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Wednesday, October 14, 2026

दिल्लगी ने दी हवा


गोवा में आयोजित होनेवाले भारतीय अंतराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में कुछ वर्षों पूर्व एक सत्र के दौरान करण जौहर ने कहा था कि पहले फिल्मों में दो-तीन प्रकार की कहानियां ही दर्शकों को पसंद आती थीं। अगर मुझे ठीक याद आ रहा है तो करण ने कहा था कि एक तो खोया पाया का फार्मूला और दूसरा प्रेम त्रिकोण वाली कहानी को दर्शक खूब पसंद करते हैं। करण जौहर के उस वक्तव्य के बाद वहां उपस्थित फिल्म इतिहासकारों से इसपर चर्चा भी हुई थी। उस चर्चा में फिल्म दोस्ताना नहीं आई थी। फिल्म दोस्ताना करण जौहर के पिता यश जौहर की फिल्म है। इस फिल्म की कहनी भी प्रेम त्रिकोण ही है। विजय (अमिताभ बच्चन) और रवि (शत्रुघ्न सिन्हा) दो दोस्त हैं जिनको शीतल (जीनत अमान) से प्यार हो जाता है। रवि बिंदास अंदाज में शीतल से प्यार की पींगे बढ़ाता है वहीं रवि खामोश मोहब्बत करता है। शीतल रवि को दोस्त समझती है। उसको भी रवि के प्यार का अनुमान नहीं है। रोचक तरीके से कहानी कई दिलचस्प मोड़ लेती हुआ आगे बढ़ती है। रवि और विजय दोस्त से दुश्मन बन जाते हैं। कहानी के एक नाटकीय मोड़ से रवि को विजय की उसके प्रति भावना का पता चलता है। वो बेचैन हो जाता है। इस फिल्म को राज खोसला ने निर्देशित किया था। राज खोसला अपने जमाने के बेहतरीन निर्देशकों में गिने जाते थे। उन्होंने सलीम-जावेद की दोस्ताना की कहानी का ट्रीटमंट ऐसा किया कि दर्शकों को फिल्म भा गई। जो कहानी कई बार कही जा चुकी थी उसको दर्शकों का खूब प्यार मिला। 1980 में रिलीज हिट फिल्मों में दोस्ताना भी शामिल है। 

फिल्म दोस्ताना के बनने की कहानी भी दिलचस्प है। राज खोसला ने मराठी उपन्यास आशी तुझी प्रीत पर आधारित एक हिंदी फिल्म निर्देशित की थी जिसका नाम था ‘मैं तुलसी तेरे आंगन की’। इस फिल्म के बाद राज खोसला की शराब से ऐसी दोस्ती हुई कि वो कहने लगे थे कि अब फिल्म नहीं बस स्काच के साथ जिंदगी बिताई जाएगी। ये वही दौर था जब यश जौहर फिल्मों की पब्लिसिटी और प्रबंधन से मुक्त होकर फिल्म बनाना चाह रहे थे। वो राज खोसला के पास पहुंचे और उनसे फिल्म निर्देशित करने का अनुरोध किया। पहले तो राज खोसला ने मना कर दिया लेकिन यश जौहर ने हार नहीं मानी। उनके पास सलीम-जावेद की कहानी थी। सलीम जावेद का हिंदी फिल्मों में डंका बज रहा था। एक दिन यश जौहर ने राज खोसला से आग्रह किया कि वो कहानी सुन लें। खोसला ने जब कहानी सुनी तो हां कर दी। अब कास्टिंग की बात आरंभ हुई। अमिताभ को राज खोसला ने एक फिल्म में डायरेक्ट किया था। वो तय ही थे। जीनत अमान और विनोद खन्ना भी फाइनल किए गए। राज खोसला और विनोद खन्ना ने कई फिल्में साथ की थीं। दोनों में बहुत अच्छी दोस्ती थी। फिल्म दोस्ताना की रिलीज के दो साल पहले मुकद्दर का सिकंदर रिलीज हुई थी। उस फिल्म में अमिताभ बच्चन और विनोद खन्ना दोनों की दमदार उपस्थिति थी। विनोद खन्ना अपेक्षाकृत अधिक खूबसूरत थे। सब तय हो गया था। कहानी में राज खोसला ने कुछ बदलाव बताए जिसको सलीम-जावेद ने स्वीकार कर लिया था। स्टारकास्ट भी फाइनल ही था। अचानक एक दिन राज खोसला ने कहा कि विनोद खन्ना को दोस्ताना में लेना ठीक नहीं होगा। जब उनसे कारण पूछा गया तो बोले कि नायिका विनोद खन्ना जैसे खूबसूरत हीरो को छोड़कर अमिताभ बच्चन के साथ क्यों जाएगी। यहीं से फिल्म में शत्रुघ्न सिन्हा के चयन का रास्ता साफ हुआ। 

1980 में रिलीज हुई फिल्म दोस्ताना को उसके गानों के लिए भी याद किया जाता है। सलीम खान कहते भी हैं कि राज कपूर के बाद राज खोसला को ही कहानी और उसमें संगीत के उपयोग की शानदार समझ थी। जिस तरह से राज कपूर संगीत को समझ कर अपनी फिल्मों में उसका उपयोग करते थे उसी तरह से राज खोसला भी अपनी फिल्मों को संगीत से बढ़ाते थे। इस गाने को याद करिए- मेरे दोस्त किस्सा ये क्या हो गया, सुना है कि तू बेवफा हो गया। आनंद बक्षी के इस गीत को मोहम्मद रफी की आवाज ने अमर कर दिया। फिल्म में कहानी के जिस मोड़ पर इस गाने का उपयोग राज खोसला ने किया वो बेहतरीन है। इसी तरह से फिल्म का आरंभ भी एक गीत से ही होता है जिसको मोहम्मद रफी और किशोर कुमार ने आवाज दी है। आनंद बक्षी ने लिखा और लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने संगीत दिया । गाने के बोल हैं- सलामत रहे दोस्ताना हमारा। मोहम्मद रफी और किशोर कुमार के साथ गाए गानों में ये गाना बहुत ही अधिक पसंद किया गया या कह सकते हैं कि अब भी किया जाता है। जब करेण जौहर कह रहे थे कि प्रेम त्रिकोण वाली फिल्में भारतीय दर्शक पसंद करते हैं तो उनके जेहन में अवश्य फिल्म दोस्ताना भी रही होगी क्योंकि बहुत लंबे समय तक धर्मा प्रोडक्शन की सबसे हिट फिल्म दोस्ताना ही थी। 


Saturday, October 10, 2026

साहित्यिक वक्ताओं की तैयारी पर प्रश्न


बात कड़वी लग सकती है लेकिन सच्चाई यही है। हद तो यह हो गई कि एक वक्ता कुंवर नारायण की जगह निर्मल वर्मा पर बोलने लगे। टोकने पर उसको स्मृति दोष बताने लगे। यह बात भी उचित है कि कुछ वक्ताओं को ही हर विषय पर बोलने के लिए बार-बार क्यों बुला जाता है। असल में रजा न्यास दरबारियों को प्राथमिकता देता है। दो दिन तक में इस कार्यक्रम में बतैर श्रोता मौजूद रहा, और एकाध वक्ताओं को छोड़ दें तो किसी ने भी कुंवर नारायण को पढ़ा नहीं था। यह कहने के बाद हो सकता है कि रजा न्यास मुझे बतौर श्रोता भी आमंत्रित नहीं करे लेकिन जिस तरह से सरकारी संस्थाओं में इस तरह के आयोजन रस्मी होते हैं रजा न्यास के आयोजन भी उसी तरह के होते हैं, जिसमें चमचों को माइक दिया जाता है। यह कठोर टिप्पणी लिखी है दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापक और हिंदी के प्रतिष्ठित लेखक प्रभात रंजन ने। प्रभात रंजन बात कर रहे हैं हिंदी कवि कुंवर नारायण के जन्मशताब्दी के अवसर पर रजा न्यास के दो दिवसीय आयोजन की। रजा न्यास लेखक अशोक वाजपेयी की साहित्यिक दुकान है। ये संस्था नियमित रूप से कार्यक्रम आदि आयोजित करती है। इनके कार्यक्रमों में कुछ ऐसे लोगों को आमंत्रित किया जाता है जो अशोक वाजपेयी के हर कार्यक्रम में उपस्थित होते हैं। चाहे उनको पुरस्कार दिया जा रहा हो या फिर किसी लेखक कवि पर केंद्रित गोष्ठी आयोजित की जा रही हो। हिंदी के वर्तमान साहित्यिक परिदृष्य में बहुत ही कम ऐसे लेखक हैं जो किसी गोष्ठी में जाने के लिए मना करते हैं। अध्ययन हो या न हो। 

प्रभात रंजन की टिप्पणी हिंदी साहित्य की किसी राजनीति के अंतर्गत नहीं लिखी गई है बल्कि क्षोभ से उपजी हुई है। कुंवर नारायण समकालीन हिंदी साहित्य के ऐसे कवि या लेखक हैं जिनका रचना संसार विस्तृत है। उन्होंने श्रेष्ठ कवितें लिखी हैं। उनकी कविताओं में कई परतें हैं जिनको समझने के लिए भारतीय काव्य परंपरा का गहन अध्ययन होना चाहिए। काव्य परंपरा के साथ साथ भारतीय परंपराओं का ज्ञान भी होना चाहिए। कुंवर नारायाण ने अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल के बहाने विश्व सिनेमा पर भी बहुत गंभीर टिप्पणियां की थीं जो उनके अध्ययन क्षेत्र का सूचक है। हिंदी साहित्य में कम ही ऐसे लेखक और कवि हुए हैं जिन्होंने अंतराष्ट्रीय सिनेमा पर अधिकारपूर्वक लिखा हो। ऐसे लेखक के जन्म शताब्दी समारोह में इस तरह के हल्के, अज्ञानी और लापरवाह वक्ताओं को बुलाकर दिवंगत लेखक का अपमान करना ही माना जाएगा। आप कल्पना करिए कि जन्म शताब्दी समारोह कुंवर जी की मनाई जा रही हो और मंच से कोई वक्ता निर्मल वर्मा पर बोलने लगे। यह तो लेखक और मंच दोनों का अपमान है। लापरवाही की हद तब होती है जब उनको याद दिलाया गया तो वो कहने लगे कि स्मृति दोष के कारण कुंवर जी की बजाए निर्मल जी पर बोलने लगे थे। यह बहुत ही गैर जिम्मेदारी वाला अप्रोच है। इस तरह की घटनाएं हिंदी साहित्य की गोष्ठियों में आम है। आप किसी विषय पर सुनने जाएंगे लेकिन इसकी गारंटी नहीं है कि वक्ता उसी विषय पर बोलें। वक्ता अपनी मर्जी से बोलते हैं और वक्तव्य के बीच में एक दो बार विषय का नाम ले लेते हैं ताकि ऐसा प्रतीत हो कि वो विषय पर बोल रहे हैं।  जन्म शताब्दी जैसे आयोजनों में तो ये खूब होता है। आप अपने पूर्वज लेखक की रचनाशीलता और उसके विभिन्न कोणों के बारे में जानने सुनने के लिए ऐसी गोष्ठियों में जाते हैं लेकिन वक्ता अपने और उनके संबंधों के बारे में बखान करने लग जाते हैं। उनको लगता है कि श्रोताओं को उनकी चतुराई समझ नहीं आती। श्रोता सब समझते हैं.  

यह अकारण नहीं है कि हिंदी साहित्य से जुड़ी गोष्ठियों में श्रोता नहीं या कम मिलते हैं। गोष्ठियों में श्रोताओं को कुछ नया मिलना लगभग बंद हो गया है। जो भी वक्ता आते हैं उनमें से अधिकतर बगैर किसी तैयारी के अपने ज्ञानदंभ के साथ आते हैं। जो मन आता है वो बोलकर चले जाते हैं। श्रोता बेचारा ठगा रह जाता है। अशोक वाजपेयी का ही उदाहरण लीजिए। वो अच्छे वक्ता माने जाते हैं। लच्छेदार हिंदी और अंग्रेजी बोलते हैं। उनके पास संस्मरणों का खजाना भी है। पर तय विषय पर उनको बोलते कम ही सुना गया है। आखिरी बार किसी गोष्ठी में तय विषय पर अशोक वाजपेयी कब बोले इसपर तो शोध हो सकता है। उनकी विशेषता है कि वो मंच पर आते हैं। आरंभ कुछ हल्की फुल्की बातों से करते हैं। फिर एकाध संस्मरण सुनाते हैं और तय विषय को छूते हुए निकल जाते हैं। बात रामचंद्र शुक्ल के कविता क्या है जैसे लेख पर होगी तो वो ये बताएंगे कि उनका रामचंद्र शुक्ल का अध्ययन कितना कम है। अरे भले आदमी अगर आपका अध्ययन कम है तो मत बोलिए। मंच और माइक का लोभ संवरण कर पाना बहुत कठिन कार्य है। नामवर सिंह भी अपने आरंभिक दिनों में बहुत तैयारी के साथ बोलते थे। उनके व्याख्यानों में तथ्य और तर्क दोनों होते थे। इसलिए लोग उनको सुनने के लिए घंटों प्रतीक्षा करते थे। बढ़ती अवस्था के साथ-साथ मंच और माइक के आकर्षण ने उनको भी वक्तव्य पूर्व की तैयारी से दूर कर दिया। वो भी अपने अनुभवों के आधार पर बोलने लगे थे। परिणाम होता था कि जब नामवर सिंह किसी पुस्तक लोकार्पण में जाते थे तो मंच पर ही पुस्तक को उलटते-पलटते थे। अपने भाषण में पुस्तक की दो-तीन पंक्तियां उद्धृत करते हुए लेखक पर तले जाते थे। यह अकारण नहीं था कि बाद के दिनों में नामवर सिंह मंच से हर किसी की प्रशंसा करने लगे थे। प्रशंसा कर देने से प्रश्न नहीं उठते हैं। 

इस तरह की गोष्ठियों और वक्ताओं से हिंदी साहित्य समृद्ध नहीं होता। ना ही लेखक की कृति पर चर्चा हो पाती है। तात्कालिक रूप से लेखकों को अच्छा लग सकता है कि नंच से उसकी प्रशंसा हुई पर कुछ समय बाद उसको कोई याद भी नहीं रखता क्योंकि कोई सार्थक बात तो हुई नहीं। दूसरी तरफ अशोक वाजपी जैसे वक्ताओं को जो बेहतर बोल सकते हैं वो भी संस्मरणात्मक घटनाओं से आगे नहीं बढ़ पाते हैं। संस्मरणों की हल्की फुल्की बातें सुनाकर श्रोतों का मनोरंजन तो हो सकता है लेकिन ज्ञानवर्धन नहीं। विषय के साथ न्याय के लिए आवश्यक है कि उसपर बोलने के लिए पर्याप्त तैयारी की जाए। कुछ ऐसा विश्लेषण या तथ्य प्रस्तुत किया जा सके जिससे श्रोता समृद्ध हो सकें, साहित्य की चौहद्दी बढ़े। किसी कृति पर बोलने के पहले यह भी आवश्यक है कि उसकी लेखन प्रकृत्ति की परंपरा को रेखांकित करते हुए इस बात का आकलन किया जाए कि अमुक कृति ने उस परंपरा को आगे बढ़ाया या उसमें कुछ जोड़ा या नहीं। पाठकों के सामने कृति के उस पक्ष को रखा जाना चाहिए जिसको लेखक स्पष्ट नहीं कर पाया हो। यही काम तो आललोचना का भी था और यही काम गोष्ठियों में अपने विचार प्रस्तुत करनेवालों का भी है। प्रभात रंजन की टिप्पणी में दरबारियों और चमचों की भी बात की गई है। कम से कम ये साहित्य का भला तो नहीं कर सकते। 


Saturday, October 3, 2026

सामान्यीकरण का स्वर्णकाल


दो दिन पूर्व फेसबुक स्क्रोल करते समय पटना के चिकित्सक डा विनय कुमार की एक पोस्ट पर नजर गई। विनय जी आमतौर पर विवादों से दूर रहते हैं। दाहिने-बायें सभी ओर उनके मित्र और प्रशंसक हैं। अच्छे डाक्टर के साथ अच्छे कवि भी हैं। इस कारण साहित्य जगत में उनकी प्रतिष्ठा है। अपने पोस्ट में वो हिंदी के बुजुर्ग साहित्यकार असगर वजाहत की किसी रील का उल्लेख करते हुए लिखते हैं-एक रील में असगर वजाहत साहब यह कहते हुए सुने जा सकते हैं कि डाक्टर इंजीनियर को मैं पढ़ा लिखा नहीं मानता। वे अपवाद का जिक्र भी करते हैं। उनकी इस टिप्पणी को पढ़ने के बाद इच्छा हुई कि असगर साहब क्या कह रहे हैं उसको सुना जाए। असगर वजाहत कह रहे हैं, मैं तो डाक्टर और इंजीनियर्स को आमतौर पर, अपवाद हो सकते हैं, पढ़ा लिखा नहीं मानता, शिक्षित नहीं मानता। स्वयं पूछते हैं कि क्यों नहीं मानता फिर उसका उत्तर देते हैं, हाई स्कूल और इंटरमीडियट करके ये पांच साल की इंजीनयरिंग कर लेते हैं और इंटरमीडियट तक क्या पढ़ाई होती है ये आप भी जानते हैं। न तो ठीक से भाषा की पढ़ाई होती है, न तो इतिहास पढ़ते हैं, न भूगोल पढ़ते हैं, न अर्थशास्त्र पढ़ते हैं, न साहित्य पढ़ते हैं। ह्यूमिनिटीज की पढ़ाई बिल्कुल नहीं होती है इनकी। इसलिए इनका आर्ट और कल्चर के प्रति रुझान जो है, आमतौर से नहीं होता। अपवाद हो सकते हैं। जबतक आप ग्रेजुएशेन नहीं करोगे तबतक ह्यूमिनिटीज को इतिहास को भूगोल को अर्थशास्त्र को नहीं पढ़ोगे तबतक समाज के प्रति कोई दृष्टिकोण नहीं बन पाएगा। वो पैसा कमा रहे हैं अच्छा काम कर रहे हैं लेकिन उनका बौद्धिक विकास नहीं हो पाता है।

असगर वजाहत के इस कथन पर डा विनय कुमार ने उचित ही प्रश्न उठाते हुए पूछा है कि क्या यह ओवर जेनरालाइजेशन नहीं है। दरअसल ये बिल्कुल ही सामान्यीकरण है। असगर जी जैसे चिंतनशील व्यक्ति कैसे इस तरह की टिप्पणी कर गए पता नहीं लेकिन विनय जी ने भी लिखा है और हमारा भी अनुभव है कि ह्यूमिनिटीज के विषयों से कई स्नातक और स्नातकोत्तर व्यक्ति भी अपना बौद्धिक विकास नहीं कर पाते हैं। इसके आधार पर यह कह देना कि जो लोग मानविकी के विषय नहीं पढ़ते हैं उनका समाज के प्रति कोई दृष्टिकोण नहीं बन पाता या उनका बौद्दिक विकास नहीं होता, अनुचित है। दरअसल पहले बौद्धिक जगत में चलनेवाले विमर्श को देख सुनकर लगता था कि राजनीति के साथ-साथ साहित्य में भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का स्वर्णकाल चल रहा है। कुछ लोग अवश्य फैशन में फासीवाद-फासीवाद खेलते रहते हैं। पिछले कई दशकों में देश में फासीवाद की आहट सुनने वाले कम्युनिस्ट विचार के लेखकों को वर्तमान दौर में या यों कहें कि जून 2014 के बाद से फासीवाद के आने और पांव पसारने की आशंका तेज हो गई थी। 2014 के बाद करीब एक युग बीत गया लेकिन फासीवाद की ना तो आवाज तेज हुई और ना ही चाल। आशंका निर्मूल। दरअसल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर जो टिप्पणी की जाती है वो सामान्यीकरण के दोष का शिकार होती है। एक बुजुर्ग लेखिका-पत्रकार की फ्लाईदुबई विमान कांड पर की गई टिप्पणी सामान्यीकरण के दोष की शिकार है, हलांकि उसमें कुंठा का मिश्रण भी था। वो लिखती हैं, सुखांत में कई संयोग जुट गए हैं। मसलन हाईजैक हो रहे प्लेन का यमनी को-पायलट सुरक्षा को चरका देकर चाकू लाना, दो-दो प्रशिक्षित पायलटों की बतौर यात्री मौजूदगी, घायल पायलट का काकपिट का दरवाजा खोलते ही उनका आरोपी पर काबू और भारत के कथित फादरलैंड के मुखिया द्वारा भरपूर तारीफ। हलांकि पूर्व में भी इनकी टिप्पणियां कुंठा से सराबोर रहती हैं लेकिन एक आतंकी घटना का जिस तरह से सामान्यीकरण किया वो तो विक्षिप्त मन की विलक्षण प्रतिभा ही कर सकती है।

सामान्यीकरण को समझने के लिए ये दो उदाहरण ही काफी हैं लेकिन एक और उदाहरण देख लेते हैं। हाल में दिल्ली विश्वविद्यालय में कुछ छात्राओं ने सुरक्षा को लेकर मार्च निकाला था। उस जुलूस में जिस तरह के नारे लगे थे वो भी सामान्यीकरण का उदाहरण है। एक नारा था, एक कचौड़ी दो समोसा, मर्द जात का क्या भरोसा। एक और तख्ती पर लिखा था- चाय गरम दूध गरम, मर्द समाज बेशरम। इसी तरह की तुकबंदी वाले कई नारे थे जो हास्य तो उत्पन्न कर रहे थे लेकिन उनका प्रभाव समाज पर पड़ा हो ऐसा प्रतीत नहीं होता है। प्रभाव इस कारण से नहीं क्योंकि ये नारे बहुत ही जनरलाइज्ड थे। पूरे मर्द समाज को एक कोष्ठक में रख दिया गया। किसी भी समस्या या अपराध पर पूरे जेंडर को कठघरे में खड़ा करना अति सामान्यीकरण है जिसका प्रभाव शून्य हो जाता है। इंटरनेट मीडिया पर इस तरह के पोस्ट या नारे वायरल हो सकते हैं, हिट्स और लाइक्स मिल सकते हैं, हास्य वाली इमोजी से स्वागत भी हो सकता है लेकिन सब अर्थहीन। ये वैसा ही है जैसा असगर वजाहत ने सभी डाक्टर्स और इंजीनियर्स को एक ही कोष्ठक में रखकर उनकी बौद्धिक क्षमता को प्रश्नांकित कर दिया। इस कारण से एक आशंका है कि असगर वजाहत साहब की उक्त टिप्पणी पर लोग आनंद लेंगे, हो सकता है कि इंटरनेट मीडिया पर प्रचलित भी हो जाए, लेकिन उसका कोई प्रभाव समाज पर पड़ेगा इसमे संदेह है। कम ही लोग गंभीरता से लेंगे।

उपरोक्त उदाहरण से इतना तो स्पष्ट ही है कि लोगों में, समाज के लगभग सभी वर्गों में किसी घटना या किसी अपराध के सामान्यीकरण की प्रवृत्ति बढ़ी है। यह प्रवृत्ति समाज के हर क्षेत्र में बढ़ी है। बगैर सोचे समझे इस तरह की टिप्पणी कर दी जाती है जिसकी चर्चा तो हो जाती है लेकिन अर्थहीन। सामान्यीकरण के स्वर्णकाल की ही परिणति है एक दूसरे पर जातिगत टिप्पणी करना। इसमें किसी की मंशा किसी को अपमानित करने की नहीं भी हो सकती है। अब अगर किसी अगड़ी जाति के व्यक्ति पर उनकी जाति को लेकर टिप्पणी की जाती है तो वो तो सामान्यीकरण का दोष है। उद्देश्य अपमान नहीं बल्कि कुछ और हो सकता है।हमारा समाज इस तरह की टिप्पणियां क्यों करने लगा है इसपर विचार करना होगा। एक कारण तो तुरंता प्रसिद्धि की चाहत। इस तरह के कई लोग आपको इंटरनेट मीडिया पर मिल जाएंगें जो ऊलजलूल टिप्णियां करने के लिए ही जाने जाते हैं। उनके लाखों फालोवर्स भी हैं। पर ऐसे लोगों की समाज में क्या उपयोगिता है इसपर भी विचार किया जाना चाहिए। क्या ऐसे लोगों को समाज गंभीरता से लेता है या इनकी राय पर व्यापक वर्ग में कोई चर्चा होती है। उत्तर तो ना में ही देखने को मिलता है। तुरंता प्रसिद्धि भले ही मिल जाती है लेकिन उसमें स्थायित्व नहीं होता। सामान्यीकरण का सबसे बड़ा नुकसान ये होता है कि टिप्पणी करनेवाले या करनेवाली की प्रतिष्ठा धूमिल होती है और लोग उनकी बातों को गंभीरता से लेना छोड़ने लगते हैं। अब समय आ गया है कि सभी ये सोचें कि समान्यीकरण के इस दोष से कैसे मुक्ति मिल सकती है। इसके विकराल रूप धर लेने से पहले इसको रोकना आवश्यक है।

Saturday, September 19, 2026

सेंसर बोर्ड के समझ नई चुनौतियां


नौ वर्षों के लंबे अंतराल और प्रतीक्षा के बाद केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (चलन  में सेंसर बोर्ड) का पुनर्गठन किया गया। 2017 में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड में नए सदस्यों का मनोनयन हुआ था। नियमानुसार हर तीन साल में नया बोर्ड बनाया जाना चाहिए। इस वर्ष मई में जब केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के अध्यक्ष प्रसून जोशी को प्रसार भारती का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था तब चर्चा हुई थी कि सेंसर बोर्ड का नए सिरे से गठन होगा। प्रसून जोशी के बाद शशिशेखर वेंपति को सेंसर बोर्ड का अध्यक्ष नियुक्त किया गया लेकिन बोर्ड के नए सदस्यों की घोषणा नहीं हुई। अध्यक्ष की नियुक्ति के लगभग चार महीनों बाद 16 सितंबर को सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने अगले तीन वर्षों के लिए सेंसर बोर्ड के 18 नए सदस्यों के नाम की घोषणा कर दी। सेंसर बोर्ड में सिनेमा से जुड़े लोगों को प्राथमिकता दी गई है। फिल्मकार, अभिनेता, लेखक और रंगमंच से जुड़े लोगों को सदस्य बनाकर सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने बोर्ड के गठन को तर्कसंगत बनाया। पर प्रश्न ये उठता है कि जिस बोर्ड का गठन तीन वर्षों बाद यानि 2020 में हो जाना चाहिए था उसके गठन में इतनी देरी क्यों हुई। पिछले नौ वर्षों में सेंसर बोर्ड कई बार विवादों में घिरी थी। तब के अध्यक्ष प्रसून जोशी ने अपने सूझबूझ से उन विवादों का हल निकाल लिया था। नए बोर्ड के सामने अब नई तरह की चुनौतियां हैं। अब फिल्मकारों में सेंसर बोर्ड को फिल्म के प्रचार के टूल के तौर पर उपयोग करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। बोर्ड के गठन से ऐसा प्रतीत होता है कि मंत्रालय को इन चुनौतियों का अनुमान है इस कारण से विभिन्न क्षेत्रों में फिल्मों से जुड़े लोगों को सदस्य बनाया गया है। 

फिल्म सेंसर बोर्ड के गठन के बाद मनोरंजन की बदलती दुनिया को दृष्टिगत रखते हुए 1952 के सिनेमैटोग्राफी एक्ट में समयानुकूल बदलाव करने की चुनौती थी। मनोरंजन की दुनिया के बदलते स्वरूप और तकनीक के कारण बदलते समय के हिसाब से एक्ट में बदलाव पर लंबे समय से विमर्श हो रहा था। कोई निणय नहीं लिया जा सका था। सूचना और प्रसारण मंत्रालय में बैठे यथास्थिवाद के देवता बदलावों को नोटिफाई नहीं कर पा रहे थे। जिस दिन सेंसर बोर्ड के सदस्यों के नाम घोषित किए गए उसी दिन सरकार ने फिल्म प्रमाणन को लेकर एक नई गाइडलाइन भी जारी कर दी। 35 वर्षों बाद जारी इस गाइडलाइन में ड्रग्स और बच्चों को लेकर स्पष्टता दी गई है। दर्शकों के वर्गीकरण को और भी स्पष्ट किया गया है। 2016 में जब स्वर्गीय अरुण जेटली सूचना और प्रसारण मंत्री थी तो श्याम बेनेगल की अध्यक्षता में उन्होंने एक समिति बनाई थी। उस समिति की सिफारिशों को आंशिक रूप से समय समय पर लागू किया जाता रहा। अब जब मनोरंजन की दुनिया के साथ-साथ समाज भी बदल रहा है तो इसमें और भी सुधार की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। 35 वर्षों बाद सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने ये कदम उठाया है। इस गाइडलाइन के आरंभ में ही कहा गया है कि कलात्मक और सृजनात्मक अभिव्यक्ति को बाधित नहीं किया जाएगा। प्रमाणन को सामाजिक बदलाव के अनुसार तय किया जाए। नए गाइडलाइन में अश्लीलता पर भी एक पंक्ति है। हम सब जानते हैं कि अश्लीलता को परिभाषित करना बहुत मुश्किल है। जहां जुगुप्साजनक अश्लीलता होगी उसकी पहचान तो आसानी से की जा सकती है। बहुत लंबा चुंबन दृष्य हो या इंटीमेट सीन, दोनों को देखकर सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि ये कहानी की मांग है या फिर फिल्मकार की मुनाफा कमाने की मंशा। 

गाडलाइन की एक और बिंदु ने ध्यान खींचा, जिसमें ये लिखा गया है कि सेंसर बोर्ड फिल्म के समाज पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन करते हुए प्रमाणन का निर्णय ले। कई बार फिल्मकार बहुत चालाकी से पात्रों के नाम आदि के आधार पर ये संदेश देने की कोशिश करते हैं कि अमुक समुदाय पीड़ित है और अमुक समुदाय उसको दबा रहा है या उसपर अत्याचार कर रहा है। फिल्म मुक्काबाज के एक संवाद का उदाहरण कई बार दिया जा चुका है। संवाद है – वो आएंगे और पीट-पीटकर तुम्हारी हत्या कर देंगे और भारत माता की जय का नारा लगाकर चले जाएंगे। संवाद से स्पष्ट था कि फिल्मकार किसको टार्गेट कर रहे थे। इस संवाद का फिल्म की कहानी और संबंधित दृश्य से बहुत अधिक लेना देना नहीं था। लेना-देना था तो फिल्मकार के सोच और उसकी राजनीतिक मानस और प्रतिबद्धता से। फिल्मों के माध्यम से राजनीति करने की, अपनी विचारधारा को आगे बढ़ाने की और विरोधी विचारधारा को गिराने का खेल इन दिनों काफी बढ़ गया है। बहुत सारे ऐसे फिल्मकार हैं जो मोदी सरकार के विरोधी हैं और वो अपनी कहानी और संवाद के माध्यम से सरकार के विरुद्ध माहौल बनाने के लिए फिल्म की कलात्मक और सृजनात्मक स्वतंत्रता का सहारा लेते हैं। पहले भी ऐसा होता था पर कम।  

पिछले दिनों ऐसी खबरें आई थीं कि पंजाबी फिल्म दस्तार को लेकर सेंसर बोर्ड ने कड़ा रुख अपनाया था। उसमें कई कट्स लगाने की सलाह दी गई थी। इस फिल्म के दृष्य और संवाद ऐसे थे जो कि व्यापक समाज हित में नहीं थे। आतंकवादियों को लेकर गांवों में जिस तरह के दृष्य दिखाकर उनको महिमामंडित करने की कोशिश की गई थी वो व्यापक समाज और देशहित में नहीं था। आतंकवादियों के पड़ोसी देश में जाने को लेकर परिवार में जो संवाद होता था वो भी अनुचित था। इसके पहले फिल्म सतलुज को पिछले चार वर्षों से सेंसर सर्टिफिकेट नहीं मिला था तो उसके पीछे कारण है। वो फिल्म सिस्टम पर सवाल उठाने के आवरण में देश पर प्रश्न खड़े करती है। सेंसर बोर्ड  के सामने इस तरह के कंटेंट को देखना और उसका प्रमाणन बड़ी चुनौती है। सेंसर बोर्ड के क्षेत्रीय कार्यालयों को भी सुधारना होगा। वहां से पूर्व में भ्रष्टाचार की खबरें ती रही हैं। जो फिल्में क्षेत्रीय स्तर पर प्रमाणित की जाती हैं उसमें पारदर्शिता और जिम्मेदारी तय करने की आवश्यकता है। अकारण किसी फिल्म को रोका न जाए और कारण हो तो किसी फिल्म को प्रमाण पत्र दिया भी न जाए। चतुर फिल्म निर्माताओं ने ऐसी जुगत निकाली है कि फिल्म मुंबई में बनाओ लेकिन सर्टिफिकेशन के लिए कोलकाता या दिल्ली में आवेदन करो। क्यों। 

सूचना और प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव के पास कई अहम जिम्मेदारियां हैं। पर एक काम अच्छा किया गया कि सेंसर बोर्ड के चेयरमैन शशिशेखर वेंपति को बनाया गया। शशिशेखर वेंपति तकनीक में माहिर हैं। उनके इस हुनर का लाभ सेंसर बोर्ड के क्रियाकलापों को और पारदर्शी बनाने में किया जाना चाहिए। हलांकि सेंसर बोर्ड का एक्स हैंडल जो 2022 के बाद से निष्क्रिय था उसको सक्रिय किया गया है। दरअसल फिल्म एक ऐसी विधा है जिसका समाज पर व्यापक प्रभाव है। इस कारण लोगों की इसमें अधिक रुचि होती है। कोई फिल्म विवादित होती है तो चर्चा बटोरती है। कोई सूत्र मिल जाए तो प्रधानमंत्री तक को लपेटे में लेने का प्रयास किया जाता है। नए बोर्ड के समझ चुनौतियां भी हैं और अवसर भी। 


Saturday, September 12, 2026

विचारधारा की जकड़न में फिल्मकार


हिंदी फिल्मों के एक निर्देशक हैं तिग्मांशु धूलिया। उन्होंने कई फिल्में निर्देशित की हैं। कुछ में अभिनय भी किया है। लोग उनको फिल्म पान सिंह तोमर के निर्देशक के तौर पर जानते हैं। इस फिल्म को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला था। पिछले दिनों एक कार्यक्रम में उनका भाषण हुआ। तिग्मांशु ने करीब आधे घंटे के अपने उद्बोधन में दुनिया जहान की बातें की। पूंजीवाद के खतरे से लेकर इप्टा (भारतीय जन नाट्य संघ) से जुड़े किस्से सुनाए। चूंकि वो फिल्मों से जुड़े हैं तो फिल्मी बातें अधिक हुईं। राजनीति पर भी गए। अपने अनुभव भी साझा किए। अपना मत भी रखा। उनका मानना था कि इन दिनों हिंदी फिल्मों से कहानी गायब हो गई है। फिल्म धुरंधर का उदाहरण देते हुए उपहास के अंदाज में उसकी कहानी पर प्रश्न खड़ा किया। बोले कि बस एक व्यक्ति है जो पाकिस्तान जाता है। वहां तबाही मचाता है। ऐसी टिप्पणी करनेवाले तिग्मांशु को ये बताना चाहिए था कि कहानी क्या होती है। क्या कहानी सिर्फ उन फिल्मों में ही होती है जो लेफ्ट इकोसिस्टम के निर्देशक बनाते हैं। फिल्म धुरंधर में अगर कहानी नहीं दिखाई देती है तो उनको कहानी की परिभाषा का फिर से अध्ययन करना चाहिए। हिंदी के कई आलोचकों ने कहानी की परिभाषा दी है। अगर तिग्मांशु उन परिभाषाओं को एक बार देख लेते तो बेहतर तरीके से अपनी बात रख पाते। 

तिग्मांशु ने ये भी कहा कि हिंदी फिल्मों में हिंसा बहुत हो गई है। समाज क्रोध में है। यह बात आंशिक रूप से सही हो सकती है लेकिन सामान्यीकरण भी है। फिल्मों में हिंसा दिखाई जा रही है पर कई ऐसी फिल्में बन रही हैं जिनमें हिंसा नहीं होती। हिंसा तो कहानी पर निर्भर करती है। पिछले दिनों कई बेहतर प्रेम कहानी आई हैं जिसको दर्शकों ने पसंद किया। फिल्म सैयारा इसका सबसे सशक्त उदाहरण है। चूंकि उन्होंने कहा कि वो फिल्में नहीं देखते। संभव है कि इस कारण उनको हिंदी फिल्मों की दुनिया में क्या घट रहा है इसका अनुमान कम हो। तिग्मांशु धूलिया की बातों के आलोक में उनकी फिल्म घमासान को परख लेते हैं। बीते शुक्रवार को उनकी फिल्म घमासान रिलीज हुई। ये फिल्म 2006 के उत्तर प्रदेश की कहानी कहती है। उत्तर प्रदेश का एक दस्यु सम्राट जिसका बुंदेलखंड इलाके में खौफ है। राजनीति से उसका संबंध और चुनाव के बाद फिल्म के अंत में उसके एनकाउंटर पर कहानी समाप्त होती है। ये एक ऐसी कहानी है जो दर्जनों बार हिंदी फिल्मों में कही जा चुकी है। तिग्मांशु ने जिस तरह से इस फिल्म को बुना है वो भी पुरानी प्रविधि है। एक ही कहानी को बार बार दोहराने से कथा का मूल तत्त्व, उत्सुकता, समाप्त हो जाता है। उनकी शिकायत है कि हिंदी फिल्में हिंसा के एक विशेष टेंपलेट में फंस गई है। घमासान देखने के बाद तो यही लगता है कि तिग्मांशु स्वयं डकैतों की समस्या और उसके खात्मे के हिंदी फिल्मों के पुराने टेंपलेंट में फंसे हैं। अपनी ही फिल्म पान सिंह तोमर से एक इंच भी आगे नहीं जा पाए हैं। राजनीति का तड़का लगाने का प्रयास अवश्य किया है लेकिन वो फार्मूला भी बहुत ही पुराना हो चुका है। रही बात हिंसा की तो इस फिल्म में तिग्मांशु ने भी दस कटे हुए सर का सार्वजनिक प्रदर्शन किया है। क्लोज शाट भी दिखाया है। यहां वो हिंसा को कहानी की मांग बताकर उचित करार दे सकते हैं। यही बात अन्य फिल्मों पर भी लागू होगी। अपनी फिल्म में हिंसा दिखाना कहानी की मांग और कोई दूसरा दिखाए तो वो एक टेंपलेट। गजब विचार है। 

उन्होंने अपने व्याख्यान में दो उदाहरण दिए और बताया कि जवाहरलाल नेहरू कितने उदार थे। जब एक फिल्म सेंसर बोर्ड में अटक गई तो दिलीप कुमार ने नेहरू से गुहार लगाई। नेहरू ने फिल्म देखकर सेंसर बोर्ड को फिल्म रिलीज करने को कहा। तिग्मांशु को ये कदम उदारता लग सकती है। पर यह एक खतरनाक प्रवृत्ति थी कि एक वैधानिक संस्था के निर्णय को प्रधानमंत्री ने पलट दिया। आज अगर ऐसी कोई छोटी सी घटना हो जाए तो यही लोग आसमान सर पर उठा लेंगे। संविधान की दुहाई देने लगेंगे। उनकी एक और बात को रेखांकित करने की आवश्कता है कि 2017 तक सब ठीक था लेकिन पता नहीं क्यों उसके बाद फिल्मी दुनिया अचानक क्यों बदल गई। वो ये भी कह गए कि 2017 तक ‘इनको’ (वर्तमान सरकार को) फिल्मों की समझ नहीं थी। कैसा अजीब तर्क है। तिग्मांशु जैसे वामपंथी पता नहीं क्यों नहीं समझ पा रहे हैं कि देश का मूड बदल चुका है। दर्शकों की पसंद बदल गई है। दस्यु और उनके आतंक की कहानी अब दर्शक नहीं सुनना/देखना चाहते हैं। कई बार देख लेने के बाद उनको ये दोहराव लगता है। न कहानी अलग, न ही ट्रीटमेंट अलग न ही कोई चौंकानेवाली बात।

दरअसल तिग्मांशु और उन जैसे वामपंथी निर्देशकों की कठिनाई अलग है। अब उनकी फिल्में चल नहीं रही हैं तो वो दर्शकों के सर पर इसका ठीकरा फोड़ना चाहते हैं। इसी इकोसिस्टम के एक और निर्देशक हैं सुधीर मिश्रा। एकाध अच्छी फिल्में बनाईं हैं। जब उनकी फिल्म अफवाह रिलीज हुई तो वो दर्शकों को बांटने लगे थे। अफवाह और द केरल स्टोरी एक साथ रिलीज हुई थी। द केरल स्टोरी सुपर हिट रही और अफवाह बुरी तरह पिट गई। तब सुधीर ने एक्स पर लिखा था- ‘द कश्मीर फाइल्स के बारे में लिबरल्स को शिकायत रहती है। क्यों? विवेक अग्निहोत्री ने एक फिल्म बनाई और उसके दर्शक इस फिल्म को देखने के लिए थिएटर में आए। लेकिन जब हम फिल्म बनाते हैं तो हमारे दर्शक, जो विवेक की आलोचना करते हैं, चुपचाप बैठे रहते हैं। वो फिल्म देखने के लिए सिनेमा हाल नहीं पहुंचते हैं।‘ ये टिप्पणी कुंठा की पराकाष्ठा है। तिग्मांशु उसी राह पर हैं। 

तिग्मांशु जब फिल्मकारों की लाचारगी की बात करते हुए कहते हैं कि जब अच्छी कहानी कहनेवाले फिल्मकारों पर संकट आता हो तो कोई बचाने नहीं आता। भाईचारा खत्म हो गया है। तिग्मांशु धूलिया जी इस भाईचारे को खत्म करने का आरंभ तो आप जैसे कलाकारों ने ही 2014 में किया था। जब लोकसभा चुनाव का प्रचार अपने अंतिम चरण में था तो इम्तियाज अली, विशाल भारद्वाज, नंदिता दास, कबीर खान, महेश भट्ट जैसे लोगों ने परोक्ष रूप से कांग्रेस के पक्ष में और नरेन्द्र मोदी के विरोध में खुला पत्र लिखा था। आप जब नेहरू फैन होने की बात करते हैं तो 2014 की आपका बयान याद आता है कि मोदी को प्रधानमंत्री के पद पर देखना दुखद होगा। आपकी प्रतिबद्धता स्पष्ट है । आपलोगों को अगर राजनीति करनी है तो खुलकर राजनीति के मैदान में उतरिए। कला और फिल्मों को औजार मत बनाइए। दर्शक समझ चुके हैं आपलोग कब समझेंगे । जितनी जल्दी समझ जाएं वो फिल्मी दुनिया के लिए बेहतर होगा। और हां ! लोकतंत्र 1793 में फ्रांस में आरंभ नहीं हुआ था। उसके बहुत पहले से भारत में वैशाली में लोकतांत्रिक शासन प्रणाली चल रही थी। अपने देश को, अपने अतीत को समझिए, उसपर गर्व करिए दर्शकों को समझ जाएंगे।