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Saturday, May 2, 2026

स्तरीय शोध-प्रकाशन को कैसे लगे पंख


कोलंबिया की राजधानी बोगोटा में आयोजित अंतराष्ट्रीय पुस्तक मेला (फिलबो) में अलग अलग मंडप में देश-विदेश के प्रकाशकों ने अपने स्टाल लगाया था। फिलबो में एक मंडप में कोलंबिया के विभिन्न शहरों में स्थित सरकारी और निजी विश्वविद्यालय के करीब 75 स्टाल लगे थे। अलग-अलग विश्वविद्यालय के स्टाल और वहां उस विश्वविद्लय के प्रकाशनों को प्रदर्शित किया गया था। सभी विश्वविद्यालयों की अपनी पत्रिकाएं थीं, पुस्तकें थीं। उन स्टालों पर घूमते हुए ये महसूस हुआ कि कोलंबिया के निजी और सरकारी विश्वविद्यालयों के अपने-अपने नियमित प्रकाशन हैं जो साहित्य, कला, संगीत से लेकर इतिहास और विज्ञान की पुस्तकों का नियमित प्रकाशन करते हैं। अधिकतर पुस्तकें स्पैनिश भाषा में थीं। मंडप में दो तीन घंटे बिताकर विश्वविद्यालय के प्रकाशनों को देखकर जब बाहर निकला तो मन में प्रश्न उठ रहा था कि भारत के विश्वविद्यालयों में इस तरह के प्रकाशन क्यों नहीं होते हैं। अपने यहां के विश्वविद्यालयों से कोई स्तरीय पत्रिका क्यों नहीं निकलती है। विश्वविद्यालयों में होनेवाले दर्जनों शोध प्रबंधों में से चुनिंदा शोध के प्रकाशन की व्यवस्था क्यों नहीं है। हम अपने देश के राज्य विश्वविद्यालयों को छोड़ भी दें तो जो चार दर्जन केंद्रीय विश्वविद्यालय हैं वहां से भी कोई स्तरीय शोध पत्रिका नहीं निकलती है। संभव है कि इन केंद्रीय विश्वविद्यालयों में से कुछ विश्वविद्यालय या उनके विभाग पत्रिकाएं निकालते हों, लेकिन उन पत्रिकाओं की प्रतिष्ठा नहीं है और उनकी पहुंच अकादमिक जगत से बाहर होती नहीं है। जिन कुछ विश्वविद्यालय से पत्रिकाएं निकलती हैं वो स्तरीय नहीं है। दिल्ली विश्वविद्यालय के एक शिक्षक ने बताया कि सागर स्थित डा हरि सिंह गौड़ विश्वविद्यालय से मध्य भारती नाम की एक पत्रिका का प्रकाशन होता है लेकिन स्तरीयता का अभाव है। 

देश की राजधानी दिल्ली में भी कई केंद्रीय विश्वविद्यालय हैं। हर वर्ष यहां से सैकड़ों छात्र अलग अलग विषयों पर शोध करते हैं। इन विश्वविद्यालयों से उत्कृष्ट शोध को प्रकाशित करने की जानकारी नहीं मिल पाती है। कोलंबिया पुस्तक मेला में ये पता चला कि वहां के विश्वविद्यालय प्रकाशन करते हैं या फिर निजी प्रकाशकों से करार करके बेहतर पुस्तकों का प्रकाशन करवाते हैं। निजी प्रकाशकों को विश्वविद्यालय के शिक्षकों के स्तर से पुस्तकें तैयार करवाकर प्रकाशकों को दी जाती हैं ताकि स्तरीयता बरकरार रह सके। वर्धा में जब महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्याल की स्थापना हुई थी और अशोक वाजपेयी उसके पहले कुलपति बने थे, तब इस तरह के कुछ प्रयास हुए थे। विश्वविद्यालय ने बहुवचन, पुस्तक वार्ता और अंग्रेजी में हिंदी नाम की एक पत्रिका निकाली थी। कुछ पुस्तकों का प्रकाशन भी हुआ था। पर अशोक वाजपेयी की अपनी सीमाएं हैं और ये सीमाएं बेहतर करने में बाधक होती रही हैं। विभूति नारायण राय के समय पत्रिकाएं ठीक निकलीं। वर्धा शब्दकोश का भी प्रकाशन हुआ लेकिन शब्दकोश अपडेट नहीं हो पाया। बाद के वर्षों में विश्वविद्यालय की पत्रिकाएं अनियमित हो गईं, संयुक्तांक निकलने लगे। जो पत्रिकाएं निकलीं उनको ही पुस्तकाकार प्रकाशित करवाया गया। स्तरीयता का भी ध्यान नहीं रहा। स्वाधीनता के अमृत महोत्सव के समय भी केंद्रीय विश्वविद्यालयों से अपेक्षा की गई थी कि वहां से कुछ स्तरीय पुस्तकों का प्रकाशन होगा। पुस्तकों का प्रकाशन हुआ भी लेकिन संपादित लेखों से आगे जाकर कोई उल्लेखनीय पुस्तक नहीं आई। राष्ट्रीय शिक्षा नीति को आए पांच वर्ष से अधिक हो गए लेकिन उसपर आधारित उल्लेखनीय पुस्तकें नहीं आ पाई। इन दिनों विश्वविद्यालयों के शिक्षकों में विभिन्न लेखकों से लेख लिखवाकर संपादित पुस्तकें प्रकाशित करवाने का चलन बढ़ा है। मौलिक पुस्तकों की अपेक्षा संपादित पुस्तकें अधिक आ रही हैं। ये कार्य आसान है। कोई विषय चुनिए और लेखकों से लेख लिखवा कर अपने नाम से संपादित पुस्तक प्रकाशित करवा लीजिए। 

कोलंबिया से लौटकर अकादमिक जगत के एक वरिष्ठ प्रोफेसर से इस संबंध में विस्तृत चर्चा की। उनसे इसका कारण जानना चाहा। उन्होंने जो बताया वो मेरे लिए चौंकानेवाला था। उनका कहना था कि विश्वविद्यालयों को केंद्र सरकार ने पहले से कई गुणा अधिक सुविधाएं दी हैं। शिक्षकों को पठन-पाठन का बेहतर वातावरण उपलब्ध करवाया है। परंतु अधिकतर विश्वविद्यालयों के नेतृत्व का ध्यान अकादमिक उत्कृष्टता की ओर कम है। अकादमिक उत्कृष्टता से अधिक उनका ध्यान आयोजनों पर होता है, समें लोगों को उपकृत करने का अवसर होता है।आयोजन करना बुरी बात नहीं है लेकिन उन आयोजनों से क्या संदेश निकले या उन आयोजनों में जो वक्तव्य दिए गए उनको आधार बनाकार ही उसके दस्तावेजीकरण का प्रयास नहीं होता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी निरंतर विश्वविद्यालयों में स्तरीय शोध हो इसके लिए तमाम तरह के संसाधन मुहैया करवाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे लेकिन शोध तो शिक्षकों को ही करना होगा। विश्वविद्यालय के सीनियर प्रोफेसरों से ये अपेक्षा की जाती है कि वो अपने अधीन बेहतर शोध करवाएं चाहे विषय विज्ञान का हो, इतिहास का हो या मानविकी का हो। ऐसा होता दिखता नहीं है। पिछले दिनों राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश जी से बात हो रही थी उन्होंने इसपर चिंता व्यक्त की कि भारतीय साहित्य जगत पिछले एक दशक में भारत में हो रहे बदलावों को दर्ज करने में लगभग असफल रहा है। उन्होंने इसमें समाज विज्ञानियों और राजनीति पर लिखनेवालों को भी जोड़ा और कहा कि समाज, राजनीति, विदेश नीति आदि में जो उल्लेखनीय बदलाव हुआ है उस ओर लेखकों और अकादमिक जगत का ध्यान नहीं जा रहा है। कहना ना होगा कि हरिवंश जी की चिंता उचित है। मैं इसमें देशभर के विश्वविद्यालयों को भी जोड़ता हूं जिनके पास अवसर है इन बदलावों को रेखांकित करने का। 

प्रोफेसर साहब ने एक और बात रेखांकित की, केंद्रीय विश्वविद्लयों में कुलपतियों की नियुक्तियां भी समय पर नहीं हो पाती हैं। उनके मुताबिक अभी भी आधे दर्जन या उससे अधिक केंद्रीय विश्वविद्यालय नेतृत्वविहीन है। उन्होंने पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय का उदाहरण देते हुए बताया कि कुलपति के लिए चयनित प्रत्याशियों से चयन समिति ने बात-चीत कर ली थी। संभावित पैनल भी तैयार हो गया था लेकिन कुछ दिनों पहले दस या ग्यारह अन्य उम्मीदवारों बुलाकर चयन समिति ने बात की। नियुक्ति फिर भी नहीं हो पाई है। सागर, अमरकंटक, लेह, विजयनगरम, गुजरात और हैदराबाद स्थित केंद्रीय विश्वविद्यालय बगैर कुलपति के या कामचलाऊ कुलपति के भरोसे चल रहे हैं। ऐसे में प्रश्न ये उठता है कि अगर विश्वविद्यालय नेतृत्वविहीन होंगे तो वहां काम क्या होगा। उतने ही काम होंगे जिससे कि विश्वविद्यालय चलता रहे। किसी नवाचार की आशा करना व्यर्थ है। जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी निरंतर शिक्षा व्यवस्था को बेहतर करने का प्रयास कर रहे हैं ऐसे में आधे दर्जन केंद्रीय विश्वविद्यालयों में कुलपति की नियुक्ति में देरी होने का कारण समझ नहीं आता। नियुक्ति से इतर भी बात करें तो विश्वविद्यालय के शिक्षकों की भी जबावदेही तय होनी चाहिए। अगर उनको पठन पाठन और अध्ययन के लिए उचित समय और अवसर उपलब्ध करवाए जा रहे हैं तो हर वर्ष इस बात का स्पष्ट आकलन हो कि उन्होंने पद के अनुरूप कितना कार्य किया। अभी जो व्यवस्था है उसमें शिक्षक स्वयं का आकलन करके विश्वविद्यालय के इंटरनल क्वालिटी अस्योरेंस सेल को भेजते हैं। इसमें बदलाव की आवश्यकता है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से अपेक्षा की जानी चाहिए कि वो इस बारे में विचार कर निर्णय ले। 


Saturday, April 25, 2026

भाषाओं के वैश्विक पहचान की पहल


लैटिन अमेरिकी देश कोलंबिया की राजधानी बोगोटा में इस क्षेत्र के सबसे बड़े पुस्तक मेलों में से एक का आयोजन होता है। इस वर्ष 21 अप्रैल से 4 मई तक इसका आयोजन हो रहा है। बोगोटा इंटरनेशनल पुस्तक मेला (फिल्बो) में इस वर्ष भारत को ‘कंट्री आफ आनर’ के रूप में आमंत्रित किया गया है। 21 अप्रैल को पुस्तक मेला का और उसके तुरंत बाद भारत मंडप का उद्घाटन हुआ। भारत मंडप का उद्घाटन कोलंबिया की संस्कृति, कला और ज्ञान मंत्री यानोई कदामनी फोनरोडोना ने किया। भारत मंडप के शुभारंभ समारोह के दौरान चार मिनट की एक छोटी सी डाक्यूमेंट्री दिखाई गई। इसमें भारत मंडप के बारे में बताया गया। डाक्यूमेंट्री की भाषा हिंदी और सबटाइटल स्पेनिश भाषा में था। जब ये डाक्यूमेंट्री दिखाई जा रही थी तो कोलंबिया की संस्कृति मंत्री यानोई कदामनी फोनरोडोना ने बगल में बैठे राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के अध्यक्ष प्रोफेसर मिलिंद सुधाकर मराठे से पूछा कि डाक्यूमेंट्री की भाषा तो हिंदी है न? प्रोफेसर मराठे के हां कहते ही मंत्री ने तुरंत बताया कि उनको सुनकर ऐसा ही लगा। बातचीत के क्रम में मंत्री ने कहा कि वो कुछ समय चेन्नई में रही हैं इसलिए सुनते ही हिंदी पहचान गईं। इस बातचीत के बाद जब वो मंच पर अपने उद्बोधन के लिए पहुंची तो आरंभ ही डाक्यूमेंट्री की भाषा से किया। उन्होंने भारत ने मंडप के परिचय के लिए हिंदी भाषा के चयन की सराहना की। साथ ही उन्होंने एक महत्वपूर्ण बात भी कही। संस्कृति मंत्री फोनरोडोना ने कहा कि सभी को अपनी भाषा के साथ ही मंचों पर उपस्थित होना चाहिए क्योंकि भाषा से ही पहचान होती है। कभी भी अपनी भाषा को नहीं छोड़ना चाहिए। वो धड़ल्ले से स्पैनिश बोल रही थीं और सभागार में बैठे स्पेनिश नहीं समझनेवाले लोग इंटरप्रेटर हेडफोन के माध्यम से उनका भाषण सुन और समझ रहे थे। 

कोलंबिया की संस्कृति मंत्री का भाषण सुनते समय ही उनकी एक बात दिमाग में धंस गई। सभी को अपनी भाषा के साथ ही मंचों पर उपस्थित होना चाहिए। भाषा ही तो पहचान है। बार-बार ये बात दिमाग में आ रही थी कि हमारा देश तो बहुभाषी है लेकिन अंतराष्ट्रीय मंचों पर बहुधा हिंदी को भारत की भाषा के तौर पर पहचान मिलने लगी है। याद आया प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का राष्ट्रपति जो बाइडन के कार्यकाल का अमेरिका दौरा। अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने निवास पर उनके सम्मान में एक भोज का आयोजन का था। अमेरिका के महत्वपूर्ण लोगों की उपस्थिति उसमें थी। उस दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हिंदी में भाषण दिया था। तत्कालीन राष्ट्रपति जो बाइडन और उनकी पत्नी कान में इंटरप्रेटर मशीन लगाकर सुन रही थीं। वहां उपस्थित तमाम देशों के राजनयिक भी प्रधानमंत्री के हिंदी के भाषण को सुन रहे थे। कुछ वर्षों पूर्व तक ये कल्पना भी नहीं की जा सकती थी कि भारत का प्रधानमंत्री व्हाइट हाउस में भारतीय भाषा में बात करेंगे। प्रधानमंत्री मोदी के पहले के अधिकतर प्रधानमंत्री विदेश में अंग्रेजी में बोलते थे। अठल बिहारी वाजपेयी ने जब विदेश मंत्री के तौर पर संयुक्त राष्ट्र में हिंदी में भाषण दिया था तो अनेक वर्षों तक यह समान्य ज्ञान का प्रश्न होता था। अनेक परीक्षा में ये पूछा जाता था कि भारत के किस विदेश मंत्री ने संयुक्त राष्ट्र में हिंदी में भाषण दिया था। किसी भी भाषा को ताकत तब मिलती है जब उस देश की सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग उसका प्रयोग करते हैं। प्रधानमंत्री नरन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह का हिंदी में बातचीत और काम करना औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति के एक प्रयत्न के तौर पर भी रेखांकित किया जाना चाहिए। किया भी जा रहा है। 

जब अपनी भाषा अपनी पहचान के बारे में विचार करते हैं तो सबसे अधिक तकलीफ हिंदी के अंग्रेजीदां लोगों को देख-सुनकर होती है। हिंदी आती भी है तो भी रौब गांठने के चक्कर में अंग्रेजी बोलना आरंभ कर देते हैं। अंग्रेजी में बोलकर अपनी विद्वता दिखाने का छद्म प्रयास करनेवाले ये कहते हुए मिल जाएंगे कि मेरी हिंदी अच्छी नहीं है। इसका असर समाज के उन तबकों पर भी पड़ता है जिनको मध्यमवर्ग या निम्न मध्यमवर्ग कहते हैं। आप इन वर्ग के अधिकतर लोगों को अपने मुहल्ले की दुकान पर खरीदारी करते समय हिंदी में बात करते देखंगे। जैसे ही वो किसी बड़े शापिंग माल की चमकती दमकती दुकान में घुसते हैं तो एक्सक्यूज मी पर आ जाते हैं। एक दो वाक्य किसी तरह से अंग्रेजी में बोलकर हिंदी पर आ जाते हैं। ये औपनिवेशिक मानसिकता है। इस मानसिकता वाले लोग पिछले एक दशक में कम हुए हैं लेकिन अब भी हैं। अब तो पेजथ्री पार्टियों में भी हिंदी बोली जाने लगी है। मैं तो इसको सत्ता की भाषा होने से जोड़कर देखता हूं। पर ऐसा कहना गलत होगा कि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं ने अंग्रेजी को विस्थापित कर दिया है। इस दिशा में पहल आरंभ हुई है। इस औपनिवेशिक मानसिकता से उबरने में दशकों लगेंगे। भारत से हजारों किलोमीटर दूर बोगोटा के अंतराष्ट्रीय पुस्तक मेला में भी भारत और भारतीय भाषाओं के प्रति रुझान दिखा। बोगोटा में अंग्रेजी समझने और बोलनेवाले लोग कम हैं। लोगों से बगैर दुभाषिए के बात करना कठिन है। भारत मंडप में घुसते ही भारतीय लेखकों की तस्वीर के साथ उनका परिचय है। प्रेमचंद से आरंभ होकर सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, रामधारी सिंह दिनकर, सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय के साथ अन्य भारतीय भाषाओं के प्रमुख लेखकों को भी स्थान दिया गया है। 

आज वैश्विक स्तर पर भारत की संस्कृति और भाषा के बारे में जानने की उत्सुकता बढ़ी है। हम भारतीयों को इस नए बने माहौल का लाभ उठाने के बारे में विचार करने का अवसर है। बोगोटा इंटरनेश्नल पुस्तक मेला में आयोजित सत्रों में हिंदी में बोलने का अवसर मिला। सभागार में बैठे लोगों ने दुभाषिए के जरिए हिंदी को समझा और चर्चा सत्र में हिस्सा लिया। जब स्पेनिश कलाकार ने राजस्थानी गीत और संगीत पर पारंपरिक राजस्थानी नृत्य प्रस्तुत किया तो खचाखच भरे सभागार में तालियां रुक ही नहीं रही थीं। भारतीय भाषाओं के लेखन को राष्ट्रीय पुस्तक न्यास ने स्पेनिश में अनुवाद करवा कर इस पुस्तक मेले में प्रस्तुत किया। इन पुस्तकों में पाठकों ने काफी रुचि दिखाई। भारतीय लेखकों को विश्व की अन्य भाषाओं में अनुदित करवाकर नियमित रूप से अंतराष्ट्रीय पुस्तक मेलों में भेजा जाना चाहिए। भारतीय भाषा के लेखकों को स्वाधीनता के बाद अगर नोबेल नहीं मिला है तो उसके पीछे प्रमुख कारण भारतीय लेखन का दुनिया की अन्य भाषाओं में अनुवाद नहीं या कम होना है। अनुवाद के कारण ही भारत की दो लेखिकाओं को हाल ही में बुकर पुरस्कार मिला। आज आवश्यकता इस बात की है कि भारत के प्रकाशक अपने लेखकों की पुस्तकों का दुनिया भर की भाषाओं में अनुवाद करवाएं। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास इन पुस्तकों को अंतराष्ट्रीय पुस्तक मेलों में पेश करें ताकि दुनिया का ध्यान भारतीय लेखन की ओर जाए। इसके लिए आवश्यक है कि भारत सरकार एक समग्र संस्कृति नीति बनाए। एक ऐसी नीति जिसमें भारत के सृजनात्मक लेकन को वैश्विक मंचों पर पहुंचने में मदद मिल सके। डगर कठिन है पर अभी माहौल अनुकूलल है जिसका लाभ लेना चाहिए।  


मनमोहन देसाई का जादुई सिनेमा


मनमोहन देसाई हिंदी के ऐसे फिल्मकार के तौर पर याद किए जाते हैं जिनकी फिल्मों में भरपूर मनोरंजन होता था, हास्य होता था। कई बार वो ऐसे दृष्य दिखा देते थे जो अकल्पनीय होता था। सांप्रदायिक सद्भाव दिखाने के चक्कर में फिल्म अमर अकबर एंथोनी में एक मां को उनके तीन बिछुड़े बेटे का खून एक साथ चढ़वा देते हैं। निरुपा राय (भारती) अस्पताल में भर्ती है और उनको खून की आवश्यकता है। अस्पताल में एक बेड पर वो लेटी होती हैं तीन अन्य बेड पर विनोद खन्ना(अमर), ऋषि कपूर (अकबर) और अमिताभ बच्चन (एंथोनी)। तीनों के हाथ से तीन अलग-अलग इंट्रावेनस ट्यूब से खून निकालकर एक बोतल में ले जाया जाता है। उस बोतल से एक अलग ट्यूब से निरुपा राय को खून चढ़ाया जाता है। वो ठीक होने लगती हैं और फिल्म के दर्शक मारे खुशी के उलछने लगते हैं। अब इसमें लाजिक नहीं खोजा जाता है। इस तरह के कारनामे मनमोहन देसाई ने कई फिल्मों में किया। उनसे जब पूछा जाता था तो वो कहते थे कि संदेश देने के लिए ऐसे दृष्यों का सृजन करना पड़ता है। जनता को समझने में आसानी होती है। उनकी फिल्म देशप्रेमी सबसे संतुलित और कठोर संदेश देने वाली फिल्म है। आज से करीब 44 वर्ष पूर्व जब ये फिल्म रिलीज हुई थी तो अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी लेकिन दक्षिण भारत में बहुत पसंद किया गया था। 

मनमोहन देसाई ने अपनी इस फिल्म में बेहद प्रभावशाली दृष्यों और संवादों के माध्यम से संदेश दिया था। अमिताभ बच्चन इसमें डबल रोल में थे। स्वतंत्रता सेनानी मास्टर दीनानाथ और उनके बेटे राजू की भूमिका में। मास्टर दीनानाथ को ठाकुर प्रताप सिंह (अमजद खान) के काले कारनामों को पता चलता है और  वो उसे उजागर करना चाहते हैं। ठाकुर मास्टर जी को प्रलोभन देकर रोकना चाहता है। अनिर्णय की स्थिति में मास्टर जी रातभर सो नहीं पाते हैं। इस किरदार के द्वंद्व को दिखाने के लिए फिल्मकार ने एक दृष्य रचा। दीनानाथ कमरे में बैठे सोच रहे होते हैं कि क्या करें तो अचानक उनकी निगाह स्वाधीनता सेनानी के उनके मेडल पर जाती है। वो चांद की रोशनी में चमक रहा होता है। दीनानाथ सोचते हैं कि देशभक्ति सिर्फ युद्ध के समय वीरता दिखाने से नहीं बल्कि शांति के समय ईमानदारी से समाज सेवा का कार्य करना भी है।वो ठाकुर के काले कारनामों को उजागर कर देते हैं। मास्टर दीनानाथ साहस दिखाते हैं लेकिन उनको इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है। उनके घर को आग लगा दी जाती है उनकी बेटी और पत्नी का अपहरण कर लिया जाता है। प्रचारित कर दिया जाता है कि दोनों मर गईं। मास्टर दीनानाथ अपनी जगह छोड़कर एक बड़े स्लम भारत नगर में रहने चले जाते हैं। बेटा उनके साथ होता है। 

भारत नगर में वो अपनी नैतिकता और ईमानादरी के साथ लोगों के बीच प्रतिष्ठा अर्जित करते हैं। भारत नगर में भी चार छोटे-छोटे अपराधी होते हैं जो मुसलमान, पंजाबी, तमिल और बंगाली होते हैं। ये सभी अपने समुदाय के लोगों की चिंता करते हैं और एक भारतीय की तरह नहीं सोचते। मास्टर जी सबको एक करने का प्रयास करते हैं। समय ठीक गुजरने लगता है और अतीत की यादें धुंधली पड़ने लगती हैं।  इस बीच मास्टर जी का बेटा राजू खुद अपराधी बन जाता है। देश के लिए अपना संपूर्ण समय लगा देनेवाले मास्टर जी को पता ही नहीं चलता है कि उनका बेटा ठाकुर के लिए काम करने लगा है। एक समय ऐसा आता है ठाकुर उनके बेटे पर गोली चलता है और उसकी जान बचाने के लिए मास्टर जी उसके सामने आ जाते हैं। फिल्मकार ने चतुराई के साथ कई संदेश दे दिया। मास्टर दीनानाथ मरने कके पहले अपने बेटे से कहते हैं- तुम्हारी मां कोढ़ से मर गई, मगर इस भारत माता को कोढ़ मत होने देना। इसके सीने पर कोढ़ फैलानेवाले वतनफरोशों को खतम कर देना, खतम कर देना। फिल्मकार यहां कोढ़ को मेटाफर की तरह पेश करते हैं। संदेश देते हैं कि भ्रष्टाचार समाज और देश के लिए कोढ़ है। मास्टर जी जब अपनी अंतिम सांस लेते हैं और उनके मुंह से हे! राम निकलता है तो उनका बेटा राजू जोर से चिल्लाता है पिताजी। इस चिल्लाहट के साथ एक नवजात के रोने की आवाज आती है। मास्टर जी के घर तीसरी पीढ़ी का आगमन होता है। जीवन की निरंतरता का संदेश। ये एक ऐसी फिल्म थी जिसने दर्शकों का मनोरंजन तो किया लेकिन देशप्रेम के हैवी डोज के साथ। आज जब हमारा देश स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना चुका है तब भी इस फिल्म से निकलते संदेश हमें सोचने पर तो मजबूर करते ही हैं।  


Saturday, April 18, 2026

मुस्लिम घुसपैठ और हिंदी साहित्य


हाल में असम विधानसभा का चुनाव संपन्न हुआ है। बंगाल में विधानसभा चुनाव का प्रचार जारी है। इसके पहले बिहार विधानसभा का चुनाव हुआ था। इन तीन विधानसभा चुनावों के दौरान घुसपैठिए शब्द पर बहुत राजनीति हुई। बंगाल में तो मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की घोषणा के बाद से ही राजनीतिक दलों के बीच बंगलादेशी मुस्लिम घुसपैठियों को लेकर बयानबाजी आरंभ हो गई थी। बंगलादेशी मुस्लिम घुसपैठियों की पहचान और उसको राज्य से बाहर करने को भारतीय जनता पार्टी ने चुनावी मुद्दा बना लिया है। ममता बनर्जी भी अपने भाषणों में घुसपैठियों को लेकर केंद्र की सरकार को ललकारती नजर आती हैं। असम में विशेष पुनरीक्षण के पहले और उसके बाद भी बांग्लादेशी घुसपैठिए चुनावी मुद्दा बना था। इस तरह के समाचार बंगाल और असम से आते ही रहे हैं। समाचारों को पढ़ने के बाद मन में विचार आया कि देखा जाए घुसपैठिए की समस्या को हिंदी साहित्य ने किस तरह से अपनी रचनाओं में दर्ज किया है। दिमाग में सबसे पहला नाम कुबेरनाथ राय का आया । कुबेरनाथ राय ने असम में शिक्षण कार्य करते हुए देश-दुनिया के विषयों पर लिखा। कुबेरनाथ राय ने 1960-70 के दशक में नक्सवादियों और उनके समर्थकों पर प्रहार किया। भारतीय पौराणिक प्रतीकों को अपने लेखों में उपयोग किया कि जो पाठकों को आनंद देते हैं। उनके निबंध संग्रहों को पलटने लगा। भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित कुबेरनाथ राय का एक निबंध संग्रह है गंधमादन। इस संग्रह में एक निबंध है ‘कजरीबन में जीवहंस’। इसकी पहली पंक्ति से प्रतीत होता है कि 1969 में लिखा गया था। वो लिखते हैं, उन्नीस सौ सत्तर का युवा वसंत अभी कुछ दूर है, पर उसकी नक्सलपंथी लौह मृदंग की टंकार सुनकर यह वर्ष उनहत्तर का जर्जर-पाण्डुर बूढ़ा हेमंत और ठंडा पड़ गया है।

बात बंगलादेशी घुसपैठियों की हो रही थी। कुबेरनाथ राय ने अपने इस निबंध में उसका बहुत ही तार्किक वर्णन किया है। ये भी बताया है कि किस तरह से बंगलादेसी मुसलमान असम में घुसते हैं और फिर यहां खेती-किसानी के नाम पर अपना स्थायी अड्डा बना लेते हैं। ‘कजरीबन में जीवहंस’ में राय लिखते हैं- असम में कई लाख अनुप्रवेशकारी आ गए हैं, उसमें ज्यादा तादाद इन्हीं यायावर मुसलमान कृषकों की है। ये फर्जी नाम से या किसी स्थानीय मुसलमान के नाम से जमीन का बंदोबस्त सरकारी दफ्तरों से करा लेते हैं और कभी कभी यों ही दखल करके पाट, सनई, धान, कलाई, आलू और सरसों की फसल उगा लेते हैं। नयी मिट्टी के कारण फसल भी बड़ी जानदार होती है। इधर असम मंत्रिमंडल और सुरक्षा विभाग कुछ कड़ा पड़ा है तो धीरे-धीरे यहीं के बाशिंदे हो रहे हैं और कभी इस राजनीतिक दल से तो कभी उस दल की मदद से मतदाता सूची में आ जाते हैं।‘ अब अगर हम कुबेरनाथ राय की 1969 में लिखी इन बातों को ध्यान से देखें तो ये स्पष्ट होता है कि राजनीतिक दलों की मदद से बंगलादेशी मुसलमान भारत की मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज करवाने में कामयाब होते रहे हैं। कुबेरनाथ राय सिर्फ मतदाता सूची में नाम दर्ज करवाने तक ही नहीं रुकते हैं उसको राजनीतिक सिद्धांतों की कसौटी पर भी कसते हैं। वो आगे लिखते हैं कि भारतीय कम्युनिस्टों की भावना है कि कम्युनिज्म का प्रधान शत्रु है हिंदुवाद, अतएव भावी लड़ाई में मुसलमान बड़े काम की चीज साबित होगा। उधर कांग्रेस के केंद्रीय कर्णधारों की धारणा है कि कम्युनिज्म के खिलाफ मोर्चा तभी जीता जा सकता है जब मुसलमान हाथ में रहें- हिंदू तो वामपंथी होता जा रहा है। पर साधारण मुसलमान किसी प्रतिबद्धता का कायल नहीं। वह अपनी लाभ हानि ही देखता है और संप्रदाय की लाभ-हानि भी कुछ देखता है-इससे आगे और कुछ नहीं। चाहे जो हो ये यायावर मुसलमान बड़े परिश्रमी होते हैं। विशेषत: इनकी औरतें बहुत खटती हैं। एक-एक मुसलमान तीन-चार शादियां रखता है, मौज से तंबाकू पीता है, पान खाता है, केश सजाता है और उसमें जो नयी रहती है उसके साथ सोता है- शेष को प्राचीनकाल के गुलामों की तरह खटना और खाना है।...फातिमा की दीदी का पति भी ऐसे भी यायावर परिवार से आया है जो अब इस नदी के किनारे दस-बारह साल से बस गए हैं। घर-द्वार बनाकर स्थायी बाशिंदे हो हो गए हैं। 

कुबेरनाथ राय शब्दों के चयन में बेहद सजग लेखक के तौर पर जाने जाते हैं। उनकी उक्त टिप्पणी से स्पष्ट है कि किस तरह से बंगलादेशी मुसलमान असम में आते थे और राजनीतिक दलों की मदद से मतदाता सूची में स्थान बनाते थे। राजनीतिक दल बंगलादेशी मुसलमानों को अपनी विचारधारा को मजबूत करने के लिए उपयोग में लाते रहे हैं। यहां वो यह भी स्पष्ट करते हैं कि मुसलमान किसी प्रतिबद्धता का कायल नहीं है बल्कि वो अपने व्यक्ति लाभ को प्राथमिकता देता है। कुबेरनाथ राय का ये निबंध भले ही साहित्यिक हो लेकिन इसमें जिस तरह से उन्होंने बंगलादेशी मुसलमानों की असम में घुसपैठ, उनकी जीवनशैली और फिर यहां के स्थायी निवासी बनने के तरीकों को उजागर किया है वो बेहद सटीक प्रतीत होता है। वामपंथियों की राजनीति पर कुबेरनाथ राय 1969 में प्रहार कर रहे होते हैं जबकि उस समय नक्सलियों को लेकर एक रोमांटिसिज्म अकादमिक और बौद्धिक जगत में रेखांकित किया जा सकता है। यह अकारण नहीं है कि वामपंथी इकोसिस्टम ने बहुत कायदे से कुबेरनाथ राय जैसे भारतीय परंपरा और पौराणिक ग्रंथों से प्रतीकों को उठाकर समकालीन स्थितियों पर लिखनेवाले लेखक को किनारे लगाने का कुत्सित खेल खेला। खैर... ये इस लेख का विषय नहीं है। उक्त लेख में कुबेरनाथ राय की एक और पंक्ति है जो ध्यान खींचती है। वो लिखते हैं, मैमनसिंह बंगलादेश का एक जिला है। ये मैमनसिंहिया मुसलमान कहीं भी अच्छी मिट्टी वाली जमीन पाकर खेती करने लगते हैं। कानूनी या गैर-कानूनी दखल द्वारा लावारिस जमीन पर खरपतवार की एक बस्ती आनन फानन में तैयार कर डालते हैं। अपने इस लेख में आगे वो समझाते हैं कि किस तरह से असम की नदियां अपना पथ परिवर्तन करती हैं तो जो जमीन डूब से बाहर निकलता है उसपर मैमनसिंहिया मुसलमान किस तरह से कब्जा करते हैं। साहित्य में घुसपैठ का ये समाजशास्त्रीय विश्लेषण है। 

आज मतदाता सूची का गहन पुनरीक्षण हो रहा है। घुसपैठियों को देश से बाहर निकालने पर गृहमंत्री अमित शाह अडिग नजर आते हैं। असम में भी विधानसभा चुनाव में ये मुद्दा बना था तो इसके पीछे राजनीति नहीं बल्कि देश की मतदाता सूची को शुद्ध करने का उपक्रम ही नजर आता है। कहा जाता है कि साहित्य अपने समय को भी दर्ज करता हुआ चलता है। कभी यथार्थ के चित्रण के तौर पर तो कभी गल्प का छौंक लगाकर। कुबेरनाथ राय ने तो अपने निबंध कजरीबन में जीवहंस में यात्रा, प्रकृत्ति और समाज के बहाने मुसलमानों के भारत में घुसपैठ के तरीकों और राजनीतिक दलों की मतदाता सूची को दूषित करने की युक्ति को उजागर करते हैं। देश मुस्लिम घुसपैठ की समस्या को लंबे समय से झेल रहा है और अब समय आ गया है कि उसपर सख्त एक्शन हो। भारत की जनता संविधानसम्मत तरीके से अपने नीतिनिर्धारकों का चुनाव करे।     


Saturday, April 11, 2026

सांस्कृतिक संस्थाओं का हो पुनर्गठन


मार्च के अंतिम सप्ताह में दिल्ली में साहित्य अकादेमी ने एक बड़ा साहित्य उत्सव का आयोजन किया। जानकारों के मुताबिक आयोजन पर करीब तीन करोड़ रुपए खर्च होते हैं। संगीत नाटक अकादेमी की बेवसाइट पर कई कार्यक्रमों की सूचना मिलती है। ये संस्था विभिन्न अवसरों पर झांकियों से लेकर परेड का आयोजन करती है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय प्रतिवर्ष भारत रंग महोत्सव का आयोजन करता है। इसका बजट भी करीब पांच करोड़ के आसपास रहता है। इस आयोजन का उद्देश्य देश में नाट्य संस्कृति का विकास करना और रंगकर्मियों को एक राष्ट्रीय मंच उपलब्ध करना है। ललित कला अकादेमी की वेबसाइट पर अनेक प्रकार के हो चुके और होनेवाले इवेंट की जानकारी है। ये सभी संस्थान संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध हैं। ध्यान से देखने पर ये प्रतीत होता है कि ये संस्थाएं इवेंट मैनजमेंट कंपनी बन गई हैं। संस्कृति मंत्रालय के कई इवेंट ये संस्थाएं करवाती हैं। स्वाधीनता के अमृत महोत्सव के समय साहित्य अकादेमी ने रंगोली प्रतियोगिता जैसे अखिल भारतीय आयोजन में सहयोग किया था। अगर अकादमियों से आगे बढ़कर देखें तो संस्कृति मंत्रालय की ही एक और संस्था है सांस्कृतिक स्त्रोत एवं प्रशिक्षण केंद्र। इस संस्था का मुख्यालय दिल्ली में है। इस संस्था के निदेशक का पद जनवरी 2024 से खाली बताया जाता है। इस संस्था को एक सोसाइटी चलाती है। संस्था की वेबसाइट के मुताबिक सोसाइटी के सदस्यों की जगह खाली है। पता नहीं कब से। मंत्रालय के एक अधिकारी प्रभारी निदेशक के तौर पर संस्था का कामकाज देख रहे हैं। साहित्य अकादेमी और ललित कला अकादेमी का कामकाज मंत्रालय के अधिकारी देख रहे हैं। ललित कला अकादेमी के चेयरमैन के अधिकारों को लेकर विवाद हुआ था। जिसके बाद मंत्रालय ने उनके अधिकार कम कर दिए थे। उन्होंने संस्था आना छोड़ दिया। ललित कला अकादेमी एक ऐसी संस्था है जिसके पास अमूल्य कलाकृतियों की धरोहर है लेकिन उनकी उचित देखभाल और सुरक्षा पर प्रश्न उठते रहे हैं।

संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत ही क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र भी आते हैं। भारत सरकार ने सात जोनल कल्चरल सेंटर का गठन किया था। इन संस्थाओं का मूल उद्देश्य स्थानीय लोककलाओं का संरक्षण और संवर्धन था। इन क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों का मुख्यालय पटियाला, नागपुर, उदयपुर, प्रयागराज, कोलकाता, दीमापुर, और तंजावुर में है। 2024 में लोकसभा में अपने लिखित उत्तर में संस्कृति मंत्री ने बताया कि संस्कृति मंत्रालय इन क्षेत्रीय सांस्कृति केंद्रों के माध्यम से 14 राष्ट्रीय संस्कृति महोत्सव, चार क्षेत्रीय राष्ट्रीय महोत्सव का आयोजन करती है। इसके अलावा कला और संस्कृति के विकास के लिए कम से कम 42 क्षेत्रीय संस्कृति उत्सवों का आयोजन क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों के द्वारा किया जाता है। इन केंद्रों के चेयरमैन उन राज्यों के राज्यपाल होते हैं जिस राज्य में क्षेत्रीय केंद्र का मुख्यालय होता है। अगर राज्यपाल की रुचि कला-संस्कृति में है तो कार्य सुचारू रूप से चलता है अन्यथा नहीं। पूर्वी क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र के चेयरमैन बंगाल के पूर्व राज्यपाल सी वी आनंद बोस थे। उनकी सांस्कृति संस्थाओं के कामकाज में  रुचि कम थी। आर एन रवि के राज्यपाल बनने से कला जगत आशान्वित है। इन सांस्कृतिक केंद्रों का उद्देश्य कला और संस्कृति का संवर्धन और संरक्षण था। आयोजनों से उद्देश्य की आंशिक पूर्ति हो सकती है लेकिन मूल उद्देश्य कैसे पूरा होगा, इसपर चर्चा होनी चाहिए। कुल मिलाकर अगर मोटे तौर पर देखा जाए तो इन केंद्रों ने कला-संस्कृति से जुड़े संस्कृति मंत्रालय के आयोजन किए। 

संस्कृति मंत्रालय से आगे बढ़ते हैं और शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत तीन संस्थानों को देखते हैं, ये संस्थाएं हैं, आगरा स्थित केंद्रीय हिंदी संस्थान, दिल्ली स्थित केंद्रीय हिंदी निदेशालय और मैसूर का केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान। केंद्रीय हिंदी संस्थान का उद्देश्य है हिंदी का विकास और प्रसार। कमोबेश यही उद्देश्य केंद्रीय हिंदी निदेशालय का भी है। केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान का उद्देश्य सभी भारतीय भाषाओं का संवर्धन और संरक्षण है। इसमें हिंदी भी शामिल है। तीनों संस्थान अलग अलग शहरों में हैं। तीनों का प्रशासनिक ढांचा है, तीनों के कर्मचारी और अधिकारी अलग हैं परंतु तीनों के उद्देश्य एक हैं। तीनों एक ही मंत्रालय के अधीन हैं लेकिन तीनों अलग अलग काम कर रही हैं और तीनों में समन्वय न्यूनतम है। इसी तरह संगीत नाटक अकादेमी और भारतीय नाट्य विद्यालय के कई कार्यों में समानता है। दिल्ली में कुछ ही मीटर की दूरी पर इनके कार्यालय हैं लेकिन दोनों संस्थाओं में समन्वय न्यूनतम है, जबकि दोनों संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध हैं। ललिता कला अकादेमी और नेशनल गैलरी आफ माडर्न आर्ट के उद्देश्यों को देखें तो दोनों में कई समानताएं दिखाई देंगी। कामकाज भी एक जसा ही है लेकिन समन्वय न्यूनतम। ये दोनों संस्थाएं भी संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत हैं। कला और संस्कृति से जुड़ी संस्थाओं को देखें तो कई ऐसी संस्थाएं हैं जिनके उद्देश्य लगभग एक हैं लेकिन उनके बीच समन्वय का अभाव है। इन सबके अलावा इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र भी है जो कला और संस्कृति के क्षेत्र में काम कर रही है।

स्वाधीनता के बाद देश में जब कला और संस्कृति से जुड़ी हुई संस्थाएं बनने लगीं तो अलग अलग विधाओं के लिए अलग अलग अकादमियों की स्थापना हुई। कालांतर में जब कांग्रेस सरकार ने कला और संस्कृति को वामपंथियों को आउटसोर्स कर दिया तो और संस्थाएं बनीं। अपने लोगों को स्थापित करने के लिए संस्थाएं बनाई जाने लगीं। परिणाम ये हुआ कि संस्थाएं बन गई और मनचाहे लोगों के हाथों में इनकी कमान सौंपी गईं। उद्देश्यों की ओवरलैपिंग के बारे में विचार नहीं किया जा सका। स्वाधीनता के इतने वर्षों बाद जब भारत विकसित राष्ट्र की राह पर चल पड़ा है तो आवश्यकता इस बात की है कि इन संस्थाओं के क्रियाकलापों पर पुनर्विचार हो। इनके उद्देश्यों को लेकर भी पुनर्विचार की आवश्यकता है। जहां दो संस्थाओं के उद्देश्य एक हैं उनका विलय किया जाना चाहिए। बेहतर तो ये होगा कि कला और संस्कृति से जुड़ी सभी संस्थाओं का पुनर्गठन किया जाए और एक ऐसी संस्था बने जहां अंतराष्ट्रीय स्तर के कार्य हों, शोध हों और उसका प्रचार प्रसार हो। भाषा, संस्कृति और कला से जुड़े अलग-अलग विभाग उस बड़ी संस्था के प्रशासनिक नियंत्रण में हों ताकि समन्वय बेहतर हो सके और कार्यों में दुराव न हो। मंत्रालय आयोजनों से आगे जाकर नीति निर्माण के कार्य में जुटे। भारत की अपनी संस्कृति नीति बनाई जाए। इन संस्थाओं के पुनर्गठन के बाद जिस संस्था का निर्माण हो वो व्यापक स्तर पर कार्य करे। पुनर्गठन के बाद भारतीय संस्कृति के संवर्धन और विकास के लिए अगर एक बड़ी संस्था बनती है तो उसका काम भारत समेत दुनिया के अन्य देशों में भारतीय संस्कृति, कला और लेखन को लेकर जाने का हो। करीब दो वर्ष पहले जब गोविंद मोहन संस्कृति मंत्रालय के सचिव थे तब भारत की संस्कृति के वैश्विक प्रचार प्रसार के लिए नीति बनाने को लेकर दिल्ली के भारत मंडपम में देशभर के विद्वानों ने मंथन किया था। उसके बाद उस पहल का क्या हुआ पता नहीं चल पाया। आज इस बात की आवश्यकता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विकसित भारत के लक्ष्य को ध्यान में रखकर कला संस्कृति, भाषा के लिए काम करनेवाली संस्थाओं का परीक्षण और पुनर्गठन हो। 


Saturday, April 4, 2026

फिल्मों के सामाजिक सरोकार


इस वर्ष जनवरी के आखिर में जब रानी मुखर्जी अभिनीत फिल्म मर्दानी-3 रिलीज हुई थी तब दिल्ली से लापता हो रही बच्चियों का मुद्दा जोर-शोर से उठा था। एक रिपोर्ट के हवाले से ये समाचार चर्चा में आया था कि दिल्ली और आसपास के इलाकों से भारी संख्या में किशोरियां और महिलाएं गायब हो रही हैं। उस समय आए आंकड़े बेहद डरानेवाले थे। तब भी ये भी कहा गया था कि जिस रिपोर्ट के हवाले से मुद्दा बनाया जा रहा था उसमें गायब हुई लड़कियों की बरामदगी के आंकड़े नहीं दिखाए गए थे। आंकड़ों को लेकर जब चर्चा बढ़ी को दिल्ली पुलिस हरकत में आई। पुलिस ने एक्स पर एक पोस्ट किया। उसमें लिखा कि, चंद संकेतों या प्रारंभिक जानकारी को जांचने के बाद ये सामने आया कि दिल्ली से गुमशुदा लड़कियों की संख्या पेड प्रमोशन का हिस्सा है। दिल्ली पुलिस ने स्पष्ट किया था कि डर का माहौल बनाकर लाभ कमाने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। इस तरह का वातावरण बनानेवालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। संयोग ऐसा था कि मर्दानी 3 में भी दिल्ली और इसके आसपास के इलाकों से बच्चियों के गायब होने की कहानी थी। दिल्ली पुलिस के पेड प्रमोशन वाले पोस्ट के बाद चर्चा कम जरूर हुईं लेकिन समाचारपत्रों में लड़कियों के गायब होने के बारे में कुछ न कुछ सामग्री प्रकाशित होती रही। गुमशुदा होनेवाली लड़कियों की संख्या के साथ साथ बरामदगी की संख्या भी प्रकाशित हुई। इससे इंटरनेट मीडिया से बना भ्रम कुछ कम हुआ और राजधानी और इसके आसपास के क्षेत्रों के निवासियों में भय भी कम हुआ। 

फिल्म मर्दानी-3 में बच्चियों का अपहरण कर उनको विदेश भेजने और उनपर दवाओं के ट्रायल की बहुत मार्मिक और भयावह कहानी है। फिल्मकार ने ये दिखाने का प्रयास किया है कि मानव तस्करी सिर्फ देह व्यापार के लिए नहीं होती बल्कि इसके अनेक रूप होते हैं। इस फिल्म में बच्चियों का अपरहण किया जाता था और जिनका ब्लड ग्रुप खास किस्म का होता था उसको विदेश ले जाकर उसपर कैंसर की दवाई का टेस्ट किया जाता था। अगवा की गई जिन लड़कियों का ब्लड ग्रुप उस समूह का नहीं होता है उनसे भीख मंगवाने से लेकर अन्य गैरकानूनी कार्य करवाए जाते थे। कैंसर की दवाई का जिन लड़कियों पर टेस्ट किया जाता था उनकी हालत बहुत खराब हो जाती थी और कुछ समय बाद तड़प तड़प कर उनकी मृत्यु होते दिखाया गया। इस सिंडिकेट में लड़कियों के लिए काम करने वाली एक संस्था और उसके प्रमुख की संलिप्तता भी दिखाई गई थी। कहानी थोड़ी फिल्मी भी होती है। जांच कर रही पुलिस आफिसर को सस्पेंड कर दिया जाता है लेकिन वो विभाग के अपने साथियों का साथ श्रीलंका जाकर इस गैंग का खात्मा करती है। फिल्म में कई टर्न और ट्विस्ट हैं, जो फिल्म को रोचक बनाने और दर्शकों को बांधने के लिए किए गए हैं, पर मूल कहानी तो लड़कियों का गिनी पिग की तरह इस्तेमाल करने की ही है। फिल्म की कहानी, संभव है काल्पनिक हो लेकिन मानव तस्करी का जो पहलू इसमें दिखाया गया है उसको देखकर गायब होने वाली लड़कियों को लेकर समाज को चिंतित होना चाहिए। ये अपराध बेहद संगठित और समाज के इज्जतदार लोगों की सरपरस्ती में चलता हुआ दिखाया गया है। वैसे लोग जो पैसे की खातिर किसी की जान को बेचने या जान लेने में नहीं हिचकते हैं। 

फिल्म से वापस समाज में लौटते हैं। तीन चार दिन पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने बच्चों की तस्करी को लेकर एक याचिका पर सुनवाई के दौरान बेहद कठोर टिप्पणी की। अदालत ने कहा मानक संचालन प्रक्रिया (स्टैंडर्ड आपरेटिंग प्रोसिड्योर) और न्यायिक आदेशों के बावजूद दिल्ली बच्चों की तस्करी की मंडी बन चुकी है। हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस और राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग से ये जानना चाहा कि बच्चों की तस्करी को रोकने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने एक बेहद ही डराने और चौंकानेवाली बात कही। याचिकाकर्ता ने एक घटना का उल्लेख करते हुए बताया कि दिल्ली के आनंद विहार रेलवे स्टेशन से एक बच्ची को बचाकर पुलिस को सौंपा गया था। आरोप लगाया गया कि पुलिस ने बचाई गई बच्ची को बाल कल्याण समिति के सामने पेश करने की बजाए उसको वापस तस्करों को सौंप दिया। बाद में वही बच्ची फिर से तस्करों के पास से मिली। अगर ये आरोप सही हैं तो ये हमारे सिस्टम पर बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह है। कोर्ट ने इस आरोप का संज्ञान लिया है। हलांकि इस सुनवाई के दौरान ये बात भी सामने आई कि 2018 से लेकर 2024 के बीच रेलवे सुरक्षा बल ने रेलवे परिसर से 84000 बच्चों को बचाया भी। इस तरह से कई अन्य आंकड़े भी कोर्ट के समझ रखे गए थे। आज जब हमारी पुलिस व्यवस्था अत्याधुनिक तकनीकी उपकरणों और सुविधाओं से युक्त है तब कोर्ट की तस्करी की मंडी बनने जैसी टिप्पणी भयावह है। आज भी अगर बच्चों की तस्करी हो रही है तो उसका किन अपराध में उपयोग हो रहा होगा इस बारे में सोचकर सिहरन होती है। 

कई बार ये कहा जाता है कि फिल्में समाज के लिए संदेश देने का काम करती है। मर्दानी 3 में कम उम्र की लड़कियों का अपहरण करके विदेश भेजने की बात हो या वेबसीरीज डेल्ही क्राइम-3 में कम उम्र की लड़कियों को विदेश में बेचने की कहानी, एक संकेत तो समाज को दिया ही जा रहा है। इस तरह की कहानियां फिल्मों में आ रही हों और उसी समय इस तरह के केस कोर्ट में भी सुनवाई के लिए आ रहे हों तो ये प्रतीत होता है कि फिल्में कुछ तो कहने का प्रयास कर रही हैं। फिल्मों को बहुधा मनोरंजन कह कर खारिज कर दिया जाता है, लेकिन कई बार उनसे निकलनेवाले संदेश को पकड़ने की आवश्यकता भी है। 1950 में व्ही शांताराम की एक फिल्म आई थी दहेज। स्वाधीन भारत में दहेज की समस्या को लेकर ये फिल्म बनी थी। इस बात की कई बार चर्चा होती है कि बिहार विधानसभा में दहेज की कुरीति पर चर्चा के दौरान इस फिल्म का नाम कई बार आया था। कहा तो यहां तक जाता है कि बिहार में दहेज उन्मूलन कानून बनने के पीछे इस फिल्म की प्रेरणा थी। इस बात में सचाई हो या ना हो लेकिन इतना तो तय है कि व्ही शांताराम ने अपने फिल्म के माध्यम से इस कुरीति को चर्चा के केंद्र में ला दिया था। फिल्मों से ऐसे कई उदाहरण दिए जा सकते हैं। आज अगर मर्दानी-3 में बालिकाओं की तस्करी का मुद्दा उठा है तो समाज को इस घृणित अपराध के बारे में गंभीरता से विचार करना चाहिए। सरकार और पुलिस तो अपने स्तर पर प्रयास करेंगी, अदालतों में सुनवाई होगीं, आदेश पारित होंगे लेकिन जबतक हमारा समाज इस अपराध के खिलाफ सजग होकर नहीं उठेगा तबतक बेटियों की तस्करी पर लगाम लगा पाना संभव नहीं है। आज जब हमारा देश विकसित बनने की राह पर अग्रसर है तब इस तरह के अपराध की समाज में कोई जगह होनी नहीं चाहिए।