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Saturday, March 22, 2025

रील्स की मायावी दुनिया और साहित्य


इन दिनों रील्स और उसके कटेंट की अच्छे और बुरे कारणों से खूब चर्चा होती रहती है। रील्स देखना भी लोकप्रिय होता जा रहा है। चकित करने वाली बात ये है कि रील्स के विषयों का फलक इतना व्यापक है कि वो किसी को भी घंटों तक रोके रख सकता है। अब तो स्थिति ये हो गई है कि रील्स में दिखाई गई बातों को सत्य माना जाने लगा है। रील्स की दुनिया में भविष्यवक्ताओं की बाढ़ आई हुई है। कोई आपके नाम के आधार पर तो कोई आपके नाम में प्रयुक्त अक्षरों की संख्या को जोड़कर आपका भविष्य बता रहा है। कई महिलाएं भी भविष्य के बारे में बात करती नजर आएंगी। वो भी बता रही हैं कि कैसे शुक्रवार को पति के साथ व्यवहार करने से लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं। कोई बताती हैं कि पत्नी को हर दिन पति के पांब दबाने चाहिए। क्योंकि लक्ष्मी जी भी विष्णु जी के पांव दबाती हैं। कोई महिला ये बताती है कि अमुक अंक लिखकर अपने घर की तिजोरी में रख दो या अमुक नंबर के नोट अगर आपने अपने घर में पैसे रखने के स्थान पर रख दिया तो पैसौं की कमी नहीं होगी। इतना ही नहीं रील्स की दुनिया में बिजनेस करने के तौर तरीकों और और जमाधन को दुगुना और तिगुना करने के नुस्खे भी बताए जाने लगे हैं। ये सब इतने रोचक अंदाज में बताया जाता है कि देखनेवाला मोबाइल से चिपका रहता है। आमतौर पर यह देखा जाता है कि अगर रील्स देखना आरंभ कर दें तो घंटे दो घंटे तो ऐसे ही निकल जाते हैं। कहना न होगा कि रील्स की दुनिया एक ऐसी मनोरंजक दुनिया है जो लोगों को बेहतर भविष्य का सपना भी दिखाती है। लोगों को पैसे कमाने से लेकर घर परिवार की सुख समृद्धि के नुस्खे बताती है। ये नुस्खे कितने सफल होते हैं ये पता नहीं क्योंकि इस तरह का कोई रील देखने में नहीं आता है कि फलां नुस्खे ये उनका लाभ हुआ या इस तरह की कोई केस स्टडी भी सामने नहीं आई है कि फलां नंबर के नोट तिजोरी में रखने से उसकी आमदनी निरंतर बढ़ती चली गई। पर हां इतना अवश्य है कि रील्स एक ऐसी काल्पनिक दुनिया में ले जाता है जहां सबकुछ मोहक और मायावी लगता है। 

रील्स की दुनिया को हल्के फुल्के मनोरंजन के तौर पर लिया जाना चाहिए। लिया जा भी रहा है। लेकिन इन दिनों साहित्य, कला और कविता से जुड़े कुछ ऐसे रील्स देखने को मिले जो चिंतित करते हैं। हाल के दिनों में कई ऐसे रील्स देखने को मिले जिनमें सेलिब्रेटी कविता पढ़ते नजर आ रहे हैं। वो कविता किसी और की पढ़ते हैं और रील्स के डिस्क्रप्शन में कवि का नाम लिख देते हैं। रील में कहीं कवि का नाम नहीं होता है। सेलिब्रिटी की टीम उसको इंटरनेट मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म पर पोस्ट कर देती है और अश्वत्थामा हतो नरो...वाली ईमानदारी के साथ वीडियो के डिस्क्रिप्शन में कवि का नाम लिख देती है। होता ये है कि सेलिब्रटी की पढ़ी गई कविताओं का वीडियो इन प्लेटफार्म्स से डाउनलोड करके उनके प्रशंसक उसको फिर से उन्हीं प्लेटफार्म्स पर साझा करना आरंभ कर देते हैं। प्रशंसक अश्वत्थामा वाली ईमानदारी को समझ नहीं पाते और वो सेलिब्रिटी की कविता के नाम से ही उसको साझा करना आरंभ कर देते हैं। दिनकर जी जैसे श्रेष्ठ कवियों की कविताएं तो लोगों को पता है तो उसमें ये खेल नहीं हो पाता है लेकिन कई नवोदित कवि की कविताएँ सेलिब्रिटि के नाम से चलने लगती हैं। कवि को पता भी नहीं चलता और वो कविता सेलिब्रिटी के नाम हो जाती है। रील्स की दुनिया में इस बेईमानी से कई साहित्यिक प्रतिभा कुंद हो जा रही हैं। इसका निदान कहीं न कहीं बौदधिक जगत को ढूंढना ही चाहिए। 

एक और नुकसान जो साहित्य का हो रहा है वो ये कि पौराणिक ग्रंथों से बगैर संदर्भ के किस्सों को उठाकर प्रमाणिक तरीके से पेश कर दिया जा रहा है। पिछले दिनों जब अल्लाबदिया का केस हुआ था तो उसके कुछ दिनों बाद एक रील मेरी नजर से गुजरा। एक बेहद लोकप्रिय व्यक्ति उसमें एक किस्सा सुना रहे थे। किस्से में वो बता रहे थे कि कालिदास अपना ग्रंथ कुमारसंभव पूरा क्यों नहीं कर पाए? उनके हिसाब से कालिदास जब कुमारसंभव में पार्वती और शंकर जी की रतिक्रिया के बारे में लिखने जा रहे थे तब पार्वती जी को पता चल गया। उन्होंने सरस्वती जी तो बुलाया और कहा कि ये कौन सा कवि है और क्या लिखने जा रहा है। इसको रोकना होगा। फिर किस्सागोई के अंदाज में ये प्रसंग आगे बढ़ता है। वो बताते हैं कि सरस्वती जी ने क्रोधित होकर उनको श्राप दे दिया और वो बीमार हो गए। इस कारण से कुमारसंभव पूरा नहीं हो पाया। कालिदास बीमार अवश्य हुए थे। उनको पक्षाघात हो गया और वो भी सरस्वती के श्राप के कारण इसको कहां से उद्धृत किया गया था यह सामने आना चाहिए। इस पूरे प्रसंग में शब्द कुछ अलग हो सकते हैं पर उनका भाव यही था। चिंता की बात ये है कि ये पूरा प्रसंग जैसे सुनाया गया वो विश्वसनीय सा लगता है। इसको सुनकर नई पीढ़ी के लोगों में से कई सच मान सकते हैं, विशेषकर वो जो उनके प्रशंसक हैं। इससे तो एक अलग तरह का इतिहास बनता है। बौद्धिक समाज को इस तरह के प्रसंगों पर विचार करते हुए इसपर विमर्श को बढ़ावा देना चाहिए। चिंता तब और अधिक होती है जब इस तरह के रील बनानेवाले लोग बेहद लोकप्रिय होते हैं।

रील्स की दुनिया के पहले फेसबुक ने साहित्य का बहुत नुकसान किया, विशेषकर कविता का। फेसबुक के लाइक्स और कमेंट ने कवियों औ रचनाकारों के दिमाग में ये बैठा दिया कि अब उनके आलोचकों की आवश्यकता ही नहीं है। वो सीधे पाठक तक पहुंच रहे हैं। ऐसे लोग ये मानते थे कि आलोचक पाठकों तक पहुंचने का एक जरिया है। जबकि आलोचकों की भूमिका उससे कहीं अलग होती है। आलोचक रचना के अंदर प्रवेश करके उसकी गांठों को खोलकर पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करता है। रचनाओं में अंतर्निहित भावों को आसान शब्दों में पाठकों को समझाने का प्रयत्न करता है। इससे रचनाकार और पाठक के बीच एक ऐसा संबंध बनता था जो फेसबुक के कमेंट से नहीं बन सकता है। फेसबुक पर जिस तरह के कमेंट आते हैं उनमें से अधिकतर तो प्रशंसा के ही होते हैं जो रचना का ना तो आकलन कर पातें हैं और ना ही रचना के भीतर प्रवेश करके उसकी परतों को पाठकों के लिए खोलते हैं। कुल मिलाकार आज जो परिस्थितियां बन रही हैं उनमें प्रमाणिक स्त्रोंतो के आधार पर तथ्यों को प्रस्तुत करने के लिए साहित्यकारों को आगे आना होगा। प्रो जगदीश्वर चतुर्वेदी कई वर्षों से ये आह्वान कर रहे हैं कि साहित्यकारों को इंटरनेट मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म्स पर लिखना चाहिए। उनके नहीं लिखने से अनर्गल लिखनेवालों का बोलबाला होता जा रहा है। तकनीक को साहित्यकारों को अपनाना चाहिए और उसके नए माध्यमों को पाठकों तक पहुंचने का औजार बनाना चाहिए।     


Saturday, April 20, 2024

फिल्मों से निकलते साहित्यिक संदेश


फिल्मों में रुचि के कारण मित्रों से नई और पुरानी फिल्मों पर चर्चा होती रहती है। आपस में बातचीत करते रहते हैं कि कौन सी फिल्म या वेबसीरीज आई है, किसका ट्रीटमेंट कैसा है, संवाद कैसा है, कौन सी देखी जा सकती है। इसी क्रम में साइलेंस टू का नाम आया। बताया गया कि वो अमुक प्लेटफार्म पर उपलब्ध है। मैंने सोचा, मनोज वाजपेयी की फिल्म है, देख ली जाए। प्रशंसा भी हो रही थी कि अच्छी मर्डर मिस्ट्री है। इस फिल्म को देखने की इच्छा के साथ टीवी आन किया। अलेक्सा का बटन दबाकर कहा, साइलेंस टू। अलेक्सा सर्च करने लगा। चंद पलों में उसने साइलेंस टू को स्क्रीन पर उपस्थित कर दिया। फिल्म का पोस्टर लगा था और नीचे उसकी अवधि भी एक घंटे पचास मिनट उल्लिखित थी। मैंने उसको सेलेक्ट करके चालू कर दिया। फिल्म आरंभ हो गई। मनोज वाजेयी इस फिल्म में थे। कहानी अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी की थी। मेंने देखना आरंभ कर दिया। कुछ अंतराल के बाद मुझे लगा कि गलत फिल्म देख रहा हूं। मैंने उसको बंद किया और फिर अलेक्सा को बोला कि साइलेंट टू दिखाओ। वो फिर वहीं लेकर गया । मैं उसी फिल्म को देखने लगा। करीब पौने घंटे के बाद फिर मुझे लगा कि गलत फिल्म देख रहा हूं। अपने मित्र को फोन करके कहा कि आपने नाम गलत बता दिया । थोड़ी नाराजगी भी दिखाई। उन्होंने फिर से कहा कि साइलेंस टू सर्च करिए और देखिए। अच्छी फिल्म है। मैंने फिर से देखा तो फिल्म के ऊपर छोटे अक्षरों में लिखा आ रहा था साइलेंस टू, मनोज वाजपेयी, प्राची देसाई। मैं फिर निश्चिंत हो गया और आगे देखने लगा। थोड़ी देर बाद ये समझ आ गया कि मैं साइलेंस टू नहीं बल्कि मनोज वाजपेयी की ही एक और फिल्म अलीगढ़ देख रहा था। तबतक एक घंटा देख चुका था। खैर...फिल्म पूरी देख गया। इस फिल्म ने दो सूत्र दे दिए जिसकी चर्चा यहां करना चाहता हूं। पहला तो ये कि अलेक्सा को भी धोखा दिया जा सकता है। किसी ने अलीगढ़ फिल्म के ऊपर साइलेंस टू का थंबनेल लगा दिया था। तकनीकी तौर फिल्म अलीगढ़ को यूट्यूब पर इस तरह से लगाया था कि साइलेंस टू सर्च करने पर वही फिल्म आए। स्तंभ लिखने के पहले एक बार फिर चेक किया। अब भी यही हो रहा था। दरअसल मुझसे गलती ये हो गई थी कि मुझे जी 5 प्लेटफार्म पर जाकर इस फिल्म को सर्च करना चाहिए था। 

दूसरी महत्वपूर्ण बात साहित्य से जुड़ी है। अलीगढ़ फिल्म में प्रोफेसर सिरस (मनोज वाजपेयी) और युवा पत्रकार दीपू (राजकुमार राव) के बीच एक संवाद है। बुजुर्ग प्रोफेसर सिरस युवा पत्रकार दीपू से पूछते हैं कि अच्छा बताओ तुमने किन किन पोएट को पढ़ा है। उत्तर मिलता पोएट, अय्यो! ज्यादा कुछ तो नहीं पढ़ा है...शब्दों का जो खेल है वो सब ऊपर से चला जाता है। प्रोफेसर सिरस कहते हैं कि पोएट्री शब्दों में कहां होती है बाबा। कविता तो शब्दों के अंतराल में मिलती है, साइलेंसेज और पाजेज में होती है। लोग अपने हिसाब से उसका अर्थ निकालते रहते हैं। उम्र और मैच्युरिटी के हिसाब से। समझे। दीपू कहता है, समझा। इसके बाद दीपू उनकी कविता पुस्तक के बारे में पूछता है। प्रोफेसर सिरस बेहद गंभीर भाव भंगिमा में बोलते हैं, नैचुरली आजकल कविता खरीदता कौन है?  और तुम्हारे जेनरेशन के लोगों को तो पोएट्री की समझ ही नहीं है। वो तो हर चीज को किसी न किसी लेबल से चिपकाना चाहते हैं- फैंटेस्टिक, फैबुलस, सुपर, सुपर्ब, कूल और आसम। फिर दोनों की बात केस को लेकर आगे चलती रहती है। संवाद की उपरोक्त पंक्तियों को अगर समकालीन साहित्य के संदर्भ में समझने का प्रयत्न करें तो काफी हद तक ये सही प्रतीत होती है। अगर प्रकाशकों की मानें तो कविता संग्रहों के खरीदार पहले की अपेक्षा में कम हुए हैं। कवियों को अपने संग्रह को प्रकाशित करवाने में संघर्ष करना होता है। समकालीन कविता के एक सशक्त हस्ताक्षर से स्वयं मुझसे कहा कि उन्होंने एक कविता संग्रह तैयार किया था। उसको प्रकाशित करवाना चाहते थे लेकिन प्रकाशक तैयार नहीं हो रहे थे। उनके मुताबिक प्रकाशकों के तर्क थे कि कविता आजकल खरीदता कौन है। कविता के पाठक घट गए हैं। कई बार फिल्मों के संवाद में साहित्यिक यथार्थ उद्घाटित हो जाते हैं। 

कविता के अलावा प्रोफेसर सिरस ने जो एक और बात कही वो भी महत्वपूर्ण है। युवा पत्रकार को जब वो कहते हैं कि तुम्हारी पीढ़ी हर चीज को किसी न लेबल से चिपकाना चाहती है, फैंटेस्टिक, फैबुलस, सुपर, सुपर्ब, कूल और आसम। ऐसा लेबलीकरण इंटरनेट मीडिया पर साफ तौर देखा जा सकता है। अगर किसी ने फेसबुक पर कोई कविता पोस्ट की तो कमोबेश इसी तरह की प्रतिक्रिया अधिक मिलती है। कई बार तो ऐसा लगता है कि कविता बिना पढ़े पोस्ट पर अपनी उपस्थिति दिखाने के लिए प्रशंसात्मक लेबलनुमा टिप्पणी कर देते हैं। यह तो हुई वो बात जो सतह पर दिखती है। प्रो सिरस के लेबल लगानेवाली बात के गंभीर निहितार्थ भी हैं। इस तरह की टिप्पणियों (लेबलीकरण) से खराब कविता लिखनेवालों को बढ़ावा मिलता है। उनको लगता है कि वो पंत और निराला के स्तर की कविताएं लिख रहे हैं। तुकबंदी मिलाने और भावोच्छ्वास को कविता की तरह परोसनेवाले लेखकों का उत्साहवर्धन इतना हो जाता है कि इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म पर इस तरह की कविताएं बहुतायत में उपलब्ध होने लगती है। प्रशंसात्मक टिप्पणियों से उनको लगता है कि वो महान कवि हो गए हैं। अब उनकी कविताओं का संग्रह आना ही चाहिए। वो भावोच्छ्वास और तुकबंदी लेकर प्रकाशकों के यहां पहुंचने लगते हैं। कुछ प्रकाशक, दबाव या अन्य कारणों से संग्रह प्रकाशित भी कर देते हैं। इस तरह के संग्रह कविता के गंभीर पाठकों को भाते नहीं। परिणाम ये होता है कि वो बिक नहीं पाते और कविता को लेकर एक खराब धारणा बनने लगती है। 

इन प्रशंसात्मक लेबलों का एक और गंभीर नुकसान होता है। खराब कविता लिखकर भी प्रशंसा पाने वाले कवियों को ये लगता है कि आलोचकों की कोई भूमिका ही नहीं है। वो खुलेआम ये घोषणा करते नजर आते हैं कि पाठक उनकी कविताओं को पसंद कर रहे हैं तो आलोचकों की आवश्यकता क्या है। कवि और पाठक के बीच तीसरा क्यों ? आलोचकों के इस नकार का परिणाम आज युवा कवि ही सबसे अधिक झेल रहे हैं। संजय कुंदन, प्रेमरंजन अनिमेष, हेमंत कुकरेती की पीढ़ी की कविताओं पर तो कुछ आलोचकों ने विचार किया भी। उनकी कविताओं को रेखांकित किया। उनको साहित्य जगत में कवि रूप में स्थापित किया। इसके बाद की पीढ़ी के कवियों का क्या हुआ ?  इनके बाद की पीढ़ी का आलोचक नहीं होने के कारण अच्छे कवि भी रेखांकित नही हो पा रहे हैं। उनकी पहचान नहीं बन पा रही है। प्रोफेसर सिरस कह रहे हैं कि कविता शब्दों के अंतराल में उसके साइलेंस में होती है। इसी अंतराल और साइलेंस की कविता को उद्घाटित करने का कार्य आलोचक करते हैं। सामान्य लेबलीकरण से न तो अंतराल और न ही साइलेंस के अर्थ पाठकों के सम्मुख आ सकते हैं। आंत में प्रोफेसर सिरस अनुवाद की स्थिति पर भी टिप्पणी करते हुए कहते हैं अनुवाद भी स्तरीय न होने के कारण कविता का रूप बिगड़ जाता है। यह स्थिति सिर्फ कविता की नहीं है। अधिकतर गद्य के अनुवाद भी स्तरहीन हो रहे हैं। सिनेमा को जो लोग सिर्फ मनोरंजन का माध्यम मानते हैं उनको सिनेमा के दृश्यों और संवादों से निकलते संदेशों को पकड़ना चाहिए। कई बार फिल्मों और उसके संवादों से जो संदेश निकलते हैं वो समकालीन रचनात्मकता या सामाजिक संदर्भों पर टिप्पणी होती है।  


Saturday, September 25, 2021

सूफियों पर पुनर्विचार की जरूरत


हिंदी के मार्क्सवादी आलोचक नामवर सिंह की एक पुस्तक ‘दूसरी परंपरा की खोज’ 1982 में प्रकाशित हुई थी। तब उस पुस्तक की बहुत चर्चा हुई थी। इसकी भूमिका में नामवर सिंह ने स्वीकार किया था कि ‘परंपरा के समान ही खोज भी एक गतिशील प्रक्रिया है’। उसी गतिशील प्रक्रिया के तहत उन्होंने अपने गुरु हजारी प्रसाद द्विवेदी की दृष्टि की खोज की थी। इस पुस्तक के प्रकाशन  के 37 साल बाद एक और मार्क्सवादी आलोचक सुधीश पचौरी ने ‘तीसरी परंपरा की खोज’ पुस्तक लिखी जिसे वाणी प्रकाशन ने प्रकाशित किया। सुधीश पचौरी अपनी इस पुस्तक में ‘हिंदी साहित्य के उपलब्ध इतिहास की अबतक न देखी गई सीमा को उजागर करने’ का दावा करते हैं। ये भी कहते हैं कि ‘ये हिंदी साहित्य के इतिहास के पुनर्लेखन का दरवाजा खोलती है’। इसमें नामवर सिंह की खोज से आगे जाकर सुधीश पचौरी ने कुछ ‘खोजा’ है। इस लेख का उद्देश्य इन दोनों पुस्तकों की तुलना करना नहीं है बल्कि सुधीश पचौरी की पुस्तक के कुछ निष्कर्षों पर विचार करना है। सुधीश पचौरी ने अपनी पुस्तक में सूफियों को इस्लाम का प्रचारक कहा है। अपनी इस अवधारणा के समर्थन में उन्होंने पूर्व में लिखी गई पुस्तकों और वक्तव्यों का सहारा लिया है। सुधीश पचौरी लिखते हैं, ‘मध्यकाल के इतिहास ग्रंथों में सूफी कवियों की छवि ठीक वैसी नजर नहीं आती जैसा कि हिंदी साहित्य के इतिहास में नजर आती है। साहित्य के इतिहास में वे सिर्फ कवि हैं जबकि इतिहास ग्रंथों में वो वे इस्लाम के प्रचारक के तौर पर सामने आते हैं। साहित्य के इतिहास का लेखन अगर अंतरानुशासिक नजर से किया जाता तो सूफियों की इस्लाम के प्रचारक की भूमिका स्पष्ट रहती।‘ सुधीश पचौरी ने इस बात को साबित करने की कोशिश की है कि सूफी लोग सुल्तानों के साथ आते थे। उनका काम इस्लाम का प्रचार होता था लेकिन यहां के यथार्थ की जटिलताओं को देखकर कई सुल्तान कट्टर की जगह नरम लाइन लेने लगते थे उसी तरह सूफी भी अपनी लाइन को बदलते थे। 

इतिहासकार मुजफ्फर आलम की बातों से इसकी पुष्टि भी होती है। उनके हवाले से लिखा गया है कि ‘उत्तर भारत में ग्यारहवीं शताब्दी में गजनवी के हमलों के साथ ही सूफियों का आगमन हो गया था। तेरहवीं शताब्दी में जब सल्तनत स्थापित हो गया तब सूफियों ने भी अपना विस्तार आरंभ किया’। सूफियों के विस्तार का तरीका बहुत चतुराई भरा था। वो इस्लाम के धर्मगुरुओं से अलग तरीके से काम करते थे लेकिन दोनों का उद्देश्य एक ही होता था कि जिन इलाकों को सुल्तान जीतता था उन इलाकों में इस्लाम को मजबूत करते चलना। इस काम के लिए वो भारत के संतों और महात्माओं से संवाद करते थे और उनकी उन बातों को अपनी रचनाओं में शामिल कर लेते थे जो उनके धर्म को बढ़ावा देने के काम आ सकती थीं। इतिहासकार जियाउद्दनी बरनी के हवाले से ये भी बताया गया है कि जब सुल्तान शम्सुद्दीन अलतुतमिश से इस्लाम के धर्मशास्त्रियों ने शरीआ लागू करने की मांग की और हिंदुओं के सामने इम्माइल इस्लाम-इम्माइल कत्ल यानि इस्लाम या कत्ल में से एक को चुनने का विकल्प दिया जाए तो सुल्तान ने बेहद चतुराई से इस मसले को टाल दिया था। सुल्तान ने तब कहा था कि अभी अभी हिन्दुतान को जीता गया है जहां हिन्दू बड़ी संख्या में रहते हैं। अगर अभी शरीआ लागू की गई तो हिंदू एकजुट हो सकते हैं और विद्रोह हो सकता है। जब मुस्लिम सेनाएं और ताकतवर हो जाएंगी तब हिंदुओं को इस्लाम या मृत्यु में से एक विकल्प चुनने की बात होगी। इस प्रसंग में अगर सूफियों के उपयोग की बात जोड़कर देखें तो पूरा परिदृश्य साफ हो जाता है। 

हिंदी साहित्य कि बात करें तो सूफियों को इस तरह से स्थापित किया गया कि वो सामाजिक समरसता को बढ़ाने में या सामासिक संस्कृति की जड़ें मजबूत करने के लिए अपनी कविताओं और गीतों का उपयोग करते थे। उनको इस तरह से स्थापित किया गया कि कई लोग तो सूफी ‘संत’ तक कहे जाने लगे। साहित्य के इतिहास में ऐसे कई ‘संतों’ का उल्लेख मिलता है। जबकि वो उन दिनों अपने धर्म का प्रचार करने के लिए इस भूमि पर आए थे। उनका उपयोग उस दौर के आक्रमणकारियों ने साफ्ट पावर के तौर पर किया था। जो काम तलवार नहीं कर पा रही थी उस काम को इन कथित संतों ने अपनी बोली और वाणी से करने का काम किया। इन ‘संतों’ को स्थापित और लोकप्रिय करने के लिए कई मार्क्सवादी इतिहासकारों ने श्रमपूर्वक इतिहास को अपने हिसाब से तोड़ा मरोड़ा। सतीश चंद्रा ने मध्यकालीन भारत का इतिहास लिखते हुए भक्तिकाल के कवियों की चर्चा में सूफियों को तो याद किया लेकिन तुलसीदास का नाम भी नहीं लिया। ये भूल नहीं हो सकती, ये सायास था। ऐतिहासिक घटनाओं की ऐसी व्याख्या प्रस्तुत की गई जिसने हमारे देश में इस्लाम के प्रचार प्रसार को अलग ही रंग दे दिया। युद्ध में जय पराजय को उस वक्त हमारे देश में व्याप्त सामाजिक स्थितियों से जोड़कर देखा गया। नागरीय क्रांति जैसे पद गढे गए। भारतीय समाज को जातियों में बांटकर इतिहास लेखन किया गया। उस वक्त समाज में व्याप्त कुरीतियों को भी इतिहास लेखन का आधार बनाया गया।  लेखन की इस पक्षपाती प्रविधि ने इतिहास को एकांगी कर दिया। अगर इतिहास को समग्रता में लिखा गया होता और सारी बातों जनता के सामने आती तो संभव है कि इतिहास के पुनर्लेखन की बात नहीं होती। दुनिया में इतिहास लेखन इस बात का गवाह है कि जब भी इतिहास लेखन एकांगी हुआ है तो उसको वर्षों बाद भी समावेशी करने की कोशिशें हुई हैं। अगर इतिहासकार किसी भी देश के इतिहास को यथार्थ से दूर लेकर जाते हैं और उसमें कल्पना या अपने सिद्धांत के आधार पर की गई व्याख्या को यथार्थ बनाने की कोशिश करते हैं तो फिर उसके पुनर्लेखन की बात होती ही है चाहे वो दशकों बाद हो या उससे भी बड़े कालखंड के बाद। 

सूफियों का जिस तरह से महिमामंडन किया गया वो भले ही बहुत लंबे कालखंड तक स्वीकार्य रहा लेकिन अब साहित्य के अंदर से ही उस महिमामंडन पर प्रश्न खड़े होने आरंभ हो गए हैं। हिंदी साहित्य में अनेक प्रकार के ज्ञानात्मक विमर्श होते रहे हैं लेकिन साहित्य के इतिहास लेखन को लेकर बहुत अधिक उत्साह नहीं दिखाई देता। यूरोप और अमेरिका में आज से करीब पचास पूर्व ही इतिहास लेखन को लेकर एक बहुत गंभीर बहस चली थी। न सिर्फ बहस चली बल्कि इतिहास को नए नजरिए से देखने की कोशिशें भी हुईं। हमारे देश में इतिहास लेखन को राजनीति से जोड़ दिया जाता है इस वजह से हमारे यहां इतिहास लेखन की प्रविधियों को लेकर न तो विमर्श हो पाता है और न ही नए दृष्टिकोण से लेखन। नतीजा यह होता है कि जब भी कोई लेखक इतिहास को नए सिरे से लिखने की कोशिश करता है तो उसको हतोत्साहित किया जाता है। आज जब हमारा देश स्वाधीनता का अमृत महोत्सव मना रहा है कि तो ऐसे में इस बात की आवश्यकता है कि इतिहास लेखन को लेकर ऐसा माहौल बनाया जाए कि अलग अलग तरीके से घटनाओं और प्रवृतियों पर विचार किया जाए। हिन्दुस्तान पर आक्रमण करके उसको गुलाम बनानेवाली ताकतों और उन ताकतों को भारत में स्थापित करने वाले तमाम लोगों, समूहों और शक्तियों के बारे में उपलब्ध जानकारियों के आधार पर समग्र विश्लेषण हो। कोई तथ्य न दबाया जाए न छिपाया जाए। न तो सतीश चंद्रा जैसी गलती होने दी जाए और न ही सूफियों के बारे में उपलब्ध तथ्यों को दबाया जाए। 


Saturday, August 28, 2021

विभाजन विभीषिका पर उदासीन साहित्य


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के एक दिन पहले एक ट्वीट किया। लिखा कि ‘देश के बंटवारे के दर्द को कभी भुलाया नहीं जा सकता। नफरत और हिंसा की वजह से हमारे लाखों बहनों भाइयों को विस्थापित होना पड़ा और अपनी जान तक गंवानी पड़ी। उन लोगों के संघर्ष और बलिदान की याद में 14 अगस्त को ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ के तौर पर मनाने का निर्णय लिया गया है।‘  केंद्र सरकार के इस फैसले पर राजनीति आरंभ हो गई है। हम राजनीति से इतर साहित्य सृजन के आइने में विभाजन की विभीषिका को परखने की कोशिश करते हैं। 1947 में हमारे देश का बंटवारा हुआ। उसके बाद के हिंदी साहित्य के परिदृश्य पर नजर डालें तो इस विषय को केंद्र में रखकर बहुत कम लेखन नजर आता है। ले-देकर यशपाल की औपन्यासिक कृति ‘झूठा सच’ का दो खंड और भीष्म साहनी के उपन्यास ‘तमस’ का नाम याद पड़ता है। बदीउज्जमा के उपन्यास ‘छाको की वापसी’ के अलावा सच्चिदानंद हीरानंद  वात्स्यायन ‘अज्ञेय’, मोहन राकेश और कृष्णा सोबती ने कुछ कहानियां लिखी हैं। बहुत बाद में आकर कमलेश्वर ने भी लिखा। भीष्म जी को भी तमस लिखने में बीस साल से अधिक लगे। कथा साहित्य में तो कुछ रचनाएं मिलती भी हैं लेकिन कवियों ने तो इस ओर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया, प्रतीत होता है। अज्ञेय की ही एक कविता ‘शरणार्थी’ का स्मरण होता है। वामपंथी लेखक जिन मुक्तिबोध को अपना सबसे बड़ा कवि मानते और प्रचारित करते हैं उनकी रचनाओं में भी विभाजन की विभीषिका नहीं दिखाई देती है। दूसरी तरफ गुरुदत्त जैसे राष्ट्रवादी लेखकों ने विभाजन पर कम से कम आधा दर्जन उपन्यास लिखे। लेकिन गुरुदत्त को इन कथित प्रगतिशील लेखकों और आलोचकों ने साहित्य के परिदृश्य से ओझल कर दिया। उनकी विभाजन पर लिखी रचनाओं पर न तो आलोचनात्मक लेख लिखे गए और न ही किसी विमर्श में उनका नामोल्लेख किया जाता है। बावजूद इसके जब भी हिंदी में विभाजन पर लिखे साहित्य की बात होगी तो गुरुदत्त का नाम लेना ही पड़ेगा।  

स्वाधीनता के बाद हिंदी साहित्य में प्रगतिशीलता का झंडा लेकर घूमनेवाले लेखकों का बोलबाला रहा है। कई तरह के साहित्यिक आंदोलन चले लेकिन उन आंदोलनों में कहीं भी विभाजन की विभीषिका के दर्द और संघर्ष को जगह नहीं मिल पाई है। लाखों लोगों की जान गई, उससे अधिक लोग विस्थापित हुए। मरनेवालों के परिवार और विस्थापित समूहों के दर्द को हिंदी साहित्य के लेखक पकड़ नहीं पाए। पिछले दिनों मार्क्सवादी लेखक जगदीश्वर चतुर्वेदी से बात हो रही थी तो उन्होंने एक बेहद चौंकानेवाला तथ्य बताया। 15 अगस्त 1947 में जब देश स्वाधीन हुआ तो उसके अगले महीने यानि सितंबर में प्रयागराज (तब इलाहाबाद) में प्रगतिशील लेखक संघ की एक बैठक हुई। उस बैठक में उस वक्त के तमाम छोटे-बड़े लेखक शामिल हुए थे। सितंबर 1947 में हुए प्रगतिशील लेखक संघ की इस बैठक में 22 प्रस्ताव पास किए गए थे। इन 22 प्रस्तावों में कहीं भी विभाजन की चर्चा तो दूर की बात उसका उल्लेख तक नहीं था। ये वो दौर था जब पूरे देश में सिर्फ विभीषिका की चर्चा ही हो रही थी। यह तथाकथित प्रगतिशील लेखकों की अज्ञानता नहीं हो सकती है ये तो उदासीनता थी। बैठक के एक प्रस्ताव में एक या डेढ़ पंक्ति में सांप्रदायिकता की बात कही गई थी। ये चर्चा भी इस वजह से हुई कि प्रगतिशील लेखक संघ की बैठक के एक दिन पहले शाम को प्रयागराज के मुस्लिम बहुल इलाके में छुरेबाजी की घटना हुई थी। जिसकी वजह से प्रस्ताव में सांप्रदायिकता का उल्लेख हुआ था। ये वही प्रगतिशील लेखक संघ है जिसने 1975 में इमरजेंसी लगाए जाने के बाद दिल्ली में हुई अपनी बैठक में उसका समर्थन किया था। इमरजेंसी के समर्थन में प्रस्ताव पास किया था। इसलिए यह तर्क नहीं दिया जा सकता है कि लेखक संघों की बैठक में राजनीतिक मसलों पर प्रस्ताव पास नहीं किए जाते थे। विभाजन का दर्द वैसे भी राजनीतिक मसला नहीं था बल्कि वो सामाजिक और मानवीय मसला था। मानवता के कलेजे पर भोंके गए इस खंजर का दर्द उस समनय के हिंदी के लेखक महसूस नहीं कर सके।  

दरअसल अगर हम समग्रता में विचार करें तो इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि जिन लेखकों की आस्था कम्युनिस्ट पार्टियों में थीं वो विभाजन को लेकर उदासीन रहे, उसके दर्द को लेकर खामोश रहे। अपनी इस उदासीनता को उन्होंने बहुत करीने से दबाए रखा। वो लगातार ये नारा लगा रहे थे कि ‘ये आजादी झूठी है, देश की जनता भूखी है’ । ये नारा नहीं कम्युनिस्टों की मानसिकता को दर्शा रहा था। स्वाधीनता का ये अस्वीकार क्यों था। ये एक अलग लेख की मांग करता है। जब एक संप्रभु राष्ट्र जन्म ले रहा था तो ये कम्युनिस्ट उसका स्वागत करने की बजाए उसपर प्रश्न खड़े कर रहे थे। जब देश में लोकतंत्र स्थापित हो रहा था तो ये भूख और गरीबी का नारा लगाकर लोकतंत्र का मजाक उड़ा रहे थे। इनको ये बुनियादी बात समझ नहीं आ रही थी कि अगर देश स्वतंत्र नहीं होगा तो भूख और गरीबी कैसे हटेगी। दरअसल ये कम्युनिस्ट मन से स्वाधीनता के विरोधी थे। ये अनायास नहीं था कि देश के स्वतंत्र होने के 74 साल बाद कम्युनिस्ट पार्टी ने अपने कार्यालय पर तिरंगा झंडा फहराया। जब मातृ संगठन की ये सोच होगी तो उससे संबद्ध लेखक संगठन और उन लेखक संगठनों से जुड़े लेखक भी तो इसी सोच के आधार पर सृजन करेंगे। हिंदी साहित्य में विभाजन की विभीषिका पर कहानी-कविता तो कम लिखी ही गईं कोई विमर्श भी नहीं हुआ। तो क्या ये माना जाए कि कम्युनिस्ट विचारधारा के प्रभाव में ऐसा किया गया। 

दूसरा तर्क ये हो सकता है कि विभाजन के समय सक्रिय हिंदी के लेखकों की सोच का दायरा बहुत छोटा रहा। उनकी संवेदना में विभाजन का दर्द या विस्थापन की पीड़ा आ ही नहीं सकी। वो जिस भौगोलिक क्षेत्र में रहते थे वहां का विभाजन नहीं हुआ तो वो स्वतंत्र भारत की इस घटना को महसूस नहीं कर सके। पंजाब का विभाजन हुआ तो पंजाबी साहित्य में विभाजन को लेकर, उसके अलग अलग पहलुओं को लेकर विपुल लेखन हुआ। बंगाल का विभाजन हुआ तो बंगला में विभाजन पर, उसके असर को लेकर कई उत्कृष्ट कृतियां हैं। ये सही है कि हिंदी प्रदेश का भौगोलिक विभाजन नहीं हुआ लेकिन हिंदी प्रदेशों ने विभाजन की विभीषिका को तो बहुत करीब से देखा तो था ही। हिंदी के लेखकों की संवेदना क्यों नहीं झंकृत हुईं, ये आश्चर्य की बात है। इसी भौगोलिक प्रदेश के इतिहासकारों ने विभाजन को लेकर बहुत लिखा। भारत विभाजन के राजनीतिक पक्ष भी बहुत लिखा गया लेकिन हिंदी के लेखक अलग अलग विषयों में उलझे रहे। कहानी कविता से इतर आकर अगर आलोचना पर भी विचार करें तो वहां भी देश के बंटवारे को लेकर कोई डिस्कोर्स नहीं दिखता। रामविलास जी से लेकर नामवर सिंह तक के लेखन में इस विषय को प्रमुखता नहीं मिलती है। नामवर सिंह तो उर्दू के भी जानकार माने जाते हैं, उनको बंगला का भी ज्ञान था लेकिन उनके लेखन में भी विभाजन की बात नहीं आना हैरत में डालता है। बात घूम फिरकर वहीं पहुंचती है कि कम्युनिस्ट विचारधारा के प्रभाव में रहनेवाले लेखकों को विभाजन का दर्द या तो समझ नहीं आया या फिर वो जानबूझकर उस वक्त हुए नरसंहार और विस्थापन को लेकर आंखें मूंदे बैठे रहे। अब अगर विभाजन विभीषिका दिवस की घोषणा हुई है तो एक बार फिर से हिंदी के लेखकों को अपनी इस ऐतिहासिक भूल पर विचार करना चाहिए और उसको सुधारने का उपक्रम भी। 


Saturday, November 21, 2020

ज्ञान से लव जिहाद का प्रतिकार संभव


वर्तमान में एक बार फिर से लव जेहाद को लेकर बहस छिड़ी हुई है। उत्तर प्रदेश के कानपुर और अन्य इलाकों में लव जिहाद की कई घटनाओं ने लोगों का इस ओर ध्यान खींचा। इन घटनाओं के बाद उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश समेत कुछ अन्य राज्य लव जिहाद के खिलाफ कानून बनाने की तैयारी में हैं। इस बीच राजस्थान के मुख्यमंत्री ने इसके खिलाफ अपनी राय सामने रख दी। लव जिहाद पर जारी इस बहस के बीच खुद के प्रगतिशील होने का दावा करनेवाले विश्लेषकों ने भारतीय जनता पार्टी के नेता शाहनवाज हुसैन और मुख्तार अब्बास नकवी की शादी को लेकर भी लव जिहाद के खिलाफ कानून की बात करनेवालों का उपहास करना शुरू कर दिया। यहां वो ये भूल गए कि जिस लव जिहाद के खिलाफ कानून की बात हो रही है उसके मूल में धोखा देकर या नाम बदलकर विवाद करने का मामला है। न तो नकवी ने नाम बदलकर प्रेम किया और न ही शाहनवाज ने नाम बदलकर शादी की। ये अवांतर प्रसंग है लेकिन यहां ये उल्लेख करना आवश्यक है कि प्रगतिशीलता और निष्पक्षता का बाना धारण करनेवाले तथाकथित बुद्धिजीवी हर मसले में घालमेल करने में सिद्धहस्त हैं।लव जिहाद पर बनने वाले कानून को अगर वो प्रेम और प्यार की राह में बाधा से जोड़ दें तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। खैर..इस पर चर्चा फिर कभी। फिलहाल बात लव जिहाद पर ।

इन दिनों लव जिहाद एक बेहद गंभीर सामाजिक समस्या के तौर पर उपस्थित हुआ है जिसका फायदा आपराधिक मनोवृत्ति के लोग उठा रहे हैं। धोखा देकर लड़कियों को अपने प्रेम के जाल में फंसाना और फिर शादी कर लड़की का धर्मांतरण करवाना आ उसके लिए दबाव बनाना ही लव जिहाद के मूल में है। कहीं पढ़ा था कि किसी भी सामाजिक परिवर्तन की रफ्तार अगर धीमी रहती है तो उसको सुधार कहकर परिभाषित किया जाता है और अगर वो सामाजिक परिवर्तन काफी तेजी से होता है तो उसको क्रांति कहा जाता है। इसी तरह से अगर कोई सामाजिक बुराई धीमी गति से फैलती है तो उसपर अंकुश लगाने के लिए दीर्घकालिक योजना की जरूरत होती है लेकिन अगर सामाजिक बुराई तीव्र गति से फैलने लगती है तो उसको कानून के डंडे और सामाजिक जागृति से काबू में लाया जाता है।

पिछले दिनों जिस तरह से लव जिहाद के मामले बढ़े हैं उसको रोकने के लिए कानून बनाने की सोच उचित प्रतीत होती है। लव जिहाद जैसी सामाजिक बुराई को सिर्फ कानून बनाकर दूर नहीं किया जा सकता है। इसके लिए संस्कृति और शिक्षा के क्षेत्र में भी काम करना आवश्यक होगा। दरअसल हमारे देश में गंगा-जमुनी तहजीब का जो सिद्धांत प्रतिपादित किया गया उसका निषेध करना होगा। ऐसी कोई संस्कृति हमारे देश में नहीं है। गंगा जमुनी तहजीब के साथ साथ इस अवधारणा को भी दूर करने का उपक्रम करना होगा कि भारत विविध संस्कृतियों का देश है। हमारे देश की संस्कृति एक ही है, एक ऐसी संस्कृति जहां हम तमाम तरह की विविधताओं का उत्सव मनाते हैं। भारतीय संस्कृति की यही विशेषता रही है कि वो सबको अपने अंदर समाहित करता चलता है। भारतीय संस्कृति के सामाजिक रूप पर अगर विचार करें तो यह पाते हैं कि आर्यों और आर्येतर जातियों ने साथ मिलकर एक संस्कृति को मजबूत किया जिसे हिंदी संस्कृति के तौर पर जाना गया। मुसलमानों के भारत में आगमन के पहले जब तुर्क और मंगोल आदि भारत आए तो उन्होंने यहां की संस्कृति को अपनाया। नतीजा यह हुआ कि विविधता और बढ़ गई। इस अवधारणा को पुष्ट करने के लिए विद्यालय स्तर पर काम करने की जरूरत है। अभी हाल ही में पेश की गई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इस बात के संकेत तो हैं लेकिन बहुत स्पष्ट रूप से इसको सामने रखने की जरूरत है। स्पष्टता के साथ नीति सामने आएगी तो फिर उसके क्रियान्वयन के लिए प्रयास करना होगा। 

नैतिक शिक्षा की बात बार-बार की जाती है और तथाकथित प्रगतिशील तबका उसका उपहास करती रही है, लेकिन आज की सामाजिक समस्या को ध्यान में रखते हुए नैतिक शिक्षा की आवश्कता एक बार फिर से महसूस होने लगी है। सामाजिक और पारिवारिक संस्कार शिक्षा के मूलाधारों में से एक होना चाहिए। कथित प्रगतिशील तबका भारतीय संस्कृति या यों कहें कि हिंदू संस्कृति का ये कहकर मजाक उड़ाती रही है कि यहां लोक से अधिक परलोक को प्रधानता दी गई है। ऐसा कहने के पीछे उनका उद्देश्य यह होता है कि वो ये साबित करें कि हिंदू संस्कृति जिंदगी को जीने या संघर्ष करने की प्रेरणा नहीं देता है बल्कि पलायन की राह दिखाता है। ऐसे कथित प्रगतिशील विद्वानों को ये नहीं पता कि उनके इन तर्कों का आधार उनका अज्ञान है। हम वैदिक धर्म का सूक्षमता से अध्ययन करें तो पाते हैं कि वहां संन्यास की नहीं बल्कि गृहस्थधर्म की प्रधानता है। ऋगवेद में तो इस बात का उल्लेख मिलता है कि ऋषि वैराग्य की कामना वहीं करते बल्कि वो इंद्र से ये कहते हैं कि ‘हमारे घोड़ों को पुष्ट करो, हमारी संततियों को बलवान बनाओ, हमारे शत्रुओं को कमजोर करो आदि आदि।‘ ऋगवेद में समाज और संस्कृति की जो रेखा दिखाई देती है उसका ही विस्तार रामायण और महाभारत में भी दिखता है। गीता में भी कर्मयोग पर जोर दिया गया है। ये सारी बातें विस्तार से नई पीढ़ी को बतानी होगी। उनको पौराणिक ग्रंथों में वर्णित ज्ञान से संस्कारित करना होगा। इसके लिए जरूरी है कि शिक्षा और संस्कृति मंत्रालय मिलकर एक समेकित योजना पर काम करें। इसके लिए किसी नए संस्थान बनाने की जरूरत भी नहीं बल्कि जो संस्थाएं पहले से काम कर रही हैं उनकी कार्यप्रणाली को ठीक करके उनसे ये काम करवाया जा सकता है। बस संस्कृति और उसको मजबूत करने में रुचि की होनी चाहिए।

शिक्षा और संस्कृति को मजबूत करके हम समाज में अपने युवाओं को इस तरह से संस्कारित कर सकते हैं जिससे वो सभ्यता के दुर्गुणों के पीछे नहीं भागें। दिनकर ने सभ्यता और संस्कृति को बहुत कायदे से परिभाषित किया है। उनके अनुसार ‘सभ्यता वह वस्तु है जो हमारे पास है, संस्कृति वह है जो हम स्वयं हैं। प्रत्येक सुसभ्य व्यक्ति सुसंस्कृत नहीं होता क्योंकि संस्कृति का निवास मोटर, महल और पोशाक में नहीं, मनुष्य के ह्रदय में होता है।‘ नई शिक्षा नीति में संस्कृति को लेकर जो चीजें छूट गई हैं उसको राष्ट्रीय संस्कृति नीति बनाकर शामिल किया जा सकता है। आजाद भारत के इतिहास में अबतक हमारे देश की कोई संस्कृति नीति नहीं बनी। संस्कृति के क्षेत्र में जो लोग सक्रिय रहे उनकी सोच के हिसाब से काम होता रहा। पहले पुपुल जयकर और बाद के दिनों में कपिला वात्स्यायन की सोच सरकारी की संस्कृति को लेकर बनने वाली नीतियों को प्रभावित करती रही। इमरजेंसी के बाद के दौर में वामपंथियों की सोच ने भी भारत सरकार की नीतियों को प्रभावित किया। विदेश से आयातित विचारों के आधार पर भारतीय संस्कृति को सिर्फ व्याख्यायित ही नहीं किया गया बल्कि उसको प्रभानित करने की नापाक कोशिश भी हुई।समग्रता में संस्कृति नीति के बारे में कभी सोचा गया हो ऐसा ज्ञात वहीं है। अब जब सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लागू करने की दिशा में ठोस कदम उठाया है तब देश के लिए एक समग्र सांस्कृतिक नीति को लेकर भी विचार करना चाहिए। अगर मौजूदा सरकार इस देश में राष्ट्रीय शिक्षा नीति के साथ साथ एक समग्र संस्कृति नीति बनाने और उसको लागू करने पर विचार करती है तो लव जिहाद जैसी सामाजिक समस्याएं न्यून हो सकती हैं।

Sunday, April 14, 2013

सेक्स और साहित्य

पिछले साल जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में लेखिका अलका पांडे से उनकी किताबों पर बात हो रही थी । अलका पांडे ने अंग्रेजी में न्यूज एज कामसूत्र फॉर वूमन नाम से एक किताब लिखी थी । उन्होंने जो अनुभव बताए वो बेहद चौंकाने वाले थे । अलका जी बताया कि उनकी किताब के बाद उन्हें इरोटिक लेखक मान लिया गया । पार्टियों में उनसे अजीबोगरीब सवाल पूछे जाने लगे । उनको सेक्स क्वीन तक कहा गया । उसी तरह से मैत्रेयी पुष्पा पर भी अपने उपन्यासों में सेक्स प्रसंगों को लिखने के लिए लानत मसलामत की गई थी । उसके पहले मृदुला गर्ग के उपन्यास चितकोबरा को लेकर भी शुद्धतावादियों और नैतिकतावादियों ने कई सवाल खड़े किए थे । ऐसा नहीं है कि इस तरह के सवाल सिर्फ हिंदी लेखन में ही उठते रहे हैं । कुछ महीनों पहले बयालिस साल की पूर्व टेलीविजन स्क्रिप्ट राइटर ई एल जेम्स की पहली किताब फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे जब प्रकाशित हुई तो उसको लेकर इंग्लैंड और अमेरिका में भी जमकर बवाल मचा । कुछ आलोचकों ने तो इसे मम्मी पॉर्न का खिताब दे डाला है तो कुछ इसको वुमन इरोटिका लेखन के क्षेत्र में क्रांति की तरह देख रहे हैं। अमेरिका में इस बात को लेकर बहस छिड़ी हुई है कि इस किताब को पुस्तकालयों के लिए खरीदा जाए या नहीं। लंदन में कई पुरातनपंथी आलोचक इस किताब को पोर्नोग्राफी बताकर इसे खारिज करने पर उतारू हैं लेकिन जिस तरह से इस किताब की बिक्री हो रही है उसने तमाम आलोचनाओं को ध्वस्त कर दिया है। अमेरिका की एक टेलीविजन शो में तो एक एंकर ने इसे रैप फैंटेसी करार दे दिया। उधर कई फेमिनिस्ट लेखक-लेखिका भी इस उपन्यास के पक्ष में उठ खड़े हुए हैं और उन्हें लगता है कि इस उपन्यास ने महिलाओं के सेक्सुअल डिजायर पर अबतक पड़े पर्द को हटा दिया है, लिहाजा उस पर्दे के पीछे लेखन करनेवालों को तकलीफ हो रही है। ई एल जेम्स के पक्ष में खड़ी फेमिनिस्ट लेखिकाओं की दलील है कि इस किताब के बाद से महिलाओं को और खुलकर अपनी सेक्सुअल डिजायर के बारे में बात करने का साहस मिलेगा। सेक्सुअल डिजायर पर लिखना या फिर महिलाओं के इनर डिजायर पर लिखना हमेशा से दुधारी तलवार पर चलने जैसा होता है। जेम्स की इस किताब के साथ भी यही हो रहा है। डिक्शनरी में पोर्नोग्राफी का जो मतलब है वह यह है कि जिस लेखन को पढ़ने के बाद किसी की सेक्साकांक्षा में बढ़ोतरी ( मैटेरियल प्रोड्यूस्ड टू स्टीमुलेट सेक्सुअल एक्साइटमेंट) होती है। लेकिन लेखिका इस बात को लेकर लेखिका को सख्त आपत्ति है। उनका कहना है कि यह उपन्यास एक प्रेम कहानी है। उनके मुताबिक सेक्स प्रेम का अनिवार्य अंग है और जो भी प्रेम करते हैं वो सेक्स भी करते हैं। लेकिन यूरोप और अमेरिका में अबतक किताब और ई बुक के रूप में पचास लाख से ज्यदा प्रतियों के बिक जाने के बाद तमाम आलोचनाएं बेमानी हो गई हैं। यूनिवर्सल एंड फोकस ने उनसे पचास लाख डॉलर में उपन्यास पर फिल्म बनाने का अधिकार खरीदा है।
यह उपन्यास नायिका अनाशटेशिया और उसके प्रेमी ग्रे के इर्द गिर्द घूमता है। दोनों के बीच जिस तरह से प्यार की पींगे बढ़ रही होती है उससे यह तय हो जाता है कि ग्रे ही अन्ना का कौमार्य भंग करेगा। कौमार्य भंग करने के इस पल को दोनों विशेष बनाना चाहते हैं। वह अना के हाथ कुर्सी से हत्थे से बांधकर उसके साथ सेक्स करना चाहता है। जब अना को उसके BDSM (Bondage-discipline, dominance-submission, sadism-masochism) यानि कष्ट देकर सेक्स का आनंद लेने की प्रवृत्ति का पता चलता है तो पहले तो वो कुछ देर के लिए हिचकती है लेकिन फिर उसकी बात मान लेती है।
अमेरिका और यूरोप में इस बात को लेकर बहस चल रही है कि क्या ये सामान्य है। इस बात को लेकर भी बहस शुरू हो गई है कि क्या फीमेल इरोटिका या महिलाओं के इनर डिजायर पर इतनी खुलकर बात हो सकती है। आलोचक इस किताब को रूपर्ट कैंपबेल के स्नीरिंग लिप एंड हॉर्समैन थाईज, डायरीज ऑफ अनीस नैन, एरिका जांगस के फीयर ऑफ फ्लाइंग और नैंसी फ्राइड के उपन्यासों से आगे की कृति मान रहे हैं।
अभी हाल में ही सत्रह किताबें लिखकर मशहूर हो चुकी लेखिका और भारतीय अंग्रेजी महिला लेखन की स्टार राइटर शोभा डे की नई किताब ‘’सेठजी’’ छपकर आई है। शोभा डे के लेखन में सेक्स एक अनिवार्य तत्व की तरह आता है । तकरीबन तीन सौ पन्नों के इस उपन्यास में भी शोभा डे ने सेक्स के भरपूर प्रसंग डाले हैं। सेठजी की महिला पात्र अमृता को जब उसका पुराना प्रेमी उत्तेजना के अंतरंग क्षणों में छोड़ता है तब जिस तरह से वो अपने आप को बाथरूम में रिलैक्स करती है, इसका वर्णन बेहद घटिया है । इस तरह के कई प्रसंग और अंतरंग क्षणों के वर्णन इस किताब में है। शोभा डे के इस तरह के लेखन के मद्देनजर ही ब्रिटेन के प्रख्यात साहित्यकार रेजीनॉल्ड मैसी ने अभी हाल ही में अपने भारत दौरे के दौरान कहा था कि- लोगों के भाग्य उदय होने के अलग-अलग कारण होते हैं। मशहूर लेखिका शोभा डे भारत में एक बड़ा नाम है लेकिन उनके मशहूर होने की प्रमुख वजह उनके द्वारा रचा जाने वाला अश्लील साहित्य है। वे एक खूबसूरत महिला हैं, स्टाइलिश हैं, लेकिन मैं उन्हें गंभीर लेखक नहीं मानता।‘’ इस तरह के विवाद और विमर्श अंग्रेजी में खूब होते हैं लेकिन भारत में जहां कालिदास दशकों पहले अभिज्ञान शाकुंतल लिख गए वहां इन मसलों पर खुलकर चर्चा नहीं होती है तो क्या इसे हम हिंदी का पिछड़ापन मानें ?

 

 

Wednesday, June 30, 2010

बिखरा ‘तहलका’ का पठन पाठन

तरुण तेजपाल देश के ख्यातिप्राप्त पत्रकार हैं । तहलका के बैनर से स्टिंग ऑपरेशन कर काफी शोहरत कमा चुके हैं । अब दिल्ली से हिंदी और अंग्रेजी में तहलका पत्रिका निकालते हैं । अंग्रेजी तहलका ने तो कई वर्षों में अपनी एक अलग पहचान बनाई लेकिन हिंदी तहलका पत्रिकाओं की भीड़ के बीच अपना स्थान और पहचान बनाने के लिए संघर्ष कर रही है । कुछ अलग करने की चाहत में तहलका ने हिंदी साहित्य का रुख किया और जून में पठन पाठन के नाम पर साहित्य विशेषांक निकाला । आमतौर पर जैसा इस तरह की पत्रिकाओं के साथ होता है तहलका का साहित्य विशेषांक भी उसका शिकार हो गया है । साहित्य विशेषांक के नाम पर निकली इस पत्रिका का कोई साहित्यिक स्वरूप ही नहीं बन पाया है । सबकुछ समेट लेने की चाहत और नामचीन लोगों को बेवजह स्थान देने से में पत्रिका का पूरा स्वरूप बिखर गया । अपने संपादकीय में पत्रिका के वरिष्ठ संपादक संजय दुबे ने लिखा है- समाचार पत्रिका के साहित्य विशेषांक के अपने कुछ फायदे भी हैं । इस अंक में ना केवल दस्तावेज और अन्यान्य जैसी बहुपयोगी श्रेणियां मौजूद हैं बल्कि इसे लोकतांत्रिक और सर्वसमावेशी बनाने की ओर भी विशेष ध्यान रखा गया है । इसमें अनुभवी दिग्गजों को समुचित सम्मान देते हुए साहित्यिक संभावनाओं के नए संकेतों का भी उतनी ही गर्मजोशी से स्वागत किया है । वरिष्ठ संपादक का यह दावा है तो ठीक लेकिन इस अंक में कविता और कवियों को लेकर एक उपेक्षाभाव साफ तौर पर दिखता है । एक तरफ जहां कहानीकारों और लेखकों को प्रमुखता के साथ छापा गया है वहीं कवियों और कविताओं को रनिंग मैटर की तरह एक के बाद एक छाप कर रस्म अदायगी की गई है । ना तो किसी का कोई परिचय दिया गया है और ना ही किसी के फोटो छापे गए हैं । या तो पत्रिका के कर्ता-धर्ता यह समझते हैं कि उन्होंने जितने कवियों को छापा है वो इतने प्रसिद्ध हैं और वो किसी परिचय के मोहताज नहीं है । नाम ही काफी है की अगर सोच है तो नाम तो सही छपना चाहिए था । वरिष्ठ कवि विमल कुमार बेचारे विपल कुमार हो गए, शुक्र है विफल कुमार नहीं हुए । कई अच्छी कविताएं छपी हैं लेकिन खराब डिस्पले की वजह से वो उबर नहीं पाई । चर्चित कवि संजय कुंदन की छोटी कविता- ठीक है- आज की नई पीढ़ी की मानसिकता और उसकी सोच को प्रतिबिंबित करती है । गीत चतुर्वेदी की लंबी कविता - जाना सुनो मेरा जाना – भी इस अंक की उपलब्धि है । गीत की कविता में एक गहराई होती है जिसे पढ़कर महसूस किया जा सकता है ।
आज हिंदी साहित्य में नई पीढ़ी के कहानीकारों की रवीन्द्र कालिया ने एक फौज खड़ी कर दी है । जैसा कि आमतौर पर होता है कि अगर आप फौज बनाते हैं तो उसमें कई जांबाज के साथ साथ कुछ सुस्त भी भर्ती हो जाते हैं, कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो जंग से बचकर शॉर्चकट से निकल भागने के चक्कर में लगे रहते हैं । हिंदी कहानी की इस नई पीढ़ी में भी तीनों तरह के लोग हैं । कई नए कहानीकार बेहतरीन लिख रहे हैं और उन्होंने हिंदी को एक नई भाषा दी है । क्या कहानी लेखन में नयी पीढ़ी को लेकर मच रहा शोर रचनात्मकता है इसको केंद्र में रखकर इस अंक में- समकालीन कहानी कितना जोर कितना शोर- एक लेख छपा है । इसके लेखक दिनेश कुमार ने वरिष्ठ कहानीकारों की राय के आधार पर लेख लिखा है । काशीनाथ सिंह कहते हैं कि – ये युवा लेखक विज्ञापन की ऐसी विधियां जान गए हैं, जिनसे पुराने लेखक अपरिचित थे । वे लोग लेखन पर कम ध्यान देकर विज्ञापन की आधुनिक सुविधाओं का लाभ अधिक उठा रहे हैं । काशीनाथ जी की इस बात में दम है लेकिन ये पूरी पीढ़ी पर लागू नहीं होता । दिल्ली में कई ऐसे लेखक हैं जो संपादकों के दरबार में हाजिरी लगाकर साहित्य में अपने आपको स्थापित करने में लगे हैं । उनमें से कई कहानीकारों की कहानियां इस अंक में छपी भी हैं । ज्ञानरंजन भी नई पीढ़ी को बाजार की मांग के अनुरूप लिखनेवाला करार दे रहे हैं । युवा कहानी में एक नई भाषा और कंटेंट सामने आ रहा है जिसे ये लोग बाजार की देन मांगते हैं । मेरा इन वरिष्ठ लेखकों से यही सवाल है कि हिंदी साहित्या का बाजार कितना बड़ा है । कितने लेखकों को हिंदी साहित्य के बजार से फायदा पहुंच रहा है । आज तो हिंदी में यह हालत है कि वरिष्ठ से वरिष्ठ लेखकों की कृतियां एक हजार से ज्यादा नहीं बिक पाती हैं । उधर अंग्रेजी में अद्वैत काला जैसी नई और युवा लेखिका का उपन्यास पचास हजार प्रतियों से ज्यादा बिकता है । किस भ्रम और किस मानसिकता में जी रहे हैं हमारे बुजुर्ग साहित्यकार । इस अंक में वंदना राग की कहानी देवा- देवा अच्छी है । दूसरी तरफ उमाशंकर चौधरी की कहानी बेवजह खिंची हुई लगती है, नतीजा यह हुआ कि ना केवल कहानी बिखर गई बल्कि उबाऊ भी हो गई ।
संजय दुबे ने अपने लेख में अपने सहयोगी गैरव सोलंकी को विलक्षण लेखन प्रतिभा बताया गया है लेकिन इस अंक में छपी कहानी और कविता में विलक्षणता दिखाई तो नहीं देती ।
अपने संपादकीयमुमा लेख में संजय दुबे ने एक और दावा किया है – शायद हिंदी के किसी भी साहित्य विशेषांक के लिए यह पहला प्रयास होगा कि इस अंक में हमने विभिन्न प्रकाशकों, साहित्यकारों और समालोचकों आदि से अनुरोध करके,उनसे बात करके तमाम तरह की सर्वेक्षणनुमा जानकारियां भी संकलित की हैं । संजय दुबे ने शायद शब्द लिखकर अपने बचने का रास्ता छोड़ दिया है । उन्हें याद दिलाना चाहूंगा कि हिंदी में इस तरह के आयोजन कई बार हो चुके हैं चाहे वो अवध नारायण मुदगल के संपादन में निकला छाया मयूर का अंक हो. या फिर धीरेन्द्र अस्थाना के संपादन में निकला जागरण उदय का अंक हो । कई बार इस तरह के सर्वेक्षण प्रकाशित हो चुके हैं और इसमें नया कुछ नहीं है । तहलका में नया है तो सिर्फ उनमें छपी अशुद्धियां – बेस्य सेलर में कथा सतीसर को गांताजलिश्री का उपन्यास बता दिया गया है जबकि ये चंद्रकांता की कृति है । अन्यान्य पर भी संपादक को गर्व है लेकिन इसमें विभूति नारायण राय ने कहा है कि गोविंद शुक्ल को मिले साहित्य अकादमी पुरस्कार । गोविंद मिश्र को गोविंद शुक्ल लिखकर लेखक का अपमान किया गया है । उदय प्रकाश का बड़बोलापन भी यहां है, वो कहते हैं कि 99.9 फीसदी लेखन ऐसा ही है । हिंदी जगत में सबसे चमकदार चेहरे सबसे अयोग्य हैं । मुझे लगता है कि उदय ने जो दशमलव एक फीसदी छोड़ा है वो अपने लिए छोड़ा है क्योंकि हिंदी में वही सबसे उत्तम लिख रहे हैं । इसके अलावा भारत भारद्वाज के लेख में भी प्रतीक का प्रकाशन 1943 बताया गया है जबकि उसका प्रकाशन 1945 में शुरू हुआ था ।
संपादकीयनुमा लेख में निस्वार्थ सहयोग के लिए उपन्यासकार भगवानदास मोरवाल का आबार प्रकट किया गया है । हमें यह नहीं मालूम कि मोरवाल की भूमिका इस अंक में कितनी दूर तक थी लेकिन अंक की परिकल्पना चाहे जो भी हो अंक बेहद औसत निकला है । इसने ना तो हिंदी साहित्य की किसी विधा में कोई हलचल पैदा की है और ना ही इस अंक का कोई स्थायी महत्व है । तहलका के सामने इंडिया टुडे के साहित्य विशेषांक का उदाहरण तो था ही उसे पार करने की एक चुनौती भी थी लेकिन चुनौती स्वीकार करना तो दूर की बात यह अंक इंडिया टुडे के साहित्य विशेषांक के आस-पास भी नहीं पहुंच पाया है । मुझे यह भी नहीं मालूम कि तरुण तेजपाल की इस अंक में कितनी भूमिका है लेकिन इतना तो तय है कि संपादक के रूप में उसका नाम छपने की वजह से उनकी ही दृष्टि पर सवाल खडे़ होंगे ।

Sunday, May 3, 2009

लेखकों का शोषण करते संपादक

चंद दिनों पहले की बात है , सुबह सुबह फोन की घंटी बजी । फोन उठाने पर आवाज आई कि मैं पुष्प बोल रहा हूं । चूंकि सोते- सोते फोन उठाया था इसलिए अनायास मुंह से निकला कौन पुष्प ? उलाहने भरे स्वर में पुष्प जी ने बताया कि वो ‘साहित्य केसरी’ के संपादक विनोद पुष्प बोल रहे हैं । तबतक मैं कुछ व्यवस्थित हो चुका था और उनके उलाहना भरे स्वर के बाद सचेत भी । इधर-उधर की बातचीत के बाद पुष्प जी कहा कि उनकी पत्रिका साहित्य केसरी के लिए मुझसे एक लेख चाहिए । मैंने छूटते ही पूछा कि लेख लिखने के कितने पैसे मिलेंगे । इतना सुनते ही पुष्प जी हत्थे से उखड़ गए और कहने लगे कि – “मेरी पत्रिका साहित्य केसरी एक आंदोलन है और मैं आपसे एक आंदोलन में भागीदारी चाहता हूं और आप हैं कि आंदोलन में भागीदारी के एवज में पैसे मांग रहे हैं । मैं पिछले पच्चीस वर्षों से अनियतकालीन पत्रिका निकाल रहा हूं और आजतक किसी ने आप जैसी बेशर्मी से लेख लिखने के पैसे नहीं मांगे । चूंकि पुष्प जी मेरे पैतृक शहर से हैं और वरिष्ठ साहित्यकार भी इसलिए मैं उनकी सुनता रहा और वो मुझे तमाम सिद्धांतों की घुट्टी पिलाने में जुटे रहे, मेरे जमीर, मेरी प्रतिबद्धता आदि आदि को झकझोरने की नाकाम कोशिश करते रहे । जब वो थोड़ा रुके तो मैंने उनसे पूछा कि आप पत्रिका निकालने के लिए जो कागज खरीदते हैं उसका भुगतान करते हैं ? क्या छपाई के लिए प्रेस वाले को पैसे देते हैं ? क्या पैकिंग और पोस्टिंग पर खर्च करते हैं ? जब इन सवालों के जबाव मुझे सकारात्मक मिले, तो फिर मैंने उनसे पूछा कि लेखकों को पैसा क्यों नहीं देते ? मेरे इस सवाल का उनके पास कोई तर्कसंगत उत्तर नहीं था, जाहिर था उन्होंने फोन काट दिया । इस घटना ने मुझे विचलित कर दिया और मैं काफी देर तक इसपर विचार करता रहा कि कि क्या लेख लिखने के लिए पैसे मांगकर मैंने गलत किया । इस घटना ने मेरे सामने एक और बड़ा सवाल खड़ा कर दिया था वो सवाल जो हिंदी लेखकों की अस्मिता से जुड़ा था । मैं काफी देर तक हिंदी में निकल रहे सैकड़ों साहित्यिक पत्रिका के बारे में सोचता रहा और इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि लेखकों को मानदेय तो सिर्फ दो तीन पत्रिकाएं ही देती हैं ।
आज जब कि साहित्य में कोई भी व्यावसायिक पत्रिका नहीं बची है, लेकिन लघु पत्रिकाएं धड़ाधड़ निकल रही हैं, तो इसके पीछे के गणित पर विचार करना बी जरूरी है । साहित्यिक रुझानवाला और एक लेखक के रूप में स्थापित ना होने की कुंठा मन में संजोए लोगों के बीच संपादक बनने की होड़ सी लगी है । संपादक बनने का गणित है भी बेहद आसान । व्यक्तिगत संपर्कों और मित्रों की मदद से किसी तरह एक अंक निकालिए और बन जाइए संपादक । चूंकि साहित्यिक पत्रिकाएं अनियतकालीन होती है इसलिए यहां भूतपूर्व होने का खतरा भी नहीं है ।
लघु पत्रिकाओं के ज्यादातर संपादक आज आर्थिक तंगी का रोना रोकर लेखकों को पैसे नहीं देते लेकिन पत्रिकाओं के संपादकों के ठाठ में कोई कमी नहीं दिखाई देती है । इन साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादकों के सरोकार भी बेहद संकुचित और व्यक्ति केंद्रित हो गए हैं । लेखकीय गरिमा या फिर साथी लेखकों की प्रतिष्ठा का उन्हें कोई ख्याल नहीं है । साथी लेखकों को ये साहित्यिक संपादक ‘टेकन फॉर ग्रांटेड’ समझते हैं । न तो उनकी मेहनत का ध्यान रखते हैं और ना ही उनके लेख लिखने के दौरान हुए खर्चे, मसलन- कागज, स्याही, कंप्यूटर, प्रिंटर- आदि का । संपादक नामक ये जीव अपने सहयोगी लेखकों को पहले तो इमोशनल ब्लैकमेल करते हैं और जब उससे उनका स्वार्थ नहीं सधता तो फिर विचारधारा की धौंस देकर अपना काम निकालने की तिकड़म करते हैं ।
पत्रिका निकालने के साथ ये साहित्यिक संपादक एक और खेल खलते हैं । अब उनपर भी एक नजर डाल लेते हैं । आजकल आपको साहित्यिक पत्रिकाओं के मोटे-मोटे विशेषांक दिख जाएंगें – कोई समकालीन कविता पर, कोई उपन्यास पर , कोई कहानियों पर, कोई आलोचना की वर्तमान दशा-दिशा पर, तो कोई फिल्म पर तो कोई किसी लेखक विशेष पर केंद्रित होता है ।
दरअसल इन विशेषांको के पीछे भी धन कमाने की जुगत होती है । विशेषांक की योजना बनाते समय ही किसी प्रकाशक को इसका सहभागी बना लिया जाता है और उनसे तय हो जाता है कि पत्रिका प्रकाशन के कुछ दिनों बाद उसे पुस्तकाकार छाप दिया जाए । प्रकाशक तय होते ही किसी विषय विशेष पर पत्रिका का अंक प्रकाशित होता है । मोटी पत्रिका के प्रकाशन में आने वाला खर्च प्रकाशक वहन करते हैं । पत्रिका का मूल्य इतना अधिक होता है या रखा जाता है कि पाठक उसको कम से कम खरीदें । बची हुई पत्रिका को पहले से तय सौदे के आधार पर प्रकाशक हार्ड कवर में डालकर पुस्तक का रूप दे देते हैं । जिसे उंचे दामों पर थोक सरकारी खरीद में खपा दिया जाता है । बिक्री से जो रॉयल्टी मिलती है उसे संपादक खुद डकार जाता है और अगर लेखक किस्मतवाला हुआ तो उसे पुस्तक की एक प्रति मिल जाती है । इस प्रवृति के लाभ भी हैं लेकिन लेखकों को ईमानदारी से रायल्टी में हिस्सा तो मिलना ही चाहिए ।
इस खेल में छोटे मोटे संपादकों के अलावा कई नामचीन लेखक/ संपादक भी सक्रिय हैं और साथी लेखकों का जमकर शोषण कर रहे हैं । खुद तो पत्रिका के नाम पर ऐश करते हैं और साथी लेखकों को उनका वाजिब हक भी देना गंवारा नहीं । मेरे जानते ऐसी साहित्यिक पत्रिकाओं की एक लंबी फेहरिस्त है जो अपने लेखकों को एकन्नी भी नहीं देते उल्टे उनसे ये अपेक्षा रखते हैं कि कुछ विज्ञापन का जुगाड़ कर दें या फिर कुछ प्रतियां बेचने का इंतजाम करें ।
ये एक ऐसा सवाल है जिसपर पूरी लेखक बिरादरी को गंभीरता से विचार करने की जरूरत है । आज हिंदी के प्रकाशकों पर गाहे बगाहे लेखकों की रॉयल्टी हड़पने का आरोप लगता है । कुछ लेखक तो बकायदा लिखकर भी इसके खिलाफ अपनी आवाज उठा चुके हैं, कुछ विवाद मित्रों के बीचबचाव की वजह से सामने आने से रह जाते हैं । लेकिन मेरे जानते किसी ने भी साहित्यिक लघु पत्रिकाओं के संपादकों द्वारा लेखकों के शोषण को विषय बनाकर इसे किसी भी मंच पर उठाने की कोशिश नहीं की है । संपादकों के इस छलात्कार का जोरदार विरोध लेखकों को हर उपलब्ध मंच पर करना चाहिए ताकि शोषण के खिलाफ अपनी रचनाओं में आवाज उठानेवाले खुद के शोषण को बेनकाब कर सके । अंत में मुझे वरिष्ठ साहित्यकार उपेन्द्र नाथ अश्क से जुड़ा एक दिलचस्प प्रसंग याद आ रहा है । अश्क जी को एक बार एक प्रतिष्ठित पत्रिका के संपादक ने समीक्षा के लिए एक पुस्तक भिजवाई । पत्रिका के साथ लिखे पत्र में संपादक ने आग्रह किया कि पुस्तक प्राप्ति की सूचना दें । अश्क जी ने पुस्तक प्राप्ति की सूचना का जो पत्र लिखा वो कुछ यों था – प्रिय भाई समीक्षा के लिए आप द्वारा प्रेषित पुस्तक प्राप्त हुई, आभार । लेकिन पुस्तक के साथ यदि आप समीक्षा लेखन के मानदेय का चेक भी संलग्न कर देते तो मैं हुलसकर समीक्षा लिखता और उत्साह के साथ उसे आपको प्रेषित करता, सादर आपका, अश्क ।