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Saturday, April 4, 2026

फिल्मों के सामाजिक सरोकार


इस वर्ष जनवरी के आखिर में जब रानी मुखर्जी अभिनीत फिल्म मर्दानी-3 रिलीज हुई थी तब दिल्ली से लापता हो रही बच्चियों का मुद्दा जोर-शोर से उठा था। एक रिपोर्ट के हवाले से ये समाचार चर्चा में आया था कि दिल्ली और आसपास के इलाकों से भारी संख्या में किशोरियां और महिलाएं गायब हो रही हैं। उस समय आए आंकड़े बेहद डरानेवाले थे। तब भी ये भी कहा गया था कि जिस रिपोर्ट के हवाले से मुद्दा बनाया जा रहा था उसमें गायब हुई लड़कियों की बरामदगी के आंकड़े नहीं दिखाए गए थे। आंकड़ों को लेकर जब चर्चा बढ़ी को दिल्ली पुलिस हरकत में आई। पुलिस ने एक्स पर एक पोस्ट किया। उसमें लिखा कि, चंद संकेतों या प्रारंभिक जानकारी को जांचने के बाद ये सामने आया कि दिल्ली से गुमशुदा लड़कियों की संख्या पेड प्रमोशन का हिस्सा है। दिल्ली पुलिस ने स्पष्ट किया था कि डर का माहौल बनाकर लाभ कमाने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। इस तरह का वातावरण बनानेवालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। संयोग ऐसा था कि मर्दानी 3 में भी दिल्ली और इसके आसपास के इलाकों से बच्चियों के गायब होने की कहानी थी। दिल्ली पुलिस के पेड प्रमोशन वाले पोस्ट के बाद चर्चा कम जरूर हुईं लेकिन समाचारपत्रों में लड़कियों के गायब होने के बारे में कुछ न कुछ सामग्री प्रकाशित होती रही। गुमशुदा होनेवाली लड़कियों की संख्या के साथ साथ बरामदगी की संख्या भी प्रकाशित हुई। इससे इंटरनेट मीडिया से बना भ्रम कुछ कम हुआ और राजधानी और इसके आसपास के क्षेत्रों के निवासियों में भय भी कम हुआ। 

फिल्म मर्दानी-3 में बच्चियों का अपहरण कर उनको विदेश भेजने और उनपर दवाओं के ट्रायल की बहुत मार्मिक और भयावह कहानी है। फिल्मकार ने ये दिखाने का प्रयास किया है कि मानव तस्करी सिर्फ देह व्यापार के लिए नहीं होती बल्कि इसके अनेक रूप होते हैं। इस फिल्म में बच्चियों का अपरहण किया जाता था और जिनका ब्लड ग्रुप खास किस्म का होता था उसको विदेश ले जाकर उसपर कैंसर की दवाई का टेस्ट किया जाता था। अगवा की गई जिन लड़कियों का ब्लड ग्रुप उस समूह का नहीं होता है उनसे भीख मंगवाने से लेकर अन्य गैरकानूनी कार्य करवाए जाते थे। कैंसर की दवाई का जिन लड़कियों पर टेस्ट किया जाता था उनकी हालत बहुत खराब हो जाती थी और कुछ समय बाद तड़प तड़प कर उनकी मृत्यु होते दिखाया गया। इस सिंडिकेट में लड़कियों के लिए काम करने वाली एक संस्था और उसके प्रमुख की संलिप्तता भी दिखाई गई थी। कहानी थोड़ी फिल्मी भी होती है। जांच कर रही पुलिस आफिसर को सस्पेंड कर दिया जाता है लेकिन वो विभाग के अपने साथियों का साथ श्रीलंका जाकर इस गैंग का खात्मा करती है। फिल्म में कई टर्न और ट्विस्ट हैं, जो फिल्म को रोचक बनाने और दर्शकों को बांधने के लिए किए गए हैं, पर मूल कहानी तो लड़कियों का गिनी पिग की तरह इस्तेमाल करने की ही है। फिल्म की कहानी, संभव है काल्पनिक हो लेकिन मानव तस्करी का जो पहलू इसमें दिखाया गया है उसको देखकर गायब होने वाली लड़कियों को लेकर समाज को चिंतित होना चाहिए। ये अपराध बेहद संगठित और समाज के इज्जतदार लोगों की सरपरस्ती में चलता हुआ दिखाया गया है। वैसे लोग जो पैसे की खातिर किसी की जान को बेचने या जान लेने में नहीं हिचकते हैं। 

फिल्म से वापस समाज में लौटते हैं। तीन चार दिन पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने बच्चों की तस्करी को लेकर एक याचिका पर सुनवाई के दौरान बेहद कठोर टिप्पणी की। अदालत ने कहा मानक संचालन प्रक्रिया (स्टैंडर्ड आपरेटिंग प्रोसिड्योर) और न्यायिक आदेशों के बावजूद दिल्ली बच्चों की तस्करी की मंडी बन चुकी है। हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस और राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग से ये जानना चाहा कि बच्चों की तस्करी को रोकने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने एक बेहद ही डराने और चौंकानेवाली बात कही। याचिकाकर्ता ने एक घटना का उल्लेख करते हुए बताया कि दिल्ली के आनंद विहार रेलवे स्टेशन से एक बच्ची को बचाकर पुलिस को सौंपा गया था। आरोप लगाया गया कि पुलिस ने बचाई गई बच्ची को बाल कल्याण समिति के सामने पेश करने की बजाए उसको वापस तस्करों को सौंप दिया। बाद में वही बच्ची फिर से तस्करों के पास से मिली। अगर ये आरोप सही हैं तो ये हमारे सिस्टम पर बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह है। कोर्ट ने इस आरोप का संज्ञान लिया है। हलांकि इस सुनवाई के दौरान ये बात भी सामने आई कि 2018 से लेकर 2024 के बीच रेलवे सुरक्षा बल ने रेलवे परिसर से 84000 बच्चों को बचाया भी। इस तरह से कई अन्य आंकड़े भी कोर्ट के समझ रखे गए थे। आज जब हमारी पुलिस व्यवस्था अत्याधुनिक तकनीकी उपकरणों और सुविधाओं से युक्त है तब कोर्ट की तस्करी की मंडी बनने जैसी टिप्पणी भयावह है। आज भी अगर बच्चों की तस्करी हो रही है तो उसका किन अपराध में उपयोग हो रहा होगा इस बारे में सोचकर सिहरन होती है। 

कई बार ये कहा जाता है कि फिल्में समाज के लिए संदेश देने का काम करती है। मर्दानी 3 में कम उम्र की लड़कियों का अपहरण करके विदेश भेजने की बात हो या वेबसीरीज डेल्ही क्राइम-3 में कम उम्र की लड़कियों को विदेश में बेचने की कहानी, एक संकेत तो समाज को दिया ही जा रहा है। इस तरह की कहानियां फिल्मों में आ रही हों और उसी समय इस तरह के केस कोर्ट में भी सुनवाई के लिए आ रहे हों तो ये प्रतीत होता है कि फिल्में कुछ तो कहने का प्रयास कर रही हैं। फिल्मों को बहुधा मनोरंजन कह कर खारिज कर दिया जाता है, लेकिन कई बार उनसे निकलनेवाले संदेश को पकड़ने की आवश्यकता भी है। 1950 में व्ही शांताराम की एक फिल्म आई थी दहेज। स्वाधीन भारत में दहेज की समस्या को लेकर ये फिल्म बनी थी। इस बात की कई बार चर्चा होती है कि बिहार विधानसभा में दहेज की कुरीति पर चर्चा के दौरान इस फिल्म का नाम कई बार आया था। कहा तो यहां तक जाता है कि बिहार में दहेज उन्मूलन कानून बनने के पीछे इस फिल्म की प्रेरणा थी। इस बात में सचाई हो या ना हो लेकिन इतना तो तय है कि व्ही शांताराम ने अपने फिल्म के माध्यम से इस कुरीति को चर्चा के केंद्र में ला दिया था। फिल्मों से ऐसे कई उदाहरण दिए जा सकते हैं। आज अगर मर्दानी-3 में बालिकाओं की तस्करी का मुद्दा उठा है तो समाज को इस घृणित अपराध के बारे में गंभीरता से विचार करना चाहिए। सरकार और पुलिस तो अपने स्तर पर प्रयास करेंगी, अदालतों में सुनवाई होगीं, आदेश पारित होंगे लेकिन जबतक हमारा समाज इस अपराध के खिलाफ सजग होकर नहीं उठेगा तबतक बेटियों की तस्करी पर लगाम लगा पाना संभव नहीं है। आज जब हमारा देश विकसित बनने की राह पर अग्रसर है तब इस तरह के अपराध की समाज में कोई जगह होनी नहीं चाहिए।    


Saturday, March 28, 2026

रचनात्मक स्वतंत्रता के नाम पर बेइमानी


इन दिनों पूरे देश में फिल्म धुरंधर, द रीवेंज की सफलता की चर्चा हो रही है। इस फिल्म के निर्देशक आदित्य धर के निर्देशन के साथ-साथ इस फिल्म के कलाकारों के अभिनय की प्रशंसा हो रही है। इस फिल्म ने बाक्स आफिस पर कमाई का कीर्तिमान रच दिया है। करीब चार घंटे की इस फिल्म को देखने के लिए सिनेमा हाल में दर्शकों की भीड़ उमड़ रही है। फिल्म धुरंधर 2 की सफलता पर कवि-लेखक चेतन कश्यप से बात हो रही थी। धुरंधर के संवाद, पुराने फिल्मी गीतों का बैकग्राउंड म्यूजिक की तरह उपयोग पर चर्चा हुई। निर्देशक रामगोपाल वर्मा की फिल्म धुरंधर पर की गई टिप्पणी और रणवीर सिंह और अमिताभ बच्चन के अभिनय की तुलना भी की गई। दीवार में अमिताभ बच्चन का दोनों पैर उठाकर टेबल पर रखनेवाले सीन और धुरंधर- 2 में ल्यारी पर कब्जे के बाद रणवीर सिंह का रहमान की कुर्सी पर बैठ कर सामने की टेबल पर दोनों पैर रखने के सीन की तुलना की गई। इसके बाद फिल्म के क्राफ्ट पर चर्चा चली। फिल्म के क्राफ्ट पर चर्चा होते-होते शैलेन्द्र की फिल्म
तीसरी कसम पर कैसे बात चली गई ठीक से याद नहीं। बात रेणु जी की कहानी और फिल्म की कहानी पर होने लगी। मूल कहानी का बड़ा हिस्सा फिल्म में नहीं है। इसी क्रम में चेतन ने बताया कि फिल्म तीसरी कसम की पटकथा तीसरी कसम के नाम से ही प्रकाशित हो चुकी है। तुरंत ही पटकथा की पुस्तक मंगवाई गई। जबतक फिल्म तीसरी कसम की पटकथा आती तबतक रेणु की संपूर्ण कहानियां से तीसरी कसम, अर्थात मारे गए गुलफाम निकालकर पढ़ी गई। चूंकि क्राफ्ट पर बात हुई थी इस कारण यूट्यूब पर उपलब्ध तीसरी कसम देखी। ये सब होने के बाद जब पटकथा वाली पुस्तक आई तो उसको भी पढ़ा। 

पटकथा वाली पुस्तक के पृष्ठ संख्या 96 पर एक दृष्य का वर्णन है। जिसमें नौटंकी देखने के क्रम में एक दर्शक, शिवरतन, हीरामन और लालमोहर के बीच नायिका हीराबाई को लेकर संवाद है। प्रकाशित पटकथा के अनुसार शिवरतन का एक दर्शक की हीराबाई पर टिप्पणी पर संवाद है अरे, पौडर से दांत धो लेती होगी...बड़ी चालाक रंडी है। हीरामन गुस्से में कहता है, ए! क्या बे-बात की बकते हो? कंपनी की औरत को रंडी कहते हो। शिवरतन- एक बार नहीं सौ बार कहेंगे। तुमको इससे क्या? हीरामन- मैं तुम्हारी जीभ खींच लूंगा...। शिवरतन लापरवाही से हंसता है- अरे-जा-जा रंडी के भड़ुए...! हीरामन- मारो साले को! लालमोहर- मारो!! लालमोहर हाथ की दुआली से हर आदमी को पटापट पीटता जाता है। हीरामन शिवरतन को पटककर छाती पर सवार है...आओ! एक-एक की गरदन उतार लूंगा! पलटदास घुस्सा लगाते हुए कहता है – साला! सिया सुकमारी को रंडी कहता है। सो भी हिंदू होकर! धुन्नीराम भाग खड़ा होता है। कलरव, कोलाहल—हल्ला...! हीराबाई पर्दे को हटाकर देखती है और अचरज से उसका मुंह खुल जाता है।...मारपीट जारी है।इस संवाद को पढ़ते ही कुछ खटका। लगा कि कहानी में तो कुछ और है। वापस कहानी पर गया। कहानी में रेणु ने लिखा है- पौडर से दांत धो लेती होगी। हरगिज नहीं। कौन आदमी है बात की बेबात करता है। कंपनी की औरत को पतुरिया कहता है। तुमको बात क्या लगी ? कौन है रंडी का भड़वा ? मारो साले को! मारो! तेरी..! लालमोहर दुआली से पटापट पीटता जा रहा है सामने के लोगों को। पलटदास एक आदमी की छाती पर सवार है- साला, सिया सुकुमारी को गाली देता है, सो भी मुसलमान होकर। रेणु की कहानी में जिस संवाद में मुसलमान कहा जाता है वो पटकथा तक पहुंचते पहुंचते हिंदू हो जाता है। 

लगा कि एक बार फिल्म देखनी चाहिए कि फिल्म के संवाद में क्या कहा गया है। यूट्यूब पर उपलब्ध फिल्म के क्रेडिट में स्क्रीनप्ले नवेंदु घोष का और कहानी-डायलाग फणीश्वरनाथ रेणु का है। फिल्म में गाना आता है, पान खाए सैंया हमार। उसके फौरन बाद ये सीन है। फिल्म के संवाद में न तो हिंदू है न मुसलमान। वहां हीराबाई के दांत पर टिप्पणी है, उसको अपशब्द कहे गए हैं लेकिन सिया सुकुमारी वाला संवाद नहीं है। प्रश्न यह उठता है कि अगर कहानी में मुसलमान था तो उसको पटकथा में हिंदू क्यों और किसने कर दिया। जानकारों का मानना है कि ये काम संवाद या स्क्रीनप्ले लिखनेवाले कर सकते हैं। शाट लेते समय निर्देशक इंपर्वोवाइज करने के लिए बदलाव कर सकते हैं। रेणु जी ने जब कहानी में मुसलमान लिखा तो पटकथा में उसको हिंदू लिखने का कोई स्पष्ट कारण समझ नहीं आता है। संभव है कि नवेन्दु घोष ने स्क्रीनप्ले लिखते समय ये बदलाव कर दिया होगा क्योंकि वो कम्युनिस्ट थे। हिंदी फिल्मों में कम्युनिस्ट संवाद लेखकों ने इस तरह के कई कारनामे किए हैं। इस फिल्म के निर्माता शैलेन्द्र भी प्रगतिशील लेखक संघ और भारतीय जन नाट्य संघ में सक्रिय थे इस कारण संभव है कि इस बदलाव पर उनको आपत्ति ना हुई हो। अब प्रश्न उठता है कि अगर पटकथा में उक्त संवाद था तो फिल्म में क्यों नहीं है? दो बात हो सकती है, एक तो ये कि इस संवाद को शूट ही नहीं किया गया हो। मारपीट का दृष्य तो है, छाती पर चढ़कर पीटने का भी लकिन उसके बाद ही इतना हो-हल्ला हो जाता है कि थोड़ी देर तक संवाद की गुंजाइश ही नहीं बनती। उसके बाद निर्देशक ने पुलिस की एंट्री करवा दी। दृष्य बदला तो संवाद बदल गए। दूसरी बात ये कि मारपीट के दौरान ये दृष्य शूट किया गया। जब फिल्म सेंसर बोर्ड गई हो तो बोर्ड ने इस संवाद को हटाने के लिए कहा होगा। इस कारण ये संवाद फिल्म में नहीं है। क्योंकि एक हिंदू के मुंह से सिया को गाली दिलवाना आपत्तिजनक है। 

इस पूरे प्रसंग को देखने के बाद ये अनुमान कि.या जा सकता है कि हिंदी फिल्मों में कम्युनिस्ट और कथित प्रगतिशील लेखकों ने रचनात्मक स्वतंत्रता के नाम पर जाने क्या-क्या किया। रचनात्मक स्वतंत्रता के नाम पर बुरे पात्रों का धर्म बदल दिया जाता रहा। फिल्म की कहानी या दृष्य या संवाद बदल कर हिंदुओं को नीचा दिखाने प्रवत्ति उक्त प्रसंग से गाढ़ी होती है। पूर्व में भी कई फिल्मों के संवाद में हिंदुओं को नीचा दिखाने और मुसलमानों को बेहतर दिखाने की प्रवृत्ति को रेखांकित किया जाता रहा है। अधिकतर फिल्मों में हिंदू पात्रों के सामने मुस्लिम पात्रों को बेहतर दिखाया जाता है। किसी फिल्म में हिंदू पात्र मंदिर की सीढ़ियों पर चढ़ना नहीं चाहता और जब मजबूरी में उसको मंदिर जाना पड़ता है तो भगवान से उसकी खुश होने की बात करता है। किसी देवता की मूर्ति के पीछे खड़े होकर भगवान की आवाज में किसी लड़की से बात करने जैसे दृष्य तो हिंदी फिल्मों के दर्शकों ने देखा ही है। प्रश्न ये उठता है कि जो लोग गंगा-जमुनी तहजीब की बात करते हैं उनमें से अधिकतर इस तरह की हरकतों में क्यों लिप्त नजर आते हैं। स्वंय को तरक्कीपसंद और नास्तिक कहकर नैतिकता की मीनार पर खड़े होकर पूरे देश को भाषण पिलाने वाले लेखक भी इस तरह की रचनात्मक बेईमानी करते पाए जाते हैं। उनसे जब इस बाबत प्रश्न पूछो तो पलटवार करते हुए आपसे पूछेंगे कि क्या आप अपने मुल्क को सीरिया बनाना चाहते हैं। नहीं साहब! हम अपने मुल्क को सीरिया बिल्कुल नहीं बनाना चाहते हैं पर लेखकों से ईमानदार और वस्तुनिष्ठ होने की अपेक्षा अवश्य करते हैं।

Saturday, March 21, 2026

अकादेमी पुरस्कारों से उठते गंभीर प्रश्न


आखिरकार साहित्य अकादेमी ने अपने वार्षिक पुरस्कारों की घोषणा कर ही दी। जैसी की साहित्य जगत में चर्चा थी उसी अनुसार अरुण कमल, अरविंदाक्षण और अनामिका की जूरी ने हिंदी की वरिष्ठ लेखिका ममता कालिया को हिंदी के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार देने की घोषणा की। पिछले वर्ष दिसंबर में जब आखिरी समय में नाटकीय ढंग से साहित्य अकादेमी पुरस्कारों की घोषणा रोक दी गई थी तब इसको लेकर कई तरह के कयास लगाए गए थे। कुछ लोग इसको साहित्य अकादेमी की स्वयत्तता से जोड़कर देख रहे थे। कुछ इसको पुरस्कार के स्थगित होने की आशंका से व्यथित थे। घोषणा के समय के आसपास ही मंत्रालय ने साहित्य अकादेमी, ललित कला अकादमी, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय और संगीत नाटक अकादमी को एक पत्र, फाइल संख्या एकेडी-18/27/2025 एकेएडी, दिनांक 18 दिसंबर 2025 भेजी। इस पत्र में इन संस्थाओं के प्रमुखों को संस्कृति मंत्रालय के साथ जुलाई 2025 में हुई करार (एमओयू) की याद दिलाई गई थी। कहा गया था कि एमओयू के मुताबिक सभी अकादमियां संस्कृति मंत्रालय से विमर्श करके अपने पुरस्कारों का पुनर्गठन करेगी। उसी पत्र में मंत्रालय ने ये भी सूचित किया था कि जबतक पुरस्कारों का पुनर्गठन नहीं हो जाता है, तबतक मंत्रालय की पूर्व अनुमति के बिना प्रकिया नहीं हो सकती। यहां यह प्रश्न उठता है कि इन तीन महीनों में क्या साहित्य अकादेमी की पुरस्कार प्रक्रिया का पुनर्गठन हो गया? 

दरअसल साहित्य अकादेमी के पुरस्कारों को लेकर विवाद होते रहे हैं। 2024 में सरकार ने सभी अकादमियों के पुरस्कारों को पद्म पुरस्कारों की तरह पारदर्शी बनाए जाने को ध्यान में रखते हुए प्रक्रिया को बदलने को कहा था। जिसमें पाठकों की भी सहभागिता सुनिश्चित करने की बात थी। पहले व्यवस्था ये थी कि हर भाषा के दो विशेषज्ञ संबंधित भाषा की पुस्तकों की आधार सूची तैयार करते थे। इन विशेषज्ञों को भाषा की सलाहकार समिति के सदस्यों के सुझाए गए पैनल के आधार पर अध्यक्ष तय करते थे। अकादेमी ने इस नियम को बदलकर आधार सूची की व्यवस्था समाप्त कर दी थी। अकादेमी ने 2025 में विज्ञापन प्रकाशित किया था। विज्ञापन के अनुसार लेखक, प्रकाशक या कोई भी व्यक्ति किसी पुस्तक को पुरस्कृत करने की अनुशंसा या सुझाव दे सकता था। विज्ञापन के बाद जब पुस्तकें आ जाती तो अकादेमी ने उनकी सूची संबंधिक भाषा की सलाहकार समिति के सभी सदस्यों को भेजा था। उनसे अनुरोध किया गया था कि उस सूची में से दो पुस्तकों की अनुशंसा करें। सलाहकार समिति के सदस्य स्वयं भी पुरस्कार के लिए सूची से बाहर की पुस्तक भी सुझा सकते हैं। सलाहकार समिति के सदस्यों से प्राप्त सूची को प्राथमिक पैनल को भेजा जाता है। प्राथमिक पैनल का गठन भाषा की सलाहकार समिति के सुझाए गए नामों के आधार पर तैयार पैनल में से अध्यक्ष चुनता है। ये पैनल हर भाषा में 10 लोगों का होता है जो गोपनीय रखा जाता है। प्राथमिक पैनल के सदस्यों से दो-दो पुस्तकों के नाम मांगे जाते हैं। किसी भी भाषा के लिए निर्णायक समिति के सामने प्रथामिक पैनल द्वारा भेजी गई सूची और पुस्तकें रखी जाती हैं। हिंदी में सलाहकार समिति के सदस्य अधिक हैं इस कारण अधिक पुस्तकें आती हैं। 

अब यहां से निर्णायक समिति की भूमिका आरंभ होती है जिसको फाइनल जूरी कहते हैं। इस जूरी के सदस्यों का चयन अध्यक्ष करता है। ये सूची भी संबंधित भाषा की सलाहकार समिति के सदस्य के सुझाए गए पैनल से ही होता है। हिंदी के चूंकि 22 सदस्य आमसभा में होते हैं इस कारण से वो सभी सलाहकार समिति के सदस्य होते हैं। अध्यक्ष अपनी मर्जी से पैनल से तीन सदस्यों का चयन करता है जो पुरस्कृत होनेवाले लेखक की कृति को चुनते हैं। पुरस्कृत कृति का चयन बहुमत से या सर्वसम्मति से होता है। हिंदी के लिए इस बार जो चयन समिति बनी उसमें अरुण कमल और अरविंदाक्षण की विचारधारा वामपंथी है। अनामिका का झुकाव घोषित तौर पर वामपंथ की तरफ नहीं है लेकिन वो बहुधा बहुमत के साथ रहती हैं। अरुण कमल तो लंबे समय तक प्रगतिशील लेखक संघ के पदाधिकारी रहे हैं।  जब दिसंबर 2025 में साहित्य अकादेमी के पुरस्कारों की घोषणा होनेवाली थी और उसको मंत्रालय ने रोका था तो यही दलील दी गई थी कि पुरस्कार प्रक्रिया का पुनर्गठन नहीं हुआ। जबकि उपरोक्त व्यवस्था पिछले वर्ष प्रकाशित विज्ञापन के साथ ही आरंभ हो गई थी। 31 अक्तूबर को अकादेमी के तत्कालीन सचिव सेवानिवृत्त हो गए। 1 नवंबर 2025 को उनकी जगह संस्कृति मंत्रालय की एक अधिकारी ने सचिव का कार्यभार संभाला। जब 2025 के पुरस्कार के लिए पैनल बन रहा था तो मंत्रालय की अधिकारी साहित्य अकादेमी में सचिव के तौर पर तैनात थीं। उनके सचिव रहते ही फाइनल जूरी के सदस्यों को अध्यक्ष ने मनोनीत किया। उनकी देखरेख में भी अकादमी के पुरस्कारों की प्रक्रिया चली। उन्होंने सब जगह हस्ताक्षर किए होंगे ऐसा माना जा सकता है। अकादेमी में मंत्रालय की प्रतिनिधि के तौर पर सचिव का कार्यभार संभाल रही अधिकारी के दस्तखत से एजेंडा बना होगा। उस एजेंडा पर कार्यकारिणी ने विचार किया। फिर पुरस्कारों को अंतिम स्वरूप दिया गया। उसके बाद पुरस्कार की घोषणा के लिए मीडिया के लोगों को आमंत्रण भी प्रभारी सचिव की तरफ से ही गया था। 

प्रश्न ये उठता है कि अगर अकादेमी मंत्रालय के साथ किए गए एमओयू को बगैर माने पुरस्कार की प्रक्रिया को आगे बढ़ा रही थी, तो मंत्रालय की जो अधिकारी सचिव का कार्यभार संभाल रही थीं, उन्होंने आपत्ति क्यों नहीं की। हर बैठक में सचिव की उपस्थिति होती है। अगर एमओयू का उल्लंघन हो रहा था तो सचिव ने मंत्रालय को अलर्ट क्यों नहीं किया?  कार्यकारिणी की बैठक में आपत्ति क्यों नहीं उठाई। एजेंडा पर हस्ताक्षर करते समय अध्यक्ष से प्रश्न क्यों नहीं किए गए। ठीक पुरस्कार घोषित होने के समय ही संस्कृति मंत्रालय को ये याद कैसे आया कि एमओयू का उल्लंघन हो रहा है। अब तीन महीने में ऐसा क्या बदल गया कि पुरस्कृत लेखकों की उसी सूची को जारी कर दिया गया जिसे रोका गया था। दरअसल हिंदी की जूरी का नाम और पुरस्कृत होनेवाली लेखिका ममता कालिया का नाम साहित्य के गलियारे में सबको पता था। कई इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म पर ममता कालिया के नाम की घोषणा भी हो चुकी थी। ममता कालिया की छवि कांग्रेस की पक्षधर और मोदी सरकार की विरोधी की रही है। ऐसा प्रतीत होता है कि उस समय ममता जी के नाम की इतनी अधिक चर्चा हो गई कि मंत्रालय ने पुरस्कार की घोषणा को टालना उचित समझा। अन्यथा मंत्रालय को अब स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए कि दिसंबर में किस नियम का पालन साहित्य अकादेमी ने नहीं किया जिसका पालन तीन महीने में हो गया? एमओयू के करार के अंतर्गत पुनर्गठन हुआ या नहीं? अगर नहीं तो फिर पुरस्कारो की घोषणा क्यों ? 

दरअसल अगर हम साहित्य और संस्कृति से जुड़ी अकादमियों को देखें तो वहां ऐसे लोग बैठे हैं जो साहित्य से अधिक राजनीति करते हैं। अपने-अपने को पुरस्कार देने का खेल खेला जाता है। इस तरह के आरोप इस कारण भी उचित प्रतीत होते हैं कि हिंदी की सूची को देखने के बाद लगता है कि ममता कालिया की संस्मरणात्मक कृति ‘जीते जी इलाहाबाद’ अपेक्षाकृत कमजोर कृति है। इस सूची में कई ऐसी पुस्तकें थीं जो उनकी कृति से मजबूत हैं। साहित्य अकादेमी को चाहिए कि वो अब अपने नियम को बदलकर कृति के स्थान पर लेखक/लेखिका के समग्र लेखन पर पुरस्कार देना तय करे। पिछले वर्षों में कई बुजुर्ग लेखकों को उनकी कमजोर कृतियों पर पुरस्कार देकर उपकृत किया गया। विचारधारा का पोषण भी। साहित्य अकादेमी में वामपंथ की विचारधारा बहुत गहरे तक है उससे पार पाना मुश्किल है। उन वामपंथियों की पहचान मुश्लिल है जो इन दिनों रामनामी ओढ़कर अकादेमी में राजनीति कर रहे हैं। 


Saturday, March 14, 2026

हिंदी के विरुद्ध ‘पवित्र जिहाद’


कुछ दिनों पूर्व नागिरीप्रचारिणी सभा, बनारस की फेसबुक वाल पर एक रील देखी जिसमें कवि अशोक वाजपेयी के वक्तव्य का एक अंश था। उस रील में अशोक वाजपेयी ने आचार्य रामचंद्र शुक्ल की कविता की समझ को रेखांकित किया था। रील देखने के बाद संदर्भ समझने के लिए अशोक वाजपेयी का पूरा भाषण ढूंढा। पता चला कि नागरीप्रचारिणी सभा के तीन प्रकाशनों पर दिल्ली में एक चर्चा का आयोजन था। मंच पर अशोक वाजपेयी और सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल इत्यादि थे। अपने भाषण में वाजपेयी कह रहे हैं कि  वो हिंदी साहित्य के वैध विद्यार्थी नहीं रहे हैं। एक जमाने जब सबलोग आचार्य राaमचंद्र शुक्ल इत्यादि को विधिवत पढ़ते थे वैसे उन्होंने नहीं पढ़ा। कुछ छुट्टा, इधर उधर पल्लवग्राही रूप में पढ़ा। उन्होंने शुक्ल जी के निबंध कविता क्या है की पंक्तियों को पढ़ उसपर टिप्पणी की। जब वो शुक्ल को उद्धृत करते थे तो उनके बगल में मंच पर बैठे व्योमेश दाद दे रहे थे। पूरे प्रसंग की चर्चा मैंने एक मित्र से की। मेरे मित्र काशीवासी और साहित्यिक अभिरुचि के हैं। उनसे अशोक वाजपेयी का कथन बताया कि उन्होंने शुक्ल को विधिवत नहीं पढ़ा है तो उन्होंने गंभीरता से एक प्रश्न पूछा कि ये किसका दुर्भाग्य है ? आचार्य का या अशोक वाजपेयी का। मैं तबतक समझ गया था कि वो ऐसा क्यों पूछ रहे हैं। मैंने छूटते ही कहा कि जाहिर तौर पर दुर्भाग्य तो शुक्ल जी का ही रहा। इतना सुनकर मेरे मित्र जोर से हंसे और बोले कि अगर शुक्ल जी को वो विधिवत और समग्रता में पढ़ लेते तो शुक्ल जी पर बोलने के लिए नहीं आते। ना ही उनके साथ वामपंथी लेखक संघ से जुड़े लोग मंच पर होते। अब मैं थोड़ा विनोद के भाव में आ गया था। मैंने मित्र से पूछा कि उनके कथन का आधार क्या है। उनके अनुसार अगर अशोक वाजपेयी शुक्ल जी के भाषा संबंधी लेखों को विधिवत पढ़ लेते तो शायद नागिरीप्रचारिणी सभा के प्रकाशनों पर बोलने नहीं आते।

दरअसल शुक्ल जी ने हिंदी और उर्दू को लेकर जो लेख नागिरीप्रचारिणी पत्रिका और लीडर जैसी पत्रिकाओं में वर्ष 1908 से 1917 के कालखंड में लिखा उसको अगर वाजपेयी पढ़ लिए होते तो शुक्ल जी की प्रशंसा कर पाते, इसमें संदेह है। शुक्ल जी ने तो हिंदी के विरुद्ध उस समय के मुसलमान नेताओं के वक्तव्यों को पवित्र जिहाद कहा था। वो लिखते हैं कि हिंदी के विरुद्ध अपने पवित्र जिहाद में नवाब अब्दुल मजीद वह हर युक्ति अपनाते हैं, जिसमें उनकी तरह सोचनेवाले व्यक्ति विशेष रूप से निपुण कहे जाते हैं। क्या गलतबयानी, क्या भ्रांतव्याख्या, क्या धमकी, क्या शेखी, क्या स्तुति, क्या निंदा- वे सबका सहारा लेते हैं। यदि सहारा नहीं लेते हैं तो सिर्फ उचित तर्क देने का। आचार्य रामचंद्र शुक्ल इतने पर नहीं रुकते हैं बल्कि यहां तक कहते हैं कि नवाब साहब जब हिंदुओं को ये याद दिलाते हैं कि पुराने समय में वो मुसलमानों के अधीन थे वहां भी वो ये तथ्य विस्मृत कर जाते हैं कि दिल्ली के मुसलमान बादशाह ब्रिटिश शुरक्षा में आने के पहले मराठों की सुरक्षा में थे। पुराने समय के मुसलमानी साम्राज्य की अपेक्षा सिख और मराठा सम्राज्य जनता की स्मृति में अधिक है। इसके लिए शुक्ल जी इंपीरियल गजेटियर खंड छह का उदाहरण देते हैं। अशोक वाजपेयी ने सही माना कि वो हिंदी के वैध विद्यार्थी नहीं रहे। जो वैध नहीं रहता है वो क्या होता है ये बताने की आवश्कता नहीं है। अशोक वाजपेयी जैसे लोग भारत की सामासिक संस्कृति की बहुत बातें करते हैं। बहुधा गंगा-जमुनी संस्कृति की भी और हिंदी की जगह पर हिंदुस्तानी को प्राथमिकता देने पर जोर देते रहे हैं। इस पर भी शुक्ल जी ने टिप्पणी की थी। वो लिखते हैं कि जो लोग राजनीतिक दृष्टि से हिंदू-मुस्लिम एकता अत्यंत आवश्यक समझते हैं वे एक बीच का रास्ता पकड़कर हिंदुस्तानी लेकर उठे हैं। इस हिंदुस्तानी का समर्थन कुछ उदार समझे जानेवाले मुसलमान और उर्दू की गोद में पले हिंदू भी कर रहे हैं। हम भोली-भाली जनता को उस हिंदुस्तानी से सावधान करना अत्यंत आवश्यक समझते हैं। जो हिंदुस्तानी इन लोगों के ध्यान में है वह थोड़ी छनी हुई उर्दू के सिवा कुछ और नहीं है। उर्दू के सब लक्षण जैसे वाक्य रचना की फारसी शैली, अरबी फारसी के अप्रचलित मुंशी-फहम शब्द अरबी-फारसी के कायदे के बहुवचन इसमें वर्तमान रहेंगे तब तो वह हिंदुस्तानी कहलाएगी अन्यथा नहीं।

आचार्य शुक्ल उर्दू को अलग भाषा मानते ही नहीं थे वो तो उसको हिंदी की ही एक शाखा मात्र मानते थे। इसको लेकर उनकी बहुत कठोर टिप्पणी है- हर विद्वान जानता है कि उर्दू कोई स्वतंत्र भाषा नहीं है। यह पश्चिमी हिंदी की एक शाखा मात्र है, जिसे मुसलमानों द्वारा अपनी ऐकांतिक रुचियों और पूर्वग्रहों के अनुकूल एक निजी रूप दे दिया गया है। इस प्रकार हिंदी और उर्दू एक ही भाषा के दो रूप हैं। ये बात तो गणेश शंकर विद्यार्थी ने भी कही थी। शुक्ल जी ये भी कहते हैं कि उर्दू ईर्ष्यावश संस्कृत शब्दों से परहेज करती है और केवल अरबी और फारसी से शब्द उधार लेती है। शुक्ल जी उर्दू को सैन्य छावनी से निकलनेवाली भाषा नहीं मानते हैं।  इस तरह की बातों का उपहास करते थे। विचारणीय प्रश्न ये है कि किस तरह से सैयद अहमद ने उर्दू को मुसलमानों की भाषा कहकर राजनीति आरंभ की और उसको एक समुदाय से जोड़ दिया जो विभाजन तक आते आते बहुत गहरा हो गया। शुक्ल जी ही क्यों उस कालखंड के तमाम लेखकों ने उर्दू को लेकर टिप्पणियां की। स्वाधीन भारत में जब गंगा-जमुनी तहजीब के ध्वजवाहकों ने राजनीति से लेकर सांस्कृतिक लैंडस्केप पर अपना अधिकार जमाना आरंभ किया तो उन्होंने रामचंद्र शुक्ल, प्रताप नाययण मिश्र, भारतेंदु, बालकृष्ण भट्ट और महावीर प्रसाद दिविदी जैसे दिग्गजों के हिंदी-उर्दू संबंधी लेखन को नेपथ्य में धकेलने का प्रयत्न किया। हिंदी-उर्दू के विवाद में ये बात भी उभर कर आई थी कि उर्दू को जमानेवाले लोग सायास अपनी लेखन में भारतीय इतिहास ग्रंथों और पुराणों से उदाहरण नहीं लेकर फारसी से लेने लगे थे। यहां ये भी देखा जाना चाहिए कि उस समय नागरी लिपि को लेकर भी एक बड़ा विमर्श हुआ था। नागिरीप्रचारिणी सभा की पत्रिका से लेकर अन्य पत्रिकाओं में भी इस पर चर्चा हुई थी। ये कैसे हो गया कि नागरी में नुक्ता का प्रयोग आरंभ हो गया। अभी प्रकाशित नागिरीप्रचारिणी सभा के मुखपत्र के लेखों में नुक्ता का उपयोग किया गया है। कैसे और क्यों ? विमर्श इस बात पर भी होना चाहिए कि हिंदी में नुक्ता का प्रयोग क्यों ? हिंदी वर्णमाला में तो नुक्ता का स्थान है ही नहीं।   

प्रश्न भाषा का तो है ही उससे अधिक बड़ा प्रश्न ये है कि किस तरह से भारतीय लेखन को ओझल किया गया। बाद की पीढ़ियों को अपने पूर्वज लेखकों के सोच से दूर किया गया। इस तरह की शिक्षा पद्धति बनाई गई कि भारत और भारतीयता की बात करनेवाले लेखकों के लेखन को पीछे धकेला जा सके। इस संदर्भ में कुबेरनाथ राय का नाम लिया जा सकता है। कुबेरनाथ राय ने भारतीय पौराणिक ग्रंथों से उदाहरण लेकर विपुल लेखन किया। उनके लेखन को भी लंबे समय तक अनदेखा किया गया। अब जाकर उनके लेखन पर थोड़ी बहुत चर्चा होने लगी है। अकादमिक जगत में रामचंद्र शुक्ल के हिंदी साहित्य का इतिहास को प्रमुखता दी गई। भाषा संबंधी उनके विचार स्थान नहीं बना पाए। हिंदी को हिंदू और हिंदुस्तान से जोड़कर एक विमर्श खड़ा कर दिया गया। हिंदी राष्ट्रवाद तक की बात की गई और उसपर पुस्तकें प्रकाशित हुईं। जब हम भारतीय सभ्यता की पुनर्स्थापना की बात करते हैं तो साहित्य और भाषा पर पूर्व में हुए विचारों को समग्रता में देखना होगा। बिना उसके हिंदी की विकास यात्रा को नहीं समझा जा सकता है।

Sunday, March 8, 2026

रेडियो को दिए हिंदी के संस्कार


हिंदी साहित्य के इतिहास में डा नगेन्द्र की जब भी चर्चा होती है तो उनको या तो आलोचक के रूप में या दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के धाकड़ विभागाध्यक्ष के रूप में याद किया जाता है। आलोचक के रूप में रस सिद्धांत और कविता की प्रवृत्तियों पर उनके लिखे को हिंदी आलोचना में पर्याप्त प्रतिष्ठा प्राप्त है। उनके निबंधों की भी चर्चा होती है। दिलचस्प बात ये है कि अंग्रेजी में एमए करने के बाद नगेन्द्र ने हिंदी में भी एमए किया और जीवनपर्यंत हिंदी की सेवा में ही लगे रहे। शिक्षक-आलोचक के रूप में उनकी जो ख्याति है उसके सामने उनका हिंदी भाषा को लेकर किया गया कार्य बहुधा अलक्षित रह जाता है। स्वाधीनता के कुछ महीनों पूर्व 1947 के मई के तीसरे सप्ताह में डा नगेन्द्र ने आल इंडिया रेडियो में नौकरी आरंभ की। अपनी आत्मकथा नें डा नगेन्द्र ने लिखा है कि जब उन्होंने आल इंडिया रेडियो में नौकरी आरंभ की तो वहां हिंदी की दुर्दशा थी। वार्ता, नाटक, संगीत सभी अनुभागों में उर्दू का बोलबाला था। नाम उसका हिंदुस्तानी था पर भाषा उर्दू थी। उत्तर भारत में उस समय अंग्रेजी के अलावा हिंदुस्तानी में समाचार प्रसारित होते थे। आल इंडिया रेडियो में उपयोग में आनेवाली भाषा हिंदुस्तानी शुद्ध उर्दू ही थी जिसमें क्रियाओं और विभक्तियों के अतिरिक्त, जो वस्तुत: हिंदी और उर्दू में समान होती है, हिंदी का कोई लक्षण नहीं था। अंतराष्ट्रीय के लिए वैनुलअकवामी, प्रधानमंत्री के लिए वजीरे आजम, गृहमंत्री और विदेश मंत्री के लिए वजीरे दाखिला और वजीरे खालिजा जैसे शब्दों का प्रयोग होता था। स्वागत और धन्यवाद जैसे शब्दों का प्रयोग आल इंडिया रेडियो में वर्जित था। उस समय आल इंडिया रेडियो के महानिदेशक एस ए बुखारी थे। 

देश स्वाधीन हुआ और सरदार पटेल को इस बात का भान था कि रेडियो शिक्षा और संस्कृति के प्रसार प्रचार का प्रभावी साधन है।। उन्होंने गृह मंत्रालय के साथ-साथ सूचना और प्रसारण मंत्रालय अपने पास रखा। आल इंडिया रेडियो के उस समय के महानिदेशक एस ए बुखारी विभाजन के बाद पाकिस्तान चले गए लेकिन बुखारीकालीन भाषा आल इंडिया रेडियो पर चलती रही। बुखारी के बाद राजर्षि टंडन के प्रयास के बाद पी सी चौधुरी की नियुक्ति रेडियो में महानिदेशक के पद पर हुई। उनको सरदार पटेल का पूर्ण समर्थन था। चौधुरी भारतीय संस्कृति और इतिहास के ज्ञाता ही नहीं थे बल्कि उसके अनुरागी भी थे। जब डा नगेन्द्र ने रोडियो में अपनी सेवा आरंभ की तो हिंदी को हिंदी बनाने का प्रयास आरंभ हुआ। डा नगेन्द्र ने आल इंडिया रेडियो के उत्तर भारत के स्टेशनों में हिंदी के लेखकों और साहित्यकारों को सलाहकार के रूप में नामित कर जोड़ा। उनको कार्यक्रमों में बुलाया जाने लगा। चुनौती हिंदी समाचार की भाषा को हिंदी में प्रसारित करने की  थी। पहले तो हिंदी के साथ साथ उर्दू की पारिभाषिक शब्दावली का उपयोग होना शुरू हुआ। जैसे कहा जाता था कि प्रधानमंत्री यानि वजीरे आजम, अंतराष्ट्रीय यानि वैनुलअकवामी। इस तरह के प्रयोग की आलोचना आरंभ हुई। उर्दू अखबारों के अलावा मुस्लिम विद्वानों ने इसका जोरदार विरोध किया। महानिदेशक चौधुरी को इन आलोचकों की मंशा का पता था इस कारण वो डटे रहे और डा नगेन्द्र को हिंदी के अधिकतम शब्दों के उपयोग की छूट दी। उसी दौर में डा नगेन्द्र पर उनके एक सहकर्मी ने कटाक्ष करते हुए कहा था कि मौलाना अबुल कलाम आजाद के कार्यालय से फोन आया था और वो जानना चाहते थे कि क्या उनका महकमा बदल दिया गया है। दरअसल उस दिन के बुलेटिन में डा नगेन्द्र ने वजीरे तालीम की जगह शिक्षा मंत्री लिखा था जो प्रसारित हुआ था। इन आलोचनाओं और कटाक्षों से डा नगेन्द्र डिगे नहीं और हिंदी को आल इंडिया रेडियो में स्थापित करने का महती कार्य किया। 

डा नगेन्द्र ने चौधुरी के कहने पर सुमित्रानंदन पंत को रेडियो के लिए काम करने को तैयार किया। पंत जब रेडियो के लिए काम करने लगे तो साहित्य जगत के कुछ दिग्गजों ने उनके चयन पर प्रश्न उठाया था। नगेन्द्र अपनी आत्मकथा में लिखते हैं, भारतीय प्रसारण का इतिहास इस बात का साक्षी है कि पंत जी की नियुक्ति को लेकर शंका सर्वथा निर्मूल थी। पंत जी के ज्योति-स्पर्श से रेडियो का वायुमंडल एक स्निग्ध-स्वर्णिम प्रकाश से दीपित हो उठा। उन्होंने अत्यंत परिश्रम के साथ आकाशवाणी( तबतक आल इंडिया रेडियो का हिंदी नाम आकाशवाणी हो चुका था) के कार्यक्रम का संस्कार-परिष्कार किया और उसे भारतीय संस्कृति का उपयुक्त माध्यम बनाने में अपूर्व योगदान किया। डा नगेन्द्र ने पंत को रेडियो पर प्रसारिक होनेवाले समाचार की भाषा को ठीक करने का श्रेय दिया है। ये उचित भी है लेकिन नगेन्द्र ने आल इंडिया रेडियो के हिंदी के समाचार प्रभाग में हिंदी को स्थापित करने के क्रम में अपमान और प्रताड़ना भी झेलकर डिगे नहीं ये भी उल्लेखनीय है। नेहरू जी का स्वाधीनता की अर्धरात्रि को दिए जानेवाले भाषण के हिंदी अवुवाद को लेकर भी डा नगेन्द्र को कठघरे में खड़ा किया गया था लेकिन उन्होंने उस भाषण के अंग्रजी से हिंदी अनुवाद में सिर्फ कुछ शब्द ठीक किए थे। यह पूरा प्रसंग काफी लंबा है लेकिन स्वाधीनता के बाद हिंदी भाषा को जनप्रिय बनाने में रेडियो और नगेन्द्र की भूमिका का स्मरण करना आवश्यक है।