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Saturday, November 11, 2017

लेखकीय आत्मलज्जा का सवाल

इस स्तंभ में पहले भी कई बार चर्चा की जा चुकी है कि हिंदी साहित्य के लिए फेसबुक और वहां चलनेवाली बहसें काफी महत्वपूर्ण हो गई हैं। महत्वपूर्ण इस वजह कि साहित्य की नई नई प्रवृत्तियों, रचनाओं पर तो संवाद होते ही हैं, साहित्यक विवाद भी अक्सर अब पत्रिकाओं की बजाए फेसबुक पर उठने लगे हैं। कई बार विवाद सिले हुए पटाखे की तरह उठते ही फुस्स हो जाते हैं तो बहुधा वो लंबे समय तक चलते हैं। समय के साथ साथ इन विवादों का दायरा भी विस्तार लेता है। इन दिनों फेसबुक पर साहित्यक चोरियों के आरोपों को लेकर घमासान मचा है। इस वक्त आरोपों के बवंडर में हैं हिंदी की कथाकार रजनी मोरवाल। रजनी मोरवाल पर आरोप है कि उन्होंने फेसबुक पर पोस्ट की गई सामग्रियों का इस्तेमाल ‘हंस’ पत्रिका में प्रकाशित अपनी कहानी ‘महुआ’ में किया है। पुराने फेसबुक पोस्ट के साथ साथ ‘हंस’ पत्रिका में प्रकाशित रजनी मोरवाल की कहानियों के अंश फेसबुक पर पोस्ट किए जा रहे हैं। तमाम तरह की बातें हो रही है, आरोप लगाए जा रहे हैं । थाने, मुकदमे तक की बातें हो रही हैं। बौद्धिक संपदा की चोरी को लेकर कानूनची भी सक्रिय हैं। आरोपों के कोलाहल के बीच एक दिलचस्प मोड़ इस पूरे विवाद में आया। रजनी मोरवाल पर जिस फेसबुक पोस्ट को अपनी कहानी में उपयोग करने का आरोप लगा है उसपर भी सवाल खड़े होने लगे हैं। फेसबुक पर सक्रिय चंद लोगों ने मूल फेसबुक पोस्ट को  कुबेरनाथ राय जी के निबंध का हिस्सा बताकर पोस्ट करना शुरू कर दिया। स्तंभ लिखे जाने तक इस तरह की बात करनेवाले लोग ये नहीं बता पाए हैं कि वो अंश कुबेरनाथ जी के किस निबंध का हिस्सा है। इसपर खामोशी है। कुछ लोगों का कहना है कि पूर्व में फेसबुक पर पोस्ट की गई साम्रगी और रजनी मोरवाल की कहानी के अंश दोनों गूगल बाबा की कृपा से अवतरित हुए हैं, इस कारण से दोनों में समानता है। अब सत्य क्या है इसबारे में तो आनेवाले दिनों में ही पता चल पाएगा। फिलहाल तो रजनी मोरवाल पर संगीन आरोप हैं और साहित्य जगत में आम धारणा बनती जा रही है कि उन्होंने पूर्व में फेसबुक पर पोस्ट की गई सामग्री का उपयोग बगैर क्रेडिट दिए किया। फेसबुक पर सक्रिय लोग इसको साहित्यिक चोरी कह रहे हैं। इस पूरे प्रकरण पर रजनी मोरवाल जी का पक्ष आना शेष है।   
इस घटना के बाद कुछ उत्साही लोगों ने पुराने मामलों को उछालना शुरू कर दिया, गड़े मुर्दे उखाड़े जाने लगे। रजनी मोरवाल के मुद्दे के सामने आने के बाद जयश्री राय पर को लेकर भी लोगों ने बातें करनी शुरू कर दी। उनपर भी आरोप लगाया जाने लगा कि उन्होंने अपनी कहानियों में विवेक मिश्र की नकल की, अपने उपन्यासों में मनीषा कुलश्रेष्ठ के उपन्यास के अंश का उपयोग कर लिया, कहीं मृदुला गर्ग के उपन्यास की पंक्तियां जस का तस उठाकर रख दी आदि आदि। जयश्री राय को लेकर इस तरह की चर्चा पुरानी रही है। इसके पहले हिंदी के जादुई यथार्थवादी कहानीकार उदय प्रकाश पर भी इस तरह के आरोप लगे थे। आलोचक रविभूषण के लेख से भी विवाद हुआ था। तब भी केस मुकदमे की बातें हुई थीं, लेकिन वो फेसबुक का दौर नहीं था। साहित्यक चोरी को लेकर आजादी के पहले सरस्वती पत्रिका के अंकों में भी लेख आदि छपे थे जो अब इतिहास के पन्नों में दर्ज है ।
अभी दो साल पहले दो हजार पंद्रह में भी साहित्यिक चोरी को लेकर फेसबुक पर काफी हो हल्ला मचा था। उस वक्त भी फेसबुक पर जारी चर्चा के आधार पर मैंने कुछ प्रवृत्तियों को रेखांकित किया था। दरअसल पिछले कुछ सालों में कुछ कवयित्रियां ऐसी आ गईं जो हैं जो पुराने कवियों की कविताओं की तर्ज पर शब्दों को बदलते हुए लोकप्रियता के पायदान पर ऊपर चढ़ना चाहती हैं। हिंदी साहित्य जगत में हमेशा से ऐसे लोग रहे हैं जो इस तरह की प्रतिभाहीन लेखिकाओं की पहचान कर उनकी महात्वाकांक्षाओं को परवान चढ़ाते हैं । इसके कई फायदे होते हैं । उन फायदों की फेहरिश्त यहां गिनाने का कोई अर्थ नहीं है । दो हजार पंद्रह में जब एक कवयित्री को लेकर विवाद उठा था तब भी ये बात आई थी कि हिंदी के वरिष्ठ लेखक क्या कर रहे हैं, वो खामोश क्यों हैं। बयानवीर लेखक संगठन क्या कर रहे हैं। तब भी कुछ नहीं हो पाया था और आशंका है कि इस बार भी शायद ही कोई पहल हो या किसी प्रकार का ठोस कदम उठाया जा सके।  
यहां चर्चा हो रही है हिंदी साहित्य में साहित्यिक चोरी के आरोपों की जो कि एक बार फिर से उभर कर सामने आ गया है और इन दिनों हिंदी साहित्य जगत में विमर्श के केंद्र में है। साहित्यिक चोरी के आरोपों पर फेसबुक पर ही निंदा करके मामला शांत हो जा रहा है। क्या साहित्यिक चोरी का सवाल बड़ा साहित्यिक सवाल नहीं है जिससे टकराने की कोशिश की जानी चाहिए। हद तो तब हो जा रही है जब उन रचनाओं को पुरस्कृत भी कर दिया जा रहा है जिनपर साहित्यिक चोरी का आरोप है। पुरस्कृत कर देने से रचनाओं को एक प्रकार की वैधता तो मिल ही जाती है। रघुवीर सहाय और पवन करण की कविताओं की छाया जिन कविताओं में दिखी थी उनपर बहुत बातें हो चुकी हैं और उनको दोहराने का कोई अर्थ नहीं है। इस तरह की तिकड़म करनेवाले लेखकों और लेखिकाओं को ये सोचना चाहिए कि साहित्य के पाठक इतने सजग हैं कि साहित्यिक चोरी करके कोई बचकर निकल नहीं सकता है । जब साहित्यिक चोरी पकड़ी जाती है तो यह कहकर बचने और बचाने की कोशिश की जाती है कि दोनों रचनाकारों की जमीन एक रही होगी। इसके अलावा यह भी कहा जाने लगा है कि हिंदी में साहित्यिक चोरी के ज्यादतर आरोप लेखिकाओं पर क्यों लगते हैं। ऐसा हाल में देखा जाने लगा है खासकर फेसबुक के लोकप्रिय होने के बाद से। लेकिन अगर बौद्धिक संपदा की चोरी है तो चोरी है उसमें स्त्री पुरुष का भेद नहीं किया जाना चाहिए।
फेसबुक पर जो साहित्य की दुनिया है वो पत्र-पत्रिकाओं की साहित्यिक दुनिया से अलग है। फेसबुक के जरिए प्रसिद्धि हासिल करनेवालों का एक पूरा गिरोह वहां सक्रिय है। फेसबुक ये साहित्यिक गिरोह अपने गैंग के सदस्यों की रचनओं की जमकर वाहवाही करने लग जाता है । लाइक्स और कमेंट की बौछार कर दी जाती है। आम और तटस्थ पाठकों को लगता है कि कोई बहुत ही क्रांतिकारी रचना आई है । फेसबुक पर सक्रिय इस साहित्यिक गिरोह के कर्ताधर्ता ये भूल जाते हैं कि ये आभासी दुनिया है और इसका फैलाव अनंत है । इसके दायरे में जो भी चीज आ जाती है वो बहुत दूर तक जाती है । सुदूर बैठा पाठक जो साहित्य के समीकरणों को नहीं समझता है और जो गंभीरता से साहित्य को घोंटता है वह जब इस तरह की साहित्यक चोरी को देखता है तो प्रमाण के साथ उजागर कर देता है ।
अब अगर हम इस प्रवृत्ति के बढ़ते जाने की वजहों की पड़ताल करते हैं तो सबसे बड़े दोषी के तौर पर मुझे तो गूगल बाबा ही नजर आते हैं। अपनी रचनाओँ में अपने अनुभवों को और अपने ज्ञान को पिरोने की बजाए अब कुछ लेखकों ने शॉर्टकट रास्ता अपनाना शुरू कर दिया है। कहीं से किसी कथा का कोई प्लॉट दिमाग में आत ही सबसे पहले गूगल की शरण में जाते हैं। गूगल पर लगभग हर तरह की सामग्री प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। कई बार स्त्रोत के साथ तो कई बार बगैर किसी स्त्रोत के। लेखकों को अपने प्लॉट के हिसाब से जो सामग्री मिलती है उसको उठा लेते हैं और उसको अपनी रचना में इस्तेमाल कर लेते हैं। जल्दी प्रसिद्धि की चाहत में स्त्रोत आदि की जांच करने या उसका उल्लेख करने का ध्यान नहीं रहता है। जिसका परिणाम यह होता है कि दो तीन लेखकों की रचनाओं  समानता दिखाई देती है। जिसकी पहले छपी होती है उसकी बल्ले बल्ले और जिसकी बाद में छपती है उसपर साहित्यिक चोरी का आरोप।

साहित्यिक चोरी को लेकर हिंदी में गंभीर विमर्श की दरकार है और इसकी पुनरावृत्ति नहीं हो इस बारे में संपादकों को भी सोचने की जरूरत है। जिन लेखकों पर आरोप लग रहे हैं उनको छापना बंद करना चाहिए या उनको अपनी बेगुनाही साबित करने का मौका दिया जाना चाहिए। कायदे से तो हंस पत्रिका में रजनी मोरवाल जी का पक्ष प्रकाशित होना चाहिए और संपादक को भी अपना पक्ष रखना चाहिए। पाठकों को पता तो लगे कि दोषी कौन है और है और दोषी के खिलाफ क्या कार्रवाई हुई। अन्यथा पत्रिका पर भी पाठकों का भरोसा कम हो सकता है।   

Saturday, August 25, 2012

हिंदी के युवा लेखकों से उम्मीद


हिंदी में सालों से प्रकाशक और लेखक दोनों पाठकों की कमी का रोना रोते रहते हैं । बहुत शोर मचता है कि हिंदी के पाठक कम हो रहे हैं । हिंदी के आलोचकों ने भी कई बार इस बात का ऐलान किया है कि हिंदी में गंभीर लेखन पढ़नेवालों की लगातार कमी होती जा रही है । कई उत्साही आलोचकों ने तो नए पाठकों की अपनी भाषा से विमुखता को भी रेखांकित किया । वर्षों से पाठकों की कमी के कोलाहल के बीच हिंदी अखबारों की प्रसार संख्या बढ़ती रही जो लेखकों, प्रकाशकों और आलोचकों की पाठकों की कमी की चिंता के विपरीत था । हिंदी के प्रकाशकों का कारोबार भी लगातार फैलता जा रहा है वह भी इस चिंता के उलट है । एक अनुमान के मुताबिक हिंदी में अलग अलग विधाओं की करीब पच्चीस से तीस हजार किताबें हर साल छापी जाती हैं । सवाल ये है कि अगर बिकती नहीं हैं तो इतनी किताबें छपती क्यों हैं । इन सवालों के बरक्श हम हिंदीवालों को अपने अंदर झांक कर देखने की जरूरत है । किताबें क्यों नहीं बिकती या किताबें पाठकों के बीच क्यों नहीं लोकप्रिय होती है । सामाजशास्त्रीय विश्लेषण करने से हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि इक्कीसवीं सदी के पाठकों की रुचि में सत्तर और अस्सी के दशक के पाठकों की रुचि में जमीन आसमान का अंतर आ चुका है । सन 1991 को हम इस रुचि का प्रस्थान बिंदु मान सकते हैं । हमारे देश में 1991 से अर्थव्वयस्था को विदेशी कंपनियों के लिए खोला गया और उससे करीब सात साल पहले देश में संचार क्रांति की शुरुआत हो चुकी थी । हमारे देश के लिए ये दो बहद अहम पड़ाव थे जिसका असर देश की साहित्य संस्कृति पर बेहद गहरा पड़ा । लेकिन वो एक अवांतर प्रसंग है जिसपर चर्चा इस लेख में उपयुक्त नहीं है । संचार क्रांति और उदारीकरण का असर यह हुआ कि देश में पश्चिमी संस्कृति से देश की जनता का परिचय हुआ । जो बातें अबतक सुनी जाती थी वो प्रत्यक्ष रूप से देखी जानी लगी । बाजारवाद और नवउदारवाद के प्रभाव में भारत में आम जनता की और खासकर युवा वर्ग की रुचि में बदलाव तो साफ तौर पर रेखांकित किया जा सकता है ।
युवा वर्ग और उन दशकों में जवान होती पीढ़ी में धैर्य कम होता चला गया और एक तरह से इंस्टैंट का जमाना आ गया चाहे वो काफी हो या अफेयर । यह अधीरता कालांतर में और बढ़ी । यह लगभग वही दौर था जब हमारे देश के आकाश को निजी टेलीविजन के तरंगों के लिए खोल दिया गया । मतलब यह है कि देश में कई देशी विदेशी मनोरंजन और न्यूज चैनलों ने अपना प्रसारण शुरू किया । यह वही वक्त था जब हिंसा प्रधान फिल्मों की जगह बेहतरीन रोमांटिक फिल्मों ने ली । मार-धाड़ वाली फिल्मों की बजाय शाहरुख काजोल की रोमांटिक फिल्मों को जबरदस्त सफलता मिली । लगभग इसी वक्त राष्ट्रीय अखबारों के पन्ने रंगीन होने लगे और फिल्मों के रंगीन परिशिष्ट अखबारों का एक अहम अंग बन गया । यह सब बताने का तात्पर्य यह है कि नवें दशक में हमारे देश की लोगों की पसंद बदलने लगी । लेकिन इतने बदलाव को हिंदी के लेखक सालों तक नहीं पकड़ पाए और उनके लेखन का अंदाज बदला जरूर लेकिन वो बदलते समय के साथ कदम से कदम मिलाकर नहीं चल पाए । नतीजा यह हुआ कि हिंदी का फिक्शन लेखन पाठकों की पसंद में लगातार पिछड़ता चला गया । पहले हिंदी में किसी भी उपन्यास का एक संस्करण हजार प्रतियों का होता था जो बाद में घटकर पांच सौ प्रतियों का होने लगा और अब तो प्रकाशन जगत के जानकारों का दावा है कि ये आंकड़ा तीन सौ का हो गया है । कुछ प्रकाशक तो इतना भी नहीं छाप रहे । जितनी प्रतियों का ऑर्डर मिल जाता है उसको छापकर तैयार कर लेते हैं । आधुनिक तकनीक की वजह से यह मुमकिन भी है । हिंदी के फिक्शन लेखक जब अपनी किताबें नहीं बिक पाने का रोना रोते हैं तो उसके पीछे कम से कम पाठकों की कमी, तो वजह बिल्कुल नहीं है । हिंदी में फिक्शन पढ़नेवाले पाठक हैं लेकिन लेखकों को उनकी रुचि के हिसाब से लेखन शैली बदलनी होगी । लेखकों को इस बारे में गंभीरता से विचार करना होगा कि हिंदी के प्रकाशकों की सूची से फिक्शन का अनुपात कम क्यों होता जा रहा है । आज प्रकाशकों की रुचि गैर साहित्यक किताबें छापने में ज्यादा हो गई है । प्रभात प्रकाशन, दिल्ली से लुई एल हे की यू कैन हील योर लाइफ, दीपक चोपड़ा की सफलता और अध्यात्म से जुड़ी किताबें बिक रही हैं तो उसके पीछे पाठकों की बदलती रुचि है । हिंदी में इन दिनों आत्मकथा और जीवनियों की भी जमकर बिक्री हो रही है । चाहे वो सायना नेहवाल की जीवनी हो, चाहे कलाम की टर्निंग प्वाइंट्स हो । पाठकों के इस मनोविज्ञान का विश्लेषण करने से यह बात और साफ होती है कि अब हिंदी का पाठक यथार्थ के नाम पर नारेबाजी, क्रांति के नाम पर भाषणबाजी, सामाजिक बदलाव के नाम पर विचारधारा विशेष का पोषण को पसंद नहीं कर रहा है ।
अब हिंदी प्रकाशन जगत के लिए यह जानना बेहद जरूरी है कि पाठकों की पसंद क्या है और किस तरह की किताबें धड़ाधड़ बिक सकती हैं । अगर हम अंग्रेजी प्रकाशन जगत को देखें तो युवाओं को केंद्र में रखकर लिखे गए रोमांटिक प्लॉट वाले उपन्यास या कहानी संग्रह खूब बिक रहे हैं । इसके अलावा चिक लिट बुक्स हैं जो अपनी रोमांटिक और चमक दमक वाली जिंदगी की वजह से युवतियों के बीच खासी लोकप्रिय हो जाती हैं । अंग्रेजी में ज्यादातर बेस्ट सेलर किताबों में लव सेक्स और संघर्ष की कहानी होती है जो बीस से तीस वर्ष के युवाओं को लुभाता है और उन्हें खरीदकर पढ़ने को मजबूर करता है । अंग्रेजी में भी भारतीय लेखकों की एक नई फौज आई है जो इस तरह के प्लॉट को उठा रही हैं जिनमें कविता दासवानी, सिद्धार्थ नारायण ,प्रीति शिनॉय, निकिता सिंह, नवनील चक्रवर्ती और सचिन गर्ग जैसे लेखक प्रमुख हैं । इनका लेखन और प्लॉट अमिताभ घोष, अमिश त्रिपाठी, ताबिश खैर जैसे भारतीय लेखकों से अलग है । अंग्रेजी में लिखनेवाले इन लेखकों की सफलता का राज उनकी भाषा और उनके उपन्यासों के शीर्षक हैं जो गंभीरता के बोझ से मुक्त हैं । इन युवा लेखकों की वही भाषा है जो आज के युवाओं के बीच बोली जाती है । उनके उपन्यासों के शीर्षक भी उन्हीं बोलचाल के शब्दों से उठाए जाते हैं । जैसे ओह शिट्, नॉट अगेन, नॉटी मैन, बॉंबे गर्ल, ऑफ कोर्स आई लव यू, ओह यस आई एम सिंगल जैसे दो सवा दो सौ पन्नों के उपन्यास खासे लोकप्रिय हो रहे हैं । जाहिर तौर पर इन उपन्यासों के नायक नायिकाएं युवा होते हैं और उपन्यासों का परिवेश भी उनके आस पास का ही होता है । ऐसा नहीं है कि सारे के सारे युवा लेखक सिर्फ हल्के फुल्के प्रेम प्रसंगों पर ही लिख रहे हैं । कई लेखक तो गंभीर बीमारियों को भी अपने उपन्यास का विषय बना चुके हैं लेकिन उसमें भी कहीं ना कहीं प्रेम का तत्व डाल ही देते हैं । इन उपन्यासों की एक विशेषता और है कि ये दो सौ रुपए से कम में पाठकों को उपलब्ध है जिसकी वजह से चलते चलाते भी उसकी खरीदारी हो जाती है ।
हिंदी में इस तरह का लेखन-प्रकाशन जरा कम हुआ है । हिंदी में युवाओं के बदलते मनमिजाज और प्राथमिकताओं पर गीताश्री ने कई बेहतर कहानियां लिखी हैं लेकिन उनका कोई संग्रह या उपन्यास नहीं आया है जिससे लोकप्रियता का मूल्यांकन हो सके । अभी अभी सामयिक प्रकाशन दिल्ली ने युवा लेखक लेखिकाओं की कहानियों और उपन्यासों को पूरा सेट प्रकाशिकत किया है । जिसमें जयश्री राय, अजय नावरिया, पंकज सुबीर, कविता,रजनी गुप्त, शरद सिंह, मनीषा कुलश्रेष्ठ की किताबें एक साथ प्रकाशित की हैं । लेकिन अब हिंदी के पुराने लेखक सर्वहारा और उस तरहब की नारेबाजी से मुक्त नहीं हो पाए हैं । जयश्री राय के कहानी संग्रह के ब्लर्ब पर संजीव ने जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया है उससे खूबसूरत कहानियां उभरती नहीं है बल्कि बौद्धिकता के बोझ से दब जाती हैं । दरअसल अब हिंदी के प्रकाशकों को भी ब्लर्ब की शास्त्रीयता से मुक्त होने की जरूरत है । रजनी गुप्त ने अपने उपन्यास कुल जमा बीस में जो विषय चुना है वो समय के साथ है । उसमें किशोर के मनस्थिति उसके संघर्ष, वर्चुअल दुनिया को लेकर उसके मन में चल रहे द्वंद के इर्द-गिर्द कथा बुनी गई है । युवाओं के बीच इस उपन्यास को पढ़े जाने की उम्मीद है । कविता का पहला उपन्यास -मेरा पता कोई और है -को भी पाठक पसंद करेंगे लेकिन यहां भी ब्लर्ब पर वही बौद्धिकता और भारी भारी शब्दों का इस्तेमाल । सामयिक प्रकाशन से जिस तरह से हिंदी के अहम युवा लेखक लेखिकाओं की किताबें एक साथ प्रकाशित हुई हैं उससे एक उम्मीद तो जगती है । हॉर्ड बाउंड में छपी इन किताबों के मूल्य ढाई सौ से चार सौ रुपए तक हैं लेकिन प्रकाशक को युवाओं तक पहुंचने के लिए उसको दो सौ के अंदर रखना होगा भले ही चाहे वो पेपर बैक में क्यों ना छपे ।

Saturday, June 23, 2012

संबंधों और विमर्श की नदी

हिंदी में इन दिनों स्त्री विमर्श के नाम पर रचनाओं में जमकर अश्लीलता परोसी जा रही है । स्त्री विमर्श की आड़ में देहमुक्ति के नाम पर पुरुषों के खिलाफ बदतमीज भाषा का जमकर इस्तेमाल हो रहा है । कई लेखिकाओं को यह सुनने में अच्छा लगता है कि आपकी लेखनी तो एके 47 की तरह हैं । माना जाता है कि हिंदी में स्त्री विमर्श की शुरुआत राजेन्द्र यादव ने अपनी पत्रिका हंस में की । नब्बे के शुरुआती वर्षों में । उस वक्त विमर्श के नाम पर काफी धांय-धांय हुई थी । कई अच्छे लेख लिखे गए । कई शानदार रचनाएं आई । लंबी लंबी बहसें हुई । लेकिन कुछ साल बाद स्त्री और विमर्श दोनों अपनी अपनी अलग राह चल पड़े और उनकी जगह ले ली एक तरह की अश्लील और बदतमीज लेखन ने । शुरुआत में तो पाठकों को उस तरह का बदतमीज या अश्लील लेखन एक शॉक की तरह से लगा था जिसकी वजह से उसकी चर्चा भी हुई और लोगों को पसंद भी आई । बाद में जब हर कोई फैशन की तरह बदतमीज लेखन करने लगा तो उसकी शॉक वैल्यू खत्म हो गई और पाठकों के साथ साथ आलोचकों ने भी उस तरह से लेखन को नकारना शुरू कर दिया । सवाल भी उठे कि क्या स्त्री विमर्श का मतबल परिवार तोड़कर, परिवार छोड़कर, रिश्तों से आजादी है । क्या देहमुक्ति का मतलब अवारागर्दी है । क्या स्त्रियां देहमुक्ति के नाम पर जब चाहे जिससे चाहे शारीरिक संबंध बना लें और उसका वर्णन हमारे साहित्य का हिस्सा बन जाए । इन सवालों से टकराते हुए स्त्री विमर्श की मुहिम पर ब्रेक लगा ।

उस मुहिम पर ब्रेक भले ही लग गया हो लेकिन उस दौर में लिखने की शुरुआत कर रही कई लेखिकाओं ने स्त्री विमर्श के मूल को पकड़ा और इंटरनेट युग की युवतियों की छटपटाहट, बेचैनी, मुक्त होने की लालसा, अपनी देह की मालकिन होने की अभिलाषा, अपनी आजादी और स्वतंत्रता के लिए किसी भी हद तक जाने की जिद को अपनी रचनाओं का विषय बनाया । कुछ वरिष्ठ लेखिकाएं भी अपने तरीके से अपनी रचनाओं में स्त्री विमर्श को उठाए रही । अभी हाल ही में मैने युवा लेखिका जयश्री राय का पहला उपन्यास –औरत जो नदी है – पढ़ा । करीब डेढ सौ पन्नों के इस उपन्यास में स्त्री मन की आजादी का कोमल और संवेदनशील चित्रण है । उपन्यास की शुरुआत बेहद ही नाटकीय तरीके से होती है । नायक अशेष त्यागी एक मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी करता है तबादले के बाद गोवा पहुंचता है । वो शादी शुदा और बाल बच्चेदार आदमी है लेकिन तबादले की वजह से पत्नी और परिवार के बगैर गोवा में मिलेज लोबो के घर उसे ठिकाना मिलता है । अकेला और आजाद । वहां उसकी मुलाकात दामिनी नाम की एक युवती से होती है । उपन्यास के शुरुआत में फोन नंबर का प्रसंग एक तिलस्म की तरह है जो धीरे-धीऱे खुलता है । बेहद दिलचस्प । दामिनी और अशेष की मुलाकात होती है और बिना प्यार में जीने मरने की कसमें खाए बगैर दोनों के बीच शारीरिक संबंध बनते हैं । जयश्री राय ने उन अंतरंग क्षणों का बेहद संवेदनशीलता के साथ वर्णन किया है बगैर अश्लील हुए । लोग तर्क दे सकते हैं कि स्त्री-पुरुष के बीच जब अंतरंग संबंध बनते हैं तो उसका जो वर्णन होगा उसमें खुलापन तो होगा । लेकिन जयश्री ने उन क्षणों का वर्णन इस तरह से किया है कि उससे जुगुप्सा नहीं बल्कि बेहतरीन गद्य को पढने का सुख मिलता है । उस वक्त लेखिका की भाषा काफी संयत लेकिन आज के जमाने के हिसाब है । प्रतीकों में तो बातें कहती है लेकिन रीतिकालीन भाषा में नहीं । गौर फर्माइये- अपने तटबंधों को गिराते हुए मुझमें किसी बाढ़ चढी नदी की तरह उफन आई थी वह । प्रेम के क्षणों में जितनी कोमल थी वह कभी-कभी उतनी ही आक्रामक भी- एक सीमा तक हिंसक ! अपनी देह पर खिले अनवरत टीसते हुए नीले फूलों को देखकर पीड़ा का ऐसा स्वाद ऐसा मधुमय भी हो सकता है, यह उसी रात महसूस कर पाया था मैं ।
इस तरह के कई प्रसंग हैं उस उपन्यास में लेकिन सभी मर्यादा में रहकर । इस उपन्यास में एक जगह इस बात का संकेत है कि अंतरंग क्षणों में स्त्रियों को कष्ट पहुंचाने से कईयों को ज्यादा आनंद की अनुभूति होती है । यहां सिर्फ संकेत मात्र है लेकिन अंग्रेजी में इस विषय पर कई उपन्यास लिखे गए हैं । अभी हाल ही में पूर्व टीवी पत्रकार ई एल जेम्स की तीन किताबें आई हैं – फिफ्टी शेड्स आफ ग्रे, फिफ्टी शेड्स डॉर्कर और फिप्टी शेड्स फ्रीड । जेम्स की इन किताबों में नायक ग्रे और नायिका एना के बीच के सेक्स संबंध को बीडीएमएस के तौर पर दिखाया गया है । यूरोप और अमेरिका में ये किताबें कई हफ्तों से बेस्ट सेलर की सूची में हैं । सेक्स प्रसंगों की वजह से कुछ आलोचकों ने तो इसे मम्मी पॉर्न का खिताब दे डाला है तो कुछ इसको वुमन इरोटिका लेखन के क्षेत्र में क्रांति की तरह देख रहे हैं । उसके पहले भी 1965 में पॉलिन रेग का उपन्यास स्टोरी ऑफ ओ आया था । स्टोरी ऑफ ओ में एक खूबसूरत पर्सियन फोटोग्राफर अपने प्रेमी के साथ सेक्स संबंधों में गुलाम की तरह का व्यवहार किया जाना पसंद करती थी । उसको लेकर उस वक्त फ्रांस में काफी बवाल मचा था और पुस्तक पर पाबंदी की मांग भी उठी थी, शायद पाबंदी लगी भी थी । लेकिन हिंदी में फीमेल इरोटिका पर अब भी पाठकों को एक बेहतरीन कृति का इंतजार है ।
जयश्री के इस उपन्यास में अशेष और दामिनी के बीच जब संबंधों की शुरुआत होती है तो अशेष उससे झूठ बोलता है कि उसका अपनी पत्नी से संबंध ठीक नहीं है आदि आदि । यह प्रसंग रोचक है । अमूमन ऐसा होता ही है । लेखिका ने उसको भी स्त्री मन से जोड़कर उसे एक उंचाई दे दी है । पत्नी से खराब संबंध की बात सुनकर दामिनी के मन में जो भाव उठते हैं उसे जयश्री नायक के मार्फत इस तरह से व्यक्त करती है- ...मैं जानता था वह मेरा होना चाह रही थी, मगर रस्म निभा रही थी- दुनियादारी की रस्म । यह जरूरी हो जाता है, ऐसे क्षणों में जब हमन किसी वर्जित क्षेत्र में प्रवेश कर रहे हों, अपनी ग्लानि को कम करना जरूरी हो जाता है । दिमाग जिसे नहीं स्वीकारता, मन उसे अस्वीकार नहीं कर पाता । इस तरह से स्त्री के मन में चलनेवाले द्वंद को भी जहां मौका मिला है बेहतर तरीके से उघारा गया है । इस उपन्यास में दामिनी की मां की एक समांतर कहानी चलती है । किस तरह से दामिनी के पिता ने उसकी मां के साथ इमोशनल अत्याचर किया । वो उससे बात ही नहीं करते थे, जिसका मनोवैज्ञानिक असर जानलेवा साबित हुआ और अएक दिन उनकी मृत्यु हो जाती है । दामिनी के मन पर इस घटना का जबरदस्त प्रभाव आखिर तक बना रहता है ।

अशेष और दामिनी के बीच का प्यार चरम पर होता है उसी वक्त एक और स्त्री रेचल का प्रवेश कथा में होता है । अशेष उसके भी देहमोह में फंसता है । एक दिन रेचल के साथ रात बिताकर बिस्तर में ही होता है कि अचानक सुबह सुबह दामिनी उसके कमरे पर आ जाती है । स्त्री तो आखिर स्त्री ही होती है । जब वो पुरुष के साथ संबंध में होती है तो उसे दूसरी स्त्री बर्दाश्त नहीं होती है । दामिनी के साथ भी वही होता है । वो रेचल को बर्दाश्त नहीं कर पाती है । दोनों के संबंध दरक जाते हैं । संबंधों की उष्मा भाप बनकर उड़ जाती है । अलगाव होता है और फिर उसी तरह के ओवियस भी संवाद होते हैं । स्त्री के मन और मनोविज्ञान का भरपूर वर्णन । उपन्यास का अंत भी बेहद बोल्ड हो सकता था जहां दामिनी, अशेष और रेचल के संबंधों को सहजता से लेती और मस्त रहती । लेकिन मुमकिन है कि लेखिका पारंपरिक अंत करके स्त्री विमर्श की चौहद्दी तोड़ना नहीं चाहती । हमारे समाज में अभी लड़कियां कितनी भी बोल्ड हो जाएं पर वो जिसे प्यार करती हैं उसे दूसरी महिला के साथ बिस्तर में बर्दाश्त नहीं कर सकती ।  
उस उपन्यास में इन दो कहानियों के साथ साथ भारतीय समाज में स्त्रियों की स्थिति और पुरुषों की मानसिकता पर भी टिप्पणी चलते रहती है । कभी दामिनी की विदेशी दोस्तों और अशेष के संवाद के रूप में तो कभी दामिनी की सहयोगी उषा की मौत के पहले के उसके बयान से । इस दौर मे जयश्री राय की भाषा से उपन्यास का कथ्य चमक उठता है । भाषा इस उपन्यास की ताकत है जब जयश्री लिखती हैं- सूरज का सिंदूर समंदर के सीने में उतरकर न जाने कब एकदम से घुल गया । जयश्री राय के इस उपन्यास की आने वाले दिनों में हिंदी साहित्य में चर्चा होनी चाहिए और आलोचकों और पाठकों के बीच जयश्री के उठाए सवालों पर बहस भी ।