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Saturday, May 23, 2026

इतिहास के लैंडस्केप में बदलाव संभव


पिछले दिनों भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला के कई विद्वानों से संवाद का अवसर मिला। उनके विभिन्न प्रकार के शोध की जानकारी मिली। उच्च अध्ययन संस्थान में ही टैगोर फेलो के रूप में कार्यरत प्रो ओम प्रकाश शर्मा जी से लंबी बातचीत हुई। उनका अध्ययन हिमाचली पहाड़ी भाषा, लिपियां और लोकसाहित्य पर है। बातचीत के क्रम में उन्होंने एक पांडुलिपि दिखाई। उन्होंने बताया कि इस पांडुलिपि का नाम खुजित्रा फलित ज्योतिष पांडुलिपि है। इसमें आगम शास्त्र के अंतर्गत होरारि ज्योतिष के विषय पर लिखा गया है। पांडुलिपि की लिपि के संबंध में उन्होंने दिलचस्प बात बताई। उनका कहना है कि इसकी लिपि शारदा लिपि से जन्मी हिमाचल प्रदेश की भटाखरी लिपि है। उत्तराखंड के जौंसार-बाबर के लिपिकार इस पांडुलिपि को जड़ाखरी लिपि मानते हैं। ओम प्रकाश शर्मा लंबे समय से पांडुलिपियों की खोज में लगे हैं और करीब सात वर्षों की कठिन मेहनत के बाद उनको ये पांडुलिपि डिजिटाइजेशन के लिए मिली है। उनका शोध ये कहता है कि यह पांडुलिपि बहुत पुरानी है और मूल शारदा लिपि में लिखी गई होगी। शारदा लिपि ब्राह्मी परिवार की लेखन प्रणाली के तौर पर कश्मीर में मान्य रही है। ज्ञान की देवी शारदा के नाम पर ही इस लिपि का नामकरण बताया जाता है। प्राचीन काल में इस लिपि का प्रयोग कश्मीर से लेकर हिमाचल प्रदेश तक में होता था। उत्तराखंड से मिली इस पांडुलपि से संकेत मिलता है कि किस प्रकार से शारदा लिपि की यात्रा कश्मीर से लेकर उत्तराखंड तक हुई होगी। जब डा शर्मा से बात हो रही थी तो उसी समय संस्कृति मंत्रालय की योजना ज्ञान भारतम का ध्यान आया।

ज्ञान भारतम के बारे में पहली बार इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, नई दिल्ली के प्रोफेसर रमेशचंद्र गौड़ से पिछले वर्ष विस्तार से चर्चा हुई थी। ये वो समय था जब ज्ञान भारतम पर मंथन के लिए तीन दिनों का अंतराष्ट्रीय सम्मेलन दिल्ली में आयोजित किया गया था। इस सम्मेसन का विषय था- रिक्लेमिंग इंडियाज नालेज लीगेसी थ्रू मैनुस्क्रिप्ट हैरिटेज। हाइब्रिड मोड में आयोजित इस सम्मेलन में देश विदेश के करीब दो हजार विद्वानों ने हिस्सा लिया था जिसमें डेढ सौ विशेषज्ञों ने अपनी बात रखी थी। सम्मेलन के दूसरे दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ज्ञान भारतम को औपचारिक रूप से आरंभ किया था । इसके पहले बजट में भी इस तरह की योजना की घोषणा की गई थी। इस सम्मेलन में इस योजना से जुड़े वर्किंग ग्रुप की रिपोर्ट भी जारी की गई थी। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि पांडुलिपियां भारतीय ज्ञान परंपरा के लिखित स्त्रोत हैं जो भारत की विभिन्न संस्थाओं के साथ-साथ व्यक्तिगत अधिकार के घरों में उपलब्ध हैं। इन पांडुलिपियों के बारे में गहन सर्वेक्षण की आवश्यकता पर बल दिया गया है। संस्कृति मंत्रालय ने इस वर्ष अप्रैल से जून तक तीन महीने की अवधि में पांडुलिपियों के सर्वेक्षण का कार्य आरंभ किया है। 2003 में भी राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन आरंभ किया गया था। तब इसमें जन भागीदारी नहीं थी। विशेषज्ञों और संस्थाओं के माध्यम से कार्य किया गया था जो बाद में लगभग समाप्त हो गया। अब भारत सरकार ने पांच वर्षों के लिए करीब पांच सौ करोड़ रुपए का बजट ज्ञान भारतम के लिए तय किया है। उसके अंतर्गत पांडुलिपियों की खोज का पहला चरण आरंभ हो गया है। अभी जो सर्वेक्षण हो रहा है उसमें जन भागीदारी सुनिश्चित की गई है। जनसाधारण से एक एप के माध्यम से पांडुलिपियों के बारे में जानकारी देने की अपेक्षा की गई है। ज्ञान भारतम के सर्वे समाप्त हो जाने के बाद प्राप्त जानकारी की प्रामाणिकता जांची जाएगी। फिर संरक्षण, प्रलेखन, डिजीटाइजेशन, आकार्इविंग, पाठक संपादन और प्रकाशन का चरण आरंभ होगा। दीर्घ योजना है। पिछले वर्ष आयोजित अंतराष्ट्रीय सम्मेलन के वर्किंग समूह की रिपोर्ट में भवनाथ झा ने विस्तार से पांडुलिपि सर्वेक्षण के चरणों और उसके बाद के कार्यों का लेखा जोखा प्रस्तुत किया है।

एक अनुमान के मुताबिक राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन के अंतर्गत पहले ही हमारे पास करीब 50 लाख पांडुलपियों की कैटलागिंग हो चुकी है। मनमोहन सिंह सरकार के दौरान इसका काम बहुत धीमा हो गया था। अब नरेन्द्र मोदी सरकर ने संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत इसका रोडमैप बनाकर सर्वेक्षण का कार्य आरंभ किया है। संस्कृति मंत्रालय में इस कार्य से जुड़े व्यक्ति ने बताया कि पिछले करीब डेढ महीने में 25 लाख पांडुलिपियों की जानकारी मिल चुकी है। जिस प्रकार से जानकारियां मिल रही हैं उससे अनुमान लगाया जा सकता है कि आनेवाले दिनों में इस जानकारी का दायरा विस्तृत होगा। सबसे मुश्किल कार्य है जानकारी के बाद उन पांडुलपियों को डिजीटाइजेशन के लिए हासिल करना। जिन धार्मिक संस्थाओं के कमरों में पांडुलपियां बंद हैं उनके प्रमाणीकरण और उसके डिजिटाइजेशन के लिए पांडुलिपियों प्राप्त करना कठिन हो सकता है। ये काम हो भी गया तो उसके बाद इन पांडुलिपियों के पाठ के लिए बड़ी संख्या में भाषा, लिपि और इतिहास के विद्वानों की आवश्यकता होगी। कृत्रिम प्रज्ञा (एआई) से पांडुलिपियों के वर्गीकरण में सहायता मिल सकती है लेकिन एआई बहुत मददगार साबित होगा इसमें संदेह है। अभी जर्मनी के एक विश्वविद्लाय से जुड़ा एक समाचार चर्चा में आया है। इसके अनुसार वहां इस तरह का एक एआई टूल विकसित किया गा है जो प्राचीन लिपियों को पढ़ने में मददगार है। ये अभी बहुत आरंभिक बातें हैं इसके विकसित होने और उपयोगी टूल के रूप में चलन में आने में समय लग सकता है। पांडुलपियों के इंडेक्सिंग का कार्य भी समय लेगा। कीवर्ड के आधार पर इंडेक्सिंग की विधि से ही ये काम होगा। इसमें एक चुनौती और भी है कि अगर इस कार्य में कुशल लोगों को नहीं लगाया गया तो सारी मेहनत पर पानी फिर सकता है। पांडुलिपियों को जुटाने के काम के साथ साथ संस्कृति मंत्रालय को कुशल मानव संसाधन के विकास की भी योजना बनानी पड़ेगी। सर्वेक्षण के साथ साथ इस कार्य को करने से भविष्य में मदद मिलेगी।

ज्ञान भारतम भारत सरकार का एक ऐसा प्रकल्प है जो भारत की सभ्यतागत विशेषताओं को रिक्लेम करेगा। इस स्तंभ में पहले भी प्रधानमंत्री की सभ्यतागत चेतना की पुनर्स्थापना के कार्यों को रेखांकित किया गया है। ज्ञान भारतम के अंतर्गत जमा की गई पांडुलपियों के माध्यम से भारत की वो शक्ति सामने आ सकती है जिसको विदेशी इतिहासकारों और विदेशी विचारधारा से प्रभावित विद्वानों ने योजनाबद्ध तरीके से नजरअंदाज किया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पिछले बारह वर्षों के महत्वपूर्ण कार्यों का विश्लेषण करें तो निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि वो भारत और भारतीयता को स्थापित करने और अपनी सभ्यतागत निरंतरता से जोड़ने के लिए प्रयत्नशील हैं। प्राचीन पांडुलपियों में वो खजाना छुपा हुआ जो भारत के इतिहास को बदल देने की सामर्थ्य रखता है। बस इसमें एक सतर्कता बरतनी होगी कि इन पांडुलिपियों को लेकर जिस प्रकार से संगठित तरीके से अफवाह फैलाई जाती रही है उसकी काट भी रखनी होगी। अगर वैश्विक इतिहास और ज्ञान का लैंडस्केप बदलता दिखेगा तो तमाम वैश्विक शक्तियां ज्ञान भारतम के कार्य को पटरी से उतारने की कोशिश करेंगी। अकादमिक रूप से बहुत सतर्क रहने की आवश्यकत है। ये सतर्कता इस कारण भी आवश्यक है कि ये हमारी सभ्यता की निरंतरता और ज्ञान परंपरा को स्थापित करेगी।    

आजा तेरी याद आई


आज पूरी दुनिया ड्रग्स की समस्या से जूझ रही है। नशे के कारोबार ने अपनी जड़ें बहुत गहरी जमा ली है। भारत के पहाड़ी और मैदानी राज्य भी इस समस्या से बुरी तरह से जूझ रहे हैं। नशे की तस्करी के रूप भी बदल गए हैं। इस कारोबार से होनेवाली आय से तंकवाद का जुड़ना एक बड़ी वैश्विक समस्या के तौर पर उभरा है। नशे के कारोबार और ड्रग तस्करी पर कई फिल्में बनी हैं। पिछले वर्षों में एक वेबसीरीज आर्या आई थी जिसमें नशे के कारोबार के आधुनिक और बेहद खतरनाक स्वरूप को दिखाया गया था। किस तरह से ये कारोबार लोगों की जान लेता भी है और जान जाती भी है इसका सूक्षम्ता से प्रदर्शन किया गया था। ये समस्या आज की नहीं है बल्कि दशकों पुरानी है। आज से 50 वर्ष पूर्व एक फिल्म आई थी चरस। रामानंद सागर लिखित और निर्देशित इस फिल्म चरस में नशे के कारोबार के अंतराष्ट्रीय कारोबार और उससे होनेवेली कमाई के लालच को प्रदर्शित किया गया था। धर्मेन्द्र- हेमा मालिनी अभिनीत फिल्म चरस मानवता की रक्षा के लिए समर्पित और ड्रग्स के कारोबार के विरुद्ध लड़ाई में अपनी जिंदगी को दांव पर लगाने वाले लोगों को समर्पित है। आरंभिक संवाद भी ये संदेश देती है कि फिल्म मानवता, इंसानियत और समाज को बचाने के लिए है। जैसे जैसे फिल्म आगे बढ़ती जाती है वो संदेश से आगे निकलकर एक प्रेम कहानी में बदलती जाती है। एक बेहद रोमांटिक प्रेम कहानी समांतर रूप से चलती रहती है। इस प्रेम कहानी को हेमा का हुस्न और धर्मेन्द्र का भोलापन और हस्य एक अलग ही ऊंचाई प्रदान करता है। ये वही समय था जब असल जिंदगी में हेमा और धर्मेन्द्र के बीच प्यार के किस्सों की चर्चा होने लगी थी। दोनों के बीच पर्दे पर जिस तरह की निकटता दिखती है उससे भी इस बात के संकेत मिलने लगे थे। फिल्मी भाषा में उसको पर्दे की केमेस्ट्री कहते हैं। 1975 में आई फिल्म शोले में जो चुलबुली और शोख तांगेवाली लड़की थी वो अब एक थिएटर आर्टिस्ट के रूप में उपस्थित थी। शोले हिट हो चुकी थी और सिनेमा घरों से लेकर बैठकी तक में बसंती और वीरू के प्यार का संवाद आम होने लगा था। शोले की सफलता ने ही रामानंद सागर को इस जोड़ी को दोहराने के लिए प्रेरित किया था। रामानंद सागर ने अपनी फिल्म में अमजद खान को भी खलनायक के रोल में लिया था। शोले में अमजद खान का किरदार खैनी खानेवाला डाकू का था जो क्रूर भी था लेकिन चरस में वही अमजद खान बो-टाई में विलेन के रूप में थे लेकिन मेकअप और गेटअप के बाद भी वैसी प्रभावोत्पादकता नहीं ला सके।

चरस इस मायने में अपने समय की यादगार फिल्म थी कि इसके बड़े हिस्से की शूटिंग माल्टा और रोम में हुई थी। जब फिल्म रिलीज होने वाली थी तो इस बात का प्रचार जोर शोर से किया गया था कि फिल्म खूबसूरत विदेशी लोकेशन पर शूट की गई थी। फिल्मी मैगजीन और प्रचार सामग्री में विदेशी लोकेशन की बात की गई थी। चरस फिल्म की कहानी औसत थी लेकिन उसमें रामांनद सागर ने जिस चरह के लटके-झटके डाले थे वो दर्शकों को बांधे रखने में कामयाब हो गए थे। पिता की मौत का इंतकाम लेनेवाला बेटा और पिता के इलाज के लिए पैसे की खातिर ब्लैकमेल होती बेटी और स्थितियों का लाभ उठाता विलेन। ना जाने इस तरह की कहानी कितनी बार दोहराई जा चुकी थी लेकिन क्राफ्ट अगर बेहतर होता है तो दर्शक कहानी के दोहराव को स्वीकार कर लेते हैं। कहानी के बीच धर्मेन्द्र और हेमा मालिनी के बीच खूबसूरत लोकेशन और समंदर किनारे गाए फिल्मी गीत अबतक लोगों को पसंद आते हैं। आनंद बक्षी की कलम से निकले शब्दों को लता मंगेशकर, किशोर कुमार, मोहम्मद रफी और आशा भोसले की आवाज ने अमर कर दिया। मैं एक शरीफ लड़की बदनाम हो गई, नाइट क्लब में फिल्माया गीत है। नाइट क्लब में नायिका की वेशभूषा और अंदाज मादक होते थे जिसे आशा भोसले की आवाज ने और बढ़ा दिया था। एक और गीत है जिसको लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी ने अपनी आवाज दी। इस गीत का मुखड़ा आनंद बक्षी ने गाया था। गीत है- आ जा तेरी याद आई। ये गाना जब आरंभ होता है तो धर्मेन्द्र और हेमा खड़े हैं और पार्श्व से गीत बजता है जिसके बोले हैं दिल इंसान का एक तराजू है..। चंद पंक्तियों के बाद लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी की आवाज। संदेश के आवरण में लिपटी इस फिल्म को रामानंद सागर ने इस तरह से पेश किया था जो आज 50 वर्षों के बाद धर्मेन्द्र हेमा की बेहतरीन फिल्मों में शामिल किया जा सकता है।    

 

Saturday, May 16, 2026

इतिहास लेखन की बाधा स्लीपर सेल


इतिहास एक ऐसा विषय है जिसकी चर्चा भारतीय राजनीति में निरंतर होती रहती है। भारतीय राजनीतिक दल हमेशा एक दूसरे पर दोषारोपण करने में अबतक लिखे इतिहास का सहारा लेते रहते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भारतीय इतिहास को समग्रता में देखे और लिखने की बात प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से कई बार कर चुके हैं। गृहमंत्री अमित शाह ने कुछ वर्षों पहले काशी की एक गोष्ठी में कहा था कि इतिहास लेखन में दूसरे की गलतियों को रेखांकित करने से बेहतर होगा कि अपनी लकीर लंबी की जाए। कहना ना होगा कि देश का शीर्ष नेतृत्व भारतीय इतिहास को समग्रता में लिखे जाने और देश की जनता के समक्ष प्रस्तुत किए जाने की अपेक्षा करता है। 2014 में जब नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने तब से वामपंथी इतिहास लेखन की जगह भारतीय दृष्टि से इतिहास लेखन की बात की जाने लगी थी। नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के करीब चार वर्ष बाद 2018 में भारत के समग्र इतिहास लेखन का सोच भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (इंडियन काउंसिल आफ हिस्टारिकल रिसर्च- आईसीएचआर) में आया। चार वर्षों तक वहां इसपर मंथन होता रहा। इस बीच देश की जनता ने एक बार फिर से नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी को लोकसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत दिया। 2022 में भारत के समग्र इतिहास की योजना पर कार्य आरंभ हुआ। उस समय के समाचार पत्रों में आईसीएचआऱ के चैयरमैन राघवेन्द्र तंवर के हवाले से ये बातें प्रकाशित हैं कि आईसीएचआर भारत के समग्र इतिहास के प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है। वामपंथी इतिहासकारों ने इसको इतिहास के पुनर्लेखन से जोड़कर इसकी आलोचना आरंभ कर दी। एक वामपंथी सांसद ने 2022 के दिसंबर में संसद में इसपर प्रश्न भी उठाया। शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने उस प्रश्न के उत्तर में सदन को बताया था कि इतिहास का पुनर्लेखन नहीं किया जा रहा है। आईसीएचआर ने भारत के समग्र इतिहास लेखन पर एक प्रोजेक्ट आरंभ किया है। कांग्रेस सांसद मनीषे तिवारी ने भी इस पर प्रश्न उठाया था।

प्रश्न ये नहीं है कि इतिहास का पुनर्लेखन किया जा रहा है या इतिहास लेखन के एकांगी प्रविधि से उत्पन्न रिक्त स्थानों की पूर्ति के लिए इतिहास लिखा जा रहा है। प्रश्न ये है कि आईसीएचआर ने 2018 में जो सोचा वो आठ वर्षों बाद भी भौतिक रूप से आकार नहीं ले सका है। अब तक भारत के समग्र इतिहास का एक भी खंड प्रकाशित नहीं हो पाया है। जबकि इसके लिए एक बोर्ड का गठन किया गया था। इस प्रोजेक्ट के लिए इतिहासकार सुष्मिता पांडे की नियुक्ति संपादक के पद पर की गई थी। उनके साथ प्रधानमंत्री मेमोरियल लाइब्रेरी से नरेन्द्र शुक्ल को प्रतिनियुक्ति पर लाकर इस प्रोजेक्ट से जोड़ा गया । दो और युवा विद्वानों को इस प्रोजेक्ट से जोड़ा गया था। नरेन्द्र शुक्ल वापस जा चुके हैं। कहना ना होगा कि इस प्रोजेक्ट से जुड़े लोगों के वेतन आदि का खर्च तो आईसीएचआर उठा ही रहा है। इस बीच आईसीएचआर के सदस्य सचिव रहे उमेश कदम पर 2022 में गंभीर वित्तीय अमियमितता के आरोप लगे। वो यहां से कार्यमुक्त हो गए। भारत के समग्र इतिहास के पहले खंड पर कार्य आरंभ हो चुका था। इस प्रोजोक्ट से जुड़े लोगों ने बताया कि उमेश कदम ने पदमुक्त होने के बाद पत्र लिखकर आईसीएचआर को अपने लिखित कार्यों के उपयोग से रोक दिया था। पहले खंड के लिए उन्होंने मध्यकालीन इतिहास पर लिखा था। उसकी जगह नए व्यक्ति की खोज करना और लिखवाने में समय लगा, बताया गया। इस बात को भी चार वर्ष बीत गए। अभी तक पहला खंड नहीं आ पाना आईसीएचआर की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल है। प्रभारी सचिव ओमजी उपाध्याय को आशा है कि जल्द ही पहला खंड प्रकाशित हो जाएगा। अगर ये मान भी लिया जाए कि 2022 में ये प्रोजेक्ट जमीन पर उतरा और पहला खंड 2026 में आ जाएगा तो इस हिसाब से तो आठ खंड को प्रकाशित होने में 32 वर्ष लगेंगे।

इस प्रोजेक्ट से जुड़े लोगों के अनुसार ये तय हुआ था कि भारत का समग्र इतिहास का पहला खंड परिचयात्मक होगा। इस खंड में भारत के समग्र इतिहास लेखन की आवश्यकता को स्थापित किया जाएगा। इस बात की चर्चा होगी कि भारत के इतिहास लेखन का आधार भू-राजनीतिक न होकर भू-सांस्कृतिक होगा। पहला खंड दो-ढाई सौ पृष्ठों का होना था। बढ़ते बढ़ते वो करीब ग्यारह सौ पृष्ठों का हो गया। इसके प्रकाशन के बारे में जानकारी लेने पर पता चला कि ग्यारह सौ पन्नों के पहले खंड को तीन विशेषज्ञों के पास भेजा गया है। उनसे अनुरोध किया गया है कि वो इसका मूल्यांकन करके अपनी राय दें। विशेषज्ञों के लिखे हुए को विशेषज्ञों से मूल्यांकन करवाने की क्या आवश्यकता है। क्या आईसीएचआर को इस प्रोजेक्ट से जुड़े विशेषज्ञों पर भरोसा नहीं है। इस प्रोजेक्ट की संपादक सुष्मिता पांडे विदुषी हैं। आईसीएचआर के अध्यक्ष राघवेन्द्र तंवर स्वयं विद्वान इतिहासकार हैं। ऐसे में मूल्यांकन के लिए बाहर के विद्वानों के पास भेजने की आवश्यकता क्यों ? इस बात पर भी विचार किया जाना चाहिए अगर पहला खंड परिचयात्मक और इस प्रोजेक्ट की आवश्यकता बताने वाला है तो ग्यारह सौ पृष्ठों का भारी भरकम खंड क्यों? क्या ये खंड दो-ढाई सौ पृष्ठों का नहीं होना चाहिए जो पहले तय किया गया था। तय तो ये भी किया जाना चाहिए कि ये प्रोजेक्ट कब तक पूरा होगा? क्या अनंत काल तक इस प्रोजेक्ट को चलाया जाना उचित रहेगा? क्या आईसीएचआर इसको निश्चित समय सीमा में पूरा नहीं कर सकता है। बहुत संभव है कि आईसीएचआर में अब भी वामपंथियों के स्लीपर सेल सक्रिय हों और इस प्रोजेक्ट को अपने आकाओं के कहने पर लटकाने का उपक्रम कर रहे हों। ये देखना तो अध्यक्ष का काम है कि ये प्रोजेक्ट समय पर पूरा हो। आईसीएचआर में गड़बड़ियों का समाचार भी आता रहता है. चाहे वो मदर आफ डेमोक्रेसी पुस्तक का प्रकाशन हो या सुभाषचंद्र बोस नाम की पुस्तक का गलत शीर्षक प्रकाशन का मसला हो।

दरअसल आईसीएचआर की समस्या बौद्धिक कम प्रशासनिक अधिक प्रतीत होती है। 2022 में उमेश कदम के पद छोड़ने के बाद से वहां स्थायी सदस्य सचिव नहीं हैं। पिछले वर्ष मई में अल्केश चतुर्वेदी को मंत्रालय ने सदस्य सचिव नियुक्त किया लेकिन वो इस पद पर अपना योगदान नहीं दे सके। कारण मंत्रालय और आईसीएचआर बेहतर बता सकते हैं। कुछ दिनों पूर्व फिर से सदस्य सचिव पद के लिए इंटरव्यू हुआ। पैनल तय करके नाम मंत्रालय भेज दिए गया लेकिन अबतक किसी की नियुक्ति नहीं हो सकी। अब तो ये भी संदेह होता है कि आईसीएचआर के उच्च पदों पर बैठे लोग ही नहीं चाहते हैं कि वहां सदस्य सचिव के पद पर कोई स्थायी नियुक्ति हो। अगर सदस्य सचिव आ जाते हैं तो वो संस्था को चलाएंगे, इससे यथास्थितिवादियों को परेशानी हो सकती है। लेकिन चार वर्षों से इतनी महत्वपूर्ण संस्था में सदस्य सचिव का नहीं होना शिक्षा मंत्रालय के निर्णय लेने की क्षमता पर भी प्रश्न खड़े करता है। आईसीएचआर ऐसी संस्था है जिसकी सक्रियता प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नीतियों को उनकी अपेक्षाओं को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है। बशर्ते कि सक्रिय हो।    

Saturday, May 9, 2026

फिल्म संस्थान की आवश्यकता-अपेक्षा


फिल्म और टेलीविजन संस्थान पुणे ने हाल में फेसबुक पर एक पोस्ट डाली। इसमें बताया कि बिहार सरकार के कला और संस्कृति विभाग के सचिव प्रणव कुमार ने संस्थान का दौरा किया। सचिव ने फिल्म और टेलीविजन संस्थान के शार्टटर्म कोर्स और आउटरीच कार्यक्रम के बारे में समझा। संस्थान इस तरह के कोर्स और कार्यक्रम देश के अलग अलग हिस्से में चलाता है। इस संभावना को भी टटोला गया कि क्या ये कोर्स बिहार में भी चलाए जा सकते हैं ताकि स्थानीय प्रतिभाओं को लाभ मिले। राज्य में फिल्म शिक्षा को बेहतर किया जा सके। इस पोस्ट को देखते हुए बिहार विधानसभा चुनाव के पहले तत्कालीन उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की एक पोस्ट की याद आई। उसमें लिखा गया था, बिहार फिल्म एवं नाट्य संस्थान की स्थापना को मिली स्वीकृति। बताया गया था कि कैबिनेट बैठक के महत्वपूर्ण निर्णय से बिहार की कला और संस्कृति को नई उड़ान मिलेगी। फिल्म इंडस्ट्री को प्रस्तावित संस्थान नई पहचान देगा। थिएटर और नाट्यकला के कलाकारों के लिए प्रशिक्षण केंद्र होगा और स्थानीय प्रतिभाओं को राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाने का सेतु बनेगा। कुछ इसी तरह का पोस्ट तत्कालीन उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा ने भी डाला था। उन्होंने लिखा था कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) की तर्ज पर राज्य में बिहार नाट्य विद्यालय बनेगा। विजय कुमार सिन्हा ने लिखा था कि विद्यालय निर्माण की प्रक्रिया के लिए जल्द ही कैबिनेट में प्रस्ताव लाया जाएगा। छात्र राज्य में नाट्य विधा से जुड़ी पढ़ाई और प्रशिक्षण ले सकेंगे। संस्थान में स्नातक स्तर पर डिग्री और दो वर्षीय डिप्लोमा प्रदान किया जाएगा और यह विद्यालय राज्य के कला के क्षेत्र में कार्य करेगा।

बिहार विधान सभा चुनाव संपन्न हो गए। पहले जनता दल (यू) के नीतीश कुमार और अब भारतीय जनता पार्टी के सम्राट चौधरी बिहार के मुख्यमंत्री बने । मंत्रिमंडल का विस्तार हो गया। अब अपेक्षा है कि सम्राट चौधरी चुनाव पूर्व दी गई जानकारी के बारे में ठोस पहल करें। संभव है बिहार के कला संस्कृति विभाग के सचिव का फिल्म और टेलीविजन संस्थान, पुणे का दौरा इस संबंध में ही रहा हो। आज बिहार में एक फिल्म और टेलीविजन के लिए अभिनय समेत विभिन्न विधाओं को सिखानेवाले एक संस्थान की बहुत आवश्यकता है। बिहार में रंगमंच की परंपरा रही है। मनोज वाजपेयी, पंकज त्रिपाठी तो जाना पहचाना नाम हैं। इसके अलावा बिहार से अखिलेन्द्र मिश्रा, विजय कुमार जैसे उत्कृष्ट कलाकारों ने रंगमंच और फिल्म दोनों में अपनी जगह बनाई। अमिताभ सिन्हा ने लेखन और निर्देशन में नाम कमाया है। वो बिहार के हैं और फिल्म और टेलीविजन सस्थान, पुणे के छात्र रह चुके हैं। इनके अलावा भी बिहार का रंगमंच काफी समृद्ध रहा है। बावदूद इसके बिहार में ना तो कोई सरकारी नाट्य विद्यालय है और ना ही कोई फिल्म और टेलीविजन से जुड़ा संस्थान। बिहार में प्रतिवर्ष सैकड़ों छात्र अभिनय को अपना करियर बनाना चाहते हैं। कोई संस्थान नहीं होने के कारण उनको दिल्ली, मुंबई या देस के किसी और राज्य की ओर रुख करना होता है। कई ऐसे प्रतिभाशाली छात्र हैं जो नाट्य कला या सिनेमा निर्माण से जुड़ना चाहते हैं लेकिन अवसर नहीं होने के कारण उनकी प्रतिभा का उपयोग नहीं हो पाता है। निजी संस्थानों की फीस इतनी अधिक होती है कि सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार के छात्रों के लिए वहां जाना संभव नहीं हो पाता। स्वाधीनता के इतने वर्षों बाद भी बिहार में इस तरह के किसी संस्थान के नहीं होने से यहां के राजनीतिक नेतृत्व पर प्रश्न चिन्ह खड़ा होता है। स्वाधीनता के बाद भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में पहली बार बिहार में सरकार बनी है। अब अवसर है कि इस भूल को सुधारा जाए। बिहार में एक नाट्य कला विद्यालय या फिल्म इंस्टीट्यूट की स्थापना करके यहां के छात्रों के सपने को पूरा किया जाए। 

पिछले दिनों बिहार से खबर आई थी कि राज्य सरकार फिल्मसिटी का निर्माण करना चाहती है। मुंबई से सिनेमा से जुड़े कुछ लोगों के साथ अधिकारियों ने बांका इलाके में फिल्मसिटी निर्माण की संभावनाओं पर विचार करने के लिए दौरा किया था। इस बात को कई महीने बीत गए लेकिन अबतक ये ज्ञात नहीं हो सका है कि फिल्मसिटी के निर्माण की योजना का क्या हुआ। अगर बिहार में फिल्मसिटी का निर्माण करके उसको सफल और क्रियाशील बनाना है तो बिहार में फिल्म निर्माण से जुड़े मानव संसाधन तैयार करने पर भी विचार करना होगा। इसके लिए आवश्यक है कि बिहार में राज्य का अपना एक फिल्म इंस्टीट्यूट हो। इस फिल्म इंस्टीट्यूट में सिर्फ अभिनय का प्रशिक्षण नहीं दिया जाए बल्कि तकनीकी में भी छात्रों को प्रशिक्षित किया जाए चाहे वो साउंड रिकार्डिंग हो. डबिंग हो या फिर वीएफएक्स जैसी विधा हो। बिहार सरकार चाहो तो केंद्र सरकार से अनुरोध करके फिल्म एंड टेलीविजन संस्थान, पुणे या सत्यजित राय फिल्म और टेलीविजन संस्थान, कोलकाता का एक केंद्र पटना या बिहार के किसी अन्य शहर में खोल सकती है। दोनों संस्थानों को अब विश्वविद्यालय का दर्जा प्राप्त है लिहाजा उनको कहीं भी केंद्र खोलने में किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं होगी। बिहार सरकार को आधिकारिक रूप से सूचना और प्रसारण मंत्रालय को अनुरोध भेजना होगा। सूचना और प्रसार मंत्रालय और शिक्षा मंत्रालय के साथ समन्वय करके इस कार्य को पूरा किया जा सकता है। आवश्यकता राजनीतिक इच्छा शक्ति और प्रयास की है। डबल इंजन की सरकार का इतना लाभ तो बिहार को मिलना ही चाहिए। 

बीते शुक्रवार को सुवेंदु अधिकारी को जब बीजेपी के बंगाल विधानमंडल दल का नेता चुना गया था तो गृह मंत्री अमित शाह ने वहां उपस्थित विधायकों को संबोधित किया था। अपने संबोधन में अमित शाह ने बंगाल में एक विश्वस्तरीय नाट्य और कला विद्यालय की स्थापना की बात की थी। बंगाल में अगर विश्वस्तरीय नाट्य कला विद्यालय बनाया जाता है तो अच्छी बात होगी लेकिन ध्यान में रहना चाहिए कि वहां तो पहले से ही सत्यजित राय फिल्म और टेलीविजन संस्थान है। नया संस्थान बनाने से बेहतर है कि इस संस्थान को ही संसाधानयुक्त करके, नियुक्तियां आदि करके इसको विश्वस्तरीय बनाया जाए। जबकि बिहार में तो ऐसा कोई संस्थान है भी नहीं। सुवेंदु की तरह सम्राट चौधरी भी गृहमंत्री अमित शाह की पसंद बताए जाते हैं। बंगाल की तरह बिहार चुनाव के समय भी अमित शाह ने कमान संभाली थी। मंत्रिमंडल विस्तार के पहले उनके पटना पहुंचने से स्पष्ट है कि उनकी नजर बिहार पर भी है। गृहमंत्री ने जिस तरह से बंगाल को नाट्य विद्यालय देने की घोषणा की उसी तरह उनका ध्यान बिहार पर भी जाए, ऐसी अपेक्षा बिहार के लोग कर रहे हैं। बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को विधानसभा चुनाव पूर्व के कैबिनेट के उक्त निर्णय पर ध्यान देना चाहिए। प्रस्ताव को पुनर्जीवित करते हुए सरकार की ओर से केंद्र सरकार को अनुरोध भेजना चाहिए। इसमें कोई समस्या है तो बिहार को मध्य प्रदेश की तर्ज पर अपना नाट्य विद्यालय खोलना चाहिए। बिहार में प्रतिभा की कमी नहीं है, कमी है तो बेहतर अवसर की। अगर राज्य में ही छात्रों को अवसर मिलता है तो ये बदलाव के एक बड़े कदम के तौर पर रेखांकित हो सकता है। 

Saturday, May 2, 2026

स्तरीय शोध-प्रकाशन को कैसे लगे पंख


कोलंबिया की राजधानी बोगोटा में आयोजित अंतराष्ट्रीय पुस्तक मेला (फिलबो) में अलग अलग मंडप में देश-विदेश के प्रकाशकों ने अपने स्टाल लगाया था। फिलबो में एक मंडप में कोलंबिया के विभिन्न शहरों में स्थित सरकारी और निजी विश्वविद्यालय के करीब 75 स्टाल लगे थे। अलग-अलग विश्वविद्यालय के स्टाल और वहां उस विश्वविद्लय के प्रकाशनों को प्रदर्शित किया गया था। सभी विश्वविद्यालयों की अपनी पत्रिकाएं थीं, पुस्तकें थीं। उन स्टालों पर घूमते हुए ये महसूस हुआ कि कोलंबिया के निजी और सरकारी विश्वविद्यालयों के अपने-अपने नियमित प्रकाशन हैं जो साहित्य, कला, संगीत से लेकर इतिहास और विज्ञान की पुस्तकों का नियमित प्रकाशन करते हैं। अधिकतर पुस्तकें स्पैनिश भाषा में थीं। मंडप में दो तीन घंटे बिताकर विश्वविद्यालय के प्रकाशनों को देखकर जब बाहर निकला तो मन में प्रश्न उठ रहा था कि भारत के विश्वविद्यालयों में इस तरह के प्रकाशन क्यों नहीं होते हैं। अपने यहां के विश्वविद्यालयों से कोई स्तरीय पत्रिका क्यों नहीं निकलती है। विश्वविद्यालयों में होनेवाले दर्जनों शोध प्रबंधों में से चुनिंदा शोध के प्रकाशन की व्यवस्था क्यों नहीं है। हम अपने देश के राज्य विश्वविद्यालयों को छोड़ भी दें तो जो चार दर्जन केंद्रीय विश्वविद्यालय हैं वहां से भी कोई स्तरीय शोध पत्रिका नहीं निकलती है। संभव है कि इन केंद्रीय विश्वविद्यालयों में से कुछ विश्वविद्यालय या उनके विभाग पत्रिकाएं निकालते हों, लेकिन उन पत्रिकाओं की प्रतिष्ठा नहीं है और उनकी पहुंच अकादमिक जगत से बाहर होती नहीं है। जिन कुछ विश्वविद्यालय से पत्रिकाएं निकलती हैं वो स्तरीय नहीं है। दिल्ली विश्वविद्यालय के एक शिक्षक ने बताया कि सागर स्थित डा हरि सिंह गौड़ विश्वविद्यालय से मध्य भारती नाम की एक पत्रिका का प्रकाशन होता है लेकिन स्तरीयता का अभाव है। 

देश की राजधानी दिल्ली में भी कई केंद्रीय विश्वविद्यालय हैं। हर वर्ष यहां से सैकड़ों छात्र अलग अलग विषयों पर शोध करते हैं। इन विश्वविद्यालयों से उत्कृष्ट शोध को प्रकाशित करने की जानकारी नहीं मिल पाती है। कोलंबिया पुस्तक मेला में ये पता चला कि वहां के विश्वविद्यालय प्रकाशन करते हैं या फिर निजी प्रकाशकों से करार करके बेहतर पुस्तकों का प्रकाशन करवाते हैं। निजी प्रकाशकों को विश्वविद्यालय के शिक्षकों के स्तर से पुस्तकें तैयार करवाकर प्रकाशकों को दी जाती हैं ताकि स्तरीयता बरकरार रह सके। वर्धा में जब महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्याल की स्थापना हुई थी और अशोक वाजपेयी उसके पहले कुलपति बने थे, तब इस तरह के कुछ प्रयास हुए थे। विश्वविद्यालय ने बहुवचन, पुस्तक वार्ता और अंग्रेजी में हिंदी नाम की एक पत्रिका निकाली थी। कुछ पुस्तकों का प्रकाशन भी हुआ था। पर अशोक वाजपेयी की अपनी सीमाएं हैं और ये सीमाएं बेहतर करने में बाधक होती रही हैं। विभूति नारायण राय के समय पत्रिकाएं ठीक निकलीं। वर्धा शब्दकोश का भी प्रकाशन हुआ लेकिन शब्दकोश अपडेट नहीं हो पाया। बाद के वर्षों में विश्वविद्यालय की पत्रिकाएं अनियमित हो गईं, संयुक्तांक निकलने लगे। जो पत्रिकाएं निकलीं उनको ही पुस्तकाकार प्रकाशित करवाया गया। स्तरीयता का भी ध्यान नहीं रहा। स्वाधीनता के अमृत महोत्सव के समय भी केंद्रीय विश्वविद्यालयों से अपेक्षा की गई थी कि वहां से कुछ स्तरीय पुस्तकों का प्रकाशन होगा। पुस्तकों का प्रकाशन हुआ भी लेकिन संपादित लेखों से आगे जाकर कोई उल्लेखनीय पुस्तक नहीं आई। राष्ट्रीय शिक्षा नीति को आए पांच वर्ष से अधिक हो गए लेकिन उसपर आधारित उल्लेखनीय पुस्तकें नहीं आ पाई। इन दिनों विश्वविद्यालयों के शिक्षकों में विभिन्न लेखकों से लेख लिखवाकर संपादित पुस्तकें प्रकाशित करवाने का चलन बढ़ा है। मौलिक पुस्तकों की अपेक्षा संपादित पुस्तकें अधिक आ रही हैं। ये कार्य आसान है। कोई विषय चुनिए और लेखकों से लेख लिखवा कर अपने नाम से संपादित पुस्तक प्रकाशित करवा लीजिए। 

कोलंबिया से लौटकर अकादमिक जगत के एक वरिष्ठ प्रोफेसर से इस संबंध में विस्तृत चर्चा की। उनसे इसका कारण जानना चाहा। उन्होंने जो बताया वो मेरे लिए चौंकानेवाला था। उनका कहना था कि विश्वविद्यालयों को केंद्र सरकार ने पहले से कई गुणा अधिक सुविधाएं दी हैं। शिक्षकों को पठन-पाठन का बेहतर वातावरण उपलब्ध करवाया है। परंतु अधिकतर विश्वविद्यालयों के नेतृत्व का ध्यान अकादमिक उत्कृष्टता की ओर कम है। अकादमिक उत्कृष्टता से अधिक उनका ध्यान आयोजनों पर होता है, समें लोगों को उपकृत करने का अवसर होता है।आयोजन करना बुरी बात नहीं है लेकिन उन आयोजनों से क्या संदेश निकले या उन आयोजनों में जो वक्तव्य दिए गए उनको आधार बनाकार ही उसके दस्तावेजीकरण का प्रयास नहीं होता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी निरंतर विश्वविद्यालयों में स्तरीय शोध हो इसके लिए तमाम तरह के संसाधन मुहैया करवाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे लेकिन शोध तो शिक्षकों को ही करना होगा। विश्वविद्यालय के सीनियर प्रोफेसरों से ये अपेक्षा की जाती है कि वो अपने अधीन बेहतर शोध करवाएं चाहे विषय विज्ञान का हो, इतिहास का हो या मानविकी का हो। ऐसा होता दिखता नहीं है। पिछले दिनों राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश जी से बात हो रही थी उन्होंने इसपर चिंता व्यक्त की कि भारतीय साहित्य जगत पिछले एक दशक में भारत में हो रहे बदलावों को दर्ज करने में लगभग असफल रहा है। उन्होंने इसमें समाज विज्ञानियों और राजनीति पर लिखनेवालों को भी जोड़ा और कहा कि समाज, राजनीति, विदेश नीति आदि में जो उल्लेखनीय बदलाव हुआ है उस ओर लेखकों और अकादमिक जगत का ध्यान नहीं जा रहा है। कहना ना होगा कि हरिवंश जी की चिंता उचित है। मैं इसमें देशभर के विश्वविद्यालयों को भी जोड़ता हूं जिनके पास अवसर है इन बदलावों को रेखांकित करने का। 

प्रोफेसर साहब ने एक और बात रेखांकित की, केंद्रीय विश्वविद्लयों में कुलपतियों की नियुक्तियां भी समय पर नहीं हो पाती हैं। उनके मुताबिक अभी भी आधे दर्जन या उससे अधिक केंद्रीय विश्वविद्यालय नेतृत्वविहीन है। उन्होंने पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय का उदाहरण देते हुए बताया कि कुलपति के लिए चयनित प्रत्याशियों से चयन समिति ने बात-चीत कर ली थी। संभावित पैनल भी तैयार हो गया था लेकिन कुछ दिनों पहले दस या ग्यारह अन्य उम्मीदवारों बुलाकर चयन समिति ने बात की। नियुक्ति फिर भी नहीं हो पाई है। सागर, अमरकंटक, लेह, विजयनगरम, गुजरात और हैदराबाद स्थित केंद्रीय विश्वविद्यालय बगैर कुलपति के या कामचलाऊ कुलपति के भरोसे चल रहे हैं। ऐसे में प्रश्न ये उठता है कि अगर विश्वविद्यालय नेतृत्वविहीन होंगे तो वहां काम क्या होगा। उतने ही काम होंगे जिससे कि विश्वविद्यालय चलता रहे। किसी नवाचार की आशा करना व्यर्थ है। जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी निरंतर शिक्षा व्यवस्था को बेहतर करने का प्रयास कर रहे हैं ऐसे में आधे दर्जन केंद्रीय विश्वविद्यालयों में कुलपति की नियुक्ति में देरी होने का कारण समझ नहीं आता। नियुक्ति से इतर भी बात करें तो विश्वविद्यालय के शिक्षकों की भी जबावदेही तय होनी चाहिए। अगर उनको पठन पाठन और अध्ययन के लिए उचित समय और अवसर उपलब्ध करवाए जा रहे हैं तो हर वर्ष इस बात का स्पष्ट आकलन हो कि उन्होंने पद के अनुरूप कितना कार्य किया। अभी जो व्यवस्था है उसमें शिक्षक स्वयं का आकलन करके विश्वविद्यालय के इंटरनल क्वालिटी अस्योरेंस सेल को भेजते हैं। इसमें बदलाव की आवश्यकता है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से अपेक्षा की जानी चाहिए कि वो इस बारे में विचार कर निर्णय ले। 


Saturday, April 25, 2026

भाषाओं के वैश्विक पहचान की पहल


लैटिन अमेरिकी देश कोलंबिया की राजधानी बोगोटा में इस क्षेत्र के सबसे बड़े पुस्तक मेलों में से एक का आयोजन होता है। इस वर्ष 21 अप्रैल से 4 मई तक इसका आयोजन हो रहा है। बोगोटा इंटरनेशनल पुस्तक मेला (फिल्बो) में इस वर्ष भारत को ‘कंट्री आफ आनर’ के रूप में आमंत्रित किया गया है। 21 अप्रैल को पुस्तक मेला का और उसके तुरंत बाद भारत मंडप का उद्घाटन हुआ। भारत मंडप का उद्घाटन कोलंबिया की संस्कृति, कला और ज्ञान मंत्री यानोई कदामनी फोनरोडोना ने किया। भारत मंडप के शुभारंभ समारोह के दौरान चार मिनट की एक छोटी सी डाक्यूमेंट्री दिखाई गई। इसमें भारत मंडप के बारे में बताया गया। डाक्यूमेंट्री की भाषा हिंदी और सबटाइटल स्पेनिश भाषा में था। जब ये डाक्यूमेंट्री दिखाई जा रही थी तो कोलंबिया की संस्कृति मंत्री यानोई कदामनी फोनरोडोना ने बगल में बैठे राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के अध्यक्ष प्रोफेसर मिलिंद सुधाकर मराठे से पूछा कि डाक्यूमेंट्री की भाषा तो हिंदी है न? प्रोफेसर मराठे के हां कहते ही मंत्री ने तुरंत बताया कि उनको सुनकर ऐसा ही लगा। बातचीत के क्रम में मंत्री ने कहा कि वो कुछ समय चेन्नई में रही हैं इसलिए सुनते ही हिंदी पहचान गईं। इस बातचीत के बाद जब वो मंच पर अपने उद्बोधन के लिए पहुंची तो आरंभ ही डाक्यूमेंट्री की भाषा से किया। उन्होंने भारत ने मंडप के परिचय के लिए हिंदी भाषा के चयन की सराहना की। साथ ही उन्होंने एक महत्वपूर्ण बात भी कही। संस्कृति मंत्री फोनरोडोना ने कहा कि सभी को अपनी भाषा के साथ ही मंचों पर उपस्थित होना चाहिए क्योंकि भाषा से ही पहचान होती है। कभी भी अपनी भाषा को नहीं छोड़ना चाहिए। वो धड़ल्ले से स्पैनिश बोल रही थीं और सभागार में बैठे स्पेनिश नहीं समझनेवाले लोग इंटरप्रेटर हेडफोन के माध्यम से उनका भाषण सुन और समझ रहे थे। 

कोलंबिया की संस्कृति मंत्री का भाषण सुनते समय ही उनकी एक बात दिमाग में धंस गई। सभी को अपनी भाषा के साथ ही मंचों पर उपस्थित होना चाहिए। भाषा ही तो पहचान है। बार-बार ये बात दिमाग में आ रही थी कि हमारा देश तो बहुभाषी है लेकिन अंतराष्ट्रीय मंचों पर बहुधा हिंदी को भारत की भाषा के तौर पर पहचान मिलने लगी है। याद आया प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का राष्ट्रपति जो बाइडन के कार्यकाल का अमेरिका दौरा। अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने निवास पर उनके सम्मान में एक भोज का आयोजन का था। अमेरिका के महत्वपूर्ण लोगों की उपस्थिति उसमें थी। उस दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हिंदी में भाषण दिया था। तत्कालीन राष्ट्रपति जो बाइडन और उनकी पत्नी कान में इंटरप्रेटर मशीन लगाकर सुन रही थीं। वहां उपस्थित तमाम देशों के राजनयिक भी प्रधानमंत्री के हिंदी के भाषण को सुन रहे थे। कुछ वर्षों पूर्व तक ये कल्पना भी नहीं की जा सकती थी कि भारत का प्रधानमंत्री व्हाइट हाउस में भारतीय भाषा में बात करेंगे। प्रधानमंत्री मोदी के पहले के अधिकतर प्रधानमंत्री विदेश में अंग्रेजी में बोलते थे। अठल बिहारी वाजपेयी ने जब विदेश मंत्री के तौर पर संयुक्त राष्ट्र में हिंदी में भाषण दिया था तो अनेक वर्षों तक यह समान्य ज्ञान का प्रश्न होता था। अनेक परीक्षा में ये पूछा जाता था कि भारत के किस विदेश मंत्री ने संयुक्त राष्ट्र में हिंदी में भाषण दिया था। किसी भी भाषा को ताकत तब मिलती है जब उस देश की सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग उसका प्रयोग करते हैं। प्रधानमंत्री नरन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह का हिंदी में बातचीत और काम करना औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति के एक प्रयत्न के तौर पर भी रेखांकित किया जाना चाहिए। किया भी जा रहा है। 

जब अपनी भाषा अपनी पहचान के बारे में विचार करते हैं तो सबसे अधिक तकलीफ हिंदी के अंग्रेजीदां लोगों को देख-सुनकर होती है। हिंदी आती भी है तो भी रौब गांठने के चक्कर में अंग्रेजी बोलना आरंभ कर देते हैं। अंग्रेजी में बोलकर अपनी विद्वता दिखाने का छद्म प्रयास करनेवाले ये कहते हुए मिल जाएंगे कि मेरी हिंदी अच्छी नहीं है। इसका असर समाज के उन तबकों पर भी पड़ता है जिनको मध्यमवर्ग या निम्न मध्यमवर्ग कहते हैं। आप इन वर्ग के अधिकतर लोगों को अपने मुहल्ले की दुकान पर खरीदारी करते समय हिंदी में बात करते देखंगे। जैसे ही वो किसी बड़े शापिंग माल की चमकती दमकती दुकान में घुसते हैं तो एक्सक्यूज मी पर आ जाते हैं। एक दो वाक्य किसी तरह से अंग्रेजी में बोलकर हिंदी पर आ जाते हैं। ये औपनिवेशिक मानसिकता है। इस मानसिकता वाले लोग पिछले एक दशक में कम हुए हैं लेकिन अब भी हैं। अब तो पेजथ्री पार्टियों में भी हिंदी बोली जाने लगी है। मैं तो इसको सत्ता की भाषा होने से जोड़कर देखता हूं। पर ऐसा कहना गलत होगा कि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं ने अंग्रेजी को विस्थापित कर दिया है। इस दिशा में पहल आरंभ हुई है। इस औपनिवेशिक मानसिकता से उबरने में दशकों लगेंगे। भारत से हजारों किलोमीटर दूर बोगोटा के अंतराष्ट्रीय पुस्तक मेला में भी भारत और भारतीय भाषाओं के प्रति रुझान दिखा। बोगोटा में अंग्रेजी समझने और बोलनेवाले लोग कम हैं। लोगों से बगैर दुभाषिए के बात करना कठिन है। भारत मंडप में घुसते ही भारतीय लेखकों की तस्वीर के साथ उनका परिचय है। प्रेमचंद से आरंभ होकर सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, रामधारी सिंह दिनकर, सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय के साथ अन्य भारतीय भाषाओं के प्रमुख लेखकों को भी स्थान दिया गया है। 

आज वैश्विक स्तर पर भारत की संस्कृति और भाषा के बारे में जानने की उत्सुकता बढ़ी है। हम भारतीयों को इस नए बने माहौल का लाभ उठाने के बारे में विचार करने का अवसर है। बोगोटा इंटरनेश्नल पुस्तक मेला में आयोजित सत्रों में हिंदी में बोलने का अवसर मिला। सभागार में बैठे लोगों ने दुभाषिए के जरिए हिंदी को समझा और चर्चा सत्र में हिस्सा लिया। जब स्पेनिश कलाकार ने राजस्थानी गीत और संगीत पर पारंपरिक राजस्थानी नृत्य प्रस्तुत किया तो खचाखच भरे सभागार में तालियां रुक ही नहीं रही थीं। भारतीय भाषाओं के लेखन को राष्ट्रीय पुस्तक न्यास ने स्पेनिश में अनुवाद करवा कर इस पुस्तक मेले में प्रस्तुत किया। इन पुस्तकों में पाठकों ने काफी रुचि दिखाई। भारतीय लेखकों को विश्व की अन्य भाषाओं में अनुदित करवाकर नियमित रूप से अंतराष्ट्रीय पुस्तक मेलों में भेजा जाना चाहिए। भारतीय भाषा के लेखकों को स्वाधीनता के बाद अगर नोबेल नहीं मिला है तो उसके पीछे प्रमुख कारण भारतीय लेखन का दुनिया की अन्य भाषाओं में अनुवाद नहीं या कम होना है। अनुवाद के कारण ही भारत की दो लेखिकाओं को हाल ही में बुकर पुरस्कार मिला। आज आवश्यकता इस बात की है कि भारत के प्रकाशक अपने लेखकों की पुस्तकों का दुनिया भर की भाषाओं में अनुवाद करवाएं। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास इन पुस्तकों को अंतराष्ट्रीय पुस्तक मेलों में पेश करें ताकि दुनिया का ध्यान भारतीय लेखन की ओर जाए। इसके लिए आवश्यक है कि भारत सरकार एक समग्र संस्कृति नीति बनाए। एक ऐसी नीति जिसमें भारत के सृजनात्मक लेकन को वैश्विक मंचों पर पहुंचने में मदद मिल सके। डगर कठिन है पर अभी माहौल अनुकूलल है जिसका लाभ लेना चाहिए।  


मनमोहन देसाई का जादुई सिनेमा


मनमोहन देसाई हिंदी के ऐसे फिल्मकार के तौर पर याद किए जाते हैं जिनकी फिल्मों में भरपूर मनोरंजन होता था, हास्य होता था। कई बार वो ऐसे दृष्य दिखा देते थे जो अकल्पनीय होता था। सांप्रदायिक सद्भाव दिखाने के चक्कर में फिल्म अमर अकबर एंथोनी में एक मां को उनके तीन बिछुड़े बेटे का खून एक साथ चढ़वा देते हैं। निरुपा राय (भारती) अस्पताल में भर्ती है और उनको खून की आवश्यकता है। अस्पताल में एक बेड पर वो लेटी होती हैं तीन अन्य बेड पर विनोद खन्ना(अमर), ऋषि कपूर (अकबर) और अमिताभ बच्चन (एंथोनी)। तीनों के हाथ से तीन अलग-अलग इंट्रावेनस ट्यूब से खून निकालकर एक बोतल में ले जाया जाता है। उस बोतल से एक अलग ट्यूब से निरुपा राय को खून चढ़ाया जाता है। वो ठीक होने लगती हैं और फिल्म के दर्शक मारे खुशी के उलछने लगते हैं। अब इसमें लाजिक नहीं खोजा जाता है। इस तरह के कारनामे मनमोहन देसाई ने कई फिल्मों में किया। उनसे जब पूछा जाता था तो वो कहते थे कि संदेश देने के लिए ऐसे दृष्यों का सृजन करना पड़ता है। जनता को समझने में आसानी होती है। उनकी फिल्म देशप्रेमी सबसे संतुलित और कठोर संदेश देने वाली फिल्म है। आज से करीब 44 वर्ष पूर्व जब ये फिल्म रिलीज हुई थी तो अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी लेकिन दक्षिण भारत में बहुत पसंद किया गया था। 

मनमोहन देसाई ने अपनी इस फिल्म में बेहद प्रभावशाली दृष्यों और संवादों के माध्यम से संदेश दिया था। अमिताभ बच्चन इसमें डबल रोल में थे। स्वतंत्रता सेनानी मास्टर दीनानाथ और उनके बेटे राजू की भूमिका में। मास्टर दीनानाथ को ठाकुर प्रताप सिंह (अमजद खान) के काले कारनामों को पता चलता है और  वो उसे उजागर करना चाहते हैं। ठाकुर मास्टर जी को प्रलोभन देकर रोकना चाहता है। अनिर्णय की स्थिति में मास्टर जी रातभर सो नहीं पाते हैं। इस किरदार के द्वंद्व को दिखाने के लिए फिल्मकार ने एक दृष्य रचा। दीनानाथ कमरे में बैठे सोच रहे होते हैं कि क्या करें तो अचानक उनकी निगाह स्वाधीनता सेनानी के उनके मेडल पर जाती है। वो चांद की रोशनी में चमक रहा होता है। दीनानाथ सोचते हैं कि देशभक्ति सिर्फ युद्ध के समय वीरता दिखाने से नहीं बल्कि शांति के समय ईमानदारी से समाज सेवा का कार्य करना भी है।वो ठाकुर के काले कारनामों को उजागर कर देते हैं। मास्टर दीनानाथ साहस दिखाते हैं लेकिन उनको इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है। उनके घर को आग लगा दी जाती है उनकी बेटी और पत्नी का अपहरण कर लिया जाता है। प्रचारित कर दिया जाता है कि दोनों मर गईं। मास्टर दीनानाथ अपनी जगह छोड़कर एक बड़े स्लम भारत नगर में रहने चले जाते हैं। बेटा उनके साथ होता है। 

भारत नगर में वो अपनी नैतिकता और ईमानादरी के साथ लोगों के बीच प्रतिष्ठा अर्जित करते हैं। भारत नगर में भी चार छोटे-छोटे अपराधी होते हैं जो मुसलमान, पंजाबी, तमिल और बंगाली होते हैं। ये सभी अपने समुदाय के लोगों की चिंता करते हैं और एक भारतीय की तरह नहीं सोचते। मास्टर जी सबको एक करने का प्रयास करते हैं। समय ठीक गुजरने लगता है और अतीत की यादें धुंधली पड़ने लगती हैं।  इस बीच मास्टर जी का बेटा राजू खुद अपराधी बन जाता है। देश के लिए अपना संपूर्ण समय लगा देनेवाले मास्टर जी को पता ही नहीं चलता है कि उनका बेटा ठाकुर के लिए काम करने लगा है। एक समय ऐसा आता है ठाकुर उनके बेटे पर गोली चलता है और उसकी जान बचाने के लिए मास्टर जी उसके सामने आ जाते हैं। फिल्मकार ने चतुराई के साथ कई संदेश दे दिया। मास्टर दीनानाथ मरने कके पहले अपने बेटे से कहते हैं- तुम्हारी मां कोढ़ से मर गई, मगर इस भारत माता को कोढ़ मत होने देना। इसके सीने पर कोढ़ फैलानेवाले वतनफरोशों को खतम कर देना, खतम कर देना। फिल्मकार यहां कोढ़ को मेटाफर की तरह पेश करते हैं। संदेश देते हैं कि भ्रष्टाचार समाज और देश के लिए कोढ़ है। मास्टर जी जब अपनी अंतिम सांस लेते हैं और उनके मुंह से हे! राम निकलता है तो उनका बेटा राजू जोर से चिल्लाता है पिताजी। इस चिल्लाहट के साथ एक नवजात के रोने की आवाज आती है। मास्टर जी के घर तीसरी पीढ़ी का आगमन होता है। जीवन की निरंतरता का संदेश। ये एक ऐसी फिल्म थी जिसने दर्शकों का मनोरंजन तो किया लेकिन देशप्रेम के हैवी डोज के साथ। आज जब हमारा देश स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना चुका है तब भी इस फिल्म से निकलते संदेश हमें सोचने पर तो मजबूर करते ही हैं।