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Saturday, February 24, 2018

पौराणिक पात्रों पर लेखन की चुनौतियां


इन दिनों हिंदी से लेकर अन्य भारतीय भाषाओं के अलावा अंग्रेजी में भी पौराणिक कथाओं और चरित्रों के बारे में बहुत लिखा जा रहा है। महाभारत के पात्र, रामायण के पात्र और पुराणों में वर्णित घटनाओं, उपनिषदों के प्रसंगों के अलावा देवी देवताओं के प्रचलित और गैर प्रचलित किस्सों को केंद्र में रखकर दर्जनों उपन्यास लिखे जा चुके हैं और अब भी लिखे जा रहे हैं । पौराणिक कथाओं पर लिखनेवाले लेखकों की सूची बहुत लंबी है और हिंदी समेत अन्य भारतीय भाषा के पाठकों को उनके बारे में ज्ञात भी है। इसलिए उसको दुहराने का कोई अर्थ नहीं है। पहले भी लेखक पौराणिक कथाओं को अपने लेखन में विषय बनाते थे लेकिन वो अपेक्षाकृत कम होते थे। जैसे अगर हम देखें तो हजारी प्रसाद द्विवेदी, अमृतलाल नागर और आचार्य चतुरसेन शास्त्री के यहां भी इस तरह का लेखन मिलता है लेकिन उन्होंने योजनाबद्ध तरीके से बहुत ज्यादा नहीं लिखा। हिंदी के अलावा अन्य भारतीय भाषाओं में भी यही स्थिति थी। हिंदी में नरेन्द्र कोहली, मराठी में शिवाजी सावंत और अन्य भाषाओं में इसी तरह कम लेखक इस तरह के विषयों को उठा रहे थे या फिर पौराणिक चरित्रों पर लिख रहे थे। बहुतायत में लिखी जा रही इन पुस्तकों में हर लेखक अलग अलग तरीके से पौराणिक या मिथकीय चरित्रों को व्याख्यित करता है। उदाहरण के तौर पर अगर हम देखें तो अमीश ने राम-त्रयी के अपने उपन्यास सीता, मिथिला की योद्धा में सीता की एकदम अलग तरह की छवि गढ़ी है। उनको योद्धा के तौर पर सामने रखा। जबकि सीता की छवि सुकुमारी की रही है। अमीश ने सीता को लेकर कथा का जो वितान रचा है वो उनकी शोध और सोच का हिस्सा हो सकता है। उसमें रोचकता भी है, पढ़ते समय पाठकों के दिमाग में आगे क्या जैसी जिज्ञासा भी जगती है। लेकिन कई लोगों को अमीश के उस उपन्यास में सीता के चरित्र चित्रण को लेकर आपत्तियां भी हैं। होनी भी चाहिए। एक जाग्रत समाज से ये अपेक्षा भी की जाती है वो किसी कृति पर रचनात्मक आपत्तियां उठाए। इससे ही तो विमर्श की जमीन तैयार होती है,, संवाद का माहौल बनता है। लेकिन आपत्तियों का ठोस आधार होना भी उतना ही आवश्यक है।
अब प्रश्न यह उठता है कि पौराणिक कथाओं को लिखते हुए लेखक जब रचनात्मक छूट लेता है तो क्या वो परंपरा या इतिहास के साथ खिलवाड़ करता है या एक नया इतिहास गढ़ता है। इतिहास के साथ खिलवाड़ या नया इतिहास गढ़ने की बात पर विचार करने से लगता है कि इसके अलावा भी एक पक्ष है वो ये है कि कुछ लेखक बगैर इतिहास से खिलवाड़ किए बिना उपलब्ध प्रामाणिक या लिखित जानकारी के आधार पर पात्रों को समकालीन बनाने का जतन करते हैं। जैसे नरेन्द्र कोहली। कुछ लोग जनश्रुतियों के आधार पर, लोक में व्याप्त छवियों के आधार पर पौराणिक चरित्रों को व्याख्यायित करने की कोशिश करते हैं। जैसे देवदत्त पटनायक। कुछ लेखक अपने हिसाब से पौराणिक चरित्रों को गढ़ने की कोशिश करते हैं और कुछ लोग उससे भी आगे जाकर पौराणिक चरित्रों का अपनी विचारधारा के आधार पर आकलन करने लग जाते हैं। विचारधारा की कसौटी पर कसते हुए पौराणिक चरित्रों को या तो गिराने का लेखन किया जाता है या फिर खलनायकों को नायक बनाने की कोशिश की जाती है। इसका एक उदाहरण महाभारत का चरित्र कर्ण है। महाभारत के इस पात्र को शिवाजी सावंत ने अपनी कृति ‘मृत्युंजय’ में नायक के तौर पर स्थापित करने की कोशिश की है। वैसा नायक जो बुरा काम करते हुए भी समाज में नायक की प्रतिष्ठा हासिल करता है। लेकिन जब हम नरेन्द्र कोहली के ‘महाभारत’ पर लिखी कृतियों में कर्ण के चरित्र को देखते हैं तो वहां वो बेहद क्रूर और खलनायक नजर आता है। एक बार मैंने नरेन्द्र कोहली जी से प्रश्न पूछा था कि आपके यहां कर्ण इतना क्रूर और कुटिल क्यों दिखाई देता है, जबकि अन्य लेखक उसको वंचितों का प्रतिनधित्व मानते हुए सहानुभूतिपूर्वक उस चरित्र का चित्रण करते हैं। तब कोहली जी ने कहा था कि ‘उनका कर्ण महाभारत का वास्तविक कर्ण है।‘ उन्होंने कहा कि- ‘महाभारत में जो- दुर्योधन, दुशासन, शकुनि और कर्ण की चांडाल चौकडी है, उसका वो सबसे दुष्ट पात्र है। द्रोपदी का चीरहरण करने के लिए किसने कहा, कौन व्यक्ति था जो चाहता था कि वो राजपरिवार में रहे, राजकुमारों के बराबर रहे, धृतराष्ट्र उसको अपना पुत्र मान ले।‘ कोहली ने ये भी कहा कि ‘अगर हम महाभारत में चित्रित कर्ण के चरित्र को देखते हैं तो पाते हैं कि जितने भी युद्ध हुए उसमें सबसे पहले कर्ण भागता है, लोगों को ये मालूम महीं है, लोगों ने महाभारत को नहीं पढा है, लोगों ने इधर उधर की सुनी सुनाई बातें या बंबइया फिल्मों में कर्ण के चरित्र को देखा है या पारसी थिएटर में महावीर कर्ण, महादानी कर्ण वगैरह वगैरह देखा है जो कि मूल महाभारत के कर्ण से अलग है। पांडव जब वन में जाते हैं तो उनको चिढाने के लिए जाने का सुझाव किसने दिया, कर्ण ने। कर्ण ने द्यूत सभा में द्रौपदी को जो कहा है वो सुनिए, कर्ण ने युद्ध के समय शल्य को मद्र देश की स्त्रियों के विषय में जो कुछ कहा है, उससे उसकी घटिया सोच के बारे मे पता चलता है। इन दोनों बातों को पढ़ने से ही पता चल जाएगा कि कर्ण की स्त्रियों को लेकर सोच क्या थी। कितनी अपमानित करनेवाली बातें हैं उसको जानने के लिए महाभारत को पढ़ना आवश्यक है। और ये जो दलित या जाति आदि की बात होती है वो तो उस काल में था ही नहीं वो तो इस समय की बात है, चाहे उसको शिवाजी सावंत ने उठाया हो चाहे किसी अन्य लेखक ने। ये बातें आज की मानसिकता को उसपर आरोपित करना है। कर्ण तो राजपरिवार में पला, राजकुमारों के साथ पला.राजमहल में रहा, उसको कौन सी कमी थी सिवाए इसके कि वो धृतराष्ट्र का पुत्र कहला नहीं सका।‘
पौराणिक कथाओं में कल्पना का पुट लगाकर विपुल लेखन हो रहा है, फिक्शन में ये बातें उचित हो सकती हैं लेकिन जब आप किसी मूल ग्रंथ में वर्णित पात्रों के चरित्र को बदलने की कोशिश करते हैं तो लेखन पर सवाल उठने लगते हैं। होना यह चाहिए कि अगर जब लेखक किसी पौराणिक चरित्र को उठाता है और उसको मूल ग्रंथ का चरित्र बताता है तो लेखक को मूल चरित्र के निकट से निकट जाने की कोशिश करनी चाहिए। यह तो संभव है कि लेखक पौराणिक चरित्रों या कथाओं को सामयिकता, सार्थकता और प्रासंगिकता की कसौटी पर कसे, क्योंकि कोई भी रचना समय से मुक्त तो हो नहीं सकती है। लेकिन आधुनिकता के नाम या समकालीनता के नाम पर या नया लिखने के नाम पर जब मूल चरित्र को बदलने की कोशिश होती है तो वो हास्यास्पद हो जाती है।
पौराणिक चरित्रों को लेकर संकट सिर्फ लेखन में ही नहीं सार्वजनिक बातचीत में भी बहुत होती है। सीता और राम के संबंधों को लेकर बहुत सारे विमर्श होते रहते हैं। स्त्रियों के पक्ष में डंडा-झंडा लेकर चलनेवाले रचनाकार राम को सीता के घर से निकालने के प्रसंग को लेकर बहुधा सवाल खड़े करते हैं। लेकिन कुछ शोध ऐसे भी आए हैं जिनमें ये माना गया है कि राम द्वारा सीता की अग्नि परीक्षा और राज्य से बाहर निकालने की कथा वाल्मीकि रामायण में बाद में प्रक्षिप्त की गई है। इसका आधार यह माना जाता है कि अधर्म पर धर्म की विजय की कहानी तो रावण के वध के बाद ही समाप्त हो जाती है। तुलसीदास के रामचरित मानस में तो ये प्रसंग है ही नहीं। स्रावजनित विमर्श में कई बार जब राम को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश होती है तो कई संदर्भ इसी तरह से जोड़े घटाए जाते हैं। समग्रता में तर्क सामने नहीं आते हैं क्योंकि मूल ग्रंथ के चरित्र तक जाने और उसके जानने की कोशिश के बगैर ही किसी पात्र या चरित्र के बारे में राय बना ली जाती है। पौराणिक कथाओं पर लिखना या पौऱाणिक चरित्रों के बारे में लिखना बहुत सावधानी की मांग करता है, बहुत गहरे अध्ययन की मांग करता है। यहां लेखक को उसी तरह का संतुलन रखना पड़ता है जैसे नट रस्सी पर चलते हुए रखता है। जरा सी चूक उसको नीचे गिरा सकती है या जरा सी असावधानी से लेखक की साख धूल में मिल सकती है।

Saturday, May 20, 2017

हिंदी में मिथकों से परहेज क्यों?

साहित्य जगत में इन दिनों अमिष त्रिपाठी की किताब ‘सीता, द वॉरियर ऑफ मिथिला’, को लेकर उत्सुकता का माहौल है। सोशल मीडिया पर भी इस किताब को लेकर लगातार चर्चा हो रही है। पहले केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने लेखक अमिष त्रिपाठी के साथ घंटेभर की बातचीत इस किताब को केंद्र में रखकर की। दोनों की इस बातचीत को फेसबुक पर हजारों लोगों ने देखा। अमिष लगातार अपने पाठकों से सोशल मीडिया से लेकर हर उपलब्ध मंच पर चर्चा कर रहे हैं। कुछ दिनों पहले किताब का ट्रेलर जारी किया गया जिसमें सीता को योद्धा के रूप में दिखाया गया है। ट्रेलर देखकर और पुस्तक के शीर्षक को एक साथ मिलाकर देखने से अमी। ने सीता का जो चित्रण किया होगा उसके बारे में अंदाज लगाया जा सकता है । इन बातों की चर्चा सिर्फ इस वजह से कि लेखक अपनी किताब को लेकर बेहद सक्रिय हैं। हर तरह के माध्यम का उपयोग करके वो अपने विशाल पाठक वर्ग तक इसको पहुंचाने के यत्न में लगे हैं।  अमिष को मालूम है कि इस वक्त हमारे देश में खासकर अंग्रेजी के पाठकों के बीच मिथकीय चरित्रों के बारे में जानने पढ़ने की खासी उत्सकुता है। अंग्रेजी के पाठकों में मिथकों को लेकर जो उत्सकुता है उसने लेखकों के लिए अवसर का आकाश सामने रख दिया है। इस वक्त अंग्रेजी के कई लेखक अलग अलग मिथकीय चरित्रों पर लिख रहे हैं और तकरीबन सबकी किताबों की जमकर बिक्री हो रही है। अमिष की ही सीता पर आनेवाली किताब से पहले जब ‘इममॉरटल ऑफ मेलुहा’, ‘नागा’ और ‘वायुपुत्र’ प्रकाशित हुई थी तो उसने बिक्री के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे। ‘इममॉरटल ऑफ मेलुहा’ के प्रकाशन को लेकर भी बेहद दिलचस्प कहानी है ।  दो हजार दस में जब ये किताब पहली बार प्रकाशित हुई थी तो उसके पहले प्रकाशकों ने इसको करीब डेढ दर्जन बार छापने से मना कर दिया था। तमाम संघर्षों को बाद जब यह किताब छपकर आई तो इसने बिक्री के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए और इतिहास रच दिया। अमिष त्रिपाठी की इन किताबों के पाठक अब भी बाजार में हैं और उनकी लगातार बिक्री हो रही है। अमिष की इन किताबों का विश्व की कई भाषाओं में अनुवाद भी हो रहा है। अमिष त्रिपाठी देश के सबसे प्रतिष्ठित प्रबंधन संस्थान आई आई एम से पढे हैं और वित्तीय क्षेत्र की नौकरी के बाद लेखन में उतरे। लेखन की दुनिया में इतने रमे कि बस लेखक होकर रह गए। इसके पहले भी अशोक बैंकर ने रामायण पर एक पूरी श्रृंखला लिखी थी जो बेहद लोकप्रिय हुई थी। बहुत प्रामाणिकता के साथ कहना मुश्किल है लेकिन बैंकर को अंग्रेजी में मिथकों पर लोकप्रिय तरीके से योजनाबद्ध तरीके से लिखने की शुरुआत का श्रेय दिया जा सकता है।
अंग्रेजी में मिथक लेखन का इतना बड़ा बाजार है इसको सिर्फ अमीष की पुस्तकों की बिक्री से समझना उचित नहीं होगा। अश्विन सांधी ने भी अपने लेखन में मिथकीय चरित्रों को अपने तरीके से व्याख्यायित कर वाहवाही लूटी और देश के बेस्ट सेलर लेखकों की सूची में शामिल हो गए। उनकी कृति ‘सियासकोट सागा’, ‘चाणक्या चैंट्स’ आदि की जमकर बिक्री हुई। पिछले दिनों अश्विन सांघी से मुंबई लिट-ओ-फेस्ट में मुलाकात हुई थी। वहां सांघी ने अपनी पहली किताब छपने की बेहद दिसचस्प कहानी बताई। उन्होंने कहा कि एक दो बार नहीं बल्कि सैंतालीस बार प्रकाशकों ने उनकी किताब को रिजेक्ट किया था और बड़ी मुश्किल से उनकी किताब छप पाई थी। आज अश्विन सांघी अंतराष्ट्रीय स्तर पर मशहूर और प्रतिष्ठित लेखकों के साथ मिलकर लेखन करने में जुटे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि जिस लेखक को प्रकाशक जितना नकारते हैं वह उतना ही हिट होता है। अमिष की तरह की अश्विन सांघी भी कारोबार की दुनिया से ही लेखन की दुनिया में आए। एक और शख्स जो साहित्य की दुनिया की परिधि से बाहर था उसने भी भारतीय मिथकीय चरित्रों पर अंग्रेजी में लिखकर खासी शोहरत हासिल की, उनका नाम है देवदत्त पटनायक। देवदत्त पटनायक कुछ मायनों में अमिष और अश्विन से अलग तरह का लेखन करते हैं । देवदत्त पटनायक लोककथाओं या पूर्व में स्थानीय स्तर पर लोककथाओं के आधार पर जो लेखन हो चुका है, उसको अपने शोध का हिस्सा बनाकर प्रामाणिकता के साथ पेश करने की कोशिश करते हैं। इससे उनके बारे में यह धारणा बनती है कि वो अपनी रचनाओं को लोकेल के ज्यादा करीब ले जाते है लेकिन उनके लेखन पर बहुधा सवाल भी उठते हैं। बावजूद उसके वो लोकप्रिय हैं। देवदत्त पटनायक, अमिष त्रिपाठी, अश्विन सांघी के अलावा भी दर्जनभर से ज्यादा अंग्रेजी के लेखक अलग अलग मिथकीय चरित्रों पर लिख रहे है। पौराणिक कथाओं को अपने लेखन का आधार बना रहे है।
अब हमें इस पर भी विचार करना चाहिए कि अंग्रेजी में पौराणिक कथाओं, मिथकीय चरित्रों और प्राचीन ग्रंथों के पात्रों पर लिखकर लेखकों को प्रसिद्धि, पैसा, पहचान और प्रतिष्ठा मिल रही है लेकिन हिंदी में हालात बिल्कुल अलग हैं। अमिष त्रिपाठी रामचंद्र सीरीज में पहले ‘सियोन ऑफ इच्छवाकु’ लिख चुके हैं और ‘सीता’ उनकी दूसरी किताब है लेकिन उनको कोई रामकथा लेखक नहीं कहता है। ना ही इससे अमिष की प्रतिष्ठा और आय पर कोई असर पड़ा है। इसी तरह से केरल के इंजीनियर आनंद नीलकंठन ने भी रामायण और महाभारत को आधार बनाकर ‘असुर’ से लेकर ‘काली’ तक पर लेखन किया। उनके लेखन को सराहा गया। आनंद की किताबें खूब जमकर बिकीं, देश विदेश की पत्र-पत्रिकाओं ने उनपर उनके लेखन पर लंबे लंबे लेख छापे । लेकिन हिंदी में स्थिति इससे बिल्कुल उलट है। हिंदी में राम पर विपुल लेखन करनेवाले नरेन्द्र कोहली को विचारधारा विशेष के लेखकों और आलोचकों ने ‘रामकथा लेखक’ कहकर हाशिए पर डालने की कोशिश की। ये तो नरेन्द्र कोहली के लेखन की ताकत और निरंतरता थी कि उन्होंने अपना एक पाठकवर्ग बनाया जिसे विचारधारा से कोई मतलब नहीं था । नरेन्द्र कोहली को कभी भी तथाकथित मुख्यधारा का लेखक नहीं माना गया क्योंकि वो धर्म पर लिख रहे थे और किसी लेखक को मुख्यधारा का मानने या ना मानने का काम जिनके जिम्मे था वो धर्म को अफीम मानते रहे थे । कोहली जी को कभी भी साहित्य अकादमी पुरस्कार के योग्य ही नहीं माना गया। एक कार्यक्रम में जब मैंने यह सवाल उठाया तो वहां एक मार्क्सवादी आलोचक ने कहा कि अब यही दिन देखने को रह गए हैं कि कोहली जैसे लेखकों को साहित्य अकादमी मिलेगा। सवाल यही उठता है कि रामायण, महाभारत, विवेकानंद आदि पर विपुल लेखन करनेवाले नरेन्द्र कोहली को अकादमी पुरस्कार के योग्य क्यों नहीं माना गया, इसपर विमर्श होना चाहिए। साहित्य अकादमी के पास भूल सुधार का मौका है।  

नरेन्द्र कोहली जैसे बड़े लेखक को रामकथा लेखक कहने से हिंदी का नुकसान हुआ क्योंकि मिथकीय चरित्रों और पात्रों पर लिखने का काम हिंदी में कम हुआ। उऩ परिस्थितियों और उन लोगों को चिन्हित किया जाना चाहिए जिन्होंने हिंदी का नुकसान किया। नतीजा यह हुआ कि नए लेखकों ने विचारधारा के खौफ में उधर यानि मिथकीय लेखन का रुख ही नहीं किया। भगवान सिंह ने ‘अपने अपने राम’ लिखा पर उस कृति पर भी अच्छा खासा विवाद हुआ था। रमेश कुंतल मेघ ने ‘विश्व मिथक सागर’ जैसे ग्रंथ की रचना की है । रमेश कुंतल मेघ ने इस किताब को लिखने में कितनी मेहनत की होगी इसका अंदाज लगाना कठिन है। इस किताब पर हिंदी में ठीक से विचार नहीं हुआ है, आगे होगा इसमे मुझे संदेह है क्योंकि अकादमियों आदि में अब भी उसी विचारधारा वालों का बोलबाला है। फासीवाद-फासीवाद का हल्ला मचाकर वो अपने से अलग विचार रखनेवालों को बैकफुट पर रखते है। यह उनकी रणऩीति है जिसको समझने की जरूरत है। फासीवाद का हौवा खड़ा करके सामनेवाले को रक्षात्मक मुद्रा में लाकर अपना उल्लू सीधा करने की चाल बहुत पुरानी है, लेकिन जानते बूझते भी उसको रोकने का काम नहीं किया जाना भी दुर्भाग्यपूर्ण है। मिथकीय और पौराणिक चरित्रों पर लेखन करने से रोकने की प्रवृत्ति को समझना इसलिए भी आवश्यक है कि इस प्रवृत्ति से हिंदी का, हमारी पारंपरिक चिंतन पद्धति का विकास अवरुद्ध हो गया है। जो काम अंग्रेजी में या जो काम मलयालम में या तमिल में हो सकता है और वहां उसको प्रतिष्ठा मिल सकती है वो हिंदी में क्यों नहीं हो सकता है। हिंदी को अपनी परंपरा से अपनी विरासत से अपने समृद्ध लेखन से दूर करनेवालों ने साहित्य के साथ आपराधिक कृत्य किया है। इस कृत्य को करनेवालो को अगर समय रहते चिन्हित कर उनसे सवाल नहीं पूछे गए तो वह दिन दूर नहीं जब हिंदी के पाठक अपनी विरासत को जानने समझने के लिए दूसरी भाषा का रुख करने लगेंगे। वह स्थिति हिंदी के लिए बहुत विकट होगी और जो नुकसान होगा फिर उसको रोक पाना मुमकिन हो पाएगा, इसमें संदेह है।     

Saturday, February 18, 2017

हिंदी की ताकत का करार


बिहार की राजधानी पटना में आयोजित पुस्तक मेला हाल ही में संपन्न हुआ है । पुस्तक मेलों के लिहाज से देखें तो पटना पुस्तक मेला देश के बड़े पुस्तक मेलों में शुमार होता है । दिल्ली में आयोजित विश्व पुसतक मेला की ही तरह पटना में भी सांस्कृतिक कार्यक्रम और साहित्यक मसलों पर मंथन होता रहता है । पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में आयोजित इस पुस्तक मेले को पूरब का सांस्कृतिक कुंभ कहना गलत नहीं होगा । ग्यारह दिन चलनेवाले इस पुस्तक मेले को लेकर देशभर के साहित्यकारों में उत्सुकता बनी रहती है । सहभागिता को लेकर भी और हाय हुसैन सिंड्रोम को लेकर भी पुस्तक मेला चर्चा में रहता है । इस बार तो इस मेले ने सोशल मीडिया पर भी अपनी जबरदस्त उपस्थिति दर्ज करवाई । इसके पक्ष और विपक्ष में कमेंट्स लिखे गए । कुछ ऊलजलूल आरोप भी लगे । बावजूद इसके यह आयोजन खूब सफल रहा और अपने तेइसवें संस्करण में भी पाठकों का जबरदस्त प्यार इसको मिला। इस बार पटना पुस्तक मेले में दलित साहित्य से लेकर लेखन से गायब होते रोमांस तक की चर्चा हुई । नरेन्द्र कोहली से लेकर स्थानीय लेखकों ऋषिकेश सुलभ और आलोक धन्वा की भागीदारी रही ।  बच्चों को लेकर दिनभर पुस्तक मेले में कार्यक्रम हुए लेकिन इस बार पुस्तक मेले में एक ऐसी साहित्यक घटना घटी जिसकी अनुगूंज काफी लंबे समय तक साहित्य जगत में सुनाई देनेवाली है ।
हिंदी में इस बात को लेकर हमेशा से रोना रोया जाता है कि लेखकों को पैसे नहीं मिलते । हिंदी की किताबों की कम बिक्री को लेकर लेखकों और प्रकाशकों के बीच चिंता देखी जा सकती है । इस बात पर कमोबेश हर गोष्ठी आदि में रेखांकित किया जाता है कि हिंदी में खरीदकर पढ़नेवाले पाठक नहीं हैं । बहुधा प्रकाशकों और लेखकों के बीच संबंध खराब होने की वजह किताबों की रॉयल्टी ही बनती रही है । लेकिन पटना में जो हुआ वो हिंदी में एरर नई मिसाल कायम करनेवाला है । बिहार के सबसे पुराने प्रकाशकों में से एक नोवेल्टी प्रकाशन ने अपने स्थापना के पचहत्तर वर्ष पूरे होने पर अब साहित्यक प्रकाशन के क्षेत्र में कदम रखने का फैसला लिया है । ब्लूबर्ड नाम के नए प्रकाशन की शुरुआत के साथ ही नोवेल्टी प्लेटिनम सीरीज के तहत स्तरीय साहित्यक कृतियों के प्रकाशन की योजना बनाई है । संस्थान ने ऐलान किया कि थोक के भाव से साहित्यक कृतियों के प्रकाशन की बजाए वो साल में एक या दो ऐसी किताबों को छापेगा जिन्हें वृहत्तर पाठक वर्ग तक पहुंचाकर इस मिथक को तोड़ने का प्रयास होगा कि हिंदी में किताबें नहीं बिकती हैं । नोवेल्टी ने अपने इस नए उपक्रम नोवेल्टी प्लेटिनम के तहत पहली किताब चुनी है हिंदी के कथाकार, मीडिया विशेषज्ञ और संस्कृतिकर्मी रत्नेश्वर कुमार सिंह की । उनके उपन्यास रेखना मेरी जान को इस सीरीज के तहत प्रकाशित करने का एलान करते हुए नोवेल्टी ने रत्नेश्वर के साथ एक करोड़ पचहत्तर लाख के अनुबंध की घोषणा भी की । यह किसी भी भारतीय प्रकाशक के लिए किसी एक लेखक को दी जानी वाली अबतक की सबसे बड़ी राशि है । अनुबंध के लिए साइनिंग अमांउट के तौर पर रत्नेश्वर को ढाई लाख का चेक मेले के दौरान हुए प्रेस कांफ्रेंस में सौंपा गया । प्रकाशक ने रेखना मेरी जान की दस लाख प्रतियां बेचने का लक्ष्य रखा है । नोवेल्टी के अमित झा का दावा है कि उन्हें हिंदी की ताकत का एहसास है और उसके हिसाब से ही उन्होंने रत्नेश्वर की किताब को बेचने की रणनीति बनाई है । तीन अप्रैल से इस किताब की ऑनलाइन बुकिंग शुरू हो रही है और पांच अप्रैल से पाठकों के लिए उपलब्ध हो जाएगी । किसी एक किताब के लिए इस तरह की रणनीति और महात्वाकांक्षी लक्ष्य हिंदी में तो कम से कम पहली बार देखने को मिल रहा है । तमाम आशंकाओं को दरकिनार करते हुए लेखक और प्रकाशक दोनों मिलकर इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए जुटे हुए हैं । देशभर के हर शहर में इस उपन्यास को लेकर कार्यक्रम आदि करने की योजना है जिसमें लेखक की मौजूदगी होगी और वो अपने पाठकों से संवाद भी करेंगे ।

अभी कुछ सालों पहले ही अंग्रेजी के एक प्रकाशक ने शिवा त्रैयी पर उपन्यास लिखनेवाले अंग्रेजी के स्टार लेखक अमीष त्रिपाठी के साथ उनके आगामी उपन्यासों के लिए पांच करोड़ रुपए का करार किया था । उस करार में किताब, आडियो बुक और ई बुक्स का वैश्विक अधिकार भी शामिल था । अमिष के प्रकाशक ने उनकी किताबों की बिक्री को आधार बनाकर यह करार करने का दावा किया था । अमिष त्रिपाठी पहले से बेस्टसेलर रहे हैं और अंग्रेजी में किताबों का एक बड़ा बाजार पहले से रहा है । पर फिर भी अमिष त्रिपाठी के उस करार को लेकर बाद में कई विवादित बातें सामने आई थी । लेकिन हिंदी में एक किताब के लिए पौने दो करोड़ का करार परीकथा की तरह लगता है । हिंदी के लेखकों को इस करार पर यकीन करने में मुश्किल हो रही है । रत्नेश्वर का प्रतीक्षित उपन्यास ग्लोबल वार्मिंग को केंद्र में रखकर लिखा गया है । ग्लोबल वार्मिग जैसे बड़े विषय के बड़े कैनवास के बीच इस उपन्यास में एक बेहदद इंटेंस प्रेम कथा भी साथ साथ चलती है । ग्लोबल वार्मिंग जैसे गंभीर विषय के साथ प्रेम को जोड़कर कथा को आगे बढ़ानेवाले रत्नेशवर को उम्मीद है कि पाठकों को यह विषय बहुत पसंद आएगा । आत्मविश्वास से लबालब रत्नेश्वर कहते हैं कि जिस देश में करीब साठ करोड़ हिंदी भाषी हों वहां दस लाख किताबें बिकनी ही चाहिए और इसपर जो लोग सवाल खड़े कर रहे हैं उनको हिंदी की ताकत का एहसास नहीं है । उनको उम्मीद है कि रेखना मेरी जान के प्रकाशन के बाद एक बार फिर से हिंदी की ताकत स्थापित होगी । रत्नेश्वर पौने दो करोड़ रुपए के करार को लेकर उत्साहित तो थे लेकिन दिमाग सातवें आसमान पर नहीं है । एक उपन्यास के लिए पौने दो करोड़ का करार करने वाले पहले हिंदी लेखक बनकर रत्नेश्वर को अपनी जिम्मेदारी का एहसास है। वो कहते हैं कि इस करार के बाद उनसे हिंदी की ताकत को स्थापित करने की साथी लेखकों और पाठकों की अपेक्षा बहुत ज्यादा है । वो इस बात से पूरी तरह से मुतमईन हैं कि उनका उपन्यास हिंदी लेखन में एक कीर्तिमान स्थापित करेगा और उसकी प्रतिष्ठा उसको हासिल होगी । 

Sunday, May 15, 2016

मिथकीय चरित्रों से हिंदी को परहेज क्यों

एक तरफ जहां हिंदी साहित्य लेखन में एकरसता जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई है और लगभग एक ही ढर्रे पर कहानी, कविता और उपन्यास लिखे जा रहे हैं वहीं दूसरी तरफ अंग्रेजी में लिखनेवाले भारतीय लेखकों ने विषयों की विविधता को लेकर खासे प्रयोग किए । हिंदी में पुरातन भारतीय चरित्रों और मिथकीय चरित्रों पर लिखने को एक खास विचारधारा ने सांप्रदायिकता से जोड़ दिया उसी मिथकीय चरित्रों पर लिखकर अंग्रेजी के लेखकों ने ना केवल प्रसिद्धि पाई बल्कि करोड़ों रुपए भी कमाए । भगवान शंकर के चरित्र चित्रण को लेकर अमिष त्रिपाठी ने जितनी प्रसिद्धि पाई वो हिंदी के लेखकों के लिए फिलहाल तो अकल्पनीय नजर आती है । बाबा भोलेनाथ पर ट्रायोलॉजी लिखकर अमिष ने अंतराष्ट्रीय स्तर पर अपने लेखन की ना केवल पहचान बनाई बल्कि जमकर पैसे भी कमाए । उसकी इस सफलता के बाद एक प्रकाशन गृह ने उनसे करोड़ों रुपए अग्रिम देकर आनेवाली किताबों को छापने का अधिकार खरीदा था । तब देशभर के अखबारों में ये करार सुर्खियां बनी थी । हिंदी के विचारधारा युक्त साहित्यकार अमिष त्रिपाठी को लाख खारिज करें लेकिन उन्होंने अपना एक पाठक वर्ग तैयार किया और अपने तमाम साक्षात्कार में वो भगवान शंकर के व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं पर बात करते हैं । अमिष इस हिंदू देवी देवता पर बात करने से  बिल्कुल नहीं हिचकते हैं । उन्हें इस बात की भी चिंता नजर नहीं आती है कि हिंदू देवी देलताओं के चरित्र पर बात करनेवालों को संघी मान लिया जाता है । वो बेबाक होकर कहते हैं कि आज उनके पास जो कुछ भी है वो बाबा भोलेनाथ की कृपा से है । अंग्रेजी में सिर्फ अमीष त्रिपाठी ही नहीं हैं जो मिथकीय चरित्रों पर लिखते हैं । अभी हाल ही में देवदत्त पटनायक की एक किताब शिखंडी एंड अदर टेल्स दे डोंट टेल यू देखने को मिली । देवदत्त पटनायक भी लगातार भारतीय मिथकीय चरित्रों को अपने लेखन का विषय बनाते हैं । देवदत्त पटनायक हेल्थकेयर में नौकरी करने के बाद लेखन की ओर मुडे थे और उन्होंने शिव, विष्णु, हनुमान,लक्ष्मी भारत की देवियां स्वतंत्र रूप से किताबें लिखीं और उनकी सारी किताबें पाठकों ने खासी पसंद की । उनकी किताबों का हिंदी में भी अनुवाद हुआ और हिंदी के पाठकों ने भी अमिष के उपन्यासों की तरह पटनायक की किताबों को भी हाथों हाथ लिया । हमारे देश की युवा पीढ़ी बेहद चाव से इन मिथकीय चरित्रों को पढ़ना जानना चाहती है । अच्छी बात यह है कि इन लेखकों में कइयों ने इन मिथकीय चरित्रों को आधार बनाकर बाल साहित्य भी रचा । पटनायक की ही करीब आधा दर्जन किताबें बच्चों को ध्यान में रखकर लिखी गई हैं जो उनके बीच लोकप्रिय हैं । अब तो इन मिथकीय चरित्रों और उनके प्रबंधन कौशल को आधुनिक प्रबंधन से जोड़कर किताबें लिखी जा रही हैं । चाहे वो शंकर हों या विष्णु या कृष्ण का चरित्र ।क्राइसिस के दौरान उनके प्रबंधकीय कौशल को लेकर या संकट से निबटने के उनके सूत्रों को आधुनिक प्रबंधन सिद्धांत के तौर पर पेश कर किताबें लिखी जा रही हैं ।       
हिंदी साहित्य में स्थिति इसके बिल्कुल उलट है । हिंदी में नरेन्द्र कोहली ने राम पर लिखना शुरू किया तो उनको रामकथा मर्मज्ञ और आगे बढ़कर जब उन्होंने महाभारत पर अपने लेखन का फोकस किया तो उनको धार्मिक लेखक कहकर साहित्य की तथाकथित मुख्यधारा से अलग रखा गया । विपुल लेखन करनेवाले नरेन्द्र कोहली को लाखों पाठक तो मिले पर साहित्य अकादमी पुरस्कार के योग्य नहीं समझा गया । कोहली को आजतक उनके श्रम और लेखन के हिसाब से हिंदी साहित्य में वो प्रतिष्ठा नहींमिली जिसके वो हकदार हैं । उम्र के पचहत्तरवें पड़ाव को पार करने के बाद भी लगातार वो भारतीय पौराणिक मिथकीय चरित्रों को अपने लेखन का विषय बना रहे हैं । धर्म को अफीम मामने वाली विचारधारा को यह सोचना चाहिए कि इस सिद्धांत का प्रतिपादन करनेवाले को भारतीय मानस की ना तो समझ है और ना ही ये सिद्धांत भारत के लिए मुफीद है । विदेशी सिद्धांत को भारतीय साहित्य पर लागू करवाने की जिद ने धर्म और मिथक पर लिखनेवालों को दोयम दर्जे का लेखक करार देने की प्रवृत्ति बढ़ती चली गई । हिंदी और अंग्रेजी लेखऩ का ये अलग अलग चरित्र समझने की जरूरत है । दरअसल भारतीय अंग्रेजी लेखन किसी भी तरह की विचारधारा के अधिनायकवाद से स्वतंत्र है और वो विषयों को पाठकों की रुचि को ध्यान में रखकर चुनता और उसपर लेखन करता है । हिंदी की स्थिति अंग्रेजी से बिल्कुल उलट है यहां अब भी विचारधारा विशेष का दबदबा है और उसके दायरे से बाहर लेखन करनेवालों को हाशिए पर डाल दिया जाता है । ज्यादातर उन्हीं लेखकों को सम्मान और साहित्यक यश आदि मिलता है जो वितारधारा की बेड़ियों में रहकर लेखन करते हैं । विचारधारा के दायरे से बाहर लेखन करनेवालों को नीचा दिखाने की कोशिश होती रही हैं । इसका नतीजा यह रहा कि नए लेखकों मे सफलता के इस शॉर्टकट को अपनाया और विचारधारा युक्त लेखन की ओर प्रवृत्त होते चले गए । विषयों की विविधता के अन्वेषण की बजाए उन्हीं विषयों पर लिखा जो कि हिंदी साहित्य में स्वीकृत थी । नए लेखकों ने इलस चौहद्दी को तोड़ने की कोई कोशिश नहीं की । निर्मल वर्मा और अज्ञेय ने इस दायरे को तोड़ा तो उनको भी साहित्यक कॉमरेडों ने नहीं बख्शा । दिनकर को भी नहीं । अभी एक गोष्ठी में मैंने कविता में यथार्थ की खुरदरी जमीन पर पाठकों के लहूलुहान होते रहने का सवाल उठाया था । यह इस वजह से ही हुआ कि हिंदी के नए लेखक विषयगतत नवीनता की ओर उन्मुख नहीं हो पाए । उनके सामने नरेन्द्र कोहली, मिर्मल वर्मा, अज्ञेय और दिनकर का उदाहरण था । निर्मल वर्मा ने तो इस साहित्यक बेइमानी पर लिखा भी है – ‘जिस मार्क्सवादी ‘स्वर्ग’ का बखान हमारे हिंदी के अधिकांश लेखक, पत्रकार , बुद्धिजीवी बरसों से करते आए हैं, उसके भीतर झांकने की बौद्धिक ईमानदारी शायद ही किसी ने अपनी लेखकीय जिम्मेदारी समझ कर बरती हो । यह जानते हुए कि भी ‘राजा नंगे हैं’, अपनी आंखें मेदे रखना ही उन्होंने सुविधानक समझा । इससे उन्होंने दो सुख एक साथ प्राप्त कर लिए – वे राजनीति रूप से सही, ‘पॉलिटिकली करेक्ट’ भी बने रहे और सत्य बोलने के खतरों से भी बचे रहे ।...भारत के मार्क्सवादियों ने पिछले वर्षों में नए रंग पोतने और पुराने धब्बों को पोंछने में जो हस्तकौशल दिखाया, वह आश्चर्यजनक है ।‘ यहां निर्मल वर्मा साफ तौर पर संकेत करते हैं कि साहित्य में किस तरह से विचारधारा विशेष के लेखकों ने बेइमानियां की ।

अंग्रेजी में जिस तरह से भारतीय मिथकीय चरित्रों को केंद्र में रखकर लिखी गई किताबें युवा पाठकों को लुभा रहे हैं वो इस बात को साबित करते हैं आज की युवा पीढ़ी की रुचि धर्म की ओर बढ़ रही है । इसको इस तरह से भी कह सकते हैं कि आज हमारी युवा पीढ़ी जो अपनी संस्कृति के बारे में जानना चाहती है, उस विचारधारा को परखना चाहती है जो हमारे देश में पहले से मौजूद थी । हिंदी के लेखकों ने तो मराठी के लेखक शिवाजी सावंत से भी सीख नहीं ली । अगर हमारे लेखक मृत्युंजय की लोकप्रियता को ही देख लेते तो आज हिंदी का विस्तार कहीं अधिक हो रहा होता । आज इस बात का अफसोस भी है कि हमारी नई पीढ़ी बाबा भोलेनाथ, इच्छवाकु, राम, विष्णु जैसे चरित्रों को समझने के लिए अमिष त्रिपाठी और देवदत्त पटनायक को पढ़ने की जरूरत गो रही है । हिंदी में इनपर विपुल साहित्य मौजूद है लेकिन इनको धर्म की किताबें बताकर हाशिए पर डालनेवालों ने अमिष और देवदत्त जैसे लेखकों के लिए लेखन की उर्वरक जमीन तैयार की । आज हमें इस बात पर गंभीरता से विचार करना होगा कि हिंदी में मौजूज मिथकीय साहित्य अंग्रेजी के रास्ते फिर से अनुदित होकर हिंदी में आ रहा है और लाखों की कमाई कर रहा है । वहीं मूल हिंदी में इनको छापनेवाली संस्था गीता प्रेस बदहाली के दौर से गुजर रही है । क्या हिंदी उस औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त हो सकेगी । इन सवालों के साथ विचार तो इसपर भी किया जाना चाहिए कि हिंदी में मिथकीय चरित्रों पर लिखी गई पुस्तकों को पाठकों से दूर करनेवाले कौन लोग हैं । उनको साहित्य में चिन्हित कर उनसे भी इस बाबत जबाव मांगा जाना चाहिए । जबतक सार्वजनिक रूप से इस साजिश को बेनकाब नहीं किया जाएगा तबतक हिंदी साहित्य को उसका उचित हक नहीं मिल पाएगा ।