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Sunday, April 17, 2016

सितारों के बायोपिक का दौर

जब फिल्म पान सिंह तोमर आई तो उसकी सफलता ने लोगों को चौंकाया था । कम लागत में बनी इस फिल्म को तारीफ तो मिली ही थी इसने जमकर मुनाफा भी कमाया था । पान सिंह तोमर भारतीय फौज में थे और उन्होंने उन्नीस सौ अट्ठावन के तोक्यो एशियन गेम्स में भारत का प्रतिनिधित्व किया था । इस बायोपिक को लोगों ने पसंद किया था क्योंकि इसमें एक फौजी के बागी बनने की कहानी थी । चंबल के रहनेवाले पान सिंह ने किस तरह से बंदूक उठाई उसको फिल्मकार ने दर्शकों के सामने परोसा था । इसके बाद तो हिंदी फिल्मों में बॉयोपिक का दौर चल पड़ा । दो हजार तेरह में ओलंपियन मिल्खा सिंह पर बनी फिल्म भाग मिल्खा भाग ने तो सफलता के तमाम रेकॉर्ड धवस्त करते हुए एक सौ नौ करोड़ का बिजनेस कर डाला । मिल्खा सिंह की जिंदगी भी पान सिंह तोमर की तरह ही नाटकीय है । उसमें सफल बॉलीवुड फिल्म के सारे तत्व मौजूद हैं । भारत विभाजन के बाद हुए दंगों में मिल्खा सिंह के माता-पिता की जान चली गई थी । उसके बाद वो दिल्ली आते हैं फिर सेना में शामिल होकर ओलंपिक गेम्स तक पहुंचते हैं । आज भी लोग मिल्खा सिंह को उड़न सिख कहते हैं तो उनके जेहन में उन्नीस सौ साठ का ओलंपिक आता है जब पलभर से मिल्खा सिंह पदक से चूक गए थे । चार सौ मीटर की उस रेस में मिल्खा सिंह आधी दूर तक सबसे आगे थे लेकिन उसके बाद वो पिछड़ गए थे । करीब पौने छियालीस सेकेंड का उनका रिकॉर्ड भारत में चार दशकों तक कायम रहा था और कोई भी धावक उसको पार नहीं कर पाया था । एक तो भारत विभाजन का वक्त, दूसरे एक परिवार के तहस नहस होने के बाद उसके सदस्य का उठ खड़ा होना लोगों को भा गया ।  इसी तरह से पिछले दिनों बॉक्सर मैरी कॉम पर प्रियंका चोपड़ा अभिनीत बॉयोपिक मैरी कॉम आई थी । प्रियंका चोपड़ा के शानदार अभिनय और उत्तर पूर्व के राज्य मणिपुर के एक छोटे से कस्बे से निकलकर मैरी कॉम पांच बार एमैच्योर बॉक्सिंग की विश्व चैंपियन रहीं । मैरी कॉम ने ना केवल इचियोन एशिएयन गेम्स में स्वर्ण पदक जीता था बल्कि ओलंपिक में भी अपने मुक्के का कमाल दिखाया था । उस वक्त मैरी कॉम पूरे देश में नायिका की तरह उभरी थीं । मैरी कॉम पर बनी फिल्म भी हिट रही थी और इंडस्ट्री के अनुमान के मुताबिक उसने बासठ करोड़ का बिजनेस किया था । दरअसल होता यह है कि स्पोर्ट्स के सितारों के जीवन पर फिल्म बनाने के लिए  बॉलीवुड के फिल्मकार और निर्देशक ज्यादा उत्साहित रहते हैं । उस उत्साह की कई वजहें हैं लेकिन सबसे बड़ी वजह है तैयार बाजार मिलता है । इस तैयार बाजार का फायदा यह होता है कि यहां मुनाफे की गुंजाइश ज्यादा रहती है । तैयार बाजार को भुनाने के लिए फिल्मकार उन खिलाड़ियों की जिंदगी की ओर आकर्षित होते हैं जिनके साथ किंवदंतियां, किस्से कहानियां जुड़े हों और लोग उसके बारे में जानने के लिए उत्सुक हों । इसके अलावा भारतीय दर्शक कुछ अलग देखने की चाहत भी रखते हैं । अपने नायक को रूपहले पर्दे पर देखने की उनकी ख्वाहिश भी उनको सिनेमा हॉल तक खींच सलाती हैं । इसके अलावा अपने नायक के जीत को वभारत का दर्शक बार-बार देखना चाहता है । अगर फिलमकार दर्शकों के इस मनोविज्ञान को पकड़कर ठीक से उसको फिल्मा देता है तो फिल्म के सफलता की गारंटी रहती है । इसके अलावा एक और वजह होती है खिलाड़ियों की लोकप्रियता को भुनाने की, लेकिन यहां एक पेंच भी होता है । वो पेंच है लोकप्रियता के साथ या तो संघर्ष हो या फिर कोई लंबे समय तक चला विवाद । इसका फायदा यह होता है कि फिल्मकारों को और निर्देशकों को अपनी रचनात्मकता और कल्पनाशीलता को दिखाने के लिए खुले आकाश जैसा विस्तार  मिलता है जहां वो खुल कर खेल सकते हैं ।
अब अगर देखें तो इस वक्त तीन क्रिकटरों के अलावा एक गणितज्ञ और एक पहलवान पर बायोपिक आने वाली है । पहली फिल्म आ रही है टीम इंडिया के पूर्व कप्तान मोहम्मद अजहरुद्दीन पर । फिल्म का नाम है अजहर । इस फिल्म में अजहरुद्दीन की भूमिका निभा रहे हैं इमरान हाशमी और ये तेरह मई को रिलीज होगी । अब अगर हम अजहरुद्दीन की जिंदगी पर नजर डालते हैं तो ये एक फिल्म की परफेक्ट स्क्रिप्ट की तरह नजर आती है । अजहर की जिंदगी जहां एक सितारे की बनने की दास्तां है, उसके बाद उसके बॉलीवुड की एक नायिका के साथ प्रेम है, विवाह है और फिर है अलगाव । कहानी इतने पर ही नहीं रुकती है । भारतीय क्रिकेट का ये सितारा मैच फिक्सिंग के जाल में भी फंसता है । मैच फिक्सिंग की फांस में घिरे इस क्रिकेट कप्तान पर आजीवन प्रतिबंध लगाया जाता है फिर लंबी कानूनी लड़ाई के बाद उसको हाईकोर्ट से मामूली राहत मिलती है । इस बीच वो शख्स राजनीति में आता है और सांसद बन जाता है । पारिवारिक जिंदगी में भी दर्द का सामना करना पड़ता है । इस बीच एक अन्य बैडमिंटन खिलाड़ी से उसके रोमांस की खबरें आम होती है हलांकि वो प्यार परवान नहीं चढ़ सकता है । तो जहां जिंदगी में इतना मसाला हो वहां बॉलीवुड की नजर ना जाए, संभव ही नहीं है । अजहर के बाद दूसरी फिल्म आ रही है टीम इंडिया के कैप्टन कूल महेन्द्र सिंह धौनी पर । इस फिल्म का नाम है – एम एस धोनी, द अनटोल्ड स्टोरी और ये सितंबर के पहले सप्ताह में रिलीज होने को तैयार है । इस फिल्म में धोनी के किरदार को निभाया है अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत ने । अब धौनी की जिंदगी में सफलता के शिखर पर पहुंचने के बाद के साथ साथ उनकी कहानी लगातार किंवदंती बनती जा रही है । कई बार ये किस्सा सामने आया है कि किस तरह से धौनी अपना एक क्रिकेट मैच खेलने के लिए रांची से पूर्वोत्तर के किसी राज्य में पहुंचे थे । इसके अलावा रेलवे के टिकट चैकर की नौकरी से अरबपति होने की दास्तां अपने आप में दिलचस्प है । इसी तरह से आमिर खान की फिल्म दंगल भी हरियाणा के मशहूर पहलवान महावीर सिंह फोगट की जिंदगी पर आधारिक हैं । यहां भी इस चरित्र के साथ किंवदंतियां जुड़ी हुई हैं ।

बॉलीवुड की नजर अजहर और धोनी पर तो जाती है लेकिन उनकी नजर सचिन तेंदुलकर या फिर सुनील गावस्कर पर नहीं जाती है । ये दोनों क्रिकेटर महानतम खिलाड़ियों में से एक हैं लेकिन इनके संघर्ष में मसाला नहीं लिहाजा इनपर बॉलीवुड की नजर नहीं गई । सचिन तेंदुलकर पर फिल्म आ रही है जो बना रहे हैं हॉलीवुड के जेम्स इर्सकिन सचिन पर फिल्म बना रहे है जिसका नाम है सचिन-अ बिलियन ड्रीम्स । इस फिल्म का एक पोस्टर भी हाल ही में रिलीज किया गया है । फिल्म के पोस्टर के रिलीज के मौके पर सचिन तेंदुलकर ने कहा कि कैमरे को फेस करना किसी भी फास्ट बॉलर को फास्ट पिच पर खेलने के कठिन है । खैर ये अवांतर प्रसंग है । हम बात कर रहे हैं बॉलीवुड की बायोपिक फिल्मों की । दरअसल यही बुनियादी फर्क है बॉलीवुड या हॉलीवुड में । बॉलीवुड में नजर होती है मसाला और मुनाफा पर जबकि हॉलीवुड कला पर भी अपना ध्यान केंद्रित करता है । हमारे देश के फिल्मकार बाबा साहब भीमराव अंबेडकर या फिर सरदार पटेल पर फिल्म बनाने के लिए सरकार का मुंह जोहते हैं और सरकारी मदद के बाद हीइन शख्सियतों पर फिल्में बनाते हैं । यह विंडबना ही कही जाएगी कि गांधी पर अबतक की सबसे बेहतरीन फिल्म भारत से बाहर बनी है । रिचर्ड अटनबरो को ही गांधी में संभावना नजर आई और उन्होंने विश्व प्रसिद्ध फिल्म का निर्माण किया । गांधी पर बनी ये फिल्म उन्नीस सौ बयासी में रिलीज हुई थी । बेन किंग्सले अभिनीत इस फिल्म की याद करीब तीन दशक से ज्यादा बीच जाने के बाद भी भारतीय मानस में ताजा है । इसी तरह से हॉलीवुड से महान गणितज्ञ रामानुजन पर बनी फिल्म 29 अप्रैल को रिलीज हो रही है । द मैन हू न्यू इनफिनिटी के बनने की बेहद दिलचस्प दास्तां हैं । रॉबर्ट केनिगेल की किताब- द मैन हू न्यू इनफिनिटी, ए लाइफ ऑफ द जीनियस रामानुजन को अमेपिकर स्क्रिप्ट राइटर मट ब्राउन ने ढूंढ निकाला और उसपर फिल्म बनी । पिछले साल इसका प्रीमियर टोरंटो फिल्म फेस्टिवल में हो चुका है । पिछले साल गोवा इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में इस फिल्म को दिखाया गया था । अब ये फर्क साफ तौर पर देखा जा सकता है । दरअसल बॉलीवुड में फिल्म मेकिंग शुद्ध कारोबार है और फिल्म या कहानी का चयन मुनाफे को ध्यान में रखकर किया जाता है । बॉयोपिक अगर ज्यादा बन रहे हैं तो इसके पीछे भी भाग मिल्खा भाग और मैरी कॉम की सफलता है । इस बात को फिल्म से जुड़े लोग स्वीकार भी करते हैं । इंतजार तो इस बात का है कि कब हमारे यहां भी असल मायने में बायोपिक बनाने वाले फिल्मकार सामने आएं ।  

Saturday, January 14, 2012

धौनी नहीं बुढ़ाते खिलाड़ी जिम्मेदार

विदेशी धरती पर पिछले छह टेस्ट में लगातार हार से भारतीय क्रिकेट में भूचाल आया हुआ है । एक दो लोगों को छोड़कर तमाम पूर्व क्रिकेटर और दिग्गज भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेन्द्र सिंह धौनी को इस शर्मनाक हार का जिम्मेदार मानते हैं । धौनी के सर हार का ठीकरा फोड़ने के बाद अब उनके आलोचकों ने धौनी को हटाने का एक अभियान सा छेड़ दिया है । जिस महेन्द्र सिंह धौनी ने अब से नौ महीने पहले ही देश को क्रिकेट विश्व कप का तोहफा दिया था वही धौनी अब क्रिकेट के सबसे बड़े खलनायक करार दिए जा रहे हैं । हमें धौनी की आलोचना के पीछे के मनोविज्ञान और मानसिकता को समझने की जरूरत है । जब से भारत ने क्रिकेट खेलना शुरू किया तब से लेकर अबतक भारत में भी यह खेल अभिजात वर्ग के हाथ में ही रहा । क्रिकेट और क्रिकेट से जुड़े अहम संस्थाओं पर भी उसी इलीट वर्ग का वर्चस्व रहा । बड़े शहरों के बड़े लोगों का खेल क्रिकेट । दिल्ली और मुंबई का इस खेल पर लंब समय तक आधिपत्य रहा । लेकिन धौनी ने भारतीय क्रिकेट के उस मिथ को तोड़ा । झारखंड के एक छोटे से शहर रांची से आकर धौनी विश्व क्रिकेट के आकाश पर धूमकेतु की तरह चमके और छा गए । भारतीय क्रिकेट में धौनी युग की शुरूआत के बाद क्रिकेट दिल्ली मुंबई से निकलकर अमेठी-मेरठ हापुड-मेवात तक पहुंचा और वहां के खिलाड़ी सामने आने लगे और उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा भी मनवाया। जब धौनी भारत के लिए तमाम सफलता हासिल कर रहे थे तब भी कई पूर्व क्रिकेटर उसको धौनी की मेहनत नहीं बल्कि किस्मत से जोड़कर देख रहे थे । उनको धौनी की सफलता रास नहीं आ रही थी । दिल्ली और मुंबई महानगरों की मानसिकता में जी रहे इन क्रिकेटरों को धौनी की सफलता से रश्क होने लगा था और वो उसको पचा नहीं पा रहे थे । इसलिए जैसे ही धौनी की कप्तानी में टीम इंडिया की हार होने लगी है तो महानगरीय मानसिकता वाले पूर्व क्रिकेटरों को भारतीय कप्तान पर हमला करने का मौका मिल गया ।धौनी की कप्तानी कौशल पर भी सवाल खड़े होने लगे और कुछ लोग तो उनको हटाने की मांग भी करने लगे हैं । लेकिन धौनी को हटाने की मांग करनेवाले या टीम इंडिया की हार के लिए अकेले धौनी को जिम्मेदार ठहरानेवाले इन विशेषज्ञों की टीम के दिग्गज और बुढा़ते बल्लेबाजों पर चुप्पी आश्चर्यजनक है। आज भारतीय टीम में जितने खिलाड़ी खेल रहे हैं अगर उनके शतकों को जोड़ दिया जाए तो वह पर्थ टेस्ट की पहली पारी में टीम इंडिया के स्कोर के करीब करीब बराबर होगी । लेकिन इतने दिग्गज बल्लेबाजों के रहते भी टीम इंडिया लगातार हार रही है तो सिर्फ कप्तान पर सवाल खड़े करने की वजह से क्रिकेट से अलहदा नजर आती है । टीम इंडिया के चार बड़े और दिग्गज बल्लेबाज- सचिन तेंदुलकर, विरेन्द्र सहवाग, राहुल द्रविड़ और वी वी एस लक्ष्मण का बल्ला विदेशी पिचों पर चल ही नहीं पा रहा है । क्रिकेट के भगवान सचिन तेंदुलकर पिछले कई मैचों से एक शतक नहीं लगा पाने की वजह से भारी दबाव में हैं और अपने प्राकृतिक खेल से दूर होते जा रहे हैं । सचिन पर अपने सौंवे शतक का दबाव इतना ज्यादा है कि उसका खामियाजा टीम को उठाना पड़ रहा है । सवाल यह उठता है कि सचिन तेंदुलकर को और कितना मौका दिया जाएगा । क्या अब वक्त नहीं आ गया है कि सचिन को खुद से संन्यास लेकर नए लोगों को खेलने का मौका देना चाहिए । अगर सौंवा शतक नहीं बन पा रहा है तो कब तक भारत उसका इंतजार करते रहेगा । धौनी पर आलोचना का तीर चलानेवाले विशेषज्ञों को यह कहने का साहस क्यों नहीं है कि सचिन को संन्यास ले लेना चाहिए ।
भारत के दूसरे दिग्गज बल्लेबाज विरेन्द्र सहवाग की बात करें तो वहां तस्वीर और भी दयनीय है । सहवाग कभी अच्छी बल्लेबाजी करते होंगे, अभी कुछ दिनों पहले देश में ही उन्होंने तिहरा शतक भी लगाया लेकिन विदेशी दौरों पर उनका प्रदर्शन दयनीय से भी बदतर है । दक्षिण अफ्रीका से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक में सहवाग जब भी ओपनिंग करने आए तो बुरी तरह से फ्लॉप रहे । विदेशी धरती पर ओपनर के तौर पर उनका औसत 16 का है और भारतीय उपमहाद्वीप के बाहर शतक लगाए हुए उनको चार साल हो गए । धौनी की आलोचना करनेवालों को सहवाग का इतना घटिया प्रदर्शन नजर नहीं आ रहा है । क्या अब वक्त नहीं आ गया है कि सहवाग को टीम से बाहर का रास्ता दिखाया जाए । कब तक अतीत में अच्छे प्रदर्शन के आधार पर टीम इन वरिष्ठ खिलाड़ियों को ढोती और उसकी वजह से हारती रहेगी । सहवाग के अलावा एक जमाने में टीम इंडिया की दीवार कहे जानेवाले राहुल द्रविड़ के खेल को देखें तो वहां तो हालात और भी खराब है । मेलवर्न से लेकर पर्थ तक की पांच पारियों में द्रविड़ ने 24 रनों की औसत से 121 रन बनाए हैं और चार बार बोल्ड आउट हुए हैं । टीम इंडिया की दीवार अब ढहती नजर आने लगी है । तकनीक के मास्टर माने जानेवाले द्रविड़ जब पांच में चार पारियों में बोल्ड आउट होते हैं तो चयनकर्ताओं के लिए सोचने का वक्त आ गया है । उसी तरह अगर लक्ष्मण की बल्लेबाजी का आकलन करें तो वहां भी निराशा ही हाथ लगती है । ऐसे में सिर्फ धौनी को जिम्मेदार मानना उस शख्स के साथ अन्याय है जिसने देश को वनडे और टी-20 विश्वकप का तोहफा दिया । धौनी की कप्तानी पर सवाल खड़े करनेवालों को विश्व कप का फाइनल याद करना चाहिए जहां सहवाग के शून्य और सचिन के अठारह रन पर आउट होने के बाद धौनी ने जबरदस्त फॉर्म में चल रहे युवराज सिंह की बजाए खुद को बल्लेबाजी क्रम में उपर किया और फाइनल में नाबाद 97 रन बनाकर भारत को शानदार जीत दिलाई । हाई वोल्टेज मैच में शानदार छक्का लगाकर मैच जिताने का जिगरा बहुत ही कम बल्लेबाजों को होता है । उसी तरह टी-20 विश्व कप के फाइनल में जोगिंदर शर्मा को आखिरी ओवर देकर धौनी ने जीत हासिल की थी । तब सभी लोग धौनी की कप्तानी और उनकी रणनीति के गुणगान करने में जुटे थे । सौरभ गांगुली और सचिन ने भी अगल अलग वक्त पर धौनी को महानतमन कप्तान कहा है । टीम इंडिया के कोच गैरी कर्स्टन ने भी रिटायरमेंट के बाद कहा था कि अगर उन्हें युद्ध के मैदान में जाना होगा तो धौनी को अपना सेनापति रखना पसंद करेंगे । दरअसल क्रिकेट एक टीम गेम है और वो महान अनिश्चतिताओं का भी खेल है । इसमें किसी एक वयक्ति के प्रदर्शन पर हार या जीत का फैसला कम ही होता है ।
अगर हम हाल के दिनों में भारतीय क्रिकेट के खराब प्रदर्शन पर नजर डालें तो उसके लिए भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड जिम्मेदार है । इतना अधिक क्रिकेट खेला जा रहा है कि खिलाड़ी बुरी तरह थक जा रहे हैं उन्हें आराम का मौका बिल्कुल नहीं मिल पा रहा है । चैंपियंस लीग जैसे बैकार के टूर्नामैंट हो रहे हैं जो खिलाड़ियों को तोड़ दे रहे हैं । जरूरत इस बात की है कि बीसीसीआई क्रिकेटिंग कैलेंडर को थोड़ा रिलैक्स्ड रखे । इसके अलावा टीम के हालिया खराब प्रदर्शन के लिए चयनकर्ता भी कम जिम्मेदार नहीं है । चयनकर्ताओं ने टीम इंडिया के बुढ़ाते खिलाड़ियों के विकल्प के लिए कोई नीति नहीं बनाई, युवा खिलाड़ियों को तैयार नहीं किया । आज सचिन, सहवाग,द्रविड़ और लक्ष्मण का विकल्प दूर दूर तक दिखाई नहीं देता । चयनकर्ताओं में

Friday, August 5, 2011

सफलता के नशे में बेअंदाज धोनी

भारतीय क्रिकेट टीम को बुलंदी के शिखर पर पहुंचाने वाला शख्स- महेन्द्र सिहं धौनी । पहले टी 20 में देश को विश्वविजेता बनाने वाला शख्स महेन्द्र सिंह धौनी । तकरीबन अट्ठाइस साल बाद भारतीय क्रिकेट के लिए विश्वविजेता का ताज हासिल करने वाला शख्स महेन्द्र सिंह धौनी । टेस्ट क्रिकेट में टीम इंडिया को नंबर वन की कुर्सी तक पहुंचाने वाला शख्स महेन्द्र सिंह धौनी । अबतक अपने देश की धरती या फिर विदेश में कोई भी टेस्ट सीरीज नहीं हारने वाला शख्स महेन्द्र सिंह धौनी । बहुत कम समय में इतनी सारी सफलताओं का स्वाद चखना और उसको जज्ब करके शांत चित्त रहकर दुनिया भर में अपनी नेतृत्व क्षमता का लोहा मनवा लेना वाला शख्स महेन्द्र सिंह धोनी। लेकिन अब लगता है कि सफलता के शीर्ष पर बैठा भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान पर वही सफलता उनके सर चढ़कर बोलने लगी है । सफलात के नशे में वो इतना चूर हो गए हैं कि अपने अलावा उन्हें कुछ और दिखता ही नहीं है । पिछले दिनों लंदन में भारत के उच्चायोग की पार्टी में समय देकर महेन्द्र सिंह धोनी नहीं गए । वह अपनी पत्नी के फाइंडेशन के लिए धन इकट्ठा करने के लिए एक होटल में नीलामी के लिए मौजूद थे । मौजूद तो वहां सचिन तेंदुलकर समेत पूरी टीम इंडिया भी थी । इस वजह से उच्चायोग को अंतिम समय में क्रिकेटरों के सम्मान में आयोजित अपनी पार्टी रद्द करनी पड़ी । डिप्लोमैटिक सर्किल में देश की ना सिर्फ बेइज्जती हुई बल्कि उच्चायोग के लिए यह एक बेहद शर्मिंदगी लेकर भी आया। लंदन के भारतीय उच्चायोग की यह पार्टी भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के नियमों और परंपराओं के मुताबिक ही थी । नियम ये कहता है कि विदेश यात्रा पर जा रही टीम इंडिया को उच्चायोग या राजदूतावास के दावत में सम्मिलित होना आवश्यक है । लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि क्रिकेट के मैदान में प्रचलित मान्यताओं की धज्जी उड़ानेवाले धौनी को यह याद नहीं रहा कि डिप्लोमेसी में इस तरह के कदम पूरे देश की किरकिरी हो सकती है । हुई भी । क्रिकेट के मैदान पर विकेट कीपर को गेंदबाजी करते हुए नहीं देखा गया है । लेकिन इंगलैंड के खिलाफ टेस्ट सिरीज में धौनी ने प्रचलिक मान्यताओं को धता बता दिया। दस्ताने उतार कर भारत के इस विकेटकीपर को दुनिया ने गेंदबाजी करते हुए देखा। भारतीय टीम के पूर्व कप्तान कपिलदेव और सौरव गांगुली ने धौनी के इस कदम को क्रिकेट का माखौल उड़ानेवाला कदम करार दिया था ।
जब लंदन के भारतीय उच्चायोग ने विदेश मंत्रालय से धौनी के इस वर्ताव की शिकायत की तो भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड धौनी के बचाव में उतर आया । दरअसल भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड हमेशा अपनी सुविधा के अनुसार तर्क गढ़ता रहता है । जब उस संस्था पर मनोरंजन कर और इंकम टैक्स लगाने की बात होती है तो वह अपने आपको देश के गौरव से जोड़कर इन करों में रियायत की वकालत करता है । लेकिन जब यही अपेक्षा देश उनसे करता है तो वो अपने आपको निजी संस्था बताने में लग जाते हैं । इस तरह के कई वाकए हुए हैं जब बीसीसीआई ने अलग अलग वक्त पर अलग अलग स्टैंड लिया है । जहां तक मुझे याद है कि किसी मामले में अदालत में भी बीसीसीआई ने इस तर्क का सहारा लिया था कि वह एक निजी संस्था है और लोकहित के नाम पर उसपर दबाव नहीं बनाया जा सकता है । देश के लिए गौरव की बात करनेवाले क्रिकेट बोर्ड को देश के गौरव की अगर फिक्र होती तो धौनी और टीम इंडिया को उच्चायोग के डिनर में जाना होता । लेकिन खिलाड़ियों को भी लगता है कि जब बोर्ड को ही देश की फिक्र नहीं है तो उन्हें क्यों हो । हमारे क्रिकेट के खिलाड़ी सिर्फ और सिर्फ पैसा के लिए खेलते हैं । देश के गौरव का तो वो पैसा कमाने के लिए एक प्लेटफॉर्म की तरह इस्तेमाल करते हैं और यह सीख उन्हें उनके संस्था यानि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड से मिलती है । दरअसल क्रिकेट खेलनेवाले खिलाड़ी पैसा कमाने की अंधी दौड़ में इस कदर मुब्तिला हो चुके हैं कि उन्हें विदेशों में भी देश के गौरव और सम्मान की चिंता नहीं रहती । महेन्द्र सिंह धौनी देश के पिछड़े राज्यों में एक झारखंड से आते हैं और बेहद संघर्षों के बाद अपनी काबिलियत के बूते पर एक मुकाम हासिल किया लेकिन अब लगता है कि सफलता के शीर्ष पर पहुंचकर या तो वो असुरक्षा बोध से ग्रस्त हो गए हैं या फिर सफलता का ऐसा नशा उनपर चढ़ा है कि वो अपने आगे किसी को कुछ समझते ही नहीं है । ज्यादा दिन नहीं हुए हैं जब पद्म पुरस्कार वितरण समारोह में भी महेन्द्र सिंह धौनी नहीं पहुंचे थे । जिस दिन महामहिम राष्ट्रपति महेन्द्र सिंह धौनी समेत देश के अन्य विशिष्ट वयक्तियों को पद्म पुरस्कारों से नवाजनेवाली थी उस दिन धोनी साहब के किसी विज्ञापन फिल्म की शूटिंग में वयस्त होने की खबर आई थी । उस वक्त भी महेन्द्र सिंह धौनी के पद्म पुरस्कार नहीं लेने के लिए पहुंचने पर खासी आलोचना हुई थी । तब भी बीसीसीआई ने धौनी का बचाव किया था और अब भी वो लचर दलीलों के साथ अपने कप्तान का बचाव कर रही है ।
लेकिन ऐसा लगता है कि धोनी को पैसे के आगे ना तो अपनी प्रतिष्ठा का ख्याल है और ना ही देश और उसकी संवैदानिक मान्यताओं और संस्थाओं का । अब वक्त आ गया है कि देश के कर्ता-धर्ताओं को या भारत सरकार को बीसीसीआई को एकदम से नितांत निजी संस्था की तरह ट्रीट करना चाहिए और ना तो उन्हें टैक्स में किसी तरह की रियायत मिलनी चाहिए और ना ही आईपीएल के तमाशे में मनोरंजन कर में छूट मिलनी चाहिए । दरअसल इतना कड़ा स्टैंड हम तभी ले पाएंगे जब देश के शीर्ष नेतृत्व में दृढ राजनैति इच्छा शक्ति हो । अबतक बीसीसीआई पर उन्हीं लोगों का कब्जा है जो या तो सरकार में शामिल रहे हैं या फिर सरकार में शामिल लोगों के पिट्ठू रहे हैं । नतीजा यह होता है कि देश की एक निजी संस्था को पैसा कमाने के लिए देश का नाम का इस्तेमाल करने की छूट मिली हुई है । उनसे तत्काल यह छूट वापस ली जानी चाहिए और उन्हें भारतीय क्रिकेट टीम की बजाए बीसीसीआई की टीम माना जाना चाहिए । और सिर्फ देश की सरकार को नहीं बल्कि देश की जनता को भी क्रिकेटरों को किसी निजी संस्था के लिए खेलनेवाले खिलाड़ियों की तरह मानना चाहिए और उनके साथ भी उसी तरह का व्यवहार करना चाहिए । वो किसी क्लब के हीरो हो सकते हैं किसी देश के नहीं । देश का नायक होने के लिए देश की इज्जत, उसकी मान मर्यादा, उसकी मान्यताओं, उसकी परंपराओं में ना केवल विश्वास और आस्था होना जरूरी है बल्कि समय आने पर यह दिखाना भी पडता है कि मान्यताओं में आस्था और विश्वास भी है

Wednesday, April 22, 2009

भज्जी,धोनी ने गलती की मगर....

भज्जी और धोनी पद्म पुरस्कार लेने नहीं गए । इसपर जमकर विवाद हुआ, कहा तो यहां तक गया खिलाड़ियों ने मं6लय के फोन तक नहीं उठाए । खेल पत्रकार अभिषेक दूबे ने इस विषय पर हाहाकार के लिए खास तौर पर ये लेख लिखा है ।
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पांच साल पुरानी बात है, तभी मैं क्रिकेट का दीवाना अधिक पत्रकार कम था। मेरा एक दोस्त क्रिकइनफो के लिए एक लेख लिखने के सिलसिले में हरभजन सिंह के घर जालंधर जा रहा था, मैं साथ में चल लिया।
हरभजन के बारे में काफी कुछ सुन रखा था, निगेटिव अधिक, पोजिटिव कम। जालंधर की गलियों से होते हुए जैसे-जैसे मैं हरभजन के घर के नजदीक आता चला गया, अपने घर की याद आने लगी। मैं हरभजन से पहली बार मिल रहा था, लेकिन जैसे-जैसे घर में समय बीतता गया मुझे एक पल के लिए नहीं लगा कि मैं कबाब में हड्डी बनकर चला आया हूं। लगा कि मैं कॉलेज के समय के एक करीब दोस्त से मिल रहा हूं।
जल्द ही हम हरभजन के ड्राइंग रूम से बेडरूम में आ गए और जैसे ही पहली बार इंटरव्यू की चर्चा की, तो आवाज आई बेटा तुमलोग खाना खाओगे तभी इंटरव्यू मिलेगा। दरअसल वो आवाज हरभजन की मां की थी। मेरा दोस्त, मैं और भज्जी खाना खाने बैठे ही थे। मां-बहन खुद खाना परोस रही थी, घर की गर्मा-गर्म रोटी देखती ही, मुंह में पानी आ गया। पहला निवाला लिया ही था कि बहन बोल पड़ी- भैया आप लोग खुद गाड़ी चलाकर आए हो, मैंने दबी जुबान में कहा- साथ ड्राइवर आया है तभी मां ने फरमान जारी किया- उसे बाहर क्यों छोड़ दिया, बेचारा भूखा होगा। चंद ही मिनटों में ड्राइवर हमारे साथ बैठकर खाना खा रहा था। खाने-पीने के बाद इंटरव्यू का दौर शुरू हुआ। भज्जी हर मुद्दे पर दिल खोलकर बोल रहे थे, कई ऐसी बातें जिसे मैं चाहकर भी आपके साथ नहीं बांट सकता।
हाल में हरभजन और धोनी पद्म पुरस्कार लेने नहीं आए और इसे लेकर काफी बवाल मचा। तरह-तरह की प्रतिक्रिया आई। मुझे भी दुख हुआ और मैंने अपनी पीड़ा को अपने चैनल के जरिए लोगों के सामने रखा। जब मैं अपने चैनल पर इसकी आलोचना कर रहा था, तो हरभजन के घर में मेरे दोस्त के साथ बिताए हर पल याद आ रहे थे। मैं ऐसे ही ना जाने कितने अतीतों को जोड़कर मैं समझना चाह रहा था कि इन्होंने ऐसा क्यों किया। दरअसल जो हरभजन, मुनाफ, आरपी, पठान और रैना जैसे क्रिकेटरों की सबसे बड़ी ताकत है, वही सबसे बड़ी कमजोरी भी। जिसने धोनी ब्रिगेड को मैचविनर बनाया है, वही लोगों के आंखों की किरकिरी भी।
क्रिकेट मुंबई-दिल्ली, राजवाड़े और बड़े घरानों से निकलकर अब भारत के दूर-दराज इलाकों में फैल चुका है। जालंधर के हरभजन सिंह, मेरठ के प्रवीण कुमार, मुरादनगर के सुरेश रैना, भरूच के मुनाफ बिंदास नजरिया लेकर क्रिकेट मैदान पर आ रहे हैं। नजफगढ़ के सहवाग को सामने खड़े गेंदबाज के शख्सियत की परवाह नहीं। भज्जी या प्रवीण हेडन या पीटरसन को वैसा ही समझकर गेंद फेंक रहे होते हैं जैसे वो अपने मुहल्ले के बबलू या बंटी को फेंकते आए हैं। ऐसे क्रिकेटर इतिहास के बोझ तले भी दबे नहीं होते। शायद इसलिए जब इनसे पूछा जाता है कि क्या आपको अंदाजा है कि टीम इंडिया अबतक न्यूजीलैंड में हारती आई है तो ये हंसकर जवाब देते हैं कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। अगर हम बढ़िया खेलेंगे तो जीतेंगे, अगर खराब खेले तो हारेंगे।
आपको सहवाग का पाकिस्तान में दिया गया मशहूर बयान याद ही होगा। राहुल द्रविड़ के साथ सहवाग ओपनर के तौर पर पंकज रॉय और वीनू मांकड़ की जोड़ी का वर्ल्ड रिकॉर्ड तोड़ने के करीब थे। पत्रकार ने जब वीरू से इस बारे में पूछा तो उन्होंने कहा- कौन पंकज रॉय, मैंने तो इनके नाम तक नहीं सुने। किसी को भला लगे या बुरा, अगर ये वीरू की कमजोरी है तो सबसे बड़ी ताकत भी। लब्बोलुआब ये है कि अगर क्रिकेट के लोकतांत्रिकरण ने भारत को बिंदास खिलाड़ियों की फौज दी है, तो ऐसे कैरेक्टर भी जिन्हें इतिहास, मूल्यों और उसूलों का अंदाजा नहीं।
टीम इंडिया में एक ऐसे मशहूर क्रिकेटर हैं जो इंटरव्यू देना पसंद नहीं करते। टी-20 वर्ल्ड कप के सिलसिले में मैं दक्षिण अफ्रीका में था। प्रिंट के एक पत्रकार ने जब इस क्रिकेटर से कहा कि अगर तुम लम्बी रेस का घोड़ा बनना चाहते हो, तो तुम्हें मीडिया को साथ लेकर चलना होगा। हंसते हुए उस क्रिकेटर ने जवाब दिया- एक बात मैं अच्छे से जानता हूं अगर मैं अच्छा खेला तो आप मेरी तारीफ करने पर मजबूर होंगे और अगर मैं बुरा खेला तो आप लाख चाह लो, मुझे बचा नहीं पाओगे। जैसे ही प्रिंट मीडिया का वो पत्रकार आगे गया, उस क्रिकेटर ने मुझसे कहा- ये दादा को नहीं बचा पाए, मैं किस खेत की मूली हूं।
ऐसा ही एक और वाकया मुझे याद आता है। भारत के सुदूर इलाके से आने वाले एक क्रिकेटर ने मेथ्यू हेडन को आउट करने के बाद जमकर गाली दी। मैच खत्म होने के बाद जैसे ही हमने इस बारे में उस क्रिकेटर से चर्चा की तो उन्होंने कहा- पता है भैया, हमारे बीते जेनेरेशन ने इन कंगारुओं का दिमाग खराब कर दिया है। वो इन्हें बाउंसर फेंकने बाद सॉरी कहते थे। मेरा तो फंडा साफ है, मैं बाउंसर भी फेंकता हूं और दबाकर गाली भी देता हूं।
आत्मविश्वास, बिंदास नजरिया और किसी की परवाह नहीं करना दुधारी तलवार है। अगर इस नजरिए का पोजिटिव इस्तेमाल हो, तो वो मौजूदा टीम इंडिया की तरह चैंपियन टीम बनाती है। अगर इसने अराजक रूप ले लिया तो ये पाकिस्तान क्रिकेट टीम का ड्रेसिंग रूम जैसा माहौल बनाती है। पाकिस्तान में जबतक ऐसे क्रिकेटरों को नेतृत्व करने वाला इमरान खान जैसा लीडर मिला, तो उस टीम का बेहतरीन प्रदर्शन रहा। जैसे ही इमरान ने क्रिकेट को अलविदा कहा पाकिस्तान का ड्रेसिंग रूम अराजकता का प्रतीक बनता गया। अगर भारतीय टीम में भज्जी-वीरू-धोनी जैसे बिंदास क्रिकेटर हैं, तो सचिन, राहुल और लक्ष्मण जैसे अनुभवी और जागरूक इंसान भी जो इन्हें उड़ते वक्त नियंत्रण में रखते हैं।
सवाल ये है कि त्रिमूर्ति की विदाई के बाद ऐसा कौन करेगा। अगर मैं अपने अनुभव को आधार मानूं तो इस लिहाज से गौतम गंभीर में वो माद्दा है। अपने बेहतरीन खेल से वो ना सिर्फ मिसाल बनकर टीम की अगुवाई कर सकते हैं, बल्कि सोच और उसूलों के मामले में वो मौजूदा क्रिकेटरों को सही दिशा भी दे सकते हैं। सच कहता हूं, अगर बिंदास क्रिकेटरों के ब्रिगेड को कोई बिंदास मुखिया मिल गया, तो भारतीय क्रिकेट का बहुत बुरा होगा।
हरभजन और धोनी ने पद्म पुरस्कार के लिए नहीं जाकर बहुत बुरा किया। वो रोल मॉडल हैं और उनके इस रवैये से गलत संदेश जाता है। मैं कतई उनका बचाव नहीं कर रहा। साथ ही मैं दो सवाल छोड़ रहा हूं-पहला सवाल..क्या हम अपने दिल पर हाथ रखकर ये पूछ सकते हैं कि क्या हम राष्ट्रीय प्रतीकों और सम्मानों को उतना ही सम्मान करते हैं जितना हमारे माता-पिता करते आए, क्या अगले जेनेरेशन के मन में उनके लिए उतनी ही इज्जत है जितनी हममें हैं? दूसरा सवाल- क्या भज्जी, पठान, रैना, सहवाग जैसे क्रिकेटरों के आने से भारतीय क्रिकेट मजबूत नहीं हुआ...क्या ऐसे क्रिकेटरों ने तिरंगे की शान को नहीं बढ़ाया?
आजमगढ़ अगर आज कामरान दे रहा है और भरूच मुनाफ, मेरठ अगर प्रवीण दे रहा है और कोच्ची श्रीसंत, इससे भारतीय क्रिकेट का सम्मान बढ़ा है। ये बिंदास जरूर हैं, लेकिन दिल से भोले भी। राजे-राजवाड़ो और पारंपरिक क्रिकेट स्कूलों से आए क्रिकेटरों की तरह ये एलीट तो नहीं, लेकिन मकसद दिखाए जाने पर ये जी-जान लगाना जानते हैं।
जरूरी है इन्हें राष्ट्रीय और समाजिक तौर पर जागरूक करने की, इनकी ताकत को सही दिशा देने की और इनके भोले मन में वसूलों के लिए इज्जत पैदा करने की। ऐसे क्रिकेटरों को लीडरशिप के लिए पहले कॉनवेंट में पढ़े गांगुली चाहिए था और अब एक और कॉनवेंट में पढ़े गंभीर चाहिए। जरूरी है कि हम इन्हें इतना जागरूक करें, कि आने वाले कल में वो अपना लीडर खुद बन सकें।