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Wednesday, June 8, 2016

स्टार्टअप को संभालने की जरूरत

केंद्र में मोदी सरकार के दो साल पूरे होने के मौक पर जारी जश्न के बीच कुछ अहम बातें कहीं गुम सी हो गई हैं । सरकार ने पिछले दो सालों में स्टार्ट अप इंडिया को लेकर परिश्रमपूर्वक माहौल बनाया । स्टार्टअप कंपनियों के कर्ताधर्ताओं को लेकर दिल्ली के विज्ञान भवन में कार्यक्रम कर नए लोगों को प्रोत्साहित किया गया । सरकार ने स्टार्टअप को टैक्स आदि में कई सहूलियतें भी दी थी लेकिन चंद महीनों में ऐसा लगता है कि स्टार्टअप में निवेशकों की रुचि कम होने लगी है । यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि स्टार्टअप का हश्र दो हजार एक के डॉट कॉम के बुलबुले जैसा होने वाला है लेकिन जो संकेत मिलने लगे हैं वो खतरे की घंटी तो बजा ही रहे हैं । किसी भी प्रोजेक्ट के लिए इंवस्टेमेंट उसकी लाइफलाइन होती है लेकिन जब निवेश कम होने लगे तो ये समझा जाना चाहिए कि निवेशकों का भरोसा कम होने लगा है ।जिस तरह से स्टार्टअप प्रोजेक्ट्स में वेंचर कैपिटलिस्ट यानि निवेशकों की रुचि कम हो रही है या जिस तरह से वो कंपनियों के सामने अपनी अपेक्षाओं का पहाड़ खड़ा कर रहे हैं वह नई कंपनियों के लिए बेहद जटिल है । ना सिर्फ वेंचर कैपटलिस्ट बल्कि अन्य निवेशकों ने भी भारतीय स्टार्टअप से हाथ खींचना शुरू कर दिया है । जिस अमेरिकी म्युचुअल फंड कंपनी टी रो प्राइस ने पिछले साल दिसंबर में फ्लिपकार्ट में करीब सौ मिलियन डॉलर निवेश किया था उसने कंपनी में अपनी हिस्सेदारी पंद्रह फीसदी कम कर ली । भारतीय स्टार्टअप कंपनियों के लिए आदर्श रही फ्लिपकार्ट के लिए ये एक झटके से कम नहीं था । इसके पहले मोर्गन स्टेनली ने भी फ्लिपकार्ट में अपना शेयर पंद्रह फीसदी कम कर लिया था । फिल्पकार्ट पर इसका असर भी दिख रहा है । बड़े संस्थानों से कैंपस प्लेसमेंट के नाम पर मोटी सैलरी पर जिनको नौकरी का वादा किया गया था उसको स्थगित कर दिया गया है । इससे कुछ संकेत तो मिलते ही हैं । फिल्पकार्ट का उदाहरण सिर्फ इसलिए दिया गया है कि वो भारतीय स्टार्टअप इकोसिस्टम का एक बेहद अहम हिस्सा है ।
दरअसल अगर हम स्टार्टअप में निवेश को देखें तो पिछले तिमाही की तुलना में इस साल की पहली तिमाही में वेंचर कैपटलिस्ट और पीई फंड्स ने डेढ़ बिलियन डॉलर का निवेश किया । ये पिछले तिमाही की तुलना में करीब चौबीस फीसदी कम है । निवेश के बारे में जानकारी रखनेवालों का कहना है कि चौबीस फीसदी कम निवेश बेहद चिंता की बात है और उसको ठीक करने के लिए फौरन कदम उठाने की जरूरत है । दरअसल ये चिंता सिर्फ भारतीय कंपनियों के लिए ही नहीं है । एशिया में ही अगर हम देखें तो पिछले दो तिमाही से लगातार निवेश में भारी कमी दर्ज की गई है और ऐसा दो हजार बारह के बाद पहली बार हो रहा है । अगर अंतराष्ट्रीय मीडिया की खबरों को माने तो स्टार्टअप कंपनियों में वेंचर कैपटलिस्ट, प्राइवेट इक्यूटि प्लेयर्स, म्युचुअल फंड आदि का निवेश पूरी दुनिया में कम हो रहा है । ऐसा नहीं है कि टी रो प्राइस ने सिर्फ फ्लिपकार्ट को झटका दिया है बल्कि उसने तो उबर समेत कई अमेरिकी स्टार्टअप कंपनियों में भी अपना शेयर कम किया है । इसका मतलब है कि बाजार के ये खिलाड़ी स्टार्ट अप्स को लोकर बहुत उत्साहित नहीं है ।
दरअसल अगर हम हमारे देश की स्टार्ट अप कंपनियों को देखें तो ये साफ तौर नजर आता है कि इन कंपनियों ने अपना विस्तार नहीं ढूंढा । सामानों की खरीद फरोख्त के प्लेटफॉर्म का मॉडल हमारे सामने था औपर हर कोई इस मॉडल को अपनाते हुए उसको भुनाना चाहता था । हमारे यहां स्टार्टअप में बहुत प्रयोग नहीं किए जा रहे है कोई नई तकनीक का विकास नहीं किया जा रहा । यहां ज्यादातर स्टार्ट अप वैश्विक स्तर पर सफल हो चुकी कंपनियों के मॉडल की नकल में शुरू हो रहे हैं जो थोड़ा बहुत भारतीय ग्राहकों की जरूरतों और रुचियों का ध्यान रखते हैं । वेंचर कैपटलिस्टों को हमेशा से नई तकनीक और प्रयोग लुभाते रहे हैं और वो उसमें निवेश करते रहे हैं । भारतीय जरूरतों और परिस्थितियों के मुताबिक स्टार्टअप को ढालने और उसको जनता के बीच ले जाने की जरूरत है । देश में इन दिनों सूखा पड़ा है लेकिन पानी के प्रबंधन को लेकर कोई स्टार्टअप है नहीं । इस दिशा में अगर अब भी काम शुरू हो तो निवेशकों को आकर्षित किया जा सकता है । पानी का मैनेजमेंटआने वाले दिनों में भारत में एक बड़े सेक्टर के तौर पर उभर कर सामने आने वाला है । इस बात को ध्यान रखा जाना चाहिए कि वेंचर कैपटलिस्ट भविष्य का आंकलन कर निवेश करते हैं । साइबर सुरक्षा पर भी कम काम हो रहा है जबकि ये कई देशों में सफल बिजनेस मॉडल है ।

अब हम हमारे बड़ी स्टार्टअप कंपनियों को देखते हैं तो पाते हैं कि उनमें से ज्यादातर इंटरनेट सॉफ्टवेयर सर्विसेज पर आधारित हैं ।  इससे उलट अगर हम इजरायल की स्टार्टअप कंपनियों को देखें तो वहां ज्यादातर कंपनियां साइबर सुरक्षा, स्वास्थ्य, और सर्विसेज सेक्टर में है । इजरायल की स्टार्टअप कंपनियों की सफलता के पीछे की वजह स्टार्टअप की क्षितिज का विस्तार है । केंद्र सरकार ने कई स्कीमों को बेहतर सोच के साथ शुरु किया लेकिन उस सोच को जमीनी स्तर पर उतारने के लिए उस तरह के लोगों को सामना आना होगा । स्टार्टअप इंडिया को सफल बनाने के लिए टैक्स आदि में छूट देना तो ठीक है लेकिन इस स्कीम को स्किल इंडिया से जोड़कर कुछ नई योजना को बढ़ावा देना होगा । सरकार को निवेशकों का भरोसा कायम करने की दिशा में भी काम करना होगा । स्टार्ट अप्स के पास जो पैसा आ रहा है वो उसको डिस्काउंट के तौर पर ग्राहकों को देकर वॉल्यूम बढ़ाते हैं । निवेशकों को ये मॉडल सही नहीं लग रहा है क्योंकि ज्यादा डिस्काउंट से प्रोफिट का मार्जिन कम हो जाता है । सरकार को स्टार्टअप के निवेश को रेगुलेट करने के लिए कदम उठाने चाहिए । 

Sunday, July 12, 2015

बेस्टसेलर की बिक्री पर विवाद

शिवा ट्राएलॉजी लिखकर लेखन की दुनिया में अपनी पहचान और धमक कायम करनेवाले अंग्रेजी के बेस्टसेलर लेखक अमिष त्रिपाठी की नई किताब सिऑन ऑफ इच्छवाकु को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है । विवाद किताब को लेकर नहीं, किताब के चरित्र को लेकर नहीं, किताब के कथानक को लेकर नहीं बल्कि उसके बेचे जाने के करार को लेकर हुआ है । विवाद इतना बढ़ गया कि पूरा मामला दिल्ली हाईकोर्ट जा पहुंचा । इस किताब के प्रकाशक वेस्टलैंड ने फ्लिपकार्ट पर कॉपीराइट और आईटी एक्ट के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है । प्रकाशक का आरोप है कि बगैर उसकी इजाजत के फ्लिपकार्ट अपने ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर अमिष का नया उपन्यास बेच रहा है । हाईकोर्ट ने इस मामले में फ्लिपकार्ट को नोटिस भेजकर चार अगस्त तक अपना जवाब दाखिल करने का हुक्म दिया है । फ्लिपकार्ट का तर्क है कि वो सिर्फ ग्राहकों और विक्रेता को खरीद फरोख्त के लिए मंच मुहैया करवाता है और अगर कोई पुस्तक विक्रेता उसके मंच पर किताबें बेचना चाहता है तो वो उसको रोक नहीं सकता है । दरअसव अमेजन ने अमीष त्रिपाठी और उनके प्रकाशक वेस्टलैंड के साथ उसकी इस किताब को बेचने का एक्सक्लूसिव करार किया हुआ है । आईपीएल के मैचों के दौरान अमेजन ने अमीष त्रिपाठी की इस किताब को लेकर टीवी पर आक्रामक तरीके से प्रचार और मार्केटिंग की थी, लेकिन जब किताब बिक्री के लिए उपलब्ध हुई तो वो एमेजन के अलावा फ्लिपकार्ट पर भी बिक्री के लिए उपलब्ध थी । दरअसल अगर हम देखें तो हाल के दिनों में अंग्रेजी के बेस्टसेलर लेखकों या फिर मशहूर शख्सियतों की किताबों को लेकर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर बिक्री को लेकर विवाद होते रहे हैं । चंद महीनों पहले जो तर्क अमेजन दे रहा था वही तर्क अब फ्लिपकार्ट दे रहा है । इसी स्तंभ में चेतन भगत की किताब हाफ गर्ल फ्रेंड को लेकर उठे विवाद पर विस्तार से चर्चा की गई थी । हाफ गर्ल फ्रेंड के लिए उसके प्रकाशक ने ऑनलाइन बेवसाइट फ्लिपकार्ट से समझौता किया था। तब उस करार के मुताबिक प्रकाशक ने फ्लिपकार्ट को यह अधिकार दिया था कि पहले कुछ दिनों तक चेतन भगत की किताब सिर्फ फ्लिपकार्ट के ऑनलाइन बुकस्टोर पर ही मौजूद रहेगी । बदले में फ्लिपकार्ट ने भी प्रकाशक को एकमुश्त साढे सात लाख प्रतियों का ऑर्डर दिया था । चेतन भगत के उपन्यास की प्रीबुकिंग ही जमकर हुई । इस एक्सक्लूसिव करार की वजह से भारत में चेतन के लाखों प्रशंसकों ने फ्लिपकार्ट के ऑनलाइन स्टोर से जाकर किताब खरीदी थी । लेकिन उस वक्त अमेजन ने भी कुछ इसी तरह का तर्क दिया था कि उनकी कंपनी तो विक्रेताओं और क्रेता के बीच मंच प्रदान करती है, लिहाजा वो किसी को चेतन की किताब बेचने से रोक नहीं सकती । उस वक्त भी चेतन की किताब के प्रकाशक और अमेजन के बीच विवाद हुआ था । इसके बाद भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की किताब द ड्रामेटिक डिकेड, द इंदिरा गांधी इयर्स को लेकर भी सामने आई । जिस प्रकाशक ने चेतन भगत की किताब की बिक्री के लिए फ्लिपकार्ट से समझौता किया था उसी ने प्रणब मुखर्जी की किताब के लिए अमेजन से समझौता किया । उस करार के मुताबिक किताब जारी होने के इक्कसी दिन तक यह सिर्फ अमेजन पर उपलब्ध रहनी थी । मतलब यह कि इक्कीस दिनों तक अगर कोई पाठक प्रणब मुखर्जी की यह किताब एक्सक्लूसिव तौर पर इसी बेवसाइट से खरीद सकता था । उसके बाद यह देशभर के पुस्तक विक्रेताओं के पास पहुंचेगा । इसका नतीजा यह हुआ था कि प्री बुकिंग के दौर में ही महामहिम की किताब लोकप्रियता के लिहाज से चेतन भगत और सचिन तेंदुलकर की किताब के बाद तीसरे पायदान पर पहुंच गई थी । तब भी इस तरह के सवाल उठे थे । ऑनलाइन बिक्री को लेकर अभी हमारे देश में नियम कानूनों में कई सूराख हैं जिसका फायदा इस तरह की कंपनियां उठाती रही हैं और मामले अदालतों में जाते रहे हैं । ऑनलाइन किताबों की बिक्री को लेकर तो हाल के दिनों में तनातनी काफी बढ़ी है । भारत में किताबों के दुकानों के कम होने की वजह से ऑनलाइन पर किताबों की खूब बिक्री होती है । आनलाइन कंपनियों का खर्च भी कम होता है लिहाजा वो किताबों के दुकानों की तुलना में पाठकों को आकर्षक छूट भी देते हैं । किताबों के मूल्य भी बिक्री या प्रीबुकिंग के हिसाब से तय किए जाते हैं । जब राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की किताब की प्री बुकिंग शुरू हुई थी तो उसपर छूट कम थी लेकिन जैसे जैसे किताब रिलीज होने की तारीख पास आने लगी तो ऑनलाइन स्टोर ने इसके मूल्य में भी कमी करनी शुरू कर दी थी ताकि पाठकों को आकर्षित किया जा सके । किताब पर छपे मूल्य पांच सौ पचानवे की बजाय प्रीबुकिंग में इसका मूल्य चार सौ छियालीस रुपए रखा गया था । रिलीज वाले दिन इस किताब का मूल्य घटाकर तीन सौ निन्यानवे कर दिया गया । यह बिक्री का अपना गणित भी है और मुनाफा का अर्थशास्त्र भी है । ऑनलाइन किताबों की खरीद बिक्री का एक और भी पक्ष है । इस तरह के करार से किताबें भी वहां बिक्री के लिए पहले उपलब्ध होती हैं और बेवसाइट्स को वहां जिट करनेवाले एकल ग्राहकों की वजह से हिट्स भी ज्यादा मिलते है । ऑनलाइन कंपनियों के लिए हिट्स का खासा महत्व है और कंपनी के वैल्यूएशन से लेकर फंडिंग तक में इस आंकड़े का इस्तेमाल किया जाता है । इस वजह से भी वहां रिटेल खरीद को प्रोत्साहित किया जाता है । कोई भी ग्राहक किसी भी चर्चित किताब की सिर्फ एक ही प्रति खरीद सकता है । अगर किसी को दो या उससे अधिक किताबें चाहिए तो उसे उतने ही ग्राहक प्रोफाइल या अकाउंट बनाने होंगे । यह बाजार में थोक बिक्री के आसन्न खतरे के मद्देनजर किया गया है । इससे दो फायदे होते हैं । पहला तो किताबों की बिक्री बढ़ती है दूसरे ऑनलाइन स्टोर के मार्फत किताबों की दुकान तक चर्चित कृतियों के पहुंचने पर रोक लगती है ।
दरअसल हमारे देश में ऑनलाइन बिक्री के लिए अभी तक कोई तय प्रक्रिया नहीं है । दस जुलाई को डिपार्टमेंट ऑफ इंडस्ट्रियल पॉलिसी एंड प्रमोशन ने केंद्र सरकार के सात विभागों और फ्लिपकार्ट और अमेजन के प्रतिनिधियों के साथ लंबी बैठक की । 15 जुलाई को केंद्रीय वाणिज्य मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस बाबत राज्यों की एक अहम बैठक बुलाई है । उस बैठक के बाद ई कॉमर्स को लेकर कोई दिशा निर्देश तय किए जा सकते हैं । हो सकता है कि तब इस तरह के विवाद ना उठें । अब अगर हम देखें तो ऑनलाइन बुक स्टोर्स पर बढ़ते ग्राहक संख्या और इस तरह के मार्केटिंग की रणनीति से किताबों की दुकानों की बिक्री पर असर पड़ने लगा है । भारत में कम हो रही किताबों की दुकान के लिए बिक्री का यह नया प्लेटऑर्म और एक्सक्लूसिव करार एक गंभीर चुनौती के तौर पर सामने आ रहा है । बदलाव की इस बयार में ऑनलाइन स्टोर्स की एक्सक्लूसिविटी पुस्तकों की दुकान में पूंजी लगानेवालों को भी हतोत्साहित कर रही है । चेतन और प्रणब मुखर्जी की किताबों के रिलीज के वक्त देश के कई बुक स्टोर्स ने ने कड़ा रुख अख्तियार किया था और ऐसा करनेवाले प्रकाशकों को उनकी अन्य किताबे नहीं बेचने की धमकी दी थी । उनका तर्क था कि ऑनलाइन कंपनियों के साथ करार करके प्रकाशक पाठकों के साथ छल करते हैं । उन्होंने धमकी दी थी कि अगर कोई प्रकाशक बेस्टसेलर के लिए ऑनलाइन बुक स्टोर का चुनाव करता है तो उसको फिर सारी किताबें वहीं बेचनी चाहिए । ये नहीं हो सकता है कि चर्चित शख्सियतों और लेखकों की किताबें ऑनलाइन बेची जाएं और कम चर्चित और गंभीर किताबें दुकानों के माध्यम से बेची जाएं । कई पुस्तक विक्रेताओं ने प्रकाशकों को पत्र लिखकर विरोध जताया था भविष्य में ऐसा नहीं करने की सलाह दी थी । अमिष त्रिपाठी और चेतन भगत की किताबों की मार्केटिंग के बरक्श अगर हम हिंदी प्रकाशन की दुनिया को देखें तो अब हालात कुछ उत्साहजनक नजर आने लगे हैं । हिंदी के प्रकाशक अब बाजार का इस्तेमाल करने पर विचार करने लगे हैं । कइयों ने अपनी किताबें ऑनलाइन स्टोर्स पर उपलब्ध भी करवा दी है । लेकिन हिंदी के प्रकाशकों इन ऑनलाइन बुक स्टोर से उस तरह से राफ्ता कायम नहीं हो सका है । हिंदी के प्रकाशकों को बाजार के इस खेल में पूरी तरह से शामिल होना पड़ेगा । यह धारणा गलत है कि हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं की किताबें नहीं बिकती हैं । एक अनुमान के मुताबिक चेतन भगत और अमिष त्रिपाठी की किताबों के हिंदी अनुवाद की बिक्री, कुल बिक्री का पैंतीस फीसदी रहा है । इंटरनेट के फैलाव और सरकार के डिजीटल इंडिया स्कीम को प्राथमिकता के बाद इंटरनेट का घनत्व बढ़ेगा । जैसे जैसे देश में इंटरनेट का फैलाव होगा ऑनलाइन बिक्री के प्लेटफॉर्म की अहमियत बढ़ती जाएगी ।
 

Sunday, December 28, 2014

ऑनलाइन बुक स्टोर के खतरे और चुनौतियां

दो हजार चौदह को किताबों की दुनिया या कहें कि प्रकाशन के कारोबार के लिहाज से भी अहम वर्ष के तौर पर देखा जाएगा । किताबों की दुनिया में दो ऐसी घटनाएं घटी जिसने भारत में कम होती जा रही किताबों की दुकानों के लिए खतरे की घंटी बजा दी है । पहले मशहूर लेखक चेतन भगत के उपन्यास हाफ गर्ल फ्रेंड के लिए उसके प्रकाशक ने ऑनलाइन बेवसाइट फ्लिपकार्ट से समझौता किया । उस करार के मुताबित प्रकाशक ने फ्लिपकार्ट को यह अधिकार दिया था कि पहले कुछ दिनों तक चेतन भगत की किताब सिर्फ फ्लिपकार्ट के ऑनलाइन बुकस्टोर पर ही मौजूद रहेगी । बदले में फ्लिपकार्ट ने भी प्रकाशक को एकमुश्त साढे सात लाख प्रतियों का ऑर्डर दिया । चेतन भगत के उपन्यास की प्रबुकिंग ही जमकर हुई । इस एक्सक्लूसिव करार की वजह से भारत में चेतन के लाखों प्रशंसकों ने फ्लिपकार्ट के ऑनलाइन स्टोर से जाकर किताब खरीदी । जबतक उनका उपन्यास किताबों की दुकान तक पहुंचता तब तक उसके पाठक उसको खरीद चुके थे । चेतन भगत के ज्यादातर पाठक इंटरनेट की दुनिया से जुड़े हैं, लिहाजा उनके लिए फ्लिपकार्ट से खरीद करना सुविधाजनक भी रहा था । उस वक्त भारत के प्रकाॆशन जगत के लिए यह बिल्कुल नई घटना थी, लिहाजा देश के किताब विक्रेता खामोश रहे । अब इसी तरह का करार भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की नई किताब द ड्रामेटिक डिकेड, द इंदिरा गांधी इयर्स भी सामने आया है । राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की किताब के प्रकाशक ने एक बार फिर एक दूसरी बड़ी ऑनलाइन कंपनी अमेजन से करार किया। इस करार के मुताबिक किताब के जारी होने के इक्कसी दिन तक यह सिर्फ अमेजन पर उपलब्ध होगी । मतलब यह कि इक्कीस दिनों तक अगर कोई पाठक प्रणब मुखर्जी की यह किताब एक्सक्लूसिव तौर पर इसी बेवसाइट से खरीद सकता था । उसके बाद यह देशभर के पुस्तक विक्रेताओं के पास पहुंचेगा । इसका नतीजा यह हुआ कि प्री बुकिंग के दौर में ही महामहिम की इस किताब लोकप्रियता के लिहाज से चेतन भगत और सचिन तेंदुलकर की किताब के बाद तीसरे पायदान पर पहुंच गई । प्री बुकिंग के आंकड़ों को देखकर तो यही लग रहा था कि इससे पुस्तक विक्रेताओं को खासा नुकसान हुआ होगा । यहां भी एक अलग तरह का तंत्र है । बेवसाइट ने प्रणब मुखर्जी की इस किताब की प्री बुकिंग शुरू की । जैसे जैसे किताब रिलीज होने की तारीख पास आने लगी तो ऑनलाइन स्टोर ने इसके मूल्य में भी कमी करनी शुरू की । किताब पर छपे मूल्य पांच सौ पचानवे की बजाय प्रीबुकिंग में इसका मूल्य चार सौ छियालीस रुपए रखा गया था । रिलीज वाले दिन इस किताब का मूल्य घटाकर तीन सौ निन्यानवे कर दिया गया । यह बिक्री का अपना गणित भी है और मुनाफा का अर्थशास्त्र भी है । इस खेल का एक और पक्ष भी है वो यह कि अमेजन पर एक ग्राहक प्रणब मुखर्जी की सिर्फ एक ही किताब खरीद सकता था । अगर किसी को दो या उससे अधिक किताबें चाहिए तो उसे उतने ही ग्राहक प्रोफाइल या अकाउंट बनाने होंगे । यह बाजार में थोक बिक्री के आसन्न खतरे के मद्देनजर किया गया है । इसी तरह से मार्केटिंग के दांव चेतन की किताब की बिक्री के वक्त भी किया गया था । चेतन की किताब ने बिक्री के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए । प्रकाशन जगत से जुड़े लोगों का कहना है कि प्रणब मुखर्जी की किताब भी खूब बिक रही है । एक तो प्रणब मुखर्जी का लेखन, दूसरे किताब के केंद्र में इंदिरा गांधी । इन दोनों को मजबूती प्रदान करने के लिए जबरदस्त मार्केटिंग के तौर तरीके ।
अंग्रजी में किताब बिक्री के इस नए चलन से एक सवाल भी उठा है । क्या दुकान पर जाकर पुस्तक खरीदनेवाले किताब प्रेमियों को अब कुछ खास किताबों के लिए इंतजार करना होगा या फिर उन्हें भी किताबों की दुकान से मुंह मोड़कर ऑनलाइन स्टोर की ओर जाना पड़ेगा । भारत में कम हो रही किताबों की दुकान के लिए बिक्री का यह नया अर्थशास्त्र एक गंभीर चुनौती है । वक्त बदला है । वक्त के साथ प्रकाशन जगत के कायदे कानून भी बदल रहे हैं । लेकिन बदलाव की इस बयार में ऑनलाइन स्टोर्स की एक्सक्लूसिविटी पुस्तकों की दुकान में पूंजी लगानेवालों को हतोत्साहित करनेवाली है । इसको रोकने के लिए दिल्ली के मशहूर खान मार्किट में मौजूद एक बुक स्टोर और दिल्ली और अन्य महानगरों में बुक स्टोर की श्रंखला के मालिकों ने कड़ा रुख अख्तियार किया है । इन दोनों ने तो चेतन भगत और प्रणब मुखर्जी की किताबों के प्रकाशक की अन्य किताबें उनको वापस भेजने का फैसला लिया है । उनका कहना है कि ये पाठकों के साथ धोखधड़ी है । उनका एक तर्क यह भी है कि इस तरह से किताबों का कारोबार नहीं चलता है । अगर किसी भी प्रकाशक को ऑनलाइन बुक स्टोर पर जाना है तो फिर सारी किताबें वहीं बेचनी होंगी । ये नहीं हो सकता है कि चर्चित शख्सियतों और लेखकों की किताबें ऑनलाइन बेची जाएं और कम चर्चित और गंभीर किताबें दुकानों के माध्यम से बेची जाएं ।  कुछ अन्य बुक स्टोर्स ने प्रकाशक को पत्र लिखकर विरोध जताया है और भविष्य में ऐसा नहीं करने की चेतावनी दी है । चेतन भगत और प्रणब मुखर्जी की किताबों की मार्केटिंग के बरक्श अगर हम हिंदी प्रकाशन की दुनिया को देखें तो हमारे हिंदी के प्रकाशक मित्र अभी इस स्तर पर बाजार का का इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं । बाजार के इस खेल को समझने और लागू करने की दिशा में अगर सोच भी रहे हों तो मैदान में उतरने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं । हिंदी के प्रकाशकों का अभी इन ऑनलाइन बुक स्टोर से राफ्ता कायम नहीं हो सका है । हिंदी की कुछ गिनी चुनी किताबें ही इन बेवसाइ्टस के ऑनलाइन बुक स्टोर पर मौजूद हैं । उसमें भी कई बार लिंक क्लिक करने पर एरर ही आ जाता है । जिससे पाठकों को कोफ्त होती है । हिंदी के प्रकाशकों को बाजार के इस खेल में शामिल होना पड़ेगा । इसका एक फायदा यह होगा कि हिंदी में लिखनेवाले लेखकों की पहुंच ज्यादा होगी और हिंदी के किताबों के संस्करणों की जो संख्या लगातार कम होता जा रही है उसमें बढ़ोतरी होगी । बाजार के अपने खतरे भी हैं लेकिन पाठकों तक पहुंचने के लिए इन खतरों का उठा लेना चाहिए । 

जिस तरह से हमारे देश में पुस्तक विक्रेताओं का आभाव है उसकी कमी को पूरा करने के लिए भी कदम उठाने होंगे । विशाल हिंदी पाठक वर्ग को ध्यान में रखते हुए यह आवश्यक है कि ऑनलाइन स्टोर के साथ साथ हिंदी के प्रकाशक इस तरह की कोई योजना बनाएं जिससे वो पाठकों तक पहुंच सकें । छोटे शहरों में तो फिर भी किताबें मिल जाती हैं लेकिन बड़े शहरों और मेट्रो में किताबों की अनुपल्बधता पाठकों को खिन्न करती हैं । अभी हाल ही में साहित्य अकादमी ने दिल्ली मेट्रो के साथ स्टेशनों पर किताब की दुकान खोलने के लिए करार किया है । लेकिन दो मेट्रो स्टेशनों पर किताब की दुकान से काम नहीं चलनेवाला है । साहित्य अकादमी को इस दिशा में और पहल करनी होगी और भारत सरकार को इसमें सहयोग करना होगा । साहित्य अकादमी के माध्यम से अगर किताबों की दुकानें शुरू करने का प्रयोग सफल होता है तो भारत सरकार को अकादमी को इस मद में बजट देना होगा । इसके लिए आवश्यक है कि भारत सरकार एक नई पुस्तक नीति बनाए । पुस्तकों को लेकर सरकार का रुख नरम है । अभी जिस तरह से पुस्तकों के कारोबार को जीएसटी के दायरे से बाहर कर दिया गया है वह संकेत उत्साहजनक है । सरकार को राष्ट्रीय पुस्तक नीति बनाने से पहले इसपर राष्ट्रव्यापी बहस करवाने की जरूरत है । इस व्यवसाय से जुड़े और इसको जाननेवाले सारे पक्षों की बातों को सुनकर, समझकर नीति बनाने की कोशिश की जानी चाहिए लेकिन प्राथमिकता किताबों की उपलब्धता को ध्यान में रखकर तय की जानी चाहिए । हमारे देश में हर तरह की नीति बनती है लेकिन किताबों को लेकर एक समग्र नीति के आभाव में आजादी के इतने सालों बाद भी पुस्तक संस्कृति का विकास नहीं हो पाया है । सरकार के अलावा गैर सरकारी संस्थाओं को भी पुस्तकों की संस्कृति विकसित करने की दिशा में कोशिश करनी होगी । सबकी सामूहिक कोशिशों से ही किताबों को लेकर नई पीढ़ी में ललक पैदा करनी होगी । अगर यह हो सकता है तो फिर ऑनलाइऩ स्टोर पर एक्सक्लूसिव किताबें बेचने की मार्केंटिंग के तरीकों पर रोक भी लग सकती है और मुनाफे का समावेशी वितरण हो सकेगा । दूसरा फायदा हिंदी के लेखकों को भी होगा और उनकी आय में बढ़ोतरी होगी । अबतक बाजार से भागनेवाले लेखकों को बाजार के तौर तरीके अपनाने ही होंगे । अगर ऐसा हो पाता है तो यह पुस्तक प्रकाशन कारोबार के लिए अच्छे दिन लेकर आएगा ।