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Saturday, June 20, 2026

सफल राजनय का फार्मूला मोदीनामिक्स


विश्व के सात उन्नत अर्थव्यवस्था वाले देशों के समूह जी 7 की बैठक फ्रांस के शहर एवियन में हुई। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इस सम्मेलन में भाग लेने का समाचार आया तो सबकी निगाहें प्रधानमंत्री मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप की वहां होनेवाली मुलाकात पर टिक गई। सम्मेलन संपन्न हुआ। प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच भेंट हुई। मोदी विरोधियों को उम्मीद थी कि राष्ट्रपति ट्रंप और प्रधानमंत्री मोदी के बीच कुछ ऐसा घटित होगा जिससे कि मोदी को घेरा जा सकेगा। हुआ इसके ठीक विपरीत। प्रधानमंत्री जब सम्मेलन कक्ष में पहुंचे तो राष्ट्रपति ट्रंप अपनी कुर्सी से उठकर उनसे गर्मजोशी से मिले। द्विपक्षीय वार्ता के बाद साझा प्रेस कांफ्रेंस में राष्ट्रपति ट्रंप ने प्रधानमंत्री मोदी की भूरि-भूरि प्रशंसा की। प्रशंसा पर व्यापक चर्चा हो चुकी है इस कारण दुहराने का अर्थ नहीं। राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत में मोदी विरोधियों की आशाओं पर पानी फेर दिया। प्रधानमंत्री मोदी ने ईरान-अमेरिका संघर्ष के दौरान तीन भारतीय नाविकों की मौत का मुद्दा भी राष्ट्रपति ट्रंप के सामने उठाया। मजबूती के साथ अपनी बात रखी। इस पूरी प्रेस कांफ्रेस में प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप बहुत सहज दिखे।

इस प्रेस कांफ्रेंस के बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने एक साक्षात्कार में प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ की। जब उनसे महान नेता की परिभाषा पूछी गई तो उन्होंने कहा प्रधानमंत्री मोदी जो 12 वर्ष से प्रधानमंत्री हैं और बहुत सालिड हैं। वो काम बहुत शांति से करते हैं लेकिन बहुत सख्त हैं। ये मैं बहुत अच्छे से जानता हूं। वो 150 करोड़ आबादी वाले देश के नेता है और निरंतर बने हुए है। जब ट्रंप बार-बार प्रधानमंत्री मोदी के लिए शांत लेकिन सख्त शब्द का प्रयोग कर रहे हैं तो इसका विश्लेषण करना चाहिए। पिछले वर्ष अप्रैल में पहलगाम में पाकिस्तानी आतंकवादियों ने 26 भारतीयों की धर्म पूछकर हत्या की थी। उस आतंकी वारदात के बाद भारत ने पाकिस्तान के आतंकवादी ठिकानों को ध्वस्त करने के लिए आपरेशन सिंदूर आरंभ किया। पाकिस्तान ने भारत पर ही हमला कर दिया जिसका बारतीय सेना ने मुंहतोड़ जबाव दिया। 10 मई को संघर्ष विराम हुआ। तब से कई महीनों तक जब भी राष्ट्रपति ट्रंप को अवसर मिलता वो इस बात को कहते थे कि भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष विराम उन्होंने ही करवाया। इस बात को उन्होंने पचास से अधिक बार दुहराया। जब भी डोनाल्ड ट्रंप ये बात कहते तो यहां विपक्षी दलों के नेता प्रधानमंत्री को घेरने का प्रयत्न करते। उनकी विदेश नीति को लेकर प्रश्न खड़े करने लगते। उसी समय अमेरिका ने एकतरफा टैरिफ बढ़ाने की घोषणा कर दी थी। उस दौर में राष्ट्रपति ट्रंप भारत को लेकर सकारात्मक टिप्पणी नहीं करते थे। एक बार तो उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था के डेड (मृत) होने की बात तक कह डाली थी। उनके बयानों पर यहां मोदी विरोधी सक्रिय हो जाते। ये सिलसिला कई महीनों तक चला। इस बीच प्रधानमंत्री कनाडा के दौरे पर गए थे। उनकी और ट्रंप की फोन पर बातचीत हुई। ट्रंप ने प्रधानमंत्री मोदी से वाशिंगटन होते हुए भारत लौटने का निमंत्रण दिया। राष्ट्रपति ट्रंप के उस अनुरोध को प्रधानमंत्री मोदी ने अपने पूर्व निर्धारित कार्यक्रमों का हवाला देकर टाल दिया था। इसको अंतराष्ट्रीय कूटनीति में एक बड़े कदम के तौर पर देखा गया था। ट्रंप की बयानबाजियों का मोदी ने कोई नोटिस ही नहीं लिया। कोई प्रतिक्रिया ही नहीं दी। मोदी की इस उदासीनता के भाव ने अमेरिका के साथ कूटनीतिक संबंधों को नया आयाम दे दिया।

खाड़ी संकट के दौरान हार्मूज जलडमरूमध्य के बंद होने पर जब कच्चे तेल का संकट हुआ तो भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए रूस से कच्चे तेल का आयात जारी रखा। अमेरिका ने रूस से तेल खरीद पर प्रतिबंध लगाया था पर भारत-रूस संबंध पर उसका असर नहीं पड़ा। अमेरिका ने एकतरफा प्रतिबंध लगाया था और अपनी तरफ से ही एक महीने की छूट दी। वो छूट भी खत्म हो गई लेकिन उसके बारे में फिर कोई बयान नहीं आया। इस वर्ष जून में जिस मात्रा में भारत रूस से कच्चा तेल आयात कर रहा है वो एक नया कीर्तिमान बनने की ओर बढ़ रहा है। शिप ट्रैकिंग डाटा के अनुसार भारत अपनी जरूरतों के 50 प्रतिशत से अधिक तेल रूस से आयात कर रहा है। बिना किसी शोर शराबे के और बयानबाजी के ये काम निर्बाध गति से चलता रहा। ये प्रधानमंत्री मोदी का अपना इकोनामिक्स है जिसको अंतराष्ट्रीय राजनय में मोदीनामिक्स कहा जाने लगा है। दरअसल जब राष्ट्रपति ट्रंप मोदी को टफ निगोशिएटर कहते हैं तो उसके पीछे मोदी की खामोश पर दृढ़ निर्णयों की पृष्ठभूमि है। राहुल गांधी भले ही प्रधानमंत्री मोदी को कंप्रोमाइज्ड प्राइम मिनिस्टर कहें लेकिन अंतराष्ट्रीय मंचों पर प्रधानमंत्री की जो स्थिति है वो इस बयान को बचकाना बयान साबित करता है। फ्रांस में जी 7 सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने जितने भी वैश्विक नेताओं के साथ द्विपक्षीय बैठकें कीं वो सब इस बात की गवाही देने के लिए पर्याप्त है कि मोदोनामिक्स कैसे काम कर रहा है। आज अंतराष्ट्रीय राजनय में मोदी ने वैश्विक नेताओं के साथ जिस तरह का रैपो बनाया है या कहें कि जिस तरह के व्यक्तिगत संबंध बनाए हैं उसका लाभ देश को हो रहा है। इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी ने भले ही मजाक में कहा हो कि वो और मोदी वायरल कपल हैं लेकिन इससे दोनों देशों के संबंधों में एक निकटता झलकती है। फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों ने जिस तरह से हिंदी में बोलकर प्रधानमंत्री का स्वागत किया और भारत-फांस मैत्री के अमर रहने की बात की वो दोनों देशों की निकटता को दर्शाता है।

इतना ही नहीं खाड़ी संकट के दौरान प्रधानमंत्री ने खाड़ी देशों के साथ भारत के संबंधों को मजबूत किया वो भी अंतराष्ट्रीय राजनय में एक मिसाल है। इतने लंबे संघर्ष के दौरान उन देशों में रहनेवाले भारतीयों की सुरक्षा को अहम स्थान मिला। दरअसल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भारत के बाजार की ताकत को ना केवल पहचानते हैं बल्कि अपनी इस ताकत का उपयोग अंतराष्ट्रीय राजनय में बहुत बेहतर तरीके से करते हैं। बगैर आक्रामक दिखे दृढता से देशहित के लिए कदम उठाते रहते हैं।  150 करोड़ भारतवासियों की ताकत और राजनय में प्रधानमंत्री का गांभीर्य मोदीनामिक्स को विशिष्टता प्रदान करता है। यह अनायास नहीं है कि अमेरिकी राष्ट्रपति कहता है कि अगर भारत पर संकट आया तो वो साथ खड़ा रहेगा। अगली ही पंक्ति में ये भी कह देता है कि जबतक मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं। अगर खाड़ी संकट नहीं आता और देश की अर्थव्यवस्था पर उसका असर नहीं पड़ता तो भारत ने विकास की जो रफ्तार पकड़ी थी वो कायम रहती। खाड़ी संकट के दौरान ऊर्जा सुरक्षा को लेकर भारत ने जिस तरह की रणनीति अपनाई उसके कारण ही जनता पर बहुत अधिक बोझ नहीं पड़ा। जिस तरह से ऊर्जा चुनौतियों का सामना भारत ने किया और नई जगहों से अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा किया वो एक केस स्टडी है। आनेवाले समय में प्रधानमंत्री मोदी के 12 वर्षों के कार्यकाल में जब उपलब्धियों और चुनौतियों पर शोधादि होंगे तो मोदीनामिक्स उसके केंद्र में होगा।   


Sunday, June 14, 2026

महाकवि के प्रति उदासीनता


आचार्य रामचंद्र शुक्ल के लेखन पर कुछ काम करते हुए कवि भूषण के बारे में उनकी राय सामने आई। आचार्य शुक्ल ने कवि भूषण को ‘हिंदू जाति का प्रतिनिधि’ कवि कहा है। जाति से आचार्य शुक्ल का आशय किसी ‘कास्ट’ से नहीं बल्कि हिंदू राष्ट्रीयता से है क्योंकि हिंदू कोई जाति तो है नहीं। आचार्य शुक्ल की ये टिप्पणी दिमाग में बैठक गई। इसके कुछ दिनों बाद दैनिक जागरण में प्रकाशित एक समाचार ने ध्यान खींचा। समाचार का शीर्षक था, साझा संस्कृति का केंद्र बनेगा महाकवि का गांव। बात कवि भूषण के पैतृक गांव की हो रही थी जो कि कानपुर का टिकवांपुर है। समाचार में विस्तार से बताया गया था कि किस तरह से कवि भूषण के पैतृक आवास में चलनेवाले प्राथमिक विद्यालय का भवन जर्जर हो चुका था। इस जर्जर भवन के कमरों में ग्रामीण भूसा भंडारण कर रहे थे और परिसर में मवेशी पालन हो रहा था। इस भवन को ठीक कराने का आदेश हुआ। कवि भूषण हिंदी के शीर्ष कवियों में माने जाते हैं। उन्होंने शिवाजी महाराज की वीरता और पराक्रम पर विस्तार से लिखा है। उनके द्वारा रचित शिवा-बावनी में शिवाजी महाराज के युद्ध कौशल, उनकी रणनीति, तेज गति से चलती उनकी तलवार आदि के बारे में विस्तार से लिखा है। कवि भूषण का कालखंड मुगल राजा औरंगजेब के समय का था। जब औरंगजेब मंदिरों को तोड़ता था तो समाचार सुनकर कवि भूषण विचलित हो जाते थे। उनकी लेखनी चलती थी और उससे राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत होकर जो छंद निकलते थे उसमें औरंगजेब से पीड़ित जनता का स्वर होता था। उन्होंने शिवाजी के माध्यम से हिंदू संस्कृति की रक्षा के लिए जो रचनाएं की उसने भारत की जनता के मध्य राष्ट्र के प्रति एक अनुराग पैदा किया। शिवाजी महाराज की प्रशंसा में जो रचनाएं उन्होंने लिखी उसका लक्ष्य भी जनता के बीच शिवाजी को हिंदू संस्कृति के रक्षक के तौर पर स्थापित करना था। उन्होंने लिखा- ‘मीड़ि राखे मुगल मरोड़ि राखे पातसाह बैरी पीसि राखे बरदान राख्यौ कर मैं/राजन की हद्द राखी/तेग-बल सिवराज देव राखे देवल स्वधर्म राख्यो घर मैं।‘ इससे स्पष्ट है कि वो अपनी कविताओं में शिवाजी महाराज को देवतुल्य बताकर जनता को प्रेरित करते थे। अनायास नहीं था कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल उनको हिंदू जाति का प्रतिनिधि कवि मानते थे। 

हिंदू जाति के ऐसे प्रतिनिधि कवि के पैतृक आवास की ये स्थिति क्यों है ? हिंदू जाति अपने नायकों की स्मृति को क्यों नहीं सहेज सकती। इन प्रश्नों के साथ कुछ दिनों पूर्व कोलंबिया यात्रा में बोगोटा में वहां के नोबेल पुरस्कार विजेता लेखक गैब्रियल गार्सिया मार्केज के बारे में जानना चाहा। वहां के लेखकों ने जानकारी दी कि कोलंबिया ने उनकी यादों को सहेजा हुआ है। बोगोटा में वो बहुत अधिक दिन नहीं रहे थे। जितने भी दिन बिताए और जहां भी उनका कार्यस्थल रहा उसको बोगोटा ने सहेजा। वहीं पता चला कि कोलंबिया के ही शहर कार्टेघाना में गैब्रियल गार्सिया मार्केज का घर अब भी सुरक्षित और जस का तस है। कोलबिंया आने वाले पर्यटक उस घर को देखने जाते हैं। लाल ईंटों से बनी उस इमारत में उनकी स्टडी, उनका लिविंग रूम को मूल स्वरूप में संभाल कर रखा गया है। ये वही स्थान है जहां मार्केज ने अपनी महत्वपूर्ण कृतियों की रचना की थी। इस वर्ष अप्रैल में अंतराष्ट्रीय माचार माध्यमों में इस बात की खूब चर्चा रही कि किंग्स कालेज लंदन की एक प्रोफेसर लूसी मुनरो ने विलियम शेक्सपियर के घर का सटीक स्थान खोज निकाला। श्कसपियर के घर के सटीक स्थान को लेकर इसके पहले तक भ्रम था। बताया जाता था कि वो इसी स्थान पर कहीं रहते थे। कहने का आशय ये है कि एक प्रोफेसर वर्षों तक अपने सम्मानित लेखक के घर को ढूंढने में रही। उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर उसने ये काम कर दिया। हम अपनी भाषा के पूर्वज लेखकों, उनसे जुड़ी धरोहरों को लेकर इतने उदासीन क्यों हैं। इस पूरे प्रसंग को लिखते हुए याद आता है प्रयागराज के मालवीय नगर इलाके में पंडित बालकृष्ण भट्ट का निवास। सरस्वती पत्रिका के संपादक स्व देवीदत्त शुक्ल के पौत्र व्रतशील शर्मा के साथ भट्ट जी के घर गया था। जर्जर अवस्था में था उनका घर। उनके परिवार के लोगों ने काठ वो चौकी बचा रखी थी जिसपर बैठकर भट्ट जी ‘प्रदीप’ का संपादन किया करते थे। तब उनके घर की स्थिति को देखकर बहुत पीड़ा हुई थी। अब कवि भूषण के पैतृक घर की स्थिति के बारे में जानकार दुख बढ़ गया। कवि भूषण के जन्म स्थान पर उनका भव्य स्मारक बनाया जाना चाहिए। हिंदू जाति के इस प्रतिनिधि कवि की यादों को संजोने के लिए और आगे आनेवालि पीढ़ी को ये बताने के लिए वहां उनकी रचनाओं पर आधारित म्यूजियम बनाने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार को पहल करनी चाहिए। इस कार्य में महाराष्ट्र सरकार को भी आगे आकर उत्तर प्रदेश सरकार का सहयोग करना चाहिए। कवि भूषण का नाम भारत के गौरव शिवाजी महाराज से जुड़ता है। अगर उत्तर प्रदेश सरकार और महाराष्ट्र सरकार ठान ले तो टिकवांपुर में कवि भूषण का भव्य और दिव्य स्मारक बनने में देर नहीं लगेगी।    


  


Saturday, June 13, 2026

तुष्टीकरण पर वैश्विक चिंता


भारतीय राजनीति में इन दिनों घुसपैठियों की जमकर चर्चा होती है। चुनाव आयोग के मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण अभियान के आरंभ के बाद से ही घुसपैठियों को लेकर राजनीतिक बयानबाजी होने लगी है। पश्चिम बंगाल के चुनाव के समय भी घुसपैठिए चर्चा के केंद्र में रहे। बंगलादेश से लगी भारत की सीमा पर चुनाव आयोग के विशेष पुनरीक्षण अभियान के समय और चुनाव परिणाम के बाद घुसपैठियों के देश लौटने की तस्वीरें भी पूरे देश ने देखीं। घुसपैठियों की ये समस्या सिर्फ भारत की समस्या नहीं है। इस समस्या से यूरोप के कई देश और अमेरिका भी जूझ रहा है। इस माह के आरंभ में ब्रिटेन में भारतीय मूल के एक युवक को एक ब्रिटिश युवक की हत्या के आरोप में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। सजा के कुछ दिनों पूर्व हत्याकांड के वीडियो के सामने आने के बाद पूरे ब्रिटेन में प्रवासियों के खिलाफ गुस्सा फूट पड़ा। दरअसल हुआ कि जब ब्रिटेन के युवक पर हमला हुआ और पुलिस घटनासथल पर पहुंची तो पुलिस ने 18 वर्ष के घायल युवक हेनरी को अस्पताल पहुंचाने के बजाए उसको ही हथकड़ी पहना दी। उसकी कराह और स्थिति से भी पुलिस का दिल नहीं पसीजा। उसकी मौत हो गई। ब्रिटेन में इस कांड के वीडियो सामने आने के बाद प्रवासियों और घुसपैठियों के विरुद्ध एक बड़ा आंदोलन खड़ा हो गया है। इनके अधिकारों को लेकर बहस भी चल पड़ी है। बहस तो तुष्टीकरण को लेकर भी हो रही है, रिलीजन को लेकर भी हो रही है। पूरे ब्रिटेन में मृत युवक हेनरी की स्मृति और समर्थन में युवक और युवतियां घुटनों पर बैठकर अपने वीडियो जारी कर रहे हैं। अपनी मौत के पहले हेनरी भी इसी तरह पुलिस वालों से गुहार लगा रहा था।

हाल ही में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री का एक वीडियो इंटरनेट मीडिया पर प्रचलित हो रहा है। इस वीडियो में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर से पूछा जाता है कि क्या अब भी ब्रिटेन एक क्रिश्चियन देश है?  उनका सीधा उत्तर नहीं आता। वो कहते हैं कि अगर क्रिश्चियन देश की बात है तो मैं स्वयं एक क्रिश्चियन हूं और चर्च में मेरा विश्वास है। हमारे अनौपचारिक संविधान में भी क्रिश्चियनिटी की बात प्रमुखता से है। वे इतने पर ही नहीं रुकते हैं और आगे कहते हैं कि हम अनेक मतों को सेलिब्रेट करते हैं और मैं इसके लिए गर्व का अनुभव करता हूं। इस बयान के बाद ब्रिटेन में रिलीजन को लेकर भी एक नई बहस छिड़ गई है। बहस ये कि क्या क्रिश्चियनिटी को ब्रिटेन में कम महत्व मिल रहा है। ब्रिटेन के मूल निवासियों के एक वर्ग में अपने प्रधानमंत्री के इस बयान को लेकर नाराजगी है। उनका तर्क है कि अन्य मतावलंबियों को सम्मान मिले लेकिन देश को अपने मूल रीलिजन को प्रमुखता और प्राथमिकता होनी चाहिए। इस बहस ने ब्रिटेन की सीमा को पार कर लिया है। फ्रांस और जर्मनी के अलावा अमेरिका भी इस बहस में शामिल हो गया है। रिलीजन के अलावा चर्चा राज्य के दायित्व पर हो रही है। पूछा जा रहा है कि राज्य पीड़ित के पक्ष में दया और न्याय का भाव रखे या नहीं। ब्रिटेन में हेनरी पर हमले के बाद देखा गया कि पीड़ित के साथ पुलिस ने दया नहीं दिखाई। अपने स्तर का न्यायपूर्म व्यवहार भी नहीं कर पाई। वार से घायल हेनरी जमीन पर तड़पता रहा और पुलिस उसको घुटने के बल पर बैठा कर हथकड़ी लगाती रही। ब्रिटेन की बहस अब राष्ट्रीय अस्मिता और पहचान तक पहुंच गई है। ब्रिटेन किसका ? ब्रिटेन का कानून किसके लिए? मूल निवासियों के लिए या प्रवासियों और घुसपैठियों के लिए। बहस ने ब्रिटेन की राजनीति को भी प्रभावित करना आरंभ कर दिया है।

ब्रिटिश युवक की हत्या और उसके बाद घुसपैठियों और प्रवासियों को लेकर चलनेवाली बहस सीमाओं से आगे निकल गई है। अमेरिका के उपराष्ट्रपति जे डी वांस ने एक्स पर हेनरी का वीडियो साझा करते हुए लिखा कि हेनरी नोवाक उसी तरह से मरा है जिस तरह से एक सभ्यता की मौत होती है। प्रशासन ने ना तो उस पर विश्वास किया। ना ही उसका ध्यान रखा। हथकड़ी लगाकर मरने के लिए छोड़ दिया। उसपर हेट क्राइम का आरोप भी लगाया जो उसने किया ही नहीं था। जे डी वांस ने अपने लंबे पोस्ट में लिखा कि हेनरी इस तरह के अपराध में जान गंवाने वाला पहला युवक नहीं है और ना ही आखिरी होगा। इस तरह की घटना के प्रतिवाद का एकमात्र रास्ता है न्यापूर्ण तरीके से क्रोध का प्रदर्शन। अंत में वांस ने लिखा कि हम अपनी सभ्यता और अपने देश को प्यार करते हैं। अपने बच्चों से प्यार करते हैं और किसी की भी जान हेनरी नोवाक की तरह न जाए इसका ध्यान रखना होगा। उपराष्ट्रपति जे डी वांस के अलावा उद्गोयपति एलान मस्क ने भी इस घटना पर अपनी प्रतिक्रिया देकर उसको अंतराष्ट्रीय मसला बना दिया। वो तो सिविल वार होने तक की टिप्पणी कर गए। यूरोप में जनता का न्यायपूर्ण क्रोध बढ़ता जा रहा है और इसने ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस के अलावा नीददरलैंड और स्वीडन को भी अपनी चपेट में ले लिया है। कहा जा रहा है कि इन देशों की सरकारों की उदारवादी नीतियों ने मूल निवासियों के अधिकारों को खतरे में डाल दिया है।

जब भारत में घुसपैठियों और तुष्टीकरण की बात होती है तो यहां का कथित लिबरल तबका इसका विरोध करता है। उदारता और समानता के सिद्दांतों की बातें होने लगती हैं। हमारा देश भी घुसपौठियों के कारण अनेक समस्याओं से जूझता रहा है। बंगाल का ही उदाहरण लें तो वहां पूर्व में जिस तरह से घुसपौठियों को आधार कार्ड और राशन कार्ड देकर वैधता प्रदान की गई उसके पीछे वोट और सत्ता पाने की मंशा थी। हमारे देश ने भी तुष्टिकरण का लंबा दंश झेला है। तुष्टीकरण के कारण ही अपराधियों और गैंगस्टरों का बड़ा वर्ग तैयार हुआ था। बंगाल के अलावा उत्तर प्रदेश का ही उदाहरण लें। वहां तुष्टीकरण के कारण ही अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी जैसी खूंखार अपराधी ना केवल जन्मे बल्कि उन्होंने अपना साम्राज्य खडा कर लिया। ये तुष्टीकरण का ही परिणाम था कि उत्तर प्रदेश के अपराधी को लंबे समय तक पंजाब की जेल में रखा गया। कानूनी प्रक्रिया के बाद उसको उत्तर प्रदेश की जेल में लाया जा सका। ये उस तुष्टीकरण का ही परिणाम था कि मुंबई बम धमाकों के अपराधी याकूब मेनन के लिए सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की बेंच आधी रात के बाद सुनवाई के लिए बैठी थी। आज हमाररे देश के सामने सबसे बड़ा प्रश्न ये है कि क्या हम भी यूरोप और अमेरिका की तरह भारत के मूल निवासियों के अधिकारों की रक्षा की राजनीति करें या इसको छोड़कर घुसपैठियों को वैधता प्रदान कर सत्ता के लिए राजनीति चमकाएं। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में ये मुद्दा केंद्रीय हो सकता है। अभी से इसके आसार दिखने लगे हैं। राजनीतिक दल मुद्दा बनाएं या नहीं लेकिन समाज को भी इस बारे में सोचना होगा। न्यापूर्ण क्रोध का प्रदर्शन करना होगा।   

Friday, June 5, 2026

जाग्रत समाज बनाएगी पुस्तक संस्कृति


कुछ वर्ष पहले की बात है। संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत स्वायत्तशासी संस्था राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन की वेबसाइट पर क्रय की जानेवाली पुस्तकों की सूची प्रकाशित हुई थी। उसमें एक पुस्तक थी जिसका नाम था मदर आफ डेमोक्रेसी इंडिया। संस्था की वेबसाइट पर क्रय की जानेवली पुस्तकों की सूची में इस पुस्तक का मूल्य पांच हजार रुपए बताया गया था। पुस्तक प्रकाशक या विक्रेता की तरफ से छूट भी प्रस्तावित थी। उसके बाद पुस्तक का मूल्य तीन हजार (स्मरण के आधार पर) के करीब था। राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन की बैठक में इस पुस्तक को लेकर प्रश्न उठा था। किसी सदस्य ने प्रश्न उठाया था कि यही पुस्तक जब बाजार में किसी अन्य प्रकाशन, संभवत: राष्ट्रीय पुस्तक न्यास से सात सौ रुपए मूल्य पर उपलब्ध है तो फाउंडेशन इतनी महंगी पुस्तक क्यों खरीद रहा है। ये जानकारी नहीं है कि उक्त पुस्तक की खरीद राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन में हुई या नहीं। ये इस लेख का विषय भी नहीं है। राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन और उसके क्रियाकलाप पर भी चर्चा करना उद्देश्य नहीं है। उक्त उदाहरण से एक बड़ा प्रश्न भारतीय प्रकाशन जगत के सामने खड़ा होता है कि सरकारी खरीद के लिए पुस्तकों के मूल्य बहुत ज्यादा और बाजार के लिए उसी पुस्तक का मूल्य कम क्यों रखे जाते हैं? ये तो एक उदाहरण है जबकि प्रकाशन जगत से जुड़े लोगों का कहना है कि ये तो सामान्य बात है। कवर अलग करके पुस्तकों का मूल्य कई गुणा बढ़ा दिए जाते हैं। बढ़े हुए मूल्य पर खरीद भी होने की बात की जाती है। समय आ गया है कि हिंदी के प्रकाशकों को इस बात पर विचार करना चाहिए कि पुस्तकों के मूल्य का मानकीकरण होना चाहिए या नहीं। 

अभी मेरे सामने एक ही प्रकाशन से प्रकाशित दो पुस्तकें रखी हैं। एक हार्ड बाउंड है और दूसरा पेपरबैक। हार्ड बाउंड पुस्तक की पृष्ठ संख्या 200 है और उसका मूल्य रु 499 है। पेपरबैक पुस्तक की पृष्ठ संख्या 191 है और मूल्य रु 299 है। अन्य प्रकाशक की एक पुस्तक में पृष्ठ है 120 और मूल्य है रु 200। एक और प्रकाशन से प्रकाशित पेपरबैक पुस्तक में पृष्ठ है 230 मूल्य है रु 500। लेख लिखने के क्रम में दर्जनों पुस्तकों की पृष्ठ संख्या और मूल्य देखा। एक ही प्रकाशन से एक ही जैसे कागज पर एक ही आकार में और लगभग समान पृष्ठ संख्या की प्रकाशित पुस्तकों के मूल्य अलग-अलग हैं। उनको देखकर कोई अनुमान नहीं लगा सकता है कि प्रकाशकों ने पुस्तकों के मूल्य निर्धारण का क्या फार्मूला तय किया है। कई प्रकाशकों से मूल्य निर्धारण को लेकर बात की तो पता चला कि आमतौर पर एक रुपए प्रति पृष्ठ की दर से पुस्तकों का मूल्य निर्धारण होता था। अब ये दर बढ़कर दो रुपए प्रति पेज तक पहुंच गया है। एक प्रकाशक ने बताया कि पुस्तक की लागत से चार से छह गुणा अधिक मूल्य रखा जाता है। उनका तर्क था कि पुस्तक विक्रेताओं को चालीस प्रतिशत तक कमीशन और करीब तीन महीने का क्रेडिट देना होता है। ई-कामर्स प्लेटफार्म अब प्रकाशकों से 50-55 प्रतिशत कमीशन की मांग करने लगे हैं। इस कारण पुस्तक का मूल्य लागत के चार से छह गुणा अधिक रखा जाता है। बड़े प्रकाशक तो फिर भी अपने प्रकाशनों के बल पर मूल्यों को नियंत्रण में रख पातें हैं लेकिन कई छोटे प्रकाशक अपनी एक अच्छी पुस्तक से ही मुनाफा कमाने के चक्कर में अधिक मूल्य रख देते हैं। इससे कई बार पाठक खिन्न भी होते हैं और खरीदने में हिचकते भी हैं। 

पुस्तकों के बाजार या बिक्री का इकोसिस्टम बहुत सारी बातों पर निर्भर करता है। अंतराष्ट्रीय स्तर पर कोई घटना घटी तो पेपर के दाम बढ़ जाते हैं। किसी दो देश के बीच संघर्ष जैसी स्थिति बनती है तो भी उसका असर पुस्तकों के बाजार पर पड़ता है। कोरोना जैसी महामारी का असर भी प्रकाशन व्यवसाय पर पड़ते देखा गया । पायरेसी भी पुस्तकों के बाजार पर नकारात्मक असर डालती है। पुस्तक चर्चित हुई नहीं कि पायरेटेड वर्जन बाजार में उपलब्ध। खुले आम चौक-चौराहों पर बिक्री आरंभ। हिंदी के अलावा अन्य भाषाओं में लेखकों को दी जानेवली कापीराइट राशि की दर भी मूल्य को प्रभावित करता है। ये प्रश्न उठ सकता है कि पुस्तकों के मूल्य निर्धारण की कोई नीति क्यों नहीं है? प्रकाशकों की अखिल भारतीय संस्थाएं या अन्य संस्थाएं इसमें पहल क्यों नहीं करती हैं। कम्युनिस्ट पार्टियों के बौद्धिक प्रकोष्ठ की तरह काम कारनेवाले लेखक संगठनों से तो ये अपेक्षा ही व्यर्थ थी/ है। यहां सरकारी खरीद की बात नहीं हो रही है। वो एक अलग ही किस्म का खेल है। जिसमें बहुधा भ्रष्टाचार की खबरें आती रहती हैं। पारदर्शिता की कमी का उल्लेख होता ही रहता है। हिंदी के एक आलोचक जब राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन के अध्यक्ष थे तो एक प्रकाशक को लाभ पहुंचाने की बात हिंदी साहित्य जगत में आम है। इसकी चर्चा फिर कभी। इस बात पर विचार करना होगा कि जो पुस्तकें ज्ञान का आधार होती हैं। प्रत्यक्ष रूप से राष्ट्र निर्माण के लिए पीढ़ियों को तैयार करती हैं। राष्ट्र को एक सूत्र में जोड़ने के उपक्रम के तौर पर देखी जाती हैं। उसको लेकर समाज को क्या करना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने पहले कार्यकाल से ही पुस्तकों और पुस्तकालयों की महत्ता पर जोर दे रहे हैं। घर में देवालय और पुस्तकालय की बात भी कर चुके हैं। इंटरनेट मीडिया के दौर में भी पुस्तकों की महत्ता कम नहीं हुई है। हिंदी क्षेत्र के पुस्तक मेलों और साहित्य उत्सवों में पुस्तकों के प्रति पाठकों का प्रेम दिखता है। नई दिल्ली में आयोजित होनेवाले विश्व पुस्तक मेला ने इस वर्ष सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किए थे। प्रतिवर्ष दिसंबर में आयोजित होनेवाले पुणे पुस्तक मेला का आकार और बिक्री के आंकड़े संतोषजनक ही नहीं बल्कि चौंकानेवाले हैं। मराठी में पुस्तक खरीदकर पढ़नेवाले युवाओं की संख्या बढ़ रही है। मलयालम, तमिल और बांगला में भी पुस्तकों की बड़ी संख्या में बिक्री होती है। 

आज आवश्यकता इस बात की है कि पुस्तकों की संस्कृति के विकास को लेकर समाज को जाग्रत होना होगा। हमें ये तय करना होगा कि पायरेटेड या चोरी से प्रकाशित की गई पुस्तकें नहीं खरीदनी है। चाहे उनका मूल्य कितना भी कम क्यों ना हो। पुस्तकालयों को दी जानेवाली पुस्तकों की सरकारी खरीद में पारदर्शिता लाने की आवश्यकता है। अगर कहीं भ्रष्टाचार है तो उसको रोकने के उपाय करने होंगे। अनियमितता के कारण सरकारी पुस्तकों के खरीद रोक देने से प्रकाशन जगत पर असर पड़ता है। प्रकाशकों को भी व्यक्तिगत और सरकारी खरीद के लिए उपलब्ध पुस्तकों के मूल्य में समानता रखनी होगी। जो प्रकाशक ऐसा नहीं करते हैं उनके बारे में प्रकाशक संघों को सार्वजनिक रूप से सामने आकर कदम उठाने होंगे। लेखकों और पाठकों को भी प्रकाशकों के साथ मिलकर इस व्यवसाय को आगे बढ़ाना होगा क्योंकि इस कारोबार की प्रकृति अलग है। पूंजी लगानेवाले लाभ की इच्छा रखते हैं, रखना भी चाहिए क्योंकि ये पूंजी का स्वभाव है। पर लाभ के चक्कर में ये नहीं भूलना चाहिए कि ये कारोबार पीढ़ियों के निर्माण से भी जुड़ा है। इसका उद्देश्य पवित्र है।         


Saturday, May 30, 2026

ज्ञान का इकोसिस्टम बनाती पत्रकारिता


हिंदी पत्रकारिता के दौ सौ वर्ष पूर्ण होने पर देश के अलग-अलग हिस्से में गोष्ठियों का आयोजन हो रहा है। हिंदी के पहले समाचारपत्र उद्दंत मार्तंड और उसके संपादक जुगुल किशोर सुकुल से लेकर वर्तमान दौर की पत्रकारिता पर चर्चा हो रही है और इस क्षेत्र से जुड़े लोग अपनी-अपनी राय और विश्लेषण रख रहे हैं। पत्रकारिता और साहित्य के संबंध पर भी बातें हो रही है। कुछ दिनों पूर्व सहितम् संस्था द्वारा आयोजित एक कार्यशाला में जाने का अवसर मिला। वहां देश के विभिन्न प्रांतों से आए युवाओं से संवाद हुआ। संवाद का विषय हिंदी साहित्य चुनौतियां और संभावनाएं जैसा था। सहितम् का ये प्रयास युवाओं को लेखन की दुनिया से जोड़ने और उनको एक मंच प्रदान करने का है। युवा लेककों से बात करते हुए साहित्य सृजन पर बात हुई। कुछ दिनों पूर्व हिंदी के वरिष्ठ आलोचक सुधीश पचौरी से कामायनी और छायावाद पर लंबी बात हुई थी। कामायनी और छायावाद को वो इन दिनों बिल्कुल अलग तरीके से व्याख्यित करने का कार्य कर रहे हैं। उनकी स्थापना है कि छायावादी कविता देशप्रेम के भाव से युक्त एक राष्ट्रवादी कविता है। सहितम् की गोष्ठी में युवाओं से संवाद के दौरान सुधीश जी से हुई बातचीत अवचेतन मन में थी। इस कारण जब साहित्य सृजन पर बात होने लगी तो साहित्य सृजन की एक अलग परिभाषा पर चर्चा आरंभ हो गई। साहित्य सृजन को परिभाषित करते हुए बात ज्ञान की पारिस्तिथिकी (इकोसिस्टम आफ नालेज) तक पहुंच गई। स्वाधीनता के पूर्व के साहित्य सृजन को देखकर यही प्रतीत होता है कि अधिकतर साहित्यकरों ने और लेखकों ने अपनी लेखनी के माध्यम से ज्ञान की पारिस्थितिकी को मजबूत किया। विशेषकर यदि हम भक्तिकाल के कवियों को देखें तो उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से एक इकोसिस्टम तैयार किया। ज्ञान के इस इकोसिस्टम से भारत की उस समय की जनता लाभान्वित तो हुई ही संगठित भी हुई। उनके टूटे मनोबल को बल मिलने लगा।  

जयशंकर प्रसाद की महान कृति कामायनी को देखें तो उसमें लेखक एक साथ कई स्तरों पर अपनी बात कहते हुए आगे बढ़ते हैं। देवत्व जब दानत्व की ओर बढ़ता है तो प्रलय आती है। प्रलय सबको नष्ट कर देती है। कामायनी का नायक मनु जीवन से हताश निराश हो जाता है। हिमालय चला जाता है। कविता आगे बढ़ती है तो मनु को श्रद्धा मिलती है। श्रद्धा से ज्ञान मिलता है। प्रलय से ज्ञान की जिस पारिस्थितिकी को क्षति पहुंची थी वो उसका परिष्कार होने लगता है। कामायनी में वर्णित स्थितियां और पात्रों के मनोविज्ञान को पकड़ने और उसको विश्लेषित करने का काम आलोचकों का है। लेकिन पत्रकारिता को या ज्ञानार्जन करनेवालों के लिए एक बड़ी व्यवस्था जयशंकर प्रसाद ने अपनी इस रचना में दी। प्रलय के बाद भी अगर आपके पास श्रद्धा है तो आपको ज्ञानार्जन से कोई रोक नहीं सकता है। सृजन क बाधित नहीं किया जा सकता। ज्ञान अर्जन करने के लिए विनयशील होना आवश्यक है। श्रद्धा नाम कामायनी की नायिका का अवश्य है लेकिन उसको प्रतीक के तौर पर देखा जा सकता है। आदर बिना ज्ञान नहीं प्राप्त हो सकता है। यही बात तो पत्रकारिता पर भी लागू होती है। पत्रकार भी अपनी लेखनी के माध्यम से ज्ञान का इकोसिस्टम ही बनाता है। पूर्व में बने हुए इकोसिस्टम को मजबूत करता है। अब यहां हमें दो बातों पर विचार करना चाहिए कि दो सौ वर्षों की हिंदी पत्रकारिता के किस कालखंड के पत्रकारों ने ज्ञान का इकोसिस्टम बनाने या उसको मजबूत करने का काम किया। स्वाधीनता पूर्व की हिंदी पत्रकारिता को देख लेते हैं। उस कालखंड की पत्रकारिता के आकलन से निष्कर्ष निकलता है कि वो ज्ञान की पारिस्थितिकी को मजबूत करके देश की जनता को जागरूक कर रही थी। उस दौर के साहित्यकार भी यही कर रहे थे। ये अनायास नहीं है कि उस कालखंड में अधिकतर पत्रकार साहित्यकार भी थे या कह सकते हैं कि जो साहित्यकार थे वही पत्रकारिता भी कर रहे थे। क्योंकि दोनों का उद्देश्य समान था।

पत्रकारिता के दो सौ वर्षों के इतिहास को देखें तो भी स्पष्ट होता है कि जो आदर और विनयशीलता के साथ पत्रकारिता कर रहे थे वो शीर्ष पर पहुंचे। आक्रामकता कभी पत्रकारिता को आगे नहीं बढ़ाती है। विनम्र होकर आदर के साथ प्रश्नों के उत्तर ढूंढेंगे तो बेहतर उत्तर मिलने की संभावना बनेगी। संभव है कि उत्तर उस तरह का मिले कि ज्ञान की पारिस्थितिकी में कुछ जोड़ें। वहीं अगर आक्रामकता के साथ पत्रकारिता की जाती तो पूर्वज पत्रकारों द्वारा बनाई गई ज्ञान की पारिस्थितिकी कमजोर होने का खतरा रहता है। पत्रकारिता में हमेशा से ये कहा जाता है कि पत्रकारों को प्रश्नाकुल होना चाहिए। बिल्कुल होना चाहिए। परंतु प्रश्नाकुलता के साथ विनयशीलता होनी चाहिए। पत्रकारिता के जरिए जब ज्ञान के इकोसिस्टम को बल देने की बात होती है तो स्मरण आता है इस वर्ष तीन खंडों में प्रकाशित समग्र भारतीय पत्रकारिता। वाणी प्रकाशन से प्रकाशित लेखक विजयदत्त श्रीधर ने श्रमपूर्वक इसको तैयार किया है। विजयदत्त क्षीधर पत्रकार रहे हैं। उन्होने भोपाल में माधवराव सप्रे स्मृति समाचारपत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान की स्थापना भी है। ये अपनी तरह का एक अनोखा संग्रहालयय है। वहां शोधार्थियों के लिए प्रचुर सामग्री उपलब्ध है। इसपर फिर कभी विस्तार से चर्चा। समग्र भारतीय पत्रकारिता के तीन खंडों को देखने के बाद ये विश्वास पक्का होता है कि पत्रकार अपनी पत्रकारिता के माध्यम से ज्ञान का इकोसिस्टम ही बनाते रहे हैं। तीन खंडों के 49 अध्यायों में विजयदत्त श्रीधर ने बेहद श्रमपूर्वक भारतीय पत्रकारिता की विकास यात्रा को दर्शाने का प्रयास किया है। वो इन तीन खंडो को समग्र भारतीय पत्रकारिता की सन 1780 से लेकर 1948 तक की 128 वर्ष की यात्रा कथा बताते हैं। उनकी इस कृति में हिंदी भाषा के बदलते स्वरूप को भी देखा-समझा जा सकता है। विजयदत्त श्रीधर ने जहां भी पत्र-पत्रिकाओं के उद्धरण दिए हैं वहां उसकी भाषा को यथावत रखा है। इस कृति में पाठकों को तमिल, मलयालम, तेलुगु, ओडिया और अंग्रेजी पत्रकारिता के बारे में भी अलग अलग अध्यायों में जानकी मिलती है। पुस्तक में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की पत्रकारिता और उनकी ओजस्वी वाणी को भी रेकांकित किया गया है। 

विजयदत्त श्रीधर की इस पुस्तक से ये स्पष्ट होता है कि किस तरह से भारतीय पत्रकारिता ने ज्ञान का इकोसिस्टम बनाया। श्रीधर जी स्वाधीनता के बाद रुक जाते हैं। आज इस बात की पड़ताल करने की आवश्यकता है कि स्वाधीनता के बाद किस विचार और किस प्रचार ने भारतीय पत्रकारिता निर्मित ज्ञान के इकोसिस्टम को बाधित या खंडित करने का प्रयत्न किया। 1948 के बाद भारतीय पत्रकारिता में कई महत्वपूर्ण पड़ाव आए। 1962 के युद्ध में चीन से पराजय, 1975 में देश में आपातकाल की घोषणा और उसके बाद नागरिक अधिकारों और प्रेस की स्वतंत्रता समाप्त होना, 1991 में आर्थिक उदारीकरण का आरंभ होना। पत्रकारिता और पत्रकार ने नई तकनीक आई, चुनौतियों के साथ संभावनाएं आईं। इसो पत्रकारिता ने किस तरह से लिया। इस पर विस्तार से लिखे जाने की आवश्यकता है। पत्रकारिता किस तरह से ज्ञान के इकोसिस्टम से दूर होकर राजनीतिक परिवार के इकोसिस्टम को मजबूत करने में लग गई। ये भी देखा जाना चाहिए।