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Saturday, June 13, 2026

तुष्टीकरण पर वैश्विक चिंता


भारतीय राजनीति में इन दिनों घुसपैठियों की जमकर चर्चा होती है। चुनाव आयोग के मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण अभियान के आरंभ के बाद से ही घुसपैठियों को लेकर राजनीतिक बयानबाजी होने लगी है। पश्चिम बंगाल के चुनाव के समय भी घुसपैठिए चर्चा के केंद्र में रहे। बंगलादेश से लगी भारत की सीमा पर चुनाव आयोग के विशेष पुनरीक्षण अभियान के समय और चुनाव परिणाम के बाद घुसपैठियों के देश लौटने की तस्वीरें भी पूरे देश ने देखीं। घुसपैठियों की ये समस्या सिर्फ भारत की समस्या नहीं है। इस समस्या से यूरोप के कई देश और अमेरिका भी जूझ रहा है। इस माह के आरंभ में ब्रिटेन में भारतीय मूल के एक युवक को एक ब्रिटिश युवक की हत्या के आरोप में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। सजा के कुछ दिनों पूर्व हत्याकांड के वीडियो के सामने आने के बाद पूरे ब्रिटेन में प्रवासियों के खिलाफ गुस्सा फूट पड़ा। दरअसल हुआ कि जब ब्रिटेन के युवक पर हमला हुआ और पुलिस घटनासथल पर पहुंची तो पुलिस ने 18 वर्ष के घायल युवक हेनरी को अस्पताल पहुंचाने के बजाए उसको ही हथकड़ी पहना दी। उसकी कराह और स्थिति से भी पुलिस का दिल नहीं पसीजा। उसकी मौत हो गई। ब्रिटेन में इस कांड के वीडियो सामने आने के बाद प्रवासियों और घुसपैठियों के विरुद्ध एक बड़ा आंदोलन खड़ा हो गया है। इनके अधिकारों को लेकर बहस भी चल पड़ी है। बहस तो तुष्टीकरण को लेकर भी हो रही है, रिलीजन को लेकर भी हो रही है। पूरे ब्रिटेन में मृत युवक हेनरी की स्मृति और समर्थन में युवक और युवतियां घुटनों पर बैठकर अपने वीडियो जारी कर रहे हैं। अपनी मौत के पहले हेनरी भी इसी तरह पुलिस वालों से गुहार लगा रहा था।

हाल ही में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री का एक वीडियो इंटरनेट मीडिया पर प्रचलित हो रहा है। इस वीडियो में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर से पूछा जाता है कि क्या अब भी ब्रिटेन एक क्रिश्चियन देश है?  उनका सीधा उत्तर नहीं आता। वो कहते हैं कि अगर क्रिश्चियन देश की बात है तो मैं स्वयं एक क्रिश्चियन हूं और चर्च में मेरा विश्वास है। हमारे अनौपचारिक संविधान में भी क्रिश्चियनिटी की बात प्रमुखता से है। वे इतने पर ही नहीं रुकते हैं और आगे कहते हैं कि हम अनेक मतों को सेलिब्रेट करते हैं और मैं इसके लिए गर्व का अनुभव करता हूं। इस बयान के बाद ब्रिटेन में रिलीजन को लेकर भी एक नई बहस छिड़ गई है। बहस ये कि क्या क्रिश्चियनिटी को ब्रिटेन में कम महत्व मिल रहा है। ब्रिटेन के मूल निवासियों के एक वर्ग में अपने प्रधानमंत्री के इस बयान को लेकर नाराजगी है। उनका तर्क है कि अन्य मतावलंबियों को सम्मान मिले लेकिन देश को अपने मूल रीलिजन को प्रमुखता और प्राथमिकता होनी चाहिए। इस बहस ने ब्रिटेन की सीमा को पार कर लिया है। फ्रांस और जर्मनी के अलावा अमेरिका भी इस बहस में शामिल हो गया है। रिलीजन के अलावा चर्चा राज्य के दायित्व पर हो रही है। पूछा जा रहा है कि राज्य पीड़ित के पक्ष में दया और न्याय का भाव रखे या नहीं। ब्रिटेन में हेनरी पर हमले के बाद देखा गया कि पीड़ित के साथ पुलिस ने दया नहीं दिखाई। अपने स्तर का न्यायपूर्म व्यवहार भी नहीं कर पाई। वार से घायल हेनरी जमीन पर तड़पता रहा और पुलिस उसको घुटने के बल पर बैठा कर हथकड़ी लगाती रही। ब्रिटेन की बहस अब राष्ट्रीय अस्मिता और पहचान तक पहुंच गई है। ब्रिटेन किसका ? ब्रिटेन का कानून किसके लिए? मूल निवासियों के लिए या प्रवासियों और घुसपैठियों के लिए। बहस ने ब्रिटेन की राजनीति को भी प्रभावित करना आरंभ कर दिया है।

ब्रिटिश युवक की हत्या और उसके बाद घुसपैठियों और प्रवासियों को लेकर चलनेवाली बहस सीमाओं से आगे निकल गई है। अमेरिका के उपराष्ट्रपति जे डी वांस ने एक्स पर हेनरी का वीडियो साझा करते हुए लिखा कि हेनरी नोवाक उसी तरह से मरा है जिस तरह से एक सभ्यता की मौत होती है। प्रशासन ने ना तो उस पर विश्वास किया। ना ही उसका ध्यान रखा। हथकड़ी लगाकर मरने के लिए छोड़ दिया। उसपर हेट क्राइम का आरोप भी लगाया जो उसने किया ही नहीं था। जे डी वांस ने अपने लंबे पोस्ट में लिखा कि हेनरी इस तरह के अपराध में जान गंवाने वाला पहला युवक नहीं है और ना ही आखिरी होगा। इस तरह की घटना के प्रतिवाद का एकमात्र रास्ता है न्यापूर्ण तरीके से क्रोध का प्रदर्शन। अंत में वांस ने लिखा कि हम अपनी सभ्यता और अपने देश को प्यार करते हैं। अपने बच्चों से प्यार करते हैं और किसी की भी जान हेनरी नोवाक की तरह न जाए इसका ध्यान रखना होगा। उपराष्ट्रपति जे डी वांस के अलावा उद्गोयपति एलान मस्क ने भी इस घटना पर अपनी प्रतिक्रिया देकर उसको अंतराष्ट्रीय मसला बना दिया। वो तो सिविल वार होने तक की टिप्पणी कर गए। यूरोप में जनता का न्यायपूर्ण क्रोध बढ़ता जा रहा है और इसने ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस के अलावा नीददरलैंड और स्वीडन को भी अपनी चपेट में ले लिया है। कहा जा रहा है कि इन देशों की सरकारों की उदारवादी नीतियों ने मूल निवासियों के अधिकारों को खतरे में डाल दिया है।

जब भारत में घुसपैठियों और तुष्टीकरण की बात होती है तो यहां का कथित लिबरल तबका इसका विरोध करता है। उदारता और समानता के सिद्दांतों की बातें होने लगती हैं। हमारा देश भी घुसपौठियों के कारण अनेक समस्याओं से जूझता रहा है। बंगाल का ही उदाहरण लें तो वहां पूर्व में जिस तरह से घुसपौठियों को आधार कार्ड और राशन कार्ड देकर वैधता प्रदान की गई उसके पीछे वोट और सत्ता पाने की मंशा थी। हमारे देश ने भी तुष्टिकरण का लंबा दंश झेला है। तुष्टीकरण के कारण ही अपराधियों और गैंगस्टरों का बड़ा वर्ग तैयार हुआ था। बंगाल के अलावा उत्तर प्रदेश का ही उदाहरण लें। वहां तुष्टीकरण के कारण ही अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी जैसी खूंखार अपराधी ना केवल जन्मे बल्कि उन्होंने अपना साम्राज्य खडा कर लिया। ये तुष्टीकरण का ही परिणाम था कि उत्तर प्रदेश के अपराधी को लंबे समय तक पंजाब की जेल में रखा गया। कानूनी प्रक्रिया के बाद उसको उत्तर प्रदेश की जेल में लाया जा सका। ये उस तुष्टीकरण का ही परिणाम था कि मुंबई बम धमाकों के अपराधी याकूब मेनन के लिए सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की बेंच आधी रात के बाद सुनवाई के लिए बैठी थी। आज हमाररे देश के सामने सबसे बड़ा प्रश्न ये है कि क्या हम भी यूरोप और अमेरिका की तरह भारत के मूल निवासियों के अधिकारों की रक्षा की राजनीति करें या इसको छोड़कर घुसपैठियों को वैधता प्रदान कर सत्ता के लिए राजनीति चमकाएं। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में ये मुद्दा केंद्रीय हो सकता है। अभी से इसके आसार दिखने लगे हैं। राजनीतिक दल मुद्दा बनाएं या नहीं लेकिन समाज को भी इस बारे में सोचना होगा। न्यापूर्ण क्रोध का प्रदर्शन करना होगा।   

Friday, June 5, 2026

जाग्रत समाज बनाएगी विकसित पुस्तक संस्कृति


कुछ वर्ष पहले की बात है। संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत स्वायत्तशासी संस्था राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन की वेबसाइट पर क्रय की जानेवाली पुस्तकों की सूची प्रकाशित हुई थी। उसमें एक पुस्तक थी जिसका नाम था मदर आफ डेमोक्रेसी इंडिया। संस्था की वेबसाइट पर क्रय की जानेवली पुस्तकों की सूची में इस पुस्तक का मूल्य पांच हजार रुपए बताया गया था। पुस्तक प्रकाशक या विक्रेता की तरफ से छूट भी प्रस्तावित थी। उसके बाद पुस्तक का मूल्य तीन हजार (स्मरण के आधार पर) के करीब था। राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन की बैठक में इस पुस्तक को लेकर प्रश्न उठा था। किसी सदस्य ने प्रश्न उठाया था कि यही पुस्तक जब बाजार में किसी अन्य प्रकाशन, संभवत: राष्ट्रीय पुस्तक न्यास से सात सौ रुपए मूल्य पर उपलब्ध है तो फाउंडेशन इतनी महंगी पुस्तक क्यों खरीद रहा है। ये जानकारी नहीं है कि उक्त पुस्तक की खरीद राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन में हुई या नहीं। ये इस लेख का विषय भी नहीं है। राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन और उसके क्रियाकलाप पर भी चर्चा करना उद्देश्य नहीं है। उक्त उदाहरण से एक बड़ा प्रश्न भारतीय प्रकाशन जगत के सामने खड़ा होता है कि सरकारी खरीद के लिए पुस्तकों के मूल्य बहुत ज्यादा और बाजार के लिए उसी पुस्तक का मूल्य कम क्यों रखे जाते हैं? ये तो एक उदाहरण है जबकि प्रकाशन जगत से जुड़े लोगों का कहना है कि ये तो सामान्य बात है। कवर अलग करके पुस्तकों का मूल्य कई गुणा बढ़ा दिए जाते हैं। बढ़े हुए मूल्य पर खरीद भी होने की बात की जाती है। समय आ गया है कि हिंदी के प्रकाशकों को इस बात पर विचार करना चाहिए कि पुस्तकों के मूल्य का मानकीकरण होना चाहिए या नहीं। 

अभी मेरे सामने एक ही प्रकाशन से प्रकाशित दो पुस्तकें रखी हैं। एक हार्ड बाउंड है और दूसरा पेपरबैक। हार्ड बाउंड पुस्तक की पृष्ठ संख्या 200 है और उसका मूल्य रु 499 है। पेपरबैक पुस्तक की पृष्ठ संख्या 191 है और मूल्य रु 299 है। अन्य प्रकाशक की एक पुस्तक में पृष्ठ है 120 और मूल्य है रु 200। एक और प्रकाशन से प्रकाशित पेपरबैक पुस्तक में पृष्ठ है 230 मूल्य है रु 500। लेख लिखने के क्रम में दर्जनों पुस्तकों की पृष्ठ संख्या और मूल्य देखा। एक ही प्रकाशन से एक ही जैसे कागज पर एक ही आकार में और लगभग समान पृष्ठ संख्या की प्रकाशित पुस्तकों के मूल्य अलग-अलग हैं। उनको देखकर कोई अनुमान नहीं लगा सकता है कि प्रकाशकों ने पुस्तकों के मूल्य निर्धारण का क्या फार्मूला तय किया है। कई प्रकाशकों से मूल्य निर्धारण को लेकर बात की तो पता चला कि आमतौर पर एक रुपए प्रति पृष्ठ की दर से पुस्तकों का मूल्य निर्धारण होता था। अब ये दर बढ़कर दो रुपए प्रति पेज तक पहुंच गया है। एक प्रकाशक ने बताया कि पुस्तक की लागत से चार से छह गुणा अधिक मूल्य रखा जाता है। उनका तर्क था कि पुस्तक विक्रेताओं को चालीस प्रतिशत तक कमीशन और करीब तीन महीने का क्रेडिट देना होता है। ई-कामर्स प्लेटफार्म अब प्रकाशकों से 50-55 प्रतिशत कमीशन की मांग करने लगे हैं। इस कारण पुस्तक का मूल्य लागत के चार से छह गुणा अधिक रखा जाता है। बड़े प्रकाशक तो फिर भी अपने प्रकाशनों के बल पर मूल्यों को नियंत्रण में रख पातें हैं लेकिन कई छोटे प्रकाशक अपनी एक अच्छी पुस्तक से ही मुनाफा कमाने के चक्कर में अधिक मूल्य रख देते हैं। इससे कई बार पाठक खिन्न भी होते हैं और खरीदने में हिचकते भी हैं। 

पुस्तकों के बाजार या बिक्री का इकोसिस्टम बहुत सारी बातों पर निर्भर करता है। अंतराष्ट्रीय स्तर पर कोई घटना घटी तो पेपर के दाम बढ़ जाते हैं। किसी दो देश के बीच संघर्ष जैसी स्थिति बनती है तो भी उसका असर पुस्तकों के बाजार पर पड़ता है। कोरोना जैसी महामारी का असर भी प्रकाशन व्यवसाय पर पड़ते देखा गया । पायरेसी भी पुस्तकों के बाजार पर नकारात्मक असर डालती है। पुस्तक चर्चित हुई नहीं कि पायरेटेड वर्जन बाजार में उपलब्ध। खुले आम चौक-चौराहों पर बिक्री आरंभ। हिंदी के अलावा अन्य भाषाओं में लेखकों को दी जानेवली कापीराइट राशि की दर भी मूल्य को प्रभावित करता है। ये प्रश्न उठ सकता है कि पुस्तकों के मूल्य निर्धारण की कोई नीति क्यों नहीं है? प्रकाशकों की अखिल भारतीय संस्थाएं या अन्य संस्थाएं इसमें पहल क्यों नहीं करती हैं। कम्युनिस्ट पार्टियों के बौद्धिक प्रकोष्ठ की तरह काम कारनेवाले लेखक संगठनों से तो ये अपेक्षा ही व्यर्थ थी/ है। यहां सरकारी खरीद की बात नहीं हो रही है। वो एक अलग ही किस्म का खेल है। जिसमें बहुधा भ्रष्टाचार की खबरें आती रहती हैं। पारदर्शिता की कमी का उल्लेख होता ही रहता है। हिंदी के एक आलोचक जब राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन के अध्यक्ष थे तो एक प्रकाशक को लाभ पहुंचाने की बात हिंदी साहित्य जगत में आम है। इसकी चर्चा फिर कभी। इस बात पर विचार करना होगा कि जो पुस्तकें ज्ञान का आधार होती हैं। प्रत्यक्ष रूप से राष्ट्र निर्माण के लिए पीढ़ियों को तैयार करती हैं। राष्ट्र को एक सूत्र में जोड़ने के उपक्रम के तौर पर देखी जाती हैं। उसको लेकर समाज को क्या करना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने पहले कार्यकाल से ही पुस्तकों और पुस्तकालयों की महत्ता पर जोर दे रहे हैं। घर में देवालय और पुस्तकालय की बात भी कर चुके हैं। इंटरनेट मीडिया के दौर में भी पुस्तकों की महत्ता कम नहीं हुई है। हिंदी क्षेत्र के पुस्तक मेलों और साहित्य उत्सवों में पुस्तकों के प्रति पाठकों का प्रेम दिखता है। नई दिल्ली में आयोजित होनेवाले विश्व पुस्तक मेला ने इस वर्ष सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किए थे। प्रतिवर्ष दिसंबर में आयोजित होनेवाले पुणे पुस्तक मेला का आकार और बिक्री के आंकड़े संतोषजनक ही नहीं बल्कि चौंकानेवाले हैं। मराठी में पुस्तक खरीदकर पढ़नेवाले युवाओं की संख्या बढ़ रही है। मलयालम, तमिल और बांगला में भी पुस्तकों की बड़ी संख्या में बिक्री होती है। 

आज आवश्यकता इस बात की है कि पुस्तकों की संस्कृति के विकास को लेकर समाज को जाग्रत होना होगा। हमें ये तय करना होगा कि पायरेटेड या चोरी से प्रकाशित की गई पुस्तकें नहीं खरीदनी है। चाहे उनका मूल्य कितना भी कम क्यों ना हो। पुस्तकालयों को दी जानेवाली पुस्तकों की सरकारी खरीद में पारदर्शिता लाने की आवश्यकता है। अगर कहीं भ्रष्टाचार है तो उसको रोकने के उपाय करने होंगे। अनियमितता के कारण सरकारी पुस्तकों के खरीद रोक देने से प्रकाशन जगत पर असर पड़ता है। प्रकाशकों को भी व्यक्तिगत और सरकारी खरीद के लिए उपलब्ध पुस्तकों के मूल्य में समानता रखनी होगी। जो प्रकाशक ऐसा नहीं करते हैं उनके बारे में प्रकाशक संघों को सार्वजनिक रूप से सामने आकर कदम उठाने होंगे। लेखकों और पाठकों को भी प्रकाशकों के साथ मिलकर इस व्यवसाय को आगे बढ़ाना होगा क्योंकि इस कारोबार की प्रकृति अलग है। पूंजी लगानेवाले लाभ की इच्छा रखते हैं, रखना भी चाहिए क्योंकि ये पूंजी का स्वभाव है। पर लाभ के चक्कर में ये नहीं भूलना चाहिए कि ये कारोबार पीढ़ियों के निर्माण से भी जुड़ा है। इसका उद्देश्य पवित्र है।         


Saturday, May 30, 2026

ज्ञान का इकोसिस्टम बनाती पत्रकारिता


हिंदी पत्रकारिता के दौ सौ वर्ष पूर्ण होने पर देश के अलग-अलग हिस्से में गोष्ठियों का आयोजन हो रहा है। हिंदी के पहले समाचारपत्र उद्दंत मार्तंड और उसके संपादक जुगुल किशोर सुकुल से लेकर वर्तमान दौर की पत्रकारिता पर चर्चा हो रही है और इस क्षेत्र से जुड़े लोग अपनी-अपनी राय और विश्लेषण रख रहे हैं। पत्रकारिता और साहित्य के संबंध पर भी बातें हो रही है। कुछ दिनों पूर्व सहितम् संस्था द्वारा आयोजित एक कार्यशाला में जाने का अवसर मिला। वहां देश के विभिन्न प्रांतों से आए युवाओं से संवाद हुआ। संवाद का विषय हिंदी साहित्य चुनौतियां और संभावनाएं जैसा था। सहितम् का ये प्रयास युवाओं को लेखन की दुनिया से जोड़ने और उनको एक मंच प्रदान करने का है। युवा लेककों से बात करते हुए साहित्य सृजन पर बात हुई। कुछ दिनों पूर्व हिंदी के वरिष्ठ आलोचक सुधीश पचौरी से कामायनी और छायावाद पर लंबी बात हुई थी। कामायनी और छायावाद को वो इन दिनों बिल्कुल अलग तरीके से व्याख्यित करने का कार्य कर रहे हैं। उनकी स्थापना है कि छायावादी कविता देशप्रेम के भाव से युक्त एक राष्ट्रवादी कविता है। सहितम् की गोष्ठी में युवाओं से संवाद के दौरान सुधीश जी से हुई बातचीत अवचेतन मन में थी। इस कारण जब साहित्य सृजन पर बात होने लगी तो साहित्य सृजन की एक अलग परिभाषा पर चर्चा आरंभ हो गई। साहित्य सृजन को परिभाषित करते हुए बात ज्ञान की पारिस्तिथिकी (इकोसिस्टम आफ नालेज) तक पहुंच गई। स्वाधीनता के पूर्व के साहित्य सृजन को देखकर यही प्रतीत होता है कि अधिकतर साहित्यकरों ने और लेखकों ने अपनी लेखनी के माध्यम से ज्ञान की पारिस्थितिकी को मजबूत किया। विशेषकर यदि हम भक्तिकाल के कवियों को देखें तो उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से एक इकोसिस्टम तैयार किया। ज्ञान के इस इकोसिस्टम से भारत की उस समय की जनता लाभान्वित तो हुई ही संगठित भी हुई। उनके टूटे मनोबल को बल मिलने लगा।  

जयशंकर प्रसाद की महान कृति कामायनी को देखें तो उसमें लेखक एक साथ कई स्तरों पर अपनी बात कहते हुए आगे बढ़ते हैं। देवत्व जब दानत्व की ओर बढ़ता है तो प्रलय आती है। प्रलय सबको नष्ट कर देती है। कामायनी का नायक मनु जीवन से हताश निराश हो जाता है। हिमालय चला जाता है। कविता आगे बढ़ती है तो मनु को श्रद्धा मिलती है। श्रद्धा से ज्ञान मिलता है। प्रलय से ज्ञान की जिस पारिस्थितिकी को क्षति पहुंची थी वो उसका परिष्कार होने लगता है। कामायनी में वर्णित स्थितियां और पात्रों के मनोविज्ञान को पकड़ने और उसको विश्लेषित करने का काम आलोचकों का है। लेकिन पत्रकारिता को या ज्ञानार्जन करनेवालों के लिए एक बड़ी व्यवस्था जयशंकर प्रसाद ने अपनी इस रचना में दी। प्रलय के बाद भी अगर आपके पास श्रद्धा है तो आपको ज्ञानार्जन से कोई रोक नहीं सकता है। सृजन क बाधित नहीं किया जा सकता। ज्ञान अर्जन करने के लिए विनयशील होना आवश्यक है। श्रद्धा नाम कामायनी की नायिका का अवश्य है लेकिन उसको प्रतीक के तौर पर देखा जा सकता है। आदर बिना ज्ञान नहीं प्राप्त हो सकता है। यही बात तो पत्रकारिता पर भी लागू होती है। पत्रकार भी अपनी लेखनी के माध्यम से ज्ञान का इकोसिस्टम ही बनाता है। पूर्व में बने हुए इकोसिस्टम को मजबूत करता है। अब यहां हमें दो बातों पर विचार करना चाहिए कि दो सौ वर्षों की हिंदी पत्रकारिता के किस कालखंड के पत्रकारों ने ज्ञान का इकोसिस्टम बनाने या उसको मजबूत करने का काम किया। स्वाधीनता पूर्व की हिंदी पत्रकारिता को देख लेते हैं। उस कालखंड की पत्रकारिता के आकलन से निष्कर्ष निकलता है कि वो ज्ञान की पारिस्थितिकी को मजबूत करके देश की जनता को जागरूक कर रही थी। उस दौर के साहित्यकार भी यही कर रहे थे। ये अनायास नहीं है कि उस कालखंड में अधिकतर पत्रकार साहित्यकार भी थे या कह सकते हैं कि जो साहित्यकार थे वही पत्रकारिता भी कर रहे थे। क्योंकि दोनों का उद्देश्य समान था।

पत्रकारिता के दो सौ वर्षों के इतिहास को देखें तो भी स्पष्ट होता है कि जो आदर और विनयशीलता के साथ पत्रकारिता कर रहे थे वो शीर्ष पर पहुंचे। आक्रामकता कभी पत्रकारिता को आगे नहीं बढ़ाती है। विनम्र होकर आदर के साथ प्रश्नों के उत्तर ढूंढेंगे तो बेहतर उत्तर मिलने की संभावना बनेगी। संभव है कि उत्तर उस तरह का मिले कि ज्ञान की पारिस्थितिकी में कुछ जोड़ें। वहीं अगर आक्रामकता के साथ पत्रकारिता की जाती तो पूर्वज पत्रकारों द्वारा बनाई गई ज्ञान की पारिस्थितिकी कमजोर होने का खतरा रहता है। पत्रकारिता में हमेशा से ये कहा जाता है कि पत्रकारों को प्रश्नाकुल होना चाहिए। बिल्कुल होना चाहिए। परंतु प्रश्नाकुलता के साथ विनयशीलता होनी चाहिए। पत्रकारिता के जरिए जब ज्ञान के इकोसिस्टम को बल देने की बात होती है तो स्मरण आता है इस वर्ष तीन खंडों में प्रकाशित समग्र भारतीय पत्रकारिता। वाणी प्रकाशन से प्रकाशित लेखक विजयदत्त श्रीधर ने श्रमपूर्वक इसको तैयार किया है। विजयदत्त क्षीधर पत्रकार रहे हैं। उन्होने भोपाल में माधवराव सप्रे स्मृति समाचारपत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान की स्थापना भी है। ये अपनी तरह का एक अनोखा संग्रहालयय है। वहां शोधार्थियों के लिए प्रचुर सामग्री उपलब्ध है। इसपर फिर कभी विस्तार से चर्चा। समग्र भारतीय पत्रकारिता के तीन खंडों को देखने के बाद ये विश्वास पक्का होता है कि पत्रकार अपनी पत्रकारिता के माध्यम से ज्ञान का इकोसिस्टम ही बनाते रहे हैं। तीन खंडों के 49 अध्यायों में विजयदत्त श्रीधर ने बेहद श्रमपूर्वक भारतीय पत्रकारिता की विकास यात्रा को दर्शाने का प्रयास किया है। वो इन तीन खंडो को समग्र भारतीय पत्रकारिता की सन 1780 से लेकर 1948 तक की 128 वर्ष की यात्रा कथा बताते हैं। उनकी इस कृति में हिंदी भाषा के बदलते स्वरूप को भी देखा-समझा जा सकता है। विजयदत्त श्रीधर ने जहां भी पत्र-पत्रिकाओं के उद्धरण दिए हैं वहां उसकी भाषा को यथावत रखा है। इस कृति में पाठकों को तमिल, मलयालम, तेलुगु, ओडिया और अंग्रेजी पत्रकारिता के बारे में भी अलग अलग अध्यायों में जानकी मिलती है। पुस्तक में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की पत्रकारिता और उनकी ओजस्वी वाणी को भी रेकांकित किया गया है। 

विजयदत्त श्रीधर की इस पुस्तक से ये स्पष्ट होता है कि किस तरह से भारतीय पत्रकारिता ने ज्ञान का इकोसिस्टम बनाया। श्रीधर जी स्वाधीनता के बाद रुक जाते हैं। आज इस बात की पड़ताल करने की आवश्यकता है कि स्वाधीनता के बाद किस विचार और किस प्रचार ने भारतीय पत्रकारिता निर्मित ज्ञान के इकोसिस्टम को बाधित या खंडित करने का प्रयत्न किया। 1948 के बाद भारतीय पत्रकारिता में कई महत्वपूर्ण पड़ाव आए। 1962 के युद्ध में चीन से पराजय, 1975 में देश में आपातकाल की घोषणा और उसके बाद नागरिक अधिकारों और प्रेस की स्वतंत्रता समाप्त होना, 1991 में आर्थिक उदारीकरण का आरंभ होना। पत्रकारिता और पत्रकार ने नई तकनीक आई, चुनौतियों के साथ संभावनाएं आईं। इसो पत्रकारिता ने किस तरह से लिया। इस पर विस्तार से लिखे जाने की आवश्यकता है। पत्रकारिता किस तरह से ज्ञान के इकोसिस्टम से दूर होकर राजनीतिक परिवार के इकोसिस्टम को मजबूत करने में लग गई। ये भी देखा जाना चाहिए। 


Saturday, May 23, 2026

इतिहास के लैंडस्केप में बदलाव संभव


पिछले दिनों भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला के कई विद्वानों से संवाद का अवसर मिला। उनके विभिन्न प्रकार के शोध की जानकारी मिली। उच्च अध्ययन संस्थान में ही टैगोर फेलो के रूप में कार्यरत प्रो ओम प्रकाश शर्मा जी से लंबी बातचीत हुई। उनका अध्ययन हिमाचली पहाड़ी भाषा, लिपियां और लोकसाहित्य पर है। बातचीत के क्रम में उन्होंने एक पांडुलिपि दिखाई। उन्होंने बताया कि इस पांडुलिपि का नाम खुजित्रा फलित ज्योतिष पांडुलिपि है। इसमें आगम शास्त्र के अंतर्गत होरारि ज्योतिष के विषय पर लिखा गया है। पांडुलिपि की लिपि के संबंध में उन्होंने दिलचस्प बात बताई। उनका कहना है कि इसकी लिपि शारदा लिपि से जन्मी हिमाचल प्रदेश की भटाखरी लिपि है। उत्तराखंड के जौंसार-बाबर के लिपिकार इस पांडुलिपि को जड़ाखरी लिपि मानते हैं। ओम प्रकाश शर्मा लंबे समय से पांडुलिपियों की खोज में लगे हैं और करीब सात वर्षों की कठिन मेहनत के बाद उनको ये पांडुलिपि डिजिटाइजेशन के लिए मिली है। उनका शोध ये कहता है कि यह पांडुलिपि बहुत पुरानी है और मूल शारदा लिपि में लिखी गई होगी। शारदा लिपि ब्राह्मी परिवार की लेखन प्रणाली के तौर पर कश्मीर में मान्य रही है। ज्ञान की देवी शारदा के नाम पर ही इस लिपि का नामकरण बताया जाता है। प्राचीन काल में इस लिपि का प्रयोग कश्मीर से लेकर हिमाचल प्रदेश तक में होता था। उत्तराखंड से मिली इस पांडुलपि से संकेत मिलता है कि किस प्रकार से शारदा लिपि की यात्रा कश्मीर से लेकर उत्तराखंड तक हुई होगी। जब डा शर्मा से बात हो रही थी तो उसी समय संस्कृति मंत्रालय की योजना ज्ञान भारतम का ध्यान आया।

ज्ञान भारतम के बारे में पहली बार इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, नई दिल्ली के प्रोफेसर रमेशचंद्र गौड़ से पिछले वर्ष विस्तार से चर्चा हुई थी। ये वो समय था जब ज्ञान भारतम पर मंथन के लिए तीन दिनों का अंतराष्ट्रीय सम्मेलन दिल्ली में आयोजित किया गया था। इस सम्मेसन का विषय था- रिक्लेमिंग इंडियाज नालेज लीगेसी थ्रू मैनुस्क्रिप्ट हैरिटेज। हाइब्रिड मोड में आयोजित इस सम्मेलन में देश विदेश के करीब दो हजार विद्वानों ने हिस्सा लिया था जिसमें डेढ सौ विशेषज्ञों ने अपनी बात रखी थी। सम्मेलन के दूसरे दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ज्ञान भारतम को औपचारिक रूप से आरंभ किया था । इसके पहले बजट में भी इस तरह की योजना की घोषणा की गई थी। इस सम्मेलन में इस योजना से जुड़े वर्किंग ग्रुप की रिपोर्ट भी जारी की गई थी। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि पांडुलिपियां भारतीय ज्ञान परंपरा के लिखित स्त्रोत हैं जो भारत की विभिन्न संस्थाओं के साथ-साथ व्यक्तिगत अधिकार के घरों में उपलब्ध हैं। इन पांडुलिपियों के बारे में गहन सर्वेक्षण की आवश्यकता पर बल दिया गया है। संस्कृति मंत्रालय ने इस वर्ष अप्रैल से जून तक तीन महीने की अवधि में पांडुलिपियों के सर्वेक्षण का कार्य आरंभ किया है। 2003 में भी राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन आरंभ किया गया था। तब इसमें जन भागीदारी नहीं थी। विशेषज्ञों और संस्थाओं के माध्यम से कार्य किया गया था जो बाद में लगभग समाप्त हो गया। अब भारत सरकार ने पांच वर्षों के लिए करीब पांच सौ करोड़ रुपए का बजट ज्ञान भारतम के लिए तय किया है। उसके अंतर्गत पांडुलिपियों की खोज का पहला चरण आरंभ हो गया है। अभी जो सर्वेक्षण हो रहा है उसमें जन भागीदारी सुनिश्चित की गई है। जनसाधारण से एक एप के माध्यम से पांडुलिपियों के बारे में जानकारी देने की अपेक्षा की गई है। ज्ञान भारतम के सर्वे समाप्त हो जाने के बाद प्राप्त जानकारी की प्रामाणिकता जांची जाएगी। फिर संरक्षण, प्रलेखन, डिजीटाइजेशन, आकार्इविंग, पाठक संपादन और प्रकाशन का चरण आरंभ होगा। दीर्घ योजना है। पिछले वर्ष आयोजित अंतराष्ट्रीय सम्मेलन के वर्किंग समूह की रिपोर्ट में भवनाथ झा ने विस्तार से पांडुलिपि सर्वेक्षण के चरणों और उसके बाद के कार्यों का लेखा जोखा प्रस्तुत किया है।

एक अनुमान के मुताबिक राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन के अंतर्गत पहले ही हमारे पास करीब 50 लाख पांडुलपियों की कैटलागिंग हो चुकी है। मनमोहन सिंह सरकार के दौरान इसका काम बहुत धीमा हो गया था। अब नरेन्द्र मोदी सरकर ने संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत इसका रोडमैप बनाकर सर्वेक्षण का कार्य आरंभ किया है। संस्कृति मंत्रालय में इस कार्य से जुड़े व्यक्ति ने बताया कि पिछले करीब डेढ महीने में 25 लाख पांडुलिपियों की जानकारी मिल चुकी है। जिस प्रकार से जानकारियां मिल रही हैं उससे अनुमान लगाया जा सकता है कि आनेवाले दिनों में इस जानकारी का दायरा विस्तृत होगा। सबसे मुश्किल कार्य है जानकारी के बाद उन पांडुलपियों को डिजीटाइजेशन के लिए हासिल करना। जिन धार्मिक संस्थाओं के कमरों में पांडुलपियां बंद हैं उनके प्रमाणीकरण और उसके डिजिटाइजेशन के लिए पांडुलिपियों प्राप्त करना कठिन हो सकता है। ये काम हो भी गया तो उसके बाद इन पांडुलिपियों के पाठ के लिए बड़ी संख्या में भाषा, लिपि और इतिहास के विद्वानों की आवश्यकता होगी। कृत्रिम प्रज्ञा (एआई) से पांडुलिपियों के वर्गीकरण में सहायता मिल सकती है लेकिन एआई बहुत मददगार साबित होगा इसमें संदेह है। अभी जर्मनी के एक विश्वविद्लाय से जुड़ा एक समाचार चर्चा में आया है। इसके अनुसार वहां इस तरह का एक एआई टूल विकसित किया गा है जो प्राचीन लिपियों को पढ़ने में मददगार है। ये अभी बहुत आरंभिक बातें हैं इसके विकसित होने और उपयोगी टूल के रूप में चलन में आने में समय लग सकता है। पांडुलपियों के इंडेक्सिंग का कार्य भी समय लेगा। कीवर्ड के आधार पर इंडेक्सिंग की विधि से ही ये काम होगा। इसमें एक चुनौती और भी है कि अगर इस कार्य में कुशल लोगों को नहीं लगाया गया तो सारी मेहनत पर पानी फिर सकता है। पांडुलिपियों को जुटाने के काम के साथ साथ संस्कृति मंत्रालय को कुशल मानव संसाधन के विकास की भी योजना बनानी पड़ेगी। सर्वेक्षण के साथ साथ इस कार्य को करने से भविष्य में मदद मिलेगी।

ज्ञान भारतम भारत सरकार का एक ऐसा प्रकल्प है जो भारत की सभ्यतागत विशेषताओं को रिक्लेम करेगा। इस स्तंभ में पहले भी प्रधानमंत्री की सभ्यतागत चेतना की पुनर्स्थापना के कार्यों को रेखांकित किया गया है। ज्ञान भारतम के अंतर्गत जमा की गई पांडुलपियों के माध्यम से भारत की वो शक्ति सामने आ सकती है जिसको विदेशी इतिहासकारों और विदेशी विचारधारा से प्रभावित विद्वानों ने योजनाबद्ध तरीके से नजरअंदाज किया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पिछले बारह वर्षों के महत्वपूर्ण कार्यों का विश्लेषण करें तो निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि वो भारत और भारतीयता को स्थापित करने और अपनी सभ्यतागत निरंतरता से जोड़ने के लिए प्रयत्नशील हैं। प्राचीन पांडुलपियों में वो खजाना छुपा हुआ जो भारत के इतिहास को बदल देने की सामर्थ्य रखता है। बस इसमें एक सतर्कता बरतनी होगी कि इन पांडुलिपियों को लेकर जिस प्रकार से संगठित तरीके से अफवाह फैलाई जाती रही है उसकी काट भी रखनी होगी। अगर वैश्विक इतिहास और ज्ञान का लैंडस्केप बदलता दिखेगा तो तमाम वैश्विक शक्तियां ज्ञान भारतम के कार्य को पटरी से उतारने की कोशिश करेंगी। अकादमिक रूप से बहुत सतर्क रहने की आवश्यकत है। ये सतर्कता इस कारण भी आवश्यक है कि ये हमारी सभ्यता की निरंतरता और ज्ञान परंपरा को स्थापित करेगी।    

आजा तेरी याद आई


आज पूरी दुनिया ड्रग्स की समस्या से जूझ रही है। नशे के कारोबार ने अपनी जड़ें बहुत गहरी जमा ली है। भारत के पहाड़ी और मैदानी राज्य भी इस समस्या से बुरी तरह से जूझ रहे हैं। नशे की तस्करी के रूप भी बदल गए हैं। इस कारोबार से होनेवाली आय से तंकवाद का जुड़ना एक बड़ी वैश्विक समस्या के तौर पर उभरा है। नशे के कारोबार और ड्रग तस्करी पर कई फिल्में बनी हैं। पिछले वर्षों में एक वेबसीरीज आर्या आई थी जिसमें नशे के कारोबार के आधुनिक और बेहद खतरनाक स्वरूप को दिखाया गया था। किस तरह से ये कारोबार लोगों की जान लेता भी है और जान जाती भी है इसका सूक्षम्ता से प्रदर्शन किया गया था। ये समस्या आज की नहीं है बल्कि दशकों पुरानी है। आज से 50 वर्ष पूर्व एक फिल्म आई थी चरस। रामानंद सागर लिखित और निर्देशित इस फिल्म चरस में नशे के कारोबार के अंतराष्ट्रीय कारोबार और उससे होनेवेली कमाई के लालच को प्रदर्शित किया गया था। धर्मेन्द्र- हेमा मालिनी अभिनीत फिल्म चरस मानवता की रक्षा के लिए समर्पित और ड्रग्स के कारोबार के विरुद्ध लड़ाई में अपनी जिंदगी को दांव पर लगाने वाले लोगों को समर्पित है। आरंभिक संवाद भी ये संदेश देती है कि फिल्म मानवता, इंसानियत और समाज को बचाने के लिए है। जैसे जैसे फिल्म आगे बढ़ती जाती है वो संदेश से आगे निकलकर एक प्रेम कहानी में बदलती जाती है। एक बेहद रोमांटिक प्रेम कहानी समांतर रूप से चलती रहती है। इस प्रेम कहानी को हेमा का हुस्न और धर्मेन्द्र का भोलापन और हस्य एक अलग ही ऊंचाई प्रदान करता है। ये वही समय था जब असल जिंदगी में हेमा और धर्मेन्द्र के बीच प्यार के किस्सों की चर्चा होने लगी थी। दोनों के बीच पर्दे पर जिस तरह की निकटता दिखती है उससे भी इस बात के संकेत मिलने लगे थे। फिल्मी भाषा में उसको पर्दे की केमेस्ट्री कहते हैं। 1975 में आई फिल्म शोले में जो चुलबुली और शोख तांगेवाली लड़की थी वो अब एक थिएटर आर्टिस्ट के रूप में उपस्थित थी। शोले हिट हो चुकी थी और सिनेमा घरों से लेकर बैठकी तक में बसंती और वीरू के प्यार का संवाद आम होने लगा था। शोले की सफलता ने ही रामानंद सागर को इस जोड़ी को दोहराने के लिए प्रेरित किया था। रामानंद सागर ने अपनी फिल्म में अमजद खान को भी खलनायक के रोल में लिया था। शोले में अमजद खान का किरदार खैनी खानेवाला डाकू का था जो क्रूर भी था लेकिन चरस में वही अमजद खान बो-टाई में विलेन के रूप में थे लेकिन मेकअप और गेटअप के बाद भी वैसी प्रभावोत्पादकता नहीं ला सके।

चरस इस मायने में अपने समय की यादगार फिल्म थी कि इसके बड़े हिस्से की शूटिंग माल्टा और रोम में हुई थी। जब फिल्म रिलीज होने वाली थी तो इस बात का प्रचार जोर शोर से किया गया था कि फिल्म खूबसूरत विदेशी लोकेशन पर शूट की गई थी। फिल्मी मैगजीन और प्रचार सामग्री में विदेशी लोकेशन की बात की गई थी। चरस फिल्म की कहानी औसत थी लेकिन उसमें रामांनद सागर ने जिस चरह के लटके-झटके डाले थे वो दर्शकों को बांधे रखने में कामयाब हो गए थे। पिता की मौत का इंतकाम लेनेवाला बेटा और पिता के इलाज के लिए पैसे की खातिर ब्लैकमेल होती बेटी और स्थितियों का लाभ उठाता विलेन। ना जाने इस तरह की कहानी कितनी बार दोहराई जा चुकी थी लेकिन क्राफ्ट अगर बेहतर होता है तो दर्शक कहानी के दोहराव को स्वीकार कर लेते हैं। कहानी के बीच धर्मेन्द्र और हेमा मालिनी के बीच खूबसूरत लोकेशन और समंदर किनारे गाए फिल्मी गीत अबतक लोगों को पसंद आते हैं। आनंद बक्षी की कलम से निकले शब्दों को लता मंगेशकर, किशोर कुमार, मोहम्मद रफी और आशा भोसले की आवाज ने अमर कर दिया। मैं एक शरीफ लड़की बदनाम हो गई, नाइट क्लब में फिल्माया गीत है। नाइट क्लब में नायिका की वेशभूषा और अंदाज मादक होते थे जिसे आशा भोसले की आवाज ने और बढ़ा दिया था। एक और गीत है जिसको लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी ने अपनी आवाज दी। इस गीत का मुखड़ा आनंद बक्षी ने गाया था। गीत है- आ जा तेरी याद आई। ये गाना जब आरंभ होता है तो धर्मेन्द्र और हेमा खड़े हैं और पार्श्व से गीत बजता है जिसके बोले हैं दिल इंसान का एक तराजू है..। चंद पंक्तियों के बाद लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी की आवाज। संदेश के आवरण में लिपटी इस फिल्म को रामानंद सागर ने इस तरह से पेश किया था जो आज 50 वर्षों के बाद धर्मेन्द्र हेमा की बेहतरीन फिल्मों में शामिल किया जा सकता है।    

 

Saturday, May 16, 2026

इतिहास लेखन की बाधा स्लीपर सेल


इतिहास एक ऐसा विषय है जिसकी चर्चा भारतीय राजनीति में निरंतर होती रहती है। भारतीय राजनीतिक दल हमेशा एक दूसरे पर दोषारोपण करने में अबतक लिखे इतिहास का सहारा लेते रहते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भारतीय इतिहास को समग्रता में देखे और लिखने की बात प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से कई बार कर चुके हैं। गृहमंत्री अमित शाह ने कुछ वर्षों पहले काशी की एक गोष्ठी में कहा था कि इतिहास लेखन में दूसरे की गलतियों को रेखांकित करने से बेहतर होगा कि अपनी लकीर लंबी की जाए। कहना ना होगा कि देश का शीर्ष नेतृत्व भारतीय इतिहास को समग्रता में लिखे जाने और देश की जनता के समक्ष प्रस्तुत किए जाने की अपेक्षा करता है। 2014 में जब नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने तब से वामपंथी इतिहास लेखन की जगह भारतीय दृष्टि से इतिहास लेखन की बात की जाने लगी थी। नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के करीब चार वर्ष बाद 2018 में भारत के समग्र इतिहास लेखन का सोच भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (इंडियन काउंसिल आफ हिस्टारिकल रिसर्च- आईसीएचआर) में आया। चार वर्षों तक वहां इसपर मंथन होता रहा। इस बीच देश की जनता ने एक बार फिर से नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी को लोकसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत दिया। 2022 में भारत के समग्र इतिहास की योजना पर कार्य आरंभ हुआ। उस समय के समाचार पत्रों में आईसीएचआऱ के चैयरमैन राघवेन्द्र तंवर के हवाले से ये बातें प्रकाशित हैं कि आईसीएचआर भारत के समग्र इतिहास के प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है। वामपंथी इतिहासकारों ने इसको इतिहास के पुनर्लेखन से जोड़कर इसकी आलोचना आरंभ कर दी। एक वामपंथी सांसद ने 2022 के दिसंबर में संसद में इसपर प्रश्न भी उठाया। शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने उस प्रश्न के उत्तर में सदन को बताया था कि इतिहास का पुनर्लेखन नहीं किया जा रहा है। आईसीएचआर ने भारत के समग्र इतिहास लेखन पर एक प्रोजेक्ट आरंभ किया है। कांग्रेस सांसद मनीषे तिवारी ने भी इस पर प्रश्न उठाया था।

प्रश्न ये नहीं है कि इतिहास का पुनर्लेखन किया जा रहा है या इतिहास लेखन के एकांगी प्रविधि से उत्पन्न रिक्त स्थानों की पूर्ति के लिए इतिहास लिखा जा रहा है। प्रश्न ये है कि आईसीएचआर ने 2018 में जो सोचा वो आठ वर्षों बाद भी भौतिक रूप से आकार नहीं ले सका है। अब तक भारत के समग्र इतिहास का एक भी खंड प्रकाशित नहीं हो पाया है। जबकि इसके लिए एक बोर्ड का गठन किया गया था। इस प्रोजेक्ट के लिए इतिहासकार सुष्मिता पांडे की नियुक्ति संपादक के पद पर की गई थी। उनके साथ प्रधानमंत्री मेमोरियल लाइब्रेरी से नरेन्द्र शुक्ल को प्रतिनियुक्ति पर लाकर इस प्रोजेक्ट से जोड़ा गया । दो और युवा विद्वानों को इस प्रोजेक्ट से जोड़ा गया था। नरेन्द्र शुक्ल वापस जा चुके हैं। कहना ना होगा कि इस प्रोजेक्ट से जुड़े लोगों के वेतन आदि का खर्च तो आईसीएचआर उठा ही रहा है। इस बीच आईसीएचआर के सदस्य सचिव रहे उमेश कदम पर 2022 में गंभीर वित्तीय अमियमितता के आरोप लगे। वो यहां से कार्यमुक्त हो गए। भारत के समग्र इतिहास के पहले खंड पर कार्य आरंभ हो चुका था। इस प्रोजोक्ट से जुड़े लोगों ने बताया कि उमेश कदम ने पदमुक्त होने के बाद पत्र लिखकर आईसीएचआर को अपने लिखित कार्यों के उपयोग से रोक दिया था। पहले खंड के लिए उन्होंने मध्यकालीन इतिहास पर लिखा था। उसकी जगह नए व्यक्ति की खोज करना और लिखवाने में समय लगा, बताया गया। इस बात को भी चार वर्ष बीत गए। अभी तक पहला खंड नहीं आ पाना आईसीएचआर की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल है। प्रभारी सचिव ओमजी उपाध्याय को आशा है कि जल्द ही पहला खंड प्रकाशित हो जाएगा। अगर ये मान भी लिया जाए कि 2022 में ये प्रोजेक्ट जमीन पर उतरा और पहला खंड 2026 में आ जाएगा तो इस हिसाब से तो आठ खंड को प्रकाशित होने में 32 वर्ष लगेंगे।

इस प्रोजेक्ट से जुड़े लोगों के अनुसार ये तय हुआ था कि भारत का समग्र इतिहास का पहला खंड परिचयात्मक होगा। इस खंड में भारत के समग्र इतिहास लेखन की आवश्यकता को स्थापित किया जाएगा। इस बात की चर्चा होगी कि भारत के इतिहास लेखन का आधार भू-राजनीतिक न होकर भू-सांस्कृतिक होगा। पहला खंड दो-ढाई सौ पृष्ठों का होना था। बढ़ते बढ़ते वो करीब ग्यारह सौ पृष्ठों का हो गया। इसके प्रकाशन के बारे में जानकारी लेने पर पता चला कि ग्यारह सौ पन्नों के पहले खंड को तीन विशेषज्ञों के पास भेजा गया है। उनसे अनुरोध किया गया है कि वो इसका मूल्यांकन करके अपनी राय दें। विशेषज्ञों के लिखे हुए को विशेषज्ञों से मूल्यांकन करवाने की क्या आवश्यकता है। क्या आईसीएचआर को इस प्रोजेक्ट से जुड़े विशेषज्ञों पर भरोसा नहीं है। इस प्रोजेक्ट की संपादक सुष्मिता पांडे विदुषी हैं। आईसीएचआर के अध्यक्ष राघवेन्द्र तंवर स्वयं विद्वान इतिहासकार हैं। ऐसे में मूल्यांकन के लिए बाहर के विद्वानों के पास भेजने की आवश्यकता क्यों ? इस बात पर भी विचार किया जाना चाहिए अगर पहला खंड परिचयात्मक और इस प्रोजेक्ट की आवश्यकता बताने वाला है तो ग्यारह सौ पृष्ठों का भारी भरकम खंड क्यों? क्या ये खंड दो-ढाई सौ पृष्ठों का नहीं होना चाहिए जो पहले तय किया गया था। तय तो ये भी किया जाना चाहिए कि ये प्रोजेक्ट कब तक पूरा होगा? क्या अनंत काल तक इस प्रोजेक्ट को चलाया जाना उचित रहेगा? क्या आईसीएचआर इसको निश्चित समय सीमा में पूरा नहीं कर सकता है। बहुत संभव है कि आईसीएचआर में अब भी वामपंथियों के स्लीपर सेल सक्रिय हों और इस प्रोजेक्ट को अपने आकाओं के कहने पर लटकाने का उपक्रम कर रहे हों। ये देखना तो अध्यक्ष का काम है कि ये प्रोजेक्ट समय पर पूरा हो। आईसीएचआर में गड़बड़ियों का समाचार भी आता रहता है. चाहे वो मदर आफ डेमोक्रेसी पुस्तक का प्रकाशन हो या सुभाषचंद्र बोस नाम की पुस्तक का गलत शीर्षक प्रकाशन का मसला हो।

दरअसल आईसीएचआर की समस्या बौद्धिक कम प्रशासनिक अधिक प्रतीत होती है। 2022 में उमेश कदम के पद छोड़ने के बाद से वहां स्थायी सदस्य सचिव नहीं हैं। पिछले वर्ष मई में अल्केश चतुर्वेदी को मंत्रालय ने सदस्य सचिव नियुक्त किया लेकिन वो इस पद पर अपना योगदान नहीं दे सके। कारण मंत्रालय और आईसीएचआर बेहतर बता सकते हैं। कुछ दिनों पूर्व फिर से सदस्य सचिव पद के लिए इंटरव्यू हुआ। पैनल तय करके नाम मंत्रालय भेज दिए गया लेकिन अबतक किसी की नियुक्ति नहीं हो सकी। अब तो ये भी संदेह होता है कि आईसीएचआर के उच्च पदों पर बैठे लोग ही नहीं चाहते हैं कि वहां सदस्य सचिव के पद पर कोई स्थायी नियुक्ति हो। अगर सदस्य सचिव आ जाते हैं तो वो संस्था को चलाएंगे, इससे यथास्थितिवादियों को परेशानी हो सकती है। लेकिन चार वर्षों से इतनी महत्वपूर्ण संस्था में सदस्य सचिव का नहीं होना शिक्षा मंत्रालय के निर्णय लेने की क्षमता पर भी प्रश्न खड़े करता है। आईसीएचआर ऐसी संस्था है जिसकी सक्रियता प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नीतियों को उनकी अपेक्षाओं को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है। बशर्ते कि सक्रिय हो।