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Sunday, April 12, 2015

बुद्धिजीवियों की चुभती चुप्पी

मराठी एक ऐसा शब्द ऐसा है जिसको महाराष्ट्र में राजनीति करनेवाले सभी दल लगातार भुनाते रहे हैं और उसको भुनाना रहे हैं और आगे भुनाते रहेंगे । राजनीतिक दलों को लगता है कि मराठी अस्मिता के नाम पर वो जो भी कार्ड खेलेंगे वो तुरुप का इक्का ही होगा । दरअसल सियासी दल अपनी लोकप्रियता को बढ़ाने के लिए बहुधा इस तरह की चाल चलते हैं । कभी कभार अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए भी इस तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं । महाराष्ट्र में मराठी और मराठा मानुष के नाम पर राजनीति की एक लंबी परंपरा रही है । स्वतंत्रता बाद की परिस्थितियों में शिवसेना ने इसको काफी भुनाया और राज ठाकरे की राजनीति की तो बुनियाद ही मराठी अस्मिता रही है । हलांकि पिछले चुनाव में महाराष्ट्र की जनता ने इस तरह की राजनीति करनेवालों को उनकी सही जगह दिखा दी । अब इसी मराठी भावना को भुनाने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने मल्टीपलैक्स को शाम छह बजे से नौ बजे तक मराठी फिल्में दिखाने का फरमान जारी कर दिया था । यह एक ऐसा फरमान था जिसके खिलाफ बुद्धिजीवियों को मजबूती से उठ खड़ा होना चाहिए था । राजनेताओं से तो अपेक्षा की ही नहीं जा सकती हैं क्योंकि जहां संविधान और वोटबैंक को चुनना होता है तो उनकी प्राथमिकता वोट बैंक होती है । लेखकों की कोई मजबूरी नहीं होती है उनको तो सत्य के साथ खड़ा होना चाहिए । इस बार भी लगभग पूरा लेखक समाज चुप रहा । लेकिन अंग्रजी की लेखिका और पत्रकार शोभा डे ने इसके खिलाफ सोशल मीडिया पर मुहिम शुरू कर दी । उन्होंने ट्वीट कर महाराष्ट्र सरकार के इस फैसले के खिलाफ अपना विरोध दर्ज करवाया । उन्होंने महाराष्ट्र सरकार के इस फरमान पर तंज कसते हुए लिखा कि अब मल्टीप्लैक्स में पॉपकार्न की जगह दही मिसल और वडा पाव मिला करेंगे । इसके अलावा भी उन्होंने कई ट्वीट कर अपना विरोध जताया । शोभा डे के ट्वीट के बाद आगबबूला शिवसेना ने उनके खिलाफ बयानों की झड़ी लगा दी । लेकिन शोभा अपने स्टैंड पर कायम रहीं । इसके बाद तो शोभा डे के खिलाफ शिवसेना के विधायक ने महाराष्ट्र विधानसभा में विशेषाधिकार हनन का नोटिस तक डे डाला लेकिन शोभा टस से मस नहीं हुई । इस बीच शोभा के खिलाफ विरोध प्रदर्शन तेज होने लगे, पुतले फूंके जाने लगे, उसके घर की सुरक्षा बढ़ा दी गई, वडा पाव लेकर शिवसैनिक उनके घर तक जा पहुंचे लेकिन हमारा लेखक समुदाय खामोश रहा । जितनी चिंता की बात सरकार का सिनेमाघरों को मराठी फिल्मों के लिए वक्त तय करना है उससे ज्यादा चिता की बात लेखक और बुद्धिजीवी समुदाय का इसपर खामोश रहना है । यह एक ऐसा सवाल है जिसपर देशभर के लेखकों को विचार करना होगा । गंभीरता से चिंतन और मनन करना होगा । इस तरह की खामोशी एक तरह से सरकारों को बल प्रदान करती है । संविधान के नाम पर शपथ लेकर सत्ताधीश बने नेताओं के हौसले इस कदर बुलंद हो जाते हैं कि वो संविधान की परवाह करना छोड़ने की सोचने लगते हैं । लेकिन एक शोभा डे की पहल ने महाराष्ट्र सरकार को अपना फरमान बदलने के लिए मजबूर कर दिया । भारत में लेखकों और साहित्यकारों के सत्ता और उसके फैसलों के विरोध की एक लंबी परंपरा रही है लेकिन हाल के दिनों में उसका क्षरण रेखांकित किया जा सकता है । आजादी के बाद लेखक समुदाय हर मसले पर अपनी राय रखते थे और उसको प्रकट करते थे । पिछले लोकसभा चुनाव में भी मशहूर कन्नड़ लेखक अनंतमूर्ति ने नरेन्द्र मोदी का विरोध किया था । यह अलहदा बात है कि विरोध करने के लिए उन्होंने जिन शब्दों का चयन किया था वो विवादित था । उन्होंने मोदी के जीतने पर देश छोड़ने की बात कह दी थी जिसपर बाद में उन्होंने सफाई भी दी । राजनीति के आगे मशाल की तरह चलनेवाला साहित्य इन दिनों उसी राजनीति का शिकार हो गया है । सत्य  और चुनिंदा सत्य में जो फर्क होता है उसने साहित्य जगत का बड़ा नुकसान पहुंचाया ।
अगर हम हिंदी साहित्य की ही बात करें तो देखते हैं कि साठ और सत्तर के दशक के बाद से लेखन और विमर्श में तो प्रतिरोध की खूब बातें हुई । सत्ता के विरोध और प्रतिरोध के नाम पर जमकर सत्ता सुख भोगने के मामले भी सामने आए । प्रगतिशीलता, जनवाद आदि आदि जैसे जुमले गढ़कर देश की जनता को गुमराह करने का खेल खेला गया । साहित्य में प्रगतिशीलता की कोई आवश्यकता ही नहीं थी । साहित्य तो खुद प्रगतिशील होता है । दरअसल यह पूरा खेल अपने राजनीतिक आकाओं के इशारे पर खेला गया था । लेखक संघ बनाए गए । जो भी लेखक संघ बने वो किसी ना किसी राजनीतिक दल से जुड़े रहे । उनके बुद्दिजीवी प्रकोष्ट की तरह काम करते रहे । लेकिन जनता के सामने अपना दूसरा चेहरा पेश कर उनको भरमाते रहे । प्रगतिशील लेखक संघ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का अंग रहा, उसी तरह जनवादी लेखक संघ सीपीएम का बौद्धिक प्रकोष्ट बना रहा । जैसे जैसे वामपंथी पार्टी में विभाजन होते रहे उनके लेखक प्रकोष्ट बनते रहे । जब सीपीएम में विभाजन हुआ तो एक और बौद्धिक प्रकोष्ठ बना उसका नाम पड़ा जन संस्कृति मंच । दरअसल हमारा मानना है कि लेखकों को इन वामदलों ने सिद्धांत, प्रतिरोध, गरीब, दबे, कुचले के नाम पर भ्रमित किया और फिर उनका फायदा उठाया । जब ये लेखक संगठन इन पार्टियों के बौद्धिक प्रकोष्ठ की तरह काम करने लगे तो जाहिर है कि उनके विरोध और प्रतिरोध भी अपने राजनीतिक आकाओं की मुंहदेखी होने लगी । इसका सर्वोत्तम उदाहरण है कि प्रगतिशील लेखक संघ ने इमरजेंसी का समर्थन किया । इस तरह के कई उदाहरण हैं लेकिन इन उदाहरणों का उल्लेख यहां आवश्यक नहीं है । अब तो प्रगतिशील लेखक संघ की हालत यह हो गई है कि वो लेखकों की सहमति के बगैर उन्हें पार्टी के पद बांट रही है । ताजा मामला पश्चिम बंगाल का है जहां कवि राज्यवर्धन को बगैर उनकी जानकारी और सूचना के राज्य इकाई का कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया गया । राज्यवर्धन ने फेसबुक पर इस बारे  में लिखकर जानकारी साझा की है ।
पार्टियों के बौद्धिक प्रकोष्ठ बनने का नतीया यह हुआ कि लेखकों ने चुनिंदा सत्य बोलना शुरू कर दिया । चुनिंदा और सुविधानुसार बोला गया सत्य, झूठ से ज्यादा नुकसान पहुंचाता है । इन लेखक संगठनों से जुड़े रचनाकार तस्मीमा नसरीन के मुद्दे पर खामोशी अख्चियार कर लेते हैं लेकिन एम एफ हुसैन के मामले पर जोरदार विरोध शुरू हो जाता है । गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे का विरोध करनेवाले लोग सलमान रश्दी के मामले में खामोश हो जाते हैं । क्या यह एक प्रकार की लेखकीय सांप्रदायिकता नहीं है । कट्टरपंथी हिंदूवादी ताकतों के खिलाफ खड़े होनेवाले लेखक मुस्लिम कट्टरपंथ के खिलाफ बोलने में घबराने लगते हैं । जुबान खामोश हो जाती है । अच्छा इस तरह के लेखकों को लगता है कि अगर वो मुस्लिम कट्टरपंथ के खिलाफ बोलेंगे तो उनको सांप्रदायिक मान लिया जाएगा । सांप्रदायिकता और फासीवाद की आड़ लेनेवाले लेखक उसी का शिकार होते चले गए । इस तरह की प्रवृत्ति लंबे समय तक चलती रही जिसका परिणाम यह हुआ कि लेखकों से लोगों का भरोसा उठता चला गया । लेखक भी सत्ता के हिसाब से अपनी प्रथामिकताएं तय करने लगी । राजनीति के आगे चलनेवाली मशाल सत्ता की पिछलग्गू बन गईं । जब आप सत्ता के पिछलग्गू बनेंगे तो फिर उसके खिलाफ बोलने का साहस का ह्रास होता चला जाएगा । फिर इसकी परिणति शोभा डे जैसे मामले में देखने को मिलेगा । शोभा डे के समर्थन में साहित्य जगत का ना आना चौंकाता नहीं बल्कि उस धारणा को पुष्ट करता है ।
दरअलस अगर हम पूरी गंभीरता से हिंदी के लेखकीय परिदृश्य पर विचार करें तो निराशाजनक तस्वीर सामने आती है । मुक्तिबोध और उनकी कविता की  पंक्ति तोड़ने ही होंगे सारे गढ़ और मठ को नारे की तरह इस्तेामल करनेवाले लेखक गढ़ और मठ में शामिल होने की जुगत में लगे रहते हैं । कोई किसी अकादमी का सदस्य बनना चाहता है तो कोई किसी सरकारी कमेटी में फिट होने के जुगाड़ में लगा रहता है, किसी की ख्वाहिश किसी विश्वविद्लाय के कुलपति बनने की होती है तो कोई पुरस्कार के दंद फंद में जुटा रहता है । ऐसे परिदृश्य में यह अपेक्षा करना बेमानी है कि लेखक सरकारी फैसलों के खिलाफ बोलने की हिम्मत कर पाएंगे । सरकारी संरक्षण की लालसा लिए घूम रहे इस तरह के लेखकों की भीड़ बढ़ती जा रही है । इसकी ऐतिहासिकता में अगर जाएं तो इसके बीज इंदिरा गांधी के शासन काल में दिखाई देते हैं । जब इमरजेंसी पूर्व ही उन्होंने साहित्य और संस्कृति का मसला वामपंथियों को सौंप दिया । इंदिरा गांधी की ये सोची समझी रणनीति थी जिसके वामपंथी शिकार हुए और इसके एवज में वो इंदिरा गांधी का समर्थन करते रहे । अब वक्त आ गया है कि लेखक समुदाय को खासकर हिंदी के लेखकों को साहस के साथ सच बोलना चाहिए वो भी समग्रता में क्योंकि चुनिंदा सत्य ने लेखकों पर से समाज का भरोसा कम कर दिया है । चुनौती उसिी भरोसो को वापस लाने की है ।


Saturday, October 11, 2014

महाराष्ट्र चुनाव की बिसात

तैंतीस विधानसभा के लिए हुए उपचुनावों के नतीजों के झटके के बाद बीजेपी का तर्क था कि ये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता का पैमाना नहीं है । पार्टी का तर्क था प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहीं भी चुनाव प्रचार नहीं किया था । लेकिन अब महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनावों में नरेन्द्र मोदी धुंआधार चुनाव प्रचार कर रहे हैं । इसलिए इन दोनों राज्यों के चुनाव नतीजों को मोदी की लोकप्रियता की कसौटी के तौर पर देखा जाने लगा है । पार्टी को भी नरेन्द्र मोदी पर ही सबसे ज्यादा भरोसा है और उनकी सभाओं में आनेवाली भीड़ को देखकर उत्साहित भी है । उधर राजनीतिक पंडित तमाम तरह के गुणा भाग में लगे हैं । चुनावी पंडितों और सर्वे के मुताबिक हरियाणा और महाराष्ट्र दोनों जगह भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर तो उभर रही है लेकिन बहुमत से दूर है  । हलांकि इसी साल मई में जब लोकसभा चुनाव नतीजे आए थे तो मोदी की लोकप्रियता ने तमाम राजनीतिक पंडितों और सर्वे के अनुमान को गलत साबित कर दिया था ।  दरअसल महाराष्ट्र और हरियाणा दोनों राज्य बीजेपी के लिए इस वजह से अहम हैं वहां कभी भी पार्टी ने अपने बूते पर सरकार नहीं बनाई है । महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ मिलकर सरकार बना चुकी है । हरियाणा में भी बीजेपी हमेशा से वहां की किसी पार्टी के साथ गठबंधन में रही है । कभी चौटाला की पार्टी इंडियन नेशनल लोकदल तो कभी कुलदीप विश्नोई की पार्टी हरियाणा जनहित कांग्रेस के सहारे बीजेपी ने राजनीति की है । तब की बात कुछ और थी और इस बार जब लोकसभा चुनाव में पार्टी को जनादेश मिला तो अब हरियाणा और महाराष्ट्र में वो अपनी धमक बरकरार रखना चाहती है । हरियाणा में तो पार्टी ने अकले चुनाव लड़ने का फैसला किया है। उधर महाराष्ट्र में भी बीजेपी ने शिवसेना के साथ अपना सालों पुराना गठबंधन तोड़ दिया । दो हजार नौ के विधानसभा चुनाव में दो सौ अठासी  सीटों में से शिवसेना को चौवालीस और बीजेपी को पैंतालीस सीटें मिली थी । लेकिन दो हजार चौदह के लोकसभा चुनाव में बीजेपी शिवसेना गठबंधन को अड़तालीस में से इकतालीस सीटें हासिल हुई थी । लोकसभा चुनाव की सफलता के बाद शिवसेना को लगने लगा था कि सूबे में उसकी सरकार बन रही है । लिहाजा उद्धव ठाकरे ने अपना नाम मुख्यमंत्री पद के लिए चलवा दिया है । यहीं से दोनों दलों के बीच खटास पैदा हुई ।  आज से करीब बीस साल पहले महाराष्ट्र में एक पार्टी की आखिरी सरकार थी।उन्नीस सौ पचानवे के विधानसभा चुनाव में बीजेपी शिवसेना गठबंधन की जीत के बाद सूबे में गठबंधन सरकार की परंपरा शुरू हुई । इस बार जब केंद्र में बीजेपी ने अपने बूते बहुमत हासिल किया तो विधानसभा चुनाव के लिए उसके हौसले बुलंद हुए । लिहाजा वो अपने सहयोगी शिवसेना से ज्यादा सीटों की मांग करने लगी । नतीजा यह हुआ कि शिवसेना और बीजेपी का पच्चीस साल पुराना गठबंधन टूटा । उधर लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की बुरी गत से एनसीपी ने भी  आंखे तरेरनी शुरू कर दी । यहां भी सीटों का पेंच फंसा और पिछले पंद्रह साल से सत्ता में रही कांग्रेस और एनसीपी की दोस्ती भी टूट गई । महाराष्ट्र विधानसभा का चुनाव इस लिहाज से इस बार ऐतिहासिक और दिलचस्प हो गया है कि इस बार का चुनाव चारों पार्टियां अपने बलबूते पर लड़ रही हैं । इन सबके अलग अलग चुनाव लड़ने से प्रचार के दौरान अहम मुद्दे गौण होते चले गए । चारो पार्टियां एक दूसरे पर गठबंधन ठोकरे की जिम्मेदारी का ठीकरा फोड़ने में लगी है । मानो गठबंधन का टूटना ही जनता के लिए सबसे बड़ा मुद्दा हो । कुछ समय पहले तक महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रहे पृथ्वीराज चौहान ने एनसीपी पर बीजेपी के साथ अंदरखाने हाथ मिलाने का आरोप लगाया है तो अजीत पवार ने पृथ्वीराज चौहान का नकारा मुख्यमंत्री तक कह डाला । उधर शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे ने दो दशक से ज्यादा तक सहयोगी रहे बीजेपी की तुलना अफजल खान की सेना से कर दी । उद्व के मुताबिक जिस तरह से अदिल शाह की सेना छत्रपति शिवाजी को मारकर महाराष्ट्र पर कब्जा करना चाहती थी उसी तरह से बीजेपी महाराष्ट्र पर कब्जा करना चाहती है । प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तो शिवसेना पर सीधा हमला नहीं करने का एलान किया लेकिन बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष देवेन्द्र फडणवीस ने तो सरेआम शिवसेना पर रंगदारी वसूलने का इल्जाम मढ़ दिया । महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में आरोप प्रत्यारोप के इस कोलाहल में के बीच असल मुद्दे दबते नजर आने लगे हैं । मुद्दों के बजाए आरोपों पर बात होने से विदर्भ के किसानों की बदहाली का मुद्दा गौण हो गया । हजारों किसानों के कर्ज में डूबे होने और वक्त पर उसे नहीं चुका पाने के तनाव में खुदकुशी करने पर कोई राजनीतिक दल बात नहीं कर रहा है । तकरीबन हर चुनाव में विदर्भ के किसानों का मुद्दा उठता रहा है लेकिन सालों बाद पहलीबार ऐसा हो रहा है कि इस विधानसबा चुनाव में इन किसानों की बदतर हालत और खुदकुशी चुनावी मुद्दा नहीं बन पा रहा है । विदर्भ को अलग राज्य बनाने की मांग भीइस चुनाव में कोई मुद्दा नहीं है । प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने साफ कर दिया है कि उनके दिल्ली की गद्दी पर होते कोई भी शिवाजी की इस धरती को बांटने के अपने मंसूबे में कामयाब नहीं हो पाएगा । इस चुनाव में महाराष्ट्र में हुए हजारों करोड़ के सिंचाई घोटाले पर बात नहीं हो रही है । मुंबई को शंघाई बनाने के तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के वादे के बारे में कोई कांग्रेस से सवाल नहीं पूछ रहा है । महंगाई और भ्रष्टाचार इस ब महाराष्ट्र में चुनावी मुद्दा  नहीं है । लोकसभा चुनाव के दौरान महंगाई और भ्रष्टाचार को सबसे बड़ा मुद्दा बनाने वाली पार्टी बीजेपी भी अब इन दो मुद्दों से किनारा करती नजर आ रही है । उसके लिए भी महंगाई का मुद्दा उठाना अब आसान नहीं रहा । केंद्र में उनकी ही सरकार है लेकिन महंगाई कम होने का नाम नहीं ले रही है । कांग्रेस का तो इतना बुरा हाल है कि उसको कुछ सूझ ही नहीं रहा है कि वो क्या करे । पार्टी का पूरा चुनावी कैंपेन बुरी तरह से बिखरा बिखरा सा नजर आ रहा है । ऐसा लग रहा है कि पार्टी ने पहले ही हार मान ली है । एनसीपी दस साल तक कांग्रेस के साथ सरकार में रही अब वो अपनी ही सरकार को कठघरे में खड़ा कर चुनावी फायदा उठाने की जुगत में है लेकिन जनता अब इतनी समझदार तो हो ही चुकी है कि वो राजनीतिक दलों के इन खेल को समझ सके । लोकसभा चुनाव में मोदी की लहर पर सवार होकर ऐतिहासिक जीत हासिल करने के बाद बीजेपी के हौसले बुलंद थे लेकिन उसके कद्दावर नेता गोपीनाथ मुंडे की सड़क हादसे में मौत के बाद पार्टी को थोड़ा झटका लगा है । गोपीनाथ मुंडे की बेटी पंकजा मुंडे ने पिता की मौत के बाद पूरे सूबे में यात्रा की उसको बड़ा जनसमर्थन मिला । पंकजा मुंडे महाराष्ट्र बीजेपी की ऐसी नेता है जिनकी भूमिका आनेवाले दिनों में अहमन हो सकती है । पार्टी के आला नेता लगातार पंकजा को आगे कर रहे हैं । 
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि पहली बार महाराष्ट्र में ये लग रहा है कि चुनावी मुकाबला चतुष्कोणीय है लेकिन असलियत में ऐसा है नहीं । अलग अलग इलाके में अलग अलग दल एक दूसरे के सामने हैं और यह कहा जा सकता है कि इलाका विशेष में चुनावी मुकाबला सीधा है । महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में मुख्य रूप से विदर्भ, मराठवाड़ा, पश्चिमी महाराष्ट्र, उत्तरी महाराष्ट्र और मुंबई ठाणे के पांच रणक्षेत्र में बांट सकते हैं । विदर्भ इलाके में विधानसभा की साठ सीटें हैं । पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान इस इलाके की दस सीटें में से बीजेपी ने 6 और शिवसेना ने 4 सीटें जीती थीं । विदर्भ की सबसे बड़ी समस्य़ा किसानों की खुदकुशी की है और सबसे बड़ी मांग अलग राज्य की है । परंपरागत विश्लेषम यह कहता है कि इस इलाके में मुख्य मुकाबला बीजेपी और कांग्रेस में होगा । मराठवाड़ा को कांग्रेस का गढ़ माना जाता रहा है और इस इलाके से कांग्रेस के कई मुख्यमंत्री हुए । विलासराव देशमुख के निधन और अशोक चौहान के आदर्श घोटाले में आरोपी होने के बाद कांग्रेस इस इलाके में भी कमजोर हुई और लोकसभा में मराठवाड़ा से सिर्फ दो सीटें जीत पाई । मोदी लहर का असर यहां भी दिखा । मराठवाड़ा में कांग्रेस के कमजोर होने के बाद यह माना जा रहा है कि इस इलाके में चारों दलों ने अपनी- अपनी पैठ बनाई है ।
पश्चिमी महाराष्ट्र को एनसीपी नेता शरद पवार का गढ़ माना जाता रहा  है जहां चीनी मिलों के की राजनीति के मार्फत उनका दबदबा रहा है । इस इलाके में विधानसभा की 78 सीटें हैं और इस बार शरद पवार के सामने अपने गढ़ को बचाने की चुनौती भी है । लोकसभा चुनाव के दौरान सात में से चार सीट जीतकर शरद पवार ने अपनी लाज बचाई थी । बदले हुए राजनीतिक हालात में एनसीपी के कई नेता पाला बदलकर बीजेपी में जा चुके हैं । इसका नुकसान एनसीपी को हो सकता है। इसी इलाके में शरद पवार के सालों से पॉलिटिकल राइवल स्वाभिमानी शेतकारी संगठना के राजू शेट्टी भी एनसीपी को नुकसान पहुंचा सकते हैं । तमाम अमुमानों के बावजूद यह कहा जा सकता है कि इस इलाके में मुख्य मुकाबला कांग्रेस और एनसीपी में ही होगा । अगर शिवसेना, बीजेपी और शेतकारी संगठना इकट्ठे चुनाव लड़ते तो शरद पवार का दुर्ग ढह सकता था । उत्तरी महाराष्ट्र हमेशा से बीजेपी को समर्थन करता रहा है और मोदी लहर ने उसको और मजबूत ही किया है । मुंबई ठाणे इलाके में शहरी वोटर ज्यादा हैं । 2009 में इस इलाके से कांग्रेस को सफलता मिली थी और करीब आधी विधानसभा सीट पर जीत हासिल हुई थी अनुमान है कि मोदी के करिश्मे की वजह से इस इलाके से इस बार कांग्रेस एनसीपी का सूपड़ा साफ हो सकता है । चार दलों के बीच मचे घमासान में इस बार कोई भी राज ठाकरे और उनकी पार्टी मनसे को याद नहीं कर रहा है क्योंकि गांधी के इस देश में हिंसा और नफरत की राजनीति से पहचान तो मिल सकती है लेकिन लंबा चलने के लिए चोला बदलना ही पड़ता है ।