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Friday, August 16, 2024

शानदार किस्सागो का जाना


दिल्ली के विज्ञान भवन में गुटनिरपेक्ष शिखर सम्मेलन होना था। एक दिन अचानक उस वक्त की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने शिखर सम्मेलन के संयोजक नटवर सिंह से पूछा कि क्या गुटनिरपेक्ष देशों के राष्ट्राध्यक्षों और प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों को एशियाड विलेज के फ्लैट्स में रखा जा सकता है? नटवर सिंह ने छूटते ही कहा कि ये कैसे संभव है। इंदिरा गांधी ने अपनी गंभीर आवाज में कहा कि आप इस संभावना को तलाशिए और रिपोर्ट करिए। इंदिरा गांधी ने राजीव गांधी, पीसी एलेक्जेंडर, जी पार्थसारथी और उस समय के दिल्ली के एलजी जगमोहन को एशियाड विलेज जाकर सुविधाओं को जायजा लेने का हुक्म दिया। सबलोग एशियाड विलेज पहुंचे। फ्लैट्स आदि देखने के बाद न तो एलेक्जेंडर कुछ बोल रहे थे न ही जगमोहन। सब राजीव गांधी के बोलने की प्रतीक्षा कर रहे थे। पार्थसारथी ने कहा कि एशियाड विलेज के फ्लैट्स में विदेश मंत्रियों को रुकवाया जा सकता है। नटवर सिंह इसके लिए राजी नहीं थे। राजीव कुछ बोल नहीं रहे थे। कोई फैसला नहीं हो पा रहा था। दरअसल राजीव गांधी के कुछ दोस्तों ने विदेशी अतिथियों को एशियाड विलेज में रुकवाने का आयडिया दे दिया था। उन्होंने इंदिरा जी को। बात फैलने लगी थी कि विदेशी प्रतिनिधिमंडल को एशियाड विलेज में रुकवाया जाएगा। ये बात उन देशों के राजदूतों तक भी पहुंची। उनमें से कइयों ने नटवर सिंह को स्पष्ट कर दिया कि अगर ऐसा होगा तो कोई नहीं आएगा। बात इंदिरा जी तक पहुंची और मामला किसी तरह से टला। 

इस तरह के सैकड़ों दिलचस्प किस्से नटवर सिंह के पास थे। जब भी आप उनसे उनके दिल्ली के जोरबाग वाले घर में मिलते और वो मूड में होते तो किस्सों का दौर आरंभ हो जाता। उनकी स्मरण शक्ति इतनी तेज थी और घटनाओं का वर्णन इतने दिलचस्प अंदाज में करते थे कि आप घंटों उनको सुन सकते थे। एक बार अपने घर पर हुई मुलाकात नें उन्होंने ऐसा ही एक किस्सा सुनाया था जो इंदिरा गांधी, फिडेल कास्त्रो और यासिर अराफात से जुड़ा था। 1983 में दिल्ली में गुट निरपेक्ष शिखर सम्मेलन के दौरान फिलीस्तीनी नेता यासिर अराफात इस बात से नाराज हो गए कि उनको सम्मेलन में जार्डन के राजा के बाद बोलने का अवसर मिला। इसको अराफात ने अपना अपमान माना और सम्मेलन छोड़कर वापस लौटने की बात की। नटवर सिंह ने तुरंत इंदिरा गांधी को सूचित किया। इंदिरा गांधी ने फिडेल कास्त्रो से बात की। इंदिरा और कास्त्रो दोनों फौरन विज्ञान भवन पहुंचे और अराफात को लेकर एक कमरे में गए। यासिर गुस्से से लाल पीले हो रहे थे। कास्त्रो और इंदिरा गांधी ने उनकी बातों को थोड़ी देर तक सुना। कास्त्रो ने अराफात से पूछा कि आप इंदिरा को अपना दोस्त समझते हो। गुस्से में अराफात ने कहा कि ये दोस्त नहीं मेरी बड़ी बहन है। इतना सुनते ही फिडेल बोले कि फिर छोटे भाई की तरह बर्ताव करिए और चुपचाप दोपहर के सत्र में शामिल होइए। एक बड़ा कूटनीतिक मसला हल हो गया। नटवर सिंह के निधन से दिल्ली में रहनेवाला एक बड़ा किस्सागो चला और साथ चली गईं उनकी स्मृतियों में बसी घटनाएं।    


Sunday, May 24, 2015

क्रांतिवीर मार्क्सवादियों की हकीकत ?

कार्ल मार्क्स । मार्क्सवाद । ये दो शब्द हैं ऐसे हैं जो भारत में बुद्धिजीवियों के एक बड़े तबके को बहुत लुभाते हैं । इन दो शब्दों के रोमांटिसिज्म में वो इसके आंकलन में वस्तुनिष्ठ नहीं हो पाते हैं । तमाम धाराओं को इन दो शब्दों की धारा में बहाने का दुराग्रह करते चलते हैं । आलोचना से लेकर रचना तक की कसौटी का मूल आधार यही दो शब्द रहते हैं । अभी हाल ही में कार्ल मार्क्स की एक सौ सत्तानवीं जयंती बीती है । इस मौके पर एक बार फिर से उनकी महानता का गुणगान करते हुए लेख छपे । भाषण दिए गए । सोशल मीडिया पर इस विचारधारा के अनुयायियों ने जमकर अपनी ऊर्जा का प्रदर्शन किया । मार्क्सवाद एक अवधारणा के तौर पर, एक आदर्शवादी सिद्धांत के तौर पर बहुत अच्छा कहा या माना जा सकता है लेकिन शुरुआत से लेकर अबतक मार्क्सवाद की जो व्यावहारिकता सामने आई है उसपर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया । मार्क्सवाद की जो अवधारणा है उसमें धर्म को अफीम कहा गया है । यह लाइन इसके अनुयायियों को बहुत भाती है । वो लगातार इसका प्रचार करते हैं और इस लाइन के आधार पर धर्म को भला बुरा कहते चलते हैं । धर्म को अफीम मानने वाले यह भूल जाते हैं कि धर्म लोगों को एक मर्यादा में रहना भी सिखाता है । मार्क्सवाद की जो अवधारणा है वो पूंजीवाद का निषेध करता है लेकिन परोक्षरूप से पूरी तौर पर भौतिकतावाद की वकालत करता है । वहां परिवार या सामाजिक बंधन या मान्यता नाम की चीजें अमान्य हैं । सोवियत रूस में जब उन्नीस सौ सत्रह में क्रांति हुई तो यह मान्यता प्रचारित की गई कि शादी विवाह आदि का कोई अर्थ नहीं है । जब जिसका मन करे वो किसी से भी संबंध बनाए । यह भौतिकतावाद की ही एक मिसाल है । लगभग बीस सालों तक सोवियत रूस में यह बात चलती रही । आपको यह याद दिला दें कि उन्नीस सौ सत्रह से लेकर उन्नीस सौ तीस तक सोवियत रूस में एक ग्लास पानी मुहावरा काफी प्रचलित था । यह उस बात के लिए कहा जाता था कि जब प्यास लगे तो पानी पी लो और जब शरीर की मांग हो तो उसको किसी के भी साथ पूरा कर लो । करीब बीस साल तक रूस में ये चलता रहा और फिर धीरे धीरे इस अवधारणा को बगैर किसी शोर शराबे के दफन कर दिया गया ।
मार्क्स के दो बड़े भारी अनुयायी हुए । एक तो चीन के माआत्सेतुंग और दूसरे क्यूबा के सर्वेसर्वा फिडेल कास्ट्रो । फिडेल हलांकि पहले मार्क्सवादी नहीं थे लेकिन बाद में सोवियत रूस से लेकर तमाम वामपंथी देशों ने सहयोग आदि देकर उनको अपने पाले में ले लिया । कालांतर में वो और उनका देश दोनों कम्युनिस्ट बन गया और वो कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ क्यूबा के 1961 से लेकर 2011 तक महासचिव रहे । इन दोनों के बारे में वामपंथी बहुत उच्च विचार रखते हैं । एक समय में तो हमारे देश में चेयरमैन माओ के समर्थन में नारे लगानेवाले भी खुलेआम मिल जाया करते थे । फिडेल कास्ट्रो में भी वामपंथी लगभग मूर्तिपूजा की हद तक आस्था रखते हैं । सवाल यही है कि किसी के व्यक्तित्व और कृतित्व का मूल्यांकन क्या भक्तिभाव के साथ किया जा सकता है । क्या किसी को आलोचना से ऊपर मानकर उसका मूल्यांकन किया जा सकता है । नहीं । भारत में हमारे वामपंथी बौद्धिकों ने माओ से लेकर कास्ट्रो तक का मूल्यांकन भक्ति भाव के साथ किया, लिहाजा उन्हें उनके व्यक्तित्व में कोई खामी, उनके कार्यों में कोई कमी, उनके चरित्र में कोई खोट आदि दिखाई ही नहीं दिया । इस तरह की हर बात को षडयंत्रपूर्वक दबा दिया गया । धर्म को अफीम मानने वाले लोगों की अपने वैचारिक गुरुओं में इस तरह की आस्था उनको बौद्धिक रूप से लगातार बेईमान बनाती रही । भारत में इस तरह की बौद्धिक बेईमानी का खेल दशकों तक चलता रहा । कम्युनिस्टों को या वामपंथ में आस्था रखनेवाले साहित्यकारों, लेखकों को साहित्य में बहुत ऊपर का दर्जा दिया गया जबकि वामपंथ की परिधि से बाहर लेखन करनेवालों को, भारतीय परंपरा और धर्म, पौराणिक कथाओं और मिथकों पर लिखनेवालों को लगातार हाशिए पर रखा गया । ये सब एक सोची समझी रणनीति के तहत किया गया, साहित्य में इस तरह की राजनीति करनेवालों की पहचान करना आवश्यक है । खैर हम वापस मार्क्सवाद के दो पुरोधा की ओर लौटते हैं । माओ और फिडेल कास्ट्रो ।
अभी हाल ही में मैनें इन दोनों पर कई किताबें और किताबों के अंश पढ़े । जैसे माओ पर लिखी जंग चांग की किताब- द अननोन स्टोरी ऑफ माओ और फिडेल पर लिखी ब्रायन लैटल की किताब- कास्ट्रोज सीक्रेट, द सीआईए एंड क्यूबाज इंटेलिजेंस मशीन । इन दो किताबों के अलावा उन्नीस सौ अठानवे में वेंडी गिंबेल की एक किताब आई थी हवाना ड्रीम्स, उसमें भी कास्ट्रो पर लिखा गया है । अभी हाल ही में एक किताब आई है - द डबल लाइफ ऑफ फिडेल कास्ट्रो । इस किताब के लेखक हैं सत्रह सालों तक उनके अंगरक्षक रहे जुआन रियेनाल्डो सांचेज । इन किताबों के लेखक अलग अलग विचारधारा और पृष्ठभूमि के हैं । इन सारी किताबों या उनके अंशों को पढ़ने का बाद एक साझा सूत्र जो इन दोनों मार्क्स के अनुयायियों को जोड़ती है वह यह है कि दोनों लगभग तानाशाह थे । दोनों अपने विरोधियों को बर्दाश्त नहीं कर सकते थे । दोनों को अपने विरोधियों को निबटाने के लिए हिंसा का सहारा लेने में कोई गुरेज नहीं था । दोनों की सेक्सुअल लाइफ बेहद रहस्यमयी थी । दोनों अपने लिए बेशुमार दौलत इकट्ठा करना चाहते थे ।
अब एक प्रसंग माओ के बारे में देखिए । जब अक्तूबर उन्नीस सौ इकतालीस में वांग मिंग ने माओ को लेख लिखकर चुनौती दी तो माओ भन्ना गए । उन्होंने उनके लेखों को छपने से रोक दिया । मिंग ने अपने विचारों को पोस्टर के तौर पर प्रचारित किया । यह बात माओ के गले नहीं उतर रही थी वो रात में बाहर निकलकर उन पोस्टरों को पढ़नेवालों की संख्या को देखने निकलते थे । पोस्टरों की बढ़ी लोकप्रियता से घबराकर उन्होंने मिंग को निबटाने की योजना बनाई । एक दिन अचानक मिंग बीमार पड़ते हैं और अस्पताल में भर्ती होते हैं । माओ ने अपने पॉयजनिंग यूनिट के डॉक्टर जिन म्याओ को वांग मिंग के इलाज के लिए नियुक्त किया । उन्होंने मिंग के लिए कई ऑपरेशन सुझाए लेकिन वो खतरनाक होने की वजह से नहीं हो पाए । जब मिंग को अस्पताल से छुट्टी दी जानी थी तब डॉ जिन ने उनको गोली खिलाई जिसके बाद वो बीमार पड़ गए । बाद में जांच में पता चला कि ये मरकरी पॉयजनिंग का केस था । परिदृश्य पर रूस के एक डॉक्टर के आने के बाद यह बात खुली । इसी तरह से माओ ने सांस्कृतिक क्रांति के दौर में सिनेमा पर प्रतिबंध लगा दिया। उन्नीस सौ पचास में वहां उनतालीस फीचर फिल्में बनी तो दो साल बाद इसकी संख्या घटकर सिर्फ दो रह गई । सांस्कृति स्वतंत्रता की वकालत करनेवाले इन माओ के समर्थकों ने इतिहासबोध को खूंटी पर टांग दिया है, लगता है ।    

इसी तरह से अगर हम देखें तो फिडेल कास्ट्रो के चेहरे से भी क्रांतिकारी नायक का नकाब लगातार उतरता चला जाता है । फिडेल कास्ट्रो ने शादी शुदा होते हुए एक शादी शुदा महिला से ना केवल संबंध बनाए बल्कि उनके एक बच्चे के पिता भी बने । नटालिया नाम की इस महिला और कास्ट्रो के बीच के प्रेम पत्रों के सार्वजनिक होने के बाद इस विवाहेत्तर संबंध का खुलासा हुआ । अब से चंद महीने पहले नटालिया की मौत हुई और उन्हें इस बात का मलाल था कि जिस शख्स ने 1953 में आक्रमण की रणनीति उनके घर पर रहकर बनाई वही शख्स जब दो साल बाद क्यूबा की सत्ता पर काबिज होते है तो उसको भूल जाता है । भूल तो वो अपनी बेटी को भी जाता है । यह मार्क्सवाद की एक गिलास पानी की अवधारणा का निकृष्टतम रूप है । अब उससे भी एक खतरनाक बात सामने आई है । सत्रह साल तक क्यूबा के राष्ट्रपति फिडेल कास्ट्रो के अंगरक्षक रहे जुआन रियेनाल्डो सांचेज की ताजा किताब- द डबल लाइफ ऑफ फिडेल कास्ट्रो -  से यह खुलासा किया है कि किस तरह से कास्ट्रो ने एक ड्रग्स कारोबारी को पचहत्तर हजार डॉलर के एवज में क्यूबा में ऐश करने की अनुमति दी । इस किताब में इस बात के पर्याप्त सबूत दिए गए हैं कि किस तरह से फिडेल कास्ट्रो अपने सीक्रेट रूम में बैठकर कोकीन कारोबारी के बारे में सौदेबाजी कर रहे थे । इस किताब के लेखक ने इस बात का भी खुलासा किया है कि कास्ट्रो के हवाना में बीस आलीशान कोठियां हैं, वो एक कैरेबियन द्वीप के भी मालिक हैं । इस तरह के खुलासों से साफ है कि मार्क्सवाद की आड़ में उनके रहनुमा रहस्यमयी सेक्सुअल लाइफ से लेकर तमाम तरह के भौतिकवादी प्रवृत्तियों को अपनाते हैं और विचारधारा की आड़ में व्यवस्था बदलने का सपना दिखाकर अपना उल्लू सीधा करते हैं । 

Saturday, July 7, 2012

फिडेल का फरेब ?

क्यूबा-फिडेल कास्ट्रो और अमेरिका जॉन एफ कैनेडी ये दो ऐसे विषय हैं जिनपर अबतक सैकड़ो किताबें लिखी जा चुकी हैं, हजारों लेख लिखे जा चुके हैं । लेकिन क्यूबा और अमेरिका में शह और मात के खेल में साठ के दशक में जो चालें चली गई हैं अब जाकर उनपर से धीरे-धीरे पर्दा हटने लगा है । अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी की हत्या पर भी सैकड़ों लेखकों ने लिखा, कई फिल्में बनीं, अपराध कथा लेखकों ने राष्ट्रपति की हत्या पर उपन्यास लिखे, टीवी निर्माताओं ने कैनेडी की हत्या और कैनेडी-कास्ट्रो संबंधों पर डॉक्यूमेंट्री बनाईं । कैनेडी की हत्या के चालीस साल बाद भी ये एक ऐसा विषय है जो अब भी लेखकों को झकझकोरते हुए चुनौती देता है । कैनेडी की मर्जर मिस्ट्री को लोग दुनिया की सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री करार दे चुके हैं । नतीजा यह है कि इस विषय पर हर साल कई नई किताबें आती है जिसका लेखक शोध का दावा करते हुए कुछ नया अन्वेषण का ऐलान करता है । अब अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए में लंबे समय तक लैटिन अमेरिका मामलों के आला खुफिया अधिकारी ब्रायन लैटल की नई किताब- कास्ट्रोज सीक्रेट्स : द सीआईए एंड क्यूबाज इंटेलिजेंस मशीन- में कई सनसनीखेज खुलासे हुए हैं । ब्रायन का दावा है उन्होंने इस किताब को लिखने के लिए तकरीबन पांच साल तक शोध किया और हजारों दस्तावेज खंगाले । इसके अलावा अमेरिका और क्यूबा के खुफिया एजेंसी के अफसरों से बात की । इस किताब में लेखक का दावा है कि क्यूबा के राष्ट्रपति फिडेल कास्ट्रो को अमेरिका के राष्ट्रपति जे एफ कैनेडी के कत्ल के बारे में पता था और उन्होंने 22 नवंबर 1963 को कैनेडी के कत्ल के बाद झूठ बोला था कि उन्हें इस कत्ल की ना तो कोई जानकारी थी और ना ही आभास । कास्ट्रो ने ये बयान कैनेडी के कत्ल के एक दिन बाद दिया था जिसे उन्होंने अलग अलग जगहों पर कई बार दोहराया भी है । कास्ट्रो ने इस बात से भी इंकार किया था कि कैनेडी के कातिल ओसवाल्ड को वो जानते हैं ।

इस किताब के लेखक ब्रायन ने क्यूबा के पूर्व खुफिया अधिकारी और उसके राजदूतावास में उस वक्त तैनात रहे अफसरों के हवाले से कास्ट्रो के दोनों बयानों को झूठा ठहराया है । ब्रायन ने एक वक्त क्यूबा के डीजीआई इंटेलिजेंस सर्विस के अहम अधिकारी रहे और 1987 में क्यूबा छोड़कर अमेरिका में शरण लेनेवाले फ्लोरेन्टिनो लोम्बार्ड के हवाले से बताया है कि कास्ट्रो को कत्ल की जानकारी थी । लोम्बार्ड के मुताबिक जिस दिन कैनेडी का कत्ल हुआ उस दिन उसको आदेश मिला था कि वो अमेरिका के रेडियो तरंग को पकड़ने के लिए हवाना में लगे एंटिना का रुख मियामी से हटाकर टैक्सास की तरफ कर दें और वहां की हर छोटी बड़ी सूचना से तुरंत ही देश के सर्वोच्च नेता को अवगत कराया जाए। हुक्म देने वाले ने जोर देकर कहा था कि टैक्सास में घटित होनेवाली हर छोटी से छोटी घटना को भी नजरअंदाज नहीं किया जाए । इस हुक्म के चंद घंटों के भीतर ही टैक्सास में अमेरिकी राष्ट्रपति कैनेडी को ओसवाल्ड ने गोलियों से भून दिया । लेखक का दावा है कि फ्लोरेन्टिनो लोम्बार्ड ने उन्हें यह भी बताया था कि कास्ट्रो को इस बात की पहले से जानकारी थी कि ओसवाल्ड कैनेडी को गोली मारेगा । इसके अलावा लैटेल ने जो दूसरा परिस्थितिजन्य सबूत पेश किया है वो यह है कि ओसवाल्ड के कैनेडी को मारने के इरादे का भी पता कास्ट्रो को था और क्यूबा का राष्ट्रपति उस शख्स को जानता भी था । कैनेडी के कत्ल के पहले ओसवाल्ड ने क्यूबा के मैक्सिको स्थित दूतावास में क्यूबा जाने के लिए वीजा का आवेदन दिया था जिसे दूतावास ने खारिज कर दिया था । वीजा खारिज होने से खफा ओसवाल्ड ने चिल्लाते हुए कहा था कि मैं कैनेडी को मारने जा रहा हूं और कास्ट्रो के समर्थन में नारे लगाए थे । ये बातें कास्ट्रो को उनके दूतावास अधिकारियों ने बताई थी । बाद में कास्ट्रो ने भी एक डबल एजेंट से हुई बातचीत में इस बात को स्वीकार भी किया था ।

इस किताब में इन दो बातों के आधार पर ये साबित करने की कोशिश की गई है कि कास्ट्रो ने कैनेडी के कत्ल की पहले से जानकारी नहीं होने के बारें में झूठ बोला था । लेकिन लेखक इस बात को लेकर बेहद सावधान हैं कि इस किताब से यह ध्वनित नहीं हो कि कैनेडी के कत्ल की साजिश रचने में कास्ट्रो की कोई प्रत्यक्ष भूमिका थी । ब्रायन ने यह स्वीकार किया है कि - उन्हें नहीं मालूम कि फिडेल कास्ट्रो ने कत्ल का हुक्म दिया था । उन्हें यह भी नहीं मालूम कि कातिल ओसवाल्ड कास्ट्रो के इशारे पर काम कर रहा था । ब्रायन के मुताबिक ये मुमकिन हो सकता है कि ओसवाल्ड कास्ट्रो के इशारे पर काम कर रहा हो लेकिन उन्हें अपने शोध के दौरान इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिला । उन्होंने ये साबित करने की कोशिश की है कि फिडेल कास्ट्रो को कैनेडी से अपनी जान का खतरा था । इतिहास में इस बात के पर्याप्त सबूत मौजूद हैं हैं बगैर अमेरिकी जनता की जानकारी और अमेरिकी कांग्रेस को विश्वास में लिए जॉन और रॉबर्ट कैनेडी ने आठ बार फिडेल के कत्ल की साजिश रची और आठों बार नाकाम रहे । दरअसल फिडेल कास्ट्रो की खुफिया जानकारियां और रणनीति अमेरिकी खुफिया एजेंसियों और उनकी रणीनित से बेहतर थी । इस वजह से अमेरिका तमाम कोशिशों को बावजूद क्यूबा को झुका नहीं पाया ।
लेकिन ब्रायन लैटल ने की नई किताब - कास्ट्रोज सीक्रेट्स : द सीआईए एंड क्यूबाज इंटेलिजेंस मशीन में जो बातें क्यूबा के कम्युनिस्ट नेता फिडेल कास्ट्रो के बारे में लिखी गई हैं उसका जिक्र कैनेडी हत्याकांड की जांच कर रही किसी एजेंसी ने नहीं किया । कैनेडी की हत्या की जांच करनेवाली वॉरेन कमीशन, द हाउस असेसिनेशन कमेटी और द चर्च कमेटी ने अपनी जांच के दौरान इन तथ्यों को क्यों नजरअंदाज कर दिया । यह एक बड़ा सवाल है । कैनेडी की हत्या पर अमेरिका में वर्षों से शोध हो रहे हैं।  सरकरी कमीशनों और खुफिया एजेंसियों ने इस हत्याकांड और उसे जुड़े तथ्यों को करीब पचास लाख पन्नों में दर्ज कियया है लेकिन उन पचास लाख पन्नों में इन दो तथ्यों का उल्लेख नहीं होना हैरान करनेवाला है । हो सकता है कि कई सालों बाद जब कुछ और वर्गीकृत सूचनाएं सार्वजनिक हों तो इस बात का खुलासा हो लेकिन फिलहाल ब्रायन की इस किताब ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है कि क्या कैनेडी के कत्ल के मामले में फिडेल कास्ट्रो ने झूठ बोला था ।