Translate

Showing posts with label शास्त्री. Show all posts
Showing posts with label शास्त्री. Show all posts

Saturday, March 30, 2024

अकादमिक बौद्धिक वर्ग पर उठते प्रश्न


आमतौर पर इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स पर साहित्य को लेकर प्रशंसात्मक पोस्ट ही अधिक देखने को मिलती है। ‘तू पंत, मैं निराला’ वाली शैली में एक दूसरे की तारीफ करते हुए लेखक मिल जाते हैं। वैचारिक टिप्पणियां बहुत ही कम देखने को मिलती है।  जो भी टिप्पणियां होती हैं वो अपनी विचारधारा को पोषित करने या दूसरी विचारधारा को नीचा दिखाने के लिए की गई प्रतीत होती हैं। लेकिन पिछले दिनों फेसबुक पर एक ऐसी टिप्पणी देखने को मिली जिसने बहुत ही आधारभूत प्रश्न तो छुआ। टिप्पणी छोटी थी लेतिन उसके पीछे प्रश्न बहुत बड़ा था। उसने विचार करने पर मजबूर कर दिया। प्रकाशन जगत से जुड़े आलोक श्रीवास्तव ने एक टिप्पणी लिखी, किसी समय राष्ट्र बन रहा था इस भाषा के जरिए, अब इस भाषा में वैयक्तिक महात्वाकांक्षाएं, दुरभिसंधियां और उदासियां बची हैं। इसका साथ उन्होंने 1962 में उत्तर प्रदेश हिंदी समिति के प्रकाशनों की एक सूची डाली। उनका आश्य हिंदी भाषा से था क्योंकि उन्होंने जो सूची लगाई थी वो हिंदी में प्रकाशित पुस्तकों की थी। उनकी टिप्पणी को उद्धृत करते हुए कोलकाता में रहनेवाले साहित्य और इतिहास के अध्येता प्रोफेसर हितेन्द्र पटेल ने अपने विचार रखे। लिखा- स्वाधीन भारत में साठ के दशक तक भारतीय भाषाओं में ज्ञान-विज्ञान की किताबें छपती थीं और सरकारी सहयोग भी था। स्वाधीनता आंदोलन और उसके पूर्व के नवजागरण काल में भारतीय भाषाओं में यह प्रयास मिशनरी भाव से होता रहा था। लेखकों ने त्याग और तपस्या का जीवन चुना था ताकि देश में एक नया बौद्धिक वातावरण तैयार कर सकें। उसके बाद एक नया अकादमिक बौद्धिक वर्ग उभरा जिसके लिए ज्ञान-विज्ञान की भाषा बस अंग्रेजी ही हो सकती थी। उन्होंने आगे लिखा कि इस पोस्ट को पढ़कर बस इसको याद दिलाने का मन हुआ। प्रोफेसर पटेल की इस टिप्पणी ने कई प्रश्न खड़े किए जिसमें सबसे अधिक महत्वपूर्ण अकादमिक बौद्धिक वर्ग को लेकर है। वो कौन सी स्थितियां थीं जिनमें साठ के दशक के बाद उभरे नए अकादमिक बौद्धिक वर्ग ने भारतीय भाषाओं को ज्ञान-विज्ञान की भाषा न मानकर अंग्रेजी को प्राथमिकता देना आरंभ किया। इसके लिए हमें साठ के दशक के उत्तरार्ध की स्थितियों के बारे में विचार करना होगा।  

यह वो दौर था जब देश ती जनता का नेहरू की नीतियों से मोहभंग हो रहा था। शास्त्री जी के असामयिक निधन के बाद इंदिरा युग का उदय हो रहा था। भाषा के आधार पर प्रांतों का गठन हो चुका था। हिंदी के विरुद्ध गैर हिंदी भाषी प्रदेशों में एक वातावरण बना दिया गया था। स्वाधीनता के बाद और नेहरू के शासनकाल में वामपंथियों ने अकादमिक जगत में जो बीज बोया था वो अब पेड़ बन गया था। साहित्य और मानविकी के क्षेत्र में वामपंथी अपनी जड़ें जमा चुके थे। उन्होंने माहौल बनाना आरंभ कर दिया था कि हिंदी और भारतीय भाषाओं में ज्ञान विज्ञान की बातें हो ही नहीं सकती हैं। वो अपने लेख से लेकर लेक्चर तक में विदेशी विद्वानों को उद्धृत करने लगे थे। पुस्तकें विदेशी अवधारणाओं के आधार पर तैयार की जाने लगी थी। भारतीय शब्दों को विदेशी शब्दों से विस्थापित किया जाने लगा था। भारतीय भाषाओं के शब्दों के अर्थ को संकुचिच करके उसके समान अर्थ वाले शब्द अकादमिक जगत में पेश किए गए थे। देशभर के विश्वविद्यालयों में इस तरह का माहौल बनाना गया था जैसे चेखव और ब्रेख्त कालिदास से बड़े नाटककार थे। समाज विज्ञान और दर्शन के क्षेत्र में भारतीय विद्वानों की मान्यताओं पर विदेशी विद्वानों को महत्वपूर्ण बताया जाने लगा था। भारत की मेधा और बुद्धिमत्ता पर प्रश्नचिन्ह खड़ा किया जाने लगा था। पूरी दुनिया को शून्य की अवधारणा से परिचित करानेवाले देश को बताया जाना लगा कि गणित और विज्ञान के लिए विदेशी फार्मूले अधिक उपयुक्त हैं। विदेशी फार्मूले को समझने के लिए विदेशी भाषा का ज्ञान आवश्यक है। मैकाले ने जो स्वप्न देखा था और जिसके आधार पर उसने भारत में शिक्षा पद्धति आरंभ करवाई थी, स्वाधीनता के बाद उसको रोकने का गंभीर प्रयास नहीं हुआ। हिंदी में लिखी पुस्तकें ओझल की जाने लगीं। हिंदी के स्थान पर अंग्रेजी की पुस्तकों को प्राथमिकता मिलने से गैर साहित्यिक विषयों पर पुस्तकें प्रकाशित करनेवाले प्रकाशक कम होते चले गए। 

याद पड़ता है जबलपुर विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास और संस्कृति विभाग के आचार्य और अध्यक्ष रहे डा राजबली पांडेय ने एक पुस्तक लिखी थी, भारतीय नीति का विकास। ये पुस्तक बिहार राष्ट्रभाषा परिषद से साठ के दशक के मध्य में प्रकाशित हुई थी। इसमें डा राजबलि पांडेय ने नीतिशास्त्र पर विस्तार से अपनी बात रखी थी। इस पुस्तक की भूमिका में बिहार राष्ट्रभाषा परिषद के उस समय के निदेशक भुवनेश्वरनाथ मिश्र माधव ने लिखा है कि नीतिशास्त्र हिताहित का विवेचन करनेवाला शास्त्र है। इसका अध्ययन करने के मनुष्य को अपने कर्तव्य-अकर्तव्य, सत्य-असत्य, उचित अनुचित, शुभ-अशुभ आदि का ज्ञान होता है और वह जीवन यात्रा में उपयुक्त मार्ग पर अग्रसर होने में समर्थ होता है। नीति के अभाव में मानव का पथभ्रष्ट होना स्वाभाविक है। अब नीति की ऐसी व्याख्या या परिभाषा पश्चिम के विद्वानों के यहां नहीं मिलती। वो तो पालिसी की बात करते हैं और हमारे यहां के विद्वान नीति को पालिसी समझने की भूल कर बैठते हैं। सिर्फ नीतिशास्त्र ही नहीं बल्कि इतिहास, विज्ञान, गणित, दर्शन, पदार्थ शास्त्र, योग दर्शन, राजनीति शास्त्र, पश्चिम की विचारधाराओं और विदेश नीति पर हिंदी में मौलिक पुस्तकें लिखी गईं थी और प्रकाशित भी हुई थीं। चाहे वो राज्य सरकारों की अकादमियों से प्रकाशित हों या काशी नागरी प्रचारिणी सभा से या अन्य संस्थाओं से। आचार्य रामचंद्र शुक्ल हिंदी साहित्य में आलोचक के रूप में समादृत हैं लेकिन उन्होंने भारतीय वस्त्रों से लेकर राजनीति और अन्य विषयों पर विपुल लेखन किया है, अधिकतर हिंदी में। अगर प्राचीन हस्तलिखित पोथियों के विवरण पर नजर डालेंगे तो वहां भी हिंदी में विविध विषयों पर लिखी गई पुस्तकों के बारे में जानकारी मिलेगी। उस विवरण में दर्शन, विज्ञान और धर्म पर लिखी पोथियों की लंबी सूची दिखाई देती है।

आज जब राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू होने के प्राथमिक चरण में है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी निरंतर भारतीय भाषाओं में शिक्षा को लेकर आग्रही बने हुए हैं तो अब एक महती जिम्मेदारी आती है संस्थाओं पर। इन संस्थानों का दायित्व बनता है कि वो प्राचीन काल में हिंदी में विभिन्न विषयों पर लिखी गई मौलिक पुस्तकों को खोजें और उसको अद्यतन करवाकर फिर से प्रकाशित करें। आज शिक्षा के क्षेत्र में धन की कमी नहीं है, प्रचुर मात्रा में संसाध्न उपलब्ध करवाए जा रहे हैं, आवश्यकता है मजबूत इच्छाशक्ति की। अगर इस भ्रम को तोड़ना है कि ज्ञान विज्ञान की भाषा हिंदी नहीं हो सकती है तो पहले इस भाषा में ज्ञान विज्ञान की लिखी पुस्तकों का पुनर्प्रकाशन करना होगा। प्रोफेसर हितेन्द्र पटेल भी कहते हैं कि उस स्वदेशी परंपरा का नवोन्मेष हो, इन किताबों का पढ़ने पढ़ाने का एक आंदोलन हो। और कुछ हो न हो करमजले यह कहना बंद करेंगे कि इन भाषाओं में भान विज्ञान की चर्चा कैसे करें। पढ़ने पढ़ानेवाले नवबौद्धिकों ने ही अंग्रेजी के प्रभुत्व को बढ़ाने में अपनी स्वार्थपरता, काहिली और लोलुपता से मदद की है। ये विस्मृत कर चुके हैं कि हिंदी, मराठी या बांग्ला में विपुव मात्रा में ज्ञान विज्ञान पर पुस्तकें लिखनेवाले लोग थे। अंत में एक बात और कह देना आवश्यक है कि इस कार्य में सरकारी संस्थाओं और विश्वविद्यालयों को पहल करनी होगी। साहित्य, कला, इतिहास और समाज शास्त्र से जुड़ी अधिकतर सरकारी संस्थाएं इवेंट मैनेजमेंट कंपनी बन गई हैं। सेमिनार और गोष्ठियां करवा कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री मान लेते हैं। जबकि होना ये चाहिए कि ये संस्थाएं हिंदी में मौलिक लिखवाने का प्रयास करें। ऐसा करनेवाले लेखकों को बेहतर मानदेय दें। अगर ये संभव हो पाता है तो हिंदी का गौरव पुनस्थापित हो सकेगा।  



Saturday, April 23, 2022

समृद्ध बने प्रधानमंत्री संग्रहालय


हाल ही में दिल्ली के तीन मूर्ति भवन परिसर में प्रधानमंत्री संग्रहालय का शुभारंभ किया गया ।  स्वाधीनता के अमृत महोत्सव वर्ष में देश के सभी प्रधानमंत्रियों को याद किया गया। इस संग्रहालय में उन सभी के योगदान को एक स्थान पर देखने समझने का अवसर उपलब्ध करवाया गया। देश की राजधानी दिल्ली में पहले से तीन प्रधानमंत्रियों की स्मृति को सहेज कर रखा गया था। जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद उनके निवास स्थान तीन मूर्ति भवन को ही नेहरू स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय बना दिया गया था । नई दिल्ली के ही 1, सफदरजंग रोड को पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की स्मृति में समर्पित कर दिया गया। ये वही स्थान है जहां इंदिरा गांधी की हत्या हुई थी। नेहरू स्मारक संग्रहालय में नेहरू जी से जुड़ी रखी गई हैं और इंदिरा गांधी स्मृति में उनसे जुड़ी सामग्रियों के अलावा महत्वपूर्ण अवसरों के चित्र आदि हैं। इस भवन में इंदिरा गांधी के पारिवारिक अवसरों के चित्र भी सहेज कर रखे गए हैं। इसके अलावा नई दिल्ली क्षेत्र में ही पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की स्मृति में भी एक भवन है। इस भवन मे शास्त्री जी से जुड़ी चीजों को रखा गया है। ये भवन नई दिल्ली के 1 मोतीलाल नेहरू पैलेस, मान सिंह रोड के पास स्थित है। ये तीनों भवन बहुत बड़े भूखंड में फैले हैं। इंटरनेट मीडिया पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक इंदिरा गांधी स्मृति की जिम्मेदारी एक निजी ट्रस्ट के पास है जिसकी प्रमुख सोनिया गांधी हैं। लाल बहादुर शास्त्री स्मृति की देखभाल भी एक निजी ट्रस्ट ही करता है।

तीन मूर्ति भवन में प्रधानमंत्री संग्रहालय के शुभारंभ के आसपास इस तरह के समाचार आए कि इंदिरा गांधी और राजीव गांधी से जुड़ी चीजें नेहरू-गांधी परिवार से मांगी गई थी, ताकि उनको संग्रहालय में संजा जा सके। नए बने संग्रहालय को गांधी परिवार की ओर से कोई सहयोग नहीं मिल पाया। खबरें तो इस तरह की भी आई थीं कि जिस परिवार ने देश को तीन प्रधानमंत्री दिए उस परिवार का कोई सदस्य प्रधानमंत्रियों के संग्रहालय के शुभारंभ के अवसर पर उपस्थित नहीं हो सका था। संस्कृति मंत्रालय के मुताबिक गांधी परिवार को इस समारोह में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया था। सोनिया गांधी परिवार का प्रधानमंत्री संग्रहालय को लेकर उदासीनता के कारण स्पष्ट नजर आते हैं। गांधी-नेहरू परिवार के दो प्रधानमंत्रियों की स्मृति में बड़े-बड़े संग्रहालय बनाए गए लेकिन अन्य प्रधानमंत्रियों को लेकर उपेक्षा भाव बना रहा। यह अकारण नहीं है कि मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह, चंद्रशेखर, आई के गुजराल और अन्य प्रधानमंत्रियों की स्मृतियों को सहेजने और उनकी उपलब्धियों को प्रदर्शित करने का कोई संस्थागत प्रयास नहीं दिखाई देता है। जबकि इन सभी प्रधानमंत्रियों का किसी न किसी रूप में देश के विकास में योगदान रहा है। नरसिम्हा राव की याद में भी कोई संग्रहालय दिल्ली में हो, ऐसा ज्ञात तो नहीं है। जबकि नरसिम्हा राव ने प्रधानमंत्री के तौर पर देश के आर्थिक विकास को एक नई दिशा दी थी। प्रकांड विद्वान थे। कई भाषाओं के ज्ञाता थे। उनकी समृद्ध लाइब्रेरी भी थी। प्रधानमंत्री के तौर पर उनका कार्यकाल स्वाधीन भारत के इतिहास में कई अहम घटनाओं का गवाह रहा है। 

नरसिम्हाराव के निधन के बाद की घटनाओं को अगर याद किया जाए तो परिवार से बाहर के प्रधानमंत्रियों को लेकर उपेक्षा भाव का कारण साफ समझ आता है। 23 दिसंबर 2004 को नरसिम्हा राव का दिल्ली में निधन हुआ। उसके बाद क्या क्या घटा उसके बारे में विनय सीतापति ने अपनी पुस्तक ‘हाफ लायन, हाऊ पी वी नरसिम्हा राव ट्रासफार्म्ड इंडिया’ में लिखा है। नरसिम्हा राव का पार्थिव शरीर उनके मोतीलाल नेहरू वाले सरकारी घर में लाया गया तो उस समय के गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने  उनके पुत्र प्रभाकर को सलाह दी कि अंतिम संस्कार हैदराबाद में किया जाना चाहिए। प्रभाकर ने जब दिल्ली में अंतिम सस्कार की बात की तो शिवराज पाचिल ने बेहद रूखे अंदाज में उनसे कहा कि कोई आएगा नहीं। बाद में उस वक्त के आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाई एस राजशेखर रेड्डी ने भी प्रभाकर को फोन करके हैदराबाद में राव के अंतिम संस्कार की बात की थी और इसके लिए उनको तैयार करने के लिए दिल्ली भी आए थे। ये प्रसंग यहीं खत्म नहीं हुआ था। उस शाम को सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह और प्रणब मुखर्जी के साथ राव के अंतिम दर्शन के लिए पहुंची थीं। तब मनमोहन सिंह ने भी प्रभाकर राव से जानना चाहा था कि परिवार का राव के अंतिम संस्कार के बारे में क्या विचार है। प्रभाकर ने सोनिया गांधी की उपस्थिति में मनमोहन सिंह को दिल्ली में अपने पिता के अंतिम संस्कार करने की इच्छा जताई थी। बाद में अहमद पटेल ने भी परिवार को हैदराबाद में राव का अंतिम संस्कार करने के लिए के लिए राजी करने की कोशिश की थी। राव के परिवारवालों पर जब हैदराबाद के लिए दबाव बनने लगा तो उन्होंने दिल्ली में राव का एक भव्य स्मारक बनाने की शर्त रखी थी। राव का पार्थिव शरीर घर में रखा हुआ था और उनके अंतिम संस्कार को लेकर राजनीति हो रही थी। उसी रात को राव के परिवारवालों की तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात करवाई गई। शिवराज पाटिल ने राव के परिवार वालों की मौजूदगी में मनमोहन सिंह को दिल्ली में राव के स्मारक की बात बताई। मनमोहन सिंह ने सुनते ही स्वीकृति दे दी और परिवारवालों को भरोसा दिया कि राव का स्मारक दिल्ली में बनेगा उसमें कोई दिक्कत नहीं है। पूरे प्रकरण के दौरान प्रभाकर राव को महसूस हुआ था कि सोनिया गांधी राव का दिल्ली में अंतिम संस्कार नहीं होने देना चाहती थीं। वो दिल्ली में राव का स्मारक बनाने के पक्ष में भी नहीं थीं। इसका दबाव परिवार पर था। आखिरकार परिवार हैदराबाद में अंतिम संस्कार के लिए तैयार हो गया। लेकिन महत्वपूर्ण बात ये कि सोनिया गांधी दिल्ली में राव के स्मारक को लेकर अनिच्छुक बनी रहीं। राव के प्रति उपेक्षा भाव का असर रहा कि उनका कोई स्मारक दिल्ली में नहीं बन पाया।

यही अनिच्छा और उपेक्षा भाव दिल्ली में अन्य प्रधानमंत्रियों के संग्रहालय बनने की राह में बाधा हो सकती है। नरेन्द्र मोदी ने पार्टी और मत से ऊपर उठकर इस कार्य को किया। अब जब कि दिल्ली में सभी प्रधानमंत्रियों का संग्रहालय एक स्थान पर निर्मित हो गया है तो केंद्र सरकार को एक काम और करना चाहिए। दिल्ली में इंदिरा गांधी स्मृति और लालबहादुर शास्त्री स्मारक का भी प्रधानमंत्री संग्रहालय में विलय करने के बारे में गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। सभी लोगों से सलाह मशविरा करके इसको अंतिम रूप दिया जा सकता है। इंदिरा जी को जिस स्थान पर गोली मारी गई थी उसको एक स्वरूप दिया जा सकता है और उस भवन का अन्य उपयोग किया जा सकता है। बाबरी विध्वंस के बाद श्रीरामजन्मभूमि  पर जो लोग अस्पताल और स्कूल खोलने का तर्क दे रहे थे उनको भी इन भवनों के खाली होने से अच्छा लगेगा। संभव है कि वो स्कूल और अस्पताल वाला तर्क फिर से दोहरा दें। लेकिन अगर ऐसा हो पाता है तो इसके दो लाभ होगें। एक तो देश विदेश के पर्यटकों को इंदिरा जी और लालबहादुर शास्त्री से जुड़ी सभी जानकारियां एक जगह पर उपलब्ध होंगी और उनको एक स्थान पर देखने की सहूलियत भी होगी।  तीन मूर्ति भवन में जिस भव्यता के साथ संग्रहालय का निर्माण हुआ है उसमें तकनीक का बेहतरीन उपयोग हुआ है। एक कनमी खटकती है कि सभी प्रधानमंत्रियों से जुड़ी चीजें वहां उपलब्ध नहीं है। अगर इंदिरा स्मृति और शास्त्री स्मारक को वहां शिफ्ट कर दिया जाता है तो ये कमी भी पूरी हो सकती है।