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Saturday, March 21, 2026

अकादेमी पुरस्कारों से उठते गंभीर प्रश्न


आखिरकार साहित्य अकादेमी ने अपने वार्षिक पुरस्कारों की घोषणा कर ही दी। जैसी की साहित्य जगत में चर्चा थी उसी अनुसार अरुण कमल, अरविंदाक्षण और अनामिका की जूरी ने हिंदी की वरिष्ठ लेखिका ममता कालिया को हिंदी के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार देने की घोषणा की। पिछले वर्ष दिसंबर में जब आखिरी समय में नाटकीय ढंग से साहित्य अकादेमी पुरस्कारों की घोषणा रोक दी गई थी तब इसको लेकर कई तरह के कयास लगाए गए थे। कुछ लोग इसको साहित्य अकादेमी की स्वयत्तता से जोड़कर देख रहे थे। कुछ इसको पुरस्कार के स्थगित होने की आशंका से व्यथित थे। घोषणा के समय के आसपास ही मंत्रालय ने साहित्य अकादेमी, ललित कला अकादमी, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय और संगीत नाटक अकादमी को एक पत्र, फाइल संख्या एकेडी-18/27/2025 एकेएडी, दिनांक 18 दिसंबर 2025 भेजी। इस पत्र में इन संस्थाओं के प्रमुखों को संस्कृति मंत्रालय के साथ जुलाई 2025 में हुई करार (एमओयू) की याद दिलाई गई थी। कहा गया था कि एमओयू के मुताबिक सभी अकादमियां संस्कृति मंत्रालय से विमर्श करके अपने पुरस्कारों का पुनर्गठन करेगी। उसी पत्र में मंत्रालय ने ये भी सूचित किया था कि जबतक पुरस्कारों का पुनर्गठन नहीं हो जाता है, तबतक मंत्रालय की पूर्व अनुमति के बिना प्रकिया नहीं हो सकती। यहां यह प्रश्न उठता है कि इन तीन महीनों में क्या साहित्य अकादेमी की पुरस्कार प्रक्रिया का पुनर्गठन हो गया? 

दरअसल साहित्य अकादेमी के पुरस्कारों को लेकर विवाद होते रहे हैं। 2024 में सरकार ने सभी अकादमियों के पुरस्कारों को पद्म पुरस्कारों की तरह पारदर्शी बनाए जाने को ध्यान में रखते हुए प्रक्रिया को बदलने को कहा था। जिसमें पाठकों की भी सहभागिता सुनिश्चित करने की बात थी। पहले व्यवस्था ये थी कि हर भाषा के दो विशेषज्ञ संबंधित भाषा की पुस्तकों की आधार सूची तैयार करते थे। इन विशेषज्ञों को भाषा की सलाहकार समिति के सदस्यों के सुझाए गए पैनल के आधार पर अध्यक्ष तय करते थे। अकादेमी ने इस नियम को बदलकर आधार सूची की व्यवस्था समाप्त कर दी थी। अकादेमी ने 2025 में विज्ञापन प्रकाशित किया था। विज्ञापन के अनुसार लेखक, प्रकाशक या कोई भी व्यक्ति किसी पुस्तक को पुरस्कृत करने की अनुशंसा या सुझाव दे सकता था। विज्ञापन के बाद जब पुस्तकें आ जाती तो अकादेमी ने उनकी सूची संबंधिक भाषा की सलाहकार समिति के सभी सदस्यों को भेजा था। उनसे अनुरोध किया गया था कि उस सूची में से दो पुस्तकों की अनुशंसा करें। सलाहकार समिति के सदस्य स्वयं भी पुरस्कार के लिए सूची से बाहर की पुस्तक भी सुझा सकते हैं। सलाहकार समिति के सदस्यों से प्राप्त सूची को प्राथमिक पैनल को भेजा जाता है। प्राथमिक पैनल का गठन भाषा की सलाहकार समिति के सुझाए गए नामों के आधार पर तैयार पैनल में से अध्यक्ष चुनता है। ये पैनल हर भाषा में 10 लोगों का होता है जो गोपनीय रखा जाता है। प्राथमिक पैनल के सदस्यों से दो-दो पुस्तकों के नाम मांगे जाते हैं। किसी भी भाषा के लिए निर्णायक समिति के सामने प्रथामिक पैनल द्वारा भेजी गई सूची और पुस्तकें रखी जाती हैं। हिंदी में सलाहकार समिति के सदस्य अधिक हैं इस कारण अधिक पुस्तकें आती हैं। 

अब यहां से निर्णायक समिति की भूमिका आरंभ होती है जिसको फाइनल जूरी कहते हैं। इस जूरी के सदस्यों का चयन अध्यक्ष करता है। ये सूची भी संबंधित भाषा की सलाहकार समिति के सदस्य के सुझाए गए पैनल से ही होता है। हिंदी के चूंकि 22 सदस्य आमसभा में होते हैं इस कारण से वो सभी सलाहकार समिति के सदस्य होते हैं। अध्यक्ष अपनी मर्जी से पैनल से तीन सदस्यों का चयन करता है जो पुरस्कृत होनेवाले लेखक की कृति को चुनते हैं। पुरस्कृत कृति का चयन बहुमत से या सर्वसम्मति से होता है। हिंदी के लिए इस बार जो चयन समिति बनी उसमें अरुण कमल और अरविंदाक्षण की विचारधारा वामपंथी है। अनामिका का झुकाव घोषित तौर पर वामपंथ की तरफ नहीं है लेकिन वो बहुधा बहुमत के साथ रहती हैं। अरुण कमल तो लंबे समय तक प्रगतिशील लेखक संघ के पदाधिकारी रहे हैं।  जब दिसंबर 2025 में साहित्य अकादेमी के पुरस्कारों की घोषणा होनेवाली थी और उसको मंत्रालय ने रोका था तो यही दलील दी गई थी कि पुरस्कार प्रक्रिया का पुनर्गठन नहीं हुआ। जबकि उपरोक्त व्यवस्था पिछले वर्ष प्रकाशित विज्ञापन के साथ ही आरंभ हो गई थी। 31 अक्तूबर को अकादेमी के तत्कालीन सचिव सेवानिवृत्त हो गए। 1 नवंबर 2025 को उनकी जगह संस्कृति मंत्रालय की एक अधिकारी ने सचिव का कार्यभार संभाला। जब 2025 के पुरस्कार के लिए पैनल बन रहा था तो मंत्रालय की अधिकारी साहित्य अकादेमी में सचिव के तौर पर तैनात थीं। उनके सचिव रहते ही फाइनल जूरी के सदस्यों को अध्यक्ष ने मनोनीत किया। उनकी देखरेख में भी अकादमी के पुरस्कारों की प्रक्रिया चली। उन्होंने सब जगह हस्ताक्षर किए होंगे ऐसा माना जा सकता है। अकादेमी में मंत्रालय की प्रतिनिधि के तौर पर सचिव का कार्यभार संभाल रही अधिकारी के दस्तखत से एजेंडा बना होगा। उस एजेंडा पर कार्यकारिणी ने विचार किया। फिर पुरस्कारों को अंतिम स्वरूप दिया गया। उसके बाद पुरस्कार की घोषणा के लिए मीडिया के लोगों को आमंत्रण भी प्रभारी सचिव की तरफ से ही गया था। 

प्रश्न ये उठता है कि अगर अकादेमी मंत्रालय के साथ किए गए एमओयू को बगैर माने पुरस्कार की प्रक्रिया को आगे बढ़ा रही थी, तो मंत्रालय की जो अधिकारी सचिव का कार्यभार संभाल रही थीं, उन्होंने आपत्ति क्यों नहीं की। हर बैठक में सचिव की उपस्थिति होती है। अगर एमओयू का उल्लंघन हो रहा था तो सचिव ने मंत्रालय को अलर्ट क्यों नहीं किया?  कार्यकारिणी की बैठक में आपत्ति क्यों नहीं उठाई। एजेंडा पर हस्ताक्षर करते समय अध्यक्ष से प्रश्न क्यों नहीं किए गए। ठीक पुरस्कार घोषित होने के समय ही संस्कृति मंत्रालय को ये याद कैसे आया कि एमओयू का उल्लंघन हो रहा है। अब तीन महीने में ऐसा क्या बदल गया कि पुरस्कृत लेखकों की उसी सूची को जारी कर दिया गया जिसे रोका गया था। दरअसल हिंदी की जूरी का नाम और पुरस्कृत होनेवाली लेखिका ममता कालिया का नाम साहित्य के गलियारे में सबको पता था। कई इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म पर ममता कालिया के नाम की घोषणा भी हो चुकी थी। ममता कालिया की छवि कांग्रेस की पक्षधर और मोदी सरकार की विरोधी की रही है। ऐसा प्रतीत होता है कि उस समय ममता जी के नाम की इतनी अधिक चर्चा हो गई कि मंत्रालय ने पुरस्कार की घोषणा को टालना उचित समझा। अन्यथा मंत्रालय को अब स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए कि दिसंबर में किस नियम का पालन साहित्य अकादेमी ने नहीं किया जिसका पालन तीन महीने में हो गया? एमओयू के करार के अंतर्गत पुनर्गठन हुआ या नहीं? अगर नहीं तो फिर पुरस्कारो की घोषणा क्यों ? 

दरअसल अगर हम साहित्य और संस्कृति से जुड़ी अकादमियों को देखें तो वहां ऐसे लोग बैठे हैं जो साहित्य से अधिक राजनीति करते हैं। अपने-अपने को पुरस्कार देने का खेल खेला जाता है। इस तरह के आरोप इस कारण भी उचित प्रतीत होते हैं कि हिंदी की सूची को देखने के बाद लगता है कि ममता कालिया की संस्मरणात्मक कृति ‘जीते जी इलाहाबाद’ अपेक्षाकृत कमजोर कृति है। इस सूची में कई ऐसी पुस्तकें थीं जो उनकी कृति से मजबूत हैं। साहित्य अकादेमी को चाहिए कि वो अब अपने नियम को बदलकर कृति के स्थान पर लेखक/लेखिका के समग्र लेखन पर पुरस्कार देना तय करे। पिछले वर्षों में कई बुजुर्ग लेखकों को उनकी कमजोर कृतियों पर पुरस्कार देकर उपकृत किया गया। विचारधारा का पोषण भी। साहित्य अकादेमी में वामपंथ की विचारधारा बहुत गहरे तक है उससे पार पाना मुश्किल है। उन वामपंथियों की पहचान मुश्लिल है जो इन दिनों रामनामी ओढ़कर अकादेमी में राजनीति कर रहे हैं। 


Saturday, March 14, 2026

हिंदी के विरुद्ध ‘पवित्र जिहाद’


कुछ दिनों पूर्व नागिरीप्रचारिणी सभा, बनारस की फेसबुक वाल पर एक रील देखी जिसमें कवि अशोक वाजपेयी के वक्तव्य का एक अंश था। उस रील में अशोक वाजपेयी ने आचार्य रामचंद्र शुक्ल की कविता की समझ को रेखांकित किया था। रील देखने के बाद संदर्भ समझने के लिए अशोक वाजपेयी का पूरा भाषण ढूंढा। पता चला कि नागरीप्रचारिणी सभा के तीन प्रकाशनों पर दिल्ली में एक चर्चा का आयोजन था। मंच पर अशोक वाजपेयी और सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल इत्यादि थे। अपने भाषण में वाजपेयी कह रहे हैं कि  वो हिंदी साहित्य के वैध विद्यार्थी नहीं रहे हैं। एक जमाने जब सबलोग आचार्य राaमचंद्र शुक्ल इत्यादि को विधिवत पढ़ते थे वैसे उन्होंने नहीं पढ़ा। कुछ छुट्टा, इधर उधर पल्लवग्राही रूप में पढ़ा। उन्होंने शुक्ल जी के निबंध कविता क्या है की पंक्तियों को पढ़ उसपर टिप्पणी की। जब वो शुक्ल को उद्धृत करते थे तो उनके बगल में मंच पर बैठे व्योमेश दाद दे रहे थे। पूरे प्रसंग की चर्चा मैंने एक मित्र से की। मेरे मित्र काशीवासी और साहित्यिक अभिरुचि के हैं। उनसे अशोक वाजपेयी का कथन बताया कि उन्होंने शुक्ल को विधिवत नहीं पढ़ा है तो उन्होंने गंभीरता से एक प्रश्न पूछा कि ये किसका दुर्भाग्य है ? आचार्य का या अशोक वाजपेयी का। मैं तबतक समझ गया था कि वो ऐसा क्यों पूछ रहे हैं। मैंने छूटते ही कहा कि जाहिर तौर पर दुर्भाग्य तो शुक्ल जी का ही रहा। इतना सुनकर मेरे मित्र जोर से हंसे और बोले कि अगर शुक्ल जी को वो विधिवत और समग्रता में पढ़ लेते तो शुक्ल जी पर बोलने के लिए नहीं आते। ना ही उनके साथ वामपंथी लेखक संघ से जुड़े लोग मंच पर होते। अब मैं थोड़ा विनोद के भाव में आ गया था। मैंने मित्र से पूछा कि उनके कथन का आधार क्या है। उनके अनुसार अगर अशोक वाजपेयी शुक्ल जी के भाषा संबंधी लेखों को विधिवत पढ़ लेते तो शायद नागिरीप्रचारिणी सभा के प्रकाशनों पर बोलने नहीं आते।

दरअसल शुक्ल जी ने हिंदी और उर्दू को लेकर जो लेख नागिरीप्रचारिणी पत्रिका और लीडर जैसी पत्रिकाओं में वर्ष 1908 से 1917 के कालखंड में लिखा उसको अगर वाजपेयी पढ़ लिए होते तो शुक्ल जी की प्रशंसा कर पाते, इसमें संदेह है। शुक्ल जी ने तो हिंदी के विरुद्ध उस समय के मुसलमान नेताओं के वक्तव्यों को पवित्र जिहाद कहा था। वो लिखते हैं कि हिंदी के विरुद्ध अपने पवित्र जिहाद में नवाब अब्दुल मजीद वह हर युक्ति अपनाते हैं, जिसमें उनकी तरह सोचनेवाले व्यक्ति विशेष रूप से निपुण कहे जाते हैं। क्या गलतबयानी, क्या भ्रांतव्याख्या, क्या धमकी, क्या शेखी, क्या स्तुति, क्या निंदा- वे सबका सहारा लेते हैं। यदि सहारा नहीं लेते हैं तो सिर्फ उचित तर्क देने का। आचार्य रामचंद्र शुक्ल इतने पर नहीं रुकते हैं बल्कि यहां तक कहते हैं कि नवाब साहब जब हिंदुओं को ये याद दिलाते हैं कि पुराने समय में वो मुसलमानों के अधीन थे वहां भी वो ये तथ्य विस्मृत कर जाते हैं कि दिल्ली के मुसलमान बादशाह ब्रिटिश शुरक्षा में आने के पहले मराठों की सुरक्षा में थे। पुराने समय के मुसलमानी साम्राज्य की अपेक्षा सिख और मराठा सम्राज्य जनता की स्मृति में अधिक है। इसके लिए शुक्ल जी इंपीरियल गजेटियर खंड छह का उदाहरण देते हैं। अशोक वाजपेयी ने सही माना कि वो हिंदी के वैध विद्यार्थी नहीं रहे। जो वैध नहीं रहता है वो क्या होता है ये बताने की आवश्कता नहीं है। अशोक वाजपेयी जैसे लोग भारत की सामासिक संस्कृति की बहुत बातें करते हैं। बहुधा गंगा-जमुनी संस्कृति की भी और हिंदी की जगह पर हिंदुस्तानी को प्राथमिकता देने पर जोर देते रहे हैं। इस पर भी शुक्ल जी ने टिप्पणी की थी। वो लिखते हैं कि जो लोग राजनीतिक दृष्टि से हिंदू-मुस्लिम एकता अत्यंत आवश्यक समझते हैं वे एक बीच का रास्ता पकड़कर हिंदुस्तानी लेकर उठे हैं। इस हिंदुस्तानी का समर्थन कुछ उदार समझे जानेवाले मुसलमान और उर्दू की गोद में पले हिंदू भी कर रहे हैं। हम भोली-भाली जनता को उस हिंदुस्तानी से सावधान करना अत्यंत आवश्यक समझते हैं। जो हिंदुस्तानी इन लोगों के ध्यान में है वह थोड़ी छनी हुई उर्दू के सिवा कुछ और नहीं है। उर्दू के सब लक्षण जैसे वाक्य रचना की फारसी शैली, अरबी फारसी के अप्रचलित मुंशी-फहम शब्द अरबी-फारसी के कायदे के बहुवचन इसमें वर्तमान रहेंगे तब तो वह हिंदुस्तानी कहलाएगी अन्यथा नहीं।

आचार्य शुक्ल उर्दू को अलग भाषा मानते ही नहीं थे वो तो उसको हिंदी की ही एक शाखा मात्र मानते थे। इसको लेकर उनकी बहुत कठोर टिप्पणी है- हर विद्वान जानता है कि उर्दू कोई स्वतंत्र भाषा नहीं है। यह पश्चिमी हिंदी की एक शाखा मात्र है, जिसे मुसलमानों द्वारा अपनी ऐकांतिक रुचियों और पूर्वग्रहों के अनुकूल एक निजी रूप दे दिया गया है। इस प्रकार हिंदी और उर्दू एक ही भाषा के दो रूप हैं। ये बात तो गणेश शंकर विद्यार्थी ने भी कही थी। शुक्ल जी ये भी कहते हैं कि उर्दू ईर्ष्यावश संस्कृत शब्दों से परहेज करती है और केवल अरबी और फारसी से शब्द उधार लेती है। शुक्ल जी उर्दू को सैन्य छावनी से निकलनेवाली भाषा नहीं मानते हैं।  इस तरह की बातों का उपहास करते थे। विचारणीय प्रश्न ये है कि किस तरह से सैयद अहमद ने उर्दू को मुसलमानों की भाषा कहकर राजनीति आरंभ की और उसको एक समुदाय से जोड़ दिया जो विभाजन तक आते आते बहुत गहरा हो गया। शुक्ल जी ही क्यों उस कालखंड के तमाम लेखकों ने उर्दू को लेकर टिप्पणियां की। स्वाधीन भारत में जब गंगा-जमुनी तहजीब के ध्वजवाहकों ने राजनीति से लेकर सांस्कृतिक लैंडस्केप पर अपना अधिकार जमाना आरंभ किया तो उन्होंने रामचंद्र शुक्ल, प्रताप नाययण मिश्र, भारतेंदु, बालकृष्ण भट्ट और महावीर प्रसाद दिविदी जैसे दिग्गजों के हिंदी-उर्दू संबंधी लेखन को नेपथ्य में धकेलने का प्रयत्न किया। हिंदी-उर्दू के विवाद में ये बात भी उभर कर आई थी कि उर्दू को जमानेवाले लोग सायास अपनी लेखन में भारतीय इतिहास ग्रंथों और पुराणों से उदाहरण नहीं लेकर फारसी से लेने लगे थे। यहां ये भी देखा जाना चाहिए कि उस समय नागरी लिपि को लेकर भी एक बड़ा विमर्श हुआ था। नागिरीप्रचारिणी सभा की पत्रिका से लेकर अन्य पत्रिकाओं में भी इस पर चर्चा हुई थी। ये कैसे हो गया कि नागरी में नुक्ता का प्रयोग आरंभ हो गया। अभी प्रकाशित नागिरीप्रचारिणी सभा के मुखपत्र के लेखों में नुक्ता का उपयोग किया गया है। कैसे और क्यों ? विमर्श इस बात पर भी होना चाहिए कि हिंदी में नुक्ता का प्रयोग क्यों ? हिंदी वर्णमाला में तो नुक्ता का स्थान है ही नहीं।   

प्रश्न भाषा का तो है ही उससे अधिक बड़ा प्रश्न ये है कि किस तरह से भारतीय लेखन को ओझल किया गया। बाद की पीढ़ियों को अपने पूर्वज लेखकों के सोच से दूर किया गया। इस तरह की शिक्षा पद्धति बनाई गई कि भारत और भारतीयता की बात करनेवाले लेखकों के लेखन को पीछे धकेला जा सके। इस संदर्भ में कुबेरनाथ राय का नाम लिया जा सकता है। कुबेरनाथ राय ने भारतीय पौराणिक ग्रंथों से उदाहरण लेकर विपुल लेखन किया। उनके लेखन को भी लंबे समय तक अनदेखा किया गया। अब जाकर उनके लेखन पर थोड़ी बहुत चर्चा होने लगी है। अकादमिक जगत में रामचंद्र शुक्ल के हिंदी साहित्य का इतिहास को प्रमुखता दी गई। भाषा संबंधी उनके विचार स्थान नहीं बना पाए। हिंदी को हिंदू और हिंदुस्तान से जोड़कर एक विमर्श खड़ा कर दिया गया। हिंदी राष्ट्रवाद तक की बात की गई और उसपर पुस्तकें प्रकाशित हुईं। जब हम भारतीय सभ्यता की पुनर्स्थापना की बात करते हैं तो साहित्य और भाषा पर पूर्व में हुए विचारों को समग्रता में देखना होगा। बिना उसके हिंदी की विकास यात्रा को नहीं समझा जा सकता है।

Sunday, March 8, 2026

रेडियो को दिए हिंदी के संस्कार


हिंदी साहित्य के इतिहास में डा नगेन्द्र की जब भी चर्चा होती है तो उनको या तो आलोचक के रूप में या दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के धाकड़ विभागाध्यक्ष के रूप में याद किया जाता है। आलोचक के रूप में रस सिद्धांत और कविता की प्रवृत्तियों पर उनके लिखे को हिंदी आलोचना में पर्याप्त प्रतिष्ठा प्राप्त है। उनके निबंधों की भी चर्चा होती है। दिलचस्प बात ये है कि अंग्रेजी में एमए करने के बाद नगेन्द्र ने हिंदी में भी एमए किया और जीवनपर्यंत हिंदी की सेवा में ही लगे रहे। शिक्षक-आलोचक के रूप में उनकी जो ख्याति है उसके सामने उनका हिंदी भाषा को लेकर किया गया कार्य बहुधा अलक्षित रह जाता है। स्वाधीनता के कुछ महीनों पूर्व 1947 के मई के तीसरे सप्ताह में डा नगेन्द्र ने आल इंडिया रेडियो में नौकरी आरंभ की। अपनी आत्मकथा नें डा नगेन्द्र ने लिखा है कि जब उन्होंने आल इंडिया रेडियो में नौकरी आरंभ की तो वहां हिंदी की दुर्दशा थी। वार्ता, नाटक, संगीत सभी अनुभागों में उर्दू का बोलबाला था। नाम उसका हिंदुस्तानी था पर भाषा उर्दू थी। उत्तर भारत में उस समय अंग्रेजी के अलावा हिंदुस्तानी में समाचार प्रसारित होते थे। आल इंडिया रेडियो में उपयोग में आनेवाली भाषा हिंदुस्तानी शुद्ध उर्दू ही थी जिसमें क्रियाओं और विभक्तियों के अतिरिक्त, जो वस्तुत: हिंदी और उर्दू में समान होती है, हिंदी का कोई लक्षण नहीं था। अंतराष्ट्रीय के लिए वैनुलअकवामी, प्रधानमंत्री के लिए वजीरे आजम, गृहमंत्री और विदेश मंत्री के लिए वजीरे दाखिला और वजीरे खालिजा जैसे शब्दों का प्रयोग होता था। स्वागत और धन्यवाद जैसे शब्दों का प्रयोग आल इंडिया रेडियो में वर्जित था। उस समय आल इंडिया रेडियो के महानिदेशक एस ए बुखारी थे। 

देश स्वाधीन हुआ और सरदार पटेल को इस बात का भान था कि रेडियो शिक्षा और संस्कृति के प्रसार प्रचार का प्रभावी साधन है।। उन्होंने गृह मंत्रालय के साथ-साथ सूचना और प्रसारण मंत्रालय अपने पास रखा। आल इंडिया रेडियो के उस समय के महानिदेशक एस ए बुखारी विभाजन के बाद पाकिस्तान चले गए लेकिन बुखारीकालीन भाषा आल इंडिया रेडियो पर चलती रही। बुखारी के बाद राजर्षि टंडन के प्रयास के बाद पी सी चौधुरी की नियुक्ति रेडियो में महानिदेशक के पद पर हुई। उनको सरदार पटेल का पूर्ण समर्थन था। चौधुरी भारतीय संस्कृति और इतिहास के ज्ञाता ही नहीं थे बल्कि उसके अनुरागी भी थे। जब डा नगेन्द्र ने रोडियो में अपनी सेवा आरंभ की तो हिंदी को हिंदी बनाने का प्रयास आरंभ हुआ। डा नगेन्द्र ने आल इंडिया रेडियो के उत्तर भारत के स्टेशनों में हिंदी के लेखकों और साहित्यकारों को सलाहकार के रूप में नामित कर जोड़ा। उनको कार्यक्रमों में बुलाया जाने लगा। चुनौती हिंदी समाचार की भाषा को हिंदी में प्रसारित करने की  थी। पहले तो हिंदी के साथ साथ उर्दू की पारिभाषिक शब्दावली का उपयोग होना शुरू हुआ। जैसे कहा जाता था कि प्रधानमंत्री यानि वजीरे आजम, अंतराष्ट्रीय यानि वैनुलअकवामी। इस तरह के प्रयोग की आलोचना आरंभ हुई। उर्दू अखबारों के अलावा मुस्लिम विद्वानों ने इसका जोरदार विरोध किया। महानिदेशक चौधुरी को इन आलोचकों की मंशा का पता था इस कारण वो डटे रहे और डा नगेन्द्र को हिंदी के अधिकतम शब्दों के उपयोग की छूट दी। उसी दौर में डा नगेन्द्र पर उनके एक सहकर्मी ने कटाक्ष करते हुए कहा था कि मौलाना अबुल कलाम आजाद के कार्यालय से फोन आया था और वो जानना चाहते थे कि क्या उनका महकमा बदल दिया गया है। दरअसल उस दिन के बुलेटिन में डा नगेन्द्र ने वजीरे तालीम की जगह शिक्षा मंत्री लिखा था जो प्रसारित हुआ था। इन आलोचनाओं और कटाक्षों से डा नगेन्द्र डिगे नहीं और हिंदी को आल इंडिया रेडियो में स्थापित करने का महती कार्य किया। 

डा नगेन्द्र ने चौधुरी के कहने पर सुमित्रानंदन पंत को रेडियो के लिए काम करने को तैयार किया। पंत जब रेडियो के लिए काम करने लगे तो साहित्य जगत के कुछ दिग्गजों ने उनके चयन पर प्रश्न उठाया था। नगेन्द्र अपनी आत्मकथा में लिखते हैं, भारतीय प्रसारण का इतिहास इस बात का साक्षी है कि पंत जी की नियुक्ति को लेकर शंका सर्वथा निर्मूल थी। पंत जी के ज्योति-स्पर्श से रेडियो का वायुमंडल एक स्निग्ध-स्वर्णिम प्रकाश से दीपित हो उठा। उन्होंने अत्यंत परिश्रम के साथ आकाशवाणी( तबतक आल इंडिया रेडियो का हिंदी नाम आकाशवाणी हो चुका था) के कार्यक्रम का संस्कार-परिष्कार किया और उसे भारतीय संस्कृति का उपयुक्त माध्यम बनाने में अपूर्व योगदान किया। डा नगेन्द्र ने पंत को रेडियो पर प्रसारिक होनेवाले समाचार की भाषा को ठीक करने का श्रेय दिया है। ये उचित भी है लेकिन नगेन्द्र ने आल इंडिया रेडियो के हिंदी के समाचार प्रभाग में हिंदी को स्थापित करने के क्रम में अपमान और प्रताड़ना भी झेलकर डिगे नहीं ये भी उल्लेखनीय है। नेहरू जी का स्वाधीनता की अर्धरात्रि को दिए जानेवाले भाषण के हिंदी अवुवाद को लेकर भी डा नगेन्द्र को कठघरे में खड़ा किया गया था लेकिन उन्होंने उस भाषण के अंग्रजी से हिंदी अनुवाद में सिर्फ कुछ शब्द ठीक किए थे। यह पूरा प्रसंग काफी लंबा है लेकिन स्वाधीनता के बाद हिंदी भाषा को जनप्रिय बनाने में रेडियो और नगेन्द्र की भूमिका का स्मरण करना आवश्यक है।   


Saturday, March 7, 2026

सिनेमा पर बचकानी समझ


लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी का केरल में कालेज के छात्रों के साथ संवाद की खबर समाचारपत्रों में प्रकाशित है। राहुल गांधी कह रहे हैं कि फिल्म, टीवी और मीडिया का हथियार के रूप में इस्तेमाल हो रहा है। केरल के कुट्टिक्कनम् में कालेज छात्रों से बातचीत के दौरान जब एक छात्र ने राहुल गांधी से जानना चाहा कि फिल्मों का उपयोग हथियार के रूप में कैसे हो रहा है तो उन्होंने विस्तार से अपनी बात रखी। प्रतिपक्ष के नेता ने फिल्म द केरला स्टोरी 2, गोज बियान्ड का उदाहरण दिया और बताया कि ये अच्छी बात है कि लोगों ने दे केरला स्टोरी 2 को नहीं देखा और सिनेमा हाल खाली रहे। राहुल के अनुसार इस तरह की फिल्में लोगों को बदनाम करने, उन्हें समाप्त करने और समाज में विभाजन पैदा करने जैसे उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया जाता है ताकि कुछ लोगों को इससे लाभ हो और दूसरों को नुकसान। राहुल गांधी ने आगे कहा कि भारत इस तरह का बन गया। अब राहुल गांधी जब ये कहते हैं कि फिल्मों का उपयोग हथियार के तौर पर किया जा रहा है और भारत इस तरह का बन गया है तो इससे ये ध्वनित होता है कि ये नई परिघटना है। प्रश्न उठता है कि क्या फिल्मों और वेब सीरीज का उपयोग राजनीतिक हथियार के रूप में नया ट्रेंड है। क्या जब देश केंद्र में कांग्रेस पार्टी की सरकार या उसकी अगुवाई वाली सरकार थी तो फिल्मों का राजनीतिक हथियार के तौर पर उपयोग नहीं किया जाता था। क्या जब से ओटीटी प्लेटफार्म पर चलनेवाली वेब सीरीज बनने लगी हैं तब से उसमें राजनीतिक स्टेटमेंट नहीं होता है। प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से वेब सीरीज में नियमित अंतराल पर वर्तमान भारतीय जनता पार्टी की सरकार की आलोचना के स्वरों को लक्षित किया जा सकता है। कहना ना होगा कि वेब सीरीज को लेकर किसी प्रकार के प्रमाणन की व्यवस्था नहीं है इस कारण से वहां इस तरह के कंटेंट अधिक दिखाई देते हैं।

राहुल गांधी जब फिल्मों को हथियार के तौर पर उपयोग करने और समाज के विभाजन के उसके उद्देश्य पर बोलते हैं तो कई ऐसी फिल्में याद आती हैं जो कांग्रेस के शासन काल में बनीं और प्रदर्शित हुईं। तब क्या किसी ने कहा था कि वो फिल्में समाज में विभाजन पैदा करने के लिए बनाई जा रही हैं या उसका राजनीतिक उपयोग किया जा रहा है। स्वाधीनता के पहले और स्वाधीनता के बाद कई ऐसी फिल्में बनी जो सत्ता में बैठे लोगों के विचार को या सत्ता का समर्थन कर रही विचारधारा का समर्थन करती थी। नया दौर और मदर इंडिया में किस तरह से फिल्म कला की आड़ में वैचारिकी परोसी गई वो अब किसी से छुपी नहीं है। नया दौर में तो महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज और नेहरू की औद्योगिकीकरण की नीति के टकराव को चित्रित किया गया था। जिसका विश्लेषण बाद में कई फिल्म इतिहासकारों ने किया। ख्वाजा अहमद अब्बास तो घोषित रूप से वामपंथी थे। वामपंथी विचारधारा को पोषित और पल्लवित करनेवाली कहानियां लिखते और बनाते थे। नक्सवाद के कथित संघर्ष को चित्रित करती फिल्म द नक्सलाइट्स बनाई। उसका उद्देश्य क्या था? आमिर खान अभिनीत फिल्म फना आई थी जिसमें कश्मीर में जनमत संगह की बात की गई थी। भारत की जनता को अब भी याद है कि स्वाधीन भारत में किस भारतीय नेता ने सबसे पहले कश्मीर में जनमत संग्रह की बात की थी। अगर हम इतिहास में ना भी जाएं और इस शताब्दी में बनी फिल्मों पर ही नजर डालें तो एक विवादास्पद फिल्म का नाम स्मरण होता है - परजानियां। इस फिल्म को 2002 के गुजरात दंगे की सत्यकथा से प्रेरित बताकर पेश किया गया था। क्या उसमें समाज को बांटने की बातें नहीं थीं। क्या उसमें हिंदुओं और मुसलमानों के बीच की खाई को और गहरा करके नहीं दिखाया गया था। इस फिल्म के प्रदर्शन के समय तक तो राहुल गांधी राजनीति में आ चुके थे। फिल्म परजानियां को लेकर राहुल गांधी ने कभी इस तरह का बयान दिया हो, जैसा वो द केरला स्टोरी को लेकर दे रहे हैं, याद नहीं पड़ता है। परजानियां की रिलीज के समय कितना विवाद हुआ था ये अब भी फिल्मों में रुचि रखनेवाले लोगों को याद है। सिर्फ इतना ही क्यों आनंद पटवर्धन की फिल्मों को ही देख लीजिए अनुमान हो जाएगा कि वो किसके विरुद्ध हथियार का उपयोग कर रहे थे। उनकी फिल्मों का मुख्य स्वर हिंदू विरोध होता था। ये पूरा का पूरा कांग्रेस का इकोसिस्टम का हिस्सा था।

राहुल गांधी ने टीवी और मीडिया को भी अपने बयान के लपेटे में लिया है। आज भी अगर वेबसीरीज को देखा जाए तो कई ऐसी सीरीज हैं जिनमें समाज को बांटनेवाले दृश्य या हिंदू मुसलमान के बीच नफरत के संवाद होते हैं। कई बार तो सिस्टम को भी मुसलमानों के विरुद्ध बता दिया जाता है। पाताललोक नाम के वेबसीरीज को देखिए किस तरह से पुलिस को मुस्लिम विरोधी चित्रित किया गया है। इस कारण से जब राहुल गांधी इस तरह की बातें करते हैं तो वो खोखले लगते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि वो सिनेमा और मनोरंजन की दुनिया में चलनेवाली राजनीति से अनजान हैं। आज भी कम से कम हिंदी फिल्मों में तो कांग्रेस इकोसिस्टम का ही बोलबाला है। मुक्काबाज जैसी फिल्म में बगैर किसी प्रसंग के संवाद होता है कि वो आएंगे और पीट-पीटकर तुम्हारी हत्या कर देंगे और भारत माता की जय के नारे लगाते हुए चले जाएंगे। संकेत स्पष्ट है कि फिल्मकार किस विचार को कठघरे में खड़ा कर रहा है। आज भी आईसी 814 कांधार हाईजैक जैसी वेबसीरीज बनती है जो पाकिस्तान की बदनाम खुफिया एजेंसी आईएसआई को लगभग आरोप मुक्त करती है। राहुल गांधी जब फिल्म. टीवी और मीडिया की बात करते हैं तो उनको ये देखना चाहिए कि किस विचार ने कला के लिए कला के सिद्धांत को आगे बढ़ाया और किस विचारधारा ने कला में मैसेज होने की बात आरंभ की। चाहे वो चित्र हो, चलचित्र हो या फिर साहित्य ही क्यों न हो हर जगह सृजन में मैसेज की वकालत की गई थी। जब मैसेज होगा तो किसी न किसी के पक्ष में होगा या किसी के विरोध में। मैसेज तो सामाजिक भी हो सकता है और राजनीतिक भी।

आज राहुल गांधी को द केरला स्टोरी या द कश्मीर फाइल्स जैसी फिल्मों में विभाजनकारी मैसेज दिखता है क्योंकि वो उनकी राजनीति के अनुकूल नहीं है। उनकी और उनकी पार्टी की राजनीति परजानियां और फना जैसी फिल्मों के आधार पर चलती है। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की सूची को अगर देखा जाए तो ये बात और स्पष्ट हो जाती है। ये तो भला हो कि राहुल गांधी को धुरंधर की याद नहीं आई अन्यथा वो इसको भी नहीं छोड़ते। हिंदी फिल्मों में लंबे समय से हिंदू धर्म प्रतीकों को बदनाम करने के लिए सोची समझी रणनीति के तहत काम किया जाता रहा है, आज भी कुछ लोग कर ही रहे हैं लेकिन चूंकि वो हिंदू विरोधी हैं इस कारण से राहुल गांधी को वो हथियार नहीं लगता है. आज फिल्मों के दर्शक बहुत समझदार हो चुके हैं और वो किसी भी भाषा में अगर उनकी धर्म और संस्कृति के खिलाफ कोई बात आती है तो उसके विरोध में खड़े हो जाते हैं। अयोध्या में भव्य रामलला के मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के समय तमिल में अन्नपूर्णी फिल्म आई थी। उसमें हिंदू विरोधी कहानी थी। दर्शकों ने उसका विरोध किया था। नेटफ्लिक्स को उस फिल्म को अपने प्लेटफार्म से हटाना पड़ा था। जिस दिन राहुल गांधी फिल्मों, टीवी और मीडिया को समग्रता में देखना आरंभ करेंगे वो इसको राजनीति के हथियार के तौर पर उपयोग करना बंद कर देंगे।  

Saturday, February 28, 2026

वंदे मातरम् के खंडित स्वरूप पर सवाल


बंकिमचंद चटर्जी लिखित गीत वंदे मातरम् को पूरा गाने का निर्णय भारत सरकार ने लागू कर दिया है। अब खंडित वंदे मातरम् की जगह पूरा गीत गाया जा सकेगा। कुछ समय पहले इस स्तंभ में भारतीय सभ्यतागत चेतना और मूल्यों के पुनर्स्थापना की बात की गई थी। वंदे मातरम् गीत को पूर्ण स्वरूप में गाया जाना भी उसी दिशा में बढ़ा एक कदम है। 150 वर्ष पहले रचित वंदे मातरम् एक ऐसा गीत है जो पुस्तकों और पत्रिकाओं से निकलकर लोक में व्याप्त हो गया। जो रचनाएं लोक में व्याप्त हो जाती हैं वो अमर हो जाती हैं। कालखंड या समय की सीमाओं से परे जाकर कालजयी हो जाती हैं। वंदे मातरम् ऐसा ही गीत है। खंडित होने के बावजूद बंकिम का ये गीत आजतक जनमानस पर अंकित है। आज जब भारत अपनी सभ्यतागत चेतना को रिक्लेम कर रहा है तो इस गीत को उसके मूल स्वरूप में लाना बहुत आवश्यक था। इस गीत का कई भारतीय भाषाओं में न केवल अनुवाद हुआ है बल्कि असंख्य धुनों पर इसको गाया भी जा चुका है। हिंदी में महावीर प्रसाद द्विवेदी से लेकर सुमित्रानंदन पं तक ने इस गीत का भावानुवाद किया। द्विवेदी जी का भावानुवाद सरस्वती पत्रिता में प्रकाशित हुआ था। इस बात के प्रमाण अनेक पुस्तकों में मिलते हैं कि वंदे मातरम की रचना 1875 में अक्षय नवमी के दिन हुई थी। अक्षय यानि जिसका क्षय न हो। बंगाल में अक्षय नवमी के दिन जगत जननी माता जगद्धात्री की पूजा की जाती है। कहा जाता है कि मुर्शिदाबाद के लालगोला,जहां बंकिम पदस्थापित थे, के एक मंदिर में मां काली के चित्र को बेड़ियों में जकड़ा हुआ देखकर बंकिम ने उस चित्र को एक रूपक के तौर पर उठाया और इस गीत की रचना की।

बंकिम रचित वंदे मातरम् को लेकर राजनीति 1920 से लेकर 1940 तक होती है। उसके पहले किसी को भी संपूर्ण वंदे मातरम् के पाठ से परेशानी नहीं थी। 1896 में कांग्रेस के कलकत्ता (अब कोलकाता) अधिवेशन में तो गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने पूरा वंदे मातरम् गाया था। 1905 में कांग्रेस के बनारस अधिवेशन में गोपाल कृष्ण गोखले के कहने पर सरला देवी चौधरानी ने इस गीत को गाया।  लेकिन उस वक्त की सांप्रदायिक राजनीति ने एक साहित्यिक रचना को अपना औजार बनाया । जिस साहित्यिक रचना ने पूरे देश को एक राष्ट्रीय पहचान दी उसको राजनीति ने सांप्रदायिक रंग दे दिया। 17 मार्च 1938 को जिन्ना ने नेहरू को वंदे मातरम के विरोध में एक पत्र लिखा। इसके पहले सिंध के नेता अहमद यार दौलताना ने इसका विरोध किया था। मुस्लिम लीग की तरफ से वंदे मातरम का विरोध बढ़ने लगा था। 16 अक्तूबर 1937 को विश्व भारती न्यूज में कृष्ण कृपलानी ने वंदे मातरम् के विभाजनकारी स्वरूप पर एक विध्वसंक लेख लिखा था। नेताजी सुभाष चंद्र बोस उस लेख को पढ़कर बेहद आहत हुए थे। उन्होंने गुरूदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर को एक पत्र लिखकर जानना चाहा था कि पत्रिका में प्रकाशित लेख में विचार लेखक के हैं या पत्रिका भी उन विचारों से सहमत है। नेताजी ने तब जवाहरलाल नेहरू से लेकर गांधी जी और माडर्न रिव्यू के संपादक रामानंद चट्टोपाध्याय को भी अपनी भावनाओं से अवगत करवाया था। वंदे मातरम् के अविभाजित स्वरूप पर विवाद इतना बढ़ा कि कांग्रेस के नेता दबाव में आ गए। तय किया गा कि गुरूदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर से इसपर राय ली जाए। 

रवीन्द्रनाथ ठाकुर को वंदे मातरम् के पहले दो पैराग्राफ पर कोई आपत्ति नहीं थी। उन्होंने तब कहा था कि कविता के बाकी हिस्से के बगैर भी उसकी आत्मा कायम रह सकती है। उन्होंने इस कविता को आनंदमठ से जोड़कर देखा और कहा कि गीत को उपन्यास के साथ मिलाकर इसको देखने से इसपर मुसलमानों को आपत्ति हो सकती है। गुरुदेव ने इस कविता के खंडित स्वरूप की विवेचना करते हुए कहा था कि इसके पहले दो पैरा की स्वतंत्र पहचान हो सकती है और उन दो को पढ़कर भी इसकी भावना बची रहती है। कांग्रेस कार्यसमिति ने रवीन्द्रनाथ ठाकुर के मत को आधार बनाकर वंदे मातरम् के खंडित स्वरूप को मान्यता दे दी। मजेदार बात ये 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक के कुछ ही दिन पहले नेहरू ने पहली बार आनंदमठ पढ़ा था। पढ़ने के बाद 20 अक्तूबर 1937 को लिखा कि मैंने आनंदमठ का अंग्रेजी अनुवाद पढ़ा ताकि वंदे मातरम् की पृष्ठभूमि जान सकूं। नेहरू ने ये भी स्वीकार किया था कि आनंदमठ की भाषा बहुत कठिन है। बहुत स्थान पर उल्लिखित शब्द उनको समझ में नहीं आए। जब उपन्यास ही समझ नहीं आया तो उसमे वर्णित वंदे मातरम् को खंडित करने का समर्थन क्यों किया गया ये समझ से परे था।    

गुरुदेव के पत्र को ही कांग्रेस ने वंदे मातरम् को खंडित करने का आधार बनाया था। इस कारण गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के मत की बंगाल के बौद्धिक जगत में तीखी प्रतिक्रिया हुई थी। उनके मित्र रामानंद चटर्जी ने भी ठाकुर की आलोचना की। उन्होंने माडर्न रिव्यू में गुरुदेव के मत के विरुद्ध संपादकीय लिखा। उन्होंने स्पष्ट किया कि ना तो वंदे मातरम् सांप्रदायिक है और ना ही मुसलमानों के खिलाफ। अन्यय समाचारपत्रों र पत्रिकाओं में भी गुरुदेव के मत के विरुद्ध लेख आदि छपे। तब नेहरू ने ठाकुर के मत के समर्थन में लेख लिखा। बावजूद इसके इन सारी बातों का जिन्ना पर कोई असर नहीं हुआ। वो इस बात पर अड़ा रहा कि वंदे मातरम को नहीं गाया जा सकता है। गांधी भी वंदे मातरम् को लेकर हो रहे विवाद पर क्षुब्ध थे। जुलाई 1939 के हरिजन में लिखे एक लेख में उन्होंने माना कि उनको ये कभी नहीं लगा कि ये (वंद मातरम्) हिंदू टेक्सट है। हम ऐसे समय में हैं जहां सोना भी लोहा लगने लगा है। राजा जी ने भी कहा था कि इससे (गीत को खंडित करने से) कोई लाभ नहीं होगा बल्कि ये भविष्य के विभाजन की नींव बनेगा। राजा जी की आशंका सच साबित हुई। वंदे मातरम् को खंडित करने के करीब 10 वर्षों के अंदर भारत का विभाजन हो गया। 

कुछ दिनों पूर्व महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा और भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला की वंदे मातरम् पर आयोजित दो दिन की राष्ट्रीय संगोष्ठी में भाग लेने का अवसर मिला। वहां भी इस गीत को खंडित करने पर चर्चा हुई। मेरे मन में भी कई प्रश्न उठे। क्या किसी कवि को दूसरे लेखक की रचना को विभाजित करने या विभाजित करने के पक्ष में अपना मत देने का अधिकार है। जब हम साहित्यिक रचनात्मकता को परखते हैं तो रचनात्मक या लेखकीय संवेदना की बात भी आती है। क्या बौद्धिक स्वतंत्रता हमें इस बात की अनुमति देता है कि किसी लेखक की मृत्यु के बाद कोई दूसरा लेखक उसकी कृति में काट-छांट के पक्ष में अपना मत दे सकता है। क्या इसपर राष्ट्रव्यापी बहस नहीं होनी चाहिए थी। क्या अकादमिक जगत को वंदे मातरम् के खंडित किए जाने पर नए सिरे से विचार नहीं करना चाहिए। जो कृति स्वाधीनता का मंत्र था उसको खंडित करने का अधिकार राजनीतिक दल को था क्या। क्या मुसलमानों को या मुस्लिम नेताओं को खुश करने के लिए वंदे मातरम् का विभाजन किया गया था। क्या इसको तुष्टीकरण न माना जाए। क्या स्वाधीन भारत में राजनीतिशास्त्र के दिग्गजों ने वंदे मातरम् के विभाजन को तुष्टीकरण के तौर पर देखा। आज जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भारत की सभ्यतागत मूल्यों की पुनर्स्थापना में लगे हैं तब ये प्रश्न अकादमिक और बौद्धिक जगत के सामने चुनौती बनकर खड़े हैं। इस चुनौती से मुठभेड़ करना ही होगा ताकि इतिहास की गलतियों पर चर्चा करके देश की नई पीढ़ी को ये बताया जाए कि किस तरह से राजनीतिक लाभ-लोभ के लिए रचनात्मकता और सृजनात्मकता से खिलवाड़ किया गया।