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Saturday, September 3, 2022

राजनीति के ‘रंगबाज’ और ‘महारानी’

मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू होने के बाद बिहार में सामाजिक बदलाव की बयार बही थी। लगभग उसी समय बिहार में कई ऐसे बाहुबली भी उभरे जो बाद में राजनीति के रास्ते विधानसभा और संसद के सदस्य बने। इनमें पप्पू यादव से लेकर आनंद मोहन तक और शहाबुद्दीन से लेकर सूरजभान सिंह तक का नाम शामिल है। बाद के दिनों में भी ये क्रम चलता रहा और स्थानीय स्तर के अपराधी भी विधानसभा पहुंचने लगे। इन आपराधिक प्रवृत्ति वाले नेताओं का लगभग सभी राजनीतिक दल ने अपने हित में उपयोग किया। किसी ने आपराधिक पृष्ठभूमि वाले इन नेताओं उपयोग सरकार बनाने के लिए समर्थन जुटाने में किया तो किसी ने सरकार बचाने के लिए। 1990 के बाद के दशकों में बिहार की राजनीति का अपराधीकरण तेज हुआ। उसी समय राजनीति के अपराधीकरण पर देशव्यापी चर्चा हुई थी। चुनाव में बूथ लूटने और कब्जा करने की घटनाएं भी खूब हुई, चुनावी हिंसा भी। ये वही दौर था जब बिहार में जाति और विचारधारा के नाम पर सामूहिक नरसंहार हुए। नक्सलियों ने विचारधारा और समानता हासिल करने की आड़ में नरसंहार किए तो जाति आधारित निजी सेनाओं के बीच भी खूनी खेल खेला गया। जातियों के नए नेता पैदा होते चले गए। जातियों के बीच चौड़ी होती खाई को नेताओं ने अपने वोटबैंक के तौर पर उपयोग करना आरंभ कर दिया। पाटने की कोशिश किसी ने नहीं की। लालू प्रसाद यादव जैसे गरीब परिवार से आनेवाले व्यक्ति बिहार के मुख्यमंत्री बने तो सामाजिक न्याय का नारा जोरशोर से लगा। उनपर जब घोटाले का आरोप लगा तो उन्होंने अपने राजनीतिक सहयोगियों को नजरअंदाज करते हुए अपनी पत्नी राबड़ी देवी को बिहार का मुख्यमंत्री बना दिया। कहना न होगा कि उस समय बिहार में राजनीति और अपराध की दुनिया में बहुत कुछ घट रहा था जो किसी फिल्मी पटकथा से कम रोचक और दिलचस्प नहीं था। बिहार में उन्हीं दिनों की राजनीतिक घटनाओं और बाहुबलियों को केंद्र में रखकर कई बेवसीरीज बने भी और अब भी बन रहे हैं।

हाल में दो वेबसीरीज आई है जिसके केंद्र में बिहार की राजनीति, बिहार के बाहुबली और बिहार की राजनीतिक और आपराधिक घटनाएं हैं। जी 5 पर बाहुबलियों को केंद्र में रखकर एक सीरीज आती है जिसका नाम है ‘रंगबाज’। इस वेब सीरीज के पहले सीजन में उत्तर प्रदेश के खतरनाक अपराधी श्रीप्रकाश शुक्ल के कारनाओं पर आधारित पूर्वांचल की राजनीति को दिखाया गया था। इसमें हरिशंकर तिवारी और वीरेन्द्र शाही के बीच चलनेवाले खूनी खेल को फिक्शनलाइज किया गया था। रंगबाज का पहला सीजन 22 दिसंबर 2018 को रिलीज हुआ था। इस शृंखला में 20 दिसंबर 2019 को राजस्थान के गैंगस्टर आनंदपाल सिंह के अपराध पर सीरीज आई। इस कहानी में राजस्थान की राजनीति के उन आयामों को भी दर्शकों के सामने पेश किया गया है जिसके बारे में देश दुनिया को जानकारी कम थी। ‘रंगबाज फिर से’ नाम से के बाद इस वर्ष 29 जुलाई को ‘रंगबाज, डर की राजनीति’ के नाम से बिहार के सिवान के बाहुबली नेता शहाबुद्दीन के बनने और उनके मिटने की कहानी को दर्शकों के सामने पेश किया गया है। रंगबाज के इस सीजन में बिहार में सामाजिक न्याय के दौर की राजनीति के दांव पेंच और अपने राजनीतिक लक्ष्य को हासिल करने के लिए हिंसा का सहारा लेने के बारे में विस्तार से बताया गया है। शहाबुद्दीन के किरदार के साथ विनीत कुमार सिंह ने न्याय किया है। वेब सीरीज के इस सीजन की स्क्रिप्ट बहुत कसी हुई है। इसमें शहाबुद्दीन की प्रेमकथा वाले प्रसंग को भी उभारा गया है। शहाबुद्दीन के चरित्र के क्रूरतम पक्ष पर अपेक्षाकृत कम फोकस किया गया है। चंदा बाबू, जिनके बेटों की हत्या हुई थी, के दर्द और संघर्ष को उभारने में निर्देशक लगभग नाकाम रहे हैं। कहा जा सकता है कि ये सीजन शहाबुद्दीन पर केंद्रित है इस वजह से चंदा बाबू पर ज्यादा फोकस नहीं किया गया है। अगर चंदा बाबू के दर्द और संघर्ष को उभारा गया होता तो शहाबुद्दीन के कारनामों को अधिक प्रामाणिकता के साथ पेश किया जा सकता था। दरअसल इस तरह से सीरीज के लेखक सुनी सुनाई बातों, पुस्तकों और इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री के आधार पर कहानी कंस्ट्रक्ट करते हैं। उनको उस दौर के समाचरपत्रों को भी देखना चाहिए और कहानी लिखने के पहले प्राथमिक स्त्रोतों तक पहुंचना चाहिए था।

बिहार के मुख्यमंत्री रहते हुए लालू प्रसाद यादव जब घोटाले के भंवर में फंसे तो उन्होंने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बना दिया था। उस घटना पर केंद्रित वेब सीरीज महारानी का दूसरा सीजन भी आया है। दूसरे सीजन में निर्देशक और लेखक ने इसकी कहानी को बहुत अधिक काल्पनिक बनाकर फिल्मी बनाने की कोशिश की है। इसमें पति पत्नी के बीच के संघर्ष में ‘वो’ की एंट्री कहानी को ‘पति पत्नी और वो’ की ओर ले जाती है। केंद्रीय पात्र भीमा भारती का अपनी पार्टी की कार्यकर्ता कीर्ति सिंह के साथ प्रेम चलता है। फिल्मी अंदाज में तीज वाले दिन जब भीमा भारती अपनी प्रेमिका कीर्ति सिंह के साथ अकेले कमरे में होते हैं तो रानी भारती की एंट्री कराई जाती है। ये बेहद पुराना फार्मूला रहा है। इस सीरीज में भी जब ये प्रसंग आता है तो दर्शक चौंकता नहीं है क्योंकि उसको पता है कि आगे क्या होनेवाला है। प्रेम प्रसंग के अलावा इसमें राजनीति की तमाम साजिशें हैं, तिकड़में हैं, डरा धमकाकर नेताओं को अपने पाले में लाने की कोशिश भी है। पूरी कहानी अविभाजित बिहार में चलती है जहां शिबू सोरेन का किरदार भी महत्वपूर्ण पात्र के रूप में सामने आता है। झारखंड राज्य को लेकर सियासी सौदेबाजी भी है। इसके अलावा कई किरदार बिहार की समकालीन राजनीति के नेताओं से मेल खाते हैं। बहुत वर्षों पहले पटना में एक विधायक ने एक लड़की के साथ रेप किया था। वो आपराधिक वारदात देश भर में चर्चित हुआ था। उस घटना को भी महारानी सीजन 2 में दिखाकर इसको बिहार की कहानी बताने और बनाने की कोशिश निर्माताओं ने की है। और तो और इसमें चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर के चरित्र से मेल खाता एक महिला पात्र गढ़ा गया है जो हमेशा लैपटाप पर आंकड़ों का खेल करती है। अपने नेता की छवि निर्माण में लगी रहती है।

रानी भारती के रोल में हुमा कुरैशी ने बेहतरीन अभिनय किया है लेकिन उनको अपने उच्चारण पर काम करने की जरूरत है। जब वो बिहार की कम पढ़ी लिखी मुख्यमंत्री के रूप में बोलती हैं तो ये उनके बोली से परिलक्षित नहीं होता है। कई स्थितियों में उनका इस तरह का उच्चारण खटकता है। बावजूद इन कमियों के महारानी का सीजन 2 पहले सीजन से बेहतर है। अब निर्माताओं ने तीसरे सीजन का भी संकेत दे दिया है। भीमा भारती की हत्या हो जाती है। दूसरे सीजन के अंत में जिस तरह से वेबसीरीज को मर्डर मिस्ट्री बनाने की कोशिश हुई है उसको देखकर लगता है कि इस सीरीज को लिखनेवालों के सामने राजनीति की जमीन को पकड़े रहने की चुनौती होगी। अन्यथा राजनीति से आरंभ होकर ये वेबसीरीज प्रेम त्रिकोण के रास्ते अपराध कथा में बदल जाएगी। ये अच्छी बात है कि बिहार की राजनीति और यहां की आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं पर मनोरंजन की दुनिया का ध्यान गया है। बिहार में इस तरह के पात्रों और घटनाओं की कमी नहीं है। अभी न बने लेकिन भविष्य में इस बात की संभवाना तो है ही कि जब महारानी का चौथा या पांचवा सीजन आएगा तो उसमें नीतीश कुमार के राजनीतिक दांव-पेंच और अलग अलग पार्टियों के साथ सरकार बनाने की घटनाओं पर भी रोचक कहानी कंस्ट्रक्ट होगी। तब इसको देखना और दिलचस्प होगा।   

Saturday, February 27, 2021

कलात्मक(?) अराजकता पर अंकुश


हाल के दिनों में दो तीन ऐसी खबरें आईं जो मनोरंजन की दुनिया की दशा और दिशा दोनों बदल सकती है। एक खबर है कि अमेजन प्राइम वीडियो से जुड़ीं अपर्णा पुरोहित का पुलिस ने बयान दर्ज करवाया। ये बयान वेब सीरीज ‘तांडव’ में आपत्तिजनक कटेंट को लेकर दर्ज कराए गए केस के संबंध में लिया गया है। साढे तीन घंटे तक अपर्णा पुरोहित से लखनऊ के हरतगंज कोतवाली में पुलिस ने पूछताछ की। इससे ही जुड़ी एक और खबर आई प्रयागराज से। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपर्णा पुरोहित को अग्रिम जमानत देने से इंकार कर दिया। अपर्णा पुरोहित पर वेब सीरीज ‘तांडव’ तो लेकर नोएडा में भी केस दर्ज हुआ था, उस सिलसिले में वो हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत चाहती थीं। पिछले कई सालों से वीडियो स्ट्रीमिंग साइट, जिसको ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म भी कहते हैं, पर दिखाई जानेवाले वेब सीरीज की सामग्री को लेकर तो कई बार वहां दिखाई जानेवाली फिल्मों को लेकर विवाद होते रहे हैं। पिछले तीन साल से इन वेब सीरीज पर दिखाए जानेवाली सामग्री में हिंसा, यौनाचार, मनोरंजन की आड़ में विचारधारा की पैरोकारी, हिंदू धर्म प्रतीकों का गलत चित्रण से लेकर अन्य कई तरह के आरोप लगते रहे हैं। जब भी इन बातों को लेकर विवाद उठते थे तो सरकार से ये मांग भी की जाती थी कि ओटीटी पर दिखाई जानेवाली सामग्री के संदर्भ में विनियमन नीति लागू की जानी चाहिए। इस स्तंभ में भी लगातार इस बारे में चर्चा जाती रही है कि इस क्षेत्र में बढ़ रही अराजकता पर अंकुश लगाने के लिए सरकार को दिशा निर्देश या कटेंट के प्रमाणन की व्यवस्था करनी चाहिए। सरकार के स्तर पर विनियमन लागू करने के लिए इस क्षेत्र में काम कर रही कंपनियों के प्रतिनिधियों के साथ कई दौर के  संवाद भी हुए थे, लेकिन किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सका था। इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने ओटीटी पर दिखाई जानेवाली सामग्री को लेकर 2018 में सख्त टिप्पणी की थी, संसद में भी ये मामला कई बार उठा । इस पृष्ठभूमि में सरकार ने ओटीटी पर दिखाई जानेवाली सामग्री को लेकर अब एक दिशा निर्देश जारी कर दिया है।

केंद्र सरकार के दिशा-निर्देश में ओटीटी पर दिखाई जानेवाली सामग्री के लिए स्वनियमन की बात की गई है। स्वनियमन की बात तो की गई है लेकिन ये नियमन कैसे हो और इसका दायरा क्या हो इसको सरकार ने स्पष्ट कर दिया है। ये स्पष्ट कर दिया गया है कि कोई भी प्लेटऑर्म भारत की एकता, अखंडता और संप्रभुता को आघात पहुंचानेवाले दृश्य और संवाद नहीं दिखाएंगें। कलात्मक स्वतंत्रता की आड़ में कोई भी ऐसी सामग्री दिखाने की अनुमति नहीं होगी जो कानून सम्मत नहीं है। लेकिन सरकार ने दिशा निर्देश जारी करते हुए सेवा प्रदताओं को इसका तंत्र विकसित करने को कहा है। अच्छी बात ये है कि सरकार ने जो व्यवस्था बनाई है उसमें कार्यक्रमों को दिखाने के पहले किसी से अनुमति लेने की बात नहीं है यानि की प्री सेंसरशिप का रास्ता सरकार ने नहीं अपनाया। उन्होंने सबकुछ इन प्लेटफॉर्म पर छोड़ दिया है। नए नियमों के अनुसार सेवा प्रदाता कंपनियों को खुद अपनी सामग्रियों का वर्गीकरण करना होगा। बच्चों के देखने लायक सामग्री से लेकर अलग अलग उम्र की मनोरंजन सामग्रियों का वर्गीकरण कर दिया गया है। सेवा प्रदाता कंपनियों को इसका पालन करना होगा। अगर किसी को शिकायत होती है या किसी प्रकार से इन नियमों का उल्लंघन होता है तो उससे निबटने के लिए तीन स्तरीय व्यवस्था बनाई गई है। ये व्यवस्था लगभग उसी तर्ज पर है जिस तर्ज पर टेलीविजन के कार्यक्रमों का स्वनियमन होता है। 

सरकार के इस स्वनियम के दिशा निर्देशों को लेकर तमाम तरह की शंकाएं जताई जा रही हैं। फिल्म इंडस्ट्री के कुछ स्वयंभू निर्देशक इस कदम की आलोचना कर रहे हैं और इसको कलात्मक स्वतंत्रता को बाधित करनेवाला कदम बता रहे हैं। दरअसल जब वो कलात्मक स्वतंत्रता की बात करते हैं तो उनको इस बात का ध्यान नहीं रहता कि ये स्वतंत्रता असीमित नहीं है। भारतीय संविधान में अभिव्यक्ति की आजादी की सीमाओं को भी स्पष्ट किया गया है। ऐसा भी नहीं है कि इंटरनेट मीडिया पर चलनेवाले इन मनोरंजन के माध्यमों के लिए दिशानिर्देश जारी करनेवाला भारत दुनिया का पहला देश है। कई देशों में ओटीटी के लिए स्पष्ट दिशा निर्देश हैं। सिंगापुर में तो बकायदा इसके लिए एक प्राधिकरण है जिसको इंफोकॉम मीडिया डेवलपमेंट अथॉरिटी कहते है। इसकी स्थापना ब्राडकास्टिंग एक्ट के तहत की गई थी। इसमें सभी सेवा प्रदताओं को ब्राडकास्टिंग एक्ट के अंतर्गत इस प्राधिकरण से लाइसेंस लेना पड़ता है। ओटीटी, वीडियो ऑन डिमांड और विशेष सेवाओं के लिए एक विशेष कंटेंट कोड है। इसमें सामग्रियों के वर्गीकरण की स्पष्ट व्यवस्था है। सिंगापुर की इंफोकॉम मीडिया डेवलपमेंट प्राधिकरण को अधिकार है कि वो ओटीटी प्लेटऑर्म पर दिखाई जानेवाली सामग्री को अगर कानून सम्मत नहीं पाती है तो उसका प्रसारण रोक दे।इसके अलावा नियम विरुद्ध सामग्री दिखाने पर जुर्माना लगाने का भी प्रावधान है। सिर्फ सिंगापुर ही नहीं बल्कि ऑस्ट्रेलिया में भी इस तरह के प्लेटऑर्म पर नजर रखने के लिए ई सेफ्टी कमिश्नर हैं। उनका दायित्व है वो डिजीटल मीडिया पर चलनेवाली सामग्रियों पर नजर रखें। वहां तो विनियमन इस हद तक है कि ई सेफ्टी कमिश्नर अगर पाते हैं कि किसी मनोरंजन सामग्री का वर्गीकरण अनुचित है या गलत तरीके से उसको किया गया है तो वो दंड के तौर पर उसको प्रतिबंधित भी कर सकते हैं। ऑस्ट्रेलिया में भी ओटीटी पर चलनेवाली सामग्री की शिकायत मिलने पर उसके निस्तारण की एक तय प्रक्रिया है। इसके अलावा भी दुनिया के कई देशों में किसी न किसी तरह के दिशा निर्देश लागू हैं। हमारे देश में अबतक ओटीटी की सामग्री को लेकर किसी तरह का कोई नियमन नहीं था। इसका नतीजा यह था कि कई प्लेटफॉर्म पर तो बेहद अश्लील सीरीज भी परोसे जा रहे थे, बिना किसी वर्गीकरण के। कहीं किसी कोने में छोटा सा अठारह प्लस लिख दिया जाता था लेकिन किसी प्रकार की कोई रोक टोक नहीं थी। कोई भी उसको देख सकता था।

जहां तक कलात्मक स्वतंत्रता को बाधित करने की बात है उसको लेकर जो लोग प्रश्न खड़े कर रहे हैं वो यह भूल रहे हैं कि हमारे देश में फिल्मों को भी रिलीज के पहले प्रमाणन करवाना होता है। क्या इस प्रमाणन की व्यवस्था से हमारे देश में फिल्मों की कलात्मक स्वतंत्रता बाधित हुई? टीवी चैनलों को लेकर स्वनियमन लागू है क्या टीवी चैनलों पर दिखाई जानेवाली सामग्रियों में कलात्मक स्वतंत्रता बाधित दिखती है? दरअसल इस तरह के नियमनों से अराजकता पर रोक लगती है। ये कौन सी कलात्मक स्वतंत्रता है जिसमें वेब सीरीज की आड़ में राजनीति की जाती हो, भारतीय सेना की छवि को धूमिल किया जाता हो, कश्मीर में सेना के क्रियाकलापों को गलत तरीके से पेश किया जाता हो, हिंसा, गाली गलौच और यौनिकता के दृश्यों को प्रमुखता से दिखाया जाता हो। कोई भी माध्यम समाज सापेक्ष होना चाहिए, समाज से, संस्कृति से, निरपेक्ष होकर कला का विकास नहीं हो सकता है। समाज और संस्कृति को छोड़कर कोई भी कला अपने उच्च शिखर को प्राप्त नहीं कर सकती है। और इस मामले में तो सरकार ने बहुत लंबे समय तक प्रतीक्षा की कि ओटीटी प्लेटफॉर्म अपनी तरफ से कोई स्वनियमन की नीति बनाकर देंगे लेकिन जब उनके बीच सहमति नहीं बन सकी तो सरकार ने दिशा निर्देश जारी कर दिए। जो लोग इसको बाधा मान रहे हैं उनको ये पता होना चाहिए कि कला भी अनुशासन की मांग करती है। सरकार ने ओटीटी के लिए दिशा निर्देश जारी करने में थोड़ी देरी अवश्य की लेकिन अब जब ये जारी हो गा है तो उम्मीद की जानी चाहिए कि ओटीटी पर हम वाक्य में गाली गलौच नहीं होगी और अश्लीलता की सीमाएं भी नहीं टूटेंगीं।  

Thursday, December 24, 2020

देसी कहानियों के बोलबाला का वर्ष


वर्ष 2020 खत्म होने को आया। लगभग पूरा वर्ष कोराना संकट से जूझते ही बीता। कोरोना वायरस के फैलाव को रोकने के लिए किए गए लॉकडाउन की वजह से पूरे देश के सिनेमा हॉल कई महीनों तक बंद रहे। कोरोना के भय के कम होने के बाद जब सिनेमा हॉल खुले तब भी दर्शकों का पुराना प्यार नहीं मिल पाया है। मनोरंजन के विकल्प के तौर पर लोगों की रुचि वीडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स में बढ़ी। फिल्में भी वहीं रिलीज होने लगीं। वीडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स या ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म्स पर दर्शकों की संख्या में भी अभूतपूर्व इजाफा हुआ, महानगरों से लेकर छोटे शहरों और कस्बों तक में। ये वो घटनाएं रहीं जिनके बारे में चर्चा होती रही है लेकिन कोरोना संकट के दौरान पिछले नौ महीने में कुछ ऐसा मंहत्वपूर्ण हुआ जिसने मनोरंजन जगत को बहुत गहरे तक प्रभावित किया। उसकी दिशा में अहम बदलाव देखने को मिला। सबसे पहले जिस महत्ववपूर्ण बदलाव को रेखांकित करने की जरूरत है वो है कहानियों में भारतीय परिवेश और भारतीयता का बढ़ता चलन। अगर हम इस वर्ष रिलीज हुई फिल्मों और वेब सीरीज पर नजर डालें तो इनकी कहानियों में भारतीयता बोध उभर कर सामने आता है। फिल्मकारों ने उन कहानियों को तवज्जो दी और दर्शकों ने भी उसको पसंद किया जिसमें अपनी माटी की मिट्टी की खुशबू थी, अपने आसपास की कहानी होने का लगाव सा था या अपने समाज में घटी या घट रही घटनाओं का चित्रण है। जैसे अगर हम बात करें तो सबसे पहले जून में रिलीज हुई फिल्म ‘गुलाबो सिताबो’ का कथानक जेहन में आता है। एक हवेली के माध्यम से मिर्जा और उनकी बेगम के बीच रची गई इस कॉमेडी ड्रामा में लखनऊ का परिवेश साकार हो उठता है। इस फिल्म की कहानी के साथ साथ संवाद में भी लखनऊ की पूरी संस्कृति उपस्थित है। ‘गुलाबो सिताबो’ की रिलीज के अगले ही महीने एक और फिल्म आई जिसमें हमारे आसपास की ही एक और कहानी को दर्शकों ने खूब पसंद किया, ये फिल्म थी ‘शकुंतला देवी’। इस फिल्म में गणित की जीनियस शकुंतला देवी के बहाने दर्शकों को आजादी पूर्व के दक्षिण भारत के एक गांव का परिवेश दिखता है। वहां के सामाजिक यथार्थ से सामना होता है और फिर ये कहानी महानगरों से होती हुई दर्शकों को देश विदेश ले जाती है। इस पूरी कहानी में भारतीय परिवार के सस्कारों को स्थापित किया गया है। एक और फिल्म का उल्लेख करना आवश्यक है वो है ‘गुंजन सक्सेना, द करगिल गर्ल’। इस फिल्म में भी एक भारतीय महिला अफसर की जाबांजी के किस्से को फिल्मी पर्दे पर उतारा गया है। 

हम इन फिल्मों में एक साझा सूत्र की तलाश करें तो हमें अपने देसी परिवेश और यहां का संघर्ष दिखाई देता है, भारतीय होने का गौरव दिखाई देता है। कोरोना संकट शुरू होने के पहले एक फिल्म आई थी तान्हाजी, इसमें भी हमारे देश के उस नायक को फिल्मी पर्दे पर उतारा गया था जिसकी वीरता के किस्से लोकगाथाओं में गूंजते हैं। इन सबके मद्देनजर ये भी कहा जा सकता है कि ये वर्ष फिल्मों में लेखकों की वापसी का वर्ष भी रहा। बीच में इस तरह की कहानियां आ रही थीं जिनके बारे में ‘माइंडलेस कॉमेडी’ जैसे शब्द कहे जाते थे लेकिन इस वर्ष जितनी भी कहानियां आईं उसमें अगर कॉमेडी भी थी तो उसका एक अर्थ था, एक संदेश था। इस तरह की एक और फिल्म आई ‘छलांग’, जिसकी कहानी हरियाणा के एक गांव के स्कूल के इर्द गिर्द चलती है। ये भी एक कॉमेडी ड्रामा ही है लेकिन इसमें भी हरियाणा का परिवेश जीवंत हो उठता है। एक जमाना था जब विदेशी फिल्मों के प्लॉट उठातक उसको भारतीय स्थितियों में ढालकर चित्रित किया जाता था। यहां तक अब तक की सबसे हिट फिल्म मानी जानेवाली ‘शोले’ को भी कुरुसोवा की फिल्म सेवन समुराई पर आधारित माना गया था। लेकिन इस वर्ष को भारतीय फिल्मों में भारतीय कहानियों के वर्ष के तौर पर याद किया जाएगा। 

इसी तरह से अगर हम वेब सीरीज देखें तो उसमें भी भारतीय कहानियों की मांग ही बढ़ी। वीडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स पर दुनियाभर की सीरीज मौजूद हैं लेकिन भारतीय कहानियों और लोकेल पर पर बनी सीरीज अधिक पसंद की गईं। इस साल रिलीज हुई वेब सीरीज पर नजर डालें तो चाहे वो आर्या हो, पाताल लोक हो, आश्रम हो, बंदिश बैंडिट्स हो, पंचायत हो इन सबमें हमारे आसपास की कहानियां हैं। ना सिर्फ कहानियों में बल्कि इन सीरीज की भाषा और मुहावरों में भी देसी बोली के शब्दों को जगह मिलने लगी है। अगर हम याद करें तो एक वेब सीरीज आई थी जामताड़ा, सबका नंबर आएगा। इस फिल्म के संवाद में ‘कनटाप’ शब्द का उपयोग हुआ है। ये शब्द कानपुर और उसके आसपास में प्रयोग किया जाता है। इसी तरह से वेब सीरीज आर्या में भी राजस्थान की भाषा सहज रूप से आती है और लोग उसको स्वीकार भी करते हैं और पसंद भी। इन बिंदुओं को ध्यान में रखते हुए ये कहा जा सकता है कि ये वर्ष भारतीय मनोरंजन जगत के आत्मनिर्भर होने और अपनी आंतरिक सामर्थ्य को पहचानने का वर्ष भी रहा। 

Saturday, November 28, 2020

प्रगतिशीलता के नाम पर बौद्धिक अपराध


इन दिनों एक वेब सीरीज को लेकर विवाद जारी है। विवादों के केंद्र में एक बार फिर ओवर द टॉप प्लेटफॉर्म (ओटीटी) नेटफ्लिक्स और उसपर दिखाई जा रही सीरीज ‘अ सुटेबल बॉय’ है। ये सीरीज विक्रम सेठ की 1993 में इसी नाम से प्रकाशित औपन्यासिक कृति पर आधारित है। उपन्यास में भारत विभाजन के बाद की कहानी कही गई है, जाहिर है कि वेब सीरीज में भी इसी कहानी को चित्रित किया गया है। विवाद इस वजह से उठा कि इस सीरीज की नायिका लता और उसके मित्र कबीर के बीच मंदिर प्रांगण में चुंबन दृश्य दिखाया गया है। इस वेब सीरीज के खिलाफ रीवा में पहली शिकायत दी गई। शिकायत में कहा गया कि सीरीज में मध्य प्रदेश के महेश्वर घाट के शिव मंदिर प्रांगण में तीन बार एक मुस्लिम लड़के ने हिंदी लड़की का चुंबन लिया है जो हिंदू समाज की भावनाओं को आहत करती है। पुलिस और प्रशासन से मांग की गई कि नेटफ्लिक्स की दो अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया जाए। पुलिस ने आरंभिक जांच के बाद केस दर्ज कर लिया और जांच कर रही है। कानून अपना काम करेगी। इस शिकायत के बाद देश-विदेश में इस बात को लेकर चर्चा आरंभ हो गई। विदेशी अखबारों में इसकी आलोचना करते हुए लेख लिखे जा रहे हैं। अपने यहां भी इंटरनेट मीडिया पर खुद को प्रगतिशील और लिबरल समझनेवाले कथित ‘विद्वानों’ ने ‘अ सुटेबल बॉय’ के चुंबन दृश्य के चित्र को खजुराहो के मंदिर की मूर्तियों के चित्र के साथ लगाकर टिप्पणियां करनी शुरू कर दीं। अब इन तथाकथित प्रगतिशीलों को कौन समझाए कि चित्रों या फिल्मों के दृश्यों की प्रभावोत्पादकता का आकलन संदर्भों के बगैर अनुचित है। अगर ‘अ सुटेबल बॉय’ के चुंबन दृश्य और खजुराहो के चित्रों पर वस्तुनिष्ठ तरीके से विचार करें तो दोनों चित्रों के संदर्भ अलग हैं, लेकिन प्रगतिशीलों की बगैर संदर्भों को समझे या जानबूझकर किसी भी चीज को संदर्भ से काटकर प्रस्तुत करने की प्रविधि पुरानी है। 

पूरे देश ने एम एफ हुसैन के मामले में भी प्रगतिशीलों की इस प्रविधि को देखा था। हुसैन जब हिंदू देवी देवताओं के नग्न चित्र बना रहे थे तो उसको कला का उत्कृष्ट नमूना बताया गया था। उस वक्त भी उसकी तुलना खजुराहो के मंदिरों की दीवारों पर बनाई गई मूर्तियों से की गई थीं। उस वक्त भी इस बात को छिपा लिया गया था कि हुसैन जब किसी को अपमानित करना चाहते थे तो उसका नग्न चित्र बनाते थे। जबकि ये बात स्वयं हुसैन ने कही थी। हुआ ये था कि हुसैन ने एक बार महात्मा गांधी, कार्ल मार्क्स, आइंस्टीन और हिटलर की पेंटिंग बनाई थी। उस पेंटिंग में उन्होंने सिर्फ हिटलर को नग्न दिखाया था। जब इस बारे में उनसे सवाल पूछा गया कि पेंटिंग में उन्होंने सिर्फ हिटलर को ही नग्न क्यों चित्रित किया तो हुसैन ने साफ तौर पर कहा था कि किसी को अपमानित करना का उनका ये तरीका है। जब उनके हिंदू देवियों के नग्न चित्र बनाने पर विरोध हो रहा था तब खुद को उदारवादी माननेवाले या कलात्मक अभिव्यक्ति की पैरोकारी करनेवालों ने हुसैन के इस कथन को छुपा लिया था ।वो खजुराहो मंदिर की मूर्तियों के बहाने से पूरे देश को कलात्मकता की परिभाषा समझाने में जुट गए थे। उद्देश्य ये था कि हुसैन का बचाव किया जाए और उनका विरोध करनेवालों को अपनी परंपरा से अनभिज्ञ करार दिया जाए। अब एक बार फिर जब ये मसला उठा है तो खजुराहो की मंदिर की मूर्तियों की आड़ लेकर इस वेब सीरीज का बचाव किया जा रहा है। 

समग्रता में नेटफ्लिक्स पर दिखाई जानेवाली वेब सीरीज पर विचार करें तो एक पैटर्न दिखाई देता है। इस प्लेटफॉर्म पर दिखाई जानेवाली सीरीज में हिंदू धर्म या हिंदू देवी-देवताओं या हिंदू धर्म प्रतीकों का अपमानजनक तरीके से चित्रण किया जाता रहा है। वेब सीरीज ‘लैला’ से लेकर ‘द सूटेबल बॉय’ तक में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से ये दिखता है। नेटफ्लिक्स ही क्यों अन्य ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर भी हिंदू धर्म प्रतीकों का अक्सर ही मजाक उड़ाया जाता है। संवादों में भी भावनाएं आहत करनेवाली टिप्पणियां की जाती हैं। पात्रों के नाम भी इस तरह से रखे जाते हैं जो इनकी मंशा को साफ तौर पर उजागर करते हैं। प्राइम वीडियो पर एक वेब सीरीज आई थी ‘पाताल लोक’ उसमें पालतू कुतिया का नाम सावित्री रखा गया था। अब इसके पीछे की मंशा क्या हो सकती है, समझा जा सकता है। यूट्यूब पर मसखरी करनेवाले कई हास्य कलाकार भी हिंदू देवी देवताओं को लेकर कैसी भी बात बोल जाते हैं। शंकर भगवान को लेकर जाने कैसी कैसी फूहड़ बातें कही जाती हैं बगैर शिव के व्यक्तित्व को समझे। हनुमान जी को लेकर भी उलजलूल टिप्पणियां की जाती हैं। हमारे पौराणिक ग्रंथ में वर्णित चरित्रों को लेकर भी अपमानजनक बोल बोले जाते हैं। इन सब बातों को लेकर किसी को आपत्ति हो और वो भारतीय संविधान के अंतर्गत कानून का सहारा लेता है तो देश को आहत भावनाओं का गणतंत्र करार दे दिया जाता है। ये सिर्फ वेब सीरीज आदि में ही नहीं दिखता है, फिल्मों में बहुधा इस तरह की बातें दिख जाती हैं। फिल्म ‘पीके’ से लेकर ‘ओ माई गॉड’ तक के संवाद और दृश्य देखे जा सकते हैं।

इसका एक दूसरा पक्ष भी है। जब भी किसी फिल्म में किसी मुस्लिम चरित्र को खलनायक के तौर पर पेश किया जाता है तो उसपर भी आपत्ति शुरू हो जाती है। यहां इस बात का उल्लेख करना जरूरी है कि फिल्म ‘पद्मावत’ में खिलजी के चरित्र चित्रण पर भी कई लोगों को आपत्ति हुई थी।  फिल्म में खिलजी के चरित्र चित्रण को इतिहास के मलबे में दबे दुर्गुणों को पेश करने जैसा बता दिया गया था। तब मलिक मुहम्मद जायसी लिखित काव्य पद्मावत की व्याख्या की जाने लगी थी। कई लोगों ने इस बात को भी रेखांकित किया कि फिल्म में हिंदू राजा को अच्छा और मुस्लिम राजा को बर्बर दिखाया गया था। तब दक्षिण एशियाई साहित्य के विदेशी विद्वान थॉमस ड ब्रूइन की पुस्तक ‘रूबी इन द डस्ट’ का सहारा लिया गया था। इस पुस्तक में ब्रूइन ने जायसी की कृति पद्मावत की व्याख्या की है। जब भी किसी फिल्म में मुसलमानों को आक्रांताओं के तौर पर दिखाया जाता है तो ये कथित प्रगतिशील तबका येन केन प्रकारेण उसकी आलोचना में जुट जाते हैं और इधर उधर से तर्क जुटाने की कोशिश करते हैं। इस बात की पैराकारी भी करने लगते हैं कि इतिहास को धर्म के आधार पर व्याख्यायित करना गलत होगा। इसी तरह से जब फिल्म ‘मणिकर्णिका’ के एक सीन में अंग्रेज सैनिक बछड़े को पकड़कर कर उसका मांस खाने की तैयारी में होते हैं तो रानी लक्ष्मीबाई बछड़े को अंग्रेज सैनिकों के चंगुल से छुड़ाती हैं। वहां रानी लक्ष्मीबाई का एक संवाद है कि ‘जिस धरती पर तुम लोग खड़े हो वहां के लोगों और उनकी भावनाओं का सम्मान करना सीखो।‘ इस दृश्य और संवाद में कुछ गलत नहीं था लेकिन इसको हिंदू राष्ट्रवाद से जोड़ दिया गया। ये भी याद दिलाने की कोशिश की गई कि रानी लक्ष्मीबाई और आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर द्वितीय अंग्रेजों के खिलाफ उस लड़ाई में साथ थे। इस तरह के ढेरों उदाहरण हैं जहां एक ही तरह की स्थिति में हिंदुओं और मुसलमानों के लिए अलग अलग मानदंड हैं। एक ही तरह की स्थितियों को देखने के लिए अलग अलग प्रिज्म है। ये एक तरह का बौद्धिक अपराध है जिसके लिए किसी कानूनी सजा का प्रावधान नहीं है इसको तो बौद्धिकता के अखाड़े में ही चुनौती देनी होगी। 


Saturday, June 27, 2020

वेब सीरीज पर लगाम कसने का समय


‘दुख हुआ, वेब-सीरीज ‘रसभरी’ में असंवेदनशीलता में एक छोटी बच्ची को पुरुषों के सामने उत्तेजक नाच करते हुए, एक वस्तु की तरह दिखाना निंदनीय है। आज रचनाकार और दर्शक सोचें कि बात मनोरंजन की नहीं, यहां बच्चियों के प्रति दृष्टिकोण का प्रश्न है, यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है या शोषण की मनमानी? यह प्रश्न उठा रहे हैं केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड, जिसको बातचीत में सेंसर बोर्ड भी कहा जाता है, के अध्यक्ष और मशहूर गीतकार प्रसून जोशी। प्रसून जोशी पहले भी अपनी आपत्तियों को सार्वजनिक करने से बचते रहे हैं और जब से प्रमाणन बोर्ड के अध्यक्ष बने हैं तब से तो बिल्कुल ही नहीं बोलते हैं, लेकिन वेबसीरीज ‘रसभरी’ के इस दृष्य ने उनको इतना उद्वेलित कर दिया कि वो सामने आए। उनकी इस आपत्ति का उत्तर दिया ‘रसभरी’ वेबसीरीज की नायिका स्वरा भास्कर ने, ‘आदर सहित सर, शायद आप सीन को गलत समझ रहे हैं, सीन का जो वर्णन किया है वो उसके ठीक उल्टा है। बच्ची अपनी मर्जी से नाच रही है, पिता देखकर झेंप जाता है और शर्मिंदा होता है। नाच उत्तेजक नहीं है, बच्ची बस नाच रही है, वो नहीं जानती समाज उसे सेक्सुअलाइज करेगा-सीन यही दिखाता है।‘  स्वरा बचाव करने की लाख कोशिश करे लेकिन बच्ची से उत्तजेक गाने पर नाच करवाने की कहानी या कहानी में जो पृष्ठभूमि या संवाद है उससे ही मंशा का पता चलता है। बच्ची के नाच के पहले एक महिला का ये कहना कि, ‘थोड़ा बहुत नाच गाना लड़कियों को आना चाहिए, कल को अपने पति को रिझाए रखेगी’ और गाना देखकर फिर वही महिला कहती है कि ‘तेरी बेटी के लक्षण ठीक नहीं लग रहे’ तो दूसरी महिला खास अदा के साथ कहती है कि ‘ये सिर्फ अपने पति को नहीं बल्कि पूरे मुहल्ले को रिझाएगी।‘ अगर इन संवादों के साथ प्रसून जोशी की आपत्ति को देखेंगे तो उसमें एक गंभीरता दिखाई देती है और स्वरा की प्रतिक्रिया बेहद हल्की और तथ्यहीन। किसी भी मुद्दे पर विचार करने से पहले उसपर समग्रता से सोचना आवश्यक होता है अन्यथा प्रतिक्रिया सतही होती है।

‘रसभरी’ और उसमें स्वरा की भूमिका ऐसी है जिसको खुद स्वरा ही नहीं चाहती की उसके पिता इस वेब सीरीज को उस वक्त देखें जब वो उनके आसपास हो। ये तो स्वरा ने सार्वजनिक रूप से माना है। उसके पिता ने अपनी बेटी को शाबाशी देते हुए ट्वीट किया कि उनको अपनी बेटी की प्रतिभा पर गर्व है। इसके उत्तर में स्वरा ने लिखा कि ‘डैडी! कृपया इसको उस वक्त नहीं देखें जब मैं आपके आसपास रहूं।‘ अब जरा इस मानसिकता को समझिए कि एक पुत्री अपने पिता को सार्वजनिक रूप से कह रही है कि वो इस वेब सीरीज को अपनी बेटी के आसपास होने पर न देखें और वही प्रसून जोशी को समाज की मानसिकता आदि के बारे में नसीहत देती है और समझाती है कि बच्ची सिर्फ नाच रही है। वैसे भी ये वेब सीरीज इतना फूहड़ और इसके संवाद इतने स्तरहीन हैं कि इसको कोई भी संजीदा व्यक्ति परिवार के आसपास होने पर नहीं देखना पसंद करेगा। प्रसून जोशी ने एक वेब सीरीज में बच्ची के नाच को लेकर जो सवाल खड़ा किया है उसपर हमारे समाज को विचार करना चाहिए। क्या वेब सीरीज की दुनिया अब इतना नीचे गिर जाएगी कि वो यौन प्रसंगों से भी आगे बढ़कर अब बच्चियों को एक आब्जेक्ट के तौर पर पेश करेगी। लाभ कमाने के लिए इस तरह के हथकंडे अपनाना कहां तक उचित है? दरअसल ये एक और संकेत है कि ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म पर कंटेंट को लेकर कितनी अराजकता बढ़ती जा रही है। इन सीरीज पर किसी भी प्रकार का कोई नियमन नहीं होने की वजह से अराजकता अपने चरम पर है। पता नहीं क्यों वेब सीरीज निर्माताओं को ये क्यों लगता है कि अगर इनकी भाषा स्तरहीन रखी जाएगी, यौन प्रसंग होंगे, भयंकर हिंसा होगी तभी इसको दर्शक मिलेंगे। कुछ शुरुआती वेब सीरीज बनानेवाले निर्देशकों की वजह इस तरह की भ्रांति बनी। ‘रसभरी’ भी इसकी शिकार हुई है क्योंकि प्रचारित ये किया जा रहा है ‘रसभरी के जादू से कोई बच नहीं सकता एक बार आजमा कर तो देखो।‘ दो हजार अठारह में ‘वीरे द वेडिंग’ फिल्म में अपनी भूमिका से स्वरा ने जो छवि बनाई उसको ‘रसभरी’ पुष्ट करती है। कई बार इन सीरीज की प्रचार सामग्री से भी इस बात का अंदाज लग जाता है कि इसमें क्या होगा। लेकिन इसके ठीक पहले हॉटस्टार पर रिलीज ‘आर्या’ और उसके पहले प्राइम वीडियो पर रिलीज ‘पंचायत’ ने इस भ्रांति को भी तोड़ा कि जुगुप्साजनक अश्लीलता, नग्नता और हिंसा ही किसी सीरीज को चर्चित बनाती है। ‘आर्या’ में जिस तरह से ड्रग के धंधे को दिखाया गया है उसमें अश्लील दृश्यों को दिखाने की पूरी संभावना थी लेकिन निर्माता उस रास्ते पर नहीं चले। इस सीरीज में सुष्मिता सेन को लेकर या फिर अन्य नायिकाओं की नग्नता का प्रदर्शन किया जा सकता था लेकिन ऐसा किया नहीं गया और बहुत साफ सुथरे तरीके से कहानी आगे बढ़ती चली गई। दर्शक कहानी के सम्मोहन में इसके साथ जुडा रहता है। आज हालत ये है कि ‘आर्या’ किसी भी सीरीज से कम लोकप्रिय नहीं है। सुष्मिता सेन की अदाकारी, कहानी और संवाद का कसावट दर्शकों को अंत तक बांधे रखता है। इसमें भी कहीं-कहीं निर्माता भटकते दिखते हैं लेकिन फौरन संभल जाते हैं।
वेब सीरीज की अराजकता का दायरा धीरे-धीरे बढता जा रहा है। जो किताबें दशकों पहले फुटपाथ पर पीली पन्नियों में छुपाकर बेची जाती थीं, अब उसी स्तर की कहानियां और उसपर बनी फिल्में इन प्लेटफॉर्म पर वेबसीरीज के रूप में मौजूद हैं। ‘मस्तराम’ के नाम की जो किताबें कई सालों पहले किशोर और युवा छुपा कर पढते थे, कभी अपनी कोर्स की किताबों के बीच छुपाकर तो कभी घर के किसी सूने कोने में छिपकर अब उसी मस्तराम के नाम से पूरी की पूरी सीरीज ओटीटी पर उपलब्ध हैं। जिसमें उन किताबों की कहानियों को फिल्मा दिया गया है। इतना ही नहीं ‘कविता भाभी’, ‘लाली भाभी’ जैसी सीरीज भी उपलब्ध हैं। इन सीरीज में जो नग्नता दिखाई जा रही है उसपर समाज को विचार करना चाहिए। देशभर में इसपर चर्चा होनी चाहिए कि क्या इस तरह की नग्नता किसी प्लेटफॉर्म पर दिखाया जाना उचित है। क्या हमारा समाज इस तरह की सामग्री को परोसने की इजाजत दे सकता है। क्या हमारा समाज इतना परिपक्व हो चुका है कि इस तरह की कामोद्दीपक सीरीज को स्वीकार किया जा सके। कुछ लोग ये तर्क दे सकते हैं कि ओटीटी प्लेटफॉर्म फिल्मों से अलग है क्योंकि फिल्में सार्वजनिक तौर पर प्रदर्शित की जाती हैं, उसको सामूहिक तौर पर देखते हैं और वेब सीरीज को अपने मोबाइल पर व्यक्तिगत तौर पर देखते हैं। यह तर्क अपनी जगह सही हो सकता है लेकिन क्या इन वेब सीरीज पर इतना कंट्रोल है कि जो लोग वयस्क नहीं हैं और किशोरावस्था की दहलीज पर कदम रख रहे हैं या जिनको अभी यौनिकता की समझ विकसित नहीं हुई है वो इसको देख नहीं सके। वेब सीरीज की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए ऐसा लगता है कि अब समय आ गया है कि सरकार इसके बारे में कुछ सोचे। सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष की तरफ से बच्ची के नाच पर बयान आना क्या इस ओर कोई संकेत कर रहा है या फिर प्रसून जोशी के बयान को सिर्फ उनका व्यक्तिगत बयान माना जाए। तमाम नजरें सूचना प्रसारण मंत्रालय की ओर है।    

Saturday, April 13, 2019

बदलने लगा वेब सीरीज का रास्ता


इंटरनेट पर मनोरजंन के बढ़ते बाजार को ध्यान में रखते हुए नई-नई वेब सीरीज दर्शकों के सामने पेश की जा रही हैं। चूंकि इसमें किसी तरह की कोई सेंसरशिप नहीं है, इस वजह से निर्माता-निर्देशक अपने सीरीज को हिट कराने के लिए जुगुप्सा की हद तक हिंसा दिखाने से भी परहेज नहीं कर रहे हैं।यथार्थवादी कलात्मकता के नाम पर हिंसा और सेक्स सीन को भी प्रमुखता मिल रही है। गाली-गलौच वाले संवाद के बारे में तो कहना ही क्या। लस्ट स्टोरीज, सेक्रेड गेम्स, मिर्जापुर जैसी वेब-सीरीज में उपरोक्त मसाले भरपूर मात्रा में परोसे गए। गाली-गलौच के बचाव में ये तर्क दिया जाता है कि जिस भौगोलिक इलाके की इनमें कहानियां होती हैं वहां की बोलचाल की भाषा में गालियों का प्रयोग होता है लिहाजा उनकी मजबूरी है। इस तर्क की आड़ में निर्माता-निर्देशक उस परिवेश को नैचुरल दिखाने के लिए पात्रों से भरपूर गाली दिलवाते हैं। ज्यादातर सीरीज अपराध कथाओं पर आधारित होती हैं लिहाजा अपराध, सेक्स प्रसंग, गाली गलौच, जबरदस्त हिंसा आदि दिखाने की छूट मिल जाती है। प्रत्यक्ष रूप से इन मसालों को दिखाने के तर्क जो भी हों पर लक्ष्य तो दर्शकों को अपनी ओर खींचना ही होता है। ये लोग ये नहीं समझते हैं कि कला और साहित्य में ‘जीवन’ तो होता है पर ‘जीवन’ को जस का तस धर देना कला नहीं है। उनको ‘जीवन’ जैसा बनाने की कोशिश ही कला है। साहित्य में भी यथार्थवाद का दौर लंबे समय तक चला पर यथार्थ के नाम पर इतनी छूट नहीं ली गई जितनी वेब सीरीज में ली जा रही है। जिन भी फिल्मों में जीवन का फोटग्राफिक यथार्थ पेश किया जाता है वो श्रेष्ठ फिल्में नहीं मानी जाती हैं। निर्देशक अनुराग कश्यप अपनी फिल्मों से लेकर वेबसीरीज तक में इस दोष के शिकार नजर आते हैं। यह अलग बात है कि वो इसको यथार्थ के नाम पर बेचने में कई बार कामयाब हो जाते हैं।  
अभी हाल ही में एक वेब सीरीज आई है जिसका नाम है ‘क्रिमिनल जस्टिस’। ये इसी नाम से बनी ब्रिटिश वेब-सीरीज का भारतीय संस्करण है। करीब पैंतालीस मिनट के दस एपिसोड में जबरदस्त कहानी है। यहां भी समाज का यथार्थ अपने वीभत्स रूप में उपस्थित है, पर वो फोटोग्राफिक यथार्थ नहीं है। इसलिए यह अन्य वेब सीरीजों से अलग दिखता है। इस पूरे वेब सीरीज में समाज के विषमताओं पर भी चोट की गई है, बगैर अनुराग कश्यप की तरह लाउड हुए और बगैर किसी राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाते हुए। इस वेब सीरीज में एक ऐसे लड़के की कहानी है, जो फुटबॉल खेलता है, दोस्तों के साथ पार्टी करता है लेकिन उसको अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों का भी एहसास है। मैच जीतने की खुशी में दोस्तों के साथ पार्टी में जाने के पहले जब बहन उससे अनुरोध करती है कि वो अपने पिता की टैक्सी चलाकर कुछ पैसे कमा लाए तो वो मान लेता है। कहानी के आगे बढ़ते ही वो एक ऐसे चक्रव्यूह में फंसता है जिससे वो अंत में ही निकल पाता है। टैक्सी चलाकर जब आदित्य वनाम का लड़का अपने दोस्तों की पार्टी की ओर जा रहा होता है तो उसको पता चलता है कि उसकी गाड़ी में जो लड़की सवारी बैठी थी वो अपना मोबाइल कार में ही छोड़ गई है। वो मोबाइल लौटाने उस लड़की के घर जाता है और वहीं से उसकी दुश्वारियां शुरू हो जाती हैं। उस लड़की का कत्ल हो जाता है और वो जेल पहुंच जाता है। तमाम परिस्थितिजन्य सूबत उसके कातिल होने की चीख-चीख कर गवाही दे रहे होते हैं। पर असल में जो संदेश इस वेब सीरीज के माध्यम से निकलता है वो दर्शकों को बताता है कि न्याय की डगर कितनी कठिन है। 22 महीने के अंतराल में फैली इस कहानी में एक अच्छा भला परिवार तबाह हो जाता है। मुजरिम की बहन जब बच्चे को जन्म देती है तो उसका पति उसको तलाक देने पर उतारू होता है। पिता की दुकान बिक जाती है। पारिवारिक और सामाजिक रिश्ते तार-तार हो जाते हैं। इस वेब-सीरीज में एक अपराधी के परिवार को लेकर समाज की मानसिकता, परिवार का बिखरना,वकीलों के दांव पेंच, न्यूज चैनलों का असंवेदनशील चेहरा, पुलिस विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार, ड्रग का धंधा, सामाजिक कार्य की आड़ में फलने फूलनेवाले अपराध, जेल में गैंगवॉर, जेलर का भ्रष्टाचार यानि सबकुछ है। कहानी बहुत सधी हुई चलती है, हां इतना अवश्य है कि मुजरिम आदित्य को अदालत से सजा होने के बाद कहानी को अनावश्यक विस्तार दिया गया है। उसको और कसा जा सकता था।
इसमें दो तीन ऐसे प्रसंग हैं जिनको रेखांकित करना आवश्यक है। एक प्रसंग तो वह है जिसमें मुजरिम आदित्य की बहन को तलाक देने का मन बना चुका उसका जीजा एक दिन अपने ससुराल पहुंचता है।अपनी पत्नी से साथ रहने की गुहार लगाता है। जिंदगी की तमाम कठिनाइयों को अपने नवजात बच्चे के साथ झेल रही वो महिला अपने पति के प्रस्ताव को ठुकरा देती है। बगैर आक्रामक हुए वो कहती है कि नहीं अब और नहीं। बगैर शोर मचाए यह प्रसंग हमारे देश में स्त्रियों के मजबूत होने का बड़ा संदेश देता है। यह महिलाओं की प्रताड़ना के प्रतिकार का प्रसंग भी है। वो बेहद सामान्य तरीके से ये तय करती है कि अपने बच्चे की परवरिश खुद करेगी । इसी तरह न्यूज चैनलों के गैर जिम्मेदाराना हरकतों को भी ये सीरीज शिद्दत के साथ बिना कुछ कहे दर्शकों के सामने रख देती है। जब आदित्य का केस चल रहा होता है तो एक दिन एक न्यूज चैनल का एंकर उसकी बहन के दफ्तर पहुंचता है। उससे संवेदना प्रकाट करता है और कहता है कि जब वो चाहें तो देश को आदित्य और अपने परिवार का पक्ष बता सकती हैं। एक दिन जब वो तय करके चैनल के स्टूडियो में पहुंचती है तो वही एंकर उसको अपना पक्ष रखने का मौका तो नहीं ही देता है, लाइव शो में उसको जलील भी करता है। इस सीन में मुजरिम की बहन के चेहरे पर ठगे जाने का भाव पूरे सिस्टम पर एक टिप्पणी की तरह प्रकट होता है। इसी तरह एक और प्रसंग है जिसमें दो लड़कियां आदित्य की मां के पास आती हैं। कहती हैं वो आदित्य के साथ कॉलेज में थीं, उनसे संवेदना प्रकट करती हैं, आदित्य के अपराधी नहीं होने की बात करती हैं। दूसरी मुलाकात में उसकी मां ढेर सारी बातें कहती हैं जिसको वो दोनों लड़कियां चुपके से रिकॉर्ड कर लेती हैं। उस बातचीत में जेल में बंद मुजरिम आदित्य की मां किसी प्रंसग में कहती हैं कि लड़की की हत्या और उसका रेप करनावाला जानवर ही होगा। बाकी सारे बातें एडिट करके टीवी पर सिर्फ यही चलाया जाता है कि मुजरिम की मां ने कहा कि हत्यारा जानवर था। जेल में बंद आदित्य जब टीवी पर अपनी मां की बात सुनता है तो वो अंदर से टूट जाता है। न्यूज चैनलों को करीब से देखने जानने वालों को इस तरह की कई घटनाएं याद होंगी।
इस वेब सरीजी में पंकज त्रिपाठी का अभिनय शानदार है। पंकज त्रिपाठी ने पिछले कुछ वर्षों में खुद को बेहतरीन अभिनेता के तौर पर खुद को स्थापित किया। फिल्मों में भी और वेब सीरीज में भी। पंकज के अभिनय में जो सहजता है वो उनको बलराज साहनी और इरफान की परंपरा से जोड़ता है। कई बार तो पंकज अपने अभिनय में इरफान से आगे निकलते दिखाई देते हैं, खास तौर पर वहां जब वो संवाद अदायगी में परिस्थिजन्य सहजता को बरकरार रखते हैं। यहां वो मनोज वाजपेयी से बिल्कुल अलग और आगे नजर आते हैं। मनोज वाजपेयी अपने अभिनय में इतने प्रयोग करते नजर आते हैं कि उसमें उनकी सहजता कहीं गायब हो जाती है और कई बार उनकी संवाद अदायगी कृत्रिम लगने लगती है। पंकज की आंखें और उनकी बॉडी लैंग्वेज उनके संप्रेषण को बेहद प्रभावशाली बना देती है। कभी कभार तो उनका हूं या अच्छा कहना ही कई वाक्यों पर भारी पड़ता है और इस वेब सीरीज में उनका ये कौशल कई बार दर्शकों के सामने आता है। पंकज के अलावा जैकी श्रॉफ और अन्य अभिनेताओं ने भी अच्छा काम किया है। अंत में यह कहना आवश्यक है कि इस तरह के वेब सीरीज समाज की जरूरत हैं जिसमें मनोरंजन के साथ साथ समाज के बदलते मन मिजाज से भी दर्शकों का परिचय करवाया जाता है। ‘क्रिमिनल जस्टिस’ जैसे सीरियल उस सोच को भी बदलते हैं या निगेट करते हैं जिसके तहत निर्माताओं और निर्देशकों को ये लगता है कि सेक्स प्रसंगों को दिखाकर दर्शकों को खींचा जा सकता है। निगेट तो ‘क्रिमिनल जस्टिस’ ने इस बात को भी किया कि दर्शकों को जुगुप्साजनक हिंसा पसंद आती है। इसमें हिंसा है लेकिन कभी उसको देखकर उबकाई नहीं आती है जैसा कि वेब सीरीज को ‘घूल’ को देखकर दर्शकों को आई थी। 

Saturday, October 13, 2018

नग्नता और यौनिकता का बोलबाला

हाल ही में एक कार्यक्रम के दौरान जब वेब सीरीज पर चर्चा हो रही थी, तो एक श्रोता ने उसके कंटेंट पर सवाल खड़े करते हुए वक्ताओ से ये सवाल पूछा कि क्या यहां दिखाई जानेवाली सामग्री पर किसी तरह का नियमन होना चाहिए? वहां बैठे ज्यादातर लोगों के उत्तर नकारात्मक थे। मंच पर बैठे एक वक्ता ने ये तो यहां तक कह दिया कि एक जगह तो छोड़ दो जहां सरकार का दखल नहीं हो। एक दूसरे वक्ता ने इस प्रश्न के उत्तर को कलाकारों की कलात्मक अभिव्यक्ति से जोड़ दिया। तीसरे वक्ता ने सेंसर बोर्ड का हवाला देते हुए कहा कि अगर सरकार का दखल होगा तो बेव सीरीज भी संस्कारी हो जाएंगे। लेकिन प्रश्नकर्ता डटा हुआ था और वो इस विषय पर संवाद की मांग कर रहा था। खैर सत्र का समय नियत था और वो उसके प्रश्न के साथ ही खत्म हो गया। लेकिन उस श्रोता के प्रश्न इतने वाजिब थे सत्र खत्म होने के बाद भी उसपर चर्चा होती रही। दरअसल हाल के दिनों में जो चर्चित बेव सीरीज आए हैं उनमें जिस तरह की सामग्री आई है उसको लेकर भारतीय समाज में चर्चा होनी चाहिए। उसको यह कहकर उचित नहीं ठहराया जा सकता है कि वो कलात्मक स्वतंत्रता है। एक सीरीज आई थी लस्ट स्टोरीज। इसमें चार अलग अलग कहानियों का चार अलग अलग निर्देशकों ने बनाया था। अनुराग कश्यप, जोया अख्तर, दिबाकर बैनर्जी और करण जौहर। अब अगर उसकी सामग्री को देखें तो जिस तरह से यौन प्रसंगों को दिखाया गया है, वो प्रश्न तो खड़े करता है। इसी तरह से एक और बेव सीरीज चर्चित रही सेक्रेड गेम्स। अनुराग कश्यप अपनी फिल्मों में गाली-गलौच वाली भाषा के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने यही काम इस सीरीज में भी किया है।  इसके अलावा ‘सेक्रेड गेम्स’ में सेक्स प्रसंगों की भरमार है, अप्राकृतिक यौनाचार के भी दृश्य हैं, नायिका को टॉपलेस भी दिखाया गया है। हमारे देश में इंटरनेट पर दिखाई जानेवाली सामग्री को लेकर पूर्व प्रमाणन जैसी कोई व्यवस्था नहीं है लिहाजा इस तरह के सेक्स प्रसंगों को कहानी में ठूंसने की छूट है। सेक्रेड गेम्स के लगभग हर एपिसोड में इस तरह से दृश्य हैं और ये सबसे सस्ता तरीका है दर्शकों को अपनी ओर खींचने का और उनकी उत्सुकता जगाने का । यौन-प्रसंगो में जिस तरह की नग्नता का चित्रण होता है और हिंसा के बाद जो शारीरिक विकृतियां दिखाई गई हैं वो जुगुप्साजनक हैं। ये कलात्मक स्वतंत्रता के नाम पर अराजकता है। इन दो बेव सीरीज के बाद एक और सीरीज आई घोउल। इसमें भी वही सब रिपीट किया है। इसमें इतनी हिंसा और खून खराबा है जो किसी विकृत मानसिकता को ही संतुष्ट कर सकती है। इस तरह के कई विदेशी सीरीज पर इन प्लेटफॉर्म्स पर उपलब्ध हैं।
दरअसल जब हम इस तरह क बेव सीजीज पर विचार करते हैं तो मुझे ऑल्ट बालाजी का गूगल पर दिखाई देनेवाला पेज याद आ जाता है। अगर आप गूगल पर ऑल्ट बालाजी सर्च करेंगे तो जो पेज खुलता है उसमें ये बताया गया है कि ये प्लेटफॉर्म मुख्यधारा की मनोरंजन का विकल्प है। लेकिन उसके नीचे लिखा है रागिनी एमएमएस, गेट हॉट विद रागिनी। उसके नीचे लिखा है हॉट, वाइल्ड एंड लस्टफुल बैयल (सुंदरी)। इसके आगे कहने को कुछ रह नहीं जाता है। इससे मंशा साफ हो जाती है कि प्लेटफॉर्म अपने दर्शकों को क्या दिखाना चाहता है। यहां आपको सुभाष बोस के बारे में भी समाग्री उपलब्ध है, लेकिन ये भी है। ये नाम इस लिहाज से ले रहा हूं कि ये चर्चित रहे हैं। इससे ये संदेश नहीं जाना चाहिए कि इनको ही लक्षित करके लिखा जा रहा है। कमोबेश सभी जगह यही हालात है। सवाल यही है कि फिल्मों में तो गाली को भी बीप करो और बेव सीरीज में गाली को फिल्मा कर दिखाओ। फिल्मों में अश्लीलता के नाम पर लंबे चुबंन दृश्यों पर आपत्ति लेकिन बेव सीरीज में नायिका को टॉपलेस दिखाने की छूट। फिल्मों में हिंसा को देखते ही सेंसर बोर्ड की कैंची तैयार लेकिन हिंसा की विकृतियों को चित्रित करने की बेव सीरीज को छूट। यह कैसी विडंबना है, यह कैसा दोहरा रवैया है, इस पर विचार तो होना ही चाहिए। अगर हम बेव सीरीज पर किसी भी प्रकार की नियमन की बात करें तो हमे केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड की आधारभूत संरचना को देखना होगा। सिनेमेटोग्राफी एक्ट 1952 के तहत सेंसर बोर्ड का गठन किया । 1983 में इसका नाम बदलकर केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड कर दिया गया। उसके बाद भी इस एक्ट के तहत समय समय पर सरकार गाइडलाइंस जारी करती रही है । जैसे पहले फिल्मों की दो ही कैटेगरी होती थी ए और यू । कालांतर में दो और कैटेगरी जोड़ी गई जिसका नाम रखा गया यू ए और एस । यू ए के अंतर्गत प्रमाणित फिल्मों को देखने के लिए बारह साल से कम उम्र के बच्चों को अपने अभिभावक की सहमति और साथ आवश्यक किया गया ।एस कैटेगरी में स्पेशलाइज्ड दर्शकों के लिए फिल्में प्रमाणित की जाती रही हैं । फिल्म प्रमाणन के संबंध में सरकार ने एक और गाइडलाइंस 6 दिसबंर 1991 को जारी की थी जिसके आधार पर ही लंबे समय तक कामकाज चल रहा है।
सिनेमेटोग्राफी एक्ट की धारा 5 बी (1) के मुताबिक किसी फिल्म को रिलीज करने का प्रमाण पत्र तभी दिया जा सकता है जब कि उससे भारत की सुरक्षा, संप्रभुता और अखंडता पर कोई आंच ना आए।मित्र राष्ट्रों के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणी ना हो । इसके अलावा तीन और शब्द हैं – पब्लिक ऑर्डर, शालीनता और नैतिकता का पालन होना चाहिए। अब इसमें सार्वजनिक शांति या कानून व्यवस्था तक तो ठीक है लेकिन शालीनता और नैतिकता की व्याख्या अलग अलग तरीके से की जाती रही है। बदलते वक्त के साथ शालीनता और नैतिकता की परिभाषा भी बदलती चली गई। जब अरुण जेटली के पास सूचना और प्रसारण मंत्री का प्रभार था तो उन्होंने श्याम बेनेगल की अध्यक्षता में एक समिति बनाई थी जिसने केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड यानि सीबीएफसी में सुधारों को लेकर रिपोर्ट सौंपी थी। उस समिति ने कई सुझाव दिए थे जो अब तक फाइलों में बंद है। यथास्थितिवाद के इस दौर में उस समिति की सिफारिशों पर आगे बढ़ने की सूरत नजर नहीं आती है। अब अगर बेवसीरीज के कंटेंट पर कलात्मक स्वतंत्रता की बात करें तो यह तर्क गले नहीं उतरता है। कलात्मक आजादी के नाम पर जिस तरह से नग्नता और विकृत हिंसा को परोसा जा रहा है उसके आलोक में दिल्ली हाईकोर्ट के तत्कालीन जस्टिस जे डी कपूर का आठ अप्रैल दो हजार चार के फैसले मैं साफ कर दिया था कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर कुछ भी परोसना गलत है। अपने फैसले में उन्होंने अभिव्यक्ति की आजादी के साथ साथ जिम्मेदारी भी तय की थी। उन्होंने एम एफ हुसैन के एक मामले में कहा था कि ‘याचिकाकर्ता ने महाभारत की पात्र द्रोपदी, जिन्हें हिंदू धर्म को मानने वाले लोग इज्जत की नजरों से देखते हैं, को भी पूरी तरह से निर्वस्त्र चित्रित किया है, जबकि चीरहरण के वक्त भी द्रोपदी निर्वस्त्र नहीं हो पाई थी । इस पेंटिंग में जिस तरह से द्रोपदी का चित्रण हुआ है वह साफ तौर से हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचानेवाला और नफरत पैदा करनेवाला है ।‘
बेवसीरीज में परोसेजानीवाली नग्नता और हिंसा को लेकर निर्माताओं को पहले तो स्वनियमन के बारे में सोचना चाहिए। उन्हें भारतीय समाज को ध्यान में रखते हुए, यहां के रिश्तों की संरचना को ध्यान में रखते हुए सीरीज बनानी चाहिए। भारतीय समाज अभी पश्चिम के उन देशों की तरह नहीं हो पाया हा जहां नग्नता पूरी तरह से स्वीकार्य है, जहां की फिल्मों में शारीरिक संबंधों का चित्रण आम बात हो। स्वनियमन अगर नहीं संभव है तो फिर सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए। क्योंकि ओवर द टॉप प्लेटफॉर्म पर जिस तरह से थोड़े देसी और बहुतायत में विदेशी कंटेट उपलब्ध हो रहे हैं उसपर निगरानी की जरूरत है। अगर सरकार को लगता है कि इसपर नियमन की जरूरत नहीं है तो फिर फिल्मों पर नियंत्रण के लिए बनाई गई संस्था सीबीएफसी का भी कोई औचित्य है नहीं क्योंकि अगर इंटरनेट के माध्यम से नग्नता परोसने की छूट है तो फिर फिल्मवालों को क्यों नहीं? सूचना और प्रसारण मंत्रालय को इस दिशा में पहल करनी चाहिए और इस प्लेटफॉर्म पर केंटेट बनानेवालों के साथ बैठकर मंछन करना चाहिए। उसके बाद इसपर देशव्यापी बहस होनी चाहिए, हर पक्ष की राय को सामने लाने का उपक्रम हो ताकि सबकी सहमति से कोई हल निकाला जा सके।