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Sunday, December 10, 2017

प्रकाशन जगत में कॉरपोरेट की दस्तक

भारत में प्रकाशन जगत को उद्योग का दर्जा प्राप्त नहीं है, बहुधा हमारे हिंदी के प्रकाशक इस बात को अलग अलग मंचों पर उठाते भी रहते हैं कि प्रकाशन के लिए बैंकों से ऋण नहीं मिलता है। वहीं दूसरी तरफ कई प्रकाशकों का कहना है कि प्रकाशन जगत काराबोर नहीं हो सकता है क्योंकि ये उद्यम साहित्य सेवा है और इसमें लेखक-प्रकाशक परिवार की तरह काम करते हैं। इसका नतीजा यह है कि हिंदी में लगातार नए-नए प्रकाशन गृहों के खुलने के बावजूद ये इस व्यवसाय में लगभग असंगठित क्षेत्र जैसी स्थिति है। पिछले कुछ सालों से जब से भारत में विदेशी प्रकाशन गृहों ने अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई है तब से प्रकाशन जगत में भी हलचल शुरू हुई है। विदेशी प्रकाशन गृहों के आगमन के बाद तकनीक के विस्तार के बाद पारंपरिक तरीके से पुस्तकों के प्रकाशन के अलावा ई प्लेटफॉर्म पर पुस्तकों के प्रकाशन ने भी इस व्यवसाय को नए आयाम दिए। ई प्लेटफॉर्म पर पुस्तकों के प्रकाशन की वजह से बाजार की तरह की तरह की संभावनाओं की तलाश भी की जाने लगी। बाजार की संभावनाओं की तलाश में ही कुछ प्रकाशनगृह पूरी तरह से बाजार में उतरने के उपक्रम करने लगे हुए हैं। यहां चर्चा सिर्फ उन प्रकाशकों की हो रही है जिनको साहित्यक पुस्तकों का प्रकाशक माना जाता है। बाजार में उतरने की हिचक लगभग खत्म सी होने लगी है, बाजार की मांग के अनुरूप कुछ प्रकाशकों ने पुस्तकों का प्रकाशन शुरू कर दिया है। यह ठीक है उनको अभी उस तरह की स्वीकार्यता या पहचान नहीं मिली है लेकिन प्रयास को पहचान तो मिली ही है। ये आने वाले समय में तय होगा कि उनकी इस तरह की पहल कितने लंबे समय तक चलती है और साहित्य जगत में किस तरह का प्रभाव छोड़ती है। अभी किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।
पिछले दिनों एक खबर ने प्रकाशन जगत से जुड़े लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा। टेलीकॉम के क्षेत्र की अग्रणी कंपनी एयरटेल ने डिजीटल प्रकाशक जगरनॉट में हिस्सेदारी खरीदी है । एयरटेल के जगरनॉट में निवेश के बाद इस तरह की खबर आई कि एयरटेल ने ये निवेश डिजिटल प्लेटफॉर्म पर स्तरीय कंटेंट और गैर पारंपरिक लेखन को बढ़ावा देने के लिए किया है। जगरनॉट में पहले भी इंफोसिस से जुड़े नंदन नीलेकणि और बोस्टन कंसलटेंसी ग्रुप के इंडिया सीईओ नीरज अग्रवाल ने निवेश किया था। तब उस निवेश को व्यक्तिगत निवेश की तरह देखा गया था, था भी।
जगरनॉट में एयरटेल का निवेश एक सुखद संकेत की तरह है और इस बात की संभावना बनने लगी है कि प्रकाशन जगत में भी संस्थागत निवेश हो सकता है। हलांकि इस क्षेत्र से जुड़े लोगों का कहना है कि एयरटेल ने अपने फोर जी प्लेटफॉर्म पर कंटेंट उपलब्ध करवाने के लिए जगरनॉट में निवेश किया है । इससे ये हो सकता है कि एयरटेल को अपने पाठकों के लिए कंटेंट उपलब्ध करवाने और उसपर नजर रखने में मदद होगी। अप्रैल दो हजार सोलह में जगरनॉट लॉंच हुआ था और इस वक्त डिजिटल प्लेफॉर्म पर उसके एप का करीब दस लाख डाउनलोड हो चुका है। एंड्रायड और आईओएस दोनों प्लेटफॉर्म पर जगरनॉट मौजूद है। जगरनॉट ने जब हिंदी में अपना एप लॉंच किया था तब उसपर एक महीने तक साहित्यक कृतियां मुफ्त में उपलब्ध करवाई गई थीं। उस वक्त जगरनॉट के इस एप पर मौजूद कृतियों को देखकर इस बात का सहज अंदाज लगाया जा सकता है कि उनकी रणनीति क्या होगी।इस निवेश के बाद जगरनॉट को अपने कंटेंट को बेहतर करने का एक अवसर मिल सकता है।
जगरनॉट, खासतौर पर हिंदी में ज्यादातर उस तरह की रचनाओं को प्रमुखता दे रहा है जिससे पाठकों को अपनी ओर खींचा जा सके। उन रचनाओं की स्तरीयता को लेकर बहस हो सकती है। जिस तरह की कहानियां या छोटे उपन्यास जगरनॉट ने अपने इस एप पर डाले थे उसमें प्रकरांतर से यौन प्रसंगों को प्रमुखता दी गई थी । साहित्यक कृतियों में रीतिकालीन प्रवृतियों को आधुनिकता के छौंक के साथ प्रस्तुत कर पाठकों की बांधने की रणनीति थी जो उसके एप को डाउनलोड करवाने में काफी हद तक सफल भी रही। पता नहीं क्यों इस तरह की स्थिति भारत में खासतौर पर हिंदी में क्यों बन रही है कि यौनिकता को प्रमुखता देनेवालों को इटरनेट पर पाठक मिलते हैं। यह शोध का एक विषय हो सकता है।  
देश में इंटरनेट के बढ़ते घनत्व ने पाठकों तक पहुंचने का एक बड़ा अवसर हिंदी के प्रकाशकों और लेखकों को उपलब्ध करवाया है। पिछले एक दशक में देश में तकनीक का फैलाव काफी तेजी से हुआ है । मोबाइल फोन की क्रांति के बाद देश ने टू जी से लेकर फोर जी तक का सफर देखा और अब तो फाइव जी की बात होने लगी है। इसका फायदा उठाने की कोशिशें भी लगातार परवान चढ़ने लगी हैं । इस वक्त कई तरह के एप हैं जहां से हिंदी साहित्य की पुस्तकें सस्ते में खरीदी और पढ़ी जा सकती हैं। किंडल पर भी हिंदी समेत कई भारतीय भाषाओं की रचनाएं हैं। हिंदी के कई प्रकाशकों ने बेहद गंभीरता से ई प्लेटफॉर्म पर अपनी मौजूदगी दर्ज करवाई है और लगातार उसको मजबूत कर रहे हैं।
 आज से करीब पांच साल पहले पहले भी प्रकाशन जगत में इसी तरह की एक प्रमुख घटना घटी थी।  विश्व के दो बड़े प्रकाशन संस्थानों- रैंडम हाउस और पेंग्विन का विलय हुआ था। रैंडम हाउस और पेंग्विन विश्व के छह सबसे बड़े प्रकाशन संस्थानों में से एक थे । जब दोनों का विलय हुआ था तब यह माना गया था कि अंग्रेजी पुस्तक व्यवसाय के पच्चीस फीसदी राजस्व पर इनका कब्जा हो जाएगा । अगर हम विश्व के पुस्तक कारोबार खास कर अंग्रेजी पुस्तकों के कारोबार पर नजर डालें तो इसमें मजबूती या कंसॉलिडेशन का दौर काफी पहले से शुरू हो गया था । रैंडम हाउस जो कि जर्मनी की एक मीडिया कंपनी का हिस्सा है उसमें भी पहले नॉफ और पैंथियॉन का विलय हो चुका है । उसके अलावा पेंग्विन, जो कि एडुकेशन पब्लिकेशन हाउस पियरसन का अंग है, ने भी वाइकिंग और ड्यूटन के अलावा अन्य छोटे छोटे प्रकाशनों गृहों को अपने में समाहित किया था। जब पेंगिवन और रैंडम हाउस का विलय हुआ था तब अमेरिका के एक अखबार की टिप्पणी ने की थी- रैंडम हाउस और पेंग्विन में विलय उस तरह की घटना है जब कि एक पति पत्नी अपनी शादी बचाने के लिए बच्चा पैदा करने का फैसला करते हैं । उस वक्त पुस्तकों के कारोबार से जुड़े विशेषज्ञों ने माना था कि अमेजॉन और किंडल पर ई पुस्तकों की लगातार बढ़ रही बिक्री ने पुस्तक विक्रेताओं और प्रकाशकों की नींद उड़ा दी थी। माना गया था कि अमेजॉन के दबदबे से निबटने के लिए रैंडम हाउस और पेंग्विन ने साथ आने का फैसला लिया था। कारोबार का एक बेहद आधारभूत सिद्धांत होता है कि किसी भी तरह के आसन्न खतरे से निबटने के लिए आप अपनी कंपनी का आकार इतना बड़ा कर लें कि प्रतियोगियों को आपसे निबटने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़े । कारोबार के जानकारों के मुताबिक आनेवाले वक्त में पुस्तक कारोबार के और भी कंसोलिडेट होने के आसार हैं । अगर पुस्तकों के कारोबार पर समग्रता से विचार करें तो ई बुक्स की बढ़ती लोकप्रियता से पारंपरिक प्रकाशन पर असर पड़ सकता है। दरअसल जिन इलाकों में इंटरनेट का घनत्व बढ़ेगा उन इलाकों में छपी हुई किताबों के प्रति रुझान कम हो सकता है, ऐसा माना जा रहा है, हलांकि इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि छपी हुई किताबों का अपना एक महत्व है । पाठकों और किताबों के बीच एक भावनात्मक रिश्ता होता है । किताब पढ़ते वक्त उसके स्पर्श मात्र से एक अलग तरह की अनुभूति होती है  
हिंदी प्रकाशन जगत से जुड़े लोगों को समझना होगा कि भारत में भी इंटरनेट का घनत्व लगातार बढ़ता जा रहा है और उसके यूजर्स भी । ऐसे में अगर हिंदी प्रकाशन जगत को प्रोफेशनल तरीके से एक इंडस्ट्री के तौर पर उभरना है तो उसको भी जतन करने होंगे। पाठकों तक पहुंचने के लिए और अपने पाठकों की संख्या को दर्ज करने के लिए योजनाबद्ध तरीके से काम करना होगा। अगर हिंदी प्रकाशन जगत को संस्थागत पूंजी निवेश की दरकार है तो उसको और व्यवस्थित होना पड़ेगा। आज हिंदी के प्रकाशकों के पास जिस तरह का समृद्ध कंटेंट हैं, उसको लेकर बाजार में उतरने की जरूरत है। जिस तरह का साहित्य उनके पास उसको व्यापक पहुंच की जरूरत है और अगर एक बार ये पहुंच बन गई या व्यापक पाठक वर्ग तक पहुंचने का रास्ता बन गया तो फिर इस कारोबार में निवेश की अपार संभावनाएं हैं।


Tuesday, May 2, 2017

साहित्य का बढ़ता दायरा


हिंदी साहित्य में लंबे समय से पाठकों की कमी का रोना रोया जाता है। पाठकों की कमी को बहुधा साहित्यक कृतियों के वितरण की कमियों से जोड़कर भी पेश किया जाता है। यह माना जाता है कि रचनाएं हिंदी के विशाल पाठक वर्ग तक पहुंच नहीं पाती हैं। देश में इंटरनेट के बढ़ते घनत्व ने पाठकों तक पहुंचने का एक बड़ा अवसर हिंदी के प्रकाशकों और लेखकों को उपलब्ध करवाया है। पिछले एक दशक में देश में तकनीक का फैलाव काफी तेजी से हुआ है । मोबाइल फोन की क्रांति के बाद देश ने टू जी से लेकर फोर जी तक का सफर देखा और अब तो फाइव जी की बात होने लगी है। इसका फायदा उठाने की कोशिशें भी लगातार परवान चढ़ने लगी हैं । पहले डेली हंट नाम के एक एप पर साहित्यक कृतियां बहुत सस्ते में सुलभ हुई फिर किंडल पर हिंदी समेत कई भारतीय भाषाओं की रचनाएं ई बुक्स के फॉर्मेट में पेश की गईं। इस वैकल्पिक वितरण व्यवस्था ने हिंदी साहित्य के पारंपरिक वितरण व्यवस्था को मजबूती प्रदान की, ऐसा माना जाना चाहिए। साहित्यक कृतियां उन लोगों तक पहुंचने लगी जो कंप्यूटर, टैब और स्मार्ट फोन इस्तेमाल कर रहे थे। चंद सालों पहले सोशल मीडिया के बढ़ते कदम के मद्देनजर मोबाइल फर्स्ट का सिद्धांत प्रतिपादित किया गया था लेकिन अब तो वो आगे बढ़कर मोबाइल ओनली तक पहुंच गया है । यही वजह है कि - अब लगभग सभी कंपनियां स्मार्टफोन की स्क्रीन साइज बढ़ा चुकी हैं । एप्पल जैसा पारंपरिक ब्रांड भी स्क्रीन साइज बढ़ाने को मजबूर हो गया था । इसी तरह सोशल मीडिया में सक्रिय कंपनियों को हिंदी में अपार संभावनाएं नजर आईं । धीरे-धीरे सबने हिंदी को अपनाना शुरू किया । ट्विटर ने हैशटैग के लिए भी हिंदी समेत कई भारतीय भाषाओं को अपने प्लेटफॉर्म पर शामिल किया । अब हिंदी में किए गए ट्वीट ट्रेंड कर सकते हैं, करने लगे भी है । 
स्मार्ट फोन के बढ़ते चलन से पाठकों या दर्शकों को चलते फिरते पढ़ने/ देखने की आदत बढ़ने लगी । बाजार की भाषा में कहते हैं कि उपभोक्ता आन द मूव पढ़ना, देखना चाहता है । अब कृतियों को देखने पढ़ने का आधार यूजर का मूड हो गया ।  लेखकों का एक वर्ग इस मूड के हिसाब से भी लेखन करने लगा। साहित्यक कृतियों के बाजार और उस बाजार पर कब्जे को लेकर रणनीतियां बनने लगीं । अभी हाल ही में एक नए प्रकाशक जगरनॉट ने हिंदी में अपना एप लॉंच किया है। यह एप आईओएस और एंड्रायड दोनों प्लेटफॉर्म पर डाउनलोड किया जा सकता है। इस एप पर एक महीने तक साहित्यक कृतियां मुफ्त में उपलब्ध हैं। जगरनॉट के इस एप पर मौजूद कृतियों को देखकर इस बात का सहज अंदाज लगाया जा सकता है कि उनकी रणनीति क्या होगी। जिस तरह कि कहानियां या छोटे उपन्यास जगरनॉट ने अपने इस एप पर डाले हैं उसमें प्रकरांतर से यौन प्रसंगों को प्रमुखता दी गई है। साहित्यक कृतियों में रीतिकालीन प्रवृतियों को आधुनिकता के छौंक के साथ प्रस्तुत कर पाठकों की बांधने की रणनीति दिखाई देती है । इस एप के कर्ताधर्ताओं को लगता है कि इस तरह की कहानियां से उनके एप ज्यादा से ज्यादा डाउन लोड हो सकते हैं। संभव है उनकी यह रणनीति तात्कालिक रूप से सफल हो जाए लेकिन दीर्घकालीन सफलता में संदेह है।

जगरनॉट के पहले भी साहित्यक कृतियों को इस तरह के प्लेटफॉर्म पर पेश की गई थी। जैसा कि उपर संकेत किया गया है कि डेली हंट ने सात आठ साल पहले ही इसकी शुरुआत की थी। जहां बहुत सस्ती कीमत पर सुरेन्द्र मोहन पाठक से लेकर फैज तक की कृतियां उपलब्ध थीं। साहित्य की स्तरीय कृतियों की वहां भरमार थी। डेली हंट ने कालांतर में अपना नाम बदला और अब वो न्यूज हंट के नाम से मौजूद है। इसके अलावा प्रतिलिपि का भी अपना एक एप है जहां पाठक एंड्रायड प्लेटफॉर्म पर उसको डाउनलोड कर कहानियां और कविताएं पढ़ सकते हैं । साहित्य कृतियों की ऑनलाइन उपलब्धता बढ़ी है। यह साहित्य के लिए बेहतर स्थिति है। लेकिन अगर हम इस तरह के एप आधारित प्लेटफॉर्म के अर्थशास्त्र पर बात करें तो स्थिति बहुत आसान दिखाई नहीं देती है। आज ये समय में किसी भी उत्पाद का एप बनवाना बहुत आसान है। उस एप को उपभोक्ताओं के मोबाइल पर डाउनलोड करवाना और फिर उसको उनके मोबाइल में बनाए रखना बेहद कठिन और चुनौतीपूर्ण काम है। एप को डाउनलोड करवाने का काम तो कंपनियां कर रही हैं लेकिन उसको बनाए रखने का कोई तंत्र अभी विकसित नहीं हो पाया है। इस लिहाजा से देखें तो साहित्यक एप को पाठकों के मोबाइल या अन्य डिवाइस पर बनाए रखना बहुत मुश्किल है। अगर जगरनॉट या अन्य कंपनियां अपने एप को बनाए रखने में सफल रहती हैं तो यह साहित्य के लिए बेहतर स्थिति होगी। इससे हिंदी साहित्य का दायरा बढ़ेगा और पुस्तकों के संस्करणों की घटती संख्या की भारपाई हो सकेगी। हिंदी साहित्य के लेखकों की पहुंच भी विशाल पाठक वर्ग तक हो सकेगी ।    





Saturday, April 23, 2016

साहित्य में ग्लैमर का तड़का ·

सनी लियोनी और साहित्य । सुनकर कुछ अजीब लगता है क्योंकि एक एडल्ट फिल्मों की नायिका जो इन दिनों बॉलीवुड फिल्मों में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रही है, जो लगातार चाल साल तक गूगल में सबसे ज्यादा सर्च की जानेवाली शख्सियत रही हों, उनका साहित्य से क्या लेना देना । परंतु सनी लियोनी अब कहानीकार के तौर पर सामने आई हैं । दो दिनों पहले भारतीय प्रकाशन जगत में एक नए डिजीटल पब्लिशिंग हाउस ने दस्तक दी है, नाम है जगरनॉट । इसने शुक्रवार को इसकी शुरुआत सनी लियोनी की कहानियों से की है । जगरनॉट के मोबाइल ऐप पर अगले दस दिनों तक हर रोज रात दस बजे सनी लियोनी की एक नई कहानी अपलोड की जाएगी । सनी लियोनी के कहानी संग्रह का नाम स्वीट ड्रीम्स है और इसको उनकी छवि के हिसाब से ही प्रकाशक ने प्रचारित भी किया है । दरअसल खबरों के मुताबिक प्रकाशन संस्थान ने सनी लियोनी को अपने लांच के लिए साइन किया था और उसकी तारीख को ध्यान में रखकर कहानी संग्रह तैयार करवाया गया था । सनी लियोनी की कहानियों में प्यार होगा, रोमांस होगा और डिजायर भी होगा । इसके अलावा जगरनॉट के लेखकों में विलियम डेलरिंपल, श्वेतलाना एलेक्सविच, अरुंधति राय, पोलस्टर प्रशांत किशोर और हुसैन हक्कानी जैसे बड़े नाम शामिल किए गए हैं । अभी इस डिजीटल प्रकाशन गृह की शुरुआत करीब सौ टाइटल के साथ की गई है और इसकी भविष्य की योजना में और भी किताबें हैं । सौ में से करीब पचास किताबें इन्होंने खुद तैयार की हैं और बाकी पटास अन्य प्रकाशकों के साथ साझा समझौते के तहत जारी की गई हैं ।  जगरनॉट की योजना के मुताबिक वो पहले ई फॉर्मेट में किताबें प्रकाशित करेंगे और फिर पाठकोंके रेस्पांस के हिसाब से उसको किताब के रूप में प्रकाशित करेंगे । भारतीय प्रकाशन जगत के लिए ये ठीक उल्टी प्रक्रिया है । यहां तो पहले कोई भी कृति किताब के रूप में प्रकाशित होती है फिर बाद में उसका डिजीटल संस्करण जारी किया जाता है या ज्यादा से ज्यादा दोनों एक साथ ही जारी किए जाते हैं ।  
जगरनॉट का दावा है कि वो भारत की पहली एप आधारित डिजीटल प्रकाशन गृह है जो पाठकों को इतनी कम कीमत पर किताबें उपलब्ध करवा रही है । इस महात्वाकांक्षी योजना के अंतर्गत पाठकों के लिए पंद्रह रुपए रोज या फिर दो सौ निन्यानबे रुपए महीने की सदस्यता पर किताबें उपलब्ध की जाएंगी । अगर पाठक सदस्यता नहीं लेना चाहे तो निन्यानवे रुपए में किताबें उपलब्ध हैं जिसे डाउनलोड किया जा सकता है । दरअसल ये कहा जा सकता है कि प्रकाशन की दुनिया का ये स्टार्ट अप है जिसने मोबाइल यूजर के लिए उसकी सहूलियत को ध्यानमें रखते हुए उस फॉर्मेट में किताबों को पेश करने की योजना बनाई है । इस प्रकाशन गृह के पीछे पेंग्विन प्रकाशन की पूर्व एडिटर इन चीफ चिक्की सरकार और उनकी सहयोगी दुर्गा रघुनाथ हैं । अबतक इस स्टार्टअप में करीब पंद्रह करोड़ का निवेश हो चुका है । निवेशकों में नंदन नीलेकणी, फैब इंडिया के विलियम बिसिल और बोस्टन कंस्ल्टिंग ग्रुप के भारत प्रमुख नीरज अग्रवाल प्रमुख हैं । जगरनॉट का मानना है कि मोबाइल ऐप का जो इकोसिस्टम है वो पारंपरिक प्रकाशन से कम खर्चे पर चलता है । कम खर्चे की बात इस वजह से होती है कि ईबुक्स को एक बार तैयार करवाने में खर्च होता है बाकी तो उसके बाद जितने भी डाउनलोड होते हैं वो मुनाफा ही होता है ।  किताबों की तरह यहां नहीं है कि जितनी भी प्रति बिकेगी सबकी कुछ ना कुछ लागत होगी । संभव है तिक्की सरकार का अलग गणित हो लेकिन मोबाइल ऐप आधारित सभी कारोबार का इकोसिस्टम बेहद खर्चीला माना जाता है । स्टार्टअप बिजनेस के लिए किसी भी तरह का मोबाइव एप बनवाना बहुत आसान और सस्ता है लेकिन उस मोबाइल एप को डाउनलोड करवाना और फिर उसको रिटेन करवाना बहुत ही मुश्किल है । गूगल और फेसबुक भी छह सौ रुपए में एक ग्राहक बेचते हैं लेकिन उसको रिटेन करवाने का कोई फॉर्मूला उनके पास भी नहीं है ।  इंडस्ट्री के जानकारों का मानना है कि एक मोबाइल एप को डाउनलोड करवाने का खर्च लगभग पांच सौ रुपए आता है और उसको ग्राहक अपने मोबाइल में कब तक रखेगा इसकी कोई गारंटी नहीं है । भारत में मोबाइल के ग्राहकों की विशाल संख्या को देखते हुए वेंचर कैपिटलिस्टों को और स्टार्टअप को यहां एक बड़ा बाजार नजर आता है । वो भूल जाते हैं कि ज्यादातर स्मार्टफोन में मेमोरी बहुत कम होती है और ग्राहक अपने मोबाइल में खरीदारी के एप को ज्यादा से ज्यादा दो की संख्या में रखते हैं, नए डाउनलोड करते हैं तो पुराने हटा देते हैं ।  ये पूरा बिजनेस ट्रांसेक्शन की संख्या पर भी निर्भर करता है । जगरनॉट ने तो मोबाइल वैलेट कंपनी पेटीएम के साथ भी करार किया है । इस करार के मुताबिक कोई भी ग्राहक जिसके पास पेटीएम का ऐप है वो उसके जरिए भी जगरनॉट के ऐप तक पहुंच सकता है । जगपनॉट को पेटीएम के मोबाइल ग्राहकों की संख्या पर भी भरोसा है कि उनके जरिए किताबों की बिक्री हो सकेगी । ये तो आनेवाला वक्त ही तय करेगा कि मोबाइल वैलेट के लोग कितना पैसा किताबों के लिए निकालते हैं ।  दरअसल हमारे देश में हाल के दिनों में ग्रॉसरी से लेकर सब्जी तक के स्टार्टअप खुलते जा रहे हैं और उसी रफ्तार से बंद भी हो रहे हैं । मोबाइल एप पर आधारित इस तरह की ज्यादातर कंपनियां घाटे में चल रही हैं । घाटे में चल रही इन कंपनियों के लिए वेंचर कैपटलिस्ट की पूंजी प्राणवायु का काम तो करती है लेकिन ये दीर्घकालीन हल नहीं देते हैं क्योंकि वेंचर कैपटलिस्ट पहली बात तो इक्विटी से अपना घाटा पूरा करते हैं और फिर कंपनी की वैल्यूएशन के आधार पर उसको मौका मिलते ही बेच देते हैं । किसी भी कारोबार को शुरू करने और उसकी सफलता के लिए माना जाता है कि आपको अपने प्रोडक्ट के बारे में औरों से बेहतर जानकारी हो, आपको अपने ग्राहकों के स्वभाव और उनकी खरीदारी के पैटर्न का बेहतर अंदाजा हो और कारोबार को सफल करने का ख्वाब हो । लेकिन स्टार्टअप में एक और चीज जोड़ी जानी चाहिए कि कारोबारी को इस बात का भी इल्म हो कि उसके ट्रांजेक्शन कैसे बढ़ाए जा सकते हैं । चिक्की सरकार को अपने प्रोडक्ट के बारे में बेहतर ज्ञान है और पेटीएम के विजय शेखर शर्मा खरीदारी के पैटर्न का अंदाज है । विजय शर्मा भी जगरनॉट के सलाहकार हैं तो ये उम्मीद की जानी चाहिए कि ये स्टार्टअप सफल होगा । साहित्य जगत के लिए भी इसका सफल होना बेहतर होगा ।

दिसंबर दो हजार पंद्रह तक भारत में मोबाइल पर इंटरनेट इस्तेमाल करनेवाले तीस करोड़ छह लाख ग्राहक थे और इंडस्ट्री के अनुमान के मुताबिक ये इक्कीस फीसदी की दर से बढ़कर जून दो हजार सोलह तक सैंतीस करोड़ की संख्या को पार कर जाएगा । मोबाइल पर इंटरनेट के इस्तेमाल के विस्तार को देखते हुए जगरनॉट का बिजनेस मॉडल बेहतर कर सकता है बशर्ते कि इसका खूब प्रचार प्रसार हो । जगरनॉट का मानना हो सकता है कि जिस तरह से मोबाइल का विस्तार हो रहा है उससे ये संख्या और भी बढ़ सकती है । जगरनॉट जून में हिंदी की किताबें भी ईफॉर्मेट में पेश कर रही है । हिंदी के प्रकाशक वाणी प्रकाशन की कॉपीराइट की निदेशक अदिति माहेश्वरी जगरनॉट का स्वागत करती हैं और कहती हैं कि ये भारतीय भाषाओं के लिए अच्छी बात है नए नए फॉर्मेट में किताबें आ रही हैं और साथ ही पूंजी निवेश भी हो रहा है । पर मुझे लगता है कि पाठकों को मोबाइल के एप तक पढ़ने के लिए लाना बहुत मुश्किल काम है । इस तरह का काम काफी सालों से डेलीहंट नाम की कंपनी करती है जो बेहद कम मूल्य पर भारतीय भाषाओं की पुस्तकें बेच रही हैं । उनके बिजनेस मॉडल का पता नहीं है कि वो मुनाफे में है या नहीं । प्रकाशन कारोबार से जुड़े लोगों का कहना है कि भारत में किताबों को लेकर जो प्यार और अपनापन पाठकों के दिलो दिमाग तक छाया हुआ है वो अहसास उनको वर्चुअल बुक्स से नहीं मिलता है यही वजह है कि भारत में अबतक ईबुक्स का बहुत बड़ा बाजार नहीं बन पाया है । इस साल जनवरी में दिल्ली में हुए विश्व पुस्तक मेले में पाठकों की उमड़ती भीड़ ने भी इस बात तो साबित किया है कि पुस्तकों के प्रति पाठकों का प्यार कम नहीं हुआ है । तो पुस्तक प्रेमियों के इस समाज में सनी लियोनी जैसी सेलिब्रिटी ईफॉर्मेट तक ले जाएंगी, देखना दिलचस्प होगा ।