कोलंबिया की राजधानी बोगोटा में आयोजित अंतराष्ट्रीय पुस्तक मेला (फिलबो) में अलग अलग मंडप में देश-विदेश के प्रकाशकों ने अपने स्टाल लगाया था। फिलबो में एक मंडप में कोलंबिया के विभिन्न शहरों में स्थित सरकारी और निजी विश्वविद्यालय के करीब 75 स्टाल लगे थे। अलग-अलग विश्वविद्यालय के स्टाल और वहां उस विश्वविद्लय के प्रकाशनों को प्रदर्शित किया गया था। सभी विश्वविद्यालयों की अपनी पत्रिकाएं थीं, पुस्तकें थीं। उन स्टालों पर घूमते हुए ये महसूस हुआ कि कोलंबिया के निजी और सरकारी विश्वविद्यालयों के अपने-अपने नियमित प्रकाशन हैं जो साहित्य, कला, संगीत से लेकर इतिहास और विज्ञान की पुस्तकों का नियमित प्रकाशन करते हैं। अधिकतर पुस्तकें स्पैनिश भाषा में थीं। मंडप में दो तीन घंटे बिताकर विश्वविद्यालय के प्रकाशनों को देखकर जब बाहर निकला तो मन में प्रश्न उठ रहा था कि भारत के विश्वविद्यालयों में इस तरह के प्रकाशन क्यों नहीं होते हैं। अपने यहां के विश्वविद्यालयों से कोई स्तरीय पत्रिका क्यों नहीं निकलती है। विश्वविद्यालयों में होनेवाले दर्जनों शोध प्रबंधों में से चुनिंदा शोध के प्रकाशन की व्यवस्था क्यों नहीं है। हम अपने देश के राज्य विश्वविद्यालयों को छोड़ भी दें तो जो चार दर्जन केंद्रीय विश्वविद्यालय हैं वहां से भी कोई स्तरीय शोध पत्रिका नहीं निकलती है। संभव है कि इन केंद्रीय विश्वविद्यालयों में से कुछ विश्वविद्यालय या उनके विभाग पत्रिकाएं निकालते हों, लेकिन उन पत्रिकाओं की प्रतिष्ठा नहीं है और उनकी पहुंच अकादमिक जगत से बाहर होती नहीं है। जिन कुछ विश्वविद्यालय से पत्रिकाएं निकलती हैं वो स्तरीय नहीं है। दिल्ली विश्वविद्यालय के एक शिक्षक ने बताया कि सागर स्थित डा हरि सिंह गौड़ विश्वविद्यालय से मध्य भारती नाम की एक पत्रिका का प्रकाशन होता है लेकिन स्तरीयता का अभाव है।
देश की राजधानी दिल्ली में भी कई केंद्रीय विश्वविद्यालय हैं। हर वर्ष यहां से सैकड़ों छात्र अलग अलग विषयों पर शोध करते हैं। इन विश्वविद्यालयों से उत्कृष्ट शोध को प्रकाशित करने की जानकारी नहीं मिल पाती है। कोलंबिया पुस्तक मेला में ये पता चला कि वहां के विश्वविद्यालय प्रकाशन करते हैं या फिर निजी प्रकाशकों से करार करके बेहतर पुस्तकों का प्रकाशन करवाते हैं। निजी प्रकाशकों को विश्वविद्यालय के शिक्षकों के स्तर से पुस्तकें तैयार करवाकर प्रकाशकों को दी जाती हैं ताकि स्तरीयता बरकरार रह सके। वर्धा में जब महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्याल की स्थापना हुई थी और अशोक वाजपेयी उसके पहले कुलपति बने थे, तब इस तरह के कुछ प्रयास हुए थे। विश्वविद्यालय ने बहुवचन, पुस्तक वार्ता और अंग्रेजी में हिंदी नाम की एक पत्रिका निकाली थी। कुछ पुस्तकों का प्रकाशन भी हुआ था। पर अशोक वाजपेयी की अपनी सीमाएं हैं और ये सीमाएं बेहतर करने में बाधक होती रही हैं। विभूति नारायण राय के समय पत्रिकाएं ठीक निकलीं। वर्धा शब्दकोश का भी प्रकाशन हुआ लेकिन शब्दकोश अपडेट नहीं हो पाया। बाद के वर्षों में विश्वविद्यालय की पत्रिकाएं अनियमित हो गईं, संयुक्तांक निकलने लगे। जो पत्रिकाएं निकलीं उनको ही पुस्तकाकार प्रकाशित करवाया गया। स्तरीयता का भी ध्यान नहीं रहा। स्वाधीनता के अमृत महोत्सव के समय भी केंद्रीय विश्वविद्यालयों से अपेक्षा की गई थी कि वहां से कुछ स्तरीय पुस्तकों का प्रकाशन होगा। पुस्तकों का प्रकाशन हुआ भी लेकिन संपादित लेखों से आगे जाकर कोई उल्लेखनीय पुस्तक नहीं आई। राष्ट्रीय शिक्षा नीति को आए पांच वर्ष से अधिक हो गए लेकिन उसपर आधारित उल्लेखनीय पुस्तकें नहीं आ पाई। इन दिनों विश्वविद्यालयों के शिक्षकों में विभिन्न लेखकों से लेख लिखवाकर संपादित पुस्तकें प्रकाशित करवाने का चलन बढ़ा है। मौलिक पुस्तकों की अपेक्षा संपादित पुस्तकें अधिक आ रही हैं। ये कार्य आसान है। कोई विषय चुनिए और लेखकों से लेख लिखवा कर अपने नाम से संपादित पुस्तक प्रकाशित करवा लीजिए।
कोलंबिया से लौटकर अकादमिक जगत के एक वरिष्ठ प्रोफेसर से इस संबंध में विस्तृत चर्चा की। उनसे इसका कारण जानना चाहा। उन्होंने जो बताया वो मेरे लिए चौंकानेवाला था। उनका कहना था कि विश्वविद्यालयों को केंद्र सरकार ने पहले से कई गुणा अधिक सुविधाएं दी हैं। शिक्षकों को पठन-पाठन का बेहतर वातावरण उपलब्ध करवाया है। परंतु अधिकतर विश्वविद्यालयों के नेतृत्व का ध्यान अकादमिक उत्कृष्टता की ओर कम है। अकादमिक उत्कृष्टता से अधिक उनका ध्यान आयोजनों पर होता है, समें लोगों को उपकृत करने का अवसर होता है।आयोजन करना बुरी बात नहीं है लेकिन उन आयोजनों से क्या संदेश निकले या उन आयोजनों में जो वक्तव्य दिए गए उनको आधार बनाकार ही उसके दस्तावेजीकरण का प्रयास नहीं होता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी निरंतर विश्वविद्यालयों में स्तरीय शोध हो इसके लिए तमाम तरह के संसाधन मुहैया करवाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे लेकिन शोध तो शिक्षकों को ही करना होगा। विश्वविद्यालय के सीनियर प्रोफेसरों से ये अपेक्षा की जाती है कि वो अपने अधीन बेहतर शोध करवाएं चाहे विषय विज्ञान का हो, इतिहास का हो या मानविकी का हो। ऐसा होता दिखता नहीं है। पिछले दिनों राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश जी से बात हो रही थी उन्होंने इसपर चिंता व्यक्त की कि भारतीय साहित्य जगत पिछले एक दशक में भारत में हो रहे बदलावों को दर्ज करने में लगभग असफल रहा है। उन्होंने इसमें समाज विज्ञानियों और राजनीति पर लिखनेवालों को भी जोड़ा और कहा कि समाज, राजनीति, विदेश नीति आदि में जो उल्लेखनीय बदलाव हुआ है उस ओर लेखकों और अकादमिक जगत का ध्यान नहीं जा रहा है। कहना ना होगा कि हरिवंश जी की चिंता उचित है। मैं इसमें देशभर के विश्वविद्यालयों को भी जोड़ता हूं जिनके पास अवसर है इन बदलावों को रेखांकित करने का।
प्रोफेसर साहब ने एक और बात रेखांकित की, केंद्रीय विश्वविद्लयों में कुलपतियों की नियुक्तियां भी समय पर नहीं हो पाती हैं। उनके मुताबिक अभी भी आधे दर्जन या उससे अधिक केंद्रीय विश्वविद्यालय नेतृत्वविहीन है। उन्होंने पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय का उदाहरण देते हुए बताया कि कुलपति के लिए चयनित प्रत्याशियों से चयन समिति ने बात-चीत कर ली थी। संभावित पैनल भी तैयार हो गया था लेकिन कुछ दिनों पहले दस या ग्यारह अन्य उम्मीदवारों बुलाकर चयन समिति ने बात की। नियुक्ति फिर भी नहीं हो पाई है। सागर, अमरकंटक, लेह, विजयनगरम, गुजरात और हैदराबाद स्थित केंद्रीय विश्वविद्यालय बगैर कुलपति के या कामचलाऊ कुलपति के भरोसे चल रहे हैं। ऐसे में प्रश्न ये उठता है कि अगर विश्वविद्यालय नेतृत्वविहीन होंगे तो वहां काम क्या होगा। उतने ही काम होंगे जिससे कि विश्वविद्यालय चलता रहे। किसी नवाचार की आशा करना व्यर्थ है। जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी निरंतर शिक्षा व्यवस्था को बेहतर करने का प्रयास कर रहे हैं ऐसे में आधे दर्जन केंद्रीय विश्वविद्यालयों में कुलपति की नियुक्ति में देरी होने का कारण समझ नहीं आता। नियुक्ति से इतर भी बात करें तो विश्वविद्यालय के शिक्षकों की भी जबावदेही तय होनी चाहिए। अगर उनको पठन पाठन और अध्ययन के लिए उचित समय और अवसर उपलब्ध करवाए जा रहे हैं तो हर वर्ष इस बात का स्पष्ट आकलन हो कि उन्होंने पद के अनुरूप कितना कार्य किया। अभी जो व्यवस्था है उसमें शिक्षक स्वयं का आकलन करके विश्वविद्यालय के इंटरनल क्वालिटी अस्योरेंस सेल को भेजते हैं। इसमें बदलाव की आवश्यकता है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से अपेक्षा की जानी चाहिए कि वो इस बारे में विचार कर निर्णय ले।




