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Saturday, January 23, 2021

राजनीति का औजार बनते वेब सीरीज


वेब सीरीज ‘तांडव’ को लेकर पिछले दिनों खूब हंगामा हुआ। केस मुकदमा तक बात पहुंची। वेब सीरीज से जुड़े लोगों से पुलिस ने पूछताछ की। उनके बयान दर्ज हुए। पुलिस की पूछताछ के पहले हो रहे विरोध की वजह से निर्माताओं ने माफी भी मांगी। हर बार की तरह इस बार भी भावनाएं आहत होने की बात उठी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से लेकर कलात्मक स्वतंत्रता की बात भी की गई। इन तमाम विवादों और कोलाहल के बीच निर्माताओं ने वेब सीरीज में आपत्तिजनक प्रसंगों को हटाने की बात की और सूचना और प्रसारण मंत्रालय को उनके समर्थन और मार्गदर्शन के लिए धन्यवाद भी दिया। हो सकता है कि इस वेब सीरीज में से कुछ अंश हटा दिए गए हों। लेकिन ‘तांडव’ पर उठे विवाद से जो प्रश्न उठे हैं वो अभी अनुत्तरित हैं। इन प्रश्नों पर कलाकारों को और कला से जुड़े लोगों को खुले दिल से बहस करनी चाहिए। वेब सीरीज ‘तांडव’ में हिंदू धर्म के देवी देवताओं के चित्रण पर आपत्ति उठी थी। धर्मिक भावनाएं आहत होने की बात की गई। जिन अंशों पर आपत्ति की गई थी उनको हटाने और निर्माताओं के माफी मांग लेने से मामला ठंडा पड़ता जा रहा है लेकिन इस औसत कहानी वाली वेब सीरीज में जिस तरह से खुले आम राजनीतिक टिप्पणियां की गईं हैं वो भावनाओं को आहत करने से अधिक गंभीर सवाल उठाते हैं। इसके आरंभिक एपिसोड में जो कुछ संवाद हैं या दृश्यों से जो कहने की कोशिश की गई है वो ये है कि ‘मुसलमानों को चिन्हित कर मारा’। सलीम और अयूब के संदर्भ में जो संवाद हैं उसमें एक वाक्य है, ‘हमलोगों को मारना बहुत आसान होता है। मेरा नाम भी किसी आतंकवादी संगठन से जोड़ देंगे’। इस तरह के संवाद बेहद गंभीर निहितार्थ लिए हुए होते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि इस तरह के संवादों के जरिए देश की एक बड़ी आबादी को भड़काने का उपक्रम किया गया है। इस वेब सीरीज पर तो राजद्रोह का केस दर्ज किया जाना चाहिए। भारतीय दंड संहिता की धारा 124(ए) के अनुसार ‘जब कोई व्यक्ति लिखित में या संकेतों में या प्रत्यक्ष प्रस्तुतिकरण या किसी अन्य विधि से भारत सरकार के प्रति घृणा या अवमान पैदा करने का प्रयास करता है तो वो राजद्रोह करता है।‘ 

वेब सीरीज तांडव के जिस संवाद का जिक्र ऊपर किया गया है उससे साफ तौर पर भारत सरकार के खिलाफ घृणा पैदा करने की कोशिश नजर आती है। व्यवस्था के खिलाफ एक पूरे समुदाय को भड़काने की कोशिश भी नजर आती है। किसी समस्या की ओर ध्यान दिलाना और किसी समस्या को लेकर जजमेंटल होना दोनों अलग अलग बात हैं। ‘तांडव’ में ही ऐसा हुआ है ये भी नहीं है, इसके पहले के वेब सीरीज में भी और उसके पहले की कुछ फिल्मों में भी इस तरह के संवाद और दृश्य रखे हैं जो मुसलमानों के मन में भारत सरकार के खिलाफ घृणा के बीज बोने जैसे हैं। इसके पहले एक सीरीज आई थी जिसका नाम है ‘पाताल लोक’ । उस सीरीज में भी मुसलमानों को लेकर इसी तरह की बातें की गई थीं। उस सीरीज में पुलिसवालों के बीच की आपसी बातचीत में मुसलमानों के लिए जिस तरह के विश्लेषण गढ़े गए थे वो भी प्रत्यक्ष रूप से पुलिस और परोक्ष रूप से भारत सरकार के खिलाफ घृणा पैदा करने जैसा था। सीबीआई तक को मुसलमानों के खिलाफ चित्रित किया गया था। सिर्फ संवादों में ही नहीं बल्कि काल्पनिकता की आड़ में भी दृश्यों को इस तरह से चित्रित किया गया था कि इस नैरेटिव को मजबूती मिले कि सरकार मुसलमानों के खिलाफ है। इसके पहले ‘सेक्रेड गेम्स’ में भी दिखाया गया था कि कैसे पुलिस निर्दोष मुस्लिम लड़के को फर्जी मुठभेड़ में मार गिराती है। इसके बाद संवाद के जरिए राजनीतिक बयान दिया जाता है और कहा जाता है कि उस मुस्लिम लड़के का परिवार धरने पर बैठा है और सिस्टम से उसकी सुध लेनेवाला कोई नहीं है। इसी वेब सीरीज में बाबरी विध्वंस के फुटेज लंबे समय तक दिखाकर बैकग्राउंड से राजनीतिक टिप्पणियां आती रहती हैं। इसके पहले एक फिल्म आई थी ‘मुक्काबाज’, उसमें बगैर किसी संदर्भ के एक संवाद है कि ‘वो आएंगे तुमको मारेंगे और भारत माता की जय कहकर चले जाएंगे’। मंशा स्पष्ट है। किसी चरित्र को पहले की फिल्मों में भी सांप्रदायिक दिखाया जाता रहा है लेकिन पूरे सिस्टम को एक ही रंग में रंगने का प्रयास इन दिनों ज्यादा दिखाई देता है। खासतौर पर वेब सीरीज में। 

वेब सीरीज में इस तरह के प्रसंगों या दृष्यों को देखने के बाद साफ तौर पर एक पैटर्न नजर आता है जिसमें कि सीरीज के निर्माता मनोरंजन के इस माध्यम का उपयोग किसी खास विचारधारा को पुष्ट करने और किसी विचारधारा को बदनाम करने के लिए करते हैं। इस पहलू पर भी विचार किया जाना चाहिए कि इन वेब सीरीज के निर्माता हिंदू धर्म प्रतीकों को अपमानित क्यों करते हैं? अगर मुसलमानों को लेकर की गई टिप्पणियों और हिंदू धर्म प्रतीकों के अपमान के चित्रण को जोड़कर देखेंगे तो तस्वीर साफ नजर आती है। ये तस्वीर है राजनीति की, ये तस्वीर है इन वेब सीरीज के राजनीति का औजार बन जाने की। एक तरफ मुसलमानों के मन में मौजूदा सरकार के खिलाफ, उसकी संस्थाओं के खिलाफ जहर भरने का काम कर रहे हैं और दूसरी तरफ आप हिंदुओं के धार्मिक प्रतीकों का अपमान कर रहे हैं। जब आप हिंदू धर्म प्रतीकों का अपमान करते हैं तो मंशा ये हो सकती है कि आप एक समुदाय विशेष के मन में अपनी साख जमाना चाह रहे हों। ये तब और सही प्रतीत होता है जब इन वेब सीरीज को बनानेवाला एक निर्माता शाहीन बाग पहुंचता है और आंदोलन के दौरान मंच पर खढ़े होकर बिरयानी खाते हुए अपनी तस्वीरें खिंचवाता है। ये बहुत ही खतरनाक प्रवृत्ति की  का संकेत है। इस प्रवृत्ति के लिए ये वेब सीरीज इस वजह से भी सुविधाजनक है क्योंकि वीडियो स्ट्रीमिंग साइट्स के लिए या ओवर द टॉप प्लेटफॉर्म को लेकर हमारे देश में किसी प्रकार की कोई आचार संहिता नहीं है। 

देश में पिछले दो लोकसभा चुनाव के नतीजों में भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा को बहुमत की स्वीकृति मिली। वामपंथी विचारधारा या उसकी तरफ झुकी हुई विचारधारा को जनता ने नकार दिया। लगातार दो नकार से वामपंथ के अनुयायी बौखला भी गए हैं और कुंठित भी होते नजर आ रहे हैं। अब जब उनको जनता के मध्य जाकर अपनी लोकप्रियता वापस प्राप्त करने का कोई रास्ता नहीं मिल पा रहा है तो उन्होंने मनोरंजन के इस अराजक माध्यम को अपनी राजनीति का औजार बनाया है। यह अनायास नहीं है कि ‘तांडव’ जैसी घटिया स्टोरी को बड़े कलाकार और बड़ा प्लेटफॉर्म मिलता है। ये एक ऐसी कहानी है जिसमें न तो निरंतरता है न ही रोचकता और न ही कहानी लेखक को भारतीय राजनीति की समझ। इस कहानी में सिर्फ एजेंडा भरा गया है और अखबारों से उठाकर घटनाओं का भोंडा कोलाज बनाने का प्रयास किया गया है। इस कहानी पर तो कायदे से चोरी का केस भी दर्ज होना चाहिए। ब्राहमण प्रोफेसर और उसके दलित प्रेमी के बीच का जो संवाद है वो हिंदी के कहानीकार उदय प्रकाश की कहानी ‘पीली छतरीवाली लड़की’ से जस का तस उठा लिया गया है। अब समय आ गया है कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय और केंद्र सरकार इस बात को समझे कि इन वेब सीरीज के बहाने राजनीति हो रही है। ये वेब सीरीज राजनीति के औजार से राजनीति का हथियार बनें उसके पहले ही एक सम्यक और व्यापक आचार संहिता बने जो इन सब बातों का ख्याल रख सके।   


Saturday, May 23, 2020

पाताल लोक में पक्षपात का समुच्चय

वेब सीरीज की स्वच्छंद दुनिया में एक नए सीरियल का पदार्पण हुआ है नाम है पाताल लोक। ये वेब सीरीज जिस प्लेटफॉर्म पर दिखाए जाते हैं वो प्लेटफॉर्म ही स्वच्छंद हैं तो जाहिर ही बात है इन वेब सीरीज में स्वच्छंदता होगी ही। जब कहीं से किसी प्रकार का बंधन नहीं होता और किसी प्रकार का कोई उत्तरदायित्व नहीं होता तो बहुधा ये स्वच्छंदता अराजकता में बदल जाती है। वेब सीरीज की दुनिया को देखने के बाद ये लग रहा है कि ये दुनिया स्वच्छंदता से स्वायत्ता की ओर न बढ़कर स्वच्छंदता से अकाजकता की ओर बढ़ने के लिए व्यग्र है। वेब सीरीज पर दिखाए जानेवाले कंटेंट को लेकर कई बार चर्चा हो चुकी है। इस स्तंभ में ओवर द टॉप प्लेटफॉर्म (ओटीटी) पर दिखाए जाने वाले कई बेव सीरीज में दिखाए गए भयंकर हिंसा, जुगुप्साजनक यौनिक प्रसंग के अलावा समाज को बांटनेवाले कंटेंट को रेखांकित किया जा चुका है। अमेजन प्राइम पर वेब सीरीज पाताल लोक इन दिनों काफी चर्चित हो रहा है। इस वेब सीरीज की प्रोड्यूसर फिल्म अभिनेत्री अनुष्का शर्मा हैं और कहानी लिखी है सुदीप शर्मा और तीन अन्य लेखकों ने मिलकर। इस वेब सीरीज के कंटेंट पर बाद में आते हैं पहले बात कर लेते हैं कहानी की। इस वेब सीरीज की जो कहानी है वो पत्रकार तरुण तेजपाल के उपन्यास ‘द स्टोरी ऑफ माई एसेसिन्स’ पर बनाई गई प्रतीत होती है क्योंकि कहानी के प्लॉट से लेकर कुछ पात्रों के नाम और काम दोनों में समानता दिखाई देती है। अगर ऐसा है तो अबतक तरुण तेजपाल को इस वेब सीरीज पर अपनी साहित्यिक कृति की चोरी का आरोप लगा देना चाहिए था क्योंकु उनको कहीं क्रेडिट नहीं दिया गया है। साहित्यिक हलके में ऐसी चर्चा है कि तरुण तेजपाल की मर्जी से ऐसा हुआ है। सचाई या तो तरुण तेजपाल बता सकते हैं या फिर सुदीप शर्मा। एक स्टिंग ऑपरेशन के बाद तरुण तेजपाल की हत्या की साजिश की बात सामने आई थी और दिल्ली पुलिस की चार्जशीट में बिहार के एक बाहुबली राजनेता का नाम भी आया था। इस बात की पर्याप्त चर्चा हुई थी कि दुबई में बैठे एक माफिया डॉन ने तरुण तेजपाल की सुपारी दी थी। उस वक्त की चर्चा में दोनों चरित्र मुसलमान थे लेकिन अगर कहानी तरुण तेजपाल के उपन्यास से प्रेरित है तो वेब सीरीज में दोनों को बदल दिया गया है, न तो सुपारी लेनेवाला और न ही देनेवाला मुसलमान है। ये कलात्मक सृजनात्मक की कैसी स्वतंत्रता है इसपर देशव्यापी बहस की आवश्यकता है।  
अब जब पाताल लोक रिलीज हुई तो एक बार फिर से इन बातों की चर्चा शुरू हो जाना स्वाभाविक है। कहानी चाहे तरुण के उपन्यास की हो, उससे प्रेरित हो या फिर सुदीप ने खुद लिखी हो इतना तो तय है कि इस कहानी के पीछे मंशा उस नैरेटिव को मजबूती देने की है जिसमें भगवा झंडा लेकर चलनेवाले मॉब लिंचिंग करते हैं। अपराधी अपराध करने के बाद मंदिर में जाकर शरण लेते हैं, आदि आदि। ये कहानी एक टेलीविजन संपादक की असफल हत्या के प्रयास की कहानी और हत्यारों की गिरफ्तारी को लेकर शुरू होती है। कहानी दिल्ली की जमीन पर चलती है। जिस न्यूज चैनल संपादक की हत्या का प्लॉट दिखाया गया है वो बेहद लोकप्रिय है। न्यूज चैनल के संपादक का उसके सहकर्मी के साथ इश्क और शारीरिक संबंध दोनों दिखाए गए हैं। परोक्ष रूप से किसी लड़की की अपने देह का उपयोग कर अपने करियर में आगे बढ़ने की बात को बल देने की हद तक। यहां तो संपादक और उसकी सहयोगी के बीच चलनेवाले संबंध बेहद सहजता के साथ दिखा दिए गए हैं लेकिन तरुण तेजपाल की असल जिंदगी में तो उनपर उनके साथ काम करनेवाली एक लड़की ने बेहद गंभीर आरोप लगाए थे जिसके बाद वो गिरफ्तार भी हुए थे और जेल में लंबे समय तक रहना भी पड़ा था। पूरी कहानी में टेलीविजन चैनल को लेकर जो कहानी बुनी गई है वो बहुत हद तक कमजोर सी लगती है और ऐसा प्रतीत होता है कि लेखक और निर्देशक को न्यूज चैनलों के कामकाज करने के तरीके को लेकर और काम करने की जरूरत है। न्यूज रूम की वर्किंग भी वास्तविकता से थोड़ी दूर है। 
अब हम आते हैं पाताल लोक की उस कहानी पर या उन संवादों या दृष्यों पर जिसको लेकर ये धारणा बनती है कि इस वेब सीरीज का मकसद एक धर्म विशेष को बदनाम करना भी है। कला की सृजनात्मक अभिव्यक्ति के नाम पर समाज को बांटने की छूट न तो लेनी चाहिए और ना ही दी जानी चाहिए। अब इस वेब सीरीज में साफ तौर पर पुलिस और सीबीआई दोनों को मुसलमानों के प्रति पूर्वग्रह से ग्रसित दिखाया गया। थाने में मौजूद हिंदू पुलिसवालों के बीच की बातचीत में मुसलमानों को लेकर जिस तरह के विशेषणों का उपयोग किया जाता है उससे ये लगता है कि पुलिस फोर्स सांप्रदायिक है। इसी तरह से जब इस वेब सीरीज में न्यूज चैनल के संपादक की हत्या की साजिश की जांच दिल्ली पुलिस से लेकर सीबीआई को सौंपी जाती है, और जब सीबीआई इस केस को हल करने का दावा करने के लिए प्रेस कांफ्रेंस करती है तो वहां तक उसको मुसलमानों के खिलाफ ही दिखाया गया है। मुसलमान हैं तो आईएसआई से जुड़े होंगे, नाम में एम लगा है तो उसका मतलब मुसलमान ही होगा आदि आदि। संवाद में भी इस तरह के वाक्यों का ही प्रयोग किया गया है ताकि इस नेरेटिव को मजबूती मिल सके। और अंत में ऐसा होता ही है कि सीबीआई मुस्लिम संदिग्ध को पाकिस्तान से और आईएसआई से जोड़कर उसे अपराधी साबित कर देती है। कथा इस तरह से चलती है कि जांच में क्या होना है ये पहले से तय है, बस उसको फ्रेम करके जनता के सामने पेश कर देना है। अगर किसी चरित्र को सांप्रदायिक दिखाया जाता तो कोई आपत्ति नहीं होती, आपत्तिजनक होता है पूरे सिस्टम को सांप्रदायिक दिखाना जो समाज को बांटने के लिए उत्प्रेरक का काम करती है। बात यहीं तक नहीं रुकती है, इस वेब सीरीज में तमाम तरह के क्राइम को हिंदू धर्म के प्रतीकों से जोड़कर दिखाया गया है। 
ये पहला मौका नहीं है जब कोई वेब सीरीज इस तरह से हिंदू धर्म और प्रतीकों के खिलाफ माहौल बनाने में जुटा है। नेटफ्लिक्स पर एक वेब सीरीज आई थी लैला, ये सीरीज प्रयाग अकबर के उपन्यास पर आधारित थी। इसको देखने के बाद ये बात साफ तौर पर उभर कर आई थी कि ये हिंदुओं के धर्म और उनकी संस्कृति की कथित भयावहता को दिखाने के उद्देश्य से बनाई गई है। लैला का निर्देशन दीपा मेहता ने किया था। अभी चंद दिनों पहले दैनिक जागरण के एक कार्यक्रम में सूचना और प्रसारण मंत्री ने जोरदार तरीके से वेब सीरीज के स्वनियमन पर बल दिया था। ये तो सरकार का काम है जब चाहे करे लेकिन वेब सीरीज के माध्यम से खड़ा किए जा रहे फेक नैरेटिव का रचनात्मक प्रतिकार जरूरी है। समय और समाज का सही चित्रण करें और यहां इस काम में सरकार पहल कर सकती हैं। उनके पास नेशनल फिल्म डेवलपमेंट कॉरपोरेशन है। उसका उपयोग किया जा सकता है। अगर ‘पाताल लोक’ या ‘लैला’ के माध्यम से हिंदू धर्म का काल्पनिक चित्रण हो रहा है तो किसी और वेब सीरीज के माध्यम से उसका यथार्थ चित्रण भी होना चाहिए जिसमें महिमामंडन की बजाए उन सकारात्मक पक्षों की बात हो जो लोक-कल्याणकारी है।