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Saturday, October 17, 2026

संवाद ने उतारा सोच की मुखौटा


नायक कहता है, मिस शीतल साहनी, मैं एक बात आपको भी कहना चाहूंगा। लड़कियों को छेड़नेवाले ऐसे थर्ड क्लास गुंडों को पकड़ना और उन्हें सबक सिखाना हमारा फर्ज है और वो हम करते हैं। पर कुछ फर्ज लड़कियों का भी है। नायिका पूछती है, क्या फर्ज है मैं समझी नहीं। जरा देखिए अपने आप को, इस तरह के कपड़े पहनकर अगर आप बाहर सड़क पर निकलेंगी तो गुंडों की सीटियां नहीं बजेंगी तो क्या मंदिर की घंटियां बजेंगी। उत्तर मिलता है, क्या खराबी हैं इन कपड़ों में। कहा जाता है कि बहुत कम हैं। सुना था एक जमाने में लड़कियों को कपड़ों का बहुत शौक हुआ करता था ये आजकल आप लोग कपड़ों के मामले में कंजूस क्यों होती जा रही हैं। नायिका का उत्तर मैं क्या पहनती हूं ये मेरा पर्सनल मामला है। नायक प्रतिवाद करते हुए कहता है कि ये तो उसी तरह की बात हुई कि वो लोफर कहे कि सीटी बजाना मेरा पर्सनल काम है। हर वो काम जिससे दूसरों को परेशानी हो पर्सनल नहीं हो सकता। लड़की पूछती है कि मेरे इस लिबास से दूसरों को क्या परेशानी हो सकती है। जवाब- ये तो उस लोफर से पूछना पड़ेगा जिसने आपको देखकर सीटी बजाई। बहरहाल आप एक शरीफ घराने की शरीफ लड़की हैं और अगर थोड़े से शरीफाना कपड़े पहने लें तो किसी को कोई दिक्कत नहीं होगी। ये संवाद है आज से 46 वर्ष पूर्व की फिल्म दोस्ताना का। 

फिल्म दोस्ताना के लेखक हैं सलीम- जावेद यानि सलीम खान और जावेद अख्तर। हिंदी फिल्मों की सफल लेखक जोड़ी। जावेद अख्तर स्वयं को तरक्कीपसंद लेखक के तौर पर पेश करते रहे हैं। उनकी प्रगतिशील सोच का उदाहरण है दोस्ताना का ये संवाद। ऐसा भी नहीं है कि उक्त लंबा संवाद कहानी की मांग हो। कहानी तो लगभग यहीं से आरंभ ही होती है। नायिका जीनत अमान बहुत कम कपड़ों में जा रही होती और पेंटल उनको छेड़ता है। जीनत अमान उसको पकड़कर थाने ले आती है। पुलिस उसको हवालात में बंद कर देती है। उसके बाद इंस्पेक्टर की भूमिका निभा रहे अमिताभ बच्चन नायिका को कम कपड़ों पहनने को लेकर ज्ञान उड़ेलने लगते हैं। अमिताभ तो वही संवाद बोलते हैं जो लेखक ने लिखा होगा। जावेद अख्तर और सलीम खान की जोड़ी के बारे में कहा जाता है कि सलीम खान कहानी लिखते थे, उसको रोमांचक मोड़ देनेवाले प्रसंग जोड़ते थे और जावेद अख्तर संवाद लिखते थे। अब दोस्ताना के उपरोक्त संवाद से लेखक द्वय की महिलाओं और उसके कपड़ों को लेकर सोच उजागर होता है। माना जाता है कि कोई भी लेखक दो चीजों से प्रभावित होता है। एक तो उसका परिवेश और दूसरा उसका नजरिया। आज से 46 वर्ष पूर्व के परिवेश का तो अनुमान लगाया जा सकता है लेकिन महिलाओं के कम कपड़ों को लेकर जावेद अख्तर और सलीम खान के नजरिए का पता या संकेत तो उक्त संवाद से मिलता ही है। आज जावेद अख्तर नैतिकता की मीनार पर खड़े होकर चाहे जितनी बड़ी-बड़ी बातें कर लें लेकिन उनकी लिखी फिल्में, उसके संवाद चीख चीख कर उनकी असलियत बताते चलते हैं। ये तो इन लेखकों की सौभाग्य है कि हिन्दुस्तान में फिल्मों को लेकर गंभीर अध्ययन कम होता है, अन्यथा इस तरह के लेखन करनेवाले लेखकों को महान तो नहीं ही माना जाता। उनके लिखे संवाद आदि पर तुलनात्मक अध्ययन होता। फिल्मों के दृष्य और संवाद के साथ साथ गीतों पर भी समग्रता में विचार होता। इस वैचारिकक मंथन से क्या निकलता इसका अनुमान पाठक लगा सकते हैं। 

बात सिर्फ महिलाओं के कम कपड़ों पर उपदेश की नहीं है। उस पूरे संवाद में एक पंक्ति में जिस तरह से मंदिर की घंटी की बात की गई है वो भी लेखकों के सोच का परिचायक है। इस वाक्य को एक बार फिर से देखा जाना चाहिए जहां लेखक एक पुरुष पात्र के मुंह से कहलवाता है कि इस तरह के कपड़े पहनकर अगर आप बाहर सड़क पर निकलेंगी तो गुंडों की सीटियां नहीं बजेंगी तो क्या मंदिर की घंटियां बजेंगी। लेखक को गुंड़ों की सीटियां के सामने मंदिर की घंटियां नजर आई थी। मंदिर की घंटी और गुंडे की सीटी में तुलना का क्या औचित्य। औचित्य को अगर छोड़ भी दिया जाए तो इस तुलना की उपयुक्तता पर विचार किया जाना चाहिए।  जावेद अख्तर के लेखन में हिंदू धर्म प्रतीकों को लेकर इस तरह की हल्की टिप्पणियां पहले भी रेखांकित की जा सकती हैं। इसलिए इस संवाद को लेकर किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। लेकिन दर्शकों को पता तो होना चाहिए कि प्रगतिशीलता का दावा करनेवाले लेखक की असलियत क्या है। महिलाओं और धार्मिक प्रतीकों के बारे में वो क्या सोचता है। जावेद अख्तर बहुधा व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बातें करते हुए नजर आते हैं। जब वो मंच से इस तरह की जुमलेबाजी करते हैं तो खूब तालियां बजती हैं। इस तरह की बातों रीलों पर लाइक्स भी बटोरते हैं। साहित्यिक मंचों पर इस तरह की बातें कर गंभीर लेखक और कवि होने का दावा पेश करते हैं पर उनके लिखे फिल्मी संवाद उनके सोच को सामने रख देते हैं। यह नहीं कहा जा सकता है कि फिल्मों की कहानी में तो फार्मूला और सफलता को ध्यान में रखकर लिखी जाती है। लिखी जाती होगी लेकिन लेखक के विचार तो उसमें आते ही हैं। ये सिर्फ जावेद अख्तर के साथ नहीं होता है बल्कि फिल्मों के सभी लेखकों के लेखन को देखने पर यही पता चलता है। अपने लेखन में लेखक वैचारिक छौंक लगाता ही है। 

जावेद अख्तर खुद को नास्तिक भी घोषित करते रहे हैं। अपनी इस छवि को बल प्रदान करने के लिए मंचों पर इस्लाम को लेकर भी कटु बातें कह जाते हैं। लेकिन वो बातें इस्लामिक समाज की कुरीतियों तक ही होती हैं। किसी मंच या फिल्मी संवाद में उन्होंने इस्लाम से संबंधित किसी उपमा का, किसी प्रतीक का उपहास किया हो ऐसा दिखाई नहीं देता है। जब उनसे कभी किसी मंच पर कोई व्यक्ति इससे संबंधित प्रश्न पूछ लेता है तो वो इसको बहुत चतुराई के साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़ देते हैं। इमोशनल होकर ये पूछने लग जाते हैं कि क्या आप अपने मुल्क को सीरिया बनाना चाहते हैं। दर्शकों को लगता है कि देखो कितनी अच्छी बातें कर रहा है। फिर कुछ और मजेदार बातें, क्रोधित होने का अभिनय और जनता की तालियां। लेकिन इन तालियों से ना तो मूल प्रश्न का उत्तर मिलता है और ना ही जावेद अख्तर के लेखन से उपजे विचार की तार्किकता सिद्ध होती है। जावेद अख्तर की ये कैसी नास्तिकता है जो उनको सिर्फ हिंदू धर्म प्रतीकों का उपहास करने की अनुमति देता है। क्या हिंदुओं की सहनशीलता और सहिष्णुता उनको इस तरह की उपहासजनक टिप्पणियां करने का साहस देता है। ये उनकी कैसी प्रगतिशीलता है जो लड़कियों के कम कपड़ों पर टिप्पणियां करवाता है। आज कुछ राजनीतिक दल देश में स्मैश द पैट्रियार्की का ना बुलंद करते हैं, मनुस्मृति को प्रश्नों के कठघरे में खड़ा करते हैं। करिए, लेकिन जावेद अख्तर जैसे लेखकों के सोच को और उस तरह के लेखन तो भी रेखांकित कर प्रश्नांकित करने की आवश्यकता है।  


Sunday, August 18, 2024

कितने आदमी थे...


शोले जो भड़क न सका। करीब चार दशक पहले पढ़ा ये शीर्षक दिमाग पर इस कदर अंकित हो गया कि वर्षों बाद आज भी स्मृति में बना हुआ है। जब भी फिल्म शोले देखता हूं या इससे जुड़ी कोई चर्चा होती है तो ये शीर्षक कौंध जाता है। स्कूल में था, फिल्मों में रुचि थी। उसी समय फिल्म शोले पर एक समीक्षानुमा लेख देखा था। उसमें ये बताया गया था कि शोले फिल्म सफल नहीं हो सकी। बाद में शोले ने सफलता का इतिहास रच दिया। 15 अगस्त 1975 को शोले फिल्म के प्रदर्शन के 50 वर्ष पूरे हुए। एक बार फिर से इस शीर्षक की याद आई। इसी समय पता चला कि सलीम खान और जावेद अख्तर एक बार फिर से साथ आ रहे हैं। सलीम-जावेद की जोड़ी पर प्राइम वीडियो पर तीन पार्ट में एक डाक्यूमेंट्री आ रही है। ये सलीम जावेद की जोड़ी ही थी जिसने हिंदी सिनेमा के एंग्री यंगमैन को गढ़ा था। शोले फिल्म की कहानी और पटकथा सलीम- जावेद की है। जिसके प्रदर्शन पर लिखा गया था कि शोले जो भड़क न सका वो शोले ऐसा भड़का कि मुंबई (तब बांबे) के मिनर्वा सिनेमा हाल में लगातार पांच वर्षों तक दिखाई जाती रही। उस दौरे को जिसने देखा है उनका कहना है कि दो साल तो मिनर्वा के बाहर तक टिकट लेनेवालों की लाइनें लगा करती थी। इतना ही नहीं दिल्ली के प्लाजा सिनेमा में फिल्म देखने के लिए दूर दूर से लोग थे। पंजाब के दर्शकों को दिल्ली लाने के लिए चलनेवाली बस का नाम ही शोले एक्सप्रेस रख दिया गया था। 

यह बात सही है कि शोले फिल्म ने अपने प्रदर्शन के पहले सप्ताह में अच्छा बिजनेस नहीं किया था। रिव्यू भी अच्छे नहीं थे। तब फिल्मों के कारोबार के बारे में बताने वाली फिल्म पत्रिका द ट्रेड गाइड में सलीम-जावेद ने अपने नाम से एक विज्ञापन देकर भविष्यवाणी की थी। उन्होंने विज्ञापन में दावा किया था कि फिल्म हर वितरण के लिहाज से बनाए गए हर क्षेत्र में ये फिल्म एक करोड़ रुपए से अधिक का कारोबार करेगी। ये इनका आत्मविश्वास था। इसी तरह से इन दोनों से जुड़ा एक और रोचक किस्सा है। एक फिल्म प्रदर्शित होनेवाली थी। फिल्म के पटकथा लेखक सलीम-जावेद ने निर्माताओं से कहा कि पोस्टर पर उनका भी नाम होना चाहिए। निर्माता नहीं माने। पूरे मुंबई में फिल्म के पोस्टर लग गए। सलीम-जावेद ने तय किया शहर के हर पोस्टर पर अपना नाम लिखवाएंगे। रातों रात उन्होंने कुछ पेंटर्स से संपर्क किया। अगले दिन अधिकतर पोस्टर्स पर सलीम जावेद का नाम लिखा था। परिणाम ये हुआ कि भविष्य में निर्माता पोस्टर पर पटकथा लेखक के तौर पर इस जोड़ी का नाम लिखने लगे। सलीम-जावेद की जोड़ी ने जिस तरह के संवाद लिखे वो भी बेहद लोकप्रिय हुए थे। चाहे फिल्म दीवार में अमिताभ और शशि कपूर के बीच का संवाद- आज मेरे पास बिल्डिंग है,प्रापर्टी है, बैंक बैलेंस है, बंगला है गाड़ी है तुम्हारे पास क्या है? उत्तर मिलता है- मेरे पास मां है। या फिल्म शोले में अमिताभ का ये पूछना कि तुम्हारा नाम क्या है बसंती अथवा गब्बर का ये कहना कि अरे ओ साभां, कितने आदमी थे। शोले के तो कई संवाद बेहद लोकप्रिय हुए, अब भी गाहे बगाहे लोग दोहराते हैं। संवाद के कैसेट तक बिके थे। सलीम-जावेद कि संवाद की एक और विशेषता है कि वो अश्लील या द्विअर्थी नहीं होते हैं। शोले में जब गब्बर बसंती को देखकर कहता है कि- अरे ओ साभां, ये रामगढ़ वाले अपनी बेटियों को कौन सी चक्की का आटा खिलाते हैं रे, जरा दारी के हाथ पांव देख, बहुत करारे हैं। इस संवाद पर तालियां बजी थीं किसी को गुस्सा नहीं आया था। सलीम जावेद एक कथा में कई उपकथा यानि कहानी के भीतर कहानी की कला में पारंगत हैं। शोले की कथा में कई गैप हैं लेकिन उन गैप्स को उपकथाएं भर देती हैं और दर्शक मनोरंजन की सपनीली दुनिया में चला जाता है। 


Saturday, June 3, 2023

नसीरुद्दीन शाह का बुढ़भस


तीन-चार वर्ष पूर्व की बात है।फिल्म अभिनेता नसीरुद्दीन शाह ने एक साहित्योत्सव में कहा था कि वो फिल्मों में इस कारण आए थे क्योंकि वो लोकप्रिय होना चाहते थे। नसीरुद्दीन शाह इतने पर ही नहीं रुके थे बल्कि यहां तक कहा था कि वो फिल्मों के माध्यम से कला की सेवा करने के उद्देश्य से इस क्षेत्र में नहीं आए थे बल्कि वो तो लोकप्रियता चाहते थे। जो लोग फिल्मों में आने का कारण कला की सेवा बताते हैं वो झूठ बोलते हैं। सचाई ये है कि लोग फिल्मों में धन कमाने और प्रसिद्ध होने के लिए आते हैं। ये वो व्यक्ति बोल रहा था जिनको श्रेष्ठ कलाकार और कला को नई ऊंचाई पर पहुंचानेवाला अभिनेता आदि कहा जाता रहा है। नसीरुद्दीन शाह के इस वक्तव्य के कुछ महीनों पहले उनकी पुस्तक आई थी। दरअसल देश में पिछले कई वर्षों से एक ट्रेंड चल रहा है कि जिन फिल्मी कलाकारों को काम नहीं मिलता है या कम काम मिलता है वो पुस्तक लिख देते हैं। पुस्तक लिखने का एक फायदा यह होता है कि उनको बुद्धीजीवी मान लिया जाता है और दूसरा कि उनको साहित्योत्सवों में आमंत्रित किया जाने लगता है। साहित्योत्सवों से एक अलग प्रकार की लोकप्रियता मिलती है। तो नसीरुद्दीन शाह को जब काम कम मिलने लगा तो उन्होंने भी पुस्तक लिख दी। कई साहित्योत्सवों में बुलाए गए। वहां विवादित बयान देकर चर्चित हुए। पुस्तक भी खूब बिकी। इस बात को भी कई वर्ष बीत गए। उनकी कोई दूसरी पुस्तक नहीं आई तो साहित्योत्सवों से आमंत्रण मिलना बंद हो गया। अब उन्होंने चर्चित होने का एक नया तरीका निकाला। समय समय पर विवादित बयान देने लगे। कभी देश में डर का माहौल बताने लगे तो तो कभी इस भय के वातावरण के कारण अपने बच्चों की चिंता जताने लगे। कभी अनुपम खेर को जोकर कह दिया तो कभी अन्य साथी कलाकारों पर घटिया टिप्पणी कर दी। इंटरनेट मीडिया के इस युग में इस तरह के विवादित बयानों को प्रचलित होते देर नहीं लगती है और पक्ष विपक्ष में बयानवीर खड़े हो जाते हैं। 

जब नसीर को फिल्मों में कम काम मिलने लगा तो उन्होंने ओवर द टाप (ओटीटी) प्लेटफार्म्स की ओर रुख किया। जब उनकी कोई बेव सीरीज रिलीज होती तो फिर वो सामने आते और विवादित बातें कहकर चर्चा में बने रहने का प्रयास करते। अभी जब उनकी वेब सीरीज ताज,रेन आफ रिवेंज आई तो एकबार फिर से नसीर को इंटरव्यू आदि देने का अवसर मिला। इस बार नसीरुद्दीन शाह को तो डर नहीं लगा बल्कि इस बार वो इस बात को रेखांकित करते दिखे कि हिंदी फिल्मों के बड़े कलाकार भयभीत हैं। इसके अलावा वो नए संसद भवन के उद्घाटन समारोह का भी उपहास उड़ाते नजर आए। नसीर ने प्रश्न उठाया कि नए संसद के उद्घाटन के समय इस तरह के भव्य समारोह की क्या आवश्यकता थी। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का नाम लिए बिना यहां तक कह दिया कि देश के सुप्रीम नेता स्वयं के लिए स्मारक बनवा रहे हैं। उनको इस बात पर भी आपत्ति है कि संसद के शुभारंभ समारोह में नरेन्द्र मोदी हाथ में धर्म दंड लिए पुजारियों से क्यों घिरे हुए थे। उपहास के अंदाज में कहा कि ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे ब्रिटेन का राजा बिशपों के साथ चल रहा हो। अब नसीरुद्दीन शाह को भारतीय परंपराओं के बारे में कौन समझाए। जब उनका मूल उद्देश्य ही प्रचार पाना हो तो वो उस प्रकार की बातें ही करते हैं जो हेडलाइन बने और इंटरनेट मीडिया पर प्रचलित हो सके। उनको शायद ये ज्ञात नहीं होगा कि जब देश को स्वाधीनता मिली थी तो जवाहरलाल नेहरू ने भी डा राजेन्द्र प्रसाद के घऱ पर पूजा पाठ की थी। देशभर की नदियों के जल का छिड़काव करवाया गया था। पूजा-पाठ के उस कार्यक्रम के बाद जवाहरलाल नेहरू, डा राजेन्द्र प्रसाद और अन्य स्वाधीनता सेनाननियों के साथ संविधान सभा की बैठक में भाग लेने गए थे। जब आपको अपने देश की परंपरा का बोध न हो और आलोचना करके प्रसिद्धि हासिल करना उद्देश्य हो तो इस तरह के अनर्गल बातें ही की जा सकती हैं। जब उनसे ये पूछा गया कि शाह रुख खान ने तो संसद भवन और उसकी भव्यता की प्रशंसा की तो उन्होंने खामोशी ओढ़ ली।

नसीरुद्दीन शाह मुंह खोलें और डर की बात न करें ये तो संभव ही नहीं है। शाह रुख और आमिर जैसे अभिनेताओं को भी 2014 के बाद इस देश में डर लगा था लेकिन अब वो भयमुक्त होकर काम कर रहे हैं। नरेन्द्र मोदी का विरोध करनेवाले आमिर खान न केवल प्रधानमंत्री मोदी से मिलते हैं बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोगों से मिलने-जुलने में उनको किसी प्रकार का परहेज नहीं है। एक नसीरुद्दीन शाह बचे हैं जिनको अब भी लगता है कि हिंदी फिल्मों के जिन लोगों की बातों में वजन है वो किसी डर से चुप हैं। नसीरुद्दीन शाह इस बात को लेकर चिंतित नजर आते हैं कि इस समय देश में एजेंडा और प्रोपगैंडा वाली फिल्में बन रही हैं और हिंदी फिल्मों के दिग्गज किसी अनजान डर से इसके विरोध में चुप हैं। नसीर साहब इस बात को भूल गए कि जब वो समांतर सिनेमा के दौर में प्रसिद्धि पा रहे थे तो उन फिल्मों में किस विचारधारा का एजेंडा चल रहा था। उस समय तो वो सफल थे, उनकी बातों का वजन और असर होता। तब तो उनको न तो एजेंडा दिखा और न ही प्रोपेगैंडा। उस दौर के पहले जाएं तो जब ख्वाजा अहमद अब्बास के नेतृत्व में अभिनेताओं की टीम सोवियत रूस जाकर वहां कार्यक्रमों में हिस्सा लेती थे। वहां की सरकार के आतिथ्य का आनंद उठाती थी और लौटकर उनकी विचारधारा के आधार पर फिल्में बनाती थी। उसके बारे में कभी नसीरुद्दीन शाह ने कुछ नहीं बोला। इसको कहते हैं चुनिंदा चुप्पी या चुनिंदा मसलों पर प्रतिक्रिया देना। इस तरह की बातें अब देश की जनता समझने लगी है। समझ तो इनका एजेंडा भी आ गया है। 

नसीरुद्दीन शाह के बारे में जावेद अख्तर और सलीम खान की राय एक है। दोनों का मानना है कि नसीर कुंठा में इस तरह के बयान देते हैं। दरअसल कुछ वर्षों पूर्व नसीरुद्दीन शाह ने राजेश खन्ना को औसत कलाकार कहकर उनका मजाक उड़ाया था। तब जावेद अख्तर ने स्पष्टता के साथ कहा था कि ‘नसीर साहब को कोई सक्सेसफुल आदमी पसंद नहीं है। अगर कोई पसंद हो तो नाम बताएं कि ये आदमी मुझे अच्छा लगता है क्योंकि वो सक्सेसफुल है। मैंने तो आज तक नहीं सुना। वो दिलीप कुमार को क्रिटिसाइज करते हैं, अमिताभ बच्चन को क्रिटिसाइज करते हैं, हर आदमी जो सक्सेसफुल है उनको अच्छा नहीं लगता है।‘ लगभग उसी समय सलीम खान ने भी नसीरुद्दीन शाह को कुंठित और कड़वा व्यक्ति कहा था। ऐसा प्रतीत होता है कि सलीम खान और जावेद अख्तर का नसीरुद्दीन शाह पर दिया गया बयान ठीक था। वो इस बात से कुंठित हो सकते हैं कि उनकी ही आयु के अनुपम खेर इस वक्त भी अलग अलग तरह की भूमिकाएँ कर रहे हैं और व्यस्त हैं। उनसे बड़ी आयु के अमिताभ बच्चन को अब भी काम मिल रहा है जबकि नसीरुद्दीन शाह को फिल्म इंडस्ट्री में बहुत कम लोग पूछ रहे हैं। हिंदी फिल्मों की दुनिया इस मायने में बहुत ही निर्मम है कि अगर किसी अभिनेता को दर्शक पसंद नहीं कर रहे हैं या उनकी फिल्में सफल नहीं हो पा रही हैं तो उनकी तरफ देखते भी नहीं हैं, उनके साथ फिल्म करना तो बहुत ही दूर की बात है। नसीर को ये समझना होगा।