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Saturday, February 21, 2026

साहित्य से छंटती व्यक्तिगत विवादों की धुंध


इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स पर उपभोक्ताओं के व्यतीत किए जानेवाले समय को लेकर इन दिनों खूब चर्चा हो रही है। इन प्लेटफार्म्स की सार्थकता को लेकर पक्ष विपक्ष के तर्क सामने आते रहते हैं। फेसबुक से लेकर एक्स और इंस्टा जैसे प्लेटफार्म पर डाली जानेवाली सामग्री चर्चा कें केंद्र में रहती है। हिंदी साहित्य के अधिकतर लोग फेसबुक पर अपनी मन की बात लिखते हैं। कोई पुस्तकों के बारे में बताता है तो कोई वैचरिक वातें करता है। कुछ कवि अपनी कविताओं का पाठ करके वीडियो फेसबुक पर डालते हैं। स्मार्ट फोन का चलन बढ़ने से और फोन के कैमरे की क्वालिटी बेहतर होने से वीडियो पोस्ट करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। कई बार फेसबुक पर इतिहास की घटनाओं की जानकारी भी मिल जाती है। कोई चर्चित साहित्यिक प्रसंग और उसपर हुई चर्चा भी अचानक आपके सामने आ जाती है। पिछले दिनों फेसबुक पर स्क्रोल करते समय एक ऐसे ही विवादित प्रंसग की जानकारी मिली। नामवर सिंह और उनके अनुज काशीनाथ सिंह की टिप्पणी और उसपर महाश्वेता देवी का प्रतिकार। ये पोस्ट कोलकाता से निकलनेवाली पत्रिका लहक के संपादक निर्भय देव्यांश की थी। इस पोस्ट में नामवर सिंह और काशीनाथ सिंह के बयान की चर्चा थी।  उक्त पोस्ट में लिखा था कि लखनऊ में एक पत्रिका के कार्यक्रम में नामवर सिंह ने साहित्यकारों की हैसियत सत्ता के समक्ष कांता यानि जोरू जैसी बताया। वहीं उनके कहानीकार भाई काशीनाथ सिंह ने कहा था कि साहित्यकार गांव के सिवान पर मुंह ऊपर उठाकर भूंकता हुआ कुकूर है। इसी पोस्ट के नीचे बांग्ला की प्रख्यात लेखिका महाश्वेता देवी की अंग्रेजी में लिखी हस्तलिखित प्रतक्रिया थी। जिसका अनुवाद है, मैं यह जानकर बहुत आहत हुई कि सम्मानित लेखक नामवर सिंह ने कहा है कि आज के लेखक सत्ता के समझ लार टपकानेवाले कुत्ते हैं, वे रखैल और जोरू की तरह हैं। उनके छोटे भाई भी उनके इस बयान से सहमत हैं। महाश्वेता देवी ने लिखा कि 29.4.2012 के समाचारपत्र में प्रकाशित समाचार को पढ़कर उनका दिल टूट गया। उन्होंने आगे लिखा कि वो बचपन से ही एक ऐसे भारत में विश्वास करती हैं जिसमें हिंदी, बांग्ला, मराठी, गुजराती, उर्दू व अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य का साझा विकास हो। यह संपदा सिर्फ भारत के पास है। महाश्वेता देवी ने अपनी हस्तलिखित नोट पर 4 मई 2012 की तिथि अंकित की थी। 

नामवर सिंह और काशीनाथ सिंह ने अगर इस तरह का बयान दिया था, महाश्वेता जी के पत्र से तो यही लगता है, तो यह बेहद आपत्तिजनक था साथ ही महिला और साहित्यकार विरोधी भी। हिंदी के शीर्ष आलोचक और प्रमुख कथाकार अगर अपने साथी लेखकों के बारे में इस तरह की बातें करेंगे तो अन्य भाषा के साहित्यकारों की बीच हिंदी जगत की क्या छवि बनी होगी। इस बात की कल्पना की जा सकती है। दरअसल हिंदी में ये देखा जाता है कि जो साहित्यकार शीर्ष पर पहुंच जाते हैं वो अपने साथी साहित्यकारों को हेय दृष्टि से देखने लगते हैं। उनका श्रेष्ठता बोध उनको अहंकारी बना देता है। अशोक वाजपेयी से लेकर रवीन्द्र कालिया तक इसके शिकार रहे हैं। राजेन्द्र यादव इसके अपवाद रहे हैं। वो लेखकों पर तीखा हमला करते थे, नाम लेकर करते थे, लेकिन कभी भी वो समान्यीकरण के शिकार नहीं होते थे। वो इस तरह की गर्वोक्ति नहीं कहते थे कि हिंदी के लेखकों को हवाई जहाज पर मैंने चढ़ाया। जब मैंने निर्भय की फेसबुक वाल पर ये पोस्ट देखी तो मुझे दशकों पहले एक चैनल पर करीब 20 वर्ष हुई परिचर्चा का स्मरण हो उठा। इस परिचर्चा में रवीन्द्र कालिया, ज्ञानरंजन, मैनेजर पांडे, विभूति नारायण राय, संतोष भारतीय,अखिलेश और मैंने हिस्सा लिया था। चर्चा का विषय था हिंदी साहित्य में विवादों का गिरता स्तर। हिंदी साहित्य में विवादों के स्तर पर होते हुई चर्चा साहित्य के सत्ता केंद्रों तक पहुंच गई। संतोष भारतीय ने रवीन्द्र कालिया से दिल्ली के साहित्यिक मठाधीश के बारे में जानना चाहा।  रवीन्द्र कालिया ने चर्चा का रुख मेरी तरफ मोड़ते हुए कहा था कि अनंत उन मठाधीशों को जानते हैं। अनंत उनको साहित्य का ब्रह्मा विष्णु महेश कहते हैं। मैं उन्हें ऐसा नहीं मानता बल्कि मैं उन तीनों को साहित्य का कफ, पित्त और वात कहता हूं। चर्चा में शामिल सभी लोगों को पता था कि कालिया जी नामवर सिंह, अशोक वाजपेयी और राजेन्द्र यादव के बारे में बोल रहे थे। आज से करीब तीस वर्ष या उसके भी पहले हिंदी साहित्य में नामवर सिंह, अशोक वाजपेयी और राजेन्द्र यादव की तूती बोलती थी। नामवर सिंह नियमित अंतराल पर विवादित बयान देते रहते थे। कई बार उन बयानों से लक्षित साहित्यकार या साहित्य समूह आहत भी होते थे। उनके विरुद्ध प्रदर्शन आदि भी होते थे। नरेन्द्र कोहली जी तो जीवनपर्यंत नामवर सिंह के आलोचक रहे और साहित्य को समग्रता में नहीं देखने की प्रवृत्ति के प्रवर्तक भी मानते रहे। अपनी विचारधारा के औसत लेखकों को बढ़ावा देनेवाले और विपरीत विचारधारा वाले लेखकों को हाशिए पर रखनेवाले मठाधीश।

एक बार फिर लौटते हैं नामवर और काशीनाथ सिंह के उक्त बयान पर जिसमें साहित्कारों पर अपमानजनक टिप्पणी की गई। उस टिप्पणी से दोनों भाइयों की मानसिकता का भी संकेत मिलता है। महाश्वेता देवी ने बहुत सधे हुए तरीके से अपनी प्रतिक्रिया दी थी। उस समय फेमिनिज्म का इतना जोर नहीं था अन्यथा नामवर सिंह के कथन पर उनकी जमकर आलोचना होती। प्रश्न ये उठता है कि साहित्य में इस तरह की टिप्पणियां शीर्ष पर माने जानेवाले साहित्यकार क्यों करते थे। दरअसल नामवर सिंह जिस कथित प्रगतिशील विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते थे उसमें महिलाओं को लेकर एक विचित्र भाव था। नामवर सिंह की उक्त टिप्पणी पर याद पड़ता है शायर कैफी आजमी की पत्नी शौकत कैफी से जुड़ा एक प्रसंग। शौकत कैफी ने अपनी किताब ‘यादों की रहगुजर’ में लिखा है कि शादी के बाद वो मुंबई (तब बांबे) में एक कम्यून में रहती थीं। उनको एक बेटा हुआ जो टी बी के कारण काल के गाल में समा गया। शौकत पूरी तरह से टूट गई थीं। दुख से उबरने की कोशिश में उनको पता चला कि वो फिर से मां बनने वाली हैं। अपनी इस खुशी को शौकत ने कम्यून में साझा की । तब शौकत कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ले चुकी थी। पार्टी को जब इसका पता चला तो पार्टी ने शौकत से गर्भ गिरा देने का फरमान जारी किया। ये कैसी अमानवीय विचारधारा है। महिलाओं को लेकर कितना असंवेदनशील रवैया। हिंदी के शीर्ष आलोचक नामवर सिंह उसी विचारधारा के लंबे समय तक ध्वजवाहक रहे थे।  

हिंदी में विवादों की एक लंबी परंपरा रही है लेकिन साहित्यिक सत्ता में जब से मठाधीशी आरंभ हुई तब से व्यक्तिगत टिप्पणियां अधिक होने लगी। व्यक्ति केंद्रित कहानियां पहले से अधिक लिखी जाने लगी। हंस पत्रिका के पुनर्प्रकाशन के बाद इस प्रवृत्ति को मंच मिला। उदय प्रकाश ने कई ऐसी कहानियां लिखीं जिसके केंद्र में साहित्यकार लेखक थे। अशोक वाजपेयी ने साथी लेखकों पर कई व्यक्तिगत टिप्पणियां कीं। नामवर जी को अचूक अवसरवादी कहा। आज कम से उस तरह के विवाद साहित्य जगत में नहीं हैं। अपमानित करने की मंशा से होनेवाले विवादों का धुंध झंट सा गया लगता है।              


Saturday, February 14, 2026

सभ्यतागत चेतना की पुनर्स्थापना


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नए प्रधानमंत्री कार्यालय का शुभारंभ किया। इसका नाम रखा गया सेवा तीर्थ। सेवा तीर्थ के उद्घाटन के अवसर पर प्रधानमंत्री ने गणेश पूजा करके कार्यालय में विधिवत प्रवेश किया। भारत में कार्यारंभ के समय भगवान श्रीगणेश की पूजा की परंपरा रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारतीय परंपरा का ध्यान रखा। प्रधानमंत्री मोदी भारतीय परंपराओं और विधियों का ना केवल ध्यान रखते हैं बल्कि उसको निजी और सार्वजनिक रूप से बरतते भी हैं। इसको भारत की पारंपरिक और आध्यात्मिक चेतना को वापस लाने का प्रयत्न के तौर पर देखा जाना चाहिए। प्रधानमंत्री जब किसी कार्य का आरंभ करते हैं, किसी मंदिर या धर्मस्थल पर जाते हैं तो वहां विधि-विधान के साथ पारंपरिक अर्चना से परहेज नहीं करते हैं। उनके इन कदमों पर कांग्रेस समेत कई अन्य दलों के नेता टीका टिप्पणी करते रहते हैं। उनका आरोप रहता है कि प्रधानमंत्री मोदी हिंदुओं को लुभाने के लिए इस तरह के कार्य करते हैं। इन आरोपों पर कुछ कहना व्यर्थ है क्योंकि हिंदुओं को लुभाने के लिए प्रधानमंत्री ने कभी भी वस्त्र के ऊपर जनेऊ नहीं पहना। कभी भी दिखावे के लिए ना तो पूजा-अर्चना की ना ही दिखावे के लिए श्रद्धावनत हुए। दरअसल मोदी के विरोधी इस बात को नहीं समझते हैं कि प्रधानमंत्री अपने इन कदमों को सभ्यतागत संघर्ष में एक टूल की तरह उपयोग करते हैं। पिछले बारह वर्षों में मोदी ने सभ्यतागत चेतना को विमर्श के केंद्र में लाने के लिए दिन-रात मेहनत की। आज स्वाधीन भारत के इतिहास में वो ऐसे प्रधानमंत्री के तौर पर दिखाई देते हैं जिन्होंने भारतीय सभ्यता को पुनर्स्थापित करने का ना केवल प्रयत्न किया बल्कि उसमें बहुत हद तक सफलता भी प्राप्त की।। सभ्यतागत संघर्ष में आनेवाली बाधाओं का अनुमान जनता बहुत देर से लग पाता है। पर बाधाएं होती बहुत भीषण हैं। धर्म और आध्यामिकता को विमर्श के केंद्र में लाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने जो कदम उठाए वो रेखांकित करने योग्य हैं। आज हमारी सभ्यता और उसकी विरासत राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में है। आलोचकों को लगता है कि ये धर्म और राजनीति का घालमेल है लेकिन ये घालमेल नहीं बल्कि अपनी जड़ों की ओर लौटना है। 

भारतीय ज्ञान परंपरा, भारतीय शोध विधि, भारतीय न्याय संहिता...ये सूची बहुत लंबी हो सकती है। ये सभी आज देश में केंद्रीय विमर्श का हिस्सा हैं। जब प्रधानमंत्री मोदी 2047 में विकसित भारत की बात करते हुए आध्यत्मिकता की बात करते हैं तो हमें स्मरण होता है कि यही काम तो अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी अपने देश में कर रहे हैं। वहां भी धर्म की वापसी को लेकर ना केवल प्रयत्न किए जा रहे हैं बल्कि ईसाई धर्म की ओर युवाओं का लाने के लिए कई तरह के कदमों की घोषणा की जा रही है। कुछ दिनों पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप ने 17 मई को देशव्यापी प्रेयर डे मनाने के लिए अमेरिकी जनता का आह्वान किया। प्रेयर डे के आयोजन की घोषणा क्यों की गई उसका भी जिक्र राष्ट्रपति ट्रंप ने किया। उन्होंने बताया कि पिछले दिनों में चर्च जानेवालों की संख्या बढ़ी है। इस खुशनुमा नवीनीकरण को ध्यान में रखते हुए 17 मई को सभी अमरीकियों को नेशनल माल में प्रार्थना के लिए आमंत्रित कर रहा हूं। उस दिन हमलोग फिर से अपने राष्ट्र अमेरिका को ईश्वर की सत्ता के अधीन करनेवाले हैं। अमेरिका में ईसाई धर्म को लेकर पिछले कुछ वर्षों में आकर्षण बढ़ा है। वहां जिस तरह से नास्तिकता के नाम पर, मानवाधिकार के नाम पर, स्वाधीनता के नम पर अराजकता जैसी स्थिति हो गई थी वो भी सभ्यतागत लड़ाई का ही नतीजा था। आज से कुछ वर्षों पूर्व अमेरिका में थर्ड जेंडर और उनके अधिकारों की बात होती थी लेकिन आज वहां स्पष्ट तौर पर कहा जाता है कि दो ही लिंग होते हैं महिला और पुरुष। पुरुष के मां बनने की बात का उपहास सार्वजनिक रूप से वहां के नीतिनियंता उड़ाते रहते हैं। वहां फिर से ईश्वर में विश्वास वापसी, आस्तिकता और परिवार प्रबंधन में दो से अधिक बच्चे पैदा करने की बातें होने लगी हैं। यह अनायास नहीं है कि ट्रंप के पहले कार्यकाल में पिछले सौ वर्षों में सबसे अधिक संख्या में बाइबिल की बिक्री हुई है। हमारे यहां भी तो पिछले दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने परिवार में तीन बच्चों को शास्त्रसम्मत और विज्ञान सम्मत बताया था। मुंबई में आयोजित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शताब्दी वर्ष के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने प्रश्नों के उत्तर देने के क्रम में डाक्टरों, मनोविज्ञानियों और जनसंख्या विशेषज्ञों का हवाला देते हुए तीन बच्चों को परिवार के लिए उचित बताया। बच्चों की परवरिश के लिए भी। भागवत ने अमेरिका में प्रकाशित पुस्तक चीपर बाय द डिजायन का संदर्भ दिया था। 

अमेरिका के सेक्रेट्री आफ वार ने कहा कि अमेरिका ईसाई राष्ट्र के तौर पर स्थापित हुआ और वैसा ही बना रहेगा। अमेरिका स्वयं को एक बार फिर से 17 मई को ईश्वर को समर्पित करेगा। भारत में भी जब हिंदू राष्ट्र की बात होती है तो उसको पता नहीं किस किस तरीके से परिभाषित किया जाता है। वेबसीरीज और फिल्मों में हिंदू राष्ट्र की एक गंदी छवि प्रस्तुत की जाती है। पर सरसंघचालक समेत तमाम बड़े हिंदूवादी नेताओं ने ये स्पष्ट किया है कि भारत तो पहले से हिंदू राष्ट्र है और उनके अपने तर्क हैं। यहां हिंदू राष्ट्र में किसी का विरोध नहीं है बल्कि भारत में रहनेवाले सभी को हिंदू मानने की अपेक्षा की जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि हिंदू एक जीवन शैली है। मोहन भागवत भी कई बार कह चुके हैं कि पूजा या उपासना पद्धतियां अलग हो सकती है और उससे किसी का भी किसी तरह का विरोध नहीं है। अमेरिका में तो खुलेआम वहां के कांग्रेसजन कह रहे हैं कि शरिया कानून का अमेरिकी मूल्यों के साथ तालमेल नहीं हो सकता है और इसके लिए वहां कोई जगह नहीं है। कांग्रेसमैन ब्रैंडन गिल ने तो सके बाद  स्पष्ट किया कि उनको गर्व है कि वो शरिया मुक्त अमेरिकी काकस का हिस्सा बन गए हैं। 

आज सिर्फ भारत या अमेरिका ही नहीं बल्कि दुनिया के अन्य देशों में अपनी जड़ों की ओर लौटने की व्याकुलता देखी जा सकती है। दुनिया के वो देश जो मानवाधिकार से लेकर जेंडर मुक्त बातों की वकालत करते थे आज इनसे दूर होते दिख रहे हैं क्योंकि स्वाधीनता और स्वायत्ता के नाम पर कथित आधुनिक विचारधारा ने पूरी दुनिया में जो अराजकता फैलाई उसका दुष्परिणाम लंबे समय बात सामने आ रहा है। आज भारत की जनता भी इस बात को समझ चुकी है कि उनके यहां भी स्वाधीनता के बाद आधुनिकता के नाम पर जिस तरह से विदेशी विचारों और मूल्यों को सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों ने थोपा उससे उनका हित नहीं हो सका। राष्ट्र को आधुनिक बनाने के नाम पर जिस तरह के विचारों का पोषण किया गया उसने राष्ट्र को परोक्ष रूप से आंतरिक तौर पर कमजोर और विभाजित किया। चाहे वो भाषा के नाम पर हो, शोध प्रविधि और अध्ययन -अध्यापन के नाम पर हो। अपने पौराणिक ग्रंथों में वर्णित सिद्धातों और प्रविधियों को नजरअंदाज कर विदेशी सिद्धातों को अपनाकर भारतीय विचारों को कुंद किया गया। यही कुछ वर्षों पूर्व अमेरिका में भी हुआ था लेकिन अब वहां भी अपनी जड़ों की ओर लौटने की ललक दिख रही है। सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग भी उसी विचार के हैं। हमारे देश में भी भारतीय पद्धतियों को अपनाने की दिशा में बहुत काम हो चुका है लेकिन गाहे बगाहे अब भी स्वयं को प्रगतिशील कहनेवाले इन कदमों का उपहास करते रहते हैं पर अब उनका ना तो बहुत नोटिस लिया जाता है और ना ही बातों को महत्व मिलता है। 


Sunday, February 8, 2026

युवाओं को लुभा रही पुस्तक


जनवरी में देश के विभिन्न हिस्सों में कई तरह से साहित्यिक आयोजन हुए। दिल्ली में विश्व पुस्तक मेला का आयोजन, छत्तीसगढ़ की राजधानी में रायपुर साहित्य उत्सव, चेन्नई में पुस्तक मेला और उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में साहित्य उत्सव। साहित्यिक आयोजन इस कारण कि वहां लेखकों से संवाद के अलावा पुस्तकों की बिक्री भी हुई। दिल्ली में आयोजित विश्व पुस्तक मेला में पुस्तकों की बिक्री के अलावा फेस्टिवल आफ फेस्टिवल्स का भी आयोजन हुआ। उपलब्ध जानकारी के अनुसार देश के विभिaन्न हिस्सों में आयोजित होनेवाले साहित्योत्सवों ने एक ही मंच पर अलग अलग संवाद सत्र किए। विश्व पुस्तक मेला में पुरी लिटरेचर फेस्टिवल, नालंदा लिट फेस्ट, कोलकाता लिटरेचर फेस्टिवल, भारत लिटरेचर फेस्टिवल आदि ने अपने आयोजन किए। रायपुर साहित्य उत्सव और मुरादाबाद में पुस्तक मेला भी लगा था। लग अलग प्रकाशकों के स्टाल थे। चेन्नई पुस्तक मेला में भी लेखकों से संवाद का कार्यक्रम था। इन सब आयोजनों का स्वरूप अलग था लेकिन एक बात इनमें समान रूप से लक्षित की गई कि पुस्तकों को लेकर समाज में, विशेषकर युवाओं में जबरदस्त आकर्षण देखने को मिला। साहित्य के सत्रों में भी युवाओं की भागीदारी रही। इन आयोजनों ने उस धारणा का निषेध किया कि आज के युवा रील्स देखने में व्यस्त हैं और पुस्तकों और पठन-पाठन में उनकी रुचि घट रही है। ऐसा सिर्फ गमारे देश में नहीं हो रहा है, अमेरिका और यूरोप में भी पुस्तकों की बिक्री बढ़ी है। 

विश्व पुस्तक मेला, दिल्ली के आयोजकों के मुताबिक इस बार मेले में पिछले वर्ष की तुलना में 20 प्रतिशत अधिक पुस्तक प्रेमी पहुंचे। पहले ही दिन से वहां प्रकाशकों के चेहरे खिले हुए थे। प्रकाशकों के चेहरे तभी खिलते हैं जब बिक्री अच्छी होती है। तीन चार प्रकाशकों से बात करने पर ये अनुमान हुआ कि पुस्तकों की बिक्री पिछले वर्ष की तुलना में करीब 30 प्रतिशत अधिक रही है। इस बार विश्व पुस्तक मेला में प्रवेश में कोई टिकट नहीं रखा गया था। कई नवाचार भी किए गए थे। सैन्य इतिहास की थीम पर सजे मेले में सैनिकों की वीरता और शौर्य की कहानियों की पुस्तकें बिक रही थीं, उनपर चर्चा सत्र आयोजित किए गए थे। रेखांकित करनेवाली बात ये रही कि भारत मंडपम में आयोजित पुस्तक मेले में स्वच्छता और अनुशासन का बहुत ध्यान रखा गया था। चेन्नई पुस्तक मेला में बिक्री का आंकड़ा भी उत्साहवर्धक रहा। मुरादाबाद में चार दिनों के आयोजन में सम्मिलित होकर लौटे एक प्रकाशक ने बताया कि स्थानीय होने के बावजूद उनके स्टाल से डेढ़ लाख रुपये से अधिक की बिक्री हुई। रायपुर साहित्य उत्सव के पुस्तक मेले में भी जमकर पुस्तकों की बिक्री हुई। एक प्रकाशक ने तो बताया कि वो जितनी पुस्तकें लेकर आए थे सभी लगभग समाप्त हो गईं। वहां भी युवा खरीदारों की संख्या बहुत अधिक थी। रायपुर् साहित्य उत्सव में तमाशा नहीं था बल्कि साहित्य केंद्र में था। फिल्मों से भी वही लोग आमंत्रित थे जो गंभीर बातें कर सकते थे। इन दिनों आमतौर पर साहित्य उत्सव के नाम पर बीते जमाने के फिल्मी सितारों को आमंत्रित कर लिया जाता है ताकि उनके नाम पर भीड़ जुट सके। रायपुर साहित्य उत्सव और विश्व पुस्तक मेला ने ये साबित किया कि पाठकों को साहित्य और उसकी विधाओं पर गंभीर चर्चा चाहिए। 

जो लोग हिंदी की पुस्तकों को लेकर चिंता प्रकट कर रहे थे उनको भी युवा पुस्तक प्रेमियों ने अपने पुस्तक प्रेम से चौंकाया है। युवाओं के पुस्तकों के पास पहुंचने का मुख्य कारण जो समझ में आता है वो ये कि हिंदी लेखन में विविधता आई है। हिंदी में एक ही तरह की कहानी, कविताओं और उपन्यासों ने पाठकों को दूर किया था। जब से हिंदी लेखन में विविधता आई है और जमकर कथेतर लेखन होने लगा है तो पाठक भी इस ओर आकर्षित होने लगे। अन्य भाषाओं से हिंदी में अनुदित पुस्तकें भी खूब बिक रही हैं। सिनेमा,स्थानीय कहानियां, तकनीक, विज्ञान आदि पर जिस तरह से पुस्तकें आ रही हैं उसने युवा पाठकों के बीच एक उत्सुकता जगाई है। फिक्शन में भी फार्मूलाबद्ध लेखन के चौखटे को तोड़कर कई लेखकों ने देसी कहानियों और देसी माहौल को रचा। इंटरनेट मीडिया पर पुस्तकों की जानकारियां और चर्चा होने के कारण पुस्तकों का व्यापक प्रचार प्रसार होने लगा। पाठकों के बीच पुस्तकों को लेकर उत्सुकता बनी। ई कामर्स प्लेटफार्म पर तो पुस्तकें पहले से बिक रही थीं अब क्विक कामर्स प्लेटफार्म पर भी पुस्तकें उपलब्ध होने लगी हैं। आप पुस्तक के बारे में सोचें, आर्डर करें और 10 से 15 मिनट में पुस्तक आपके हाथ में पहुंच जाती है। इसने भी समाज में एक वातावरण का निर्माण किया। ये भी प्रचार किया गया कि भारत में युवाओं की एकाग्रता अवधि (कंस्ट्रेशन स्पैन) चंद सेकेंड की रह गई है। जब ये भ्रामक प्रचार फैला तो युवाओँ ने अपनी एकाग्रता अवधि को जांचने के लिए पुस्तकों की ओर लौटना आरंभ किया। परिणाम ये हुआ वो पुस्तकों के नजदीक पहुंचे और उनको पढ़ने में आनंद आने लगा। प्रकाशन व्यवसाय से जुड़े लोगों का कहना है कि कोरोना काल के दौरान पुस्तकों के प्रति रुझान देखने को मिला था। कोरोना काल के समाप्त होने के बाद ये रुझान आकर्षण में बदला। एक और कारण जो समझ में आता है वो ये कि पुस्तकों का प्रोडक्शन भी उन्नत कोटि का हो गया है। अच्छी छपाई और अच्छी प्रिंटिंग और बाइंडिंग के कारण पाठकों को पुस्तकों ने अपनी ओर खींचा। पहले की तुलना में पुस्तकों के मूल्य भी तर्कसंगत हुए। पेपरबैक संस्करण की क्वालिटी भी अच्छी होने लगी है। कुल मिलाकर देखा जाए तो इन आयोजनों में किशोरों और युवाओं की भागीदारी पुस्तकों के प्रति आश्वस्ति देती प्रतीत होती है।


Saturday, February 7, 2026

जातिसूचक फिल्म शीर्षक पर बवाल


इस सप्ताह मनोज वाजयेपी अभिनीत फिल्म घूसखोर पंडत के नाम पर उठा विवाद उठा। ये फिल्म ओवर द टाप प्लेटफार्म (ओटीटी) नेटफ्लिक्स पर रिलीज होनेवाली थी। उसका ट्रेलर सामने आते ही इसके नाम को लेकर विवाद आरंभ हो गया। कई शहरों में इसके विरुद्ध प्रदर्शन हुए। लखनऊ में केस दर्ज होने और भारत सरकार के दखल के बाद फिल्म के निर्माताओँ ने ना सिर्फ ट्रेलर बल्कि इंटरनेट मीडिया पर मौजूद सभी प्रकार की प्रचार सामग्री हटा ली। फिल्म के निर्देशक ने एक लिखित बयान जारी किया जिसमें अपनी सफाई दी। कहा कि फिल्म का टाइटल एक कालपनिक चरित्र को ध्यान में रखकर तय किया गया था। फिल्म के शीर्षक किसी समुदाय विशेष को लक्षित करने के इरादे नहीं रखा गया था। अपने लंबे बयान में नीरज ने अपने पूर्व के कामों को भी याद किया। ये भी स्वीकार किया कि इस फिल्म के शीर्षक से कुछ लोगों की भावनाएं आहत हुई हैं। वो लोगों की भावनाओं का सम्मान करते हुए फिल्म से जुड़ी सभी प्रचारात्मक सामग्री हटा रहे हैं। जल्द ही फिल्म को दर्शकों के सामने पेश करने का भरोसा भी दिया। अपने बयान में नीरज ने कंटेंट के इंटेट की बात भी की। प्रश्न ये उठता है कि बार-बार हिंदुओं को ही क्यों लक्षित किया जाता है। नीरज पांडे को ऐसी कहानी कैसे मिली कि उसमें पंडत को ही घूसखोर दिखाया गया। क्या नीरज पांडे कभी ऐसी कहानी पर काम कर पाएंगें या ऐसी फिल्म बनाने का साहस कर पाएंगे जिसका शीर्षक घूसखोर मौलाना या भ्रष्ट पादरी होगा। उत्तर नकारात्मक ही होगा।

नीरज पांडे की इस फिल्म ने एक बार फिर से हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की मंशा पर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। एक बार फिर से ओटीटी प्लेटफार्म के नियमन को लेकर चर्चा होने लगी है। क्या ओटीटी के लिए भी किसी प्रकार के प्रमाणन या नियमन की आवश्यकता है। ये पहली बार नहीं हो रहा है कि ओटीटी प्लेटपार्म पर चलनेवाली सामग्री को लेकर जनता का गुस्सा फूटा हो। इसके पहले भी याद करिए जब राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा समारोह आयोजित होनेवाला था तो उसके कुछ दिनों पूर्व नेटफ्लिक्स पर एक तमिल फिल्म अन्नपूर्णी रिलीज की गई। नेटफ्लिक्स पर प्रसारित इस फिल्म में दिखाया गया था एक ब्राह्मण लड़की देश का श्रेष्ठ शेफ बनना चाहती है। उसको कहा गया कि इसके लिए उसको नानवेज खाना बनाना होगा। इस फिल्म के संवाद में प्रभु श्रीराम को मांसाहारी बताया गया। हिंदू लड़की को नमाज पढ़ते हुए दिखाया गया। तर्क ये दिया गया कि उसने बिरयानी बनाना एक मुस्लिम महिला से सीखा था इसलिए आभार प्रकट करने के लिए उसने नमाज पढ़ी। नेटफ्लिक्स पर आने के बाद इसके संवाद और दृष्य पर मुकदमा हुआ। केस के बाद इसके निर्माता कंपनी ने क्षमा मांगी। इस फिल्म को नेटफ्लिक्स से हटाया गया। ये सब कलात्मक अभिव्यक्ति के नाम पर हुआ लेकिन 22 जनवरी को श्रीरामजन्मभमि मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के पहले इस तरह के कंटेंट का आना इंटेंट पर प्रश्न तो खड़े करता ही है। सिर्फ नेटफ्लिक्स ही क्यों प्राइम वीडियो पर जब वेबसीरीज तांडव रिलीज हो रही थी तब उसको लेकर भी काफी हंगामा हुआ था। लखनऊ में केस दर्ज हुआ था। प्राइम वीडियो से जुड़ी अपर्णा पुरोहित से लखनऊ पुलिस ने पूछताछ भी की थी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुरोहित को अग्रिम जमानत देने से मना कर दिया था। पिछले कई सालों से ओटीटी प्लेटफॉर्म पर दिखाई जानेवाले वेब सीरीज की सामग्री और फिल्मों को लेकर विवाद होते रहे हैं। हिंदू धर्म प्रतीकों के गलत चित्रण के आरोप लगते रहे हैं। दरअसल स्वनियमन या त्रिस्तरीय नियमन के नाम पर जो व्यवस्था बनाई गई है उसमें बहुत सारे झोल हैं। उन्हीं झोल का फायदा ये प्लेटफार्म्स उठाते रहे हैं। यूजीसी गाइडलाइंस को लेकर समाज का एक वर्ग उद्वेलित था। ऐसे वातावरण में घूसखोर पंडत की घोषणा ने उनके जख्मों पर नमक छिड़कने का काम किया।

एक दूसरा समाचार जो दिल्ली पुलिस के हवाले से सामने आया। समाचार था दिल्ली से गायब होनेवाली लड़कियों और महिलाओं को लेकर। अचानक इंटरनेट मीडिया पर इस खबर ने जोर पकड़ा कि दिल्ली से भारी संख्या में लड़कियां और महिलाएं गायब हो रही हैं। रिपोर्ट को इस तरह से प्रस्तुत किया गया कि अमुक अवधि में अमुक संख्या में लड़कियां और महिलाएं गायब हो रही हैं। सामने आए आंकड़े डरानेवाले थे। रिपोर्ट आधारित समाचार में गुमशुदा लोगों की बरामदगी का उल्लेख नहीं था। बाद में इन आंकड़ों पर विमर्श बढ़ा। देश की राजधानी में जब ये विमर्श बढ़ा तो दिल्ली पुलिस हरकत में आई। पुलिस ने अपने एक्स हैंडल पर पोस्ट करके बताया कि चंद संकेतों या प्रारंभिक जानकारी को जांचने के बाद ये सामने आया कि दिल्ली से गुमशुदा लड़कियों की संख्या पेड प्रमोशन का हिस्सा है। दिल्ली पुलिस ने स्पष्ट किया कि डर का माहौल बनाकर लाभ कमाने वालों को बख्शा नहीं जाएगा और इस तरह का वातावरण बनानेवालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। ये स्पष्ट तो नहीं है कि कौन इस तरह का वातावरण बनाकर लाभ कमाना चाहता है। संयोग है कि इसी समय फिल्म मर्दानी-3 रिलीज हुई थी। इस फिल्म की कहानी भी गुमशुदा लड़कियों और उनकी बरामदगी की है जिसमें रानी मुखर्जी लीड रोल में है। कैसे लड़कियां गायब होती हैं और किन-किन गैंगों का इसमें हाथ रहता है। यह बिल्कुल नहीं कहा जा रहा है कि मर्दानी फिल्म को लाभ पहुंचाने के लिए ही दिल्ली में लड़कियों के गायब होने की रिपोर्ट पर चर्चा हुई। अगर दिल्ली पुलिस कह रही है कि उस रिपोर्ट को प्रचारित करना पेड प्रमोशन का हिस्सा है तो उसको इसकी जांच तो करनी ही चाहिए। पेड प्रमोशन में हिस्सा लेकर लाभ कमाने की कोशिश करनेवालों को दिल्ली पुलिस को सामने लाना चाहिए।

एक तर्क ये भी दिया जा रहा है कि प्रचार के लिए घूसखोर पंडत नाम रख दिया गया। इस तरह के तर्क के बाद दर्शक ये सोचने को विवश हो जाता है कि क्या फिल्मकारों को अब अपनी कला पर भरोसा नहीं रहा। क्या उनको अपनी स्टोरीटेलिंग पर विश्वास नहीं रहा और वो प्रचार के विभिन्न हथकंडों को अपनाने लगा। फिल्म धुरंधर ने 1000 करोड़ रुपए से अधिक का बिजनेस किया लेकिन फिल्म को सफल बनाने के लिए निर्देशक आदित्य धर ने किसी प्रकार के सनसनी फैलाने वाले हथकंडे का उपयोग नहीं किया। आदित्य धर कहानी कहने के अपने हुनर और फिल्म की कहानी पर भरोसा था। दर्शकों ने उस भरोसे को सही साबित किया। धुरंधर को लेकर भी कुछ लोगों ने नकारात्मक प्रचार करने की कोशिश की लेकिन उसको दर्शकों ने नकार दिया। हिंदी फिल्मों में जब से भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) से जुड़े लोग कहानी और गाने लिखने लगे तब से ही सनातन धर्म प्रतीकों का उपहास बढ़ा। इस स्तंभ में पिछले दिनों जावेद अख्तर से पूछे गए प्रश्न की चर्चा की थी। वो प्रश्न अब भी अनुत्तरित है कि क्या लेखक का मजहब उसकी कृति को प्रभावित करती है। अब उस प्रश्न का दायरा और बढ़ा देता हूं कि क्या लेखक की विचारधारा कहानी में जबरदस्ती अपने विचार ठूंसती है।

 

Saturday, January 31, 2026

उतरने लगा लेखक संघों के मुखौटे का रंग


हमारे देश में कम्युनिस्ट पार्टियों ने अपने बौद्धिक प्रकोष्ठ बनाए थे। उनका नाम लेखक संगठन रखा था। इन लेखक संगठनों को स्वायत्त होने का वातावरण बनाया गया था। जबकि ये परोक्ष तौर पर राजनतिक दल से जुड़े थे। लंबे समय तक यही होता रहा और इन लेखक संगठनों से जुड़े लोग राजनीतिक बयानबाजी करते रहे। राजनीतिक मुद्दों को अपनी रचनाओं में उठाते रहे। इसका लाभ उनके पितृ संगठन यानि कम्युनिस्ट पार्टियों को मिलता रहा। कालांतर में ये लेखक संगठन एक्सपोज होते चले गए। लेखक संगठन लेखकों के कल्याण के लिए कुछ नहीं करके अपने राजनीतिक आकाओं की लक्ष्य प्राप्ति का वातावरण बनाने में लगे रहे। जैसे-जैसे कम्युनिस्ट पार्टियों में विभाजन होता गया लेखक संगठन भी बंटते चले गए। प्रगतिशील के बाद जनवादी और उसके बाद जन संस्कृति नाम से संगठन बने। जनवादी लेखक संगठन और जन संस्कृति मंच तो अधिकतर वार्षिक आयोजनों तक सिमट कर रह गए हैं। नियमित रूप से फेसबुक आदि पर उनके पदाधिकारी कुछ लिखकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेते रहे हैं। फासीवाद और अधिनायकवाद जैसे नारे वर्षों से कागजों में लगते रहे हैं। यही बात अलग अलग तरीके से कम्युनिट पार्टियां भी करती रही हैं। प्रगतिशील लेखक संघ की बिहार ईकाई सक्रिय थी लेकिन अब वहां भी संगठन बंटा नजर आ रहा है। दो अलग अलग गुटों के अपने अपने पदाधिकारी हैं। ये तो इन लेखक संगठनों की स्थिति है, लेकिन अभी एक बहुत ही मजेदार स्थिति पैदा हुई है। कुछ समय पूर्व प्रगतिशील लेखक संगठन ने पूर्व पुलिस अधिकारी और कुलपति विभूति नारायण राय को अपना कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया था। 

राय के कार्यकारी अध्यक्ष बनने के बाद भी संगठन के क्रियाकलापों में तेजी आई हो ऐसा दिखा नहीं। एकाध आयोजन आदि हुए लेकिन लेखकों के व्यापक हित में संगठन ने कुछ कार्य किया हो, ज्ञात नहीं हो सका। विनोद कुमार शुक्ल और एक दो अन्य लेखकों ने प्रकाशकों को एकतरफा पत्र भेजकर पुस्तक प्रकाशन  का अधिकार वापस लेने की बात की। लेखक संगठनों ने कभी भी इन मसलों में हस्तक्षेप नहीं किया। न तो प्रकाशकों के हित में और ना ही लेखकों के हित में। इन लेखक संगठनों को ये भी समझ नहीं आ सकी कि कोई लेखक एकतरफा करार को कैसे रद कर सकता है। उसी तरह प्रकाशकों के साथ बैठकर लेखकों को मिलनेवाली रायल्टी पर भी कुछ ठोस नहीं कर सके। इनकी सारी ऊर्जा अपने राजनीतिक आकाओं को प्रसन्न करने में लगी रही। इन लेखक संगठनों ने लेखकीय अस्पृश्यता को भी जमकर बढ़ावा दिया। अपने से अलग विचारधारा वाले लेखकों के साथ संवाद नहीं करना इनकी प्राथमिकता में रहा। इस तरह लेखकों को बांटने का काम भी इन संगठनों ने किया। कभी भी इन लेखक संगठनों ने अलग अलग विचार वाले लेखकों को साथ बैठाकर साहित्यिक प्रवृत्तियों पर चर्चा करने का मंच उपलब्ध नहीं करवाया। परिणाम ये रहा कि इन लेखक संगठनों का दायरा सिकुड़ता चला गया। भारतीय समाज हमेशा से समावेशी रहा है। समाज के इस चरित्र को समझने में कम्युनिस्ट लेखक संगठन असफल रहे और अपने ही बने दायरे में घूमते रहे। विभूति नारायण राय ने प्रगतिशील लेखक संघ के कार्यकारी अध्यक्ष होने के बावजूद जब लेखक संघों की भूमिका पर सवाल उठाए तो उनके  विचार को निजी विचार माना गया। प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव सिरसा ने एक पत्र जारी किया जिसमें राय को कठघरे में खड़ा किया गया। उस पत्र में ही बताया गया कि राय ने एक इंटरव्यू में कहा कि लेखक संगठनों की अब कोई भूमिका नहीं बची है और उनको बंद कर दिया जाना चाहिए। दूसरी टिप्पणी राय की ये थी कि देश में पिछले चार दशकों से भी अधिक समय से सशक्त वामपंथी संघर्ष के अंत के आसार दिखने लगे हैं। दूसरी टिप्पणी को उन्होंने 2025 की उपलब्धि के तौर पर रेखांकित किया। 

प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव के हस्ताक्षर से जारी पत्र में लिखा गया है कि प्रगतिशील लेखक संघ का राष्ट्रीय नेतृत्व अपने कार्यकारी अध्यक्ष के विचारों से सहमत नहीं है। माओवाद के खात्मे पर सिरसा के पत्र में लिखा है कि जिन जगहों से माओवादी के सफाए को विभूति जी ने अमित शाह की उपलब्धि के तौर पर रेखांकित किया है वो सभी आदिवासी क्षेत्र हैं। जिनको माओवादी कहकर मारा गया है उन घनाओं पर भी झूठे एनकाउंटकर के आरोप लगे हैं। सिरसा के इस पत्र का विभूति नारायण राय ने उत्तर दिया और लिखा कि लेखक संगठनों को अब व्हाट्सएप लेखक संगठन कहना उचित होगा। राय ने अपने पत्र में अपनी विचारधारा का प्रदर्शन भी किया, लेकिन बहुत ही सधे तरीके से सिरसा को और उनकी आलोचना करनेवालों की ठीक से खबर भी ले ली। विभूति नारायण राय ने सिरसा के पत्र का जो उत्तर दिया है उसमें अपने इस्तीफे की पेशकश भी कर दी और संगठन के दायित्वों से मुक्त होने की बात लिखी। विभूति ने लिखा कि संगठन अनुशासन से चलता है लेकिन साहित्येतर अनुशासन किसी भी लेखक के लिए आत्महत्या जैसा है। हलांकि लेखक संघ ने उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया है। संभव है कि विभूति के तार्किक पलटवार को झेल पाने में संगठन सक्षम नहीं हो। राय ने दक्षिणपंथी सच्चिदानंद जोशी और रामबहादुर राय को कार्यक्रम में बुलाने पर भी अपना पक्ष रखा और माओवाद के खात्मे वाली टिप्पणी पर भी। प्रगतिशील लेखक संगठन के इस विवाद ने एक बार फिर से कम्युनिस्टों की बराबरी और समानता के दावों और नारों की पोल खोल दी है। कम्युनिस्ट दावे बराबरी की करते हैं लेकिन वैचारिक आधार पर समाज को बांटनेवाली ये विचारधारा अपने विरोधियों को एक मिनट भी झेल नहीं सकती। इनका चरित्र समावेशी बिल्कुल नहीं है। ये दूसरों पर फासीवादी होने का आरोप जड़ते हैं लेकिन इनका स्वयं का चरित्र फासीवादी है। ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करते हैं लेकिन अगर इनके संगठन से जुड़ा कोई व्यक्ति भी सच कहने का साहस करे तो संगठन से जुड़े लोग झुंड बनाकर उनपर आक्रमण करते हैं। उनको नेतृत्व का भी शह प्राप्त होता है। 

इस पूरे प्रसंग से एक बात साफ हो गई है कि बचे-खुचे लेखक संगठनों में आंतरिक लोकतंत्र और विमर्श की कोई जगह शेष नहीं है। इस प्रसंग में एक और खतरनाक बात सिरसा ने लिखी है। उन्होंने अन्य नामों के साथ उमर खालिद के नाम का भी उल्लेख करते हुए लिखा कि उनको कानूनी शिकंजे में फंसाकर परेशान किया जा रहा है। सिरसा को क्या ये पता नहीं कि देश की अदालतों ने उमर खालिद को जमानत देने से इंकार कर दिया है। वो दंगे का आरोपी है। दरअसल ये होता तब है जब आप राजनीतिक दल के बौद्धिक प्रकोष्ठ की तरह कार्य करते हैं। राजनीतिक दलों की राय पर चलनेवाली बुद्धिजीवियों से लेखकीय स्वतंत्रता की अपेक्षा करना ना सिर्फ बेमानी है बल्कि असंभव भी है। कम्युनिस्ट पार्टियों से संबद्ध इन लेखक संगठनों को अगर पुनर्जीवित होना है तो उनको अपने पितृ संगठनों से मुक्त होकर समावेशी और उदार बनना होगा। भारत में सोवियत रूस या चीन की नीतियां नहीं चल सकतीं, वहां का समाज अलग है और भारत का समाज अलग है।