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Saturday, November 22, 2025

फिल्मों से छूटता संवेदना का सिरा

पिछले दिनों मुंबई में जागरण फिल्म फेस्टिवल, 2025 का समापन हुआ। सितंबर के पहले सप्ताह में दिल्ली में आरंभ हुआ जागरण फिल्म फेस्टिवल 14 शहरों से होता हुआ मुंबई पहुंचा। मुंबई में फिल्म फेस्टिवल के अंतिम दिन पुरस्कार वितरण का कार्यक्रम था। प्रख्यात निर्देशक प्रियदर्शन को जागरण फिल्म फेस्टिवल में जागरण अचीवर्स अवार्ड से सम्मानित किया गया। प्रियदर्शन ने बताया कि उनके पिता लाइब्रेरियन थे इस कारण उनको पुस्तकों तक पहुंचने की सुविधा थी।  घर पर भी ढेर सारी पुस्तकें थीं। उन्हें बचपन से अलग अलग विधाओं की पुस्तकें पढ़ने का आदत हो गई। किशोरावस्था में उन्होंने कामिक्स भी खूब पढ़ा। इससे उनको फ्रेम और अभिव्यक्ति की समझ बनी। प्रियदर्शन ने कहा कि उनका अध्ययन उनके निर्देशक होने की राह में सहायक रहा। आगे बताया कि पुस्तकों में पढ़ी गई घटना किसी
फिल्म की शूटिंग के दौरान याद आ जाती है जिससे फिल्मों के दृश्यों को इंप्रोवाइज करने में मदद मिलती है। प्रियदर्शन ने विरासत, हेराफेरी जैसी कई सफल हिंदी फिल्में बनाई हैं। इसके अलावा अंग्रेजी, मराठी, मलयालम, तमिल और तेलुगू में उन्होंने बेहतर फिल्में बनाई हैं। पुरस्कार वितरण समारोह समाप्त होने के बाद फिल्मों से जुड़े लोगों से बात होने लगी। इसी दौरान फिल्म ओ माय गाड- 2 के निर्देशक अमित राय वहां आए। उनसे मैंने प्रियदर्शन की पुस्तक वाली बात बताई। वो मुस्कुराए और बोले मेरे पास भी एक अनुभव है सुनाता हूं। 

अमित राय ने जो सुनाया वो बेहद चिंताजनक बात थी। उन्होंने कहा कि एक दिन किसी फिल्म पर चर्चा हो रही थी। वहां एक निर्देशक भी थे। अपेक्षाकृत युवा हैं लेकिन उनकी दो तीन फिल्में सफल हो चुकी हैं। कहानियों पर बात होने लगी। एक उत्साही लेखक ने कहा कि उसने कहानी पर स्क्रिप्ट डेवलप की है और वो सुनाना चाहता है। निर्देशक महोदय ने सुनने की स्वीतृति दी। दो दिन बाद मिलना तय हुआ। तय समय पर स्क्रिप्ट लेकर लेखक महोदय वहां पहुंचे। दो घंटे की सीटिंग हुई। स्क्रिप्ट और कहानी सुनकर निर्देशक महोदय बेहद खुश हो गए। उन्होंने जानना चाहा कि ये किसकी कहानी है। स्क्रिप्ट लेखक ने बहुत उत्साह के साथ बताया कि कहानी प्रेमचंद की है। निर्देशक महोदय ने फौरन कहा कि प्रेमचंद को फौरन टिकट भिजवाइए और मुंबई बुलाकर इस कहानी के अधिकार उनसे खरीद लिए जाएं।। कहानी के अधिकार के एवज में उनको बीस पच्चीस हजार रुपए भी दिए जा सकते हैं। निर्देशक महोदय की ये बातें सुनकर बेचारे स्क्रिप्ट लेखक को झटका लगा। उन्होंने कहा कि सर प्रेमचंद जी अब इस दुनिया में नहीं हैं और उनकी कहानियां कापीराइट मुक्त हो चुकी हैं। निर्देशक महोदय ये सुनकर प्रसन्न हुए और बोले तब तो कोई झंझट भी नहीं है। इसपर काम आरंभ किया जाए। उस समय तो अमित राय की बातें सुनकर हंसी आई। हम सबने इस प्रसंग को मजाक के तौर पर लिया। देर रात जब मैं होटल वापस लौट रहा था तब अमित को फोन कर पूछा कि क्या सचमुच ऐसा घटित हुआ था। अमित ने बताया कि ये सच्ची घटना है। मैं विचार करने लगा कि हिंदी फिल्मों का निर्देशक प्रेमचंद को नहीं जानता। जो हिंदी प्रेमचंद के नाम पर गर्व करती है, जो हिंदी के शीर्षस्थ लेखक हैं और जिनकी कितनी रचनाओं पर फिल्में बनी हैं उनको एक सफल निर्देशक नहीं जानता। ये अफसोस की बात है। 

आज हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की बात करें तो वहां हिंदी जानने वाले कम होते जा रहे हैं। हिंदी की परंपरा को जानने वाले तो और भी कम। आज हिंदी फिल्मों के गीतों के शब्द देखें तो लगता है कि युवा गीतकारों के शब्द भंडार कितने विपन्न हैं।  हिंदी पट्टी के शब्दों से उनका परिचय ही नहीं है। वो शहरों में बोली जानेवाली हिंदी और उन्हीं शब्दों के आधार पर लिख देते हैं। यह अकारण नहीं है कि समीर अंजान के गीत पूरे भारत में पसंद किए जाते हैं। समीर वाराणसी के रहनेवाले हैं और नियमित अंतराल पर काशी या हिंदी पट्टी के साहित्य समारोह से लेकर अन्य कार्यक्रमों में जाते रहते हैं। एक बातचीत में उन्होंने बताया था कि लोगों से मिलने जुलने से और उनको सुनने से शब्द संपदा समृद्ध होती है। इससे गीत लिखने में मदद मिलती है। हिंदी फिल्मों के एक सुपरस्टार के बारे में भी एक किस्सा मुंबई में प्रचलित है। कहा जाता है कि उनके पास तीन चार सौ चुटकुलों का एक संग्रह है। वो अपनी हर फिल्म में चाहते हैं कि उनके चुटकुला बैंक से कुछ चुटकुले निकालकर संवाद में जोड़ दिए जाएं। उनका इस तरह का प्रयोग एक दो फिल्मों में सफल रहा है। नतीजा ये कि अब वो अपनी हर फिल्म में चुटकुला बैंक का उपयोग करना चाहते हैं। आज हिंदी फिल्मों के संकट के मूल में यही प्रवृत्ति है। हिंदी पट्टी की जो संवेदना है उसको मुंबई में रहनेवाले हिंदी के निर्देशक न तो पकड़ पा रहे हैं और ना ही उसको अपनी फिल्में में चित्रित कर पा रहे हैं। भारत की कहानियों की और भारतीय समाज की ओर जब फिल्में लौटती हैं तो दर्शकों को पसंद आती हैं। दर्शकों को फिल्म पसंद आती है तो वो अच्छा बिजनेस भी करती है। कोई हिंदी फिल्म 100 करोड़ का बिजनेस करती है तो शोर मचा दिया जाता है कि फिल्म ने 100 करोड़ या 200 करोड़ का आंकड़ा पार कर लिया। उनको ये समझ क्ययों नहीं आता कि कन्नड फिल्म कांतारा ने सिर्फ कन्नड़ दर्शकों के बीच 300 करोड़ का कारोबार किया। कन्नड़ की तुलना में हिंदी फिल्मों के दर्शक कई गुणा अधिक हैं। अगर अच्छी फिल्म बनेगी कितने सौ करोड़ पार कर सकेगी। फिल्मकारों को ये सोचना होगा। 

ऐसे कई उदाहरण हैं जहां हिंदी फिल्मों में हिंदी के दर्शकों की संवेदना को छुआ नहीं और दर्शकों ने उसको नकार दिया। पौराणिक पात्रों पर फिल्में बनाने वालों से भी इस तरह की चूक होती रही है। कई बार तो आधुनिकता के चक्कर में पड़कर पात्रों से जो संवाद कहलवाए जाते हैं वो भी दर्शकों के गले नहीं उतरते हैं। हिंदी का लोक बहुत संवेदनशील है। जब उसकी संवेदना से छेड़छाड़ की जाती है तो नकार का सामना करना पड़ता है। राज कपूर यूं ही नहीं कहा करते थे कि हिंदी फिल्मों की कहानियां प्रभु राम के चरित से या रामकथा से प्रेरित होती हैं। एक नायक है, एक नायिका है और खलनायक आ गया। अब ये लेखक के ऊपर है कि वो रामकथा को क्या स्वरूप प्रदान करता है और निर्देशक उसको किस तरह से ट्रीट करता है। जो भी लेखक या निर्देशक रामकथा के अवयवों को पकड़ लेता है उसकी फिल्में बेहद सफल हो जाती हैं। कारोबार भी अच्छा होता है। लेकिन जो निर्देशक पहले से ही 100 या 200 करोड़ का लक्ष्य लेकर चलता है वो कहानी में मसाला डालने के चक्कर में राह से भटर जाता है और फिल्म असफल हो जाती है। आज आवश्यकता इस बात की है कि फिल्मों के लेखक और निर्देशक भारतीय मानस को समझें और उसकी संवेदना की धरातल पर फिल्मों का निर्माण करें। बेसिरपैर की कहानी एक दो बार करोड़ों कमा सकती है लेकिन ये दीर्घकालीन सफलता का सूत्र बिल्कुल नहीं है। 


Saturday, October 21, 2023

हिंदी फिल्मों के अच्छे दिन


हम आपके लिए सितारे लेकर आते हैं और आप उनमें चमक भरते हैं। कुछ दिनों पहले सिनेमा हाल के कारोबार की कंपनी पीवीआऱ आईनाक्स ने अपने विज्ञापन में ये भी बताया कि इस वर्ष जुलाई- सितंबर की तिमाही में उसके सिनेमाघरों में चार करोड़ अस्सी लाख दर्शक पहुंचे। । पीवीआर के पास देशभर के 115 शहरों में 1702 स्क्रीन हैं। इस विज्ञापन को देखकर मस्तिष्क में एक बात कौंधी कि अगर तीन महीने में पीवीआर के मल्टीप्लेक्सों में करीब पांच करोड़ दर्शक फिल्म देखने पहुंचे तो अगर इसमें सिंगल थिएटर और अन्य मल्टीप्लेक्स शृंखलाओं के दर्शकों को जोड़ दिया जाए तो आंकड़े कहीं और ऊपर चले जाएंगे। देशभर में सिंगल थिएटरों की संख्या में निरंतर कमी आ रही है। फिल्म फेडरेशन आफ इंडिया की वेबसाइट पर उपलब्ध आंकडों के मुताबिक देशभर में सिंगल थिएटर 10167 हैं। अगर इन आंकड़ों में कमी भी आई होगी तो छह से सात हजार तक सिंगल थिएटर तो देश में हैं हीं। पीवीआर के आंकड़े संकेत कर रहे हैं कि सिनेमा का दर्शक एक बार फिर से सिनेमाघरों की ओर लौट रहा है। पीवीआर के इन आंकड़ों को देखने के बाद सिनेमाप्रेमी होने के कारण मन में संतोष हुआ लेकिन ये जिज्ञासा भी हुई कि देखा जाए कि किन फिल्मों ने ये चमत्कार किया। खिन फिल्मों के कारण जुलाई-सितंबर की तिमाही में बाक्स आफिस पर खुशी का वातावरण देखने को मिल रहा है। 

जागरण फिल्म फेस्टिवल के दौरान मुंबई में फिल्मकारों से चर्चा हो रही थी। पटकथा लेखक हैदर रिजवी ने एक बहुत महत्वपूर्ण बात कही थी। उन्होंने बताया था कि अब मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में लोगों के चेहरे खिले हुए हैं। लोगों का विश्वास वापस लौटता दिख रहा है। उस समय ये बात आई गई हो गई। अब सोचता हूं तो ऐसा लगता है कि इस बात में कई संकेत छिपे हुए थे। फिल्मों से जुड़े लोगों का विश्वास वापस लौटना और उनके चेहरे के खिलने का सीधा संबंध सिनेमाघरों में दर्शकों की वापसी और मुनाफा से जुड़ा हुआ है। पिछले दिनों ओरमैक्स मीडिया की सिंतबर की बाक्स आफिस रिपोर्ट आई थी। ओरमैक्स मीडिया हर महीने के तीसरे सप्ताह में पिछले महीने की बाक्स आफिस रिपोर्ट जारी करती है जिसमें फिल्मों के कारोबार की जानकारी होती है। ओरमैक्स मीडिया की रिपोर्ट पर फिल्म इंडस्ट्री और उससे जुड़े लोगों का विश्वास है। ऐसा माना और कहा जाता है। सिंतबर की भारत की बाक्स आफिस रिपोर्ट में कई चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। सितंबर 2023 में प्रदर्शित फिल्मों ने घरेलू बाक्स आफिस पर 1353 करोड़ रुपए का कारोबार किया है। इस वर्ष प्रदर्शित फिल्मों के आंकड़ों पर नजर डालें तो फिल्म के कारोबार की तस्वीर बेहद अच्छी नजर आती है। इस वर्ष अबतक फिल्मों ने 8798 करोड़ रुपए का कारोबार किया है जो पिछले वर्ष से छह प्रतिशत अधिक है। 

दरअसल कोरोना महामारी के दौरान सिनेमाघरों से दर्शक दूर हो गए थे और कई बड़े बजट की फिल्में भी बाक्स आफिस पर अच्छा नहीं कर पाई थीं। इस वर्ष का आरंभ भी काफी अच्छा रहा था। उसके बाद के महीनों में भी प्रदर्शित गदर-2, पठान और जवान ने बाक्स आफिस पर बंपर कमाई की। इन तीनों फिल्मों ने अलग अलग 600 करोड़ रुपए से अधिक का कारोबार किया है। अब भी इनको दर्शक मिल रहे हैं। 66 वर्ष के अभिनेता सनी देओल ने जब लंबे अंतराल के बाद फिल्मों में वापसी की तो गदर 2 में उनका जादू सर चढ़कर बोला। इस फिल्म की सफलता का अनुमान फिल्मों से जुड़े लोग भी नहीं लगा पाए थे। इसी तरह 57 वर्ष के अभिनेता शाह रुख खान को भी दर्शकों ने खूब पसंद किया। उनकी फिल्म पठान 646 करोड़ रुपए तो फिल्म जवान ने 733 करोड़ रुपए का कारोबार किया। इन अधेड़ उम्र के अभिनेताओं के साथ साथ तमिल फिल्मों के सुपर स्टार 72 वर्षीय के रजनीकांत की फिल्म जेलर ने भी भारत में करीब चार सौ करोड़ रुपए का कारोबार करके ये साबित किया कि दक्षिण भारतीय फिल्मों के बास का जलवा अब भी कायम है। इन सबके बीच एक फिल्म आई ओएमजी-2 । इसमें पंकज त्रिपाठी, यामी गौतम के अलावा अक्षय कुमार भी संक्षिप्त भूमिका में हैं। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड से काफी दिक्कतों के बाद पास हुई इस फिल्म ने भी भारत में 200 करोड़ रुपए से अधिक का बिजनेस किया। इस फिल्म के निर्देशक अमित राय की जमकर प्रशंसा हुई। फिल्म से जुड़े लोगों का मानना है कि अगर फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने इस फिल्म को वयस्क फिल्म (ए सर्टिफिकेट) की बजाए यूनिवर्सल (यू) प्रमाण पत्र दिया तो इसका कारोबार और भी बेहतर हो सकता था। इस फिल्म ने न केवल अच्छा कारोबार किया बल्कि अक्षय कुमार को लगातार पांच फिल्मों की असफलता के बाद सफलता का स्वाद भी चखाया। तमाम विवादों के बीच भी फिल्म आदिपुरुष ने 331 करोड़ रुपए का और द केरला स्टोरी ने ढाई सौ करोड़ रुपए से अधिक का कारोबार किया। इन फिल्मों ने दर्शकों को सिनेमाघरों में लौटाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। फिल्मों की इस सफलता में हिंदी फिल्मों की हिस्सेदारी 42 प्रतिशत है जबकि तमिल और तेलुगु फिल्मों की हिस्सेदारी सोलह सत्रह प्रतिशत के करीब है। 

कोरोना महामारी के समय भी और उसके बाद भी फिल्मों को लेकर कई फिल्मी पंडित सशंकित हो गए थे। उनको लगने लगा था कि हिंदी फिल्मों का बाजार खत्म हो गया है। पिछले वर्ष उन्होंने ये भवियवाणी तक कर दी थी कि अब दक्षिण भारतीय फिल्में ही चलेंगी। उस समय भी कार्तिक आर्यन की फिल्म भूल भुलैया-2 ने उम्मीद जगाए रखी थी और ढाई सौ करोड़ रुए से अधिक का कारोबार किया था। अजय देवगन और तब्बू की फिल्म दृश्यम 2 ने और भी अच्छा बिजनेस किया था। उस फिल्म ने बाक्स आफिस पर तीन सौ करोड़ रुपए के करीब अर्जित किया था। इन सभी सफल फिल्मों पर नजर डालें तो इनमें से कई पुरानी फार्मूला वाली फिल्में हैं। जिसमें जबरदस्त एक्शन है, रोमांस है और ऐसे संवाद हैं तो दर्शकों को पसंद आते हैं। लगता है कि दर्शकों को हल्का फुल्का मनोरंजन पसंद आ रहा है। द केरला स्टोरी और ओएमजी 2 में कहानी अलग हटकर है। द केरला स्टोरी और ओएमजी 2 दोनों में यथार्थ बहुत मजबूती के साथ उपस्थित है। अच्छी कहानी और अच्छा मनोरंजन दोनों दर्शकों को पसंद आ रहे हैं। आनेवाले दिनों में सलमान खान की फिल्म टाइगर 3, शाह रुख खान की डंकी और प्रभास की सालार आनेवाली है, जिसको लेकर दर्शकों के बीच उत्सुकता है। अगर इन तीनों फिल्मों ने बहुत अच्छा कारोबार किया तो ये वर्ष भारतीय फिल्मों के लिए बहुत अच्छा वर्ष साबित होगा। फिल्मों के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती है दर्शकों को सिनेमाघरों की तरफ निरंतर आकर्षित करते रहने की। इसके लिए फिल्मों के टिकटों की दरें कम करनी चाहिए। कई बार सिनेमाघर इस तरह के प्रयोग कर भी रहे हैं। जब वहां किसी विशेष दिन टिकटों की दर सौ रुपए के करीब रखा जाता है तो उस दिन दर्शकों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक रहती हैं। सिनेमाघरों में टिकटों के मूल्य के साथ साथ वहां मिलनेवाले खाद्य सामग्रियों और पेयजल के मूल्य पर भी ध्यान देना चाहिए और दर्शकों को उचित मूल्य पर उपलब्ध होना चाहिए। एक मध्यमवर्गीय व्यक्ति अपने परिवार के साथ फिल्म देखने जाता है तो टिकट और इंटरवल में पापकार्न और चाय काफी के लिए उसे दो हजार रुपए तक खर्च करने पड़ते हैं। ऐसे में वो सोचता है कि एक दो महीने बाद फिल्म ओटीटी प्लेटफार्म पर आ ही जाएगी, तब देख लेंगे। इस धारणा को कमजोर करना होगा ताकि फिल्मों के प्रति दर्शकों का प्रेम बना रहे।