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Tuesday, May 13, 2014

सवालों के घेर में चुनाव आयोग

लोकसभा का चुनाव अपने अंतिम चरण में है । सोमवार को अंतिम दौर का मतदान होगा और बाकी बची इकतालीस सीटों पर वोट डाले जाएंगे । छिटपुट हिंसा की वारदातों को छोड़कर आमतौर पर चुनाव शांतिपूर्वक संपन्न होने के आसार हैं । अपनी इस उपलब्धि पर चुनाव आयोग अपनी पीठ थपथपा सकता है, लेकिन यह चुनाव आयोग का प्राथमिक दायित्व ही नहीं उनका काम भी है । हमारे देश का संविधान चुनाव आयोग को निष्पक्ष चुनाव करवाने के लिए पूरी ताकत देता है । चुनाव के ऐलान होने के बाद से लेकर वोटों की गिनती संपन्न होने तक चुनाव आयोग की मर्जी के बगैर देश में पत्ता भी नहीं हिल सकता है । रोजमर्रा के कामों को छोड़कर तमाम प्रशासनिक और नीतिगत फैसले चुनाव आयोग की पूर्व मंजूरी के बिना पूरे नहीं किए जा सकते हैं । इस लिहाज से अगर देखें तो आचार संहिता के लागू होने के बाद से लेकर चुने हुए प्रतिनिधियों के नोटिफिकेशन तक आयोग के पास असीमित अधिकार हैं । लेकिन इस बार के चुनाव के दौरान देश के चुनाव आयोग पर कई तरह के आरोप लगे । भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी तो खुले आम आरोप लगाया कि चुनाव आयोग निष्पक्ष नहीं है । उन्होंने वाराणसी में अपनी रैली के लिए इजाजत नहीं मिलने के बाद ये आरोप जड़े थे । मोदी के आरोपों के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त ने प्रेस कांफ्रेंस कर सफाई दी थी । साथ ही उन्होंने एलान किया था कि चुनाव आयोग किसी से डरता नहीं है । आरोपों और सफाई के इस दौर के बीच एक चुनाव आयुक्त ने कह दिया कि वाराणसी में मोदी की रैली के आवेदन पर फैसला लेने में संवादहीनता से विलंब हुआ । इससे पता चलता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयोग की सोच अलग है । एक और घटना हुई जिससे चुनाव आयोग की कार्य प्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं । नरेन्द्र मोदी को वोटिंग वाले दिन प्रेस कांफ्रेंस के दौरान अपना चुनाव चिन्ह दिखाने पर चुनाव आयोग ने सख्ती दिखाई और फौरन एफआईआर दर्ज करने का आदेश दियया जिसका उसी दिन शाम तक पालन भी हो गया । लेकिन जब अमेठी में चुनाव के दौरान राहुल गांधी ईवीएम मशीन के पास खड़े नजर आए और मीडिया में उनकी फोटो छपी तो चुनाव आयोग जांच करवाने में जुटा है । राहुल गांधी ने हिमाचल के सोलन में अपने भाषण में कहा था कि अगर भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आई तो बाइस हजार लोग मारे जाएंगे । उसका संज्ञान लेने और फिपर राहुल गांधी को नोटिस भेजने में चुनाव आयोग को हफ्ते भर का समय लग गया । तो इस तरह के दो मानदंड से चुनाव आयोग पर सवाल खड़े हो रहे हैं ।
इसके अलावा भी चुनाव आयोग में सब कुछ सामान्य नहीं है । एक कहावत है कि सत्ता और सरकार अपने इकबाल से चलती हैं । कई सारे काम और बाधाएं तो सिर्फ हनक के बूते पर पार की जा सकती हैं । इस चुनाव में यह साफ तौर पर दिखा कि चुनाव आयोग का इकबाल या उसकी हनक कम हुई है । नेताओं के बयानें और उनपर कार्रवाई नहीं होने से यह बात और मजबूत हुई और नेताओं के खिलाफ नरमी बरतने के आरोप लगे । जिसको जो मर्जी में आया कहता रहा और चुनाव आयोग नोटिस की खाना पूरी करता रहा । अमित शाह के बदला वाले बयान और आजम खान के करगिल में मुसलमानों के जीत दिलाने के बयान के बाद दोनों पर सार्वजनिक भाषणों पर पाबंदी लगाई थी । अमित शाह ने खेद प्रकट किया और उनको माफी मिल गई । आजम खान ने जवाब भेजा और उनका आरोप है कि बगैर उसको देखे उनपर पाबंदी कायम रखी गई । आजम खान खुले आम चुनाव आयोग पर संगीन इल्जाम लगाते घूम रहे हैं । चुनाव आयोग ने गिरिराज सिंह के खिलाफ केस दर्ज करने का आदेश दिया लेकिन उन्होंने भी माफी नहीं मांगी और जमानत पर बाहर घूम रहे हैं । कई ऐसे उदाहरण हैं जिससे चुनाव आयोग की निष्पक्षता तो तो सवाल उठता ही है उनके फैसले भी संदिग्ध हो उठते हैं । राजनीति विश्लेषकों का मानना है कि नब्बे के दशक और उसके बाद चुनाव आयोग जिस तरह से ताकतवर होकर उभरा था, इस चुनाव के दौरान उसकी ताकत में कुछ क्षरण हुआ है । लोकतंत्र में किसी भी संवैधानिक संस्था का यह क्षरण चिता का कारण है । इस बारे में चुनाव आयुक्तों को तो गंभीरता से सोचना ही होगा देश की जनता को भी यह विचार करना होगा कि जब देश की संवैधानिक संस्थाएं अपने दायित्वों के निर्वहन में कमोजर होने लगें तो क्या किया जाना चाहिए । संवैधानिक संस्थाओं की मर्यादा और गरिमा को बचाने का जिम्मा सिर्फ नेताओं पर नहीं छोड़ा जा सकता है । संवैधानिक संस्था के मुखिया को भी इस तरफ विशेष ध्यान देते हुए उस संस्था की परंपरा और इतिहास को ध्यान में रखते हुए काम करना पड़ेगा । यही अपेक्षा मुख्य चुनाव आयुक्त से भी थी, है भी । समनय उनका भी इतिहास लिखेगा ।

आजादी के बाद भारतीय गणतंत्र का यह सोलहवां संसदीय चुनाव है । चुनाव आयोग के इन असीमित अधिकारों के बारे में देश की जनता को तब पता लगा जब वरिष्ठ नौकरशाह टी एन शेषन देश की नियुक्ति देश के चुनाव आयुक्त के तौर पर की गई थी । टीएन शेषन ने देश की जनता को बताया कि कैसे चुनाव करवाया जा सकता है और संविधान ने चुनाव आयोग को कितने अधिकार दिए हैं जिनका अबतक उपयोग ही नहीं किया जा सका था । चुनाव आयुक्त के तौर शेषन ने ना सिर्फ अपराधियों के खिलाफ मोर्चा खोला था बल्कि नेताओं को भी उनकी हद और सीमा बता दी थी । चुनाव की ड्यूटी लगने को सरकारी कर्मचारी बेहद हल्के में लेते थे लेकिन शेषन ने आने के बाद इसपर लगाम लगाया । उन्होंने जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा सतहत्तर को कड़ाई से लागू करवाया था । यह बहुत कम लोगों को पता होगा कि टी एन शेषन ने ही चुनाव लड़नेवालों के लिए चुनाव खर्च का अलग हिसाब रखने के कानून को सख्ती से लागू करवाने के क्रम में चालीस हजार उम्मीदवारों की जांच की और उनमें से सोलह हजार लोगों के खाते में गड़बड़ी पाई । शेषऩ ने इन सोलह हजार प्रत्याशियों के तीन साल तक चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी थी । चुनाव में काले धन के इस्तेमाल पर रोक की दिशा में बढ़ाया गया यह एक अहम कदम था । चुनाव आयोग के अधिकारों के लिए शेषन से सरकारों से भी पंगा लिया और कई मौकों पर कोर्ट केस भी झेला । कई मामलों में सुप्रीम कोर्ट को भी दखल देना पड़ा । लोकसभा चुनाव के अलावा शेषन ने राज्यसभा चुनाव में भी एक नियम को सख्ती से लागू करवाया था । उन्नीस सौ पचास के एक कानून के आलोक में शेषन ने नियम बना दिया कि राज्यसभा का प्रत्याशी उस राज्य का निवासी होना चाहिए । शेषन के इस कदम का सियासी दलों ने जमकर विरोध किया था लेकिन उस वक्त शेषन के कडक रवैये ने नेताओं को ढुकने पर मजबूर कर दिया था । टीएन शेषन के कड़े फैसलों ने सरकार को चुनाव आयोग को बहुसदस्यीय बनाने पर मजबूर कर दिया था । शेषन ने अपने कार्यकाल में इतनी बड़ी लकीर खींच दी थी कि उनके बाद के चुनाव आयुक्तों ने भी उसी परंपरा का निर्वाह करते हुए चुनाव करवाए । बाद में जे एम लिंगदोह शेषन की परंपरा के चुनाव आयुक्त साबित हुए । जुलाई दो हजार दो में कार्यकाल खत्म होने के नौ महीने पहले जब गुजरात विधानसभा भंग कर दी गई थी और चुनाव करवाने की मांग उठी तो लिंगदोह ने साफ मना कर दिया था । लिंगदोह का मानना था कि सांप्रदायिक हिंसा के जख्म इतने हरे हैं कि निष्पक्ष चुनाव संभव नहीं है । उस वक्त नरेन्द्र मोदी ने चुनाव आयोग पर जमकर हमले किए । केंद्र में बीजेपी की सरकार थी लेकिन लिंगदोह टस से मस नहीं हुए । याद हो कि उस वक्त नरेन्द्र मोदी ने लिंगदोह को उनके पूरे नाम, जेम्स माइकल लिंगदोह, सं संबोधित करना शुरू कर उनपर दवाब बनाने की कोशि्श की थी । शेषन और लिंगदोह की परंपरा को एस वाई कुरैशी ने आगे बढाया और बगैर किसी शोर शराबे के अपने विनम्र पर सख्त अंदाज में अपने कार्.यकाल के सारे चुनाव करवाए । कुरैशी साहब ने मंत्री से लेकर संतरी तक में कोई भेदभाव नहीं किया । अब शेषन से लेकर कुरैशी तक की परंपरा में इस बार विचलन नजर आ रहा है । यह मजबूत परंपरा अगर दरकती है तो लोकतंत्र के लिए संदेश सही नहीं है ।