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Saturday, April 24, 2021

उपेक्षा के भंवर में फंसी धरोहर


कोरोना की दूसरी लहर का असर कला और कलाकारों पर फिर से पड़ने लगा है। पिछले सालभर से कोरोना संक्रमण के बढ़ने की वजह से सार्वजनिक कार्यक्रमों के रद्द होने से कलाकारों के सामने जीविका का संकट उत्पन्न हो गया था। मंच पर परफॉर्म करने वाले घर बैठे थे। बड़े कलाकारों के साथ तबले और हारमोनियम आदि पर संगत करनेवालों के लिए संकट अधिक गहरा था। इस वर्ष के आरंभ से कोरोना संक्रमण के संकट के कम होने से एक उम्मीद जगी थी, लेकिन अब संक्रमण की दूसरी लहर ने उसपर पानी फेर दिया। हाल ही में साहित्य और संस्कृति के लिए काम करनेवाली कोलकाता की संस्था प्रभा खेतान फाउंडेशन ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के साथ एक बातचीत का आयोजन किया था। विषय था ‘इकोनॉमी इन कल्चर’। इस बातचीत में वित्त मंत्री ने भी कलाकारों की स्थिति पर चिंता प्रकट की। उन्होंने माना कि परफॉर्मिंग आर्ट के कलाकारों के सामने चुनौती बड़ी है । उन्होंने कलाकारों से ये अपेक्षा की कि वो सरकार को बताएं कि इस क्षेत्र की चुनौतियों से कैसे निबटा जाए ताकि इस क्षेत्र की समस्याओं का निदान हो सके। इस बातचीत में आगे निर्मला सीतारमण ने माना कि संस्कृति के क्षेत्र में कई संस्थाएं सांस्थानिक उपेक्षा का शिकार हो रही हैं। वित्त मंत्री ने सांस्कृतिक संस्थाओं की बेहतरी के संदर्भ में पूछे गए प्रश्न के उत्तर में कहा कि धन के साथ-साथ इनको बेहतर करने के लिए ‘सही व्यक्तियों’ की भी जरूरत होती है। 

जब मैं ये कार्यक्रम सुन रहा था तो अचानक त्रिपुरा के उनकोटि की छवियां दिमाग में कौंधी। इस वर्ष जब कोरोना संक्रमण थोड़ा कम हुआ था तो मार्च के अंतिम सप्ताह में त्रिपुरा जाने का अवसर मिला था। उनकोटि में पत्थरों पर तराशी गई मूर्तियों की कलात्मकता की प्रशंसा सुनी थी। शिव को मानने वालों के लिए ये आस्था का बड़ा केंद्र भी है। उनकोटि का अर्थ होता है एक करोड़ से एक कम। इसके नाम के साथ भी एक बेहद दिलचस्प कहानी जुड़ी हुई है। मान्यता ये है कि भगवान शिव एक करोड़ देवी देवताओं के साथ काशी जा रहे थे। जब त्रिपुरा के इस स्थान पर पहुंचे तो रात हो गई। शिवजी ने सबके साथ वहीं रात बिताने का निर्णय लिया और सभी देवी-देवताओं को कहा कि रात्रि विश्राम के पश्चात सूर्योदय के पहले सबको काशी के लिए प्रस्थान करना है। अगले दिन पौ फटने के पहले भगवान शंकर जब उठे तो उन्होंने देखा कि सभी देवी देवताएं सो रहे हैं और कोई भी काशी जाने के लिए समय से तैयार नहीं हो पाए हैं। शिव अकेले ही वहां से नियत समय पर चल दिए लेकिन अपने साथ के सभी देवी देवताओं को श्राप दिया कि वो पत्थर के हो जाएं। मान्यता है कि इसी वजह से इस स्थान का नाम ‘उनकोटि’ पड़ा और वहां एक करोड़ से एक कम पत्थर की मूर्तियां या पत्थर पर उकेरे चित्र बने हैं। 

अगरतला से करीब पौने दो सौ किलोमीटर की दूरी तय करके जब उनकोटि पहुंचा तो वहां की सुंदरता और पत्थर के मूर्तियों की भव्यता और कलाकारी देखकर आह्लादित हो गया। इस परिसर में नीचे उतरते ही सबसे पहले करीब तीस फीट के ‘उनकोटेश्वर कालभैरव’ की पत्थर की मूर्ति मिलती है। इस मूर्ति का मुकुट ही करीब दस फीट के पत्थर पर बना है जिसपर अद्भुत कलाकारी है। उनके आसपास दो देवियों के चित्र पत्थर पर उकेरे हुए हैं और इसी के पास नंदी की पत्थर की दो मूर्ति भी मिलती है। काफी सीढ़ियां चढ़कर आपको अन्य मूर्तियों को देखने जाना पड़ता है। पत्थर की कई मूर्तियों को उसी परिसर में बने कमरे में बंद करके रखा गया है। काल भैरव की मूर्ति की दूसरी तरफ एक विशाल पत्थर पर गणेश जी की मूर्ति बनी हुई है जिसके दोनों तरफ पत्थर पर हाथी की मुखाकृति वाले चित्र उकेरे हुए हैं। इस परिसर के बारे में संक्षेप में बताने की जरूरत इसलिए है ताकि इसकी भव्यता और कलात्मकता का अंदाज हो सके। ये पूरा परिसर संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत आनेवाली संस्था भारतीय पुरातत्तव सर्वेक्षण की देखरेख में है। वित्त मंत्री ने सही कहा था कि संस्कृति से जुड़ी जगहों को सहेजने के लिए धन से ज्यादा सुरुचि संपन्न मानव संसाधन की आवश्यकता है। भले ही उन्होंने ये बातें कोलकाता की सांस्कृतिक संस्थाओं के बारे में कही हो, लेकिन ये उनकोटि पर भी लागू होता है। इतने बड़े और भव्य परिसर में नागरिक सुविधाओं के नाम पर शौचालय तो बना है लेकिन ऐसा लगा कि उसमें वर्षों से पानी नहीं आया था। बुजुर्गों और दिव्यांगों के लिए भी किसी तरह की सुविधा मुझे नहीं दिखी। इनको अगर थोड़ी देर के लिए छोड़ भी दिया जाए तो जो पत्थर पर बनी मूर्तियां हैं या कला कृतियां हैं वो भी देखरेख के आभाव में जगह जगह से खराब हो रही हैं। कालभैरव की प्रतिमा के नीचे कुछ लोग कपड़े धो रहे थे। उपर के हिस्से में जाने के लिए बनी सीढ़ियां बुरी हालत में हैं। उस परिसर में उगनेवाले जंगली घास भी लंबे समय से काटे नहीं जा सके थे। ऐसा प्रतीत होता है कि भारतीय पुरातत्तव सर्वेक्षण बस परिसर के गेट पर बोर्ड लगाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री माने बैठा है। 

यह स्थिति तब है जबकि इस वर्ष के बजट में भारतीय पुरातत्तव सर्वेक्षण के हिस्से में संस्कृति मंत्रालय के बजट से हजार करोड़ रुपए से अधिक का आवंटन है। इसके अलावा संस्कृति मंत्रालय की अन्य योजनाओं के अंतर्गत पूर्वोत्तर के लिए एक सौ दो करोड़ की राशि भी आवंटित की गई है। संस्कृति के साथ-साथ पर्यटन मंत्रालय के बजट का कुछ हिस्सा भी जोड़ दें तो एक अलग ही तस्वीर बनती है। ‘देखो अपना देश’ (डीएडी) योजना के तहत ही उनकोटि जैसे स्थानों के बारे में लोगों को बताया जाए और जब इन स्थानों के बारे में बताया जाए तब वहां उपलब्ध सुविधाओं के बारे में भी जानकारी दी जा सकती है। उनकोटि को तो दो तरह से विकसित किया जा सकता है। एक तो इसको धार्मिक पर्यटन के तौर पर प्रचारित किया जा सकता है। एक ही स्थान पर एक करोड़ से बस एक कम देवताओं का दर्शन लाभ लिया जा सकता है। दूसरे इसको भारतीय मूर्तिकला के अप्रतिम उदाहरण के तौर पर पूरी दुनिया में पेश किया जा सकता है। पूर्वोत्तर भारत में इतनी तरह की कलाओं के उदाहरण मिलते हैं जिनसे न केवल भारतीय कला की समृद्ध परंपरा सामने आती है बल्कि हमारे इतिहास का वो पन्ना भी दुनिया के सामने आ सकता है जो कि हमारी प्राचीन सभ्यता की सुरुचि संपन्नता  को भी सामने ला सकती है।   

दरअसल हम अपनी विरासत को लेकर उत्साहित ही नहीं होते हैं। उनको सहेजने और उसको पूरी दुनिया के सामने लाने के उपक्रम में भी पिछड़ जाते हैं। उनकोटि जैसी विरासत या कला का नायाब नमूना अगर पश्चिम के किसी देश के पास होता तो वो इसकी इतनी मार्केटिंग करता कि पूरी दुनिया उस स्थान की दीवानी हो जाती। प्रश्न सिर्फ मार्केंटिंग का नहीं है, सवाल तो ये भी कि हम अपने इतिहास को भी इन कलाओं के माध्यम से और इनसे जुड़ी कहानियों से जान सकते हैं। अगर पूरे देश में फैले विरासत के इन अनमोल हीरों को एक माला में पिरो सकें तो यह एक बड़ा काम होगा। इन हीरों को एक माला में पिरोने के लिए एक देश को एक संस्कृति नीति की आवश्यकता है। जितनी जल्दी संस्कृति नीति बनेगी उतनी जल्दी हम ने केवल अपनी गौरवशाली विरासत को सहेज पाएंगे बल्कि नई पीढ़ी के अंदर भी आत्मगौरव का संचार कर पाएंगे। 

Sunday, April 18, 2021

साहित्य का शीर्ष कलश


पिछले दिनों नरेन्द्र कोहली की एक पुस्तक आई थी, ‘समाज जिसमें मैं रहता हूं’। उस पुस्तक की आरंभिक प्रतियों में से एक उन्होंने मुझे भिजवाई थी। ये उनके संस्मरणों और भाषा आदि को लेकर लिखे लेखों का संग्रह है। उनकी इच्छा थी कि मैं इस पुस्तक को पढ़कर उनसे चर्चा करूं। मैंने पुस्तक को तत्काल पढ़कर उनको फोन किया और पुस्तक के बारे में खूब अच्छी अच्छी बातें उनसे कहीं, कई उल्लिखित प्रसंगों पर उनसे चर्चा भी की। बातचीत के दौरान मुझे लगा कि वो अपनी तारीफ से इतर वो कुछ सुनना चाह रहे थे। मेरे पास वो बातें थीं लेकिन मैं कह नहीं पा रहा था। बात आई गई हो गई। इस बीच मैंने उनके प्रकाशक को फोन करके बता दिया कि कोहली जी की उक्त पुस्तक में प्रूफ की अनेक गलतियां हैं जो उनकी प्रतिष्ठा के विपरीत हैं। अभी पांच अप्रैल को उनसे बहुत लंबी बात हुई, देश दुनिया, समाज, राजनीति और साहित्यिक जगत की। उस दौरान भी मेरे दिमाग में ये बात आई कि पुस्तक की खामियों की ओर उनका ध्यान दिला दूं , लेकिन हिम्मत नहीं पड़ी। लेकिन मेरे मन के किसी कोने में अंतरे में ये बात अटकी हुई थी कि कोहली जी को ये तो बताना ही होगा कि उनकी पुस्तक में भी कमियां हैं। ये इस वजह से भी था कि वो हमेशा शब्दों के प्रयोग और उसको लिखने के तरीके को लेकर सचेत रहते थे। अगले दिन उनको व्हाट्सएप पर संदेश भेजा, ‘आपकी पुस्तक में प्रूफ की कई गलतियां हैं जो नहीं होनी चाहिए थीं’। तुरंत जवाबी संदेश आया, ‘तुमने सही प्रतिक्रिया देने में बहुत देर कर दी, पता नहीं क्यों?’ मैंने लिखा, ‘आपसे डरकर’ । उनका उत्तर, ‘सत्य कहने में भय किस बात का और तुम कब से डरकर सत्य बोलने से बचने लगे?’ मैंने हाथ जोड़ लिए। मेरी कोहली जी से ये अंतिम बातचीत थी, लेकिन इस बातचीत ने मुझे बहुत शक्ति दी थी। वो इसी तरह से बातचीत के दौरान और कभी कभार संदेश भेजकर मुझे शब्दों के प्रयोग और मेरे लेख पर प्रतिक्रिया दिया करते थे, ये उनका सिखाने का तरीका था। 

नरेन्द्र कोहली से मेरा परिचय मेरे मित्र और वाणी प्रकाशन के अरुण माहेश्वरी ने करवाया था। वर्ष ठीक से याद नहीं है लेकिन करीब दस साल से अधिक तो हो ही गए होंगे। फिर हम लोगों ने देश-विदेश की कई यात्राएं साथ-साथ कीं। इन यात्राओं के भी कई दिलचस्प किस्से हैं, प्रसंग हैं। कोहली जी की श्रीराम में जबरदस्त आस्था थी। वो हर बात में ये कहा करते थे कि रामजी की यही इच्छा रही होगी। उनकी इस आस्था का प्रकटीकरण तब हुआ जब वो एक कार्यक्रम के सिलसिले में अयोध्या गया। कार्यक्रम की आयोजक मालिनी अवस्थी के सामने उन्होंने शर्त रखी कि वो अयोध्या तभी जाएंगें जब रामलला के दर्शन की व्यवस्था हो पाएगी। आयोजकों ने उनकी बात मानी। वो अयोध्या गए। रामलला के दर्शन भी किए। दर्शन के बाद कोहली जी फफक फफक कर रोने लगे। उन्होंने अपने जीवनकाल में पहली बार अयोध्या में रामलला के दर्शन तक किए जब सुप्रीम कोर्ट का राम जन्मभूमि पर फैसला आ गया। मालिनी अवस्थी और युवा कवि राहुल नील इस पल के गवाह बने थे। बाद में पता चला कि उन्होंने ये तय किया हुआ था कि रामलला के दर्शन करने अयोध्या तभी जाएंगे जब जन्मभूमि के तमाम विवाद समाप्त हो जाएंगे। 

दैनिक जागरण में जब हमने ‘हिंदी हैं हम’ अभियान का आरंभ किया तो नरेन्द्र कोहली जी पहले कार्यक्रम के अतिथि थे। दैनिक जागरण बेस्टसेलर की जब शुरुआत हुई तो पहली सूची नरेन्द्र कोहली ने जारी की थी। संवादी लखनऊ से लेकर बिहार संवादी तक में कोहली जी की भागीदारी रही थी। अपनी भाषा हिंदी को लेकर उनमें एक जबरदस्त प्रेम था और उनका यह प्रेम बहुधा गोष्ठियों में दिख भी जाता था। उनके निधन से हिंदी को अपूरणीय क्षति हुई है। वो हिंदी साहित्य के शीर्ष कलश थे।  


Saturday, April 17, 2021

आपदा में विरासत सहेजने का अवसर


कोरोना की दूसरी लहर की वजह से लोगों ने फिर से अपने-अपने घरों से निकलना कम कर दिया है। स्थितियां इस तरह की बनने लगी हैं कि पिछले साल की घटनाएं और स्थितियां याद आने लगी हैं। एक बार फिर से इलेक्ट्रानिक या ई-फॉर्मेट में प्राचीन पुस्तकों का आदान-प्रदान शुरू हो गया है। कुछ ऐसी पुस्तकें भी इस दौरान देखने को मिल रही हैं जो अब अप्राप्य हैं या जिनका प्रकाशन अब नहीं हो रहा है। पिछले साल जब कोरोना का कहर था तब भी एक ऐसी ही दुर्लभ पुस्तक ई फॉर्मेट में प्राप्त हुई थी। पुस्तक का नाम था ‘सनातन धर्म, एन एलिमेंट्री टेक्स्टबुक ऑफ हिंदी रिलीजन एंड एथिक्स’। इस पुस्तक के लेखक का नाम नहीं था लेकिन इसके कवर पर प्रकाशन वर्ष उन्नीस सौ सोलह और प्रकाशक के तौर पर सेंट्रल हिंदू कॉलेज बनारस के मैनेजिंग कमेटी का उल्लेख था। पिछले साल ये पुस्तक काफी उपयोगी मानी गई थी और कई लोगों ने इसका अध्ययन भी किया था। अभी एक ऐसी ही महत्वपूर्ण पुस्तक प्राप्त हुई है जिसका नाम है ‘जन जनक जानकी’ जिसके संपादक है सच्चिदानंद वात्स्यायन। वात्स्यायन जी को ज्यादातर लोग अज्ञेय के नाम से जानते हैं। इस पुस्तक के प्रकाशन वर्ष का उल्लेख नहीं है लेकिन ये उन्नीस सौ तिरासी के एक या दो वर्षों के बाद प्रकाशित हुई थी। ये पुस्तक इस अर्थ में भी महत्वपूर्ण है कि इसमें हिंदी के सत्रह महत्वपूर्ण लेखकों के विचार हैं जो एक यात्रा के दौरान उपजे थे। दरअसल उन्नीस सौ तिरासी में अज्ञेय जी की अगुवाई में लेखकों के एक दल ने बाइस जनवरी से लेकर अठारह मार्च तक दो चरणों में यात्रा की थी। इस यात्रा को ‘जानकी जीवन यात्रा’ का नाम दिया गया था और यात्रा के रूट को ‘सीयराममय पथ’ कहा गया था। पहले चरण में जनकनंदिनी के जन्मस्थान बिहार के सीतामढ़ी से लेकर श्रीराम प्रभु के जन्मस्थान अयोध्या तक और फिर दूसरे चरण में अयोध्या से लेकर चित्रकूट तक की यात्रा की गई थी। इस पुस्तक की भूमिका में इस यात्रा का उद्देश्य भी स्पष्ट किया गया है, ‘यह यात्रा केवल राम-जानकी की कथा से जुड़े स्थलों को देखने के लिए नहीं की गई थी, न ही उसका उद्देश्य रामायण की कथा के भौगोलिक विस्तार के प्रमाण को खोजने के लिए की गई थी। रामायण की, राम-जानकी की कथा का, भारत के जन जीवन में जो महत्वपूर्ण स्थान है, लोक चित्त जिस प्रकार उस कथा से जुड़कर ही अपनी सांस्कृतिक अस्मिता की पहचान बनाता है उसको रेखांकित करने का प्रयास था।‘ इस यात्रा में शामिल सत्रह लेखकों ने अपने अपने अनुभवों को कलमबद्ध किया था जो ‘जन जनक जानकी’ नाम के पुस्तक में संकलित किया गया था। अब यह पुस्तक अपने मूल स्वरूप में उपलब्ध नहीं है।

जब अज्ञेय जी ने इस यात्रा की योजना बनाई थी तब इसको लेकर कई तरह की चर्चा भी चली थी। इसपर सवाल भी खड़े हुए थे। वो वामपंथ का दौर था और वामपंथी इतिहासकार भारतीय पौराणिक चरित्रों को लगातार मिथक कहकर प्रचारित और स्थापित कर रहे थे। वैसे समय में अज्ञेय ने सीतामढी से लेकर अयोध्या और फिर अयोध्या से चित्रकूट तक की ‘जानकी जीवन यात्रा’ का आयोजन करके एक तरह से वामपंथियों को सांस्कृतिक मोर्चे पर चुनौती भी दी थी। यात्रा के पहले अज्ञेय ने पटना में आयोजित पत्रकार वार्ता में कहा भी था कि, ‘महाकाव्य-चेतना राष्ट्र एवं मनुष्य मात्र की भावनात्मक एकता को सार्थक और गतिशील बनाती है। लोकजीवन की प्रेरणा हमेशा से शाश्वत काव्य की उदगम भूमि रही है, आज भी राष्ट्र और मनुष्य मात्र की भावनात्मक एकता को शाश्वत सांस्कृतिक धरातल पर प्रतिष्ठित करने के लिए महाकाव्य-चेतना की अंतर्निहित शक्ति की पुन: खोज करनी पड़ेगी। ‘सीयराममय पथ’ पर अग्रसर होने का सामूहिक संकल्प इसी दिशा में प्रगति का एक संकल्प है।‘ एक लेख में जितेन्द्र सिंह ने लिखा था- ‘आजकल प्राचीन भारतीय इतिहास के विख्यात विद्वान इस विषय पर तीखी बहस चला रहे हैं कि क्या वाल्मीकि रामायण या तुलसीकृत रामचरितमानस में वर्णित मूल कथा अधिक ऐतिहासिक और पुरातन है अथवा वेदव्यास रचित महाभारत की कथा?’ इसके अलावा इस बात पर भी चर्चा हो रही थी कि क्या साहित्य से या पौराणिक ग्रंथों से इतिहास के संकेत मिलते हैं? अज्ञेय इन प्रश्ऩों से सीधे तो नहीं टकरा रहे थे लेकिन परोक्ष रूप से वो ये संकेत करना चाहते थे कि ‘हमारे रचनाकार इतिहास के घटनाचक्र और उसके अनुक्रम से अधिक महत्व माहाकाव्यों के गाथाओं में गुंफित लोकजीवन के शाश्वत सत्य को मानते हैं।‘ इन बातों से ये भी स्पष्ट होता है कि हमारे रचनाकारों में अपने लोक जीवन के तत्वों को लेकर कितनी गहरी आस्था हुआ करती थी। 

‘जानकी जीवन यात्रा’ को ज्यादा समय नहीं बीता है। अड़तीस साल पहले की गई इस महत्वपूर्ण यात्रा और उस यात्रा के बाद लिखे गए लेखों पर आधारित पुस्तक का उपलब्ध ना होना भी कई प्रश्न खड़े करता है। मन में यह प्रश्न स्वाभाविक तौर पर उठता है कि क्या साहित्य के इतिहास की इस महत्वपूर्ण घटना को हाशिए पर डालकर उसको विस्मृत करने का षडयंत्र तो नहीं रचा गया। यह अनायस नहीं है कि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के ‘कल्याण’ पत्रिका में छपे लेखों पर चर्चा नहीं होती, उसका कहीं उल्लेख नहीं मिलता। निराला को वामपंथी साबित करने के लिए उनकी कविताओं की तमाम तरह की व्याख्या हमारे सामने है लेकिन ‘कल्याण’ के ‘कृष्ण भक्ति अंक’ में लिखा उनका लेख नहीं मिलता। दो साल पहले पटना पुस्तक मेला के दौरान हिंदी के वरिष्ठ कवि लीलाधर जगूड़ी ने एक अनौपचारिक बातचीत में बताया था कि वासुदेव शरण अग्रवाल ने ‘श्रृंगार हाट’ नाम से एक पुस्तक लिखी थी। उस पुस्तक में पौराणिक काल में स्त्रियों के श्रृंगार की विधियों का वर्णन है।  ये पुस्तक भी उपलब्ध नहीं है। इस तरह के कई और उदाहरण हैं जहां हिंदी के पूर्वज लेखकों की उन रचनाओं को दरकिनार करने की कोशिश की गई जिसमें भारतीयता और हिंदू धर्म प्रतीकों के बारे में बात की गई हो। हमारे देश के विश्वविद्यालयों के हिंदी विभागों पर वामपंथियों का लंबे समय से कब्जा है लिहाजा इन विषयों पर शोध कार्य भी नहीं हो सका। नतीजा यह हुआ कि जो पुस्तकें वामपंथी विचारधार का पोषण नहीं करती थीं और जिनमें भारतीयता और यहां के लोक-तत्व मिलते थे वो ओझल होते चले गए। जब पुस्तकें पाठकों के सामने आएंगीं नहीं तो उनको कोई पढ़ेगा कैसे, जब पढ़ेगा नहीं तो उसकी चर्चा कैसे होगी और जब चर्चा नहीं होगी तो उसकी व्याप्ति कैसे होगी, जब व्याप्ति नहीं होगी तो प्रकाशकों की रुचि नहीं होगी और अंतत: उसका पुनर्प्रकाशन नहीं होगा और वो अनुपलब्ध हो जाएंगी। नई पीढ़ी को पता ही नहीं चल पाएगा कि उनकी समग्र साहित्यिक विरासत क्या है, उऩके सामने जो होगा उसको ही वो साहित्यिक विरासत मान लेगें। अपनी देश के लेखन की विरासत से पीढ़ियों को दूर करने का या उसके बारे में उनको अंधेरे में रखने का जो अपराध पूर्व में हुआ है, उसके लिए किसी को दंडित तो नहीं किया जा सकता है। उसका प्रायश्चित तो किया ही जा सकता है। प्रायश्चित इस रूप में कि उन अनुपलब्ध पुस्तकों को आधुनिक रूप में प्रकाशित करके युवा पीढ़ी तक पहुंचाने का उपक्रम हो । अगर ऐसा हो पाता है तो न केवल हमारी नई पीढ़ी अपनी ज्ञान परंपरा से परिचित होगी और वो समग्र ज्ञानार्जन से अपेक्षाकृत बेहतर कर पाने में सक्षम हो पाएगी। इस काम में सरकार की सांस्कृतिक संस्थाओं को पहल करनी चाहिए और इस संकट के समय में जितनी पौराणिक पुस्तकें लोगों के पास पहुंच रही हैं उसको जमा कर, उसकी प्रामाणिकता जांचने के बाद उसको प्रकाशित करने की दिशा में प्रयास किया जाना चाहिए। 

Saturday, April 10, 2021

परंपरा के पुनर्स्थापन का हो प्रयास


देशभर में कला, संस्कृति और भाषा से जुड़ी कई इमारतें हैं जिनका अपना एक इतिहास है। चाहे वो दिल्ली का त्रिवेणी कला संगम हो, श्रीराम सेंटर हो, रवीन्द्र भवन हो या भोपाल का भारत भवन हो, मुंबई की जहांगीर आर्ट गैलरी या पृथ्वी थिएटर हो। ये सूची बहुत लंबी हो सकती है। इस तरह की इमारतों से या इनमें होनेवाली गतिविधियों से उस शहर की कला और संस्कृति प्रेम का एक लैंडस्केप बनता है। एक ऐसा लैंडस्केप जिससे वहां के लोगों की रुचियों का आभास भी मिलता है। दिल्ली में अभी हाल ही में एक कला संकुल का लोकार्पण हुआ, नाम है संस्कार भारती कला संकुल। इसमें कला दीर्घा से लेकर कई हॉल हैं जहां बैठकर कला संस्कृति के विभिन्न विषयों पर चर्चा आदि हो सकती है। ये उम्मीद की जानी चाहिए कि इस कला संकुल से देश की राजधानी का सांस्कृतिक लैंडस्केप और बेहतर होगा। भविष्य में जो होगा उसके बारे में तो उम्मीद ही जताई जा सकती है लेकिन जो सामने घटता है उसपर चर्चा की जा सकती है। संस्कार भारती कला संकुल के लोकार्पण समारोह के दौरान जो बातें कही गईं उस पर ध्यान गया ।संस्कार भारती कला संकुल का लोकार्पण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने किया था। कोरोना की वजह से कला संकुल के परिसर में ही समारोह हुआ था। इसके लोकार्पण समारोह में मोहन भागवत ने भारतीय कला और कला परंपरा को लेकर कई महत्वपूर्ण बातें कहीं। मोहन भागवत ने कहा कि भारत की कला रंजन मात्र नहीं है। वो इसके उद्गम को ओमकार के उच्चरण से जोड़कर देखते हैं। उन्होंने कला को परिभाषित करते हुए न केवल इसको एक दार्शनिक रूप दिया बल्कि उसको समकालीन समस्याओं से जोड़ने का प्रयास भी किया। कला को परिभाषित करने के क्रम में मोहन भागवत ने इतिहास में भी आवाजाही की और उसको सत्य और शिवत्व की अभिव्यक्ति और अनुभूति से जोड़ा। उन्होंने स्पष्ट किया कि पश्चिम के देशों में मनोरंजन को सुख से जोड़ा गया जबकि हमारे यहां इसको आंतरिक अनुभूति से जोड़कर एक पूर्णता का दर्शन प्रतिपादित किया गया। पश्चिम में कला से जो रंजन होता है उससे भौतिक सुख की प्राप्ति होती है लेकिन उस भौतिक सुख में एक अधूरापन भी महसूस होता है। जबकि भारतीय कला में जो शक्ति है वो मनुष्य को उसके मूल तक ले जाती है और वहां जो सुख की भावना पैदा होती है वो मानव मन में उपजनेवाले अधूरेपन को दूर करने का रास्ता दिखाती है। यह उल्लास से शांति की ओर ले जाती है। मोहन भागवत ने विस्तार से कला के संस्कारों और समाज पर उसके प्रभाव पर भी प्रकाश डाला। 

कला संकुल के शुभारंभ के अवसर पर कला को लेकर कही गई बातों पर अगर हम विचार करें तो इसके सूत्र हमको काफी पीछे लेकर जाते हैं। वासुदेव शरण अग्रवाल ने भी भारतीय कला पर विचार करते हुए लिखा है, ‘वैदिक काल से धर्म और कला का घनिष्ठ संबंध बना रहा है। धर्म और दर्शन के उदार क्षेत्र में संयम और तप के जिन आदर्शों की कल्पना समय-समय पर प्रकट होती रही, उसी को मूर्तिमान रूप में जनता के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए कलाकारों ने प्रयत्न किया। एक प्रकार से भारतीय धर्म, जीवन की पूर्णता को लिए हुए, नृत्य, गीत, अभिनय और कला की प्रवृत्तियों में फला-फूला। इसका प्रभाव धर्म और जीवन दोनों पर अच्छा हुआ। धर्म के प्रांगण में वसंत लक्ष्मी की शोभा का अवतार कला से हुआ। दूसरी ओर धर्म के निर्मल आदर्शों को प्राप्त करके कला का स्वरूप निखर गया।‘ वासुदेव शरण अग्रवाल भी ये मानते हैं कि ‘शिव की सत्ता मणि-दीप की तरह कला के प्रासाद को आलोकित करती है।‘ वासुदेव शरण अग्रवाल ने भारत की कला और संस्कृति को लेकर विपुल लेखन किया है और स्थापना दी है कि कला, वैदिक काल से लेकर आधुनिक काल तक समाज को उस दिशा में ले जाने का काम करती है जहां पूर्णता की अनुभूति हो। 

कला का यह स्वरूप हमारे समाज में बहुत लंबे समय तक चला। जब हमारा देश स्वतंत्र हुआ तो अंग्रेज भारत छोड़कर चले गए लेकिन हम उनकी जीवन शैली की बहुत सारी बातों को आधुनिकता मानकर या समझकर अपनाने लगे थे। बाद के वर्षों में ये और भी ज्यादा बढ़ा। हमने पश्चिम के देशों का अंधानुकरण करना आरंभ किया। ये अंधानुकरण इस वजह से भी होने लगा कि हमारा समाज नए के प्रति आस्थावान होने लगा था। नए के प्रति आसक्ति गलत नहीं है लेकिन नए और पुराने में एक संतुलन होना चाहिए था। नए को अपनाने और पुरान को छोड़कर आगे बढ़ने की बढ़ती प्रवृत्ति की वजह से हमसे हमारी परंपरा का सिरा छूटने लगा था। हम आधुनिकता के नाम पर और बाद के दिनों में उत्तर आधुनिकता के नाम पर अपनी कला को भी उधर मोड़ने लगे थे। जब देश में मार्क्सवाद का जोर बढ़ा तो इस दर्शन से प्रभावित लोगों ने उसकी मान्यताओं को, सिद्धातों को साहित्य और कला में भी लागू करना शुरू कर दिया। परिणाम यह हुआ कि हमारी कला की जो आधारभूत मान्यताएं थीं वो नेपथ्य में चली गईं। इसको कई उदाहरणों से समझा जा सकता है। हमारे देश में चित्रकला या मूर्तिकला की जो परंपरा रही है उसमें सौंदर्य और प्रेम का स्पष्ट चित्रण दिखाई देता है, इसको हिमाचल की चित्र शैली से लेकर राजस्थानी चित्र शैली में देखा जा सकता है। मंदिरों के प्रांगण में बनी मूर्तियों में लक्षित किया जा सकता है। राजस्थानी शैली के कई चित्रों में स्त्री मन के प्रेम का एक अटूट प्रवाह दिखाई देता है। कालांतर में इसकी जगह ऐसी चित्रकलाओं ने ले लिया जिनको समझने के लिए जतन करना पड़ता था। उसी दौर में कुछ ऐसे चित्रकार भी हुए जो मार्क्सवाद के दर्शऩ से प्रभानित थे, उन्होंने देश की आस्था को अपमानित करनावाले चित्र भी बनाए। उन चित्रों पर विवाद तो हुआ, चित्रकार ने सुर्खियां भी बटोरीं लेकिन कला समृद्ध न हो पाई। कुछ इसी तरह की बात साहित्य में भी रेखांकित की जा सकती है। हमारे यहां जिस तरह की कविताएं लिखी जाती थीं जिसमें एक गेयता होती थी बाद में आधुनिकता के नाम पर या नए के नाम पर ऐसी कविताएं लिखी जाने लगीं जो गद्य जैसी होती थीं। कविता से लय गायब कर दिया गया। एक दौर में तो भूखी पीढ़ी के नाम से ऐसे लेखक आए जिन्होंने कविता के नाम पर स्तरहीन लेखन किया। आधुनिकता के नाम पर इस तरह के लेखन के बाद साहित्य और कला में उत्तर आधुनिकता का दौर भी आया। ये तो और भी समझ से परे था। आधुनिकता की इस प्रवृत्ति ने कला को अनुभूति से दूर कर दिया। 

संस्कार भारती कला संकुल के शुभारंभ के अवसर पर जिस भारतीय कला और संस्कृति की बात हुई है उसपर कलाप्रेमियों को, कलारसिकों को गंभीरता से विचार करना होगा। भारतीय कला के उस गौरवशाली परंपरा को बढ़ाने के लिए जतन करने होंगे। नए और पुराने के बीच समन्वय और संतुलन बनाकर कला को समृद्ध करना होगा। इस तरह का एक इकोसिस्टम बनाना होगा जिसमें नवोदित कलाकारों का अपनी कला परंपरा से परिचय हो सके। उन बाधाओं को या तत्वों को चिन्हित करना होगा जो आधुनिकता के नाम पर हमारी कला परंपरा को नेपथ्य में धकेलने का काम अब भी कर रहे हैं। संस्कार भारती कला संकुल अगर इस उपक्रम का केंद्र बन पाती है तो ये इमारत न सिर्फ दिल्ली के कला जगत के लैंडस्केप को खूबसूरत बना पाएगी बल्कि पूरे देश के कला जगत को भी एक राह दिखा पाएगी। अन्यथा हमारे महानगरों में उगनेवाले कंक्रीट के जंगलों में तो कई इमारतें बगैर किसी पहचान के निर्जीव खड़ी ही हैं। 

Saturday, April 3, 2021

अकादमिक स्वतंत्रता का खोखला नैरेटिव


2014 में जब केंद्र में नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में सरकार बनी थी तब से कई शब्द प्रचारित किए गए, उसमें सबसे प्रचलित हुआ ‘नेरैटिव’। नैरेटिव खड़ा करने के लिए कई तरह के सिद्धांतों और विश्व प्रसिद्ध विद्वानों के कथन भी बार-बार उद्धृत किए जाते रहे हैं। मोदी सरकार के सत्ता संभालने के बाद जो सबसे महत्वपूर्ण नैरेटिव खड़ा किया गया वो था ‘असहिष्णुता’ का। इस शब्द को सरकार और भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा को घेरने के लिए उपयोग में लाया गया। इसकी आड़ ही में कई छोटे-छोटे नैरेटिव और बनाए गए। ‘मॉब लिंचिंग’ से लेकर ‘पोस्ट ट्रूथ’ जैसे शब्दों को प्रचलित कर मोदी सरकार को या यों कहें कि भारतीयता के विचारों के पैरोकारों को, राष्ट्रीयता की बात करनेवालों को नीचा दिखाने की कोशिशें हुईं। असहिष्णुता की आड़ में ही पुरस्कार वापसी का प्रपंच रचा गया और उसका इतना शोर मचाया गया कि सरकार के बड़े मंत्रियों को इस मुद्दे पर सफाई देनी पड़ी थी। असहिष्णुता का जो नैरेट्व खड़ा किया वो ‘मैनफैक्चरिंग कसेंट’ के सिद्धांत के करीब नजर आता है। उन्नीस सौ अठासी में एडवर्ड हरमन और नोम चोमस्की की एक किताब आई थी जिसका नाम था, ‘मैनुफैक्चरिंग कसेंट, द पॉलिटिकल इकोनॉमी ऑफ द मास मीडिया’। इस किताब में ‘व्यवस्थित प्रोपगैंडा’ और ‘मैनफैक्चरिंग कसेंट’ यानि सहमति निर्माण के बारे में बात की गई है। किसी विषय विशेष को लेकर इस तरह का माहौल बनाया जाए या प्रोपगैंडा किया जाए ताकि आम जनता की उस मुद्दे को लेकर सहमति निर्मित की जा सके। असहिष्णुता और पुरस्कार वापसी को इस विचार की कसौटी पर कसते हैं तो साफ तौर पर ये सिद्ध होता है कि ये पूरा नैरेटिव व्यवस्थित और सुनियोजित प्रोपगैंडा पर आधारित था। असहिष्णुता का मुद्दा दो हजार पंद्रह के बिहार विधानसभा चुनाव के पहले उठाया गया था और बेहद सुनियोजित तरीके से उसको इस तरह से फैलाया गया था कि परोक्ष रूप से उसका राजनीति लाभ उठाया जा सके। विधान सभा चुनाव के बाद ये मुद्दा शांत भी हो गया था। नरेन्द्र मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के दौरान सहमति निर्माण करने की कई कोशिशें हुईं। इस तरह के प्रोपगैंडा को अंतराष्ट्रीय स्तर पर काम करनेवाले संगठनों और व्यक्तियों का भी साथ मिलता है। पीईन इंटरनेश्नल और रैंकिंग देने वाले अन्य अंतराष्ट्रीय संगठन इस तरह के प्रोपगैंडा में शामिल होते रहे हैं। अपनी रिपोर्टों के माध्यमों से वो सहमति निर्माण के लिए जमीन तैयार करते हैं। 

असहिष्णुता के बाद सरकार के विरोधियों, जिनमें वामपंथियों और अशोक वाजपेयी जैसे नव-वामपंथी भी शामिल रहे हैं, ने ‘फासीवाद’ से लेकर ‘अघोषित आपातकाल’ जैसे मसलों पर नैरेटिव खड़ा करने की कोशिशें कीं। दरअसल इस तरह के लोग अपने राजनीतिक आकाओं के लिए परोक्ष रूप से राजनीति का औजार बनते रहे हैं। जब भी कोई चुनाव आता है तो इनको देश में फासीवाद की आहट सुनाई देने लगती है, देश में अघोषित आपातकाल जैसा माहौल दिखने लगता है। और इन सबके लिए उनको भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा जिम्मेदार लगने लगती है। मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के दौरान इन सब लोगों ने बहुत जोर शोर से नैरेटिव बनाने का काम किया और कई बार सरकार को बैकफुट पर लाने की कोशिश भी की, लेकिन राष्ट्रीयता और भारतीयता की विचारधारा की ताकत के आगे उनकी ज्यादा चल नहीं पाई। बावजूद इसके खुद को लिबरल विचारधारा के कोष्टक में रखनेवाले ये लोग हार नहीं मानते हैं और जब भी कोई अवसर दिखाई देता है तो नैरेटिव खड़ा करने के काम में लग जाते हैं। असहिष्णुता के बाद जो सबसे मजबूत नैरेटिव बनाने की कोशिश हुई वो थी ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ पर खतरे को लेकर। इसको कला और साहित्य जगत से जोड़कर इस तरह से पेश किया गया कि जैसे देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लगातार बाधित की जा रही हो या फिर कलात्मक स्वतंत्रता को रोका जा रहा हो। इसके लिए मसखरी करनेवाले हास्य कवियों या कॉमेडियनों को लेकर हुए केस मुकदमों को आधार बनाने की कोशिशें भी हुईं। सरकार के खिलाफ नैरेटिव बनाने वालों को उम्मीद थी कि दो हजार उन्नीस के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी कमजोर होगी। लेकिन उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया और राष्ट्रवादी विचारधारा को देश की जनता ने और मजबूती प्रदान की और भारतीय जनता पार्टी दो हजार चौदह के मुकाबले ज्यादा सीटों पर जीत हासिल करके और मजबूत हुई। 

दो हजार उन्नीस के चुनावों में मोदी की अगुवाई में हुई जीत से इन कथित उदारवादियों को धक्का तो लगा लेकिन इन्होंने हार नहीं मानी। वो लगातार अपने काम में लगे रहे। विधान सभा चुनावों के वक्त भी उन्होंने फिर से अघोषित आपातकाल से लेकर दलितों के खिलाफ अत्याचारों को लेकर नैरेटिव बनाने का खेल खेला और उनको सहमति निर्माण में आंशिक सफलता मिली। कुछ राज्यों में भारतीय जनता पार्टी चुनाव हार गई। ये हिदुत्व के खिलाफ भी माहौल बनाते हैं लेकिन जब उग्र हिंदुत्व की पैरोकारी करनेवाली शिवसेना और कांग्रेस महाराष्ट्र में साथ मिलकर सरकार बनाती है तो इन कथित उदारवादियों के मुंह सिल जाते हैं, कलम खामोश हो जाती है। दरअसल ये इस तरह का भावनात्मक मुद्दा उठाते हैं कि जनता इनके झांसे में आ जाती है। ‘लव जिहाद’ जैसे मुद्दे को इन्होंने प्यार पर पहरे से जोड़ने की कोशिश की लेकिन जब उसका विकृत रूप लगातार समाज के सामने आने लगा तो उन्होंने बेहद चतुराई के साथ इस मुद्दे पर अपनी मुखरता कम कर दी। उदारवाद के नाम पर जिस तरह की स्वच्छंदता ये चाहते हैं वो भारतीय संस्कृति या परंपराओं के खिलाफ जाती है और हमारा समाज अभी इसको स्वीकृत नहीं करता है। 

अब जब पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु और पुडुचेरी में विधान सभा चुनाव हो रहे हैं तब इन कथित उदारवादियों ने एक बार फिर से प्रोपगैंडा के तहत सहमति निर्मित करने की कोशिशें आरंभ कर दी हैं। इस बार इन लोगों ने जो विषय उठाया है वो है ‘अकादमिक स्वतंत्रता’ का। अब ये आरोप लगा रहे हैं कि केंद्र सरकार केंद्रीय विश्वविद्यालयों से लेकर इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट (आईआईएम) और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (आईआईटी) तक के काम काज में दखल दे रही हैं और अपने विरोधियों को किनारे लगाने का संगठित काम कर रही है। हद तो तब हो गई जब इन लोगों ने एक निजी विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर के इस्तीफे को भी अकादमिक स्वतंत्रता से जोड़कर केंद्र सरकार पर आरोप लगाने शुरू कर दिए। दरअसल अकादमिक स्वतंत्रता का मुद्दा इनके लिए एक ऐसा प्रोपगैंडा है जिसकी आड़ में ये भारतीय जनता पार्टी के विरोधियों को फायदा पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। आज ये राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर शिक्षा जगत में हस्तक्षेप का आरोप लगा रहे हैं लेकिन ये लोग वो दिन भूल गए जब विश्वविद्यालयों में उनकी ही नियुक्तियां हुआ करती थीं जो लेफ्ट पार्टी के कार्ड होल्डर होते थे या उनके संगठनों के सक्रिय सदस्य हुआ करते थे। दिल्ली विश्वविद्यालय से लेकर देश के ज्यादातर सरकारी विश्वविद्यालयों ने वर्षों तक ये दौर देखा है। कई प्रतिभाशाली व्यक्तियों को सिर्फ इसलिए उचित जगह नहीं मिल पाई क्योंकि वो वाम का डंडा-झंडा लेकर नहीं चले। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद और ऐसे ही अन्य संस्थानों में किस तरह की अकादमिक स्वतंत्रता रही है ये अब पूरे देश को मालूम हो चुका है। नेशनल प्रोफेसरों से लेकर संस्थानों के अध्यक्षों तक की नियुक्तियों में क्या क्या हुआ है वो सब अभिलेखों में दर्ज है। इसलिए जब अकादमिक स्वतंत्रता की बात होती है तो वो खोखली लगती है। ‘कसेंट मैनुफैक्चरिंग’ के ये औजार अब भोथरे हो चुके हैं क्योंकि ये देश अब कथित उदारवादियों की इन चालों को समझ चुका है और उनके झांसे में आनेवाला नहीं है।