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Saturday, March 28, 2026

रचनात्मक स्वतंत्रता के नाम पर बेइमानी


इन दिनों पूरे देश में फिल्म धुरंधर, द रीवेंज की सफलता की चर्चा हो रही है। इस फिल्म के निर्देशक आदित्य धर के निर्देशन के साथ-साथ इस फिल्म के कलाकारों के अभिनय की प्रशंसा हो रही है। इस फिल्म ने बाक्स आफिस पर कमाई का कीर्तिमान रच दिया है। करीब चार घंटे की इस फिल्म को देखने के लिए सिनेमा हाल में दर्शकों की भीड़ उमड़ रही है। फिल्म धुरंधर 2 की सफलता पर कवि-लेखक चेतन कश्यप से बात हो रही थी। धुरंधर के संवाद, पुराने फिल्मी गीतों का बैकग्राउंड म्यूजिक की तरह उपयोग पर चर्चा हुई। निर्देशक रामगोपाल वर्मा की फिल्म धुरंधर पर की गई टिप्पणी और रणवीर सिंह और अमिताभ बच्चन के अभिनय की तुलना भी की गई। दीवार में अमिताभ बच्चन का दोनों पैर उठाकर टेबल पर रखनेवाले सीन और धुरंधर- 2 में ल्यारी पर कब्जे के बाद रणवीर सिंह का रहमान की कुर्सी पर बैठ कर सामने की टेबल पर दोनों पैर रखने के सीन की तुलना की गई। इसके बाद फिल्म के क्राफ्ट पर चर्चा चली। फिल्म के क्राफ्ट पर चर्चा होते-होते शैलेन्द्र की फिल्म
‘तीसरी कसम’ पर कैसे बात चली गई ठीक से याद नहीं। बात रेणु जी की कहानी और फिल्म की कहानी पर होने लगी। मूल कहानी का बड़ा हिस्सा फिल्म में नहीं है। इसी क्रम में चेतन ने बताया कि फिल्म तीसरी कसम की पटकथा तीसरी कसम के नाम से ही प्रकाशित हो चुकी है। तुरंत ही पटकथा की पुस्तक मंगवाई गई। जबतक फिल्म तीसरी कसम की पटकथा आती तबतक रेणु की संपूर्ण कहानियां से तीसरी कसम, अर्थात मारे गए गुलफाम निकालकर पढ़ी गई। चूंकि क्राफ्ट पर बात हुई थी इस कारण यूट्यूब पर उपलब्ध तीसरी कसम देखी। ये सब होने के बाद जब पटकथा वाली पुस्तक आई तो उसको भी पढ़ा। 

पटकथा वाली पुस्तक के पृष्ठ संख्या 96 पर एक दृष्य का वर्णन है। जिसमें नौटंकी देखने के क्रम में एक दर्शक, शिवरतन, हीरामन और लालमोहर के बीच नायिका हीराबाई को लेकर संवाद है। प्रकाशित पटकथा के अनुसार शिवरतन का एक दर्शक की हीराबाई पर टिप्पणी पर संवाद है ‘अरे, पौडर से दांत धो लेती होगी...बड़ी चालाक रंडी है। हीरामन गुस्से में कहता है, ए! क्या बे-बात की बकते हो? कंपनी की औरत को रंडी कहते हो। शिवरतन- एक बार नहीं सौ बार कहेंगे। तुमको इससे क्या? हीरामन- मैं तुम्हारी जीभ खींच लूंगा...। शिवरतन लापरवाही से हंसता है- अरे-जा-जा रंडी के भड़ुए...! हीरामन- मारो साले को! लालमोहर- मारो!! लालमोहर हाथ की दुआली से हर आदमी को पटापट पीटता जाता है। हीरामन शिवरतन को पटककर छाती पर सवार है...आओ! एक-एक की गरदन उतार लूंगा! पलटदास घुस्सा लगाते हुए कहता है – साला! सिया सुकमारी को रंडी कहता है। सो भी हिंदू होकर! धुन्नीराम भाग खड़ा होता है। कलरव, कोलाहल—हल्ला...! हीराबाई पर्दे को हटाकर देखती है और अचरज से उसका मुंह खुल जाता है।...मारपीट जारी है।‘ इस संवाद को पढ़ते ही कुछ खटका। लगा कि कहानी में तो कुछ और है। वापस कहानी पर गया। कहानी में रेणु ने लिखा है- ‘पौडर से दांत धो लेती होगी। हरगिज नहीं। कौन आदमी है बात की बेबात करता है। कंपनी की औरत को पतुरिया कहता है। तुमको बात क्या लगी ? कौन है रंडी का भड़वा ? मारो साले को! मारो! तेरी..! लालमोहर दुआली से पटापट पीटता जा रहा है सामने के लोगों को।‘ पलटदास एक आदमी की छाती पर सवार है- ‘साला, सिया सुकुमारी को गाली देता है, सो भी मुसलमान होकर।‘ रेणु की कहानी में जिस संवाद में मुसलमान कहा जाता है वो पटकथा तक पहुंचते पहुंचते हिंदू हो जाता है। 

लगा कि एक बार फिल्म देखनी चाहिए कि फिल्म के संवाद में क्या कहा गया है। यूट्यूब पर उपलब्ध फिल्म के क्रेडिट में स्क्रीनप्ले नवेंदु घोष का और कहानी-डायलाग फणीश्वरनाथ रेणु का है। फिल्म में गाना आता है, पान खाए सैंया हमार। उसके फौरन बाद ये सीन है। फिल्म के संवाद में न तो हिंदू है न मुसलमान। वहां हीराबाई के दांत पर टिप्पणी है, उसको अपशब्द कहे गए हैं लेकिन सिया सुकुमारी वाला संवाद नहीं है। प्रश्न यह उठता है कि अगर कहानी में मुसलमान था तो उसको पटकथा में हिंदू क्यों और किसने कर दिया। जानकारों का मानना है कि ये काम संवाद या स्क्रीनप्ले लिखनेवाले कर सकते हैं। शाट लेते समय निर्देशक इंपर्वोवाइज करने के लिए बदलाव कर सकते हैं। रेणु जी ने जब कहानी में मुसलमान लिखा तो पटकथा में उसको हिंदू लिखने का कोई स्पष्ट कारण समझ नहीं आता है। संभव है कि नवेन्दु घोष ने स्क्रीनप्ले लिखते समय ये बदलाव कर दिया होगा क्योंकि वो कम्युनिस्ट थे। हिंदी फिल्मों में कम्युनिस्ट संवाद लेखकों ने इस तरह के कई कारनामे किए हैं। इस फिल्म के निर्माता शैलेन्द्र भी प्रगतिशील लेखक संघ और भारतीय जन नाट्य संघ में सक्रिय थे इस कारण संभव है कि इस बदलाव पर उनको आपत्ति ना हुई हो। अब प्रश्न उठता है कि अगर पटकथा में उक्त संवाद था तो फिल्म में क्यों नहीं है? दो बात हो सकती है, एक तो ये कि इस संवाद को शूट ही नहीं किया गया हो। मारपीट का दृष्य तो है, छाती पर चढ़कर पीटने का भी लकिन उसके बाद ही इतना हो-हल्ला हो जाता है कि थोड़ी देर तक संवाद की गुंजाइश ही नहीं बनती। उसके बाद निर्देशक ने पुलिस की एंट्री करवा दी। दृष्य बदला तो संवाद बदल गए। दूसरी बात ये कि मारपीट के दौरान ये दृष्य शूट किया गया। जब फिल्म सेंसर बोर्ड गई हो तो बोर्ड ने इस संवाद को हटाने के लिए कहा होगा। इस कारण ये संवाद फिल्म में नहीं है। क्योंकि एक हिंदू के मुंह से सिया को गाली दिलवाना आपत्तिजनक है। 

इस पूरे प्रसंग को देखने के बाद ये अनुमान कि.या जा सकता है कि हिंदी फिल्मों में कम्युनिस्ट और कथित प्रगतिशील लेखकों ने रचनात्मक स्वतंत्रता के नाम पर जाने क्या-क्या किया। रचनात्मक स्वतंत्रता के नाम पर बुरे पात्रों का धर्म बदल दिया जाता रहा। फिल्म की कहानी या दृष्य या संवाद बदल कर हिंदुओं को नीचा दिखाने प्रवत्ति उक्त प्रसंग से गाढ़ी होती है। पूर्व में भी कई फिल्मों के संवाद में हिंदुओं को नीचा दिखाने और मुसलमानों को बेहतर दिखाने की प्रवृत्ति को रेखांकित किया जाता रहा है। अधिकतर फिल्मों में हिंदू पात्रों के सामने मुस्लिम पात्रों को बेहतर दिखाया जाता है। किसी फिल्म में हिंदू पात्र मंदिर की सीढ़ियों पर चढ़ना नहीं चाहता और जब मजबूरी में उसको मंदिर जाना पड़ता है तो भगवान से उसकी खुश होने की बात करता है। किसी देवता की मूर्ति के पीछे खड़े होकर भगवान की आवाज में किसी लड़की से बात करने जैसे दृष्य तो हिंदी फिल्मों के दर्शकों ने देखा ही है। प्रश्न ये उठता है कि जो लोग गंगा-जमुनी तहजीब की बात करते हैं उनमें से अधिकतर इस तरह की हरकतों में क्यों लिप्त नजर आते हैं। स्वंय को तरक्कीपसंद और नास्तिक कहकर नैतिकता की मीनार पर खड़े होकर पूरे देश को भाषण पिलाने वाले लेखक भी इस तरह की रचनात्मक बेईमानी करते पाए जाते हैं। उनसे जब इस बाबत प्रश्न पूछो तो पलटवार करते हुए आपसे पूछेंगे कि क्या आप अपने मुल्क को सीरिया बनाना चाहते हैं। नहीं साहब! हम अपने मुल्क को सीरिया बिल्कुल नहीं बनाना चाहते हैं पर लेखकों से ईमानदार और वस्तुनिष्ठ होने की अपेक्षा अवश्य करते हैं।

Thursday, June 4, 2020

प्रयोगधर्मा फिल्मकार की कमी खलेगी

बासु भट्टाचार्य जब हिंदी के मशहूर उपन्यासकार फणीश्वर नाथ रेणु की कृति ‘तीसरी कसम उर्फ मारे गए गुलफाम’ पर आधारित फिल्म ‘तीसरी कसम’ का निर्देशन कर रहे थे तो उनके साथ सहायक निर्देशक के रूप में जुड़े थे बासु चटर्जी। जब बासु चटर्जी ने फिल्म बनाने का फैसला लिया तो उन्होंने चुना हिंदी के उपन्यासकार राजेन्द्र यादव की कृति ‘सारा आकाश’ को। यह महज संयोग था एक प्रयोग इसका तो पता नहीं लेकिन बासु चटर्जी की इस फिल्म को मृणाल सेन की फिल्म ‘भुवन शोम’ के साथ समांतर सिनेमा की शुरुआती फिल्म माना जाता है। हिंदी फिल्मों की दुनिया में जब राजेश खन्ना का डंका बज रहा था, राजेश खन्ना की फिल्मों के रोमांस का जादू जब हिंदी के दर्शकों के सर चढ़कर बोल रहा था, लगभग उसी दौर में हिंदी फिल्मों में समांतर सिनेमा का बीज भी बोया जा रहा था। एक तरफ राजेश खन्ना का सपनों की दुनिया में ले जानेवाला रोमांस था तो दूसरी तरफ आम मध्यमवर्गीय परिवारों का अपने संघर्षों के बीच प्रेम का अहसास दिलानेवाली फिल्में। बासु चटर्जी ने अपनी पहली फिल्म सारा आकाश में इस तरह के प्रेम का ही चित्रण किया। जहां प्रेम तो है पर अपने खुरदरे अहसास के साथ। फिल्म ‘सारा आकाश’ को वो राजेन्द्र यादव के उपन्यास के पहले ही भाग पर केंद्रित कर बना रहे थे और राजेन्द्र यादव से लगातार उसपर ही चर्चा करते थे। राजेन्द्र यादव ने तब एक दिन बासु चटर्जी से कहा था कि यार तुम मेरे उपन्यास पर बालिका वधू सा क्या बना रहे हो? दरअसल राजेन्द्र यादव इस बात को लेकर चिंतित थे कि अगर उपन्यास पहले भाग पर केंद्रित रहा तो उनकी पूरी कहानी फिल्म में नहीं आ पाएगी। लेकिन बासु चटर्जी ने उनको समझा लिया था। बासु चटर्जी ने कई फिल्मों की पटकथा खुद ही लिखी थी क्योंकि वो मानते थे कि निर्देशक कहानी को सबसे अच्छे तरीके से समझ सकता है।
बासु चटर्जी ने फिर मन्नू भंडारी की कहानी ‘ये सच है’ पर ‘रजनीगंधा’ फिल्म बनाई जो दर्शकों को खूब पसंद आई। इस फिल्म में ही अमोल पालेकर और दिनेश ठाकुर जैसे आम चेहरे मोहरेवाले नायकों को लीड रोल देने का साहसी कदम बासु चटर्जी ने उठाया था। इस फिल्म से ही विद्या सिन्हा को अभिनेत्री के तौर पर पहचान मिली। फिर तो वो इस तरह के कई अन्य प्रयोग करते रहे। इसके बाद उन्होंने अमोल पालेकर और जरीना बहाव को लेकर ‘चितचोर’ बनाई। एक और प्रयोग बासु चटर्जी ने अपनी फिल्म ‘शौकीन’ में किया। इस फिल्म में तीन बुजुर्ग अशोक कुमार, ए के हंगल और उत्पल दत्त को लेकर उन्होंने बुजुर्ग मन के मनोविज्ञान को बहुत ही कलात्मक और सुंदर तरीके से दर्शकों के सामने पेश किया। शौकीन में बुजुर्ग मन के उस हिस्से को उभारा गया है जहां रोमांस शेष रह जाता है,अपने मन की करने की ललक बची रह जाती है। बासु चटर्जी ने कई कमर्शियल फिल्में भी की जिनमें अमिताभ बच्चन के साथ ‘मंजिल’ और राजेश खन्ना के साथ ‘चक्रव्यूह’ और अनिल कपूर के साथ ‘चमेली की शादी’ जैसी फिल्में भी शामिल हैं। 
एक निर्देशक के तौर पर बासु चटर्जी बहुत ही सख्त माने जाते हैं। सेट पर वो किसी तरह की अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं करते थे। एक फिल्म पत्रिका के संपादक रहे अरविंद कुमार ने बासु चटर्जी के सहायक के हवाले से एक वाकया लिखा है,  ‘दिल्लगी’ की शूटिंग के दिनों की बात है। शिफ़्ट सुबह नौ से चार तक थी। शत्रुघ्न सिन्हा को सुबह आना था वो आए शाम के चार से कुछ पहले। बासु चटर्जी ने किसी तरह अपने को संयमित किया और शत्रुघ्न सिन्हा को बोले “कॉस्ट्यूम पहन आएं।” शत्रुघ्न सिन्हा जबतक तैयार होकर आए इधर बासु चटर्जी और कैमरा निर्देशक मणि कौल में बहस हो रही थी। मणि कह रहे थे, “आधे घंटे में सूरज ढल जाएगा, तो दिन का यह सीन कैसे पूरा कर लेंगे आप?” बासु ने शत्रुघ्न को देखते ही कहा, अब तो पैकअप करना होगा... कल कोशिश करते हैं’ निर्देशक का कठोर और सहज संदेश। अगले दिन शत्रुघ्न सिन्हा ठीक दस बजे सेट पर मौजूद थे। 
बासु चटर्जी ने अपनी दूसरी पारी टीवी के साथ शुरू की थी। अभी हाल ही लॉकडाउन के दौरान जिस सीरियल ‘व्योमकेश बक्षी’ को दर्शकों ने खूब पसंद किया उसे भी बासु दा ने ही बनाया था। इलके अलावा बासु चटर्जी ने ‘रजनी’, ‘दर्पण’ और ‘कक्काजी कहिन’ जैसे टीवी सीरियल का भी निर्माण किया। वो मानते थे कि टी वी का एक्सपोजर बहुत है और उसको बहुत सारे लोग एक साथ देखते हैं। साथ ही वो ये भी कहते थे कि टीवी की इतनी ज्यादा पहुंच है कि कुछ ऐसा बनाना जो एकसाथ इतने सारे लोग को पसंद आए, बड़ी चुनौती है। बासु चटर्जी के निधन से हिंदी सिनेमा ने एक प्रयोगधर्मा वयक्तित्व को खो दिया जिसक जगह की भारपाई जल्दी संभव नहीं।