Translate

Showing posts with label .नोबेल पुरस्कार. Show all posts
Showing posts with label .नोबेल पुरस्कार. Show all posts

Saturday, November 15, 2025

जड़ों की ओर लौटता हिंदी लेखन


पिछले दिनों जब बुकर पुरस्कार की घोषणा हुई तो लेखक प्रभात रंजन ने फेसबुक पर एक टिप्पणी लिखी, देर रात बुक प्राइज की घोषणा हुई और इस बार ये पुरस्कार DAVID SZALAY के उपन्यास फ्लेश को मिला। वो कनाडा मूल के लेखक हैं। सबसे पहले उनके नाम का उच्चारण ढूंढा – वह है डेविड सोलले । अमेजन पर इनका उपन्यास खरीदा। सबसे सस्ता किंडल संस्करण मिला, 704 रु में।... एक बात समझ में आई कि इस बार शार्टलिस्ट में एक से अधिक उपन्यास ऐसे थे जिनमें अकेलापन, बेमेल दुनिया की बातें थीं। यह भी कुछ उसी तरह का उपन्यास है। अलग अलग भाषाओं में इस तरह की कहानियां और उपन्यास बहुत लिखे जा रहे हैं। प्रभात रंजन की इस टिप्पणी को पढ़ने के बाद ध्यान वैश्विक लेखन की ओर चला गया। कुछ दिनों पहले साहित्य के नोबेल पुरस्कार की घोषणा हुई थी। नोबेल पुरस्कार से सम्मानित लेखक लास्जलो क्रास्जनाहोरकाई के लेखन में भी अकेलापन और निराशा कई बार प्रकट होता है। पहले के लेखक भी इस तरह का लेखन करते रहे हैं। पश्चिमी देशों के अलावा जापान और कोरिया के कई लेखकों के उपन्यासों और कहानियों में भी अकेलापन और उसका दंश, उससे उपजी निराशा और फिर समाज पर उसका प्रभाव दिखाई पड़ता है। जापान के विश्व प्रसिद्ध लेखक हारुकी मुराकामी के उपन्यासों में भी अकेलापन प्रमुखता से आता है। जापान के समाज में अकेलापन एक बड़ी समस्या है तो जाहिर सी बात है कि वहां के लेखकों पर इस समस्या का प्रभाव होगा। उनकी कहानियों के पश्चिमी देशों में लाखों पाठक हैं। क्या कारण है कि पश्चिमी दुनिया में उनके अपने लेखकों और अन्य देशों के लेखकों की वो रचनाएं लोकप्रिय होती हैं जिसका विषय अकेलापन और अवसाद होता है। मुराकामी मूल रूप से जापानी में लिखते हैं। अमेरिका में रहते हैं। विश्व की कई अन्य भाषाओं में उनकी कृतियों का अनुवाद होता है। अनूदित पुस्तकें लाखों की संख्या में बिकती हैं। क्या पश्चिमी देश के पाठक अकेलेपन की इस समस्या से स्वयं को जोड़ते हैं इसलिए उनको इस तरह का लेखन पसंद आता है ? इसका एक पहलू ये भी है कि नोबेल विजेता से लेकर बुकर से पुरस्कृत कई लेखक अध्यात्म और भारत की चर्चा करते हैं।  

बुकर पुरस्कार की घोषणा के पहले दैनिक जागरण हिंदी बेस्टसेलर की जुलाई सितंबर 2025 की तिमाही की सूची प्रकाशित हुई। ये सूची हिंदी में सबसे अधिक बिकनेवाली पुस्तकों के आधार पर विश्व प्रसिद्ध एजेंसी नीलसन तैयार करती है। इस सूची में कथा, कथेतर, अनुवाद और कविता की पुस्तकें होती हैं। इसमें जो पुस्तकें आई हैं उसकी अनुवाद श्रेणी पर नजर डालते हैं, द हिडन हिंदू (सभी खंड), महागाथा, पुराणों से 100 कहानियां, नागा वारियर्स दो खंड, शौर्य गाथाएं, संसार, देवताओं की घाटी में प्रवेश। इनको देखने पर ये प्रतीत होता है कि भारत में हिंदी के पाठक धर्म और अध्यात्म से जुड़ी कथाएं पढ़ने में रुचि ले रहे हैं। पाठकों को वर्गीकरण करना आसान नहीं है कि किस आयुवर्ग के कितने पाठक हैं और वो कौन सी पुस्तकें पसंद कर रहे हैं। लेकिन सूची को देखने से एक बात तो स्पष्ट होती है कि हिंदी में उन विषयों पर लिखी पुस्तकें खूब बिक रही हैं जहां धर्म है, अध्यात्म है और जहां मन की शांति की बातें है। पश्चिम के पाठक अकेलेपन, अवसाद और निराशा की कहानियां पढ़ रहें हैं वहीं हिंदी के पाठक उससे बिल्कुल अलग धर्म और अध्यात्म से जुड़ी कहानियों या पुस्तकों में रुचि दिखा रहे हैं। इसके पीछे क्या कारण हो सकते हैं इसपर विचार करने की आवश्यकता है। क्या पश्चिम के समाज में और भारतीय समाज में जो मूलभूत अंतर है वो इसका कारण है या जो पारिवारिक संस्कार भारत में पीढ़ियों से चले आ रहे हैं वो वजह है? 

अगर हम विचार करते हैं तो पाते हैं कि पश्चिम के समाज में जो संस्कार हैं वो भारतीय संस्कारों से अलग है। हमारे यहां जिस प्रकार के सामाजिक मूल्य, नैतिकता और मर्यादा की स्थापना की बात होती है वैसी बातें पाश्चात्य समाज में नहीं होती है। हमारे समाज में विवाह से संतान प्राप्ति की बात होती है, विवाह संस्कार के बाद सात जन्मों के रिश्ते की बात है। विवाहोपरांत संतानोत्पत्ति की महत्ता स्थापित है और उसको मोक्ष से जोड़ा जाता रहा है। पश्चिमी देशों में सात जन्मों के रिश्ते की बात तो दूर वहां एक ही जन्म में सात रिश्ते की बातें होती हैं। वहां मोक्ष आदि की अवधारणा नहीं है इस कारण संतानोत्पत्ति को एक जैविक क्रिया तक ही सीमित रखा जाता है। पश्चिम के लेखन में मानसिक अवसाद एक कला के तौर पर रेखांकित की जाती रही है जिसमें मानवीय संवेदना और सकारात्मकता अनुपस्थित होता है। पश्चिम के नाटकों में ट्रेजडी महत्वपूर्ण है। जबकि हमारे यहां का नाट्यशास्त्र फल-प्राप्ति पर आधारित है। कोई भी काम किया जाता है तो उसके पीछे के संदेश और समाज या मानव के बेहतरी का भाव रहता है। ज्ञान के प्रकार के बारे में श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 18 के श्लोक 20, 21 और 22 में बताया गया है। कहा गया है कि जिस ज्ञान से मनुष्य पृथक -पृथक सब भूतों में एक अविनाशी परमात्मा भाव को विभाग रहित समभाव से देखता है, उस ज्ञान को सात्विक ज्ञान कहते हैं। अगले श्लोक में बताया गया है कि जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य संपूर्ण भूतों में भिन्न-भिन्न प्रकार के नाना भावों को अलग-अलग जानता है, उस ज्ञान को राजस ज्ञान कहा गया है। ज्ञान के अंतिम प्रकार के बारे में गीता में कहा गया है कि जो ज्ञान एक कार्यरूप शरीर में ही संपूर्ण के सदृश आसक्त है तथा जो बिना युक्तिवाला तात्विक अर्थ से रहित और तुच्छ है उसको तामस कहा गया है। गीता के इन तीन श्लोकों के ज्ञान के प्रकार को विश्लेषित करते हैं तो ये स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय लेखन क्यों और किस कारण से पश्चिमी लेखन से अलग है। समभाव की बात को रेखांकित किया जाना चाहिए। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के संदर्भ में जिस भारतीय ज्ञान परंपरा की बात होती है उसके सूत्र भी गीता के इन श्लोकों में देखे जा सकता हैं। 

हिंदी में भी निर्मल वर्मा, कृष्ण बदलदेव वैद्य, स्वदेश दीपक जैसे कुछ लेखकों ने अकेलेपन और अवसाद को विषय बनाकर लिखा है लेकिन माना गया कि पाश्चात्य प्रभाव में ऐसा किया गया। वामपंथ के प्रभाव या दबाव में जो लेखन हुआ वो अति यथार्थवाद का शिकार होकर लोक से दूर होता चला गया क्योंकि उसमें विद्रोह तो था पर अविनाशी परमात्मा को विभाग रहित समभाव से देखने की युक्ति नहीं थी। स्वाधीनता पूर्व का अधिकतर हिंदी लेखन रचनात्मकता समभाव की जमीन पर खड़ी नजर आती है। हिंदी साहित्य में जितना पीछे जाएंगे ये भाव उतना ही प्रबल रूप में दिखता है। यह अकारण नहीं है कि साठोत्तरी कविता और कहानी ने इस भाव से दूर जाकर नई पहचान बनाने की कोशिश की। जब इस तरह का लेखन फार्मूलाबद्ध हो गया तो पाठक इससे दूर होने लगे। आवश्यकता इस बात की है कि हिंदी लेखन अपनी जड़ों की ओर लौटे, संकेत मिल रहे हैं लेकिन इसको प्रमुख स्वर बनाना होगा। 


Sunday, October 12, 2014

मोदियानो को साहित्य का नोबेल

‘मैं पेरिस के बाजार में टहल रहा था जब मेरी बेटी ने फोन पर मुझे सूचना दी कि स्वीडिश अकादमी ने साहित्य के लिए इस साल के नोबेल पुरस्कार से मुझे सम्मानित करने का फैसला लिया है । मैंने कभी नहीं सोचा था कि साहित्य का नोबेल पुरस्कार मुझे मिलेगा । इस फैसले की जानकारी मिलते ही मैं भावुक हो गया । मैं बेहद खुश हुआ, खुशी इस बात को लेकर और बढ़ गई कि मेरा नाती भी स्वीडिश है और उसी के देश से यह पुरस्कार आया है । मैं यह पुरस्कार उसको समर्पित करता हूं ।‘ ये बातें पैट्रिक मोदियानो ने नोबेले पुरस्कार की जानकारी मिलने के बाद नोबेल मीडिया को दिए अपने पहले इंटरव्यू में कही थी । पैट्रिक मोदियानो ने यह सही कहा कि उन्हें इस बात की उम्मीद नहीं थी कि इस साल का साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार उनको मिलेगा, उम्मीद तो पूरे साहित्य जगत को भी नहीं थी । इतना अवश्य था सट्टा बाजार में पैट्रिक मोडियानो का भाव लगातार बढ़ते जा रहा था । महीने भर पहले पैट्रिक मोदियानो पर एक के मुकाबले सौ का भाव लग रहा था जो कि पिछले हफ्ते तक आते आते एक के मुकाबले दस तक पहुंच गया था । इसकी वजह उनका भी है । उनके लेखन से वैश्विक पाठकों का परिचय बेहद कम है । उनकी ज्यादातर रचनाएं फ्रेंच में हैं । फ्रांस के बाहर मोदियानो को बेहद कम लोग जानते हैं । साहित्य के लिए जब नोबेल पुरस्कार फ्रांस के लेखक पैट्रिक मोदियानो को देने का एलान किया गया तो नोबेल पुरस्कार देनेवाली संस्था तक उनसे संपर्क कायम करने में नाकाम रही थी और उनकी बेटी को इसकी सूचना दी गई थी। स्वीडिश अकादमी के सचिव पीटर इंगलैंड ने जब पैट्रिक मोदियानो के नाम का एलान किया तो उन्होंने भी ये माना कि ‘हलांकि पैट्रिक मोदियानो की बाल साहित्य समेत करीब बीस किताबें प्रकाशित हैं,जिनमें से कई तो अनुदित हैं । फ्रांस में वो एक जाना-माना नाम हैं जबकि अन्य जगह पर उनकी कोई खास पहचान नहीं है ।‘ यह भी तथ्य है कि फ्रांस में पैट्रिक मोदियानो काफी लोकप्रिय हैं । तकरीबन हर दो साल पर उनकी कोई ना कोई कृति आती रहती है । उनके उपन्यासों का फ्रेंच पाठक बेसब्री से इंतजार करते हैं । पैट्रिक मोदियानो की इसी पहचान की वजह से वो इस बार नोबेल की रेस में नहीं थे । इस बार इस बात के कयास लगाए जा रहे थे कि साहित्य का नोबेल पुरस्कार अमेरिका के लेखक फिलिप रॉथ को मिलेगा । पूरी अमेरिका मीडिया इस बात को लेकर बेहद उत्साहित थी और अमेरिका के एक अखबार के मुताबिक फिलिप रॉथ के बारे में एक किस्सा काफी मशहूर है । किस तरह से नोबेल पुरस्कार के एलान के पहले वो अपने लिटरेरी एजेंट के न्यूयॉर्क दफ्तर पहुंचते हैं और वहां बैठकर स्वीडिश अकादमी के फोन कॉल का इंतजार करते है । इतना ही नहीं पुरस्कार के एलान के बाद देनेवाले अपने वक्तव्य का मसौदा भी तैयार कर लेते हैं । तैयारी तो इस बात की भी हो जाती है कि पुरस्कार के एलान के बाद रॉथ किस कमरे में मीडिया के लोगों से मुखातिब होंगे । लिहाजा जब इस बार पुरस्कार रॉथ को ना देकर पैट्रिक मोदियानो को देने का एलान हुआ तो अमेरिकी मीडिया में काफी हो हल्ला मचा । रॉथ को अमेरिकी मीडिया ने ‘बिगेस्ट लूजर ऑफ द ईयर’ का खिताब दे दिया । अमेरिकी आलोचकों ने इस बात को लेकर भी शोरगुल मचाया कि स्वीडिश अकादमी अमेरिका के लेखकों को लेकर पूर्वग्रह से ग्रस्त है । उन्नीस सौ एक से लेकर दो हजार चौदह तक दिए गए एक सै ग्यारह पुरस्कारों में से चौदह बार फ्रेंच साहित्यकार को ये पुरस्कार मिल चुका है ।

यह भी बिडंबना है कि जिस शख्स को साहित्य के लिए दो हजार चौदह का सबसे बड़ा सम्मान देने का फैसला हुआ है वह स्कूल ड्रॉप आउट है । दो हजार ग्यारह में मोदियानो ने माना था कि मेरे पास कोई डिग्री नहीं है, कोई निश्चित लक्ष्य नहीं है जिसको पाने का प्रयास करूं  । पर यह एक लेखक के लिए बेहद चुनौती और जोखिम भरा काम है कि वो अपने जीवन के बीसवें साल में लिखना शुरू कर दे । मोदियानो ने कहा था कि वो अपनी पुरानी कृतियों को नहीं पढ़ना चहाते हैं । यह इस वजह से नहीं कि मुझे अपनी रचनाएं पसंद नहीं है बल्कि इस वजह से कि मैं अपने उस दौर को याद नहीं करना चाहता हूं । यह उसी तरह से कि जैसे कोई बुढाता हुआ अभिनेता अपनी जवानी की फिल्मों को देखते हुए एक आंतरिक पीड़ा से गुजरता है । पैट्रिक मोदियानो इस तरह की बात इस वजह से करते हैं कि उनका अधिकांश लेखन संस्मरणात्मक है । दिव्तीय विश्वयुद्द के खत्म होने के करीब दो महीने बाद पैदा हुए पैट्रिक मोदियानो के लेखन का मूल स्वर नाजियों के कब्जे के दौरान फ्रांस के समाज पर पड़नेवाला प्रभाव रहता है । उनका जन्म द्वितीय विश्वयुद्द के बाद हुआ लेकिन उनके लेखन मे विश्वयुद्द के दौर की स्मृतियों की छाप किसी ना किसी रूप में मौजूद रहती है । पुरस्कार समिति ने पैट्रिक मोदियानो की प्रशस्ति में कहा कि उन्हें युद्ध से जुड़ी यादों और समाज और लोगों के मन पर पड़नेवाले प्रभावों को बेहतर ढंग से सामने रखने के लिए इस प्रतिष्ठित पुरस्कार के लिए चुना गया है । उनहत्तर साल के पैट्रिक मोदियानो का पहला उपन्यास तेईस साल की उम्र में छप गया था । उसके बाद उनके कई उपन्यास छपे और कुछ तो काफी मशहूर हुए । उन्नीस सौ अठहत्तर में फ्रेंच में छपा और उन्नीस सौ अस्सी में अंग्रेजी में अनुदित उनके उपन्यास “मिसिंग पर्सन’ ने खूब शोहरत बटोरी थी । इस उपन्यास का केंद्रीय पात्र एक जासूस है जो अपनी याददाश्त गंवा देता है । अपनी याददाश्त को वापस लाने के लिए प्रयत्न करता हुआ ये जासूस इतिहास में भी आवाजाही करता है । माना जाता है कि उनका यह उपन्यास उनकी श्रेष्ठ कृतियों में से एक है । इसके अलावा  ‘ट्रेस ऑफ मलाइस’ और ‘हनीमून’ उनकी दो और मशहूर किताबें हैं । उपन्यास और बाल साहित्य के अलावा मोदियानो की फिल्मों में भी गहरी रुचि रही है । उन्होंने कई फिल्मों की पटकथा भी लिखी । कान फिल्म फेस्टिवल की जूरी में भी वो रह चुके हैं । यहूदी इतावली मूल के पिता और बेल्जियन अभिनेत्री मां की संतान पैट्रिक इन दिनों पेरिस के एक उपनगर में रहते हैं और दो हफ्ते पहले ही उनकी नई कृति ‘सो दैट यू डोंट देट लॉस्ट इन द नेबरहुड’ प्रकाशित हुई है । माना जाता है कि यह उपन्यास आत्मकथात्मक है । आनेवाले दिनों में ये उम्मीद की जानी चाहिए कि भारत के पाठकों के लिए भी मोदियानो की किताबें उपलब्ध हो सकेंगी । 

Sunday, October 20, 2013

कहानी की प्रतिनिधि को नोबेल पुरस्कार

विश्व साहित्य खासकर अंग्रेजी साहित्य के इतिहास में दो हजार तेरह को महिला लेखन की सशक्त मौजूदगी को लेकर याद किया जाएगा । अमेरिका से लेकर इंगलैंड, कनाडा से लेकर न्यूजीलैंड तक में लेखिकाओं ने अपने लेखन को एक नया आयाम दिया, एक नई ऊंचाई दी और साथ ही एक नया अंदाज भी दिया । अमेरिका की रचेल कुशनर की ‘द फ्लेमथ्रोअर्स’ ने तो अपने कथ्य और विषय को लेकर पूरे साहित्य जगत को झकझोर दिया था । सत्तर के दशक में आतंक और कला को केंद्र में रखकर लिखे गए उपन्यास को इक्कीसवीं सदी का सर्वोत्तम उपन्यास करार दिया गया था । यह उपन्यास विषयकी नवीनता और उसके ट्रटमेंट को लेकर रोचक अवश्य है लेकिन किसी फैसले पर पहुंचने के पहले उसपर पर्याप्त मंथन होना चाहिए । हलांकि अमेरिका में भी हिंदी साहितय की तरह ही सर्वोत्तम और सदी का महानतम, सदी का सर्वेश्रेष्ठ करार देने की एक लंबी परंपरा है । पिछले साल जब जोनाथन फ्रेंजन का उपन्यास ‘फ्रीडम’ छपकर आया था तो उसे भी अमेरिकी आलोचकों ने सदी की महानतम कृतियों की श्रेणी में रखते हुए उसको लियो टॉलस्टाय के ‘वॉर एंड पीस’ के टक्कर का उपन्यास बताया था । खैर यह एक अवांतर प्रसंग है । अगर अमेरिका और ब्रिटेन से इतर अंग्रेजी में लिख रही एशियाई लेखिकाओं पर भी गौर करें तो इस निषकर्ष पर पहुंचते हैं कि उन्होंने भी अपने लेखन से अंग्रेजी साहित्य के आलोचकों का ध्यान खींचा । महिलाओं के इस गंभीर और लोकप्रिय लेखन को ना केवल सराहा गया बल्कि उसने हर तरह के पुरस्कार भी हासिल किए । यहां तक कि पुरस्कारों के लिए जो नामांकन हुए उसमें भी लेखिकाओं का ही कब्जा रहा । अगर हम मैन बुकर प्राइज के लिए नामांकित लेखकों पर नजर डालें तो यह तस्वीर और साफ होती है । छह में से चार लेखिकाएं- झुंपा लाहिरी की ‘द लव लैंड’, एलेनॉर काटन की ‘द ल्यूमिनरीज’, वॉयलेट बुलावॉयो की ‘वी नीड न्यू नेम्स’ रूथ ओजकी की ‘अ टेल फॉर द टाइम बीइंग’ इस सूची में थी । इस सूची के नामों को गिनाने का मकसद सिर्फ इतना है कि लेखिकाओं ने अपनी कृतियों के बूते पर दुनिया के प्रतिष्ठित पुरस्कारों में से एक मैन बुकर में प्रमुखता से अपनी जगह बनाई । इस सूची में से ही न्यूजीलैंड की मात्र अट्ठाइस साल की युवा लेखिका एलेनॉर काटन की ‘द ल्यूमिनरीज’ को मैन बुकर प्राइज से नवाजा गया । आठ सौ से ज्यादा पन्नों में लिखे गए इस उपन्यास ने अपने क्राफ्ट और रोमांच की वजह से सूची के बाकी लेखकों को पछाड़ा । मैन बुकर के अलावा के ग्रांटा के बेस्ट अंडर फोर्टी के बीस लेखकों की सूची में भी बारह लेखिकाओं ने जगह बनाई । उसी तरह से अमेरिका के नेशनल बुक फाउंडेशन के फाइव अंडर थर्टी फाइव की सूची में पहली बार पांचों लेखिकाएं ही रही । भारत समेत एशियाई देशों में भी अंग्रेजी लेखन में महिलाओं ने अपनी पहचान बनाने के साथ साथ अपनी प्रतिभा का लोहा भी मनवाया । चाहे वो जेनिस पेरियॉट हो, नीलांजना राय हो ।
अंग्रेजी लेखन में महिलाओं के इस दबदबे के बीच साहित्य के लिए इस वर्ष को नोबेल पुरस्कार कनाडा की बयासी साल की वयोवृद्ध लेखिका एलिस मुनरो को दिया गया । मुनरो को पुरस्कार मिलने के बाद अंग्रेजी में हो रहे महिला लेखन पर एक बार फिर से सबकी नजर चली गई । एलिस मुनरो लंबे लंबे उपन्यास नहीं लिखती हैं । वो मूलत कथाकार हैं जिन्हें अंग्रेजी में शॉर्ट स्टोरी राइटर कहते हैं । एलिस मुनरो कनाडा की पहली कथाकार हैं जिन्हें नोबेल पुरस्कार मिला है इसके पहले इसके पहले कनाडा मूल के साउल बेलो को उन्नीस सौ छिहत्तर में नोबेल पुरस्कार मिला था लेकिन वो बचपन में ही अमेरिका में जा बसे थे । नोबेल पुरस्कार के इतिहास में बहुत कम बार ही कथाकार को साहित्य के लिए पुरस्कृत किया गया है । यह मुनरो की कहानियों की ताकत ही है जिसने नोबेल पुरस्कार समिति के सदस्यों को उनको चुनने के लिए बाध्य कर दिया। अपनी बीमारी की वजह से खुद पुरस्कार लेने नहीं जा पाई एलिस मुनरो ने एक बयान जारी कर कहा कि उनको नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद कहानी एक विधा के तौर पर और मजबूत होगी । किसान परिवार में उन्नीस इकतीस में जन्मी एलिस मुनरो ने साठ के दशक के एकदम शुरुआत से लिखना शुरू किया था। मुनरो ने माना है कि जब उन्होंने लिखना शुरू किया तो कनाडा में बहुत कम लेखक थे और विश्व साहित्य में उनकी उपस्थिति लगभग नगण्य थी । उनके घर का माहौल साहित्यक था और उनके पिता की साहित्य में गहरी अभिरुचि थी । एलिस एनी लेडलॉ ने पहली कहानी – द डायमेन्शंस ऑफ शैडो – उन्नीस पचास में लिखी । तब वो पत्रकारिता की पढ़ाई कर रही थी । पत्रकारिता की पढ़ाई के दौरान ही अपने एक सहकर्मी जेम्स मुनरो से इश्क होता है और वो दोनों शादी रचा लेते हैं । शादी के बाद एलिस मुनरो के तीन बच्चे होते हैं और वो पूरी तरह से एक गृहिणी का दायित्व निभाने लगती है । एलिस मुनरो ने माना है कि उस दौर में वो अपने परिवार में मशगूल हो गई थी और नहीं लिख पाने की वजह से वो डिप्रेशन का भी शिकार हुई । पारिवारिक चक्रव्यूह में वो इतना उलझ गई कि उसने माना कि उससे एक शब्द नहीं लिखा जाने लगा । पारिवारिक उलझनों और जिम्मेदारियों में डूबी एलिस मुनरो के लिए उसकी किताब की दुकान वरदान साबित हुई । उन्नीस सौ अड़सठ में एलिस मुनरो ने अपने पति जेम्स के साथ मिलकर एक किताब की दुकान-मुनरो बुक्स – खोली, जो अब भी विक्टोरिया इलाके में मौजूद है  । उस दुकान के ग्राहकों से बात करते हुए एलिस मुनरो में फिर से लेखन की इच्छा जाग्रत होने लगी । नतीजा यह हुआ कि उन्नीस सौ अड़सठ में उनका पहला संग्रह- डांस ऑफ द हैप्पी शेड्स -प्रकाशित हुआ । इस दौर में एलिस मुनरो की कहानियां नियमित रूप से न्यूयॉर्कर समेत तमाम प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगी थी । पहले संग्रह के प्रकाशन से ही एलिस मुनरो को कनाडा में पहचान मिली और उस किताब पर ही उसको वहां का प्रतिष्ठित साहित्यक पुरस्कार- गवर्नर जनरल पुरस्कार – से नवाजा गया । मुनरो के उसके बाद कई कहानियां आईं और उसके बाद वो दो विश्वविद्यालयों में राइटर इन रेजिंडेंस भी रहीं । एलिस मुनरो की एक और लंबी कहानी है – द बीयर कम ओवर द माउंटेन । यह कहानी एक ऐसे महिला की है जो अपनी याददाश्त खोने लगती हैं और अपने पति की इस बात से सहमत होती है कि उसको अस्पताल में भर्ती हो जाना चाहिए । कहानी जैसे जैसे आगे बढ़ती है तो पता चलता है कि औरत का पति विवाहेत्तर संबध बनाता रहा है और उसे इसका अफसोस भी नहीं है । इन्हीं हालत के बीच अस्पताल में भर्ती उस औरत को एक शख्स से प्यार हो जाता है और वो उसमें सुकून तलाशने लगती है । मानवीय संबंधों के मनोविज्ञान का बेजोड़ चित्रण है । इस कहानी पर हिट फिल्म – अवे फ्रॉम हर- भी बनी ।
इनकी कहानियों में साठ के दशक में कनाडा और अमेरिका का उथल पुथल और उस दौर में वहां रहनेवाली लड़कियों के मनोविज्ञान का चित्रण है । एलिस मुनरो की किस्सागोई में यथार्थ और अनुभव को बेहतरीन सम्मिश्रण होता है जो उनकी कहानियों को पठनीय तो बनाता ही, पाठकों को एक नई तरह की अनुभूति से भी भर देता है । एलिस मुनरो की कहानियों में ग्रामीण जीवन और क्षेत्रीय परिवेश मुख्य रूप से उभर कर सामने आता है । मुनरो की कहानियों में कथानक से ज्यादा घटनाएं और स्थितियां उभर कर आती हैं और पाठकों को चौंकाती हैं । बहुधा एलिस मुनरो की तुलना महान कथाकार एंटन चेखव से भी की जाती है । अपनी कहानियों की वजह से एलिस मुनरो को समकालीन कथा साहित्य में इस विधा के प्रतिनिधि कथाकार का दर्जा हासिल है । मुनरो की अबतक दर्जनभर से जद्यादा कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं । अमेरिका और कनाडा में उनकी किताबें लाखों में बिकती हैं । नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद कई भाषाओं में उनकी रचनाओं का अनुवाद होगा और अन्य भाषा के फाठकों को उनकी रचनाओं से परितित होने का मौका मिलेगा । एलिस मुनरो को समझने के लिए दो हजार दो में छपी उनकी बेटी की किताब अहम है । उनकी बेटी साइला मुनरो ने – लाइव्सस ऑफ मदर्स एंड डॉटर्स. ग्रोइंग अप विद एलिस मुनरो लिखी है । इस किताब में उनकी बेटी ने मुनरो के संघर्ष और एक कहानीकार के बनने पर विस्तार से लिखा है । इस किताब को पढ़कर मुनरो की कहानियों के विषयों को समझने में मदद मिलती है । हमें यह उम्मीद की जानी चाहिए कि हिंदी का भी कोई प्रकाशक एलिस मुनरो की कहानियां छापने का उद्यम करेगा ताकि हिंदी के विशाल पाठक वर्ग को भी उनकी कहानियों से परिचित होने का मौका मिल सके ।


Saturday, January 5, 2013

अकादमी के लिए मंथन का वक्त


अभी हाल में कोलकाता में आयोजित साइंस कांग्रेस के अधिवेशन में देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने वैज्ञानिकों का आह्वान किया कि वो विज्ञान के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार जीतने के लिए काम करें । प्रधानमंत्री के उस बयान को देश के वैज्ञानिकों के लिए एक चुनौती और उत्साहवर्धन दोनों के तौर पर देखा जा रहा है । लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि सृजनात्मक लेखन के लिए भारत के लेखकों को नोबेल पुरस्कार के लिए ना तो कोई चुनौती देता है और ना ही उत्साहवर्धन करता है । गाहे बगाहे ये खबर छपती हैं कि साहित्य अकादमी ने अमुक साहित्यकार का नाम नोबेल पुरस्कार के लिए प्रस्तावित किया गया है । साहित्य अकादमी से निकलनेवाली उस खबर को इस तरह से प्रचारित किया जाता है कि अमुक साहित्यकार नोबेल पुरस्कार की रेस में है । लेकिन वो प्रचार वास्तविकता से कोसों कूर होती है । दरअसल नोबेल पुरस्कार के लिए कोई भी संगठन किसी का भी नाम प्रस्तावित कर सकता है । ठीक उसी तरह से जैसे भारत में पद्म पुरस्कारों के लिए कोई भी किसी का नाम प्रस्तावित कर सकता है ।
सवाल नोबेल पुरस्कार का नहीं है । यहां सवाल यह है कि भारत के, खासकर हिंदी के, लेखकों को अंतराष्ट्रीय पाठक वर्ग तक पहुंचाने के लिए हम कितना प्रयास कर रहे हैं । क्या हमारे लेखक, प्रकाशक, साहित्य अकादमी और राज्यों की अकादमियां इस दिशा में शिद्दत से प्रयास कर रही हैं । अगर हम इस सवाल का जवाब ढूंढने निकलते हैं तो हमें पूरे परिदृष्य में घुप्प अंधेरा नजर आता है । लेखक और प्रकाशक तो अपने तईं कोशिश करते हैं लेकिन जिस तरह से साहित्य अकादमी पर भारतीय भाषाओं के रचनात्मक लेखन को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी थी उसमें अकादमी बुरी तरह से विफल रही है । 12 मार्च 1954 को जब संसद के सेंट्रल हॉल में साहित्य अकादमी का उद्धघाटन हुआ था तो उस वक्त के उपराष्ट्रपति और विद्वान चिंतक एस राधाकृष्णन ने कहा था कि -साहित्य अकादमी ऐसे लोगों का समूह है जो सृजनात्मक और आलोचनात्नक लेखन में रुचि रखते हैं । उन्होंने आगे कहा था कि साहित्य अकादमी का उद्देश्य है कि वो सृजनात्मक लेखकों की पहचान करें और उन्हें प्रोत्साहित करे । इसके अलावा साहित्य अकादमी के अन्य उद्देश्यों में उन्होंने सृजनात्मक लेखन को बढ़ावा देने के कामों पर भी जोर दिया था । लेकिन लगभग अट्ठावन साल बाद यह सवाल जोरदजार तरीके से उठाया जाना चाहिए कि साहित्य अकादमी ने सृजनात्मक लेखन की पहचान करने और उसे आग बढ़ाने के लिए क्या किया । दरअसल साहित्य अकादमी में नब्बे के दशक के आखिरी सालों में राजनीति बुरी तरह से हावी हो गई । लेखकों के बीच की राजनीति का असर यह हुआ कि धीरे धीरे   साहित्य अकादमी सृजनात्मक लेखकों से दूर होकर विश्वविद्लाय के शिक्षकों के शिकंजे में चली गई । भारत के उन विश्वविद्लायों के शिक्षकों के कब्जे में जिन्हें राजेन्द्र यादव सृजनात्मक लेखन की कब्रगाह कहते हैं । साहित्य अकादमी के अपने उद्देश्यों के भटक जाने से सृजनात्मक लेखन का बड़ा नुकसान हुआ । साहित्य अकादमी के कार्यक्रमों पर नजर डालें तो पाते हैं कि लेखकों से मिलिए जैसे कार्यक्रमों के अलावा कोई खास कार्यक्रम नहीं होते । पर्दे के पीछे और कागजों पर अगर होते होंगे तो वो जनता को ज्ञात नहीं हैं ।
दरअसल अगर हम साहित्य अकादमी की सामान्य परिषद के सदस्यों पर नजर डालेंगे तो तस्वीर आईने की तरह से साफ हो जाएगी । साहित्य अकादमी का जब गठन हुआ था तो उसके सामान्य सभा के सदस्यों में एस राधाकृष्णन, अबुल कलाम अजाद, सी राजगोपालाचारी, के एम पाणिक्कर, ए एम मुंशी, वी एन मेनन, जाकिर हुसैन, हुमांयू कबीर, सुनीति कुमार चटर्जी, उमाशंकर जोशी, जैनेन्द्र कुमार, नीलमणि फूकन, हजारी प्रसाद द्विववेदी, एम वी आयंगर, महादेवी वर्मा, रामधारी सिंह दिनकर, बनारसी दास चतुर्वेदी जैसे उदभट विव्दान थे जो खुद भी बेहतरीन सृजनात्मक लेखन कर रहे थे । लेकिन कोई भी व्यक्ति साहित्य अकादमी की बेवसाइट पर जाकर वर्तमान सदस्यों की सूची देख सकता है । स्तरीयता और स्तरहीनता का पता खुद चल जाएगा । सृजनात्मक लेखन करनेवाले वहां बहुत कम हैं । साहित्य अकादमी की कार्यशैली एक अवांतर प्रसंग है जिसपर कभी बाद में विस्तार से चर्चा होगी लेकिन सवाल यगह उठता है कि मीडियॉकर लोगों से क्या हम ये अपेक्षा कर सकते हैं कि वो देश की सृजनात्मक प्रतिभा को नोबेल पुरस्कार दिलवाने जैसी योजना पर काम कर पाएंगे, उसके लिए कोई रणनीति बना पाएंगे । जबाव ना में ही मिलेगा । राज्यों की अकादमियों का हाल तो और भी बुरा है । राज्यों की भाषा और साहित्य की अकादमियां वहां की सरकारों के लिए प्रचार प्रसार के काम में जुड़ी हैं ।
अब बचते हैं प्रकाशक जिनसे उम्मीद की जा सकती है कि वो देश में सृजनात्मक लेखकीय प्रतिभा को सामने लाने का काम करेंगे । हाल के दिनों में हिंदी के कम से कम तीन प्रकाशकों ने इस दिशा में काम करना शुरू किया है जो संतोष देने के लिए तो काफी है । वाणी प्रकाशन, राजकमल प्रकाशन और प्रभात प्रकाशन ने हिंदी के लेखकों की किताबों को अंग्रेजी में छापना शुरू कर दिया है । इससे एक फायदा तो यह होगा कि हिंदी के लेखकों की कृतियां उस भाषा में उपलब्ध होंगी जो पूरे विश्व में एक संपर्क भाषा के तौर पर इस्तेमाल की जाती है । अभी हाल में वाणी प्रकाशन से राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कृति – कुरुक्षेत्र का अंग्रेजी में अनुवाद छपा है – द बैटल रॉयल – इस काम को अंजाम दिया है डॉक्टर सचिकांत और डॉक्टर रमन पी सिंह ने । अब अगर हम देखें तो दिनकर का ये प्रबंध काव्य कुरुक्षेत्र आज से तकरीबन छियासठ साल पहले 1946 में प्रकाशित हुआ था लेकिन उसके अनुवाद का काम छह दशक बाद हुआ । जिस वक्त दिनकर जी इस काव्य की रचना कर रहे थे वह वक्त युद्ध और उसके बाद की शांति का था । उनके काव्य में युद्ध और शांति समान रूप से चलते जाते हैं । उसमें वो अपने समय से पहले की बात भी करते हैं और उसे सार्वजनिक भी करते चलते हैं । दिनकर या यह प्रबंध काव्य अगर उस वक्त या बाद के दस बीस वर्षों में भी अंग्रेजी में अनुदित होकर दुनिया के पाठकों के बीच जाता तो विश्व के उस वक्त के माहौल में उक्त कृति का मूल्यांकन होता लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा हो नहीं सका । ऐसा नहीं है कि सिर्फ रामधारी सिंह दिनकर ही बेहतरीन कवि हैं, हिंदी में कई ऐसे कवि हुए हैं जिनकी कृतियां नोबेल पुरस्कार के योग्य हैं । क्या अज्ञेय और निर्मल वर्मा की कृतियां ओरहन पामुक या फिर फ्रेडरिक येलेनिक से कमजोर हैं । कतई नहीं । यहां सवाल यह है कि जिस तरह से ओरहन पामुक की कृतियां अग्रेजी समेत विश्व की अन्य भाषाओं में प्रकाशित हुई उससे उन कृतियों को एक विशाल पाठक वर्ग मिला और उसकी चर्चा कई देशों के अखबारों में हुई । नतीजा यह हुआ कि उनकी कृतियों के पक्ष में एक माहौल बना जो बाद में उनके नोबेल पुरस्कार का आधार बना । लेकिन हमारे यहां जिनके कंधों पर साहित्यक कृतियों के प्रचार प्रसार और पाठकों के बीच पहुंचाने की जिम्मेदारी है वो बेहद छोटे कामों में उलझे हैं । मैं कई ऐसे लेखकों को व्यक्तिगत तौर पर जानता हूं जिन्होंने साहित्य अकादमी को अहम पुस्तकों का अनुवाद कर दे दिया लेकिन पांच छह वर्षों बाद भी वहां यह बतानेवाला कोई नहीं है कि उन पुस्तकों का प्रकाशन कब होगा । दरअसल यहां भी एक भयंकर भूल है कि साहित्य अकादमी खुद से किताबों का प्रकाशन करेगा । यह काम प्रकाशकों के जिम्मे छोड़ देना चाहिए । होना यह चाहिए कि अकादमी पुस्तकों का अनुवाद करवाए और प्रकाशकों पर उसे छापने की जिम्मेदारी दे । अब वक्त आ गया है कि साहित्य अकादमी अपने क्रियाकलापों को बदले और उसका जो मूल उद्देश्य था उसके लिए काम करे और छोटे छोटे कामों में ना उलझे ।
इसके अलावा हिंदी के प्रकाशकों को अपनी भाषा के क्लासिक्स को ज्यादा से ज्यादा अंग्रेजी में अनुवाद करवाना चाहिए और अंतराष्ट्रीय पुस्तक मेलों में भागीदारी के दौरान उसको शोकेस करना चाहिए । इसमें लेखक की तो प्रतिष्ठा बढे़गी ही, नया पाछक वर्ग भी मिलेगा।  लेकिन अगर हमारे किसी लेखक को कोई अंतराष्ट्रीय पुरस्कार मिल गया तो किताब की भी जबरदस्त बिक्री होगी और अंतत: उनका लाभ प्रकाशकों को ही होगा । पश्चिम में इस तरह की प्रवृत्ति है आम है कि वहां पुरस्कृत कृतियों को पाठक हाथों हाथ लेते हैं । और कारोबार के नजरिए से भी इस तरह के काम करना प्रकाशकों के लिए फायदे का सौदा रहेगा । भारतीय लेखकों को अंतराष्ट्रीय मंच पर पहुंचाने में जहां साहित्य अकादमी विफल रही है वहां से प्रकाशकों की जिम्मेदारी शुरू होती है ।