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Saturday, July 17, 2021

लापरवाहियों से खंडित होता इतिहास


मेरे एक मित्र हैं, संजीव सिन्हा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े हैं। दो दिन पहले उन्होंने चहकते हुए फोन किया, भाई साहब, नामवर सिंह अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के संस्थापक थे, क्या आपको मालूम है? जब संघ पर प्रतिबंध लगा था तो वो जेल भी गए थे। मैंने अनभिज्ञता प्रकट की तो उन्होंने पूरा प्रकरण बताया। दरअसल हुआ ये है कि नामवर सिंह की एक जीवनी प्रकाशित हुई है, नाम है ‘अनल पाखी’। इस जीवनी को लिखा है अंकित नरवाल ने। इस पुस्तक में हिंदी के शिक्षक-लेखक विश्वनाथ त्रिपाठी के हवाले से नामवर सिंह को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का अपने जिले का संस्थापक बताया गया है। दरअसल 2017 में नामवर सिंह और विश्वनाथ त्रिपाठी की एक बातचीत प्रकाशित हुई थी जो बाद में 2019 में एक पुस्तक में संकलित हुई। पुस्तक का नाम है ‘आमने-सामने’। प्रकाशक हैं राजकमल प्रकाशन। इस पुस्तक का संकलन-संपादन किया है नामवर सिंह के पुत्र विजय प्रकाश सिंह ने। इसका प्रकाशन जुलाई 2019 में हुआ था। हम इस विषय़ पर आगे बात करें इसके पहले साक्षात्कार का वो अंश देख लेते हैं जिसके आधार पर जीवनीकार से भूल हुई है। विश्वनाथ त्रिपाठी का प्रश्न है, आप पहले आरएसएस में थे, फिर वामपंथी कैसे हो गए? नामवर सिंह का उत्तर है, ‘मैं कोई किताब या मार्क्स को पढ़कर प्रगतिशील नहीं हुआ। लेकिन हां, मैं अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के अपने जिले के संस्थापकों में से हूं। गांधी की हत्या के बाद तीन महीने जेल में भी था, पुणे से मुझे लखनऊ सेंट्रल जेल भेजा गया। जब छूटा तो अटल जी मेरे सम्मान में जेल के द्वार  पर खड़े थे। मैंने उनको कविताएं भी सुनाई थीं। आरएसएस में था जरूर लेकिन मुसलमान और वामपंथियों से मेरी दोस्ती थी।...संघ हिंदू संगठन है और वहां भी पैसे वालों का दबदबा है। जात-पात छूआछूत जैसी विसंगतियां देखने को मिलीं। इसी वर्गभेद की वजह से मैं वामपंथ में चला गया।‘ 

इन बातों के सामने आने के बाद विश्वनाथ त्रिपाठी की तरफ से किसी और ने सफाई पेश की। सफाई में कहा गया कि ‘नामवर जी आजीवन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसकी विचारधारा के सक्रिय विरोधी रहे थे। नामवर सिंह मार्क्सवादी थे, प्रगतिशील लेखक संघ और सीपीआई से संबद्ध थे। सीपीआई के उम्मीदवार के तौर पर चंदौली से लोकसभा चुनाव भी लड़े थे।‘  विश्वनाथ त्रिपाठी के भक्त और कम्युनिस्ट लेखक इस अभियान में लग गए हैं कि उनको इससे बरी कर दिया जाए। चाहे कितना भी बड़ा अभियान चला लें,इस साहित्यिक अपराध को ढंकने की कितनी भी कोशिश की जाए, लेकिन ये अक्षम्य है। चार साल पहले एक साक्षात्कार छपा,फिर दो साल पहले वो बातचीत एक पुस्तक में संकलित हुई, लेकिन विश्वनाथ जी दोनों को ही देख नहीं पाए। क्या ये मान लिया जाए कि हिंदी का ये लेखक अपना लिखा नहीं पढ़ते हैं या अपने कृतित्व को लेकर बेहद असावधान हैं। इस जीवनी के प्रकाशक भी पूरे मामले को ढंकने की कोशिश कर रहे हैं और इस पुस्तक की बची हुई प्रतियों पर चिट लगाकर भूल सुधार की डुगडुगी बजा रहे हैं। अगले संस्करण में उस अंश को हटाने की घोषणा भी की गई है। सवाल फिर वही उठता है कि जो प्रतियां बिक गईं या जो पाठकों तक पहुंच गईं या जो बातें इंटरनेट मीडिया के माध्यम से सार्वजनिक हो गईं उनका परिमार्जन कैसे हो पाएगा। हो भी पाएगा या नहीं।  

जीवनीकार अंकित नरवाल से गलती ये हुई कि उन्होंने इस तथ्य की पुष्टि के लिए विश्वनाथ त्रिपाठी से स्पष्ट रूप से इस मुद्दे पर बात नहीं की और प्रकाशित बातचीत को सही मान लिया। बहुधा लेखक ऐसा करते हैं। अंकित ने दावा किया है कि ‘इसके संबंध में विश्वनाथ त्रिपाठी जी से मेरी बातचीत हुई थी। उनसे पूरी तरह यह पांडुलिपि तैयार होने से पहले और बाद में भी घंटों-घंटो बातचीत होती थी। उन्होंने अपनी बातचीत में हमेशा यह दोहराया है कि उन्होंने नामवर जी के बारे में जो इधर-उधर संस्मरण लिखे हैं, वह सभी प्रामाणिक तथ्य हैं। उनके साथ हुए साक्षात्कारों के संबंध में भी उनकी यही दृढ़ता बनी रहती थी। अब जब यह मामला तूल पकड़ गया है, तो उन्होंने अपने उस साक्षात्कार से किनारा कर लिया है।‘ लगता है कि अंकित नरवाल, विश्वनाथ जी के अतीत में कहने-पलटने की आदत से परिचित नहीं रहे होंगे। त्रिपाठी जी बहुधा पल्ला झाड़ते रहे हैं और किसी न किसी बहाने की ओट लेते रहते हैं। अपनी पुस्तक ‘व्योमकेश दरवेश’ में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के हिंदी भाषा के संयोजक रहते हुए साहित्य अकादमी पुरस्कार से संबंधित एक प्रसंग लिखा। उस प्रसंग की सत्यता के बारे में जब इस स्तंभ में सवाल उठाया गया तो उन्होंने अगले संस्करण में उस पूरे प्रसंग को ही पुस्तक से हटा दिया। इसी तरह से एक साहित्यिक पत्रिका को दिए इंटरव्यू में जब कुछ आपत्तिजनक बातें उनके हवाले से छपीं तो उससे किनारा कर लिया और ठीकरा बातचीत करनेवालों पर फोड़ दिया। मैत्रेयी पुष्पा से संबंधित एक साहित्यिक पत्रिका में अश्लील टिप्पणी करने के बाद उनको फोन करके हाथ-पांव जोड़े थे।

नामवर जी से जुड़े इस प्रसंग पर उठे विवाद से कई बड़े प्रश्न खड़े हो रहे हैं। ये प्रश्न लेखकों की साख, प्रकाशकों की विश्वसनीयता और पुस्तकों के संपादकों की गंभीरता को लेकर भी खड़े होते हैं। कोई भी लेखक क्यों नहीं तथ्यों की पड़ताल के लिए प्राथमिक स्त्रोत तक जाने की कोशिश करता है, क्यों वो सेकेंडरी सोर्स पर आश्रित रहता है। इसी तरह से प्रकाशकों की किसी पुस्तक को लेकर क्या कोई जिम्मेदारी नहीं होती है? क्या आधार प्रकाशन और इसके स्वामी देश निर्मोही का दायित्व नहीं था कि वो नामवर सिंह की जीवनी में प्रकाशित हो रहे तथ्यों के बारे में जांच पड़ताल करते। क्या आधार प्रकाशन सिर्फ प्रिंटर हैं कि जो भी आया छापा और उसको बाजार में भेज दिया। जब उसपर आपत्ति आई तो अगले संस्करण में सुधार की बात कहकर किनारे हो गए। इस पूरे प्रसंग से एक बार फिर से प्रिंटर और प्रकाशक की भमिका पर विचार करने का आधार हिंदी साहित्य जगत के सामने है। देश निर्मोही स्वयं प्रगतिशीलता का डंडा-झंडा लेकर चलते रहते हैं लेकिन उनको भी नामवर सिंह के बारे में इस तथ्य की पड़ताल की जरूरत नहीं लगी। राजकमल प्रकाशन से नामवर सिंह के पुत्र विजय प्रकाश सिंह के संपादन में आमने सामने छपी, उसमें भी विश्वनाथ त्रिपाठी का नामवर का लिया साक्षात्कार छपा लेकिन न तो उनके पुत्र ने इसको जांचने की जहमत उठाई और न ही प्रकाशक के स्तर पर इसकी कोशिश हुई। अब प्रकाशक ने पुस्तक में संशोधन की बात की है।

दरअसल ये पूरा मामला ही लापरवाहियों से भरा हुआ है। इससे हिंदी साहित्य और प्रकाशन जगत में व्याप्त अगंभीरता सामने आती है। ऐसा प्रतीत होता है कि जिनको हम बड़े साहित्यकार या बड़े प्रकाशक मानते हैं उनको अपनी साख की कोई चिंता नहीं । एक और बात जो प्रमुखता से उभर कर सामने आई है कि खुद को प्रगतिशील कहनेवाले कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़े लेखक अपनी विचारधारा से जुड़े लोगों की भूल गलतियों के लिए उनको कठघरे में खड़ा नहीं करते। कम्युनिस्ट लेखक ये काम बहुत ही संगठित तरीके से करते हैं। पूरा माहौल बनाते हैं कि उनकी विचारधारा के लेखक की गलती नहीं है वो तो परिस्थितियों के शिकार हो गए हैं आदि आदि। अब वक्त आ गया है कि साहित्य में वामपंथ की गलतियों और उनको ढ़कने और छुपाने की प्रवृत्ति को रेखांकित किया जाए। साहित्य में सत्य का अनुकरण हो और झूठ और मिथ्या की इस विचारधारा के बचे खुचे ध्वजवाहकों को आईना दिखाया जाए।

Sunday, September 16, 2018

‘पुरस्कार वापसी’ अभियान नहीं साजिश !


साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष विश्वनाथ तिवारी ने अपनी पत्रिका ‘दस्तावेज’ में लंबा संपादकीय लिखकर अवॉर्ड वापसी की मुहिम के संगठित अभियान होने का दावा किया है। अपने दावे के समर्थन में उन्होंने कई प्रमाण भी प्रस्तुत किए हैं। तिवारी ने अपने संपादकीय में लिखा ‘पुरस्कार लौटाने या इस्तीफा देने वाले लेखकों के भी तीन वर्ग थे - एक, वे जो मोदी सरकार और अकादमी के व्यक्तिगत विरोध के चलते आंदोलन के अगुआ और मुख्य किरदार थे। इनकी संख्या 5 से अधिक नहीं थी। इनमें वाजपेयी और वामदलों के लेखक शामिल हैं। दूसरे, वे जो इन मुख्य किरदारों के घनिष्ठ या मित्रा थे जिन्होंने मित्र धर्म के निर्वाह या व्यक्तिगत दबाव और पैरवी में ऐसा किया। इनकी संख्या लगभग 25 थी। तीसरे, वे जो लेखकों की सहज क्रांतिकारी या यशलिप्सु प्रवृत्ति वश इस महोत्सव में अपना नाम चमकाने और लोकप्रियता हासिल करने के लिए (जैसा कि हिंदी के प्रसिद्ध आलोचक प्रो. नामवर सिंह ने कहा है) शामिल हो गए। इनकी संख्या लगभग 15 है। इस प्रकार विश्लेषक महसूस करते हैं कि कुल पांच लेखकों ने अपनी पूर्व प्रतिबद्धता, व्यक्तिगत विरोध और राजनीतिक कारणों से असहिष्णुता का इतना बड़ा मुद्दा खड़ा किया। मुझे प्रामाणिक सूत्रों से खबर मिली और अनेक लेखकों ने व्यक्तिगत बातचीत में बताया भी कि उनसे पुरस्कार लौटाने के लिए संपर्क किए गए।
इनमें नामवर सिंह, कुंवरनारायण और केदारनाथ सिंह जैसे नाम भी हैं। लीलाधर जगूड़ी और अरुण कमल उन दिनों सिक्किम यात्रा पर थे जब एक पत्रकार ने कई बार उन्हें पुरस्कार लौटाने के लिए प्रेरित किया। जगूड़ी पर तो कई लोगों ने फोन करके दबाव बनाया। जैसा कि उन्होंने मुझे बताया। सतीश कुमार वर्मा, राजेंद्र प्रसाद मिश्र, गोविंद मिश्र आदि ने भी ऐसा ही बताया। रामशंकर द्विवेदी ने फोन पर बताया कि उन्हें साहित्य अकादेमी के एक अवकाश प्राप्त लेखक ने फोन पर पुरस्कार लौटाने के विषय में पूछा। वे पांच लेखक जो इस आंदोलन के संचालक थे अपने निकट के लेखकों द्वारा उनके परिचित लेखकों को बार-बार फोन कराकर पूछते रहते थे - ‘‘आप कब लौटा रहे हैं? या ‘‘क्या आप नहीं लौटा रहे हैं?’’ आदि। यह पुरस्कार लौटाने के लिए अप्रत्यक्ष अनुरोध था। इस बात के पक्के प्रमाण हैं कि असहिष्णुता विरोधी आंदोलन स्वतःस्फूर्त नहीं था, बल्कि इसके लिए कुछ लेखकों ने देश व्यापी नेटवर्किंग और अभियान चलाया था।‘ साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष विश्वनाथ तिवारी इथने पर ही नहीं रुके उन्होंने अपने संपादकीय में अंग्रेजी के वरिष्ठतम लेखक शिव के कुमार का उनको लिखा ई मेल भी प्रस्तुत किया। उस ईमेल में 93 वर्षीय लेखक ने साफ तौर पर लिखा है कि उनपर भी साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने का दबाव बनाया जा रहा है। इतना ही नहीं कुछ लेखक उनको ये भी सलाह दे रहे हैं कि वो अपना पद्मभूषण भी लौटाने का एलान कर दें। लेकिन शिव के कुमार से साफ तौर पर माना था कि ये पूरा आंदोलन राजनीतिक मंशा से चलाया जा रहा था।
अपने इस विस्तृत लेख में विश्वनाथ तिवारी ने अशोक वाजपेयी और के की दारूवाला समेत कई लेखकों के उस दौर के क्रियाकलापों और मीडिया में उऩके बयानों को भी सामने रखा है। एक जगह वो लिखते हैं कि ‘एक टी.वी. चैनल पर जब अशोक वाजपेयी से एंकर ने पूछा कि मकबूल फिदा हुसैन जिस समय देश छोड़कर गए या सलमान रश्दी की पुस्तक प्रतिबंधित हुई, कांग्रेस की सरकार थी। तब उन्होंने विरोध नहीं किया। इस पर वाजपेयी जी का चेहरा उतर गया। ऐसे ही किसी प्रश्न पर केकी एन. दारूवाला मौन हो गए। उन्होंने 1984 (सिखों की हत्या के वर्ष) में पुरस्कार लिया था। वाजपेयी जी ने 1994 में पुरस्कार लिया था जिसके दो वर्ष पहले अयोध्या में विवादित ढांचे का ध्वंस हुआ था।‘ इसी तरह से उन्होंने एक टीवी चैनल ने  उस दौर में असहिष्णुता पर एक बहस आयोजित की थी । विश्वनाथ तिवारी लिखते है कि ‘उस बहस में गोविंद मिश्र, गिरिराज किशोर, गणेश देवी, मंगलेश डबराल, मुनव्वर राणा आदि उसमें उपस्थित थे। बहस के बीच में ही राणा ने अपने झोले से अकादमी का प्रतीक चिन्ह और चोंगे की जेब से चेक बुक निकाल कर मेज पर रख दिया और कहा कि इसे अकादमी कार्यालय तक पहुंचा दें। क्या यह स्वतःस्फूर्त था? क्या राणा घर से योजनापूर्वक इसे लौटाने की नीयत से साथ नहीं ले गए थे? राणा ने अकादमी पुरस्कार के लिए कुछ ऐसी अपमानजनक बातें कहीं जिस पर अकादमी पुरस्कार प्राप्त लेखकों को उनकी भर्त्सना करनी चाहिए थी। राणा ने कहा कि प्रतीक चिन्ह कहीं उनके घर के कोने में पड़ा था जिसे उन्होंने ढूंढ़कर निकलवाया। वे इसे अपने ड्राइंगरूम में रखने लायक नहीं समझते। वे इसे गोमती में बहा देना चाहते हैं। आदि। यह तब है जब राणा को अकादमी पुरस्कार दिए जाने के बाद एक विवाद छिड़ा था कि वे मंच के कवि हैं, उन्हें यह पुरस्कार मिलना ही नहीं चाहिए था।‘ उस दौर में की घटनाएं इस तरह की घटी थीं जिससे इस बात के साफ संकेत मिल रहे थे कि पुरस्कार वापसी आंदोलन की व्यूह रचना की गई थी।
अपने इस लेख में विश्वनाथ तिवारी ने अशोक वाजपेयी को भी निशाने पर लिया है वो अशोक वाजपेयी को पुरस्कार वापसी के कथित आंदोलन का सूत्रधार भी मानते हैं। दरअसल अशोक वाजपेयी साहित्य अकादमी के साथ मिलकर विश्व कविता सम्मेलन करना चाहते थे। जो तिवारी जी के अकादमी अध्यक्ष रहते नहीं हो सका था जिसपर अशोक वाजपेयी ने लिखा था कि ‘जब तक साहित्य अकादमी का वर्तमान निजाम पदासीन है तब तक मैं एक लेखक के रूप में अपने को साहित्य अकादमी से अलग रखूंगा। साहित्य अकादमी के एक और निजाम के दौरान पहले भी मैंने अपने को उससे अलग रखा था। मेरे न होने से अकादमी को कोई फर्क नहीं पड़ता और मुझे अकादमी के होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। एक सार्वजनिक और राष्ट्रीय संस्थान के अनैतिक आचरण में सहभागिता करना लेखकीय अंतःकरण की अवमानना होगी।’ इस टिप्पणी के उत्तर में विश्वनाथ तिवारी ने लिखा कि ‘इसकी अंतर्कथा अति संक्षेप में यह है कि वाजपेयी जी विश्व कविता के आयोजन में अपने रजा फाउंडेशन को अकादमी के साथ जोड़ना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने कांग्रेस शासन काल में प्रशासन के बड़े अधिकारियों से काफी दबाव डलवाया। यह मामला कई महीनों चला और अंत में साहित्य अकादमी ने जब रजा फाउंडेशन को साथ न लेने का निर्णय लिया तो वाजपेयी जी ने क्रुद्ध होकर उपर्युक्त टिप्पणी लिखी।‘ हलांकि अशोक वाजपेयी ने विश्वनाथ तिवारी के लेख के बाद अपने स्तंभ में इसका खंडन किया और साफ किया कि वो नहीं बल्कि कांग्रेस सरकार उनको विश्व कविता सम्मेलन करने को कह रही थी। दरअसल विश्व कविता समारोह को किसी की नजर लग गई। अशोक जी ने पहले साहित्य अकादमी के साथ मिलकर विश्व कविता समारोह करना चाहा फिर बाद में वो बिहार सरकार से साथ मिलकर इस आयोजन को करना चाह रहे थे। कमेटी आदि भी बन गई थी, यह भी तय हो गा था कि उसका एक सचिवालय दिल्ली में होगा। विश्व कविता समारोह को लेकर बजट भी बिहार सरकार के संस्कृति विभाग ने घोषित कर दिया गया था। संस्कृति विभाग ने अपने साला कैलेंडर में भी इस आयोजन को शेड्यूल कर दिया था। लेकिन वो भी संभव नहीं हो सका। इस स्तंभ में बिहार में आयोजित होनेवाले विश्व कविता सम्मेलन की अंतर्कथा का प्रमुखता से पहले उल्लेख हो चुका है। अशोक जी ने अभी लिखा है कि ‘पिछले वर्ष चम्पारण सत्याग्रह शती के अवसर पर मैंने विश्व कविता समारोह करने का प्रस्ताव बिहार सरकार से निजी स्तर पर किया था. वह मान लिया गया. बाद में बिहार के कवियों की ज़रूरत से ज़्यादा शिरकत और सरकारी सुस्ती से क्षुब्ध होकर मैंने अपने को अलग कर लिया. और बाद में सरकार में फेर-बदल के कारण वह नहीं ही हो पाया।‘ यह ठीक हो सकता है लेकिन इसमें कुछ और भी है जिसकी परदादारी है। 
दरअसल अगर हम एक बार फिर से उस दौर को याद करें तो यह बात साफ हो जाती है कि पुरस्कार वापसी का प्रपंच रचा गया था ताकि बिहार चुनाव में नीतीश कुमार को फायदा पहुंचाया जा सके। कई साहित्यकारों ने जेडीयू के महासचिव के सी त्यागी के घर बैठकर आगे की कार्ययोजना पर विचार भी कर लिया था। लेकिन पुरस्कार वापसी के इन कर्ताधर्ताओं को शायद इस बात का अंदाजा नहीं रहा होगा कि नीतीश कुमार ही पाला बदलकर भारतीय जनता पार्टी और नरेन्द्र मोदी के साथ हो लेंगे। लेकिन जबतक बिहार में नीतीश लालू की सरकार रही तो पुरस्कार वापसी में शामिल लेखकों ने वहां से भरपूर लाभ लेने की कोशिश की, कुछ को पुरस्कार वापसी का इनाम भी मिला। अब तो यह साफ हो गया है कि कालबुर्गी की हत्या तो सिर्फ बहाना थी, निशाना नरेन्द्र मोदी थे।


Saturday, May 7, 2016

डायरी से खुलती मन की गिरहें

दोपहर ग्यारह बजे लखनऊ से नरेश सक्सेना का फोन आया । उन्हें दस्तावेज का एक सौ चोदहवां अंक मिला है । उन्होंने कहा- ‘हिंदी की सभी पत्रिकाओं में मुझे दस्तावेज सबसे अलग और विशिष्ट लगती है । इसकी साज-सज्जा ही नहीं इसमें छपी सामग्री भी । मेरा इससे ज्ञानवर्धन होता है । लेकिन आप वामपंथ विरोध क्यों जारी रखे हुए हैं ? मैंने कहा, आपके हाथ में जो अंक है उसी का संपादकीय देख जाइए तो पाएंगे कि मैंने सभी दलों के नेताओं का नाम ले लेकर विरोध किया है । इस अंक में किसानों की आत्महत्या शीर्षक संपादकीय है । क्या यह वामपंथ विरोध है ? नरेश सक्सेना ने मेरी बात को स्वीकार किया । असल बात यह है कि यह वामपंथी दुष्प्रचार है और वो अपने दल की आलोचना बर्दाश्त नहीं कर पाते ।‘ यह पूरा प्रसंग दर्ज है साहित्य अकादमी के मौजूदा अध्यक्ष विश्वनाथ तिवारी की डायरी में और तारीख है बीस जून दो हजार सात ।उनकी डायरी को वाणी प्रकाशन नई दिल्ली ने पुस्तकाकार छापा है । नाम है – दिन रैन ।  अगर सतही तौर पर देखें तो ये दो साहित्यकारों के बीच की बातचीच है जो विश्वनाथ तिवारी ने अपनी डायरी में दर्ज कर ली है और अब उसका प्रकाशन हो गया है । लेकिन अगर इसका विश्लेषण करें तो विश्वनाथ तिवारी की एक पंक्ति पर गौर करना पड़ेगा जहां वो कहते हैं कि यह वामपंथी दुष्प्रचार है और वो अपने दल की आलोचवना बर्दाश्त नहीं कर पाते । दरअसल हिंदी साहित्य में वामपंथियों का ये दुष्प्रचार लंबे समय से चल रहा है । वो ना तो अपनी रचना की, ना ही अपने संगठन की, ना अपने पार्टी की और ना ही अपनी विचारधारा और तो और ना ही अपने कॉमरेड की आलोचना बर्दाश्त कर पाते हैं । आलोचना करनेवालों को दक्षिणपंथी, कलावादी, सरकारपरस्त, संघी आदि से लेकर जाने क्या क्या कहकर बदनाम किया जाता रहा है । रामधारी सिंह दिनकर को, अज्ञेय को, निर्मल वर्मा को और तो और अशोक वाजपेयी को भी वामपंथियों ने कहां बर्दाश्त किया । यह अलहदा बात है कि बदली हुई परिस्थिति में अशोक वाजपेयी वामपंथियों के सिरमौर बने हुए हैं ।दरअसल हिंदी साहित्य का यह दौर अवसरवादिता का दौर है और अशोक वाजपेयी की रहनुमाई में वामपंथी लेखकों का आना अवसरवादिता का बेहतरीन उदाहरण है । वामपंथी लेखकों के दुष्प्रचार और अवसरवादिता को हिंदी में लंबे समय से लक्षित किया जाता था लेकिन संस्थाओं और विष्वविद्यालयों के हिंदी विभागों पर उनके कब्जे की वजह से उनके खिलाफ कम लिखा जाता था । विश्वनाथ तिवारी जैसे लेखक यदा कदा वामपंथ के अंतर्विरोधों पर लेख आदि लिखा करते थे लेकिन उसपर कभी कोई विमर्श हुआ, हो याद नहीं आता । या तो इस तरह के लेखों का नोटिस ही नहीं लिया जाता था और अगर कही गले पड़ ही गया तो लेखक को संघी आदि कहकर साहित्यक अछूत करार देकर विमर्श से पीछा छुड़ा लिया जाता था ।
विश्वनाथ तिवारी की प्रकाशित डायरी ‘दिन रैन’ में कई ऐसे प्रसंग हैं जो हिंदी साहित्य की बजबजाती दुनिया को बेनकाव करते हैं । जुलाई 2007 में विश्वनाथ तिवारी लिखते हैं, ‘किसी भी भाषा में कुंठित लेखकों की कमी नहीं है । हर शहर में कुछ ऐसे हैं, जिनकी शिकायत है कि उनकी उपेक्षा हो रही है । एक दो की शिकायत कुछ सही भी हो सकती है क्योंकि हिंदी में पिछले कुछ दशकों से लेखक संगठनों के कारण साहित्यक माहौल धूमिल हुआ है तथा कुछ लेखक अन्य कारणों से चर्चित हो गए हैं । मगर शिकायत करनेवाले अधिकांश लेखकों का भुनभुनाना और बिसूरना निराधार है । उनमें ना तो प्रतिभा है, न अध्ययन, ना दृष्टि की चमक न सर्जनात्मक भाषा । अपना लिखा सबको अच्छा लगता है लेकिन जब वह दूसरों को प्रभानित करे तब ना । किसी को पद या पुरस्कार तो साहित्येतर प्रयत्नों से प्राप्त हो सकता है पर यश तो उसे आत्मप्रचार या सिफारिश से नहीं ही मिला करता । जिन लेखकों को अपने कर्म में गहरी आस्था नहीं होती वो कुंठित हो जाते हैं । जो अपने लेखन को ही सिद्धि मानते हैं वे लिखते भी रहते हैं और देर-सबेर प्रतिष्ठित भी होते हैं । लेखक की दुनिया में देर है पर बहुत अंधेर नहीं ।‘ अपनी इस छोटी सी टिप्पणी में विश्वनाथ तिवारी ने हिंदी के ज्यादातर लेखकों की कमजोरी नस दबा दी है । साथ ही तिवारी जी लेखक संगठनों की भूमिका को भी नकारात्मक मानते हैं और उसको साहित्य का माहौल खराब करने का जिम्मेदार ठहराया है । अपनी इस टिप्पणी में तिवारी साफ तौर पर संकेत करते हैं कि कुछ लेखकों के चर्चित होने की वजह लेखक संगठन और खास विचारधारा से उनकी प्रतिबद्धता है । यह कितना दुखद है कि किसी औसत लेखक को सिर्फ इसलिए चर्तित कर दिया जाए क्योंकि वो आपकी विचारधारा के झंडे की गुलामी स्वीकार कर रहा है । इस बात पर ध्यान नहीं दिया जाता कि वो प्रतिभाशाली है या नहीं, उसके लेखन में उसकी रचनाओं में धार है या नहीं । इस साहित्यक बेइमानी पर पूरी हिंदी पट्टी में बहस होनी चाहिए ।

साहित्य अकादमी के अध्यक्ष हिंदी लेखकों की आत्ममुग्धता पर भी कठोर टिप्पणी करते हैं । यह हिंदी साहित्य के लिए सचमुच बहुत भयावह स्थिति है कि यहां हर लेखक अपने को साहित्य अकादमी पुरस्कार के योग्य मानता है । युवा लेखकों की एक पूरी फौज है जो इतनी आत्ममुग्ध है कि कहा नहीं जा सकता है । इन युवा लेखकों की आत्ममुग्धता को पंख लगते हैं फेसबुक की लाइक्स से । लाइक्स की वजह से वो इतना आत्मलिप्त हो जाता है कि उसको लगता है कि वो हिंदी साहित्य के हर पुरस्कार के योग्य है । अब इस आत्ममुग्धता को जब मंजिल नहीं मिलती है तो लेखक कुंठित होना शुरू हो जाता है । जैसे जैसे यह कुंठा बढ़ती जाती है तो वो फिर बदतमीजी पर उतारू हो जाता है और फेसबुक आदि के अराजक मंच पर अपनी भड़ास निकालना शुरू कर देता है । वह तटस्थ होकर अपने लेखन की कमजोरियों पर विचार करने की मानसिकता में नहीं रह जाता है । इस मानसिकता के आभाव में कभी वो नकली गंभीरता का आवरण धारण करता है जो उसकी रचनाओं में भी प्रतिबिंबित होकर उसको बोझिल बना देता है । बोझिलता उसको पाठकों से दूर कर देती है और यहीं से कुंठा और बढ़ जाती है । हिंदी साहित्य में खत्म होती विधा डायरी लेखन को इस किताब से प्राणवायु तो मिलेगी ही ये साहित्यक प्रवृत्तियों पर गंभीर विमर्श का आधार भी प्रदान करती है । 

Sunday, October 25, 2015

अराजकता का लाइसेंस नहीं स्वायत्ता

समकालीन भारतीय साहित्य इन दिनों संघर्ष, विरोध, प्रतिरोध, प्रदर्शन, प्रति प्रदर्शन, पुरस्कार वापसी आदि जैसे शब्दों से गूंज रहा है । शुक्रवार को तो इन शब्दों से दिल्ली के रवीन्द्र भवन का परिसर भी गूंजा । कहना ना होगा कि शब्दों में ताकत होती है लिहाजा इस ताकत के आगे साहित्य अकादमी कुछ झुकती हुई नजर आई । साहित्य अकादमी जिसकी स्थापना एक स्वायत्त संस्था के तौर पर की गई थी और इसकी स्थापना करनेवालों ने इस संस्था को लेकर एक सपना देखा था । उनका सपना कितना साकार हो पाया, इसपर लंबी बहस हो सकती है । होनी भी चाहिए । आगे इस लेख में इसपर चर्चा होगी । अबतक करीब तीन दर्जन से ज्यादा लेखक साहित्य अकादमी का पुरस्कार लौटा चुके हैं । इस स्तंभ में इसकी वजहों को लेकर चर्चा हो चुकी है । पुरस्कार लौटानेवाले लेखकों के दबाव में अकादमी की कार्यकारिणी ने कलबुर्गी हत्याकांड की कड़े शब्दों में निंदा की । अकादमी ने तीसरी बार कलबुर्गी की हत्या की निंदा की । यह अच्छी बात है कि एक लेखक की मौत पर साहित्य अकादमी, दबाव में ही सही, तीन बार निंदा करने को बाध्य हुई । हलांकि विरोध कर रहे लेखकों की तरफ से यह बता प्रचारित की गई थी कि अकादमी ने कलबुर्गी की हत्या पर शोक सभा, संदेश आदि नहीं किया । साहित्य अकादमी ने शुक्रवार को कार्यकारिणी की बैठक के बाद जारी बयान में कहा कि – ‘अपनी विविधताओं के साथ भारतीय भाषाओं के एकमात्र स्वायत्त संस्थान के रूप में, अकादमी भारत की सभी भाषाओं के लेखकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का पूरी दृढता से समर्थन करती है और देश के किसी हिस्से में, किसी भी लेखक के खिलाफ किसी भी तरह के अत्याचार या उनके प्रति क्रूरता की बेहद कठोर शब्दों में निंदा करती है । हम केंद्र सरकार  और राज्य सरकारों से अपराधियों के खिलाफ तुरंत कार्रवाई की मांग करते हैं और यह भी कि लेखकों की भविष्य में भी सुरक्षा सुनिश्चित की जाए ।‘  अकादमी का बयान यहां तो ठीक था लेकिन उसके बाद उसने अपने अधिकारों का अतिक्रमण करते हुए मांग कर डाली कि – केंद्र और राज्य की सभी सरकारें हर समाज और समुदाय के बीच शांतिपूर्ण सहअस्तित्व का माहौल बनाए रखें । साहित्य अकादमी लेखकों की राजनीति के बीच में पार्टी बनती नजर आ रही है । अकादमी इशारों में वो बातें करना चाहती है जो कहीं ना कहीं राजनीति से जुड़ती हैं । अशोक वाजपेयी, नयनतारा सहगल और कई लेखकों ने अखलाक की हत्या का मुद्दा भी उठाया था । समाज में सहिष्षणुता आदि की मांग करना उसी दबाव का नतीजा है । साहित्य अकादमी का केंद्र और राज्य सरकारो से ये मांग करना अपने दायरे से बाहर निकलने जैसा है । लोकतंत्र में हर संस्था की एक निश्टित मर्यादा होती है । इस मर्यादा का अतिक्रमण कर साहित्य अकादमी ने एक खतरनाक परंपरा की शुरआत कर दी है जिसका रास्ता उसको राजनीतिकरण की तरफ ले जा सकती है ।
अकादमी ने अपने बयान में अध्यक्ष प्रोफेसर विश्वनाथ तिवारी का समर्थन भी किया- कार्यकारी मंडल, अकादेमी के अध्यक्ष के सतर्क और कर्मठ नेतृत्व में साहित्य अकादेमी की गरिमा, परंपरा और विरासत को बरकरार रखने के लिए उनके प्रति सर्वसम्मति से अपना समर्थन व्यक्त करता है ।‘  अब इन दो पंक्तियों पर गौर करने की जरूरत है । इस वक्त यह आवश्कता क्यों महसूस की गई कि कार्यकारिणी अध्यक्ष विश्वनाथ तिवारी के पक्ष में समर्थन का प्रस्ताव पारित करे । क्या विश्वनाथ तिवारी पर कोई खतरा है या फिर उनको लेकर सरकार में कुछ चल रहा है जिसको कार्यकारिणी के इस प्रस्ताव के जरिए संदेश देने की कोशिश की गई है । कुछ तो है जिसकी परदादारी है । साहित्य अकादमी के अध्यक्ष की  ही अध्यक्षता में हुई कार्यकारिणी की बैठक ने उनके ही समर्थन में प्रस्ताव पारित कर दिया । इतिहास ने एक बार फिर से अपने को दुहराया । कोलकाता में वर्तमान सामान्य सभा के सदस्यों के चुनाव की अध्यक्षता भी प्रोफेसर तिवारी ने ही की थी । उनकी ही अध्यक्षता में हुई बैठक में उनको अध्यक्ष चुना गया था । उस वक्त इसको लेकर सवाल भी उठाए गए थे लेकिन चुनाव संपन्न होने के बाद ये बातें दब कर रह गई थी । अब वक्त आ गया है कि साहित्य अकादमी के संविधान में बदलाव किया जाए । सामान्य सभा के सदस्यों के चुनाव को मतपत्रों के जरिए चुना जाना चाहिए । हाथ उठाकर हर भाषा के अपने अपने चहेतों को चुन लेने की परंपरा को खत्म किया जाना चाहिए । इसी तरह से सामान्य सभा के सदस्यों को लेकर भी एक बड़ी खामी है । इस वक्त सामान्य सभा में असम, गुजरात, नगालैंड, तमिलनाडू और पश्चिम बंगाल से के सदस्यों की जगह खाली है । अकादमी में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि इन जगहों को भरा जाए । अगर किसी भी कारणवश किसी भी राज्य के किसी नुमाइंदे की जगह खाली रहती है तो वो पूरे पांच साल तक खाली रहेगी । अकादमी के वर्तमान अध्यक्ष आदि को कई बार व्यक्तिगत और संस्थागत तौर पर इस बारे में अनुरोध किया गया लेकिन इस विसंगति पर ध्यान नहीं दिया गया । इसकी क्या वजह हो सकती है यह तो अकादमी के कर्ताधर्ता ही जानें । इसके पहले कि साहित्य अकादमी फिर से किसी विवाद में घिरे सामान्य सभा के सदस्यों को इस बाबत विचार करना चाहिए ।
साहित्य अकादमी भले ही स्वायत्त संस्था है पर ये करदाताओं के पैसे से चलती है । स्वायत्तता का मतलब यह नहीं होता है कि उसकी जबावदेही किसी के प्रति नहीं है । जिस तरह से संसदीय समिति ने अकादमी के क्रियाकलापों पर सवाल खड़े किए थे वो किसी भी संस्था की जांच के लिए पुख्ता आधार प्रदान करती है । यहां यह आरोप भी नहीं लगाया जा सकता है कि केंद्र में सरकार बदलने के बाद साहित्य अकादमी पर कब्जे को लेकर सरकार कोशिश कर रही है । उक्त रिपोर्ट तो सीताराम येचुरी की अध्यक्षता वाली कमेटी ने तैयार की थी । उस रिपोर्ट के बाद बनी हाईपॉवर कमेटी की सिफारिशों पर क्या निर्णय लिया गया यह ज्ञात होना शेष है । साहित्य अकादमी पर लंबे समय तक प्रगतिशील साहित्यकारों का कब्जा रहा । उस दौरान साहित्य अकादमी चंद लोगों की मर्जी की गुलाम बनकर रह गई  थी। प्रगतिशील लेखकों ने जो परंपरा शुरू की थी वो अब भी बरकार है । सांस्कृतिक यात्राओं के नाम पर विदेश यात्रा में लेखकों के चुनाव को लेकर भी पारदर्शिता होनी चाहिए । अध्यक्ष इस बारे में अंतिम फैसला करते हैं लेकिन कई बार अध्यक्ष और सचिव मिलकर नाम को तय कर लेते हैं । पिछले दिनों सामान्य सभा के कई सदस्यों ने विदेश यात्राएं की । विदेश यात्राओं के नाम पर अपने अपने को दे कि परंपरा को खत्म किया जाना चाहिए । इसके अलावा अकादमी विदेशों में आयोजित होनेवले पुस्तक मेलॆं में भागीदारी करती है । यह अच्छी बात है लेकिन इन पुस्तक मेलों में क्या हासिल होता है इस बारे में दस्तावेज अकादमी की बेवसाइट पर अपलोड किए जाने की आवश्यकता है । जैसे आगामी महीनों में फ्रैंकफर्ट में पुस्तक मेला होगा । उसमें अकादमी का प्रतिनिधि मंडल जाएगा । अकादमी की बेवसाइट पर प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों के नाम होने चाहिए और वहां उन लोगों ने क्या किया और क्या नतीजा रहा इस बारे में विस्तार से जानकारी मुहैया करवाई जानी चाहिए । सूचना तो सामान्य सभा की बैठकों में लिए गए फैसलों और चर्चाओं की भी होनी चाहिए । लेकिन इसके लिए इस तरह के बैठकों में चर्चा करनी होगी । पिछले दिनों अकादमी की सामान्य सभा की एक बैठक गुवाहाटी में हुई थी । बताया जाता है कि वो बैठक बमुश्किल आधे घंटे चली । देशभर से चौबीस भाषाओं के प्रतिनिधियों के अलावा करीब सौ सवा सौ लोगों को वहां बुलाया गया और आधे घंटे में बैठक खत्म  । करदाताओं के लाखों रुपए फूंकने से हासिल क्या होता है इसपर विचार होना चाहिए । गतिविधियों को अगर बेवसाइट पर अपलोड किया जाए तो उसको रोका जा सकता है । 
दूसरी बात यह कि अकादमी में युवाओं का प्रतिनिधित्व नहीं के बराबर है । सामान्य सभा में युवाओं की भागीदारी बिल्कुल नहीं है । इस वक्त भारत विश्व के सबसे ज्यादा युवाओं वाला देश है । इस बात को ध्यान में रखते हुए सामान्य सभा में य़ुवा लेखकों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए अकादमी के संविधान में संशोधन किया जाना चाहिए ।  दरअसल अकादमी में काबिज चंद लोग इसको होने नहीं दे रहे । सदस्यों और अफसरशाहों का गठजोड़ अकादमी के लिए घातक सिद्ध हो रहा है । इस गठजोड़ को तोड़ने के लिए कदम उठाए जाने की आवश्यकता है । प्रगतिशील जमात कुछ नहीं पा रही है क्योंकि गड़बड़ियों की जनक वही है । इस वजह से ही अकादमी के अध्यक्ष सीना ठोंककर अपने एक साक्षात्कार में कहते हैं कि मेरे पास कहने को बहुत कुछ है । मैं जुबान खोलूंगा तो भूचाल आ जाएगा । तिवारी जी आप हिंदी भाषा से पहले अध्यक्ष हुए हैं, कृपया जुबान खोलकर पूर्व में हुई गड़बड़ियों को उजागर करिए । अगर आप ऐसा नहीं करते हैं तो ये मान लिया जाएगा कि आप भी उसी रास्ते पर चल रहे हैं ।