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Saturday, January 31, 2026

उतरने लगा लेखक संघों के मुखौटे का रंग


हमारे देश में कम्युनिस्ट पार्टियों ने अपने बौद्धिक प्रकोष्ठ बनाए थे। उनका नाम लेखक संगठन रखा था। इन लेखक संगठनों को स्वायत्त होने का वातावरण बनाया गया था। जबकि ये परोक्ष तौर पर राजनतिक दल से जुड़े थे। लंबे समय तक यही होता रहा और इन लेखक संगठनों से जुड़े लोग राजनीतिक बयानबाजी करते रहे। राजनीतिक मुद्दों को अपनी रचनाओं में उठाते रहे। इसका लाभ उनके पितृ संगठन यानि कम्युनिस्ट पार्टियों को मिलता रहा। कालांतर में ये लेखक संगठन एक्सपोज होते चले गए। लेखक संगठन लेखकों के कल्याण के लिए कुछ नहीं करके अपने राजनीतिक आकाओं की लक्ष्य प्राप्ति का वातावरण बनाने में लगे रहे। जैसे-जैसे कम्युनिस्ट पार्टियों में विभाजन होता गया लेखक संगठन भी बंटते चले गए। प्रगतिशील के बाद जनवादी और उसके बाद जन संस्कृति नाम से संगठन बने। जनवादी लेखक संगठन और जन संस्कृति मंच तो अधिकतर वार्षिक आयोजनों तक सिमट कर रह गए हैं। नियमित रूप से फेसबुक आदि पर उनके पदाधिकारी कुछ लिखकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेते रहे हैं। फासीवाद और अधिनायकवाद जैसे नारे वर्षों से कागजों में लगते रहे हैं। यही बात अलग अलग तरीके से कम्युनिट पार्टियां भी करती रही हैं। प्रगतिशील लेखक संघ की बिहार ईकाई सक्रिय थी लेकिन अब वहां भी संगठन बंटा नजर आ रहा है। दो अलग अलग गुटों के अपने अपने पदाधिकारी हैं। ये तो इन लेखक संगठनों की स्थिति है, लेकिन अभी एक बहुत ही मजेदार स्थिति पैदा हुई है। कुछ समय पूर्व प्रगतिशील लेखक संगठन ने पूर्व पुलिस अधिकारी और कुलपति विभूति नारायण राय को अपना कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया था। 

राय के कार्यकारी अध्यक्ष बनने के बाद भी संगठन के क्रियाकलापों में तेजी आई हो ऐसा दिखा नहीं। एकाध आयोजन आदि हुए लेकिन लेखकों के व्यापक हित में संगठन ने कुछ कार्य किया हो, ज्ञात नहीं हो सका। विनोद कुमार शुक्ल और एक दो अन्य लेखकों ने प्रकाशकों को एकतरफा पत्र भेजकर पुस्तक प्रकाशन  का अधिकार वापस लेने की बात की। लेखक संगठनों ने कभी भी इन मसलों में हस्तक्षेप नहीं किया। न तो प्रकाशकों के हित में और ना ही लेखकों के हित में। इन लेखक संगठनों को ये भी समझ नहीं आ सकी कि कोई लेखक एकतरफा करार को कैसे रद कर सकता है। उसी तरह प्रकाशकों के साथ बैठकर लेखकों को मिलनेवाली रायल्टी पर भी कुछ ठोस नहीं कर सके। इनकी सारी ऊर्जा अपने राजनीतिक आकाओं को प्रसन्न करने में लगी रही। इन लेखक संगठनों ने लेखकीय अस्पृश्यता को भी जमकर बढ़ावा दिया। अपने से अलग विचारधारा वाले लेखकों के साथ संवाद नहीं करना इनकी प्राथमिकता में रहा। इस तरह लेखकों को बांटने का काम भी इन संगठनों ने किया। कभी भी इन लेखक संगठनों ने अलग अलग विचार वाले लेखकों को साथ बैठाकर साहित्यिक प्रवृत्तियों पर चर्चा करने का मंच उपलब्ध नहीं करवाया। परिणाम ये रहा कि इन लेखक संगठनों का दायरा सिकुड़ता चला गया। भारतीय समाज हमेशा से समावेशी रहा है। समाज के इस चरित्र को समझने में कम्युनिस्ट लेखक संगठन असफल रहे और अपने ही बने दायरे में घूमते रहे। विभूति नारायण राय ने प्रगतिशील लेखक संघ के कार्यकारी अध्यक्ष होने के बावजूद जब लेखक संघों की भूमिका पर सवाल उठाए तो उनके  विचार को निजी विचार माना गया। प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव सिरसा ने एक पत्र जारी किया जिसमें राय को कठघरे में खड़ा किया गया। उस पत्र में ही बताया गया कि राय ने एक इंटरव्यू में कहा कि लेखक संगठनों की अब कोई भूमिका नहीं बची है और उनको बंद कर दिया जाना चाहिए। दूसरी टिप्पणी राय की ये थी कि देश में पिछले चार दशकों से भी अधिक समय से सशक्त वामपंथी संघर्ष के अंत के आसार दिखने लगे हैं। दूसरी टिप्पणी को उन्होंने 2025 की उपलब्धि के तौर पर रेखांकित किया। 

प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव के हस्ताक्षर से जारी पत्र में लिखा गया है कि प्रगतिशील लेखक संघ का राष्ट्रीय नेतृत्व अपने कार्यकारी अध्यक्ष के विचारों से सहमत नहीं है। माओवाद के खात्मे पर सिरसा के पत्र में लिखा है कि जिन जगहों से माओवादी के सफाए को विभूति जी ने अमित शाह की उपलब्धि के तौर पर रेखांकित किया है वो सभी आदिवासी क्षेत्र हैं। जिनको माओवादी कहकर मारा गया है उन घनाओं पर भी झूठे एनकाउंटकर के आरोप लगे हैं। सिरसा के इस पत्र का विभूति नारायण राय ने उत्तर दिया और लिखा कि लेखक संगठनों को अब व्हाट्सएप लेखक संगठन कहना उचित होगा। राय ने अपने पत्र में अपनी विचारधारा का प्रदर्शन भी किया, लेकिन बहुत ही सधे तरीके से सिरसा को और उनकी आलोचना करनेवालों की ठीक से खबर भी ले ली। विभूति नारायण राय ने सिरसा के पत्र का जो उत्तर दिया है उसमें अपने इस्तीफे की पेशकश भी कर दी और संगठन के दायित्वों से मुक्त होने की बात लिखी। विभूति ने लिखा कि संगठन अनुशासन से चलता है लेकिन साहित्येतर अनुशासन किसी भी लेखक के लिए आत्महत्या जैसा है। हलांकि लेखक संघ ने उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया है। संभव है कि विभूति के तार्किक पलटवार को झेल पाने में संगठन सक्षम नहीं हो। राय ने दक्षिणपंथी सच्चिदानंद जोशी और रामबहादुर राय को कार्यक्रम में बुलाने पर भी अपना पक्ष रखा और माओवाद के खात्मे वाली टिप्पणी पर भी। प्रगतिशील लेखक संगठन के इस विवाद ने एक बार फिर से कम्युनिस्टों की बराबरी और समानता के दावों और नारों की पोल खोल दी है। कम्युनिस्ट दावे बराबरी की करते हैं लेकिन वैचारिक आधार पर समाज को बांटनेवाली ये विचारधारा अपने विरोधियों को एक मिनट भी झेल नहीं सकती। इनका चरित्र समावेशी बिल्कुल नहीं है। ये दूसरों पर फासीवादी होने का आरोप जड़ते हैं लेकिन इनका स्वयं का चरित्र फासीवादी है। ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करते हैं लेकिन अगर इनके संगठन से जुड़ा कोई व्यक्ति भी सच कहने का साहस करे तो संगठन से जुड़े लोग झुंड बनाकर उनपर आक्रमण करते हैं। उनको नेतृत्व का भी शह प्राप्त होता है। 

इस पूरे प्रसंग से एक बात साफ हो गई है कि बचे-खुचे लेखक संगठनों में आंतरिक लोकतंत्र और विमर्श की कोई जगह शेष नहीं है। इस प्रसंग में एक और खतरनाक बात सिरसा ने लिखी है। उन्होंने अन्य नामों के साथ उमर खालिद के नाम का भी उल्लेख करते हुए लिखा कि उनको कानूनी शिकंजे में फंसाकर परेशान किया जा रहा है। सिरसा को क्या ये पता नहीं कि देश की अदालतों ने उमर खालिद को जमानत देने से इंकार कर दिया है। वो दंगे का आरोपी है। दरअसल ये होता तब है जब आप राजनीतिक दल के बौद्धिक प्रकोष्ठ की तरह कार्य करते हैं। राजनीतिक दलों की राय पर चलनेवाली बुद्धिजीवियों से लेखकीय स्वतंत्रता की अपेक्षा करना ना सिर्फ बेमानी है बल्कि असंभव भी है। कम्युनिस्ट पार्टियों से संबद्ध इन लेखक संगठनों को अगर पुनर्जीवित होना है तो उनको अपने पितृ संगठनों से मुक्त होकर समावेशी और उदार बनना होगा। भारत में सोवियत रूस या चीन की नीतियां नहीं चल सकतीं, वहां का समाज अलग है और भारत का समाज अलग है।   


Saturday, October 9, 2021

प्रगतिशीलता की भारतीयता का सच


बीते शुक्रवार को कथाकार प्रेमचंद की पुण्यतिथि थी। उस दिन इंटरनेट मीडिया पर प्रेमचंद को ‘प्रगतिशील’ लेखक के तौर पर पेश करते हुए कई लोगों ने याद किया। कई लोगों ने प्रेमचंद को हिंदी का पहला ‘प्रगतिशील’ लेखक कहा तो कइयों ने उनको साम्यवादी विचारधारा के लेखक के तौर पर याद किया। इंटरनेट मीडिया की दुनिया ऐसी है कि वहां जो पहले चल जाता है ज्यादातर लोग बिना तथ्यों को जांचे परखे उसका अनुसरण करने लग जाते हैं। कुछ उत्साही वामपंथी साहित्यप्रेमियों ने प्रेमचंद को कम्युनिस्ट लेखक तक करार दे दिया। इस तरह के अधिकतर लोगों ने प्रेमचंद को प्रगतिशील लेखक संघ का संस्थापक बताते हुए उनको साम्यवादी करार दिया। इंटरनेट मीडिया पर चलनेवाले इस तरह की बातों को देखकर मनोरंजन हुआ क्योंकि प्रेमचंद न तो कम्युनिस्ट थे, न मार्क्सवादी और न ही प्रचलित अर्थों में ‘प्रगतिशील’ और न ही प्रगतिशील लेखक संघ के संस्थापक। प्रेमचंद के बारे में ऐसी बात कहने वाले उनके लेखन और व्याख्यानों को आंशिक तरीके से सामने लाते हैं। प्रगतिशील लेखक संघ की बहुत बात होती है और प्रेमचंद के भाषण की भी बहुत चर्चा होती है कि उन्होंने साहित्य को राजनीति के आगे चलनेवाली मशाल कहा आदि आदि। ऐसा प्रतीत होता है कि 1936 में दिए गए उनके व्याख्यान को लोगों ने ध्यान से पढ़ा ही नहीं। इस बात की अधिक संभावना है कि वामपंथी लेखकों-आलोचकों ने प्रेमचंद के प्रगतिशील लेखक संघ के स्थापना अधिवेशन में दिए गए व्याख्यान को जानबूझकर नेपथ्य में रखा। प्रेमचंद के गरीबों की बात को बेहद चतुराई से सर्वहारा से जोड़ते हुए मार्क्सवाद से जोड़ दिया गया। अगर प्रेमचंद के प्रगतिशील लेखक संघ के भाषण का समग्रता में विश्लेषण करें तो कई भ्रांतियां दूर होती हैं। 

प्रेमचंद ने लखनऊ में हुए उस अधिवेशन में अपने भाषण में साफ तौर पर कहा था कि ‘प्रगतिशील लेखक संघ यह नाम ही मेरे विचार से गलत है। साहित्यकार या कलाकार स्वभावत: प्रगतिशील होता है। अगर वो इसका स्वभाव न होता तो शायद वो साहित्कार ही नहीं होता। उसे अपने अंदर भी एक कमी महसूस होती है, इसी कमी को पूरा करने के लिए उसकी आत्मा बेचैन रहती है।‘ उपरोक्त कथन में प्रेमचंद ने साफ तौर पर उस प्रगतिशीलता से अपनी असहमति सार्वजनिक रूप से स्पष्ट कर दी थी जिसको लेकर इस लेखक संघ की स्थापना कि गई थी। जिसको प्रगतिशील लेखक संघ के संस्थापकों में से एक सज्जाद जहीर आगे बढ़ाना चाहते थे। सज्जाद जहीर के बारे में एक तथ्य यहां बताना आवश्यक है कि वो विभाजन के बाद पाकिस्तान चले गए थे। वहां कम्युनिस्ट पार्टी के लिए काम करते हुए पकड़े गए थे, जेल गए थे और उनको सजा हुई थी । बाद में वो भारत आ गए और जवाहरलाल नेहरू की सरकार ने उनको शरणार्थी मानते हुए नागरिकता दे दी थी। यहां भी वो कम्युनिस्ट पार्टी में सक्रिय हुए और उसके महत्वपूर्ण पद पर भी रहे। इसके अलावा प्रेमचंद के इस वक्तव्य में आध्यामिकता की बात भी कई बार आती है। साहित्य को उन्होंने मंदिर भी कहा है। जिन शब्दों, पदों और सिद्धांतों को लेकर प्रेमचंद ने अपना भाषण दिया था उससे यह स्पष्ट है कि वो साम्यवादी विचारधारा से प्रभावित नहीं थे बल्कि  भारतीय विचार और दर्शन से प्रभावित थे। यह बात बार-बार उनकी रचनाओं में भी दिखाई देती है। हिंदू धर्म की प्रगतिशीलता तो इस बात से ही स्पष्ट होती है कि वो लगातार अपने में परिवर्तन करता है। समय के साथ चलता है और अपने समाज की कुरीतियों को दूर करने के लिए अपने अंदर से ही नायक पैदा करता है। इसके दर्जनों उदाहरण इतिहास में उपस्थित हैं। इसको ओझल करने के अनेकों प्रयास हुए लेकिन वो आज भी हमारे सामने हैं।  

इस संदर्भ में मुझे प्रेमचंद साहित्य के अध्येता और आलोचक कमलकिशोर गोयनका से जुड़ा एक प्रसंग याद आता है। प्रेमचंद शताब्दी वर्ष चल रहा था।  देशभर में आयोजन हो रहे थे। इसी क्रम में हैदराबाद विश्वविद्यालय में 24 अक्तबूर 1981 को एक आयोजन हुआ था। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता नामवर सिंह ने की थी और कमलकिशोर गोयनका इसमें वक्ता के तौर पर उपस्थित थे। कार्यक्रम के अंत में जब नामवर सिंह अपने अध्यक्षीय भाषण के लिए खड़े हुए तो उन्होंने एक ऐसी बात कह दी जिसको दबाने में वामपंथी लेखकों का एक बड़ा तबका लग गया था। नामवर सिंह ने कहा था कि ‘होरी एक हिंदू किसान है और वह हिंदू किसान ही हिंदू प्रेमचंद है। प्रेमचंद गाय-बैल, खेत खलिहान, गोबर मिट्टी की बात करते हैं।‘  जैसे ही नामवर सिंह ने ये कहा कि मंच पर बैठे कमलकिशोर गोयनका खड़े हो गए और उन्होंने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि ‘नामवर सिंह का अगर ये नया चिंतन है तो वे इसका समर्थन करते हैं।‘ नामवर सिंह ने इस हस्तक्षेप के बाद अपना वक्तव्य समाप्त किया। अध्यक्षीय वक्तव्य के बाद एक नाटकीय घटनाक्रम हुआ। सभागार में उपस्थित वामपंथी कवि वेणु गोपाल मंच पर आ गए और लगभग चीखते हुए बोले कि ‘नामवर सिंह ये बताएं कि वो गोयनका के करीब आए हैं या गोयनका उनके करीब आ गए हैं।‘ नामवर सिंह ने अपनी आदत के मुताबिक कोई उत्तर नहीं दिया। बाद में वेणु गोपाल ने कमलकिशोर गोयनका को देख लेने तक की धमकी दी। इस धमकी से विचलित हुए बगैर कमलकिशोर गोयनका ने भी उनको शारीरिक और बौद्धिक दोनों तरीके के संवाद का आग्रह किया। किसी तरह बात समाप्त हुई। 

इस प्रसंग को बताने का उद्देश्य वामपंथियों के असली चरित्र को उजागर करना है। भारतीय विचार को प्रतिपादित करनेवाले लेखक या विचारक को जबरदस्ती वामपंथी बताने की प्रवृत्ति को रेखांकित करना है। उपरोक्त प्रसंग ये भी साफ होता है कि वामपंथी सही बात अपने साथी की भी नहीं सुनते हैं और उनपर भी लांछन लगाने से नहीं चूकते। इस तरह के सैकड़ों उदाहरण हैं। जब इन तथाकथित प्रगतिशीलों के सिरमौर रामविलास शर्मा ऋगवेद पर लिखने लगे तो वामपंथी नामवर सिंह ने उनको हिंदूवादी करार दिया। प्रेमचंद की भारतीय विचारों में आस्था उनकी रचनाओं में स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। प्रेमचंद की कृति गोदान में गांव की चेतना, गाय की संस्कृति, भारतीय परिवार में गाय की आकांक्षा, परिवार संस्था की रक्षा आदि रेखांकित की जा सकती है। नामवर सिंह यूं ही होरी को हिंदू नहीं कह रहे थे । प्रेमचंद का ये पात्र ईश्वर की सत्ता में विश्वास रखता है और भाग्यवादी भी है।  हंस पत्रिका के सितंबर अंक में प्रेमचंद की एक कहानी ‘रहस्य’ प्रकाशित है। यह कहानी उनके जीवनकाल में प्रकाशित होनेवाली उनकी अंतिम कहानी है। इसमें प्रेमचंद अपने पात्रों के माध्यम से मुनष्य में देवत्व की बात करते हैं। देवत्व की बात वही लेखक कर सकता है, जिसकी देव में आस्था हो, या कम से कम देव के अस्तित्व को स्वीकार करता हो। लेखक की चेतना उसकी रचनाओं में परलक्षित होती है। प्रेमचंद की चेतना उनकी कृतियों प्रेमाश्रम के चरित्र बलराज से गोदान के होरी तक में स्पष्ट रूप से भारतीय जमीन. भारतीय विचार, भारतीय संघर्ष को स्थापित करती है। वामपंथियों ने प्रेमचंद की कृतियों की अनुचित व्याख्या और बताने से ज्यादा छुपाने की अपनी प्रवृति के आधार पर मार्क्सवादी सिद्ध कर दिया। प्रेमचंद की तथाकथित प्रगतिशीलता के झूठ को पहली बार कमलकिशोर गोयनका ने तमाम तथ्यों के साथ बेनकाब किया था। इन्हीं तथ्यों के आधार पर ये साबित भी किया था कि प्रेमचंद ने अपने लिए दो लक्ष्य तय किए थे भारतीय आत्मा की रक्षा और स्वराज की प्राप्ति। इसके बाद कहने को कुछ शेष नहीं रहता कि कैसे एक भारतीय लेखक को आयातित विचारधारा का पोषक साबित करने की कोशिशें हुईं जो अब भी जारी है। 


Sunday, November 1, 2015

लेखक संगठनों की शतरंजी बिसात

देश में पुरस्कार वापसी के माहौल में अचानक से लेखक संगठनों की सक्रियता चौकानेवाली है । साहित्य अकादमी के खिलाफ प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच के साझा बैनर के तले दिल्ली में चंद लेखकों ने मौन जुलूस निकालते हुए क्रांति का बिगुल फूंका था। लगभग सुसुप्तावस्था में पड़े इन लेखक संगठनों ने जिस तरह से आनन फानन में विरोध किया उसके बाद उनकी मंशा पर सवाल खड़े होने लगे हैं । साहित्य जगत में मौजूद ये तीन लेखक संगठन दरअसल अपनी अपनी राजनीतिक पार्टियों के बौद्धिक प्रकोष्ठ हैं । लिहाजा जिस तरह से राजनीतिक दलों के बौद्धिक प्रकोष्ठ काम करते हैं उसी तरह से ये भी ऑपरेट करते हैं । जैसे जैसे इन राजनीतिक दलों में विभाजन होता गया लेखक संगठन भी बंटते चले गए । प्रगतिशील लेखक संघ सीपीआई का बौद्धिक प्रकोष्ठ है । इसी तरह से सीपीएम का जनवादी लेखक संघ और सीपीआई माले का जन संस्कृति मंच । लेखकों के नाम पर बने इन पार्टियों के बौद्धिक संगठनों ने लेखकों का कुछ भला किया हो या लेखकों की बेहतरी के लिए कोई लड़ाई लड़ी हो, याद नहीं पड़ता । ये अपने हर कदम के लिए पहले अजय भवन आदि की ओर देखते हैं और वहां से ग्रीन सिग्नल मिलने के बाद ही कोई कदम आगे बढ़ा पाते हैं । समाज में बढ़ रही असहिष्णुता और लेखकों पर कथित सुन्योजित हमलों के खिलाफ बिगुल फूंकने वाले इन लेखक संगठनों को कभी भी कॉपीराइट औप रॉयल्टी जैसे अहम मसलों पर विमर्श करते हुए नहीं देखा गया है । हिंदी में तो कम से कम से कम रॉयल्टी एक अहम मुद्दा है । बहुधा लेखकों की तरफ से ऐसे बयान आते हैं कि उनको प्रकाशककों से उचित रॉयल्टी नहीं मिलती है । लेखकों को लगता है कि प्रकाशक उनका हक मारकर मोटा मुनाफा कमाते हैं । यह बात भी बार बार कही जाती है कि हिंदी के लेखक गरीब होते जा रहे हैं जबकि प्रकाशक लगातार अमीर होते जा रहे हैं। हिंदी के इस सबसे अहम मुद्दे पर इन तीनों लेखक संगठनों ने कभी कोई आंदोलन नहीं किया । कभी कोई मौन जुलूस लेकर किसी प्रकाशक के दफ्तर पर प्रदर्शन नहीं किया । धरना प्रदर्शन आदि की बात छोड़ भी दें तो क्या इन लेखक संगठनों ती तरफ से इस बारे में कोई पहल की गई । इसका जवाब अबतक तो नहीं है । इस वक्त साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाकर सुर्खियों में आए मंगलेश डबराल ने कहा था – ‘लेखक संगठन लेखकों के यूनियन नहीं हैं जो क़पीराइट आदि के मुद्दों पर संघर्ष करें । ये तो वैचारिक संगठन हैं जिनका काम साहित्य की दुनिया में वैचारिक संवेदना का प्रचार करना है ।‘  यह जानना भी दिलचस्प होगा कि किस तरह की वैचारिक संवेदना को फैलाने का काम इन लेखक संगठनों ने किया । इसके अलावा इन लेखक संगठनों ने लेखकों की मदद के लिए कभी कोई पहल की, इस बारे में भी गंभीरता से विचार करने की जरूरत है । हिंदी के कई लेखक मुफलिसी में जिंदगी काटकर गुजर गए, कई गंभीर बीमारी और आर्थिक संकट की वजह से अपना समुचित इलाज नहीं करवा पाने की वजह से चल बसे लेकिन इन लेखक संगठनों ने उनकी कोई सुध नहीं ली । कई लेखक तो ऐसे थे जो कि इन संगठनों में बेहद सक्रिय थे लेकिन जब वो बीमार पड़े या फिर उनके सामने आर्थिक संकट आया तो लेखक संगठनों ने उनको दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल फेंका । आज कन्नड़ के लेखक कालबुर्गी की हत्या पर साहित्य अकादमी के शोक नहीं मनाने, जो कि तथ्यहीन है, को लेकर सड़कों पर उतरे साहित्यकारों को स्मरण दिलाना चाहता हूं कि हिंदी के वरिष्ठ लेखक अरुण प्रकाश की मौत के बाद लेखक संगठन कितने निष्क्रिय रहे थे । अरुण प्रकाश दिल्ली का निधन दिल्ली के मयूर विहार इलाके में हुआ था । लेखक संगठनों से जुड़े तमाम वरिष्ठ साहित्यकार उनके फ्लैट के आधे एक किलोमीटर के दायरे में रहते हैं लेकिन कोई उनके घर शोक व्यक्त करने तक नहीं पहुंचा था । उनके अंतिम संस्कार में भी गिने चुने साहित्यकार थे । इस तरह की संवेदनहीनता के दर्जनों उदाहरण इन लेखक संगठनों के सर पर कलगी की तरह लगे हैं । दुखद ये कि इन लेखक संगठनों को अपनी इस संवेदनहीनता पर शर्मिंदगी भी नहीं है । इसके अलावा साहित्य अकादमी में सालों से चली आ रही गड़बड़ियों को लेकर भी लेखक संगठनों ने कभी कोई आवाज वहीं उठाई, क्योंकि इन लेखक संगठनों से जुड़े लेखकों को वहां से फायदा मिल रहा था । वो पुरस्कृत हो रहे थे, साहित्यक विदेश यात्राएं कर रहे थे,, देश भर में सेमिनार आदि के नाम पर घूमना फिरना हो रहा था । उन्नीस सौ पचहत्तर के बाद साहित्य अकादमी का इतिहास घोटालों और घपलों का रहा है । उसपर किसी तरह का स्पंदन उस वक्त साहित्य जगत में नहीं दिखा । साहित्य अकादमी के अध्यक्ष गोपीचंद नारंग पर कई तरह के संगीन इल्जाम लगे थे लेकिन पंकज विष्ठ के अलावा किसी लेखक ने आवाज उठाई हो याद नहीं पड़ता, लेखक संगठन की बात तो दूर  । इसी तरह से साहित्य अकादमी के सचिव को घपलों के आरोप में सस्पेंड किया गया था । उनके खिलाफ जांच बैठी थी । इस बीच उनको रिटायर कर दिया गया । उनके घपलों की जांच रिपोर्ट के नतीजे क्या आए, ये जानने की कोशिश किसी लेखक संगठन ने की या नहीं इसको देखने की आवश्यकता है । साहित्य जगत में इस बात की चर्चा लगातार रही कि उक्त सचिव ने कई वामपंथी लेखकों को उपकृत किया था लिहाजा उन सबों का अकादमी पर दबाव था कि इस मामले को रफा दफा कर दिया जाए। वही हुआ । विश्वनाथ तिवारी उन घपलों की जांच कर रहे थे लेकिन नतीजा क्या रहा पता नहीं चल पाया । सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी में घुमा-फिरा कर टाल दिया गया ।  
अब जरा इन लेखक संगठनों के क्रियाकलापों पर नजर डालते हैं। इन लेखक संगठनों में विश्वविद्लाय के शिक्षकों के दबदबे पर राजेन्द्र यादव ने कहा था- साहित्यकारों में ज्यादातर प्राध्यापक हैं, क्या ईमानदारी से इनमें से कोई वो काम करता है जिसके लिए उनको वेतन मिलता है । ये लोग ना तो अपने पाठ्यक्रम के साथ न्याय करते हैं न अपने छात्रों के साथ । साहित्य में उतरकर उनका लगभग यही उठाईगीर रवैया हम सबके सामने है । पुराने कवियों लेखकों को छोड़कर न इऩमें से किसी ने भी कोई ऐसी पुस्तक लिखी है जो वैचारिक रूप से आंदोलित करे या देश-विदेश के विचारों के परीक्षण का जोखिम उठाए । आर्थिक और औद्योगिक क्षेत्र की तरह सब बाहर से माल लाकर अपना ठप्पा ठोंक देते हैं । कभी कभी मैं सोचता हूं कि हिंदी में कबीर, तुलसी और निराला ना होते तो इन बेचारों की जिंदगी क्या होती । अपनी विद्वता कहां झाड़ते । समीक्षक वीरेन्द्र यादव ने भी माना था – लेखक संगठनों की निष्क्रियता के मूल में वामपंथी राजनीति कीपस्त हिम्मती, सुविधाजीविता और परिप्रेक्ष्यविहीनता है, वहीं लेखकों के बीच पद, प्रतिष्ठा व पुरस्कार आदि को लेकर लोलुपता बढ़ी है । वैचारिक उदारतावाद का स्थान नग्न अवसरवाद ले रहा है । इन्हीं दुर्गुणों को प्रगतिशील लेखक संघ में लक्ष्य करके जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच का गठन हुआ था , लेकिन ये संगठन भी कमोबेश आज के प्रगतिशील लेखक संघ की तरह झंडा-बैनर अधिक रह गए, सक्रिय लेखक संगठन कम ( कोलाहल कलह में-पृ 60)। यहां वीरेन्द्र यादव, मंगलेश से इतर विचार रखते हैं जब वो कहते हैं कि लेखक संगठनों को कॉपीराइट आदि के मुद्दों पर गंभीरता से काम करने की आवश्यकता है । लेखक संगठनों को लेकर इनसे वैचारिक और सांगठनिक रूप से जुड़े लेखकों के बीच जबरदस्त कंफ्यूजन की स्थिति है और यह कंफ्यूजन इनकी निष्क्रियता की वजह है ।

अब जरा हम इन लेखक संगठनों के क्रियाकलापों में पारदर्शिता की परख करते हैं । इन लेखक संगठनों का सालाना या द्वैवार्षिक अधिवेशन होता है । उन अधिवेशनों में क्या क्या प्रस्ताव आदि पारित होते हैं उसका कोई दस्तावेजी रिकॉर्ड कहीं मिलता नहीं है । इन लेखक संगठनों से जुड़े मठाधीशों ने अपने कितने चेले चपाटों की किताबें छपवाकर उनको प्रोफेसर बनवा दिया लेकिन अपने संगठन के क्रियाकलापों के दस्तावेज छपवाने के लिए उनके पास वक्त नहीं है । हो सकता है कि उन अधिवेशनों में जो होता हो उसका रिकॉर्ड रखना संगठन के हित मे ना हो लिहाजा उसको संभालने की उचित व्यवस्था नहीं की गई । अधिवेशनों में पारित प्रस्ताव अगर मौजूद होते तो उसको कसौटी पर कस कर काल और परिस्थिति के मुताबिक इन संगठनों का मूल्यांकन हो सकता था । जो हो नहीं पा रहा है । क्या ये माना जाए कि जानबूझकर इन संगठनों के क्रियाकलापों के सबूत को छिपाकर रखा गया है ताकि उनका मूल्यांकन ना हो सके । निर्मल वर्मा ने कम्युनिस्टों के बारे में कहा था- उनका लगाव और प्रेम अपने सिवा किसी और से नहीं है । उनके शतरंजी खेल में कोई भी वर्ग , चाहे वो कितना भी उत्पीड़ित क्यों ना हो, उनके लिए बाजी जीतने की मुहर से अधिक महत्व नहीं रखता । साहित्य अकादमी के बाहर इकट्ठे लेखक संगठन के लोगों को देखकर यही सवाल मन में कौंधा था कि इस बार शतरंजी खेल में असहिष्णुता के मोहरे का इस्तेमाल हो रहा है । 

Tuesday, July 19, 2011

दिलचस्प अनुभवों की शाम

बात अस्सी के दशक के अंत और नब्बे के दशक के शुरुआती वर्षों की है । पुस्तकों को पढ़ते हुए बहुधा मन में विचार आता था कि उसपर कुछ लिखूं । लेकिन संकोचवश कुछ लिख नहीं पाता था, ज्यादा पता भी नहीं था कि क्या और कैसे लिखूं और कहां भेजूं । अपने इस स्तंभ में मैं पहले भी चर्चा कर चुका हूं कि किताबों को पढ़ने के बाद चाचा भारत भारद्वाज को लंबे-लंबे पत्र लिखा करता था । फिर पत्रों में सहमति और असहमतियां भी होने लगी । इस पत्र व्यवहार से मुझे समीक्षा का एक संस्कार मिला । जमालपुर में रहता था वहां के कुछ साहित्यक मित्रों के साथ उठना बैठना होने लगा । फिर विनोद अनुपम के कहने पर जमालपुर प्रगतिशील लेखक संघ से भी जुड़ा, पदाधिकारी भी बना । प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ने के बाद कई गोष्ठियों बैठकों में बोलने का मौका मिलना शुरू हो गया । लिहाजा पुस्तकों और रचनाओं पर तैयारी करने लगा, जिसका फायदा बाद में मुझे समीक्षा लेखन में हुआ । फिर मित्रों के आग्रह पर लघु पत्रिकाओं में कुछ समीक्षाएं भेजी जो प्रकाशित भी हुई । इन सबके पहले मैं हिंदी आलोचना के शिखर पुरुष नामवर सिंह की कई किताबें पढ़ चुका था । सबसे पहले मैंने उनकी किताब - कहानी नयी कहानी पढ़ा, फिर कविता के नए प्रतिमान । उनपर केंद्रित पत्र-पत्रिकाओं और समीक्षा ठाकुर द्वारा संपादित किताब कहना ना होगा भी पढ़ा । नामवर जी के लेखन और उनकी समीक्षकीय दृष्टि से गहरे तक प्रभावित था । कहानी नयी कहानी में लिखी नामवर सिंह की एक पंक्ति अबतक याद है – आज की ग्राम जीवन पर लिखी हुई कहानियां प्रेमचंद की स्वस्थ और प्रवृत्त प्रवृति का अस्वाभाविक, परिवर्तित, कृत्रिम और डिस्टॉर्टेड पुन:प्रस्तुतीकरण है । वेद में जिसतरह सबकुछ है, उसी चरह प्रेमचंद की कहानियों में सबकुछ है । जगत ब्रह्म का विवर्त है तो आज की ग्राम कथाएं प्रेमचंद की विकृति है । कहानी नयी कहानी में जो लेख संकलित हैं वो नामवर सिंह ने 1956 से 1965 के बीच लिखे थे । लेकिन उनका उपरोक्त कथन आज भी पूरी तरह से समीचीन है । आज भी ग्रामीण जीवन पर लिखी जा रही कहानियों के संदर्भ में इस बात को कहा जा सकता है और मुझे लगता है कि यह टिप्पणी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है. जितनी उस वक्त थी । खैर मैं वर्तमान कहानी पर चर्चा नहीं कर रहा । बात नामवर सिंह की हो रही थी । जमालपुर में जब रह रहा था तो नामवर सिंह को पढ़ते हुए यह लगता था कि काश उनसे परिचय होता, उनसे बातें कर पाता । कई बार उनको पत्र लिखा लेकिन डाक में डालने की हिम्मत नहीं जुटा पाया । लेकिन नामवर और उनसे जुड़ा कुछ भी मिल जाता तो फौरन पढ़ लेता ।
समय के चक्र ने मुझे देश की राजधानी दिल्ली पहुंचा दिया । एक गोष्ठी में नामवर जी को सुना तो उनके वक्तृत्व कला से खासा प्रभावित हुआ । फिर फ्रीलांसिंग का दौर शुरु हुआ । मित्र संजय कुंदन ने राष्ट्रीय सहारा के रविवारीय पृष्ठ के लिए कई परिचर्चाएं करवाई । उसी के सिलसिले में दो एक बार नामवर जी से बात हुई । जितनी बार उनसे बात होती तो मुझे कुछ ना कुछ नया हासिल हो जाता । नामवर जी से आमना सामना नहीं हुआ । हिंदी भवन में एक गोष्ठी में नामवर जी ने अपने भाषण के क्रम में बोलते हुए ये कह डाला कि आजकल हिंदी साहित्य में अनंत विजय भी तलबारबाजी कर रहे हैं । संदर्भ मुझे अब याद नहीं है लेकिन इतना याद है कि उसी दौरान आलोचना पर एक परिचर्चा में मैंने नामवर सिंह की राय को शामिल नहीं किया था। फिर धीरे-धीरे नौकरी की व्यस्तता में लिखना कुछ कम हो गया । नामवर जी से बात करने की इच्छा मन में बनी रही । कई बार उन व्यक्तिगत पार्टी में बैठा जिसमें नामवर जी थे, उनको और उनके संस्मरणों और टिप्पणियों को सुनकर हमेशा से उनकी स्मृति और उनके अपडेट रहने की क्षमता पर ताज्जुब होता था ।
हाल ही में एक अनौपचारिक कवि गोष्ठी में नामवर सिंह जी से मुलाकात हो गई । ये कवि गोष्ठी हिंदी कवि तजेन्द्र लूथरा के पहल पर हुई थी । जिसमें वरिष्ठ कवि विष्णु नागर, लक्ष्मीशंकर वाजपेयी ,मदन कश्यप, लीलाधर मंडलोई, पंकज सिंह, सविता सिंह के अलावा राजेन्द्र शर्मा, रोहतक की कवियित्री शबनम, रमा पांडे और हरीश आनंद और ममता किरण भी थी । कवि मित्र अरुण आदित्य भी । उस दिन संयोग से विष्णु नागर जी का जन्मदिन भी था । सभी कवियों ने अपनी कविताओं का पाठ किया । हमेशा की तरह अरुण आदित्य की कविताएं व्यंग्यात्मक लहजे में बड़ी बातें कह जाती है । उनकी कविताज- डर के पीछे कैडर है- सुनकर आनंद आ गया। तजेन्द्र लूथरा ने अपनी बेहतरीन कविता-अंतराल का डर- सुनाई। यह किवता मैं पहले ही पढ़ चुका था । इसमें कवि के अनुभव संसार का व्यापक फलक और उसको देखने समझने की उनकी दृष्टि सामने आती है । लक्ष्मी शंकर वाजपेयी और ममता किरण की खासियत यह है कि वो बिना पढ़े कविता बोलते हैं। सुनाते हैं। उनकी शैली उनके काव्य पाठ को एकदम से उपर उठा देती है । राजेन्द्र शर्मा की हुसैन पर लिखी कविता एकदम से मौजूं थी । लेकिन मंडलोई की दो लाइन ने महानगरीय जीवन की त्रासदी को एकदम से नंगा कर दिया- सांप काटने से नहीं हुई है देह नीली, कल रात मैं अपने दोस्त के साथ था । सभी कवियों ने दो-दो कविताएं सुनाई लेकिन चूंकि विष्णु नागर जी का जन्मदिन था इसलिए उन्होंने अपने संग्रह से कई कविताओं का पाठ किया । सविता सिंह ने लंबी कविता सुनाई लेकिन दूर बैठे होने की वजह से मैं कविता ठीक से सुन नहीं पाया । संभवत कविता का शीर्षक था- चांद, तीर और अनश्वर स्त्री । इस कवि गोष्ठी के बाद सबको उम्मीद थी कि नामवर जी कुछ बोलेंगे । संचालन कर रहे तजेन्द्र लूथरा और रमा पांडे समेत कई लोगों ने उनसे आग्रह किया लेकिन नामवर जी ने अपने अंदाज में मुंह में पान दबाए सिर्फ इतना कहा- आनंद आ गया ।
गोष्ठी के बाद नामवर जी से मेरी पहली बार बेहद लंबी बात हुई । उन्होंने ये कहकर मुझे चौंका दिया कि चौथी दुनिया के अपने स्तंभ में तुम अच्छा लिख रहे हो । चौंकते हुए मैंने कहा कि सर आप देखते हैं तो उन्होंने फौरन मेरे स्तंभों की कई बातें बता कर अचंभे में डाल दिया । अपनी प्रशंसा सुनना हमेशा अच्छा लगता है लेकिन खुद से उसकी चर्चा अश्लीलता हो जाती है । नामवर जी से फिर हिंदी की रचनाओं पर बात शुरू हुई । हमारी लंबी चर्चा हिंदी के रचनात्मक लेखन में डीटेलिंग के नहीं होने पर हुई । उन्होंने इस बात पर सहमति जताई कि हिंदी के लेखक डिटेलिंग नहीं करते हैं इस वजह से बहुधा रचनाएं सतही हो जाती है । फिर हमारी चर्चा हुसैन पर हुई । नामवर जी ने एक दिलचस्प किस्सा सुनाया । एक बार वो, श्रीकांत वर्मा, हुसैन और कुछ मित्र दिल्ली में टी हाउस के बाहर खड़े हो कर बातें कर रहे थे, अचानक से एक वयक्ति दौड़ता हुआ आया और हुसेन को एक थप्पड़ मारकर भाग गया । सारे लोग हतप्रभ । यह दौर वही रहा होगा जब हुसेन हिंदू देवी देवताओं के चित्र बनाकर विवादित हो चुके थे । इससे हम हुसेन के भारत छोड़ने के डर का सूत्र पकड़ सकते हैं । हलांकि हुसेन के भारत छोड़ने को लेकर मेरी काफी असहमतियां रही हैं । नामवर जी ने एक और बात बताई कि कल्पना के हर अंक में हुसेन के रेखाचित्र छपा करते थे और उसके संपादक बदरी विशाल पित्ती हुसेन के गहरे मित्रों में से थे । हुसेन के बाद नामवर जी से भारतीय राजनीति, लोकपाल बिल, भ्रष्टाचार आदि पर भी बातें हुई । नामवर जी का मानना था कि आज भारतीय राजनीति बेहद खतरनाक दौर से गुजर रही है । कांग्रेस और बीजेपी पर उन्होंने ख्रुश्चेव के बहाने से एक टिप्पणी- एक बार ख्रुश्चेव से ग्रेट ब्रिटेन की दोनों पार्टियां- लेबर पार्टी और कंजरवेटिव पार्टी के बारे में उनकी राय पूछी गई । ख्रुश्चेव ने उत्तर दिया कि एक बाएं पांव का जूता है और दूसरा दाएं पांव का जूता है । कहने का अर्थ यह कि दोनों आखिरकार जूते ही हैं ।
नामवर जी से तकरीबन घंटे भर की बातचीत उनको जानने समझने के लिए काफी था और यह मेरे लिए एक लाइफ टाइम एचीवमेंट जैसा था । जिनके लिखे को पढ़कर लिखना सीखा हो उनके सामने अपनी बात कहना मेरे लिए एक स्वपन के सच होने जैसा था ।नामवर जी से इतनी लंबी बात करने का अवसर सुलभ करवाने के लिए मित्र तजेन्द्र लूथरा का आभार ।

Friday, April 17, 2009

लेखकों के मरने का इंतजार करते लेखक संगठन !

पिछले कुछ वर्षों से लेखकों की सामाजिक भूमिका लगभग खत्म हो गई है । कहीं से भी ये लगता ही नहीं है कि लेखकों का समाज से कोई जुड़ाव भी है । किसी भी बड़े सामाजिक प्रश्न पर इनकी एकजुटता नजर नहीं आती है । वे छोटे-छोटे गुटों में बनाई अपनी ही दुनिया में संतुष्ट नजर आते हैं, जबकि साहित्य और संस्कृति के सामने संकट गहराता जा रहा है । लेखकों की सामाजिक सक्रियता को लेकर लेखक संगठों की स्थापना की गई थी । कहने को तो आज हिंदी में तीन लेखक संगठन हैं और ये तीनों अलग-अलग कम्युनिस्ट पार्टियों से संबद्ध हैं । प्रगति लेखक संघ, सीपीआई से , जनवादी लेखक संघ, सीपीएम से और जन संस्कृति मंच, सीपीआई-एमएल से । लेकिन ये संगठन इन पार्टियों के पिछलग्गू ही साबित हो रहे हैं । जब सन 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना हुई थी तो दो दशकों तक इसने सभी भारतीय भाषाओं में समान रूप से लेखकों को जोड़कर गंभीरता से काम किया लेकिन समय बीतने के साथ ये संगठन कमजोर होता गया और आज तो हालत ये है कि कुछ शहरों को छोड़ दें तो ये लगभग मृतप्राय है । यही हाल जलेस और जसम का भी है । अब तो ये तक पता नहीं चलता है कि इनके अध्यक्ष और सचिव कौन हैं । इन संगठनों का पता तब चलता है जब किसी लेखक की मृत्यु होती है । इसके बाद लेखक संगठन एक शोकसभा का आयोजन करते हैं और उसमें मर्सिया पढकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं । यह सही और दुखद है कि लेखक लोग या तो किसी शोकसभा में मिलते हैं या पुस्तक विमोचन के अवसर पर । मुद्दों को लेकर लेखकों ने आपस में मिलना बंद कर दिया है ।
दूसरी सबसे शर्मनाक बात ये है कि इन लेखक संगठनों को किसी लेखक के मरने के बाद ही ही उसकी महत्ता समझ में आती है । लेखक के जीवित रहते ये संगठन लेखकों की रचनाओं पर कुछ भी करने से कतराते रहते हैं लेकिन उनके मरते ही उसे महान तथा उसकी रचनाओं को बेहद अहम बताने लग जाते हैं । इससे लगता तो ये है कि ये लेखक संगठन लेखकों की मरने की प्रतीक्षा कर रहा होता है । पिछले दिनों हिंदी के कवि सुदीप बनर्जी का निधन हुआ और तामम संगठनों के बीच उन्हें महान साबित करने की होड़ लग गई लेकिन मुझे नहीं याद कि उनके जीवित रहते किसी भी संगठन ने कोई मग्तवपूर्ण कार्यक्रम सुदीप बनर्जी पर आयोजित किया ।
कई साल पहले हिंदी के एक वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल ने एक बातचीत में कहा था कि लेखक संगठन लेखकों के यूनियन नहीं है जो कॉपीराइट आदि के मुद्दे पर संघर्ष करें । उनका मानना था कि ये वैचारिक संगठन हैं जिनका काम साहित्य की दुनिया में वैचारिक संवेदना का प्रचार करना है । अगर मंगलेश की बातों को मान भी लिया जाए तो सवाल ये उठता है कि वैचारिक संवेदना के प्रचार के लिए भी लेखक संगठन क्या कर रहे हैं ?
आज जरूरत इन लेखक संगठों की भूमिका पर पुन्रविचार की है । इन संगठनों की निष्क्रियता के पीछे वामपंथी राजनीति की हिम्मतपरस्ती और अवसरवादिता की राजनीति है । लेखको के बीच भी पद और पुरस्तार पाने की लोलुपता बढ़ती जा रही है । वैचारिकता पर अवसरवादिता हावी हो गई है । तमाम लेखक इस दंद-फंद में जुटे रहते हैं कि किस संगठन से जुड़कर उन्हें लाभ हो सकता है और ये तय करते ही वो उन संगठनों से जुड़कर साहित्यिक मठाधीशों का आशीर्वाद प्राप्त कर लेता है । सच तो ये है कि इन दिनों लेखक संगठनों से न तो कोई उर्जा प्राप्त कर पा रहे हैं और न ही कोई वैचारिक दिशा ।
लेखक संगठनों का इतना बुरा हाल है कि वो अपने ही साथी लेखकों के हित के लिए कुछ बी नहीं कर पा रहा है । कॉपीराइट हिंदी में लेखकों के लिए आज एक बड़ा मु्दा है और तमाम लेखक इसके शिकायत हो रहे हैं । लगातार प्रकाशकों द्वारा लेखकों के शोषण की बात सामने आती रहती है लेकिन आजतक लेखक संगठनों ने इस शोषण के खिलाफ कोई ठोस आवाज नहीं उठाई है, आंदोनल की बात तो दूर । इसके अलावा भी की मुद्दे हैं जिनपर लेखक संगठनों की खोमोशी चिंतनीय है ।
दरअसल अब प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ, और जन संसकृति मंच को आपसी भेदभाव भुलाकर साथ आकर एक नया सांस्कृतिक और साझा मंच बनाना चाहिए और लेखकों की मर्सिया पढ़ना बंद कर उनके जीवित रहते उनको उनका देय दिलाने के लिए प्रयास करना चाहिए तभी साहित्या का भी भला होगा और साहित्यकारों का भी । अन्यथा लेखक संघ अपने ही साथियों के मरने का इंतजार करनेवाला संगठन बनकर रह जाएगा ।