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Wednesday, March 4, 2020

खबरों की रीमिक्स करती फिल्में


फिल्म एक ऐसा माध्यम है जिसपर गंभीरता विचार कम ही होता है। इसके आयामों को लेकर, इसके क्राफ्ट को लेकर, इसकी कहानियों को लेकर या इसकी प्रस्तुतिकरण को लेकर सामाजिक संदर्भों के साथ बात कम होती है। हिंदी में तो और भी कम।आजादी के सत्तर साल बाद भी बहुत कम ऐसे विश्वविद्यालय हैं जहां फिल्म अध्ययन का अलग विभाग है। पिछले दिनों हिंदी फिल्मों की कहानियों पर काफी चर्चा होनी शुरू हुई है। इसमें यथार्थ के चित्रण पर भी बहुत बातें हुई। यह भी कहा गया कि इन दिनों हिंदी फिल्मों की कहानियां आपकी हमारी कहानियों को चित्रित कर रही हैं लिहाजा इनको दर्शक पसंद भी कर रहे हैं। यह सही भी है कि फिल्मों में इन दिनों यथार्थवादी कहानियों को ज्यादा पसंद किया जा रहा है। उनमें से कई फिल्मों को समीक्षक, तो कइयों को समीक्षक और दर्शक दोनों पसंद कर रहे हैं। पर इन दिनों जो यथार्थवादी कहानियां दिखाई जा रही हैं उसके प्रस्तुतिकरण को देखने की जरूरत है। कहना ना होगा कि इन यथार्थवादी कहानियों का प्रस्तुतिकरण काल्पनिक होने लगा है। पहले के दौर में ये होता था कि काल्पनिक कहानियों का चित्रण यथार्थवादी तरीके से होता था। चाहे वो सत्यजित रे की फिल्में हों, गोविंद निहलानी की फिल्में हो या फिर श्याम बेनेगल की। ये लोग काल्पनिक कहानियों को चुनते थे और उसके प्रस्तुतिकरण यानि नायक नायिकाओं के परिवेश से लेकर उसके कास्ट्यूम तक में यथार्थ दिखाते थे। अब क्या हो रहा है कि कहानियां को यथार्थवादी हो गई हैं लेकिन इनका प्रस्तुतिकरण काल्पनिक हो गया है। ये काल्पनिकता फिल्म ‘मुल्क’ से लेकर ‘छपाक’ तक में दिखाई देती है। यहां कहानियां तो दर्शकों के जीवन से उठाई जा रही हैं लेकिन पात्रों से लेकर परिवेश तक को काल्पनिक बना दिया जा रहा है। यथार्थवादी कहानियों में न तो यथार्थवादी ड्रेस डिजायनिंग पर ध्यान दिया जाता है न ही पात्रों के चित्रण पर।
दूसरी लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात जो इन कथित यथार्थवादी फिल्मों के बारे में रेखांकित की जा सकती है वो ये है कि इस तरह की ज्यादातर फिल्में खबरों के सहारे यथार्थ के करीब जाती हैं। जैसे अगर हम देखें तो दिल्ली से सटे नोएडा में 2008 में एक स्कूली छात्रा आरुषि तलवार और उसके नौकर की हत्या होती है। इस दोहरे हत्याकांड की पूरे देश में चर्चा होती है। इस हत्याकांड और इसकी जांच और उस वक्त के सामाजिक माहौल को केंद्र में रखकर विशाल भारद्वाज एक कहानी लिख देते हैं जिसपर मेघना गुलजार 2015 में तलवार नाम से एक फिल्म बना देती हैं। इसी तरह से अगर देखें तो उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले में कटरा सहादतगंज में दो लड़कियों की लाश पेड़ से लटकी मिली थी। उस वक्त इस बात की देश विदेश में चर्चा हुई थी कि इन दोनों लड़कियों को गैंगरेप के बाद हत्या कर पेड़ से लटका दिया गया था। इस वारदात पर जमकर राजनीति भी हुई थी। इस बड़ी खबर को केंद्र में रखकर अनुभव सिन्हा और गौरव सोलंकी ने एक कहानी लिख दी और उसपर आर्टिकल 15 नाम की फिल्म बन गई। इस फिल्म ने खूब वाहवाही बटोरी, कई पुरस्कार भी मिले। इसी तरह से 2017 में लखनऊ में एक एनकाउंटर हुआ था जिसमें एक आतंकवादी मारा गया था। मारे गए आतंकवादी के पिता ने अपने बेटे का शव लेने से ये कहकर इंकार कर दिया था कि वो देश के गद्दार का अंतिम संस्कार नहीं करेंगे। उस दौर में ये खबर भी बहुत चर्चित हुई थी। यथार्थ के करीब जाने के लिए अनुभव सिन्हा ने इसपर एक फिल्म लिख दी जो ‘मुल्क’ के नाम से बनी।
दरअसल ये एक ट्रेंड शुरू हो गया। इसी ट्रेंड के आधार पर अंकिता चौहान और मेघना गुलजार ने एक फिल्म लिखी जिसका नाम था ‘छपाक’। दरअसल 2005 में लक्ष्मी नाम की एक लड़की पर एसिड फेंक दिया गया। एसिड फेंकने की इस घटना को लेकर पूरे देश में खूब चर्चा हुई थी। खुले में एसिड बिक्री पर रोक की मांग को लेकर आंदोलन हुए. मामला कोर्ट कचहरी तक गया। फैसला हुआ। लक्ष्मी की पीड़ा को लेकर अखबारों में भी काफी चर्चा हुई थी। ‘उरी द सर्जिकल स्ट्राइक’, तो उरी में 2016 में आतंकवादी हमले और उसके बाद भारतीय सेना द्वारा किए गए सर्जिकल स्ट्राइक को ध्यान में रखते हुए बनाई गई है। इस फिल्म ने साढे तीन सौ करोड़ से अधिक का बिजनेस किया।
खबरों के आधार पर फिल्म बनाने का ये चलन चल पड़ा। फिल्म लेखकों से लेकर निर्माताओं को लगता होगा कि दर्शकों के मानस पटल पर ये घटनाएं अंकित होंगी जिसका फायदा बॉक्स ऑफिस पर दिखेगा। कई फिल्मों में दिखा भी। कुछ फिल्मों ने मुनाफा कमाया तो कुछ ने मुनाफा के साथ साथ नाम भी। दरअसल खबरों के आधार पर कहानी लिखने की जो प्रवृत्ति बॉलीवुड में चली उसके भी आर्थिक कारण हैं। हिंदी फिल्मों में सबसे कम खर्च कहानियों और स्क्रिप्ट पर किया जाता है। जबकि इसके उलट हॉलीवुड में कहानियों या स्क्रिप्ट पर बहुत अधिक खर्च किया जाता है। इस तरह के कई फिल्म लेखकों का तो ये हाल है कि इन घटनाओं को कवर करनेवाले पत्रकारों से पूछकर कहानियां लिखते हैं। दरअसल वो कहानियां नहीं लिख रहे होते हैं बल्कि वो घटनाओं के आधार पर सीन लिख रहे होते हैं। सीन लेखन का ये उपक्रम कहानी पर होनेवाले खर्च को बचा लेता है। कहना न होगा कि ये खबरों का रीमिक्स पेश करने का दौर हैं। जैसे एक दौर ऐसा आया था कि पुराने हिट गानों को रीमिक्स करके पेश किया गया, उनमें से कई गाने खूब हिट रहे तो अब खबरों को रीमिक्स किया जा रहा है। यही हाल ऐतिहासिक बड़ी खबरों के साथ भी रहा है। खबरों के रीमिक्स पर काम करने के क्रम में कुछ लेखक तो इतिहास की बड़ी खबरों तक जा पहुंचे। उन खबरों तक जिनमे गौरवगाथा भी हो। फिल्म ‘दंगल’ से लेकर फिल्म ‘सुल्तान’ या ‘गोल्ड’ तक में इस चलन को रेखांकित किया जा सकता है। ‘सांड की आँख’ का अगर उदाहरण लें तो कहानी को सबको मालूम थी लेकिन फिल्म के लेखक ने सीन लिखे और फिल्म बन गई।
खबरों का रीमिक्स कर फिल्म की कहानी बनाने का नतीजा ये होता है कि इन फिल्मों से मुनाफा तो कमा लिया जाता है, प्रशंसा भी बटोर ली जाती है लेकिन इनको लंबे समय तक याद किया जाएगा इसमें भी संदेह है। ये कालजयी नहीं हो सकतीं। एक दौर वो भी था हिंदी फिल्मों का जब राज कपूर जैसे निर्देशक कहानियों पर जमकर काम करते थे। एच एस रवैल जैसे लोग कहानियों को लेकर बेहद सतर्क होते थे। तभी उनकी फिल्में अबतक याद की जाती हैं। ये फिल्में टिकाऊ नहीं होती। यह अनायास नहीं है कि इन दिनों फिल्मों का फैसला ओपनिंग के आधार पर होने लगा है। पहले तीन दिन में सौ करोड़ कमाया या नहीं, इसके आधार पर फिल्म को सफल या असफल कहा जाने लगा है। फिल्मों की कहानी और क्राफ्ट पर कम बात होती है। अच्छी फिल्म का मानदंड उसकी कमाई हो गई है। ये अनायास नहीं है कि फिल्म की सफलता में अब इसपर भी बात होती है कि उस फिल्म को कितने स्क्रीन मिले। कितने स्क्रीन पर एक साथ फिल्म रिलीज हुई। यह अनायास नहीं है कि पिछले सालों में चर्चित हस्तियों पर खूब जमकर बॉयोपिक भी बने, इन शख्सियतों की सफलता को भुनाने के लिए उनपर फिल्में बनीं। फिल्म निर्माताओं ने मुनाफा भी कमाया लेकिन अगर बॉयोपिक को याद किया जाता है तो अब भी सबसे पहले रिचर्ड अटनबरो की फिल्म ‘गांधी’ की ही याद आती है। फिल्मों का ये असर वेब सीरीज पर भी पड़ा है। वहां प्रमाणन की कोई व्यवस्था नहीं है इसलिए यथार्थ के नाम पर अराजकता है।
सौ वर्षों से अधिक के लंबे सफर के बाद अब हिंदी फिल्मों के कर्ताधर्ताओ को इसपर विचार करना चाहिए कि कहानी पर कितना काम हो, उसपर कितना खर्च किया जाए। जबतक फिल्म की कहानी पर उसके स्क्रिप्ट पर खर्च नहीं किया जाएगा तो जिस तरह से लोकेशन की भव्यता का दौर भी खत्म होता दिख रहा है वैसे ही खबरो की रीमिक्स पर बनने वाली फिल्मों का दौर भी खत्म हो सकता है। दर्शकों के सामने एक ही तरह की फिल्म आने की वजह से एकरसता का खतरा उत्पन्न हो सकता है। हिंदी फिल्मों में एकरसता से उबने का सबसे बडा उदाहरण शाहरुख खान हैं। लंबे कालखंड तक दर्शकों ने रोमांस के बादशाह को देखा, सराहा भी लेकिन बांहें फैलाकर हीरोइन को आमंत्रण देनेवाले नायक को नकारने में भी दर्शकों ने वक्त नहीं लिया। यथार्थ के नाम पर रीमिक्स का दौर भी लंबा चलेगा इसमे संदेह है।   

Saturday, February 22, 2020

यथार्थ की आड़ में कमी छिपाते निर्देशक


इन दिनों हिंदी फिल्मों के बदलाव को लेकर काफी बातें होती हैं। बदलाव की इन बातों में कथानक, फॉर्म, क्राफ्ट से लेकर तकनीक और संगीत तक पर चर्चा होती है। ये चर्चा होनी भी चाहिए। दरअसल सिनेमा एक ऐसा माध्यम है जिसमें लगातार बदलाव करते रहने की जरूरत भी है क्योंकि दर्शक एकरसता से उब जाते हैं। हिंदी फिल्मों में आ रहे इन तमाम बदलावों के बीच पिछले तीन चार वर्षों से एक बात अधिक सुनने को मिल रही है कि अब हिंदी फिल्मों की कहानियां यथार्थ के ज्यादा करीब पहुंच रही हैं। ‘विकी डोनर’ से लेकर ‘दम लगा के हइशा’, ‘बरेली की बर्फी’ जैसी फिल्में बनीं और लोगों ने इसको पसंद भी करना शुरू किया तो छोटे शहरों की बड़ी कहानियों की बातें शुरू हो गईं। फिर ‘मुल्क’, ‘आर्टिकल 15’, ‘पिंक’ जैसी फिल्में भी आईं जो सफलता के फॉर्मूले को न अपनाते हुए कहानी के साथ चलीं। सफल भी हुईं। 2015 में बनारस की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म ‘मसान’ आई। बेहद शानदार फिल्म, कलाकारों का सधा अभिनय भी। इस तरह की फिल्मों को कालांतर में कंटेट फिल्म कहा जाने लगा। ये नामकरण ठीक वैसा ही है जैसे हिंदी में ‘नई वाली हिंदी’ को चलाने की कोशिश की गई। ‘कंटेंट फिल्म’ कहने का अभिप्राय चाहे जो भी रहा हो लेकिन इससे एक अलग भाव यह भी निकलता है कि सिर्फ इन्हीं फिल्मों में कंटेंट है और अन्य फिल्में कंटेंटविहीन हैं। ऐसा नहीं है, इस कोष्ठक से बाहर की फिल्मों में भी कंटेंट होता है। दरअसल जिन कथित फॉर्मूलाबद्ध फिल्मों से खुद को अलग दिखाने की कोशिश में ‘कंटेंट फिल्म’ का नाम चलाने की कोशिश की जा रही है वो फिल्में पहले भी थीं और आगे भी रहेंगी।
 हिंदी फिल्मों के इतिहास पर नजर डालें तो ये बहस बहुत पुरानी है। आजादी के बाद जब राज कपूर फिल्में बना रहे थे तब भी उनके सामने ये प्रश्न आया था। तब ये थोड़े बदले हुए रूप में आया था जब फिल्मों को बौद्धिक और संवेदनशील फिल्मों की श्रेणी में बांटकर देखा जाता था। राज कपूर फिल्मों को बौद्धिक माध्यम नहीं मानते थे उनका मानना था ये माध्यम संवेदना से चलता है। और वो इस बात को कहते भी थे। राज कपूर की बात सच भी है। हिंदी फिल्मों के इतिहास में अबतक ज्यादातर दर्शकों को वही फिल्में पसंद आती हैं या आ रही हैं जो कहानी को संवेदना की जमीन पर बुनती हैं। संवेदना से अलग खुरदरे यथार्थ को पेश करनेवाली फिल्में थोड़े दिनों के लिए चर्चा तो हासिल कर सकती हैं लेकिन ये चर्चा बेहद अल्पजीवी होती है। इसका सबसे सटीक उदाहरण अनुराग कश्यप नाम के एक निर्देशक हैं। अबतक इस निर्देशक ने जितनी भी फिल्में बनाई हैं, उनमें से ज्यादातर एक खास वर्ग द्वारा प्रशंसित रही हैं, दर्शकों में व्याप्ति का दायरा बेहद छोटा रहा। कहा जा सकता है कि इन साहब की फिल्में सुपरफ्लॉप लेकिन ‘क्रिटिकली अकेल्मड’ फिल्मों की स्मारक हैं। यथार्थ के नाम पर फूहड़ता और अश्लीलता परोसने में इनको महारथ हासिल है। खैर ये अलहदा विषय है जिसपर फिर कभी विस्तार से चर्चा होगी।
ये सही है कि इन दिनों हिंदी फिल्मों के विषय अपेक्षाकृत यथार्थ के करीब जाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन इस बात को रेखांकित करना भी आवश्यक है कि यथार्थ के करीब जाने में वो जीवन को जस का तस उठा कर रख देने की ओर भी बढ़ने लगे हैं। जीवन को जस का तस रखने का अर्थ है कि वो सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन के उन प्रसंगों या उन घटनाओं को उसी तरह से फिल्मा कर दर्शकों के लिए पेश कर देना। व्यक्तिगत जीवन में कई ऐसे पल होते हैं जिनको सीधे सीधे फिल्मों में नहीं उतारा जा सकता है, उसको दिखाने की एक न्यूनतम मर्यादा अपेक्षित होती है। फिल्मों में जीवन जस का तस पेश करने की प्रवृत्ति पर ध्यान देने के लिए क्रेंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड है लेकिन इंटरनेट के माध्यम से चलनेवाले प्लेटफॉर्म पर पेश किए जानेवाले कंटेंट पर ध्यान देने की कोई प्रविधि अभी है नहीं। इसका नतीजा क्या है। यथार्थ के नाम पर फूहड़ता, अश्लीलता, भयानक हिंसा, जुगुप्साजनक यौनिक दृश्य का चित्रांकन। इस स्तंभ में ओवर द टॉप प्लेटफॉर्म (ओटीटी) पर चलनेवाले वेब सीरीज को लेकर पहले भी कई बार चर्चा हो चुकी है। इस माध्यम के विनियमन को लेकर भी चर्चा हो चुकी है। सरकार ने वेब सीरीज की दशा और दिशा को लेकर एक-दो बैठक भी कर ली है। अबतक नतीजा कुछ नहीं निकला है। हो सकता है सरकार इन सीरीज पर पेश किए जा रहे कंटेंट को लेकर संतुष्ट हो गई हो।
अभी हाल ही में नेटफ्लिक्स पर एक सीरीज आई है नाम है जामताड़ा। दस एपिसोड में पेश किए गए इस सीरीज के केंद्र में झारखंड का कस्बा जामताड़ा है जहां से बैंक फ्रॉड की वारदात को अंजाम दिया जाता है। अब अगर इस सीरीज को ही देखें तो इसमें जीवन को जस का तस दिखाने की प्रवृत्ति के कई प्रसंग हैं। इस वेब सीरीज में गालियों की भरमार है, कोई भी एपिसोड ऐसा नहीं है, बल्कि ये भी कह सकते हैं कि लगभग सभी प्रसंगों में गालियां उपस्थित हैं। जामताडा के युवाओं को इस तरह से पेश किया गया है कि प्रतीत होता है कि वहां का युवा कोई वाक्य बगैर गाली के बोलता ही नहीं है। हद तो तब हो जाती है जब नायक अपनी प्रेमिका से प्रेम प्रसंगों में गाली में ही बात करता है। ये यथार्थ है या फिर सारी सामाजिक वर्जनाओं को छिन्न भिन्न कर मुनाफा कमाने की युक्ति। इसपर विचार करने की जरूरत है। सरकार से अधिक निर्माताओं और निर्देशकों को समझने की जरूरत है। जामताड़ा की भाषा को लेकर भी इस वेब सीरीज में घालमेल किया गया है। कनटाप शब्द कानपुर से इतना जुड़ा है कि हिंदी पट्टी का कोई भी व्यक्ति इसको जानता है। जब इस सीरीज जामताडा में वहां के स्थानीय लड़के अपने संवाद मे कनटाप का प्रयोग करते हैं तो ये संवाद लेखक से लेकर निर्देशक के अज्ञान को ही दर्शकों के सामने पेश करता है। इसके अलावा भी अगर इस वेब सीरीज को देखें तो जाति व्यवस्था को सूक्ष्मता से समझे बगैर पात्रों के जातीय वर्गीकरण को चित्रित करने की कोशिश की गई है। जामताडा में जिस सहजता के साथ अपराधी बैंक में पैसे जमा करते और निकालते हैं वो भी यथार्थ से दूर नजर आता है। अगर आप बैंकों के फ्रॉड को लेकर कोई सीरीज बना रहे हैं तो इसके लिए न्यूनतम शोध तो अपेक्षित ही होता है।
यथार्थ के नाम पर कहानी के लोकेशन और गाली वाली भाषा को पेश करने की जो भेड़चाल इस दौर की वेब सीरीज में दिखाई देती है उसपर भी विचार करना होगा। यथार्थ के चित्रण के लिए जिस कौशल की जरूरत होती है वो न तो अनुराग कश्यप में है और न ही गाली गलौच और अश्लीलता दिखाने वाले निर्देशकों में। दरअसल इस तरह के लोग अपनी कमजोरियों को ढ़कने के लिए गालियों, हिंसा और यौनिक दृश्यों का सहारा लेते हैं। इसका नतीजा ये होता है कि फिल्म या वेब सीरीज के क्राफ्ट या निर्देशकों के कौशल पर बात नहीं होती है और सारी चर्चा इन गालियों और फूहड़ता पर केंद्रित हो जाती है। समांतर सिनेमा के दौर में भी फिल्मों में यथार्थ दिखाया जाता था चाहे वो गोविंद निहलानी की फिल्में हों या श्याम बेनेगल की या महेश भट्ट की। इनकी फिल्मों में भी यथार्थ होता था, वैसा य़थार्थ जो बगैर लाउड हुए जीवन को दर्शकों के सामने पेश करता था। 1982 में महेश भट्ट निर्देशित एक फिल्म आई थी ‘अर्थ’ । इस फिल्म में समाज का ऐसा यथार्थ है जिसकी चर्चा फिल्म बनने के करीब चार दशक बाद अब भी होती है। फिल्म का अंतिम दृश्य जिसमें नायिका शबाना और नायक कुलभूषण खरबंदा का संवाद है वो इतना पॉवरफुल है कि अब भी दर्शकों के मानस पटल पर अंकित है। उस यथार्थ के चित्रण में फिल्मकार का कौशल दिखाई देता था। उनको अपने कौशल पर भरोसा होता था और वो उसी भरोसे के आधार पऱ फिल्म बनाते थे और उसी कौशल ने उनकी फिल्मों को अबतक जिंदा रखा है, उसकी चर्चा होती है। अब जिस कंटेंट फिल्म की चर्चा हो रही है उसको कबतक याद रखा जाएगा ये तो आनेवाले समय में पता चलेगा। लेकिन यथार्थ की आड़ में अपनी कमी छुपाने वाले निर्देशक इतिहास में गुम हो जाएंगे इस बात को समझने के लिए किसी समय का इंतजार नहीं करना होगा।  

Saturday, August 4, 2018

मुसलमानों को नसीहत देती फिल्म


पिछले दिनों जब फिल्म ‘मुल्क’ का विज्ञापन छपा तो उसमें लिखा था कि 45 फीसदी गैर-मुसलमान उस वक्त असहज हो जाते हैं जब उनके पड़ोस में कोई मुसलमान परिवार रहने आता है। इसी विज्ञापन में छोटे अक्षरों में यह भी लिखा गया था कि ये निष्कर्ष राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण पर आधारित है। इस विज्ञापन को देखकर मन में कई सवाल कुलबुलाने लगे थे। फिल्म के निर्देशक से भी सवाल पूछना चाह रहा था। मैंने इस विज्ञापन और अनुभव सिन्हा को टैग करते हुए ट्विटर पर लिखा कि ‘यह नफरत फैलानेवाला और उसको गाढा करनेवाला विज्ञापन है, अनुभव सिन्हा जी को यह बताना चाहिए कि किस एजेंसी ने ये सर्वे किया, किन राज्यों में ये सर्वे किया गया, इसका सैंपल साइज कितना था। ये जानने की कोशिश भी की कि गैर-मुसलमानों के पड़ोसी बनने से कितने मुसलमान असहज होते हैं। अनुभव सिन्हा ने प्रश्न का उत्तर देने की बजाए प्रतिप्रश्नों की झड़ी लगा दी, ‘आप इस आंकड़ें से असहमत हैं क्या?आपको लगता है सही आंकड़ा इससे ज्यादा है?या कम? या आपको लगता है कि ये बात खुले में नहीं कही जानी चाहिए?’। उत्तर की अभिलाषा में जब प्रतिप्रश्न आया तो कहना पड़ा कि आंकड़ों से सहमत-असहमत तब हुआ जा सकता है जब उसका आधार ज्ञात हो, मनगढंत आंकड़े और राष्ट्रव्यापी सर्वे कह देने भर से इसकी विश्वसनीयता साबित नहीं होती। ज्यादा या कम पर भी बात तभी हो सकती है। उनको इतना आश्वस्त जरूर किया कि खुले में बात करने का पक्षधर हूं। अनुभव सिन्हा ने भरोसा दिया और कहा कि ‘जिम्मेदार नागरिक हूं, कुछ भी नहीं कह दूंगा। विश्वास रखें। प्रेम के पक्ष में हूं जहर नहीं घोलूंगा।‘ ट्विटर पर उस संवाद के बीच कई खामखां किस्म के लोग भी आए और उलजलूल टिप्पणियां की। किसी को गुजरात की याद आई कोई मोदी को कोसने लगा कोई, बेरोजगारी तक पहुंच गया। लेकिन अनुभव सिन्हा ने संवाद की मर्यादा के लक्ष्मण रेखा को नहीं लांघा। उनके कुछ ‘खामखां’ मित्रों ने जरूर 'मुल्क' के विज्ञापन को लेकर जहर घोलने की कोशिश की। सोशल मीडिया पर अगर इस फिल्म को लेकर भ्रम की स्थिति उत्पन्न हुई तो उसके लिए इस तरह के विज्ञापन और अनुभव के ‘खामखां’ किस्म के मित्र जिम्मेदार हैं। जो हर मुद्दे में मोदी और बीजेपी को लाकर स्थिति को तनावपूर्ण बना देते हैं। बाद में यह लक्षित किया गया कि विज्ञापन में भी मुसलमान और गैर-मुसलमान का अंतर और उनके बीच की असहजता को उभारने की कोशिश लगातार कम होती चली गई और फिल्म रिलीज होने के बाद तो सभी भारतीयों से इसको देखने की अपील की गई। यहां यह सवाल भी उठता है कि क्या पोस्टर को भी केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड से अनुमति लेनी होती है। मेरी जानकारी के मुताबिक ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। इस विषय पर फिर कभी चर्चा होगी।
दरअसल निर्देशक अनुभव सिन्हा के ‘खामखां’ किस्म के मित्रों ने अपनी टिप्पणियों से फिल्म को लेकर जो शत्रुतापूर्ण माहौल बनाया वह गैरजरूरी था और फिल्म की भावना के खिलाफ भी। फिल्म में कहीं भी हिंदू मुस्लिम संघर्ष को नहीं दिखाया गया है। दरअसल इस फिल्म को हमें समग्रता में देखना होगा तभी इसके कहन और कथन तक पहुंचा जा सकता है। फिल्म के शुरू में ही ये लिखकर आता है कि इसकी कहानी हाल के दिनों की कुछ हेडलाइंस पर आधारित हैं। फिल्म जैसे आगे बढ़ती है तो मुस्लिम परिवार की हिंदू बहू लंदन से अपने पति को छोड़कर अपनी ससुराल आती है। इसकी वजह बहुत गंभीर है, मुसलमानों के लिए बड़ा सवाल लेकर उपस्थित होता है। मुसलमान पति और हिंदू पत्नी के बीच इस बात को लेकर मतभेद होता है कि उनके होनेवाले बच्चे का धर्म क्या होगा। पति चाहता है कि बच्चा होने के पहले ही उसका मजहब तय कर दिया जाए। अब इसमें परोक्ष तौर पर फिल्म ये बताना चाहती है कि मुसलमानों के अंदर मजहब को लेकर कितनी कट्टरता है। फिल्म की नायिका आरती इस बात को रेखांकित करती है कि जब उसने आफताब से प्रेम किया था तो मजहब देखकर नहीं किया था तब उसके होने वाले बच्चे का मजहब उसके जन्म के पहले क्यों तय कर लिया जाए? विवाद बढ़ने के बाद दोनों कुछ समय के लिए अलग होने का फैसला कर लेते हैं। अनुभव सिन्हा ने अपनी फिल्म में भारतीय समाज के उस चरित्र को उभारा है जो हमारे देश में वर्षों से विद्यमान है। फिल्म ‘मुल्क’ में मुराद अली मोहम्मद का पैंसठवां जन्मदिन मनाया जा रहा है। मोहल्ले की हिंदू महिलाएं भी जश्न में शामिल थीं, आनंद का माहौल था। हिंदू महिलाओं को खाने के लिए पूछा जाता है तो उनमें से एक बेहद सहजता के साथ कहती हैं कि हम इनके यहां खाते नहीं हैं। इसमें कोई हिंदू कट्टरता नहीं है। हमने तो अपने गांव में भी देखा है कि मुसलमानों के यहां शादी ब्याह के मौके पर हिंदुओं को जो भोज दिया जाता था उसके लिए चूल्हा अलग रहता था और अलग रसोइया खाना बनाता था। यह सब इतनी सहजता से होता था कि किसी को किसी तरह का अपमान नहीं लगता है। गांव पर हमारे घर मुतवल्ली आते थे, उनके लिए अलग बरतन होता था जिसमें वो खाते-पीते थे। कभी किसी के मन में इसको लेकर कोई दुर्भावना नहीं प्रकट होती थी।
इस फिल्म में मुसलमानों को नसीहत दी गई है कि वो अपने परिवार के बच्चों पर नजर रखें, वो क्या कर रहे हैं, किससे मिल रहे हैं, सोशल मीडिया पर क्या लिख रहे हैं आदि आदि। किसी भी परिवार में कोई अपराधी पनपता है तो जिम्मेदारी उस परिवार के अभिभावकों पर भी होती है। इस बात को भी रेखांकित करना चाहिए कि किस तरह से मुसलमानों को एक खास किस्म का डर दिखाकर बरगलाया जाता है। फिल्म में दो मुस्लिम लड़कों के बीच स्कूटर पर एक संवाद बेहद महत्वपूर्ण है जिसमें आतंकवादी बन गया लड़का ये तर्क देता है कि शासन उनके कौम के साथ भेदभाव कर रहा है, उनको नौकरियां नहीं मिल रही है, दूसरा लड़का यह उत्तर देता है कि हिंदू लड़कों को कौन सी नौकरियां मिल गईं, खासकर उन हिंदू लड़कों को जिसको उनसे बेहतर अंक आए थे। मुस्लिम समाज को अपने अंदर झांक कर देखना होगा कि क्यों वो गलत के खिलाफ खड़े नहीं हो पाते हैं? जब उनके ही कौम के चंद लोग आतंकवादी को शहीद बताकर उसके सम्मान में आयोजन करना चाहते हैं, तो उनका विरोध क्यों नहीं होता है, क्यों कोई मुराद अली तनकर खड़ा नहीं होता। ऐसा नहीं है कि इस फिल्म में हिंदुत्व के उग्र होने को नहीं दिखाया गया है लेकिन वो फैशन में ना होकर सचाई के करीब है। कैसे मुसलमानों की कट्टरता के विरोध में हिंदू भी धार्मिक आयोजन करने लगे हैं, उन स्थानों पर भी जहां अबतक ये नहीं होता आया था। लेकिन वहां भी जब एक मुस्लिम परिवार अस्पताल जाने के लिए रास्ता मांगता है तो कोई रोकता नहीं है। मुसलमान परिवार की हिंदू बहू जब अदालत जाने के लिए घर से निकलती है तो पहले मंदिक जाती है, वहां पूजा करती है और प्रसाद को माथे से लगाती है, किसी को आपत्ति नहीं होती, न तो पुजारी को ना ही परिवार को।
फिल्म में संवादों के जरिए भी मुसलमानों को सीख दी गई है। ऐसा ही एक संवाद है कि जहां कहा गया है कि जब भी पाकिस्तान की जीत पर कुछ घरों में पटाखे फूटेंगे तो शक का वातावरण बनेगा। मुराद अली से उनकी बहू आरती जब कठघरे में सवाल जवाब करती है तो वो जानना चाहती है कि उसने पिछले दो तीन सालों में दाढ़ी क्यों बढ़ाई। ऐसे दर्जनों संवाद इस फिल्म में हैं। कहीं भी निर्देशक ‘वो’ या ‘हम’ के पक्ष में झुके नहीं दिखाई देते हैं। बहुत दिनों के बाद ऐसी वैचारिक फिल्म आई है जो वस्तुनिष्ठ और संतुलित होकर किसी समस्या को उठाती है, बगैर किसी चश्मे के देखती है और घटनाओं और संवादों के माध्यम से दर्शकों के सामने प्रस्तुत करती है। कोर्ट रूम सीन में भले ही निर्देशक जब आतंकवाद को परिभाषित करने चलते तो संकेत में कुछ बातें कहते हैं जिसपर देशव्यापी बहस की जरूरत है, कुछ लोग उससे सहमत या असमहत हो सकते हैं। दरअसल एक खास विचारधारा के लोग दाढ़ी और टोपी को देखते ही उसकी हिमायत में निकल पड़ते हैं बगैर तथ्यों को जानें, बगैर स्थितियों और परिस्थितियों को परखे। सहअस्तित्व और सहिष्णुता हिंदुत्व की ताकत है लेकिन विचारधारा के मोह में धृतराष्ट्र बनने की प्रवृत्ति उसको गलत दिशा में मोड़ देती है। जब दिशा गलत होती है तो सोच भी गलत रास्ते पर चल पड़ती है और गलतफहमियां पैदा होती है। जरूरत इस वैचारिक आतंकवाद के खिलाफ जिहाद की भी है और युद्ध की भी है।