राज्यों में अलग-अलग भाषा के लिए अलग-अलग अकादमियां या भाषा संस्थान कार्य करती हैं। स्वाधीनता के बाद भारतीय भाषाओं को समृद्ध करने के लिए इन अकादमियों या भाषा संस्थानों की स्थापना की गई थी। दैनिक जागरण ने देश के कई राज्यों में इन भाषा अकादमियों और भाषा संस्थानों की स्थितियों की पड़ताल की। लगभग सभी भाषा संस्थान और अकादमियां बदहाल मिलीं। दिल्ली, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान आदि में अकादमियों की स्थिति इतनी खराब है कि प्रतीत होता है कि राज्य सरकारों को और उनकी कला-संस्कृति विभाग के लिए ये अकादमियां महत्वहीन हैं। यह तो कल्पना भी नहीं की जा सकती है कि किसी राज्य की एक भाषा अकादमी में कोई कर्मचारी नहीं है। सिर्फ एक आदेशपाल के भरोसे अकादमी चल रही है। बिहार के मगही अकादमी में ऐसा ही है। वहां कर्मचारियों के 15 स्वीकृत पद हैं लेकिन एक आदेशपाल कार्यरत है। कल्पना कर सकते हैं कि बिहार में मगही अकादमी के माध्यम से राज्य की इस महत्वपूर्ण भाषा का कितना विकास हो रहा होगा। एक अकेला आदेशपाल अपने कंधों पर मगही अकादमी को लेकर इस भाषा को विस्तार भी दे रहा होगा और पहचान भी। यह स्थिति सिर्फ मगही अकादमी की नहीं है बल्कि कला, साहित्य और भाषा से जुड़ी सभी अकादमियों में लगभग ऐसी ही स्थिति है। प्रतीत होता है कि इन संस्थानों और अकादमियों की सुध लेनेवाला कोई नहीं है। किसी भी सरकार को इसकी चिंता नहीं है।
यह हाल तो तब है जब कि 2020 में लागू की गई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में कहा गया है कि ‘भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में उल्लिखित प्रत्येक भाषा के लिए अकादमी स्थापित की जाएगी जिनमें हर भाषा से श्रेष्ठ विद्वान एवं मूल रूप से वह भाषा बोलनेवाले लोग शामिल रहेंगे ताकि नवीन अवधारणाओं का सरल किंतु सटीक शब्द भंडार तय किया जा सके, तथा नियमित रूप से नवीनतम शब्दकोश जारी किया जा सके ( विश्व में अन्य कई भाषाओं के सफल प्रयासों के सदृश)। इन शब्दकोशों के लिए ये अकादमियां एक दूसरे से परामर्श लेंगी, कुछ मामलों में आम जनता के सर्वश्रेष्ठ सुझावों को भी लेंगी। जब भी संभव हो साझे शब्दों को अंगीकृत करने का प्रयास भी किया जाएगा। ये शब्दकोश व्यापक रूप से प्रसारित किए जाएंगे ताकि शिक्षा, पत्रकारिता लेखन बातचीत आदि में इस्तेमाल किया जा सके। किताब के रूप में और आनलाइन उपलब्ध हो। अनुसूची आठ की भाषों के लिए इन अकादमियों को केंद्र सरकार द्वारा राज्य सरकारों के साथ परामर्श करके अथवा उनके साथ मिलकर स्थापित की जाएगी।‘ राष्ट्रीय शिक्षा नीति सिर्फ आठवीं अनुसूची की भाषाओं की अकादमियों तक नहीं रुकती है। आगे भी शिक्षा नीति में कहा गया है कि ‘इसी प्रकार व्यापक पैमाने पर बोली जानेवाली अन्य भारतीय भाषाओं की अकादमी केंद्र अथवा/और राज्य सरकारों द्वारा स्थापित की जाएंगी।‘
राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लागू हुए पांच वर्ष से अधिक हो गए लेकिन नए अकादमियों की स्थापना तो दूर, जो अकादमियां पहले से चल रही हैं उनकी स्थिति में सुधार के लिए कोई कार्य होता नहीं दिखा। शिक्षा राज्य सरकारों का विषय है। राज्य सरकारों के स्तर ही इन अकादमियों को सक्रिय किया जाना है। केंद्र सरकार ने तो शिक्षा नीति के साथ इन अकादमियों को जोड़कर राज्य सरकारों को एक रास्ता दिखाया और बताया कि कैसे इनकी हालत बेहतर की जा सकती है। नई अकादमियों की स्थापना की आवश्यकता ही नहीं पड़ती अगर राज्यों में पहले से स्थापित भाषाई अकादमियों को मरणासन्न नहीं छोड़ दिया गया होता। आवश्यकता इस बात की थी कि इन पुरानी भाषाई अकादमियों को राष्ट्रीय शिक्षा नीति के उद्देश्यों के साथ जोड़ दिया जाता। पर ऐसा किसी भी राज्य सरकार ने किया हो इसकी जानकारी उपलब्ध नहीं हो पाई। तो क्या ये मान लिया जाए कि राज्य सरकारों की रुचि भाषाई अकादमियों की स्थापना करने या पहले से मौजूद भाषाई अकादमियों को पुनर्जीवित करने में नहीं है। इन राज्यों में अकादमियों की स्थिति को देखकर तो ऐसा ही लगता है कि राजनीति कला साहित्य और भाषा का आदर नहीं करती। ना ही उसको संरक्षित और संवर्धित करने में राजनीति की कोई रुचि है। शब्दकोश निर्माण तो बहुत दूर की बात है। जो पुस्तकें पूर्व में प्रकाशित हैं उनका भी नया संस्करण प्रकाशित नहीं हो पा रहा है। दैनिक जागरण की पड़ताल में ये बात निकल कर आई कि इन अकादमियों में इनके सविधान के अनुसार नियुक्तियां भी नहीं हो पा रही हैं। कार्यकारी परिषद आदि का गठन राज्य सरकारें नहीं कर पा रही हैं। इसके कारण कामकाज ठप रहता है। उत्तर प्रदेश में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान एक महत्वपूर्ण भाषा संस्थान हुआ करती थी। इस संस्थान के पदने अध्यक्ष मुख्यमंत्री होते हैं जो इसके कार्यकारी अध्यक्ष आदि की नियुक्ति करते हैं। संस्थान उत्तर प्रदेश के भाषा विभाग से संबद्ध है। अगर ये संस्थान सिर्फ अपने अतीत के गौरव को ही कायम रख पाती तो हिंदी का बहुत भला होता। अफसोस, ऐसा हो न सका।
उत्तर प्रदेश और बिहार में तो भाषाई अकादमियों के अलावा कला और संगीत से जुड़ी अकादमियों का भी बुरा हाल है। उत्तर प्रदेश में संगीत नाटक अकादमी, भारतेन्दु नाट्य अकादमी, ललित कला अकादमी और बिरजू महाराज कथक संस्थान अपने उद्धारक की बाट जोह रहे हैं। गजब संयोग है कि इन चारों संस्थानों में नियमित निदेशक नहीं हैं। परिणाम यह कि कार्य भी प्रभार जैसा ही होता है। जिन सस्थानों पर राज्य के कलाकारों को मंच देने से लेकर युवा कलाकारों की पहचान करने और तराशने का था वो अपने ही अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं। नेतृत्व नहीं होने के कारण ये सिर्फ उतना ही कर पाती हैं जितना इनके जीवित रहने के लिए आवश्यक है। बिहार में भी राज्य संगीत नाटक अकादमी और राज्य ललित कला अकादमी है। इन दोनों अकादमियों का अस्तित्व भी कागजों में ही है। ना तो कर्मचारी हैं और ना ही कोई कार्यक्रम। मध्य प्रदेश और राजस्थान की अकादमियों का हाल भी बेहतर नहीं है। मध्य प्रदेश की पंजाबी साहित्य अकादमी में कोई स्थायी कर्मचारी नहीं है। मध्य प्रदेश की साहित्य अकादमी ने 2023 में पांच वर्ष के पुरस्कार एक साथ वितरित किए। जनजातीय लोककला और बोली विकास अकादमी स्वयं का विकास नहीं कर पा रही है। भारत भवन के बारे में तो कुछ भी कहना व्यर्थ है। दरअसल अगर हम हिंदी भाषी राज्यों में भाषा और कला अकादमियों के कामकाज पर नजर डालें तो एक बात स्पष्ट रूप से सामने आती है कि सरकारें इनको लेकर उदासीन हैं। सरकार की यह उदासीनता भाषा, कला साहित्य के लिए घातक हैं क्योंकि संस्कृति के निर्माण में और पीढ़ियों को संस्कारित करने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका है। राज्य सरकारों की इन अकादमियों की सुध लेनी चाहिए क्योंकि अगर ये इसी तरह से मरणासन्न स्थिति में रहेंगी तो हमारी भाषा, हमारी लोक-कला, हमारी संगीत की समृद्ध विरासत नई पीढ़ी तक कैसे पहुंचेगीं। सिर्फ संस्कृति की बात करने से कार्य सिद्ध नहीं होगा बल्कि संस्कृति के निर्माण करनेवाले अवयवों को बल देना होगा। राज्यों के राजनीति नेतृत्व को, उनके मंत्रियों को कला साहित्य और भाषा के लिए संवेदनशील होना होगा।




