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Saturday, March 17, 2018

आलोचना की साख पर सवाल


हिंदी साहित्य में आलोचना एक ऐसी विधा है जिस पर नियमित अंतराल पर सवाल उठते रहते हैं, कई बार उचित, तो बहुधा व्यक्तिगत राग-द्वेष की वजह से। इन दिनों फिर से आलोचना की स्थिति को लेकर सोशल मीडिया से लेकर पत्र-पत्रिकाओं में लिखे जा रहे हैं। कुछ कहानीकार, कुछ कवि अपने अधकचरे ज्ञान के आधार पर आलोचना को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश गाहे बगाहे करते रहते हैं। आलोचना विधा को समझे बगैर, उसकी गंभीरता और उसके औजारों को जाने बगैर उसपर सवाल उठाना हास्यास्पद लगता है। हद तो तब हो जाती है जब कुछ वरिष्ठ होते रचनाकार भी आलोचना के खिलाफ कोरस में शामिल हो जाते हैं और आलोचना को परजीवी विधा तक करार दे देते हैं। उनका बहुत साधारण सा तर्क होता है कि रचना के बगैर आलोचना का अस्तित्व ही नहीं है। सतही तौर पर ये आकलन ठीक लग सकता है, फेसबुक आदि पर इस तरह की टिप्पणी लिखनेवालों को लाइक्स के साथ-साथ वाहवाही आदि भी मिल जाती है, लेकिन आलोचना पर गंभीरता से काम करनेवालों की राय जुदा होती है। दरअसल जब आलोचना के परजीवी होने की बात की जाती है तो अज्ञानता में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष संबंध के सिद्धांत पर विचार नहीं किया जाता है। रचना के बगैर आलोचना के अस्तित्व को नकारनेवाले यह भूल जाते हैं कि बगैर आलोचना के रचना के अर्थ खुलते ही नहीं हैं। यह आलोचक ही होता है जो किसी भी कृति या रचना के अंदर की संवेदना की परतों को रेशा दर रेशा अलग कर देख पाता है और उसको पाठकों के सामने पेश करता है। रचना और आलोचना के बीच बहुत गहरा संबंध होता है जिसको समझने के लिए भी गहरी अंतर्दृष्टि की आवश्यकता होती है, इसका सामान्यीकरण कर इस संबंध को समझना लगभग असंभव है। मुझे ठीक से याद नहीं कि किस आलोचक ने ये कहा था- ‘आलोचना रचना है, इसका एक अर्थ यह भी है कि अच्छी आलोचना रचना की ही तरह भाषा का शास्त्रीय नहीं बल्कि सृजनात्मक उपयोग करती है, जिससे उसे पढ़ते समय तक एक स्तर पर रचना को पढ़ने का आनंद मिलता है। जैसे रचना की एक रचना प्रक्रिया होती है, वैसे ही निश्चित रूप से आलोचना की भी। उदाहरण के तौर पर जब नामवर सिंह के साठ के दशक में नई कहानियां पत्रिका में स्तंभ लिखते थे तो उसको पढ़ते हुए पाठकों को किसी रचना से कम आस्वाद नहीं मिलता था। इसी तरह से विजयदेव नारायण साही के लेख शमसेर की काव्यानुभूति की बनावट को पढ़ें तो किसी बेहतरीन रचना को पढ़ने का आनंद मिलता है।‘ यह ठीक कहा गया है। अस्सी के दशक में ये हिंदी साहित्य में ये शोर उठा था कि हिंदी आलोचना समसामयिक हो गई है। कहने का मतलब यह कि हिंदी आलोचना समकालीन रचनाकारों और कृतियों तक ही सीमित हो गई है। उस वक्त यह भी कहा गया था कि हिंदी आलोचना इतिहास और परंपरा की तरफ मुड़कर नहीं देखती। उस वक्त की स्थितियों का आकलन करने पर इसमें तथ्यों की कमी नजर आती है। उस दौर में सूर से लेकर मीरा तक और तुलसी से लेकर कबीर तक पर काम हो रहे थे। बार बार आलोचक मीरा बाई की कविताओं की ओर लौटते थे।
ऐसा नहीं है कि इस वक्त ही आलोचना को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं, आलोचना की प्रविधि और उसके तौर तरीकों पर समय समय पर सवाल भी उठते रहे हैं और आलोचक अपने तरीके से उसका उत्तर भी देते रहे हैं। शुक्ल जी के जमाने से लेकर अबतक आलोचना पर सवाल उठते रहे हैं। अशोक वाजपेयी ने भी आलोचना को लेकर कई तरह की स्थापनाएं दीं और कइयों पर पर प्रश्नचिन्ह लगाया। विवाद भी हुआ लेकिन बावजूद इसके रचना और आलोचना दोनों अपनी गति से चलती रही बल्कि कहें कि चल ही रही है। चंद दिनों पहले की बात है, हिंदी के वरिष्ठ उपन्यासकार भगवानदास मोरवाल ने आलोचना को लेकर एक टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा था कि हिंदी आलोचना अब भी रामचंद्र शुक्ल और हजारी प्रसाद द्विवेदी के बीच ही झूल रही है। उसके पहले संभवत: स्तंभकार कुलदीप कुमार ने लिखा था कि हिंदी का प्राध्यापक नौकरी लगते ही आलोचक हो जाता है जबकि अंग्रेजी में ऐसा नहीं है। भगवानदास मोरवाल के इस कथन के बाद मुझे दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापक गोपेश्वर सिंह का रामचंद्र शुक्ल और द्विवेदी जी की आलोचना पर एक लेख पढ़ने को मिला था। कुलदीप कुमार ने जिस प्रवृत्ति की ओर इशारा किया वो तो हिंदी आलोचना की सबसे बड़ी बाधा है ही। यह अकारण नहीं था कि राजेन्द्र यादव विश्वविद्यालयों के हिंदी विभागों को प्रतिभा की कब्रगाह कहा करते थे।
बावजूद इन सारी चीजों के हिंदी आलोचना में एकरसता से इंकार नहीं किया जा सकता है। इंकार तो इस बात से भी नहीं किया जा सकता है कि हिंदी के जो नए आलोचक उभर कर आ रहे हैं वो हीं आलोचना की लीक से हटकर कुछ नया नहीं कर पा रहे हैं। मार्क्सवादी आलोचना के फॉर्मूले पर रचनाओं को कसते हैं। जब कसौटी ही पुरानी हो जाए तो उसके नतीजे तो दोषपूर्ण होंगे ही। इसके अलावा एक और बात जो आलोचना को सवालों के कठघरे में खड़ा करती है वो है आलोचनाकर्म पर व्यक्तिगत रागद्वेष का हावी हो जाना। इस बात के अनेक उदाहरण हिंदी साहित्य में मौजूद हैं जब आलोचकों ने मित्रताभाव का निर्वाह किया। एक ऐसी आलोचक हैं जिनको सभी कृतियां अद्भुत ही लगती हैं। सोशल मीडिया पर वो नियमित अंतराल पर अद्भुत कृतियों के नाम पोस्ट करती रहती हैं। उनके मुताबिक हर कृति एक लंबी लकीर खीचती है। आलोचना में इस तरह की उदारता भी अनपेक्षित होती है। इन दोनों के अलावा आलोचकों में अपनी बात कहने का साहस भी कम होता जा रहा है। वरिष्ठ आलोचक निर्मला जैन ने सालों पहले कहा था कि वो अब इस वजह से किसी कृति के बारे में सही बात नहीं करती हैं क्योंकि उनको लगता है कि अगर वो ऐसा करेंगी तो लेखक नाराज हो जाएंगे। तब भी मेरे मन में सवाल उठा कि आलोचक कब से लेखक के नाराज या खुश ङोने की परवाह करने लगा? निराला ने छायावादी दौर में पंत जी की रचना ‘पल्लव’ पर बेहद कठोर टिप्पणी की थी । उस वक्त पंत जी और निराला में कितने गहरे संबंध थे यह बात पूरा साहित्य जगत जानता था। दरअसल आलोचना में कभी भी मुंह देखी नहीं होती है और बेहद निर्विकार भाव से कृति पर विचार करती है। खुद मार्क्स की एक किताब है- अ क्रिटिक ऑफ क्रिटिकल रिजन। लेकिन बाद के दिनों में मार्क्स के अनुयायियों ने इसको नेपथ्य में डाल दिया और रागद्वेष के आधार पर आलोचना करनी शुरू कर दी। आलोचना को सभ्य बना दिया जो कि बेहद शिष्ट होकर कृतियों पर विचार करने लगा। इस छद्म शिष्टाचार ने आलोचकों को सच कहने से दूर कर दिया। और आलोचना जब जब सच से दूर हुई है तो उसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हुए हैं।   
आलोचना पर बात करें और समीक्षा पर बात ना हो यह उचित नहीं होगा। दरअसल हिंदी में समीक्षा की स्थिति बहुत चिंताजनक होती जा रही है। बगैर किसी तैयारी के समीक्षकों की एक पूरी फौज हिंदी में आ गई है। जो समीक्षा के नाम पर किसी कृति का सारांश प्रस्तुत कर दे रहे हैं। बहुत फूहड़ता के साथ कृतियों का और लेखक का परिचय देते हैं। इस तरह के समीक्षकों को चिन्हित करना बहुत आसान है। समीक्षा भी आलोचना की तरह ही एक गंभीर कर्म है जिसमें बगैर तैयारी के उतरना बेहद जोखिम भरा होता है। सारांशात्मक समीक्षा से कृति के उसपक्ष पर बात नहीं हो पाती है जिसकी अपेक्षा समीक्षा और समीक्षकों से की जाती है। इस प्रकार की समीक्षा से लेखक भले ही खुश हो सकता है लेकिन साहित्य का या फिर पाठकों का कोई भला नहीं होता है। बहुधा समीक्षा की इस कमजोर स्थिति की वजह से ही हिंदी आलोचना को भी कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है। आज जरूरत इस बात की है कि समीक्षा कर्म पर बहुत गंभीरता से ध्यान दिया जाए और नादान समीक्षकों को चिन्हित कर उनको बताया जाना चाहिए कि आपने समीक्षा के नाम पर जो सारांश प्रस्तुत किया है वो साहित्य की एक समृद्ध विधा को कमजोर करनेवाली है। इस बात की पहल लेखकों के साथ साथ साथी समीक्षकों को भी करनी चाहिए क्योंकि फेसबुक ने इस प्रकार की सारांशात्मक समीक्षा को मंच दे दिया है। फेसबुक के बहुत श्वेत पक्ष हो सकते हैं लेकिन उसकी अराजक आजादी ने लेखकों के साथ साथ नादान समीक्षकों की महात्वाकांक्षाओं को भी पंख लगा दिए हैं। आलोचना और समीक्षा की साथ को कायम रखने के लिए जरूरी है कि इस तरह के छद्म समीक्षकों को रोका जाए।      


Sunday, April 12, 2015

देह अधिकार पर विमर्श का आधार

नारेबाजी को तो स्त्री की ईमानदार अभिव्यक्तियों के खिलाफ जानबूझकर स्थापित किया गया और उसे ही स्त्री लेखन का पैमाना बना दिया गया । जो देह विमर्श की पूरी राजनीति, पितृसत्तास्तमक रणनीति के साथ की गई थी, उसने बहुत सी लेखिकाओं को भ्रमित किया । बहुत से लोग, जो गंभीर काम कर सकते थे, इसी की भेंट चढ़ गए । अपनी देह पर निर्णय का अधिकार एक बड़ा मुद्दा है, इसे इतना हल्का नहीं बनाया जा सकता । देह पर निर्णय का अधिकार आसानी से नहीं मिलता ।बिना शिक्षा, बिना आर्थिक आत्मनिर्भरता के यह कितना संभव हो सकेगा !  निर्णय की स्थिति तक आने में आत्मसंघर्ष से भी गुजरना होता है । प्रेम में जिम्मेदारी भी होती है और मनुष्य अपने प्रियजनों को इतनी जल्दी नहीं छोड़ना चाहता है । जल्दी हारना भी नहीं चाहता । सबसे पहले मनुष्य अपनी परिस्थिति को ठीक करना चाहता है जब लगता है कि इसे ठीक नहीं किया जा सकता, तभी दूसरे रास्ते की तरफ बढ़ता है – ये कहना है दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षक और कथाकार अल्पना मिश्र का  । साहित्यक पत्रिका समीक्षा में प्रकाशित अपने साक्षात्कार में जब अल्पना ये बातें कहती हैं तो समकालीन साहित्य में जारी स्त्री विमर्श को वो इशारों इशारों में कठघरे में भी खड़ा करती हैं । अल्पना जब कहती हैं कि नारेबाजी को तो स्त्री की ईमानदार अभिव्यक्तियों के खिलाफ जानबूझकर स्थापित किया गया और उसे ही स्त्री लेखन का पैमाना बना दिया गया । जो देह विमर्श की पूरी राजनीति, पितृसत्तास्तमक रणनीति के साथ की गई थी, उसने बहुत सी लेखिकाओं को भ्रमित किया । यह साक्षात्कारकर्ता की सीमा थी कि वो लेखिका से इस विषय पर गहराई से बात नहीं कर पाई । अल्पना मिश्र ने जो बातें संकेत में कही हैं उसपर उनसे विस्तार से पूछा जाना चाहिए था । तभी सारी बातें और उनकी राय भी साफ हो पातीं ।

उनके साक्षात्कार में बेहद गंभीर बातें हैं और शब्दों का चयन भी बेहद समझदारी से किया गया है जिसपर स्त्री विमर्श के पैरोकारों को अपनी राय स्पष्ट करनी चाहिए । स्त्री विमर्श के नाम पर ए के सैंतालीस लेकर घूम रही लेखिकाओं को भी अल्पना के उठाए सवालों या उनके कथन पर अपनी राय देनी चाहिए, शांत दिमाग से बगैर गोलीबारी किए । स्त्री विमर्श के संदर्भ में अल्पना नारेबाजी.  देह विमर्श की पूरी राजनीति, पितृसत्तास्तमक रणनीति, लेखिकाओं के भ्रमित होने की बात उठाती हैं । ये एक एक शब्द विस्तार से चर्चा की मांग करता है । मेरी समझ में जब अल्पना स्त्री विमर्श में नारेबाजी की बात करती हैं तो वो बिल्कुल सही हैं लेकिन उसको स्थापित किसने किया इसपर साहित्य में बहस होनी चाहिए । विचार पर तो इसपर भी होना चाहिए कि क्या सचमुच पितृसत्तास्तमक रणनीति के तहत इस नारेबाजी को ही स्त्री की ईमानदार अभिव्यक्ति मान लिया गया । अल्पना ने बेहद संजीदगी के साथ अपनी बातें रखीं हैं । अपने उपन्यास के पात्रों के बहाने वो ये सवाल उठाती हैं । हिंदी में स्त्री की देह मुक्ति के आंदोलन के जनक राजेन्द्र यादव आज अगर जीवित होते तो उनकी इस मसले पर राय दिलचस्प होती । राजेन्द्र यादव स्कूल की लेखिकाओं से अपेक्षा की जाती है कि वो इस बहस को आगे बढ़ाएं । अल्पना जब कहती हैं कि स्त्री को अपनी देह के बारे में फैसला करने का अधिकार बहुत मुश्किल से मिलता है, तो वो एक और बड़ा सवाल खड़ा करती हैं । स्त्री विमर्श के नाम पर देह मुक्ति के लिए छटपटा रही लेखिकाओं को भी सामने आकर अल्पना के सवालों से या उनकी राय से मुठभेड़ की अपेक्षा है । दरअसल स्त्री विमर्श के नाम पर देहमुक्ति के खेल ने साहित्य में एक खास किस्म की अराजकता को भी बढ़ावा दिया है । देह मुक्ति शब्द की अवधारणा के पीछे तर्क यह था कि स्त्री अपने शरीर के बारे में खुद फैसला ले सके । समाज में यह स्थिति बने । इसको ही आधार बनाकर पश्चिम में विमर्श की शुरुआत की गई । लेकिन राजेन्द्र यादव ने स्त्री विमर्श में जिस देह मुक्ति को व्याख्यायित किया उसका आधार उच्छृंखलता ज्यादा था । देह मुक्ति और आजादी के नाम पर कुछ लेखिकाओं ने सारी मान्यताओं को छिन्न भिन्न कर दिया । मान्यताएं टूटवने ही चाहिए । परंपराओं को ढोने के कोई फायदा भी नहीं है । लेकिन भ्रम में जीकर तो सिर्फ नुकसान ही हो सकता है । अल्पना ने इसी भ्रम के नुकसान की बात की है । क्या स्त्री विमर्श और देह से आजादी का यह मतलब है कि घर परिवार शादी ब्याह नाते रिश्ते जैसे सारे सामाजिक संस्थाओं को तहस नहस कर दिया जाए । हमारे इस तर्क पर फिर से पितृसत्तात्मक वितार होने का आरोप लग सकता है लेकिन मैं तो सिर्फ सवाल उठा रहा हूं ष उन सवालों को जिन्हें एक लेखिका ने ही उठाया है । देह मुक्ति को अपनी शोहरत और सफलता की सीढ़ी बनानेवालों की पहचान की जानी चाहिए और उस युक्ति पर भी लेखक समुदाय को शिद्दत से विचार करना चाहिए । 

Sunday, May 8, 2011

तद्भव और अन्य पत्रिकाएं

हिंदी में साहित्यिक पत्रिकाओं का एक समृद्ध इतिहास रहा है और हिंदी के विकास में इनकी एक ऐतिहासिक भूमिका भी रही है । व्यावसायिक पत्रिकाओं के विरोध में शुरू हुआ लघु पत्रिकाओं के इस आंदोलन ने एक वक्त हिंदी साहित्य में विमर्श के लिए एक बड़ा और अहम मंच प्रदान किया था । लेकिन बदलते वक्त के साथ इन पत्रिकाओं की भूमिका भी बदलती चली गई । नब्बे के दशक में तो आलम यह था कि कई ऐसे व्यक्ति जो लेखक के रूप में हिंदी जगत में मान्यता नहीं पा सके उन्होंने किसी तरह से जुगाड़ लगा कर एक पत्रिका छाप ली । लेखक ना बन पाने की टीस संपादक बनकर दूर होने लगी । फिर तो यह फॉर्मूला चल निकला और एकल अंकी पत्रिका के संपादकों की हिंदी में बाढ़ आ गई । लगभग एक दशक में इस तरह की सभी पत्रिकाएं कहां बिला गई यह पता भी नहीं चला । उस दौर में कई पत्रिकाएं ऐसी भी निकली जिसने हिंदी साहित्य को गहरे तक प्रभावित ही नहीं किया बल्कि अपनी उपस्थिति से उसमें सार्थक हस्तक्षेप भी किया । इस तरह की एक गंभीर पत्रिका का प्रकाशन लखनऊ से कहानीकार अखिलेश ने शुरू की-तद्भव ( संपादक अखिलेश,18/20 इंदिरानगर, लखनऊ-226016, उत्तर प्रदेश) । अबतक इस पत्रिका के तेइस अंक निकल चुके हैं और हर अंक ने अपनी सामग्री की वजह से हिंदी जगत का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया । अपने संवादकीय में अखिलेश हर बार कोई विचारोत्तजक मुद्दा उठाते रहे हैं जिसपर पर्याप्त बहस की गुंजाइश भी रहती है ।
इस बार के अपने संपादकीय में अखिलेश ने इंटरनेट पर छप रहे लेखों और साहित्य को पुस्तकों की उपयोगिता का तुलनात्मक विवेचन किया है । अपने संपादकीय की शुरुआत ही अखिलेश करते हैं - इन दिनों कुछ लोगों द्वारा इस बात की चिंता प्रकट की जाती है कि इंटरनेट का विस्तार किताबों के वर्तमान स्वरूप को समाप्त कर देगा जाहिर है यहां आशय छपी हुई पुस्तकों से है । इस बात के समर्थन और विरोध की बातें कहते हुए अखिलेश फिल्मों तक पहुंचते हैं और कहते हैं कि - सिनेमा के अभ्युदय में भी साहित्य की समाप्ति का दुस्वपन देखा गया था । टेलीविजन को सिनेमा और साहित्य दोनों का संहारक माना गया । रंगीन टेलीविजन के खिलाफ तो बकायदा वैचारिक संघर्ष हुआ था और कंप्यूटर की भर्त्सना में बौद्धिक दुनिया ने विराट प्रतिरोध दर्ज किया था । इतना ही नहीं हमारे कुछ महत्वपूर्ण कवियों ने कंप्यूटर की निंदा करते हुए अपनी कविता में उसे ना छूने तक की प्रतिज्ञा की थी । अपने इस पूरे संपादकीय में अखिलेश तकनीक को लेकर हिंदी के द्वंद को सामने लाते हैं । इसके साथ ही इशारों-इशारों में इंटरनेट और ब्लॉग में फैली अराजकता पर भी सवाल खड़े करते हैं । यह सही है कि इंटरनेट और ब्लाग की दुनिया एक वैकल्पिक मीडिया के तौर पर सामने आया, साथ ही विचारों को अभिवयक्त करने का एक मंच प्रदान किया । इंटरनेट पर हिंदी में काफी महत्वपूर्ण काम किया जा रहा है लेकिन चंद लोग इसका इस्तेमाल व्यक्ति विशेष को बदनाम करने से लेकर लाभ-लोभ की आशा में ब्लैकमेलिंग के हथियार के तौर पर करते हैं । ब्लाग जगत के मूर्धन्य लोगों को आत्म नियंत्रण जैसा कोई मैकेनिज्म विकसित करना होगा । अगर ऐसा नहीं होता है तो सरकारी नियंत्रण की मांग उठेगी जो इसके हित में नहीं होगी ।
तद्भव के नए अंक में प्रसिद्ध कथाकार और अपनी धर्मनिरपेक्षता के लिए मशहूर विभूति नारायण राय की आनेवाली किताब के दो अंश छपे हैं - हाशिमपुरा 22 मई । 1987 में मेरठ के भीषण दंगों के दौरान विभूति नारायण राय बगल के जिले गाजियाबाद के पुलिस कप्तान थे । उन दंगों के दौरान उत्तर प्रदेश की पीएसी ने अंल्पसंख्यकों पर जिस तरह से जुल्म किए थे, उसके बारे में विभूति नारायण राय किताब लिख रहे हैं । यह पूरी घटना दिल दहला देने वाली है कि किस तरह 22-23 मई 1987 की रात को दिल्ली-गाजियाबाद बॉर्डर पर स्थित मकनपुर गांव के पास ट्रकों में भरकर लाए गए लोगों को पीएसी के जवानों ने अपनी गोली का शिकार बनाया था । पुलिस कप्तान के तौर पर जब राय सूचना मिलने के बाद उस जगह पहुंचे तो लाशों के ढेर के बीच सरकंडे को पकड़ कर नहर में झूलता एक जीवित व्यक्ति उन्हें मिला जिसका नाम बाबूदीन था । उसने पूरी घटना पुलिस कप्तान और उस वक्त के जिलाधिकारी नसीम जैदी को बतलाई । इस पूरे लेख में दो अधिकारियों के भय के उस मनोदशा का भी चित्रण है जहां उन्हें लगता है कि सुबह अफवाह फैलने के बाद उनके जिले में भी दंगा भड़क सकता है । यहां यह भी बताते चलें कि 1987 में चौथी दुनिया में सबसे पहले इस नरसंहार का खुलासा हुआ था । इसके अलावा तद्भव के इस अंक में वरिष्ठ साहित्यकार काशीनाथ सिंह की दो कहानियां खरोंच और पायल पुरोहित प्रकाशित है । काशीनाथ सिंह ने इस बार अपनी कहानियों में एक अलग ही तरह का प्रयोग किया है जो पाठकों को चौंकाती है । कविताओं में बद्री नारायण और प्रेम रंजन अनिमेष की कविताएं उल्लेखनीय हैं जबकि जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविताएं उनकी तुलना में काफी कमजोर है । जितेन्द्र अपनी कविताओं को संभाल नहीं पा रहे हैं और उनके कथन में भटकाव को साफ तौर पर देखा जा सकता है ।
पुस्तक समीक्षाओं पर केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका- समीक्षा ( संपादक-सत्यकाम, 3320-21, जटवाड़ा, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज नई दिल्ली-110002) का भी नया अंक आया है । मैं लंबे अरसे से इस पत्रिका को देख पढ़ रहा हूं । जब से सामयिक प्रकाशन ने इस पत्रिका का अधिग्रहण किया है तो कुछ बदलाव तो लक्षित किए जा सकते हैं लेकिन लेकिन घूम फिर कर वही-वही लेखक फिर से छप रहे हैं जो सालों से छपते आ रहे हैं । हां इतना अवश्य हुआ है कि महेश भारद्वाज ने कुछ नए लेखकों के लिए पत्रिका का सिंहद्वार खोल दिया है । अप्रैल में प्रकाशित अंक में वर्ष 2010 में प्रकाशित किताबों का लेखा-जोखा प्रकाशित होना चकित करता है । 2011 के तकरीबन चार महीने बीत जाने के बाद पिछले वर्ष का लेखा-जोखा छापना मेरी समझ से बाहर है । इन चार महीनों में तो हिंदी में कई अहम किताबें छपकर आ गई, खुद समायिक से ही कई किताबें छप गई । इस तरह के लेख से एक तो यह लगता है कि प्लानिंग के स्तर पर कुछ खामियां है जिसे दूर किया जा सकता है ताकि पत्रिका की ताजगी और लेखों की प्रासंगिकता बनी रही । इस पत्रिका के संस्थापक संपादक गोपाल राय जी ने इस बार प्रेमचंद की किताबों के बहाने एक अच्छा लेख लिखा है । संपादकीय में सत्यकाम ने कई हल्की बातें कह दी हैं,गौर करिए - पत्रिकाओं के दम पर आज साहित्य जिंदा है, वर्ना पुस्तकें पुस्तकालयों में जाकर कैद होने के लिए अभिशप्त हैं । ऐसी ही एक पत्रिका है नया पथ । यह जनवादी लेखक संघ की केंद्रीय पत्रिका है । लेखक संघों में जनवादी लेख संघ ही सर्जानत्मक रूप से सक्रिय है और इसी पर साहित्य की आशा टिकी है । पता नहीं सत्यकाम किस आधार पर कह रहे हैं कि जलेस ही सर्जनात्मक रूप से सक्रिय है और साहित्य की आशा उसपर ही टिकी है । यहां सत्यकाम फतवेबाजी के दोष के शिकार हो गए हैं । उन्हें यह बताना चाहिए था कि किस तरह से साहित्य की आशा जलेस पर टिकी है । सत्यकाम की छवि एक समझदार शिक्षक की है उनसे इस तरह की बचकानी टिप्पणी की उम्मीद नहीं थी । लेखक संघ किस तरह से अपने कर्तव्य से च्युत हो चुके हैं यह पूरा हिंदी साहित्य जानता है । उनकी साहित्य जगत में अब कोई भूमिका शेष नहीं रह गई है क्योंकि लेखकों से जुडे़ किसी भी बड़े मसले पर वो हमेशा खामेश ही रहते हैं ।
पिछले दिनों एक गोष्ठी में एक मित्र ने आधारशिला ( संपादक दिवाकर भट्ट, बड़ी मुखानी,हलद्वानी, नैनीताल, उत्तराखंड -263139) का कवि त्रिलोचन पर केंद्रित अंक-बारंबार त्रिलोचन की प्रति दी । इस अंक का संपादन वाचस्पति ने किया है । इस अंक के संपादकीय से पता चला कि इसके पहले भी आधारशिला ने अपना एक अंक त्रिलोचन पर फोकस करते हुए निकाला था और दिवाकर भट्ट की मानें तो - आधारशिला का त्रिलोचन विशेषांक -एक त्रिलोचन इतने अपने पास, अपनी सामग्री व प्रस्तुति की दृष्टि से देश-विदेश में खासा चर्चित रहा । मुझे इस बात का अफसोस है कि देश-विदेश में चर्चित उक्त अंक मैं देख नहीं पाया । अगर इस अंक को देखें तो अतिथि संपादक ने पहले ही मान लिया है कि - कुछ निजी और सार्वजनिक कारणों से त्रिलोचन विषयक अत्यंत महत्वपूर्ण सामग्री अभी हम नहीं दे पा रहे हैं । इस याचित सामग्री का उपयोग हम यथासमय अवश्य करेंगे । बावजूद इसके इस अंक में कई महत्वपूर्ण लेख प्रकाशित हैं । कथाकार उदय प्रकाश का संस्मरणात्मक लेख-पथ पर बिखरा जीवन-बेहतरीन लेखों में से एक है । इस लेख के अलावा हिंदी के तमाम लेखकों के त्रिलोचन पर समय समय पर लिखे लेख इस अंक में हैं जिसमें शमशेर बहादुर सिंह, राजेश जोशी, लीलाधर जगूड़ी, रामविलास शर्मा, रमेशचंद्र शाह आदि के नाम शामिल हैं । त्रिलोचन पर केंद्रित य़ह अंक हिंदी में सानेट के जनक को जानने के लिहाज से अहम है ।
पिछले दिनों डाक में एक ऐसी पत्रिका मिली जिसके शीर्षक के मुझे चौंकाया । प्रवासी भारतीयों की मासिक पत्रिका- पत्रिका गर्भनाल ( संपादक सुषमा शर्मा, डीएक्सई-23, मीनाल रेसीडेंसी, जे के रोड भोपाल-462023) । मैं इसके कवर और शार्षक से यह अनुमान नहीं लगा पाया कि यह किस तरह की पत्रिका है । लेकिन उलटने पुलटने के बाद पता चला कि यह पत्रिका कमोबेश साहित्यक ही है । इसमे विदेशो में बसे कुछ भारतीयों के लेखों के अलावा देसी लेखकों की भी रचनाएं प्रकाशित हैं लेकिन दो अंक देखने के बाद भी मेरी यही राय है कि अभी इस पत्रिका का कोई ठोस स्वरूप नहीं बन पाया है ।