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Saturday, September 12, 2020

कवरेज से कठघरे में न्यूज चैनल


लगभग चार साल बाद नोएडा के फिल्म सिटी गया। ये वही इलाका है जहां ज्यादातर न्यूज चैनलों के कार्यालय हैं। कोरोना की वजह से फिल्म सिटी में रौनक थोड़ी कम थी। न्यूज चैनल में कार्यरत एक मित्र से कुछ काम के सिलसिले में मिलने गया था। कोरोना की वजह से दफ्तर में बाहरियों के प्रवेश की मनाही थी। इस वजह से हमलोग फिल्म सिटी स्थित एक चाय की दुकान पर बैठकर बातें कर रहे थे। इतने में तीन पुराने सहयोगी चाय पीने उसी दुकान पर आ गए। ये सब अलग अलग चैनलों में काम करते हैं लेकिन चाय साथ ही पीते थे। वहीं खड़े खड़े बातें होने लगीं। मुझे ध्यान नहीं था कि वो दिन गुरूवार था और उसी दिन चैनलों की टीआरपी आती है। टीआरपी रेटिंग पर बातें होने लगी। न्यूज चैनल में लंबे समय तक काम करने की वजह से टीआरपी रेटिंग वाले दिन की अहमियत का पता था। उस दिन होनेवाली बातें भी वही थीं जो चार पांच साल पहले हुआ करती थी। लिहाजा मुझे लगा कि थोड़ी देर में ये बातें खत्म भी हो जाएगी लेकिन मेरे एक मित्र ने दूसरे को रेटिंग को लेकर छेड़ दिया। रिया,सुशांत, कंगना से लेकर चीन और कोरिया के घटनाक्रम केंद्र में आने लगे थे। तबतक मुझे लग रहा था कि हल्की फुल्की बातें हो रही हैं थोड़ी देर में हंसी मजाक करके खत्म हो जाएगी। सब इस वक्त अलग अलग न्यूज चैनलों में काम जरूर कर रहे थे लेकिन एक समय में सभी एक ही न्यूज चैनल का हिस्सा होते थे, गहरे मित्र भी थे। 

जिस मित्र ने दूसरे मित्र को रेटिंग कम होने को लेकर छेड़ा था उसने एक और बात कह दी जिसको लेकर बात बढ़ गई। उसने कह दिया कि ये पुराना फॉर्मूला है कि जो चैनल अपनी स्टोरी को लेकर जितना गिरेगा उसकी टीआरपी उतनी ही बढ़ेगी। ये जुमला सालों से फिल्म सिटी में गूंजता रहा था लेकिन मजाक में। पहले वाले मित्र ने कहा कि यार तुम ज्यादा ज्ञान मत दो। हमें मालूम है कि चैनलों ने टीआरपी के लिए क्या क्या नहीं किया। आज जब तुम्हारे चैनल की टीआरपी कम हो गई है तो तुम स्टोरी का वर्गीकरण करने लगे। जिस चैनल में इन दिनों तुम काम कर रहे हो न उस चैनल को आसमान में साईं बाबा की आंख दिखाई दी थी और घंटों तक वो विजुअल चलता रहा था। जरा याद कर लो । 

हम तीन लोग चुपचाप खड़े होकर उन दोनों की बातें सुन रहे थे। दोनों की बातों में तल्खी बढ़ने लगी थी। बीच बचाव करने की गरज से हम तीन में से एक बोल पडा कि अरे जाने दो भाई, सभी चैनलों ने कभी न कभी, कुछ न कुछ ऐसा चलाया है जो न्यूज चैनल पर नहीं चलना चाहिए था। इतना सुनना था कि आपस में झगड़ रहा हमारा एक साथी उसके उपर ही बिफर गया। कहने लगा कि तुम भी इसके साथ हो गए और ज्ञान देने लगे। वो दिन भूल गए जब तुमने स्वर्ग में सीढ़ी लगाई थी। वो दिन भूल गए जब ‘एरिया 51’ और ‘बारमूडा ट्राइंगल’ जैसे टीआरपी बटोरनेवाले कार्यक्रम लिखा करते थे। बड़े शौक और अकड़ से कॉलर ऊंचा करके उस दौर में घूमा करते थे कि इस हफ्ते नौ बजे की हमारी टीआरपी सबसे अधिक रही। शांति से अपनी बात कह रहा हमारा वो मित्र अपने ऊपर हुए व्यक्तिगत हमले को बर्दाश्त नहीं कर पाया। अब पलटवार करने की बारी उसकी थी। बोला तुम क्या कम हो, आज जहां काम कर रहे हो उस चैनल को देख लोग सबसे पहले तो तुम्हीं लोगों ने ये काम शुरू किया था। प्रिंस जब गड्ढे में गिरा था तो किसने गानेवालों को स्टूडियो में बुलाकर गाना गवाया था। किसने स्टूडियो में हवन और पूजन करवाया था। क्या न्यूज चैनल में ये सब बातें उचित थीं। जिस दिन प्रिंस गड्ढे में गिरा था, दरअसल उस दिन ही न्यूज भी गड्ढ़े में गिरा था। 

हमारा चौथा मित्र जो शांति से सारी बातें सुन रहा था, वो जरा वामपंथी मिजाज का था। बहस बढ़ने लगी तो उसने भी सोचा कि वो क्यों पीछे रहे। उसने कहा कि देखिए दरअसल हमको पूरी गंभीरता से और समग्रता में न्यूज चैनलों की इस समस्या का विश्लेषण करना चाहिए। हमें इस बात को भी रेखांकित करना चाहिए कि कब से न्यूज चैनलों पर खबरों से अलग हटकर कटेंट देने की शुरुआत हुई। वो कौन सी सामाजिक-राजनीति-आर्थिक परिस्थितियां थीं जिनमें उस दौर में चैनलों को इस तरह की चीजें दिखाने को मजबूर किया था। अब तीनों मिलकर उसपर टूट पड़े। ज्यादा समग्रता-वमग्रता की बातें मत करो, जरा सोचो कि न्यूज चैनलों पर आत्मा से बातें करवानेवाले कार्यक्रम क्यों चले थे। एक मुस्लिम महिला के पति के गायब होने के बाद जब उसकी शादी किसी और से हो गई थी और उसके बाद जब उसका पहला पति लौट आया था तो इस घटना का तमाशा क्यों बना था। क्यों सरेआम कैमरे के आगे पंचायत लगावकर निजी रिश्तों को तार तार किया गया था। जब न्यूज चैनलों पर मंदिर का रहस्य से लेकर बिना ड्राइवर की कार और नागिन का इंतकाम चलता था तब तो तुम खामोश रहते थे। अब सैद्धांतिक बातें कर रहे हो। अब सभी एक साथ बोलने लगे थे और मैं सोच रहा था कि यार गलत दिन अपने मित्रों से मिलने आ गया। 

बहस लंबी चलती देख नंदू ने दूसरी बार चाय भेज दी। सबने चाय ली तो मुझे लगा कि अब बात खत्म हो जाएगी, लेकिन उस मित्र ने फिर से बात छेड़ दी जिसके चैनल की टीआरपी इन दिनों बढ़ी हुई थी। उसने वामपंथी मित्र पर तंज कसा कि देखो यहां कोई दूध का धुला नहीं है, तुम्हारे जो आदर्श हैं न उनके चैनल ने ही सबसे पहले एंकरिंग का मजाक बनवाया। बंटी और बबली फिल्म रिलीज होनेवाली थी या हुई थी तो अभिषेक बच्चन और रानी मुखर्जी से एंकरिंग करवाई थी। तब से ही एंकरिंग का तमाशा बनना शुरू हुआ। अब भड़कने की बारी वामपंथी मित्र की थी, वो तो शुरू हो गया और लगा नाम लेकर सबकी बखिया उधेड़ने। उस दौर के संपादकों को बुरा भला कहने। उसकी आवाज भी ऊंची होने लगी थी। बात बिगड़ती देख मैंने कहा कि अब हम सबको चलना चाहिए। एक ने कहा भड़ास सुनते जाओ। वामपंथी मित्र अपेक्षाकृत जल्दी शांत हो गए। सभी इस पर सहमत दिखे कि टीवी न्यूज चैनलों के आरंभिक दिनों में गलतियां हुईं। एक ने तो कह भी दिया कि ‘जब बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय’। अब मेरे चारों मित्र उन पुराने न्यूज चैनल संपादकों के ज्ञान देने से झुब्ध दिखे जिनके कार्यकाल में खबरों के नाम पर तमाशा हुआ करता था। एक मित्र ने कहा कि क्या ही अच्छा होता कि नैतिकता आदि के प्रश्न उठानेवाले उस दौर के संपादक पहले ये मानते कि उन्होंने गलतियां की थीं। कहते कि न्यूज चैनल अपने शैशवावस्था में थे, गलतियां हुईं। अब तो न्यूज चैनलों की आय़ु बीस साल से अधिक हो गई है, अब जिम्मेदारी का एहसास होना चाहिए। ऐसा होता तो पुराने संपादकों के उपदेश में वजन भी आता अन्यथा ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’ वाली बात लगती है। मैंने अपने मित्रों से विदा ली। लौटते समय बहुत देर तक सोचता रहा कि इसका क्या हल है? कब कोई खड़ा होगा और कहेगा कि खबरों को खबर की तरह चलाएं और उसकी सुनी भी जाएगी। उत्तर नहीं मिल पाया। 

Thursday, April 6, 2017

साख बचाने की चुनौती

एक मंत्री का सेक्स चैट, जिसमें मादक बातें हो रही हों किसी भी टीवी चैनल के लॉंच के दिन के लिए अच्छी स्टोरी मानी जा सकती है । ना सिर्फ अच्छी स्टोरी बल्कि ज्यादा से ज्यादा दर्शकों तक अपनी पहुंच बनाने का एक उपक्रम भी, बशर्ते कि जो ऑडियो क्लिप एयर किया जाए वो प्रामाणिक हो और दोनों पक्षों की बातें समझ में आ रही हों । लेकिन केरल के एक टीवी चैनल मंगलम टीवी ने अपने लॉंच के दिन के लिए एक ऐसा प्रपंच रचा जिससे पूरी पत्रकारिता शर्मसार हो गई । केरल का रीजनल चैनल मंगलम टीवी ने अपने लॉंच वाले दिन अपने पहले न्यूज बुलेटिन में दो ऑडियो क्लिप चलाना शुरू किया जिसमें एक शख्स कामुक बातें कर रहा था । चैनल का दावा था कि उस ऑडियो क्लिप में आवाज केरल के परिवहन मंत्री ए के शशिन्द्रन की है । कथित सेक्स चैट के एयर होते ही केरल की राजनीति में भूचाल आ गया और पिनयारी विजयन सरकार की आलोचना शुरू हो गई । कामुक बातों वाली इस ऑडियो क्लिप में सिर्फ मर्द की ही आवाज सुनाई जा रही थी और बार बार ये दावा किया जा रहा था कि मंत्री ए के शशिन्द्रन एक महिला से बात कर रहे हैं जो उनसे किसी शिकायत के सिलसिले में मिली थी । इस ऑडियो क्लिप के एयर होने के चंद घंटों के अंदर ही परिवहन मंत्री ए के शशिन्द्रन ने पद से इस्तीफा दे दिया ।
ए के शशिन्द्रन के इस्तीफे से बात खत्म नहीं हुई । अब उस ऑडियो क्लिप की प्रामाणिकता पर सवाल खड़े होने लगे थे क्योंकि उसको ध्यान से सुनने के बाद यह प्रतीत हो रहा था ऑडियो क्लिप की जबरदस्त एडिटिंग की गई है । सरकार ने भी आनन फानन में इल पूरे मामले की जांच के लिए एक न्यायिक आयोग गठित कर दिया और एसआईटी को भी पूरे मामले की जांच के आदेश दे दिए । तबतक ऑडियो क्लिप की प्रामाणिकता और मंत्री ए के शशिन्द्रन जिस महिला से बात कर रहे थे उसकी आवाज नहीं सुनाने को लेकर चैनल की चौतरफा आलोचना भी शुरू हो गई थी । चौतरफा घिरता देख चैनल के सीईओ सामने आए और उन्होंने बगैर शर्त माफी मांगी और बताया कि मंत्री एक स्टिंग ऑपरेशन के शिकार हो गए थे और उनके चैनल की एक महिला पत्रकार ने ही मंत्री से बात की थी । मतलब कि महिला पत्रकार हनी ट्रैप की टूल बनीं । सार्वजनिक माफी के बाद भी यह मामला शांत होता नहीं दिख रहा है क्योंकि दो ऑडियो क्लिप ने एक मंत्री के सार्वजनिक जीवन पर दाग लगा दिया, इनको मानसिक प्रताड़ना झेलने को मजबूर किया गया, उनका इस्तीफा हो गया आदि आदि । चैनल की माफी के बावजूद एसआईटी ने चैनल के सीईओ समेत नौ कर्मचारियों के खिलाफ केस दर्ज कर सीईओ और चार अन्य को गिरफ्तार कर लिया है । जांच चलेगी, संभव है सजा भी हो जाए, चैनल पर केबल एंड टेलीविजन एक्ट के तहत कार्रवाई भी हो लेकिन पत्रकारिता के पवित्र पेशे पर जो दाग लगा है वो आसानी से मिटने वाला नहीं है । केरल की पत्रकार और बौद्धिक बिरादरी इस घटना से सन्न है । लेखकों ने एक बयान जारी कर इसकी निंदा की है वहीं पत्रकारों के संगठन ने दफ्तर के बाहर जाकर प्रदर्शन किया ।
दरअसल अगर हम देखें तो खासकर हिंदी टीवी में जब से नादान संपादकों की एक फौज आई है तो इस तरह की घटनाएं ज्यादा होने लगी हैं । पहले जो संपादक होते थे उनको पत्रकारिता की परंपरा के साथ साथ अपनी जिम्मेदारी का एहसास भी होता था । इस दौर के ज्यादातर टीवी के संपादकों को पत्रकारिता के मानदंडों से कुछ लेना देना ही नहीं है, पत्रकारिता की साख को लेकर कोई चिंता नहीं । उनको बस चिंता रहती है कि कुछ भी चलाकर रेटिंग आ जाए । इस दौर में खासकर हिंदी चौनलों में चंद ही टीवी संपादक बचे हैं जो इन दंद फंद से दूर रहते हैं । कई संपादकों को तो लगता है कि वो खबर बना भी सकते हैं । मंगलम टीवी की घटना खबर बनाने की इसी तरह की नादानी का एक शर्मनाक नमूना है । पूर्व में भी खबर बनाने की कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं जिसमें कार्रवाई भी हुई लेकिन सवाल तो वही है कि खबरों को बनाने की प्रवृत्ति क्यों ? टीवी में जिस तरह से युवाओं को लेकर संपादकों की रट सामने आती है वह अच्छी बात है लेकिन उनको अनुभव पर भी ध्यान देना चाहिए । मंगलम टीवी जैसी घटना को सिर्फ अनुभवी पत्रकार ही रोक सकता है या कम से कम सचेत कर सकता है ।  

भूत-प्रेत, नाच-गाना, मंदिर का रहस्य, पेड़ से टपकती श्रद्धा, जैसे विषयों को लेकर न्यूज चैनलों पर जिस तरह से घंटों तक प्रोग्रामिंग की जाती है उसमें संपादकों की मौन या मुखर सहमति तो रहती ही है बाजार का भी परोक्ष या प्रत्यक्ष दबाव रहता है । एक अनुमान के मुताबिक टीवी पर सालभर में करीब तीस हजार करोड़ के विज्ञापन आते हैं । इन विज्ञापनों का आधार अमूमन टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट ( टीआरपी ) ही रहता है । अब जब विज्ञापन का आधार ही टीआरपी है तो इसको हासिल करने का दबाव तो रहेगा ही । अनुभवी संपादक इस तरह के दबाव को झेल जाते हैं और रेटिंग हासिल करने का प्रामाणिक रास्ता तलाशते हैं लेकिन नादान संपादक तुरत फुरत रेटिंग के चक्कर में गलती कर बैठते हैं, कई बार तो अपने अनुभवी साथियों की सलाह को दरकिनार करके भी । मंगलम टीवी जैसी घटनाएं ना हों इसके लिए एडिटर्स गिल्ड, ब्राडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन और न्यूज ब्राडकास्टर्स एसोसिएशन जैसी संस्थाओं को तुरंत कदम उठाने की जरूरत है । साख पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताकत है और जिस तरह से खबरों को बनाने की प्रवृत्ति बढ़ी है, उससे साख छीजती है, वो बेहद चिंता की बात है । 

Monday, January 16, 2017

बाबा के भेष में बहुरूपिया !

इन दिनों खबरिया चैनलों पर साधु की वेशभूषा में एक शख्स कई राजनीतिक दावे कर रहा है । इंदिरा गांधी से नजदीकी और चंद्रशेखर और नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बवनाने में अपनी भूमिका का बखान कर रहा है । वो यहीं तक नहीं रुकता है, उसका दावा है कि उसने सलमान खान को थप्पड़ मारा है और बॉलीवुड से लेकर हॉलीवुड तक की कई अभिनेत्रियां उसकी शिष्या हैं । ये साधुनुमा शख्सियत है स्वयंभू बाबा ओम, जिसका असली नाम विनोदानंद झा है । ओम पर साइकिल चोरी से लेकर विस्फोटक रखने तक के मामले में टाडा जैसे केस दिल्ली के थानों में दर्ज हैं । फिर क्या वजह है कि एक आरोपी को नेशनल न्यूज चैनलों पर इतनी तवज्जो मिल रही है । दरअसल टीवी सीरियल बिग बॉस में ओम ने जिस तरह का उधम मचाया उसने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा । साधु के वेश में महिला के साथ स्वीमिंग पूल में नहाने से लेकर नागिन डांस करनेवाले बाबा को शर्तों को तोड़ने के आरोप में बिग बॉस के घऱ से बाहर कर दिया गया था । बड़बोले बाबा ने अपने बयानों से न्यूज चैनलों का ध्यान अपनी ओर खींचा । बाबा में टीआरपी की संभावनाएं देखते हुए बड़े बड़े चैनलों के संपादक तक उसका इंटरव्यू करने कूद पड़े । ओम को स्टूडियो में बुलाकर पूरे देश को घंटों तक उनका बकवास सुनाया गया । इन शोज़ के दौरान उनका बड़बोलापन बढ़ता चला गया । एक शो के दौरान दर्शकों में बैठी एक महिला को बेहद असंसदीय शब्द कहने से भीड़ और मेहमान दोनों भड़क गए और जमकर लात जूते चले । बाबजूद इसके शो चलता रहा, ओम दावे करते रहे ।
दरअसल अगर हम देखें तो ओम पिछले साल एक न्यूज चैनल के स्टूडियो में हुए थप्पड़ कांड से चर्चित हुआ । उसके पहले भी वो एक न्यूज चैनल के दफ्तर में पिटते पिटते बचे थे । लाइव शो में हुए थप्पड़ कांड के बाद वो चर्चित हो गए । महिला को थप्पड़ मारने के बाद पुलिस के डर से स्टूडियो से ये कहते हुए रफूचक्कर हो गए थे कि उनकी मुलायम सिंह यादव से बात हो गई है । उस केस का क्या हुआ ज्ञात नहीं है लेकिन ओम का हौसला उसके बाद बुलंद हो गया । ओम का उद्भव न्यूज चैनलों की भीड़ भरी दुनिया में उस वक्त हुआ जब डिबेट शो के दौरान चीखने चिल्लाने का दौर शुरू हुआ । ओम जैसी बेसिर-पैर की बातें करनेवाले लोग न्यूज चैनलों के प्रोड्यूसर्स की पसंद बनने लगे । खुद को हिंदी धर्म का रक्षक घोषित करनेवाले ओम का मकसद सिर्फ स्टूडियो में हंगामा करना और विरोधियों को बोलने नहीं देना होता था । उस वक्त ओम की मांग इतनी ज्यादा थी कि उसके टाइम स्लॉट बुक घंटे के हिसाब से बुक हुआ करते थे । स्टूडियो में थप्पड़ कांड के बाद ओम की मांग कम होने लगी थी लेकिन बिग बॉस के सीजन दस ने इस स्वयंभू बाबा को नया जीवन दे दिया । बिग बॉस में उलजलूल हरकतों ने ओम को फिर से चर्चा में ला दिया । हिंदू बाबा के नाम से खुद को प्रचारित करनेवाला ये बाबा हंसी का पात्र बनता चला गया और किसी भी सीरियल में एक अहमकनुमा जोकर तो चाहिए ही होता है ।

ओम को अहमियत से दो सवाल उठते हैं एक तो न्यूज चैनलों के कर्ताधर्ताओं पर । क्यों और कैसे उलजलूल बातें करनेवालों को इतना एयर टाइम दिया जाता है । यह सही है कि न्यूज चैनलों के लिए टीआरपी आवश्यक है लेकिन टीआरपी यानि रेटिंग के लिए कुछ भी किया जाए । कई वैसे लोग भी जो इस तरह के बाबा, भूत प्रेत आदि को टीवी पर दिखाए जाने के खिलाफ होते थे, संपादक बनते ही इनके ही शरण में जाते दिखने लगते हैं । ओम के कारनामों के दौरान और बाद में इस तरह की बातें सुनाई देती हैं कि फलां चैनल का इनके बयानों से कोई लेना देना नहीं है या फिर चैनल उनकी बातों और क्रियाकलापों से इत्तफाक नहीं रखता है । सही है इस तरह के डिस्क्लेमर बोले जाने चाहिए ताकि दर्शकों को जागरूक किया जा सके । लेकिन केबल एंड टेलीविजन एक्ट कहता है कि ब्राडकास्टर यानि चैनल की भी उतनी ही जिम्मेदारी होती है, जितना बोलने वाले की । किसी भी तरह का भड़काऊ बयान, आपत्तिजनक कटेंट, या फिर असंसदीय भाषा के टेलीकास्ट करने की जिम्मेदारी चैनलों की भी होती है । ओम के मामले में कई चैनल इस कानून की धाराओं का उल्लंघन करते दिखे । अब अगर सरकार उनको नोटिस देती है तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमले का शोर मचने लगेगा । जरूरत जिम्मेदारी समझने की है । दूसरी तरफ जिस तरह से हिंदू धर्मगुरू होने दा दावा करनेवाला ये शख्स ओछी हरकतें कर रहा है उसके बारे में संत समाज को भी सोचना चाहिए । क्या कोई वेशभूषा से साधु होता है या फिर आचरण- व्यवहार से, इस पर विचार करने की आवश्यकता है । ओम को अंतराष्ट्रीय मीडिया हिंदू गॉडमैन लिख रहे हैं जिससे पूरी दुनिया में हिंदी संतों की छवि खराब हो रही है । संतों की प्रतिनिधि सभा अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद को ओम की हरकतों का संज्ञान लेना चाहिए और उसपर अंकुश लगाने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए । 

Monday, October 13, 2008

टीवी के लौंडे-लफाड़े

देशभर के अखबारों में आजकल टेलिविजन चैनलों के स्टिंग ऑपरेशन पर खूब चर्चा हो रही है। सरकारी चैनल दूरदर्शन ने भी मीडिया के सरोकार के बहाने इसपर एक वृहद चर्चा आयोजित की। कमोबेश इस तरह से स्टिंग ऑपरेशन के बहाने खबरिया चैनलों पर लगाम लगाने के सरकार के इरादे को समर्थन मिल रहा है।
सवाल ये भी उठाए जा रहे हैं कि न्यूज चैनलों पर नाग नागिन और भूत प्रेत दिखाए जा रहे हैं। आलोचकों का ये भी कहना है कि न्यूज चैनलों से खबरें गायब हो गई है, बाकी सबकुछ है। इसके अलावा टीआरपी को लेकर भी खूब शोरगुल मचाया जा रहा है। जिन्हें टीआरपी की एबीसी भी पता नहीं है, वो भी न्यूज चैनलों की इस बात के लिए जमकर आलोचना करने में जुटे हैं कि वो टीआरपी बटोरने के लिए किसी भी हद तक जा रहे हैं।
टीआरपी के बारे में आधी अधूरी जानकारी रखनेवाले विद्वान, लेखक और अपने आपको मीडिया के जानकार बतानेवाले टीआरपी के सैंपल साइज पर भी सवाल उठा रहे हैं। कोई कह रहा है कि दो हजार बक्से से ये कैसे तय हो सकता है तो कोई इसकी संख्या पांच हजार बता रहा है। तो कहीं इसकी कार्यप्रणाली पर ही सवाल खड़े किए जा रहे हैं। बात-बात में सीएनएन और बीबीसी के उदाहरण दिए जाते हैं। लेकिन इसपर जो भी चर्चा हो रही है वो बहुत ही सतही और सुनी सुनाई बातों के आधार पर की जा रही है।
टीआरपी और इस व्यवस्था को कोसना आजकल फैशन हो गया है लेकिन न्यूज चैनलों पर लिखनेवाले मित्रों के लेखों को पढ़कर लगता है कि वो बगैर किसी तैयारी के लिख रहे हैं। टीआरपी और इस व्यवस्था की आलोचना करनेवालों को ये पता होना चाहिए कि ये व्यवस्था विश्व की सबसे बड़ी व्यवस्था है। किसी भी और देश में टीआरपी के इतने बक्से नहीं लगे हैं।
पूरे भारत में अभी टीआरपी के सात हजार बक्से लगे हैं और रिसर्च करनेवालों की एक पूरी टीम हफ्तेभर इसपर काम करती है। और अगर टीआरपी को ध्यान में रखकर कंटेंट तय किया जा रहा है तो इसमें बुराई क्या है। क्या अखबार और पत्र-पत्रिकाएं सर्कुलेशन और रीडरशिप को ध्यान में रखकर अपना कंटेंट तय नहीं करते हैं। अगर टीआरपी के सैंपल साइज पर सवाल उटाए जा रहे हैं तो अखबारों के रीडरशिप सर्वे पर कोई सवाल क्यों नहीं उठता। पांच लाख के सर्कुलेशन वाले अखबार की रीडरशिप यानी पाठक संख्या पचास साठ लाख से ज्यादा दिखाई जाती है।
बारह लाख बिकनेवाली चालीस पृष्ठ की पत्रिका की पाठकसंख्या एक करोड़ से ज्यादा बताई जाती है। मतलब ये कि उक्त अखबार और पत्रिका की एक प्रति को लगभग दस लोग लोग पढ़ते हैं। क्या ऐसा संभव है। ये तो सिर्फ किसी बात की तरफ इशारा भर करता है। चलिए मान भी लिया जाए कि ऐसा होता होगा तो फिर सवाल ये उठता है कि नेशनल रीडरशिप सर्वे और इंडियन रीडरशिप सर्वे का सैंपल साइज क्या होता है। क्या इन सर्वे के सैंपल साइज इतना बावेला मचा।
अखबार और पत्र-पत्रिकाओं के विज्ञापन से जुड़े लोग इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि इन रीडरशिप सर्वे के आधार पर पत्र-पत्रिकाएं विज्ञापनदाताओं के पास जाकर कितना शोर मचाते हैं।
दूसरी जो सबसे हल्की बात न्यूज चैनलों के बारे में कही जाती है कि वो नाग नागिन और भूत प्रेत दिखाते रहते हैं। क्या इस तरह का फतवा जारी करने वाले किसी भी व्यक्ति ने सारे न्यूज चैनलों पर चलनेवाले कंटेट का अध्ययन किया है। कतई नहीं। अगर वो गंभीरता से इस पर विचार करते तो इस तरह का स्वीपिंग रिमार्क नहीं आता। एकाध न्यूज चैनल हैं जो इसे दिखाते हैं तो क्या उसके आधार पर सारे न्यूज चैनलों के कंटेट को हल्का करार दिया जा सकता है।
क्या अखबारों में और पत्र-पत्रकिओं में भूत-प्रेत और नाग-नागिन के बारे में खबरें नहीं छपती। दरअसल हर मीडियम, में चाहे वो प्रिंट हो या फिर इलेक्ट्रॉनिक, हर तरह के कंटेंट मिलते हैं कहीं मसाला ज्यादा होता है और कहीं गंभीरता ज्यादा होती है। दरअसल न्यूज चैनलों की आलोचना से पत्रकारिता का वर्ग-संघर्ष सामने आता है। कुछ लोगों के मन में कुंठा घर कर गई है कि वो पंद्रह बीस साल तक कलम घिसने के बाद एक छोटी सी गाड़ी में ही चल पा रहे हैं जबकि न्यूज चैनलों में चार पांच साल काम करके ही लोग लंबी-लंबी गाड़ियों में चलने लगते हैं।
कई अखबारों के स्थानीय संपादक मेरे मित्र हैं जिन्हें मैंने ये कहते सुना है कि ये टीवी वाले लौंडे-लफाड़े ऐश कर रहे हैं और हम साले जीवन भर कलम ही घिसते रह जाएंगें। इसमें तो इन "लौंडे-लफाड़ों" का दोष नहीं है। बल्कि उन्हें तो अवसर मिला और जिस माध्यम में वो काम कर रहे हैं वहां आय हो रही है, तो पैसे मिल रहे हैं। साथ ही ये भी देखना होगा कि अखबारों में काम का दवाब कितना होता है और टीवी में कितना होता है। अखबार तो एक बार निकाल कर आप चौबीस घंटे के लिए निश्चिंत हो गए लेकिन न्यूज चैनलों में तो हर आधे घंटे में आपको एक अखबार निकालना होता है। काम के दवाब के हिसाब से कंपशेसन मिलता है।
और रही बात स्टिंग आपरेशन की तो क्या एक चैनल की गैरजिम्मेदारी के आधार पर ये कहना उचित है कि स्टिंग पर रोक लगा देनी चाहिए। क्या स्टिंग से देश का भला नहीं हुआ है। क्या स्टिंग से देश में सर्वोच्च स्तर पर चलनेवाले भ्रष्टाचार का पर्दाफाश नहीं हुआ। अगर एक व्यापक सामाजिक हित में स्टिंग किया जा रहा हो तो उसपर रोक लगाने की कोई वजह नहीं है। लेकिन ये भी आवश्यक है कि स्टिंग को ऑन एयर डालने से पहले उसके हर पहलू पर गंभीरता से विचार करना चाहिए और ये भी सोचना चाहिए कि इस स्टिंग से समाज का भला हो रहा है या नहीं । व्यक्तिगत दुश्मनी या बदला लेने की नीयत से किया जानेवाला स्टिंग सर्वथा निंदनीय है और कोई भी उसका पक्षधर नहीं है। राजनेता और सरकार तो हमेशा से ये चाहते रहे हैं कि मीडिया पर लगाम लगे ताकि वो स्वच्छंदतापूर्वक मनमाफिक काम कर सके।