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Saturday, August 1, 2026

परंपरा में गालियों का सौंदर्यशास्त्र


जंतर मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन के बाद आंदोलन में शामिल हुए युवक और युवतियों की भाषा और गालियों पर चर्चा हो रही है। साहित्य जगत इससे अछूता नहीं है। साहित्य जगत में भी गालियों पर खूब चर्चा हुई। प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से ऐसी भाषा का उपयोग किया गया जो साहित्यकारों और लेखक/लेखिकाओं से अपेक्षित नहीं थी। राजनीतिक प्रतिबद्धता के आधार पर गालियों की पैरोकारी की गई। कुछ उत्साही लेखकों ने तो गाली को साहित्य का अभिन्न अंग बता दिया। राही मासूम रजा से लेकर काशीनाथ सिंह के उपन्यासों में गालियों की बात कर अपने तर्कों में वजन डालने का प्रयत्न किया गया। अति उत्साह में वैसी रचनाएं खोजी गईं जिनको गालियों के पक्ष में उद्धूत किया जा सके। पर वहां ये नहीं बताया जा सका कि गालियों में प्रयुक्त शब्दावली कैसी थी और उसका किस संदर्भ में प्रयोग किया गया था। चूंकि ये विवाद साहित्यकारों, लेखकों और कुलेखकों के बीच था इस कारण हमें उन कृतियों पर भी विचार करना चाहिए जिसमें गालियों की भरमार है। विचार तो उसपर भी किया जाना चाहिए कि गालियों का संदर्भ क्या रहा है। किन पात्रों और परिवेश में गालियां दी जाती रही हैं। इस संबंध में राही मासूम रजा के उपन्यास आधा गांव का उदाहरण कई लोगों ने दिया। राही ने अपने उपन्यास आधा गांव में जिन पात्रों के मुंह से गालियां दिलवाई हैं उनका परिवेश और उन परिस्थितियों को भी देखा जाना चाहिए। उसको देखने से ये स्पष्ट हो जाता है कि गालियों का उपयोग लेखक ने कथा को प्रामाणिक बनाने के लिए किया। किसी को अपमानित करने या उसको नीचा दिखाने के लिए नहीं। कटेंट का इटेंट देखना सबसे आवश्यक है। यही स्थिति काशीनाथ सिंह के यहां भी दिखाई देती है। 

जिन लेखकों ने अपने उपन्यासों में गालियों को अश्लीलता के साथ प्रस्तुत किया उनपर भी विचार किया जाना चाहिए। हिंदी में एक उपन्यासकार हुए कृष्ण बलदेव वैद। उनका एक उपन्यास है विमल उर्फ जाएं तो जाएं कहां। इस उपन्यास में अश्लीलता की पराकाष्ठा है। उनकी ये कृति जब प्रकाशित होकर आई थी तो उसकी भाषा को लेकर,स्थितियों के चित्रण में अश्लीलता को लेकर चर्चा हुई थी। आमतौर पर इस तरह की कृतियों के साथ जो होता है वही उनके इस उपन्यास के साथ भी हुआ। समय बीतने के साथ इसकी चर्चा कम होती चली गई। अब तो गाहे बगाहे ही इस उपन्यास का नाम सुनाई देता है। वैद का एक और उपन्यास है उसका बचपन। इस औपन्यासिक कृति को संवेदनशील बचपन की आंख से देखी गई एक बड़ी दुनिया की कथा कहा गया। इसकी भाषा भी अश्लील ही थी। प्रकाशन के बाद इसकी चर्चा हुई लेकिन धीरे-धीरे चर्चा तो खत्म हुई ही ये कृति पाठकों की दृष्टि से ओझल भी हो गई। कहना ना होगा कि कटेंट का इंटेंट बहुत ही महत्वपूर्ण होता है। वैद ने कभी कहा था कि ये हिंदी साहित्य में उनके खिलाफ साजिश है। उनको ये भी विचार करना चाहिए था कि किस कारण से उनके उपन्यास फौरी तौर पर चर्चित होते थे और फिर नेपथ्य में चले जाते थे। दूसरी तरफ निर्मल वर्मा हैं जो उनके ही समकालीन थे। उनके उपन्यासों में भी ऐसी परिस्थियां बनती थीं कि वो अश्लील हो सकते थे। गालियों और स्त्री देह का वर्णन कर सकते थे। उन्होंने अपने भाषा कौशल से उन स्थितियों को अश्लील होने से बचाया। याद पड़ता है उनका एक उपन्यास लाल टीन की छत। इस उपन्यास में निर्मल ने अपने पात्र काया के माध्यम से कथा को आगे बढ़ाया है। काया इस उपन्यास में बचपन और किशोरावस्था के संधिकाल में थी। यहां भी देह के यथार्थ से पात्र का मुठभेड़ होता है। लेखक बेहद संवेदनशील तरीके से उसका बगैर अश्लील हुए पात्र की मन:स्थिति का सफलतापूर्वक चित्रण कर ले जाते हैं। ये उपन्यास भी खूब चर्चित हुआ। अब भी ये हिंदी के पाठकों के साथ साथ गैर-हिंदी पाठकों को अपने शिल्प और भाषाई सौष्ठव के कारण लुभाता है। कंटेंट का इंटेंट साफ है। निर्मल कई बार विसंगतियों को रेखांकित करते हैं लेकिन अर्थहीन नहीं होते। 

कई लोगों ने प्रेमचंद और अमृतलाल नागर के उपन्यासों का नाम लेकर भी गालियों को या अश्लीलता के सार्वजनिक प्रदर्शन को उचित ठहराने का प्रयत्न किया। ऐसे लोगों की हालत भी वैद साहब जैसी होकर रह गई। चर्चा तो मिली लेकिन तर्कों को स्थायित्व नहीं। इंटरनेट मीडिया के जमाने में किसको स्थायित्व की चिंता है। हो भी क्यों ? यहां तो तुरंता प्रसिद्धि के फेर में लोग साहित्यकार बने फिरते हैं। किसी भी चर्चा में छूट ना जें इसलिए उलजलूल लिखकर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते हैं। उपन्यासकारों के बाद अशोक वाजपेयी की बात कर लेते हैं। आयोजनधर्मी होने के बावजूद आज भी अशोक वाजपेयी को कवि के रूप में मान्यता प्राप्त करने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। रतिक्रीड़ा की कविताएं लिखनेवाले अशोक वाजपेयी को देह और गेह का कवि ही माना गया। अपनी कविताओं में बाद के दिनों में अशोक वाजपेयी ने मोहक गद्य लिखना आरंभ किया लेकिन कवि के तौर पर पहचान और कविताओं को लोक में स्वीकृति नहीं मिल पाई है। उनकी तुलना में कुंवर नारायण और केदारनाथ सिंह ना केवल कवि के रूप में स्थापित हुए बल्कि कविताओं में वैचारिकी और सिद्धांत के कारण हिंदी साहित्य समाज में समादृत भी हुए। कुंवर जी कविता है- अबकी बार लौटा तो। उसकी कुछ पंक्तियां हैं- अबकी बार लौटा तो/ वृह्तर लौटूंगा। अबकी बार लौटूंगा तो मनुष्यतर लौटूंगा। अबकी बार लौटा तो/ हताहत नहीं/सबके हिताहित को सोचता/ पूर्णतर लौटूंगा। इन पंक्तियों में भारत है। भारत का दर्शन है । अशोक वाजपेयी की तरह पाश्चात्य पांडित्य को भारतीय परिवेश में ढालने की फूहड़ कोशिश नहीं। केदारनाथ सिंह की कविता है घास। इस कविता की आखिरी पंक्ति है कभी भी.../ कहीं से उग आने की/ एक जिद है वह। इस तरह की कई पंक्तियां पाठकों को याद हैं। अशोक वाजपेयी की शायद ही कोई ऐसी कविता हो जो पाठकों को या काव्य रसिकों को याद हो। यह है कंटेंट का इटेंट। इंटेंट अगर फौरी चर्चा है तो वो तो गालियों से मिल सकती है लेकिन कालजयी नहीं हो सकते। 

कुछ लोगों ने विवाहोत्सव में बारातियों के स्वागत में गाई जानेवाली गालियों और  नकटौरा के संवादों में अश्लीलता की बात की। दोनों बातें सही हैं। गालियां दी जाती हैं लेकिन उसका अपना एक सौंदर्यशास्त्र है। विवाहोत्सव के दौरान गाई जानेवाली गालियां शारदा सिन्हा ने खूब गाईं। बिहार में उसको गारी कहते हैं। उसको सुनकर कभी भी उबकाई नहीं आई। विवाहोत्सव और नकटौरा की गालियों में एक रस होता है। वैसा रस जो शब्दों में घुलकर सुननेवाले को आनंद देता है। नकटौरा तो बिल्कुल ही निजी आयोजन होता है। इसके मनोविज्ञान को समझना चाहिए। ये महिलाओं को अपनी बात, अपनी भावनाएं सामने रखने का एक निजी मंच है। इसलिए जंतर मंतर पर दी गई गालियों का गारी और नकटौरा से तुलना हास्यास्पद है। जो अंतर सेंसुअलिटी और सेक्सुअलिटी में है वही जंतर मंतर की गालियों और गारी में है। गालियों को लेकर फेसबुक आदि पर लिखी टिप्पणियों से कई लेखकनुमा जीवों का अज्ञान सामने आ गया।   


Sunday, July 26, 2026

हिंदी का संवादप्रिय आलोचक


हिंदी अकादमिक और साहित्य जगत में नामवर सिंह का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। उनकी जन्म शताब्दी वर्ष में उनके लेखन और भाषणों पर समग्रता में विचार करने की आवश्कता है। नामवर सिंह पर अधिकांश लेख भक्ति भाव से लिखे जाते रहे हैं। बहुत कम लेख ऐसे लिखे गए जो उनकी रचनात्मकता के आधार पर उनका मूल्यांकन करने जैसा हो। या तो प्रशंसात्मक लिखा गया या उनकी व्यक्तिगत आलोचना की गई। नामवर सिंह ने अपने आरंभिक दिनों में विपुल लेखन किया। बाद में उन्होंने वाचन विधा को अपना लिया। मनसा वाचा कर्मणा वो आजीवन कम्युनिस्ट रहे। उनके लेखों में कभी भी कम्युनिस्ट विचारधारा से विचलन देखने को नहीं मिलता है। नामवर सिंह एक सच्चे पार्टी कार्यकर्ता की तरह साहित्य में भी अपनी विचारधारा के कार्यकर्ता थे। लेनिन का एक लेख है ‘पार्टी साहित्य और पार्टी संगठन’। इस लेख में वो पार्टी लेखकों से पक्षधरता का आग्रह करते हैं। नामवर सिंह के लेखन में लेनिन का वो आग्रह साकार दिखाई देता है। आलोचक होने के नाते उनका दायित्व था कि खोज-खोजकर हिंदी साहित्य के कवियों-लेखकों को मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित बताना और स्थापित करना। निराला को लेनिन के प्रभाव में बताने के लिए वो उनकी 1920 की एक कविता बादल राग की पंक्तियां लेकर आए थे। पंक्ति है- तुझे बुलाता कृषक अधीर/ऐ विप्लव के वीर। अब इस पंक्ति में चूंकि कृषक भी है और विप्लव भी तो निराला कम्युनिस्ट हो गए। नामवर सिंह ने तो जयशंकर प्रसाद पर भी लेनिन का प्रभाव देखा और कहा भी। दिनकर की किसी कविता में लेनिन का नाम आया तो उनको कम्युनिस्ट बताने लगे थे। प्रेमचंद को तो कम्युनिस्ट बता ही चुके थे। नामवर सिंह ने जो राह दिखाई थी उनके कम्युनिस्ट चेले उसी पर चलकर इन लेखकों कवियों के बारे में बोलने-लिखने लगे। परिणाम ये हुआ कि इन लेखकों का इकहरा और दोषपूर्ण मूल्यांकन हुआ। 

जब नामवर सिंह लेखन से वाचन की ओर आए तो उन्होंने कम्युनिस्ट विचारधारा पर भी प्रहार किया। विचारधारा को लेकर चलनेवाले इस नामवर आलोचक ने किसी गोष्ठी में कह दिया कि विचारधारा हमें अमानवीकृत करती है। फिर किसी गोष्ठी में कह दिया कि शुक्र है कि हमारे देश में कम्युनिष्टों का शासन नहीं है वर्ना हम सभी यानि उनसे असहमति रखनेवाले जेलों में बंद होते। एक और इसी तरह का बयान था-भारतीय समाज में जो दुर्गति समाजवाद की है साहित्य में वही प्रतिबद्धता की। इन बयानों पर प्रगतिशील जमात के लेखकों ने खूब हो हल्ला मचाया था। एक बार मैंने राजेन्द्र यादव से पूछा था कि नामवर सिंह इस तरह के बयान क्यों देते हैं? उन्होंने छूटते ही कहा कि वो प्रचार-प्रिय आलोचक हैं। उनको पता है कि कैसे चर्चा के केंद्र में रहा जाता है। नामवर सिंह ने भी अशोक वाजपेयी के साथ एक बातचीत में कहा था कि विवादों के माध्यम से सिद्धांत का विकास हो सकता है और इनके माध्यम से ठोस साहित्यिक कृतियों के मूल्यांकन की दिशा में भी हम पाठकों की समझ ज्यादा बढ़ा सकते हैं, विकसित कर सकते हैं। उसी बातचीत में ये भी कहा था कि विवाद आलोचना कर्म और आलोचना धर्म में ही निहित है। नामवर सिंह के शिष्यों ने उनके व्याख्यानों को लिपिबद्ध कर पुस्तकाकार प्रकाशित करवाया है। उन व्याख्यानों से नामवर सिंह की जो तस्वीर बनती है वो लेखक नामवर सिंह से अलग है। ऐसा प्रतीत होता है कि नामवर सिंह लिखे हुए शब्दों और बोले गए शब्दों के महत्व को समझते थे। लिखे हुए को संशोधित करना या बदलना या अपनी स्थापना से पलट जाना कठिन होता है जबकि व्याख्यानों में ये सुविधा होती है। नामवर सिंह का जिस समय हिंदी साहित्य में डंका बज रहा था उस समय संचार के माध्यम बहुत ही कम थे। नामवर सिंह ने इसका लाभ उठाया। 

नामवर सिंह की आलोचना में तमाम विचलन होने के बावजूद इतना तो स्वीकार करना होगा कि उनके अध्ययन का दायरा बहुत विशाल था। उन्होंने हिंदी, संस्कृत, उर्दू और विदेशी साहित्य बहुत पढ़ा था। एक तरफ अपने व्याख्यानों में वो श्रीरामचरितमानस की पंक्ति उद्धृत करते थे तो मीर और गालिब की शायरी का भी धड़ल्ले से प्रयोग करते थे। अपनी स्थापना के समर्थन में विदेशी आलोचकों और लेखकों को उद्धृत करते थे। उनके व्याख्यानों से ये लगता है कि वो हर गोष्ठी में पूरी तैयारी के साथ जाते थे और कुछ न कुछ नया देने की कोशिश करते। जब भी वो विचारधारा और राजनीति से मुक्त होकर अकादमिक स्तर पर बोलते तो उनका व्याख्यान सुनने योग्य होता था। उनकी आलोचना का जो वाचिक स्वरूप था वो विमर्शात्मक होता था लेकिन जब वो लिखते थे तो सृजनात्मक हो जाते थे। नामवर सिंह ने कभी स्वयं इस बात को स्वीकार किया था कि सिद्धांत निर्माण की जगह मूल्ययांकन पर प्रतिक्रिया देकर संवाद बढ़ाया जाना अधिक बेहतर है। नामवर सिंह ने छायावाद पर जो पुस्तक लिखी थी उसने अपने समय में छायावाद पर नए सिरे से साहित्य जगत को सोचने पर मजबूर किया था। कविता के नए प्रतिमान और कहानी नई कहानी उनकी दो पुस्तकों ने हिंदी साहित्य पर विचार करने की एक नई जमीन तैयार की थी। उसी तरह से जैसे डा रामविलास शर्मा ने ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण’ लिखकर हिंदी नवजागरण को समझने की नई दृष्टि दी थी। नामवर सिंह क्रिया केवलम उत्तरम को अपना आदर्श वाक्य मानते थे और जीवन के अंतिम दिनों तक वो इसपर डटे रहे। बाद के दिनों में जब उनपर बहुत व्यक्तिगत हमले होने लगे थे तो एक दिन मैंने उनसे इस बाबत पूछा था। उन्होंने कहा- चढ़िए हाथी ज्ञान को, सहज दुलीचा डाल/स्वान रूप संसार है, भूंकन दे झकमार। 


Saturday, July 25, 2026

सफेद रंग का इंद्रधनुष


राज कपूर के बारे में कई बातें कही जाती हैं। एक तो उनको सफेद साड़ी पहनने वाली स्त्रियां पसंद थीं। या उनको पसंद करनेवाली स्त्रियां सफेद साड़ी पहनती थीं। दूसरी उनकी वो फिल्में जबरदस्त हिट होती थीं जिनकी लीड हीरोइन के साथ उनके अफेयर के चर्चे होते थे। नरगिस से लेकर पद्मिनी और वैजयंतीमाला तक का उदाहरण उनके साथ काम करनेवाले अबतक देते रहते हैं। उनपर लिखी कई पुस्तकों में भी इस तरह की बातों का उल्लेख मिलता है। एक और बात राज कपूर के बारे में कही जाती है, जब से नरगिस और उनका अलगाव हुआ तब से उनकी फिल्मों में सेंसुअलिटी का स्थान सेक्सुअलिटी ने ले लिया। इस बीच एक और घटना घटी जिसने राज कपूर को नायिकाओं को पेश करने का आयडिया दे दिया। एक दिन राज कपूर मुंबई (तब बांबे) में अपने किसी मित्र के यहां रात के खाने पर गए थे। मित्र के घर जब वो खाना खा रहे थे डायनिंग टेबल के ऊपर लगी तस्वीर देखकर वो खाना भूल गए। वो राजजा रवि वर्मा की एक पेंटिंग थी। पेंटिंग में एक स्त्री भीगी हुई साड़ी में थी। गीली और झीनी साड़ी अपने बदन पर लपेटी। उस स्त्री की पेंटिंग में सेंसुअलिटी थी, जिसे राज कपूर ने पर्दे पर सेक्सुअलिटी में बदल दिया। ये वही दौर था जब राज कपूर की जिंदगी से नरगिस जा चुकी थीं। उनकी नई नायिका थीं पद्मिनी। उनको लेकर राज कपूर फिल्म ‘जिस देश में गंगा बहती है’ बना रहे थे। इस फिल्म में पद्मिनी पर फिल्माए गए गीत ‘ओ मैंने प्यार किया ओहो क्या जुर्म किया’ में राज कपूर ने राजा रवि वर्मा की पेंटिंग को दृष्यों में उतारने का प्रयास किया। गाने के दौरान पद्मिनी काली साड़ी पहनकर झरने के नीचे बने जलकुंड में कूदती हैं। तैरती हैं। पानी से बाहर आकर चट्टान पर लेटती हैं। पलटती हैं। इन सारी मादक अदाओं को कैमरा कैद करता रहता है। पद्मिनी ने इस पूरे सीन में काली साड़ी पहनी थी जो उसके शरीर के साथ चिपकी रहती है। झरने में नहाने का छोटा सीन भी है। जिसको राज कपूर दिखाते तो हैं लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि वो अगली फिल्म के लिए कुछ बचा लेना चाहते हैं।

राज कपूर ने फिल्म ‘जिस देश में गंगा बहती है’ में जो बचा लिया था उसको उन्होंने दिखाया अपनी फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ में। इस फिल्म का गाना याद करिए ‘अंग लग जा बालमा’। इस गाने के बोल शुरु होने से पहले लगभग एक मिनट तक नायिका अपने कमरे में बेचैनी में करवटें बदलती हैं। कैमरा विभिन्न मुद्राओं को कैद करता है। डेढ मिनट बाद जब कड़कती हुई बिजली और तूफानी रात में नायिका पद्मिनी पेड़ के तने से लिपट कर गाना आरंभ करती है तो दर्शक नायिका की अदाओं में खो जाते हैं। यहां राज कपूर अपनी नायिका को काली साड़ी से हल्के क्रीम कलर और लाल बार्डर वाली साड़ी तक लेकर आते हैं और उसको भिगाते भी हैं। चौखट पर अपने बदन पर साड़ी लपेटकर खड़ी पद्मिनी राजा रवि वर्मा की पेंटिंग को साकार कर देती हैं। पर इस फिल्म में भी ऐसा लगता है कि राज कपूर ने यहां भी कुछ बचा लिया। इस फिल्म के करीब डेढ़ दशक बाद राज कपूर की एक फिल्म आती है ‘राम तेरी गंगा मैली’। ये फिल्म राज कपूर ने अपने बेटे राजीव कपूर को लेकर बनाई थी। इस फिल्म का गाना याद करिए, तुझे बलाए मेरी बाहें। इसमें लाल वस्त्र में नायिका आती है लेकिन उसके बाद जब वो पर्वत के नीचे और झरने के पीछे अपने होने की बात करती है तो सफेद पारदर्शी साड़ी पहने होती है और यहां आकर राज कपूर लगभग नग्नता तक चले जाते हैं। मंदाकिनी पर फिल्माए इस दृष्य को लेकर उस समय काफी बवाल मचा था। सेंसर से सर्टिफिकेट मिलने के बाद ये फिल्म जबरदस्त हिट रही थी। उस वर्ष की सबसे बड़ी हिट फिल्म। इस फिल्म ने रातों रात मंदाकिनी को स्टार बना दिया। उसके बाद मंदाकिनी ने दर्जनों फिल्में की जिनमें मिथुन चक्रवर्ती और गोविंदा के साथ की गई फिल्में ठीक ठाक चली। मेरठ की रहने वाली यास्मीन जोसेफ को राज कपूर ने देखा। कहा जाता है कि हिंदी फिल्मों की नायिकाएं राज कपूर की नीली आंखों में खो जाती थीं लेकिन राज कपूर यास्मीन जोसेफ की नीली आंखों में खोए नहीं बल्कि डूब गए। सीधे अपनी फिल्म का लीड रोल दे दिया। मंदाकिनी नाम भी दिया। मेरठ की यास्मीन जोसेफ मंदाकिनी बनकर प्रसिद्ध हो गई। मंदाकिनी फिर प्रसिद्धि से गुमनामी में गई और कुछ दिनों बाद पता चला कि उन्होंने एक बौद्ध मतावलंबी से शादी कर ली और अब फिल्मी दुनिया से दूर अपना पारिवारिक जीवन जी रही हैं।    


सरकार के हिसाब से कब बनेगा सिस्टम ?


दिल्ली के जंतर मंतर पर जारी विरोध प्रदर्शन के बीच दो सरकारी कार्यक्रमों की जानकारी मिली। एक कार्यक्रम भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत चलनेवाली संस्था राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) के भोपाल स्थित क्षेत्रीय शिक्षा संस्थान और शालभंजिका का आयोजन है। भारत सरकार की संस्था एनसीईआरटी ने कवि विनय कुमार की कृति श्रेयसी पर चर्चा आयोजित की है। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता कवि राजेश जोशी कर रहे हैं। चर्चा में कुमार अंबुज, निरंजन श्रोत्रिय, आशुतोष दुबे और अंबर पांडे भाग ले रहे हैं। कार्यक्रम का पोस्टर देखकर तो सामान्य लग सकता है पर अगर अध्यक्षता कर रहे महानुभाव और कुछ वक्ताओं की प्रतिबद्धता को देखेंगे तो ऐसा लगता है कि भारत सरकार अपने विरोधियों को लेकर कितनी उदार है। घोर वामपंथी कवि राजेश जोशी हमेशा से मोदी सरकार के विरोधी रहे हैं और कई सार्वजनिक मंचों पर भी सरकार को विरोध करते रहते हैं। इस कार्यक्रम के पोस्टर देखने के बाद सोचा कि जोशी जी की फेसबुक वाल पर टहल आया जाए। वहां जाकर देखा तो पता चला कि वो भी शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफा के आकांक्षी हैं। बावजूद इसके भारत सरकार की शिक्षा मंत्रालय उनका आतिथ्य कर रही है। उनकी अध्यक्षता में कार्यक्रम आयोजित कर रही है। शिक्षा मंत्रालय तो चलिए अपनी उदारता का परिचय दे रही है लेकिन क्या राजेश जोशी को ये नहीं पता कि उन्होंने जिस कार्यक्रम में जाने की सहमति दी है उसी महकमे के मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान थे। दरअसल ये वामपंथियों का चरित्र है। जहां लाभ दिखता है वहां जाने में उनको कोई परहेज नहीं होता है। वहां जाने के लिए कोई खूबसूरत बहाना ढूंढ लेते हैं। उदाहरण के लिए इस केस में कह सकते हैं कि एनसीईआरटी तो करदाताओं के पैसे से चलता है इसलिए उनके कार्यक्रमों में जाने में क्या परेशानी है। इसका सर्वोत्तम उदाहरण साहित्यिक पत्रिकाओं मं देखा जा सकता है जहां संपादकीय में प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री योगी की आलोचना होती है और उसके ठीक पहले इनर कवर पर योगी सरकार का विज्ञापन। राजेश जोशी के अलावा जो वक्ता हैं उनमें से अधिकतर शिक्षा मंत्री को हटाने के पक्षधर थे। 

दूसरा कार्यक्रम शिवपूजन सहाय की कृति देहाती दुनिया के सौ साल पूरा होने पर पटना में बिहार संग्रहालय का एक आयोजन है। देहाती दुनिया ठेठ देहात का औपन्यासिक चित्र की परिभाषा के साथ बाजार में आया था। देहाती दुनिया का पहला संस्करण जब प्रकाशित हुआ था तब उसके आरंभ में श्री गणेशाय नम: प्रकाशित था। पहले खंड में एक ही पृष्ठ पर श्री गणेशाय नम: उसके बाद बड़े अक्षरों में देहाती दुनिया फिर अंक एक और उसके नीचे माता का अंचल उल्लिखित था। ऐसे शिवपूजन सहाय की कृति के सौ वर्ष पूरे होने पर बिहार के कला और संस्कृति विभाग के अंतर्गत चलनेवाली संस्था बिहार संग्रहालय ने जो आयोजन किया है उसमें वक्ताओं में वामपंथ से जुड़े लेखकों की प्रधानता है। प्रगतिशील लेखक संघ के बिहार के अध्यक्ष, महासचिव और एक अन्य पदाधिकारी पहले सत्र में वक्ता के तौर पर आमंत्रित हैं। दूसरे सत्र में भी सरकार के विरोधियों को स्थान दिया गया है। ऐसे लोगों को आमंत्रित किया गया है जो सरकार के विरोध में खड़े होकर पटना के गांधी मैदान में नारे लगाते रहे हैं। अब भी लगाते रहते हैं। पर बिहार सरकार के कला और संस्कृति विभाग की उदारता के क्या ही कहने। दरअसल पिछले कुछ समय से ये देखा जा रहा है कि बिहार संग्रहालय वामपंथियों को अच्छी खासी जगह दे रहा है। कुछ वामपंथी लेखक तो वहां के कार्यक्रमों में स्थायी हैं। बिडंबना है कि शिवपूजन बाबू के साहित्य पर उस विचार के लोग बोलेंगे जिन्होंने प्रयासपूर्वक शिवपूजन सहाय का मूल्यांकन नहीं होने दिया। उनकी समग्र रचना उनके पुत्र मंगलमूर्ति जी के सौजन्य और श्रम से प्रकाशित हो पाई। शिवपूजन सहाय परम रामभक्त थे। वो अपनी डायरी में सैकड़ों जगह राम, रामकृपा और भगवान की इच्छा जैसी बातें लिखते हैं लेकिन उनके इस लेखन के बारे में बहुत ही कम चर्चा की गई। देश के विभाजन से लेकर चीन युद्ध तक शिवपूजन सहाय ने बेहद कठोर टिप्पणियां कीं। उन्होंने नेहरू से लेकर उनके मंत्री कृष्ण मेनन तक की आलोचना की। लेकिन नेहरू की विराट छवि बनाने में लगे कांग्रेस-वामपंथी इकोसिस्टम ने इन टिप्पणियों को दबा दिया। वही अब उनकी प्रमुख कृति पर बात करेंगे। 

संभव है कि बहुत लोगों को ये लगे कि इन दो सरकारी कार्यक्रम में वामपंथियों को बुलाने से क्या ही हो जाएगा। लेकिन ये दो कार्यक्रम तो सिर्फ उदाहरण के तौर पर दिए गए हैं। ऐसे सैकड़ों कार्यक्रम होते रहते हैं जहां वामपंथी किसी न किसी से जुगाड़ भिड़ाकर घुस जाते हैं। सरकारी समितियों से लेकर पुरस्कार आदि में भी वो अपनी गोटी सेट कर लेते हैं। हाल ही में एक महत्वपूर्ण पुरस्कार की घोषणा हुई। उसमें जिन सज्जन को पुरस्कृत किया है वो रोजाना प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आलोचना करते रहते हैं। सार्वजनिक तौर पर करते रहते हैं। फिर भी उनको पुरस्कृत करने का ऐलान किया गया। ऐसा नहीं है कि पुरस्कृत करनेवालों को उनके बारे में पता नहीं था, पता था। फिर भी हुआ। इस तरह की घटनाएं नियमित अंतराल पर निरंतर हो रही हैं पर इसकी सुध लेनेवाला कोई नहीं है। साहित्य, कला और संस्कृति के क्षेत्र में वैचारिक लड़ाई होती है। वर्षों तक वामपंथी-कांग्रेसी इकोसिस्टम ने दक्षिणपंथ से जुड़े लेखकों और साहित्यकारों को मंच तक नहीं दिया। फिर योजनाबद्ध तरीके से ये बात फैलाई गई कि दक्षिणपंथ में प्रतिभा की कमी है। वर्षों तक इस झूठ के सहारे अपने विचार को श्रेष्ठ दिखाने का जतन करते रहे। कुबेरनाथ राय जैसे अप्रतिम प्रतिभा के लेखक को अकादमिक जगत से षडयंत्रपूर्वक बाहर रखा गया। सिर्फ कुबेरनाथ राय ही क्यों हाल के दिनों की बात करें तो नरेन्द्र कोहली जी का भी सम्मान नहीं कर सके। यह वामपंथी विचारधारा की योजना थी। अब भी वामपंथी लेखक जिन कार्यक्रमों में जाते हैं और वहां इसी तरह की बातें करते हैं जिससे भारत और भारतीयता की बात करनेवाले लेखकों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से नीचा दिखाया जा सके। कई गोष्ठियों में इस तरह के विमर्श का प्रत्यक्षदर्शी रहा हूं इस कारण यह बात रख रहा हूं। केंद्र में नरेन्द्र मोदी सरकार के 12 वर्ष पूरे हो गए हैं लेकिन शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र से वामपंथियों का प्रभाव कम नहीं हो पाया है। यह कार्य प्रधानमंत्री के स्तर से नहीं होना है। इस कार्य को करने के लिए शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में काम कर रहे नेतृत्व को निर्णय लेना होगा। विश्वविद्यालयों में कुलपति के स्तर पर और सांस्कृतिक संस्थाओं में निदेशक/अध्यक्ष के स्तर पर ये कार्य होना चाहिए। फिल्मों से जुड़ी संस्थाओं को भी ध्यानपूर्वक कार्य करना होगा। फिल्मों के क्षेत्र में जिस तरह से वाम विचार के लोग विचार की रामनामी ओढ़कर सक्रिय हैं उनकी पहचान करके उनकी षडयंत्रकारी योजनाओं को नाकाम करना होगा। ये कहकर भी नहीं बचा जा सकता है कि सरकार भले ही हमारी है लेकिन सिस्टम तो उनका ही है। सिस्टम तो सरकार के हिसाब से बनती है। बनाने का प्रयास करना चाहिए। 

Saturday, July 18, 2026

संवाद नहीं कठोर निर्णय का समय


कुछ दिनों पूर्व ये समाचार प्रकाशित हुआ कि ओवर द टाप (ओटीटी) प्लेटफार्मों पर फिल्म के प्रदर्शन से पहले प्रमाणन के लिए नियमों में संशोधन पर विचार किया जा रहा है। बताया गया कि संभवत: सरकार ओटीटी  पर दिखाई जानेवाली फिल्मों के लिए पूर्व प्रमाणन की व्यवस्था करने पर मंथन कर रही है। उसी समाचार में ये भी कहा गया कि सरकार इसके लिए आईटी नियम 2021 में भी संशोधन कर सकती है। इस तरह की खबरें नियमित अंतराल पर प्रकाशित होती रही हैं। जब भी किसी फिल्म या वेबसीरीज को लेकर प्रश्न खड़े होते हैं तो इस तरह की बात सामने आती ही है। पिछले सात-आठ वर्षों में ओटीटी प्लेटफार्म पर दिखाई जानेवाली सामग्री पर जब-जब बवाल होता है तब इस तरह की खबरें आती हैं कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय बहुत सख्ती से कंटेंट के आकलन पर विचार कर रहा है। पूर्व में भी सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने इन ओटीटी प्लेटफार्म्स के प्रतिनिधियों से कई दौर की बातचीत की थी। मनोरंजन जगत के प्रतिनिधियों को इस तरह की बैठकों में सरकार की तरफ से सख्त संदेश दिया गया था। पहले स्वनियमन की बात हुई। फिर त्रिस्तरीय व्यवस्था बनी। लेकिन ओटीटी पर चलनेवाली सामग्री में कोई विशेष बदलाव देखने को नहीं मिला। कंटेंट और संवाद में अराजकता जारी है। गाहे बगाहे कुछ सीरीज और कुछ फिल्में इस तरह की आ जाती हैं जो बगैर किसी विवाद के निकल जाती हैं। लेकिन कुछ ऐसे निर्माता हैं जो अपनी फिल्मों में और वेबसीरीज में यौनिकता, नग्नता, जुगुप्साजनक दृष्य, हिंसा या गाली गलौच भरे संवाद से बाज नहीं आते हैं। वेबसीरीज निर्माताओं को लगता है कि नग्नता और हिंसा के साथ गाली गलौच की छौंक सीरीज की सफलता की गारंटी है। मनोरंजन की दुनिया में भेड़चाल है। एक सफल फार्मूला मिला नहीं कि सब उसी तरफ दौड़ पड़ते हैं और दौड़ते ही रहते हैं। 

ताजा विवाद फिल्म सतलुज को लेकर उठा है। इस फिल्म को केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड से पिछले चार वर्षों से सर्टिफिकेट नहीं मिला था। निर्माता और बोर्ड के बीच कुछ बिंदुओं पर सहमति नहीं बन पा रही थी। इस बीच जी 5 ने सतलुज को दिखाना आरंभ कर दिया। जबतक सरकार जागी तबतक दो दिन बीच चुके थे। जिनको देखना था वो देख चुके थे। बताया जा रहा है कि भारत में वैधानिक रूप से भले ही इस फिल्म को दिखाने पर प्रतिबंध है लेकिन पंजाब के कई शहरों में इस फिल्म का सार्वजनिक प्रसारण हो चुका है या हो रहा है। यह तो और भी गंभीर बात है। बगैर केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के प्रमाणपत्र के किसी भी फिल्म का सार्वजनिक प्रदर्शन सिनेमैटोग्राफी एक्ट 1952 का उल्लंघन है। इस एक्ट के मुताबिक हर फिल्म को, अगर वो सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए है, तो पहले फिल्म प्रमाणन बोर्ड से प्रमाणपत्र लेना होगा। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ये देखता है कि फिल्म सार्वजनिक प्रदर्शन के योग्य है या नहीं। उस फिल्म से देश की अखंडता  और संप्रभुता पर तो कोई कतरा नहीं पैदा हो सकता है। इसके अलावा भी अन्य कई बिंदु हैं जिसकी पड़ताल करके प्रमाणन बोर्ड फिल्म के सार्वजनिक प्रदर्शन की श्रेणी तय करते है। फिर प्रमाणपत्र के रूप में फिल्म के प्रदर्सन की अनुमति दी जाती है। फिल्म सतलुज का बगैर सेंसर सर्टिफिकेट के सार्वजनिक प्रदर्शन कानून सम्मत नहीं है। पंजाब पुलिस को या प्रशासन को इसके प्रदर्शन को रोकना चाहिए था। इससे भी बड़ा सवाल ये है कि जी 5 ने अपने प्लेटफार्म पर इस फिल्म के प्रदर्शन के लिए कैसे और क्यों अनुमति दी। क्या उनको ये पता नहीं था कि फिल्म सतलुज को लेकर निर्माता और सेंसर बोर्ड के बीच विवाद चल रहा है। अगर पता नहीं था तो आश्चर्य की बात है और अगर पता होते हुए ऐसा किया गया तो सूचना और प्रसारण मंत्रालय को इसपर ध्यान देना चाहिए।  

ऐसा नहीं है कि इस तरह का विवाद पहली बार सामने या है। ओटीटी प्लेटफार्म पर चलनेवाली सामग्री को लेकर विवाद होते रहे हैं। भारतीय वायुसेना और कश्मीर के हालात पर पहले भी ओटीटी प्लेटफार्म पर आपत्तिजनक संवाद और दृष्य दिखाए गए थे। विरोध के बाद उसको हटाया गया था। परंतु वो फिल्में नहीं थी। उनका सार्वजनिक प्रदर्सन नहीं हुआ था। सतलुज के इंटरनेट मीडिया और मैसेजिंग एप्स पर उपलब्ध होने की बात कही जाती है उससे तो सरकार का प्रतिबंध बेमानी हो गया। देश ये भी जानना चाहता है कि सरकार ने जी 5 पर इस फिल्म के प्रदर्शन पर तो रोक लगा दी लेकिन उसके बाद क्या किया। सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने उसके बाद क्या कदम उठाए। कानून तोड़नेवालों की पहचान करने और उनको दंडित करने के लिए क्या पंजाब सरकार ने कोई कदम उठाया। ये बहुत ही चिंता की बात है कि संवैधानिक संस्थाओं के क्षरण की बात करनेवालों को भी ये प्रकरण नहीं दिखा या देखकर भी अनजान बने रहे। अब समय आ गया है कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय बहुत गंभीरता के साथ ओटीटी प्लेटफार्म पर चलनेवाली सामग्री को लेकर ठोस निर्णय ले। कड़े कदम उठाए जाएंगे, किसी को बख्शा नहीं जाएगा आदि के आगे जाकर निर्णय लेने का वक्त है। सरकार ने मनोरंजन जगत को बहुत समय दे दिया। स्वनियमन को लेकर व्यवस्था बनाई वो चली नहीं, त्रिस्तरीय व्यवस्था भी ठीक साबित नहीं हुई। लिहाजा सरकार को अब प्रसारित होनेवाली सामग्री के पूर्व प्रमाणन की व्यवस्था करनी चाहिए। 

ओटीटी प्लेटफार्म पर जारी होनेवाले सामग्री के प्रमाणन की व्यवस्था करना बहुत आसान नहीं होगा। इसके लिए मानव संसाधन के अलावा संस्थागत ढांचा भी तैयार करना होगा। सूचना और प्रसारण मंत्रालय को इस प्रकरण को या इस प्रकल्प को अपनी प्राथमिकता में लेना होगा। जिस तरह से केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड बरसों से बगैर सदस्यों के चल रहा है उसपर भी ध्यान देकर सदस्यों की नियुक्ति करनी होगी। बगैर सदस्यों के काम तो चल सकता है लेकिन उससे कई प्रकार की दिक्कतें पैदा होती हैं। अस्थायी विशेषज्ञों के भरोसे काम चलाया जाता है पर इसमें जिम्मेदारी तय नहीं हो पाती है। सदस्यों के नहीं होने से बोर्ड के दफ्तरों में काम करने वाले बाबुओं का दखल बढ़ता है। वहीं से भ्रष्ट व्यवस्था के जन्म लेने की जमीन तैयार होती है। पूर्व में इ तरह के मामले आए हैं। प्रमाणन बोर्ड के क्षेत्रीय कार्यालयों को भी संसाधन देना होगा। क्षेत्रीय स्तर पर फिल्म प्रीव्यू करनेवाले सदस्यों की संख्या बढ़ानी होगी। ओटीटी की सामग्री को फिल्म प्रमाणन बोर्ड के दायरे में लाने से काम बढ़ेगा। अब यह करना इस कारण आवश्यक हो गया है कि ओटीटी पर चलनेवाली बेवसीरीज और फिल्मों का उपयोग मनोरंजन की आड़ में राजनीति करने में होने लगा है। राजनीतिक मैसेजिंग या किसी व्यक्ति या विचारधारा को बदनाम करने का औजार बनने लगा है। कोई भी प्लेटफार्म जब अपनी मूल प्रकृत्ति को छोड़ने लगे तो सरकार को हस्तक्षेप करके उसको संविधानसम्मत तरीके से रेगुलेट करना पड़ता है। कानून को लागू करना होता है। ओटीटी प्लेटफार्म को लेकर अब यही स्थिति बन रही है। संवाद का समय समाप्त हो गया है और समय है उचित और कठोर निर्णय का।  


Saturday, July 11, 2026

मंदिर चोरी पर ताजा सनातनी चुप


अयोध्या स्थित प्रभु श्रीरामजन्मभूमि मंदिर में चढ़ावा चोरी की जांच से अधिक तेजी से इस प्रकरण पर राजनीति हो रही। श्रीराम मंदिर में चढ़ावा चोरी की घटना निंदनीय है। दोषियों को कठोरतम सजा होनी चाहिए। इस चोरी की सजा जितनी जल्दी हो उतना ही अच्छा। सरकार को चाहिए कि वो विशेष जांच दल (एसआईटी) को एक निश्चित समयावधि में जांच पूरी करने का आदेश निर्गत करे। उसकी रिपोर्ट के आधार पर पुलिस अपनी जांच कर कोर्ट में रिपोर्ट सौंपे। उसकी सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन करके दोषियों को सजा दी जाए। इस मामले में न्याय होना जितना आवश्यक है उतना ही आवश्यक है न्याय होते दिखना। चढ़ावा चोरी प्रकरण पर कई राजनीतिक दल के नेता स्वयं को सनातनी साबित करने पर तुले हुए हैं। कोई किसी को रामघाती बता रहा है तो कोई सुंदरकांड का पाठ करवा रहा है। किसी को प्रभु श्रीराम की आस्था पर हुई चोट की चिंता हो रही है तो कोई भक्तों की आहत भावना की चिंता कर रहा । राजनीति के रंगमंच पर हर दिन श्रीराम भक्ति के नए आयाम प्रस्तुत किए जा रहे हैं। जो दल प्रभु श्रीराम को किस्से कहानियों का चरित्र मानते थे, श्रीरामजन्भूमि पर अस्पताल और स्कूल खोलने की वकालत किया करते थे आज उनकी भी आस्था प्रभु श्रीराम में द्विगुणित हो गई है। जिस प्रकार की राजनीति चढ़ावा चोरी को लेकर हो रही है उसमें सभी राजनीतिक दल स्वयं को सच्चा सनातनी कहते हुए नहीं थक रहे हैं। यह भारतीय राजनीति का एक नया अध्याय है।  

इस पूरे प्रकरण पर जिस प्रकार की राजनीति हो रही है उससे सबसे बड़ा प्रश्न ये खड़ा हो रहा है कि चढ़ावा चोरी बड़ी चोरी है या मंदिर चोरी बड़ी है। भारत का इतिहास इस बात का साक्षी है कि किस तरह से लुटेरों ने हमारे आस्था के केंद्र मंदिरों को लूटा। सिर्फ लूटकर ही नहीं छोड़ा बल्कि लूटने के बाद मंदिरों को ध्वस्त भी किया। ध्वस्त करने के बाद उस स्थान पर मस्जिदें और ईदगाह बनाई गईं। चढ़ावा चोरी के बाद जो राजनीतिक दल इस मसले पर राजनीतिक फसल काटना चाहते हैं उनमें से अधिकतर ने मंदिर चोरों की पैरोकारी की है। कभी चुप रहकर तो कभी मुखर होकर। सबसे पहले बात करते हैं गुजरात के सोमनाथ मंदिर की। ईसवी 1026 से लेकर 1706 तक कई लुटेरों ने सोमनाथ मंदिर को लूटा। गजनी, खिलजी, मुजफ्फर शाह, औरंगजेब ने सोमनाथ मंदिर को लूटा भी और मंदिर को तोड़ा भी। स्वाधीन भारत में जब सोमनाथ मंदिर के लुटोरों और ध्वंस के दाग को मिटाने का प्रयास हुआ तो कांग्रेस के उस समय के नेता जवाहरलाल नेहरू ने उसका परोक्ष विरोध किया था। जब भी इस प्रकरण की बात उठती है तो पंडित नेहरू और राजेन्द्र प्रसाद के बीच के पत्र व्यवहार की याद आती है। 10 मार्च 1951 को राजन्द्र बाबू ने नेहरू को लिखा, मैं देखता हूं कि सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन समारोह के साथ संबद्ध होने का मेरा विचार आपको पसंद नहीं, क्योंकि इसमें अनेक बातें अंतर्निहित हैं। आपको लगता है कि इस समारोह में मेरे जुड़ने से हो सकता है कि कुछ लोगों को यह विचार पसंद नहीं आए कि जिस मंदिर को उस समय के मुसलमान आक्रमणकारियों ने अनेक बार तोड़ा, उसका पुनर्निमाण या पुनरुद्धार किया जाए। मैं समझता हूं, आप मानेंगे कि यह रुख अपनाना उचित नहीं है, खासकर जबकि सरकार इसपर कुछ खर्च नहीं कर रही है।... अत: मैं समझता हूं कि इस निमंत्रेण को अस्वीकार करने का कोई अर्थ नहीं है। ( डा राजेन्द्र प्रसाद कारस्पोंडेंस...खंड 14, पृष्ठ 37) एक बार फिर से विचार करना चाहिए कि स्वाधीन भारत में चढ़ावा चोरी बड़ा अपराध है मंदिर चोरी। 

श्रीरामजन्मभूमि के मामले में तो पूरे देश ने देखा कि किस तरह से जब जन्मभूमि को मुक्त करवाने का आंदोलन चल रहा था तो कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दलों का क्या रुख था। अदालतों में प्रभु श्रीराम के बारे में किस तरह की बातें कही गईं, पूरे देश को अब भी याद है। जब श्रीरामजन्मभूमि स्थित विवादित ढांचा गिरा था उसके बाद जिस तरह की राजनीति हुई वो भी स्मृतियों में है। संसद में श्रीरामजन्मभूमि में विराजमान रामलला को अनआथराइज्ड तक कहा गया। समाजवादी पार्टी नेता रामगोपाल वर्मा ने तो यहां तक कह दिया था कि जो गुंबद पर चढ़ गए थे वो नीचे उतर नहीं सके। उनको इस बात की चिंता भी नहीं थी कि हिंदू उनकी पार्टी को वोट देंगे या नहीं। उसी समाजवादी पार्टी के नेता अब सनातनी और रामभक्त होने का दावा करते घूम रहे हैं। श्रीरामजन्मभूमि स्थित मंदिर की भी तो चोरी ही हुई थी। उसके बाद वहां मस्जिद बना दी गई थी। चढ़ावा चोरी पर हमलावर राजनीतिक दल के नेता मंदिर चोरी पर एक शब्द नहीं बोल पाते थे। डा राजेन्द्र प्रसाद ने नेहरू को जो लिखा उसका एक वाक्य देखा जाना चाहिए- कुछ लोगों को यह विचार पसंद नहीं आए कि जिस मंदिर को उस समय के मुसलमान आक्रमणकारियों ने अनेक बार तोड़ा, उसका पुनर्निमाण या पुनरुद्धार किया जाए। मुसलमान आक्रमणकारियों या मंदिर चोरों के प्रति नरम रुख दिखा कर वर्षों तक मुस्लिम वोट की राजनीति होती रही। काशी विश्वनाथ मंदिर को लेकर भी यही रुख देखने को मिलता रहा है। वहां भी यही सारे दल मंदिर चोरों के पक्ष में दिखते हैं। 

मथुरा स्थित श्रीकृष्ण जन्मस्थान को लेकर भी ताजा-ताजा रामभक्त हुए दलों का रुख देखना चाहिए। इस बात का उल्लेख इतिहास की तमाम पुस्तकों और या6 वृत्तांतों में मिलेता है कि 1670 में औरंगजेब ने मथुरा के केशवदेव मंदिर का ध्वंस कर वहां शाही ईदगाह बनावाया था। क्या ये हिंदू मंदिर की चोरी नहीं थी। पूरे मंदिर की चोरी करके वहां ईदगाह बनवा दिया गया। औरंगजेब की मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने उस स्थान की नीलामी कर दी। नीलामी में बनारस के राजा पटनीमल ने ये जमीन खरीदी थी। कालांतर में उद्योगपति जुगल किशोर बिड़ला ने पटनीमल के वारिसों से ये जमीन खरीद ली। उनके साथ उस समय जयदयाल डालमिया और हनुमान प्रसाद पोद्दार भी थे। बाद में उस स्थान पर रामकृष्ण डालमिया ने केशवदेव का मंदिर बनवाया। मंदिर बनने से लेकर 1968 तक कांग्रेस पार्टी का क्या रुख रहा ये बताने की आवश्यकता नहीं है। आज भी अगर श्रीकृष्णजन्मभूमि स्थित कारावास में जाने पर स्पष्ट लगता है कि मंदिर चोरों ने हिंदुओं के इस पवित्र स्थल पर डाका डाला था। क्या स्वाधीनता के बाद इन मंदिर चोरों के कृत्यों पर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए थी ? नहीं हुई। क्योंकि इससे मुस्लिम वोट बैंक छिटकने का खतरा था। आज जो भी राजनीतिक दल सनातनी होने का दावा कर रहे हैं उनको मंदिर चोरों पर भी अपना रुख स्पष्ट करना चाहिए। उचित तो ये होगा कि सनातनी होने का दावा करनेवाली पार्टियां श्रीकृष्णजन्मभूमि के मामले में भी सनातनी रुख अपनाए और उसको मुक्त करने के अभियान में साथ आए। बयानों में सनातनी दिखने से बेहतर होगा अपने कर्मों में सनातनी दिखें। क्योंकि कर्म की प्रधानता का अपना महत्व है।