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Saturday, November 7, 2026

भाषा अकादमियों का औचित्य


राज्यों में अलग-अलग भाषा के लिए अलग-अलग अकादमियां या भाषा संस्थान कार्य करती हैं। स्वाधीनता के बाद भारतीय भाषाओं को समृद्ध करने के लिए इन अकादमियों या भाषा संस्थानों की स्थापना की गई थी। दैनिक जागरण ने देश के कई राज्यों में इन भाषा अकादमियों और भाषा संस्थानों की स्थितियों की पड़ताल की। लगभग सभी भाषा संस्थान और अकादमियां बदहाल मिलीं। दिल्ली, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान आदि में अकादमियों की स्थिति इतनी खराब है कि प्रतीत होता है कि राज्य सरकारों को और उनकी कला-संस्कृति विभाग के लिए ये अकादमियां महत्वहीन हैं। यह तो कल्पना भी नहीं की जा सकती है कि किसी राज्य की एक भाषा अकादमी में कोई कर्मचारी नहीं है। सिर्फ एक आदेशपाल के भरोसे अकादमी चल रही है। बिहार के मगही अकादमी में ऐसा ही है। वहां कर्मचारियों के 15 स्वीकृत पद हैं लेकिन एक आदेशपाल कार्यरत है। कल्पना कर सकते हैं कि बिहार में मगही अकादमी के माध्यम से राज्य की इस महत्वपूर्ण भाषा का कितना विकास हो रहा होगा। एक अकेला आदेशपाल अपने कंधों पर मगही अकादमी को लेकर इस भाषा को विस्तार भी दे रहा होगा और पहचान भी। यह स्थिति सिर्फ मगही अकादमी की नहीं है बल्कि कला, साहित्य और भाषा से जुड़ी सभी अकादमियों में लगभग ऐसी ही स्थिति है। प्रतीत होता है कि इन संस्थानों और अकादमियों की सुध लेनेवाला कोई नहीं है। किसी भी सरकार को इसकी चिंता नहीं है। 

यह हाल तो तब है जब कि 2020 में लागू की गई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में कहा गया है कि ‘भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में उल्लिखित प्रत्येक भाषा के लिए अकादमी स्थापित की जाएगी जिनमें हर भाषा से श्रेष्ठ विद्वान एवं मूल रूप से वह भाषा बोलनेवाले लोग शामिल रहेंगे ताकि नवीन अवधारणाओं का सरल किंतु सटीक शब्द भंडार तय किया जा सके, तथा नियमित रूप से नवीनतम शब्दकोश जारी किया जा सके ( विश्व में अन्य कई भाषाओं के सफल प्रयासों के सदृश)। इन शब्दकोशों के लिए ये अकादमियां एक दूसरे से परामर्श लेंगी, कुछ मामलों में आम जनता के सर्वश्रेष्ठ सुझावों को भी लेंगी। जब भी संभव हो साझे शब्दों को अंगीकृत करने का प्रयास भी किया जाएगा। ये शब्दकोश व्यापक रूप से प्रसारित किए जाएंगे ताकि शिक्षा, पत्रकारिता लेखन बातचीत आदि में इस्तेमाल किया जा सके। किताब के रूप में और आनलाइन उपलब्ध हो। अनुसूची आठ की भाषों के लिए इन अकादमियों को केंद्र सरकार द्वारा राज्य सरकारों के साथ परामर्श करके अथवा उनके साथ मिलकर स्थापित की जाएगी।‘ राष्ट्रीय शिक्षा नीति सिर्फ आठवीं अनुसूची की भाषाओं की अकादमियों तक नहीं रुकती है। आगे भी शिक्षा नीति में कहा गया है कि ‘इसी प्रकार व्यापक पैमाने पर बोली जानेवाली अन्य भारतीय भाषाओं की अकादमी केंद्र अथवा/और राज्य सरकारों द्वारा स्थापित की जाएंगी।‘ 

राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लागू हुए पांच वर्ष से अधिक हो गए लेकिन नए अकादमियों की स्थापना तो दूर, जो अकादमियां पहले से चल रही हैं उनकी स्थिति में सुधार के लिए कोई कार्य होता नहीं दिखा। शिक्षा राज्य सरकारों का विषय है। राज्य सरकारों के स्तर ही इन अकादमियों को सक्रिय किया जाना है। केंद्र सरकार ने तो शिक्षा नीति के साथ इन अकादमियों को जोड़कर राज्य सरकारों को एक रास्ता दिखाया और बताया कि कैसे इनकी हालत बेहतर की जा सकती है। नई अकादमियों की स्थापना की आवश्यकता ही नहीं पड़ती अगर राज्यों में पहले से स्थापित भाषाई अकादमियों को मरणासन्न नहीं छोड़ दिया गया होता। आवश्यकता इस बात की थी कि इन पुरानी भाषाई अकादमियों को राष्ट्रीय शिक्षा नीति के उद्देश्यों के साथ जोड़ दिया जाता। पर ऐसा किसी भी राज्य सरकार ने किया हो इसकी जानकारी उपलब्ध नहीं हो पाई। तो क्या ये मान लिया जाए कि राज्य सरकारों की रुचि भाषाई अकादमियों की स्थापना करने या पहले से मौजूद भाषाई अकादमियों को पुनर्जीवित करने में नहीं है। इन राज्यों में अकादमियों की स्थिति को देखकर तो ऐसा ही लगता है कि राजनीति कला साहित्य और भाषा का आदर नहीं करती। ना ही उसको संरक्षित और संवर्धित करने में राजनीति की कोई रुचि है। शब्दकोश निर्माण तो बहुत दूर की बात है। जो पुस्तकें पूर्व में प्रकाशित हैं उनका भी नया संस्करण प्रकाशित नहीं हो पा रहा है। दैनिक जागरण की पड़ताल में ये बात निकल कर आई कि इन अकादमियों में इनके सविधान के अनुसार नियुक्तियां भी नहीं हो पा रही हैं। कार्यकारी परिषद आदि का गठन राज्य सरकारें नहीं कर पा रही हैं। इसके कारण कामकाज ठप रहता है। उत्तर प्रदेश में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान एक महत्वपूर्ण भाषा संस्थान हुआ करती थी। इस संस्थान के पदने अध्यक्ष मुख्यमंत्री होते हैं जो इसके कार्यकारी अध्यक्ष आदि की नियुक्ति करते हैं। संस्थान उत्तर प्रदेश के भाषा विभाग से संबद्ध है। अगर ये संस्थान सिर्फ अपने अतीत के गौरव को ही कायम रख पाती तो हिंदी का बहुत भला होता। अफसोस, ऐसा हो न सका। 

उत्तर प्रदेश और बिहार में तो भाषाई अकादमियों के अलावा कला और संगीत से जुड़ी अकादमियों का भी बुरा हाल है। उत्तर प्रदेश में संगीत नाटक अकादमी, भारतेन्दु नाट्य अकादमी, ललित कला अकादमी और बिरजू महाराज कथक संस्थान अपने उद्धारक की बाट जोह रहे हैं। गजब संयोग है कि इन चारों संस्थानों में नियमित निदेशक नहीं हैं। परिणाम यह कि कार्य भी प्रभार जैसा ही होता है। जिन सस्थानों पर राज्य के कलाकारों को मंच देने से लेकर युवा कलाकारों की पहचान करने और तराशने का था वो अपने ही अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं। नेतृत्व नहीं होने के कारण ये सिर्फ उतना ही कर पाती हैं जितना इनके जीवित रहने के लिए आवश्यक है। बिहार में भी राज्य संगीत नाटक अकादमी और राज्य ललित कला अकादमी है। इन दोनों अकादमियों का अस्तित्व भी कागजों में ही है। ना तो कर्मचारी हैं और ना ही कोई कार्यक्रम। मध्य प्रदेश और राजस्थान की अकादमियों का हाल भी बेहतर नहीं है। मध्य प्रदेश की पंजाबी साहित्य अकादमी में कोई स्थायी कर्मचारी नहीं है। मध्य प्रदेश की साहित्य अकादमी ने 2023 में पांच वर्ष के पुरस्कार एक साथ वितरित किए। जनजातीय लोककला और बोली विकास अकादमी स्वयं का विकास नहीं कर पा रही है। भारत भवन के बारे में तो कुछ भी कहना व्यर्थ है। दरअसल अगर हम हिंदी भाषी राज्यों में भाषा और कला अकादमियों के कामकाज पर नजर डालें तो एक बात स्पष्ट रूप से सामने आती है कि सरकारें इनको लेकर उदासीन हैं। सरकार की यह उदासीनता भाषा, कला साहित्य के लिए घातक हैं क्योंकि संस्कृति के निर्माण में और पीढ़ियों को संस्कारित करने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका है। राज्य सरकारों की इन अकादमियों की सुध लेनी चाहिए क्योंकि अगर ये इसी तरह से मरणासन्न स्थिति में रहेंगी तो हमारी भाषा, हमारी लोक-कला, हमारी संगीत की समृद्ध विरासत नई पीढ़ी तक कैसे पहुंचेगीं। सिर्फ संस्कृति की बात करने से कार्य सिद्ध नहीं होगा बल्कि संस्कृति के निर्माण करनेवाले अवयवों को बल देना होगा। राज्यों के राजनीति नेतृत्व को, उनके मंत्रियों को कला साहित्य और भाषा के लिए संवेदनशील होना होगा।   


Saturday, October 31, 2026

अमेरिका के मध्यावधि चुनाव पर नजर


दो दिन बाद अमेरिका में मध्यावधि चुनाव है। पूरे विश्व की निगाहें इसपर लगी हैं। चुनाव का परिणाम का असर अमेरिका के राष्ट्रपति की कुर्सी पर नहीं पडेगा। ट्रंप अपने पूरे कार्यकाल तक राष्ट्रपति बने रहेंगे लेकिन अगर परिणाम उनकी पार्टी के विरुद्ध आया तो उनको कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। अमेरिका में होनेवाला मध्यावधि चुनाव ये तय करता है कि वहां की संसद (कांग्रेस) में किसको कितनी सीटें मिलेंगी। इस कारण वैश्विक चर्चा है कि अमेरिका के मध्यावधि चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी का कांग्रेस पर दबदबा रहेगा या फिर डेमोक्रैट्स का कब्जा होगा। अगर ट्रंप की पार्टी का कांग्रेस में बहुमत नहीं होता है तो संसदीय समितियों के माध्यम से ट्रंप प्रशासन के फैसलों की समीक्षा आरंभ हो जाएगी। अगर रिपब्लिकन को मध्यावधि चुनाव में जीत नहीं मिलती है तो उसको ट्रंप के काम काज पर जनता का निर्णय माना जा सकता है। नैरेटिव की लड़ाई में राष्ट्रपति ट्रंप कमजोर पड़ सकते हैं और डेमोक्रैट्स ये माहौल बनाने का प्रयास करेंगे कि जनता राष्ट्रपति ट्रंप की नीतियों से खुश नहीं है। संभव है कि इसका असर 2028 में होनेवाले राष्ट्रपति चुनाव पर पड़े। 

अमेरिका के मध्यावधि चुनाव में कई सारे मुद्दे हैं। मतदान के दो दिन पहले ट्रंप के समर्थक अरबपति उदयोगपति एलन मस्क ने अपने एक बयान से कई प्रकार की चर्चा को जन्म दे दिया। एलन मस्क ने एक्स पर पोस्ट किया कि डेमोक्रैट्स अमेरिका में जीते तो अमेरिका का खेल ही खत्म हो सकता है। मस्क का मानना है कि अगर डेमोक्रैट्स 2028 के चुनाव में प्रतिनिधि सभा, सीनेट और राष्ट्रपति पद पर जीत जाते है तो अमेरिका की व्यवस्था में भारी परिवर्तन हो सकता है। उनका दावा है कि सत्ता में आने पर डेमोक्रैट्स वाशिंगटन डीसी और प्यूर्टो रिको को राज्य का दर्जा दे सकते हैं ताकि सीनेट में उनकी संख्या बढ़ सके। इसके अलावा अवैध प्रवासियों को मान्यता देने जैसे कदम भी उठा सकते हैं। इसका लाभ ये हो सकता है कि उनको स्थायी मतदाता मिल जाए। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाकर अपने पक्ष में कर सकते हैं। एलन मस्क यहां तक कह जाते हैं कि रिपब्लिकन की हार का मतलब होगा अमेरिका में एक दलीय व्यवस्था की ओर बढ़ना जिससे कि लोकतंत्र का अर्थ ही समाप्त हो जाएगा। हमें इसपर विचार करना होगा कि एलन मस्क ऐसा क्यों कह रहे हैं। मेक अमेरिका ग्रेट अगेन (मागा) जैसे नारे के पीछे एलन मस्क की सहमति मानी जाती रही है। वो डेमोक्रैट्स को विभाजन और नफरत की पार्टी मानते हैं। वो लेफ्ट के विरोधी हैं और कहते रहे हैं कि लेफ्ट के जीतने से अमेरिका बर्बाद हो जाएगा। ऐसे में अगर ट्रंप की पार्टी हारती है तो एलन भी कमजोर हो सकते हैं। एलन मस्क के पास अकूत संपत्ति है और डेमोत्रैट्स को उनका समर्थन बहुत मायने रखता है। अमेरिका विशेषकर रिपब्लकिन की राजनीति में एनल इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं कि वो राजनीतिक चंदे के रूप में एक बड़ी राशि डेमोकैट्स को देते हैं। दूसरी तरफ जार्ज सोरोस और अन्य धनवान समर्थक हैं। अमेरिकी मीडिया के अनुसार एलन मस्क अबतक चुनाव में करीब 3700 करोड़ रुपए खर्च कर चुके हैं या चंदा के रूप में अपनी पसंदीदा पार्टी को दे चुके हैं। इतनी बड़ी धनराशि देनेवाला व्यक्ति अगर कुछ कहता है तो राजनीति उसपर विचार अवश्य करती है। 

एलन मस्क के उक्त बयान के पहले अमेरिका का मध्यावधि चुनाव मुख्य रूप से ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के फैसलों, नागरिकों के जीवनयापन पर बढ़ते खर्च, अप्रवासी नीतियों, स्वास्थ्य सेवा, तकनीकी कंपनियों का समाज पर बढ़ते प्रभाव आदि पर केंद्रित था। चर्चा ट्रंप के निर्णयों पर होती थी। पिछले महीने के मध्य में ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग करीब 31 प्रतिशत रही थी। उसके बाद से चर्चा का बाजार गर्म हो रहा था। मुद्दों पर चर्चा करने से पहले हमें ये समझ लेना चाहिए कि अमेरिका के मध्यावधि चुनाव होते कैसे हैं। अमेरिका में शासन व्यवस्था के तीन प्रमुख अंग हैं। पहला कांग्रेस (संसद) जिसमें हाउस आफ रिप्रजेंटेटिव और सीनेट दो सदन होते हैं। ये दोनों सदन मिलकर संघीय कानून बनाते हैं। दूसरा राष्ट्रपति और तीसरा सुप्रीम कोर्ट। अमेरिकी व्यवस्था में इन तीनों शाखाओं की संरचना इस तरह से की गई है कि कोई भी एक अंग अराजक नहीं हो सके। अब मध्यावधि चुनाव को समझने के लिए हाउस आफ रिप्रजेंटेटिव और सीनेट की संरचना को समझना होगा। हाउस आफ रिप्रजेंटेटिव में 435 सदस्य होते हैं जो दो वर्षों के लिए चुने जाते हैं। किस राज्य से कितने सदस्य हाउस आफ रिप्रजेंटेटिव में होंगे ये उनकी जनसंख्या के आधार पर तय होता है। इसी तरह से सीनेट में कुछ 100 सदस्य होते हैं। प्रत्येक राज्य से दो सदस्य। इनका कार्यकाल छह वर्षों का होता है लेकिन एक तिहाई सदस्यों का चुनाव हर दो वर्ष पर होता है। 

2026 के मध्यावधि चुनाव में मोटे तौर पर तीन तरह की संभावना बनती है। पहली ये कि रिपब्लिकन का दोनों सदनों में बहुमत हो जाए। ट्रंप के लिए ये आदर्श स्थिति होगी क्योंकि अगर ऐसा होता है तो वो अपने एजेंडे को बिना किसी बाधा के आगे बढ़ा सकेंगे। दूसरी स्थिति ये हो सकती है कि डेमोक्रैट्स का हाउस आफ रिप्रजेंटेटिव में बहुमत हो लेकिन रिपब्लिकन सीनेट में बहुमत में रहें। इस स्थिति में हाउस आफ रिप्रजेंटेटिव किसी मसले की जांच कर सकती है, सुनवाई कर सकती है और राष्ट्रपति के फैसलों को चुनौती दे सकती है। सीनेट में बहुमत नहीं होने से कानून पास करना कठिन होगा। तीसरी स्थिति ये हो सकती है कि डेमोक्रैट्स को दोनों सदनों में बहुमत मिल जाए। इस स्थिति में राष्ट्रपति ट्रंप के लिए विधायी बाधाएं चुनौती बनकर खड़ी रहेंगी। उनको अपने निर्णयों को क्रियान्वयित करने में देरी हो सकती है। एक अन्य मुद्दा तकनीकी कंपनों का बढ़ता वर्चस्व भी चर्चा में हैं। बड़ी तकनीकी कंपनियां, डाटा सेंटर और एआई को लेकर वहां चुनावी बहस छिड़ी हुई है। बड़े डाटा सेंटर में बड़े बड़े सर्वर लगे हैं जो सूचनाओं को संचित करते हैं, उसको प्रोसेस करते हैं और क्लाउट कंप्यूटिंग और आनलाइन प्लेटफार्म्स को सेवाएं देते हैं। एआई के बढ़ते चलन के कारण बड़े डाटा सेंटर्स की मांग बढ़ रही है। इन डाटा सेंटर्स को लेकर चिंता भी बढ़ रही हैं। इनको चलाने के लिए बिजली की मांग में बेतहाशा वृद्धि हो सकती है। बिजली के अलावा इन डाटा सेंटर्स के तापमान को नियंत्रित रखने के लिए बड़ी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। इसका पर्यावरण पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है। 


दैनंदिन जीवन में तकनीक का प्रभाव बढ़ रहा है। व्यक्तिगत आदतों से लेकर रुचियां तक उन कंपनियों को मालूम पड़ जा रही हैं। इसका उपयोग राजनीतिक कैंपेन से लेकर कसेंट बनाने तक में किया जा रहा है। इसको लेकर भी अमेरिकी वोटर सशंकित हैं। तकनीक के बढ़ते चलन के साथ साथ चुनाव में बड़ी मात्रा में धन के खर्च होने पर भी चिंता जताई जा रही है। कुल मिलाकर पूरी दुनिया की निगाहें अमेरिका के मध्यावधि चुनाव के परिणाम पर टिकी हैं। मध्यावधि चुनाव के परिणाम से वैश्विक परिजृष्य पर भी फर्क पड़ेगा विशेषकर युद्ध वाले क्षेत्रों पर। 


Saturday, October 24, 2026

दक्षिणपंथी फिल्मकारों के सामने चुनौतियां


फिल्म निर्देशक मधुर भंडारकर ने डा श्यामा प्रशाद मुखर्जी पर फिल्म बनाने की घोषणा की है। फिल्म का नाम होगा- श्यामा द मिसिंग चैप्टर। फिल्म की घोषणा के समय बताया गया कि इसमें डा श्यामा प्रसाद मुखर्जी के राजनीतिक संघर्ष, वैचारिक प्रतिबद्धता और राष्टीय एकता के लिए उनके आंदोलनों को प्रमुखता से दिखाया जाएगा। कलकत्ता विश्विद्यालय के सबसे युवा कुलपति बनने से लेकर स्वतंत्र भारत के पहले मंत्रिमंडल के सदस्य होने तक डा मुखर्जी की संघर्ष यात्रा में भी कई दिलचस्प मोड़ हैं। स्वाधीन भारत में जब प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से उनका मतभेद हुआ तो वो मंत्रिमंडल छोड़ कर बाहर निकल गए। कश्मीर में अनुच्छेद 370 की समाप्ति के लिए बड़ा आंदोलन किया। उस आंदोलन में ही उनका बलिदान हुआ। इन सब महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं को इस फिल्म में समेटने की बात की जा रही है। अभी सिर्फ फिल्म की घोषणा की गई है, इसके शूटिंग शेड्यूल, स्टारकास्ट आदि के बारे में नहीं बताया गया है। दो वर्षॉ पहले वीर सावरकर पर रणदीप हुड्डा ने एक फिल्म बनाई थी। फिल्म का नाम था स्वातंत्र्यवीर सावरकर। रणदीप हुड्डा ने इस फिल्म को लेकर खूब मेहनत की थी। लेकिन फिल्म को अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी। जब फिल्म प्रदर्शित हुई थी तब चर्चा हुई कि अगर फिल्म की अवधि थोड़ी कम होती तो दर्शकों को अधिक पसंद आती। तीन घंटे की फिल्म थी। उस समय भी इस बात की भी चर्चा हुई थी कि जब देश के नायकों या राइट विंग के विषयों पर दक्षिणपंथी माने जानेवाले फिल्मकार फिल्में बनाते हैं तो उनमें से अधिकतर व्यावसायिक रूप से सफल क्यों नहीं हो पाते हैं। 

राइट विंगर फिल्मकारों की असफलता पर बात करने के पहले तीन फिल्मों के बारे मं जान लेते हैं। 2019 में एक फिल्म आई थी पीएम नरेन्द्र मोदी। इस फिल्म में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भूमिका विवेक ओबराय ने निभाई थी। निर्देशक थे उमंग कुमार। फिल्म नहीं चल पाई। एक और फिल्म आई जो पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पर केंद्रित थी जिसका नाम था मैं अटल हूं। इसमें अटल बिहारी वाजपेयी की भूमिका पंकज त्रिपाठी ने की थी। ना तो विवेक ओबराय पीएम नरेन्द्र मोदी के व्यक्तित्व के साथ न्याय कर पाए और ना ही पंकज त्रिपाठी अपनी अदाओं से अटल जी के करीब पहुंच पाए। पूरी फिल्म में वो पंकज त्रिपाठी ही बने रहे। इसके अलावा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर भी एक फिल्म आई जिसका नाम था अजेय, द अनटोल्ड स्टोरी आप ए योगी। ये फिल्म भी नहीं चल पाई। ये शांतनु गुप्ता की पुस्तक द मंक हू बिकेम द चीफ मिनिस्टर पर आधारित थी। इस तरह की कई फिल्में बनीं पर द कश्मीर फाइल्स और द केरला स्टोरी को छोड़कर कम ही फिल्मों को सफलता मिल पाई। दूसरी तरफ अगर हम देखें तो संजय दत्त जैसे चरित्र पर बनी फिल्म संजू कई सौ करोड़ का बिजनेस करती है। संजय दत्त के व्यक्तित्व में बहुत सारी नकारात्मक बातें हैं फिर भी जब उनको फिल्मी पर्दे पर पेश किया जाता है तो दर्शकों को पसंद आती है। निर्देशक राजू हिरानी ने कथा को बहुत ही रोचक तरीके से पिरोया था।

राइट विंग के फिल्मकारों की फिल्मों की असफलता के कारणों पर विचार करें तो सबसे पहली बात जो सामने आती है वो ये कि इनकी फिल्मों का बजट बहुत कम होता है। इंटरनेट मीडिया पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर बनी फिल्म का बजट 8 करोड़ रु था। अटल बिहारी वाजपेयी पर बनी फिल्म का बजट 20 करोड़ रु और योगी आदित्यनाथ पर बनी फिल्म का बजट 15 करोड़ था। वहीं 2018 में प्रदर्शित फिल्म संजू का बजट 100 करोड़ के करीब था। बजट कम होने के कारण फिल्मों में जो भव्यता और बड़े स्टार की उपस्थिति होनी चाहिए वो नहीं हो पाती है। राइट विंग के फिल्मकारों के साथ या राइट विंग के विषयों पर फिल्म करने से अभी हिंदी फिल्मों के बड़े स्टार हिचकते हैं। हिचकते क्या हैं बल्कि कोई न कोई बहाना बनाकर मना कर देते हैं। पता नहीं क्यों उनको किस बात का भय सताता है कि वो अब भी लेफ्ट के खेमे के निकट ही दिखना चाहते हैं। हिंदी फिल्मों में लंबे समय से एक इकोसिस्टम काम करता है जो राइट विंग के विषयों या उनके नायकों पर फिल्म बनाने से कतराता है। एक तो बजट की कमी दूसरे सितारों का नहीं मिलना कारण बनता है कि कोई स्टूडियो फिल्म को रिलीज करने के लिए आगे नहीं आता है। उनको इस बात की आश्वस्ति नहीं होती कि फिल्म में  सफल हो पाएगी और वो इपने निवेश पर मुनाफा कमा पाएंगे। संजू फिल्म की सफलता का एक बड़ा कारण उसमें रणवीर कपूर, अनुष्का शर्मा, विकी कौशल, परेश रावल का होना भी था। एक और कारण जो समझ आता है वो ये कि फिल्मों को दर्शकों को ध्यान में रखकर बनाना चाहिए ना कि जिनके इर्दगिर्द फिल्म बना रहे हैं उनको ध्यान में रखते हुए। फिल्मकार का दायित्व दर्शकों के प्रति होता है। सिनेमा में सिनेमा का तत्वों का होना बहुत आवश्यक है। फिल्म बनाने के पीछे अगर कोई उद्देश्य है भी तो उसको प्रत्यक्ष नहीं करना चाहिए बल्कि परोक्ष रूप से दर्शकों के सामने जाना चाहिए। जैसे संजू फिल्म के माध्यम से संजय दत्त की नकारात्मक छवि को बेहतर करना था। पर वो फिल्मों में दिखाए प्रसंगों के माध्यम से आया, प्रत्यक्ष संवाद से नहीं। राइट विंग फिल्मकार जब नेताओं को केंद्र में रखकर फिल्में बनाते हैं तो उनके व्यक्तित्व पर पर्याप्त शोध नहीं करते। व्यक्तित्व के उन हिस्सों तक नहीं पहुंच पाते हैं जो अज्ञात या कम ज्ञात हो। उनको अपने रिसर्च का स्तर बढ़ाना होगा। फिल्म बनाने में समय लगाना होगा। ये सब तभी संभव होगा जब बजट हो। 

एक और बात जो फिल्मों को प्रभावित करती है वो है समीक्षकों और पीआर का ईकोसिस्टम। फिल्म प्रदर्शित होने के पहले जिस तरह का माहौल बनाया जाता है उसमें इस ईकोसिस्टम का बड़ा हाथ होता है। उस ईकोसिस्टम में अभी भी राइट विंग का प्रभाव नहीं बन पाया है। जबकि लेफ्ट और उससे समानुभूति रखनेवाले लोग खुलकर ना केवल अपने लोगों का समर्थन करते हैं बल्कि अन्य वैचारिक पृष्ठभूमि वाले फिल्मकारों का खुला विरोध भी करते हैं। मुझे याद पड़ता है कि जब डा चंद्रप्रकाश द्विवेदी की फिल्म पिंजर रिलीज हुई थी तो उसकी समीक्षा एम एस सथ्यू ने लिखी थी। एम एस सथ्यू ने गरम हवा फिल्म बनाई थी। वो समीक्षक नहीं थे लेकिन चंद्रप्रकाश द्विवेदी की फिल्म पर लिखा, उसकी कमियां गिनाईं। उसके बाद सथ्यू ने फिर किसी फिल्म की समीक्षा लिखी हो ध्यान नहीं आता। कुल मिलाकर अगर हम फिल्मों के परिदृश्य को देखें तो वहां राइट विंग के विषयों पर बननेवाली फिल्मों के सामने चुनौतियां बहुत अधिक हैं। पता नहीं श्यामा प्रसाद मुखर्जी पर बनने वाली फिल्म के लिए मधुर भंडारकर का बजट कितना है। वो इसको किस भव्यता से बनाना चाहते हैं। श्यामा प्रसाद मुखर्जी की भूमिका कौन सा अभिनेता निभाएगा। ये सब ऐसे प्रस्न हैं जो अब भी राइट विंगर हिंदी फिल्मकारों के सामने मुंह बाए खड़े हैं।  


संस्कार की धरा पर विराट संस्कृति


दुर्गा पूजा और पंडाल कोलकाता की उत्सवी संस्कृति का वो हिस्सा है जिसको हर भारतीय को एक बार महसूस करना चाहिए। नवरात्र के दौरान कोलकाता में देवी दुर्गा के आगमन से लेकर प्रस्थान तक का उत्सव भारतीय संस्कृति के उस आयाम को उद्घाटित करता है जहां संस्कार हैं, मर्यादा है, नवाचार है ,सहयोग से समन्वय का सोच है। देवी दुर्गा की मूर्ति से लेकर पंडाल तक में प्रयोगधर्मिता है। ऐसी प्रयोगधर्मिता जो जन के मन से जुड़कर उनके संस्कार को झंकृत करता है। इस वर्ष तो इनके साथ परिवर्तन भी जुड़ा है। कोलकाता के दुर्गा पूजोत्सव में प्रयोगधर्मिता पंडाल के डिजायन से लेकर मां की प्रतिमा निर्मित तक में दिख रही है। परंतु प्रयोग के नाम पर संस्कार को किसी भी प्रकार से खंडित नहीं किया जाता है। महिषासुर मर्दिनी की प्रतिमा में पौराणिक आख्यानों में वर्णित सारे प्रतिमान दिखेंगे। महिषासुर वध भी होगा, माता की भुजाओं में अस्त्र और कमल का फूल होगा लेकिन किसी प्रतिमा में वो एक भुजा में गणेश को उठाए भी होंगी। उनके पांवों के नीचे महिषासुर होगा ही। 

कहना ना होगा कि ये प्रयोगधर्मिता सनातन के संस्कारों से निर्मित होती है। जो इस वर्ष कोलकाता के पंडालों में दिख रही है। कहीं वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने की थीम, तहीं राम की अयोध्या, कहीं महाभारत तो कहीं देवी दुर्गा की ब्रहंमांडीय शक्ति को बताती विश्वरूपा-विश्वरूपिणी का विराट स्वरूप।कोलकाता में दुर्गा पूजा के अवसर पर नवरात्र में विशेषकर पांच दिनों तक पूरा शहर भक्ति में सराबोर होता है लेकिन किसी भी पंडाल में आपको कानफोड़ू संगीत का शोर नहीं सुनाई देगा। डीजे पर बजनेवाले फिल्मी संगीत भी अनुपस्थित। इन पांच दिनों के दौरान जो संस्कृति आकार लेती है उसमें ढाक के स्वर, रवीन्द्र संगीत की कर्णप्रिय धुनें और देवी मां की प्रतिमा के आगे ढाक की धुन पर धुनुची नृत्य करती महिलाएं। ये नृत्य मां दुर्गा के भक्तों में उल्लास भरता है। पंडाल और उसके आसपास खाने पीने की वस्तुएं बिकती हैं। इन स्टाल्स में विशेष प्रकार की सुरुचिसंपन्नता दिखती है। दुर्गा जी की प्रतिमा लगभग सभी मुहल्ले में स्थापित होती है लेकिन कहीं कोई शोर नहीं। कहीं कोई अफरातफरी नहीं। आत्मनियंत्रण और एक दूसरे के साथ सहयोग करते लोग। पांडालों के बीच कोई द्ववंद्व नहीं बल्कि संयोग और सहयोग का समन्वय दिखता है जो बंगाल की इस संस्कृतिक विरासत की एक अमिट छाप छोड़ता है। इस बार कोलकाता के विभिन्न दुर्गा पंडालों में सनातनी संस्कृति को लेकर एक विशेष आकर्षण दिखता है। जिस भूमि पर जयश्रीराम कहने पर सत्ताधारियों की भृकुटि तन जाती थी वहां अब पंडालों के बाहर राम-राम लिखा है। छत्तीसगढ़ के रामनामी समुदाय के लोग भजन गा रहे हैं। परिवर्तन ने बंगाल में सनातन के सातत्य को बल प्रदान किया।  

Saturday, October 17, 2026

संवाद ने उतारा सोच की मुखौटा


नायक कहता है, मिस शीतल साहनी, मैं एक बात आपको भी कहना चाहूंगा। लड़कियों को छेड़नेवाले ऐसे थर्ड क्लास गुंडों को पकड़ना और उन्हें सबक सिखाना हमारा फर्ज है और वो हम करते हैं। पर कुछ फर्ज लड़कियों का भी है। नायिका पूछती है, क्या फर्ज है मैं समझी नहीं। जरा देखिए अपने आप को, इस तरह के कपड़े पहनकर अगर आप बाहर सड़क पर निकलेंगी तो गुंडों की सीटियां नहीं बजेंगी तो क्या मंदिर की घंटियां बजेंगी। उत्तर मिलता है, क्या खराबी हैं इन कपड़ों में। कहा जाता है कि बहुत कम हैं। सुना था एक जमाने में लड़कियों को कपड़ों का बहुत शौक हुआ करता था ये आजकल आप लोग कपड़ों के मामले में कंजूस क्यों होती जा रही हैं। नायिका का उत्तर मैं क्या पहनती हूं ये मेरा पर्सनल मामला है। नायक प्रतिवाद करते हुए कहता है कि ये तो उसी तरह की बात हुई कि वो लोफर कहे कि सीटी बजाना मेरा पर्सनल काम है। हर वो काम जिससे दूसरों को परेशानी हो पर्सनल नहीं हो सकता। लड़की पूछती है कि मेरे इस लिबास से दूसरों को क्या परेशानी हो सकती है। जवाब- ये तो उस लोफर से पूछना पड़ेगा जिसने आपको देखकर सीटी बजाई। बहरहाल आप एक शरीफ घराने की शरीफ लड़की हैं और अगर थोड़े से शरीफाना कपड़े पहने लें तो किसी को कोई दिक्कत नहीं होगी। ये संवाद है आज से 46 वर्ष पूर्व की फिल्म दोस्ताना का। 

फिल्म दोस्ताना के लेखक हैं सलीम- जावेद यानि सलीम खान और जावेद अख्तर। हिंदी फिल्मों की सफल लेखक जोड़ी। जावेद अख्तर स्वयं को तरक्कीपसंद लेखक के तौर पर पेश करते रहे हैं। उनकी प्रगतिशील सोच का उदाहरण है दोस्ताना का ये संवाद। ऐसा भी नहीं है कि उक्त लंबा संवाद कहानी की मांग हो। कहानी तो लगभग यहीं से आरंभ ही होती है। नायिका जीनत अमान बहुत कम कपड़ों में जा रही होती और पेंटल उनको छेड़ता है। जीनत अमान उसको पकड़कर थाने ले आती है। पुलिस उसको हवालात में बंद कर देती है। उसके बाद इंस्पेक्टर की भूमिका निभा रहे अमिताभ बच्चन नायिका को कम कपड़ों पहनने को लेकर ज्ञान उड़ेलने लगते हैं। अमिताभ तो वही संवाद बोलते हैं जो लेखक ने लिखा होगा। जावेद अख्तर और सलीम खान की जोड़ी के बारे में कहा जाता है कि सलीम खान कहानी लिखते थे, उसको रोमांचक मोड़ देनेवाले प्रसंग जोड़ते थे और जावेद अख्तर संवाद लिखते थे। अब दोस्ताना के उपरोक्त संवाद से लेखक द्वय की महिलाओं और उसके कपड़ों को लेकर सोच उजागर होता है। माना जाता है कि कोई भी लेखक दो चीजों से प्रभावित होता है। एक तो उसका परिवेश और दूसरा उसका नजरिया। आज से 46 वर्ष पूर्व के परिवेश का तो अनुमान लगाया जा सकता है लेकिन महिलाओं के कम कपड़ों को लेकर जावेद अख्तर और सलीम खान के नजरिए का पता या संकेत तो उक्त संवाद से मिलता ही है। आज जावेद अख्तर नैतिकता की मीनार पर खड़े होकर चाहे जितनी बड़ी-बड़ी बातें कर लें लेकिन उनकी लिखी फिल्में, उसके संवाद चीख चीख कर उनकी असलियत बताते चलते हैं। ये तो इन लेखकों की सौभाग्य है कि हिन्दुस्तान में फिल्मों को लेकर गंभीर अध्ययन कम होता है, अन्यथा इस तरह के लेखन करनेवाले लेखकों को महान तो नहीं ही माना जाता। उनके लिखे संवाद आदि पर तुलनात्मक अध्ययन होता। फिल्मों के दृष्य और संवाद के साथ साथ गीतों पर भी समग्रता में विचार होता। इस वैचारिकक मंथन से क्या निकलता इसका अनुमान पाठक लगा सकते हैं। 

बात सिर्फ महिलाओं के कम कपड़ों पर उपदेश की नहीं है। उस पूरे संवाद में एक पंक्ति में जिस तरह से मंदिर की घंटी की बात की गई है वो भी लेखकों के सोच का परिचायक है। इस वाक्य को एक बार फिर से देखा जाना चाहिए जहां लेखक एक पुरुष पात्र के मुंह से कहलवाता है कि इस तरह के कपड़े पहनकर अगर आप बाहर सड़क पर निकलेंगी तो गुंडों की सीटियां नहीं बजेंगी तो क्या मंदिर की घंटियां बजेंगी। लेखक को गुंड़ों की सीटियां के सामने मंदिर की घंटियां नजर आई थी। मंदिर की घंटी और गुंडे की सीटी में तुलना का क्या औचित्य। औचित्य को अगर छोड़ भी दिया जाए तो इस तुलना की उपयुक्तता पर विचार किया जाना चाहिए।  जावेद अख्तर के लेखन में हिंदू धर्म प्रतीकों को लेकर इस तरह की हल्की टिप्पणियां पहले भी रेखांकित की जा सकती हैं। इसलिए इस संवाद को लेकर किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। लेकिन दर्शकों को पता तो होना चाहिए कि प्रगतिशीलता का दावा करनेवाले लेखक की असलियत क्या है। महिलाओं और धार्मिक प्रतीकों के बारे में वो क्या सोचता है। जावेद अख्तर बहुधा व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बातें करते हुए नजर आते हैं। जब वो मंच से इस तरह की जुमलेबाजी करते हैं तो खूब तालियां बजती हैं। इस तरह की बातों रीलों पर लाइक्स भी बटोरते हैं। साहित्यिक मंचों पर इस तरह की बातें कर गंभीर लेखक और कवि होने का दावा पेश करते हैं पर उनके लिखे फिल्मी संवाद उनके सोच को सामने रख देते हैं। यह नहीं कहा जा सकता है कि फिल्मों की कहानी में तो फार्मूला और सफलता को ध्यान में रखकर लिखी जाती है। लिखी जाती होगी लेकिन लेखक के विचार तो उसमें आते ही हैं। ये सिर्फ जावेद अख्तर के साथ नहीं होता है बल्कि फिल्मों के सभी लेखकों के लेखन को देखने पर यही पता चलता है। अपने लेखन में लेखक वैचारिक छौंक लगाता ही है। 

जावेद अख्तर खुद को नास्तिक भी घोषित करते रहे हैं। अपनी इस छवि को बल प्रदान करने के लिए मंचों पर इस्लाम को लेकर भी कटु बातें कह जाते हैं। लेकिन वो बातें इस्लामिक समाज की कुरीतियों तक ही होती हैं। किसी मंच या फिल्मी संवाद में उन्होंने इस्लाम से संबंधित किसी उपमा का, किसी प्रतीक का उपहास किया हो ऐसा दिखाई नहीं देता है। जब उनसे कभी किसी मंच पर कोई व्यक्ति इससे संबंधित प्रश्न पूछ लेता है तो वो इसको बहुत चतुराई के साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़ देते हैं। इमोशनल होकर ये पूछने लग जाते हैं कि क्या आप अपने मुल्क को सीरिया बनाना चाहते हैं। दर्शकों को लगता है कि देखो कितनी अच्छी बातें कर रहा है। फिर कुछ और मजेदार बातें, क्रोधित होने का अभिनय और जनता की तालियां। लेकिन इन तालियों से ना तो मूल प्रश्न का उत्तर मिलता है और ना ही जावेद अख्तर के लेखन से उपजे विचार की तार्किकता सिद्ध होती है। जावेद अख्तर की ये कैसी नास्तिकता है जो उनको सिर्फ हिंदू धर्म प्रतीकों का उपहास करने की अनुमति देता है। क्या हिंदुओं की सहनशीलता और सहिष्णुता उनको इस तरह की उपहासजनक टिप्पणियां करने का साहस देता है। ये उनकी कैसी प्रगतिशीलता है जो लड़कियों के कम कपड़ों पर टिप्पणियां करवाता है। आज कुछ राजनीतिक दल देश में स्मैश द पैट्रियार्की का ना बुलंद करते हैं, मनुस्मृति को प्रश्नों के कठघरे में खड़ा करते हैं। करिए, लेकिन जावेद अख्तर जैसे लेखकों के सोच को और उस तरह के लेखन तो भी रेखांकित कर प्रश्नांकित करने की आवश्यकता है।  


Wednesday, October 14, 2026

दिल्लगी ने दी हवा


गोवा में आयोजित होनेवाले भारतीय अंतराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में कुछ वर्षों पूर्व एक सत्र के दौरान करण जौहर ने कहा था कि पहले फिल्मों में दो-तीन प्रकार की कहानियां ही दर्शकों को पसंद आती थीं। अगर मुझे ठीक याद आ रहा है तो करण ने कहा था कि एक तो खोया पाया का फार्मूला और दूसरा प्रेम त्रिकोण वाली कहानी को दर्शक खूब पसंद करते हैं। करण जौहर के उस वक्तव्य के बाद वहां उपस्थित फिल्म इतिहासकारों से इसपर चर्चा भी हुई थी। उस चर्चा में फिल्म दोस्ताना नहीं आई थी। फिल्म दोस्ताना करण जौहर के पिता यश जौहर की फिल्म है। इस फिल्म की कहनी भी प्रेम त्रिकोण ही है। विजय (अमिताभ बच्चन) और रवि (शत्रुघ्न सिन्हा) दो दोस्त हैं जिनको शीतल (जीनत अमान) से प्यार हो जाता है। रवि बिंदास अंदाज में शीतल से प्यार की पींगे बढ़ाता है वहीं रवि खामोश मोहब्बत करता है। शीतल रवि को दोस्त समझती है। उसको भी रवि के प्यार का अनुमान नहीं है। रोचक तरीके से कहानी कई दिलचस्प मोड़ लेती हुआ आगे बढ़ती है। रवि और विजय दोस्त से दुश्मन बन जाते हैं। कहानी के एक नाटकीय मोड़ से रवि को विजय की उसके प्रति भावना का पता चलता है। वो बेचैन हो जाता है। इस फिल्म को राज खोसला ने निर्देशित किया था। राज खोसला अपने जमाने के बेहतरीन निर्देशकों में गिने जाते थे। उन्होंने सलीम-जावेद की दोस्ताना की कहानी का ट्रीटमंट ऐसा किया कि दर्शकों को फिल्म भा गई। जो कहानी कई बार कही जा चुकी थी उसको दर्शकों का खूब प्यार मिला। 1980 में रिलीज हिट फिल्मों में दोस्ताना भी शामिल है। 

फिल्म दोस्ताना के बनने की कहानी भी दिलचस्प है। राज खोसला ने मराठी उपन्यास आशी तुझी प्रीत पर आधारित एक हिंदी फिल्म निर्देशित की थी जिसका नाम था ‘मैं तुलसी तेरे आंगन की’। इस फिल्म के बाद राज खोसला की शराब से ऐसी दोस्ती हुई कि वो कहने लगे थे कि अब फिल्म नहीं बस स्काच के साथ जिंदगी बिताई जाएगी। ये वही दौर था जब यश जौहर फिल्मों की पब्लिसिटी और प्रबंधन से मुक्त होकर फिल्म बनाना चाह रहे थे। वो राज खोसला के पास पहुंचे और उनसे फिल्म निर्देशित करने का अनुरोध किया। पहले तो राज खोसला ने मना कर दिया लेकिन यश जौहर ने हार नहीं मानी। उनके पास सलीम-जावेद की कहानी थी। सलीम जावेद का हिंदी फिल्मों में डंका बज रहा था। एक दिन यश जौहर ने राज खोसला से आग्रह किया कि वो कहानी सुन लें। खोसला ने जब कहानी सुनी तो हां कर दी। अब कास्टिंग की बात आरंभ हुई। अमिताभ को राज खोसला ने एक फिल्म में डायरेक्ट किया था। वो तय ही थे। जीनत अमान और विनोद खन्ना भी फाइनल किए गए। राज खोसला और विनोद खन्ना ने कई फिल्में साथ की थीं। दोनों में बहुत अच्छी दोस्ती थी। फिल्म दोस्ताना की रिलीज के दो साल पहले मुकद्दर का सिकंदर रिलीज हुई थी। उस फिल्म में अमिताभ बच्चन और विनोद खन्ना दोनों की दमदार उपस्थिति थी। विनोद खन्ना अपेक्षाकृत अधिक खूबसूरत थे। सब तय हो गया था। कहानी में राज खोसला ने कुछ बदलाव बताए जिसको सलीम-जावेद ने स्वीकार कर लिया था। स्टारकास्ट भी फाइनल ही था। अचानक एक दिन राज खोसला ने कहा कि विनोद खन्ना को दोस्ताना में लेना ठीक नहीं होगा। जब उनसे कारण पूछा गया तो बोले कि नायिका विनोद खन्ना जैसे खूबसूरत हीरो को छोड़कर अमिताभ बच्चन के साथ क्यों जाएगी। यहीं से फिल्म में शत्रुघ्न सिन्हा के चयन का रास्ता साफ हुआ। 

1980 में रिलीज हुई फिल्म दोस्ताना को उसके गानों के लिए भी याद किया जाता है। सलीम खान कहते भी हैं कि राज कपूर के बाद राज खोसला को ही कहानी और उसमें संगीत के उपयोग की शानदार समझ थी। जिस तरह से राज कपूर संगीत को समझ कर अपनी फिल्मों में उसका उपयोग करते थे उसी तरह से राज खोसला भी अपनी फिल्मों को संगीत से बढ़ाते थे। इस गाने को याद करिए- मेरे दोस्त किस्सा ये क्या हो गया, सुना है कि तू बेवफा हो गया। आनंद बक्षी के इस गीत को मोहम्मद रफी की आवाज ने अमर कर दिया। फिल्म में कहानी के जिस मोड़ पर इस गाने का उपयोग राज खोसला ने किया वो बेहतरीन है। इसी तरह से फिल्म का आरंभ भी एक गीत से ही होता है जिसको मोहम्मद रफी और किशोर कुमार ने आवाज दी है। आनंद बक्षी ने लिखा और लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने संगीत दिया । गाने के बोल हैं- सलामत रहे दोस्ताना हमारा। मोहम्मद रफी और किशोर कुमार के साथ गाए गानों में ये गाना बहुत ही अधिक पसंद किया गया या कह सकते हैं कि अब भी किया जाता है। जब करेण जौहर कह रहे थे कि प्रेम त्रिकोण वाली फिल्में भारतीय दर्शक पसंद करते हैं तो उनके जेहन में अवश्य फिल्म दोस्ताना भी रही होगी क्योंकि बहुत लंबे समय तक धर्मा प्रोडक्शन की सबसे हिट फिल्म दोस्ताना ही थी।