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Saturday, July 12, 2025

और फिल्मिस्तान बिक गया...


हिंदी फिल्मों में जब स्टूडियो युग का आरंभ हुआ तो न्यू थिएटर्स और प्रभात स्टूडियो ने कई फिल्में बनाई। अनेक फिल्मी प्रतिभाओं को तराश कर दर्शकों के सामने पेश किया। यह कालखंड 1935 से 1955 तक का रहा। एक और स्टूडियो की स्थापना हुई थी जिसका नाम था बंबई टाकीज। हिमांशु राय और देविका रानी ने मिलकर इसे स्थापित किया था। विदेश से वापस भारत लौटे हिमांशु राय और देविका रानी ने बंबई टाकीज को प्रोफेशनल तरीके से स्थापित ही नहीं किया उसी ढंग से चलाया भी। स्टूडियो की स्थापना के लिए हिमांशु राय ने फरवरी 1934 में अपनी कंपनी के 100 रुपए के शेयर जारी किए थे। 25 हजार शेयर बेचकर जुटाई पूंजी से बंबई टाकीज की स्थापना की गई। कंपनी को चलाने के लिए एक बोर्ड का गठन हुआ। इस स्टूडियो से बनी पहली कुछ फिल्में असफल हुईं। बंबई टाकीज ने धीरे-धीरे भारतीय दर्शकों की पसंद के हिसाब से फिल्में बनानी आरंभ की और सफलता मिलने लगी। हिमांशु राय ने देशभर से कई युवाओं को फिल्म से जोड़ा। इन युवाओं ने कालांतर में हिंदी सिनेमा को अपनी प्रतिभा और मेहनत से समृद्ध किया। इनमें शशधर मुखर्जी, सेवक वाचा, आर के परीजा, अशोक कुमार आदि प्रमुख हैं। अशोक कुमार को तो हिमांशु राय ने लैब सहायक से सुपरस्टार बना दिया। वो फिल्मों में अभिनेता का काम नहीं करना चाहते थे लेकिन राय के दबाव में अभिनेता बने। ये बेहद ही दिलचस्प किस्सा है जिसके बारे में फिर कभी चर्चा होगी। 

स्टूडियो की स्थापना के करीब 6 वर्ष बाद हिमांशु राय के असामयिक निधन ने बंबई टाकीज की नींव हिला दी थी। उसके बाद इस कंपनी के शेयरधारकों और हिमांशु राय के प्रिय कलाकारों में से कुछ ने मिलकर देविका रानी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। इस मोर्चे का नेतृत्व शशधर मुखर्जी कर रहे थे। शशधर मुखर्जी हिमांशु राय के जीवनकाल में ही बंबई टाकीज में महत्वपूर्ण हो गए थे। कुछ फिल्म इतिहासकारों का मानना है कि देविका रानी के व्यवहार और उनके अपने पसंदीदा लोगों को बढ़ाने के निर्णयों से शशधर मुखर्जी आहत थे। हिमांशु राय के निधन के बाद बंबई टाकीज में जो घटा वो एक फिल्मी कहानी है। शशधर मुखर्जी चाहते थे कि बंबई टाकीज उनकी मर्जी से चले और देविका रानी उनके हिसाब से निर्णय लें। ये देविका रानी को स्वेकार्य नहीं था। वो अपनी मर्जी से निर्णय ले रही थीं। अमिय मुखर्जी उनको सहयोग कर रहे थे। उस दौर की पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित लेखों से संकेत मिलता है बंबई टाकिज में कुछ लोगों को देविका रानी के महिला होने के कारण उनको संस्था प्रमुख मानने और उनसे निर्देश लेने में दिक्कत होती थी। चूंकि बंबई टाकीज में होनेवाले प्रमुख निर्णयों को कंपनी का बोर्ड तय करता था। इस कारण जब देविका रानी ने अपने निर्णयों को लागू करना आरंभ किया तो कारपोरेट दांव पेच भी चले गए। शेयरधारकों का बहुमत जुटाने के लिए भी देविका रानी ने भी प्रयास किया। इस काम में उनको सहयोग मिला केशवलाल का। देविका प्रतिदिन सुबह आठ बजे कार्यलय पहुंच जातीं और देर रात तक वहीं रहती। शशधर मुखर्जी समेत अन्य लोगों के निर्णयों की समीक्षा होने लगी थी। देविका रानी के दखल के बाद शशधर मुखर्जी आदि असहज होने लगे थे। शशधर मुखर्जी प्रोडक्शन का पूरा काम संभालते थे लेकिन देविका रानी ने इस विभाग में भी दखल देना आरंभ कर दिया था। फिल्मों की स्क्रिप्ट से लेकर उसके प्रोडक्शन तक हर विभाग पर वो नजर ही नहीं रखती बल्कि अपने निर्णयों को लागू भी करवाने लगीं। 

उधर बंबई टाकीज के शेयरों को लेकर मामला कोर्ट कचहरी तक गया। बोर्ड में देविका रानी का बहुमत होने के कारण उनको अपने निर्णयों को लागू करवाने में परेशानी नहीं हुई। बंबई टाकीज के इतिहास में जून 1942 में हुई बोर्ड मीटिंग बहुत महत्वपूर्ण है। इस दिन बोर्ड ने ये फैसला लिया कि बंबई टाकीज में देविका रानी प्रोडक्शन कंट्रोलर होंगी और शशधर मुखर्जी प्रोड्यूसर होंगे। देविका रानी को ये अधिकार दे दिया गया कि वो बंबई टाकीज की हर फिल्म में उनका दखल होगा। इसके पहले ये व्यवस्था थी कि एक फिल्म शशधर मुखर्जी प्रोड्यूस करेंगे और उसके बाद देविका रानी फिर शशधर। बोर्ड के निर्णय के बाद देविका रानी बंबई टाकीज में उस पद पर पहुंच जगई जहां हिमांशु राय होते थे। इन दो वर्षों में बंबई टाकीज में स्पष्ट रूप से दो गुट बन गए थे। एक गुट में देविका रानी और अमिय मुखर्जी थे और दूसरे में शशधर मुखर्जी, अशोक कुमार, राय बहादुर चुन्नी लाल, ज्ञान मुखर्जी आदि प्रमुख थे। बंबई टाकीज की इसी गुटबाजी और कारपोरेट वार ने फिल्मिस्तान की नींव डाली। शशधर मुखर्जी, अशोक कुमार, राय बहादुर चुन्नीलाल और ज्ञान मुखर्जी ने बंबई टाकीज से इस्तीफा दे दिया जिसे देविका रानी से फौरन स्वीकार कर लिया। फिल्मिस्तान की स्थापना बंबई (अब मुंबई) के गोरेगांव में स्थापित की गई। अशोक कुमार ने बंबई टाकीज छोड़ा था तब उनका मासिक वेतन एक हजार रु था। ये वो दौर था जब फिल्म अभिनेता और अन्य मासिक वेतन पर स्टूडियो में नौकरी करते थे। फिल्मिस्तान ने अशोक कुमार को रु 2000 प्रतिमाह देना तय किया था।  

फिल्मिस्तान आरंभ हुआ तो कंपनी ने देविका रानी को भी इसके उद्घाटन समारोह का आमंत्रण भेजा। देविका रानी इस समारोह में नहीं गई लेकिन उन्होंने जो पत्र लिखा उसमें खुद को मिसेज हिमांशु राय बताते हुए अपनी व्यस्तता का हवाला दिया था। फिल्मिस्तान ने जो पहली फिल्म बनाई उसका नाम था चल चल रे नौजवान। उसके बाद भी फिल्मिस्तान ने कई फिल्में बनाई। थोड़े दिनों तक तो उत्साह रहा लेकिन फिर इसके संस्थापकों को एहसास होने लगा था कि फिल्म कंपनी चलाना आसान नहीं। इसके लिए काफी मेहनत की आवश्यकता होती है। संसाधान जुटाना एक बड़ी समस्या थी। पांच वर्ष होते होते फिल्मिस्तान के संस्थापकों के बीच मतभेद उभरने लगे थे। उधर बंबई टाकीज भी देविका रानी के छोड़ने के बाद सही नहीं चल रहा था। अशोक कुमार ने बंबई टाकीज में निवेश किया और उसका आंशिक मालिकाना हक ले लिया। पांच वर्षों बाद जब अशोक कुमार ने बंबई टाकीज में कदम रखा तो हिमांशु राय की अर्ध प्रतिमा (बस्ट) को देखकर भावुक हो गए थे और उसको गले लगा लिया था। कहना न होगा कि फिल्मिस्तान की स्थापना फिल्म जगत के पहले कारपोर्ट वार के परिणामस्वरूप हुई थी। मुंबई के गोरेगांव में करीब 5 एकड़ में फैले इस स्टूडियो में कई अच्छी फिल्में भी बनीं जिनमें सरगम, मजदूर, शिकारी दो भाई आदि प्रमुख हैं। बाद में फिल्मिस्तान का मालिकाना हक बदला। फिल्में बनती रहीं। हाल के कुछ वर्षों में फिल्मिस्तान में गाने या टीवी सीरियल आदि शूट होने लगे थे। हाल में फिल्मिस्तान के मालिकों ने इसको बेच दिया। खबरों के मुताबिक इसकी जगह अब अपार्टमेंट बनाए जाएंगे। आरे के स्टूडियो के बाद फिल्मिस्तान का बिकना भारतीय सिनेमा के बदलते स्वरूप का संकेत है। लेकिन जब भी हिंदी फिल्मों के इतिहास पर बात होगी तो देविका रानी की बात होगी और देविका रानी के साथ साथ फिल्मितान का जिक्र भी होगा। 

Sunday, March 30, 2025

रजतपट की पहली रानी


कौन जानता था कि 1933 के उत्तरार्ध में लंदन से भारत आनेवाले दो युवा भारतीय हिंदी फिल्मों की दिशा बदलनेवाले साबित होंगे। ये दोनों थे हिमांशु राय और देविका रानी। हिमांशु राय और देविका रानी ने ना केवल भारत में फिल्म स्टूडियो की नींव रखी बल्कि उनको व्यावसायिक तरीके से चलाया भी। बांबे टाकीज ने हिंदी फिल्मों को कई चमकदार सितारे दिए। एक तरफ जहां हिमांशु राय ने अशोक कुमार के अंदर फिल्म अभिनेता बनने की संभावनाएं देखीं। उनको अपनी फिल्म में काम देकर सफलतम अभिनेताओं में एक बनने का अवसर प्रदान किया। वो अशोक कुमार जिनकी मां ने उनको लड़कियों से दूर रहने की हिदायत दी थी, वो अशोक कुमार जो अपनी पहली फिल्म में अपनी अभिनेत्री के गले में हार नहीं पहना पा रहे थे क्योंकि वो इस बात पर नर्वस थे कि हीरोइन उनको छू न दे। इसी तरह से देविका रानी ने हिंदी फिल्म को दिलीप कुमार जैसा अभिनेता दिया। अपने पति हिमांशु राय के निधन के बाद देविका रानी बांबे टॉकीज चला रही थीं। फिल्म ‘किस्मत’ को लेकर अशोक कुमार और अमिय चक्रवर्ती में विवाद हुआ और अशोक ने बांबे टॉकीज छोड़ दिया। ये बांबे टॉकीज के लिए बड़ा झटका था। जब अशोक कुमार बांबे टॉकीज छोड़ गए तो देविका रानी किसी नए हीरो की खोज में जपुट गईं। कई जगह इस बात की चर्चा मिलती है कि देविका रानी ने दिलीप कुमार को नैनीताल के फल मार्केट में देखा। वहीं उनको मुंबई में मिलने को कहा। परंतु दिलीप कुमार अपनी आत्मकथा, ‘द सब्सटेंस एंड द शैडो’ में अलग ही कहानी बताते हैं। एक दिन बांबे (अब मुंबई) के चर्चगेट पर उनकी भेंट मनोविज्ञानी डा मसानी से होती है। बातों बातों में डा मसानी ने बताया कि वो बांबे टॉकीज की मालकिन से मिलने जा रहे हैं। दिलीप कुमार जो तब युसूफ खान थे, मसानी के साथ हो लिए। मसानी ने युसूफ खान का परिचय देविका रानी से  करवाया और साथ लाने का उद्देश्य बताया। देविका रानी ने युसूफ से पूछा क्या आप उर्दू जानते हैं। फिर पूछा कि क्या आप सिगरेट पीते हैं और अगला प्रश्न था कि क्या कभी अभिनय किया है।  सभी उत्तर सुनने के बाद देविका रानी ने पूछा कि क्या आप अभिनय करना चाहते हैं। जवाब आया हां। देविका रानी ने युसूफ खान के सामने 1250 प्रतिमाह के वेतन का प्रस्ताव दे दिया। उनको इस बात पर विश्वास नहीं हो रहा था कि 1250 प्रतिमाह वेतन मिलेगा। ये वो समय था जब हीरो मासिक वेतन पर काम किया करते थे। अगले दिन जब वो काम पर पहुंचे तो देविका रानी ने युसूफ खान का नाम बदलने का प्रस्ताव किया। उन्होंने युसूफ खान के सामने तीन नाम रखे- जहांगीर, वासुदेव और दिलीप कुमार। देविका रानी को दिलीप कुमार नाम पसंद था क्योंकि ये अशोक कुमार से मिलता जुलता था। जाहिर सी बात है कि दिलीप कुमार के नाम पर ही सहमति बनी। 

लंदन से भारत लौटने के तीन साल बाद देविका रानी ने अशोक कुमार के साथ अछूत कन्या फिल्म की। स्वाधीनता संग्राम के इस दौर में अस्पृश्ता पर गांधी निरंतर प्रहार कर रहे थे। ऐसे समय में अछूत कन्या फिल्म ने इस विमर्श को बल दिया। माना जाता है कि देविका रानी के अभिनय के कारण ये फिल्म बेहद सफल रही थी। आज भी इसको क्लासिक फिल्म माना जाता है। कुछ फिल्म समीक्षकों ने तो देविका रानी के इस रोल की तुलना ग्रेटा गार्बो के अभिनय से की थी। ये अकारण नहीं है कि देविका रानी को हिंदी फिल्मों में वही रुतबा हासिल है जो हालीवुड में ग्रेटा गार्बो को है। इस फिल्म की एक और विशेषता रही है। इसमें देविका रानी और अशोक कुमार ने गाना भी गाया है। इन्होंने अलग अलग भी अपने गाने गाए और देविका रानी और अशोक कुमार का एक युगल गीत भी है, मैं बन की चिड़ियां...। इस गाने की रिकार्डिंग के समय काफी दिक्कत हुई थी। अशोक कुमार और देविका रानी को जिस तरह से म्यूजिक डायरेक्टर सरस्वती देवी गवाना चाहती थीं वो हो नहीं पा रहा था। इसके अलावा 1937 में देविका रानी ने एक और फिल्म में अभिनय किया था जिसका नाम है सावित्री। इस फिल्म में भी देविका रानी का अभिनय उत्कृष्ट रहा। सावित्री और सत्यवान की कहानी हमारे देश के लोक में व्याप्त है। उस रोल को पर्दे पर सफलतापूर्वक निभाना बड़ी चुनौती थी। देविका ने वो चुनौती स्वीकार की। 1933 में पहली फिल्म कर्मा से आरंभ करें तो देविका रानी के खाते में 15 फिल्में हैं लेकिन बांबे टाकीज में हिमांशु राय के साथ उनका काम बहुत महत्वपूर्ण है। देविका रानी ने स्वभाव से बेहद बिंदास और खुले विचारों की थीं। हिमांशु राय से प्रेम विवाह किया। बांबे टाकीज के दौरान एक साथी कलाकार के साथ उनका नाम जुड़ा। हिमांशु के निधन के बाद फिर उन्होंने विवाह किया और कुछ समय तक बांबे टाकीज को चलाया। उसके बाद कुछ दिनों तक मनाली में रहीं और फिर बेंगलुरू के पास अपने फार्म हाउस में अपना जीवन बिताया। जब दादा साहेब फाल्के पुर्साकर की स्थापना हुई तो पहले पुरस्कार के लिए देविका रानी का चयन हुआ। भारत सरकार ने उनको पद्मश्री से भी अलंकृत किया। 


Sunday, October 13, 2024

देविका रानी के सामने कांपे थे अशोक


सुबह के साढे नौ बजे थे। बांबे टाकीज की एक फिल्म की शूटिंग शुरु होनेवाली थी। बांबे टाकीज के कर्ता-धर्ता हिमांशु राय ने अपनी नई फिल्म में एक नए लड़के को नायक के तौर पर लेने का निर्णय किया था। फिल्म का नाम था जीवन नैया और युवक थे अशोक कुमार। सुबह सुबह जब अशोक शूटिंग के लिए फिल्म के सेट पर पहुंचे तो उनको देखकर हिमांशु राय चौंके। अशोक कुमार ने बेतरतीब तरीके से अपने बाल कटवा लिए थे। हिमांशु राय ने उनसे पूछा कि ये क्या है अशोक? हकलाते हुए अशोक कुछ बोलते इसके पहले ही हिमांशु राय ने हेयर ड्रेसर को बुलाकर कहा कि इनके बाल ठीक करो। विग लगाओ। अशोक ने हिमांशु राय की ओर कातर भाव से देखा, सर कुछ कहना चाहता हूं। हिमांशु राय ने अपने अंदाज में कहा कि बोलो। अशोक ने हिमांशु राय का हाथ पकड़ा और उनको सेट के एक कोने में लेकर जाकर धीरे से बोले कि मैं आपके कहने पर फिल्म में काम तो कर लूंगा पर मुझे नायिका के आलिंगन के लिए मत कहिएगा। वो मुझसे हो नहीं हो पाएगा। क्यों? पूछा हिमांशु राय ने। अशोक चुप रहे तो हिमांशु ने आश्वस्त किया कि ऐसा कोई दृष्य फिल्म में नहीं होगा। उसके बाद मेकअप आर्टिस्ट अशोक को लेकर चली गई। मेकअप और गेटअप ठीक होकर जब अशोक सेट पर पहुंचे तो उनके होश उड़ गए। सामने देविका रानी थीं जिनके साथ उनको पहला ही शाट देना था।

अशोक को निर्देशक ने सीन समझाया। अशोक नर्वस हो रहे थे। हिमांशु राय उनके पास पहुंचे उनके कंधे पर हाथ रखकर बोले कि ये बहुत ही सामान्य बात है कि एक लड़का अपनी प्रेमिका के लिए सोने का हार लाता है और फिर उसके गले में डालता है। तुमको इतना ही करना है। अशोक कुमार हाथ में सोने की चेन लेकर देविका रानी के पास पहुंचते हैं। नायिका के करीब पहुंचते ही वो नर्वस हो जाते हैं और दौड़कर बाथरूम की ओर भाग जाते हैं। थोड़ी देर बाद वापस आते हैं। दृश्यांकन आरेभ होता है। अशोक कांपते हाथों से देविका रानी के गले में हार डालने का प्रयास करते हैं। हार उनकी बालों में उलझ जाता है। फिर से प्रयास करने को कहा जाता है। इस बार निर्देशक शूटिंग नहीं रोकते हैं और अशोक कुमार को कहते हैं कि वो गले में हार डालें। अशोक कुमार ने इतनी जोर से हार पहनाने का प्रयास किया कि देविका रानी के बाल ही खुल गए और फिर निर्देशक ने सर पीट लिया। दरअसल अशोक कुमार दो बातों से बुरी तरह से घबरा रहे थे। एक तो उनके बास की पत्नी नायिका थी, दूसरे उनकी मां ने कह रखा था कि फिल्मों में काम करने जा तो रहे हो लेकिन लड़कियों से दूर ही रहना। आखिरकार ये सीन बाद में शूट करने का निर्णय हुआ। दूसरा सीन कुछ यूं था कि फिल्म का खलनायक अभिनेत्री को छेड़ने की कोशिश करेगा। अशोक कुमार को उसको धक्का देकर गिराना था। निर्देशक ने उनको सीन समझाया। कहा कि वो दस गिनेंगे और जैसे ही दस पूरा होगा धक्का देना था। शाट आरंभ हुआ। निर्देशक ने गिनती आरंभ की। घबराए अशोक कुमार ने दस पूरा होने की प्रतीक्षा नहीं की और खलनायक को धक्का दे दिया। धक्का इतनी जोर का था कि देविका रानी और खलनायक दोनों धड़ाम से फर्श पर गिरे। खलनायक का पांव टूट गया। देविका रानी खिलखिलाते हुए उठ खड़ी हुईं। उस दिन शूटिंग रोकनी पड़ी। 

दरअल अशोक कुमार के जीवन की कहानी बहुत दिलचस्प है। उनका ननिहाल बिहार के भागलपुर में था। उनकी मां ने एक लड़की के साथ उनका रिश्ता तय किया था। लड़की के पिता को जब पता चला कि अशोक कुमार फिल्मों में काम करनेवाले हैं तो उन्होंने रिश्ता तोड़ दिया था। 1934 में अशोक कुमार ने हिमांशु राय की कंपनी बांबे टाकीज में नौकरी आरंभ की थी। हिमांशु राय ने उनको अभिनेता बना दिया। उधर उनकी मां को भी जब पता चला कि उनका बेटा फिल्मों में काम करनेवाला है तो उन्होंने नसीहत दी कि फिल्मी लड़कियों से दूर रहना। 

1938 तक अशोक कुमार की छह फिल्में आ चुकी थीं। फिल्म अछूत कन्या से उनको प्रसिद्धि भी मिल चुकी थी। उधर उनकी मां परेशान थी कि बेटा इतनी लड़कियों के बीच रहता है क्या पता क्या कर ले। वो अपने बेटे की शादी को लेकर चिंतित रहने लगी थी। 1938 के अप्रैल में मुंबई में अशोक कुमार को एक टेलीग्राम मिला जो उके पिता ने भेजा था। उसमें लिखा था जल्द से खंडवा आ जाओ अति आवश्यक है। उस समय अशोक कुमार फिल्म वचन की शूटिंग कर रहे थे। उन्होंने फौरन निर्देशक और निर्माता से बात की खंडवा रवाना हो गए। ट्रेन खंडवा पहुंची। अशोक कुमार ट्रेन से उतरने लगे तो देखा कि उनके पिताजी ट्रेन के अंदर आ रहे हैं। वो रुक गए। पिताजी ने आते ही कहा कि ट्रेन से उतरने की जरूरत नहीं है। हमें आगे कलकत्ता (अब कोलकाता) जाना है। उनको पिताजी से पूछने की हिम्मत नहीं हुई। पिताजी ने ही कहा कि लेडीज डब्बे में जाकर अपनी भाभी से मिल लो। वो भाभी से मिलने पहुंचे तो भाभी मुस्कुरा दीं। अशोक कुमार ने पूछा कि हम कोलकाता क्यों जा रहे हैं। भाभी ने शरारती मुस्कान के साथ कहा कि देवर जी बनो मत, हम तुम्हारी शादी के लिए कलकत्ता जा रहे हैं। अशोक जोर से हंसे और अपने डब्बे में आ गए। कलकत्ता पहुंचे तो उनकी मां और अन्य रिश्तेदार पहले से वहां थे। नाटकीय घटनाक्रम में अशोक कुमार की शादी कर दी जाती है। उनके बहनोई शशधर मुखर्जी भी शादी में नहीं पहुंच पाते हैं। ये दिन था 14 अप्रैल 1938 और अशोक कुमार की पत्नी का नाम था शोभा। अशोक कुमार शादी के बाद वापस मुंबई (तब बांबे) लौटे। शादी के बाद अशोक कुमार की प्रसिद्धि और आय दोनों में बढ़ोतरी हुई। अशोक कुमार की मां निश्चिंत हो गईं कि बेटा फिल्मों में काम करके भी बिगड़ेगा नहीं।  


Saturday, May 14, 2022

फिल्मों के स्वावलंबन का सफर


आज पूरा देश स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना रहा है। अमृत महोत्सव के अवसर पर हमें इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि भारतीय फिल्मों ने स्वाधीनता के बाद जो स्वावलंबन की राह पकड़ी वो कैसी थी, उनमें किस तरह की बाधाएं आ रही थीं। स्वाधीनता के बाद के भारतीय फिल्म के परिदृश्य पर विचार करने से पहले फिल्मों को लेकर दो बयान पर नजर डाले लेते हैं। पहला बयान रूस के कम्युनिस्ट नेता लेनिन का और दूसरा है महात्मा गांधी का। रूस की क्रांति के बाद लेनिन ने कहा था कि ‘हमारे लिए सिनेमा सभी कलाओं से अधिक महत्वपूर्ण है। सिनेमा केवल लोगों के मन बहलाव का नहीं बल्कि सामाजिक शिक्षा, संवाद स्थापित करने तथा हमारी विशाल जनसंख्या को एकसूत्र में बांधने का सशक्त साधन भी है।‘ रूसी क्रांति के दो साल बाद वहां के फिल्म उद्योग का राष्ट्रीयकरण करके उसको एक मंत्रालय के अधीन कर दिया गया था। इसके ठीक दस साल बाद भारत में स्वाधीनता संग्राम तेज हुआ। गांधी इसके सर्वमान्य नेता के तौर पर स्थापित हुए। उस वक्त तक गांधी फिल्म की शक्ति को पहचान नहीं पाए। पहचान तो वो बाद में नहीं पाए। गांधी फिल्मों को एक बुराई की तरह देखते थे। 1929 में वो बर्मा (अब म्यांमार) गए थे। वहां उनको एक नाटक देखना पड़ा। देखना पड़ा इस वजह से क्योंकि वो सोच कर गए थे कि मजदूरों की किसी सभा में जाना पड़ा रहा है। लेकिन जब वहां पहुंचे तो  नाटक का मंचन हो रहा था। गांधी ने वहां एक भाषण दिया जो गांधी वांग्मय में संकलित है। गांधी ने कहा, ‘सार्वजनिक नाटकघरों में जाने के अन्य जो भी परिणाम हो यह तो निश्चित ही है कि नाटकों ने अनेकानेक युवकों का आचरण और चरित्र भ्रष्ट कर दिया है। आप पक्की उम्र के लोग चाहे अपने को नाटकों के दुष्प्रभाव से बिल्कुल बरी मान लें, लेकिन आपको अपने छोटे-छोटे बच्चों का भी खयाल करना चाहिये जिनको आपत्तिजनक नाटकों में ले जाकर आप उनके निर्दोष, निष्पाप मन के साथ कितना बड़ा अनाचार कर रहे हैं।  आप चारों ओर नजर तो डालिये वर्तमान व्यवस्था के कुप्रभाव में पनपने वाले सिनेमा, नाटक, घुड़दौड़, शराबखाने और अफीमघर इत्यादि के रूप में समाज के ये सभी शत्रु चारों और से मुंह बाए हमारी घात में खड़े हैं।‘  सिनेमा को गांधी समाज का शत्रु मानते थे लेकिन लेनिन उसको सामाजिक शिक्षा का माध्यम मानते थे।  एक तरफ सिनेमा को लेकर लेनिन के विचार तो दूसरी तरफ गांधी के। 

स्वतंत्रता के बाद भारतीय फिल्मों की चुनौतियों पर बात करने के पहले गांधी के विचारों का ध्यान ऱखना होगा। 1947 में जब देश स्वाधीन हुआ तो फिल्म उद्योग के लोगों ने महात्मा गांधी को एक कार्यक्रम में आमंत्रित करना चाहा। उस समय गांधी के सचिव ने आयोजकों को उत्तर दिया था कि फिल्म से संबंधित किसी भी कार्यक्रम में गांधी जी को बुलाने के बारे में सोचिए भी नहीं क्योंकि फिल्मों को लेकर बापू की राय अच्छी नहीं है। कई जगह इस बात का उल्लेख मिलता है कि चक्रवर्ती राजगोपालाचारी भी फिल्मों को पाप फैलाने का माध्यम मानते थे और कहा करते थे कि फिल्में पश्चिम के घटिया मूल्यों को भारतीय समाज पर थोपतीं है। ये ठीक है कि दूसरे विश्वयुद्ध के पहले और बाद में भी विदेशी फिल्में बड़ी संख्या में भारत में आ रही थीं। उनका प्रदर्शन भी सफलतापूर्वक होता था। उनमें से कई फिल्मों में नग्नता होती थी। लेकिन ये भी उतना ही सच है कि दर्जनों भारतीय निर्माता निर्देशक अपने पौराणिक चरित्रों और संत महात्माओं को केंद्र में रखकर फिल्में बना रहे थे। जो काफी सफल भी हो रही थी। 1917 में दादा साहब फाल्के ने ‘लंका दहन’ के नाम से एक फिल्म बनाई थी। 1918 में श्रीनाथ पाटणकर ने ‘राम वनवास’ के नाम से एक ऐतिहासिक फिल्म बनाई। पाटणकर ने इसके बाद ‘सीता स्वंयवर’, ‘सती अंजनि’ और ‘वैदेही जनक’ नाम से फिल्में बनाईं थीं। मूक फिल्मों के दौर में तकरीबन हर वर्ष राम कथा पर केंद्रित फिल्में बनती थीं, इनमें से अहिल्या उद्धार, श्रीराम जन्म, लव कुश, राम रावण युद्ध, सीता विवाह, सीता स्वयंवर और सीता हरण आदि प्रमुख फिल्में हैं। बोलती फिल्मों के दौर में भी रामकथा को आधार बनाकर कई फिल्में बनीं। प्रकाश पिक्चर्स ने वाल्मीकि रामयाण पर आधारित चार फिल्में बनाईं, ‘भरत मिलाप’, ‘रामराज्य’, ‘राम वाण’ और ‘सीता स्वयंवर’। इन फिल्मों में राम का किरदार प्रेम अदीब और सीता की भूमिका शोभना समर्थ ने निभाई थी। बावजूद फिल्मों को लेकर गांधी के विचार नहीं बद सके थे। उसका असर प्रत्यक्ष और परोक्ष असर भारत के फिल्म उद्योग पर पड़ा। फिल्मों को लेकर सरदार पटेल और नेहरू के विचार गांधी से अलग थे। गांधी के जीवनकाल में ही पटेल ने मुंबई (तब बांबे) में फिल्म उद्योग के लोगों की एक सभा में उनको भरपूर सहयोग का वादा किया था। गांधी के निधन के बाद नेहरू ने भी फिल्मों को लेकर सकारात्मक रुख दिखाया था। 

इस पृष्ठभूमि के बावजूद भारतीय फिल्म उद्योग लगातार बढ़ता रहा तो इसके पीछे की वजह फिल्मों को लेकर इससे जुड़े लोगों का इस विधा में विश्वास था। स्वाधीनता के बाद 1948 में एक फिल्म रिलीज हुई थी, जिसका नाम था चंद्रलेखा। इस फिल्म का निर्माण मद्रास की जैमिनी स्टूडियो ने किया था और इसके निर्देशक एस एस वासन थे। ये भव्य फिल्म तीस लाख रुपए की लागत से तैयार हुई थी। सालभर में करीब दो करोड़ रुपए का कारोबार इस फिल्म ने किया था। यहीं से हिंदी फिल्मों को सफलता का एक सूत्र मिला जिसको कई फिल्म निर्माताओं ने अपनाया। ये सूत्र था एक नायिका और उसको चाहनेवाले दो अभिनेता। ये फार्मूला कई सालों तक चलता रहा। अब भी गाहे बगाहे किसी न किसी फिल्म में ये कथानक देखने को मिल जाता है। 1950 के आसपास कुछ ऐसी घटनाएं घटीं जिसने भारतीय फिल्मों के स्वरूप को बहुत हद तक प्रभावित किया। भारत सरकार ने 1949 में एस के पाटिल की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई जिसको फिल्म उद्योग की स्थिति के बारे में आकलन करने और उसमें बेहतकी के लिए सुझाव का जिम्मा सौंपा गया। 1951 में राजकपूर की फिल्म अवारा रिलीज हुई। इस फिल्म को देश के अलावा विदेश खासतौर पर रूस में अपार लोकप्रियता मिली। इसके सालभर बाद 1952 में देश के चार महानगरों में फिल्म फेस्टिवल का आरंभ हुआ। बांबे ( तब मुंबई ), दिल्ली, चेन्नई (तब मद्रास) और कोलकाता (तब कलकत्ता) में भारतीय के साथ साथ विदेशी फिल्मों का प्रदर्शन हुआ। इसने भारतीय फिल्म उद्योग को विदेश की कलात्मक फिल्मों से परिचय करवाया। जापान, रूस और इंगलैंड से फिल्में आईं। इस आयोजन से हमारे देश में फिल्म संस्कृति के विकास की नींव पड़ी। 

स्वाधीनता के पहले जिस स्टूडियो व्यवस्था की नींव पड़ी थी वो आज बहुत सफल है। आज फिल्मों के निर्माण की दर्जन भर से अधिक कंपनियां करोड़ों और कुछ तो अरबों रुपए का कारोबार कर रही हैं। अगर हम स्टूडियो के व्यावसायीकरण की बात करें तो इसका आरंभ स्वाधीनता के पहले ही हो गया था। फरवरी 1934 में हिमांशु राय ने बम्बई टाकीज के लिए पच्चीस लाख रुपए जुटाने के लिए सौ रुपए के पच्चीस हजार शेयर जारी किए थे। देविका रानी ने लिखा था कि ‘1935 में जब हमने बम्बई के मलाड में बम्बई टाकीज स्थापित किया तो तो उसे एक व्यापार की तरह चलाया। हमारी कंपनी के पास श्रेष्ठ उपकरण थे- बेल एंड हावेल कंपनी के कैमरे थे और आरसीए ध्वनि पद्धति थी।‘ इसके पहले भी फिल्म कंपनियां फिल्मों का निर्माण कर रही थीं लेकिन हिमांशु राय ने उसको एक अलग आयाम दिया। आज भारतीय फिल्म उद्योग जगत दुनिया के सबसे बड़े फिल्म उद्योगों में शामिल हो चुका है और निरंतर मजबूत हो रहा है। 


Tuesday, February 8, 2022

प्रतिभा को मिलती रही अंतराष्ट्रीय मान्यता


कोरोना महामारी के दौर में ओवर द टाप (ओटाटी) प्लेटफार्म और तकनीक के अन्य माध्यमों के जरिए देश विदेश में फिल्मों का प्रदर्शन होता है। फिल्म निर्माता या कंपनी फिल्म के मुनाफे को प्रचारित करती हैं तो बहुधा फिल्म के विदेश में प्रदर्शन से होनेवाली आय को भी जोड़ा जाता है। आमिर खान की फिल्म दंगल या इरफान खान अभिनित फिल्म हिंदी मीडियम की विदेश में प्रदर्शन से होनेवाली आय पर भी खूब बातें हुईं। करण जौहर की फिल्मों की विदेश में सफलता को भी प्रचारित किया जाता रहा है। जब इन फिल्मों के विदेश में सफलता की बात होती है तो हम ये भूल जाते हैं कि भारतीय निर्माताओं की फिल्में स्वाधीनता के पहले से विदेशी दर्शकों को आकर्षित करती रही हैं। किश्वर देसाई ने अपनी पुस्तक द लाइफ एंड टाइम्स आफ देविका रानी में हिमांशु राय की फिल्म कर्मा के लंदन और बर्मिंघम के सिनेमा में प्रदर्शन और उसको लेकर उत्सुकता के बारे में विस्तार से लिखा है।  ये फिल्म 1933 में लंदन में रिलीज हुई थी और इसका निर्माण भारत, ब्रिटेन और जर्मनी के निर्माताओं ने संयुक्त रूप से किया था। इसके लीड रोल में हिमांशु राय और देविका रानी थी। 68 मिनट की इस फिल्म को देखने के लिए उस वक्त लंदन का पूरा अभिजात्य वर्ग उमड़ पड़ा था। आक्सफोर्ड स्ट्रीट पर इस फिल्म का एक बड़ा पोस्टर लगा था जिसमें सिर्फ देविका रानी की तस्वीर लगी थी। इस फिल्म के बारे में लंदन के समाचारपत्रों में कई प्रशंसात्मक लेख छपे थे। उसके बाद भी कई हिंदी फिल्मों को विदेश में सराहना मिली थी। इससे परतंत्र भारत के फिल्मकारों और कलाकारों का स्वयं पर भरोसा भी गाढ़ा हुआ था। 

जब देश आजाद हुआ तो भारतीय फिल्मों खासतौर पर हिंदी फिल्मों को लेकर पूरी दुनिया में एक उत्सुकता का माहौल बना। फिल्म इतिहासकारों के मुताबिक इसकी वजह ये थी कि दुनिया के अलग अलग देशों के लोग भारत के बारे में जानना चाहते थे। 1952 में दिलीप कुमार और निम्मी की एक फिल्म आई थी ‘आन’। इस फिल्म को योजनाबद्ध तरीके से दुनिया के 28 देशों में रिलीज किया गया था। दुनिया की 17 भाषाओं में इस फिल्म का सबटाइटल तैयार किया गया था। लंदन में इस फिल्म के प्रीमियर पर ब्रिटेन के उस समय के प्रधानमंत्री लार्ड एटली के उपस्थित रहने का उल्लेख कई जगहों पर मिलता है। अंग्रेजी में इसको सैवेज प्रिंसेस तो फ्रेंच में मंगला, फी दिज आंद ( मंगला, भारत की लड़की) के नाम से रिलीज किया गया था। इस फिल्म में निम्मी ने जिस चरित्र को निभाया था उसका नाम मंगला था। इस फिल्म को कुछ समय बाद जापान में भी रिलीज किया गया था और वहां के दर्शकों ने भी इसको खूब पसंद किया था। राज कपूर की फिल्म ‘आवारा’ हिंदी में 1951 में रिलीज हो गई थी। 1954 में मास्को और लेनिनग्राद में भारतीय फिल्म फेस्टिवल में राज कपूर की इस फिल्म का प्रदर्शन हुआ। इस फिल्म को दर्शकों ने खूब पसंद किया और वहां के अखबारों में राज कपूर के अभिनय की जमकर प्रशंसा हुई। राज कपूर का जादू ऐसा चला कि इस फिल्म को रूस के अन्य सिनेमाघरों में भी प्रदर्शित किया गया। इस फिल्म के बाद ‘श्री 420’ आई उसको भी रूस के दर्शकों ने बेहद पसंद किया था। इस फिल्म के प्रीमियर पर जब राज कपूर वहां पहुंचे थे तो दर्शकों को काबू में करना मुश्किल हो गया था। फिर तो राज कपूर की हर फिल्म रूस में रिलीज होने लगी और व्यावसायिक रूप से भी सफल हुई । राज कपूर की फिल्मों को तो इजरायल के दर्शकों ने भी खूब पसंद किया था। वहां तो राज कपूर की फिल्म ‘श्री 420’ का गाना ‘ईचक दाना बीचक दाना’ तो इतना अधिक लोकपर्य हुआ कि इजरायल के गायक नईम ने उसको अपनी भाषा में गाया। कई फिल्म इतिहासकारों का मानना है कि रूस और चीन में राज कपूर की फिल्में इस वजह से दर्शकों को पसंद आ रही थीं कि वो समाजवादी विचारधारा के नजदीक थीं। पर राज कपूर खुद कह चुके हैं कि उनकी फिल्में विचार या विचारधारा को ध्यान में रखकर नहीं बनाई जाती हैं। उनकी फिल्मों में दर्शकों की संवेदना का ध्यान रखा जाता है। 

1960 के दशक और उसके बाद बनी फिल्में भी विदेश में लोकप्रिय हुईं जिनमें मुगले आजम प्रमुख हैं। 1965 आई देवानंद की फिल्म गाइड को भी विदेश में पसंद किया गया। उसके बाद शोले फिल्म को भी अंतराष्ट्रीय स्तर पर सराहना मिली। कालांतर में करण जौहर की रोमांटिक फिल्मों ने भी अंतराष्ट्रीय दर्शकों को अपनी ओर खींचा लेकिन तबतक हिंदी फिल्मों में पैसा आ चुका था और तकनीक भी बेहतर हो चुकी थीं। तकनीक के मामले में भी अगर हिंदी फिल्मों के सफर को देखें तो हिंदी फिल्मकारों ने कम संसाधन होने के बावजूद बेहतरीन दृश्यों की संरचना की। व्ही शांताराम जैसे निर्देशक तो बैलगाड़ी के अगले हिस्से में कैमरा लगाकर जिमी जिब तैयार कर मूविंग शाट्स लेते थे। उस जमाने में एल्यूमिनियम शीट्स पर पानी डालकर समंदर की लहर का अहसास करवाने वाले शाट्स बनाए जाते थे। तकनीक के मामले में भी हिंदी फिल्मों ने बहुत लंबा सफर तय कर लिया है। वीएफएक्स के इस दौर में तो गानों से लेकर नायकों की त्वचा तक को बेहतर बनाया जा सकता है। इस तरह से हम देखें तो भारतीय फिल्मकारों ने स्वाधीनता के पहले जो एक विश्वास अर्जित किया था उसकी बुनियाद पर बाद के फिल्मकारों ने सफलता की बुलंद इमारत खड़ी की।