कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी की संस्मरणात्मक पुस्तक के भारत में प्रकाशन को लेकर विवाद जैसा हो गया है। बताया जा रहा है कि सोनिया गांधी की पुस्तक बिलांगिंग,ए जर्नी आफ लव के भारत में प्रकाशन पर लेखक और प्रकाशक में मतभेद है। इस पर चर्चा करने के पहले जरा इस पुस्तक की घोषणा की पृष्ठभूमि देखते हैं। पहले इंटरनेट मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म्स पर इस पुस्तक का कवर आया। लोगों ने पोस्ट करना आरंभ किया, सोनिया जी की पुस्तक आ रही है। उत्सुकता का वातावरण बनाया गया। एक्स और फेसबुक पर कवर के बाद कहा जाने लगा कि सोनिया गांधी ने अपनी पुस्तक में राजीव गांधी से मिलने से लेकर गांधी परिवार की बहू बनने तक की घटनाओं का उल्लेख किया है। जो लोग भी पोस्ट कर रहे थे उनमें से किसी ने पुतक पढ़ी नहीं थी। पुस्तक 10 नवंबर को बाजार में आ रही है। अमेरिका का प्रकाशक इसको प्रकाशित कर रहा है। राजीव और सोनिया ने प्रेम विवाह किया था। किताब के नाम में जर्नी आफ लव को उनकी प्रेमकथा से जोड़कर लोगों ने पोस्ट लिखे। पुस्तक के प्रति उत्सुकता का वातावरण गाढ़ा हुआ। अब चर्चा हो रही है कि प्रकाशक पेंग्विन इंडिया ने भारत में उनकी पुस्तक को छापने से मना कर दिया है। इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स पर चर्चा ने जोर पकड़ा। बताया जाने लगा कि प्रकाशक ने लेखिका से कुछ प्रसंगों और अंशों को बदलने का आग्रह किया गया। लेखिका ने प्रकाशक की बात मानने से इंकार कर दिया। इसको विवाद का रूप दिया गया। इस प्रसंग को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़कर देखा जाने लगा।
प्रकाशक पेंग्विन ने अपनी तरफ से सफाई दी। घोषणा की कि सोनिया गांधी की पुस्तक पेंग्विन से प्रकासित नहीं हो रही है। आगे लिखा कि प्रकाशक होने के नाते उनका विशेषाधिकार और जिम्मेदारी है कि वो किसी भी पुस्तक के किसी भी प्रसंग का फैक्ट चेक करें। लेखक को अपनी राय से अवगत करवाएं, जो कि पुस्तक के हित में हो। ये प्रकाशन जगत की समान्य प्रक्रिया है। पेंग्विन ने आधिकारिक बयान में कहा वो अब भी इस पुस्तक को छापने के इच्छुक हैं। साथ ही बताया कि प्रकाशक और लेखक के बीच जो भी बात हुई है उसकी गोपनीता बरकरार रखना चाहते हैं। पेंग्विन ने सही कहा है। कथेतर पुस्तकों में फैक्ट चेक करने की आवश्यकता होती है। फिक्शन में तो किसी तरह प्रसंग काल्पनिक कहकर चल जाता है। जब आप किसी पुस्तक को संस्मरणात्मक कहते हैं या किसी घटना के आधार पर लिखते हैं तो उसकी प्रामाणिकता तो सिद्ध करनी ही होती है। ये तो प्रकाशन जगत की सामान्य प्रक्रिया है। जो लेखक कथेतर गद्य लिखते हैं उनको ये पता भी है। मैंने ही लोकसभा चुनाव में अमेठी में राहुल गांधी की हार और स्मृति इरानी की जीत को केंद्र में रखकर अमेठी संग्राम नाम की पुस्तक लिखी थी। उस पुस्तक के कई प्रसंगों पर प्रकाशक ने आपत्ति जताई थी। कइयों की उसकी प्रामणिकता के बारे में आशंकित थे। प्रियंका गांधी से संबंधित एक घटना मेरी पुस्तक में उल्लिखित है। प्रियंका पर टिप्पणी सुनने के बाद स्मृति इरानी ने एक बेहद कठोर निर्णय लिया था। उस निर्णय का उनके चुनाव परिणा पर असर पड़ सकता था। इस प्रेसंग को लेकर प्रकाशक आश्वस्त नहीं थे। उन्होंने प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए बोला। जब उस घटना के साक्षियों के वर्जन आए तब प्रकाशक संतुष्ट हुए। दूसरी पुस्तक मार्क्सवाद का अर्धसत्य को लेकर भी प्रकाशक के कुछ प्रश्न थे। जिनको हमने साथ बैठकर हल किया था। यह तो लेखक और प्रकाशक के बीच चलनेवाली एक रुटीन प्रक्रिया है। लेकिन इन तमाम बातों के बीच सोनिया गांधी की पुस्तक को लेकर उत्सुकता का वातावरण बना हुआ है।
इंटरनेटट मीडिया पर अब इस तरह की बातें आ रही हैं कि सोनिया जी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की एक भेंट के प्रसंग को लेकर प्रकाशक ने आपत्ति जताई। चीन-भारत संबंध के अध्याय को लेकर प्रकाशक के कुछ प्रश्न थे। इसी तरह से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबंधित प्रसंगों की प्रामाणिकता को लेकर प्रकाशक आश्वस्त होना चाहते थे। संस्मरणों में इस तरह की बातें होती हैं जो बहुधा लेखक की धारणा पर आधारित होती है । उससे किसी अन्य की छवि पर असर पड़ सकता है। संभव है कि उक्त प्रसंगों में इस तरह की धारणाएं हों जिसको लेकर प्रकाशक आश्वस्त होना चाहता हो। यही आश्वस्ति तो कांग्रेस के नेता 2010 में चाह रहे थे जब स्पैनिश लेखक जेवियर मोरो की पुस्तक ‘द रेड साड़ी’ भारत में प्रकाशित होनेवाली थी। जेवियर मोरो ने 2008 में स्पैनिश भाषा में सोनिया गांधी की जीवनी लिखी थी। उसका अनुवाद इटैलियन, फ्रेंच और डच भाषा में हुआ था। भारत में जब मोरो की पुस्तक के प्रकाशन की बात आई थी को कांग्रेस के नेताओं ने इसका खूब विरोध किया था। जहां तक मुझे स्मरण है कि जेवियर मोरो को कानूनी नोटिस भी भेजी गई थी। उस पुस्तक के कुछ प्रसंगों को लेकर कांग्रेस के नेताओं को आपत्ति थी। इमरजेंसी में सोनिया गांधी की भूमिका, सोनिया और मेनका गांधी के बीच के संबंध, गांधी परिवार की घटनाओं को लेकर कांग्रेस नेताओं को आपत्ति थी। कांग्रेस नेताओं ने तब जेवियर मोरो की पुस्तक को असत्य, अर्धसत्य और अपमानजनक बताया था। उस समय जेवियर मोरे ने ये दावा किया था कि सोनिया गांधी की जीवनी लिखने के लिए इटली स्थित सोनिया गांधी के पैतृक शहर लुसियाना में काफी समय बिताया था। उसने तो यहां तक दावा किया था कि पुस्तक प्रकाशन के पहले उसकी पांडुलिपि सोनिया जी की बहन नाडिया को दिखाई गई थी। सोनिया जी को भेजने का दावा भी मोरो ने किया था। बाद में जब केंद्र में सरकार बदली तब 2015 में ये पुस्तक भारत में प्रकाशित हो सकी। मोरो ने विवादों के बीच अपनी पुस्तक को फिक्शनलाइज्ड बायोग्राफी कहा था। पुस्तक पर डिस्क्लेमर भी लगाया था कि बातचीत संवाद और स्थितियां लेखक की व्याख्या पर आधारित है। यह आवश्यक नहीं कि वो प्रामाणिक भी हो।
अब जब सोनिया गांधी की संस्मरणात्मक पुस्तक आ रही है तो वही लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रश्न खड़ा कर रहे हैं जो उस समय जेवियर मोरो की पुस्तक का विरोध कर रहे थे। प्रामाणिकता की मांग करनेवाले वही लोग या तो अब खामोश हैं या प्रकाशक को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। ना तो यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मसला है और ना ही इसमें किसी प्रकार के दबाव की बात है। यह मामला सीधे तौर पर प्रसंगों की प्रामाणिकता का है। संभव था कि सोनिया जी इसको फिक्शनलाइज्ड संस्मरण कह देती और पेंग्विन आपत्ति नहीं करता। पर ऐसा नहीं होने के संकेत हैं। दुनिया भर में ऐसे अनेक विवाद सामने आते रहे हैं जब प्रकाशक, लेखक की बातों से असहमत होते हैं और पुस्तक छापने से इंकार देते हैं। सोनिया जी की पुस्तक का विवाद को भी इसी आईने में देखे जाने की जरूरत है। हां, इन प्रसंगों से इतना अवश् हुआ कि पुस्तक को लेकर उत्सुकता का वातावरण बना हुआ है। चर्चा होगी तो बिक्री पर असर पड़ना स्वाभाविक है।




