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Saturday, June 15, 2019

सकारात्मक के साथ सृजन का दौर


पिछले दिनों एक साहित्यिक जमावड़े में आज के लेखकों के आचार-व्यवहार पर चर्चा हो रही थी। बहस इस बात पर हो रही थी कि साहित्य में निंदा-रस का कितना स्थान होना चाहिए। साहित्यकारों के बीच होनेवाले गॉसिप से लेकर एक दूसरे को नीचा दिखाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर भी चर्चा होने लगी। वहां मौजूद सबलोग इस बात पर लगभग एकमत थे कि साहित्य में नकारात्मकता ने सृजनात्मकता का काफी नुकसान पहुंचाया। साहित् में नकारात्मकता को बढ़ावा देने के लिए फेसबुक को जिम्मेदार ठहरानेवाले भी मुखरता के साथ अपना पक्ष रख रहे थे। दरअसल ये हमेशा से होता आया है कि जब एक जगह कई साहित्यकार मिलते हैं तो गॉसिप और निंदा पुराण का दौर चलता ही है। साहित्यक जमावड़े में रसरंजन की तरह ये भी एक अनिवार्य तत्व है। कई लेखकों ने इस बारे में लिखा भी है लेकिन बहुत कुछ अलिखित रह गया है। हिंदी के मशहूर उपन्यासकार-नाटककार मोहन राकेश ने 19 जुलाई 1964 को अपनी डायरी में लिखा- ‘कल शाम सी सी आई में चले गए, भारती, गिरधारी, राज और मैं। हम लोग पहले गए, राज बाद में आया। भारती के साथ ज्यादा साहित्यिक राजनीति की ही बातें होती रहीं। वात्स्यायन के बंबई आने का किस्सा, जो पहले बार-बार वे लोग सुना चुके हैं, वह फिर से सुनाने लगा, तो उसे याद दिला दिया कि यह माजरा नया नहीं है। ज्यादा बातें हुईं- दिल्ली के छुटभैयों के बारे में, टी-हाउस, कॉफी हाउस के बारे में, उन कहानीकारों के बारे में जिनसे वक्तव्य नहीं मंगवाए गए। उनके बारे में जिन्होंने वक्तव्य नहीं भेजे। एक मजाक हुआ। राज से गिरधारी ने कहा ‘तुम्हारे मुंह से शराब की गंध आती है।‘ ‘तुम्हारे मुंह से तुलसीपत्र की गंध आती है’ राज ने उससे कहा और फिर बोला, और ‘ये जो दो चले जा रहे हैं, उनके मुंह से प्रेमपत्र की गंध आती है।‘ इसपर भारती रुककर बोला ‘क्यों गलत बात कहते हो? राकेश के मुंह से तो हमेशा त्यागपत्र की गंध आती है।’ भारती मतलब धर्मभारती और वात्स्यायन माने अज्ञेय जी। मोहन राकेश की डायरी के इस अंश में कई तरह के संकेत निकल रहे हैं। पहली ही पंक्ति में कहा गया है कि सबसे ज्यादा बात साहित्यिक राजनीति की हुई। इसका मतलब है कि उस दौर में भी साहित्य में खूब राजनीति होती थी। जब राजनीति होगी तभी को बातें होगीं। फिर वात्स्यायन के मुंबई (उस वक्त का बंबई) आने का किस्सा भी फिर शुरू हुआ था। कोई ऐसा किस्सा जरूर रहा होगा जिसको साहित्यिक जमावड़े में बार-बार दोहराया जाता होगा। उस किस्से को इतनी बार दोहराया जा चुका था कि उस दिन उस किस्से को बीच में ही रोक दिया गया। अगर बार-बार दोहराया जाता होगा तो वो होगा भी दिलचस्प। मुंबई में बैठकर दिल्ली के लेखकों के बारे में भी बातें होती रही थीं। जाहिर सी बात है कि जिस अंदाज में उस प्रसंग को लिखा गया है उससे इस बात का सहज अंदाज लगाया जा सकता है कि या तो निंदा पुराण का पाठ हुआ होगा या फिर जमकर गॉसिप।
इसके अलावा एक और चीज जो लेखकों के बीच देखने को मिलती थी वो थी ईर्ष्या। इसके बारे में तो सैकड़ों उदाहरण मौजूद हैं लेकिन मोहन राकेश और राजेन्द्र यादव का उदाहरण देना इस वजह से उचित लगता है कि ये दोनों काफी गहरे मित्र भी थे। हिंदी की नई कहानी त्रयी के दो मजबूत स्तंभ थे। तीसरे कमलेश्वर थे। मोहन राकेश को जब अगस्त, 1959 में उनके नाटक ‘आषाढ़ का एक दिन’ के लिए संगीत नाटक अकादमी की ओर से सर्वश्रेष्ठ नाटक का अवॉर्ड देने की घोषणा हुई तो मोहन राकेश ने लिखा कि ‘यादव का व्यवहार फिर कुछ अजीब सा लगा। न जाने क्यों मुझे छोटा बतलाकर या समझकर उसे खुशी होती है।‘ मोहन राकेश साफ-साफ कह रहे हैं कि उनके पुरस्कार मिलने से राजेन्द्र यादव को अच्छा नहीं लगा। बात सिर्फ यादव और राकेश की नहीं है। उपेन्द्र नाथ अश्क और महादेवी के बीच जिस तरह का शीतयुद्ध चलता था वो जगजाहिर है। दिनकर ने भी अपनी डायरी में एक समकालीन कवि-सांसद के ईर्ष्या भाव को उजागर किया ही है। बावजूद इन सबके उस दौर में ज्यादातर रचनाकर अपने समकालीनों पर लिखते भी थे, उनकी अच्छी रचनाओं की तारीफ भी करते थे। राजेन्द्र यादव, मोहन राकेश और कमलेश्वर के बीच चाहे जितनी ईर्ष्या रही हो लेकिन वो तीनों एक दूसरे को काफी प्रमोट करते थे। एक दूसरे के बारे में ग़ॉसिप भी करते थे लेकिन सार्वजनिक मंचों पर एक दूसरे की तारीफ करते थे, लेख लिखकर एक दूसरे की रचनाओं को स्थापित करते थे।
उस वक्त के साहित्यिक माहौल और अब के साहित्यिक माहौल में थोड़ा अंतर आ गया है। ईर्ष्या अब भी है, निंदा-पुराण का पाठ अब भी होता है, लेकिन सार्वजनिक रूप से अपने समकालीनों की तारीफ करने की प्रवृत्ति का ह्रास हुआ है। आज के ज्यादातर लेखक-लेखिकाओं में अपने समकालीनों को लेकर एक अजीब किस्म का भाव देखने को मिलता है जिसका फेसबुक पर बहुधा प्रकटीकरण भी हो जाता है। इसके अलावा गॉसिप में एक आवश्यक दुर्गुण चरित्र हनन का शामिल हो गया है जो कि चिंताजनक है। अगर हम इस पर गंभीरता से विचार करें तो इस तरह की प्रवृत्ति पिछले दस साल में ज्यादा बढ़ी है। आज से दस-पंद्रह साल पहले लेखन की दुनिया में आए रचनाकारों के साथ तकनीक की घुसपैठ भी साहित्य में बढ़ी। फेसबुक साहित्यकारों के बीच लोकप्रिय हुआ। वैसे लेखक जो फेसबुक को एक बुराई के तौर पर देखते थे अब दिनभर वहीं पाए जाने लगे। फेसबुक ने कई लेखकों को अहंकारी बना दिया। उनकी रचनाओं पर सौ पचास लाइक्स और कमेंट आने से वो खुद को प्रेमचंद या मन्नू भंडारी समझने लगे। बढ़ते अहंकार ने उनकी रचनात्मकता को प्रभावित किया। कुछ वाकए तो ऐसे भी सामने आए जिनमें लेखकों या लेखिकाओं ने अपने समकालीन लेखक या लेखिका के चरित्र पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कीचड़ उछाला। फेक आईडी के आधार पर एक दूसरे को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की गई। फेसबुक ने निंदा-पुराण और गॉसिप के तंत्र को विकसित होने के लिए एक ऐसा मंच दिया जो बेहद उर्वर साबित हुआ। यहां मोहल्ले के छुटभैये दादाओं की तरह साहित्यिक गिरोह बने, उनके सरगना बने और फिर अपने साथियों को निबटाने का खेल खेला गया। अब भी खेला जा रहा है, यह स्थिति साहित्य सृजन के लिए बेहतर नहीं कही जा सकती है। फेसबुक की व्यापक पहुंच की वजह से इस तरह के गिरोहों का आतंक भी बढ़ा। 
अब अगर हम एकदम नई पीढ़ी की बात करें तो उसमें एक खास किस्म की सकारात्मकता दिखाई देती है। सत्य व्यास, दिव्य प्रकाश दूबे, अंकिता, विजयश्री तनवीर की नई वाली हिंदी की टोली से लेकर खुद को गंभीर लेखन की परंपरा के मानने वाले प्रवीण कुमार, उमाशंकर चौधरी जैसे लेखकों के सार्वजनिक व्यवहार से साहित्य में सकारात्मकता का एहसास होता है। ये सभी लोग फेसबुक पर सक्रिय हैं लेकिन वहां एक दूसरे की रचनाओं पर खुश होकर टिप्पणियां करते हैं, चर्चा करते हैं। नई वाली हिंदी की जो टोली सोशल मीडिया पर है वो आपस में खूब चुहलबाजी करती है, मजाक मजाक में ही अपनी और अपनी पीढ़ी के अन्य लेखकों की कृतियों का प्रमोशन भी करती चलती है। इस टोली के किसी सदस्य को कभी नकारात्मक टिप्पणी करते हुए नहीं देखा गया है। यही इस पीढ़ी की ताकत है और इनको अपनी पूर्ववर्ती पीढ़ी से अलग भी करती है। इसी वजह से उनकी व्यापक स्वीकार्यता भी है, ऐसा प्रतीत होता है। इनका एक अपना पाठक वर्ग बना है जो इनके नाम से पुस्तकों की खरीद करता है। पाठकों को इन लेखकों की साहित्येतर टिप्पणियों में जो सृजनात्मकता देखने को मिलती है उसके आधार पर ही वो इनकी कृतियों तक जाने का मन बनाते हैं। नई वाली हिंदी की इस पीढ़ी के ठीक पहले वाली पीढ़ी के कई लेखकों ने नकारात्मकता को अपनी पहचान बनाई। उसकी वजह से पूरी पीढ़ी को नुकसान हुआ। फेसबुक पर हमेशा नकारात्मक बातें, सिद्धांत और विचारधारा की आड़ में गाली-गलौच उनकी पहचान बन गई। उनके व्यक्तित्व के साथ वो नकारात्मक पहचान चिपक गई। अब इस बात पर विचार किया जाना चाहिए कि उदारीकरण के स्थायित्व प्राप्त कर लेने के बाद साहित्य में इस तरह की नकारात्मकता क्यों बढ़ी और फिर उसके बाद की जो पीढ़ी आई उसने खुद को सकारात्मकता के सांचे में डालकर पाठकों के बीच लोकप्रियता हासिल की। हिंदी साहित्य के अध्येताओं के लिए इसके कारणों की तलाश करनी चाहिए। क्या पता कुछ दिलचस्प निष्कर्ष निकल आए।  


Tuesday, November 5, 2013

सूना हुआ हिंदी का जीवंत कोना

उनतीस अक्टूबर तड़के मॉर्निंग वॉक के लिए जाने को तैयार होकर मोबाइल उठाया तो देखा कि उसमें कई साहित्यक मित्रों के मिस्ड कॉल और मैसेज थे । राजेन्द्र यादव नहीं रहे का एसएमएस पढ़ते ही लगा कि दुनिया थम सी गई । मॉर्निंग वॉक से लौटकर चाय पीते हुए हर दिन तकरीबन साढे सात से आठ बजे के बीच यादव जी से बात होती थी । अस्सलाम आलेकुम के बाद या तो किसी मुद्दे पर बहस होती थी या फिर चंद सेंकेड में फोन रख दिया जाता था । ज्यादातर मैं ही उनको फोन करता था और अगर मैं ना कर पाऊं तो वो नाश्ते के बाद सवा आठ साढे आठ बजे फोन कर लेते थे । फोन उठाते ही उधर से आवाजा आती- क्या कर डाला । मैं कहता फिलहाल तो कुछ नहीं तो कहते कर डालो कुछ तो करो यार । साहित्य जगत बहुत ठंडा पड़ा है । कभी नई-नई किताबों पर बात होती या फिर नए विमर्शों पर । मुझे ठीट ठीक याद नहीं कि यह सिलसिला कब से शुरू हुआ । लेकिन मेरा अनुमान है कि पिछले दस सालों से तो ये बातचीच हो ही रही थी । उनके निधन के पहले वाली शाम यानि अट्ठाइस अक्टूबर को उनसे लंबी बात हुई थी । उन्होंने मुझे इस बात के लिए हड़काया था कि हंस का मेरा स्तंभ उन्हें देर से मिलता है । उनकी शिकायत थी कि मेरी वजह से पत्रिका में काम करनेवालों को देर होती है । उन्होंने मुझसे वादा लिया था कि पांच से दस तारीख के बीच मैं अपना स्तंभ उनको भेज दिया करूंगा । यह पूरा प्रसंग बताने का मतलब सिर्फ इतना था कि यादव जी हमारे जैसे अदने से लेखक का भी ना केवल उत्साहवर्धन करते थे बल्कि लगातार कुछ लिखने के लिए उकसाते रहते थे । अभी पिछले ही हफ्ते अचानक एक दिन उनका फोन आया – अरे यार काफ्का ने अपने पिता को एक खत लिखा था । मैंने कहा कि हां बहुत लंबा और बहुत मशहूर खत है वो । तो उन्होंने कहा कि ये मुझे फौरन चाहिए । मैंने कहा कि दफ्तर के लिए निकल गया हूं कल सुबह आपके गेट पर छोड़ दूंगा । हमारे बीच किताबों, लेखों का आदान प्रदान उनकी सोसाइटी आकाशदर्शन के गेट मौजूद गार्ड के माध्यम से ही होता था । मुझे कुछ दोना होता था तो मैं गेट पर लिफाफा छोड़ देता था और उनको कुछ देना होता था तो मेरे नाम का लिफाफा वो अपने गेट पर रखवा देते थे । अभी उनका आखिरी लिफाफे में हंस का नवंबर अंक मिला था । लिफाफे के ऊपर इतने बड़े साइज में मेरा नाम लिखा था कि मैंने मिलते ही उनको फोन किया कि इतने बड़े साइज में क्यों लिखा तो उन्होंने कहा कि छोटा तुम्हें दिखता नहीं तो हंस का अंक गुम हो जाता । 
राजेन्द्र यादव से पहली मुलाकात हंस के उनके दफ्तर में 1991 में हुई थी, तब मैं दिल्ली आया ही आया था। उसके पहले उनसे लंबे लंबे पत्र व्यवहार हुए थे । पहली मुलाकात में ही वो इस तरह से मिले जैसे सालों से जानते हों । फिर कई मुलाकातें हुईं । जिस संबंध की नींव दरियागंज के हंस के दफ्तर में पड़ी थी वो बाइस सालों के बाद उनके निधन से खत्म हुआ लेकिन स्मृति में अब भी ताजा रहा करेगा । राजेन्द्र यादव के व्यक्तित्व का अगर मूल्यांकन करें तो उसके चार पड़ाव आपको साफ तौर पर दिखाए देंगे । नई कहानी के दौर के पहले कहानी मनोरंजन के तौर पर (मुझे ठीक से याद नहीं पर शायद नामवर जी ने कहीं ऐसा लिखा है ) पढ़ी जाती थी लेकिन इस दौर के कहानीकारों ने उसे मनोरंजन से मुक्त कर यथार्थ की जमीन पर ला पटका था । और इस काम के अगुवा बने थे मोहन राकेश, कमलेश्वर और राजेन्द्र यादव । इन तीनों ने उस दौर में अपनी काहनियों के माध्यम से कहानी की स्थापित मान्यताओं को छिन्न भिन्न कर दिया था । उसके बाद राजेन्द्र यादव का योगदान है हंस । अस्सी के दशक में जब संस्थागत पूंजीवाली हिंदी की पत्रिकाएं एक एक कर दम तोड़ रही थी तो उस वक्त राजेन्द्र यादव ने हंस को पुनर्प्रकाशित करने का जोखिम उठाया । जोखिम इस वजह से कि उसके पीछे कोई संगठित पूंजी नहीं था, थी सिर्फ इच्छाशक्ति और मित्रों का साथ । नामवर जी हमेशा कहते हैं कि राजेन्द्र का नाम सिर्फ हंस की वजह से ही सुनहले अक्षरों में लिखा जाएगा । लगातार अट्ठाइस साल तक बगैर किसी बाधा के व्यक्तिगत प्रयासों से एक मासिक पत्रिका का प्रकाशन किसी चमत्कार से कम नहीं है । राजेन्द्र यादव ने इस चमत्कार को कर दिखाया था । हंस का एक बड़ा योगदान यह भी है कि उसने हिंदी में नए कहानीकारों की कई पीढ़ियां तैयार कर दी – जिसमें उदय प्रकाश, अखिलेश, शिवमूर्ति, सृंजय, संजय खाती जैसे नामचीन कथाकार हैं । इसी हंस के माध्यम से राजेन्द्र यादव ने हिंदी साहित्य के हाशिए पर पड़े दलित और स्त्री को विमर्श के जरिए साहित्य के केंद्र में स्थापित कर दिया। यह राजेन्द्र जी का हिंदी साहित्य को बड़ा योगदान है । उन्होंने कई लेखिकाओं को हंस में छापकर उन्हें ना केवल पहचान दिलवाई बल्कि प्रसिद्धि भी । मैत्रेयी पुष्पा तो खुलेआम कहती हैं कि हंस उनके लिए विश्वविद्यालय है । हलांकि यादव जी के इस स्त्री विमर्श के भी कई छोर थे और उनपर स्त्री विमर्श की आड़ में देह विमर्श के भी आरोप लगते रहते थे । लेकिन इस तरह के आरोपों से उनको ऊर्जा मिलती थी । विवादों में बने रहने की उनकी आदत की वजह से नामवर जी उन्हें विवादाचार्य कहा करते थे । नामवर जी के साथ उनकी नोंकझोंक बेहद आनंददायक हुआ करती थी, सार्वजनिक मंच पर भी और व्यक्तिगत रसरंजन के कार्यक्रमों में भी ।

इसके अलावा यादव जी ने हंस के संपादकीय के माध्यम से सांप्रदायिकता के खिलाफ भी एक मुहिम छेड़ी थी । उनके एक संपादकीय में हनुमान पर टिप्पणी से इतना विवाद उठा कि उनके खिलाफ कई केस हुए । हंस की प्रतियां जलाई गईं । हंस के दफ्तर के बाहर हिंदू कट्टरवादियों ने तोड़ फोड़ की । लेकिन यादव जी इससे डिगे नहीं । उस दौर में उन्हें सुरक्षा मिली थी । उनकी जिंदादिली की एक मिसाल- उनका विरोध चल रहा था, उनके घर के बाहर सुरक्षा गार्ड तैनात थे । सुबह सुबह उनका फोन आया- अरे यार कभी तुम एके 47 के साथ सोए हो । साली रात भर सोने ही नहीं देती । रातभर तंग करती रहती है । हटवाओ किसी तरह से । उन्होंने प्रयत्नपूर्वक अपनी सुरक्षा वापस कर दी । यादव जी की भारतीय लोकतंत्र में अगाध श्रद्दा थी । विचारों में वो खुद को प्रगतिशील मानते थे लेकिन हंस को उन्होंने एक लोकतांत्रिक मंच बनाया जहां निशंक भी छपते थे और घोर वामपंथी भी । यादव जी के जाने से हिंदी साहित्य का एक जीवंत कोना बेहद सूना हो गया है । निकट भविष्य में उसी भारपाई संभव नहीं दिखाई देती ।