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Saturday, January 17, 2026

जुमलों के बीच दबी प्रश्न की सार्थकता


प्रतिवर्ष जनवरी के दूसरे सप्ताह में जयपुर में एक आयोजन होता है, जनवरी आफ जयपुर। इस आयोजन में राजस्थान की संस्कृति का उत्सव मनाया जाता है। राजस्थान से जुड़े कलाकार एक सत्र में प्रस्तुति देते हैं। दूसरे सत्र में या तो राष्ट्रीय स्तर का कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करता है या फिर किसी ख्यात व्यक्ति से बातचीत होती है। जनवरी आफ जयपुर में आमंत्रित अतिथि राजस्थानी व्यंजन का भी आनंद उठाते हैं। जनवरी आफ जयपुर का आयोजन संस्कृतिकर्मी संदीप भूतोड़िया-मंजरी भूतोड़िया और सौरभ कक्कड़-विनी कक्कड़ करते हैं। इस वर्ष 11 जनवरी को जय महल पैलेस में जनवरी आफ जयपुर का आयोजन हुआ। सबसे पहले पद्मश्री से सम्मानित लोकगायक अली और मोहम्मद गनी ने अपने गीतों से समां बांधा। इसके बाद प्रख्यात पटकथा लेखक-गीतकार जावेद अख्तर से बातचीत का सत्र हुआ। जावेद अख्तर से बातचीत नृत्यांगना शिंजिनी कुलकर्णी ने की। संवाद के बाद प्रश्नोत्तर का सत्र था। प्रश्न करने के लिए तीन चार हाथ उठे जिसको जावेद साहब देख नहीं पाए। उन्होंने टिप्पणी कर दी कि पहले प्रश्न पूछने में लोग हिचकते हैं। एक-दो प्रश्नों के बाद सिलसिला चल निकलता है। मैंने  पहले प्रश्न के लिए हाथ खड़ा किया था। जावेद अख्तर हमको देख नहीं पा रहे थे तो उन्होंने पूछा कि आप किधर हैं। मैंने खड़े होकर कहा कि मैं आपके राइट में हूं तो तपाक से टिप्पणी की आप तो जानते ही हैं कि राइट वालों से मेरा जरा कम ही....। मैंने जावेद अख्तर से जानना चाहा था कि, क्या फिल्म लेखक के लेखन पर उसके संस्कार, उसके पारिवारिक परिवेश और उसके धार्मिक या मजहबी मान्यताओं का प्रभाव पड़ता है। जावेद अख्तर ने इस प्रश्न को और खोलने को कहा। 

फिल्म शोले और दीवार का उदाहरण देकर प्रश्न के धागे खोले गए। फिल्म शोले के एक दृष्य में हेमा मालिनी भगवान शंकर से अरनी मन की बात करती है तो धर्मेन्द्र प्रतिमा के पीछे से भोंपू से आवाज बदलकर उत्तर देता है। अमिताभ बच्चन की एंट्री होती है और वो हेमा मालिनी को प्रतिमा के पीछे ले जाकर धर्मेन्द्र की असलियत दिखाता है। फिल्म दीवार में नायक जब मंदिर में जाता है तो भगवान से कहता है कि आज खुश तो तुम बहुत होगे। अन्य दृष्य में अमिताभ बच्चन पुलिस से बचकर भागते हैं और शशि कपूर उसका पीछा करते हैं। एक जगह वो ग्रिल से टकरा कर गिरते हैं और 786 का बिल्ला छिटक जाता है। अमिताभ बिल्ला उठाने का प्रयास करते हैं। पुलिस पीछा कर रही होती है लिहाजा वो बिल्ला थोड़कर भागते हैं। शशि कपूर चेतावनी के बाद गोली चला देता है जो अमिताभ की बांह पर लगता है। इसमें लेखक की धार्मिकता का प्रभाव दिखता है या नहीं। इतना सुनते ही जावेद साहब लगभग भड़क से गए और अपनी पुरानी दलीलें देने लगे कि आप क्या मुल्क को सीरिया जैसा बनाना चाहते हैं। आप भी क्या उनकी तरह होना चाहते हैं। उनकी बातों को सुनकर तालियां बजती थीं। मैंने सहजता से कहा कि आपके जुमलों पर तालियां बज सकती हैं लेकिन प्रश्न अनुत्तरित है। उनको लगा कि मैं उनकी लोकप्रियता पर टिप्पणी कर रहा हूं जबकि मैं तो बगैर लाउड हुए अपने प्रश्न का उत्तर चाहता था। जावेद साहब लंबी तकरीर करने लगे और दुनिया का तमाम कट्टरपंथी और मजहबी मुल्कों का उदाहरण देने लगे। प्रश्न के उत्तर पर अंत तक नहीं आए। जब मैंने उनको फिर से प्रश्न पर लाने की कोशिश की तो उन्होंने मुझे क्रास क्वेश्चनिंग ना करने की नसीहत देकर अपनी बात जारी रखी। गाजा पर बच्चों पर बम बरसाने की बात तक चले गए। अंत में कहा कि अगर आज उनको वो दृष्य लिखने होते तो नहीं लिखते। बदतमीजी न हो जाए इस कारण मैंने प्रश्न के उत्तर जानने की अपेक्षा नहीं की और बैठ गया। प्रश्नोत्तर के पूरे सत्र में जावेद साहब मेरे प्रश्न से परेशान से दिखे। मेरी मंशा उनको परेशान करने की नहीं बल्कि एक वरिष्ठ लेखक से ये जानने की थी कि लेखक का लेखन किन बातों से प्रभावित होता है। सत्र की समाप्ति के बाद एक महिला मेरे पास आईं और बोलीं कि जावेद साहब को गाजा के बच्चों पर बमबारी की याद रही लेकिन पहलगाम में धर्म पूछकर हत्या करने की वारदात उनके जेहन में नहीं थी। 

जावेद अख्तर ने प्रश्न का उत्तर टाल तो दिया लेकिन यह प्रश्न तो हिंदी सिनेमा के सामने अब भी है। क्या कारण रहा कि जब हिंदी फिल्में आरंभ हुई तो दादा साहब फाल्के से लेकर उनके बाद के कई वर्षों तक भारतीय संस्कृति के अनुसार नायक होते रहे। हिंदू देवी देवताओं और धार्मिक प्रतीक चिन्हों का उपहास नहीं उड़ाया गया। बाद में जब सलीम जावेद की जोड़ी आई तो भगवान और हिंदू धर्म के प्रतीक चिन्हों का उपहास आरंभ हुआ। उनके बाद के लेखकों ने भी ऐसा किया। तिलकधारी पुजारी को खलनायक के तौर पर चित्रित किया जाने लगा। शोले में तो अजान की आवाज सुनकर अपने बेटे की मृत्यु का गम छोड़कर पात्र उस ओर उन्मुख हो जाता है। हिंदू नायक भी मंदिरों में जाकर भगवान के सामने अपने मन की भड़ास निकालने लगा। नास्तिक टाइप के नायक गढ़े गए, जो मंदिर की सीढ़ियों पर चढ़ने में हिचकते दिखे। फिल्म मि. नटवरलाल में भी नायक भगवान कृष्ण की तस्वीर सामने जिस तरह से संवाद बोलते हैं उसको भी ध्यान में रखा जाना चहिए। इसको अभिव्यक्ति की रचनात्मक स्वतंत्रता के तौर पर रेखांकित किया जाता रहा। प्रश्न यही है कि अभिव्यक्ति की वो कथित स्वतंत्रता सिर्फ हिंदू देवी-देवताओं और हिंदू धर्म से जुड़े लोगों को लेकर ही क्यों दिखती है। किसी और मजहब को लेकर उस तरह से किसी संवाद लेखक ने मजाक किया हो याद नहीं पड़ता। मेरी जिज्ञासा बस इतनी सी थी और जावेद अख्तर जैसे वरिष्ठतम फिल्म लेखक से अपेक्षा भी थी कि वो बेलौस अंदाज में अपनी बात रखते। पर ऐसा हो न सका। 

समय का पहिया घूमता रहा और भगवान का उपहास उड़ाने की प्रवृत्ति बढ़ती चली गई। हद तो ये हुई कि उस समय से केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने भी इस तरह की प्रवृत्ति पर किसी तरह का रोक लगाने की कोशिश नहीं की। फिल्मों के बाद जब ओटीटी का युग आरंभ हुआ तो उसमें भी यही प्रवृत्ति दिखाई देने लगी। ओटीटी प्लेटफार्म पर चलनेवाले वेबसीरीज में तो मंदिरों के अंदर चुंबन दृष्य तक दिखाए जाने लगे। तर्क खजुराहो की मूर्तियों में भी इस तरह नायक नायिका को दिखाया गया है। धार्मिक ग्रंथों से कहानियां उद्धृत कर इस प्रवृत्ति का बचाव किया गया। तर्क गढे गए कि हिंदू धर्म और उसके अनुयायी बहुत उदार हैं इस कारण वो अपने अराध्य को लेकर किसी तरह की उपहासजनक टिप्पणी से आहत नहीं होते हैं। देश में बौद्धिक जगत में ऐसी विचारधारा का दबदबा था जिसमें कहा जाता था कि धर्म तो अफीम है। हिंदू धर्म पर उपहासजनक टिप्पणी या संवाद करनेवालों को प्रगतिशील कहा जाने लगा। धर्म और आस्तिकता की बात करने और उसके चिन्हों का सार्वजनिक उपयोग करनेवालों को दकियानूसी कहा गया। प्रश्न वही कि ऐसा जानबूझकर किया गया या लेखक के सामाजिक और मजहबी परिवेश ने उससे ऐसा करवाया। 


वो कमाल भी क्या खूब था


 कमाल अमरोही का नाम लेते ही  फिल्म महल, पाकीजा. दायरा और रजिया सुल्तान का नाम याद आता है। कमाल अमरोही ने बहुत कम फिल्में निर्देशित कीं लेकिन सबमें उन्होंने अपनी कला की अमिट छाप छोड़ी। वैसे तो वो 1938 से ही फिल्म जगत में कहानीकार और संवाद लेखक के रूप में उपस्थित थे। लेकिन उनको निर्देशक के रूप में पहचान मिली बांबे टाकीज की फिल्म महल से। स्वाधीनता के ठीक पहले देविका रानी ने 1946 में रशियन पेंटर से विवाह कर लिया और बांबे टाकीज में उनकी रुचि कम हो गई। उन्होंने अभिनेता अशोक कुमार और सावक वाचा को 28 लाख रुपए में बांबे टाकीज बेच दिया। अशोक कुमार ने दब बांबे टाकीज संभाला तो उस समय स्वाधीनता आंदोलन चरम पर पहुंच चुका था। पूरे देश में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच तनाव की स्थिति थी। बांबे टाकीज में काम करनेवाले हिंदू और मुस्लिम कर्मचारियों के बीच तनाव महसूस किया जा रहा था। उस दौर में अशोक कुमार और सावक वाचा ने बांबे टाकीज से कई हिंदू कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखाकर मुस्लिम कर्मचारियों को काम पर रख लिया था। वहां तनाव बढ़ रहा था। उनके लिए काम करने वाले लेखक सअदात हसन मंटो ने अशोक कुमार को चेताया था कि वो ऐसा ना करें क्योंकि इससे हिंदी बहुत नाराज हो जाएंगे। अशोक कुमार कहा करते थे कि वो ना तो हिंदू हैं और ना ही मुसलमान बल्कि वो तो कलाकार हैं। कला ही उनका धर्म है। इस सोच के अंतर्गत ही अशोक कुमार ने बांबे टाकीज की अपनी पहली फिल्म महल को निर्देशित करने के लिए एक मुस्लिम निर्देशक कमाल अमरोही को साइन किया था। नोआखाली में हिंदुओं के नरसंहार के बाद देशभर में हिंदू मुसलमान के बीच की दरार गहरी हो गई थी। ऐसे माहौल में अशोक कुमार ने क मुस्लिम निर्देशक को फिल्म सौंपने का निर्णय लिया था जिसकी बहुत आलोचना हुई थी लेकिन अशोक कुमार अपने निर्णय पर अडिग रहे। कमाल अमरोही ने ही फिल्म महल निर्देशित की जो 1949 में प्रदर्शित हुई। इस फिल्म ने इतिहास रच दिया था। इसके बाद 1953 में कमाल अमरोही ने दायरा फिल्म निर्देशित की। ये फिल्म फ्लाप रही थी और कमाल अमरोही एक बेहचर कहानी और फिल्म की तलाश में थे। उनको पाकीजा की कहानी में ये संभावना दिखी और उसको निर्देशित करने का कार्य आरंभ किया। 

फिल्म पाकीजा ने कमाल अमरोही को हिंदी फिल्मों के शीर्ष निर्देशकों की पंक्ति में खड़ा कर दिया। मीना कुमारी इस फिल्म की नायिका थीं जो कमाल अमरोही की पत्नी थीं। पाकीजा की शूटिंग के दौरान दोनों के संबंध बहुत खराब हो चुके थे। मीना कुमारी का दिल बरी तरह से टूट चुका था और वो मरणासन्न हो गई थीं। फिल्म की कहानी भी कुछ ऐसी थी कि नायिका प्यार खोजती है लेकिन ना तो उसको प्यार मिलता है ना ही सुकून। फिल्म पाकीजा में बुरी तरह टूटे हुए दिल वाली नायिका में दर्शकों को मीना कुमारी की रीयल लाइफ कहानी नजर आई थी। पाकीजा फिल्म की शूटिंग के दौरान मीना कुमारी इतनी बीमार थीं कि मुजरा करने की स्थिति में नहीं थी। ऐसे में कमाल अमरोही ने तय किया कि मीना कुमारी के डांस सीक्वेंस को पद्मा खान से करवाया जाए। पद्मा खान की कद काठी मीना कुमारी जैसी थी और उनको बुर्का पहनाकर क्लाइमैक्स का डांस शूट करवाया गया था। कैमरे और उसके उपयोग की कमाल अमरोही को कमाल की समझ और जानकारी थी। इस फिल्म को 35 एमएम कैमरे पर शूट किया गया था। कमाल अमरोही ने रील देखकर बता दिया था कि शूट किए गए कुछ सीन आउट आफ फोकस हैं। विदेश में दो बार जांच हुई तब जाकर ये बात पकड़ में आ सकी कि कुछ फ्रेम में शूट आउट आफ फोकस है। पाकीजा को पहले 1971 में रिलीज होना था लेकिन भारत पाकिस्तान युद्ध के कारण रिलीज टली। 1972 में ये फिल्म रिलीज हुई। 1971 के भारत- पाकिस्तान युद्ध में भारत की विजय हुई तो शिमला समझौते के लिए भुट्टो शिमला आए थे। वहां भुट्टो और उनकी टीम ने पाकीजा देखने की इच्छा जताई । कई पुस्तकों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि इंदिरा गांधी ने पराजित पाकिस्तान के नेताओं के लिए पाकीजा की स्क्रीनिंग की व्यवस्था करवाई थी। कमाल अमरोही के निर्देशन में बनी आखिरी फिल्म रजिया सुल्तान थी। कमाल अमरोही ने कम फिल्में की लेकिन महल और पाकीजा में उनके निर्देशन ने उनकी प्रतिभा का रंग दर्शकों को दिखाया। 


Saturday, January 10, 2026

अकादमियों की दुर्दशा का जिम्मेदार कौन


बीते वर्ष जनवरी में दिल्ली सरकार की हिंदी अकादमी ने साहित्यकारों, कवियों और पत्रकारों के लिए पिछले तीन साल के पुरस्कारों की एक साथ घोषणा की थी। दिल्ली के तत्कालीन मंत्री सौरभ भारद्वाज ने उस समय बड़ी-बड़ी बातें की थीं, कहा था कि पुरस्कारों की घोषणा से हिंदी अकादमी ने साहित्य के क्षेत्र में मील का पत्थर दोबारा स्थापित किया है। जो पुरस्कार किन्हीं कारणों से पिछले छह साल से नहीं दिए गए थे, उन्हें अकादमी ने फिर से शुरू किया है।सौरभ भारद्वाज ने किस मील के पत्थर की बात की थी पता नहीं। हिंदी अकादमी के पुरस्कार की घोषणा अगर मील का पत्थर थी तो उस मील के पत्थर को ढंका भी तो उनकी यानि आम आदमी पार्टी की सरकार ने ही था। 2018-19 के बाद से पुरस्कारों की घोषणा और उसका वितरण भी तो सौरभ भारद्वाज की पार्टी की सरकार ने ही रोका था। सौरभ भारद्वाज को क्या पता था कि वो जिसे वो मील का पत्थर बता रहे हैं वो भी घोषणा मात्र होकर रह जाएगी। हिंदी अकादमी ने पुरस्कारों की घोषणा तो की लेकिन पुरस्कार अर्पण समारोह नहीं हो सका। दिल्ली में विधानसभा चुनाव घोषित हो गए। विधान सभा चुनाव में आम आदमी पार्टी हार गई। भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी। सत्ता बदली तो हिंदी अकादमी में भी बदलाव देखने को मिला। हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष और हास्य कवि सुरेन्द्र शर्मा वहां से हटे। सुरेन्द्र शर्मा ने भी पुरस्कारों की घोषणा के समय मंत्री के साथ बैठकर दावा किया था कि पिछले तीन साल के पुरस्कारों की घोषणा से देशभर में हिंदी का मान बढ़ेगा। घोषणा करके पुरस्कार नहीं दे पाने से हिंदी अकादमी का मान बढ़ा या उसकी साख प्रश्नांकित हुई ये तो सुरेन्द्र शर्मा ही बता सकते हैं। 

पिछले वर्ष फरवरी में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी तो रेखा गुप्ता मुख्यमंत्री बनीं और कपिल मिश्रा को भाषा और संस्कृति विभाग मिला। इस विभाग के अंतर्गत ही हिंदी और अन्य भाषाई अकादमियां आती हैं। नई सरकार बने लगभग 11 महीने होने को आए लेकिन आम आदमी पार्टी की सरकार द्वारा घोषित पुरस्कार अभी तक नहीं बंट सके। विधानसभा चुनाव के ठीक पहले आम आदमी पार्टी की सरकार ने जिनका चयन पुरस्कार के लिए किया था उनमें भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विरोधियों का भी नाम था। अगर पुरस्कार सूची से नई सरकार या नए मंत्री को कोई आपत्ति है तो उसको रद कर देना चाहिए। उन वर्षों के पुरस्कार की घोषित सूची को रद करने से अनिश्चितता की स्थिति दूर होगी। पूर्व में भी कई-कई वर्ष तक पुरस्कार नहीं दिए गए इस कारण किसी विवाद की आशंका भी नहीं है। अधिक से अधिक क्या होगा, अशोक वाजपेयी कहीं लिख-बोल देंगे क्योंकि उनका नाम श्लाका सम्मान के लिए घोषित हुआ था। जब से अशोक वाजपेयी राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा में शामिल हुए हैं तब से उनके कहे या लिखे का उतना असर नहीं रहा क्योंकि उनकी निष्पक्षता संदिग्ध हो गई। ये तो हुई पुरस्कार की बात लेकिन अगर हिंदी अकादमी और अन्य भाषाई अकादमियों के काम-काज पर नजर डालें तो स्थिति बदलतर नजर आती है।

हिंदी अकादमी की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार इसकी स्थापना का उद्देश्य हिंदी भाषा साहित्य और संस्कृति से संबंधित कार्यक्रमों को कार्यरूप में लाना है। इसके अन्तर्गत दिल्ली के प्राचीन तथा समकालीन उत्कृष्ट साहित्य का संकलन, परिरक्षण तथा उसके सृजन के लिए प्रोत्साहन का कार्य सम्मिलित है। जिससे कि दिल्ली के साहित्यकारों को उत्कृष्ट साहित्य के सृजन के लिए प्रोत्साहन मिले, पुराना और दुर्लभ साहित्य सुरक्षित किया जा सके और नये साहित्यकारों के लिए योजनाओं और नयी दिशाओं की खोज की जा सके। जब वेबसाइट पर ही इन उद्देश्यों की पूर्ति के उपक्रम खोजने लगा तो वहां दिल्ली के उपराज्यपाल और दिल्ली की मुख्यमंत्री का चित्र- परिचय दिखा। जब हमने नया क्या है सेक्शन में क्लिक किया तो बहुत ही दिलचस्प जानकारियां मिली। पहली जानकारी दो दिवसीय बाल नाट्य उत्सव कलरव -2 के लिए प्रविष्टियां आमंत्रित करने की थी। इसके लिए अंतिम तिथि 25 अक्तूबर 25 थी। यानि उसके बाद नया कुछ हुआ नहीं। उसके पहले समाचार पत्रों की रद्दी बेचने और सचिव के प्रभार देने की जानकारी है। सबसे दिलचस्प है पथ-प्रदर्शन का खंड। इसमें संचालन समिति पर क्लिक करने पर कोई जानकारी नहीं मिलती है। प्रतीत होता है कि नई सरकार गठन के बाद हिंदी अकादमी की संचालन समिति नहीं बन पाई है। संचालन समिति नहीं बन पाई तो संचालन कैसे हो। इसी खंड में दायित्वों की सूची है जिसमें सचिव, सहायक सचिव और मुख्य लेखाधिकारी की जानकारी है। सिर्फ तीन की। हिंदी अकादमी का सरकारी उपयोग शीला दीक्षित के मुख्यमंत्री रहते ही आरंभ हो गया था। अरविंद केजरीवास की सरकार के समय तो ये पूरी तरह से सरकार की प्रचार एजेंसी में तब्दील हो गई। आरंभिक दिनों में केजरीवाल की पार्टी से जुड़े मंचीय कवि इसको चलाते थे। उसी दौर में कपिल मिश्रा उसके बाद मनीष सिसोदिया और सौरभ भारद्वाज ने इसको संभाला। हो सकता है कि अन्य मंत्रियों के पास भी हिंदी अकादमी का दायित्व रहा हो। शीला दीक्षित के समय जब नानकचंद इसके सचिव थे तो उस दौरान हिंदी अकादमी ने काफी कार्य किया था। उसके बाद से निरंतर इस संस्था की साख और कार्य छीजते चले गए। अब न तो इस संस्था का उपाध्यक्ष है और ना ही संचालन समिति। भगवान भरोसे है इनका कार्य। 

सिर्फ हिंदी अकादमी ही क्यों अगर मैथिली-भोजपुरी अकादमी को देखें तो उसकी हालत और भी दयनीय है। पूर्वांचलियों को प्रसन्न करने के लिए 2008 में इस अकादमी की स्थापना की गई थी। विधानसभा चुनाव के आसपास सभी दलों को पूर्वांचलियों की याद आती है लेकिन उसके बाद भूल जाते हैं। मैथिली और भोजपुरी अकादमी का उद्देश्य मैथिली और भोजपुरी भाषाओं और साहित्य संस्कृति का उन्नयन और पल्लवन। जब इस संस्था का ही उन्नयन नहीं हो पाया तो भाषा, साहित्य और संस्कृति का उन्नयन कैसे हो पाता। ये अकादमी भी संचालन समिति और पूर्णकालिक कर्मचारियों की कमी से मरणासन्न है। दिल्ली के भाषा और संस्कृति विभाग और उसके मंत्री कपिल मिश्रा को प्राथमिकता के आधार पर इन अकादमियों पर ध्यान देना चाहिए। भारतीय जनता पार्टी तो कला और संस्कृति के काम करने की प्रतिबद्धता निरंतर दोहराती रहती है बावजूद इसके दिल्ली की इन अकादमियों की स्थिति कुछ और ही कहानी कह रही है। दिल्ली सरकार के सामने अपनी पूर्ववर्ती सरकार की इन अकादमियों के प्रति बरती गई उदासीनता को दूर करने की चुनौती है। इस उदासीनता के कारण ही इन अकादमियों की दुर्दशा हुई। अकादमियों को मूल स्वरूप में लाने का काम करना होगा। साहित्य और संस्कृति की बदलती प्रवृत्तियों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने की चुनौती है। सरकार की प्रचार मशीनरी के तौर पर काम करनेवाली इन अकादमियों को इससे मुक्त करके भाषा और संस्कृति के लिए गंभीर कार्य करने पर ध्यान देना होगा। यह सही है कि साहित्य कला के उन्नयन आदि के कार्यों से वोट नहीं मिलते लेकिन कई बार यही सेगमेंट वोटर की मानसिकता तय कर देते हैं।  

Saturday, January 3, 2026

ताजा हवा के झोंके की तरह अपराध कथा


ओवर द टाप (ओटीटी) प्लेटफार्म्स पर चलने वाली वेबसीरीज की बात आते ही पहली प्रतिक्रिया होती है गालियों की भरमार होगी। जबरदस्ती ठूंसी गई यौनिकता या न्यूडिटी होगी। जबरदस्त हिंसा होगी। शरीऱ के अंगों को काटा जा रहा होगा और तड़पते हुए कटे अंग होंगे। प्रश्न आता है कि कोई अच्छी और साफ-सुथरी वेबसीरीज बताइए। उत्तर मिलता है पंचायत और गुल्लक। अच्छी कहानी, साफ सुथरी प्रस्तुति, कम गाली-गलौच और न्यूमतम हिंसा जिस वेबसीरीज में हो उसकी संख्या कम है। हमारे देश में विशेषकर हिंदी में बनने वाली वेब सीरीज एक ऐसी राह पर चली गई जिसमें निर्माता और निर्देशकों को लगता है कि बगैर गालियों के, बिना यौनिकता और हिंसक दृष्यों के वेबसीरीज लोगों को पसंद नहीं आएंगी। लिहाजा सफलता के लिए ये तीन अवयव जबरदस्ती कहानी में ठूंसे जाते हैं। अपराध कथा हो तो ये तो आवश्यक ही होते हैं। भले ही ये कहानी का सत्यानाश क्यों न कर हो जाए। पता नहीं निर्देशकों को क्या लगता है और वो भारतीय दर्शकों की मानिकता को किस तरह से विश्लेषित करते हैं। इनको पता नहीं ये बात कब समझ में आएगी कि दर्शकों को कहानी चाहिए। बेहतर कहानी और बेहतर ट्रीटमेंट ही किसी सीरीज को दर्शकों को पसंद बना सकती है। एक जमाने में इसी तरह से हिंदी फिल्मों में अश्लीलता दिखाने के लिए तर्क गढ़े जाते थे। नायिकाओं को बिकिनी या अर्धनग्न दिखाने के लिए उसको कहानी का हिस्सा बनाया जाता था। कई ऐसी फिल्में दर्शकों ने पसंद भी की थीं लेकिन ये ट्रेंड लंबे समय तक नहीं चल सका और दर्शक जबरदस्ती ठूंसी गई नग्नता से ऊब गए। फिर हिंदी फिल्मों ने अपनी राह बदली।

आज वेबसीरीज के निर्माताओं को इसपर विचार करने की आवश्यकता महसूस होनी चाहिए। वेबसीरीज पर चूंकि किसी प्रकार के सेंसर या प्रमाणन की व्यवस्था नहीं है इस कारण वहां अराजकता जारी है। इस स्तंभ में अनेकों बार इस ओर ध्यान दिलाया गया है। स्वनियंत्रण और स्वनियमन की आड़ में प्रमाणन को रोका गया है। सरकार इस कारण से इस दिशा में गति से नहीं बढ़ रही है क्योंकि अगर प्रसारण पूर्व प्रमाणन का निर्णय होता है तो एक अलग संस्था बनानी होगी। अलग संस्था नहीं बनाई जाती है और केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड को ये दायित्व दे दिया जाता है तब भी बहुत बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर की आवश्यकता होगी। मानव संसाधन की आवश्यकता तो होगी ही। इसलिए सरकार जल्द निणय लेने के मूड में नहीं दिखाई देती है। सरकार ने एक व्यवस्था बनाई है और जब किसी वेबसीरीज को लेकर अधिक विवाद होता है या अधिक आलोचना आदि होती है तो सूचना और प्रसारण मंत्रालय अपने स्तर से प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से हस्तक्षेप करके ममले को सुलझा देता है। आज चर्चा वेबसीरीज के प्रमाणन पर नहीं बल्कि एक ऐसी वेबसीरीज की करनी है जो बहुत ही साफ-सुथरी, न्यूनतम गाली गलौच के साथ और बगैर किसी अश्लीलता और जुगुप्साजनक हिंसा के बनाई गई है। ये वेबसीरीज अपराध कथा है, उसमें मर्डर है, ग्लैमर और लड़कियां हैं, प्रेम-प्रसंग हैं, अश्लीलता दिखाने का अवसर भी है, लेकिन अश्लीलता या नग्नता कम से कम है। इस वेबसीरीज को परिवार के सभी लोग एक साथ बैठकर देख सकते हैं। रोचकता अपने चरम पर है और दर्शकों के दिमाग में इसको देखते हुए बस यही चलता रहता है कि आगे क्या?  यही तो निर्माता निर्देशक की सफलता है।

बात हो रही है एक वेबसीरीज मिसेज देशपांडे की। छह एपिसोड की ये सीरीज एक सीरीयल किलर को पकड़ने की कथा है। कहा गया है कि ये किसी फ्रेंच कहानी पर आधारित सीरीज है लेकिन इसके निर्देशक और लेखक नागेश कुकनूर ने जिस प्रकार से कहानी को भारतीय पुट दिया है वो प्रशंसनीय है। अपने जमाने की सुपरस्टार रही माधुरी दीक्षित लीड रोल में हैं। उन्होंने अपने अभिनय कला से दर्शकों को बांधे रखा है। अधिक मेकअप के बिना और चेहरे पर बढ़ती उम्र के निशान के बावजूद माधुरी दीक्षित ने जिस तरह से मिसेज देशपांडे के पात्र को पर्दे पर जीवंत किया है वो उल्लेखनीय है। माधुरी दीक्षित अपनी परिस्थियों के कारण सीरीयल किलर बन जाती है। पकड़ ली जाती हैं और मिसेज देशपांडे को जेल में जीनत का नाम मिलता है। वो इस पहचान के साथ जेल में सूर्य नमस्कार करती है और साथी कैदियों को भोजन बनाकर खिलाती हैं। सीरियल किलर होने के बावजूद अन्य कैदी, जो संभवत: उसके अपराध से परिचत नहीं है, माधुरी का सम्मान करती हैं। ये सीरीयल किलिंग पुणे में हुई थी। मिसेज देशपांडे के केस की फाइल किसी एक लड़की के हाथ लग जाती है। यहां भी कहानी में एक दिलचस्प मोड़ है वो लड़की पहले लड़का होती है लेकिन अपनी मानसिक स्थिति के कारण वो चिकित्साकीय रास्ते से लड़की बनती है। ये लड़की पुणे की सीरियल किलर मिसेलज देशपांड की कापी कैट किलर बनती है। उसके ही अंदाज में अपने शिकार का नायलान की रस्सी से गला घोंटकर हत्या करती है और उसका आंख खोल देती है।

जब कापीकैट किलर ने मुंबई में कत्ल करना आरंभ किया तो पुलिस कमिश्नर ने मिसेज देशपांडे यानी जीनत की मदद लेना तय किया। कहानी में इतने चक्करदार घुमाव हैं कि मिसेज देशपांडे इस केस की जांच करनेवाले पुलिस आफिसर की मां होती है और कापीकैट किलर जांच अधिकारी की पत्नी की दोस्त। कहानी इतने दिलचस्प मोड़ लेती है कि दर्शक उससे बंधे रहने पर मजबूर होता है। जब दर्शक को लगता है कि पुलिस किलर के पास पहुंच गई है तो कहानी में एक नया मोड़ आता है और किलर की नए सिरे से तलाश आरंभ हो जाती है। कोई नया क्लू मिलता है। जिसपर किलर होने का शक होता है या जिसको किलर की तरह पेश किया जाता है वो तो किसी और ही मानसिक स्थिति में होता है। दर्शक जब उसकी सचाई जानता है तो उसके प्रति संवेदना से भर उठता है। प्रश्न उठता है कि किलर कौन ? निर्देशक ने कहानी को किसी तरह से लाउड नहीं होने दिया है। ना ही किसी प्रकार का छद्म वातावरण तैयार करके अपराध कथा को तिलस्मी स्वरूप प्रदान करने का प्रयास किया। बगैर लाउड हुए कहानी का ट्रीटमेंट बेहतरीन है। बस कहानी में एक ही चीज खटकती है। अंत में भेद खुलता है कि मिसेज देशपांड को उसके पिता ने ही सेक्सुअली अबयूज किया था। वो अपने पिता की हत्या के लिए पहुंचती है। वो छत से कूदकर अपनी जान दे देते हैं। पश्चिम में इस तरह की कहानी होती होगी लेकिन भारतीय दर्शकों के लिए ये एक झटके की तरह है। इस तरह की वेबसीरीज से एक उम्मीद जगती है कि ओटीटी प्लेटफार्म पर चलनेवाली सामग्री में परिपक्वता आनी आरंभ हो गई है। दूसरे निर्माता भी इसको देखकर प्रेरित होंगे और कहानी का इस तरह का ट्रीटमेंट करेंगे। मिसेज देशपांड को एक शुभ संकेत की तरह लिया जाना चाहिए। इसकी सफलता ने ये संकेत भी दिया है कि साफ सुथरी वेबसीरीज दर्शकों को भाती है। मिसेलज देशपांडे उन निर्देशकों के लिए मिसाल है जो सेक्स और हिंसा दिखाकर सफल होना चाहते हैं।  

 

Saturday, December 27, 2025

धर्म-परंपराओ को अपनाना आवश्यक


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत जब भी हिंदू धर्म या हिंदू राष्ट्र की बात करते हैं तो विपक्षी दल विशेषकर वामपंथी और उनका इकोसिस्टम उछलने लगता है। वो धर्म को राजनीति से दूर रखने की वकालत करने लग जाते हैं। इसी तरह से जब प्रधानमंत्री मोदी हिंदू धर्म की बात करते हैं या हिंदू या सनातन धर्म के प्रतीकों को रेखांकित करते हैं तो कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दल के नेता इसको धर्म और राजनीति का घालमेल बताने लग जाते हैं। संविधान और उसके अनुच्छेदों को उद्धृत करने लगते हैं। दुनिया के अन्य देशों का उदाहरण देने में प्राणपन से जुट जाते हैं। जहां तक मुझे स्मरण है कि कुछ वर्षों पूर्व जब बराक ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति थे तो एक रिपोर्ट आई थी जिसमें भारत में धार्मिक असहिष्णुता की बात की गई थी। अब तो अमेरिका में भी बदलाव की बयार देखने को मिल रही है। वहां खुल कर ईसाई धर्म की और उसकी रक्षा की विस्तार से बातें की जा रही है। पिछले दिनों अमेरिका में चार्ली किर्क की फ्रीडम टी शर्ट पहनने वाली एक महिला जेनी को जब सार्वजनिक रूप से प्रताड़ित किया गया तो पूरे अमेरिका में उसके समर्थन की लहर दौड़ गई। देखते देखते जेनी के समर्थन में ढाई लाख डालर से अधिक की क्राउड फंडिंग हो गई। उनका अमेरिका फेस्ट के मंच पर अभिनंदन किया गया। चार्ली किर्क अमेरिका का दक्षिणपंथी राजनीतिक कार्यकर्ता था जो अमेरिकी समाज की परंपराओं  को लेकर निरंतर मुखर रहता था। इस वर्ष उनकी हत्या कर दी गई थी। अमेरिका में चार्ली किर्क को परंपरावादी माना जाता था। राष्ट्रपति ट्रंप से उनके करीबी रिश्ते थे।

अभी क्रिसमस बीता है। क्रिसमस के पहले अमेरिका में कमला हैरिस का एक वक्तव्य खूब वायरल हुआ। अमेरिकी राष्ट्रपति की चुनावी रैली में कमला ने कहा था ‘हाउ डेयर यू विश क्रिसमस’। करीब 15 दिनों तक कमला हैरिस के इस वीडियो को चलाकर उनकी आलोचना की गई। प्रतीत होता है कि इसका उद्देश्य कमला हैरिस और उनकी पार्टी को धर्म विरोधी बताने का था। ऐसा इसलिए भी लगता है कि व्हाइट हाउस ने क्रिसमस के अवसर पर एक्स पर पोस्ट किया, वी आर सेइंग मेरी क्रिसमस अगेन। इसके बाद क्रिसमस ट्री की फोटो और अमेरिका का झंडा लगया गया है। इस पोस्ट में क्रिसमस ट्री के आगे डोनाल्ड ट्रंप की फोटो थी और उनके आफिशियल हैंडल को टैग किया गया। इस पोस्ट को कमला हैरिस के लिए संदेश के तौर पर देखा गया। इतना ही नहीं डोनाल्ड ट्रंप ने अपने एक्स हैंडल से जो पोस्ट किया वो और भी मारक है- ‘सभी को मेरी क्रिसमस। उन नीच रैडिकल लेफ्ट को भी जो अमेरिका को ध्वस्त करने के हर संभव प्रयास से जुड़े हुए हैं लेकिन बुरी तरह असफल हो रहे हैं। अब हमारी कोई सीमा खुली हुई नहीं है, पुरुष महिलाओं के वस्त्र में नहीं हैं और कानून का पालन करवाने वाली एजेंसियां कमजोर नहीं हैं। हमारा स्टाक मार्केट रिकार्ड स्तर पर है। महंगाई नहीं है। बीते कल हमारी जीडीपी 4.3 पर थी जो उम्मीद से दो प्वाइंट अधिक है। टैरिफ से खरबों डालर मिले जिससे हम समृद्ध हुए। हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा उच्चतम स्तर पर है। पूरी दुनिया में हमारा सम्मान बढ़ा है। भगवान! अमेरिका पर कृपा बनाए रखें।‘ ट्रंप का ये एक्स पोस्ट पूरी तौर पर राजनीतिक है और क्रिसमस और भगवान को केंद्र में रखकर लिखा गया है। कल्पना कीजिए अगर हमारे देश में प्रधानमंत्री मोदी या राष्ट्रपति इस तरह की पोस्ट लिख दें तो कैसा बवाल मचता। 

धर्म के नाम पर अमेरिका में इतना ही नहीं हो रहा है। व्हाइट हाउस ने 26 दिसंबर को राष्ट्रपति ट्रंप का एक वक्तव्य जारी किया जिसमें लिखा है कि आज रात को कमांडर इन चीफ के तौर पर मेरे निर्देश पर संयुक्त राज्य ने आई एस आई एस के नीच आतंकवादियों पर पूरी ताकत के साथ मारक हमला किया। ये वही आतंकवादी हैं जो पिछले कई दिनों से निर्दोष ईसाइयों पर हमला कर रहे हैं और उनकी जान ले रहे हैं। इस संदेश से ये स्पष्ट है कि पूरी दुनिया में अगर ईसाइयों पर कहीं हमला होगा तो अमेरिका उसमें प्रभावी हस्तक्षेप करेगा। इसकी एक पृष्ठभूमि है। दो नवंबर को ट्रंप ने नाइजीरिया सरकार को चेतावनी दी थी कि अगर वहां की सरकार इस्लामिक आतंकवादियों को ईसाई जनता को मारने से नहीं रोकेगी तो हर तरह के प्रतिबंध लगाए जाएंगे। ट्रंप ने अपनी सेना को युद्ध के लिए तैयार रहने का निर्देश दिया था। अगर नाइजीरिया सरकार अपने देश में निर्दोष और मासूम ईसाइयों की हत्या नहीं रोकती है तो हमलावरों पर उससे अधिक त्वरा से हमला होगा जैसे आतंकवादी वारदात को अंजाम देते हैं। ये वही दौर था जब ईसाई समुदाय के लोगों ने ट्रंप से नाइजीरिया में ईसाइयों की हत्या को रोकने की मांग की थी। अमेरिका के इस कदम को अगर कूटनीतिक स्तर पर देखा जाए तो जिस तरह से बंग्लादेश में हिंदूओं पर हमले हो रहे हैं वैसे में भारत को हिंदुओं की रक्षा का अधिकार मिलता है। 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने शताब्दी वर्ष में कुटुंब प्रबोधन की बात कर रहा है। परिवार को जोड़ने और और परिवार की महत्ता पर बल देने का उपक्रम जारी है। इस कार्यक्रम से संघ विरोधियों के पेट में दर्द हो रहा है। कुछ लोग इसको आधुनिक सोच के विपरीत बताने में जुटे हैं। वो व्यक्तिगत अधिकारों और अपना जीवन अपनी मर्जी से जीने के अधिकारों की बात करते हुए संविधान को बीच में लाते हैं। जबकि संविधान कहीं से भी कुटुंब का विरोधी नहीं है। कुछ दिनों पहले सरसंघचालक मोहन भागवत ने हिंदू दंपति को तीन बच्चा पैदा करने की सलाह दी थी। उस समय इसको लेकर खूब हंगामा हुआ । खुद को प्रगतिशील समझने और घोषित करनेवाले राजनीतिक विश्लेषकों ने मोहन भागवत की आलोचना की थी। अनेक प्रकार के तर्क दिए गए थे जबकि मोहन भागवत ने विशेषज्ञों की राय के आधार पर कहा था कि जिस समुदाय में जन्म दर तीन से कम होते हैं वो विलुप्त हो जाते हैं। प्रगतिशील और आधुनिकता का दंभ भरनेवालों को अमेरिका को देखना चाहिए। वहां परिवार, शादी, बच्चे की महत्ता पर खूब चर्चा हो रही है। एलान मस्क और अमेरिका के उफराष्ट्रपति जे डी वांस अपने बच्चों के साथ ओवल आफिस में देखे जाते हैं। गर्व से वो परिवार की बात करते हैं। प्रेस सेक्रेट्री कैरोलिन लेविट जब गर्भवती होती है तो इसकी घोषणा होती है। वहां समलैंगिक अधिकारों या लिवइन का हो हल्ला अब नहीं मच रहा है। अपनी जड़ों की ओर लौटने की बात हो रही है। अगर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिंदुओं से तीन बच्चा पैदा करने की अपेक्षा कर रहा है तो न तो ये पुरातन सोच है और ना ही आधुनिकता विरोधी। आज वैश्विक स्तर पर अपनी परंपराओं और धर्म से जुड़ने का आग्रह बढ़ा है। इसको जो नहीं समझ पा रहे हैं वो हाशिए पर जा रहे हैं।    


Saturday, December 20, 2025

भारतीय मन को छूती फिल्म त्रयी


इन दिनों फिल्म धुरंधर की बहुत चर्चा हो रही है। चर्चा इस फिल्म के निर्देशक आदत्य धर की भी हो रही है। फिल्म रिलीज होने के पहले ही हिंदी फिल्मों से जुड़े एक विशेष इकोसिस्टम ने इसके विरुद्ध लिखना आरंभ कर दिया था। इस फिल्म के विरोध में इस इकोसिस्टम को साथ मिला उनका भी जो पाकिस्तान को लेकर साफ्ट रहते हैं। आतंक की पनाहगार से आतंक और आतंकवादियों का देश बन चुका पाकिस्तान और भारत के रिश्तों में शांति की बातें करनेवाले इकोसिस्टम को ये फिल्म आईना दिखाती है। इस कारण इसका विरोध होना स्वाभाविक था। कहा जाने लगा कि इसमें बहुत हिंसा है। अत्यधिक हिंसा की बात वो लोग कर रहे हैं जिनकी तब जिह्वा तालु से चिपक जाती है या कीबोर्ड पर टाइप करते हुए उंगलियां कापने लगती हैं जब हिंसा का प्रदर्शन करती वेबसीरीज आती हैं। वेब सीरीज मुंबई डायरीज की याद नहीं आई। मुंबई डायरीज के दूसरे संस्करण में मायानगरी में 2006 की भयानक बाढ के दौरान अस्पताल में डाक्टरों की कठिन जिंदगी को दिखाया गया है। यथार्थ चित्रण के नाम पर जिस तरह के दृष्य दिखाए गए हैं वो इस सैक्टर में नियमन या प्रमाणन की आवश्यकता को पुष्ट करते हैं। बाढ में फंसी गर्भवती महिला की स्थिति जब बिगड़ती है तो उसकी शल्यक्रिया का पूरा दृष्य दिखाना जुगुप्साजनक है। कैमरे पर आपरेशन के दौरान पेट को चीरने का दृश्य, खून से लथपथ बच्चे को माता के उदर से बाहर निकालने के दृश्य पर किसी ने कुछ नहीं बोला। इसी तरह से एक वेबसीरीज आई थी घोउल उसमें हाथ काट दिया जाता है और उसके बाद तर्जनी को छटपटाते हुए क्लोज शाट में दिखाया जाता है। वो हिंसा इनको नजर नहीं आई। केजीएफ में दिखाई जानेवाली जबरदस्त हिंसा के दृश्यों का भी इतना विरोध नहीं हुआ था। दरअसल हिंसा का बहाना लेकर धुरंधर की आलोचना की जा रही है। कारण कुछ और ही है। फिल्म धुरंधर में ये दिखाया गया है कि पाकिस्तानी जब भारतीय सैनिकों या खुफिया एजेंटों को पकड़ते हैं तो उनके साथ किस तरह का हिंसक बर्ताव करते हैं। सौरभ कालिया के साथ पाकिस्तानियों ने क्या किया था वो जगजाहिर है। 

दर्शकों ने इस इकोसिस्टम के विरोध की परवाह नहीं की और फिल्म को जबरदस्त सफल बना दिया। हिंसा के आरोपों को भी दर्शकों ने यथार्थ के भाव से देखा। इस फिल्म में मुसलमान किरदार को हिंसक दिखाया गया है जो इस इकोसिस्टम को नहीं भा रहा है। आईसी 814 में जब एक यात्री का गला रेता जा रहा है तो उस दृश्य को लेकर भी आलोचनात्मक स्वर उभरे। क्या ऐसा नहीं हुआ था। इस देश में ही आईसी 814, कांधार हाईजैक को लेकर एक वेबसीरीज बनी। जिसको लेकर ये इकोसिस्टम लहालोट हुआ था। एक राजनीकिक विश्लेषक को तो ये कहते सुना गया था कि इस वेबसीरीज को बनाने वाले अनुभव सिन्हा विश्वस्तरीय निर्देशक हैं। हाल ही में झूठ पर आधारित उस वेबसीरीज को पुरस्कृत भी किया गया और उसके बारे में फिर से चर्चा हुई। वेबसीरीज में कांधार हाईजैक में पाकिस्तान की बदनाम खुफिया एजेंसी का हाथ नहीं था या बहुत कम था को स्थापित करने का झूठा प्रयास किया गया था। हाईजैक के बाद उस समय के गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने संसद में 6 जनवरी 2000 को एक बयान दिया था। उस बयान में ये कहा गया था कि हाईजैक की जांच करने में जुटी एजेंसी और मुंबई पुलिस ने चार आईएसआई के आपरेटिव को पकड़ा था। ये चारो इंडियन एयरलाइंस के हाईजैकर्स के लिए सपोर्ट सेल की तरह काम कर रहे थे। इन चारों आतंकवादियों ने पूछताछ में ये बात स्वीकार की थी कि आईसी 814 का हाईजैक की योजना आईएसआई ने बनाई थी और उसने आतंकवादी संगठन हरकत-उल-अंसार के माध्यम से अंजाम दिया था। पांचों हाईजैकर्स पाकिस्तानी थे। हरकत उल अंसार पाकिस्तान के रावलपिडीं का एक कट्टरपंथी संगठन था जिसको 1997 में अमेरिका ने आतंकवादी संगठन घोषित किया था। उसके बाद इस संगठन ने अपना नाम बदलकर हरकत- उल- मुजाहिदीन कर लिया था। संसद में दिए इस बयान के अगले दिन पाकिस्तान के अखबारों में ये समाचार प्रकाशित हुआ था कि भारत ने जिन तीन आतंकवादियों को छोड़ा वो कराची में देखे गए थे। अनुभव सिन्हा की वो वेबसीरीज पूरी तरह से एजेंडा थी। लेकिन धुरंधर फिल्म में इसको अलग तरीके से दिखाया गया जिससे ये साफ होता है कि पाकिस्तान ही आतंकी वारदातों का एपिसेंटर है। चाहे वो संसद पर हमला हो या मुबंई की 26/11 की आतंकी वारदात हो।   

आदित्य धर की इस फिल्म में उन आडियो को भी दर्शकों को सुनवाया गया है जो पाकिस्तान में बैठे आतंक के आका और आतकवादियों के बीच की बातचीत थी। फिल्म धुरंधर में कोई एजेंडा नहीं है बल्कि यथार्थ का ऐसा चित्रण है जो इस बात की परवाह नहीं करता है कि कहानी किसको पसंद आएगी और किसको नहीं। आदित्य ने सच को सच की तरह कहने का साहस किया है। किस तरह से पाकिस्तान में बैठे आईएसआई के आपरेटिव भारतीय अर्थव्यवस्था को कमजोर करना चाहते हैं। नकली नोट छापकर उसको किस रूट से भारत में भेजा जाता है  और इसमें किस तरह से भारत में बैठे मां भारती के गद्दार पाकिस्तानियों की मदद करते हैं। अजीत डोभाल के चरित्र के आधार पर जिस तरह से स्थितियों को बुना गया है वो देकने लायक है। अपने छोटे किंतु महत्वपूर्ण भूमिका में माधवन ने पाकिस्तानी आतंकवादी घटनाओं को बेनकाब किया है। फिछलं दिनों जिस तरह से आदित्य धर और उनके साथ काम करनेवाले युवाओं ने आतंक के जानर के साथ साथ वैश्विक स्तर पर भारत का नैरेटटिव बनाने का काम किया है उसने इकोसिस्टम को मिर्ची लगा दी है। चाहे फिल्म बारामूला हो या आर्टिकल 370 हो। इन तीनों फिल्मों को अगर एक साथ मिलाकर देखंगे तो आको एक सूत्र नजर आएगा जो हिंदी फिल्मों के स्थापित विमर्श को बगैर डरे ध्वस्त करता है। आतंक और आतंकवादियों को लेकर जिस तरह से हिंदी फिल्मों में रोमांटिसिज्म रहा है उससे अलग हटकर आदित्य धर ने एक जानर क्रिएट कर दिया। नहीं तो हिंदी फिल्मों के दर्शकों ने तो आईएसआई और भारतीय खुफिया एजेंसी को साथ काम करते भी देखा है। 

आदित्य धर की फिल्म को एजेंडा पिल्म कहनेवाले भी सामने आ रहे हैं। उनलोगों ने कश्मीर फाइल्स और द केरला स्टोरी को भी एजेडा फिल्म कहा था। आदित्य धर की फिल्म धुरंधर या आर्टिकल 370 और बारामूला की जो त्रयी है उसने हिंदी दर्शकों को एक नई तरह की फिल्म का स्वाद दिया है। दर्शक फिल्मों को भारतीय विमर्श की तरह देखना चाहते हैं। दर्शकों का मूड अब बदल गया है। एजेंडा फिल्म तो अनुषा रिजवी की द ग्रेट शमसुद्दीन फैमिली है। इस फिल्म में फिर से मुलममानों के विरुद्ध अत्याचार का झूठा नैरेटिव गढ़ा गया है। देश की वर्तमान राजनीति पर झूठा आरोप लगाते हुए कहा गया है कि देश में कुछ भी  ठीक नहीं है। पत्रकार मारे जा रहे हैं, लोगों पर हमले हो रहे हैं। इकोसिस्टम के रुदाली गैंग की प्रतिक्रिया इस फिल्म पर देखने की अपेक्षा है।