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Saturday, August 21, 2021

कुंठा की मीनार पर विचारशून्य शायर


पृथ्वीराज चौहान से बुरी तरह शिकस्त खाने के बाद मुहम्मद गोरी का लश्कर खैबर के दर्रे में दाखिल हुआ तो पराजित बादशाह को एक दीनदार नौजवान हिंदुस्तान की तरफ आता दिखाई दिया। बादशाह ने उस नौजवान को हाथ के इशारे से रोककर पूछा कि तू हिंदुस्तान किसलिए जा रहा है। नौजवान ने दृढ़ संकल्प का सहारा लेते हुए कहा कि मैं वहां इस्लाम फैलाने जा रहा हूं। बादशाह ने कहा कि पहले हमलोगों की हालत पर निगाह डाल और ये बात भी समझ ले कि हमलोग भी वहां इस्लाम के प्रचार के लिए गए थे लेकिन उनलोगों ने हिंदुस्तान से भागने पर मजबूर कर दिया। नौजवान ने फकीराना मुस्कुराहट होठों पर बिखेरते हुए कहा आपलोग वहां तलवार लेकर इस्लाम फैलाने गए थे इसलिए नाकाम और नामुराद लौटना पड़ रहा है। मेरे हाथों में सिर्फ कलामे इलाही है और दिल में इंसानियत का जज्बा है।  नौजवान कोई मामूली शख्स नहीं था। यह तो हजरत ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती थे।‘  ये अंश है पूर्व में मशहूर और इन दिनों भटके हुए शायर मुनव्वर राना की पुस्तक ‘मीर आ के लौट गया’ का। यहां मुनव्वर राना इस्लाम को तलवार की ताकत पर फैलाने को गलत ठहरा रहे हैं। ये पुस्तक 2016 में वाणी प्रकाशन से प्रकाशित हुई थी। पांच साल में ही मुनव्वर राना अपनी ही कही कहानी से अलग जाकर अफगानिस्तान में तालिबानियों का समर्थन करते नजर आ रहे हैं। तालिबानी तो मुहम्मद गौरी से भी ज्यादा बर्बर हैं और अफगानिस्तान पर कब्जा जमाते ही इस्लामी राज की घोषणा कर देते हैं। लेकिन राना को तालिबानियों में शांति दूत नजर आते हैं और वो उनकी तुलना में ऐसी ओछी बातें कर देते हैं तो उनकी कुंठा को, धर्मांधता को और अज्ञानता को प्रदर्शित करता है।

अपनी इसी किताब में ही बड़े ही चुनौतीपूर्ण अंदाज में राना कहते हैं कि ‘दुनिया के हर गैर मुस्लिम इतिहासकार ने लिखा है तो यही है कि इस्लाम तलवार के जोर से फैलाया गया मजहब है लेकिन दुनिया के तमाम इतिहासकार मिलकर भी इस बात को साबित नहीं कर सके कि दुनिया के किसी भी हिस्से में मुसलमान बे सबब हमलावर हुए या कत्ल और गारतगरी (तबाही) का बाजार गर्म किया। इस्लाम के सदाबहार दुश्मन यहूदियों और ईसाइयों ने बड़े ही सुनियोजित तरीके से इस्लाम के खिलाफ प्रोपगंडा की जो मुहिम शुरू की थी वो आज भी सूरतें बदल-बदलकर दुनिया में मौजूद है।‘ वो यहां भी सामान्यीकरण के दोष के शिकार तो हो जाते हैं और अपनी अज्ञानता का सार्वजनिक प्रदर्शन करते नजर आते हैं। मुनव्वर राना छह साल पहले इस तरह की बातें लिखते हैं क्या उनको नहीं मालूम था कि 1996 में तालिबान ने अफगानिस्तान में किस तरह की क्रूरता की थी। क्या राना को यह मालूम नहीं था कि तालिबानियों के दौर में अफगानिस्तान में महिलाओं को किस तरह से प्रताड़ित किया गया था। या इस्लाम को मानने वाले दहशतगर्दों ने अमेरिका से लेकर फ्रांस और अन्य मुल्कों में किस तरह की तबाही मचाई। तब भी वो लिख रहे थे कि मुसलमान कभी भी हमलावर नहीं हुए और दुनियाभर के तमाम इतिहासकारों ने इस्लाम के खिलाफ दुश्प्रचार किया। अब भी उनको ये नजर नहीं रहा कि तालिबान अफगानिस्तान में क्या कर रहा है। किस तरह से लोगों की जान ले रहा है या किस तरह के अत्याचार वहां हो रहे हैं। मुनव्वर राना तालिबानियों के प्रेम में इतने डूब गए कि उनको अपने वतन की साख का भी ख्याल नहीं रहा। तमाम मर्यादा को तोड़ते हुए इस बुजुर्ग शायर ने अपने देश के अपराधियों के पास तालिबान से ज्यादा हथियार होने की बात कह डाली। इतना ही नहीं मुनव्वर राना ने अपने जाहिल होने का भी सबूत पेश किया। उनका कहना है कि तालिबानियों के यहां जितनी क्रूरता है उससे अधिक क्रूरता तो हमारे यहां है। मुनव्वर राना के बेटों ने जिस तरह का ड्रामा रचा था अगर वैसा ड्रामा वो अफगानिस्तान में रचते तो उनको पता चलता कि क्रूरता क्या होती है। राना ये भूल जाते हैं कि इस देश में संविधान का राज चलता है, कोई धार्मिक सत्ता नहीं। यहां तर्क और तथ्यों के आधार पर कानून की धाराएं तय होती हैं किसी अन्य तरीके से नहीं। 

मुनव्वर राना बार-बार अपनी मूर्खता का प्रमाण देते हैं। तालिबानियों पर बोलते हुए उनको महर्षि वाल्मीकि याद आ गए। मैं जान-बूझकर मूर्खता शब्द का उपयोग कर रहा हूं कि मुनव्वर राना को न तो महर्षि वाल्मीकि के अतीत के बारे में पता है और न ही उनके योगदान के बारे में। वाल्मीकि के बारे में जानने के लिए राना को न केवल वाल्मीकि रामायण पढ़ना पड़ेगा बल्कि स्कन्दपुराण आदि का अध्ययन भी करना पड़ेगा। इन ग्रंथों में वाल्मीकि के बारे में, उनकी जिंदगी के आरंभिक वर्षों के बारे में, उनके पेशे के बारे में विस्तार से उल्लेख मिलता है। बगैर पढ़े और सुनी सुनाई बातों के आधार पर राना की बातें बुढ़भस सरीखी हैं। राना पूरी तरह से न केवल विचार शून्य हैं बल्कि अपनी परंपराओं और पूर्वजों के बारे में भी उनको कुछ पता नहीं है। अगर पता होता तो वो वाल्मीकि की तुलना कभी भी तालिबानियों से नहीं करते। अब जब उनके खिलाफ मुकदमा हो गया है तो उनके होश ठिकाने आ गए हैं और उस बयान पर दाएं-बांए करते नजर आ रहे हैं। ऐसा वो पहले भी करते रहे हैं, ऊलजलूल बोल देते हैं और जब चौतरफा घिरने लगते हैं तो अपने बयान से पलट जाते हैं। 

मुनव्वर राना का अतीत इसी तरह की पलटीमार घटनाओं से भरी हुई हैं। ज्यादा पीछे नहीं जाते हुए अगर हम 2015 की ही बात करते हैं। उस वर्ष देश में कुछ लेखकों ने असहिष्णुता को आधार बनाकर सरकार को बदनाम करने की साजिश रची। साहित्य अकादमी के पुरस्कार लौटाने का प्रपंच भी रचा गया। मुनव्वर राना ने भी तब साहित्य अकादमी के अपने पुरस्कार को लौटाने के लिए एक न्यूज चैनल का मंच चुना। हलांकि इसके तीन चार दिन पहले एक अंग्रेजी अखबार में उनका बयान पुरस्कार वापसी के खिलाफ छपा था।  न्यूज चैनल पर पुरस्कार वापसी की घोषणा के बाद चैनल के कर्मचारी उनकी ट्राफी और चेक लेकर साहित्य अकादमी पहुंचे थे। चेक पर किसी का नाम नहीं लिखा था। पूरा ड्रामा फिल्मी था। उस वक्त न्यूज चैनलों में चर्चा थी कि राना ने एक बड़ी डील के तहत पुरस्कार वापसी को लेकर अपना स्टैंड बदला। अब डील क्या थी या उसकी सचाई क्या थी ये तो राना ही बता सकते हैं। पुरस्कार वापसी के अलावा राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भी राना ने बेहद आपत्तिजनक बयान दिया था और सर्वोच्च न्यायालय पर आरोप लगाए थे। 

दरअसल राना की अपनी कोई विचारधारा नहीं है। उनका सार्वजनिक आचरण इस बात की गवाही देता है कि वो बेहद स्वार्थी व्यक्ति हैं और अपने स्वार्थ के आगे उनको कुछ नहीं दिखता है। वो लाभ के लिए स्टैंड लेते हैं और लाभ के लिए कभी अपने धर्म का तो कभी अपनी शायरी की आड़े लेते हैं। जब फंसने लगते हैं तो स्टैंड बदल देते हैं। राना जैसे लोगों के इस तरह के व्यवहार पर कथित प्रगतिशील खेमा भी खामोश रहता है। यहां तक कि बात बात पर प्रेस रिलिज जारी करनेवाला जनवादी लेखक संघ भी राना के तालिबान वाले बयान पर खामोश है। प्रगतिशील लेखक संघ और जन संस्कृति मंच को तो जैसे सांप सूंघ गया है। दरअसल इस तरह की खामोशी या कथित प्रगतिशीलता ही कट्टरता को सींचती है। आज अगर राना के बयानों का विरोध ये लेखक संगठन नहीं करते हैं तो फिर उनकी बची-खुची साख पर बड़ा सवालिया निशान लगता है।


Saturday, August 22, 2020

निष्पक्षता की आड़ में कुंठा- प्रदर्शन

फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत को लेकर हिंदी फिल्मों की दुनिया लगातार चर्चा में है। फिल्मी दुनिया के दांव पेंच, सितारों की निजी जिंदगी तक की बातें सामने आ रही हैं। फिल्मी सितारों के बीच के अंतरंग मैसेज भी सार्वजनिक होकर चर्चित हो रहे हैं। फिल्मों से जुड़े लोग इस या उस पक्ष में होने के संकेत अपने बयानों से दे रहे हैं। कुछ लोग बयानों से अपनी कुंठा का सार्वजनिक प्रदर्शन भी कर रहे हैं। इसी तरह का एक बयान ताजा-ताजा बयानवीर बने नसीरुद्दीन शाह ने भी दिया। उन्होंने इशारों में कंगना रनौत को अर्धशिक्षित कह डाला। एक टीवी चैनल पर साक्षात्कार में नसीरुद्दीन ने कहा कि उनका भारत की कानून व्यवस्था और न्यायिक प्रणाली में विश्वास है और कोई भी व्यक्ति किसी अर्धशिक्षित सितारे की राय जानने में रुचि नहीं रखता है। नसीरुद्दीन शाह के इस बयान पर कंगना ने सवाल खड़ा किया और पूछा कि क्या नसीर यही बात प्रकाश पादुकोण या अनिल कपूर की बेटी के लिए कह सकते हैं। यह एक अलग लेकिन वैध मुद्दा है जो कंगना उठा रही है, पहले भी वो इस तरह के मुद्दे पर मुखर रही हैं। नसीरुद्दीन शाह का किसी को भी अर्धशिक्षित कहना यह बताने के लिए काफी है कि वो अहंकार की ऊंची मीनार पर खड़े होकर दूसरों को हेय दृष्टि से देख रहे हैं। पिछले साल भी जब नागरिकता संशोधन कानून को लेकर उनसे सवाल जवाब हुआ था तब भी उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी पर निहायत ही व्यक्तिगत आक्षेप किया था। उस वक्त उन्होंने कहा था कि प्रधानमंत्री कभी छात्र रहे नहीं इसलिए वो छात्रों की बात नहीं समझ सकते हैं या उनके मन में छात्रों के लिए करुणा नहीं है। वो मानते हैं कि मौजूदा हुकूमत में कोई भी बुद्धिजीवी नहीं है, लिहाजा वो बुद्धिजीवियों की महत्ता को नहीं समझ सकते है। कहते हैं न कि लोग जोश में होश खो बैठते हैं या क्रोध विवेक को हर लेता है, नसीर भी इसके शिकार हैं। वो तो प्रधानमंत्री की डिग्री तक देखने की ख्वाहिश जताने लगे थे और अपने को हिंदी फिल्मों के मानसिक रूप से विपन्न एक निर्देशक की इच्छा के साथ जोड़ रहे थे। यह उस व्यक्ति का अहंकार ही बोल रहा था। 

पिछले कुछ सालों से नसीर इस बात की सफाई भी देने लगे हैं कि वो ये बात एक मुसलमान के तौर पर नहीं कह रहे हैं। इतना कहने के बाद वो अपनी भड़ास निकालने लगते हैं, वैसी भड़ास जिसमें तथ्य कम अहंकार अधिक रहता है। दरअसल नसीर जैसे लोगों के साथ दिक्कत ये हुई कि उनकी फिल्मों में उनके अभिनय को लेकर इतनी बड़ी-बड़ी बातें हो गईं कि वो खुद को बहुत ही ऊंचे पायदान पर देखने लगे। दरअसल 1970 में जब समांतर या कला फिल्मों की शुरुआत हुई तो उसमें काम करनेवाले अभिनेता अभिनेत्री को पता नहीं किस वजह से बुद्धिजीवी भी मान लिया गया। नसीर भी उनमें से एक हैं। फिल्मों से हटकर जब भी नसीर बात करते हैं तो उनकी बातें फूहड़ और चालू लगती हैं। वो वही बातें करते हैं जिनका आधार सोशल मीडिया पर चलनेवाली आधारहीन और तथ्यहीन बातें होती हैं। आपको यकीन न हो तो नागरिकता संशोधन कानून या अन्य मसलों पर उनका साक्षात्कार देख लें। वास्तविकता सामने आ जाएगी। 

नसीरुद्दीन शाह की ही तरह एक शायर हैं नाम है मुनव्वर राना। अभी राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर उन्होंने अपनी कुंठा सार्वजनिक कर दी और कहा कि अदालतों में तो फैसले होते हैं, इंसाफ नहीं। जबकि राम मंदिर के मामले पर तो इंसाफ की जरूरत थी। सुप्रीम कोर्ट के राम मंदिर पर दिए फैसले से वो इतने कुपित थे कि उन्होंने फैसला सुनानेवाले खंडपीठ में शामिल सुप्रीम कोर्ट के उस वक्त के चीफ जस्टिस रंजन गगोई पर बेहद संगीन इल्जाम लगा दिए। उन्होंने कहा कि रंजन गगोई बिक गए। जैसा कि उपर कहा गया कि बहुधा क्रोध विवेक को हर लेता है वहीं मुनव्वर राना के मामले में भी हुआ और वो एक ऐसी बात बोल गए जो उनकी सामंती मानसिकता को भी उजागर कर गया। उन्होंने कहा कि वो तो इतने में बिक गए जितने में तवायफें नहीं बिकतीं। मुनव्वर राना का ये निहायत ही घटिया बयान है, जिसकी भर्त्सना होनी चाहिए थी। जो लोग महिला अधिकारों की बातें करते हैं वो खामोश रहे, हिंदी साहित्य में स्त्री विमर्श का झंडा लहरानेवाली लेखिकाएं भी इस मसले पर आश्चर्यजनक रूप से खामोश रहीं। मुनव्वर राना के इस बयान में एक खास चीज जो रेखांकित की जानी चाहिए वो ये कि जब वो राम मंदिर के फैसले पर बोल रहे थे तो उन्होंने भी ये कहा कि वो खरा-खरा बोलते हैं जिससे हिंदू भी नाराज होते हैं और मुसलमान भी। परोक्ष रूप से वो ये कहना चाह रहे थे कि वो जो कह रहे हैं वो एक मुसलमान के तौर पर नहीं कह रहे हैं बल्कि उनकी आवाज को एक स्वतंत्र आवाज समझी जानी चाहिए। यही बात नसीरुद्दीन शाह भी कहते हैं कि वो एक मुसलमान के तौर पर नहीं बोल रहे हैं। 

एक मुसलमान के तौर पर नहीं बोलने का दावा करने की बात को रेखांकित करते हुए अगर विश्लेषित करें तो पाते हैं कि इन दिनों ये बात आम हो गई है। कुछ कहने के पहले ये डिस्क्लेमर जरूर दिया जाता है। बावजूद इस पूर्वकथन के इनकी बातों से जो ध्वनित होता है वो यही है कि वो पक्के तौर पर एक मुसलमान होने के नाते ही ऐसी बातें कर रहे हैं, चाहे वो नसीरुद्दीन शाह हों या मुनव्वर राना या फिर दस साल तक देश के उप राष्ट्रपति रहे हामिद अंसारी। और अगर एक मुसलमान होने के तौर पर ये बातें कह भी रहे हैं तो उसमे हर्ज क्या है। ये देश स्वतंत्र देश है और हर किसी को चाहे वो किसी भी मजहब या धर्म का हो उसको अपनी बात कहने का अधिकार है। दरअसल ये मौजूदा हुकूमत की आलोचना करने के पहले ये जताना चाहते हैं कि वो निष्पक्ष होकर अपनी बात कह रहे हैं। पर इनकी मुखरता इनके इस दावे की पोल खोल देता है। हाल के दिनों में नसीरुद्दीन शाह को अपने बेटों को लेकर डर लगता है, लेकिन नसीरुद्दीन शाह को तब डर नहीं लगा था जब मुंबई में बम धमाके हुए थे, उनको तब भी डर नहीं लगा था जब यूपीए के शासनकाल में नियमित अंतराल पर देश के इलग अलग शहरों में बम धमाके हो रहे थे। तब उनकी बेबाकी को लकवा मार गया था। दरअसल अगर नसीर और राना जैसे लोगों के वक्तव्यों का सूक्ष्मता से विश्लेषण करें तो ये साफ तौर पर लगता है कि वो इस बात से आहत हैं कि इस देश का बहुसंख्यक अब अपनी बात मजबूती से रखने लगा है। बहुसंख्यकों की बात को और उनकी भावनाओं का सरकार सम्मान करने लगी है। बहुसंख्यकों के अपने हिस्से की बात करना उनको सांप्रदायिकता लगता है। यही मानसिकता उनसे ये कहवाती है कि वो एक मुसलमान के तौर पर नहीं बोल रहे हैं। इसके अलावा ये लोग जिस तरह से प्रतिक्रिया देते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है कि वो मोदी सरकार के तीन तलाक खत्म करने से लेकर संविधान के अस्थायी अनुच्छेद 370 खत्म करने के फैसले से भी खफा हैं। इसी को लेकर अपनी नाराजगी का प्रदर्शन वो कभी मोदी पर भड़ास निकालकर करते हैं तो कभी उनके मंत्रियों पर। पर इससे साख न तो मोदी की खराब होती है न उनके मंत्रियों की, बल्कि प्रतिष्ठा कम होती है नसीर और राना जैसों की।