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Saturday, October 24, 2026

दक्षिणपंथी फिल्मकारों के सामने चुनौतियां


फिल्म निर्देशक मधुर भंडारकर ने डा श्यामा प्रशाद मुखर्जी पर फिल्म बनाने की घोषणा की है। फिल्म का नाम होगा- श्यामा द मिसिंग चैप्टर। फिल्म की घोषणा के समय बताया गया कि इसमें डा श्यामा प्रसाद मुखर्जी के राजनीतिक संघर्ष, वैचारिक प्रतिबद्धता और राष्टीय एकता के लिए उनके आंदोलनों को प्रमुखता से दिखाया जाएगा। कलकत्ता विश्विद्यालय के सबसे युवा कुलपति बनने से लेकर स्वतंत्र भारत के पहले मंत्रिमंडल के सदस्य होने तक डा मुखर्जी की संघर्ष यात्रा में भी कई दिलचस्प मोड़ हैं। स्वाधीन भारत में जब प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से उनका मतभेद हुआ तो वो मंत्रिमंडल छोड़ कर बाहर निकल गए। कश्मीर में अनुच्छेद 370 की समाप्ति के लिए बड़ा आंदोलन किया। उस आंदोलन में ही उनका बलिदान हुआ। इन सब महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं को इस फिल्म में समेटने की बात की जा रही है। अभी सिर्फ फिल्म की घोषणा की गई है, इसके शूटिंग शेड्यूल, स्टारकास्ट आदि के बारे में नहीं बताया गया है। दो वर्षॉ पहले वीर सावरकर पर रणदीप हुड्डा ने एक फिल्म बनाई थी। फिल्म का नाम था स्वातंत्र्यवीर सावरकर। रणदीप हुड्डा ने इस फिल्म को लेकर खूब मेहनत की थी। लेकिन फिल्म को अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी। जब फिल्म प्रदर्शित हुई थी तब चर्चा हुई कि अगर फिल्म की अवधि थोड़ी कम होती तो दर्शकों को अधिक पसंद आती। तीन घंटे की फिल्म थी। उस समय भी इस बात की भी चर्चा हुई थी कि जब देश के नायकों या राइट विंग के विषयों पर दक्षिणपंथी माने जानेवाले फिल्मकार फिल्में बनाते हैं तो उनमें से अधिकतर व्यावसायिक रूप से सफल क्यों नहीं हो पाते हैं। 

राइट विंगर फिल्मकारों की असफलता पर बात करने के पहले तीन फिल्मों के बारे मं जान लेते हैं। 2019 में एक फिल्म आई थी पीएम नरेन्द्र मोदी। इस फिल्म में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भूमिका विवेक ओबराय ने निभाई थी। निर्देशक थे उमंग कुमार। फिल्म नहीं चल पाई। एक और फिल्म आई जो पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पर केंद्रित थी जिसका नाम था मैं अटल हूं। इसमें अटल बिहारी वाजपेयी की भूमिका पंकज त्रिपाठी ने की थी। ना तो विवेक ओबराय पीएम नरेन्द्र मोदी के व्यक्तित्व के साथ न्याय कर पाए और ना ही पंकज त्रिपाठी अपनी अदाओं से अटल जी के करीब पहुंच पाए। पूरी फिल्म में वो पंकज त्रिपाठी ही बने रहे। इसके अलावा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर भी एक फिल्म आई जिसका नाम था अजेय, द अनटोल्ड स्टोरी आप ए योगी। ये फिल्म भी नहीं चल पाई। ये शांतनु गुप्ता की पुस्तक द मंक हू बिकेम द चीफ मिनिस्टर पर आधारित थी। इस तरह की कई फिल्में बनीं पर द कश्मीर फाइल्स और द केरला स्टोरी को छोड़कर कम ही फिल्मों को सफलता मिल पाई। दूसरी तरफ अगर हम देखें तो संजय दत्त जैसे चरित्र पर बनी फिल्म संजू कई सौ करोड़ का बिजनेस करती है। संजय दत्त के व्यक्तित्व में बहुत सारी नकारात्मक बातें हैं फिर भी जब उनको फिल्मी पर्दे पर पेश किया जाता है तो दर्शकों को पसंद आती है। निर्देशक राजू हिरानी ने कथा को बहुत ही रोचक तरीके से पिरोया था।

राइट विंग के फिल्मकारों की फिल्मों की असफलता के कारणों पर विचार करें तो सबसे पहली बात जो सामने आती है वो ये कि इनकी फिल्मों का बजट बहुत कम होता है। इंटरनेट मीडिया पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर बनी फिल्म का बजट 8 करोड़ रु था। अटल बिहारी वाजपेयी पर बनी फिल्म का बजट 20 करोड़ रु और योगी आदित्यनाथ पर बनी फिल्म का बजट 15 करोड़ था। वहीं 2018 में प्रदर्शित फिल्म संजू का बजट 100 करोड़ के करीब था। बजट कम होने के कारण फिल्मों में जो भव्यता और बड़े स्टार की उपस्थिति होनी चाहिए वो नहीं हो पाती है। राइट विंग के फिल्मकारों के साथ या राइट विंग के विषयों पर फिल्म करने से अभी हिंदी फिल्मों के बड़े स्टार हिचकते हैं। हिचकते क्या हैं बल्कि कोई न कोई बहाना बनाकर मना कर देते हैं। पता नहीं क्यों उनको किस बात का भय सताता है कि वो अब भी लेफ्ट के खेमे के निकट ही दिखना चाहते हैं। हिंदी फिल्मों में लंबे समय से एक इकोसिस्टम काम करता है जो राइट विंग के विषयों या उनके नायकों पर फिल्म बनाने से कतराता है। एक तो बजट की कमी दूसरे सितारों का नहीं मिलना कारण बनता है कि कोई स्टूडियो फिल्म को रिलीज करने के लिए आगे नहीं आता है। उनको इस बात की आश्वस्ति नहीं होती कि फिल्म में  सफल हो पाएगी और वो इपने निवेश पर मुनाफा कमा पाएंगे। संजू फिल्म की सफलता का एक बड़ा कारण उसमें रणवीर कपूर, अनुष्का शर्मा, विकी कौशल, परेश रावल का होना भी था। एक और कारण जो समझ आता है वो ये कि फिल्मों को दर्शकों को ध्यान में रखकर बनाना चाहिए ना कि जिनके इर्दगिर्द फिल्म बना रहे हैं उनको ध्यान में रखते हुए। फिल्मकार का दायित्व दर्शकों के प्रति होता है। सिनेमा में सिनेमा का तत्वों का होना बहुत आवश्यक है। फिल्म बनाने के पीछे अगर कोई उद्देश्य है भी तो उसको प्रत्यक्ष नहीं करना चाहिए बल्कि परोक्ष रूप से दर्शकों के सामने जाना चाहिए। जैसे संजू फिल्म के माध्यम से संजय दत्त की नकारात्मक छवि को बेहतर करना था। पर वो फिल्मों में दिखाए प्रसंगों के माध्यम से आया, प्रत्यक्ष संवाद से नहीं। राइट विंग फिल्मकार जब नेताओं को केंद्र में रखकर फिल्में बनाते हैं तो उनके व्यक्तित्व पर पर्याप्त शोध नहीं करते। व्यक्तित्व के उन हिस्सों तक नहीं पहुंच पाते हैं जो अज्ञात या कम ज्ञात हो। उनको अपने रिसर्च का स्तर बढ़ाना होगा। फिल्म बनाने में समय लगाना होगा। ये सब तभी संभव होगा जब बजट हो। 

एक और बात जो फिल्मों को प्रभावित करती है वो है समीक्षकों और पीआर का ईकोसिस्टम। फिल्म प्रदर्शित होने के पहले जिस तरह का माहौल बनाया जाता है उसमें इस ईकोसिस्टम का बड़ा हाथ होता है। उस ईकोसिस्टम में अभी भी राइट विंग का प्रभाव नहीं बन पाया है। जबकि लेफ्ट और उससे समानुभूति रखनेवाले लोग खुलकर ना केवल अपने लोगों का समर्थन करते हैं बल्कि अन्य वैचारिक पृष्ठभूमि वाले फिल्मकारों का खुला विरोध भी करते हैं। मुझे याद पड़ता है कि जब डा चंद्रप्रकाश द्विवेदी की फिल्म पिंजर रिलीज हुई थी तो उसकी समीक्षा एम एस सथ्यू ने लिखी थी। एम एस सथ्यू ने गरम हवा फिल्म बनाई थी। वो समीक्षक नहीं थे लेकिन चंद्रप्रकाश द्विवेदी की फिल्म पर लिखा, उसकी कमियां गिनाईं। उसके बाद सथ्यू ने फिर किसी फिल्म की समीक्षा लिखी हो ध्यान नहीं आता। कुल मिलाकर अगर हम फिल्मों के परिदृश्य को देखें तो वहां राइट विंग के विषयों पर बननेवाली फिल्मों के सामने चुनौतियां बहुत अधिक हैं। पता नहीं श्यामा प्रसाद मुखर्जी पर बनने वाली फिल्म के लिए मधुर भंडारकर का बजट कितना है। वो इसको किस भव्यता से बनाना चाहते हैं। श्यामा प्रसाद मुखर्जी की भूमिका कौन सा अभिनेता निभाएगा। ये सब ऐसे प्रस्न हैं जो अब भी राइट विंगर हिंदी फिल्मकारों के सामने मुंह बाए खड़े हैं।  


संस्कार की धरा पर विराट संस्कृति


दुर्गा पूजा और पंडाल कोलकाता की उत्सवी संस्कृति का वो हिस्सा है जिसको हर भारतीय को एक बार महसूस करना चाहिए। नवरात्र के दौरान कोलकाता में देवी दुर्गा के आगमन से लेकर प्रस्थान तक का उत्सव भारतीय संस्कृति के उस आयाम को उद्घाटित करता है जहां संस्कार हैं, मर्यादा है, नवाचार है ,सहयोग से समन्वय का सोच है। देवी दुर्गा की मूर्ति से लेकर पंडाल तक में प्रयोगधर्मिता है। ऐसी प्रयोगधर्मिता जो जन के मन से जुड़कर उनके संस्कार को झंकृत करता है। इस वर्ष तो इनके साथ परिवर्तन भी जुड़ा है। कोलकाता के दुर्गा पूजोत्सव में प्रयोगधर्मिता पंडाल के डिजायन से लेकर मां की प्रतिमा निर्मित तक में दिख रही है। परंतु प्रयोग के नाम पर संस्कार को किसी भी प्रकार से खंडित नहीं किया जाता है। महिषासुर मर्दिनी की प्रतिमा में पौराणिक आख्यानों में वर्णित सारे प्रतिमान दिखेंगे। महिषासुर वध भी होगा, माता की भुजाओं में अस्त्र और कमल का फूल होगा लेकिन किसी प्रतिमा में वो एक भुजा में गणेश को उठाए भी होंगी। उनके पांवों के नीचे महिषासुर होगा ही। 

कहना ना होगा कि ये प्रयोगधर्मिता सनातन के संस्कारों से निर्मित होती है। जो इस वर्ष कोलकाता के पंडालों में दिख रही है। कहीं वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने की थीम, तहीं राम की अयोध्या, कहीं महाभारत तो कहीं देवी दुर्गा की ब्रहंमांडीय शक्ति को बताती विश्वरूपा-विश्वरूपिणी का विराट स्वरूप।कोलकाता में दुर्गा पूजा के अवसर पर नवरात्र में विशेषकर पांच दिनों तक पूरा शहर भक्ति में सराबोर होता है लेकिन किसी भी पंडाल में आपको कानफोड़ू संगीत का शोर नहीं सुनाई देगा। डीजे पर बजनेवाले फिल्मी संगीत भी अनुपस्थित। इन पांच दिनों के दौरान जो संस्कृति आकार लेती है उसमें ढाक के स्वर, रवीन्द्र संगीत की कर्णप्रिय धुनें और देवी मां की प्रतिमा के आगे ढाक की धुन पर धुनुची नृत्य करती महिलाएं। ये नृत्य मां दुर्गा के भक्तों में उल्लास भरता है। पंडाल और उसके आसपास खाने पीने की वस्तुएं बिकती हैं। इन स्टाल्स में विशेष प्रकार की सुरुचिसंपन्नता दिखती है। दुर्गा जी की प्रतिमा लगभग सभी मुहल्ले में स्थापित होती है लेकिन कहीं कोई शोर नहीं। कहीं कोई अफरातफरी नहीं। आत्मनियंत्रण और एक दूसरे के साथ सहयोग करते लोग। पांडालों के बीच कोई द्ववंद्व नहीं बल्कि संयोग और सहयोग का समन्वय दिखता है जो बंगाल की इस संस्कृतिक विरासत की एक अमिट छाप छोड़ता है। इस बार कोलकाता के विभिन्न दुर्गा पंडालों में सनातनी संस्कृति को लेकर एक विशेष आकर्षण दिखता है। जिस भूमि पर जयश्रीराम कहने पर सत्ताधारियों की भृकुटि तन जाती थी वहां अब पंडालों के बाहर राम-राम लिखा है। छत्तीसगढ़ के रामनामी समुदाय के लोग भजन गा रहे हैं। परिवर्तन ने बंगाल में सनातन के सातत्य को बल प्रदान किया।  

Saturday, October 17, 2026

संवाद ने उतारा सोच की मुखौटा


नायक कहता है, मिस शीतल साहनी, मैं एक बात आपको भी कहना चाहूंगा। लड़कियों को छेड़नेवाले ऐसे थर्ड क्लास गुंडों को पकड़ना और उन्हें सबक सिखाना हमारा फर्ज है और वो हम करते हैं। पर कुछ फर्ज लड़कियों का भी है। नायिका पूछती है, क्या फर्ज है मैं समझी नहीं। जरा देखिए अपने आप को, इस तरह के कपड़े पहनकर अगर आप बाहर सड़क पर निकलेंगी तो गुंडों की सीटियां नहीं बजेंगी तो क्या मंदिर की घंटियां बजेंगी। उत्तर मिलता है, क्या खराबी हैं इन कपड़ों में। कहा जाता है कि बहुत कम हैं। सुना था एक जमाने में लड़कियों को कपड़ों का बहुत शौक हुआ करता था ये आजकल आप लोग कपड़ों के मामले में कंजूस क्यों होती जा रही हैं। नायिका का उत्तर मैं क्या पहनती हूं ये मेरा पर्सनल मामला है। नायक प्रतिवाद करते हुए कहता है कि ये तो उसी तरह की बात हुई कि वो लोफर कहे कि सीटी बजाना मेरा पर्सनल काम है। हर वो काम जिससे दूसरों को परेशानी हो पर्सनल नहीं हो सकता। लड़की पूछती है कि मेरे इस लिबास से दूसरों को क्या परेशानी हो सकती है। जवाब- ये तो उस लोफर से पूछना पड़ेगा जिसने आपको देखकर सीटी बजाई। बहरहाल आप एक शरीफ घराने की शरीफ लड़की हैं और अगर थोड़े से शरीफाना कपड़े पहने लें तो किसी को कोई दिक्कत नहीं होगी। ये संवाद है आज से 46 वर्ष पूर्व की फिल्म दोस्ताना का। 

फिल्म दोस्ताना के लेखक हैं सलीम- जावेद यानि सलीम खान और जावेद अख्तर। हिंदी फिल्मों की सफल लेखक जोड़ी। जावेद अख्तर स्वयं को तरक्कीपसंद लेखक के तौर पर पेश करते रहे हैं। उनकी प्रगतिशील सोच का उदाहरण है दोस्ताना का ये संवाद। ऐसा भी नहीं है कि उक्त लंबा संवाद कहानी की मांग हो। कहानी तो लगभग यहीं से आरंभ ही होती है। नायिका जीनत अमान बहुत कम कपड़ों में जा रही होती और पेंटल उनको छेड़ता है। जीनत अमान उसको पकड़कर थाने ले आती है। पुलिस उसको हवालात में बंद कर देती है। उसके बाद इंस्पेक्टर की भूमिका निभा रहे अमिताभ बच्चन नायिका को कम कपड़ों पहनने को लेकर ज्ञान उड़ेलने लगते हैं। अमिताभ तो वही संवाद बोलते हैं जो लेखक ने लिखा होगा। जावेद अख्तर और सलीम खान की जोड़ी के बारे में कहा जाता है कि सलीम खान कहानी लिखते थे, उसको रोमांचक मोड़ देनेवाले प्रसंग जोड़ते थे और जावेद अख्तर संवाद लिखते थे। अब दोस्ताना के उपरोक्त संवाद से लेखक द्वय की महिलाओं और उसके कपड़ों को लेकर सोच उजागर होता है। माना जाता है कि कोई भी लेखक दो चीजों से प्रभावित होता है। एक तो उसका परिवेश और दूसरा उसका नजरिया। आज से 46 वर्ष पूर्व के परिवेश का तो अनुमान लगाया जा सकता है लेकिन महिलाओं के कम कपड़ों को लेकर जावेद अख्तर और सलीम खान के नजरिए का पता या संकेत तो उक्त संवाद से मिलता ही है। आज जावेद अख्तर नैतिकता की मीनार पर खड़े होकर चाहे जितनी बड़ी-बड़ी बातें कर लें लेकिन उनकी लिखी फिल्में, उसके संवाद चीख चीख कर उनकी असलियत बताते चलते हैं। ये तो इन लेखकों की सौभाग्य है कि हिन्दुस्तान में फिल्मों को लेकर गंभीर अध्ययन कम होता है, अन्यथा इस तरह के लेखन करनेवाले लेखकों को महान तो नहीं ही माना जाता। उनके लिखे संवाद आदि पर तुलनात्मक अध्ययन होता। फिल्मों के दृष्य और संवाद के साथ साथ गीतों पर भी समग्रता में विचार होता। इस वैचारिकक मंथन से क्या निकलता इसका अनुमान पाठक लगा सकते हैं। 

बात सिर्फ महिलाओं के कम कपड़ों पर उपदेश की नहीं है। उस पूरे संवाद में एक पंक्ति में जिस तरह से मंदिर की घंटी की बात की गई है वो भी लेखकों के सोच का परिचायक है। इस वाक्य को एक बार फिर से देखा जाना चाहिए जहां लेखक एक पुरुष पात्र के मुंह से कहलवाता है कि इस तरह के कपड़े पहनकर अगर आप बाहर सड़क पर निकलेंगी तो गुंडों की सीटियां नहीं बजेंगी तो क्या मंदिर की घंटियां बजेंगी। लेखक को गुंड़ों की सीटियां के सामने मंदिर की घंटियां नजर आई थी। मंदिर की घंटी और गुंडे की सीटी में तुलना का क्या औचित्य। औचित्य को अगर छोड़ भी दिया जाए तो इस तुलना की उपयुक्तता पर विचार किया जाना चाहिए।  जावेद अख्तर के लेखन में हिंदू धर्म प्रतीकों को लेकर इस तरह की हल्की टिप्पणियां पहले भी रेखांकित की जा सकती हैं। इसलिए इस संवाद को लेकर किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। लेकिन दर्शकों को पता तो होना चाहिए कि प्रगतिशीलता का दावा करनेवाले लेखक की असलियत क्या है। महिलाओं और धार्मिक प्रतीकों के बारे में वो क्या सोचता है। जावेद अख्तर बहुधा व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बातें करते हुए नजर आते हैं। जब वो मंच से इस तरह की जुमलेबाजी करते हैं तो खूब तालियां बजती हैं। इस तरह की बातों रीलों पर लाइक्स भी बटोरते हैं। साहित्यिक मंचों पर इस तरह की बातें कर गंभीर लेखक और कवि होने का दावा पेश करते हैं पर उनके लिखे फिल्मी संवाद उनके सोच को सामने रख देते हैं। यह नहीं कहा जा सकता है कि फिल्मों की कहानी में तो फार्मूला और सफलता को ध्यान में रखकर लिखी जाती है। लिखी जाती होगी लेकिन लेखक के विचार तो उसमें आते ही हैं। ये सिर्फ जावेद अख्तर के साथ नहीं होता है बल्कि फिल्मों के सभी लेखकों के लेखन को देखने पर यही पता चलता है। अपने लेखन में लेखक वैचारिक छौंक लगाता ही है। 

जावेद अख्तर खुद को नास्तिक भी घोषित करते रहे हैं। अपनी इस छवि को बल प्रदान करने के लिए मंचों पर इस्लाम को लेकर भी कटु बातें कह जाते हैं। लेकिन वो बातें इस्लामिक समाज की कुरीतियों तक ही होती हैं। किसी मंच या फिल्मी संवाद में उन्होंने इस्लाम से संबंधित किसी उपमा का, किसी प्रतीक का उपहास किया हो ऐसा दिखाई नहीं देता है। जब उनसे कभी किसी मंच पर कोई व्यक्ति इससे संबंधित प्रश्न पूछ लेता है तो वो इसको बहुत चतुराई के साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़ देते हैं। इमोशनल होकर ये पूछने लग जाते हैं कि क्या आप अपने मुल्क को सीरिया बनाना चाहते हैं। दर्शकों को लगता है कि देखो कितनी अच्छी बातें कर रहा है। फिर कुछ और मजेदार बातें, क्रोधित होने का अभिनय और जनता की तालियां। लेकिन इन तालियों से ना तो मूल प्रश्न का उत्तर मिलता है और ना ही जावेद अख्तर के लेखन से उपजे विचार की तार्किकता सिद्ध होती है। जावेद अख्तर की ये कैसी नास्तिकता है जो उनको सिर्फ हिंदू धर्म प्रतीकों का उपहास करने की अनुमति देता है। क्या हिंदुओं की सहनशीलता और सहिष्णुता उनको इस तरह की उपहासजनक टिप्पणियां करने का साहस देता है। ये उनकी कैसी प्रगतिशीलता है जो लड़कियों के कम कपड़ों पर टिप्पणियां करवाता है। आज कुछ राजनीतिक दल देश में स्मैश द पैट्रियार्की का ना बुलंद करते हैं, मनुस्मृति को प्रश्नों के कठघरे में खड़ा करते हैं। करिए, लेकिन जावेद अख्तर जैसे लेखकों के सोच को और उस तरह के लेखन तो भी रेखांकित कर प्रश्नांकित करने की आवश्यकता है।  


Wednesday, October 14, 2026

दिल्लगी ने दी हवा


गोवा में आयोजित होनेवाले भारतीय अंतराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में कुछ वर्षों पूर्व एक सत्र के दौरान करण जौहर ने कहा था कि पहले फिल्मों में दो-तीन प्रकार की कहानियां ही दर्शकों को पसंद आती थीं। अगर मुझे ठीक याद आ रहा है तो करण ने कहा था कि एक तो खोया पाया का फार्मूला और दूसरा प्रेम त्रिकोण वाली कहानी को दर्शक खूब पसंद करते हैं। करण जौहर के उस वक्तव्य के बाद वहां उपस्थित फिल्म इतिहासकारों से इसपर चर्चा भी हुई थी। उस चर्चा में फिल्म दोस्ताना नहीं आई थी। फिल्म दोस्ताना करण जौहर के पिता यश जौहर की फिल्म है। इस फिल्म की कहनी भी प्रेम त्रिकोण ही है। विजय (अमिताभ बच्चन) और रवि (शत्रुघ्न सिन्हा) दो दोस्त हैं जिनको शीतल (जीनत अमान) से प्यार हो जाता है। रवि बिंदास अंदाज में शीतल से प्यार की पींगे बढ़ाता है वहीं रवि खामोश मोहब्बत करता है। शीतल रवि को दोस्त समझती है। उसको भी रवि के प्यार का अनुमान नहीं है। रोचक तरीके से कहानी कई दिलचस्प मोड़ लेती हुआ आगे बढ़ती है। रवि और विजय दोस्त से दुश्मन बन जाते हैं। कहानी के एक नाटकीय मोड़ से रवि को विजय की उसके प्रति भावना का पता चलता है। वो बेचैन हो जाता है। इस फिल्म को राज खोसला ने निर्देशित किया था। राज खोसला अपने जमाने के बेहतरीन निर्देशकों में गिने जाते थे। उन्होंने सलीम-जावेद की दोस्ताना की कहानी का ट्रीटमंट ऐसा किया कि दर्शकों को फिल्म भा गई। जो कहानी कई बार कही जा चुकी थी उसको दर्शकों का खूब प्यार मिला। 1980 में रिलीज हिट फिल्मों में दोस्ताना भी शामिल है। 

फिल्म दोस्ताना के बनने की कहानी भी दिलचस्प है। राज खोसला ने मराठी उपन्यास आशी तुझी प्रीत पर आधारित एक हिंदी फिल्म निर्देशित की थी जिसका नाम था ‘मैं तुलसी तेरे आंगन की’। इस फिल्म के बाद राज खोसला की शराब से ऐसी दोस्ती हुई कि वो कहने लगे थे कि अब फिल्म नहीं बस स्काच के साथ जिंदगी बिताई जाएगी। ये वही दौर था जब यश जौहर फिल्मों की पब्लिसिटी और प्रबंधन से मुक्त होकर फिल्म बनाना चाह रहे थे। वो राज खोसला के पास पहुंचे और उनसे फिल्म निर्देशित करने का अनुरोध किया। पहले तो राज खोसला ने मना कर दिया लेकिन यश जौहर ने हार नहीं मानी। उनके पास सलीम-जावेद की कहानी थी। सलीम जावेद का हिंदी फिल्मों में डंका बज रहा था। एक दिन यश जौहर ने राज खोसला से आग्रह किया कि वो कहानी सुन लें। खोसला ने जब कहानी सुनी तो हां कर दी। अब कास्टिंग की बात आरंभ हुई। अमिताभ को राज खोसला ने एक फिल्म में डायरेक्ट किया था। वो तय ही थे। जीनत अमान और विनोद खन्ना भी फाइनल किए गए। राज खोसला और विनोद खन्ना ने कई फिल्में साथ की थीं। दोनों में बहुत अच्छी दोस्ती थी। फिल्म दोस्ताना की रिलीज के दो साल पहले मुकद्दर का सिकंदर रिलीज हुई थी। उस फिल्म में अमिताभ बच्चन और विनोद खन्ना दोनों की दमदार उपस्थिति थी। विनोद खन्ना अपेक्षाकृत अधिक खूबसूरत थे। सब तय हो गया था। कहानी में राज खोसला ने कुछ बदलाव बताए जिसको सलीम-जावेद ने स्वीकार कर लिया था। स्टारकास्ट भी फाइनल ही था। अचानक एक दिन राज खोसला ने कहा कि विनोद खन्ना को दोस्ताना में लेना ठीक नहीं होगा। जब उनसे कारण पूछा गया तो बोले कि नायिका विनोद खन्ना जैसे खूबसूरत हीरो को छोड़कर अमिताभ बच्चन के साथ क्यों जाएगी। यहीं से फिल्म में शत्रुघ्न सिन्हा के चयन का रास्ता साफ हुआ। 

1980 में रिलीज हुई फिल्म दोस्ताना को उसके गानों के लिए भी याद किया जाता है। सलीम खान कहते भी हैं कि राज कपूर के बाद राज खोसला को ही कहानी और उसमें संगीत के उपयोग की शानदार समझ थी। जिस तरह से राज कपूर संगीत को समझ कर अपनी फिल्मों में उसका उपयोग करते थे उसी तरह से राज खोसला भी अपनी फिल्मों को संगीत से बढ़ाते थे। इस गाने को याद करिए- मेरे दोस्त किस्सा ये क्या हो गया, सुना है कि तू बेवफा हो गया। आनंद बक्षी के इस गीत को मोहम्मद रफी की आवाज ने अमर कर दिया। फिल्म में कहानी के जिस मोड़ पर इस गाने का उपयोग राज खोसला ने किया वो बेहतरीन है। इसी तरह से फिल्म का आरंभ भी एक गीत से ही होता है जिसको मोहम्मद रफी और किशोर कुमार ने आवाज दी है। आनंद बक्षी ने लिखा और लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने संगीत दिया । गाने के बोल हैं- सलामत रहे दोस्ताना हमारा। मोहम्मद रफी और किशोर कुमार के साथ गाए गानों में ये गाना बहुत ही अधिक पसंद किया गया या कह सकते हैं कि अब भी किया जाता है। जब करेण जौहर कह रहे थे कि प्रेम त्रिकोण वाली फिल्में भारतीय दर्शक पसंद करते हैं तो उनके जेहन में अवश्य फिल्म दोस्ताना भी रही होगी क्योंकि बहुत लंबे समय तक धर्मा प्रोडक्शन की सबसे हिट फिल्म दोस्ताना ही थी। 


Saturday, October 10, 2026

साहित्यिक वक्ताओं की तैयारी पर प्रश्न


बात कड़वी लग सकती है लेकिन सच्चाई यही है। हद तो यह हो गई कि एक वक्ता कुंवर नारायण की जगह निर्मल वर्मा पर बोलने लगे। टोकने पर उसको स्मृति दोष बताने लगे। यह बात भी उचित है कि कुछ वक्ताओं को ही हर विषय पर बोलने के लिए बार-बार क्यों बुला जाता है। असल में रजा न्यास दरबारियों को प्राथमिकता देता है। दो दिन तक में इस कार्यक्रम में बतैर श्रोता मौजूद रहा, और एकाध वक्ताओं को छोड़ दें तो किसी ने भी कुंवर नारायण को पढ़ा नहीं था। यह कहने के बाद हो सकता है कि रजा न्यास मुझे बतौर श्रोता भी आमंत्रित नहीं करे लेकिन जिस तरह से सरकारी संस्थाओं में इस तरह के आयोजन रस्मी होते हैं रजा न्यास के आयोजन भी उसी तरह के होते हैं, जिसमें चमचों को माइक दिया जाता है। यह कठोर टिप्पणी लिखी है दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापक और हिंदी के प्रतिष्ठित लेखक प्रभात रंजन ने। प्रभात रंजन बात कर रहे हैं हिंदी कवि कुंवर नारायण के जन्मशताब्दी के अवसर पर रजा न्यास के दो दिवसीय आयोजन की। रजा न्यास लेखक अशोक वाजपेयी की साहित्यिक दुकान है। ये संस्था नियमित रूप से कार्यक्रम आदि आयोजित करती है। इनके कार्यक्रमों में कुछ ऐसे लोगों को आमंत्रित किया जाता है जो अशोक वाजपेयी के हर कार्यक्रम में उपस्थित होते हैं। चाहे उनको पुरस्कार दिया जा रहा हो या फिर किसी लेखक कवि पर केंद्रित गोष्ठी आयोजित की जा रही हो। हिंदी के वर्तमान साहित्यिक परिदृष्य में बहुत ही कम ऐसे लेखक हैं जो किसी गोष्ठी में जाने के लिए मना करते हैं। अध्ययन हो या न हो। 

प्रभात रंजन की टिप्पणी हिंदी साहित्य की किसी राजनीति के अंतर्गत नहीं लिखी गई है बल्कि क्षोभ से उपजी हुई है। कुंवर नारायण समकालीन हिंदी साहित्य के ऐसे कवि या लेखक हैं जिनका रचना संसार विस्तृत है। उन्होंने श्रेष्ठ कवितें लिखी हैं। उनकी कविताओं में कई परतें हैं जिनको समझने के लिए भारतीय काव्य परंपरा का गहन अध्ययन होना चाहिए। काव्य परंपरा के साथ साथ भारतीय परंपराओं का ज्ञान भी होना चाहिए। कुंवर नारायाण ने अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल के बहाने विश्व सिनेमा पर भी बहुत गंभीर टिप्पणियां की थीं जो उनके अध्ययन क्षेत्र का सूचक है। हिंदी साहित्य में कम ही ऐसे लेखक और कवि हुए हैं जिन्होंने अंतराष्ट्रीय सिनेमा पर अधिकारपूर्वक लिखा हो। ऐसे लेखक के जन्म शताब्दी समारोह में इस तरह के हल्के, अज्ञानी और लापरवाह वक्ताओं को बुलाकर दिवंगत लेखक का अपमान करना ही माना जाएगा। आप कल्पना करिए कि जन्म शताब्दी समारोह कुंवर जी की मनाई जा रही हो और मंच से कोई वक्ता निर्मल वर्मा पर बोलने लगे। यह तो लेखक और मंच दोनों का अपमान है। लापरवाही की हद तब होती है जब उनको याद दिलाया गया तो वो कहने लगे कि स्मृति दोष के कारण कुंवर जी की बजाए निर्मल जी पर बोलने लगे थे। यह बहुत ही गैर जिम्मेदारी वाला अप्रोच है। इस तरह की घटनाएं हिंदी साहित्य की गोष्ठियों में आम है। आप किसी विषय पर सुनने जाएंगे लेकिन इसकी गारंटी नहीं है कि वक्ता उसी विषय पर बोलें। वक्ता अपनी मर्जी से बोलते हैं और वक्तव्य के बीच में एक दो बार विषय का नाम ले लेते हैं ताकि ऐसा प्रतीत हो कि वो विषय पर बोल रहे हैं।  जन्म शताब्दी जैसे आयोजनों में तो ये खूब होता है। आप अपने पूर्वज लेखक की रचनाशीलता और उसके विभिन्न कोणों के बारे में जानने सुनने के लिए ऐसी गोष्ठियों में जाते हैं लेकिन वक्ता अपने और उनके संबंधों के बारे में बखान करने लग जाते हैं। उनको लगता है कि श्रोताओं को उनकी चतुराई समझ नहीं आती। श्रोता सब समझते हैं.  

यह अकारण नहीं है कि हिंदी साहित्य से जुड़ी गोष्ठियों में श्रोता नहीं या कम मिलते हैं। गोष्ठियों में श्रोताओं को कुछ नया मिलना लगभग बंद हो गया है। जो भी वक्ता आते हैं उनमें से अधिकतर बगैर किसी तैयारी के अपने ज्ञानदंभ के साथ आते हैं। जो मन आता है वो बोलकर चले जाते हैं। श्रोता बेचारा ठगा रह जाता है। अशोक वाजपेयी का ही उदाहरण लीजिए। वो अच्छे वक्ता माने जाते हैं। लच्छेदार हिंदी और अंग्रेजी बोलते हैं। उनके पास संस्मरणों का खजाना भी है। पर तय विषय पर उनको बोलते कम ही सुना गया है। आखिरी बार किसी गोष्ठी में तय विषय पर अशोक वाजपेयी कब बोले इसपर तो शोध हो सकता है। उनकी विशेषता है कि वो मंच पर आते हैं। आरंभ कुछ हल्की फुल्की बातों से करते हैं। फिर एकाध संस्मरण सुनाते हैं और तय विषय को छूते हुए निकल जाते हैं। बात रामचंद्र शुक्ल के कविता क्या है जैसे लेख पर होगी तो वो ये बताएंगे कि उनका रामचंद्र शुक्ल का अध्ययन कितना कम है। अरे भले आदमी अगर आपका अध्ययन कम है तो मत बोलिए। मंच और माइक का लोभ संवरण कर पाना बहुत कठिन कार्य है। नामवर सिंह भी अपने आरंभिक दिनों में बहुत तैयारी के साथ बोलते थे। उनके व्याख्यानों में तथ्य और तर्क दोनों होते थे। इसलिए लोग उनको सुनने के लिए घंटों प्रतीक्षा करते थे। बढ़ती अवस्था के साथ-साथ मंच और माइक के आकर्षण ने उनको भी वक्तव्य पूर्व की तैयारी से दूर कर दिया। वो भी अपने अनुभवों के आधार पर बोलने लगे थे। परिणाम होता था कि जब नामवर सिंह किसी पुस्तक लोकार्पण में जाते थे तो मंच पर ही पुस्तक को उलटते-पलटते थे। अपने भाषण में पुस्तक की दो-तीन पंक्तियां उद्धृत करते हुए लेखक पर तले जाते थे। यह अकारण नहीं था कि बाद के दिनों में नामवर सिंह मंच से हर किसी की प्रशंसा करने लगे थे। प्रशंसा कर देने से प्रश्न नहीं उठते हैं। 

इस तरह की गोष्ठियों और वक्ताओं से हिंदी साहित्य समृद्ध नहीं होता। ना ही लेखक की कृति पर चर्चा हो पाती है। तात्कालिक रूप से लेखकों को अच्छा लग सकता है कि नंच से उसकी प्रशंसा हुई पर कुछ समय बाद उसको कोई याद भी नहीं रखता क्योंकि कोई सार्थक बात तो हुई नहीं। दूसरी तरफ अशोक वाजपी जैसे वक्ताओं को जो बेहतर बोल सकते हैं वो भी संस्मरणात्मक घटनाओं से आगे नहीं बढ़ पाते हैं। संस्मरणों की हल्की फुल्की बातें सुनाकर श्रोतों का मनोरंजन तो हो सकता है लेकिन ज्ञानवर्धन नहीं। विषय के साथ न्याय के लिए आवश्यक है कि उसपर बोलने के लिए पर्याप्त तैयारी की जाए। कुछ ऐसा विश्लेषण या तथ्य प्रस्तुत किया जा सके जिससे श्रोता समृद्ध हो सकें, साहित्य की चौहद्दी बढ़े। किसी कृति पर बोलने के पहले यह भी आवश्यक है कि उसकी लेखन प्रकृत्ति की परंपरा को रेखांकित करते हुए इस बात का आकलन किया जाए कि अमुक कृति ने उस परंपरा को आगे बढ़ाया या उसमें कुछ जोड़ा या नहीं। पाठकों के सामने कृति के उस पक्ष को रखा जाना चाहिए जिसको लेखक स्पष्ट नहीं कर पाया हो। यही काम तो आललोचना का भी था और यही काम गोष्ठियों में अपने विचार प्रस्तुत करनेवालों का भी है। प्रभात रंजन की टिप्पणी में दरबारियों और चमचों की भी बात की गई है। कम से कम ये साहित्य का भला तो नहीं कर सकते। 


Saturday, October 3, 2026

सामान्यीकरण का स्वर्णकाल


दो दिन पूर्व फेसबुक स्क्रोल करते समय पटना के चिकित्सक डा विनय कुमार की एक पोस्ट पर नजर गई। विनय जी आमतौर पर विवादों से दूर रहते हैं। दाहिने-बायें सभी ओर उनके मित्र और प्रशंसक हैं। अच्छे डाक्टर के साथ अच्छे कवि भी हैं। इस कारण साहित्य जगत में उनकी प्रतिष्ठा है। अपने पोस्ट में वो हिंदी के बुजुर्ग साहित्यकार असगर वजाहत की किसी रील का उल्लेख करते हुए लिखते हैं-एक रील में असगर वजाहत साहब यह कहते हुए सुने जा सकते हैं कि डाक्टर इंजीनियर को मैं पढ़ा लिखा नहीं मानता। वे अपवाद का जिक्र भी करते हैं। उनकी इस टिप्पणी को पढ़ने के बाद इच्छा हुई कि असगर साहब क्या कह रहे हैं उसको सुना जाए। असगर वजाहत कह रहे हैं, मैं तो डाक्टर और इंजीनियर्स को आमतौर पर, अपवाद हो सकते हैं, पढ़ा लिखा नहीं मानता, शिक्षित नहीं मानता। स्वयं पूछते हैं कि क्यों नहीं मानता फिर उसका उत्तर देते हैं, हाई स्कूल और इंटरमीडियट करके ये पांच साल की इंजीनयरिंग कर लेते हैं और इंटरमीडियट तक क्या पढ़ाई होती है ये आप भी जानते हैं। न तो ठीक से भाषा की पढ़ाई होती है, न तो इतिहास पढ़ते हैं, न भूगोल पढ़ते हैं, न अर्थशास्त्र पढ़ते हैं, न साहित्य पढ़ते हैं। ह्यूमिनिटीज की पढ़ाई बिल्कुल नहीं होती है इनकी। इसलिए इनका आर्ट और कल्चर के प्रति रुझान जो है, आमतौर से नहीं होता। अपवाद हो सकते हैं। जबतक आप ग्रेजुएशेन नहीं करोगे तबतक ह्यूमिनिटीज को इतिहास को भूगोल को अर्थशास्त्र को नहीं पढ़ोगे तबतक समाज के प्रति कोई दृष्टिकोण नहीं बन पाएगा। वो पैसा कमा रहे हैं अच्छा काम कर रहे हैं लेकिन उनका बौद्धिक विकास नहीं हो पाता है।

असगर वजाहत के इस कथन पर डा विनय कुमार ने उचित ही प्रश्न उठाते हुए पूछा है कि क्या यह ओवर जेनरालाइजेशन नहीं है। दरअसल ये बिल्कुल ही सामान्यीकरण है। असगर जी जैसे चिंतनशील व्यक्ति कैसे इस तरह की टिप्पणी कर गए पता नहीं लेकिन विनय जी ने भी लिखा है और हमारा भी अनुभव है कि ह्यूमिनिटीज के विषयों से कई स्नातक और स्नातकोत्तर व्यक्ति भी अपना बौद्धिक विकास नहीं कर पाते हैं। इसके आधार पर यह कह देना कि जो लोग मानविकी के विषय नहीं पढ़ते हैं उनका समाज के प्रति कोई दृष्टिकोण नहीं बन पाता या उनका बौद्दिक विकास नहीं होता, अनुचित है। दरअसल पहले बौद्धिक जगत में चलनेवाले विमर्श को देख सुनकर लगता था कि राजनीति के साथ-साथ साहित्य में भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का स्वर्णकाल चल रहा है। कुछ लोग अवश्य फैशन में फासीवाद-फासीवाद खेलते रहते हैं। पिछले कई दशकों में देश में फासीवाद की आहट सुनने वाले कम्युनिस्ट विचार के लेखकों को वर्तमान दौर में या यों कहें कि जून 2014 के बाद से फासीवाद के आने और पांव पसारने की आशंका तेज हो गई थी। 2014 के बाद करीब एक युग बीत गया लेकिन फासीवाद की ना तो आवाज तेज हुई और ना ही चाल। आशंका निर्मूल। दरअसल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर जो टिप्पणी की जाती है वो सामान्यीकरण के दोष का शिकार होती है। एक बुजुर्ग लेखिका-पत्रकार की फ्लाईदुबई विमान कांड पर की गई टिप्पणी सामान्यीकरण के दोष की शिकार है, हलांकि उसमें कुंठा का मिश्रण भी था। वो लिखती हैं, सुखांत में कई संयोग जुट गए हैं। मसलन हाईजैक हो रहे प्लेन का यमनी को-पायलट सुरक्षा को चरका देकर चाकू लाना, दो-दो प्रशिक्षित पायलटों की बतौर यात्री मौजूदगी, घायल पायलट का काकपिट का दरवाजा खोलते ही उनका आरोपी पर काबू और भारत के कथित फादरलैंड के मुखिया द्वारा भरपूर तारीफ। हलांकि पूर्व में भी इनकी टिप्पणियां कुंठा से सराबोर रहती हैं लेकिन एक आतंकी घटना का जिस तरह से सामान्यीकरण किया वो तो विक्षिप्त मन की विलक्षण प्रतिभा ही कर सकती है।

सामान्यीकरण को समझने के लिए ये दो उदाहरण ही काफी हैं लेकिन एक और उदाहरण देख लेते हैं। हाल में दिल्ली विश्वविद्यालय में कुछ छात्राओं ने सुरक्षा को लेकर मार्च निकाला था। उस जुलूस में जिस तरह के नारे लगे थे वो भी सामान्यीकरण का उदाहरण है। एक नारा था, एक कचौड़ी दो समोसा, मर्द जात का क्या भरोसा। एक और तख्ती पर लिखा था- चाय गरम दूध गरम, मर्द समाज बेशरम। इसी तरह की तुकबंदी वाले कई नारे थे जो हास्य तो उत्पन्न कर रहे थे लेकिन उनका प्रभाव समाज पर पड़ा हो ऐसा प्रतीत नहीं होता है। प्रभाव इस कारण से नहीं क्योंकि ये नारे बहुत ही जनरलाइज्ड थे। पूरे मर्द समाज को एक कोष्ठक में रख दिया गया। किसी भी समस्या या अपराध पर पूरे जेंडर को कठघरे में खड़ा करना अति सामान्यीकरण है जिसका प्रभाव शून्य हो जाता है। इंटरनेट मीडिया पर इस तरह के पोस्ट या नारे वायरल हो सकते हैं, हिट्स और लाइक्स मिल सकते हैं, हास्य वाली इमोजी से स्वागत भी हो सकता है लेकिन सब अर्थहीन। ये वैसा ही है जैसा असगर वजाहत ने सभी डाक्टर्स और इंजीनियर्स को एक ही कोष्ठक में रखकर उनकी बौद्धिक क्षमता को प्रश्नांकित कर दिया। इस कारण से एक आशंका है कि असगर वजाहत साहब की उक्त टिप्पणी पर लोग आनंद लेंगे, हो सकता है कि इंटरनेट मीडिया पर प्रचलित भी हो जाए, लेकिन उसका कोई प्रभाव समाज पर पड़ेगा इसमे संदेह है। कम ही लोग गंभीरता से लेंगे।

उपरोक्त उदाहरण से इतना तो स्पष्ट ही है कि लोगों में, समाज के लगभग सभी वर्गों में किसी घटना या किसी अपराध के सामान्यीकरण की प्रवृत्ति बढ़ी है। यह प्रवृत्ति समाज के हर क्षेत्र में बढ़ी है। बगैर सोचे समझे इस तरह की टिप्पणी कर दी जाती है जिसकी चर्चा तो हो जाती है लेकिन अर्थहीन। सामान्यीकरण के स्वर्णकाल की ही परिणति है एक दूसरे पर जातिगत टिप्पणी करना। इसमें किसी की मंशा किसी को अपमानित करने की नहीं भी हो सकती है। अब अगर किसी अगड़ी जाति के व्यक्ति पर उनकी जाति को लेकर टिप्पणी की जाती है तो वो तो सामान्यीकरण का दोष है। उद्देश्य अपमान नहीं बल्कि कुछ और हो सकता है।हमारा समाज इस तरह की टिप्पणियां क्यों करने लगा है इसपर विचार करना होगा। एक कारण तो तुरंता प्रसिद्धि की चाहत। इस तरह के कई लोग आपको इंटरनेट मीडिया पर मिल जाएंगें जो ऊलजलूल टिप्णियां करने के लिए ही जाने जाते हैं। उनके लाखों फालोवर्स भी हैं। पर ऐसे लोगों की समाज में क्या उपयोगिता है इसपर भी विचार किया जाना चाहिए। क्या ऐसे लोगों को समाज गंभीरता से लेता है या इनकी राय पर व्यापक वर्ग में कोई चर्चा होती है। उत्तर तो ना में ही देखने को मिलता है। तुरंता प्रसिद्धि भले ही मिल जाती है लेकिन उसमें स्थायित्व नहीं होता। सामान्यीकरण का सबसे बड़ा नुकसान ये होता है कि टिप्पणी करनेवाले या करनेवाली की प्रतिष्ठा धूमिल होती है और लोग उनकी बातों को गंभीरता से लेना छोड़ने लगते हैं। अब समय आ गया है कि सभी ये सोचें कि समान्यीकरण के इस दोष से कैसे मुक्ति मिल सकती है। इसके विकराल रूप धर लेने से पहले इसको रोकना आवश्यक है।