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Monday, January 20, 2025

सशक्त कहानी, दमदार अभिनय


फिल्म दीवार ने अमिताभ बच्चन की एंग्री यंगमैन की छवि को मजबूती प्रदान की। साथ ही एक लेखक जोड़ी को भी स्थापित किया जिसकी कहानी सफलता की गारंटी मानी गई। सलीम जावेद की जोड़ी ने जब फिल्म दीवार की कहानी लिखी तो पहले अमिताभ बच्चन को ही सुनाई। अमिताभ उस समय फिल्म गर्दिश की शूटिंग कर रहे थे। सलीम-जावेद ने फिल्म के सेट पर ही कहानी सुनाई थी। अमिताभ कहानी सुनकर अभिभूत थे। तीनों ने मिलकर तय किया कि इसपर फिल्म बनाने के लिए यश चोपड़ा से संपर्क किया जाए। सलीम-जावेद और अमिताभ, यश चोपड़ा के पाली हिल, बांद्रा के घर गिरनार अपार्टमेंट पहुंचे। इसी अपार्टमेंट में पहली बार यश चोपड़ा ने दीवार की कहानी सुनी। नैरेशन के समय निर्माता गुलशन राय भी थे। इस बात का उल्लेख मिलता है कि कहानी सुनाते सुनाते जावेद साहब अचानक रुकते और कहते कि फिल्म कम से कम 25 सप्ताह चलेगी। कहानी फिर आगे बढ़ती और जब रुकते तो सलीम साहब कहते कि इसपर बनी फिल्म कम से कम 50 सप्ताह चलेगी। इनकी बात सच हुई और कई शहरों में तो दीवार फिल्म 100 से भी अधिक समय तक चली थी। कहानी सुनने के बाद यश चोपड़ा और गुलशन राय दोनों को लगा था कि स्टोरी बहुत रूखी है और फिल्म में गाने होने चाहिए। निर्माता की राय पर फिल्म में गाने डाले गए। आप ध्यान से फिल्म देखेंगे तो लगेगा कि इन गानों की आवश्यकता नहीं थी। इंटरवल के बाद शशि कपूर और नीतू सिंह का जो गीत है उसका लाजिक समझ में नहीं आता है।  

निर्माता और निर्देशक के तय होने के बाद अभिनेताओं  के चयन पर बात आरंभ हुई । सलीम जावेद ने लीड रोल के लिए अमिताभ का नाम सुझाया। निर्माता गुलशन राय चाहते थे कि राजेश खन्ना को लिया जाए। वो एक फिल्म के लिए साइन खन्ना को अग्रिम भुगतान कर चुके थे। वो अपने पैसे की चिंता कर रहे थे। सलीम-जावेद इसपर राजी नहीं हुए। भूमिका अमिताभ को मिली। उनके भाई रवि की भूमिका के लिए लेखकों ने ही शशि कपूर को तैयार किया। स्क्रिप्ट सुनने के बाद शशि तैयार हो गए। उनकी भूमिका छोटी पर सशक्त थी। उनके बोले गए संवाद दर्शकों को खूब पसंद आए। संवाद की बात हो रही है तो कहना न होगा कि फिल्म दीवार का संवाद हिंदी फिल्मों में संवाद लेखन का शीर्ष है। इसके छोटे छोटे टुकड़े कई बार अब भी दोहराए जाते हैं। मैं आज भी फेंके हुए पैसे नहीं उठाता, मेरे पास मां है, या निरूपा राय का शशि कपूर को ये कहना कि भगवान करे कि गोली चलाते समय तुम्हारे हाथ नहीं कांपे जैसे संवाद बहुत ही पावरफुल हैं। ये फिल्म दर्शकों को मानसिक तौर पर झकझोरती है। जब एक बच्चे के हाथ पर ‘मेरा बाप चोर है’ लिख दिया जाता है तो उस बच्चे की मानसिक स्थिति की कल्पना की जा सकती है। फिल्म दीवार की कहानी में मदर इंडिया और गंगा जमुना का मिला जुला प्लाट नजर आते है लेकिन सलीम जावेद ने जिस तरह से कहानी का ट्रीटमेंट किया है वो इसको एकदम ही अलग जमीन पर लाकर खड़ा कर देता है। 

फिल्म दीवार के रिलीज होने के बाद ये प्रचारित किया गया था कि ये मुंबई के अंडरवर्ल्ड डान हाजी मस्तान के जीवन से प्रेरित है। समानता है भी। हाजी मस्तान ने भी मझगांव डाकयार्ड में कुली के तौर पर जीवन शुरु किया था। उसने भी वहां पठान गैंग की दादागीरी के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। फिल्म दीवार में भी विजय यही करता है। फिल्म दीवार के रिलीज होने के दौर को भी याद करना चाहिए। उस समय देश में छात्रों और युवाओं का असंतोष चरम पर था। जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में देश का असंतुष्ट युवा आंदोलनरत था। फिल्म में भी उस वक्त के युवा वर्ग का सिस्टम के प्रति गुस्सा और अपने बूते पर ही सब करना होगा की मानसिकता का प्रतिबिंब नजर आता है। इस कारण जब फिल्म रिलीज हुई तो युवाओं को उसमें अपनी कहानी नजर आई । वो इससे जुड़ते चले गए। फिल्म के अंत में कानून, न्याय और सत्य की जीत दिखाकर नैतिकता का पाठ भी पढ़ाया गया है।कुल मिलाकर अगर फिल्म के रिलीज होने के 50 वर्ष बाद आज विचार करें तो यही लगता है कि पावरफुल कहानी, सही स्टारकास्ट और यश चोपड़ा जैसे मंझे हुए निर्देशक के बदौलत ये कल्ट फिल्म बन गई। एक निर्देशक के तौर पर यश चोपड़ा को भी इस फिल्म से एक नई पहचान मिली, अमिताभ तो स्थापित हो ही गए।    


Thursday, March 11, 2021

जीवन का 'आनंद'


किसी भी फिल्म को अगर क्लासिक का दर्जा मिलता है तो उसके पीछे कई कारण होते हैं, कई लोगों की मेहनत होती है। फिल्म ‘आनंद’ को अगर आज 50 साल बाद भी लोग पसंद कर रहे हैं तो इसके पीछे कहानी, संवाद, निर्देशन, अभिनय, गीत, संगीत और संपादन का समुच्चय है। ‘आनंद’ एक ऐसी फिल्म है जिसके निर्माण को लेकर कई बेहद रोचक किस्से हैं। इस फिल्म के निर्देशक ह्रषिकेश मुखर्जी ने जब पहली बार एक कैंसर के युवा मरीज और उसके दोस्त को केंद्र में रखकर फिल्म बनाने की सोची थी तब उनके दिमाग में आनंद सहगल की भूमिका के लिए राज कपूर का नाम था। दोनों गहरे मित्र भी थे। तय भी हो गया था कि राज कपूर इस फिल्म में काम करेंगे। ये साल था 1955। लेकिन उसके बाद ह्रषिकेश मुखर्जी और राज कपूर की अन्य व्यस्तताओं की वजह से फिल्म का निर्माण टलता रहा। जब ह्रषिकेश मुखर्जी और एन सी सिप्पी ने फिल्म निर्माण के लिए हाथ मिलाया तो मुखर्जी ने सिप्पी को कैंसर मरीज वाली कहानी सुनाई। उनको कहानी बेहद पसंद आई। फिल्म पर काम शुरू हुआ। लेकिन तबतक राज कपूर की उम्र चालीस पार हो चुकी थी और वो युवा मरीज के रोल में फिट नहीं बैठ रहे थे। शशि कपूर के बारे में विचार चल रहा था कि एक दिन अचानक ह्रषिकेश मुखर्जी के घर राजेश खन्ना पहुंचे और इस फिल्म में काम करने की इच्छा जताई। मुखर्जी ने साफ तौर पर राजेश खन्ना को कहा कि वो उनकी फीस नहीं दे पाएंगे क्योंकि फिल्म का बजट बहुत कम है। तब राजेश खन्ना एक फिल्म के पांच लाख रुपए लेते थे। राजेश खन्ना ने कहा कि उनको फीस नहीं चाहिए इसके बदले में उनको बांबे(अब मुंबई) क्षेत्र में फिल्म वितरण का अधिकार दे दिया जाए। मुखर्जी ने कहा कि वो सिप्पी से बात करके बताएंगे। उनके घऱ से निकलने के पहले राजेश खन्ना ने उनसे एक वादा ले लिया कि अब वो शशि कपूर से बात नहीं करेंगे। इसी तरह से अभिनेता ओमप्रकाश ने अमिताभ बच्चन का नाम सुझाया था और अमिताभ से मिलने के बाद ह्रषिकेश मुखर्जी उनसे बहुत प्रभावित हुए थे। 

सिप्पी की स्वीकृति के बाद फिल्म की शूटिंग शुरू हो गई। राजेश खन्ना सेट पर हर रोज देर से आते थे। एक दिन जब राजेश खन्ना देर से आए तो ह्रषिकेश मुखर्जी भन्नाए हुए बैठे हुए थे। उन्होंने राजेश खन्ना को खूब खरी-खोटी सुनाई, कई पुस्तकों में इस बात का उल्लेख भी मिलता है कि उन्होंने खन्ना को जमकर गालियां भी दी और फिल्म बंद करने की घोषणा करके घर चले गए। राजेश खन्ना परेशान थे, परेशान तो बाकी के कलाकार भी थे ही। दो तीन दिन बाद इस फिल्म के ही एक और कलाकार रमेश देव ह्रषिकेश दा के घर पहुंचे। अपने साथ राजेश खन्ना को लेकर भी गए थे, बगैर ह्रषिकेश मुखर्जी को बताए। राजेश खन्ना को नीचे बैठकर वो दादा के पहली मंजिल के कमरे में पहुंचे और उनसे बातचीत करने लगे।बातचीत के क्रम में उन्होंने पूछा कि क्या वो सच में फिल्म बंद करना चाहते हैं? दादा बोले नहीं यार! मैं को ये सोच रहा हूं कि गुस्से में राजेश खन्ना को बहुत बुरा भला कह दिया, क्या वो फिर से फिल्म में काम करने को तैयार होगा। जब ये बात हो रही थी तो राजेश खन्ना पहली मंजिल पर पहुंच गए थे और कमरे के बाहर खड़े होकर सुन रहे थे। जैसे ही उन्होंने ह्रषिकेश मुखर्जी की बात सुनी तो कमरे में घुसे और जाकर दादा के चरण पकड़ कर फर्श पर लेट गए। कहने लगे कि क्षमा कर दीजिए अब कभी शूटिंग के लिए लेट नहीं करूंगा। ह्रषिकेश मुखर्जी पिघल गए। लेकिन राजेश खन्ना नहीं माने और बोले कि जबतक आप सिप्पी साहब को फिर से फिल्म शुरू करने के लिए फोन नहीं करेंगे तबतक वो पांव नहीं छोड़ेगे। दादा ने सिप्पी को फोन कर दिया और फिल्म फिर से शुरू हो गई। राजेश खन्ना दो तीन दिन तो समय से शूटिंग के लिए आए लेकिन फिर वही रवैया लेकिन तबतक मुखर्जी समझ चुके थे कि इस मसले पर कुछ हो नहीं सकता। राजेश खन्ना देर से आते रहे और शूटिंग चलती रही, फिल्म पूरी हो गई।

राजेश खन्ना इस फिल्म के नायक जरूर थे लेकिन पूरी फिल्म में ह्रषिकेश दा ने इस बात का ध्यान रखा कि कहानी पर नायकत्व हावी न हो सके। कहीं भी राजेश खन्ना अपने स्टाइल में अभिनय करते नजर नहीं आते हैं, न तो गरदन झटकते हैं न ही हाथ मोड़ कर अपने विशेष अंदाज में संवाद अदायगी करते हैं। 11 मार्च 1971 को फिल्म रिलीज हुई और आज पचास साल होने के बाद भी ‘आनंद’ को उतना ही प्यार मिल रहा है।  


Sunday, March 29, 2020

आपदा को अवसर में बदलते किरदार


इस वक्त पूरी दुनिया में एक तिलिस्मी वायरस कोरोना का खौफ जारी है। अपने देश में भी कोरोना की वजह से लॉकडाउन चल रहा है. आवश्यक सेवाओं को छोड़कर सबकुछ बंद कर दिया गया है। सड़कों पर सन्नाटा का साम्राज्य है लेकिन देश की जनता का मनोबल ऊंचा है। सबके मन में बस एक ही बात चल रही है कि कैसे इस वायरस को मात देनी है। कोरोना वायरस घातक है, जानलेवा है लेकिन हम भारतीयों के हौसले के आगे, हमारी दृढ़ इच्छाशक्ति के आगे, हमारे संकल्प की शक्ति के आगे उसका झुकना ही होगा। हम भारतीयों की इस ताकत का, दृढ़ इच्छाशक्ति का दर्जनों फिल्मों में चित्रण हुआ है। जहां फिल्म निर्देशकों ने अपनी फिल्मों के माध्यम से ऐसे चरित्रों को पेश किया है जो अपनी जिजीविषा के दम पर दर्शकों के दिलोदिमाग पर अमिट छाप छोड़ने में कामयाब हुए हैं.
ह्रषिकेश मुखर्जी की फिल्म ‘आनंद’ का आखिरी सीन है, जहां अस्पताल में अमिताभ बच्चन अपने दोस्त राजेश खन्ना को झकझोरते हुए कहते हैं ‘उठो आनंद उठो’ लेकिन वो तो चिरनद्रा में लीन हो चुके थे। ये चल ही रहा था कि कमरे में चल रहे टेप से एक आवाज आती है, ‘बाबू मोशाय! जिंदगी और मौत ऊपरवाले के हाथ है जहांपनाह, जिसे न तो आप बदल सकते हैं न ही मैं. हम सब तो रंगमंच की कठपुतलियां हैं जिनकी डोर ऊपरवाले की ऊंगलियों से बंधी हैं. कब कौन कैसे उठेगा कोई नहीं बता सकता है।‘ इसके बाद चंद पलों तक जोरदार ठहाका गूंजता रहता है। साउंड टेप टूटने के बाद आवाज रुक जाती है। फिर स्क्रीन पर गुब्बारा उड़ता है और बैकग्रुंड से आवाज आती है, ‘आनंद मरा नहीं, आनंद मरते नहीं।‘ हिंदी फिल्मों के इतिहास में इस फिल्म को इसके पात्र ‘आनंद’ की जिजीविषा के लिए याद किया जाएगा। राजेश खन्ना ने अपने शानदार अभिनय से ‘आनंद’ के चरित्र को जीवंत कर दिया था। ये चरित्र इतना सकारात्मक है जिसने अपने इस गुण से अपना इलाज कर रहे डॉक्टर तक की मानसिकता को बदल दिया। उसके अंदर की नकारात्मकता और निराशा को खत्म कर दिया। आनंद को पता था कि उसको कैंसर है और वो छह महीने से अधिक जिंदा नहीं रह सकेगा. बावजूद इसके वो अपनी जिंदगी को भरपूर जिंदादिली से जीता है। उसक इलाज कर रहे डॉक्टर भास्कर के मन में इस बात की निराशा होती है कि वो अपने सभी मरीजों को ठीक नहीं कर पाता है लेकिन जब वो आनंद के संपर्क में आता है तो उसमें बदलाव आता है और उसकी नकारात्मकता खत्म होने लगती है और जिंदगी को देखने का उसका नजरिया बदलने लगता है। आनंद मरा नहीं, आनंद मरते नहीं के जरिए इस फिल्म के निर्देशक ह्रषिकेश मुखर्जी समाज के एक संदेश देते हैं। इसको अगर इस तरह से व्याख्यायित करें कि आनंद (प्रसन्नता) मरा नहीं, आनंद (फिल्म का पात्र) मरते नहीं, तो संदेश साफ पकड़ में आ जाता है।
इसी तरह की अदम्य जिजीविषा वाले चरित्रों का चित्रण किया संजय लीला भंसाली ने अपनी फिल्म ब्लैक में। इसमें एक मूक बधिक लड़की और उसका संघर्ष तो है ही उसको शिक्षित करनेवाले शिक्षक का जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण भी है। इस फिल्म में बहुत छोटी बच्ची मूक बधिर बच्ची को जीवन का रंग सिखाने में लगे हैं। अमिताभ बच्चन ने जिस शिक्षक देवराज की भूमिका निभाई है वो खुद उम्रदराज और सनकी है । लेकिन तमाम अपमान सहते हुए भी एक दृष्टि बाधित लड़की को पढ़ाने का संकल्प लेता है, उसको पूरा भी करता है। जो लड़की बेहद आक्रामक थी वो भी इस अपने शिक्षक की प्रेरणा से सीखना शुरू करती है। लंभ संघर्ष के बाद मिशेल नाम की लड़की को स्नातक में दाखिला भी मिल गया। तमाम झंझावातों को झेलते हुए करीब बारह साल बाद वो बीए पास करती है। अपने अबिनय के गांभीर्य की वजह से रानी मुखर्जी ने दृष्टिबाधित लड़की के चरित्र को नई ऊंचाई दी है, उसके संघर्ष को यथार्थ के बेहद करीब ले गई। उधर अमिताभ बच्चन बढ़ती उम्र की वजह से अल्जाइमर की गिरफ्त में आ जाते हैं लेकिन कहते हैं न कि मुश्किल नहीं है कुछ भी अगर ठान लीजिए। इस फिल्म के अंत में भी आखिरी सीन में नेपथ्य से संवाद चलता है जिसमें रानी मुखर्जी कहती है, वो दुनिया का सबसे महान टीचर है, जिसने आज फिर से साबित कर दिया कि दुनिया में नामुमकिन कुछ भी नहीं, जिसने फिर से मुझे सिखाया कि दूसरों के लिए जीने को ही जीना कहते हैं। यहां भी फिल्म निर्देशक ने इस संवाद के जरिए पूरे समाज को एक संदेश दिया है और फिल्म के माध्यम से ये बताया है कि अंधेरा चाहे कितना भी घना हो लेकिन उम्मीद की किरण जलाकर उस अंधेरे को उजाले में बदला जा सकता है।
आज जब कोरोना की दहशत में लोग घरों के अंदर रहने को मजबूर हैं वैसे ही प्लेग की वजह से लोग पलायन को मजबूर हो गए थे। उसकी ही पृष्ठभूमि पर 1966 में एक फिल्म बनी थी ‘फूल और पत्थर’। इस फिल्म में बीमार शांति, जिसके किरदार को मीना कुमारी को ने निभाया है, के घरवाले अकेले छोड़कर चले जाते हैं। शाका, जिसकी भूमिका धर्मेन्द्र ने निभाई है, जो एक अपराधी की भूमिका में हैं जो उसी घर में घुसते हैं जहां के लोग बीमार शांति को मरने के लिए छोड़कर चले जाते हैं। फिल्म की कहानी कई मोड़ लेती है लेकिन अपराधी की भूमिका निभा रहे धर्मेन्द्र ने सबकुछ छोड़कर बीमार शांति की सेवा की और वो स्वस्थ हो गईं। फिर फिल्म में शांति के घर-परिवार का विरोध, समाज का विरोध आदि आदि है लेकिन इस फिल्म के माध्यम से निर्देशक ओ पी रल्हन ने साफ तौर पर ये संकेत दिया है मदद करनेवाला कोई भी हो सकता है। जान बचाने के लिए कोई भी आ सकता है। साथ ही ये संदेश भी है कि जीवन जीने की इच्छाशक्ति सबसे बड़ी दवाई है। इस संदेश को रल्हन ने शांति के चरित्र के माध्यम से रेखांकित किया है।
एक और फिल्म 1982 में बनी थी जिसे सुनील दत्त ने निर्देशित किया था, ‘दर्द का रिश्ता’। अगर हम इस फिल्म को ऊपरी तौर पर देखें तो इसमें कई इत्तफाक दिखाई देते हैं जो दर्शकों को चौंकाते हैं लेकिन ये फिल्म कैंसर जैसी बीमारी से लोहा लेने की और उसको मात देने की कहानी कहती है। सुनील दत्त, स्मिता पाटिल, रीना रॉय और खुशबू ने इस फिल्म में बेहतरीन अभिनय किया है। इसमें ग्यारह साल की बच्ची अपनी जन्म के साथ ही अपनी मां को खोती है, फिर ग्रह साल की उम्र में कैंसर दबोच लेता है. अपने डॉक्टर पिता के साथ भारत से लेकर अमेरिका तक के अस्पतालों में वो इस बीमारी से जूझती है। अपनी सकारात्मकता और खुशमिजाजी से सफलतापूर्वक मुकाबला करती है। कहने का अर्त ये है कि हिंदी फिल्मों में कई ऐसे किरदार गढ़े गए जिन्होंने विषम परिस्थितियों का डटकर मुकाबला किया। इनमें से कई चरित्र तो यथार्थ के बिल्कुल करीब हैं या फिर सत्य घटनाओं पर आधारित या उनसे प्रेरित हैं। जब भी इस तरह की फिल्में बनीं तो दर्शकों ने उसको खूब पसंद किया। धर्मेन्द्र-मीना कुमारी की फिल्म फूल और पत्थर कई सप्ताह तक सिनेमाघरों में चलती रही थीं, इसी तरह से ब्लैक ने तो पूरी दुनिया में ही धूम मचा दी थी। ‘आनंद’ और ‘दर्द का रिश्ता’ ने भी सफलता के कई कीर्तिमान स्थापित किए। कहना न होगा कि दृढ्ता और संकल्पशक्ति के साथ ना केवल आप निजी जिंदगी में सफल हो सकते हैं बल्कि आपदा को भी अवसर में बदल सकते हैं।   

Sunday, June 28, 2015

बेवजह बाजार का विरोध

साहित्य और बाजार, यह एक ऐसा विषय है जिसको लेकर हिंदी के साहित्यकार बहुधा बचते हैं या फिर मौका मिलते ही बाजार की लानत मलामत करने में जुट जाते हैं । बाजार एक ऐसा पंचिंग बैग है जिस पर हिंदी साहित्य के पुरोधा से लेकर नौसिखिया लेखक तक आते जाते मुक्का मारते हुए निकल जाते हैं । साहित्यकारों ने जिस तरह से बाजारवाद के विरोध का झंडा बुलंद किया हुआ है उससे साहित्य का लगातार नुकसान हो रहा है । बजाए इस नुकसान को समझने के अपने को साबित करने और खुद को आदर्शवादी साबित करने की होड़ में बाजार का विरोध जारी है । सार्वजनिक मंचों पर बाजार का विरोध करना बौद्धिक होने का इंस्टैंट लाइसेंस है, ठीक उसी तरह जैसे भारतीय जनता पार्टी और नरेन्द्र मोदी की आलोचना करना सेक्युलरिज्म का लाइसेंस है । राजनीति की बात अलहदा है लेकिन साहित्य में बाजारवाद के विरोध ने लेखकों की राह मुश्किल कर दी और नतीजा यह हुआ कि साहित्य को बाजार ने हाशिए पर डाल दिया । हाशिए पर जाने से यह हुआ कि किताबों की दुकानें और बिक्री लगभग खत्म हो गईं । इसका बड़ा नुकसान यह भी हुआ कि प्रकाशकों का ध्यान साहित्य से ज्यादा साहित्येतर किताबों की ओर चला गया है । अब कई प्रकाशक कहानी, कविता, उपन्यास आदि से इतर विधाओं की किताबों में ज्यादा रुचि लेने लगे हैं । उनका तर्क है कि साहित्य से ज्यादा साहित्येतर विषयों की किताबें बिकती हैं । संभव है । इस वक्त एक साथ साहित्य में कवियों की कई पीढ़ी सक्रिय है – कुंवर नारायण से लेकर बाबुषा कोहली तक लेकिन प्रकाशक हैं कि कविता संग्रह छापने को तैयार नहीं है । उनका साफ कहना है कि कविता का बाजार नहीं है, कविता संग्रह बिकते नहीं हैं । क्या यह स्थिति किसी भी भाषा के साहित्य के लिए उत्तम कही जा सकती है । कदापि नहीं ।  साहित्य को बाजार से अलग करने की ऐतिहासिक वजहें हैं । बाजार का विरोध करनेवाले कमोबेश वही लोग हैं जो पूंजीवाद का विरोध करते रहे हैं और पूंजीवाद का विरोध मार्क्सवाद के अनुयायी करते रहे हैं । साहित्य में लंबे समय तक और बहुत हद तक अभी भी मार्क्सवादियों का बोलबाला है, लिहाजा बाजार का विरोध होता रहता है । अगर हम वस्तुनिष्ठ होकर इस विरोध का आंकलन करें तो हमें इसमें बुनियादी दोष नजर आता है । लेखक लिखता है और फिर वो प्रकाशक को उसके छापने के लिए देता है । किताब के छपने के बाद प्रकाशक और लेखक दोनों की इच्छा होती है कि उसकी बिक्री हो । प्रकाशक अपने कारोबार के लिए तो लेखक पाठकों तक पहुंचने और बहेतर रॉयल्टी की अपेक्षा में बिक्री की इच्छा रखता है । अब देखिए विरोधाभास यहीं से शुरू हो जाता है वो लेखक जो बाजारवाद को पानी पी पी कर कोसता है वही अपनी किताब को उसी बाजार में सफल होना देखना चाहता है, उसी बाजार से बेहतर रॉयल्टी की चाहत रखता है । अब यह कैसे संभव है । आप जिसका विरोध करेंगे वही आपको फायदा पहुंचाएगा । बाजार की चाहत होने के बावजूद लेखकों ने बाजार का विरोध करना शुरू कर दिया, नतीजा यह हुआ कि बाजार ने भी लेखकों को उपेक्षित कर दिया और अंतत: साहित्य का नुकसान हो गया ।
बाजार का विरोध एक हद तक उचित हो सकता है लेकिन सुबह-शाम, उठते बैठते बाजार को गाली देने का फैशन नुकसानदेह है । जब मार्क्सवाद का प्रतिपादन किया गया था या उसके बाद जब कई देश उसके रोमांटिसिज्म में थे उस वक्त बाजार का विरोध उचित लगता था । कालांतर में मार्कसवाद की ज्यादातर अवधारणाओ को लोगों ने ठुकरा दिया लेकिन लेखकों ने बाजार का विरोध जारी रहा । आज के बदले वैश्विक परिवेश में बाजार एक हकीकत है, आप चाहें तो उसको कड़वी मान लें । इस हकीकत का विरोध कर या उससे ठुकराकर प्रासंगिकता बरकरार रखना लगभग मुश्किल सा है । हिंदी के लोगों को याद होगा चंद सालों पहले दक्षिण कोरिया की एक कंपनी ने साहित्य अकादमी के साथ मिलकर लेखकों को पुरस्कृत करने की एक योजना बनाई थी । साहित्यकारों ने इतना हो हल्ला मचाया कि उस कंपनी ने साहित्य से ही तौबा कर ली । पूंजीवाद और बाजारवाद का विरोध करनेवाले हिंदी के साहित्यकारों को धन्नासेठों से लखटकिया पुरस्कार लेने में संकोच नहीं होता है लेकिन अगर कोई बहुराष्ट्रीय कंपनी साहित्य के लिए कुछ करना चाहती है तो ये उनको साम्राज्यवाद, बाजारवाद. साहित्य को उपनिवेश बनाने की कोशिश आदि लगने लगता है । बाजार की हकीकत को स्वीकार करते हुए उसको साहित्य के और अपने हित में इस्तेमाल करने की कोशिश की जानी चाहिए । हमारे यहां तो साहित्य में तो जो एक सांचा बन जाता है, और अगर वो जरा भी सफल हो जाता है तो  चीजें या रचनात्मकता भी उसी में ढलती रहती हैं । वसुधा के फरवरी 1957 के अंक में हरिशंकर परसाईं ने ढलवॉं साहित्य शीर्षक से लिखा था– जैसे एक सांचे में ढले गहने होते हैं, वैसा ही कुछ साहित्य विशेष प्रकार के सांचों में ढलकर बनता है । सांचे में सुभीता होता है – सुनार को सोचने का काम नहीं करना पड़ता । सांचे में नुकसान भी है – एक किस्म का माल ढलता है, कारीगर की कला-प्रतिभा व्यर्थ चली जाती है, बदलती जनरुचि उसी के माल को कुछ दिनों बाद नापसंद करने लग जाती है ।‘  बाजारवाद के विरोध का भी यही हश्र हुआ पहले तो यह लोगों को लुभाता था, आकर्षक लगता था । क्रांति आदि की आहट महसूस होती थी लेकिन कालांतर में जनरुचि बदली लेकिन साहित्य के अलंबरदारों ने बाजारवाद के विरोध का सांचा नहीं बदला । लगातार उसी में माल ढलता रहा और कलाकार की कला प्रतिभा जनरुचि को पकड़ने में नाकाम रही । हरिशंकर परसाईं अपने उसी लेख में लिखते हैं- कई यथार्थवादी लेखक, यथार्थ जीवन में प्रवेश किए बिना, जनजीवन से सीधा और संवेदनात्मक संपर्क स्थापित किए बिना, एक सांचे पर ढलाई कर रहे हैं । इसमें मनुष्य कहीं दिखता नहीं है । कुछ समझते हैं कि सुर्ख मेंहदी, सुर्ख सूरज, लाल कमीज, सुर्ख धरती आदि लिख देने से यह प्रगतिवाद कहलाने लगेगा । या किसी ने किसी की प्रेमिका को ‘सुर्ख रूमाल’ भेंट दिलवाने-मात्र से क्रांति हुए बिना नहीं रहेगी । इन रचनाओं में ठप्पेदार शब्दों के सिवा कुछ नहीं रहता । जीवन तत्व गैरहाजिर ! संवेदना लुप्त !! बाजार और बाजारवाद का विरोध भी कुछ इसी तर्ज पर होता रहा है । अपने फायदे के लिए बाजार का विरोध वो भी उन्हीं घिसे पिटे तर्कों के आधार पर । यह तो नहीं कहा जा सकता कि बजार का विरोध करनेवाले साहित्यकार बदलते वक्त को नहीं पहचान पा रहे हैं लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि अपने फायदे के लिए बाजारवाद के विरोध की दुंदुभि बजाना नहीं छोड़ रहे ।
चालीस पचास सालों बाद अब स्थितियां कुछ बदलती नजर आ रही हैं । कुछ युवा लेखकों ने बाजार को ध्यान में रखकर किताबें भी लिखनी शुरू की हैं और उसको पाठक वर्ग तक पहुंचाने का उद्यम भी शुरू किया है । यह एक अच्छी सोच है और इसका समर्थन किया जाना चाहिए । अंग्रेजी में हमेशा से यह होता रहा है । मुझे याद आता है कि जब दो हजार सात में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के डेढ सौ साल हो रहे थे तो हिंदी के प्रकाशनों ने योजनाबद्ध तरीके से कई किताबें एक के बाद एक जारी की थीं । उससे लेखकों को भी लाभ हुआ और प्रकाशकों को तो हुआ ही । इसी तरह 26 जून को इमरजेंसी के चालीस साल हो रहे हैं । अंग्रेजी के प्रकाशकों ने उसको ध्यान में रखते हुए वरिष्ठ पत्रकार कूमी कपूर की किताब जारी कर दी । अब इस साल जब भी जहां भी इमरजेंसी की बात हो रही तो कूमी की किताब की चर्चा हो जा रही है । इससे किताबों का बाजार बनता है । हिंदी के प्रकाशक और लेखक दोनों इस तरह से योजना बनाकर किसी खास तिथि को ध्यान में रखते हुए ना तो किताब लिखते हैं और ना ही छापते हैं । बाजार को भुनाने के लिए योजनाबद्ध तरीके से काम करने की जरूरत है । स्वांत: सुखाय लेखन के बजाय बहुजन हिताय की ओर कदम बढ़ाने की आवश्यकता है । अंग्रेजी में दो चार किताबें लिखकर लेखक का जीवन चल जाता है लेकिन हिंदी में नहीं । क्यों । वजह साफ है । दीवार पर लिखी इबारत को भी अगर हम नहीं पढ़ पा रहे हैं तो यह सबकुछ देखकर अनदेखा करने जैसी स्थिति है । आज के युवा लेखकों को भी यह समझना होगा कि बाजारवाद का विरोध करके साहित्य के चंद मठाधीशों का आशीर्वाद उनको प्राप्त हो सकता है, कुछ प्रसिद्धि आदि भी मिल सकती है लेकिन पाठकों का प्यार नहीं हासिल हो सकता है । पाठकों तक पहुंचने का माध्यम बाजार ही है । अंग्रेजी में एक कहावत है – च्वाइस इज योर्स । तय कर लीजिए ।