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Thursday, May 18, 2017

अवसर की ताक में नीतीश कुमार

चारा घोटाले में सजायाफ्ता लालू यादव औपर उनके बेटे बेटियों के ठिकानों पर छापेमारी हुई। आरोप है कि उनके रेल मंत्री रहते हजार करोड़ रुपए के आसपास बेनामी संपत्ति उनके बेटों और बेटियों के नाम पर की गईं। यह तो जांच के बाद साफ हो पाएगा कि इन आरोपों में कितना दम है लेकिन लालू यादव एक बार फिर से भ्रष्टाचार के आरोपों में बुरी तरह से घिरते नजर आ रहे हैं। पटना में अस्सी लाख की मिट्टी खरीद का आरोप लालू यादव के बेटे पर लगा और उसके बाद तो दानापुर से लेकर दिल्ली तक में बेनामी संपत्ति की बात सामने आने लगी। शेल कंपनियों की मार्फत लेन-देन की बात भी सामने आ रही है। छापेमारी के बाद अब बिहार की गठबंधन सरकार को लेकर भी कयासबाज़ी का दौर शुरू हो गया है। इन अटकलों को लालू यादव के एक ट्वीट ने ही हवा दी जिसमें उन्होंने लिखा कि बीजेपी को नया साथी मुबारक हो। उनका इशारा साफतौर पर नीतीश कुमार की ओर था।
नीतीश कुमार की बीजेपी के साथ नजदीकियों की अटकलें समय समय पर जोर पकड़ती हैं। लेकिन लालू यादव को जल्द ही अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने दूसरे ट्वीट में सफाई दी। पहले ट्वीट और सफाई के बीच एक चतुर राजनेता की तरह उन्होंने नीतीश कुमार को संदेश दे दिया । दरअसल लालू यादव के ठिकानों पर छापेमारी के पहले की घटनाओं को जोड़कर देखें तो एक तस्वीर नजर आती है । संभव है कि ये तस्वीर दूर की कौड़ी हो। छापे के एक दिन पहले एक टीवी चैनल के कार्यक्रम में बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह ने एलान किया था कि उनकी सरकार भ्रष्टाचारियों को किसी कीमत पर छोड़नेवाली नहीं है । उस कार्यक्रम में उन्होंने ये भी कहा था कि भ्रष्टाचारियों पर कार्रवाई को लेकर मीडिया सरकार पर राजनीतिक बदले की भावना से काम करने का आरोप ना लगाए।
अमित शाह के इस बयान के पहले पटना में नीतीश कुमार से जब लालू यादव पर लग रहे आरोपों के बारे में पूछा गया तो उन्होंने साफ तौर पर कहा था कि अगर लालू यादव पर लग रहे आरोपों में दम है तो केंद्रीय एजेंसी से जांच करा लें। इन बयानों के अगले ही दिन लालू यादव के ठिकानों पर छापेमारी हुई। हो सकता है कि इन बयानों में कोई साझा सूत्र नहीं हो लेकिन इनके निहितार्थ तो ढूंढे ही जाएंगे। इनको जोड़कर देखा ही जाएगा। लालू यादव पहले से ही भ्रष्टाचार के आरोप में सजा काट रहे हैं, लिहाजा इन आरोपों की वजह से वो परसेप्शन की लड़ाई में पिछड़ते नजर आ रहे हैं। लालू यादव भले ही इसको सांप्रदायिकता के खिलाफ अपनी लड़ाई करार दें, लेकिन जनता के मन में शायद ही लालू के बयानों का असर हो। पहले हर बात में लालू यादव सामाजिक न्याय की दुहाई दिया करते थे, इन दिनों वो सांप्रदायकिता को अपनी राजनीति का आधार बनाना चाहते हैं। सामाजिक न्याय इन दिनों नेपथ्य में चला गया है। लालू यादव इस वक्त अपनी राजनीति के सबसे मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं। खुद सजायाफ्ता है, बेटों और बेटी पर संगीन इल्जाम लग रहे हैं। नीतीश कुमार के साथ चलना उनकी मजबूरी है। लेकिन नीतीश कुमार की कोई मजबूरी नहीं है। जब-जब लालू यादव या उनकी पार्टी के लोग नीतीश कुमार को आंख दिखाने की कोशिश करते हैं तो नीतीश कुमार एक महीन राजनीतिक चाल से सबको लाइन पर ले आते हैं। लालू यादव के ठिकानों पर छापे के बाद नीतीश कुमार ने बेहद सधा हुआ बयान दिया है।

नीतीश कुमार के बारे में कहा जाता है कि वो अपनी छवि को लेकर खासे सतर्क रहते हैं। इसके अलावा उनके प्रतिद्वंदी भी ये मानते हैं कि राजनीति में भविष्य को भांपने की कला में वो माहिर हैं। भविष्य को भांपकर ही उन्होंने राजनीति में अपने चिर प्रतिद्वंदी लालू यादव के साथ बिहार विधानसभा चुनाव के पहले गठबंधन कर लिया था। इस गठबंधन का लाभ भी उनको मिला। हो सकता है कि नीतीश कुमार को लग रहा हो कि अब अगले दस साल की राजनीति में बीजेपी का विरोध करके कोई फायदा नहीं है। वो जिस दिन अपने इस आंकलन से कन्विंस हो जाएंगे उस दिन उनको बीजेपी के साथ जाने में कोई संकोच नहीं होगा। दूसरे नीतीश कुमार अगर विपक्ष की राजनीति में अपनी जगह तलाशते हैं तो उनको ज्यादा से ज्यादा नंबर दो की हैसियत मिल सकती है, हलांकि ममता बनर्जी, नवीन पटनायक आदि के रहने से नंबर दो की पोजिशन हासिल करने में भी नीतीश को खासी मशक्कत करनी पड़ सकती है। विपक्षी एकता की धुरी इस वक्त कांग्रेस ही है और राष्ट्रीय पार्टी होने की वजह से उसका दावा भी यही होगा। अब राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी एकता कितनी हो पाएगी इसमें भी संदेह है। विपक्षी दलों के नेताओं और पार्टियों के अपने इतने अंतर्रविरोध हैं कि सबको एक साथ लाना लगभग टेढ़ी खीर है। यूपी में मायावती- अखिलेश को साथ लाना, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और वामपंथियों को साथ लाना आसान नहीं है। सबकी अपनी अपनी महात्वाकांक्षा है, सबके अपने अपने एजेंडे हैं, सबके अपने अपने सपने भी हैं। ऐसी परिस्थिति में नीतीश कुमार अगर बीजेपी के साथ जाते हैं तो कम से कम बिहार में उनके लिए किसी तरह की चुनौती नहीं होनेवाली है। दो हजार उन्नीस के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर बीजेपी भी चाहेगी कि उसको बिहार में नीतीश कुमार जैसा मजबूत और बेदाग छवि वाला सहयोगी मिले। सारी स्थितियां किसी नए समीकरण की ओर संकेत कर रही है। हो सकता है कि ये आंकलन अभी कालपनिक लगे लेकिन इस वक्त के माहौल में इनको काल्पनिक कहकर खारिज नहीं किया जा सकता है।    

Monday, April 10, 2017

मिट्टी घोटाले से आगे की कहानी

लालू यादव । एक जमाने में सामाजिक न्याय के मसीहा के तौर पर उभरे और जब रथयात्रा के दौरान लालकृष्ण आडवाणी को बिहार में गिरफ्तार किया गया तो उसके बाद से धर्म निरपेक्षता के भी चैंपियन माने जाने लगे । बिहार पर परोक्ष  प्रत्यक्ष रूप से करीब एक दशक से ज्यादा वक्त तक शासन किया । सामाजिक न्याय के उस दौर में मतदाताओं ने लालू यादव को अपार राजनीतिक ताकत दे दी थी । लालू यादव कहा भी करते थे कि वो किंग मेकर हैं । नब्बे के आखिरी दशक में गठबंधन सरकारों के दौर में यह माना जाता था कि लालू का जिसको समर्थन मिल जाएगा वो प्रधानमंत्री बन जाएगा ।  उस दौर मे लालू चालीस लिखकर लोग संसद तक में पहुंच गए थे । इतनी ताकत मिलने से लालू यादव दंभी भी हो गए थे । हमारे देश के प्रधानमंत्री रहे इंदर कुमार गुजराल ने अपनी आत्मकथा मैटर्स ऑफ डिस्क्रीशन, एन ऑटोबॉयोग्राफी में लालू से जुड़ा एक बेहद अप्रिय प्रसंग लिखा है । उस वक्त की बात है जब गुजराल बिहार से राज्यसभा का चुनाव लड़ रहे थे । राज्यसभा चुनाव के उस दौर में लालू यादव ने इंदर कुमार गुजराल को मिलने के लिए दिल्ली के बिहार भवन में बुलाया और बातों-बातों में ये इशारा किया कि राज्यसभा के चुनाव में पैसे खर्च कर वोट खरीदने होते हैं । झारखंड मुक्तिमोर्चा के विधायकों के हवाले से बात करते हुए लालू यादव ने गुजराल को ये संकेत दियाकि चुनाव जीतने के लिए उनको पैसों का इंतजाम करना होगा । गुजराल ने विनम्रतापूर्वक लालू के सांकेतित प्रस्ताव को टाल दिया। किताब में वर्णित प्रसंग के मुताबिक गुलजार के इस रुख से लालू यादव काफी खफा हो गए और लगभग चिल्लाते हुए गुजराल को अपने कमरे से बाहर निकाल दिया। बाद में वी पी सिंह के आग्रह पर गुजराल ने उस बातचीत को उस वक्त सार्वजनिक नहीं किया था ।
बाद में लालू यादव पर चारा घोटाले के आरोप लगे, कई बार जेल गए और फिर सुप्रीम कोर्ट ने उनकी सजा को बहाल रखा जिसके बाद से वो चुनाव लड़ने के अयोग्य है । लालू यादव ने पहले अपनी पत्नी राबड़ी देवी के माध्यम से राजनीति की और अब उनके दोनों बेटे बिहार सरकार में मंत्री हैं। तेजस्वी यादव तो उपमुख्यमंत्री हैं । हाल के दिनों मे लालू यादव के दूसरे बेटे तेज प्रताप यादव पर घोटाले के छींटे पड़े हैं । बीजेपी के नेता सुशील कुमार मोदी ने आरोप लगाया कि लालू यादव के बेटे ने अपनी कंपनी के माध्यम से लाखों की मिट्टी बगैर टेंडर के पटना के चिड़ियाघर को बेच दिया । चिड़ियाघर उनके विभाग के अंतर्गत ही आता है । पिता चारा घोटाले में सजायाफ्ता और बेटेपर मिट्टी घोटाले का आरोप । बिहार में राजनीति गर्माई हुई है । बीजेपी हमलावर है तो लालू यादव भी पलटवार कर रहे हैं । लेकिन यह मामला उतना आसान नहीं है । लालू यादव के दोनों बेटों और राबड़ी देवी के नाम पर इस दो एक एकड़ जमीन पर आरजेडी के ही एक विधायक पटना का सबसे बड़ा मॉल बनवा रहे हैं । माना जा रहा है कि इस पूरे प्रोजेक्ट की लागत करीब पांच सौ करोड़ है । यहां तक तो सब ठीक था लेकिन अब सुशील मोदी ने इस जमीन के ट्रांसफर को भी लालू यादव के रेल मंत्री के कार्यकाल के दौरान एक ठेके से जोड दिया है । हलांकि लालू इससे इंकार कर रहे हैं । लालू ने कहा कि दो हजार पांच में उनके सहयोगी प्रेम गुप्ता की कंपनी ने ये जमीन खरीदी थी । आरोपों के मुताबिक दो हजार आठ में राबड़ी देवी ने इस कंपनी को खरीद लिया और बाद में इसको अपने दोनों बेटों को दे दिया । लालू यादव का दावा है कि ये पूरा ट्रांजेक्शन पारदर्शी और कानून के मुताबिक हुआ है ।
अब सवाल यही उठ रहा है कि बिहार सरकार इस मसले पर क्या कर रही है । मिट्टी घोटाले के आरोपों की जांच तो हो रही है लेकिन इस जमीन के मालिकाना हक को लेकर जांच की जाएगी या लालू के इस वक्त के सहयोगी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार उनके तर्कों को मान लेंगे । या फिर कानून अपना काम करेगा जैसे जुमलों की आड़ में इस मामले को जांच के हवाले कर ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा । लालू यादव से जुड़े कुछ लोगों का दावा है कि बिहार बीजेपी में हाशिए पर चल रहे सुशील मोदी इन दिनों अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए लालू यादव पर उलजलूल आरोप लगा रहे हैं। संभव है । लेकिन क्या सुशील मोदी के आरोपों की जांच नहीं होनी चाहिए ।

अंग्रेजी में एक मुहावरा प्रचलन में है जो इतिहासकार लॉर्ड एक्टन ने 1887 में प्रतिपादित किया था- पॉवर टेंड्स टू करप्ट एंड एब्सोल्यूट पॉवर करप्ट्स एब्सोल्यूटली । यह बात कही तो काफी पहले गई थी लेकिन कई बार ये राजनीतिज्ञों पर लागू होती है । लालू यादव के केस में ही देखें तो जिस तरह से उन्होंने चारा घोटाला किया वो इस मुहावरे को सही साबित करता है । अब जब उनके दोनों बेटे एक बार फिर से सत्ता में हैं और उनके हाथ में सत्ता की ताकत है तो क्या एक बार फिर से इतिहास खुद को दोहराने के लिए तैयार बैठा है । क्या फिर से एक बार लॉर्ड एक्टन की उक्ति सही साबित होगी ।  

Tuesday, February 21, 2017

सियासत की विरासत से परहेज क्यों ?

अभी हाल ही में तमिलनाडू में जिस तरह का सियासी ड्रामा हुआ उसपर विराम तो लग गया है लेकिन अंदेशा इस बात का है कि ये विराम अस्थायी है । जयललिता की विरासत को लेकर पनीरसेल्वम और शशिकला के खेमे के बीच जोर आजमाइश के कई दौर अभी बाकी हैं । अम्मा की जगह चिनम्मा आ तो गईं लेकिन उनकी रहनुमाई कई अन्य नेताओं को मंजूर नहीं है । वो तो सुप्रीम कोर्ट ने शशिकला को जेल भेज दिया नहीं तो पलानीस्वामी की जगह वही तमिलनाडू की कमान संभालती । दरअसल यह पूरा खेल जयललिता की राजनीतिक विरासत पर कब्जे को लेकर है । जयललिता ने पार्टी में दूसरे नंबर का नेता बनाया ही नहीं या फिर किसी को इस तरह का दर्जा नहीं दिया । लिहाजा जब उनकी मृत्यु हुई तो एआईएडीएमके में उनकी विरासत को लेकर ड्रामेबाजी शुरू हो गई । दरअसल यह सिर्फ तमिलनाडू की सियासत में नहीं हुआ है । इस तरह के वाकए सभी राजनीतक दलों में देखने को मिलते हैं । हाल ही में इसका नमूना उत्तर प्रदेश में देखने को मिला था जहां मुलायम सिंह यादव की विरासत को लेकर उनके बेटे अखिलेश यादव और उनके छोटे भाई शिवपाल यादव के बीच तलवारें खिचीं थी । उपर से देखने पर ये भले ही अमर सिंह या फिर अन्य मसलों को लेकर अधिकारों की लड़ाई लगे लेकिन दरअसल ये पूरा झगड़ा मुलायम की विरासत पर कब्जे की जंग को लेकर है । अखिलेश को लगता है कि मुलायम सिंह यादव के पुत्र होने की वजह से उनकी सियासी विरासत पर उनका हक है, उधर शिवपाल सिंह यादव लगातार इस बात का संकेत देते रहते हैं कि नेताजी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर उन्होंने समाजवादी पार्टी को खड़ा किया है । जहां जहां कुनबा बड़ा है वहां सत्ता का ये संघर्ष भी बड़ा है और हर कोई अपने हिस्से को लेकर सजग और आक्रामक दिखाई देता है । इन दोनों दलों के अलावा अगर दो हजार तेरह और चौदह की देश की राजनीति पर नजर डालें तो उस दौर में भारतीय जनता पार्टी में भी नेतृत्व को लेकर अच्छी खासी मशक्कत हुई थी । नरेन्द्र मोदी अपनी कुशल रणनीति और मजबूत छवि की बदौलत भले ही बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व पर काबिज हो गए लेकिन उस वक्त भी लालकृष्ण आडवाणी के सियासी ड्रामे के बाद । गोवा में पार्टी की बैठक से लेकर लालकृष्ण आडवाणी के खत तक में यह संघर्ष देखने को मिला था । बीजेपी में नेतृत्वन की विरासत को लेकर उठा बवंडर की प्रकृति भले ही तमिलनाडू और उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी के तूफान से अलग हो लेकिन दोनों जगह विरासत ही सियासी अखाड़ेबाजी का आधार बनी ।
अभी भले ही एआईएडीएमके में जारी सियासी झगड़े पर डीएमके इपनी राजनीतिक गोटियां सेट करने में लगा है लेकिन अलग अलग मौके पर पांच बार तमिलनाडू में सत्ता संभालने वाले करुणानिधि के कुनबे में भी जो कलह हुआ था उसके पीछे भी वजह तमिल राजनीति के इस पुरोधा की राजीतिक विरासतत ही थी । करुणानिधि के बेटों अड़ागिरी और स्टालिन के बीच विरासत को लेकर जमकर झगड़ा हुआ था । एम के स्टालिन ने बहुत करीने से डीएमके कार्यकर्ताओं के बीच अपने को करुणानिधि के वारिस के तौर पर स्थापित करना शुरू कर दिया था उधर अड़ागिरी मदुरै और उसके आसपास के इलाकों में अपनी ताकत बढ़ाने में जुटे थे । दोनों के बीच के संघर्ष में करुणानिधि ने स्टालिन को चुना और अड़ागिरी पार्टी से बाहर हो गए । पारिवारिक सत्ता संग्राम में भाई भतीजों के बीच भी मलाई बंटती है और कालांतर में वो भी इस संघर्ष में इस या उस पक्ष के साथ हो जाते हैं । ये मुलायम परिवार में भी देखने को मिला और यही करुणानिधि के परिवार में भी रेखांकित किया जा सकता है । आंध्र प्रदेश की राजनीति में भी एन टी रामाराव की विरासत को लेकर उनके परिवार में संघर्ष हुआ था । एन टी रामाराव को तो उनके दामाद ने चंद्रबाबू नायडू ने ही मुख्यमंत्री की कुर्सी से अपदस्थ कर दिया क्योंकि उनको शक था कि एनटीआर अपनी दूसरी पत्नी लक्ष्मी पार्वती को सत्ता सौंपना चाहते थे । उस वक्त एनटी रामाराव के बेटों ने चंद्रबाबू का साथ दिया था लेकिन मुख्यमंत्री बनते ही को नायडू ने सबको किनारे लगा दिया । अब्दुल्ला परिवार के बेटों और दामाद के बीच सत्ता को लेकर विवाद हुआ था । कुछ दिनों पहले जब महागठबंधन ने बिहार विधानसबा चुनाव में बीजेपी को मात देकर सत्ता हासिल की तो लालू यादव के कुनबे में उनके बेटों और बेटी के बीच उपमुख्यमंत्री पद को लेकर मतभेद की खबरें आई थी । एक बेटे को उपमुख्यमंत्री बनाने के बाद दूसरे को मंत्री और बेटी को राज्यसभा में भेजकर इस झगड़े को सुलझाने का प्रयास किया गया लेकिन यहां भी यह कितना स्थायी है यह भविश्य के गर्भ में है ।   इन पार्टियों में इस तरह का झगड़े इस, वजह से भी होते हैं कि ये किसी एक शख्स के इर्दगिर्द चलनेवाले दल हैं और किसी विचारधारा से इनका बहुत लेना देना होता नहीं है । विचारधाराओं के आधार पर चलनेवाली पार्टियों में सत्ता संघर्ष का इतना वीभत्स रूप दिखाई नहीं देता है ।
कांग्रेस में विरासत को लेकर सियासी संघर्ष इस वजह से देखने को नहीं मिलता है क्योंकि इस पार्टी में ज्यादातर एक परिवार के लोग ही नेतृत्व देते रहे । इंदिरा गांधी को नेहरू और शास्त्री के निधन के बाद नेतृत्व के लिए कठिनाई का सामना करना पड़ा था और पार्टी टूटी भी थी । लेकिन परिवार के करिश्मे और इंदिरा गांधी के सियासी कौशल ने उनको स्थापित कर दिया था । कालांतर में जब राजीव गांधी की हत्या के बाद सोनिया ने राजनीति में नहीं आने का एलान किया था तब नेतृत्व की विरासत को लेकर एक बार पार्टी में फिर टूटी थी और नारायण दत्त तिवारी और अर्जुन सिंह ने कांग्रेस तिवारी बना ली थी । यह तो इतिहास है कि सोनिया के राजनीति में उतरने के फैसले के बाद सीताराम केसरी के साथ क्या हुआ था । जिस तरह से इन नेताओं की विरासत को लेकर जंग होती है वो कबीलाई सरदारों की जंग की तरह नजर आती है । फर्क सिर्फ इतना है कि कबीलाओं में सत्ता को लेकर हिंसक झगड़े हुआ करते थे लेकिन इस जंग में खून नहीं बहता है । सत्ता को लेकर सियासी दांव पेंच तो उसी तरह के चलते हैं ।
अगर हम इन पारिवारिक पार्टियों में जारी संघर्ष पर नजर डालें और उसके पीछे की वजहों का विश्लेषण करें तो यह साफ तौर पर नजर आता है कि सियासी विरासत के अलावा अकूत संपत्ति पर हक को लेकर भी ये झगड़े होते हैं । जिस तरह से हाल के दिनों में निजी कंपनियों का दबदबा देश में बढ़ा है या उनका कारोबार उन क्षेत्रों में भी फैला है जिनमें पहले सरकारी कंपनियों का एकाधिकार था, उसके बाद से क्षेत्रीय नेताओं पर आय से अदिक संपत्ति के मामले भी बढ़े हैं । राजनीति में पैसों का जो खेल होता है उसके केंद्र में हमेशा से नेता ही होता है और परिवार के लोगों को इसकी जानकारी होती है । राजनीति में पैसों के दबदबे से विरासत को लेकर संघर्ष सामने आता है । विरासत की जंग को रोकने के लिए यह आवश्यक है कि पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र को बढ़ावा मिले, हलांकि फिलहाल इसकी कोई सूरत नजर आ नहीं रही है । चुनाव आयोग ही अगर कोई कड़ा कदम उठा सके तो शुरुआत हो सकती है ।


Tuesday, March 11, 2014

राहुल गांधी के नाम खुला पत्र

आदरणीय श्री राहुल गांधी जी, लोकसभा चुनाव का ऐलान हो गया है और आपकी पार्टी हर हाथ को शक्ति देते हुए तरक्की करना चाहती है, मतलब यह है कि वो तीसरी बार विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की सत्ता पर काबिज होने का यत्न कर रही है । कांग्रेस ने इस लोकसभा चुनाव के मद्देनजर आपके कंधों पर उसे सत्ता तक पहुंचाने की जिम्मेदारी सौंपी है । आप भी प्राणपन से इस जिम्मेदारी को पूरा करने में लगे हुए हैं । पार्टी को सत्ता तक पहुंचाने के लिए आपकी पार्टी ने बिहार में लालू यादव से समझौता किया । आपको स्मरण दिला दें कि हाल ही में चारा घोटाले में राष्ट्रीय जनता दल के नेता लालू प्रसाद यादव को अदालत ने सजा सुनाई थी । वो जेल गए थे और फिलहाल जमानत पर बाहर हैं । लालू यादव चुनाव भी नहीं लड़ सकते हैं । आपको यह भी याद होगा कि पिछले साल सितंबर में आप अचानक दिल्ली के प्रेस क्लब पहुंचे थे और आपने दागियों को बचाने के सरकार के मंसूबे पर पानी फेर दिया था । आपने तब गुस्से में कहा था कि इस तरह के अध्यादेश को फाड़कर कूड़ेदान में डाल दिया जाना चाहिए । तब पूरे देश में आपके उस कदम की सराहना हुई थी और माना गया ता कि अगर कांग्रेस में पार्टी में आपकी चलेगी तो राजनीतिक शुचिता को तवज्जो मिलेगी । पर अफसोस राहुल जी, आपके उस गुस्से में दिए गए बयान का तात्कालिक असर तो अध्यादेश के रद्द होने में दिखा था लेकिन उसी सजायाफ्ता नेता का साथ लोकसभा चुनाव में गठबंधन करने से आप सवालों के घेरे में आ गए हैं । लालू यादव से गठबंधन के बाद आपके विरोधी आप पर राजनीतिक ड्रामेबाजी का आरोप भी लगाने लगे हैं । तो क्या यह मान लिया जाए कि आपने भी चुनावी गणित को ध्यान में रखते हुए अपने कदम पीछे खींच लिए हैं । राहुल जी, आप युवा हैं, देश को आपसे बड़ी उम्मीदें हैं । आप जब राजनीति में शुचिता की बात करते हैं तो पूरा देश आपको ध्यान से सुनता है । ज्यादातर लोग उसकी सराहना भी करते हैं । लेकिन यह क्या राहुल जी आपके फैसले का आपकी ही पार्टी में सिर्फ छह महीने तक सम्मान हो सका । आपको गंभीरता से विचार करना होगा । सोचना तो आपको यह भी चाहिए कि क्या पार्टी में अब भी वही होता है जो आप चाहते हैं या फिर आपको चेहरा बनाकर पार्टी आपका इस्तेमाल कर रही है और फैसले पर्दे के पीछे कांग्रेस के खुर्राट नेता लेते हैं जिनमें से कइयों को आपकी माता जी का आशीर्वाद प्राप्त है ।
राहुल गांधी जी, आप हमेशा सार्वजनिक तौर पर सिस्टम को बदलने की बात करते हैं । आप सिस्टम बदलने की बात इतनी बार कर चुके हैं कि लोग अब उस बदलाव की आपसे अपेक्षा भी करने लगे हैं । राहुल जी आप जिस पार्टी के उपाध्यक्ष हैं उसकी विरासत काफी समृद्ध है । महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में व्यवस्था में बदलाव की बात की थी और उन्होंने एक सभ्यता को एक राष्ट्र बनाने के लिए काम किया और उसमें सफलता हासिल की । उन्होंने एक सभ्यता को राष्ट्र बनाने के लिए अविभाजित भारत की सामाजिक और भौगोलिक स्थितियों को ध्यान में रखते हुए अपना एक विजन पेश किया था । गांधी ने एक भाषा के सिद्धांत को राष्ट्र की अवधारणा से अलग करने जैसा साहसिक कदम उठाया था । एक इस पूरे व्यवस्था को बदलने और वैकल्पिक व्यवस्था को लागू करवाने में गांधी को तकरीबन सत्ताइस साल लगे । उन्नीस सौ बीस के आसपास गांधी को व्यवस्था बदलने के उनके इरादों में जनता का समर्थन मिलना शुरू हुआ और उन्नीस सौ सैंतालीस में जाकर देश आजाद हुआ । जनता के समर्थन और अपनी अटल इच्छा शक्ति की बदौलत गांधी ने अपने सहयोगियों के साथ भारत को स्वतंत्रता दिलवाई । अंग्रेजों की गुलामी से आजादी दिलवाना व्यवस्था में बदलाव का एक बेहतरीन नमूना है । कम्युनिस्टों ने भी रूस और युगोस्लाविया में व्यवस्था परिवर्तन की कोशिश की लेकिन वह जोर जबरदस्ती के बल पर किया गया इसलिए दीर्घायु नहीं हो सका ।
व्यवस्था में बदलाव का दूसरा नमूना है भारत की चुनाव व्यवस्था । आपको ज्ञात होगा कि जब 1952 में पहली बार देश में लोकसभा का चुनाव हुआ था तो देश में तकरीबन साढे सत्रह करोड़ वोटर थे । पूरे चुनाव की प्रक्रिया में लगभग छह महीने लगे थे । उस वक्त निरक्षर मतदाताओं की संख्या तकरीबन पचहत्तर फीसदी थी, लिहाजा चुनाव चिन्ह का प्रयोग किया गया था। आगामी लोकसभा चुनाव में मतदाताओं की संख्या अस्सी करोड़ से ज्यादा है और चुनाव में लगनेवाला कुल वक्त अस्सी दिन है । यह एक क्रांतिकारी बदलाव है जिसको हासिल करने में चुनाव आयोग को आदी सदी का वक्त लगा । तो राहुल जी सिस्टम कोई कमरे का बल्ब नहीं है जिसे आप जब चाहें बदल दें । आप सिस्टम में बदलाव की बातें तो करते हैं लेकिन उसके लिए आप कोई विजन अबतक पेश नहीं कर पाए हैं । आप अपनी हर सभा में सूचना के अधिकार की दुहाई देते हैं । यह बात सही है कि इस कानून के बनने के बाद सरकारी कामकाज में पारदर्शिता आई है लेकिन राहुल जी जब इसी सूचना के अधिकार के तहत राजनीतिक दलों को लाने की बात होती है तो आप खामोश हो जाते हैं । संसद इस बाबत कानून में संशोधन कर देती है तो भी आप खामोश रहते हैं । आखिर क्यों । क्या आपकी इस खामोशी की वजह जानने का हक देश की जनता को नहीं है ।
राहुल गांधी जी आप भ्रष्टाचार के खिलाफ दिखने की कोशिश करते भी नजर आते हैं । आपकी स्वच्छ छवि, निर्दोष मुस्कुराहट और भ्रष्टाचार के खिलाफ आपका गुस्सा जनता को आप पर भरोसा करने की वजहें प्रदान करती हैं । आप भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कानून बनाकर उसको खत्म करने की वकालत करते रहते हैं लेकिन आप भ्रष्टाचार रूपी बरगद की जड़ को खत्म करने की बजाए उसकी टहनियों की काट छांट करना चाहते हैं । राजनीति शास्त्र के पंडितों का मानना है कि भ्रष्टाचार की एक अहम वजह चुनाव के दौरान अभियान और प्रचार पर पार्टियों द्वारा किया जाने वाला बेतहाशा खर्च है। राजनीति को बेहद नजदीक से अध्ययन करनेवालों का मानना है कि आजादी के छह दशक बाद भी राजनीतिक दलों के चुनाव खर्च का बड़ा हिस्सा औद्योगिक घरानों से आता है । आप इस बात को देश की जनता से बेहतर तरीके से जानते हैं कि औद्योगिक घरानों का कैसा पैसा राजनीतिक दलों के खजाने तक पहुंचता है । राजनीतिक दलों को पैसा मुहैया करानेवाले लोग कारोबारी हैं और चुनाव के वक्त किए गए निवेश से मोटा मुनाफा वसूलना जानते हैं ।
एक दूसरी प्रवृत्ति ने भी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को कमजोर किया है। सत्तर के दशक में इंदिरा गांधी की स्थिति मजबूत होने के बाद कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र खत्म हो गया । इसका नतीजा यह हुआ कि किसी भी तरह के भ्रष्टाचार के खिलाफ पार्टी के अंदर से आवाज आनी बंद हो गई । आपको पता होगा कि आपके दादाजी फिरोज गांधी ने संसद के अंदर उस वक्त की सरकार को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जमकर घेरा था । गौरतलब है कि जवाहरलाल नेहरू उस वक्त देश के प्रधानमंत्री थी और फिरोज गांधी उनके दामाद । यह पार्टियों में आतंरिक लोकतंत्र की खूबसूरती थी । लेकिन यह इंदिरा गांधी के वक्त खत्म हो गया । कांग्रेस की देखा-देखी अन्य दल भी इसी राह पर चल पड़े । भारत की मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी में इस वक्त तो ये हालात है कि सिर्फ और सिर्फ एक व्यक्ति फैसला ले रहा है और बाकी लोग उस फैसले का अनुसरण कर रहे हैं । तमाम क्षेत्रीय दलों में आंतरिक लोकतंत्र की बात सोचना भी बेमानी है । वो सारे दल एक व्यक्ति या परिवार के इर्द गिर्द सिमटे हुए हैं । ऐसी स्थिति में अगर उस परिवार का कोई भ्रष्ट हो जाता है तो फिर उसपर अंकुश लगानेवाला कोई बचता नहीं है । राहुल जी, आपने अपनी पार्टी के अनुषांगिक संगठनों में आंतरिक लोकतंत्र की शुरुआत की है । लेकिन आपका वह कदम ऊंट के मुंह में जीरे जैसा है । अगर आप सचमुच व्यवस्था में बदलाव करना चाहते हैं तो आपको कांग्रेस पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र बहाल करने की दिशा में कदम उठाना होगा । आपको अपने परनाना जवाहरलाल नेहरू की तरह पार्टी के अन्य नेताओं के विचारों को जगह देनी होगी ताकि नेतृत्व की किसी भी गलती पर पार्टी के नेता खुलकर अपने विचार रख सकें । अगर आप पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र बहाल करने और पार्टियों को मिलनेवाले चंदे को पारदर्शी बनाने में कामयाब हो जाते हैं तो ही आपकी व्यवस्था परिवर्तन की बातों में वजन आ जाएगा ।
राहुल गांधी जी, आप महिला सशक्तीकरण और समावेशी विकास की भी लगातार वकालत करते हैं । दोनों बातें सुनने में काफी अच्छी लगती हैं । आपकी पार्टी ने पिछले दस सालों से देश पर शासन किया । अगर महिलाओं के अधिकारों को लेकर आप सचमुच संजीदा होते तो संसद में उनके आरक्षण पर सार्थक पहल होती । आप यह तर्क नहीं दे सकते कि आपकी पार्टी पूर्ण बहुमत में नहीं थी लिहाजा आप इस तरह के क्रांतिकारी कदम नहीं उठा सकते थे । आपकी पार्टी ने अमेरिका के साथ परमाणु करार के वक्त और खुदरा बाजार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के फैसले के वक्त यह साबित किया था कि अगर इच्छाशक्ति हो तो संसद में बिल पारित करवाया जा सकता है । चलिए संसद में पास ना भी करवाया होता कम से कम कांग्रेस पार्टी इसको पास करवाने की कोशिश करती तो नजर आती लेकिन अफसोस आप सिर्फ अपने भाषणों से महिलाओं को सशक्त करवाना चाहते हैं । उसी तरह से समावेशी विकास और हर तबके तक विकास का लाभ पहुंचाने की आपकी तड़प की तारीफ करनी होगी लेकिन जब नतीजे को देखते हैं तो लगता है कि वहां भी सिर्फ हवाई किले बनाए जा रहे थे । राहुल जी आप शिक्षा की बात भी करते हैं लेकिन क्या आपको मालूम है कि प्राथमिक शिक्षा की क्या हालत है देश में । उच्च शिक्षा के क्षेत्र में एक केंद्रीय विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त करने में मंत्रालय को छह महीने लगते हैं । आपकी सरकार ने शिक्षा का अधिकार दिया लेकिन उसको लागू करने में वो पूरी तरह से नाकाम रही । राहुल जी अब बातें बहुत हो गई अब कड़े फैसले का वक्त आ गया है ।

Saturday, November 3, 2012

नीतीश पर साख का संकट

बिहार में सुशासन के रथ पर सवार होकर सत्ता के सिंहासन तक पहुंचे नीतीश कुमार की सूबे में हनक कम होती दिखाई देने लगी है । बिहार से जिस तरह की खबरें आ रही हैं उससे लगता है कि नीतीश कुमार के सुशासन का तिलिस्म दरकने लगा है । पहले मधुबनी में अफवाह की वजह से हिंसा और फिर पुलिस फायरिंग में मौत, उसके बाद पटना में दिन दहाड़े बमबाजी और अब उनकी पार्टी से जुड़े पूर्व विधायक और जेल में बंद बाहुबलि मुन्ना शुक्ला पर एक इंजीनियरिंग कॉलेज के एमडी से दो करोड़ की रंगदारी मांगने का मामला । सूबे के आला पुलिस अधिकारी ये मानते हैं कि प्रथम दृष्टया मुन्ना शुक्ला पर केस बनता है बावजूद इसके पटना की सड़कें मुन्ना शुक्ला के पोस्टरों से भरी है । ये दो करोड़ की फिरौती नीतीश कुमार के बहुप्रचारित अधिकार रैली के लिए मांगे जाने का आरोप है । लेकिन मुख्यमंत्री इस पूरे मामले में कानून अपना काम करेगा की मुगली घुट्टी पिलाकर अपना पल्ला झाड़ते हुए नजर आ रहे हैं । अपनी छवि को लेकर बेहद सतर्क  रहे नीतीश कुमार का किसी तरह की कार्रवाई नहीं करना हैरान करता है । इसके पहले बिहार के खगड़िया में भी नीतीश की यात्रा के दौरान जब विरोध प्रदर्शन हुआ तो वहां के बाहुबलि नेता और जेडीयू विधायक के पति रणबीर यादव ने पुलिस वालों के हाथ से गन लेकर फायरिंग की और फिर विरोध करनेवालों को दौड़ा दौड़ा कर पीटा । इस घटना की फुटेज कई दिनों तक बिहार के न्यूज चैनलों की सुर्खियां रहीं । रणबीर के खिलाफ कोई कार्रवाई ज्ञात नहीं है ।
अधिकार रैली के नाम पर जिस तरह से पटना की सड़कों पर बाहुबलियों के पोस्टर लगे हैं उससे ये लगता है कि नीतीश कुमार भी ये समझने लगे हैं कि बगैर बाहुलबलियों की मदद से रैली में भीड़ नहीं जुटाया जा सकता है । बिहार में पूर्व की रैलियों के व्याकरण को अगर समझने की कोशिश करें तो ये तस्वीर और साफ हो जाती है । नीतीश कुमार को चुनावों में जनता का अपार समर्थन मिला लेकिन पिछले दिनों उनकी यात्रा के दौरान जिस तरह से कई जगहों पर उनको काले झंडे दिखाए गए क्या उससे नीतीश का आत्मविश्वास हिल गया है । प्रतीत यही होता है और इसी हिले हुए आत्मविशवास का नतीजा है कि अपराधी और आपराधिक छवि के नेताओं की अधिकार रैली में मदद ली जा रही है । नहीं तो कोई वजह नहीं है कि पटना की सड़कों पर लगे होर्डिंग में नीतीश कुमार से बड़ी तस्वीरें अनंत सिंह और मुन्ना शुक्ला की लगी है ।
अपराधियों और बाहुबलियों के समर्थन से अधिकार रैली में भीड़ जुटाकर नीतीश हो सकता है अपनी ताकत का एहसास करवा दें लेकिन उससे उनकी लोकप्रियता में इजाफा होगा इसमें संदेह है । नीतीश कुमार बिहार में एक ऐसा नेता के तौर पर उभरे और स्थापित हुए जो अपराध और अपराधियों से नफरत करता था लेकिन अपनी राजनीतिक आकांक्षा की पूर्ति के लिए इन दिनों वो जिस तरह से अपराधिक छवि के दागदार नेताओं के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर रहे हैं उससे उनकी इस छवि को बट्टा लग रहा है । इसके पहले नीतीश कुमार ने अपराध और अपराधियों पर लगाम लगाने के लिए कई तरह के नतीजे देने वाले कदम उठाए । फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाकर अपराधियों को सलाखों के पीछे भिजवाने के बाद से बिहार में कानून का राज कायम होता दिखने लगा था । सैयद शाहबुद्दीन से लेकर पप्पू यादव जैसे बाहुबलियों को भी कानून और पुलिस की ताकत का एहसास करवा दिया गया था । सभी पार्टियों में मौजूद बाहुबलियों ने अपने आपको संयमित और नियंत्रित कर लिया था । लेकिन हाल के दिनों में फिर से वो संयम और नियंत्रण के खोल से बाहर निकलकर दबंगई पर उतारू हैं । राष्ट्रीय जनता दल के नेता ब्रजबिहारी की हत्या की सजा काट रहे मुन्ना शुक्ला की रैली के लिए दो करोड़ की रंगदारी मांगना इसी ओर संकेत करता है । लालू यादव के शासन काल में जेल में रहकर भी अपराधी अपना गिरोह बखूबी संचालित करते थे लेकिन नीतीश के आने के बाद से ये धंधा बंद हो गया था ।
दरअसल हमें इसको कानून व्यवस्था की समस्या के अलावा भारतीय राजनीति में आ रहे गिरावट और जनप्रतिनिधियों के लिए संविधान में समानता के मिले अधिकार को भी परखना होगा । भारत के पहले राष्ट्रपति और संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ राजेन्द्र प्रसाद ने अपनी आत्मकथा में लिखा है – लोकसभा और विधानसभा में जीतकर आने वाले जनप्रतिनिधियों, जिनपर शासन चलाने की जिम्मेदारी होती है, के लिए किसी विशेष योग्यता की जरूरत नहीं है । हर वयक्ति चाहे वो शैक्षणिक, चारित्रिक या अन्य रूप से चाहे जितना अक्षम हो उसे रोका नहीं जा सकता । हमारा संविधान सबको बराबरी का हक देता है । हम देश की बेहतरी की बात तो करते हैं लेकिन क्या हमने कभी देश को बेहतर तरीके से चलानेवालों के लिए कोई आर्हता तय की है । राजेन्द्र बाबू के मुताबिक संविधान में ऐसा प्रावधान इस वजह से नहीं हो सका क्योंकि किसी पश्चिमी देश में इस तरह का प्रावधान नहीं है और हमारा संविधान पश्चिम के कई देशों के संविधान का कॉकटेल है । राजेन्द्र बाबू ने इस बात की जोरदार वकालत की थी संविधान में इस तरह का प्रावधान होना चाहिए । लेकिन उन्होंने जनप्रतिनिधियों के लिए न्यूनतम आर्हता तय नहीं कर पाने के लिए उस वक्त के नेताओं की सोच को जिम्मेदार माना था । इस तरह की बात को संविधान में शामिल नहीं कर पाने के लिए राजेन्द्र बाबू उस वक्त के नेताओं के पश्चिमी देशों के प्रभाव में फैसले लेने की मानसिकता को जिम्मेदार ठहराते हैं । उनका मानना था कि इस तरह की मानसिकता पश्चिमी देशों की शिक्षा से बनी थी ।
लेकिन अब वक्त आ गया है कि राजेन्द्र बाबू के कथन पर गंभीरता से विचार हो और चरित्रवान और विषेषज्ञों के हाथ में सत्ता सौंपने का उपक्रम किया जाना चाहिए । नीतीश कुमार जैसे नेताओं से राजनीति में शुचिता की उम्मीद जगी थी लेकिन जिस तरह से क्षणिक सफलता के लिए नीतीश ने इन दिनों बाहुबलियों को बढ़ावा दिया है उससे शुचिता की ये उम्मीद तार तार हो गई है । यहां सवाल ये उठता है कि क्या अपनी अधिकार यात्रा के दौरान जनता के गुस्से और विरोध से नीतीश कुमार का जनसमर्थन से विश्वास हट गया और वो लालू यादव की राह पर चलने की सोचने लगे । लालू यादव ने भले ही पंद्रह वर्षों तक बिहार पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से राज किया हो लेकिन जनता ने वक्त आने पर उनको उनकी जगह दिखा दी । नीतीश कुमार लालू यादव की राह की ओर बढते दिख रहे हैं लेकिन उन्हें लालू यादव का हश्र भी नहीं भूलना चाहिए । लालू यादव को एक समय बिहार की जनता मसीहा के तौर पर देखती थी लेकिन सिर्फ राजनीति में अपराध और अपराधियों के घालमेल ने उन्हें बिहार की राजनीति में हाशिए पर पहुंचा दिया । नीतीश कुमार के लिए अब भी वक्त है कि वो अपनी इल गलती को सुधारें और बिहार की जनता ने जिस उम्मीद और अपेक्षा के साथ उनको शासन की बागडोर सौंपी थी उसको कायम रखें नहीं तो उनके भी राजनीति के बियावान में गुम हो जाने का खतरा है ।