भारतीय राजनीति में इन दिनों घुसपैठियों की जमकर चर्चा होती है। चुनाव आयोग के मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण अभियान के आरंभ के बाद से ही घुसपैठियों को लेकर राजनीतिक बयानबाजी होने लगी है। पश्चिम बंगाल के चुनाव के समय भी घुसपैठिए चर्चा के केंद्र में रहे। बंगलादेश से लगी भारत की सीमा पर चुनाव आयोग के विशेष पुनरीक्षण अभियान के समय और चुनाव परिणाम के बाद घुसपैठियों के देश लौटने की तस्वीरें भी पूरे देश ने देखीं। घुसपैठियों की ये समस्या सिर्फ भारत की समस्या नहीं है। इस समस्या से यूरोप के कई देश और अमेरिका भी जूझ रहा है। इस माह के आरंभ में ब्रिटेन में भारतीय मूल के एक युवक को एक ब्रिटिश युवक की हत्या के आरोप में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। सजा के कुछ दिनों पूर्व हत्याकांड के वीडियो के सामने आने के बाद पूरे ब्रिटेन में प्रवासियों के खिलाफ गुस्सा फूट पड़ा। दरअसल हुआ कि जब ब्रिटेन के युवक पर हमला हुआ और पुलिस घटनासथल पर पहुंची तो पुलिस ने 18 वर्ष के घायल युवक हेनरी को अस्पताल पहुंचाने के बजाए उसको ही हथकड़ी पहना दी। उसकी कराह और स्थिति से भी पुलिस का दिल नहीं पसीजा। उसकी मौत हो गई। ब्रिटेन में इस कांड के वीडियो सामने आने के बाद प्रवासियों और घुसपैठियों के विरुद्ध एक बड़ा आंदोलन खड़ा हो गया है। इनके अधिकारों को लेकर बहस भी चल पड़ी है। बहस तो तुष्टीकरण को लेकर भी हो रही है, रिलीजन को लेकर भी हो रही है। पूरे ब्रिटेन में मृत युवक हेनरी की स्मृति और समर्थन में युवक और युवतियां घुटनों पर बैठकर अपने वीडियो जारी कर रहे हैं। अपनी मौत के पहले हेनरी भी इसी तरह पुलिस वालों से गुहार लगा रहा था।
हाल ही
में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री का एक वीडियो इंटरनेट मीडिया पर प्रचलित हो रहा है।
इस वीडियो में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर से पूछा जाता है कि क्या अब
भी ब्रिटेन एक क्रिश्चियन देश है? उनका
सीधा उत्तर नहीं आता। वो कहते हैं कि अगर क्रिश्चियन देश की बात है तो मैं स्वयं
एक क्रिश्चियन हूं और चर्च में मेरा विश्वास है। हमारे अनौपचारिक संविधान में भी
क्रिश्चियनिटी की बात प्रमुखता से है। वे इतने पर ही नहीं रुकते हैं और आगे कहते
हैं कि हम अनेक मतों को सेलिब्रेट करते हैं और मैं इसके लिए गर्व का अनुभव करता
हूं। इस बयान के बाद ब्रिटेन में रिलीजन को लेकर भी एक नई बहस छिड़ गई है। बहस ये
कि क्या क्रिश्चियनिटी को ब्रिटेन में कम महत्व मिल रहा है। ब्रिटेन के मूल
निवासियों के एक वर्ग में अपने प्रधानमंत्री के इस बयान को लेकर नाराजगी है। उनका
तर्क है कि अन्य मतावलंबियों को सम्मान मिले लेकिन देश को अपने मूल रीलिजन को
प्रमुखता और प्राथमिकता होनी चाहिए। इस बहस ने ब्रिटेन की सीमा को पार कर लिया है।
फ्रांस और जर्मनी के अलावा अमेरिका भी इस बहस में शामिल हो गया है। रिलीजन के
अलावा चर्चा राज्य के दायित्व पर हो रही है। पूछा जा रहा है कि राज्य पीड़ित के
पक्ष में दया और न्याय का भाव रखे या नहीं। ब्रिटेन में हेनरी पर हमले के बाद देखा
गया कि पीड़ित के साथ पुलिस ने दया नहीं दिखाई। अपने स्तर का न्यायपूर्म व्यवहार
भी नहीं कर पाई। वार से घायल हेनरी जमीन पर तड़पता रहा और पुलिस उसको घुटने के बल
पर बैठा कर हथकड़ी लगाती रही। ब्रिटेन की बहस अब राष्ट्रीय अस्मिता और पहचान तक
पहुंच गई है। ब्रिटेन किसका ? ब्रिटेन का कानून किसके लिए? मूल निवासियों
के लिए या प्रवासियों और घुसपैठियों के लिए। बहस ने ब्रिटेन की राजनीति को भी प्रभावित
करना आरंभ कर दिया है।
ब्रिटिश
युवक की हत्या और उसके बाद घुसपैठियों और प्रवासियों को लेकर चलनेवाली बहस सीमाओं
से आगे निकल गई है। अमेरिका के उपराष्ट्रपति जे डी वांस ने एक्स पर हेनरी का
वीडियो साझा करते हुए लिखा कि हेनरी नोवाक उसी तरह से मरा है जिस तरह से एक सभ्यता
की मौत होती है। प्रशासन ने ना तो उस पर विश्वास किया। ना ही उसका ध्यान रखा।
हथकड़ी लगाकर मरने के लिए छोड़ दिया। उसपर हेट क्राइम का आरोप भी लगाया जो उसने
किया ही नहीं था। जे डी वांस ने अपने लंबे पोस्ट में लिखा कि हेनरी इस तरह के
अपराध में जान गंवाने वाला पहला युवक नहीं है और ना ही आखिरी होगा। इस तरह की घटना
के प्रतिवाद का एकमात्र रास्ता है न्यापूर्ण तरीके से क्रोध का प्रदर्शन। अंत में
वांस ने लिखा कि हम अपनी सभ्यता और अपने देश को प्यार करते हैं। अपने बच्चों से
प्यार करते हैं और किसी की भी जान हेनरी नोवाक की तरह न जाए इसका ध्यान रखना होगा।
उपराष्ट्रपति जे डी वांस के अलावा उद्गोयपति एलान मस्क ने भी इस घटना पर अपनी
प्रतिक्रिया देकर उसको अंतराष्ट्रीय मसला बना दिया। वो तो सिविल वार होने तक की
टिप्पणी कर गए। यूरोप में जनता का न्यायपूर्ण क्रोध बढ़ता जा रहा है और इसने
ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस के अलावा नीददरलैंड और स्वीडन को भी अपनी चपेट में ले
लिया है। कहा जा रहा है कि इन देशों की सरकारों की उदारवादी नीतियों ने मूल
निवासियों के अधिकारों को खतरे में डाल दिया है।
जब
भारत में घुसपैठियों और तुष्टीकरण की बात होती है तो यहां का कथित लिबरल तबका इसका
विरोध करता है। उदारता और समानता के सिद्दांतों की बातें होने लगती हैं। हमारा देश
भी घुसपौठियों के कारण अनेक समस्याओं से जूझता रहा है। बंगाल का ही उदाहरण लें तो
वहां पूर्व में जिस तरह से घुसपौठियों को आधार कार्ड और राशन कार्ड देकर वैधता
प्रदान की गई उसके पीछे वोट और सत्ता पाने की मंशा थी। हमारे देश ने भी तुष्टिकरण
का लंबा दंश झेला है। तुष्टीकरण के कारण ही अपराधियों और गैंगस्टरों का बड़ा वर्ग
तैयार हुआ था। बंगाल के अलावा उत्तर प्रदेश का ही उदाहरण लें। वहां तुष्टीकरण के
कारण ही अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी जैसी खूंखार अपराधी ना केवल जन्मे बल्कि
उन्होंने अपना साम्राज्य खडा कर लिया। ये तुष्टीकरण का ही परिणाम था कि उत्तर
प्रदेश के अपराधी को लंबे समय तक पंजाब की जेल में रखा गया। कानूनी प्रक्रिया के
बाद उसको उत्तर प्रदेश की जेल में लाया जा सका। ये उस तुष्टीकरण का ही परिणाम था
कि मुंबई बम धमाकों के अपराधी याकूब मेनन के लिए सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की
बेंच आधी रात के बाद सुनवाई के लिए बैठी थी। आज हमाररे देश के सामने सबसे बड़ा
प्रश्न ये है कि क्या हम भी यूरोप और अमेरिका की तरह भारत के मूल निवासियों के
अधिकारों की रक्षा की राजनीति करें या इसको छोड़कर घुसपैठियों को वैधता प्रदान कर
सत्ता के लिए राजनीति चमकाएं। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में ये मुद्दा केंद्रीय
हो सकता है। अभी से इसके आसार दिखने लगे हैं। राजनीतिक दल मुद्दा बनाएं या नहीं
लेकिन समाज को भी इस बारे में सोचना होगा। न्यापूर्ण क्रोध का प्रदर्शन करना होगा।




