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Saturday, April 11, 2026

सांस्कृतिक संस्थाओं का हो पुनर्गठन


मार्च के अंतिम सप्ताह में दिल्ली में साहित्य अकादेमी ने एक बड़ा साहित्य उत्सव का आयोजन किया। जानकारों के मुताबिक आयोजन पर करीब तीन करोड़ रुपए खर्च होते हैं। संगीत नाटक अकादेमी की बेवसाइट पर कई कार्यक्रमों की सूचना मिलती है। ये संस्था विभिन्न अवसरों पर झांकियों से लेकर परेड का आयोजन करती है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय प्रतिवर्ष भारत रंग महोत्सव का आयोजन करता है। इसका बजट भी करीब पांच करोड़ के आसपास रहता है। इस आयोजन का उद्देश्य देश में नाट्य संस्कृति का विकास करना और रंगकर्मियों को एक राष्ट्रीय मंच उपलब्ध करना है। ललित कला अकादेमी की वेबसाइट पर अनेक प्रकार के हो चुके और होनेवाले इवेंट की जानकारी है। ये सभी संस्थान संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध हैं। ध्यान से देखने पर ये प्रतीत होता है कि ये संस्थाएं इवेंट मैनजमेंट कंपनी बन गई हैं। संस्कृति मंत्रालय के कई इवेंट ये संस्थाएं करवाती हैं। स्वाधीनता के अमृत महोत्सव के समय साहित्य अकादेमी ने रंगोली प्रतियोगिता जैसे अखिल भारतीय आयोजन में सहयोग किया था। अगर अकादमियों से आगे बढ़कर देखें तो संस्कृति मंत्रालय की ही एक और संस्था है सांस्कृतिक स्त्रोत एवं प्रशिक्षण केंद्र। इस संस्था का मुख्यालय दिल्ली में है। इस संस्था के निदेशक का पद जनवरी 2024 से खाली बताया जाता है। इस संस्था को एक सोसाइटी चलाती है। संस्था की वेबसाइट के मुताबिक सोसाइटी के सदस्यों की जगह खाली है। पता नहीं कब से। मंत्रालय के एक अधिकारी प्रभारी निदेशक के तौर पर संस्था का कामकाज देख रहे हैं। साहित्य अकादेमी और ललित कला अकादेमी का कामकाज मंत्रालय के अधिकारी देख रहे हैं। ललित कला अकादेमी के चेयरमैन के अधिकारों को लेकर विवाद हुआ था। जिसके बाद मंत्रालय ने उनके अधिकार कम कर दिए थे। उन्होंने संस्था आना छोड़ दिया। ललित कला अकादेमी एक ऐसी संस्था है जिसके पास अमूल्य कलाकृतियों की धरोहर है लेकिन उनकी उचित देखभाल और सुरक्षा पर प्रश्न उठते रहे हैं।

संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत ही क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र भी आते हैं। भारत सरकार ने सात जोनल कल्चरल सेंटर का गठन किया था। इन संस्थाओं का मूल उद्देश्य स्थानीय लोककलाओं का संरक्षण और संवर्धन था। इन क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों का मुख्यालय पटियाला, नागपुर, उदयपुर, प्रयागराज, कोलकाता, दीमापुर, और तंजावुर में है। 2024 में लोकसभा में अपने लिखित उत्तर में संस्कृति मंत्री ने बताया कि संस्कृति मंत्रालय इन क्षेत्रीय सांस्कृति केंद्रों के माध्यम से 14 राष्ट्रीय संस्कृति महोत्सव, चार क्षेत्रीय राष्ट्रीय महोत्सव का आयोजन करती है। इसके अलावा कला और संस्कृति के विकास के लिए कम से कम 42 क्षेत्रीय संस्कृति उत्सवों का आयोजन क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों के द्वारा किया जाता है। इन केंद्रों के चेयरमैन उन राज्यों के राज्यपाल होते हैं जिस राज्य में क्षेत्रीय केंद्र का मुख्यालय होता है। अगर राज्यपाल की रुचि कला-संस्कृति में है तो कार्य सुचारू रूप से चलता है अन्यथा नहीं। पूर्वी क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र के चेयरमैन बंगाल के पूर्व राज्यपाल सी वी आनंद बोस थे। उनकी सांस्कृति संस्थाओं के कामकाज में  रुचि कम थी। आर एन रवि के राज्यपाल बनने से कला जगत आशान्वित है। इन सांस्कृतिक केंद्रों का उद्देश्य कला और संस्कृति का संवर्धन और संरक्षण था। आयोजनों से उद्देश्य की आंशिक पूर्ति हो सकती है लेकिन मूल उद्देश्य कैसे पूरा होगा, इसपर चर्चा होनी चाहिए। कुल मिलाकर अगर मोटे तौर पर देखा जाए तो इन केंद्रों ने कला-संस्कृति से जुड़े संस्कृति मंत्रालय के आयोजन किए। 

संस्कृति मंत्रालय से आगे बढ़ते हैं और शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत तीन संस्थानों को देखते हैं, ये संस्थाएं हैं, आगरा स्थित केंद्रीय हिंदी संस्थान, दिल्ली स्थित केंद्रीय हिंदी निदेशालय और मैसूर का केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान। केंद्रीय हिंदी संस्थान का उद्देश्य है हिंदी का विकास और प्रसार। कमोबेश यही उद्देश्य केंद्रीय हिंदी निदेशालय का भी है। केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान का उद्देश्य सभी भारतीय भाषाओं का संवर्धन और संरक्षण है। इसमें हिंदी भी शामिल है। तीनों संस्थान अलग अलग शहरों में हैं। तीनों का प्रशासनिक ढांचा है, तीनों के कर्मचारी और अधिकारी अलग हैं परंतु तीनों के उद्देश्य एक हैं। तीनों एक ही मंत्रालय के अधीन हैं लेकिन तीनों अलग अलग काम कर रही हैं और तीनों में समन्वय न्यूनतम है। इसी तरह संगीत नाटक अकादेमी और भारतीय नाट्य विद्यालय के कई कार्यों में समानता है। दिल्ली में कुछ ही मीटर की दूरी पर इनके कार्यालय हैं लेकिन दोनों संस्थाओं में समन्वय न्यूनतम है, जबकि दोनों संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध हैं। ललिता कला अकादेमी और नेशनल गैलरी आफ माडर्न आर्ट के उद्देश्यों को देखें तो दोनों में कई समानताएं दिखाई देंगी। कामकाज भी एक जसा ही है लेकिन समन्वय न्यूनतम। ये दोनों संस्थाएं भी संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत हैं। कला और संस्कृति से जुड़ी संस्थाओं को देखें तो कई ऐसी संस्थाएं हैं जिनके उद्देश्य लगभग एक हैं लेकिन उनके बीच समन्वय का अभाव है। इन सबके अलावा इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र भी है जो कला और संस्कृति के क्षेत्र में काम कर रही है।

स्वाधीनता के बाद देश में जब कला और संस्कृति से जुड़ी हुई संस्थाएं बनने लगीं तो अलग अलग विधाओं के लिए अलग अलग अकादमियों की स्थापना हुई। कालांतर में जब कांग्रेस सरकार ने कला और संस्कृति को वामपंथियों को आउटसोर्स कर दिया तो और संस्थाएं बनीं। अपने लोगों को स्थापित करने के लिए संस्थाएं बनाई जाने लगीं। परिणाम ये हुआ कि संस्थाएं बन गई और मनचाहे लोगों के हाथों में इनकी कमान सौंपी गईं। उद्देश्यों की ओवरलैपिंग के बारे में विचार नहीं किया जा सका। स्वाधीनता के इतने वर्षों बाद जब भारत विकसित राष्ट्र की राह पर चल पड़ा है तो आवश्यकता इस बात की है कि इन संस्थाओं के क्रियाकलापों पर पुनर्विचार हो। इनके उद्देश्यों को लेकर भी पुनर्विचार की आवश्यकता है। जहां दो संस्थाओं के उद्देश्य एक हैं उनका विलय किया जाना चाहिए। बेहतर तो ये होगा कि कला और संस्कृति से जुड़ी सभी संस्थाओं का पुनर्गठन किया जाए और एक ऐसी संस्था बने जहां अंतराष्ट्रीय स्तर के कार्य हों, शोध हों और उसका प्रचार प्रसार हो। भाषा, संस्कृति और कला से जुड़े अलग-अलग विभाग उस बड़ी संस्था के प्रशासनिक नियंत्रण में हों ताकि समन्वय बेहतर हो सके और कार्यों में दुराव न हो। मंत्रालय आयोजनों से आगे जाकर नीति निर्माण के कार्य में जुटे। भारत की अपनी संस्कृति नीति बनाई जाए। इन संस्थाओं के पुनर्गठन के बाद जिस संस्था का निर्माण हो वो व्यापक स्तर पर कार्य करे। पुनर्गठन के बाद भारतीय संस्कृति के संवर्धन और विकास के लिए अगर एक बड़ी संस्था बनती है तो उसका काम भारत समेत दुनिया के अन्य देशों में भारतीय संस्कृति, कला और लेखन को लेकर जाने का हो। करीब दो वर्ष पहले जब गोविंद मोहन संस्कृति मंत्रालय के सचिव थे तब भारत की संस्कृति के वैश्विक प्रचार प्रसार के लिए नीति बनाने को लेकर दिल्ली के भारत मंडपम में देशभर के विद्वानों ने मंथन किया था। उसके बाद उस पहल का क्या हुआ पता नहीं चल पाया। आज इस बात की आवश्यकता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विकसित भारत के लक्ष्य को ध्यान में रखकर कला संस्कृति, भाषा के लिए काम करनेवाली संस्थाओं का परीक्षण और पुनर्गठन हो। 


Saturday, June 5, 2021

कलाकार को ठोस मदद की दरकार


कोरोना संक्रमण के दौरान पूरे देश में कलाकारों के सामने बड़ा संकट उत्पन्न हो गया है। ये संकट आर्थिक है लेकिन इसका असर उनके मानस पर भी पड़ने लगा है। जाहिर सी बात है कि अगर कलाकारों का मन और मानस शांत नहीं होगा तो कला का विकास अवरुद्ध हो जाएगा। कोरोना की पहली लहर के दौरान भी कलाकारों के सामने आयोजन बंद होने से जीविकोपार्जन का संकट आ गया था। उस समय भी इस बात पर चिंता प्रकट की गई थी और संबधित व्यक्तियों ने इस संकट को दूर करने के लिए विमर्श भी किया था। तब संस्कृति मंत्रालय की तरफ से ये आश्वासन दिया गया था कि क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों के माध्यम से कलाकारों की एक सूची तैयार की जाएगी और उस सूची के आधार पर उनकी मदद की जाएगी। क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों के माध्यम से किन कलाकारों की मदद की गई या कितने कलाकारों को आर्थिक मदद दी गई ये ज्ञात नहीं हो पाया है। इन केंद्रों के माध्यम से मदद हुई भी या नहीं ये भी सवालों के घेरे में है। अगर सरकार ने इन केंद्रों के माध्यम से कलाकारों की मदद की तो उस योजना का प्रचार कला जगत के लोगों के बीच इस तरह से किया जाना चाहिए कि ज्यादातर लोग उसका फायदा उठा सकें। ये इस वजह से क्योंकि सबसे अधिक परेशानी में वो कलाकार हैं जो बड़े कलाकारों के साथ संगत करते हैं और आयोजन नहीं होने से उनकी आय का स्त्रोत सूख गया है। बड़े गायकों के साथ तबले से लेकर अन्य वाद्य यंत्रों पर परफॉर्म करनेवाले कलाकारों के सामने आर्थिक समस्या विकराल है क्योंकि उनकी नियमित आय बंद हो गई है। नाटक में भी यही स्थिति है। बड़ा कालाकर तो अपनी आय से जीवन चला रहा है लेकिन जो तकनीशियन हैं, जो लाइटमैन हैं, जो साउंड के कर्मचारी हैं या इसी तरह से नेपथ्य में रहकर काम कर रहे हैं वो परेशान हैं। अनुमान ये है कि नाटक से जुड़े वैसे कलाकार जो आर्थिक रूप से संपन्न हैं उनकी संख्या दो फीसदी है जबकि बाकी अट्ठानवे फीसदी लोग नाटकों के मंचन से होनेवाली नियमित आय पर निर्भर रहते हैं। सरकार प्रोडक्शन और रिपर्टरी ग्रांट तो दे रही है लेकिन नेशनल प्रजेंस वाली संस्थाएं अभी तक मदद की आस में हैं।

अभी कुछ दिनों पहले संस्कार भारती ने कलाकारों की मदद के उपायों पर विचार के एक गोष्ठी का आयोजन किया था, जिसमें देशभर के कला और संस्कृति से जुड़े लोगों ने भाग लिया था। उस बैठक का स्वर भी यही था कि कलाकारों को अपेक्षित मदद नहीं मिल पा रही है, लिहाजा संस्कार भारती को पिछले वर्ष की तरह इस वर्ष भी आगे आना चाहिए। इसी तरह से अन्य संस्थाएं भी कलाकारों की मदद कर रही हैं पर ये नाकाफी है। संस्कृति मंत्रालय को संकट के समय कलाकारों की मदद के लिए हाथ बढ़ाना चाहिए। संकट के समय संकट से निबटनेवाली योजनाएं बनाई जानी चाहिए और जरूरत पड़ने पर नीतिगत बदलाव भी किए जाने चाहिए ताकि कोई नियम मदद में बाधा न बन सके। कोरोना की पहली लहर के आने से लेकर अबतक कलाकारों को केंद्र में रखकर कोई ठोस योजना नहीं बन सकी है। 

संस्कृति मंत्रालय के 2001-22 के बजट को देखें तो उसमें चार सौ पचपन करोड़ रुपए कला संस्कृति विकास योजना, संग्रहालय के विकास, जन्म शताब्दियों के आयोजन आदि के लिए आवंटित किए गए हैं। इसके अलावा पूर्वोत्तर में संस्कृति से जुड़ी विभिन्न योजनाओं के लिए एक सौ दो करोड़ आवंटित किए गए हैं। इन दोनों राशियों को मिलाकर देखें तो करीब साढे पांच सौ करोड़ से अधिक की राशि संस्कृति मंत्रालय के पास है जिसको प्रशासनिक फैसलों से कलाकारों की मदद की तरफ मोड़ा जा सकता है। इस आवंटन के तहत मंत्रालय को कोई ऐसी योजना बनानी चाहिए जिससे कि देशभर के विभिन्न हिस्सों में फैले रूपकंर कला के कलाकारों को मदद मिल सके। संस्कृति मंत्राल के अधीन राष्ट्रीय स्तर पर काम करनेवाली जो अकादमियां हैं उनको भी आगे आकर मदद की पहल करनी चाहिए। संगीत नाटक अकादमी, ललित कला अकादमी, साहित्य अकादमी, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय आदि जैसी संस्थाओं को एक साथ आकर समन्वय बनाकर कलाकारों और लेखकों की मदद करने के लिए कार्ययोजना बनाकर काम करना चाहिए। इन अकादमियों ने पूर्व में भी आकस्मिक परिस्थितियों में कलाकारों की आर्थिक मदद की है। जैसे जब चेन्नई में बाढ़ आई थी और कई कलाकारों के वाद्य यंत्र आदि पानी से नष्ट हो गए थे, तब संगीत नाटक अकादमी के चेयरमैन शेखर सेन ने अपनी पहल पर उनकी मदद की थी। इस वक्त कोरोना काल में इन अकादमियों की गतिविधियां भी लगभग ठप हैं। उनका व्यय भी न्यूनतम हो रहा है। बचे हुए धन को कलाकारों की मदद में उपयोग में लाया जा सकता है। जरूरत सिर्फ इस बात की है कि इस दिशा में सोचा जाए और उसको क्रियान्वयित किया जाए। 

इस काम में एक ही बाधा आ सकती है कि वो ये कि इन अकादमियों में से ज्यादातर में शीर्ष पद खाली हैं। संगीत नाटक अकादमी के चेयरमैन शेखर सेन का कार्यकाल 27 जनवरी 2020 को समाप्त हो गया लेकिन अबतक उस पद पर नियुक्ति नहीं हो सकी है। इसका असर काम काज पर पड़ता ही है। संगीत नाटक अकादमी के प्रतिष्ठित पुरस्कार 2018 के बाद घोषित नहीं हो सके हैं। 2018 का पुरस्कार 2019 में घोषित हुआ था जो अबतक कलाकारों को प्रदान नहीं किए जा सके हैं। ललित कला अकादमी के चेयरमैन उत्तम पचारणे का कार्यकाल पिछले महीने की 21 तारीख को समाप्त हो गया। तीन साल का उनका कार्यकाल काफी विवादित रहा। उनके कार्यकाल के समाप्त होने के पहले नियुक्ति की प्रक्रिया आरंभ हो जानी चाहिए थी जो हो नहीं सकी। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की वेब साइट के मुताबिक इसके निदेशक वामन केंद्रे का कार्यकाल सितंबर 2018 में समाप्त हो गया और उसके बाद कार्यकारी निदेशक सुरेश शर्मा संस्थान चला रहे हैं। यहां पिछले साल चेयरमैन के पद पर परेश रावल की नियुक्ति हुई लेकिन निदेशक का पद विज्ञापित होने के बाद भी अबतक भरा नहीं जा सका। कला संस्कृति और साहित्य से जुड़ी कई ऐसी संस्थाएं हैं जहां शीर्ष पद खाली है। इन पदों के खाली रहने का बड़ा नुकसान ये है कि बड़े फैसले नहीं हो पाते हैं क्योंकि उसके लिए शीर्ष स्तर की मंजूरी आवश्यक होती है।

कोरोना संक्रमण के इस दौर में देश के सांस्कृतिक परिदृश्य पर जो संकट दिखता है उसको दूर करने के लिए दूरगामी योजनाएँ बनानी होंगी। यह ठीक बात है कि इस वक्त देश की प्राथमिकता अपने नागरिकों की जान की रक्षा करना, वायरस को फैलने से रोकने के उपाय करना और आसन्न खतरे से निबटने की योजना बना है। अब संक्रमण की दर कम होने लगी है, टीकाकरण की रफ्तार तेज हो रही है और स्थितियां सामान्य होती दिख रही हैं तो केंद्र सरकार को ज्यादातर कलाकारों की चरमरा गई आर्थिक स्थिति की ओर ध्यान देने की नीति पर काम करना चाहिए। स्थितियां इस कदर बिगड़ चुकी हैं कि इसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को दखल देकर एक ऐसी नीति निर्माण की दिशा में पहल करनी होगी जिससे कोरोना जैसे संकट में कलाकारों के सामने जीवन जीने का संकट पैदा नहीं हो सके। कला और संस्कृति किसी भी देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण होती है। अगर हम विश्व के इतिहास पर नजर डालें या फिर अपने ही देश के पौराणिक काल में सांस्कृतिक गतिविधियों पर विचार करें तो यह पाते हैं कि किसी भी राष्ट्र की प्रतिष्ठा वहां के कलाकारों के माध्यम से संस्कृति के आंगन में खिलखिलाती हैं। सरकार इस दिशा में ठोस कदम उठाए, नीतिया बनाएं और नियुक्तियां करें ताकि समेकित योजना बनाकर उसका क्रियान्वयन हो सके। 


Saturday, December 7, 2019

संस्कृति को लेकर उदासीनता


हाल ही में एक सेमिनार में जाने का अवसर मिला जहां समाजशास्त्रियों को सुना। इस सेमिनार में संस्थाओं के बनाने और उसको सुचारू रूप से चलाने पर बात हो रही थी। सभी वक्ता अपनी-अपनी बात तर्कों के साथ रख रहे थे, ज्यादातर वक्ता नई संस्थाओं को बनाने के लिए तर्क दे रहे थे, कुछ तो मौजूदा संस्थाओं को कैसे अच्छे से चलाया जाए और उनको मजबूत किया जाए, इस बारे में दलीलें दे रहे थे, सलाह भी। लेकिन सबसे दिलचस्प तरीके से बात रखी एक एक बेहद अनुभवी समाजशास्त्री विद्वान ने, उन्होंने कहा कि संस्थाओं को बनाने को लेकर बहुत सारी बातें हुईं लेकिन वो इस बात को रेखांकित करना चाहते हैं कि संस्थाओं को कैसे कमजोर किया जा सकता है। संस्थाओं को कमजोर करने की बात करते-करते उन्होंने इसके दो प्रमुख अलिखित नियम बताए। उनका कहना था कि जब भी किसी संस्थान की भूमिका का समाजशास्त्रीय अध्ययन किया जाता है तो इसका बहुत ध्यान रखा जाता है। पहला अलिखित नियम ये कि संस्था के प्रमुख के पद पर किसी की नियुक्ति मत करो वो संस्था धीरे-धीरे इतनी कमजोर हो जाएगी कि अपने गौरवशाली अतीत को भी खो देगी और भविष्य में उसको अपने बनाए मानदंडों तक पहुंचने में भी लंबा वक्त लगेगा। दूसरा औजार ये है कि संस्था में ऐसे व्यक्ति को नियुक्त करो जिसकी उस काम में रुचि नहीं है जो दायित्व उसको दिया गया हो। उनकी इन बातों को सुनते-सुनते मेरे दिमाग में उन संस्थाओं के नाम घुमड़ने लगे जो पिछले कई महीनों से खाली पड़े हैं और जिनको चलाने की जिम्मेदारी जिनपर है या जो उन संस्थाओं के प्रमुख कार्यकारी अधिकारी हैं।
ये माना जाता है कि मौजूदा सरकार शिक्षा और संस्कृति को लेकर बेहद संजीदा है और इन क्षेत्रों पर प्राथमिकता के आधार पर ध्यान दिया जाता है। संस्कृति को लेकर बहुत बातें होती हैं लेकिन संस्कृति पर कितना ध्यान है इसपर आगे विचार किया जाएगा पर पहले हम समझ लें कि संस्तृति क्या है और उसका निर्माण कैसे होता है। कवि-लेखक रामधारी सिंह दिनकर ने संस्कृति पर बहुत गहराई से विचार किया है और उसपर काफी लिखा भी है। दिनकर ने लिखा है कि संस्कृति ऐसी चीज नहीं है जिसकी रचना दस बीस या सौ-पचास वर्षों में की जा सकती है। अनेत शताब्दियों तक एक समाज के लोग जिस तरह खाते-पीते, रहते-सहते, पढ़ते-लिखते, सोचते –समझते और राज-काज चलाते अथवा धर्म-कर्म करते हैं, उन सभी कार्यों से उनकी संस्कृति का उत्पन्न होती है। असल में संस्कृति जिन्दगी का एक तरीका है और यह तरीका सदियों से जमा होकर उस समाज में छाया रहता है जिसमें हम जन्म लेते हैं। संस्कृति वह चीज मानी जाती है जो हमारे सारे जीवन को व्यापे हुए है तथा जिसकी रचना और विकास में अनेक सदियों के अनुभवों का हाथ है। संस्कृति असल में शरीर का नहीं आत्मा का गुण है। सभ्यता की सामग्रियों से हमारा संबंध शरीर के साथ ही छूट जाता है तब भी हमाररी संस्कृति का प्रभाव हमी आत्मा के साथ जन्म-जन्मांतर तक चलता रहता है। दिनकर ने अपने इसी लेख में आगे लिखा है कि संस्कृति के उपकरण हमारे पुस्तकालय, संग्रहालय, नाटकशाला और सिनेमागृह ही नहीं, बल्कि हमारे राजनीतिक और आर्थिक संगठन भी होते हैं क्योंकि उन पर भी हमारी रुचि और चरित्र की छाप लगी होती है।
अब जरा हम इसपर ही विचार कर लें जिन उपकरणों की ओर दिनकर जी ने इशारा किया है। हमारे यहां राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय है, इसकी बहुत प्रतिष्ठा है, यहां से पढ़कर निकले बहुत सारे कलाकारों ने अपनी कला के माध्यम से ना केवल इस संस्थान का नाम रौशन किया बल्कि अभिनय कला को भी समृद्ध किया। ऐसे कलाकारों की बहुत लंबी सूची है और उनके नाम गिनाने का यहां कोई अर्थ नहीं है। अब इसपर विचार किया जाना चाहिए कि यहां निदेशक का पद दिसंबर 2018 से खाली है यानि संस्था को चलाने की प्राथमिक जिम्मेदारी जिसकी है वो व्यक्ति यहां लगभग ग्यारह महीने से नहीं है। इससे भी दिलचस्प कहानी है यहां के अध्यक्ष की। रतन थियम का कार्यकाल 2017 में समाप्त हो गया और तब से यहां नियमित अध्यक्ष नहीं है और संस्था के उपाध्यक्ष डॉ अर्जुनदेव चारण पर ही दायित्व संभाल रहे हैं। ये कहानी सिर्फ राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की नहीं है। अब संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध एक और महत्वपूर्ण संस्था राष्ट्रीय अभिलेखागार पर विचार करते हैं। ये संस्था भारत सरकार के सभी अभिलेखों की संरक्षक है। इस संस्था में सालों से कोई नियमित महानिदेशक नहीं है, बीच में अल्प अवधि के लिए राघवेन्द्र सिंह को यहां का प्रभार मिला था लेकिन जल्द ही उनका भी तबादला हो गया। यहां का अतिरिक्त प्रभार संस्कृति मंत्रालय के अफसरों के पास रहा, अब भी है। एक और संस्था है राष्ट्रीय संग्रहालय। इस संस्था की जिम्मेदारी है ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और कलात्मक महत्व की पुरावस्तुओं एवं कलाकृतियों को प्रदर्शन, सुरक्षा और शोध के प्रयोजन से संग्रहीत करना। इस संस्था के मुख्य कार्यकारी का पद खाली है। एक और बेहद महत्वपूर्ण संस्था है जिसका नाम है नेहरू स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय और इस संस्था के अध्यक्ष प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हैं। 15 अक्तूबर 2019 को इसके निदेशक का प्रभार राघवेन्द्र सिंह को दिया गया है वो भी छह महीने के लिए या जबतक नए निदेशक की नियुक्ति नहीं हो जाती। राघवेन्द्र सिंह भारत सरकार में सचिव के पद से सेवानिवृत हो चुके हैं और सेवानिवृत्ति के बाद संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत ही सीईओ- डेवलपमेंट ऑफ म्यूजियम और कल्चरल स्पेस का पद संभाल रहे हैं। नियमित निदेशक नहीं होने से कामकाज पर असर पड़ रहा है इसकी छोटी सी झलक इसकी वेबसाइट को देखने से मिल सकती है जहां पुरानी जानकारी अबतक लगी हुई है।
संस्कृति मंत्रालय से इतर अगर बात करें तो मानव संसाधन विकास मंत्रालय के कई संस्थाओं में भी उसके प्रमुख कार्यकारी नहीं हैं। एक संस्थान है राष्ट्रीय पुस्तक न्यास इसके निदेशक का पद भी रीता चौधरी का कार्यकाल खत्म होने के बाद से खाली पड़ा हुआ है। इस सरकार को हिंदी को प्रमुखता देने के लिए भी जाना जाता है लेकिन मानव संसाधन विकास मंत्रालय से संबद्ध संस्था है केंद्रीय हिंदी निदेशालय। इसमें वर्षों से नियमित निदेशक नहीं हैं और इसका काम अतिरिक्त प्रभार के जुगाड़ से ही चल रहा है। मैसूर में स्थित भारतीय भाषा संस्थान अपनी स्थापना के पचास साल मना रही लेकिन बगैर निदेशख के। इस महत्वपूर्ण संस्थान के निदेशक का पद खाली है। मानव संसाधन मंत्रालय के अंतर्गत ही एक संस्थान है सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ क्लासिकल तमिल। इसके निदेशक की जिम्मेदारी भी वहां के रजिस्ट्रार संभाल रहे हैं। दिनकर जी ने पुस्तकालय, संग्रहालय, नाटकशाला और सिनेमागृह को संस्कृति के उपकरण के तौर पर रेखांकित किया है। उनके इन औजारों के आधार पर इस विवेचन में सूचना और प्रसारण मंत्रालय की संस्थाओं पर नजर डालें तो वहां भी कई संस्थानों में प्रमुख के पद खाली हैं।
सबसे पहले अगर हम देखें तो फिल्म समारोह निदेशालय में नियमित निदेशक का पद महीनों से खाली पड़ा है। इस संस्था के पास अंतराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के आयोजन की जिम्मेदारी से लेकर राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार के आयोजन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। दूसरा संस्थान है, भारतीय जन संचार संस्थान जो आईआईएमसी के नाम से जाना जाता है, वहां के महानिदेशक का पद भी लंबे समय से खाली है। इस संस्थान की देश दुनिया में प्रतिष्ठा है लेकिन इसके भी महानिदेशक के पद पर प्रभारी हैं। इसके अलावा दूरदर्शन के निदेशक का पद खाली है, आकाशवाणी के निदेशक का पद इसी महीने के अंत में खाली हो जाएगा। हलांकि ये दोनों पद विज्ञापित हो गए हैं लेकिन अगर कुछ वक्त के लिए भी ये पद खाली रहते हैं तो संस्थान के काम-काज पर तो असर पड़ेगा। क्या इन संस्थानों में ये व्यवस्था नहीं है कि एक व्यक्ति के कार्यकाल खत्म होने के पहले ही दूसरे की नियुक्ति हो जाए, जैसा गृह सचिव या कैबिनेट सचिव के पद के लिए होता है। इस बात पर उच्चतम स्तर पर विचार किया जाना चाहिए कि इतने सारे संस्थानों के पद क्यों खाली हैं? क्या अफसर नहीं चाहते कि इन पदों को भरा जाए क्योंकि इनके नहीं भरे जाने का लाभ उनको अतिरिक्त प्रभार के रूप में मिलता है। या क्या मंत्रियों की रुचि नहीं है।
जिन मंत्रालयों के कामकाज से संस्कृति पर प्रभाव पड़ता है या यों कहें कि संस्कृति के निर्माण में जिनकी भूमिका है उनके प्रति इस तरह की उदासीनता का ये आलम प्रश्नाकुल कर देता है। अंग्रेजी में एक कहावत है कि अगर आप किसी को प्यार करते हैं तो उसको प्रदर्शित भी करें। इस कहावत को अगर हम अपनी संस्कृति से जोड़कर देखें और विचार करें तो यह कहा जा सकता है कि अगर हम अपनी संस्कृति से प्यार करते हैं तो हमें इसका प्रदर्शन भी करना चाहिए। ये प्रदर्शन कैसे होगा इसका सबसे बेहतर तरीका तो यही है कि हम संस्कृति के प्रति गंभीर रहें, गंभीर दिखें।