंध के अध्याय को लेकर प्रकाशक के कुछ प्रश्न थे। इसी तरह से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबंधित प्रसंगों की प्रामाणिकता को लेकर प्रकाशक आश्वस्त होना चाहते थे। संस्मरणों में इस तरह की बातें होती हैं जो बहुधा लेखक की धारणा पर आधारित होती है । उससे किसी अन्य की छवि पर असर पड़ सकता है। संभव है कि उक्त प्रसंगों में इस तरह की धारणाएं हों जिसको लेकर प्रकाशक आश्वस्त होना चाहता हो। यही आश्वस्ति तो कांग्रेस के नेता 2010 में चाह रहे थे जब स्पैनिश लेखक जेवियर मोरो की पुस्तक ‘द रेड साड़ी’ भारत में प्रकाशित होनेवाली थी। जेवियर मोरो ने 2008 में स्पैनिश भाषा में सोनिया गांधी की जीवनी लिखी थी। उसका अनुवाद इटैलियन, फ्रेंच और डच भाषा में हुआ था। भारत में जब मोरो की पुस्तक के प्रकाशन की बात आई थी को कांग्रेस के नेताओं ने इसका खूब विरोध किया था। जहां तक मुझे स्मरण है कि जेवियर मोरो को कानूनी नोटिस भी भेजी गई थी। उस पुस्तक के कुछ प्रसंगों को लेकर कांग्रेस के नेताओं को आपत्ति थी। इमरजेंसी में सोनिया गांधी की भूमिका, सोनिया और मेनका गांधी के बीच के संबंध, गांधी परिवार की घटनाओं को लेकर कांग्रेस नेताओं को आपत्ति थी। कांग्रेस नेताओं ने तब जेवियर मोरो की पुस्तक को असत्य, अर्धसत्य और अपमानजनक बताया था। उस समय जेवियर मोरे ने ये दावा किया था कि सोनिया गांधी की जीवनी लिखने के लिए इटली स्थित सोनिया गांधी के पैतृक शहर लुसियाना में काफी समय बिताया था। उसने तो यहां तक दावा किया था कि पुस्तक प्रकाशन के पहले उसकी पांडुलिपि सोनिया जी की बहन नाडिया को दिखाई गई थी। सोनिया जी को भेजने का दावा भी मोरो ने किया था। बाद में जब केंद्र में सरकार बदली तब 2015 में ये पुस्तक भारत में प्रकाशित हो सकी। मोरो ने विवादों के बीच अपनी पुस्तक को फिक्शनलाइज्ड बायोग्राफी कहा था। पुस्तक पर डिस्क्लेमर भी लगाया था कि बातचीत संवाद और स्थितियां लेखक की व्याख्या पर आधारित है। यह आवश्यक नहीं कि वो प्रामाणिक भी हो। 

अब जब सोनिया गांधी की संस्मरणात्मक पुस्तक आ रही है तो वही लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रश्न खड़ा कर रहे हैं जो उस समय जेवियर मोरो की पुस्तक का विरोध कर रहे थे। प्रामाणिकता की मांग करनेवाले वही लोग या तो अब खामोश हैं या प्रकाशक को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। ना तो यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मसला है और ना ही इसमें किसी प्रकार के दबाव की बात है। यह मामला सीधे तौर पर प्रसंगों की प्रामाणिकता का है। संभव था कि सोनिया जी इसको फिक्शनलाइज्ड संस्मरण कह देती और पेंग्विन आपत्ति नहीं करता। पर ऐसा नहीं होने के संकेत हैं। दुनिया भर में ऐसे अनेक विवाद सामने आते रहे हैं जब प्रकाशक, लेखक की बातों से असहमत होते हैं और पुस्तक छापने से इंकार देते हैं। सोनिया जी की पुस्तक का विवाद को भी इसी आईने में देखे जाने की जरूरत है। हां, इन प्रसंगों से इतना अवश् हुआ कि पुस्तक को लेकर उत्सुकता का वातावरण बना हुआ है। चर्चा होगी तो बिक्री पर असर पड़ना स्वाभाविक है। 


Saturday, August 22, 2026

श्रीराम की छवि की व्याख्या का खेल


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लाल किला की प्राचीर से दिमागी नक्सल शब्द युग्म का प्रयोग किया। तमाम दिमागी नक्सल बिलबिलाने लगे। समाज को पता लगाने के लिए श्रम नहीं करना पड़ा और उनकी पहचान हो गई। यह ठीक है कि समाज में दिमागी नक्सलियों की उपस्थिति है, पर दिमागी नक्सल व्यक्ति से अधिक प्रवृत्ति है। ये प्रवृत्ति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चलती है। दिमागी नक्सली जैसी प्रवृत्ति समय के अनुसार अपने में बदलाव करके समाज को भ्रमित करने का कार्य भी करती है। प्रश्न उठता है कि क्या ये अनायास है कि प्रगतिशील और जनवादियों को अब प्रभु श्रीराम की चिंता होने लगी है। समाज में राम-राम कहकर अभिवादन करने की जगह जयश्रीराम से अभिवादन करना उनको राजनीतिक लगने लगा है। राम-राम और जयश्रीराम में उनको अंतर नजर आता है। राम-राम में कोमलता और जयश्रीराम में आक्रामकता। इतना ही नहीं समाजवाद की डोर थामे जनवाद की ध्वजा लहरानेवाले एक प्राध्यापक आलोचक तो कबीर और गांधी के राम, तुलसीदास के राम और सत्ताधारी दल के राम में अंतर दिखाने की कोशिश करते हैं। अयोध्या के भव्य और नव्य मंदिर में स्थापित श्रीराम की अलग छवि ढूंढने की कोशिश भी होती है। ढूंढते ही नहीं हैं बल्कि प्रभु श्रीराम की एक राजनीतिक छवि गाढा करने का प्रयत्न करते हैं। अच्छी बात है कि समाजवादी/जनवादी और वामपंथी प्रभु श्रीराम की बात तो करने लगे हैं। यह इनका ह्रदय परिवर्तन है या समाज को राम के नाम पर बांटने का प्रयास। इसको देखना होगा। वो राम की राजनीतिक छवि गढ़ने का प्रयत्न नहीं करते बल्कि राम के इमाम-ए-हिंद कहे जाने की बात को दोहराते हुए एक अलग विमर्श खड़ा करना चाहते हैं। ये भूल जाते हैं कि लोक में प्रभु श्रीराम की जो छवि व्याप्त है उसको बदलने या उसको प्रश्नांकित करने का प्रयास सफल हो ही नहीं सकता है। 

एक वामपंथी प्राध्यापक आलोचक प्रभु श्रीराम की छवियों में अंतर खोज रहे हैं तो एक अन्य वामपंथी प्राध्यापक-आलोचक तुलसी को याद करते हुए उनकी पंक्तियों को व्याख्यायित करते हुए वर्तमान राजनीति से जोड़कर सामने रखने का प्रयास कर रहे हैं। तुलसी दास की पंक्तियों के आधार पर ये महोदय भी श्रीराम की वाल्मीकि की बनाई छवि, तुलसी की रचनाओं से बनती छवि और आज की राजनीति में उनकी छवि को अलग अलग देखने का प्रयत्न करते हैं। आलोचक महोदय कहते हैं, तुलसी ने जिस राम को गढ़ा था वे वाल्मीकि से भिन्न हैं और आज जिस राम का प्रचार है वो तुलसी के राम से भिन्न हैं। फतवेबाजी करके निकल जाते हैं अपनी अवधारणा के समर्थन में कोई मजबूत तर्क प्रस्तुत नहीं करते हैं। ये महोदय तुलसी की एक पंक्ति राज-नीति बिनु धन-बिनु धर्मा को उद्धृत करते हुए कहते हैं कि इसमें तुलसी अपने समय में स्पष्ट कहते हैं कि राजनीति नीति-विहीन हो गई है और लोग अधर्म को अपना कर अमीर हो रहे हैं। साथ ही एक पंक्ति जड़ते हैं कि यह आज का भी यथार्थ है। प्रस्तुत ऐसे कर रहे हैं कि ऐसा हाल के दिनों में हो रहा है पहले ऐसा नहीं था। यही आलोचकीय बेईमानी है। इस तरह की कई पंक्तियों को उद्धत करके उसको आज का संदर्भ देने की कोशिश में भाईलोग लगे हुए हैं। तुलसीदास की पंक्तियों के साथ वामपंथी ऐसा पहली बार नहीं कर रहे हैं बल्कि पहले भी लगातार ऐसा करते हैं। महिलाओं और समाज के एक विशेष वर्ग को लेकर लिखी गई उनकी पंक्तियों के आधार पर तुलसीदास को कठघरे में खड़ा किया जाता रहा है। 

तुलसीदास की बात करते हुए इन वामपंथियों को कबीर अवश्य याद आते हैं। कबीर को वो क्रांतिकारी सिद्ध करते रहे हैं । उनकी तुलना में तुलसी को परंपरावादी और दकियानूसी कहते हैं। कबीर को क्रांतिकारी और तुलसी को परंपरावादी दिखाने की होड़ में कुछ क्रांतिकारी लेखकों ने तुलसीदास को वर्णाश्रम व्यवस्था का पोषक, नारी और शूद्र विरोधी करार देकर उनकी जमकर आलोचना की। श्रीरामचरितमानस की एक पंक्ति को उठाकर तुलसीदास को कलंकित करने का प्रयास हुआ लेकिन उनकी कविताओं में उनकी रचित चौपाइयों में इतनी शक्ति है कि वो उनपर इन आलोचनाओं का कोई असर ही नहीं हुआ। वामपंथियों ने सुनियोजित तरीके से तुलसीदास की उन पंक्तियों को उठाया जिनसे उनकी छवि स्त्री विरोधी और वर्णाश्रम व्यवस्था के पोषक की बनती हो। तुलसीदास को स्त्री विरोधी करार देनेवाले श्रीरामचरितमानस में अन्यत्र स्त्रियों का जो वर्णन है उसकी ओर उनकी नजर नहीं जाती है। तुलसीदास लिखते हैं – कत विधि सृजीं नारि जग माहीं, पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं । इसी तरह अगर देखें तो श्रीरामचरितमानस में पुत्री की विदाई के प्रसंग में लिखा - बहुरि बहुरि भेटहिं महतारी, कहहिं बिरंची रचीं कत नारी। इतना ही नहीं तुलसी ये भी कहते हैं कि- रामहि केवल प्रेमु पिआरा। जानि लेउ जो जाननिहारा। इन पंक्तियों को आलोच्य पंक्ति के सामने रखकर तुलसीदास का मूल्यांकन किया जाना चाहिए । नारी के अलावा जब उनको शूद्रों का विरोधी कहा जाता है तब भी खास विचार के पोषक आलोचक उन पंक्तियों को भूल जाते हैं जहां वो रामराज्य की बात करते हुए सबकी बराबरी की बात करते हैं। तुलसी के रामराज्य में चारों वर्णों के सरयू नदी के तट पर साथ स्नान करने का वर्णन मिलता है । इस ओर क्रांतिकारी कामरेड लेखकों का ध्यान जाता नहीं है। चुलसी ने लिखा है– राजघाट सब बिधि सुंदर बर, मज्जहिं तहां बरन चारिउ नर। साहित्य में ये वामपंथी खेल तुलसीदास के अलावा प्रेमचंद और निराला के साथ भी खेला गया। प्रेमचंद और निराला दोनों लेखकों ने गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित होनेवाली पत्रिका कल्याण के विशेषांकों और अन्य अंकों में लेख लिखे। उनको ओझल कर दिया गया। नई पीढ़ी के पाठकों को इस बात का पता ही नहीं चलने दिया गया कि प्रेमंद और निकाला ने कल्याण में भी लिखा है। उनको वामपंथी बता दिया गया। ये पाठ्य पुस्चतों से लेकर शोध तक होता रहा। इसके आधार पर ही स्वयं को बौद्धिक भी कहने लगे। 

इस तरह की बौद्धिक बेइमानियों को किस कोष्ठक में रखना चाहिए ये तो पाठक तय कर लेंगे। पाठकों के सामने नहीं आने देने का जो षडयंत्र रचा गया और जिसको सरकारों की शक्ति के कारण अंजाम तक पहुंचाया गया उसको परिभाषित करने के लिए लाल किला की प्राचीर से बोला गया शब्द युग्म दिमागी नक्सल सटीक बैठता है। हिंदी समाज को इसपर आत्ममंथन करना चाहिए। वही तत्व अब श्रीराम को भी बांटकर समाज के सामने प्रस्तुत करने के चक्कर में लग गए हैं लेकिन इससे इतना तो हुआ कि प्रभु श्रीराम के अस्तित्व को नकार नहीं रहे हैं, उनको काल्पनिक नहीं बता रहे हैं। जब ये संगठित और सुनियोजित तरीके से प्रचारित किया जाने लगे और सबकी टिप्पणियों में एक साझा सूत्र दिखाई देने लगे तो समझ लीजिए कि साहित्य के बेईमान लोग इकट्ठा हो गए हैं और कुछ काल्पनिक अवधारणा को यथार्थ का रूप देने निकल पड़े हैं। पर इस बार ये भूल जा रहे हैं कि भारतीय समाज में श्रीराम को परिभाषित करके उनको किसी कोष्ठक में नहीं रखा जा सकता। सबके अपने अपने काम हैं उनको किसी परिभाषा की आवश्कता नहीं।