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Sunday, May 22, 2016

नामकरण में साहित्यकारों से परहेज क्यों

अभी हाल ही में केंद्रीय विदेश राज्यमंत्री मंत्री वी के सिंह ने शहरी विकास मंत्री वेंकैया नायडू को पत्र लिखकर दिल्ली के अकबर रोड का नाम बदलकर महाराणा प्रताप के नाम पर करने का अनुरोध किया । यह खबर अभी चल ही रही थी कि ऋषि कपूर ने एक के बाद एक दनादन ट्वीट करके सियासत की दुनिया में सनसनी फैला दी । ऋषि कपूर ने गांधी-नेहरू परिवार पर सीधे हमला बोला और सवाल पूछा कि क्या सिर्फ एक ही परिवार के सदस्यों के नाम पर एयरपोर्ट और सड़कों के नाम रखे जाने चाहिए । साथ ही ऋषि कपूर ने कलाकारों के नाम लिखकर ये प्रश्न खड़ा किया कि उनके नाम पर कोई सड़क, कोई एयरपोर्ट या किसी सरकारी इमारत का नाम क्यों नहीं रखा जाता है । ऋषि कपूर ने चूंकि इसमें गांध-नेहरू परिवार का नाम ले लिया था इस वजह से जो सियासत शुरू हुई उसमें कई बातें दबकर रह गई । ऋषि के ट्वीट्स की भाषा पर भी कई लोगों ने सवाल खड़े किए। यह सब अपनी जगह पर ठीक है लेकिन कपूर ने अपने एक ट्वीट में कलाकारों के नाम पर सड़क, एयरपोर्ट या सरकारी इमारत का नाम नहीं रखने की जो बात की वो कहीं इस राजनीतिक बयानबाजी के कोलाहल में दबकर रह गई । इस सवाल पर हमें गंभीरता से विचार करना चाहिए कि किसी राजधानी में हमें कोई प्रेमचंद मार्ग या निराला मार्ग क्यों नहीं मिलता है । किसी एयरपोर्ट का नाम रामधारी सिंह दिनकर या सुमित्रानंदन पंत के नाम पर क्यों नहीं दिखाई देता है । किसी विश्वविद्लाय का नाम मुक्तिबोध या मोहन राकेश के नाम पर क्यों नहीं दिखाई देता है । हमारे समाज में साहित्यकारों को लेकर इस उदासीनता के भाव की वजह क्या है । हमें इस बात पर गंभीरता से विचार करना चाहिए । क्या इन सड़कों, इन इमारतों या फिर एयरपोर्ट्स के नाम पर सिर्फ और सिर्फ हक नेताओं का ही है । इस बात पर राष्ट्रव्यापी बहस क्यों नहीं होती है कि नामकरण के वक्त साहित्यकारों के नाम पर भी विचार हो । राजधानी दिल्ली में हर छोटे-बड़े-मंझोले नेता के नाम पर सड़क, चौक, फ्लाईओवर आदि है लेकिन अगर सुब्रह्ण्यम भारती और दिनेश नंदिनी डालमिया का नाम छोड़ दिया जाए तो मुझे याद नहीं पड़ता कि किसी सड़क का नाम किसी भी भाषा के साहित्यकार के नाम पर है । साहित्य अकादमी के भवन का नाम छोड़ दिया जाए तो याद नहीं पड़ता कि किसी सरकारी इमारत का नाम किसी वरिष्ठ साहित्यकार के नाम पर हो । ऐसा क्यों होता है । क्या सत्ता में रहनेवाले लोग ही बारी बारी से अपने नेताओं के नाम पर सड़को इमारतों का नामकरण करते रहेंगे । क्या साहित्यकारों के प्रति हमारी कोई श्रद्धा नहीं है । क्या देश रचनात्मक लेखन करनेवालों का ऋणी नहीं है ।  
दरअस अगर हम देखें तो आजादी के बाद हमारे देश में साहित्यकारों की बहुत इज्जत थी । हिंदी समेत अन्य भारतीय भाषाओं के विद्वानों को राज्यसभा में जगह दी जाती थी । भारतीय भाषाओं के नुमाइंदे तब संसद में हुआ करते थे । बाद में कलाकारों के कोटे से फिल्म अभिनेताओं को जगह दी जाने लगी ।यह गलत भी नहीं है । साहित्यकारों के नाम पर फिल्मों के स्क्रिप्ट लिखनेवाले राज्यसभा पहुंचने लगे । हिंदी का आखिरी साहित्यकार, अगर हम याद करें. जो कि राज्यसभा पहुंचे थे वो थे विद्यानिवास मिश्र । विद्यानिवास मिश्र को अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने मनोनीत किया था । उसके बाद तो फिल्मों से, खेल जगत से तो लोग नामांकित होते रहे लेकिन साहित्य को लेकर उदासीनता बनी रही । कालांतर में तो सक्रिय राजनीति कर रह और चुनाव में हारे हुए नेताओं को सरकार राज्यसभा में मनोनीत करने लगी । साहित्य और साहित्यकारों की जगह कम होती चली गई ।
साहित्यकारों को लेकर कुछ नेताओं के मन में किस तरह के विचार हैं यह वी के सिंह के उस बयान से पता चलता है जो उन्होंने पिछले साल भोपाल में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन के ठीक पहले दिया था ।  यह उस सरकार के मंत्री का बयान था जिसके मुखिया यानि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्वयं कवि हैं और उनकी कविता की पुस्तकें प्रकाशित हैं । स्वयं वी के सिंह की बी किताब प्रकाशित है और पाठकों द्वारा पसंद की की जा रही है । हलांकि वी के सिंह ने बाद में सफाई देकर कहा था कि लेखकों को अपमानित करने की उनकी मंशा नहीं थी ।
दरअसल अगर हम विचार करें तो देखते हैं कि साहित्य और राजनीति के बीच खाई गहरी होती जा रही है, साहित्यकारों और नेताओं के बीच की दूरी बढ़ती जा रही है । सत्तर के दशक के बाद हिंदी में इस प्रवृत्ति ने जोर पकड़ा था कि लेखकों को नेताओं के साथ मंच शेयर नहीं करना चाहिए । लेखकों ने नेताओं को हेय दृष्टि से देखना शुरू किया था । इनमें वो लेखक ज्यादा थे जो कि अपनी रचनाओं के लिए अजय भवन के संदेशों का इंतजार करते थे । इसका नतीजा यह हुआ कि राजनीति और साहित्य में दूरियां बढ़ती चली गईं । मुझे याद पड़ता है कि दो एक साल पहले बिहार के सांसद पप्पू यादव की आत्मकथा का विमोचन नामवर सिंह ने किया था तो नामवर सिंह पर जमकर हमले हुए थे । पिछले साल एक कहानी पुरस्कार वितरण समारोह में एक वरिष्ठ साहित्यकार ने इस वजह से आने से इंकार कर दिया था क्योंकि वहां दिल्ली के उपराज्यपाल को भी होना था । राजनेताओं के साथ मंच साझा नहीं करने की प्रवृत्ति ने साहित्य और राजनीति के विचारों की आवाजाही को रोक दिया । आयातित विचारधारा की संस्कृति ने अपनी सोच को आगे बढ़ाने के लिए हर तरह के बैरियर लगाए थे । अपनी संस्कृति को छोड़कर हम बाहर से आई संस्कृति के हिसाब से काम करने लगे थे । तभी तो राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा था – जातियों का सांस्कृतिक विनाश तब होता है जब वे अपनी परंपराओं को भूलकर दूसरों की परंपराओं का अनुकरण करने लगते हैं । जब वे मन ही मन अपने को हीन दूसरों को श्रेष्ठ मानकर मानसिक दासता को स्वेच्छया स्वीकार कर लेती है । पारस्परिक आदान-प्रदान तो संस्कृतियों का स्वाभाविक धर्म है, किन्तु जहां प्रवाह एकतरफा हो, वहां यही कहा जाएगा कि एक जाति दूसरे जाति की सांस्कृतिक दासी हो रही है । किन्तु सांस्कृतिक गुलामी का इन सबसे भयानक रूप वह होता है, जब कोई जाति अपनी भाषा को छोड़कर दूसरों की भाषा को अपना लेती है और उसी में तुतलाने को अपना परम गौरव मानने लगती है । यह गुलामी की पराकाष्ठा है, क्योंकि जोजाति अपनी भाषा में नहीं सोचती, वह अपनी परंपरा से छूट जाती है और उसके स्वाभिमान का प्रचंड विनाश हो जाता है ।‘ दिनकर जी की बातों को अगर हम वृहत्तर परिप्रेक्ष्य में देखें तो सारी बातें साफ हो जाती है । दिनकर के इस कथन से सूत्र पकड़ने की जरूरत है जब वो एकतरफा प्रवाह की बात करते हैं ।
दूसरी बात यह है कि दूसरों को श्रेष्ठ मानकर मानसिक दास्ता को स्वीकार कर लेते हैं तो विकास अवरुद्ध हो जाता है । आत्मविश्वास की कमी हो जाती हैं । अपने सांस्कृतिक विचारों से मार्क्स के विचारों को श्रेष्ठ मानने का नतीजा आज हम सबके सामने है । किसी मार्क्सवादी कवि में ये नैतिक साहस नहीं है जो दिनकर में था । आज कौन सा कवि लिख सकता है कि – मर्त्य मानव की विजय का तूर्य हूं मैं, उर्वशी ! अपने समय का सूर्य हूं मैं ।  अब यह पंक्ति कहने का साहस कवि को है तो उसके पीछे उसका अपनी परंपराओ पर अपनी संस्कृति पर गर्व और विश्वास की ताकत है । उसका आत्मविश्वास है । अपने समय का सूर्य हूं कहना मामूली बात नहीं है । सवाल यही है कि जिस तरह से हमारे साहित्यकार एक पक्ष में खड़े होते चले गए उसने साहित्य को राजनीति का एक पक्ष बना दिया और जब आप एक पक्ष बन जाते हैं तो दूसरा पक्ष आपका अनदेखी करता ही है । साहित्य और साहित्यकारों की अनदेखी तो दोनों पक्षों ने की । हिंदी के सबसे बड़े लेखक नामवर सिंह ने तो विचारधारा की ध्वजा भी उठाई थी और चुनाव भी लड़ा था लेकिन उस विचारधारा ने कभी भी नामवर सिंह को संसद में भेजने का नहीं सोचा । बंगाल के हर तरह के छोटे मोटे नेता, प्रोफेसर आदि को राज्यसभा में भेजा गया नामवर सिंह के बारे में सोचा भी नहीं गया । आज जरूकत इस बात की है कि हमारे देश में सड़को, इमारतों और एयरपोर्ट के नामकरण के लिए एक नीति और समिति बनाई जानी चाहिए । उसमें साहित्य कला और संस्कृति के नुमाइंदे भी हो जो सरकार को इस बात का सुझाव दें । अगर ऐसा हो पाता है तो अच्छा होगा वर्ना नामकरण को लेकर राजनीतिक वर्ग खासकर सत्ताधारी दल की मनमानी चलती रहेगी और जिस परिवार या वर्ग का उस दल पर वर्चस्व रहेगा वो अपनी मनमानी करता रहेगा । वक्त आ गया है कि आजादी के बाद से हुई गलतियों से सबक लेने की और उसको ठीक करने की योजना पर अमल करने की ।  


Tuesday, October 27, 2015

बयानवीरों से हलकान पार्टियां

हरियाणा में दो दलित बच्चों की चिता की आग अभी ढंडी भी नहीं हुई थी कि विदेश राज्यमंत्री जनरल वी के सिंह के बयान ने सिसायत को गर्मा दिया । दरअसल वीके सिंह ने एक बार फिर से भारतीय राजनीति में डॉग नैरेटिव का उपयोग कर विपक्ष को हमला करने का मौका दे दिया। दो दलित बच्चों की संदिग्ध मौत की बात हो रही थी उसी दौरान ये कहना कि कोई कुत्ते पर पत्थर भी फेंके तो केंद्र सरकार को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है, बेहद आपत्तिजनक और असंवेदनशील है । बाद में जनरल वी के सिंह ने अपने इस बयान के लिए माफी भी मांगी । जनरल वी के सिंह को इस बात का एहसास नहीं रहा होगा कि उनके इस बयान का बिहार चुनाव पर भी असर पड़ सकता है । विरोधियों ने वी के सिंह के इस बयान को दलित विरोधी कहकर खूब प्रचारित किया । चुनाव पर इसका क्या असर होगा ये तो नतीजों वाले दिन पता चलेगा लेकिन इतना तो तय है कि जनरल ने विरोधियों के हाथ में एक सियासी असलाह तो दे ही दिया । बीजेपी के नेताओं में जनरल साहब की गिनती बयानवीरों में की जाती है । वो मौके बेमौके अपने बयानों से विवाद का बवंडर खड़ा करते रहते हैं । चाहे वो पाकिस्तनी दूतावास में भोज का मसला रहा हो या फिर विश्व हिंदी सम्मेलन के पहले साहित्यकारों के बारे में दिए गए बयान हों । अगर हम देखें तो एनडीए सरकार में ऐसे और भी मंत्री हैं जो बयानवीर हैं । संस्कृति मंत्री महेश शर्मा भी अपने बयानों से विरोधियों के निशाने पर तो आते ही रहते हैं, पार्टी और सरकार को भी मुश्किल में डालते रहते हैं । इसी तरह से गिरिराज सिंह और संजीव बालियान भी केंद्रीय मंत्री होते हुए भी ऐसे बयान देते रहते हैं जिसपर पार्टी को सफाई देनी पड़ती है । पिछले सप्ताह बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने अपने मंत्रियों और सांसदों को बुलाकर झाड़ पिलाई थी और उनसे संभलकर बोलने की नसीहत दी थी । लगता नहीं है कि अमित शाह की फटकार का कोई असर हुआ है । केंद्रीय मंत्री और सांसदों के उलजलूल बयानों से परेशान पार्टी के लिए उनके मुख्यमंत्री भी परेशानी खड़ी करते रहे हैं । जब पूरे देश में बीफ को लेकर बहस चल रही थी तो उसके बीच ही हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने ये कहकर बीफ पॉलिटिक्स को गरमा दिया कि अगर मुसलमानों को हिंदुस्तान में रहना है तो बीफ खाना छोड़ना होगा । इन नेताओं को कौन समझाए कि इस तरह के बयानों का बड़ा गहरा असर होता है । खट्टर के बयान को लालू यादव और नीतीश कुमार की पार्टी ने बिहार के मुस्लिम बहुल इलाकों में जमकर प्रचारित किया । माना जा रहा है कि मुस्लिम बहुल इलाकों में खट्टर के बयानों का असर पड़ा है और ये चुनावी नतीजों में रिफलेक्ट हो सकता है ।
अब अगर हम सारे बयानों को देखें तो यह साफ तौर पर लगता है कि बीजेपी के पहली बार सांसद बने और फिर मंत्री बन गए वी के सिंह और महेश शर्मा में राजनीतिक परिपक्वता की कमी है । सधा हुआ राजनेता वो होता है जो समय, काल और परिस्थिति के मुताबिक सही उदाहरणों के साथ अपनी बात रखता है । वी के सिंह ने बात बिल्कुल सही कही कि हर घटना के लिए केंद्र को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है लेकिन उनके कहने का तरीका ना सिर्फ गलत बल्कि आपत्तिजनक भी था । इसी तरह से महेश शर्मा ने भी अखलाक की हत्या को हादसा बताकर विवादों को जन्म दे दिया था । दरअसल इन नेताओं को बहुत सोचसमझकर बयान देने की जरूरत है । इन्हें यह समझना होगा कि ये केंद्र सरकार के नुमाइंदे हैं और ये जो भी बोलते हैं उसकी गूंज बहुत दूर और देर तक सुनाई देती है । हरियाणा के मुख्यमंत्री खट्टर को को भी समझना होगा कि वो एक संवैधानिक पद पर हैं । ये तो हुई सत्ताधारी दल के नेताओं की बात । अब अगर हम विपक्ष में देखें तो वहां भी कई विवादवीर नजर आते हैं । लालू यादव से लेकर आजम खान तक । लालू यादव ने अमित शाह के बारे में जिस तरह के शब्दों का इस्तेमाल किया वो बेहद अशोभनीय है । इसी तरह से यूपी के कद्दावर परंतु बड़बोले मंत्री आजम खान ने रेप को लेकर विवादित बयान दिया। सूबे में बढ़ती रेप की घटनाओं को रोकने में राज्य सरकार की नाकामी को छिपाने के लिए आजम खान इस वारदात के लिए मोबाइल फोन को जिम्मेदार ठहराया है । उनका दावा है कि मोबाइल में बगैर पैसे बहुत गंदगी देखने को  मिलती है । यहां गंदगी से उनका मतलब इंटरनेट पर मौजूद पोर्न फिल्में हैं । आजम खान कहते हैं कि छोटे छोटे बच्चे पोर्न फिल्में डाउनलोड करते हैं । उनके मुताबिक इसमें ऐसी फिल्में भी डाउनलोड हो जाती हैं जिसमें दो ढाई साल के बच्चों के साथ दुष्कर्म होता है । क्या ये माना जाए कि पोर्न फिल्में देख कर ही रेप किए जा रहे हैं । लोकतंत्र में नेताओं को समाज के रहनुमा के तौर पर देखा जाता है लेकिन जब इन रहनुमाओं के बोल और विचार इस तरह के होंगे तो इनसे जनता की बेहतरी के लिए काम करने की अपेक्षा बेमानी होगी । जनता विषम परिस्थियों में इन नेताओं की ओर देखती है लेकिन जब इनके मुंह से ऐसी बातें सुनती है तो उनका मोहभंग होता है जो बदलाव की जमीन तैयार करता है ।