प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नए प्रधानमंत्री कार्यालय का शुभारंभ किया। इसका नाम रखा गया सेवा तीर्थ। सेवा तीर्थ के उद्घाटन के अवसर पर प्रधानमंत्री ने गणेश पूजा करके कार्यालय में विधिवत प्रवेश किया। भारत में कार्यारंभ के समय भगवान श्रीगणेश की पूजा की परंपरा रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारतीय परंपरा का ध्यान रखा। प्रधानमंत्री मोदी भारतीय परंपराओं और विधियों का ना केवल ध्यान रखते हैं बल्कि उसको निजी और सार्वजनिक रूप से बरतते भी हैं। इसको भारत की पारंपरिक और आध्यात्मिक चेतना को वापस लाने का प्रयत्न के तौर पर देखा जाना चाहिए। प्रधानमंत्री जब किसी कार्य का आरंभ करते हैं, किसी मंदिर या धर्मस्थल पर जाते हैं तो वहां विधि-विधान के साथ पारंपरिक अर्चना से परहेज नहीं करते हैं। उनके इन कदमों पर कांग्रेस समेत कई अन्य दलों के नेता टीका टिप्पणी करते रहते हैं। उनका आरोप रहता है कि प्रधानमंत्री मोदी हिंदुओं को लुभाने के लिए इस तरह के कार्य करते हैं। इन आरोपों पर कुछ कहना व्यर्थ है क्योंकि हिंदुओं को लुभाने के लिए प्रधानमंत्री ने कभी भी वस्त्र के ऊपर जनेऊ नहीं पहना। कभी भी दिखावे के लिए ना तो पूजा-अर्चना की ना ही दिखावे के लिए श्रद्धावनत हुए। दरअसल मोदी के विरोधी इस बात को नहीं समझते हैं कि प्रधानमंत्री अपने इन कदमों को सभ्यतागत संघर्ष में एक टूल की तरह उपयोग करते हैं। पिछले बारह वर्षों में मोदी ने सभ्यतागत चेतना को विमर्श के केंद्र में लाने के लिए दिन-रात मेहनत की। आज स्वाधीन भारत के इतिहास में वो ऐसे प्रधानमंत्री के तौर पर दिखाई देते हैं जिन्होंने भारतीय सभ्यता को पुनर्स्थापित करने का ना केवल प्रयत्न किया बल्कि उसमें बहुत हद तक सफलता भी प्राप्त की।। सभ्यतागत संघर्ष में आनेवाली बाधाओं का अनुमान जनता बहुत देर से लग पाता है। पर बाधाएं होती बहुत भीषण हैं। धर्म और आध्यामिकता को विमर्श के केंद्र में लाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने जो कदम उठाए वो रेखांकित करने योग्य हैं। आज हमारी सभ्यता और उसकी विरासत राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में है। आलोचकों को लगता है कि ये धर्म और राजनीति का घालमेल है लेकिन ये घालमेल नहीं बल्कि अपनी जड़ों की ओर लौटना है।
भारतीय ज्ञान परंपरा, भारतीय शोध विधि, भारतीय न्याय संहिता...ये सूची बहुत लंबी हो सकती है। ये सभी आज देश में केंद्रीय विमर्श का हिस्सा हैं। जब प्रधानमंत्री मोदी 2047 में विकसित भारत की बात करते हुए आध्यत्मिकता की बात करते हैं तो हमें स्मरण होता है कि यही काम तो अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी अपने देश में कर रहे हैं। वहां भी धर्म की वापसी को लेकर ना केवल प्रयत्न किए जा रहे हैं बल्कि ईसाई धर्म की ओर युवाओं का लाने के लिए कई तरह के कदमों की घोषणा की जा रही है। कुछ दिनों पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप ने 17 मई को देशव्यापी प्रेयर डे मनाने के लिए अमेरिकी जनता का आह्वान किया। प्रेयर डे के आयोजन की घोषणा क्यों की गई उसका भी जिक्र राष्ट्रपति ट्रंप ने किया। उन्होंने बताया कि पिछले दिनों में चर्च जानेवालों की संख्या बढ़ी है। इस खुशनुमा नवीनीकरण को ध्यान में रखते हुए 17 मई को सभी अमरीकियों को नेशनल माल में प्रार्थना के लिए आमंत्रित कर रहा हूं। उस दिन हमलोग फिर से अपने राष्ट्र अमेरिका को ईश्वर की सत्ता के अधीन करनेवाले हैं। अमेरिका में ईसाई धर्म को लेकर पिछले कुछ वर्षों में आकर्षण बढ़ा है। वहां जिस तरह से नास्तिकता के नाम पर, मानवाधिकार के नाम पर, स्वाधीनता के नम पर अराजकता जैसी स्थिति हो गई थी वो भी सभ्यतागत लड़ाई का ही नतीजा था। आज से कुछ वर्षों पूर्व अमेरिका में थर्ड जेंडर और उनके अधिकारों की बात होती थी लेकिन आज वहां स्पष्ट तौर पर कहा जाता है कि दो ही लिंग होते हैं महिला और पुरुष। पुरुष के मां बनने की बात का उपहास सार्वजनिक रूप से वहां के नीतिनियंता उड़ाते रहते हैं। वहां फिर से ईश्वर में विश्वास वापसी, आस्तिकता और परिवार प्रबंधन में दो से अधिक बच्चे पैदा करने की बातें होने लगी हैं। यह अनायास नहीं है कि ट्रंप के पहले कार्यकाल में पिछले सौ वर्षों में सबसे अधिक संख्या में बाइबिल की बिक्री हुई है। हमारे यहां भी तो पिछले दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने परिवार में तीन बच्चों को शास्त्रसम्मत और विज्ञान सम्मत बताया था। मुंबई में आयोजित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शताब्दी वर्ष के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने प्रश्नों के उत्तर देने के क्रम में डाक्टरों, मनोविज्ञानियों और जनसंख्या विशेषज्ञों का हवाला देते हुए तीन बच्चों को परिवार के लिए उचित बताया। बच्चों की परवरिश के लिए भी। भागवत ने अमेरिका में प्रकाशित पुस्तक चीपर बाय द डिजायन का संदर्भ दिया था।
अमेरिका के सेक्रेट्री आफ वार ने कहा कि अमेरिका ईसाई राष्ट्र के तौर पर स्थापित हुआ और वैसा ही बना रहेगा। अमेरिका स्वयं को एक बार फिर से 17 मई को ईश्वर को समर्पित करेगा। भारत में भी जब हिंदू राष्ट्र की बात होती है तो उसको पता नहीं किस किस तरीके से परिभाषित किया जाता है। वेबसीरीज और फिल्मों में हिंदू राष्ट्र की एक गंदी छवि प्रस्तुत की जाती है। पर सरसंघचालक समेत तमाम बड़े हिंदूवादी नेताओं ने ये स्पष्ट किया है कि भारत तो पहले से हिंदू राष्ट्र है और उनके अपने तर्क हैं। यहां हिंदू राष्ट्र में किसी का विरोध नहीं है बल्कि भारत में रहनेवाले सभी को हिंदू मानने की अपेक्षा की जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि हिंदू एक जीवन शैली है। मोहन भागवत भी कई बार कह चुके हैं कि पूजा या उपासना पद्धतियां अलग हो सकती है और उससे किसी का भी किसी तरह का विरोध नहीं है। अमेरिका में तो खुलेआम वहां के कांग्रेसजन कह रहे हैं कि शरिया कानून का अमेरिकी मूल्यों के साथ तालमेल नहीं हो सकता है और इसके लिए वहां कोई जगह नहीं है। कांग्रेसमैन ब्रैंडन गिल ने तो सके बाद स्पष्ट किया कि उनको गर्व है कि वो शरिया मुक्त अमेरिकी काकस का हिस्सा बन गए हैं।
आज सिर्फ भारत या अमेरिका ही नहीं बल्कि दुनिया के अन्य देशों में अपनी जड़ों की ओर लौटने की व्याकुलता देखी जा सकती है। दुनिया के वो देश जो मानवाधिकार से लेकर जेंडर मुक्त बातों की वकालत करते थे आज इनसे दूर होते दिख रहे हैं क्योंकि स्वाधीनता और स्वायत्ता के नाम पर कथित आधुनिक विचारधारा ने पूरी दुनिया में जो अराजकता फैलाई उसका दुष्परिणाम लंबे समय बात सामने आ रहा है। आज भारत की जनता भी इस बात को समझ चुकी है कि उनके यहां भी स्वाधीनता के बाद आधुनिकता के नाम पर जिस तरह से विदेशी विचारों और मूल्यों को सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों ने थोपा उससे उनका हित नहीं हो सका। राष्ट्र को आधुनिक बनाने के नाम पर जिस तरह के विचारों का पोषण किया गया उसने राष्ट्र को परोक्ष रूप से आंतरिक तौर पर कमजोर और विभाजित किया। चाहे वो भाषा के नाम पर हो, शोध प्रविधि और अध्ययन -अध्यापन के नाम पर हो। अपने पौराणिक ग्रंथों में वर्णित सिद्धातों और प्रविधियों को नजरअंदाज कर विदेशी सिद्धातों को अपनाकर भारतीय विचारों को कुंद किया गया। यही कुछ वर्षों पूर्व अमेरिका में भी हुआ था लेकिन अब वहां भी अपनी जड़ों की ओर लौटने की ललक दिख रही है। सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग भी उसी विचार के हैं। हमारे देश में भी भारतीय पद्धतियों को अपनाने की दिशा में बहुत काम हो चुका है लेकिन गाहे बगाहे अब भी स्वयं को प्रगतिशील कहनेवाले इन कदमों का उपहास करते रहते हैं पर अब उनका ना तो बहुत नोटिस लिया जाता है और ना ही बातों को महत्व मिलता है।





