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Saturday, June 21, 2025

विमोचन के बहाने विदेशी भाषा पर प्रहार


पुस्तकों के विमोचन कार्यक्रमों में आमतौर पर चर्चा पुस्तक केंदित होती है। वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी आशुतोष अग्निहोत्री के काव्य संग्रह ‘मैं बूंद स्वयं खुद सागर हूं’ के विमोचन में इस परंपरा से हटकर बातचीत हुई। मंच पर गृह मंत्री अमित शाह और गृह सचिव गोविंद मोहन थे। इस कारण वहां जो चर्चा हुई उसके महत्व को रेखांकित करना आवश्यक है। मंच पर पहले तो एक दिलचस्प वाकया हुआ। विमोचन के लिए सबको आग्रह किया जा रहा था। अमित शाह को लगा कि गृह सचिव के बोले बिना उनको आमंत्रित किया जा रहा है। उन्होंने इशारों से बताया कि गोविंद मोहन जी को बोलना है। खैर..स्थिति स्पष्ट हुई और पुस्तक विमोचन के बाद गृह सचिव बोलने आए। उन्होंने आशुतोष अग्निहोत्री की पुस्तक पर टिप्पणी करने के पहले विस्तार से हिंदी की विकास यात्रा पर अपनी बात रखी। हिंदी-उर्दू संबंध पर चर्चा करते हुए दोनों भाषा को बहन बताया। हिंदी के परिष्कृत शब्दों को लेकर समाज में जिस तरह उपहास होता है उसको रेखांकित किया। अतीत में जिस तरह से हिंदी और भारतीय भाषाओं को एक दूसरे विरुद्ध खड़ा करके हिंदी को नुकसान पहुंचाया गया उसका भी उल्लेख हुआ। अंत में उन्होंने कहा कि हिंदी का सूरज लुप्त हो रहा है लेकिन आशा की जानी चाहिए कि एक दिन उसका उदय होगा। गृह सचिव ने हिंदी के संदर्भ में कई बार विलुप्त होने जैसे शब्द बोले। विस्तार का समय नहीं रहा होगा अन्यथा वो इस बात की चर्चा अवश्य करते कि हिंदी कैसे विलुप्त हो रही है। गोविंद मोहन की ये बात भी कि हिंदी-उर्दू बहनें हैं, विस्तृत और गंभीर चर्चा की अपेक्षा रखती है।

अब बारी गृह मंत्री अमित शाह की थी। उन्होंने आशुतोष अग्निहोत्री और उनके संग्रह की प्रशंसा की। परिवर्तन में लगनेवाले समय और मेहनत पर भी बोले। अंत में वो भाषा पर आए। उन्होंने गृह सचिव से असहमति प्रकट करते हुए कहा कि गोविंद मोहन जी ने हिंदी के प्रति चिंता व्यक्त की, हिंदी की यात्रा का अच्छे से वर्णन किया लेकिन मैं उनसे थोड़ा असहमत हूं। गृह मंत्री ने कहा कि हिंदी पर कोई संकट नहीं है।  अमित शाह ने कहा कि हमारे देश की भाषाएं हमारी संस्कृति का गहना है। हमारे देश की भाषाओं के बगैर हम भारतीय ही नहीं रहते हैं। हमारा देश, इसका इतिहास, इसकी संस्कृति और हमारे धर्म को किसी विदेशी भाषा से नहीं समझ सकते। भारतीय भाषाओं पर जब अमित शाह बोल रहे थे तो उनकी वाणी में दृढता महसूस की जा सकती थी। वो इतने पर ही नहीं रुके बल्कि यहां तक कह गए कि आधी अधूरी विदेशी भाषाओं से संपूर्ण भारत की कल्पना नहीं हो सकती। वो केवल और केवल भारतीय भाषाओं से हो सकती है। अमित शाह ने ये भी माना कि लड़ाई बड़ी है, लेकिन भारत का समाज इतना सक्षम है कि इस लड़ाई में विजय प्राप्त कर सके। इस विजय के बाद एक बार फिर आत्मगौरव के साथ हमारी भाषाओं में हम हमारा देश भी चलाएंगे, सोचेंगे भी, शोध भी करेंगे, परिणाम भी निकालेंगे और विश्व का नेतृत्व भी करेंगे। अमित शाह ने जिस सभागार में ये बात कही वहां बड़ी संख्या में भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों में काम करने वाले वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे। बताते चलें कि अब भी भारत सरकार के मंत्रालयों के कामकाज में अंग्रेजी का बोलबाला है। 

गृह मंत्री अमित शाह की बातों का विश्लेषण कर रहा था। अचानक एक घटना दिमाग में कौंधी। पिछले दिनों मित्र-मिलन कार्यक्रम में गया था। वहां कई मित्र थे जो अलग अलग मंत्रालयों और विभागों में कार्यरत थे। हम कुछ मित्र एक जगह खड़े होकर बातें कर रहे थे। एक मित्र के फोन की घंटी बजी। उसने कहा जी सर मैं पहुंचता हूं, करके आपको भेजता हूं। उसने हमसे विदा लेने का उपक्रम आरंभ किया तो हमने पूछा कि क्या बात है? क्या करने की जल्दी है। उसने बताया कि गृह मंत्री अमित शाह हमारे विभाग के एक कार्यक्रम में आ रहे हैं। उस कार्यक्रम का विवरण उनको भेजा जाना है। मुझे आफिस जाना होगा। मैंने मजे लेने के लिए बोला कि क्या अपने आफिस में तुम्हीं एक हो जिसको विवरण बनाना आता है। उसने जो बोला वो चौंकानेवाला था। उसने बताया कि किसी भी मंत्रालय से कोई भी पत्र अगर गृह मंत्रालय जाता है और उस पत्र को गृह मंत्री तक जाना होता है तो वो हिंदी में ही जाता है। गृह मंत्री हिंदी के ही पत्र या फाइल नोटिंग पढते और निर्णय करते हैं। बाद में मैंने गृह मंत्रालय में कार्यरत एक दो लोगों से जानकारी ली। पता चला कि मेरा मित्र सही कह रहा था। एक ऐसा बदलाव जिसका असर गृह मंत्रालय की कार्यशैली पर स्वाभाविक है। अमित शाह का हिंदी प्रेम जगजाहिर है। हिंदी के साथ वो हमेशा भारतीय भाषाओं की बात आवश्यक रूप से करते हैं। हिंदी चूंकि उनके मंत्रालय से संबद्ध है इस कारण उनका दायित्व भी है कि वो इसको बढ़ावा दें। दे भी रहे हैं। 

अमित शाह के गृह मंत्री रहते ही अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन का आरंभ हुआ था। सूरत में पहला सम्मेलन आयोजित किया गया था। उसमें देशभर के हिंदी अधिकारी आए थे। विभिन्न सत्रों में अलग अलग क्षेत्र के विद्वानों ने हिंदी पर मंथन किया था। साहित्य, कला, संस्कृति और फिल्म से जुड़े लोग जो हिंदी से प्यार करते हैं, आमंत्रित किए गए थे। उस राजभाषा सम्मेलन की व्यापक चर्चा हुई थी। उसके बाद के सम्मेलन में हिंदी भाषी वक्ता तो थे पर इस बात का भी ध्यान रखा गया था कि वो सभागार के लोगों को बांध सकें। उन फिल्मी लोगों का आमंत्रित किया गया जो पर्दे पर तो हिंदी बोलते हैं लेकिन उनके रोमन में स्क्रिप्ट पढ़ने की बात सामने आती रहती है। सरकारी कार्यक्रमों की सीमा होती है। वहां हर तरह और वर्ग के लोगों को समायोजित करना पड़ता है। आशुतोष अग्निहोत्री के कविता संग्रह के विमोचन समारोह में जिस तरह से पहले गृह सचिव ने चिंता जताई और उसके बाद गृह मंत्री ने उन चिंताओं को दूर करते हुए लंबी लड़ाई की बात की है उसको रेखांकित किया जाना चाहिए। लंबी लड़ाई विदेशी भाषा से तो है ही, औपनिवेशिक मानसिकता से भी है। उस मानसिकता से जो ये तय करती है कि ज्ञान की भाषा अंग्रेजी ही हो सकती है। उस मानसिकता से जो ये भ्रम फैलाती है कि विज्ञान और तकनीक को जानने के लिए विदेशी भाषा का ज्ञान आवश्यक है। इन भ्रमों का, इन धारणाओं का प्रतिकार आवश्यक है। इनका प्रतिकार गोष्ठियों में दिए जानेवाले भाषणों से नहीं होगा। इनका प्रतिकार अपने काम से करना होगा। गृह मंत्रालय, शिक्षा मंत्रालय और संस्कृति मंत्रालय को इसके लिए बेहतर समन्वय करके साथ मिलकर आगे बढ़ना होगा। समग्रता में एक दिशा में साथ चलकर भारतीय भाषा को समृद्ध करना होगा। तब जाकर भारतीय भाषा का ध्वज लहरा सकेगा। 

Saturday, July 23, 2022

रचनात्मकता से समृद्ध होंगी भाषाएं


दो दिन पहले राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की घोषणा हुई। फीचर फिल्मों और लोकप्रिय सितारों को पुरस्कार मिले। उनकी खूब चर्चा हुई लेकिन कुछ फिल्मों का उल्लेख नहीं हो पाया। ये उन भाषाओं में बनी फिल्में हैं जो हमारे देश के अलग अलग हिस्सों में बोली जाती हैं। कई बार छोटे भूभाग पर बोली जानेवाली भाषा में बेहतरीन फिल्म देखने को मिल जाती हैं कई बार ऐसा होता कि भौगोलिक रूप से बड़े क्षेत्र में बोली जानेवाली भाषा में अच्छी फिल्में बनती हैं। दो दिन पहले घोषित राष्ट्रीय पुरस्कार में बेस्ट नान फीचर फिल्म के लिए डांगी भाषा की फिल्म टेस्टीमनी आफ एना चुनी गई। इस भाषा के बारे में कम ही जानकारी है। गुजरात का एक जिला है डांग जो महाराष्ट्र की सीमा से लगता है। उस जिले में आदिवासी आबादी है और वहां डांगी बोली जाती है। इस छोटे से आदिवासी बहुल जिले में बोली जानेवाली भाषा में बनी नान फीचर फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार में स्वर्ण कमल प्रदान किया जाएगा। इसी तरह 2020 के लिए ही बेस्ट शार्ट फिल्म कर्बी भाषा में बनी एक फिल्म को दिए जाने की घोषणा की गई है। हरियाणवी में दादा लख्मी पर बनी फिल्म , दिमासा में अमी बरुआ की फिल्म और टुलू में संतोष माडा की फिल्म को सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार दिया जाएगा। इसके अलावा राजस्थानी की एक फिल्म को भी सम्मानित करने की घोषणा की गई है।

उपरोक्त सभी भाषाओं पर विचार करें तो इनमें से कोई भी भाषा संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं है। राजस्थानी को छोड़कर सभी भाषाएं अपेक्षाकृत छोटे भूभाग की भाषा है लेकिन इन भाषाओं में लगातार फिल्में बन रही हैं। लगातार इस वजह से कि पिछले तीन वर्षों के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की सूची देखने पर इस तरह की कई भाषाओं की फिल्में दिखती हैं जिनको स्वर्ण कमल या रजत कमल से सम्मानित किया गया है। 2017 में तो निर्देशक की पहली सर्वोत्तम फिल्म का अवार्ड लक्षद्वीप में बोली जानेवाली भाषा जेसरी में बनी फिल्म सिंजर को दिया गया था। इस फिल्म का चयन करनेवाली जूरी के अध्यक्ष मशहूर फिल्मकार शेखर कपूर थे। करीब 115 मिनट की ये फिल्म लक्षद्वीप में रहनेवाले एक मछुआरे पर वैश्विक आतंकवाद के प्रभाव की कहानी है। फिल्म में ये दिखाया गया है कि जब उसकी बहन और मंगेतर को आईएसआईएस के आतंकवादियों के चंगुल से छुड़ाया जाता है तो पता चलता है कि उनके साथ बलात्कार हुआ है। स्थिति तब और जटिल हो जाती है जब पता चलता है कि युवतियां गर्भवती हैं। जब उनसे संवाद होता है तो ये बात सामने आती हैं कि वो अपना गर्भ गिराने को तैयार नहीं हैं। इस पूरी कहानी और नायक के मन के द्वंद्व को निर्देशक पैंपली ने बेहतरीन तरीके से दर्शकों के सामने रखा है। फिल्म के साथ साथ निर्देशक को भी सम्मानित किया गया था। इसी वर्ष लद्दाखी और टुलू भाषा में बनी फिल्मों को भी पुरस्कृत किया गया था। अगले वर्ष के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में भी राजस्थानी, गारो, सेरदुकपेन जैसी भाषाओं में बनी फिल्मों को सम्मानित किया गया। अगले वर्ष यानि 2019 में पर्यावरण पर सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार मोनपा में बनी फिल्म को दिया गया। इसके साथ ही खासी, मीशिंग, पानिया, टुलू और छत्तीसगढ़ी में बनी फिल्मों को भी पुरस्कार मिले।

उपरोक्त सारी भाषा संविधान की आठवीं अनुसूची में नहीं है। कहने का अर्थ ये है कि संविधान की आठवीं अनुसूची में नहीं होते हुए भी इन भाषाओं में बेहतर कार्य हो रहा है। वो अपनी जमीन से जुड़ी कहानियों और अपने समाज में फैली कुरीतियों पर अपनी कला के माध्यम से प्रहार कर रहे हैं। अच्छी बात ये है कि कला जगत इनके कार्यों को रेखांकित भी कर रहा है। आवश्यकता इस बात की है कि इन भाषाओं में अधिक से अधिक काम हो ताकि उन इलाकों में फैली कहानियों को देश के सामने लाया जा सके। अब जैसे इस वर्ष अभिनेता यशपाल शर्मा की फिल्म दादा लख्मी को सर्वश्रेष्ठ हरियाणवी फिल्म का पुरस्कार देने की घोषणा की गई है। दादा लख्मी हरियाणवी के प्रसिद्ध कवि और कलाकार थे। उनको हरियाणा में सूर्य कवि कहा जाता है। लोक कला के क्षेत्र में दादा लख्मी की बहुत प्रतिष्ठा है। अभिनेता यशपाल शर्मा ने श्रमपूर्वक दादा लख्मी के जीवन को पर्द पर उतारा है। इसके लिए उनको इस बात की आवश्कता नहीं हुई कि हरियाणवी संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल भाषा हो। किसी भी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग अपनी जगह सही हो सकती है लेकिन उस भाषा के लोगों का ये भी दायित्व होता है कि वो अपनी भाषा में बेहतर काम करें और उसको समृद्ध बनाएं।

इस देश में भाषा के नाम पर स्वाधीनता के बाद से राजनीति हो रही है। कभी राष्ट्रभाषा के नाम पर तो कभी राज्यों के बंटवारे के नाम पर तो कभी शिक्षा नीति में भाषा को मिलनेवाली प्राथमिकता के नाम पर। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के आने के बाद भी भाषा को लेकर एक विभाजन करने की कोशिश की गई थी लेकिन राष्ट्रीय शिक्षा नीति में मातृभाषा का उल्लेख होने की वजह से वो विभान संभव नहीं हो पाया। कला जगत में भाषा के नाम पर राजनीति अपेक्षाकृत कम है लेकिन जो कलाकार भाषा के आधार पर कला से महत्व चाहते हैं उनको अपनी भाषा में रचनात्मक कार्य करना चाहिए। रचनात्मक कार्यों से उस भाषा के प्रति लोगों के मन में एक आकर्षण पैदा होगा और वो अधिक लोगों तक पहुंच सकेगी। अगर हम लक्षद्वीप में बोली जानेवाली भाषा जेसरी में बनी फिल्म संजर का ही उदाहरण लें तो निर्देशक ने अपनी कला के माध्यम से अपनी भाषा को वैश्विक मंच तक पहुंचाया। जिस प्रकार से उन्होंने अपनी फिल्म ने वैश्विक आतंकवाद और उसके प्रभाव का मुद्दा उठाया और उसको वैश्विक मंचों पर सराहना मिली। उसने फिल्म से साथ साथ जेसरी भाषा के बारे में जानने की उत्सकुकता भी पैदा की। इस तरह के प्रयासों से न केवल भाषा का फैलाव होता है बल्कि भाषा को मजबूती भी मिलती है।

देश के अलग अलग हिस्सों में बोली जानेवाली भाषा में फिल्में बनने का एक और लाभ है।    हमारे यहां कथावाचन की एक सुदीर्घ और लंबी परंपरा रही है। उस परंपरा को समृद्ध करने के लिए अपने देश की हर भाषा में जो कदम कदम पर कहानियां बिखरी पड़ी हैं, जो लोककथाएं सुनाई जाती हैं उनको फिल्मों के माध्यम से दुनिया के सामने लाया जा सकते है। 2017 में ही एक फिल्म पुरस्कृत हुई थी जिसका नाम है विलेज राकस्टार और इसकी निर्देशक हैं रीमा दास। असमिया में बनी इस फिल्म में एक उत्तर पूर्व के एक 10 वर्षीय बच्ची धुनू की कहानी है। वो अपना राक बैंड बनाना चाहती है। इस फिल्म में उसके सपने और संघर्ष के बीच चलती कथा है जिसमें उसकी विधवा मां है और लड़कों का एक समूह है। इसको जिस तरह से निर्देशक ने कहानी में पिरोया है वो अद्भुत है। पिछले दिनों कान में आयोजित फिल्म फेस्चिवल में भारत को दुनिया का कंटेंट हब बनाने की बात हुई थी। तमाम तरह की सहूलियतों के साथ साथ हमारे देश की सैकड़ों भाषा में फैली कहानियां भी इस योजना में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है। अगर हम गंभीरता से अपनी भाषा को समृद्ध और मजबूत करना चाहते हैं तो उसमें रचनात्मक कार्य करें। दुनियाभर का उदाहरण हमारे सामने है कि कोई भी भाषा आंदोलन से न तो दीर्घजीवी हुई है और न ही समृद्ध। उसमें होनेवाले रचनात्मक कार्य ही उस भाषा को और उसको बरतनेवालों को दीर्घायु बनाते हैं।